जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती एक बार फिर इतिहास को झुठलाने और आतंकियों के लिए ‘घड़ियाली आँसू’ बहाने के अपने पुराने एजेंडे पर उतर आई हैं। ‘द वायर’ पर महबूबा मुफ्ती ने एक लेख छपवाया है। इस लेख ही हेडलाइन ‘Betrayed: The Tragedy of Two Kashmiris and the Crisis of Indian Justice’ है। इसमें महबूबा मुफ्ती दो कुख्यात चेहरों ‘अफजल गुरु और यासीन मलिक‘ को ‘सिस्टम के छल’ का शिकार बताया है।
इसके अलावा लेख में महबूबा मुफ्ती ने अफजल गुरु को ‘बलि का बकरा’ और यासीन मलिक को ‘शांतिदूत’ बताया है। महबूबा मुफ्ती न केवल इतिहास को झुठला रही है, बल्कि उन नागरिकों के बलिदान का अपमान भी कर रही है, जिन्होंने इन आतंकियों की वजह से अपनी जान गँवाई है। महबूबा मुफ्ती जिन दो चेहरों के लिए घड़ियाली आँसू बहा रही हैं, उनकी असली करतूत क्या थी, यह जानना जरूरी है।
अफजल गुरु: संसद हमले का मास्टरमाइंड, ‘बलि का बकरा’ नहीं
महबूबा मुफ्ती का दावा: ‘द वायर’ के लेख में अफजल गुरु को एक ‘मुखबिर’ बताया गया है जिसे दविंदर सिंह नामक अधिकारी के कहने पर काम करने के बाद ‘गुपचुप तरीके से फाँसी’ दी गई और ‘बलि का बकरा’ बना दिया गया।
हमारा जवाब: मुफ्ती जी, यह आधी-अधूरी और झूठी कहानी है। जिस अफजल गुरु को आप ‘बलि का बकरा’ बता रही हैं, वह आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य और 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुए सबसे बड़े हमले का मास्टरमाइंड था। उसकी योजना के तहत पाँच आतंकियों ने हमारे लोकतंत्र के मंदिर पर अँधाधुँध फायरिंग की थी, जिसमें 9 लोगों की मौत हुई थी।
भारत की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने उसके संगठित अपराध और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की मंशा को देखते हुए 2002 में मौत की सज़ा सुनाई थी। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुआ था, किसी ‘सामूहिक चेतना’ को शांत करने के लिए नहीं। अफजल को उसके आतंकवादी कृत्यों के लिए दंड मिला, न कि किसी ‘षड्यंत्र’ के लिए।
यासीन मलिक: शांतिदूत नहीं, आतंक और टेरर फंडिंग का दोषी
महबूबा मुफ्ती का दावा: मुफ्ती ने यासीन मलिक को ‘शांति का दूत’ बताया जिसने 1994 में हिंसा त्याग दी और विभिन्न प्रधानमंत्रियों के साथ संवाद किया। मुफ्ती का दावा है कि उसे ‘शांति प्रयासों’ के लिए जेल भेजा गया।
यासीन मलिक ‘शांतिदूत’ नहीं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों का प्रमुख चेहरा रहा है। उसका इतिहास खून और हिंसा से भरा है। उसने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) जाकर आतंक की ट्रेनिंग ली थी। यासीन मलिक पर 1989 में गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण में शामिल होने का गंभीर आरोप था, जिसके बदले में आतंकियों को रिहा करना पड़ा।
इससे भी बड़ा जुर्म, जनवरी 1990 में श्रीनगर में चार वायुसेना जवानों की हत्या करना था, जिसका वह मुख्य साजिशकर्ता था। इसके अलावा, वह 1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। दिल्ली की NIA कोर्ट ने उसे ‘शांति प्रयासों’ के लिए नहीं, बल्कि 2022 में टेरर फंडिंग (आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए पैसा जुटाने) के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई। हाफिज सईद जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी से मिलना ‘शांति प्रयास’ नहीं, बल्कि देश से विश्वासघात था।
महबूबा मुफ्ती का दोमुँहापन
महबूबा मुफ्ती का यह दावा कि यासीन मलिक को ‘शांति प्रयासों’ के लिए जेल भेजा गया, एक झूठा नैरेटिव है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों के साथ बातचीत करना एक अलग बात है, लेकिन हाफिज सईद जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी से मिलना और टेरर फंडिंग करना शांतिदूत का काम नहीं हो सकता। महबूबा मुफ्ती का बयान आतंकियों को बचाने और उनके कारनामों पर पर्दा डालने की एक शर्मनाक कोशिश है। देश यह जानता है कि न्याय हुआ है, बलिदान नहीं।
क्या भारतीय न्यायपालिका बड़े बदलावों की ओर बढ़ रही है? हाँ। वरना न तो भारत की राष्ट्रपति और न ही प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार न्यायप्रणाली की खामियों पर इतना खुलकर बोलते।
इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक बार फिर न्यायपालिका को आड़े हाथों लिया। 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के 75वें स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा, “न्यायपालिका में सुधार की प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए।”
इस समारोह में देशभर की जिला अदालतों से आए लगभग 800 जज मौजूद थे। राष्ट्रपति ने आगे कहा, “लोगों को लगता है कि न्यायपालिका में संवेदनशीलता नहीं है।” यानी, भारत की न्यायिक प्रणाली कठोर और अकड़ू बन चुकी है।
यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रपति मुर्मू ने जजों की नियुक्ति प्रणाली पर सवाल उठाए। कॉलेजियम का नाम लिए बिना उन्होंने बार-बार सुझाव दिया है कि जजों की नियुक्ति भी उसी तरह होनी चाहिए, जैसे आईएएस अधिकारियों की होती है।
राष्ट्रपति के सुझाव का थोड़ा बैकग्राउन्ड देखें। 1958 में भारत के लॊ कमिशन की 14वीं रिपोर्ट ने ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस (AIJS) बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1978 की 77वीं रिपोर्ट, 1986 की 116वीं रिपोर्ट और हाल ही में 2012 में भी यह सुझाव दोहराया गया। लेकिन 1958 से आज तक छह दशकों से अधिक समय बीत गया और एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
क्यों?, क्योंकि हर बार खुद जजों ने इसका विरोध किया। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने लगातार कहा कि इससे हमारे अधिकार क्षेत्र में दखल होगा।
यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) और सिविल सर्विस एग्जाम (CSE) के माध्यम से सरकार की 64 शीर्ष सेवाओं में नियुक्तियाँ होती हैं—IAS, IPS और IRS इनमें सबसे ऊपर हैं। इन्हीं परीक्षाओं से विदेश सेवा, वन सेवा, रक्षा खातों के हिसाब विभाग, रेलवे के कुछ विभागों, डाक विभाग और कई अन्य विभागों के उच्च अधिकारी चुने जाते हैं। कानून के क्षेत्र के लिए ICLS ( इंडियन सिविल लॉ सर्विस) और ILS (इंडियन लॉ सर्विस) जैसी सेवाएँ हैं, लेकिन इनमें से कोई भी जजों का चयन नहीं करती।
जरूरी है कि जजों की नियुक्ति भी IAS जैसी सख्त परीक्षा और गहन प्रशिक्षण से हो। और यह केवल हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के लिए नहीं बल्कि फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, सिटी सिविल कोर्ट और सेशन्स कोर्ट के लिए हो। आखिरकार, इन्हीं स्तरों से आगे चलकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बनते हैं।
कोलेजियम प्रणाली के चलते उच्च न्यायालयों में जजों की कुर्सियाँ कुछ चुनिंदा परिवारों के सदस्यों के लिए आरक्षित हो गईं हैं। नजदीकी रिश्तेदार न हों तो जज साहब अपने दोस्तों या खास लोगों के बच्चों को प्राथमिकता देते हैं। इसी भाई-भतीजावाद और भ्रष्ट व्यवस्था को खत्म करने के लिए नेशनल ज्यूडिशियल अप्वॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) बना। मोदी सरकार ने 2014 में संसद के दोनों सदनों में 99वाँ संवैधानिक संशोधन पास कराया, NJAC अधिनियम बना और 16 राज्यों ने भी इसे मंजूरी दे दी। 31 दिसम्बर 2014 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हस्ताक्षर कर दिए।
13 अप्रैल 2015 को यह कानून लागू हो गया। फिर क्या हुआ? 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने NJAC को असंवैधानिक करार दिया और कॉलेजियम प्रणाली बहाल कर दी।
यह वैसा ही था जैसे जंगल के दरबार में शेर से पूछा जाए कि क्या वह ऐसा कानून मंजूर करेगा जिसमें शेरों को मनमाने शिकार से रोका जाए और हर शिकार का हिसाब देना पड़े। शेर का जवाब क्या होगा?
कॉलेजियम प्रणाली ही न्यायपालिका के शेरों का पेट भरती है। NJAC लागू होता तो शेर भूखे मरते। यह कहानी का एक हिस्सा है। अब दूसरा हिस्सा।
संजीव सान्याल भारत के इतिहास पर लिखने वाले बेस्टसेलर लेखक हैं , जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अहम सदस्य हैं उन्होंने हाल ही में एक कानून विषयक सम्मेलन में 12 मिनट का सटीक भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं:-
“मुझे डर है कि न्यायिक प्रणाली और कानूनी इको-सिस्टम, खासतौर से न्यायिक प्रणाली, आज भारत को विकसित भारत बनाने में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक यहाँ भारी परिवर्तन नहीं होता, सबसे मजबूत आर्थिक नीतियाँ भी बेकार साबित होंगी।”
उन्होंने पूछा- जजों को ‘माई लॉर्ड’ क्यों कहा जाए? आखिर वे भी हमारे जैसे नागरिक हैं, सामंती शासक नहीं। (आज भले ही ‘सर’ या ‘योर ऑनर’ स्वीकार्य हैं, लेकिन सन्याल की चिंता सही है। ज़्यादातर वकील अब भी ‘माई लॉर्ड’ कहकर ही जजों को सिर पर चढ़ाते हैं।)
उन्होंने अदालतों की लंबी छुट्टियों पर सवाल उठाया। इन लंबे वेकेशन के दौरान अदालतों का पूरा कामकाज ठप हो जाता है। पुलिस, सरकारी अस्पताल या नौकरशाही में भी छुट्टियाँ होती हैं, लेकिन वहाँ काम कभी बंद नहीं होता। अदालतों को ही क्यों ‘वेकेशन बेंच’ की जरूरत पड़े?
