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नीति आयोग के निवेश अनुकूलता सूचकांक में शीर्ष पर गुजरात, बंदरगाहों से सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के विकास तक: पढ़ें कैसे ये राज्य बना निवेशकों की पहली पसंद

नीति आयोग के पहले निवेश अनुकूलता सूचकांक में गुजरात पहले स्थान पर रहा। मजबूत बुनियादी ढाँचे, नीतिगत स्थिरता और निवेशकों के भरोसे ने राज्य को शीर्ष पर पहुँचाया।

जब देश का कोई उद्योगपति 500 करोड़ या 5000 करोड़ रुपए का निवेश करने का फैसला करता है, तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि उसे सस्ती जमीन कहाँ मिलेगी या सबसे ज़्यादा टैक्स छूट कौन देगा।

उसका पहला सवाल होता है अगर मैं इस राज्य में निवेश करता हूँ, तो क्या मेरी फैक्ट्री तय समय पर बन पाएगी? क्या सरकार मेरे साथ एक साझेदार की तरह काम करेगी या मुझे महीनों तक फाइलों और मंजूरियों के चक्कर लगाने पड़ेंगे? बंदरगाह कितनी दूर है? क्या 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहेगी? क्या तैयार सामान देश और विदेश के बाजारों तक तेजी से पहुँच सकेगा? और सबसे अहम बात, क्या आज लागू नीतियों पर अगले पाँच साल बाद भी भरोसा किया जा सकेगा?

ये सवाल भले ही सामान्य लगें, लेकिन दुनिया भर में अरबों डॉलर का निवेश किस देश या किस राज्य में जाएगा, इसका फैसला अक्सर इन्हीं सवालों के जवाब तय करते हैं। यही वजह है कि निवेश की दुनिया में एक मशहूर कहावत है कि कोई भी कारोबारी सबसे पहले नक्शा नहीं देखता, बल्कि सरकार का रवैया देखता है। नक्शा बाद में देखा जाता है।

भारत में भी निवेश आकर्षित करने के लिए राज्यों के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा चल रही है। कुछ राज्य सस्ती जमीन उपलब्ध कराते हैं, कुछ टैक्स में छूट देते हैं, कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) विकसित करते हैं।

जबकि कुछ बड़े-बड़े निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित कर दुनिया भर के उद्योगपतियों को निवेश के लिए आमंत्रित करते हैं। लेकिन इन सभी प्रयासों के बीच एक सवाल का व्यवस्थित और स्पष्ट जवाब कभी सामने नहीं आया निवेशक के नजरिए से भारत का सबसे अनुकूल राज्य कौन सा है?

इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए नीति आयोग ने पहली बार पूरे देश के लिए ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’ तैयार किया है। इस सूचकांक के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का एक समान मानदंडों पर आकलन किया गया।

इसमें सिर्फ सरकारों के दावों को ही आधार नहीं बनाया गया, बल्कि निवेशकों के वास्तविक अनुभवों को भी बराबर महत्व दिया गया। इस मूल्यांकन के नतीजों में गुजरात देश का सबसे निवेश-अनुकूल राज्य बनकर सामने आया। इसके बाद महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहा।

इस खबर को सिर्फ ‘गुजरात नंबर 1’ के तौर पर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि यह कोई सामान्य रैंकिंग नहीं है, न ही किसी मीडिया संस्थान का दिया गया पुरस्कार है और न ही किसी एक विभाग का मूल्यांकन।

यह सरकार की एक ऐसी पहल है, जिसके जरिए पहली बार यह समझने की कोशिश की गई है कि अगर कोई निवेशक अपना पैसा लेकर भारत आता है, तो निवेश के लिए उसे किस राज्य पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है।

और जब इस सवाल का जवाब गुजरात के पक्ष में आता है, तो यह सिर्फ एक साल की मेहनत का नतीजा नहीं माना जा सकता। इसके पीछे कई वर्षों से लगातार अपनाई गई एक व्यापक रणनीति है, जिसका असर आम लोगों को अक्सर तुरंत दिखाई नहीं देता।

