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‘वसुधैव कुटुंबकम’ से हुए प्रेरित, माँ भारती को किया जीवन समर्पित: PM मोदी ने RSS प्रमुख को दी 75वें जन्मदिन पर बधाई, बताया ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का प्रबल समर्थक

आज 11 सितंबर है। यह दिन अलग-अलग स्मृतियों से जुड़ा है। एक स्मृति 1893 की है, जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में विश्वबंधुत्व का संदेश दिया और दूसरी स्मृति है 9/11 का आतंकी हमला, जब विश्व बंधुत्व को सबसे बड़ी चोट पहुँचाई गई। आज के दिन की एक और विशेष बात है। आज एक ऐसे व्यक्तित्व का 75वाँ जन्मदिवस है जिन्होंने वसुधैव कुटुंबकम के मंत्र पर चलते हुए समाज को संगठित करने, समता-समरसता और बंधुत्व की भावना को सशक्त करने में अपना पूरा जीवन समर्पित किया है।

संघ परिवार में जिन्हें परम पूजनीय सरसंघचालक के रूप में श्रद्धाभाव से संबोधित किया जाता है, ऐसे आदरणीय मोहन भागवत जी का आज जन्मदिन है। यह एक सुखद संयोग है कि इसी साल संघ भी अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। मैं भागवत जी को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर उन्हें दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें।

मेरा मोहन भागवत जी के परिवार से बहुत गहरा संबंध रहा है। मुझे उनके पिता, स्वर्गीय मधुकरराव भागवत जी के साथ निकटता से काम करने का सौभाग्य मिला था। मैंने अपनी पुस्तक ज्योतिपुंज में मधुकरराव जी के बारे में विस्तार से लिखा भी है। वकालत के साथ-साथ मधुकरराव जी जीवनभर राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित रहे। अपनी युवावस्था में उन्होंने लंबा समय गुजरात में बिताया और संघ कार्य की मजबूत नींव रखी।

मधुकरराव जी का राष्ट्र निर्माण के प्रति झुकाव इतना प्रबल था कि अपने पुत्र मोहनराव को भी इस महान कार्य के लिए निरंतर गढ़ते रहे। एक पारसमणि मधुकरराव ने मोहनराव के रूप में एक और पारसमणि तैयार कर दी।

भागवत जी का पूरा जीवन सतत प्रेरणा देने वाला रहा है। वे 1970 के दशक के मध्य में प्रचारक बने। सामान्य जीवन में प्रचारक शब्द सुनकर ये भ्रम हो जाता है कि कोई प्रचार करने वाला व्यक्ति होगा, लेकिन जो संघ को जानते हैं उनको पता है कि प्रचारक परंपरा संघ कार्य की विशेषता है। गत 100 वर्षों में देशभक्ति की प्रेरणा से भरे हजारों युवक-युवतियों ने अपना घर-परिवार त्याग करके पूरा जीवन संघ परिवार के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित किया है। भागवत जी भी उस महान परंपरा की मजबूत धुरी हैं।

भागवत जी ने उस समय प्रचारक का दायित्व संभाला, जब तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। उस दौर में प्रचारक के रूप में भागवत जी ने आपातकाल-विरोधी आंदोलन को निरंतर मजबूती दी। उन्होंने कई वर्षों तक महाराष्ट्र के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों, विशेषकर विदर्भ में काम किया। 1990 के दशक में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख के रूप में मोहन भागवत जी के कार्यों को आज भी कई स्वयंसेवक स्नेहपूर्वक याद करते हैं। इसी कालखंड में मोहन भागवत जी ने बिहार के गाँवों में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिताए और समाज को सशक्त करने के कार्य में समर्पित रहे।

वर्ष 2000 में वे सरकार्यवाह बने और यहाँ भी भागवत जी ने अपनी अनोखी कार्यशैली से हर कठिन परिस्थिति को सहजता और सटीकता से संभाला।

2009 में वे सरसंघचालक बने और आज भी अत्यंत ऊर्जा के साथ कार्य कर रहे हैं। भागवत जी ने राष्ट्र प्रथम की मूल विचारधारा को हमेशा सर्वोपरि रखा।

सरसंघचालक होना मात्र एक संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं है। यह एक पवित्र विश्वास है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी दूरदर्शी व्यक्तित्वों ने आगे बढ़ाया है और इस राष्ट्र के नैतिक और सांस्कृतिक पथ को दिशा दी है। असाधारण व्यक्तियों ने इस भूमिका को व्यक्तिगत त्याग, उद्देश्य की स्पष्टता और माँ भारती के प्रति अटूट समर्पण के साथ निभाया है। यह गर्व की बात है कि मोहन भागवत जी ने न केवल इस विशाल जिम्मेदारी के साथ पूर्ण न्याय किया है, बल्कि इसमें अपनी व्यक्तिगत शक्ति, बौद्धिक गहराई और सहृदय नेतृत्व भी जोड़ा है।

भागवत जी का युवाओं से सहज जुड़ाव है और इसलिए उन्होंने अधिक से अधिक युवाओं को संघ कार्य के लिए प्रेरित किया है। वे लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क में रहते हैं, और संवाद करते रहते हैं। श्रेष्ठ कार्य पद्धति को अपनाने की इच्छा और बदलते समय के प्रति खुला मन रखना, ये मोहनजी की बहुत बड़ी विशेषता रही है। अगर हम व्यापक संदर्भ में देखते हैं तो संघ की 100 साल की यात्रा में भागवत जी का कार्यकाल संघ में सर्वाधिक परिवर्तन का कालखंड माना जाएगा। चाहे वो गणवेश परिवर्तन हो, संघ शिक्षा वर्गों में बदलाव हो, ऐसे अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन उनके निर्देशन में संपन्न हुए।

कोरोना काल में मोहन भागवत जी के प्रयास विशेष रूप से याद आते है। उस कठिन समय में उन्होंने स्वयंसेवकों को सुरक्षित रहते हुए समाजसेवा करने की दिशा दी और टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाने पर बल दिया। उनके मार्गदर्शन में स्वयंसेवकों ने जरूरतमंदों तक हरसंभव सहायता पहुँचाई, जगह-जगह मेडिकल कैंप लगाए। उन्होंने वैश्विक चुनौतियों और वैश्विक विचार को प्राथमिकता देते हुए व्यवस्थाओं को विकसित किया। हमें कई स्वयंसेवकों को खोना भी पड़ा, लेकिन भागवत जी की प्रेरणा ऐसी थी कि अन्य स्वयंसेवकों की दृढ़ इच्छाशक्ति कमजोर नहीं पड़ी।

इस वर्ष की शुरुआत में, मैंने नागपुर में उनके साथ माधव नेत्र चिकित्सालय के उद्घाटन के दौरान मैंने कहा था कि संघ अक्षयवट की तरह है, जो राष्ट्रीय संस्कृति और चेतना को ऊर्जा देता है। इस अक्षयवट वृक्ष की जड़ें इसके मूल्यों की वजह से बहुत गहरी और मजबूत हैं। इन मूल्यों को आगे बढ़ाने में जिस समर्पण से मोहन भागवत जी जुटे हुए हैं, वो हर किसी को प्रेरणा देता है।

समाज कल्याण के लिए संघ की शक्ति के निरंतर उपयोग पर मोहन भागवत जी का विशेष बल रहा है। इसके लिए उन्होंने पंच परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। इसमें स्व बोध, सामाजिक समरसता, नागरिक शिष्टाचार, कुटुम्ब प्रबोधन और पर्यावरण के सूत्रों पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण को प्राथमिकता दी गई है। देश और समाज के लिए सोचने वाले हर भारतवासी को पंच परिवर्तन के इन सूत्रों से अवश्य प्रेरणा मिलेगी।

संघ का हर कार्यकर्ता वैभव संपन्न भारत माता का सपना साकार होते देखना चाहता है। इस सपने को पूरा करने के लिए जिस स्पष्ट विज़न और ठोस एक्शन की जरूरत होती है, मोहन जी इन दोनों गुणों से परिपूर्ण हैं।

