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भारत पर टैरिफ को लेकर अजीब बहानेबाजी कर रहा अमेरिका, लगा रहा पुतिन की ‘युद्ध मशीनरी को ईंधन देने’ का आरोप- खुद उसका राष्ट्रपति कर रहा मुलाकात: हम करें तो पाप, वो करे तो व्यापार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जुलाई 2025 से ही भारत पर दौहरे रवैये का हमला करना शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत पर 50% का टैरिफ लगाया, जिसका कारण रूस के साथ भारत का तेल और रक्षा व्यापार बताया। अब, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस बात को स्वीकार कर माना कि अमेरिका भारत और चीन के लिए अलग-अलग नियम अपनाता है। उन्होंने वाशिंगटन के इस दोहरे रवैये को सही भी ठहराया है।

ट्रंप ने कहा था कि भारत, रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन के खिलाफ ‘रूसी युद्ध मशीन’ को बढ़ावा दे रहा है। लेकिन, चीन भी रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। चीन हर दिन लगभग 20 लाख बैरल तेल खरीदता है। फिर भी, अमेरिका ने चीन पर कोई शुल्क नहीं लगाया है। यह अमेरिका के पाखंड को साफ दर्शाता है।

डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को अपने टैरिफ से बाहर रखा हुआ है। इस फैसले पर मार्को रुबियो ने 17 अगस्त 2025 को फॉक्स बिजनेस को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि चीन और भारत दोनों अलग है। चीन रूस से जो तेल खरीदता है उसे रिफाइन करके दूसरे देशों को बेच देता है।

रुबियो ने यह भी बताया कि अगर चीन पर प्रतिबंध लगाया गया तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें बहुत बढ़ जाएँगी। इसके अलावा मार्को रुबियो ने कहा कि चीन जो तेल खरीदकर रिफाइन कर रहा है, उसका बड़ा हिस्सा यूरोप में वापस बेचा जा रहा है। यूरोप अभी भी रूस से गैस खरीद रहा है।” उन्होंने कहा कि यूरोप रूस पर और ज्यादा प्रतिबंध लगा सकता है।

अमेरिका चीन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाता?

चीन पर कोई सख्त कदम न उठाने के फैसले को रुबियो ने सही बताया। उन्होंने अमेरिका की चुप्पी का बचाव किया। रुबियो ने कहा, “अगर चीन पर प्रतिबंध लगाता हैं तो वह तेल को रिफाइन करके बेच देगा।” जो भी देश यह तेल खरीदेगा उसे ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। अगर तेल नहीं मिलेगा तो उन्हें कोई दूसरा विकल्प देखना होगा। रुबियो साफतौर पर कहना चाहती थी कि चीन पर रोक लगाने से पूरी दुनिया को नुकसान होगा, इसलिए अमेरिका कुछ नहीं कर रहा है।

मार्को रुबियो ने यह भी कहा कि यूरोपीय देश नहीं चाहते कि चीन पर प्रतिबंध लगाया जाए। क्योंकि वे चीन से रूसी तेल खरीदते हैं। रुबियो ने बताया, “जब हमने सीनेट में चीन और भारत पर 100% टैरिफ लगाने की बात की तो कई यूरोपीय देशों ने चिंता जताई।” उन्होंने कहा कि यह चिंता प्रेस में नहीं, बल्कि सीधे बातचीत में सामने आई।

चीन-यूरोप को छूट, भारत को सजा…यही है अमेरिका का दोहरा रवैया

अमेरिका चीन पर कोई प्रतिबंध इसलिए नहीं लगा रहा है क्योंकि यूरोपीय लोग इसके पक्ष में नहीं है। इसके अलावा अमेरिका यूरोपीय देशों को भी सजा नहीं दे रहा है, जो अभी भी रूस से तेल-गैस खरीदते है।

बात बिल्कुल साफ है कि अमेरिका चीन पर टैरिफ लगाकर यूरोप को गुस्सा नहीं दिलाना चाहता और यूरोप पर किसी प्रकार का प्रतीबंध लगाकर यूरोपीय संघ से झंगड़ा नहीं लेना चाहता।

इसलिए चीन-यूरोप आराम से रूसी तेल खरीद-बेच-इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन सिर्फ भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो रूसी तेल खरीदकर ‘रूसी युद्ध मशीन को मदद कर रहा है’ बाकी कोई नहीं।

पहले, डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ बताया। अब, वही लोग यह कह रहे हैं कि यह ‘डेड इकोनॉमी’ रूस जैसे देश को युद्ध लड़ने के लिए पैसा दे रही है।

ट्रंप और मार्को रुबियो के बाद, व्हाइट हाउस के बिजनेस एडवाइजर पीटर नवारो भी भारत पर आरोप लगा रहे हैं। उनका मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए सिर्फ भारत ज़िम्मेदार है। जबकि उन्होंने चीन-यूरोप और अमेरिका को इस आरोप से दूर रखा है।

पीटर नवारो ने फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख लिखा है। इस लेख में, उन्होंने भारत पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है। इस खरीददारी से मिलने वाले पैसों का उपयोग रूस यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में कर रहा है। नवारो का मानना है कि भारत को तुरंत यह तेल खरीदना बंद कर देना चाहिए।

बिजनेस एडवाइजर पीटर नवारो ने यह भी कहा है कि अगर भारत चाहता है कि अमेरिका उसे अपना खास दोस्त माने तो उसे रूस-चीन के साथ अपने संबंध कम करने होंगे।

पीटर नवारो ने भारत को यह सिखाने की कोशिश की है कि उसे अमेरिका का अच्छा साथी कैसे बनना चाहिए। लेकिन उन्होंने अमेरिका को यह नहीं बताया कि उसे भारत के साथ बराबर का व्यवहार करने के लिए क्या करना चाहिए।

सबसे पहले, अमेरिका को पाकिस्तान से दूरी बनानी चाहिए। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देता है। अमेरिका को ऐसे देश के साथ दोस्ती करना बंद कर देना चाहिए।

फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख छपा था। इस लेख की एक हेडलाइन थी, “भारत रूस के तेल के लिए एक वैश्विक क्लियरिंग हाउस के रूप में काम करता है।” इसका मतलब है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है, जिस पर पाबंदी लगी हुई है। फिर भारत उस तेल को रिफाइन करके महँगे उत्पादों में बदल देता है और दूसरे देशों को बेचता है। इस तरह, रूस को जरूरी डॉलर मिलते हैं।

लेख की दूसरी हेडलाइन थी, “भारत की तेल लॉबी पुतिन की युद्ध मशीन को पैसा दे रही है-इसे रोकना होगा।” इसका मतलब है कि भारत में जो तेल कंपनियाँ हैं, वे रूस से तेल खरीदकर पुतिन को युद्ध के लिए पैसे दे रही हैं। लेख में यह कहा गया है कि यह तुरंत बंद होना चाहिए।

व्हाइट हाउस के बिजनेस एडवाइजर ने भारत पर एक और आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारत की वजह से रूस को ताकत मिल रही है और रूस लगातार यूक्रेन पर हमला कर रहा है, जिसकी कीमत अमेरिका और यूरोप चुका रहे हैं और उन्हें यूक्रेन की मदद के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। यह पैसा आम लोगों के टैक्स से जा रहा है।

