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बदली नहीं आतंकियों और कश्मीरी नेताओं की सोच, बना रखा है वही माहौल: एक खास विचारधारा का विस्तार है J&K की आतंकी घटनाएँ

अचानक इस तरह के हमलों का बढ़ जाना यह दिखाता है कि स्थानीय और विदेशी आतंकवादी लगातार सामान्य होती प्रशासनिक व्यवस्था और जनजीवन से विचलित हैं और अपनी तरफ से हर कोशिश करके सामान्य व्यवस्था में अशांति फैलाना चाहते हैं।

कश्मीर में पिछले कुछ दिनों में आतंकवाद की कई घटनाएँ हुईं जिनमें गैर-मुस्लिमों की हत्या की गई। अब तक अलग-अलग हमलों में इस्लामी आतंकवादियों द्वारा पिछले 5 दिनों में कुल 7 लोगों की हत्या कर दी गई। सबसे ताजा आतंकी हमले में स्कूल के एक हिंदू अध्यापक और एक सिख अध्यापिका की हत्या की गई। इससे पहले एक स्थानीय व्यापारी माखन लाल बिंद्रू और बिहार के एक स्ट्रीट हॉकर, बिरेंदर पासवान की हत्या की गई थी।

अचानक हुए इन आतंकवादी हमलों ने स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ केंद्र सरकार को सकते में डाल दिया है। जहाँ एक ओर आतंकवादी संगठन और उनके समर्थक तथाकथित कश्मीरियत को वापस लाने के लिए खुश हो रहे होंगे। कश्मीर में अचानक हो रहे इन आतंकवादी हमलों का क्या कारण हो सकता है? प्रश्न यह भी है कि ये हमले क्या 2019 से पहले होने वाले हमलों से अलग हैं? इससे पहले पंचायत चुनावों में भाग लेने वाले लोगों पर हमले हुए थे और कुछ लोगों की हत्या भी कर दी गई थी।

अब अचानक इस तरह के हमलों का बढ़ जाना यह दिखाता है कि स्थानीय और विदेशी आतंकवादी लगातार सामान्य होती प्रशासनिक व्यवस्था और जनजीवन से विचलित हैं और अपनी तरफ से हर कोशिश करके सामान्य व्यवस्था में अशांति फैलाना चाहते हैं। कश्मीर को लेकर आतंकवादियों और स्थानीय राजनेताओं की सोच में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है। राजनीतिक दलों और नेताओं ने अभी भी लगभग वही माहौल बनाकर रखा है जो वे पहले यह कहते हुए बनाकर रखते थे, कि; 370 कोई नहीं हटा सकता।

अब अंतर बस इतना है कि ये नेता अब कहते फिरते हैं कि 370 की बहाली होगी। हत्या की इन घटनाओं पर घाटी के नेताओं के बयान और राजनीतिक हालात को लेकर उनके बयान मेल ही नहीं खाते। माखन लाल बिंद्रू की हत्या पर जिन फारुख अब्दुल्ला ने यह कहा कि; इन हत्यारों ने हमारे बिंद्रू को मार डाला, उन्हीं अब्दुल्ला का पुराना बयान देखा जाए तो वे यह कहते हुए ललकारते हैं कि; ये क्या सोचते हैं? बाहर से लोगों को लाकर बसाएँगे और हम चुप रहेंगे?

फारुख अब्दुल्ला जैसे विचार महबूबा मुफ़्ती भी रखती हैं। वे पहले से ही ललकारती रही हैं कि कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं मिलेगा। अब यह क्या केवल संयोग है कि स्कूल के सिख प्रिंसिपल और हिंदू टीचर की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता दिवस समारोह में तिरंगा फहराया था? रिपोर्ट के अनुसार स्कूल के तमाम अध्यापक और अध्यापिकाओं के पहचान पत्र देखने के बाद मुसलमान अध्यापकों को जाने का आदेश दिया गया और मारने के लिए केवल इन दोनों को चुना गया।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ISIS ने घाटी में बिरेंदर पासवान की हत्या की जिम्मेदारी ली है पर जिम्मेदारी लेने की घोषणा आजकल कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अंदाज़ा इसबात से लगाया जाए कि मुकेश अंबानी के घर के नीचे जेलेटिन की क्षणों से भरी जो गाड़ी मिली थी उसकी जिम्मेदारी जैश-उल-हिंद नामक किसी आतंकवादी संगठन ने ली थी। इन हत्याओं और आतंकी हमलों को लोग अपनी-अपनी तरह से पेश करेंगे, आलोचना करेंगे, विश्लेषण करेंगे या कुछ तो इन्हें न्याय संगत ठहराते पाए जाएँगे।

अभी तक मीडिया और राजनीति के एक वर्ग ने इन हत्याओं का उद्देश्य घाटी की तथाकथित हिंदू-मुस्लिम एकता में दरार पैदा करना बताया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस की एक प्रवक्ता ने तो इनके पीछे उन भावनाओं को जिम्मेदार ठहराया है जो 370 के हटने के बाद हिंदुत्ववादी लोगों ने दिखाई थीं। सोशल मीडिया पर दी जानेवाली प्रतिक्रियाएँ हम सब को आश्चर्यचकित करने की क्षमता रखती हैं पर यह भी सच है कि घाटी और उसके बाहर के भी कुछ लोग इन हत्याओं को पहले घटी किसी न किसी घटना को आगे रखकर उचित ठहरा सकते हैं और यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

पिछले दो वर्षों से घाटी में जो बदलाव हुए हैं वे अपनी जगह हैं ही पर निकट भविष्य में जो बदलाव होने जा रहे हैं वे भी महत्वपूर्ण हैं। करीब चार दशकों के बाद जम्मू कश्मीर में परिसीमन की प्रक्रिया चल रही है। इसके परिणाम भी जल्द ही आएँगे। विशेषज्ञों का अनुमान यह है कि डेमोग्राफी का असर यह रहेगा कि जम्मू क्षेत्र में विधानसभा क्षेत्रों में बदलाव आएगा। घाटी में हिंदुओं की लगातार हो रही वापसी केवल आतंकवादियों के लिए चिंता का विषय नहीं है।

तमाम व्यक्तियों और संस्थाओं को खुद के भविष्य के लिए किसी न किसी तरीके का खतरा दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में कई लोगों की शिनाख्त करके उन्हें सरकारी नौकरियों से निकाला गया है। इन सब बातों का साझा असर एक से अधिक रूपों में दिखाई दे रहा है और ये हत्याएँ उन्हीं में से एक रूप है। केंद्र सरकार घाटी से बाहर खदेड़ दिए गए जिन हिंदुओं को वापस बसाना चाहती है या जिन्हें अब तक वापस लाया गया है उनके लिए परिस्थितियाँ आसानी से सामान्य नहीं होंगी।

यह सरकार के प्रयासों पर निर्भर करेगा कि वो इनके लिए क्या-क्या कर सकती है। देखा जाए तो सरकार के प्रयास किसी न किसी के लिए हमेशा अधूरे रहते हैं पर हम सब को यह समझने की भी आवश्यकता है कि घाटी में अपना सब कुछ वापस पाने के लिए संघर्ष करना होगा और कीमत भी देनी होगी। यह बात देश के किसी अन्य कोने में बैठकर लिखना या बोलना सरल है पर सच यही है कि सम्पूर्ण स्वतंत्रता की कीमत चुकाए बिना घाटी में रहने और वापस सबकुछ पाना कम से कम शुरुआती दिनों में असंभव होगा।

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