करीब चार दशकों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के लगातार खतरे में जीता रहा। हर साल, खासकर मानसून के मौसम में, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, देवरिया और आसपास के जिलों में इस बीमारी के नए मामले सामने आते थे।
अस्पताल मरीजों से भर जाते थे, माता-पिता अपने बच्चों की जान बचाने की उम्मीद में इमरजेंसी वार्ड के बाहर इंतजार करते रहते थे और डॉक्टर बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज करने के लिए लगातार संघर्ष करते थे। गोरखपुर का बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज इस संकट का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था।
हर साल बीमारी के चरम मौसम में इंसेफ्लाइटिस से पीड़ित सैकड़ों बच्चों को यहाँ भर्ती कराया जाता था और लंबे समय तक यह बीमारी हर वर्ष सैकड़ों मासूमों की जान लेती रही। हालात इतने गंभीर हो चुके थे कि इंसेफ्लाइटिस को सिर्फ मौसमी बीमारी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाने लगा था।
2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तब उनके सामने कई दशकों से बनी इस गंभीर बीमारी पर नियंत्रण पाने की बड़ी चुनौती थी।
सिर्फ बीमारी से नहीं, इंसेफ्लाइटिस के हर कारण से लड़ने के लिए सरकार ने पूरे राज्य में खड़ी की व्यवस्था
योगी सरकार ने यह तय किया कि इंसेफ्लाइटिस जैसी बीमारी को सिर्फ अस्पतालों के भरोसे नहीं हराया जा सकता। इसलिए सरकार ने केवल मरीजों के बीमार होने के बाद उनका इलाज करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बीमारी के फैलने से पहले ही उसे रोकने के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति अपनाई।
सरकार बनने के कुछ ही समय बाद एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) की रोकथाम और उपचार के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए। इसके तहत कई विभागों को शामिल करते हुए एक समन्वित कार्ययोजना तैयार की गई। स्वास्थ्य विभाग को इंसेफ्लाइटिस से प्रभावित 38 जिलों के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया, जबकि चिकित्सा शिक्षा, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, महिला एवं बाल कल्याण, पशुपालन और बेसिक शिक्षा सहित कई विभागों ने एक साझा ढाँचे के तहत मिलकर काम किया।
यह राज्य की कार्यप्रणाली में एक बड़ा बदलाव था। टीकाकरण, स्वच्छता, जागरूकता, निगरानी, उपचार सुविधाएँ और बुनियादी ढाँचे के विकास को अलग-अलग प्रयासों के बजाय समाधान के समान रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों के तौर पर देखा गया।
घर-घर टीकाकरण और जागरूकता अभियान से सुनिश्चित की गई लाखों बच्चों की सुरक्षा
सरकार की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार टीकाकरण और जनजागरूकता के जरिए बीमारी की रोकथाम था। फरवरी 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने दस्तक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के खतरे वाले क्षेत्रों में कोई भी बच्चा टीकाकरण से वंचित न रहे।
परिवारों के स्वास्थ्य केंद्रों तक आने का इंतजार करने के बजाय आशा कार्यकर्ता, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी प्रभावित जिलों के गाँवों और घर-घर तक पहुँचे।

उन्होंने लोगों को बताया कि इंसेफ्लाइटिस कैसे फैलता है, शुरुआती लक्षण वाले बच्चों की पहचान की और माता-पिता को समझाया कि चेतावनी के संकेत दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें। स्कूलों को जागरूकता कार्यक्रमों का केंद्र बनाया गया, जबकि जोखिम वाले मौसम के दौरान गाँवों में लगातार जनजागरूकता अभियान चलाए गए।
सरकार का मानना है कि टीकाकरण और जागरूकता को सीधे लोगों के घरों तक पहुँचाने से बीमारी की शुरुआती पहचान बेहतर हुई और गंभीर संक्रमण के मामलों में कमी आई।
स्वच्छता को भी बनाया गया बीमारी की रोकथाम का मजबूत माध्यम
प्रशासन ने यह समझा कि प्रभावित जिलों में रहने की परिस्थितियों में सुधार किए बिना इंसेफ्लाइटिस पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी उपायों के साथ-साथ सरकार ने इस अभियान को स्वच्छ भारत मिशन से जोड़ा और गाँवों में स्वच्छता तथा साफ-सफाई को बढ़ावा दिया।
जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए लोगों को सुरक्षित पेयजल का उपयोग करने, आसपास का वातावरण साफ रखने और मच्छरों के पनपने की जगहों को खत्म करने के लिए प्रेरित किया गया। लोगों को सलाह दी गई कि बच्चों को सीधे मिट्टी के फर्श पर न सुलाएँ, जहाँ उपलब्ध हों वहाँ सुरक्षित पेयजल के लिए इंडिया मार्क-II हैंडपंप का इस्तेमाल करें।