पीटर नवारो ने यह भी लिखा कि अब तक 3 लाख से ज़्यादा सैनिक और आम लोग मारे जा चुके हैं। नाटो का ईस्टर्न पार्ट (पूर्वी हिस्सा) अब ज्यादा खतरे में है और पश्चिमी देश भारत द्वारा रिफाइन किए गए रूसी तेल का खर्च उठा रहे हैं। इस तरह उन्होंने फिर से भारत को ही दोषी बताया और बाकी देशों की भूमिका पर कुछ नहीं कहा।

भारत केवल अपनी जरूरतों को पूरा कर रहा

ऐसा लगता है कि वाशिंगटन में समझ की कमी है, जो बातें साफ हैं उन्हें भी अनदेखा किया जा रहा है। चीन की तरह भारत भी रूस से कच्चा तेल खरीदता है। फिर उसे रिफाइन करके पेट्रोलियम उत्पाद बनाता है और यूरोप को बेचता है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने यूरोप को 15 अरब अमेरिकी डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद बेचे हैं।

भारत को इस संकट से कोई फायदा नहीं हो रहा है। भारत बस यह सुनिश्चित कर रहा है कि इस संकट के बावजूद भी दुनिया में ऊर्जा की कमी न हो। साथ ही वह अपने देश की जरूरतों को भी पूरा कर रहा है।

अगर यूरोप और अमेरिका सच में चाहते हैं कि रूस हार मान ले तो उन्हें खुद सबसे पहले रूसी तेल खरीदना बंद कर देना चाहिए। लेकिन वे ऐसा नहीं करते। वे सीधे रास्ते से नहीं, बल्कि घुमा-फिराकर अब भी रूसी तेल और गैस खरीदते हैं।

एक तरफ वे कहते हैं कि रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है, दूसरी तरफ वे उसी से कारोबार भी जारी रखते हैं। अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। इनकी वजह से उसने रूसी कच्चे तेल का आयात जरूर घटाया है। लेकिन रूस से व्यापार पूरी तरह बंद नहीं किया गया।

रूस ने 2022 में यूक्रेन पर हमला किया था और इस युद्ध को तीन साल हो चुके हैं। इसके बावजूद अमेरिका रूस से सामान खरीद रहा है। जनवरी 2022 से अब तक अमेरिका रूस से 24.5 अरब डॉलर से ज़्यादा का सामान मंगा चुका है।

सिर्फ इसी साल (2025 में) अमेरिका ने रूस से 1.27 अरब डॉलर का खाद खरीदा। 62.4 करोड़ डॉलर का यूरेनियम और प्लूटोनियम लिया और लगभग 87.8 करोड़ डॉलर का पैलेडियम भी खरीदा। यानी बातें कुछ और की जाती हैं, लेकिन असली काम कुछ और हो रहा है।

जनवरी से नवंबर 2024 के बीच, अमेरिका ने रूस से बहुत सी चीजें खरीदीं। इनमें पैलेडियम और एल्यूमीनियम जैसी धातुएँ भी थीं, जिनकी कीमत 876.5 मिलियन डॉलर थी। अकार्बनिक रसायनों का आयात 683 मिलियन डॉलर का था।

इसके अलावा, बिजली उत्पादन में काम आने वाली मशीनें भी खरीदी गईं। इनका मूल्य 79 मिलियन डॉलर था। कॉर्क और लकड़ी से बनी चीजों का आयात भी लगभग 64 मिलियन डॉलर का हुआ। कुछ और चीजें भी खरीदी गईं, जैसे परमाणु रिएक्टर, मशीनरी, पशुओं का भोजन, लोहा और स्टील। हालाँकि, इनकी खरीद कम थी लेकिन इन पर भी व्यापार चलता रहा।

अमेरिकी सरकार के आँकड़े बताते हैं कि 2024 में अमेरिका ने रूस को सामान कम बेचा। अमेरिका ने सिर्फ 528.3 मिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया। लेकिन रूस से बहुत ज्यादा सामान खरीदा। 2023 में अमेरिका ने रूस को 598.8 मिलियन डॉलर का सामान बेचा था।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच चाहे जैसे हालात हो, इसके बावजूद रूस और अमेरिका के बीच व्यापार कभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ और लगातार चलता रहा।

साल 2024 में यूरोपीय संघ और रूस के बीच भारी व्यापार हुआ। सिर्फ सामानों के लेन-देन का आँकड़ा 67.5 अरब यूरो तक पहुँच गया। इससे पहले 2023 में यूरोपीय संघ और रूस के बीच सेवाओं का व्यापार भी खूब हुआ था। उस समय यह कारोबार करीब 17.2 अरब यूरो का था।

2024 में यूरोप ने रूस से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की 16.5 मिलियन टन मात्रा में खरीदारी की। यानी युद्ध के बाद भी यह कारोबार घटा नहीं, बल्कि और बढ़ गया। यूरोप और रूस सिर्फ गैस तक सीमित नहीं हैं। वे एक-दूसरे से खाद, खनन उत्पाद, रसायन, लोहा, स्टील, मशीनरी और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी चीजें भी खरीदते-बेचते हैं। सीधा मतलब है कि रूस से व्यापार करने में यूरोप को कोई परहेज नहीं है। युद्ध के बीच भी उनका लेन-देन लगातार चलता रहा।

ट्रंप प्रशासन को एक बात समझनी चाहिए। जब भारत की रिफाइनरियाँ रूसी कच्चे तेल को साफ करके उसे पेट्रोलियम उत्पाद में बदल देती हैं तो वह तेल अब यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक ‘रूसी’ नहीं माना जाता। यानी अगर भारत उसे यूरोप को बेचता है तो वह अब ‘रूसी तेल’ नहीं कहलाता, बल्कि ‘भारतीय उत्पाद’ बन जाता है।

साल 2023 में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से इस मुद्दे पर सवाल पूछा गया था। उन्होंने जवाब में यूरोपीय संघ परिषद के नियम 833/2014 का हवाला दिया था। यह नियम कहता है कि परिष्कृत (refined) तेल अब उस देश का नहीं रह जाता जिससे वह आया था। इसलिए जब भारत रूस से तेल खरीद कर उसे रिफाइन करता है तो उस पर ‘रूसी’ मुहर नहीं लगाई जा सकती।

यूरोपीय विदेश नीति प्रमुख जोसेफ बोरेल ने कहा था कि भारत पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जयशंकर ने नियमों से साफ कर दिया कि भारत कुछ भी गलत नहीं कर रहा है।

4 अगस्त 2025 को भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान दिया। यह बयान डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर लगाए गए आरोपों के जवाब में था। बयान में कहा गया कि भारत ने रूस से तेल खरीदना तभी शुरू किया जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ।

इस युद्ध के कारण जो तेल भारत को मिल रहा था, वह यूरोप की तरफ भेज दिया गया। इससे भारत के लिए तेल की सप्लाई घट गई। ऐसे में, भारत ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए रूस से तेल खरीदने का फैसला किया।

भारत ने यह फैसला खुद के फायदे के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए किया। भारत ने यह भी बताया कि उस समय अमेरिका ने खुद भारत को ऐसा करने के लिए कहा था। अमेरिका ने भारत को प्रोत्साहित किया था कि वह रूस से सस्ता तेल खरीदे। ताकि दुनिया भर में तेल की कमी और कीमतें बढ़ने से रोकी जा सकें।