आप की जानकारी के लिए बता दें कि संजीव सान्याल महान क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के पोते हैं- जिनके शिष्य राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे वीर हैं जिन्होने काकोरी साहस में राम प्रसाद बिस्मिल का साथ दिया था और अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी थी। संजीव सान्याल प्रधानमंत्री के भरोसेमंद व्यक्ति हैं।
परंपरा रही है कि राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयान अक्सर प्रधानमंत्री की मूक सहमति से ही होते हैं। इसलिए इन दोनों दिग्गजों की बातें साफ इशारा करती हैं कि मोदी सरकार न्यायप्रणाली में कुछ बड़े परिवर्तन की तैयारी कर रही है। आने वाले महीनों में जज साहबान को ‘मुलजिम’ के कटघरे में खड़ा कर जवाब माँगा जाएगा और कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों द्वारा खड़ी की गई ‘लीगल इको-सिस्टम’ को भी तोड़ा जाएगा।
आवश्यक सुधारों के साथ-साथ न्यायालयों की रिपोर्टिंग प्रणाली में भी बदलाव जरूरी है। अभी LiveLaw और Bar & Bench सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई कवर करते हैं, लेकिन ये भी उसी इको-सिस्टम का हिस्सा हैं। जरूरत है एक तीसरे, मजबूत और राष्ट्रवादी लीगल डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म की, जो बेबाकी से इस किले में प्रवेश कर सके और न्यायपालिका को खोखला कर रही दीमकों का ‘पेस्ट कंट्रोल’ कर सके।
मोदी सरकार का कामकाज कुछ कुछ भगवान के कारोबार जैसा ही है- कभी कभार देर है, पर अंधेर नहीं।
उत्तर प्रदेश के बरेली में जुमे की नमाज के बाद 26 सितंबर 2025 को ‘I Love Muhammad’ को लेकर फिर हिंसा हुई है। यह देश भर के कई शहरों में जारी इस्लामी कट्टरपंथियों के हिंसक प्रदर्शनों की बस एक झलक भर है।
कानपुर से एक मनगढ़ंत कहानी के आधार पर ‘I Love Muhammad’ को लेकर शुरू हुए बवाल के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने अपनी आक्रामकता साबित करने के लिए पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ का सहारा लिया है तो हिंदुओं की तरफ से उसका उत्तर सिर्फ ‘I Love Mahadev’ है।
कानपुर से शुरू हुए ‘I Love Muhammad’ के बवाल को लेकर गुजरात के गोधरा, उत्तर प्रदेश के उन्नाव, कर्नाटक के देवानगेरे और उत्तराखंड के काशीपुर समेत देश के कई शहरों में इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंसक प्रदर्शन किए हैं।
मुस्लिमों का आक्रामकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस को कई राज्यों में 1300 से ज्यादा मुस्लिमों के खिलाफ FIR दर्ज करनी पड़ी है और करीब 40 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है। हिंसा का आलम यह है कि गुजरात के गाँधीनगर में तो ‘I Love Mahadev’ का स्टेट्स लगाने पर एक हिंदू की कट्टरपंथियों की भीड़ ने बेतहाशा पिटाई कर दी है।
इस हिंसा, पथराव के जवाब में हिंदुओं ने वही रास्ता चुना जो वो हमेशा से चुनते आए हैं, शांति का रस्ता, आदियोगी का रास्ता, ‘I Love Mahadev’ का रास्ता। देश के अलग-अलग शहरों में संत समाज समेत सामान्य लोग ‘I Love Mahadev’ के पोस्टर लगा रहे हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में कई साधु-संत यह पोस्टर पकड़े नजर आए।
वाराणसी के अलावा देश के कई शहरों में भी यह ट्रेंड दिखा है। कहीं चौराहे पर ‘I Love Mahadev’ के पोस्टर लगाए हए हैं तो कहीं गलियों में बड़े-बड़े बैनर लगे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को देखे तो साफ पता चलता है कि यह लड़ाई इन दो नारों से अधिक दो विचारधाराओं की हैं। एक तरफ हिंसा, आक्रोश और उन्माद का है, तो दूसरी तरफ सहिष्णुता, श्रद्धा और शांति का रास्ता है। हिंदुओं का रास्ता ही असल में भारत की सहिष्णुता, शिवत्व और एकात्मता का रास्ता है।
जब कट्टरपंथी ‘I Love Muhammad’ के नाम पर समाज में डर और आतंक फैलाने की कोशिश कर रहे थे, तब साधु-संतों और युवाओं ने ‘I Love Mahadev’ लिखकर यह दिखाया कि यह देश किसी एक धर्म का बंधक नहीं है। यहाँ हर कोई अपनी आस्था रख सकता है लेकिन इसकी शर्त यही है कि वह दूसरों पर खुद की आस्था को ना थोपे।
हिंदुओं के इस जवाबी अहिंसक आंदोलन का एक पहलू यह भी है कि यह हिंदुओं की एकता का प्रतीक भी है। सोशल मीडिया से लेकर गलियों और चौक-चौराहों तक जिस तरह ‘I Love Mahadev’ का संदेश फैल रहा है और लोग इसे अपनी पहचान और संस्कृति के गर्व के रूप में अपना रहे हैं। यह दिखाता है कि जब-जब सनातन संस्कृति को मजबूती की जरूरत होती है तब समाज एकजुट होकर खड़ा हो जाता है।
भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज अपनी सहिष्णुता से दिखा रहा है कि चार पत्थर लेकर किसी पर हमला कर देना असली ताकत नहीं है। असली ताकत शांति के साथ समाज की चेतना को जागृत करने में ही है।
हाल ही में भारत के पूर्व CJI डी वाई चंद्रचूड़ के साथ एक इंटरव्यू में वामपंथी स्वतंत्र पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने अयोध्या राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए।
जैन ने कुछ आलोचना भरी टिप्पणियों का हवाला देते हुए दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदुओं द्वारा किए गए अवैध कृत्य को सही ठहराता है, क्योंकि उन्होंने आंतरिक प्रांगण (जहाँ विवादित ढाँचा था) पर दावा जताया।
हालाँकि मुस्लिम पक्ष ने बाहरी प्रांगण यानी जहाँ रामलला विराजमान की मूर्ति अस्थायी मंदिर में स्थापित थी, वहाँ कोई दावा नहीं किया था। लेकिन इस इस फैसले से उस समुदाय को दंडित कर दिया गया।
The "very erection" of Babri mosque was the "fundamental act of desecration", DY Chandrachud tells me.
A startling statement — all the more given the verdict he co-authored clearly says no evidence was supplied to show if the earlier structure was demolished to build a… pic.twitter.com/wyEj7UMgqq
श्रीनिवासन जैन ने कहा कि फैसले की एक आलोचनात्मक व्याख्या यह है कि आंतरिक प्रांगण पर विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि हिंदुओं ने वहाँ अवैध काम किए, जैसे अपमानजनक हरकतें, जबरदस्ती अधिकार जताना और माहौल बिगाड़ना।
इसके उलट, मुस्लिम पक्ष ने बाहरी प्रांगण पर दावा नहीं किया और न ही वहाँ झगड़ा किया। लेकिन यही बात उनके खिलाफ चली गई, मानो उन्होंने लड़ाई नहीं लड़ी इसलिए उन्हें सजा मिली, जबकि हिंदुओं की सक्रियता उनके पक्ष में साबित हुई।
अपवित्रीकरण का मूल कार्य मस्जिद का निर्माण था: चंद्रचूड़
जैन के दावे पर जवाब देते हुए पूर्व सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने याद दिलाया कि असली अपमानजनक कृत्य मुसलमानों ने किया था, जब उन्होंने एक हिंदू मंदिर के अवशेषों पर मस्जिद खड़ी की।
उन्होंने कहा, “जब आप कहते हैं कि हिंदुओं ने आंतरिक प्रांगण में अपमानजनक काम किए, तो उस बुनियादी अपमानजनक घटना का क्या, जब मस्जिद बनाई गई थी? हम इतिहास की उस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हमारे पास पुरातात्त्विक साक्ष्य मौजूद हैं और जब यह मान लिया गया कि ऐसा हुआ था, तो फिर आँखें मूँद लेना कैसे सही होगा?” चंद्रचूड़ उस संवैधानिक पीठ का हिस्सा थे, जिसने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था।
फैसले की आलोचना करने वालों का इतिहास के प्रति चयनात्मक दृष्टिकोण है: चंद्रचूड़
जैन द्वारा फैसले पर की गई आलोचनात्मक टिप्पणियों को खारिज करते हुए पूर्व सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जो लोग सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले की आलोचना करते हैं और यह आरोप लगाते हैं कि न्यायपालिका ने पक्षपात किया, वे इतिहास को चुनिंदा ढंग से देखते हैं।
उन्होंने कहा, “जिन लोगों का आप जिक्र कर रहे हैं, वे इतिहास को चुन-चुनकर देखते हैं। वे एक निश्चित दौर के बाद की घटनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं और केवल वही बातें उठाते हैं जो उनकी सोच के अनुकूल हों।”
जैन ने यह कहकर फैसले पर सवाल उठाया कि कोर्ट ने माना था कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को गिराए जाने का ठोस सबूत नहीं है, क्योंकि मंदिर और मस्जिद के बीच कई सदियों का अंतर है। इस पर चंद्रचूड़ ने साफ जवाब दिया, “हमारे पास पुरातात्त्विक खुदाई से पर्याप्त साक्ष्य हैं, खुदाई की रिपोर्ट ही इसका सबूत है।”
उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर संदेह जता रहे हैं, वे असल में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपनी कहानी गढ़ना चाहते हैं। चंद्रचूड़ के अनुसार, “सच तो यह है कि आलोचक मस्जिद के बुनियादी इतिहास को नजर अंदाज कर देते हैं और केवल वही अंश उठाते हैं, जो उनके पक्ष को मज़बूत करते हैं।”
जैन का यह दावा कि मुस्लिम पक्ष को इसलिए सजा मिली क्योंकि उन्होंने विवादित जमीन पर अपना दावा नहीं जताया, बिल्कुल निराधार लगता है। मस्जिद खुद ही उनका दावा थी, जो एक हिंदू मंदिर के अवशेषों पर खड़ी की गई थी और वह जमीन मूल रूप से मुसलमानों की भी नहीं थी।
वास्तव में, अयोध्या जन्मभूमि ही एकमात्र उदाहरण नहीं है, देश में ऐसे कई स्थल हैं जहाँ मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों को तोड़कर अपने दावे ठोके और आज भी वे ढाँचे खड़े हैं।
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले पर बेबुनियाद शंकाएँ उठाई गईं। एक खास तबका, जिसमें कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और इतिहासकार शामिल हैं, झूठी कहानियाँ गढ़कर मस्जिद के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करता रहा।
राम जन्मभूमि को वापस पाने की लड़ाई सदियों तक चली और कई अदालतों से होकर गुजरी। इस लंबे संघर्ष में दोनों पक्षों को अपना पक्ष और सबूत रखने का पूरा मौका मिला।
1528 में मस्जिद निर्माण से शुरू हुआ यह विवाद आखिरकार 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सुलझा। संवैधानिक पीठ ने सभी साक्ष्यों और दलीलों को सुनने के बाद यह तय किया कि विवादित स्थल भगवान राम का है। इस पीठ में मुस्लिम जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर भी शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट को मान्यता दी, जिसमें साबित हुआ कि मस्जिद के नीचे हिंदू ढाँचा मौजूद था। साथ ही अदालत ने माना कि यह स्थान सदियों से हिंदुओं के लिए पवित्र रहा है। पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अलावा, ऐतिहासिक दस्तावेज भी इस बात की गवाही देते हैं कि हिंदू हमेशा से इस स्थान को राम जन्मभूमि मानते आए हैं।
राम जन्मभूमि के पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जो परिशिष्ट (ऐडेंडम) एक अज्ञात जज ने लिखा, उसमें हिंदुओं की राम जन्मभूमि से जुड़ी आस्थाओं का विस्तार से जिक्र किया गया। इसमें ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला दिया गया था, जिनमें आईन-ए-अकबरी, अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच के विवरण, जेसुइट मिशनरी फादर जोसेफ टाइफेनथालर की रिपोर्ट और गुरु नानक की अयोध्या यात्रा का वर्णन करने वाली जन्म साखियाँ शामिल थीं।
आइन-ए-अकबरी
आईन-ए-अकबरी, जो मुगल सम्राट अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने 16वीं सदी में फारसी भाषा में लिखी थी, उसमें अयोध्या का जिक्र भगवान रामचंद्र के निवास स्थान के रूप में मिलता है।
इसमें श्री रामचंद्र को विष्णु का अवतार बताया गया है और अयोध्या को प्राचीन काल के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना गया है। इस ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि त्रेता युग में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अयोध्या नगरी में राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के गर्भ से भगवान राम का जन्म हुआ।
विलियम फिंच के लेख
इस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच, जो मुगल सम्राट जहाँगीर के समय कैप्टन हॉकिन्स के साथ भारत आए थे, उन्होंने अपनी यात्रा-वृत्तांत में अयोध्या का जिक्र किया है।