संवेदनशील क्षेत्रों में सूअर रखने की जगहों को रिहायशी इलाकों से दूर रखें। जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के प्रसार को रोकने के लिए फॉगिंग और मच्छर नियंत्रण के उपायों को भी तेज किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि राज्य में इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों में कमी लाने में बेहतर स्वच्छता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
बेहतर अस्पतालों से इलाज और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को किया गया मजबूत
समुदाय स्तर पर बीमारी की रोकथाम के उपाय जारी रहने के साथ-साथ सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में इलाज की सुविधाओं को भी मजबूत किया। ग्रामीण क्षेत्रों में 15 ब्लॉक स्तरीय इंसेफ्लाइटिस उपचार केंद्र और मिनी पीडियाट्रिक केयर सेंटर स्थापित किए गए, ताकि मरीजों को लंबी दूरी तय किए बिना समय पर इलाज मिल सके।
आपातकालीन स्थिति से बेहतर ढंग से निपटने के लिए ब्लॉक स्तर के अस्पतालों में कम से कम तीन-तीन वेंटिलेटर उपलब्ध कराए गए। इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम, शुरुआती लक्षणों की पहचान और इलाज की प्रक्रिया को लेकर 3.5 लाख से अधिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
इन सुधारों से बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव कम करने में मदद मिली और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को पहले से अधिक तेजी से चिकित्सा सुविधा मिलनी शुरू हुई।
समन्वित सरकारी कार्रवाई के बाद इंसेफ्लाइटिस के मामले और मौतों में आई बड़ी कमी
टीकाकरण, स्वच्छता, जनजागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार जैसे कदमों का असर कुछ ही वर्षों में दिखाई देने लगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार, समन्वित अभियान शुरू होने के बाद उत्तर प्रदेश में इंसेफ्लाइटिस के मामलों में करीब 75 प्रतिशत और इससे होने वाली मौतों में लगभग 85 प्रतिशत की कमी आई।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर गोरखपुर में देखने को मिला, जिसे कभी इंसेफ्लाइटिस का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वर्ष 1977 से 2017 के बीच गोरखपुर में हर साल औसतन करीब 600 बच्चों की मौत एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) के कारण होती थी।
हालाँकि हाल के वर्षों में मौतों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जो बीमारी पर नियंत्रण में हुए बड़े सुधार का संकेत है।
अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज, जहाँ हर साल अगस्त महीने में आमतौर पर 500 से 600 इंसेफ्लाइटिस मरीज भर्ती होते थे, वहाँ प्रभावित जिलों में रोकथाम के उपायों के विस्तार के बाद भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में काफी कमी आई।
जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के मामले, जो कभी सैकड़ों की संख्या में दर्ज होते थे, अब पहले की तुलना में बहुत कम रह गए हैं।
सरकारी आँकड़ों में भी दिखी जापानी इंसेफ्लाइटिस के मामलों में लगातार गिरावट
सरकारी आँकड़े भी जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के मामलों में लगातार आई गिरावट को दर्शाते हैं।

वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफ्लाइटिस के 693 मामले और 93 मौतें दर्ज की गई थीं। इसके बाद हर साल स्थिति में लगातार सुधार देखने को मिला। वर्ष 2018 में 323 मामले और 25 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद 2019 में मामले घटकर 235 रह गए।
वर्ष 2020 में 100 मामले, 2021 में 153, 2022 में 124 और जनवरी से जुलाई 2023 के बीच केवल 17 मामले सामने आए, जबकि इस अवधि में एक भी मौत दर्ज नहीं हुई।
राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (National Centre for Vector-Borne Disease Control) के अनुसार, इस दौरान जापानी इंसेफ्लाइटिस के मामलों में 80 प्रतिशत से अधिक और मौतों में 95 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई।
9 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि 1 जनवरी से 7 सितंबर के बीच उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफ्लाइटिस, चिकनगुनिया और मलेरिया से एक भी मौत दर्ज नहीं हुई। उन्होंने इसे 2017 के बाद शुरू किए गए लगातार प्रयासों का परिणाम बताया और कहा कि सरकार का अगला लक्ष्य इस बीमारी का पूरी तरह उन्मूलन करना है।