यह बात साफ लगती है कि अमेरिका ने अचानक भारत को गलत ठहराना शुरू किया। यह भारत के रूस से तेल खरीदने की वजह से नहीं है। यह ट्रंप के खुद के अहंकार का नतीजा है। ट्रंप चाहते थे कि भारत पाकिस्तान की तरह उनकी बात माने।

मई 2025 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम हुआ तो ट्रंप चाहते थे कि भारत उनकी तारीफ करे। उन्होंने उम्मीद की थी कि भारत उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिलवाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए ट्रंप नाराज होकर भारत के खिलाफ बोलने लगे।

भारत ने ट्रंप की ऐसी किसी बात का समर्थन नहीं किया जो बेबुनियाद हो। यहाँ तक कि ट्रंप जिस ‘व्यापार समझौते’ की बात करते हैं, भारत ने उसमें भी वैसी भूमिका नहीं निभाई। ट्रंप का दावा था कि उन्होंने भारत को पाकिस्तानी आतंकवादियों और सेना के हमले रोकने के लिए मनाया था। भारत ने इस दावे पर भी चुप्पी साधे रखी।

भारत ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित नहीं किया। भारत ने अमेरिकी डेयरी और कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार भी नहीं खोला। इन सब बातों ने मिलकर ट्रंप को नाराज कर दिया। शायद वह इतने आहत हो गए कि अब अमेरिका भारत को रूस-यूक्रेन युद्ध का जिम्मेदार ठहराने लगा है।

ऑपइंडिया पहले ही यह बता चुका है कि यूरोपीय संघ ने ट्रंप के दबाव में झुककर अमेरिका से व्यापार समझौता किया था। इस समझौते में यूरोपीय संघ ने अपने ही कई हितों से समझौता कर लिया था। इससे ट्रंप को और बल मिला। उन्हें लगने लगा कि उनकी टैरिफ नीति हर देश पर असर डालेगी। लेकिन भारत ने ट्रंप की यह सोच तोड़ दी। भारत ने ट्रंप की नीतियों के आगे झुकने से इनकार कर दिया।

यह बात दिलचस्प है कि ट्रंप प्रशासन भारत पर निशाना साध रहा है। वो भारत को यूक्रेन के खिलाफ रूस की मदद करने वाला बता रहा है। लेकिन दूसरी ओर, खुद अमेरिका रूस से व्यापार कर रहा है।

16 अगस्त 2025 को अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसका खुलासा किया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और रूस के बीच व्यापार 20 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ गया है। इससे ट्रंप के उस दावे की सच्चाई सामने आ गई जिसमें वे कहते हैं कि अमेरिका रूस पर दबाव बना रहा है। दरअसल, अमेरिका खुद रूस से व्यापार बढ़ा रहा है, जबकि भारत पर आरोप लगा रहा है।

शायद डोनाल्ड ट्रंप, मार्को रुबियो, पीटर नवारो या लिंडसे ग्राहम ही ये समझा सकें कि अमेरिका रूस से व्यापार बढ़ाकर कैसे उसकी युद्ध मशीन को मदद नहीं कर रहा। क्या रूस को पैसा तब ही मिलता है जब भारत कुछ बैरल तेल अपनी जरूरत के लिए खरीदता है और यूरोप को बेचता है?

जब अमेरिका खुद रूस के साथ 20 प्रतिशत ज़्यादा व्यापार कर रहा है, तब वह भारत पर कैसे आरोप लगा सकता है? अब वक्त आ गया है कि अमेरिका इस दोहरे रवैये को छोड़े या तो खुद को दंडित करे कि वह भी रूसी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। या फिर भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए बार-बार दोषी ठहराना बंद करे।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ा दावा किया था। उन्होंने कहा था कि वे राष्ट्रपति बनने के 24 घंटे के अंदर रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कर देंगे। लेकिन अब आठ महीने बीत चुके हैं। आज तक वे दोनों देशों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम भी नहीं करवा सके हैं। अब ट्रंप अपनी नाकामी और झुंझलाहट का गुस्सा भारत पर निकाल रहे हैं। भारत उनके झूठे वादों, सनक या दोहरे मापदंडों का जिम्मेदार नहीं है। भारत को उनके पाखंड का बोझ ढोने की कोई जरूरत नहीं है।

भारत के हमलों से डरकर पाकिस्तान ने छिपाए थे युद्धपोत, कराची पोर्ट से हटाकर लड़ाकू जहाजों को ईरान सीमा पर किया तैनात: सैटेलाइट तस्वीरों से खुली पोल

ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटा दी लेकिन पाकिस्तान यह मानने को तैयार नहीं था। अब ऑपरेशन के दौरान की कराची और ग्वादर बंदरगाह की सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई हैं। इन तस्वीरों में पाकिस्तान नेवी (PN) भारत के हमलों से डरकर ईरान बॉर्डर पर छिपती नजर आ रही है, जिसने पाकिस्तान के दावों की फिर एक बार पोल खोलकर रख दी है।

इंडिया टुडे के ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) टीम ने जुटाई ये सैटेलाइट तस्वीरें 08 मई 2025 की हैं। इससे एक दिन पहले ही 06 और 07 मई 2025 को भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के तहत 9 आतंकी ठिकानों पर हमला किया था। इसके बाद नई दिल्ली ने इस्लामाबाद के DGMO को फोन कर बताया कि उनका मिशन पूरा हो गया है।

कराची पोर्ट की सैटेलाइट तस्वीर (फोटो साभार: India Today)

भारत के हमलों के बाद पाकिस्तान करारा जवाब देने के प्रोपेगेंडा फैलाता गया लेकिन इन सैटेलाइट तस्वीरों से पाकिस्तान का सच सामने आ गया है। तस्वीरों में साफ नजर आता है कि पाकिस्तान नेवी ने कराची में अपने लड़ाकू जहाजों को डॉक से हटाकर कमर्शियल टर्मिनलों पर शिफ्ट कर दिया था।

बाकी दूसरे जहाजों को ईरान की सीमा से मुश्किल से 100 किलोमीटर दूर पाकिस्तान के पश्चिमी बंदरगाह ग्वादर में छिपाए गए थे। पाकिस्तान को डर था कि कहीं भारत फिर कराची बंदरगाह को तबाह ना कर दे। जैसे भारत ने 04 दिसंबर 1971 को ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत कराची बंदरगाह पर हमला किया था, जिससे बंदरगाह 7 दिनों तक आग और धुएँ की लपटों से घिरा रहा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कराची पोर्ट ऑपरेशन सिंदूर के दौरान खाली था लेकिन 08 मई 2025 की सैटेलाइट तस्वीरों में युद्धपोत कमर्शियल कार्गो टर्मिनल पर खड़े दिखे। हल्के बादलों से ढकी इन तस्वीरों में कम से कम चार पाकिस्तानी नेवी जहाज कमर्शियल पोर्ट और कंटेनर टर्मिनल के पास खड़े हैं।

इसमें PNS अलमगीर, एक बाबर-क्लास कोरवेट और एक डेमन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (OPV) शामिल थे, जो कार्गो जहाज के पास खड़े थे। यहीं कंटेनर लोड-अनलोड हो रहे थे। एक और नेवी प्रिगेट कंटेनर टर्मिनल पर था ना कि पाकिस्तान नेवी के गोदाम पर।