मोहन जी के स्वभाव की एक और बड़ी विशेषता ये है कि वो मृदुभाषी हैं। उनमें सुनने की भी अद्भुत क्षमता है। यह विशेषता न केवल उनके दृष्टिकोण को गहराई देती है, बल्कि उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व में संवेदनशीलता और गरिमा भी लाती है

मोहन जी, हमेशा ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के प्रबल पक्षधर रहे हैं। भारत की विविधता और भारत भूमि की शोभा बढ़ा रही अनेक संस्कृतियों और परंपराओं के उत्सव में भागवत जी पूरे उत्साह से शामिल होते हैं। वैसे बहुत कम लोगों को ये पता है कि मोहन भागवत जी अपनी व्यस्तता के बीच संगीत और गायन में भी रुचि रखते है। वे विभिन्न भारतीय वाद्ययंत्रों में भी निपुण हैं। पठन-पाठन में उनकी रुचि, उनके अनेक भाषणों और संवादों में साफ दिखाई देती है।

पिछले दिनों देश में जितने सफल जन-आंदोलन हुए चाहे स्वच्छ भारत मिशन हो या बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मोहन भागवत जी ने पूरे संघ परिवार को इन आंदोलनों में ऊर्जा भरने के लिए प्रेरित किया। मैं पर्यावरण से जुड़े प्रयासों और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल को आगे बढ़ाने के प्रति उनके समर्पण को जानता हूँ। मोहन जी का बहुत जोर आत्मनिर्भर भारत पर भी है।

कुछ ही दिनों में विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 वर्ष का हो जाएगा। यह भी सुखद संयोग है कि विजयादशमी का पर्व, गाँधी जयंती, लाल बहादुर शास्त्री की जयंती और संघ का शताब्दी वर्ष एक ही दिन आ रहे हैं।

यह भारत और विश्वभर के लाखों स्वयंसेवकों के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। हम स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमारे पास मोहन भागवत जी जैसे दूरदर्शी और परिश्रमी सरसंघचालक हैं, जो ऐसे समय में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। एक युवा स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक की उनकी जीवन यात्रा उनकी निष्ठा और वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती है। विचार के प्रति पूर्ण समर्पण और व्यवस्थाओं में समयानुकूल परिवर्तन करते हुए उनके नेतृत्व में संघ कार्य का निरंतर विस्तार हो रहा है।

मैं माँ भारती की सेवा में समर्पित मोहन भागवत जी के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की पुनः कामना करता हूँ। उन्हें जन्मदिवस पर अनेकानेक शुभकामनाएँ।

300 गिरफ्तारी, 2 लाख प्रदर्शनकारी और 80 हजार पुलिसकर्मी: नेपाल के बाद फ्रांस में हिंसा, जानें ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ के नाम पर पेरिस की सड़कों पर हो रहा क्या-कुछ

नेपाल के बाद अब फ्रांस में राष्ट्रपति मैक्रों के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन हुआ है। राष्ट्रपति की नीतियों का विरोध हो रहा है। इस प्रदर्शन को ‘Block Everything’ का नाम दिया गया है। ये प्रदर्शन दो दिन पहले प्रधानमंत्री बने सेबेस्टियन लेकोर्नू के लिए भी बड़ी चुनौती है। प्रदर्शनकारी लगातार बदल रहे प्रधानमंत्री और बजट कटौती का विरोध कर रहे हैं।

प्रदर्शन के दौरान बुधवार (10 सितंबर 2025) को पूरे फ्रांस में सड़कें धुओं से भर गया। जगह जगह लगे बैरिकेड्स में आग लगा दी गई। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े गए और सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। करीब 80,000 सुरक्षाकर्मी प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है ‘Block Everything’ प्रदर्शन

Block Everything प्रदर्शन का नेतृत्व विपक्षी लेफ्ट ग्रुप के नेता कर रहे हैं। राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश की और प्रधानमंत्री के रूप में सेबेस्टियन लेकोर्नू के पहले दिन को अग्नि परीक्षा में बदल दिया। लेकोर्नू राष्ट्रपति मैक्रों के करीबी हैं और रक्षा मंत्री के तौर पर 3 साल से काम कर रहे हैं।

‘ब्लोक्वोंस टाउट’ या ‘ ब्लॉक एवरीथिंग’ विरोध प्रदर्शन के जरिए स्कूल से ऑफिस तक में हड़ताल जैसे माहौल बना दिए गए हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लेकर अस्पताल तक प्रभावित हुए हैं। यानी सबकुछ रोकने की कोशिश है।

प्रदर्शनकारियों के ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ वाले अभियान के दौरान सड़कों पर ट्रैफिक जाम लग गया। हर तरफ आगजनी और अफरा तफरी का माहौल है। कई जगहों पर बस में भी आग लगा दी गई। दक्षिण-पश्चिम फ्रांस में बिजली के तार टूटने की वजह से ट्रेन सेवाएँ ठप हो गईं और यातायात बाधित हो गया।

फ्रांस के मंत्री ब्रूनो रिटेलेउ ने कहा कि देश भर में लगभग 200,000 लोग सड़कों पर उतर आए हैं, जबकि फ्रांस के सबसे बड़े श्रमिक संघों में से एक, सीजीटी यूनियन ने दावा किया कि लगभग 250,000 लोग सड़कों पर उतरे हैं।

क्यों लोग उतरे सड़कों पर?

फ्रांस में जनता की बुनियादी सुविधाओं में कटौती हो रही थी। सेवानिवृति की उम्र बढ़ाकर 62 साल से 64 साल कर दिया गया । मजदूर संगठनों का मानना है कि ये मजदूरों के साथ अन्याय है। इसलिए ये संगठन सरकार के खिलाफ हैं।

वहीं युवा रोजगार के अवसर में कमी आने, विश्वविद्यालयों की फीस में बढ़ोतरी से गुस्साए हुए हैं। यहाँ आए दिन हो रही नस्लीय हिंसा भी उनके गुस्से को बढ़ा रहा है।

फ्रांस में जीवन जीना अब उतना आसान नहीं रह गया है। यहाँ Cost of Living बढ़ी है। छोटे शहरों के लोगों को लगता है कि सरकार उनके लिए नहीं सोच रही है। प्रवासियों की समस्या भी विरोध का बड़ा कारण है। सामाजिक समानता और धर्मनिरपेक्षता को मानने वाले फ्रांस में घुसपैठिए बड़ी संख्या में आ गए हैं। महँगाई, पेंशन सुधार, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता विरोध प्रदर्शन के केन्द्र में है।

लगातार हो रहा राजनीतिक बदलाव

राष्ट्रपति मैक्रों ने फ्रांस्वा बायरू के इस्तीफा देने के बाद लेकोर्नु को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। बायरू संसद का विश्वास खो चुके थे। लेकोर्नु ने 10 सितंबर को आधिकारिक तौर पर पदभार संभाला। इसके बाद बवाल शुरू हो गया। गृहमंत्री ब्रूनो रिटेलो के मुताबिक करीब 50 नकाबपोश लोगों ने आगजनी शुरू की थी। पेरिस में 75 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन गिरफ्तारियाँ क्यों हुईं, इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। इसके बाद ज्यादा बवाल मचा।

‘गन वायलेंस’ पर बोलते समय डोनाल्ड ट्रंप के करीबी नेता चार्ली किर्क की हत्या, जश्न मनाने लगा लेफ्ट-लिबरल गैंग: हमास को मानते थे गाजा में मौतों का जिम्मेदार

डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले अमेरिकी नेता चार्ली किर्क की गले पर गोली मारकर हत्या कर दी गई है। चार्ली कर्क गुरुवार (11 सितंबर 2025) को यूटा में एक कॉलेज इवेंट के दौरान एक डिबेट में गन वायलेंस पर सवालों का जवाब दे रहे थे, जब यह घटना घटी। वीडियो में देखा गया कि गोली लगते ही खून बहने लगा और अफरा-तफरी मच गई।

डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘रेडिकल लेफ्ट की करतूत’ बताया और कहा कि वामपंथियों को ‘बख्शेंगे नहीं’। हत्या को लेकर देश हिस्सों में बँट गया है। एक तरफ इस घटना को लेकर दक्षिणपंथी शोक में हैं और दूसरी तरफ लिबरल विचारधारा के लोग सोशल मीडिया पर चार्ली किर्क की मौत का मज़ाक उड़ा रहे हैं और खुशी मना रहे हैं।

हत्या कैसे हुई: गोलियों में तब्दील हुआ डिबेट

जानकारी के अनुसार, चार्ली किर्क महज 31 साल के थे और वे यूटा वैली यूनिवर्सिटी में ‘द अमेरिकन कमबैक’ और ‘प्रूव मी रॉन्ग’ के तहत बोल रहे थे। चार्ली किर्क एक सफेद टेंट के नीचे, माइक हाथ में लिए और दर्शकों से सवाल-जवाब कर रहे थे। ‘गन वायलेंस’ पर बात हो रही थी। तभी एक सवाल आया, जिसका चार्ली किर्क जवाब देने ही लगे, कि अचानक गोली चलने की आवाज आई।

चार्ली किर्क के गले में गोली लगी और वे अपने गर्दन को पकड़कर पीछे की ओर झुक गए। खून बहने लगा और चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। दर्शक चीखने लगे और घबराहट में वहाँ से भागने लगे।

चार्ली किर्क ने गाजा को लेकर एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गाजा में महिलाओं और बच्चों की मौत के लिए इजरायल नहीं, बल्कि हमास जिम्मेदार है। इस तरह के बयानों के कारण वह अक्सर वामपंथियों और लिबरल लोगों के निशाने पर रहते थे।

चार्ली किर्क ने गाजा में महिलाओं और बच्चों की मौत के लिए इजरायल नहीं, बल्कि हमास को जिम्मेदार था।
चार्ली किर्क का गाजा-हमास पर ट्विट (फोटो साभार : X_@thatdayin1992)

दक्षिणपंथी और लिबरल लोगों की प्रतिक्रिया

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चार्ली किर्क की मौत पर बहुत दुख जताया है। ट्रंप ने चार्ली किर्क को ‘महान’ और ‘दिग्गज’ कहा। ट्रंप ने आरोप लगाया कि इस हत्या के पीछे वामपंथी हैं और उन्होंने कसम खाई कि दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि चार्ली किर्क का युवाओं से खास रिश्ता था। सम्मान के तौर पर, ट्रंप ने रविवार (14 सितंबर 2025) शाम तक अमेरिकी झंडों को आधा झुकाने का आदेश भी दिया।

वहीं दूसरी ओर, वामपंथी और लिबरल लोग सोशल मीडिया पर चार्ली किर्क की मौत का जश्न मना रहे हैं। कई लोगों ने इसे ‘अच्छी खबर’ बताया और खुशी जताई। एक लड़की जो वहाँ मौजूद थी, उसने बताया कि उसने लिबरल लोगों को खुश होते हुए देखा। उसने कहा कि ऐसे लोगों को सीधे नर्क में जाना चाहिए।

एक ओर अमेरिकी नागरिक का रोते हुए पोस्ट सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा वामपंथी और लिबरल्स अब चार्ली किर्क की हत्या का जश्न मना रहे हैं। अब हम सब चार्ली किर्क हैं…

हमलावर और जाँच

घटना के बाद एक व्यक्ति को पुलिस ने हिरासत में लिया, पर बाद में छोड़ दिया। FBI प्रमुख कश पटेल ने कहा: “व्यक्ति को पूछताछ के बाद रिहा कर दिया गया है, जाँच जारी है।” फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि हमलावर कौन था और वह कहाँ है। अधिकारी अभी भी हमलावर की तलाश कर रहे हैं। यूटा के गवर्नर स्पेंसर कॉक्स ने कहा कि अधिकारियों का मानना ​​है कि गोलीबारी में केवल एक ही व्यक्ति शामिल था।

इस हत्या ने अमेरिका में बढ़ती राजनीतिक हिंसा के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। यह घटना बताती है कि देश में राजनीतिक मतभेद अब बहस और संवाद से आगे बढ़कर हिंसक रूप ले रहे हैं।

एक तरफ ट्रंप की दोस्ती की गुहार, दूसरी तरफ नवारो की भड़काऊ बयानबाजी: जानिए – व्यापार वार्ता और टैरिफ के साथ भारत ने कैसे बनाया संतुलन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 9 सितंबर को एक-दूसरे को संदेश भेजे, जो बाहर से देखने में पुरानी दोस्ती को फिर से ताजा करने जैसे लगे। पीएम मोदी ने भारत और अमेरिका को ‘गहरे दोस्त और स्वाभाविक साझेदार’ बताया और कहा कि व्यापार वार्ता से इस साझेदारी में ‘असीमित संभावनाएँ’ खुल सकती हैं।

उनका ये संदेश ट्रम्प के ट्रुथ सोशल पोस्ट के जवाब में था, जिसमें ट्रम्प ने कहा कि वो व्यापार बाधाओं को हल करने की बातचीत से ‘खुश’ हैं और पीएम मोदी को अपना ‘बहुत अच्छा दोस्त’ बताया। ट्रम्प ने ये भी भविष्यवाणी की कि बातचीत को सफलतापूर्वक पूरा करने में ‘कोई दिक्कत’ नहीं होगी।

डोनाल्ड ट्रम्प की ये दोस्ती भरी बातें तब आईं, जब वॉशिंगटन ने भारतीय सामान पर टैरिफ को दोगुना कर दिया और आगे और बढ़ाने की धमकी दी। मजेदार बात ये है कि ट्रम्प ने नई दिल्ली को लुभाने की कोशिश में संदेश पोस्ट किए, लेकिन खबरों के मुताबिक उन्होंने यूरोपीय संघ को भी भारत और चीन से आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने के लिए उकसाया, ये कहते हुए कि इससे रूस कमजोर होगा। तो एक तरफ ट्रम्प दोस्ती की बात करते हैं, लेकिन उनकी नीतियाँ कुछ और ही कहानी कहती हैं।

नवारो की सोशल मीडिया पर निकल रही भड़ास

ट्रम्प के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने अपने सोशल मीडिया को भारत के खिलाफ भड़काऊ बातों का अड्डा बना लिया है। उन्होंने हाल ही में भारत को ‘टैरिफ का महाराजा’ कहा। उन्होंने भारत पर रूस के युद्ध को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, क्योंकि भारत सस्ता रूसी तेल खरीद रहा है। उन्होंने भारतीय छात्रों पर अमेरिकी स्कूलों को ‘भरने’ का तंज कसा और दावा किया कि भारतीय यूजर्स X के कम्युनिटी नोट्स फीचर को हाइजैक कर रहे हैं ताकि तथ्यों को दबाया जा सके, जो कि बिना किसी सबूत के एक साजिश की थ्योरी है।

नवारो के हमले सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। उनकी बातों में वही तेवर दिखता है, जो भारत के कुछ विपक्षी दलों की बयानबाजी में दिखता है। नवारो ने तो जाति की सियासत में भी हाथ आजमाया और ब्राह्मणों के मुनाफा कमाने जैसे पुराने जुमलों को दोहराया, जो व्यापार नीति से कम और नाराजगी से ज्यादा जुड़ा है। संक्षेप में, ट्रम्प जहाँ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं, वहीं नवारो भारत पर हमला बोल रहा है, जो नीति से ज्यादा प्रचार जैसा लगता है।