उन्होंने वहाँ भगवान रामचंद्र के किले और मकानों के खंडहर देखे और लिखा कि भारतीयों की आस्था है कि यहीं भगवान रामचंद्र का जन्म हुआ था, जिन्होंने मानव रूप धारण किया था।
फादर जोसेफ टिफेन्थलर के वृत्तांत
जेसुइट मिशनरी फादर जोसेफ टाइफेनथालर 1766 से 1771 के बीच भारत आए और यहाँ का ऐतिहासिक व भौगोलिक विवरण लैटिन भाषा में लिखा, जिसे बाद में फ़्रेंच और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया।
उनकी यह रचना इलाहाबाद हाईकोर्ट में सबूत (Ext. 133, सूट-5) के तौर पर पेश की गई और अदालत ने इस पर भरोसा किया। सुप्रीम कोर्ट के जज ने उनके विवरण से तीन अहम निष्कर्ष निकाले-
पहला – औरंगजेब ने रामकोट नामक किले को गिरवाकर उसकी जगह तीन गुम्बदों वाली मस्जिद बनवाई। उस जगह पर मौजूद काले पत्थर के 14 खंभों में से 12 खंभे मस्जिद के भीतर इस्तेमाल किए गए और दो खंभे प्रवेश द्वार पर लगाए गए।
दूसरा – मस्जिद के बाईं ओर जमीन से पाँच इंच ऊँचा एक चौकोर स्थान था, जिसे चूने से बने किनारों से सजाया गया था। इसकी लंबाई लगभग 5 गज और चौड़ाई 4 गज थी। इसे हिंदू बेदी (झूला) कहते थे, क्योंकि मान्यता थी कि यहीं भगवान विष्णु ने राम के रूप में जन्म लिया था।
तीसरा – बाबर या औरंगज़ेब ने यह स्थान इसलिए गिराया ताकि हिंदुओं को अपनी आस्था का पालन करने से रोका जा सके। फिर भी, राम जन्मभूमि स्थल पर हिंदू लोग आज भी परिक्रमा करते हैं और भूमि पर दंडवत प्रणाम करते हैं।
गुरु नानक की अयोध्या यात्रा
परिशिष्ट (ऐडेंडम) में जन्म साखियों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें गुरु नानक की अयोध्या यात्रा का वर्णन मिलता है। इनमें दर्ज है कि 1510 ईस्वी में गुरु नानक राम जन्मभूमि के दर्शन के लिए अयोध्या आए थे, यानी 1528 में मस्जिद बनने से पहले ही।
यह रिकॉर्ड हिंदुओं के दावे को मजबूती देता है कि उस समय अयोध्या में भगवान राम का मंदिर मौजूद था, जिसे जन्मस्थान माना जाता था।
इसके अलावा, ब्रिटिश हुकूमत के कई आधिकारिक दस्तावेजों में उस मस्जिद को जन्मस्थान मस्जिद कहा गया है। यह भी साबित करता है कि सबकी समझ में यह बात थी कि मस्जिद वास्तव में राम जन्मस्थान पर बनी है।
परिशिष्ट के अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया, “हिंदुओं की आस्था और विश्वास मस्जिद बनने से पहले भी और उसके बाद भी हमेशा यही रहा है कि भगवान राम का जन्मस्थान वही है, जहाँ बाबरी मस्जिद खड़ी की गई। इस आस्था को ऊपर बताए गए दस्तावेज़ी और मौखिक साक्ष्यों से प्रमाणित किया गया है।”
श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने सिंगापुर की शिपिंग कंपनी एक्स-प्रेस फीडर्स पर 1 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 8,400 करोड़ रुपए) का जुर्माना लगाया था। यह जुर्माना 2021 में कोलंबो पोर्ट के पास जहाज एमवी एक्स-प्रेस पर्ल के डूबने से हुए भयानक पर्यावरणीय हादसे के लिए लगाया गया था। यह श्रीलंका का अब तक का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संकट माना जाता है।
लेकिन अब कंपनी ने साफ कर दिया है कि वह इस आदेश का पालन नहीं करेगी। समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कंपनी के सीईओ श्मूएल योसकोविट्ज़ ने कहा कि इतनी बड़ी रकम चुकाने से वैश्विक शिपिंग कारोबार पर असर पड़ेगा और यह एक खतरनाक मिसाल बनेगी।
यानी अदालत के आदेश के बावजूद कंपनी मुआवजा देने से इनकार कर रही है, जिससे श्रीलंका को न्याय और पर्यावरणीय सुधार के प्रयासों पर बड़ा झटका लग सकता है।
सिंगापुर ध्वज वाले एमवी एक्स-प्रेस पर्ल का डूबना और श्रीलंका की सबसे भयानक समुद्री प्रदूषण आपदा
एमवी एक्स-प्रेस पर्ल एक 1098 फुट लंबा कंटेनर जहाज था, जिसका मालिकाना हक सिंगापुर की कंपनी ईओएस रो प्राइवेट लिमिटेड (एक्स-प्रेस पर्ल ग्रुप का हिस्सा) के पास था और इसे एक्स-प्रेस फीडर्स प्राइवेट लिमिटेड संचालित करती थी। यह कंपनी एशियाई समुद्री रूट्स में बड़ी शिपिंग कंपनी मानी जाती है।
यह जहाज भारत के गुजरात स्थित हजीरा पोर्ट से श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट की ओर जा रहा था। इसमें कुल 1496 कंटेनर थे, जिनमें से 81 खतरनाक सामग्री से भरे थे।
इनमें 25 कंटेनर नाइट्रिक एसिड (खतरनाक रसायन, जिसका इस्तेमाल उर्वरकों और विस्फोटकों में होता है), इसके अलावा सीसा (लेड) की ईंटें, कैल्शियम कार्बाइड, और सैकड़ों मीट्रिक टन प्लास्टिक नर्डल्स ले जाए जा रहे थे।
ये प्लास्टिक नर्डल्स बोतलें, बैग जैसे उत्पाद बनाने में काम आते हैं, लेकिन ये नष्ट न होने वाले (नॉन-बायोडिग्रेडेबल) पदार्थ हैं। समुद्र में फैलने पर ये पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित करते हैं।
जब एमवी एक्स-प्रेस पर्ल अरब सागर में था, तब जहाज के एक कंटेनर से 20 मई 2021 को 26 मीट्रिक टन नाइट्रिक एसिड लीक होने लगा। क्रू ने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन जहरीली गैसों ने जहाज़ की बिजली प्रणाली को नुकसान पहुँचाया और लगातार तकनीकी खराबियाँ शुरू हो गई। इस वजह से कतर और भारत के बंदरगाहों ने जहाज को खतरनाक माल उतारने की अनुमति नहीं दी और जहाज को मजबूरी में कोलंबो जाना पड़ा।
यह जहाज 25 मई 2021 को कोलंबो से लगभग 17 किलोमीटर दूर लंगर डालकर खड़ा हुआ। अगले दिन, यानी 26 मई को, नाइट्रिक एसिड के रिसाव से जहाज में भीषण आग लग गई, जो 11 दिन तक जलती रही।
श्रीलंका की नौसेना, वायुसेना और अंतरराष्ट्रीय बचाव दलों की कोशिशों के बावजूद आग काबू में नहीं आई। आग ने अन्य कंटेनरों को भी अपनी चपेट में ले लिया, जिससे धमाके हुए और जहरीला धुआँ दूर से दिखाई देने लगा। आखिरकार, 2 जून 2021 को जहाज दो हिस्सों में टूटकर डूब गया। यह हादसा नेगोम्बो लैगून (जो यूनेस्को की रामसर साइट है) के पास 180 फीट गहरे पानी में हुआ।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना दशकों में सबसे बड़ा समुद्री प्रदूषण साबित हुई। इसमें 87 टन से ज्यादा प्लास्टिक नर्डल्स समुद्र में फैल गए, जो श्रीलंका के पश्चिमी तट पर 80 किलोमीटर लंबी पट्टी (नेगोम्बो से कालुतारा तक) पर बहकर आ गए। इससे समुद्र तट, नदियों के मुहाने और मैंग्रोव जंगल गंभीर रूप से दूषित हो गए। ये नर्डल्स समुद्री जीवों की खुराक में शामिल होकर पूरी खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करने लगे।
फोटो साभार – AFP
इस हादसे में समुद्र में फैले रसायन और नाइट्रिक एसिड ने तटीय पानी को जहरीला बना दिया। इसके चलते हजारों मछलियाँ मारी गई। साथ ही 417 ऑलिव रिडले कछुए, 48 डॉल्फिन, 8 नीली व्हेल और असंख्य समुद्री जीव तट पर मृत पाए गए।
आग से उठे जहरीले धुएँ में नाइट्रोजन ऑक्साइड और भारी धातुएँ थीं, जिसने कोलंबो की वायु गुणवत्ता खराब कर दी। इस प्रदूषण से सीग्रास, कोरल रीफ और प्लवक (प्लैंकटन) को गंभीर नुकसान पहुँचा, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ।
यह त्रासदी केवल समुद्र और हवा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इंसानों और अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ी। प्रभावित इलाकों में एक साल से ज्यादा समय तक मछली पकड़ने पर रोक लगानी पड़ी। नतीजतन 20,000 से अधिक मछुआरे और उनके परिवार अपनी रोजी-रोटी खो बैठे।
इसके अलावा, प्रदूषित समुद्र तटों की वजह से पर्यटन पर भी बुरा असर पड़ा। सिर्फ शुरुआती सफाई में ही 70 लाख अमेरिकी डॉलर (करीब 58 करोड़ रुपए) से ज्यादा खर्च हुए। मछुआरों को मुआवजा देने के लिए भी फंड जारी करना पड़ा। जब श्रीलंका पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था, उस समय इस हादसे ने हालात को और बिगाड़ दिया।
इस पूरे मामले में पर्यावरण संगठनों जैसे सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल जस्टिस (CEJ) और प्रभावित समुदायों ने श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने माँग की कि संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाए। खासतौर पर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) के उस सिद्धांत का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि ‘प्रदूषक को ही भुगतान करना चाहिए।’
इसी बीच, जहाज एमवी एक्स-प्रेस पर्ल के रूसी कप्तान विटाली ट्यूटकालो को जून 2021 में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें श्रीलंका से बाहर जाने से रोक दिया गया। कंपनी एक्स-प्रेस फीडर्स ने कप्तान की रिहाई के लिए जुर्माना चुकाने की पेशकश की, लेकिन श्रीलंकाई अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला और सिंगापुर स्थित एक्स-प्रेस फीडर्स द्वारा हर्जाना देने से इनकार
श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट में जुलाई 2025 में पाँच जजों वाली बेंच ने 361 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने एक्स-प्रेस फीडर्स और उसकी संबंधित कंपनियों (जिनमें ईओएस रो प्राइवेट लिमिटेड भी शामिल है) उसको जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि इस हादसे ने समुद्री पर्यावरण को अभूतपूर्व तबाही दी और लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि कंपनी श्रीलंकाई सरकार को एक साल के भीतर शुरुआती 1 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 8400 करोड़ रुपए) मुआवजा दे। इसमें से 2.3 करोड़ डॉलर 23 सितंबर 2025 तक जमा कराने थे। अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर और भुगतान भी बहाली के लिए वसूला जा सकता है।
यह मुआवज़ा आर्थिक नुकसान, पारिस्थितिक तंत्र की बहाली और लंबे समय तक हुए नुकसान को ध्यान में रखकर तय किया गया। अदालत ने कंपनी की लापरवाही और खतरनाक माल की सही जानकारी न देने को गंभीर गलती माना।
इस फैसले को दुनियाभर में सराहना मिली और इसे वैश्विक जवाबदेही की दिशा में अहम कदम बताया गया। चार साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह फैसला न्याय की उम्मीद की तरह देखा गया था।
लेकिन अब मामला उलझ गया है क्योंकि एक्स-प्रेस फीडर्स ने यह रकम देने से साफ इनकार कर दिया है। कंपनी के सीईओ श्मूएल योसकोविट्ज़ ने एएफपी से कहा कि वह भुगतान नहीं करेंगे और अदालत के आदेश को लटकती हुई तलवार (हैंगिंग गिलोटीन) करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि यह फैसला वैश्विक शिपिंग उद्योग के लिए खतरनाक मिसाल बनेगा और कंपनियों को असीमित जिम्मेदारी के खतरे में डाल देगा।
एक्स-प्रेस फीडर्स के सीईओ श्मूएल योसकोविट्ज़ ने साफ कहा कि उनकी कंपनी 1 अरब डॉलर का जुर्माना नहीं चुकाएगी। उन्होंने तर्क दिया कि समुद्री व्यापार की नींव सीमित जिम्मेदारी (Limitation of Liability) पर टिकी है और श्रीलंका सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस सिद्धांत को कमजोर करता है। उनके मुताबिक, अगर ऐसी मिसाल कायम हुई तो भविष्य में समुद्री हादसों के निपटारे पर खतरा मंडराएगा और बीमा प्रीमियम बढ़ेंगे, जिसका बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।
योसकोविट्ज ने हादसे के लिए माफी माँगी और कहा कि कंपनी पहले ही 170 मिलियन डॉलर मलबा हटाने, समुद्र व तट की सफाई और मछुआरों को मुआवज़ा देने पर खर्च कर चुकी है। उन्होंने कहा, “हम छुप नहीं रहे… हम और भुगतान करने को तैयार हैं, लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के तहत तय होना चाहिए और अंतिम निपटान होना चाहिए। अदालत के आदेश की तरह ‘लटकती तलवार’ के नीचे काम करना असंभव है।”
अगस्त 2025 में कंपनी ने बयान जारी कर अदालत के फैसले पर नाराजगी जताई। कंपनी ने आरोप लगाया कि अदालत ने जहाज के रूसी कप्तान विटाली ट्यूटकालो और स्थानीय एजेंटों को मुकदमे पूरे होने से पहले ही अपराधी मान लिया। कप्तान जून 2021 से श्रीलंका में फंसे हैं और अदालत में न तो पेश हो पाए और न ही कानूनी प्रतिनिधित्व मिल पाया।
कंपनी ने यह भी कहा कि अदालत ने श्रीलंकाई अधिकारियों की भूमिका को नजरअंदाज किया, जबकि जहाज डूबने से एक हफ्ते पहले उनके ही विशेषज्ञों ने जहाज की जाँच की थी और कोई चेतावनी नहीं दी थी। साथ ही, कंपनी ने याद दिलाया कि जहाज ने मदद माँगी थी लेकिन कतर, भारत और श्रीलंका तीनों ने खतरनाक कंटेनर उतारने से इनकार कर दिया था।