इस बारे में इंडिया टुडे से बात करते हुए 1971 कराची पोर्ट हमले में शामिल भारतीय नौसेना के पूर्व अफसर कमांडर-इन-चीफ, वाइस एडमिरल एससी सुरेश बंगारा ने कहा, “पाकिस्तान ने कमर्शियल पोर्ट में अपने जहाज खड़े किए। यह भारत के मिसाइल हमलों से बचने की कोशिश का संकेत है। कमर्शियल फ्लाइट के पास अपने सैन्य विमानों को उड़ाने से पता लगता है कि पाकिस्तान अपने सिविलियन संपत्तियों को खतरे में डालने को तैयार हैं।”

रिटायर्ड नौसेना अफसर कहते हैं, “ग्वादर, जहाँ कमर्शियल गतिविधियाँ नहीं थीं। वहाँ अग्रिम पंक्ति के जहाजों को रखना गलत था क्योंकि वे आसानी से नजर आते थे। ऐसा लगता है कि समुद्र में पाकिस्तान की एकमात्र ताकत उनकी पनडुब्बियाँ थीं।”

पाकिस्तान पत्रकार ने अपने मुल्क की पोल खोली

पाकिस्तान के पत्रकार नजम सेठी ने भी अपने ही मुल्क की पोल खोलकर रख दी। एक पाक मीडिया को दिए गए इंटरव्यू में नजम सेठी ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान के कैंप और एयरबेस में मिसाइल हमले किए, लेकिन पाकिस्तान इस पर जवाबी कार्रवाई करने में असमर्थ रहा।

नजम सेठी पाकिस्तान फौज की नाकामियाँ बताते हुए कहते हैं, “आपके (पाकिस्तान) पास कोई S-400 तरीके की मिसाइल नहीं है। भारत ने आपके (पाकिस्तान) एयरबेस और कथित फ्रीडम फाइटर के कार्यालय को उड़ा दिया और आप कुछ नहीं कर सके। पाकिस्तान के पास भारत जितनी क्षमता नहीं है।”

पाकिस्तान से सिंधु जल संधि का ‘खलनायक’ भी नेहरू ही: संसद की अनुमति लिए बगैर किया था लागू, न वाजपेयी की सुनी-न ‘दूसरा विभाजन बताने’ वाले कॉन्ग्रेस नेता की

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया है। समझौते को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 15 अगस्त के अपने भाषण में लाल किले से कहा था कि यह समझौता अन्यायपूर्ण है।

अब इस समझौते को लेकर सामने आई जानकारी से पता चला है कि यह समझौता संसद की बिना अनुमति के लागू हो गया था और मुहर लगने के 2 महीने बाद इस पर सिर्फ 2 घंटे की चर्चा हुई थी। वहीं, जब यह मुद्दा संसद में उठा था तो ज्यादातर सांसदों ने इस समझौते की आलोचना की थी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किसी की बातों पर ध्यान नहीं दिया।

बिना संसद की अनुमित की सिंधु जल समझौते पर लगी मुहर

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, यह संधि संसद या विपक्षी नेताओं को विश्वास में लिए बिना ही साइन कर दी गई थी। जब तक इस पर संसद में चर्चा होती तब तक इस पर मुहर लग गई थी।

30 नवंबर 1960 को लोकसभा में सिंधु जल संधि पर छोटी लेकिन तीखी चर्चा हुई थी। इस चर्चा में नेहरू सरकार और विपक्षी सांसदों के बीच खाई नजर आई थी। इस संधि के विरोध में विपक्षी विभिन्न दलों के सांसदों समेत कई कॉन्ग्रेसी सांसद भी थे और उनका मानना था कि भारत ने पाकिस्तान को बहुत रियायत दी है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी इससे जुड़ी जानकारी X पर कई पोस्ट के जरिए साझा की है। नड्डा ने लिखा है, “जब नेहरू ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे, तो उन्होंने एकतरफा तौर पर सिंधु बेसिन का 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान को सौंप दिया था, जिससे भारत के पास केवल 20 प्रतिशत हिस्सा रह गया था।”

उन्होंने लिखा कि इस संधि पर सितंबर 1960 में हस्ताक्षर किए गए थे लेकिन इसके सांसद में सिर्फ 2 घंटे की चर्चा के लिए नवंबर में रखा गया था।

कॉन्ग्रेस नेता ने बताया था ‘दूसरा विभाजन’

कॉन्ग्रेस के अशोक मेहता ने इस संधि की कड़ी आलोचना की और इसे देश के लिए ‘दूसरे विभाजन’ जैसा बताया था। नड्डा द्वारा शेयर किए गए डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, अशोक मेहता ने कहा, “यह एक तरह का दूसरा विभाजन है जिसका हम सामना कर रहे हैं। यह उन सभी जख्मों को फिर से हरे करने जैसा है जिनके भरने की हमें उम्मीद थी। यह हमारे प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर से फिर से हो रहा है।”

एक और कॉन्ग्रेस सांसद हरीश चंद्र माथुर ने इसे भारत के नुकसान का समझौता था। उन्होंने कहा था, “अपने लोगों की कीमत पर अधिक उदारता दिखाना कूटनीति नहीं है। इस संधि में राजस्थान के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है।” उनका कहना था, “भारत 1948 से पीछे हटता गया और पाकिस्तान दबाव डालता रहा।”

उनका कहना था कि अगर पाकिस्तान को पानी की गारंटी मिल गई थी तो कश्मीर समस्या का समाधान हो जाना चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी थी कि राजस्थान को हर साल 70-80 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।

वाजपेयी ने की थी नेहरू की कड़ी आलोचना

तब एक युवा सांसद और बाद में प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने इस संधि को लेकर नेहरू सरकार की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार घोषणा कर चुकी थी कि 1962 तक पाकिस्तान का पानी रोका जाएगा फिर अब स्थाई अधिकार क्यों दिए जा रहे हैं।

वाजपेयी ने चेतावनी दी थी कि पाकिस्तान की अनुचित माँगों के आगे झुकने से मित्रता स्थापित होने का नेहरू का तर्क गलत है। उनका कहना था, “यह दोस्ती का तरीका नहीं है। दोस्ती केवल न्याय पर आधारित हो सकती है, तुष्टिकरण पर नहीं।”

संधि पर क्या बोले थे नेहरू?

अंत में नेहरू ने बोलना शुरू किया था और उनकी आवाज में थकान और उदासी थी। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए एक ‘अच्छी संधि’ है। जो लोग इसे ‘दूसरा बँटवारा’ कह रहे थे, उन्हें झिड़कते हुए नेहरू ने पूछा, “भला, एक बाल्टी पानी का बँटवारा कैसा बँटवारा हुआ?”