यह सूचकांक केवल रैंकिंग के लिए नहीं है, यह भारत के भविष्य के लिए है

आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। आने वाले दो दशकों में भारत को विनिर्माण, निर्यात और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का प्रमुख केंद्र बनाने की लगातार बात की जा रही है। लेकिन सिर्फ इच्छा जताने से निवेश नहीं आता।

दुनिया की बड़ी कंपनियाँ अब केवल सस्ते श्रम को नहीं देखतीं। वे नीतिगत स्थिरता, कानूनी स्पष्टता, मजबूत बुनियादी ढाँचा, कुशल मानव संसाधन, बिजली, पानी, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और सरकारी फैसले लेने की गति जैसे सभी पहलुओं का एक साथ आकलन करती हैं।

नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी बात पर जोर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल केंद्र सरकार के प्रयासों से हासिल नहीं किया जा सकता।

आखिरकार उद्योग राज्यों में स्थापित होते हैं, रोजगार भी राज्यों में ही पैदा होता है और निवेश का सबसे बड़ा असर भी राज्यों पर ही दिखाई देता है। इसलिए यदि भारत को वैश्विक निवेश केंद्र बनना है, तो यह आकलन करना जरूरी है कि हर राज्य इसके लिए कितना तैयार है।

यह सोच एक दिन में विकसित नहीं हुई। जुलाई 2024 में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के लिए निवेश-अनुकूल ढाँचा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

इसके बाद केंद्रीय बजट 2025-26 में इसकी औपचारिक घोषणा की गई और अंततः यह सूचकांक तैयार किया गया। इसका उद्देश्य केवल राज्यों की रैंकिंग तय करना नहीं था, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से सीखने, अपनी कमियों को पहचानने और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना भी था। इसी वजह से इस सूचकांक को केवल एक साधारण रैंकिंग नहीं, बल्कि राज्यों के लिए एक ‘मार्गदर्शक’ के रूप में देखा जाना चाहिए।

निवेशक को अंततः क्या दिखता है?

मान लीजिए कोई जर्मन ऑटोमोबाइल कंपनी भारत में निवेश करना चाहती है। या फिर अमेरिका, जापान या ताइवान की कोई सेमीकंडक्टर कंपनी करोड़ों रुपए की लागत से अपना प्लांट लगाने की योजना बना रही है।

ऐसे में वह सबसे पहले क्या करेगी? सबसे पहले वह बाजार का आकलन करेगी। फिर कच्चे माल की उपलब्धता की जाँच करेगी। इसके बाद सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करेगी। वह यह जानना चाहेगी कि जरूरी मंजूरियाँ मिलने में कितना समय लगता है, पर्यावरण संबंधी प्रक्रियाएँ कितनी पारदर्शी हैं, बिजली और पानी की आपूर्ति कितनी भरोसेमंद है, कानून-व्यवस्था कैसी है और अगर भविष्य में सरकार बदल भी जाए, तो क्या नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।

नीति आयोग ने इन्हीं सभी सवालों के जवाबों को आंकड़ों के रूप में मापने की कोशिश की है। इसके लिए कुल 84 संकेतकों को आठ प्रमुख स्तंभों में बाँटा गया है। बुनियादी ढाँचे से लेकर संस्थागत व्यवस्था, कारोबारी माहौल से लेकर वित्तीय स्थिति और पर्यावरणीय लचीलेपन तक, हर महत्वपूर्ण पहलू को इसमें शामिल किया गया है।

इतना ही नहीं, सिर्फ सरकारों के दावों पर भरोसा करने के बजाय निवेशकों की धारणा का भी सर्वेक्षण किया गया, ताकि कागज पर दर्ज तथ्यों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर भी सामने आ सके।

यहीं से गुजरात की कहानी शुरू होती है। क्योंकि गुजरात की सफलता किसी एक योजना या एक फैसले का नतीजा नहीं है। यह कई वर्षों में लगातार लिए गए ऐसे फैसलों का परिणाम है, जिन्होंने धीरे-धीरे राज्य को न सिर्फ एक मजबूत औद्योगिक केंद्र बनाया, बल्कि निवेशकों के लिए सबसे भरोसेमंद राज्यों में भी शामिल कर दिया।