भारत ने मुख्य मुद्दों पर झुकने से इनकार किया

ये गुस्सा क्यों? जवाब है नई दिल्ली का उन मुद्दों पर समझौता न करना, जो सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा को वॉशिंगटन के प्रतिबंधों से नहीं चलाया जा सकता। 2021 से रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ा है और 2024 में ये 67 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया, जिसमें करीब 53 अरब डॉलर तेल का है। नवारो इसे मुनाफाखोरी का सबूत मानते हैं। लेकिन भारत बार-बार कहता रहा है कि पश्चिमी देश खुद रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं और भारत से ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो किसी और के युद्ध की वजह से अपनी विकास की राह छोड़ दे।

टैरिफ पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। भारत हमेशा कहता रहा है कि व्यापार संतुलित होना चाहिए, एकतरफा नहीं। कृषि आयात, डेयरी और डिजिटल सर्विस टैक्स को अमेरिकी दबाव में छोड़ने की चीजें नहीं हैं। नई दिल्ली ने अपनी घरेलू इंडस्ट्री को बचाने पर जोर दिया है, जिसे वॉशिंगटन ने संरक्षणवाद कहा। लेकिन भारत इसे सामान्य समझदारी मानता है। और ये सामान्य समझदारी इतनी सामान्य नहीं है, जो पिछले कुछ महीनों में वॉशिंगटन की भारत के प्रति नाराजगी में दिखती है।

अमेरिकी नेतृत्व की दोहरी बातें

फर्क साफ है। ट्रम्प की दोस्ती भरी पोस्ट दोस्ती और बेहतर भविष्य की बात करती हैं, लेकिन उनकी सरकार की कार्रवाइयाँ और नवारो की भड़काऊ बातें धमकी, दबाव और तिरस्कार की कहानी कहती हैं। साफ है कि अमेरिका चाहता है कि भारत टैरिफ कम करे और अपने बाजार को और खोले, लेकिन साथ ही वो खुद दंडात्मक टैरिफ लगाता है।

वो चाहता है कि भारत रूसी तेल का आयात कम करे, लेकिन उसके यूरोपीय सहयोगी चुपके से रूसी ऊर्जा खरीदते रहते हैं। वो व्यापार घाटे की शिकायत करता है, लेकिन अमेरिका में भारतीय छात्रों और पर्यटकों से हर साल कमाए अरबों डॉलर को नजरअंदाज करता है। वो चाहता है कि भारत ब्रिक्स छोड़ दे, ये कहकर कि ये अमेरिका विरोधी है, लेकिन भारत ने इसे साफ तौर पर ठुकरा दिया।

ये कूटनीति नहीं, दोहरी बातें हैं। एक तरफ ट्रम्प राजनेता बनकर व्यापार विवादों को दोस्ताना तरीके से सुलझाने की कोशिश करते दिखना चाहते हैं। दूसरी तरफ, उनके सहयोगी और नीतिगत ऐलान दबाव बनाए रखते हैं, ये उम्मीद करते हुए कि भारत पहले झुकेगा, जो ट्रम्प प्रशासन के भारी दबाव के बावजूद नहीं हुआ।

भारत की जवाबी रणनीति

अमेरिका भारत को झुकाने में नाकाम रहा। इसके बजाय, भारत ने निर्यातकों को राहत पैकेज देने, जीएसटी दरों को समायोजित कर माँग बढ़ाने और यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की बातचीत को तेज करने जैसे कदम उठाए। संदेश साफ है कि भारत दबाव में नहीं आएगा और किसी एक साझेदार पर निर्भरता कम करने के लिए अपने बाजारों का विविधीकरण जारी रखेगा।

बाजारों को अल्पकालिक नुकसान हो सकता है, खासकर कपड़ा और कृषि जैसे क्षेत्रों को अमेरिकी टैरिफ से सबसे ज्यादा चोट पहुँची है, लेकिन भारत की रणनीति लंबे समय की है। रूसी आयात से ऊर्जा स्थिरता बनाए रखकर और नए व्यापार गलियारे बनाकर, भारत अमेरिकी दुश्मनी के बावजूद अपनी मजबूती सुनिश्चित कर रहा है।

टैरिफ और घाटे का जुनून

नवारो बार-बार टैरिफ से अमेरिकी नौकरियों को नुकसान और घाटे से अमेरिकी उद्योगों को खोखला होने की बात करते हैं, लेकिन एक साफ हकीकत को नजरअंदाज करते हैं। व्यापार घाटा शोषण का सबूत नहीं है। ये वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें उपभोक्ताओं को कम कीमत और व्यवसायों को विस्तारित बाजारों से फायदा होता है। फिर भी नवारो इसे इस तरह पेश करते हैं जैसे भारत का हर कमाया डॉलर अमेरिकी मजदूरों से चुराया गया हो। ये ऐसी बातें हैं जो सूचित करने के लिए नहीं, बल्कि भड़काने के लिए बनाई गई हैं।

उनके हमले और भी खोखले हो जाते हैं, क्योंकि ट्रम्प खुद कह चुके हैं कि भारत एक ‘कड़ा सौदेबाज’ है, भले ही दोस्त हो। अगर सौदेबाजी में कड़ाई अपराध है, तो हर वो देश दोषी है जो अपने हितों की रक्षा करता है।

रूस, टैरिफ और असली चिढ़

वॉशिंगटन को सबसे ज्यादा गुस्सा टैरिफ से नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता से है। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि वो न तो किसी गुट में खींचा जाएगा और न ही उसकी विदेश नीति को निर्देशित किया जाएगा। भारत ने रूस पर पश्चिमी रुख का पालन करने से इनकार किया और अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के हिसाब से व्यापार नीति बनाने का अधिकार जताया। ऐसा करके भारत ने साफ संदेश दिया है कि वो साझेदार है, न कि कोई गुलाम देश।

यही बात नवारो को हजम नहीं होती और ट्रम्प इसे मीठी बातों से ढकने की कोशिश करते हैं। ये तथ्य कि दोस्ती और गुस्से के संदेश एक साथ दिए जा रहे हैं, ये दिखाता है कि अमेरिकी नेतृत्व भारत की अहमियत को मानने और उसकी स्वायत्तता से चिढ़ने के बीच फँसा है।

आज जो दिख रहा है, वो है अमेरिका का उलझा हुआ रवैया। एक हाथ दोस्ती का जैतून का पत्ता बढ़ाता है, दूसरा टैरिफ की छड़ी लहराता है। एक आवाज दोस्ती की बात करती है, दूसरी भारत की मुनाफाखोरी पर भड़कती है। इन सबके बीच भारत ने अपनी बात पर डटे रहना चुना अपनी संप्रभुता की रक्षा को, ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने को और डर से नहीं, ताकत से बातचीत करने।

वॉशिंगटन के लिए ये दोहरापन शायद अल्पकालिक सियासी फायदे दे, लेकिन भारत के लिए ये सिर्फ सिद्धांतों पर टिके रहने की अहमियत को और मजबूत करता है। अमेरिका घाटे और टैरिफ पर भड़क सकता है, लेकिन नई दिल्ली अपनी स्वायत्तता को सौदेबाजी में नहीं देगा। ट्रम्प की दोस्ती भरी बातें माहौल को नरम कर सकती हैं, नवारो की भड़काऊ बातें इसे तीखा कर सकती हैं, लेकिन ये साधारण हकीकत नहीं बदलती कि भारत अपनी राह खुद बनाएगा, अपने तरीके से, चाहे अमेरिका का संदेश कितना भी उलझन भरा हो।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भारत में पढ़ाई, नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस: जानिए- PM मोदी से प्रभावित सुशीला कार्की को, जिसे GenZ बनाना चाहती है नेपाल का प्रधानमंत्री