ध्यान देने योग्य है कि जुलाई 2023 में लंदन की एडमिरल्टी कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून (1976 LLMC) के तहत कंपनी की जिम्मेदारी को सिर्फ 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 19 मिलियन पाउंड) तक सीमित कर दिया था। श्रीलंका ने इसके खिलाफ अपील की है।
साथ ही, श्रीलंकाई सरकार ने कंपनी पर सिंगापुर की इंटरनेशनल कमर्शियल कोर्ट में भी मुकदमा किया है, लेकिन यह मामला लंदन अपील पर टिका हुआ है। श्रीलंका के पास अदालत के आदेश को लागू करने के लिए सीमित विकल्प हैं, जैसे अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर संपत्ति जब्त करना, इंटरपोल नोटिस जारी करना, बीमा कंपनियों पर दबाव डालना या अधिकारियों के विदेश दौरे पर गिरफ्तारी। लेकिन सिंगापुर और श्रीलंका के बीच कोई पारस्परिक संधि (reciprocity treaty) नहीं होने के कारण विदेशी अदालतें इस फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि श्रीलंका यह मुद्दा सरकार-से-सरकार स्तर पर उठा सकता है या फिर अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण (ITLOS) में ले जा सकता है, लेकिन वहाँ भी नतीजा तभी आएगा जब दोनों पक्ष सहमत हों, जो फिलहाल मुश्किल दिखता है।
हालाँकि समुद्र तट पर सफाई अभियान से हालात कुछ बेहतर दिख रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि सूक्ष्म प्लास्टिक (microplastics) समुद्र तल और खाद्य श्रृंखला में दशकों तक बने रहेंगे। यह पूरा मामला दरअसल राष्ट्रीय पर्यावरणीय न्याय और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के बीच की खींचतान को दिखाता है।
श्रीलंका पूर्ण जवाबदेही चाहता है, जबकि एक्स-प्रेस फीडर्स जवाबदेही तो दिखा रहा है, लेकिन अपनी शर्तों पर। अब देखना यह है कि असली न्याय मिलेगा या यह लड़ाई सालों तक खिंचती रहेगी।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
अमेरिका की सरकार ने भारतीय मूल की ब्रिटिश शिक्षाविद निताशा कौल को खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश के लिए चल रहे ट्रायल में एक्सपर्ट विटनेस (विशेषज्ञ गवाह) के तौर पर शामिल किया है।
अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने अपने आधिकारिक अदालती दस्तावेज में कहा है कि प्रोफेसर कौल इस मामले में साक्ष्य देंगी। वह लंदन स्थित वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय में राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध और आलोचनात्मक बहु-विषयक अध्ययन की प्रोफेसर हैं और वहीं पर लोकतंत्र अध्ययन केंद्र की निदेशक भी हैं।
दस्तावेजों के अनुसार, कौल कई बिंदुओं पर गवाही देंगी। इसमें यह भी शामिल है कि भारत सरकार ने सार्वजनिक रूप से पन्नू और हरदीप सिंह निज्जर की आतंकवादी गतिविधियों की निंदा की थी।
यह जानकारी स्वतंत्र खोजी पत्रकार ‘जर्नलिस्ट V’ ने अपने X (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर साझा की है।
कौल को अमेरिका में एक्सपर्ट विटनेस के तौर पर बुलाने की बात से भारत में विवाद खड़ा हो गया है क्योंकि निताशा ने कई भारत-विरोधी बयान दिए हैं और भारतीय संस्थानों के खिलाफ लंबे समय से सक्रिय रही हैं।
निताशा कौल कौन हैं?
निताशा कौल को उनके वर्षों पुराने बयानों और गतिविधियों के कारण अक्सर ‘भारत-विरोधी प्रचारक’ या ‘एंटी- इंडिया प्रोपेगैंडिस्ट’ कहा जाता है। मई 2024 में उन्होंने सोशल मीडिया पर शिकायत की थी कि भारत सरकार ने उनका ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड रद्द कर दिया है।
उन्होंने अपनी पोस्ट में सरकार पर असहमति की आवाज को दबाने के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय दमन’ और उनके ‘शोध कार्य’ के लिए सजा देने का आरोप लगाया था। उनके अनुसार ये शोध कार्य प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की आलोचना करता है।
उन्होंने लिखा कि उनके साथ अन्याय हुआ है और याद दिलाया कि इससे पहले भी उन्हें भारत में प्रवेश से रोका गया था, जब उन्हें कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था।
निताशा के अनुसार, उन्होंने अधिकारियों को 20,000 शब्दों का विस्तृत जवाब भेजा था, फिर भी सरकार ने उनका OCI कार्ड रद्द कर दिया। उन्होंने दावा किया कि यह भारत की ‘संकीर्ण मानसिकता और असुरक्षा’ का संकेत है, जो असहमति को जगह नहीं देती।
हालाँकि भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि OCI कार्ड कोई अधिकार नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार है। यह विशेष शर्तों के तहत भारतीय मूल के लोगों को दिया जाता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति भारत की संप्रभुता, संवैधानिक मूल्यों या राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो इसे रद्द किया जा सकता है।
भारत की संप्रभुता-अखंडता को नुकसान पहुँचाने के प्रयास पर सरकार ने रद्द किया OCI कार्ड
निताशा के मामले में उनकी ओर से साझा किए गए दस्तावेजों में लिखा था- “भारत सरकार के संज्ञान में यह बात आई है कि आप भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल पाई गई हैं, जो दुर्भावना से प्रेरित हैं और तथ्यों या इतिहास की पूरी तरह अनदेखी करती हैं। आपने अपने लेखन, भाषणों और पत्रकारिता के माध्यम से भारत और उसकी संस्थाओं की संप्रभुता को बार-बार निशाना बनाया है।”
भारत सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनकी भारत-विरोधी गतिविधियों के कारण उनका OCI कार्ड रद्द किया गया। निताशा लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव का प्रचार करती रही हैं।
मई 2024 में उन्होंने एक काल्पनिक कहानी साझा की थी। इसमें उन्होंने भारत में EVM मशीनों में वोट न गिनने का सपना देखा था। उन्होंने इस कहानी को कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से EVM को लेकर फैलाई गए विवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया।
उन्होंने कहा, “हाल ही में एक वर्कशॉप लंच में मैं एक ब्रिटिश सहयोगी को बता रही थी कि पिछली रात मैं ठीक से सो नहीं पाई क्योंकि मैंने सपना देखा कि लोग EVM पर वोट डाल रहे हैं लेकिन वोट गिने नहीं जा रहे। तुर्की के एक कलीग ने सुना और कहा कि उसे भी एर्दोगन के चुनावों के दौरान ऐसे सपने आते थे।”
फरवरी 2024 में उन्हें बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पहुँचते ही वापस भेज दिया गया था। यह कार्रवाई उनके खिलाफ जारी एक लुकआउट सर्कुलर नोटिस के आधार पर की गई थी, क्योंकि भारतीय एजेंसियों ने उन्हें ‘अलगाववादी’ बयानों और कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख के लिए चिन्हित किया था।
कौल ने कहा कि उन्हें एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने रोका और बताया कि ‘दिल्ली से ऑर्डर्स’ हैं कि उन्हें देश में घुसने न दिया जाए। उन्होंने कहा कि उनके पास यात्रा के सभी कागज थे, लेकिन फिर भी उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने दावा किया कि वह ‘लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता’ के लिए आवाज उठाना जारी रखेंगी, चाहे उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े। बेंगलुरु एयरपोर्ट से डिपोर्टेशन के बाद उन्होंने एक्स पर तीखी प्रतिक्रिया दी, ठीक उसी तरह जैसे अब उन्होंने OCI कार्ड रद्द होने के बाद दी है।
उन्होंने पहले भी RSS के बारे में झूठी बातें फैलाई थीं और ‘Stand With Kashmir’ (स्टैंड विथ कश्मीर), ‘Kashmir Solidarity Movement’ और ‘Indian American Muslim Council’ जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था।
कौल ने व्हार्टन स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को रद्द कराने में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CoDS) बिपिन रावत की मृत्यु का भी मजाक उड़ाया था। निताशा कौल ने उनके असमय निधन को सही ठहराते हुए उन्हें ‘कश्मीरियों का दुश्मन’ बताया था।
भारत-विरोधी आवाज का इस्तेमाल करती अमेरिकी सरकार
हैरानी की बात ये है कि अमेरिका सरकार ने एक भारत-विरोधी विचार रखने वाले इंसान को एक्सपर्ट विटनेस के तौर पर चुना है। ये भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है। इसे वॉशिंगटन का जानबूझकर भारत-विरोधी आवाज को मंच देने की कोशिश माना जा रहा है।
कौल की गवाही का उपयोग यह साबित करने के लिए किया जा सकता है कि भारत ने विदेशों में खालिस्तानी आतंकवादियों को निशाना बनाया है, लेकिन उनके भारत-विरोधी बयानों का इतिहास उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
कई लोगों के लिए यह ऐसा लगता है जैसे ये भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किनारा करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो, खासकर तब जब भारत ने विदेशों में हत्या की साजिशों में शामिल होने के आरोपों को बार-बार खारिज किया है।
गुरपतवंत सिंह पन्नू कौन है?
गुरपतवंत सिंह पन्नू अमेरिका में रहने वाला खालिस्तानी आतंकवादी है। उसके पास अमेरिका और कनाडा दोनों देशों की नागरिकता है। वह अमेरिका में वकील होने की बात कहता है और सिखों के अधिकारों की लड़ाई में अग्रणी होने का दावा करता है।
असल में, वह लगातार खालिस्तानी विचारों का प्रचार करता है और भारत के खिलाफ धमकियाँ देता रहता है। वह कनाडा, अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय राजनयिकों के खिलाफ हिंसा भड़काने का भी काम करता है।
भारत सरकार ने उसे गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकवादी घोषित किया है। उसकी संस्था ‘Sikhs For Justice’ को भी भारत सरकार ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है।
क्या है पन्नू मामले की तह
पन्नू की हत्या की साजिश का खुलासा पिछले साल हुआ था जब अमेरिकी न्याय विभाग ने दो भारतीय नागरिकों के खिलाफ आरोप दर्ज किए थे। पहले आरोपी विकास यादव पर भारत में बैठकर साजिश रचने का आरोप है। पहले उसे ‘CC-1’ के नाम से पहचाना गया था, अब उसे आधिकारिक तौर पर आरोपित बनाया गया है।
दूसरा आरोपी निखिल गुप्ता चेक गणराज्य में गिरफ्तार हुआ था और फिलहाल ब्रुकलिन में डिटेंशन में है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यादव पहले भारत के कैबिनेट सचिवालय में कार्यरत था। उसने निखिल गुप्ता को अमेरिका में एक हिटमैन खोजने का काम सौंपा था ताकि पन्नू को खत्म किया जा सके।
मैनहैटन फेडरल कोर्ट में फाइल किए गए एक मामले में अमेरिकी न्याय विभाग ने दावा किया था कि एक अज्ञात भारतीय सरकारी कर्मचारी (CC-1) ने निखिल गुप्ता को पन्नू को मारने के लिए एक हत्यारे की खोज करने को कहा था। गुप्ता को जून 2023 में प्राग में हिरासत में लिया गया और जून 2024 में अमेरिका प्रत्यर्पित किया गया।
अमेरिका की ओर से नवंबर 2023 में खालिस्तानी आतंकवादी पन्नू की हत्या की असफल साजिश के आरोप ऐसे समय में सामने आए जब कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय अधिकारियों की संलिप्तता का आरोप लगाया था। भारत ने इन आरोपों को बार-बार निराधार बताया है।
अब जब अमेरिका इस मामले को आगे बढ़ा रहा है और निताशा कौल जैसे व्यक्तियों को विशेषज्ञ गवाह बना रहा है तो यह मामला भारत और वाशिंगटन के बीच संबंधों में तनाव को एक और पायदान पर लेकर जा सकता है।
इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
यह देखकर अच्छा लगता है कि आप ‘तीन सरल शब्दों – आई लव मोहम्मद’ के सम्मान के लिए इतनी गंभीरता दिखा रही हैं। यह निश्चित रूप से धार्मिक पहचान का एक भाव है। यह बात भी सही है कि हर भारतीय नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है लेकिन जब आप यह कहती हैं कि भारतीय नागरिकों को अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है, तो क्या इसमें हिंदू भी शामिल होते हैं आरफा खानम शेरवानी? और अगर आप मानती हैं कि हिंदुओं को भी अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है, तो फिर आप तब चुप क्यों रहती हैं जब आपके ही समुदाय के लोग हिंदुओं को ‘आई लव महादेव’ कहने पर निशाना बनाते हैं?