नेहरू ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हर कदम पर संसद की अनुमति लेना व्यावहारिक नहीं होता। उन्होंने यह भी माना कि पाकिस्तान ने शुरुआत में 300 करोड़ रुपए की मांग की थी लेकिन भारत ने मात्र 83 करोड़ रुपए में समझौता कर लिया। उन्होंने कहा था, “हमने शांति खरीदी है।”

साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह संधि न होती, तो पश्चिम पंजाब उजाड़ हो जाता और पूरा उपमहाद्वीप अस्थिरता की चपेट में आ जाता।

नेहरू के उत्तर के बाद भी सांसद पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए। बहस का समापन बिना किसी वोट के ही हो गया क्योंकि संधि पहले ही पक्की हो चुकी थी। हालाँकि, इस चर्चा ने साफ कर दिया था कि असहमति केवल विपक्ष तक सीमित नहीं थी बल्कि सत्ता पक्ष के कई सांसद भी नेहरू के रुख से सहमत नहीं थे।

19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग के संबंध में भारत और पाकिस्तान के बीच संधि हुई थी। जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि में सिंधु, झेलम और चेनाब को पश्चिमी नदियाँ बताया गया जिनका पानी पाकिस्तान के लिए तय किया गया था। जबकि रावी, व्यास और सतलुज को पूर्वी नदियाँ बताते हुए इनका पानी भारत के लिए तय किया गया था।

संधि के बाद पानी का करीब 80% हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया था जबकि 20% भारत के पास बचा रहा था। पहलगाम आतंकी हमले के बाद नरेंद्र मोदी ने इस संधि को निलंबित कर दिया था जिसके बाद पाकिस्तान में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने PM मोदी को किया फोन, अलास्का में डोनाल्ड ट्रम्प से हुई चर्चा के बारे में बताया: भारत ने यूक्रेन विवाद के शांतिपूर्ण समाधान पर दिया जोर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार (18 अगस्त 2025) को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया। इस बातचीत में पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ अलास्का में हुई अपनी मुलाकात का ब्योरा साझा किया। पुतिन ने यूक्रेन संघर्ष को लेकर चल रही स्थिति पर भी चर्चा की।

पीएम मोदी ने इस दौरान भारत के उस रुख को दोहराया, जिसमें यूक्रेन विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति से करने की वकालत की गई है। उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में हर संभव प्रयास का समर्थन करता है।

पीएम मोदी ने पुतिन को उनकी विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद दिया और भारत-रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सहयोग के कई मुद्दों पर बात की, जिसमें व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और अन्य क्षेत्र शामिल रहे।

इस बातचीत का मकसद दोनों देशों के बीच रिश्तों को और गहरा करना था। पीएम मोदी ने पुतिन को इस साल के अंत में भारत आने का निमंत्रण भी दिया, ताकि 23वाँ भारत-रूस शिखर सम्मेलन हो सके।

पीएम मोदी ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा कि वह पुतिन के साथ निरंतर बातचीत की उम्मीद करते हैं। इस कॉल से भारत की कूटनीतिक स्थिति और मजबूत हुई, जो वैश्विक मंच पर शांति और सहयोग को बढ़ावा देती है। यह बातचीत भारत-रूस संबंधों को और प्रगाढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस कॉल से पहले पुतिन ने बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और चीन के नेताओं से भी यूक्रेन मुद्दे पर बात की थी। यह बातचीत ऐसे समय में हुई, जब अमेरिका ने भारत के रूसी तेल आयात पर 50% टैरिफ लगाया है। भारत ने इसका जवाब देते हुए कहा कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बाजार आधारित निर्णय लेता है। दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि वे भविष्य में भी लगातार संपर्क में रहेंगे।

हिंदी अखबार के 4 दिन पुराने संपादकीय का अक्षर-अक्षर गुजराती में अनुवाद कर छाप दिया, न इजाजत ली-न क्रेडिट दिया: ‘गुजरात समाचार’ ने पत्रकारिता का नया प्रतिमान गढ़ा

समाचार पत्र का संपादकीय किसी भी अखबार की आत्मा होती है। अखबार की सोच होती है, जिसे पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाया जाता है। आज कल अखबारों के साथ संपादकीय भी महत्व खोते जा रहे हैं। हालाँकि ये अभी भी प्रकाशित होते हैं।

गुजराती पत्रकारिता में ‘क्रांति’ हुई है। मोदी से लेकर ट्रंप तक के खिलाफ ‘अग्रणी’ अखबार ‘ गुजरात समाचार ‘ में भी संपादकीय प्रकाशित होते रहते हैं। 18 अगस्त को भी एक लेख ‘गुजरात समाचार’ में प्रकाशित हुआ है। शीर्षक है – ‘देश के सामने की चुनौतियाँ।’ शीर्षक पढ़कर या ‘गुजरात समाचार’ का नाम सुनकर लेख में ‘मोदी के शासन के तहत देश बर्बाद हो चुका है और उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए’ ऐसा भाव होगा, स्वाभाविक तौर पर ऐसा लग सकता है। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। लेख का टोन बहुत सामान्य है। यह एक सामान्य संपादकीय लेख की तरह है।

समाचार के संपादकीय लेख की शुरुआत हाल ही में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस से होती है। लेख में कहा गया है कि जश्न मनाने के लिए उपलब्धियों की कमी नहीं है। भारत ने जो ऊँचाइयाँ हासिल की हैं, वह छोटी बात नहीं है, क्योंकि भिन्नताएँ और विविधताएँ होने के बावजूद देश लगातार मजबूत बनता जा रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और राष्ट्रीय एकता का उल्लेख आता है।

इसके बाद आर्थिक मामलों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है और गरीबी भी घट रही है।इसके बाद दूसरे चरण की शुरुआत होती है। इसमें कुछ खामियों और चुनौतियों की बात की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की थोड़ी चर्चा होती है और अमेरिका और टैरिफ का उल्लेख दिखाई देता है। मजबूत संस्थाएँ होनी चाहिए और नियमों के आधार पर व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, ऐसी सारी बातें लिखी गई हैं।

आखिरी पैराग्राफ में संपादक लिखते हैं, “कभी-कभी बहुमत भेड़ों के झुंड जैसा होता है। भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा सत्र होने से पहले विधायक पूछने वाले प्रश्नों की चिट्ठी पार्टी की तरफ से दी जाती है। विधायक अपने क्षेत्र के असली प्रश्न नहीं पूछ सकते… ये सभी लोकतंत्र को अपंग करने वाली हैं और ये एक बड़ा चुनौती है। विपक्ष भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं पैदा हुई थी।”

आगे लिखा, “चुनाव आयोग का निष्पक्ष व्यवहार भारतीय राजनीतिक प्रणाली की नींव है, जिस पर बाकी सब निर्भर है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों के मन में कोई संदेह या उलझन की स्थिति नहीं होनी चाहिए। यह लेख सामान्य है।” जैसा अखबार में छपता है, वैसा ही है। लेकिन मूल बात यह है कि यही लेख, शब्दशः चार दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के हिंदी संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।

14 अगस्त, 2025 को रात 11:01 बजे प्रकाशित इस लेख का शीर्षक है– ’79वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत की उपलब्धियां और चुनौतियाँ, मजबूत संस्थाओं की आवश्यकता ‘

चार दिन बाद गुजरात समाचार में प्रकाशित संपादकीय और बिजनेस स्टैंडर्ड के इस लेख में अंतर इतना है कि एक हिंदी में है और एक गुजराती में। दूसरी बात ये है कि ‘गुजरात समाचार’ ने अंतिम पैराग्राफ में भाजपा-विरोधी टिप्पणियाँ की हैं, जो बिजनेस स्टैंडर्ड के लेख में नहीं हैं। बाकी का पूरा लेख पहले से आखिरी तक शब्दशः एक जैसा है। कहीं कोई बदलाव नहीं किया गया है। पैराग्राफ भी समान हैं, शुरुआत भी एक जैसी है और अंत में गुजरात समाचार द्वारा जोड़ी गई कुछ टिप्पणियों के अलावा बाकी का हिस्सा समान है।