गुजरात की सबसे बड़ी ताकत सड़कें या बंदरगाह नहीं, बल्कि भरोसा है

गुजरात के पास समुद्र था, लेकिन सिर्फ समुद्र होने से कोई राज्य अपने आप उद्योग का केंद्र नहीं बन जाता। देश के कई अन्य राज्यों के पास भी बंदरगाह हैं। गुजरात के पास पर्याप्त जमीन भी थी, लेकिन केवल जमीन होने से वैश्विक कंपनियाँ करोड़ों रुपए का निवेश करने नहीं आतीं।

असली सवाल यह था कि क्या कोई राज्य अपनी भौगोलिक ताकत को नीतिगत ताकत में बदल सकता है? गुजरात ने पिछले दो दशकों में इस चुनौती को शायद सबसे सफल तरीके से पूरा किया है।

जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत हुई, तो कई लोगों ने इसे सिर्फ निवेशकों का एक भव्य सम्मेलन माना। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि इसका मकसद केवल समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर करवाना नहीं था।

इसका असली उद्देश्य दुनिया को यह भरोसा दिलाना था कि गुजरात निवेश के लिए पूरी तरह तैयार है, सरकार निवेशकों की बात सुनने के लिए तत्पर है और फैसले लेने में अनावश्यक देरी नहीं होगी।

यह सिर्फ एक संदेश नहीं था। लेकिन केवल संदेश देने से काम नहीं चलता। उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था भी खड़ी करनी पड़ती है और शायद यहीं से गुजरात ने कई अन्य राज्यों से अलग रास्ता अपनाया।

जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत हुई, तो कई लोगों ने इसे सिर्फ निवेशकों का एक भव्य सम्मेलन माना। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि इसका मकसद केवल समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर करवाना नहीं था।

इसका असली उद्देश्य दुनिया को यह भरोसा दिलाना था कि गुजरात निवेश के लिए पूरी तरह तैयार है, सरकार निवेशकों की बात सुनने के लिए तत्पर है और फैसले लेने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। यह सिर्फ एक संदेश नहीं था।

लेकिन केवल संदेश देने से काम नहीं चलता। उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था भी खड़ी करनी पड़ती है और शायद यहीं से गुजरात ने कई अन्य राज्यों से अलग रास्ता अपनाया।

नीतियाँ नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की रणनीति

गुजरात के औद्योगिक विकास का विश्लेषण करने पर एक बात साफ दिखाई देती है कि राज्य ने कभी भी किसी एक बड़ी परियोजना के भरोसे अपनी विकास रणनीति नहीं बनाई। इसके बजाय, उसने धीरे-धीरे ऐसा निवेश पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया, जिसमें निवेशक की लगभग हर जरूरत एक-दूसरे की पूरक बन गई।

अगर किसी कंपनी को जमीन मिल जाए लेकिन बिजली न हो, तो निवेश रुक जाएगा। अगर बिजली हो लेकिन बंदरगाह तक पहुँचने के लिए बेहतर सड़क न हो, तो उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी। अगर बंदरगाह भी हो, लेकिन सरकारी मंजूरियाँ मिलने में वर्षों लग जाएँ, तो कंपनी किसी दूसरे राज्य का रुख कर सकती है।

यही वजह है कि गुजरात ने अलग-अलग परियोजनाओं को स्वतंत्र योजनाओं की तरह नहीं, बल्कि एक समग्र विकास मॉडल के हिस्से के रूप में आगे बढ़ाया। इसी कारण आज जब गुजरात के नक्शे को देखा जाता है, तो वहाँ सिर्फ शहर नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े आर्थिक केंद्र दिखाई देते हैं।

कांडला और मुंद्रा जैसे बंदरगाह देश के व्यापार के प्रमुख प्रवेश द्वार बन चुके हैं। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर राज्य को सीधे उत्तर भारत से जोड़ता है। समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर माल परिवहन को तेज और अधिक प्रभावी बनाते हैं।