गुजरात के गांधीनगर जिले के दहेगाम तालुका के बहीयाल गाँव में 24 सितंबर 2025 की रात हिंदुओं पर गरबा उत्सव के दौरान हमला हुआ। हिंसा की शुरुआत एक हिंदू युवक की सोशल मीडिया पोस्ट से हुई, जिसमें उसने लिखा था- ‘आई लव महादेव’। आपकी ही कौम के लोगों को यह पोस्ट नागवार गुजरी और वे युवक की दुकान पर पहुँच गए। इसके चलते उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। उसके न होने पर दुकान में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई। CCTV फुटेज में साफ दिखा कि कई मुस्लिम युवक दुकान में घुसकर नुकसान पहुँचा रहे थे।
यह झगड़ा जल्दी ही बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल गया। पत्थर फेंके गए, लाठियाँ और रॉड चलाई गईं और गरबा कार्यक्रम में हिंदुओं के वाहन जला दिए गए। 8 से ज्यादा गाड़ियाँ तोड़ी-फोड़ी गईं और एक दुकान पूरी तरह जला दी गई। इसके बाद हालात काबू करने पहुँची पुलिस पर भी हमला किया गया जिसमें दो पुलिस वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। एक वीडियो में साफ दिखा कि मुस्लिम युवक पत्थर बरसा रहे थे और उसी बीच एक हिंदू माँ अपने बेटे को ढूँढते हुए रो रही थी। यह तस्वीर उस भीड़ के खौफ को दिखाने के लिए काफी है।
स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस वक्त बाहर बैठे एक दुकानदार ने बताया कि करीब 5,000 लोगों की भीड़ रात में गाँव पर टूट पड़ी और उसकी दुकान को जानबूझकर निशाना बनाया। उसने बताया कि उसके गाँव में केवल 80 हिंदू परिवार रहते हैं और चारों तरफ मुसलमानों की आबादी है। भीड़ पत्थरों और हथियारों के साथ पहुँची और उसकी दुकान को तहस-नहस कर दिया जबकि मुस्लिम दुकानों को छुआ तक नहीं। उसने यह भी बताया कि हमलावरों में नाबालिग लड़के भी शामिल थे।
यह घटना साफ तौर पर हिंदू समाज को निशाना बनाने के लिए की गई थी। एक हिंदू युवक की भगवान शिव के प्रति आस्था दिखाने की बात ही हिंसा का बहाना बन गई। यह कोई झड़प नहीं थी बल्कि हिंदुओं और उनकी भक्ति से असहिष्णुता को लेकर सांप्रदायिक हमला था।
तो बताइए, शेरवानी, अगर तीन साधारण शब्द कभी भी खतरनाक नहीं माने जाने चाहिए तो फिर हिंदुओं को ‘आई लव महादेव’ कहने पर हिंसक सजा क्यों दी गई? उस समय आपका आक्रोश कहाँ चला गया था?
जरा सोचिए आरफा खानम शेरवानी जी, अगर वह हिंदू युवक भागा ही नहीं होता तो? क्या आपको लगता है कि आपके ही धर्म के वो लोग, जो उसकी दुकान तोड़ रहे थे और हिंसा कर रहे थे, उस हिंदू लड़के को नुकसान नहीं पहुँचाते? और अगर सच में वे उसे चोट पहुँचा देते, तो क्या आप यह कहतीं कि यह उनका हक है क्योंकि मुसलमानों को इतना आहत महसूस होने का विशेष अधिकार है कि वे गैर-मुसलमानों की स्वतंत्रता छीन लें?
क्या आपको सच में लगता है कि हिंदू सिर्फ अपनी भक्ति जताए तो वह आपके धर्म का अपमान है? क्या सिर्फ हिंदुओं का होना ही आपके समाज के लिए हिंसा करने का कारण बन जाता है? बताइए आरफा, क्या आप मानती हैं कि केवल मुसलमानों को ही अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है जबकि अक्सर यह धार्मिक पहचान दूसरों के धर्म को कुचलने पर आधारित होती है।
आप बहुत परेशान नजर आती हैं जब मुसलमानों को ‘आई लव मोहम्मद’ कहने पर अपराधी बताया जाता है। लेकिन ज़रा देखिए कि यही तीन ‘भोले-भाले’ शब्द आपके ही समुदाय के कुछ लोगों ने देशभर में कैसी तबाही मचाने के लिए इस्तेमाल किए हैं। ये शांति और मोहब्बत के नारे नहीं रहे। इन्हें मजहबी उन्मादियों ने जंग का नारा बना दिया है। हमने कई बार देखा है कि भीड़ इन नारों को ‘सर तन से जुदा’, पत्थरबाजी, आगजनी, तोड़फोड़ और यहाँ तक कि पुलिस पर सीधे हमले के लिए इस्तेमाल करती है।
जरा इस पोस्टर को ही देख लीजिए।
‘I Love Muhammad’ का पोस्टर
मैं 100% सहमत हूँ कि आपका ‘I Love Muhammad’ वाला पोस्टर लगाने का हक है क्योंकि यह आपके धर्म की अभिव्यक्ति है और इसे सम्मान किया जाना चाहिए। पर एक हिंदू होने के नाते, जिसकी कम्युनिटी और उसके लोग परेशानी में हैं, मैं आपसे पूछती हूँ आपकी कम्युनिटी को यह बात जोड़ने की जरूरत क्यों महसूस होती है कि ‘अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुजदिल भी पहली सफ में खड़े मिलेंगे’?
आरफा, आपकी कम्युनिटी कौन सी जंग लड़ रही है? यह जंग किसके खिलाफ है? आपकी कम्युनिटी जीतकर क्या करेगी? क्या आप जानती हैं कि किसने भी इस काल्पनिक ‘जंग’ की बात की थी? PFI ने। आप जानती हैं उन्होंने क्या लिखा? उन्होंने एक दस्तावेज में बताया कि जो आने वाली जंग होगी, उसके मतलब हिंदुओं का सफाया है जिसमें हिंदुओं की लिस्ट बनाना और उन्हें मार देना शामिल है। भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने की बात की गई, जहाँ गैर-मुसलमानों की खासकर हिंदुओं की कोई जगह न रहे। आरफा, क्या आप PFI और अपने कुछ साथियों से कहेंगी कि ‘अपनी रणनीति बदल लो, अपनी विचारधारा नहीं’ जैसा कि आपने शाहीन बाग के जिहादियों से कहा था, ताकि आप अपना सेक्युलर लबादा ओढ़े दिखें।
उत्तरी प्रदेश, उतराखंड और गुजरात समेत कई राज्यों में हिंसा भड़की है। शहरों में मार्च के दौरान पुलिस पर हमला हुआ और उन पर पत्थर फेंके गए और लोग जोर-जोर से ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगा रहे थे। एक मौलवी ने तो बरेली में एक इंस्पेक्टर को जान से मारने की धमकी भी दी थी।
यह नारा इबादत का ही प्रतीक हो सकता है और मुस्लिम समुदाय को अपने धर्म को खुलकर जताने का अधिकार होना चाहिए। समस्या यह है कि कुछ इस्लामी कट्टरपंथी मजहब को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे इसे अलगाववादी और श्रेष्ठतावादी सोच के लिए प्रयोग करते हैं। इसका नतीजा अक्सर यही होता है कि हिंदुओं पर हमला होता है, उन्हें सताया जाता है, दबाया जाता है और कभी-कभी तो उनका कत्लेआम भी कर दिया जाता है।
हिंदुओं ने कहा- ‘आई लव महादेव’। मुसलमानों ने उसका जवाब पत्थरबाजी, आगजनी और चुन-चुनकर हिंदू दुकानों पर हमले से दिया। मुसलमानों ने कहा- ‘आई लव मोहम्मद’ लेकिन इसके साथ दंगे हुए, सिर काटने की धमकियाँ दी गईं और पुलिस से हिंसक झड़पें की गईं। तो क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय राज्य या हिंदुओं पर सवाल उठाने के बजाय आपको उन लोगों से सवाल करना चाहिए जिन्होंने उसी मजहब का नाम कलंकित कर दिया है जिसे आप बड़े प्यार से मानती हैं?