गुजरात समाचार का अंडरलाइन किया हुआ भाग मूल हिंदी लेख में नहीं है

आमतौर पर एक अखबार का लेख दूसरे में प्रकाशित होती रहती हैं,लेकिन संपादकीय लेखों की अदला-बदली आम तौर पर नहीं होती है। कई अखबार-मीडिया संस्थाएँ एक-दूसरे से सामग्री लेती रहती हैं, लेकिन इसमें उस तथ्‍य का स्पष्ट उल्लेख होता है। कई गुजराती अखबार विदेशी अखबारों की रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। दोनों के बीच एक प्रकार का टाई-अप होता है।

‘गुजरात समाचार’ ने ऐसी कोई स्पष्टता नहीं लिखी है। फिर भी वास्तविकता जानने के लिए ऑपइंडिया ने जब ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से संपर्क किया, तो यह पता चला कि दोनों अखबारों के बीच ऐसा कोई टाई-अप नहीं किया गया है। न ही अंग्रेजी अखबार ने या उसके हिंदी संस्करण ने गुजरात समाचार को अपने लेख प्रकाशित करने के लिए विशेष अधिकार दिए हैं। गुजरात समाचार के सूत्र भी कहते हैं कि उनका कोई टाई-अप नहीं है।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिज़नेस स्टैंडर्ड इस विषय में जाँच कर रहा है और जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

(मूल रूप से ये लेख गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘नईम-सलीम’ का धंधा फले-फूले, क्या इसलिए तेलंगाना में मारवाड़ी-गुजराती टारगेट? जानिए क्या है ‘मारवाड़ी गो बैक’ विवाद, BJP नेता बोले- भड़का रही कॉन्ग्रेस-AIMIM

तेलंगाना में इन दिनों ‘मारवाड़ी गो बैक’ का नारा देकर बवाल मचाया जा रहा है। इस अभियान में मारवाड़ी व्यापारियों के काम-धंधों पर हमला करते हुए उन्हें वापस लौटने को कहा जा रहा हैं। मारवाड़ियों पर स्थानीय व्यापारी कारोबार छिनने से लेकर नकली सामान बेचने तक का आरोप लगा रहे हैं।

वहीं, भाजपा नेता और हिंदूवादी नेता लगातार मारवाड़ी समुदाय के पक्ष में खड़ा है। भाजपा नेता बंदी संजय कुमार ने इसे कॉन्ग्रेस-AIMIM-BRS की चाल बताकर कहा कि ये हिंदू समुदाय को बाँटने की कोशिश है। जबकि हिंदूवादी नेता टी राजा सिंह ने साफ कहा कि जिस मारवाड़ी समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है वो राज्य की GDP में योगदान देता है।

विशेष वर्ग ने छिना काटिका-रजक समाज का पेशा- बंडी संजय

बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री बंडी संजय ने ‘मारवाड़ी गो बैक’ अभियान पर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह हिंदू समाज को तोड़ने की एक साजिश है, जिसके पीछे कॉन्ग्रेस-बीआरएस-AIMIM का हाथ है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अगर यह आंदोलन बंद नहीं हुआ तो बीजेपी ‘रोहिंग्या वापस जाओ’ आंदोलन चलाएगी।

बंडी संजय ने कहा कि यह शर्म की बात है कि लोग उन रोहिंग्याओं पर चुप हैं जो अवैध रूप से रह रहे हैं और समाज के लिए खतरा हैं। लेकिन वे उस मारवाड़ी समुदाय को निशाना बना रहे हैं, जिसने तेलंगाना की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है और कभी भी राज्य को लूटा नहीं। उन्होंने कहा कि हैदराबाद का पुराना शहर ISI का अड्डा बन चुका है और यहाँ कई रोहिंग्या छिपे हुए हैं।

बंडी संजय ने आरोप लगाया कि कुछ खास व्यवसायों को खास लोगों से छीना गया है। संजय ने कहा कि ‘नईम मटन शॉप’ और ‘सलीम ड्राईक्लिनिंग शॉप’ जैसे नाम इस बात का सबूत हैं। जिन कामों को हिंदू काटिका समाज (मटन की दुकानें) और रजक समाज (ड्राई क्लीनिंग) करते थे, अब वे एक विशेष वर्ग (मुस्लिम वर्ग) के हाथों में चले गए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि इस पर ये लोग चुप क्यों हैं।

उन्होंने कहा कि मारवाड़ी समाज ने कभी भी सत्ता का लालच नहीं किया, बल्कि वे राज्य की तरक्की में भागीदार बने हैं तो फिर उन्हें तेलंगाना क्यों छोड़ना चाहिए?

मारवाड़ी समाज को बदनाम करने वालों को बख्शेंगे नहीं- राजा सिंह

वहीं, विधायक राजा सिंह लगातार मारवाड़ियों के हित में खड़े रहे है। राजा सिंह ने मारवाड़ी व्यापारियों पर निशाना साधने को लेकर कहा कि जो लोग मारवाड़ी समाज को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें हम बख्शेंगे नहीं। ऐसे लोगों को कानून के तहत जेल भेजा जाएगा। मारवाड़ी, गुजराती और राजस्थानी समुदाय तेलंगाना के विकास में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इनके पूर्वज यहीं पैदा हुए थे और यहीं बस गए।

राजा सिंह ने आगे कहा कि इन समुदायों ने मेहनत से व्यापार खड़ा किया है। आज ये राज्य की अर्थव्यवस्था और GDP को मज़बूती देने वाले मुख्य स्तंभ हैं। हाल ही में कुछ लोग इन्हें निशाना बना रहे हैं। उन्हें बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं। यह पूरी तरह गलत है और इसे कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।

विपक्ष का रवैया: रोजगार की बात या बहाना?

कॉन्ग्रेस और उसके साथी दलों का रवैया साफ तौर पर पक्षपाती दिख रहा है। इनकी बातों में हिंदू विरोध साफ झलकता है। ये पार्टियाँ एक तरफ तो बाहरी हिंदू व्यापारियों को हटाने की बात कर रही हैं। कहती हैं कि ये लोग स्थानीय व्यापार को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

दूसरी तरफ, ये लोग रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद कर रहे हैं। उनके लिए रहने, खाने और काम की व्यवस्था कर रहे हैं। कई सालों से ये पार्टियाँ हिंदू व्यापारियों के खिलाफ माहौल बना रही हैं। अब ‘न्याय’ के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। इससे समाज में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है।

वहीं, बीजेपी का कहना है कि यह सब एक साजिश है। इस साजिश का मकसद हिंदुओं को आपस में बाँटना है। साथ ही, इससे कुछ पार्टियाँ अपना वोटबैंक मजबूत करना चाहती हैं।

जिस अलास्का को रूस ने 158 साल पहले अमेरिका को बेच दिया, वहाँ अपनी टट्टी भी छोड़कर नहीं आए पुतिन: ट्रंप से मिलने गए तो बॉडीगार्ड साथ लेकर आए थे ‘पूप सूटकेस’

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को अलास्का में बैठक की। ये वही अलास्का है, जिसे रूस ने 158 साल पहले अमेरिका को बेच दिया था। इस बार जब पुतिन अलास्का में बैठक करने पहुँचे तो उन्होंने अपना मल-मूत्र तक नहीं छोड़ा। पुतिन ‘पूप सूटकेस’ में अपना मल-मूत्र लेकर वापस रूस लौटे।

The Express US की रिपोर्ट में दो वेटेरन पत्रकार रेजिस गेंटे और मिखाइल रुबिन की जानकारी के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सुरक्षा में तैनात रहे बॉडीगार्ड ने उनकी अलास्का की यात्रा के दौरान उनके मल के लिए खास बैग का इंतजाम किया, जिन्हें एक सूटकेस में इकट्ठा किया गया था।

रेजिस गेंटे और मिखाइल रुबिन दोनों ही पत्रकार रूस के विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब पुतिन अपने मल को वापस रूस लेकर लौटे हैं। ऐसा कई सालों से चला आ रहा है। साल 2017 में फ्रांस की यात्रा के दौरान भी पुतिन ने अपने मल को सूटकेस में इकट्ठा करवाकर अपने देश लाए थे।

क्या है ‘पूप सूटकेस’ ?