धोलेरा जैसे नए औद्योगिक शहर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किए जा रहे हैं। वहीं सानंद ऑटोमोबाइल उद्योग से लेकर सेमीकंडक्टर विनिर्माण तक, नए उद्योगों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।

अगर इन सभी परियोजनाओं को अलग-अलग देखा जाए, तो इनका प्रभाव उतना बड़ा नहीं लगता, लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है, तो गुजरात एक संपूर्ण और मजबूत निवेश पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में सामने आता है।

शायद यही वजह है कि नीति आयोग ने बुनियादी ढाँचे को केवल सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं रखा। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेश आकर्षित करने के लिए भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ संस्थागत क्षमता और नीतिगत स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

इसी सोच के तहत इस सूचकांक में बुनियादी ढाँचे के अलावा कारोबारी माहौल, सुशासन, संसाधन उपलब्धता और संस्थागत वातावरण जैसे प्रमुख स्तंभों को भी समान महत्व दिया गया है।

गुजरात ने न केवल उद्योगों को आमंत्रित किया, बल्कि उद्योगों को आत्मविश्वास भी प्रदान किया

भारत में कई राज्य निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करते हैं, हजारों करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoU) की घोषणा करते हैं और टैक्स में अलग-अलग तरह की छूट भी देते हैं। लेकिन निवेशक केवल विज्ञापनों या घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वे वर्षों तक किसी राज्य के काम करने के तरीके और उसके व्यवहार का आकलन करते हैं।

किसी भी उद्योगपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि समय होता है। अगर किसी प्लांट को शुरू होने में दो साल की देरी हो जाए, तो इससे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।

यही वजह है कि दुनिया भर की कंपनियों के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस का मतलब केवल कोई प्रमाणपत्र या रैंकिंग नहीं, बल्कि सरकार के हर विभाग के साथ उनका वास्तविक अनुभव होता है।

गुजरात ने इसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, डिजिटल प्रक्रियाएँ और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका ने निवेशकों को यह संदेश दिया कि सरकार केवल एक नियामक नहीं, बल्कि विकास की साझेदार भी है।

नीति आयोग ने भी इस पहलू को विशेष महत्व दिया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेशकों के लिए नीतिगत पारदर्शिता, तेज निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ बेहतर समन्वय निवेश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं। शायद यही वजह है कि जब कोई नई वैश्विक कंपनी भारत में निवेश की संभावना पर विचार करती है, तो चर्चा में सबसे पहले गुजरात का नाम सामने आता है।

आज जो कुछ भी देखने को मिलता है, उसकी तैयारी कई साल पहले शुरू हो गई थी

भारत में कई राज्य निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करते हैं, हजारों करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoU) की घोषणा करते हैं और टैक्स में अलग-अलग तरह की छूट भी देते हैं।

लेकिन निवेशक केवल विज्ञापनों या घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वे वर्षों तक किसी राज्य के काम करने के तरीके और उसके व्यवहार का आकलन करते हैं।

किसी भी उद्योगपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि समय होता है। अगर किसी प्लांट को शुरू होने में दो साल की देरी हो जाए, तो इससे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।

यही वजह है कि दुनिया भर की कंपनियों के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस का मतलब केवल कोई प्रमाणपत्र या रैंकिंग नहीं, बल्कि सरकार के हर विभाग के साथ उनका वास्तविक अनुभव होता है।

गुजरात ने इसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, डिजिटल प्रक्रियाएँ और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका ने निवेशकों को यह संदेश दिया कि सरकार केवल एक नियामक नहीं, बल्कि विकास की साझेदार भी है।

नीति आयोग ने भी इस पहलू को विशेष महत्व दिया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेशकों के लिए नीतिगत पारदर्शिता, तेज निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ बेहतर समन्वय निवेश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।

शायद यही वजह है कि जब कोई नई वैश्विक कंपनी भारत में निवेश की संभावना पर विचार करती है, तो चर्चा में सबसे पहले गुजरात का नाम सामने आता है।

लेकिन इस सफलता की असली कसौटी कहाँ है?