सितंबर 2024 में आपने ‘लव जिहाद, थूक जिहाद और लैंड जिहाद’ जैसे दर्ज मामलों को ‘फर्जी प्रोपेगेंडा’ कहकर खारिज कर दिया और उन हिंदू पीड़ितों की गवाही जानबूझकर नजरअंदाज कर दी जो इससे पीड़ित थे। फिर जनवरी 2025 में आपने ‘द वायर’ की उस रिपोर्टिंग का बचाव किया जिसमें हमीरपुर में जबरन धर्मांतरण के आरोप में पकड़े गए मुस्लिमों को बचाने की कोशिश की गई थी। आपने पुलिस पर सवाल खड़े किए लेकिन उन हिंदू परिवारों की पीड़ा को नहीं माना जिन्हें जबरदस्ती धर्म बदलने के लिए मजबूर किया या। ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं, इस सूची का कोई अंत नहीं है।
असल में आरफा, आप कभी उन मुस्लिमों जैसी नहीं बन पाएँगी जो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे थे। आप कभी अरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों की इज्जत नहीं करेंगी। आप कभी उन मुसलमानों के लिए खड़ी नहीं होंगी जो पहले भारत को रखते हैं और दिल से हिंदुओं को अपना भाई समझते हैं। आरफा आप केवल तब बोलेंगी जब कट्टर इस्लामी भीड़ हिंदुओं पर हमला करेगी। आरफा आप जिहादियों की वैचारिक रीढ़ हैं।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नवरात्रि से पहले गरबा आयोजनों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कई हिंदू संगठनों ने गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है। संगठनों का कहना है कि कट्टरपंथी अपनी पहचान छिपाकर गरबा में घुसते हैं और ‘लव जिहाद’ जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।
‘घर वापसी’ की चेतावनी और पोस्टर
भोपाल की श्रीकृष्ण सेवा समिति ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने चेतावनी दी है कि अगर कोई गैर-हिंदू गरबा पंडाल में प्रवेश करता है, तो उसकी ‘घर वापसी’ कराई जाएगी। पंडालों के बाहर ऐसे पोस्टर भी लगाए गए हैं, जिन पर साफ लिखा है कि ‘गरबा सिर्फ हिंदुओं’ के लिए है।
बीजेपी नेता आलोक शर्मा ने भी इस मामले पर अपनी चिंता जाहिर की है। आलोक शर्मा ने कहा कि कुछ लोग गरबा पंडालों में ‘कलावा और तिलक’ लगाकर आते हैं और हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनका शोषण करते हैं। आलोक शर्मा का कहना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए इस तरह के फैसले लेना बहुत जरूरी है।
‘लव जिहाद’ की घटनाओं का हवाला
यह माँग इसलिए भी उठ रही है क्योंकि पिछले कुछ सालों में गरबा आयोजनों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं। इन घटनाओं में मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर गरबा में आते थे और हिंदू लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार करते थे। पुलिस ने सबूतों के आधार पर कई ऐसे लोगों को गिरफ्तार भी किया है। कुछ मामलों में तो ऐसे भी उदाहरण मिले हैं, जहाँ मुस्लिम युवक केवल हिंदू लड़कियों की वीडियो बनाने के मकसद से गरबा समारोह में घुसे थे।
नवरात्रि जैसे पवित्र त्योहारों से कट्टरपंथियों की साजिशें शुरू होती है और अंत में ये मासूम लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर न सिर्फ प्रताड़ित करते हैं बल्कि उन पर धर्मांतरण का दबाव भी डालते हैं। ये 17 घटनाएँ साबित करती है कि गैर-हिंदुओं का प्रवेश गरबा पंडालों में वर्जित क्यों जरुरी है।
1- डांडिया नाइट की आड़ में हिंदू लड़कियों को फँसाने की साजिश
महाराष्ट्र के नागपुर में 12 अक्टूबर 2021 को लेजंटा फाइव स्टार होटल में राजिक अंसारी नाम के एक मुस्लिम युवक ने डांडिया नाइट कार्यक्रम का आयोजन किया था। आयोजन की जानकारी मिलने के बाद विश्व हिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था। हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया था कि इस तरह के आयोजनों के जरिए मुस्लिम युवकों को हिंदू लड़कियों के साथ दोस्ती करने और उन्हें निशाना बनाने का मौका दिया जा रहा था।
2- इंदौर में गरबा पंडाल से चार मुस्लिम युवक गिरफ्तार
मध्य प्रदेश के इंदौर में 10 अक्टूबर 2021 को गाँधी नगर इलाके में एक गरबा कार्यक्रम के दौरान चार मुस्लिम युवक पकड़े गए थे। आरोपितों की पहचान अदनान शाह, मोहम्मद उमर, अब्दुल कादिर और सैयद साकिब के रूप में हुई थी। SDM पराग जैन के निर्देश पर पुलिस ने चारों युवकों को गिरफ्तार किया था।
3- दिल्ली के गरबा कार्यक्रम में ‘2 मिनट की लव स्टोरी’ पर विवाद
दिल्ली में रेडियो मिर्ची गरबा 2022 के दौरान एक कार्यक्रम ‘2 मिनट की लव स्टोरी‘ पर विवाद हुआ था। इस कार्यक्रम में कथित तौर पर एक युवक ने ‘गरबा पंडालों में लव जिहाद’ की साजिश से मिलती-जुलती बात कही। रेडियो मिर्ची के शो में एक युवक अली ने अपने दोस्त को एक इंटरनेट ऐप के बारे में बताया था। अली ने कहा कि वह एक ऐसा ऐप बना रहा है, जिसमें गरबा पंडालों में आने वाली लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी जानकारी डालकर रजिस्टर कर सकेंगी।
अली ने बताया कि ऐप के जरिए लड़के अपनी पसंद की लड़की को मैसेज करके उसे पंडाल के बाहर बुला सकते हैं और उसके साथ गरबा खेल सकते हैं। इस बातचीत में गर्व के साथ यह भी बताया गया कि वे लड़कियों का डेटा इकट्ठा करेंगे और फिर उसी पंडाल में जाएँगे जहाँ उनकी पसंदीदा प्रोफाइल वाली लड़की डांडिया खेलने का विकल्प चुनेगी। इस कार्यक्रम के बाद रेडियो मिर्ची पर गंभीर आरोप लगे थे कि ये ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा दे रहा है।
4- गरबा पंडाल घुसकर की हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़
मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितंबर 2022 को नानाखेड़ा ग्राउंड में गरबा कार्यक्रम के दौरान कुछ मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर अंदर घुसे और वहाँ मौजूद महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने लगे। आयोजकों ने शक होने के बाद पकड़ा। मुस्लिम युवकों ने अपना नाम संदीप-बबलू बताया। सख्ती से पूछताछ के बाद उन्होंने जुर्म कबूल किया।
5- अहमदाबाद गरबा में जबरन घुसे मुस्लिम युवक
गुजरात के अहमदाबाद में 29 सितंबर 2022 को सिंधु भवन रोड पर एक गरबा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें कुछ मुस्लिम युवक चेतावनी के बावजूद पंडाल में घुसे थे। बाद में आयोजकों ने चेकिंग के दौरान उन्हें पकड़ा था।
6- गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू महिलाओं का बना रहे थे वीडियो
मध्य प्रदेश के इंदौर में 30 सितंबर 2022 को कुछ मुस्लिम युवकों को एक गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू लड़कियों के वीडियो बनाते हुए पकड़े गए थे। पंडाल में मौजूद कुछ हिंदू युवकों को इन लोगों पर शक हुआ था। पुलिस को बुलाने पर मुस्लिम युवक मौके से फरार हो गए थे।
7- जयपुर गरबा पंडाल में जबरन घुसने की कोशिश, मुस्लिम युवक भागे
जयपुर में 30 सितंबर 2022 मुरलीपुरा इलाके के नारायण वाटिका मैरिज गार्डन में गरबा कार्यक्रम में कुछ मुस्लिम युवक जबरन पंडाल में घुसे थे। गरबा पंडाल की सुरक्षा में तैनात बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने शक के आधार पर ID चेक की थी। उसके बाद ही मुस्लिम युवकों की पहचान उजागर हुई थी। हालाँकि, आरोपित अंधेरे का फायदा उठाकर मौके से भागने में कामयाब हो गए थे।
8- सूरत गरबा पंडाल में मुस्लिम बाउंसरों का विरोध
गुजरात के सूरत में 5 अक्टूबर 2022 को वेसु इलाके में एक गरबा कार्यक्रम में मुस्लिम बाउंसरों की तैनाती को लेकर बजरंग दल ने कड़ा विरोध किया था। बजरंग दल ने आरोप लगाया था कि मुस्लिम बाउंसर बिना जाँच के मुस्लिम युवकों को हिंदू नामों के साथ गरबा पंडास में घुसा रहे थे।
9- गरबा में मुस्लिम युवकों ने हिंदू युवक को चाकू मारा
राजस्थान के बीकानेर में 6 अक्टूबर 2022 को कुछ मुस्लिम युवकों ने गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू लड़कियों से छेड़खानी की थी। जब एक हिंदू युवक ने इसका विरोध किया तो उसे चाकू मारा गया। पुलिस ने शाहरुख, समीर और जुबैर नाम के तीन मुस्लिम युवकों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था।
10- मुनव्वर फारूकी के गरबा इवेंट में जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने किया विरोध
मुंबई में 10 अक्टूबर 2022 को स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी अपने कुछ मुस्लिम दोस्तों के साथ एक गरबा कार्यक्रम में पहुँचा था, जिसके बाद उसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। वायरल वीडियो में मुनव्वर को हिंदू लड़कियों से घिरा हुआ देखा गया था। हिंदू संगठनों ने इस मामले का कड़ा विरोध किया था। क्योंकि मुनव्वर फारूकी हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर चुका था और फिर वे हिंदू के त्योहार गरबा पंडाल में शामिल हुआ था। हिंदू संगठनों का आरोप था कि ऐसे मुस्लिम चेहरे गरबा आयोजनों का इस्तेमाल हिंदू लड़कियों को बहकाने और फँसाने की साजिश के तौर पर करते हैं।
11- हिंदू बनकर आया था ‘आमिर’
मध्य प्रदेश के इंदौर में 10 अक्तूबर 2023 को एमआर 10 स्थित वैभव श्री गार्डेन में ‘आरकेई गरबा नाइट’ कार्यक्रम हुआ था। इसमें एक मुस्लिम युवक आमिर पकड़ा गया था। आमिर पर आरोप था कि वो एक हिंदू युवती को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जा रहा था। ‘आमिर‘ अपना नाम ‘अमन‘ बताकर गरबा कार्यक्रम में शामिल हुआ था। लड़की के परिवार वालों ने आरोप लगाया कि आमिर की नीयत ठीक नहीं थी। पुलिस ने जब उसका फोन चेक किया, तो उसमें कई अश्लील चैट्स मिलीं, जिससे यह बात और साफ हो गई कि उसका मकसद गलत था। फिर पुलिस ने आरोपित आमिर को गिरफ्तार किया।
12- गुजरात गरबा पंडाल में ID चेक से खुला राज
गुजरात में 18 अक्टूबर 2023 को नवरात्रि के दौरान ही गरबा कार्यक्रम में मुस्लिम युवक को अपना नाम छिपाकर पंडाल में घुसने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था। गरबा आयोजकों ने पंडाल में प्रवेश से पहले सभी लोगों की ID चेक करना शुरू किया। इसी दौरान एक युवक पर शक हुआ था। जब उसकी आईडी की जाँच की गई, तो उसकी असली पहचान सामने आई। पता चला कि वह मुस्लिम था, जो हिंदू नाम का इस्तेमाल कर अंदर घुसने की कोशिश कर रहा था। फिर तुरंत उसे पंडाल से बाहर निकाला गया।
13- उज्जैन गरबा में घुसा था अमन, हिंदू महिलाओं से छेड़छाड़
मध्य प्रदेश के उज्जैन में 20 अक्टूबर 2023 को दशहरा मैदान इलाके में गरबा कार्यक्रम में एक मुस्लिम युवक को पंडाल में घुसकर हिंदू महिलाओं से छेड़छाड़ करते हुए पकड़ा गया था। आरोपित की पहचान ‘अमन खान’ थी। हिंदू संगठनों की चेतावनी के बावजूद अमन गरबा पंडाल में घुस गया था। जब उसने हिंदू महिलाओं के साथ छेड़छाड़ शुरू की, तो हिंदू जागरण मंच के सदस्यों ने उसे रंगे हाथों पकड़ था। सदस्यों ने तुरंत पुलिस को बुलाया और आरोपित को हवाले कर दिया।
14- हिंदू वेशभूषा से गरबा पंडाल में घुसा मुस्लिम, आधार कार्ड से खुली पोल
गुजरात के कर्णावती शहर में 20 अक्टूबर 2023 को YMCA क्लब के गरबा मंडप में एक मुस्लिम युवक को हिंदू वेशभूषा में पंडाल में घुसने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था। पंडाल के लोगों ने शक के आधार पर मुस्लिम युवक से पूछताछ की थी। मुस्लिम युवक के आधार कार्ड चेक के बाद उसकी पहचान सामने आई थी। इसके बाद आयोजकों ने उसे तुरंत पंडाल से बाहर निकाला था।
15- इंदौर में गरबा पंडाल में घुसे थे अरबाज-तहखान
मध्य प्रदेश के इंदौर में 22 अक्टूबर 2023 को सांवेर रोड स्थित एक कॉलेज में आयोजित गरबा कार्यक्रम में दो मुस्लिम युवक हिंदू नामों के साथ घुसे थे। आरोपितों की पहचान अरबाज पटेल और तह खान थी। असली पहचान उजागर होने के बाद हिंदू समुदाय कड़ा विरोध किया था। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने दोनों मुस्लिम युवकों को हिरासत में ले लिया था।
16- उज्जैन में ‘राहुल’ बनकर आया फिरोज, इंदौर में ‘पंकज’ बनकर घुसा आसीम
उज्जैन में 8 अक्टूबर 2024 को एक मुस्लिम युवक फिरोज ‘राहुल’ बनकर गरबा पंडाल में घुस आया था। जब कुछ हिंदू संगठनों को उस पर शक हुआ, तो पुलिस को शिकायत की गई। जाँच के दौरान उसके फोन से कई हिंदू लड़कियों के साथ अश्लील चैटिंग और उन्हें ब्लैकमेल करने के सबूत मिले। इसके बाद पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया।
उसी दिन इंदौर में भी इसी तरह की एक घटना सामने आई। एक मुस्लिम युवक आसीम नागौरी ‘पंकज’ बनकर एक गरबा कार्यक्रम में शामिल हुआ था। जब उसकी पहचान उजागर हुई तो उसके मोबाइल की जाँच की गई। पुलिस को उसके फोन से भी कई हिंदू लड़कियों के साथ आपत्तिजनक चैट और ब्लैकमेलिंग से जुड़ी जानकारी मिली। पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार किया।
17- गुना गरबा पंडाल में 17 मुस्लिम युवक पकड़े, ‘लव जिहाद’ का आरोप