नेपाल में GenZ प्रदर्शन ने देश की सरकार को गिरा दिया है। अब देश में अंतरिम सरकार की चर्चा तेज हो गई है। इस बीच नेपाल की पहली महिला पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की का नाम सामने आ रहा है। बुधवार (10 सितंबर 2025) को हुई वर्चुअल वोटिंग में GenZ ने सुशीला कार्की को समर्थन दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल में तख्तापलट के बाद कमान संभाल रही सेना को सुशीला कार्की ने अंतरिम प्रधानमंत्री बनने की सहमति फोन कॉल पर दे दी है। इसके बाद अब GenZ सेना से मीटिंग कर अंतरिम सरकार के प्रमुख पर फैसला करेंगे। अगर मीटिंग में सब सही रहता है तो सुशीला कार्की नेपाल की अगली अंतरिम प्रधानमंत्री हो सकती हैं।

सुशीला कार्की को महाभियोग लाकर चीफ जस्टिस पद से हटाया

सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस के रूप में जानी जाती हैं। लेकिन चीफ जस्टिस के रूप में कार्यकाल काफी छोटा रहा। कार्की 11 जुलाई 2016 से 06 जून 2017 तक नेपाल की सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस रहीं।

सुशीला कार्की को उनके पक्षपातपूर्ण फैसले देने के आरोप में चीफ जस्टिस पद से हटा दिया गया था। उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। यह प्रस्ताव उनकी अदालत द्वारा सरकार के फैसले को पलटने के फैसले के बाद लाया गया था।

जाँच में कार्की के खिलाफ आरोप साबित भी हुए और 2017 में रिटायरमेंट से पहले ही उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। हालाँकि, अपने चीफ जस्टिस के कार्यकाल के दौरान सुशीला कार्की ने नेपाल में ट्रांजिशनल जस्टिस और चुनावी विवादों से जुड़े अहम फैसले सुनाए।

सुशीला कार्की के चीफ जस्टिस के रूप में ऐतिहासिक फैसले सुनाने के चलते ही उन्हें नेपाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध योद्धा के रूप में देखा जाता है। इसीलिए शायद भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतरे GenZ ने अपने नेता के रूप में उन्हें चुना है।

सुशीला कार्की का भारत कनेक्शन

सुशीला कार्की का का भारत कनेक्शन भी सामने आया है। 7 जून 1952 को नेपाल के विराटनगर में जन्मी सुशीला ने भारत से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से सुशीला कार्की ने राजनीति शास्त्र में परा-स्नातक डिग्री हासिल की है।

एक इंटरव्यू में सुशीला कार्की ने कहा कि वो भारतीय नेताओं से प्रभावित हैं, भारतीय उन्हें बहन मानते हैं। कार्की ने कहा, “मैं मोदी जी को नमस्कार करती हूँ। मेरे लिए मोदी जी काफी प्रभावशाली नेता हैं।” BHU में पढ़ाई के दिनों को याद करते हुए कहा, “मैंने BHU में पढ़ाई की है… भारत में मेरे कई दोस्त हैं। मुझे आज भी BHU के अपने शिक्षक याद हैं। भारत के साथ हमारे रिश्ते बहुत अच्छे हैं और ये रिश्ते कई सालों से हैं। भारत ने नेपाल की बहुत मदद की है। भारतीय हमेशा नेपाल का भला चाहते हैं।”

BHU की पूर्व छात्र के तौर पर सुशीला कार्की की पहचान निश्चित ही भारत और नेपाल के संबंधों में काफी गति देगी।

मोदी सरकार ने बिहार को दी सौगात, मोकामा-मुंगेर हाईवे और भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेलवे के दोहरीकरण को मंजूरी: राज्य में सड़क और रेल कनेक्टिविटी में होगा सुधार

बिहार को केंद्रीय सरकार ने दो बड़ी परियोजनाओं की सौगात दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मोकामा-मुंगेर 4-लेन ग्रीनफील्ड एक्सेस कंट्रोल्ड हाईवे और भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेलवे लाइन को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं से राज्य की कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार होगा और लाखों लोगों की सुविधा होगी।

पहली परियोजना के तहत 82.4 किलोमीटर लंबे मोकामा-मुंगेर सेक्शन का निर्माण किया जाएगा। यह हाई-स्पीड बक्सर-भागलपुर कॉरिडोर का अहम हिस्सा होगा। इस एक्सप्रेसवे के निर्माण पर लगभग ₹4,447.38 करोड़ खर्च किए जाएँगे और इसे हाइब्रिड एन्‍युटी मॉडल के तहत बनाया जाएगा।

इस सड़क के तैयार होने से दक्षिणी बिहार के लोगों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी और यात्रा समय में लगभग डेढ़ घंटे की बचत होगी। साफ है कि इस प्रोजेक्ट से लोगों की आवाजाही आसान होगी और क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास को गति मिलेगी।

दूसरी बड़ी परियोजना रेलवे से जुड़ी है। मंत्रिमंडल ने भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दी है। फिलहाल यह 177 किलोमीटर लंबी लाइन सिंगल ट्रैक पर चल रही है। अब इस पर करीब ₹3,169 करोड़ की लागत से डबल लाइन बिछाई जाएगी। इस परियोजना से बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल तीनों राज्यों को फायदा पहुँचेगा।

इस रेलवे प्रोजेक्ट के पूरे होने पर लगभग 441 गाँव और करीब 28.72 लाख लोग बेहतर रेल सुविधा से जुड़ जाएँगे। खास बात यह है कि बांका, गोड्डा और दुमका जैसे आकांक्षी जिलों के लोगों को भी इससे बड़ा लाभ होगा। दोहरीकरण से रेल खंड पर भीड़भाड़ कम होगी और ट्रेन संचालन आसान और तेज हो जाएगा।

इसके अलावा यह रेलवे लाइन धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से भी अहम साबित होगी। देवघर का बाबा बैद्यनाथ धाम और पश्चिम बंगाल का तारापीठ जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल इस रूट से जुड़ेंगे, जिससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों की यात्रा सुविधाजनक हो जाएगी।

कुल मिलाकर, मोकामा-मुंगेर हाईवे और भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेल लाइन का दोहरीकरण, दोनों ही परियोजनाएँ बिहार और आसपास के राज्यों की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती हैं। इनसे न सिर्फ यात्रा समय और सुविधा बढ़ेगी बल्कि रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा सहारा मिलेगा।

घर भारत में, खेत नेपाल में, संबंध रोटी-बेटी से लेकर दवा-दारू तक… इस्लामी कट्टरपंथी-घुसपैठिए-तस्करों के कारण यही खुली सीमा चुनौती भी

भारत का पड़ोसी देश नेपाल इन दिनों भारी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक को न सिर्फ अपना पद छोड़ना पड़ा है, बल्कि सेना की सुरक्षा में पनाह लेनी पड़ी है। ये सब कुछ सोशल मीडिया पर लगे बैन से शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, युवा आंदोलनों और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों पर फैल गया। नेपाल में GenZ के प्रदर्शन और हिंसा में 19 से ज्यादा लोग मारे गए।

नेपाल में फैली अराजकता के बीच भारत-नेपाल के संबंधों को लेकर भी चर्चा हो रही है। दरअसल, भारत और नेपाल के बीच की सीमा सिर्फ एक लाइन नहीं है, बल्कि सदियों पुराने रिश्तों का प्रतीक है। यहाँ रोटी-बेटी का बंधन है, सांस्कृतिक समानताएँ हैं और रोजमर्रा की जिंदगी में आपसी जुड़ाव है। लेकिन ये रिश्ते अब नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। तस्करी, अपराध, घुसपैठ और यहाँ तक कि आतंकवाद की साजिशें इस खुली सीमा को खतरे में डाल रही हैं। इस रिपोर्ट में हम भारत-नेपाल संबंधों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

सुगौली की संधि से बंधे हैं भारत-नेपाल

भारत और नेपाल के बीच की सीमा लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी है। ये सीमा पाँच भारतीय राज्यों से गुजरती है – सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड। सिक्किम में ये 99 किमी, पश्चिम बंगाल में 100 किमी, बिहार में 729 किमी, उत्तर प्रदेश में 560 किमी और उत्तराखंड में 263 किमी फैली हुई है। ये सीमा ज्यादातर खुली है, यानी कोई बड़ी दीवार या फेंसिंग नहीं है, जो दोनों देशों के लोगों को आसानी से आने-जाने की आजादी देती है। लेकिन यही खुलापन अब सुरक्षा के लिए सिरदर्द बन गया है।

इस सीमा की कहानी शुरू होती है 1815-16 के एंग्लो-नेपाल युद्ध से। उस समय नेपाल की गोरखा सेना ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से लड़ रही थी। युद्ध में नेपाल की हार हुई और 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए, जो 4 मार्च 1816 को लागू हुई। इस संधि ने नेपाल के एक-तिहाई हिस्से को ब्रिटिश भारत के हवाले कर दिया, जिसमें तराई के ज्यादातर इलाके शामिल थे। संधि में काली नदी (महाकाली) को पश्चिमी सीमा के रूप में तय किया गया, जो आज भी विवाद का कारण है।

सुगौली संधि के मुख्य प्रावधान क्या थे?