कोई भी सरकार अपने विकास के दावे कर सकती है। वह बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की घोषणा भी कर सकती है। लेकिन उसकी वास्तविक सफलता की परीक्षा तब होती है, जब कोई निष्पक्ष संस्था समान मानदंडों पर सभी राज्यों का मूल्यांकन करे और यह सवाल पूछे कि निवेशकों के लिए सबसे अनुकूल माहौल आखिर कहाँ है।

नीति आयोग का यह पहला निवेश अनुकूलता सूचकांक इसी कसौटी पर आधारित है। इसमें गुजरात का पहले स्थान पर आना इस बात का संकेत है कि पिछले दो दशकों में राज्य द्वारा अपनाया गया विकास मॉडल केवल बड़ी परियोजनाएँ खड़ी करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत करने में भी सफलता हासिल की है।

आम गुजरातियों के बारे में क्या?

अक्सर जब ऐसी रिपोर्टें सामने आती हैं, तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठता है कि अगर किसी राज्य को निवेश के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है, तो उससे उसे क्या फायदा होगा? पहली नजर में ऐसा लगता है कि निवेशक आएँगे तो उद्योगपतियों को लाभ होगा, सरकार अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाएगी, लेकिन आम नागरिक के जीवन में क्या बदलेगा? वास्तव में, निवेश की पूरी व्यवस्था ऐसी है कि इसका सबसे बड़ा और सबसे व्यापक असर आम लोगों पर ही पड़ता है।

मान लीजिए कोई कंपनी गुजरात में 10000 करोड़ रुपए की लागत से एक नया प्लांट लगाने का फैसला करती है। खबरों में यह बात प्रमुखता से आएगी कि इतने करोड़ रुपए का निवेश हुआ है। लेकिन इसकी असली कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।

प्लांट बनने से पहले ही निर्माण कार्य में हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके साथ ही मशीनरी पहुँचाने वाले, ट्रांसपोर्टर, गोदाम संचालक, स्थानीय सप्लायर, छोटे-बड़े ठेकेदार और आसपास के कारोबारियों की आय और कामकाज भी बढ़ने लगता है। जब प्लांट शुरू होता है, तो केवल प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं मिलता, बल्कि उससे जुड़े कई छोटे और सहायक उद्योग भी विकसित होने लगते हैं।

किसी एक बड़े उद्योग के आसपास धीरे-धीरे पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था आकार लेने लगती है। नए आवासीय क्षेत्र विकसित होते हैं। स्कूल, अस्पताल, होटल, रेस्टोरेंट, बैंक और दूसरी जरूरी सेवाओं का विस्तार होता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री किसी बड़े निवेश को केवल एक कंपनी का निवेश नहीं मानते, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का इंजन मानते हैं।

शायद इसी कारण से नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में निवेश को केवल उद्योग स्थापित करने तक सीमित नहीं रखा है। रिपोर्ट में निवेश को रोजगार सृजन, उत्पादन, निर्यात, उत्पादकता और दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि से सीधे जोड़ा गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कहा गया है कि बेहतर निवेश वातावरण किसी भी राज्य की समग्र आर्थिक क्षमता को मजबूत बनाता है।

लेकिन प्रथम स्थान प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है

गुजरात के लिए यह पहला स्थान निश्चित रूप से गर्व की बात है, लेकिन शायद इससे भी बड़ी बात यह है कि अब पूरे देश की निगाहें गुजरात पर होंगी। क्योंकि यह सूचकांक कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है, जिसे एक बार तैयार करके बंद कर दिया जाए।

नीति आयोग का स्पष्ट उद्देश्य है कि इस मूल्यांकन को समय-समय पर दोहराया जाए, राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिले और हर राज्य दूसरे राज्यों से सीखकर अपने प्रदर्शन में सुधार करे।

यही वजह है कि आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्य भी अपनी नीतियों को और बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे। इससे राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक मजबूत होगी।