मध्य प्रदेश के गुना जिले में 8 अक्टूबर 2024 को एक गरबा कार्यक्रम में बिना अनुमति के 17 मुस्लिम युवकों को डांडिया खेलते हुए पकड़ा गया था। स्थानीय लोगों और हिंदू जागरण मंच के सदस्यों ने आरोप लगाया था कि ये युवक ‘लव जिहाद’ फैलाने के इरादे से कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा था कि ऐसे मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर गरबा में हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने के लिए घुसे थे। फिर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 3 मुस्लिम युवकों को हिरासत में लिया था।
‘घर वापसी’ करो, फिर गरबा पंडाल में घुसो
इन घटनाओं की पूरी फेहरिस्त देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की माँग केवल धार्मिक भेदभाव का मामला नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा है। यह एक ऐसा कदम है जो हिंदू लड़कियों को ‘लव जिहाद’ और यौन शोषण जैसी साजिशों से बचाने के लिए उठाया जा रहा है।
हिंदू संगठनों का यह कहना है कि अगर इन पवित्र आयोजनों में भाग लेना ही है, तो इसका सबसे आसान तरीका है कि ‘घर वापसी’ कर ली जाए। यह दिखाता है कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा और गरबा जैसे पवित्र त्योहारों की गरिमा और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए जाएँगे।
अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) ने (24 सितंबर 2025) बुधवार को दो भारतीय नागरिकों, सादिक अब्बास हबीब सैयद और खिजर मोहम्मद इकबाल शेख पर प्रतिबंध लगा दिया। इनलोगों पर फेंटेनाइल और दूसरे प्रतिबंधित और नकली दवाओं की आपूर्ति का आरोप है।
OFAC ने शेख की भारत स्थित ऑनलाइन फार्मेसी, KS इंटरनेशनल ट्रेडर्स पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। इसका संचालन KS फार्मेसी के नाम से होती थी। सादिक अब्बास पर आरोप है कि वह राकेश शर्मा नाम का इस्तेमाल कर ये गोरखधंधा कर रहा था।
Today, the U.S. Department of the Treasury sanctioned two Indian nationals for their role in collectively supplying hundreds of thousands of counterfeit prescription pills filled with fentanyl and other illicit drugs to victims across the United States. Treasury is also…
आतंकवाद और वित्तीय खुफिया मामलों के अधिकारी जॉन के. हर्ले के अनुसार, यह कार्रवाई अमेरिका में परिवारों को फेंटेनाइल संकट से बचाने के अमेरिकी सरकार के प्रयास का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “फेंटेनाइल ने बहुत से परिवारों को बर्बाद कर दिया है। इस जहर से फायदा कमाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी है।”
वैश्विक नशीली दवाओं के व्यापार में ऑनलाइन फार्मेसियों की भूमिका
प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर कहा गया है कि केएस फार्मेसी जैसी संस्थाएँ अक्सर दवा उत्पादों के वैध विक्रेता होने का दिखावा करती हैं। वास्तव में, ये नकली गोलियों की तस्करी कर रही हैं, जिनमें फेंटेनाइल या मेथामफेटामाइन मिला होता है। इससे पहले, अमेरिकी ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) ने अमेरिकी जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। संस्थान का कहना है कि अमेरिकी नागरिक इसे ऑक्सीकोडोन, एडरॉल या ज़ैनैक्स जैसी दवाएँ मान कर खरीद रहे हैं।
ये प्रतिबंध ऑनलाइन फार्मेसियों, खासकर भारत से संचालित होने वाली फार्मेसियों पर लगा है। ये फॉर्मेसी सिंथेटिक ओपिओइड को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं। ये संस्थाएँ अक्सर वैध दवा विक्रेता होने का दिखावा करती हैं, लेकिन अक्सर फेंटेनाइल या मेथैम्फेटामाइन से युक्त नकली गोलियाँ बेचती हैं।
अमेरिकी ड्रग एन्फ़ोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (DEA) ने कहा था कि अमेरिका के खरीदारों को विश्वास दिलाकर गुमराह किया जा रहा है कि वे ऑक्सीकोडोन, एडरॉल या ज़ैनैक्स जैसी असली दवाएँ खरीद रहे हैं।
सैयद और शेख के खिलाफ कार्रवाई
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैय्यद और शेख दोनों ने संयुक्त राज्य अमेरिका और डोमिनिकन गणराज्य स्थित तस्करों के साथ मिलकर काम किया। वे नकली गोलियों को रियायती दवाओं के रूप में बेचते थे और लेनदेन के लिए एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते थे। दोनों पर सितंबर 2024 में न्यूयॉर्क में मादक पदार्थों की तस्करी का आरोप भी लगा था।
दस्तावेज में कहा गया है कि केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स के मालिक शेख ने आरोपों के बावजूद अपनी ऑनलाइन फार्मेसी का संचालन जारी रखा।
न्यूयॉर्क में कार्रवाई हुई
सितंबर 2024 में, न्यूयॉर्क में लाखों फेंटेनाइल और मेथामफेटामाइन की गोलियाँ वितरित करने वाली नकली ऑनलाइन फार्मेसी चलाने वाले 18 लोगों का खुलासा किया गया। इनमें भारतीय नागरिक सादिक अब्बास हबीब सैय्यद और खिजर मोहम्मद इक़बाल शेख भी शामिल थे।
आरोप ये भी है कि सैय्यद अपने मूल को छिपाने और अवैध व्यापार में अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए कई उपनामों से काम करता था, जिनमें हिंदू नाम ‘राकेश शर्मा’ और ‘जोनाथन अकोस्टा’ शामिल था। अधिकारियों ने आरोप लगाया कि डोमिनिकन तस्कर फ्रांसिस्को अल्बर्टो लोपेज रेयेस के नेतृत्व में इनलोगों ने नकली गोलियाँ बेचीं। इसके कारण अमेरिका में कई लोगों की ओवरडोज़ से मौत हो गई, जिसमें एक 45 वर्षीय अमेरिकी पूर्व सैनिक भी शामिल है। जाँच में न्यूयॉर्क में उद्योग बन चुके ‘गोली मिलों’ का भी पर्दाफाश हुआ। यहाँ नकली दवाओं को असली जैसा बनाया जाता था।
अमेरिकी प्रतिबंध का मतलब
अमेरिका में प्रतिबंध का अर्थ है कि सैयद, शेख और केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स की संयुक्त राज्य अमेरिका में कारोबार नहीं हो पाएगा और संपत्तियाँ जब्त होंगी। दूसरे वित्तीय संस्थानों और बिजनेसमैन को भी उनके साथ लेन-देन न करने की चेतावनी दी गई है। केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स की जाँच में ऑपइंडिया को क्या मिला
ऑप इंडिया ने ऑनलाइन उपलब्ध फार्मेसी से संबंधित प्रतिबंधी दस्तावेज़ों और जानकारी की समीक्षा की है। शुरुआती जाँच में पता चला कि कंपनी ने खुद को एक वैध दवा आपूर्तिकर्ता बताते हुए डिजिटल फ़ुटप्रिंट बना रखा है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय निगरानी रिपोर्ट में उसका नाम शामिल है।
दिलचस्प बात यह है कि केएस फार्मेसी नाम से संचालित वेबसाइट का एक स्क्रीनशॉट है जिसे हटा दिया गया है। यह साफ नहीं है कि वेबसाइट पर प्रतिबंध लगने के बाद इसे हटाया गया या पहले। हालाँकि, ऑप इंडिया को archive.org वेबसाइट पर कुछ पेज मिले हैं, जिन्हें आप देख सकते हैं।
आरकाइव पेज पर मिली जानकारी के अनुसार, कंपनी की उत्पाद सूची लंबी थी। वे लॉराज़ेपम, डायज़ेपम, क्लोनाज़ेपम नोज़िम, सिल्डेनाफिल साइट्रेट कोबरा, ज़ैनैक्स अल्प्राज़ोलम, अल्प्राज़ोलम, अल्पकोर और एटिवन लॉराज़ेपम की गोलियाँ बेच रहे थे। इंजेक्शन में इमुपेग, बोल्डारिक्स, फोंडापारिनक्स सोडियम, टेस्टोस्टेरोन एनैन्थेट और टेस्टोस्टेरोन साइपियोनेट शामिल थे। कैप्सूल में फिल्डेना सिल्डेना सॉफ्टजेल, टेराफ़ॉर्म न्यूट्रिशन एंटी एंग्ज़ाइटी एंड स्ट्रेस रिलीफ और ऑर्लिस्टैट शामिल थे।
वेबसाइट डाउन है
हालाँकि वेबसाइट की WhoI जानकारी छिपाई गई थी, फिर भी ये पता चला है कि केएस इंटरनेशनल का सितंबर 2024 में अमेरिकी अदालत में ओपिओइड दवाओं के अवैध कारोबार में शामिल होने का सबूत मिला। हालाँकि, यह वेबसाइट दिसंबर 2024 में पंजीकृत हुई थी, जिससे इस बात की आशंका और पुख्ता हो जाती है कि शेख अपना दवा व्यवसाय जारी रखे हुए था।
स्रोत- WhoIs
जीएसटी नंबर 27AAZFK8713F2ZQ की रिवर्स सर्च करने पर पता चला कि जीएसटी नंबर 27 जून 2024 को जारी किया गया था, जो कंपनी के खिलाफ अमेरिकी अदालत के फैसले से केवल तीन महीने पहले का था।
केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स नामक कंपनी का इंडियामार्ट पेज है, जो लकड़ी के उत्पादों, फर्नीचर आदि का व्यापार करने का दावा करता है। प्रोफ़ाइल के अनुसार, कंपनी 2023 में पंजीकृत हुई थी और मुंबई से संचालित होती है। जीएसटी पार्टनर के नाम सबा असलम मिस्त्री और खिजर मोहम्मद इकबाल शेख बताए गए हैं।
स्रोत: IndiaMart
हालाँकि कंपनी अपने इंडियामार्ट पेज पर फ़र्नीचर बेचने का दावा करती है, लेकिन उत्पादों की समीक्षाएँ दिलचस्प हैं। हालाँकि यह साबित करना मुश्किल है कि समीक्षाएँ वास्तविक ग्राहकों ने पोस्ट की हैं या नहीं। लेकिन एक बात तो तय है कि वे लोग दवा बेच रहे थे।
उदाहरण के लिए, अमेरिका के एक ‘स्टीव’ ने 15 जून 2025 को अल्प्राज़ोलम टैबलेट के लिए एक समीक्षा लिखी और दावा किया कि उत्पाद ‘गुणवत्तापूर्ण’, कंपनी ‘विश्वसनीय’ और डिलीवरी ‘तेज’ है।
स्रोत- : Indiamart
अमेरिका के एक और ग्राहक स्कॉट रॉबर्ट हॉवर्ड ने 11 मई 2025 को कहा “ये लोग सबसे अच्छे हैं। मैं इनकी सिफारिश करता हूँ। मैंने इंडियामार्ट पर 5 लोगों से डील की है, और ये लोग अब तक के सबसे बेहतरीन हैं। ये बार वाकई कमाल के हैं।”
एक दूसरे ग्राहक, ‘रोनाल्ड कोलमैन’ ने डायजेपाम टैबलेट खरीदी। अल डेस्टेफ़ानो नाम के ग्राहक ने ऑक्सीडॉलर खरीदी जबकि डैनियल विल्सन ने क्लोनाज़ेपम खरीदी।
अल्प्राजोलम, डायजेपाम और क्लोनाजेपम
अल्प्राज़ोलम, डायजेपाम और क्लोनाज़ेपम, ये तीनों बेंजोडायजेपाइन टैबलेट हैं जिनका उपयोग चिंता, पैनिक डिसऑर्डर और अवसाद से जुड़ी बीमारियों में किया जाता है। ये दिमाग की न्यूरोट्रांसमीटर को बढ़ाकर काम करती हैं। हालाँकि इसे बार्बिटुरेट्स से ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इसके दुरुपयोग, निर्भरता और ओवरडोज का खतरा बना रहता है। खासकर जब इसे शराब, ओपिओइड या दूसरी दवाओं के साथ लिया जाए। ओवरडोज से श्वसन लेने में तकलीफ या कोमा की स्थिति आ सकती है।
ऑक्सीडॉलर
ऑक्सीडॉलर दवा में ऑक्सीकोडोन पाया जाता है। यह एक दर्द निवारक दवा है, जिसका इस्तेमाल गंभीर या लंबे समय तक दर्द के बाद किया जाता है।अगर दूसरी दर्द निवारक दवाएँ काम नहीं करतीं है, तो इसे लिया जाता है। यह गोलियों, कैप्सूल, तरल, इंजेक्शन और लगातार राहत के लिए धीमी गति से रिलीज़ होने वाले फ़ॉर्मूले के रूप में उपलब्ध है।
प्रभावी होने के बावजूद, इसमें लत, निर्भरता और ओवरडोज़ का ख़तरा होता है। इसके इस्तेमाल से आम तौर पर मतली, कब्ज़ और निंदा आते हैं। ओपिओइड की वजह से होने वाले कब्ज़-एसिडिटी को कम करने के लिए डॉक्टर ऑक्सीकोडोन को नालोक्सोन के साथ मिला सकते हैं।
कंपनी की एक और वेबसाइट ‘www.kttradersandservices.in’ (आरकाइव लिंक) है, जिस पर सिर्फ फ़र्नीचर बिकते हैं। वेबसाइट पर साफ़ तौर पर KS Traders लिखा है और जानकारी उस कंपनी से मेल खाती है जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में बनी है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
अगस्त 2019 में जब लद्दाख को UT का दर्जा मिला तो सोनम वांगचुक, प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी का ‘हाथ जोड़कर’ धन्यवाद कर रहे थे। अब वही वांगचुक ‘हाथ में पत्थर लेने’ के लिए लोगों को उकसा रहे हैं। शांति के लिए मशहूर लद्दाख, हिंसा की चपेट में है, लोग मारे गए हैं और सुनियोजित डिजाइन के तहत हिंसा को उकसाने वाला अपने गाँव भाग गया है। इस बीच एक शख्स की तस्वीर वायरल है जिसे सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेसी बताया जा रहा है। इस व्यक्ति ने मुँह पर मास्क लगा रखा है और हाथों में हथियार है।
जिस लद्दाख में 5 अगस्त 2019 को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की माँग पूरी होने का जश्न मनाया जा रहा थी, वहीं बीते बुधवार को पथराव और आगजनी की गई। लद्दाख में बुधवार (24 सितंबर 2025) को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने समेत कई माँगों को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए।
इन हिंसक प्रदर्शनों में 4 लोग मारे गए हैं और दर्जनों लोग घायल हैं। बीजेपी के दफ्तर और सुरक्षाबल के वाहनों को प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी और कई जगहों पर पथराव किए जाने की भी खबरें हैं।
लद्दाख को UT बनाए जाने का जश्न मना रहे थे सोनम वांगचुक
इस हिंसा में केंद्रीय किरदार हैं सोनम वांगुचक, उनकी भूख हड़ताल के बीच ही यह हिंसा हुई है। वांगचुक ही अपने समर्थकों के साथ लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। मौजूदा वक्त में इस हिंसा के लिए लोगों को उकसाने में उनका नाम आ रहा है लेकिन कभी वो लद्दाख को UT बनाए जाने का जश्न मना रहे थे।
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था। एक बना जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख। सोनम वांगचुक ने उसी दिन केंद्र सरकार को धन्यवाद भी दिया था।
वांगचुक ने 5 अगस्त 2019 को X पर एक पोस्ट में लिखा, “धन्यवाद प्रधानमंत्री जी, लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा करने के लिए लद्दाख नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देता है। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दाखी नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा पाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद! ???”