सैकड़ों मौतों वाले दौर से निकलकर राज्य वर्ष 2024 से इंसेफ्लाइटिस से शून्य मौतों की स्थिति दर्ज कर रहा है। वहीं वर्ष 2026 में अब तक इंसेफ्लाइटिस के केवल 3 मामले सामने आए हैं और सभी मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया गया है।
उत्तर प्रदेश के इंसेफ्लाइटिस नियंत्रण मॉडल को यूनिसेफ से मिली अंतरराष्ट्रीय सराहना
उत्तर प्रदेश के प्रयासों की सराहना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने भी की। यूनिसेफ ने दस्तक अभियान के तहत जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) और एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) के खिलाफ उत्तर प्रदेश के बड़े स्तर पर चलाए गए टीकाकरण अभियान की प्रशंसा की।
A big shout out to #UttarPradesh for immunizing every child in the state against Japanese Encephalitis and Acute Encephalitis Syndrome under the #Dastak campaign! 👏#VaccinesWork for #DimagiBukharSeJung#EveryChildALIVE #WorldImmunizationWeek @CMOfficeUP @MoHFW_INDIA pic.twitter.com/4ww8aCdgOx
— UNICEF India (@UNICEFIndia) April 25, 2018
संगठन ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि सरकार ने केवल अस्पतालों में इलाज पर निर्भर रहने के बजाय टीकाकरण, स्वच्छता, जनजागरूकता और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को एक साथ जोड़कर काम किया।
यूनिसेफ ने स्वास्थ्यकर्मियों, शिक्षकों और आशा कार्यकर्ताओं की भी सराहना की, जिन्होंने प्रभावित जिलों के दूर-दराज के गाँवों तक जागरूकता और टीकाकरण अभियान पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अंतरराष्ट्रीय सराहना ने उत्तर प्रदेश की उस छवि को और मजबूत किया है, जिसने कई पीढ़ियों से क्षेत्र को परेशान कर रही इस बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण हासिल करने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।
क्या है जापानी इंसेफ्लाइटिस और कैसे फैलती है यह बीमारी?
जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) एक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलती है। यह वायरस प्राकृतिक रूप से सूअरों और कुछ प्रजातियों के पक्षियों में पाया जाता है। मच्छर इन संक्रमित जानवरों से वायरस लेकर इंसानों तक पहुँचाते हैं। यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलती।
यह वायरस मस्तिष्क पर हमला करता है और तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दौरे पड़ना, भ्रम की स्थिति और बेहोशी जैसे लक्षण पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में यह स्थायी रूप से तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है या मरीज की मौत भी हो सकती है।
बच्चों में इस बीमारी का खतरा सबसे अधिक होता है, इसलिए उनके लिए समय पर टीकाकरण और शुरुआती इलाज बेहद जरूरी माना जाता है।
जापानी इंसेफ्लाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ टीकाकरण, मच्छर नियंत्रण, स्वच्छता, समय पर बीमारी की पहचान और सहायक उपचार को इससे होने वाली मौतों को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका मानते हैं।
दीर्घकालिक योजना से मिली सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी सफलता
UP में इंसेफ्लाइटिस के खिलाफ लड़ाई यह दिखाती है कि लंबे समय से चली आ रही किसी स्वास्थ्य चुनौती से समन्वित प्रयासों के जरिए प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।
टीकाकरण, घर-घर जागरूकता अभियान, स्वच्छता, बेहतर अस्पताल, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और कई विभागों के बीच तालमेल को एक साथ जोड़कर राज्य ने इस बीमारी से कई स्तरों पर मुकाबला किया। कई दशकों तक इंसेफ्लाइटिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आपदाओं में से एक रहा।
हर मानसून में हजारों परिवार अपने बच्चों को खोते थे और अस्पतालों पर मरीजों का भारी दबाव रहता था। पिछले कुछ वर्षों में मामलों और मौतों में आई लगातार गिरावट ने उत्तर प्रदेश के इस मॉडल को इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बना दिया है कि लंबे समय तक लगातार किए गए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयास किसी महामारी जैसी चुनौती की दिशा बदल सकते हैं।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