‘पूप सूटकेस’ अलास्का पहुँचे रूसी राष्ट्रपति के सुरक्षा इंतजामों का हिस्सा रहा था। इस सूटकेस में पुतिन के मल को इकट्ठा कर वापस रूस लाया गया। वेटेरन पत्रकार बताते हैं कि ऐसा माना गया है कि पुतिन को अपने स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लीक होने का खतरा है इसीलिए वे मल अपने साथ लेकर लौटते हैं। विदेशी ताकतों को राष्ट्रपति के मल के नमूने से उनके स्वास्थ्य की जानकारी पता लग सकती है और वो ऐसा नहीं चाहते हैं।

इस बार राष्ट्रपति के मल को पूप सूटकेस में इकट्ठा किया गया लेकिन इससे पहले भी अलग-अलग तरीके अपनाए गए हैं, जिससे राष्ट्रपति के मल का नमूना दूसरे देशों के पास ना पहुँच सके। BBC की पूर्व पत्रकार फ़रीदा रुस्तमोवा बताती हैं कि 1999 में रूस के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही पुतिन की सुरक्षा में उनके मल को इकट्ठा करके वापस रूस लाया गया है।

पत्रकार के अनुसार वियना की यात्रा में तो पुतिन अपने प्राइवेट बाथरूम के साथ पहुँचे थे, जिसमें पोर्टेबल टॉयलेट था। पुतिन अपने स्वास्थ्य की जानकारी विदेशी ताकतों तक नहीं पहुँचाना चाहते हैं। वैसे ही पुतिन की स्वास्थ्य को लेकर कुछ वर्षों में कई दावे सामने आए हैं। इससे बचने के लिए राष्ट्रपति ऐसा करते हैं।

राष्ट्रपति पुतिन के स्वास्थ्य पर पहले भी हुई चर्चाएँ

72 साल के रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने स्वास्थ्य को लेकर कुछ सालों में कई बार चर्चा में आए हैं। पुतिन के स्वास्थ्य को लेकर रूसी प्रशासन ने हमेशा गोपनीयता बरती है। इसके बावजूद उनके कुछ वीडियो और फोटो से उनके स्वास्थ्य गड़बड़ी से संबंधित कयास लगा लिए जाते हैं। अफवाहें यह भी सामने आई हैं कि पुतिन को थायराइड का कैंसर या कमर की समस्या या साइकोसिस है।

वहीं, नवंबर 2024 में जब कजाकिस्तान के अस्ताना में एक प्रेस वार्ता के दौरान पुतिन अपने पैरों को अचानक झटकाने लगे तब अंदाजा लगाया गया था कि वे किसी न्यूरो संबंधी पार्किंसन रोग से जूझ रहे हैं।

इससे पहले भी साल 2023 में बेलारूसी राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको से मीटिंग के दौरान राष्ट्रपति पुतिन अपनी कुर्सी पर हिलते हुए नजर आए थे। साल 2022 में अफवाहें सामने आई थीं कि सीढ़ियों से गिरने के बाद पुतिन का पखाना निकल गया और पूरे कपड़े गंदे हो गए थे।

कुछ रिपोर्ट्स में राष्ट्रपति पुतिन को दिल का दौरा पढ़ने की भी बातें सामने आई थीं, जिसके बाद राष्ट्रपति को उनके आवास पर खास मेडिकल केयर में रखा गया था।

जिस सासाराम से ‘वोट चोरी’ का प्रोपेगेंडा फैलाने निकले राहुल गाँधी, वहीं की जनता ने ‘खानदानी चोर’ बता निकाली हवा: कहा- इनको रोहिंग्या के नाम कटने से हो रहा दर्द

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी बिहार में 16 दिनों की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाल रहे हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने 17 अगस्त 2025 को सासाराम से की थी। वोट चोरी के नाम पर जनता को बरगलाने के लिए जो मजमा लगाया गया था उसमें लालू यादव सहित कॉन्ग्रेस के सहयोगी दलों के नेता भी थे। लेकिन सासाराम के लोगों ने ही इस यात्रा के मकसद पर सवाल उठाए हैं।

कॉन्ग्रेस और RJD के पाप गिनाते हुए लोगों ने कहा है कि वे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने के लिए, यह ढोंग कर रहे हैं। बिहार के लोगों का यह भी कहना है कि चुनाव आयोग ने SIR की प्रक्रिया के तहत जो कुछ भी किया है वो सही है। इन लोगों से बातचीत का वीडियो बिहार के डिजिटल पोर्टल लाइव सीटीज ने अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया है।

‘जिसका खानदान चोर है वो दूसरों को वोट चोर बोलेगा’

बातचीत के दौरान एक शख्स ने राहुल गाँधी के आरोपों पर कहा, “जिसका खानदान ही चोर हो और अगर वो दूसरे को चोर बोले तो यह ठीक नहीं है। सरदार पटेल जी को प्रधानमंत्री बनना था लेकिन जवाहरलाल नेहरू बन गए और तभी से कॉन्ग्रेस वोट चोरी कर रही है।” शख्स ने कहा कि राहुल गाँधी का कोई असर नहीं है।

उन्होंने कहा, “वह (राहुल गाँधी) कह रहे हैं कि अगर वोट चोरी हुआ है तो हमारे पूरे रोहतास जिले में देखा जाए कि विधायक किस पार्टी के हैं। मनोज राम अभी-अभी जीते हैं तो फिर वो भी वोट चोरी करके जीते हैं।”

जिन मनोज का जिक्र इस शख्स ने किया है वो सासाराम सीट से कॉन्ग्रेस के सांसद हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार को करीब 20,000 वोटों से हराया था। अब लोग तो पूछेंगे है कि जहाँ से आप रैली कर रहे हैं, आपकी पार्टी का सांसद है क्या वहाँ आपने भी वोट चोरी की थी?