ऐसे में गुजरात के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पहला स्थान हासिल करना नहीं, बल्कि उसे लगातार बनाए रखना है। क्योंकि निवेश की दुनिया में अतीत की उपलब्धियों से कहीं ज्यादा महत्व वर्तमान प्रदर्शन और लगातार सुधार का होता है।

जो राज्य आज सबसे आगे है, अगर वह समय के साथ खुद को नहीं बदलेगी, तो कल पीछे भी छूट सकती है। दुनिया की बड़ी कंपनियाँ केवल भारत के राज्यों की आपस में तुलना नहीं करतीं, बल्कि वे भारत की तुलना वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, मैक्सिको और पूर्वी यूरोप जैसे देशों से भी करती हैं। इसलिए गुजरात के लिए अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ देश के भीतर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर है।

इस चर्चा का शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है

इस सूचकांक को ध्यान से पढ़ने पर एक बात बार-बार सामने आती है। नीति आयोग ने कहीं भी यह नहीं कहा कि सिर्फ सस्ती जमीन उपलब्ध करा देने से निवेश आ जाएगा। न ही रिपोर्ट में यह कहा गया है कि केवल टैक्स में छूट देकर कोई राज्य निवेश का केंद्र बन सकता है।

इसके विपरीत, पूरी रिपोर्ट में एक स्पष्ट और लगातार उभरने वाला विचार यह है कि निवेश तभी आता है, जब पूरा पारिस्थितिकी तंत्र निवेशकों का भरोसा जीतता है। इसका मतलब है, अच्छी और स्थिर नीतियाँ, मजबूत बुनियादी ढाँचा, तेज और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया, प्रभावी शासन और भविष्य के लिए स्पष्ट रणनीति।

शायद यही वजह है कि गुजरात की सफलता को केवल किसी एक विभाग या किसी एक सरकार की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह कई वर्षों में विकसित हुए एक ऐसे समग्र विकास मॉडल का परिणाम है, जिसमें बंदरगाह, सड़कें, औद्योगिक गलियारे, निवेश-अनुकूल नीतियाँ, निवेशकों के साथ लगातार संवाद, नई तकनीकों को अपनाने की तैयारी और सुशासन की दक्षता इन सभी ने मिलकर एक-दूसरे की पूरक भूमिका निभाई है।

सिर्फ प्रथम स्थान ही नहीं, बल्कि विकास मॉडल की एक परीक्षा भी

भारत में विकास पर होने वाली चर्चा अक्सर राजनीतिक दावों और प्रतिदावों के बीच उलझ जाती है। जब कोई सरकार किसी उपलब्धि का श्रेय लेती है, तो विपक्ष उसकी आलोचना करता है।

लेकिन कुछ अवसर ऐसे भी होते हैं, जब बहस राजनीतिक बयानों पर नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होती है। नीति आयोग का पहला निवेश अनुकूलता सूचकांक ऐसा ही एक उदाहरण है।

यह सूचकांक यह नहीं कहता कि गुजरात में कोई समस्या नहीं है या वहाँ सुधार की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके उलट, इसका उद्देश्य राज्यों को लगातार बेहतर प्रदर्शन करने और सुधार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जरूरी विभिन्न मानकों पर गुजरात फिलहाल देश के अन्य सभी राज्यों से आगे है।

इसलिए गुजरात के इस पहले स्थान को केवल एक ट्रॉफी या रैंकिंग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे पिछले दो दशकों में राज्य द्वारा तय की गई विकास यात्रा की एक महत्वपूर्ण परीक्षा और उसकी सफलता के प्रमाण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

यही इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश भी है। निवेशक केवल उन जगहों पर नहीं जाते, जहाँ सबसे बड़ी घोषणाएँ होती हैं, बल्कि वे वहाँ निवेश करते हैं, जहाँ उन्हें सबसे अधिक भरोसा दिखाई देता है।

नीति आयोग के पहले निवेश अनुकूलता सूचकांक ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल भारत के राज्यों में निवेशकों के भरोसे का सबसे मजबूत केंद्र गुजरात है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)






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ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
Being learner, Spiritual, Reader

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