सबसे पहले नेपाल को अपनी लगभग एक-तिहाई जमीन ब्रिटिश भारत को सौंपनी पड़ी। इसमें तराई का बड़ा हिस्सा, कुमाऊँ-गढ़वाल, सिमला हिल्स, सिक्किम और दार्जिलिंग जैसे क्षेत्र शामिल थे। नेपाल की पश्चिमी सीमा को महाकाली नदी (काली नदी) से तय किया गया, पूर्वी सीमा को मेची नदी से। नेपाल को अपनी सेना को सीमित रखना पड़ा – सिर्फ 12,000 सैनिकों तक। साथ ही ब्रिटिश को काठमांडू में एक रेजिडेंट (प्रतिनिधि) रखने का अधिकार मिला, जो नेपाल के आंतरिक मामलों पर नजर रखता था।

नेपाल को ब्रिटिश के साथ व्यापारिक संबंध बनाने पड़े और विदेश नीति में ब्रिटिश की सलाह माननी पड़ी। एक दिलचस्प बात ये थी कि संधि में नेपाल को कोशी और गंडक नदियों के बीच के तराई इलाके ब्रिटिश को देने पड़े, लेकिन बाद में 1816 में एक अतिरिक्त संधि से नेपाल को कुछ तराई क्षेत्र वापस मिले, जो आज भी विवाद का कारण हैं।

फोटो साभार: drishtiias

इस संधि ने सीमा का बँटवारा किया, लेकिन इसमें कई खामियाँ थीं। नदियों के बदलते रास्ते और जंगलों ने सीमा को अस्पष्ट बना दिया। नतीजा ये हुआ कि कई गाँव और खेत बँट गए। जैसे, एक तरफ घर भारत में तो खेत नेपाल में। ऐसे कई इलाके हैं जहाँ परिवार बँटे हुए हैं। उदाहरण के लिए सुस्ता और कालापानी जैसे क्षेत्र आज भी विवादित हैं, जहाँ नदी के बदलते बहाव ने सीमा को उलझा दिया है। संधि के समय ब्रिटिश अधिकारियों ने नक्शे बनाए, लेकिन वे सटीक नहीं थे।

आजादी के बाद 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि ने सुगौली को आधार बनाया, लेकिन सीमा मुद्दे अनसुलझे हैं। आज भी दोनों देश इन मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं, लेकिन समस्याएँ बनी हुई हैं। दरअसल, राजनीतिक दबाव से बात अटक जाती है।

बिहार पर सबसे ज्यादा असर, रोटी-बेटी के रिश्ते काफी अहम

भारत-नेपाल सीमा का सबसे बड़ा हिस्सा बिहार से लगता है – करीब 729 किमी। यहाँ के लोग नेपाल के तराई इलाकों से इतने जुड़े हैं कि इसे ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ कहा जाता है। मतलब, दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे के यहाँ रोटी खाते हैं और बेटियाँ ब्याहते हैं। भाषा भी मिलती-जुलती है – मैथिली, भोजपुरी और नेपाली के मिश्रण से। नेपाल के तराई में रहने वाले मैदानी लोग बिहार के लोगों से सांस्कृतिक रूप से बहुत करीब हैं।

रोजमर्रा की जिंदगी में ये जुड़ाव साफ दिखता है। नेपाली लोग भारत में इलाज के लिए आते हैं, क्योंकि नेपाल में स्वास्थ्य सुविधाएँ कम हैं। बिहार के अस्पतालों में नेपाली मरीज आम हैं। व्यापार भी खूब होता है – सब्जियाँ, अनाज और दैनिक सामान सीमा पार आते-जाते हैं। शादियाँ दोनों तरफ होती हैं, जो परिवारों को जोड़ती हैं। लेकिन हाल के सालों में ये रिश्ते कमजोर पड़ रहे हैं।

नेपाल में कोई भी तनाव होता है, तो किसानों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। दरअसल, किसान अपने खेतों तक जाने के लिए सीमा पार करते हैं, लेकिन उन्हें काफी दिक्कतें आती हैं। समस्या यह है कि कई किसानों का घर तो भारत में है, लेकिन उनके खेत और खलिहान नेपाल की जमीन पर हैं। ये किसान सालों से अपनी जमीन पर खेतीबाड़ी करते आए हैं, लेकिन अब सख्ती ने सबकुछ उलट-पुलट कर दिया है।

किसानों को खेतों तक पहुँचने के लिए घंटों पूछताछ से गुजरना पड़ता है। ट्रैक्टर, बैलगाड़ी तक ले जाना मना है, जिससे फसल कटाई, लाने और नई बुआई में भारी दिक्कत हो रही है। ऊपर से नेपाल सरकार ने जमीन बिक्री के नियम कड़े कर दिए हैं। अब भारतीय किसान अपनी जमीन केवल नेपाली नागरिकों को ही बेच सकते हैं और वो भी कम दाम पर।

नेपाल की तरफ से घुसपैठ भी बड़ा मुद्दा

नेपाल के नागरिकों द्वारा भारतीय सीमा क्षेत्र, खासकर बिहार के सीतामढ़ी, मधुबनी और सुपौल जैसे जिलों में अतिक्रमण की खबरें सामने आई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो नेपाल के लोग भारतीय जमीन पर कब्जा कर रहे हैं और फर्जी दस्तावेज बनाकर आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल कर रहे हैं। ये लोग भारतीय नागरिकों की तरह सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि नेपाल से सटे सीमावर्ती गाँवों में ये गतिविधियाँ तेजी से चल रही हैं। कुछ लोग शादी के बहाने या अन्य तरीकों से भारत में बस रहे हैं और स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज बनवा रहे हैं। इससे भारत की सुरक्षा और सीमा की अखंडता पर खतरा बढ़ रहा है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने कुछ मामलों में कार्रवाई शुरू की है, लेकिन समस्या अब भी गंभीर है। इस स्थिति ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को और जटिल कर दिया है, खासकर सुगौली संधि से जुड़े क्षेत्रों को लेकर।

भारत-नेपाल सीमा पर फेंसिंग क्यों नहीं?