THANK YOU PRIME MINISTER Ladakh thanks @narendramodi@PMOIndia for fulfilling Ladakh's longstanding dream. It was exactly 30 years ago in August 1989 that Ladakhi leaders launched a movement for UT status. Thank you all who helped in this democratic decentralization! ??? pic.twitter.com/X7pmJ5zZin
लद्दाख को UT के दर्ज पर जश्न मनाने वालों में केवल वांगचुक ही शामिल नहीं थे, इसमें अंजुमन मोइन-उल-इस्लाम जैसे संगठन भी शामिल थे। इस संगठन ने 5 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार को धन्यवाद देते हुए एक पत्र जारी किया था। खुद सोनम वांगचुक ने यह पत्र अपने X अकाउंट पर शेयर किया था।
जो लेह आज हिंसा की चपेट है, जल रहा है उसी लेह में 5 अगस्त 2019 के बाद लोग लद्दाख को UT का दर्जा दिए जाने पर नाच-गा कर जश्न मना रहे थे।
लद्दाख के लोग जो अगस्त 2019 में जश्न मनाने के लिए सड़कों पर निकले थे वो यूँ ही नहीं था। दरअसल, मोदी सरकार ने उनकी दशकों से चली आ रही माँग को पूरा कर दिया था। लद्दाख को UT का दर्जा दिए जाने से पहले जून 2019 में बीजेपी के तत्कालीन सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल ने कहा था, “लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग किए जाने की माँग आज की नहीं है, बल्कि 1948 से ही लद्दाख के लोग अपनी अलग पहचान चाहते थे।”
नामग्याल का यह दावा सही भी है, 1949 में लद्दाख बुद्धिस्ट असोसिएशन (LBA) की विषय समिति के अध्यक्ष चीवांग रिग्जिन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ज्ञापन देकर लद्दाखियों के लिए ‘स्वशासन’ की माँग की थी।
लद्दाख के लिए UT की माँग को लेकर 1964 में एक बड़ा आंदोलन भी हुआ। यह आंदोलन बौद्ध संत और लद्दाख के तत्कालीन प्रमुख लामा कुशोक बकुला रिनपोछे के नेतृत्व में हुआ था। हालाँकि, इस प्रदर्शन में UT का दर्जा दिए जाने की माँग नहीं मानी गई।
1989 में एक बार फिर UT की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू हुआ। LBA ने भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपकर फिर से लद्दाख के लिए ‘स्वायत्तता’ की माँग की। LBA ने इसके लिए एक बड़ी रैली भी निकाली। 1995 में इसी माँग को लेकर LAHDC (Ladakh Autonomous Hill Development Council) की भी स्थापना की गई।
1989 में UT की माँग को लेकर LBA की लेह चलो रैली
इसके बाद कई वर्षों तक UT की माँग को लेकर प्रदर्शन होते रहे। तब केंद्र सरकार का मानना था कि प्रदर्शनकारियों की माँगों को पूरा करने के लिए उन्हें अनुच्छेद 370 में बदलाव करना पड़ेगा जिसके लिए कॉन्ग्रेस सरकार तैयार नहीं थी।
2016 में भी UT की माँग कर रही सर्व धार्मिक संयुक्त कार्रवाई समिति (ARJAC) ने प्रस्ताव पारित कर लद्दाख के लिए अलग UT की माँग थी। लद्दाखियों की इस माँग को अंतत: 2019 में मोदी सरकार ने ही पूरा किया।
कैसे पूर्ण राज्य के दर्जे तक पहुँची माँग
लद्दाख को UT का दर्जा मिल गया और वहाँ केंद्र सरकार ने विकास पहुँचाना भी शुरू कर दिया। मोदी सरकार में लद्दाख को एक विश्वविद्यालय, होटल प्रबंधन संस्थान और पेशेवर कॉलेज की अनुमति दी गई। करोड़ों का विशेष पैकेज दिया गया। सड़कों, पुलों का निर्माण किया गया। यह शांति और विकास कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ से पचाया नहीं जा सका।
लोगों के बीच यह धारणा फैलानी शुरू कर दी गई कि यहाँ कंपनियाँ आकर सारी जमीन हड़प लेंगी। यहाँ बाहर के लोग आकर बस जाएँगे, जैसी बातें लोगों के बीच फैलानी शुरू कर दी गईं। 2023 की शुरुआत में सोनम वांगचुक ने ‘लद्दाख के संवैधानिक सुरक्षा उपायों’ की माँग को लेकर खुले आसमान के नीचे सोकर प्रदर्शन शुरू किया। धीरे-धीरे यह प्रदर्शन आगे बढ़ता रहा।
Leh Apex Body (LAB) और कारगिल डेमोक्रैटिक अलायंस (KAD) भी उनके समर्थन में आ गए। मार्च 2024 में सोमन वांगचुक और LAB-KDA से जुड़े लोगों ने लेह में फिर हड़ताल शुरू कर दी। सितंबर 2024 में LAB ने ‘दिल्ली चलो पदयात्रा’ की भी शुरुआत की थी।
छठी अनुसूची-पूर्ण राज्य के लिए जारी बातचीत?
लद्दाख के नेताओं ने 4 माँगों के साथ गृह मंत्रालय से संपर्क किया था, जिसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल कराने की माँग, एक अलग लोक सेवा आयोग की स्थापना और दो संसदीय सीटों की माँग शामिल थी। इनमें से आखिरी दो पर गृह मंत्रालय ने सैद्धांतिक सहमति भी दे दी थी।
लद्दाख में प्रदर्शनकारियों इसे संविधान की छठी अनुसूची में भी शामिल करने की माँग कर रहे हैं। मोटे तौर पर इसे समझें तो संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता प्रदान करने का प्रावधान जिसका मकसद आदिवासी समुदायों की संस्कृति, जमीन और संसाधनों की रक्षा करना है।
यह माँग खुद बीजेपी ने भी अपने घोषणा पत्र में रखी है, तो जाहिर है कि इसे माँग को आगे ले जाने पर पार्टी ने विचार भी किया होगा। प्रदर्शनकारियों की माँगों के लिए केंद्र सरकार से लगातार बातचीत चल रही है।
मार्च 2024 में वांगुचक के प्रदर्शन से पहले लद्दाख के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत की थी। इस बातचीत को लेकर गृह मंत्रालय ने कहा, “अमित शाह ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपाय प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।
यह कोई इकलौती बैठक नहीं थी। गृह मंत्रालय ने 24 सितंबर 2025 को प्रेस नोट में बताया, “भारत सरकार इन्हीं मुद्दों पर Apex Body Leh और Kargil Democratic Alliance के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रही है। उच्चाधिकार प्राप्त समिति और उप-समितियों के औपचारिक माध्यम से और नेताओं के साथ कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से उनके साथ कई बैठकें हुईं।”
केंद्र सरकार ने कहा कि लद्दाख के नेताओं के साथ 25 और 26 सितंबर को भी बैठकें आयोजित करने की योजना है। आगामी 6 अक्टूबर को भी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक होनी है लेकिन उससे पहले ही लद्दाख को दंगों की आग में झोंकने की कोशिश की गई है।
वांगचुक ने हिंसा भड़काने के लिए की थी प्लानिंग?
लेह में आगजनी और पत्थरबाजी तो बुधवार को हुई लेकिन इसके बीज पहले से ही बोये जा रहे थे। सोनम वांगचुक ने सितंबर 2024 में एक प्रेस कॉन्फ्रेस में ही स्थिति विस्फोटक होने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था, “सरकार ने उन्हें (लद्दाख के लोगों) लोकतंत्र न देकर उनके पंख काट दिए हैं और दूसरी ओर, उन्हें रोज़गार न देकर उनके हाथ काट दिए हैं। पाकिस्तान और चीन की सीमा से लगे लद्दाख में स्थिति विस्फोटक हो सकती है।”
अपनी विदेशी फंडिंग को लेकर सवालों में रहने वाले सोनम वांगचुक ने इन प्रदर्शनों में GenZ का रेफ्रेंस दिया। यह शब्द हाल ही में नेपाल में हुए GenZ प्रदर्शनों से चर्चा में आया है जहाँ आगजनी-लूटपाट-पथराव की घटनाएँ हुई। नेपाल में दर्जनों लोग मारे गए, मंत्रियों तक को मारा पीटा गया और सरकार बदल दी गई।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अपने प्रदर्शनों को नेपाल के प्रदर्शन से जोड़कर वांगचुक क्या हिंसा को सही ठहराने और सरकार का तख्ता पल्टने की प्रक्रिया को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं? सिर्फ सोनम ही नहीं इस मामले में कॉन्ग्रेसी नेता पर की भी इस हिंसा को भड़काने में भूमिका होने के आरोप लगाए गए हैं। बीजेपी ने पार्षद वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि नजर आ रहा व्यक्ति स्टैनजिंग त्सेपांग हैं।
गृह मंत्रालय ने भी कहा है, “कई नेताओं द्वारा भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह करने के बावजूद, उन्होंने (वांगचुक) भूख हड़ताल जारी रखी और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में Gen Z के विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया।”
जब इस हिंसा को रोकने के लिए प्रयास करने की जरूरत थी तब वांगचुक कहाँ थे? गृह मंत्रालय बताता है, “सोनम वांगचुक ने अपने भड़काऊ बयानों के माध्यम से भीड़ को उकसाया था। संयोगवश, इस हिंसक घटनाक्रम के बीच, उन्होंने अपना उपवास तोड़ दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास किए बिना एम्बुलेंस से अपने गाँव चले गए।”
जाहिर है कि जिस विषय पर सरकार बातचीत कर रही थी, जिन माँगों को लेकर बैठकें हुई थीं और आगे भी होनी थीं, उसमें इस तरह की हिंसा होना सुनियोजित ही हो सकता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बातचीत ही रास्ता है और उसी से इसका हल निकला चाहिए था लेकिन जिस तरह अराजकता भड़काने की कोशिश की गई, उससे साफ है कि कुछ लोगों को भारत की शांति नहीं पच रही है। वो कभी GenZ, तो कभी बांग्लादेश-श्रीलंका जैसे उदाहरणों के जरिए देश में अराजकता का माहौल पैदा करना चाहते हैं।