‘हिंदू धर्म में नदी को देवी रूप में पूजा जाता है’: मद्रास HC ने ताम्रपर्णी नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए दिया ‘कानूनी व्यक्ति’ का दर्जा

मद्रास हाई कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने फैसले में ताम्रपर्णी (ताम्रबरणी) नदी को ‘कानूनी व्यक्ति’ (ज्यूरिस्टिक पर्सन) का दर्जा दे दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म में इस नदी को देवी के रूप में पूजा जाता है, इसलिए इसे कानून की नजर में एक व्यक्ति माना गया है। कोर्ट ने नदी को प्रदूषित करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।

मद्रास हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि नदी को यह कानूनी दर्जा केवल प्रदूषण से बचाने के अधिकारों के लिए दिया गया है। इसके अलावा इस घोषणा से कोई अन्य कानूनी अधिकार या देनदारियाँ पैदा नहीं होंगी। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि नदी को गंदा करना न केवल पर्यावरण कानूनों और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, बल्कि यह खुद नदी के अपने अधिकारों के भी खिलाफ है।

ताम्रपर्णी (ताम्रबरणी) नदी में कचरे के ढेर

सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट को नदी में फैल रहे भारी प्रदूषण के बारे में जानकारी दी गई। एक कार्यकर्ता ने कोर्ट को बताया कि नदी में हर दिन कम से कम एक टन पुराने और इस्तेमाल किए गए कपड़े फेंके जा रहे हैं। कोर्ट के सामने पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, केवल कुछ हफ्तों के सफाई अभियान के दौरान नदी से भारी मात्रा में कचरा निकाला गया है।

सफाई के दौरान 86 से 90 टन कपड़े, 2.2 टन पवित्र राख, 1,385 किलो प्लास्टिक कचरा और 220 किलो कांच की बोतलें बाहर निकाली गईं। इसके अलावा नदी से 374 किलो से ज्यादा सैनिटरी नैपकिन और डाइपर भी बरामद किए गए। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि धर्म के नाम पर भी किसी को जल स्त्रोत को गंदा करने का कोई अधिकार नहीं है।

केवल अस्थि विसर्जन की अनुमति

कोर्ट ने ताम्रपर्णी (ताम्रबरणी) नदी में कपड़े, प्लास्टिक और अन्य सामग्रियाँ फेंकने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। तिरुनेलवेली जिला प्रशासन को इस प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया गया है। प्रशासन को नदी को साफ रखने के लिए जागरूकता अभियान चलाने और समाज के लोगों को जोड़ने को कहा गया है।

स्थानीय निकायों को आदेश दिया गया है कि वे नदी को गंदा करने वालों पर जुर्माना लगाने के लिए प्रस्ताव पास करें। हालाँकि, धार्मिक और भावनात्मक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने केवल अस्थि विसर्जन की अनुमति दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अस्थियों को केवल बिना पके हुए मिट्टी के बर्तनों में लाया जाए, जो पानी में आसानी से घुल जाएं।

400 साल पुराने मंडपम को खाली कराने का आदेश और इतिहास

यह फैसला सुनाते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने शिवनुपांडियन नाम के व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने पापनासहम में स्नान घाट पर स्थित 400 साल पुराने ‘आनंदविलास’ मंडपम से अपने बेदखल किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने पाया कि यह जमीन सरकारी रिकॉर्ड में नदी की है और इस प्राचीन पत्थर की संरचना को अवैध रूप से दीवारों का निर्माण करके पूरी तरह बदल दिया गया था।

कोर्ट ने शिवनुपांडियन की याचिका को खारिज करते हुए पापनासा स्वामी मंदिर को तुरंत इस मंडपम को अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। मंदिर के अधिकारियों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के साथ मिलकर इस प्राचीन ढांचे को इसके मूल रूप में बहाल करने को कहा गया है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि नदी में प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और कोर्ट की अवमानना का मामला चलाया जाएगा।