भारत-नेपाल सीमा पर फेंसिंग क्यों नहीं है? वजह साफ है – दोनों देशों के लोगों का आपसी मेल-जोल। अगर दीवार बना दी तो रोटी-बेटी का रिश्ता टूट जाएगा। सरकारें कहती हैं कि खुली सीमा दोनों देशों की दोस्ती का प्रतीक है। लेकिन ये खुलापन अपनी समस्याएँ लाया है। 1970-80 के दशक में सामान्य तस्करी होती थी – चीनी, कपड़े वगैरह। लेकिन अब ये संगठित अपराध बन गया है। सोना, नशीले पदार्थ, हथियार और यहाँ तक कि मानव तस्करी।

सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान की आईएसआई से है। आईएसआई नेपाल को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर रही है। नेपाल की खुली सीमा से घुसपैठ आसान है। आईएसआई ने नेपाल में अड्डे बना रखे हैं, जहाँ से भारत में आतंकवाद फैलाने की साजिशें रची जाती हैं। उदाहरण के लिए लश्कर ए तैयबा, खालिस्तान और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के लोग नेपाल रूट से भारत आते हैं। हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक नेपाली नागरिक को गिरफ्तार किया, जो आईएसआई को भारतीय सिम कार्ड सप्लाई कर रहा था।

एक चौंकाने वाला मामला नेपाल के पूर्व सांसद मोहम्मद आफताब आलम का है। आलम पर आरोप था कि वो आईएसआई का एजेंट था और 2008 में रौताहट में बम ब्लास्ट कर कई लोगों की हत्या की। वो नेपाली कॉन्ग्रेस का नेता था, लेकिन जाँच में पता चला कि उसने चुनावी हिंसा में लोगों को जिंदा जलाया। 2024 में उन्हें उम्रकैद की सजा हुई, लेकिन 2025 में हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। ये मामला दिखाता है कि कैसे नेपाल में राजनीतिक लोग विदेशी ताकतों से जुड़ सकते हैं, जो भारत की सुरक्षा को खतरा है।

धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय बदलाव भारत के लिए बड़ा खतरा

नेपाल की सीमा से एक और समस्या उभर रही है – धर्मांतरण। नेपाल में इस्लामी आबादी तेजी से बढ़ रही है, खासकर तराई इलाकों में। रिपोर्ट्स सामने आई हैं कि विदेशी खासकर पाकिस्तानी फंडिंग से मस्जिदें बन रही हैं और गरीब हिंदुओं का धर्म परिवर्तन हो रहा है। ये भारत की सुरक्षा के लिए खतरा है, क्योंकि सीमा के दोनों तरफ मुस्लिम आबादी बढ़ने से कट्टरवाद फैल सकता है।

नेपाल में हिंदू बहुल समाज था, लेकिन अब इस्लामी संगठन सक्रिय हैं, जो गौहत्या और बीफ खाने की माँग कर रहे हैं। भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी ये असर दिखता है, जहाँ जनसांख्यिकीय असंतुलन राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहा है।

राजनीतिक उथल-पुथल का सीमा पर पड़ता है असर

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर भारत पर पड़ता है। नेपाल में GenZ के प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें 19 लोग मारे गए। इससे भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। व्यापार प्रभावित हो रहा है – भारत से नेपाल को 7.32 अरब डॉलर का आयात रुक सकता है। ऐसे में नेपाल की अस्थिरता भारत के हित में कतई नहीं है।

अब गाँव के जीवन से जुड़ेंगे पर्यटक, योगी सरकार ने शुरू की फार्म स्टे योजना: खेतों में बनेंगे होटल, रोजगार और संस्कृति को मिलेगा बढ़ावा

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर्यटकों के लिए फार्म स्टे योजना लेकर आई है। इसके तहत खेत या उसके पास में फार्म स्टे बनाया जाएगा। जहाँ प्रदेश में घूमने आने वाले लोग गाँव के वातावरण का अनुभव कर सकेंगे। फिलहाल योजना की शुरुआत में निवेशकों से प्रस्ताव माँगे गए हैं।

यह फार्म स्टे योजना उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग की ओर से पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पहल है। पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि योजना के तहत फार्म स्टे ऐसा पर्यटन आवास है, जो खेत या उसके पास में ही बनाया जाएगा।

पर्यटन मंत्री ने बताया कि यह आवास खेत के मालिक के घर से अलग होगा, इसमें कम से कम दो किराए पर देने के लिए कमरे और एक रिसेप्शन एरिया जरूर होगा। उन्होंने यह भी बताया कि फार्म स्टे बनाने के लिए सरकार ₹40 करोड़ तक की सब्सिडी देगी।

फार्म स्टे योजना पर्यटन को कृषि से जोड़ेगी

पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि फार्म स्टे योजना कृषि को पर्यटन से जोड़ने के लिए तैयार की गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह पहल सिर्फ खेत में आवास बनाने के बारे में नहीं है बल्कि गाँवों को संस्कृति, आजीविका और शिक्षा के जीवंत केंद्रों में बदलने के बारे में है।

जयवीर सिंह ने बताया कि इस पहल से गाँवों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे औऱ किसानों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा स्थानीय शिल्प, व्यंजन और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रचार होगा। इसके साथ इको-टूरिज्म और स्थानीय ग्रामीण प्रथाओं को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

सरकार इस पहल को और मजबूत बनाने के लिए नियोक्ताओं के EPF अंशदान की पाँच साल तक प्रतिपूर्ति करेगी। इसके अलावा दिव्यांग श्रमिकों को रोजगार देने के लिए अतिरिक्त मासिक सब्सिडी भी प्रदान की जाएगी।

फार्म स्टे योजना से निवेशकों को लाभ और स्थानीय रोजगार

फार्म स्टे योजना के तहत अब सरकार ने निवेशकों के प्रस्ताव लेना शुरू किया है। उद्यमियों और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए फाइनेंशियल पैकेज का भी ऐलान किया गया है। इसमें 10 लाख से 10 करोड़ रुपए तक की परियोजनाओं के लिए 25 प्रतिशत तक की पूंजीगत सब्सिडी शामिल है।

सरकार महिला उद्यमियों, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/पिछले वर्ग के निवेशकों को अतिरिक्त 5 प्रतिशत सब्सिडी देगी। इसके साथ फोकस टूरिज्म डेस्टिनेशन में स्थापित किए जाने वाले प्रोजेक्ट्स को भी 5 प्रतिशत अतिरिक्त सब्सिडी दी जाएगी।

साथ ही एक निवेश को हर साल अधिकतम 25 लाख रुपए तक की सब्सिडी मिलेगी, जो अधिकतम 5 साल तक लागू रहेगी। इसके अलावा स्टांप शुल्क, भूमि रूपांतरण शुल्क और विकास शुल्क पर 100 प्रतिशत छूट दी जाएगी। वहीं, पात्र परियोजनाओं के लिए ऋण पर ब्याज सब्सिडी और 50 से ज्यादा स्थानीय लोगों को रोजगार देने वाली इकाइयों के लिए रोजगार सब्सिडी भी प्रदान की जाएगी।

उत्तर प्रदेश में पर्यटन बढ़ेगा

भारत में उत्तर प्रदेश पर्यटन शीर्ष-5 राज्यों में है। घरेलू पर्यटक से लेकर विदेशी पर्यटकों की पसंद में उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहता है। साल 2024 में ही उत्तर प्रदेश ने 65 करोड़ पर्यटकों का स्वागत किया। अब योगी सरकार की फार्म स्टे योजना की शुरुआत के साथ प्रदेश का पर्यटन भी बढ़ेगा।

फार्म स्टे योजना से ग्रामीण जीवन की सादगी और गर्मजोशी से परिचित होंगे। खासकर विदेशी पर्यटन में गाँव के जीवन को जानने की काफी उत्सुकता रहती है। यहाँ रहकर पर्यटक पारंपरिक भोजन का आनंद लेने से लेकर गाँव समुदायों से जुड़ सकेंगे।

यह पहल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का आकर्षित करने का वादा करती है, जिससे उत्तर प्रदेश की भारत के ग्रामीण पर्यटन के अग्रणी केंद्र के रूप में स्थिति मजबूत होगी।

‘इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक को AIDS’: सोशल मीडिया पर नेटिजन्स समलैंगिक संबंधों को बता रहे वजह, जानिए मलेशिया में छिपे भगोड़े ने क्या कहा

भगोड़े इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक को AIDS होने की खबर सोशल मीडिया पर पिछले कई दिनों से जमकर वायरल है। भारत में धार्मिक कट्टरता फैलाने का आरोपित जाकिर इन दिनों मलेशिया में रह रहा है। सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि उसे AIDS होने के बाद मलेशिया के ही किसी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

लोगों के क्या हैं दावे?

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने X पर इससे जुड़े पोस्ट किए हैं। फातिमा खान नामक एक X यूजर ने दावा किया, “कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक को AIDS होने का पता चला है! कथित तौर पर वह फिलहाल मलेशिया के सनवे मेडिकल सेंटर में भर्ती हैं।”

एक अन्य यूजर ने तो उसके शागिर्दों को भी अपनी जाँच कराने की सलाह दे दी। यूजर ने लिखा, “सुना है जाकिर नाइक को एड्स हो गया है। अब इसके शागिर्दों को भी अपनी जाँच करवा लेनी चाहिए आपको नहीं लगता? बेचारा संबंध बना बनाकर बीमार हो गया।”

एक अन्य यूजर ने तो इसकी वजह समलैंगिक संबंध बता दी। यूजर ने लिखा, “इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक को AIDS डायग्नोस हुआ है! एड्स के ज्यादातर मामलों की वजह समलैंगिक यौन संबंध हैं। जाकिर नाइक के मजहब में समलैंगिक रिश्ते की मनाही है! फिर उसे एड्स क्यों?”

एक अन्य यूजर ने उसकी बकरियों की भी जाँच कराए जाने का दावा कर दिया। उसने लिखा, “मलेशिया जाकिर नाइक के घर के सभी सदस्यों, यहाँ तक कि उसके बकरी फार्म की भी जाँच कर रहा है। जाकिर के एड्स से संक्रमित होने के बाद, उसका बकरी फार्म मलेशियाई पुलिस के कब्जे में है।”

जाकिर नाइक ने क्या कहा?

इस खबर के वायरल होने के बाद भगौड़ा कट्टरपंथी भी सामने आया और उसने भी अपना पक्ष रहा है। ‘फ्री मलेशिया टुडे’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कट्टरपंथी ने इन दावों को खारिज किया है। नाइक ने कहा, “यह फर्जी खबर है।”

गौरतलब है कि जाकिर नाइक पर भारत में नफरत फैलाने वाले भाषण देने, युवाओं को कट्टरपंथ की ओर उकसाने और आतंकवाद के लिए प्रेरित करने जैसे गंभीर आरोप हैं। भारतीय एजेंसियाँ लंबे समय से उसकी गिरफ्तारी की कोशिश कर रही हैं लेकिन वह 2016 से भारत से फरार है और मलेशिया में शरण लिए हुए है। भारत ने उसे प्रत्यर्पित करने की कई बार कोशिश की है लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है।

जैसे कॉन्ग्रेस ने लोकसभा चुनाव में किया था ‘धोखा’, वैसी ही RJD की तैयारी : माई-बहिन योजना के नाम पर महिलाओं से भरवाए जा रहे फॉर्म, बाहरी लोगों की मदद से हो रही साजिश

बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक पार्टियाँ आधी आबादी को लुभाने की कोशिशों में लगी हुई है। आरजेडी ने वादा किया है कि अगर महागठबंधन को सत्ता मिलती है तो महिलाओं को माई- बहिन योजना के तहत हर महीने 2500 रुपए दिए जाएँगे। पार्टी इसको लेकर अभी से फॉर्म भरवा रही है। महिलाओं से उनके आधार कार्ड माँगे जा रहे हैं।

एनडीए ने आधार कार्ड नंबर लेने पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे गैर कानूनी कहा है। माई बहन मान योजना पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल कहते हैं, “यह योजना एक घोटाला है और जनता समझती है कि राजद और कॉन्ग्रेस झूठे वादे कर रहे हैं। महिलाओं को फॉर्म भरकर गुमराह किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उन्हें पैसा तभी मिलेगा जब पार्टी जीतेगी।”

नीतीश सरकार लेकर आई महिला रोजगार योजना

नीतीश सरकार ने महिलाओं के लिए महिला रोजगार योजना की शुरुआत की है। इसमें परिवार की एक महिला को तत्काल 10 हजार रुपए और 6 महीने बाद 2 लाख रुपए देने की योजना है। इसकी शुरुआत सितंबर में की जा रही है। इसको लेकर आरजेडी कह रही है कि ये माई बहिन मान योजना को देखते हुए लाया गया है।

क्या है माई बहिन मान योजना?

महागठबंधन के कार्यकर्ता और समर्थक महिलाओं के बीच जा रहे हैं और उनसे फॉर्म भरवा रहे हैं। ये फॉर्म दो तरह के हैं- एक है माई बहिन योजना और दूसरा तेजस्वी रोजगार योजना। जाहिर तौर पर पूर्व डिप्टी सीएम के नाम पर लोगों से रोजगार का वादा किया जा रहा है। वहीं माई बहिन मान योजना के तहत महागठबंधन की सरकार बनने पर हर जरूरतमंद महिला के खाते में हर महीने 2500 रुपए भेजे जाएँगे, इसका वादा किया जा रहा है।

आधार नंबर लेना गैरकानूनी

किसी भी योजना को लागू तभी किया जा सकता है जब सरकार उसे मंजूर करे। इसके लिए लाभार्थियों से सरकारी कागजात भरवाए जाते हैं और आधार कार्ड नंबर लिया जाता है। यहाँ मौजूद महिलाओं में ज्यादातर को योजना की पूरी जानकारी नहीं है। एक महिला ने कहा कि अगर धोखाधड़ी हुई, तो खूब पिटाई होगी।

चुनाव से पहले पार्टियाँ वादा कर सकती हैं। फॉर्म भरवाना या नागरिकों के पहचान पत्र लेना गैर कानूनी है। बिहार में महिलाओं की बड़ी आबादी अनपढ़ है। उन्हें ये नहीं पता है कि जो फॉर्म उनके नाम पर भरा जा रहा है, उसमें क्या है। ऐसे में झाँसे में लेकर फॉर्म भरवाना, कम पढ़े-लिखे और अनपढ़ महिलाओं को धोखा देना है।

बजट कहाँ से लाएँगे- प्रशांत किशोर

जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर ने महागठबंधन से कहा है कि माई बहिन मान योजना का बजट कहाँ से आएगा, पहले ये बता दीजिए। उन्होंने तेजस्वी यादव पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कैलकुलेटर लेकर भी इस योजना में कितना पैसा खर्च होगा, ये वह नहीं बता सकते। इतना बजट कहाँ से आएगा, ये बात तो छोड़ दीजिए।

फॉर्म भरवा रहे लोग कौन हैं?

आरजेडी और कॉन्ग्रेस माई बहिन मान योजना के फॉर्म भरवाने के लिए कई लोगों को काम में लगाया है। इनके पास किसी तरह की अथॉरिटी नहीं है, न ही कोई पार्टी से जारी किया गया पत्र है। ऐसे में पहचान पत्र लेने वाले लोगों की खुद की पहचान ही शक के दायरे में आ जाती है। ये पार्टी कार्यकर्ता हैं या बाहरी लोग हैं। फॉर्म भरवाने आयी एक महिला का कहना है कि वह पीआर एजेंसी की तरफ से आई हैं। पार्टी की कार्यकर्ता नहीं हैं। वह महिलाओं को बता रही हैं कि जब तेजस्वी यादव की सरकार आएगी, तो महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए मिलेंगे।

कॉन्ग्रेस ने दिया था महिलाओं को ‘धोखा’

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले कॉन्ग्रेस ने घोषणा की थी कि वह महिलाओं को 1 लाख रुपए देगी। चुनाव में करारी हार के बाद महिलाएँ उन्हें वादा याद दिलाने पहुँची। कांग्रेस ने कई परिवारों को ‘गारंटी कार्ड’ वितरित किए थे। इसमें हर गरीब परिवार की महिला मुखिया को हर साल 1 लाख रुपए देने का वादा किया गया था। नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस के नेता महिलाओं से बचते हुए नजर आए थे। महिलाएँ पैसे लेने कॉन्ग्रेस दफ्तर तक पहुँच गई थी।