पूरे रोहतास जिले के बात करें तो इसके तहत आने वाली तीनों लोकसभा सीटों (बक्सर, सासाराम और काराकाट) पर गैर बीजेपी दलों के सांसद हैं। इनमें एक सांसद RJD, एक कॉन्ग्रेस और एक CPI (ML)(L) से है। इस जिले के तहत आने वालीं 7 विधानसभा सीटों पर भी सिर्फ एक बीजेपी विधायक हैं। बाकी 4 सीटें RJD और 1-1 सीट कॉन्ग्रेस व CPI (ML)(L) के पास है।

‘कॉन्ग्रेस की वोट चोरी की परंपरा’

एक अन्य शख्स ने बातचीत के दौरान कहा कि राहुल गाँधी का बयान ऐसा है जैसे उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। शख्स ने कहा, “कॉन्ग्रेस की वोट चोरी की परंपरा है। सबसे पहली वोट चोरी 1975 में हुई, जब इंदिरा गाँधी ने वोट चोरी कर चुनाव जीता, कोर्ट ने उनका चुनाव रद्द किया और देश को आपातकाल जैसा गंभीर परिणाम भुगतना पड़ा।”

‘तेजस्वी यादव के बिहार को चूना लगाने’ के बयान पर शख्स ने कहा, “तेजस्वी के पिताजी खुद चारा घोटाले में बिहार को चुना लगा चुके हैं। तो वह वहीं बात कहेंगे।”

एक अन्य शख्स ने कहा, “ये लोग बेल पर छूटे हुए लोग हैं और नकारात्मकता की राजनीति कर रहे हैं। इसी नकारात्मकता की राजनीति के चलते ये लोग हाशिए पर हैं। कोई भी इनके साथ नहीं है।”

‘गाँधी परिवार ने उड़ाईं संविधान की धज्जियाँ’

एक अन्य शख्स ने गाँधी परिवार पर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने और राष्ट्रपति का अपमान करने का भी आरोप लगाया है। शख्स ने कहा, “ये चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे। आयोग पर सवाल उठाने का मतलब है कि आप संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। संविधान को इन्होंने मजाक बना डाला है।”

उन्होंने आगे कहा, “भाई, बहन, माँ ये जितने भी लोग हैं इन्होंने संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इन्होंने बाबा साहब का अपमान किया हैं और सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अपमान किया है।” ऐसे लोगों का कहना है कि अगर वोट चोरी की होती तो उन क्षेत्रों में भी बीजेपी जीत जाती जहाँ अभी हारी है। कुछ लोगों खुलकर चुनाव आयोग के समर्थन में हैं और बिहार की SIR प्रक्रिया को पूरी तरह सही बता रहे हैं।

‘SIR गलतियों को सुधारने की कोशिश, इससे तकलीफ क्यों?’

बिहार चुनाव में विपक्ष ने मतदाता सूची की SIR प्रक्रिया को लेकर हल्ला बोला हुआ है। विपक्ष द्वारा लगातार वोट काटने के आरोप लगाए जा रहे हैं। SIR के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची से चुनाव आयोग ने पुराने 65 लाख से अधिक नाम हटा दिए हैं, जिसे लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है।

एक शख्स ने इसे लेकर कहा, “जिन लोगों का नाम हटा है उनमें से 50% लोगों का दो जगह नाम होगा। मेरा नाम मेरे गाँव में भी है और सासाराम में भी है और एक जगह कटना बहुत जरूरी है। इसलिए SIR बहुत जरूरी है। कहीं ना कहीं गलतियाँ तो हैं और अगर कोई उस गलती को सुधारने का प्रयास करे तो हमें क्यों तकलीफ हो रही है? मतलब कि हम खुद गलत हैं। चुनाव आयोग जो कर रहहे है वो देश हित में है।” वहीं, एक अन्य शख्स ने कहा कि गलत अफवाह फैलाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर पूछ रहे हैं कि नाम कैसे कटा है।

‘कॉन्ग्रेस को रोहिंग्याओं के वोट कटने का दर्द है’

एक शख्स ने दावा किया है कि कॉन्ग्रेस का असल दर्द विदेशी ताकतों का कमजोर होना और रोहिंग्याओं का वोट कटना है। शख्स ने कहा, “नाम देश में किसी का नहीं कटा है। कॉन्ग्रेस दोमुँही बातें करती है। कर्नाटक के मुद्दे को लेकर इसने पूरे देश में हंगामा मचाया कि वोटर लिस्ट गलत है। वहाँ चुनाव जीती भी। लेकिन जब यहाँ SIR के तहत चुनाव आयोग पूरी तरह लगा कि मतदाता सूची को शुद्ध कर दिया जाए, तो कॉन्ग्रेस ने फिर ड्रामा शुरू कर दिया है।”

शख्स ने आगे कहा, “इनका असली दर्द क्या है? इनका दर्द रोहिंग्याओं का दर्द है। इनका दर्द विदेशियों का दर्द है। यह पार्टी देशहित में नहीं, विदेशियों के लिए जीती है। कॉन्ग्रेस के पेट में दर्द इस बात का है कि विदेशी ताकतें कमजोर हो रही हैं और रोहिंग्या जैसे विदेशी घुसपैठियों का वोट कट रहा है।”

‘4-4 जगह वोट दे रहे थे रोहिंग्या, उनका नाम कटा’

एक शख्स ने कहा कि SIR के तहत अवैध नामों को काटा गया है। शख्स ने कहा, “रोहिंग्या यहाँ पर आकर पनाह लेकर के वो चार-चार जगह नाम जुड़वा करके वोट देने का काम करते थे।” उसने कहा कि अब फिर से तेजस्वी यादव और लालू यादव का जंगलराज बिहार में नहीं लौटेगा।

‘लोकतंत्र पर सवाल उठा रहे लोकतंत्र के हत्यारे’

एक शख्स ने कहा, “लोकतंत्र की हत्या करने वाले कॉन्ग्रेसी और RJD के लोग आज लोकतंत्र के ऊपर सवाल उठा रहे हैं। जो सेना के ऊपर सवाल उठा सकता है तो उनके लिए चुनाव आयोग क्या चीज है?”

एक शख्स ने कहा कि जिन वोटरों का निधन हो गया है राहुल गाँधी उन्होंने जिंदा करने आए थे। राहुल उन्हें बताने आए थे कि जाओ और अवैध रूप से वोट करो। जो लोग यहाँ से चले गए हैं, उनको राहुल गाँधी बोल रहे हैं कि जिंदा हो जाओ और यही रहो डबल वोटर बनकर।

एक अन्य शख्स ने कहा कि विपक्षियों ने बिहार को एक ऐसा नासूर दिया है जिसके चलते बिहार में कोई उद्योग लगाने को तैयार नहीं है। विपक्षियों ने घोटाले किए जिसके बाद उद्योगपति यहाँ आने से कतरा रहे हैं।

कुछ मिलाकर देखा जाए तो राहुल गाँधी या अन्य विपक्षी दलों के चुनाव आयोग पर जो आरोप हैं, उनका असर लोगों तक नहीं पहुँचा है। जिन 65 लाख कटे नामों के सहारे राहुल गाँधी राजनीतिक संजीवनी खोजने की कोशिश कर रहे हैं उनका असर लोगों पर इसलिए भी नहीं दिख रहा है क्योंकि लगभग सभी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में मौजूद हैं। ऐसे में लोगों द्वारा विरोध किए जाने का कोई तुक नहीं हैं।

15 महीने की बच्ची, वजन सिर्फ 3.7KG… माँ के सामने कुपोषण से हुई मासूम की मौत, ससुराल वाले कहते रहे- मरने दे, लड़की ही तो है

मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले से एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहाँ 15 महीने की एक मासूम बच्ची दिव्यांशी की शनिवार (16 अगस्त 2025) को जिला अस्पताल में कुपोषण की वजह से मौत हो गई। बच्ची का वजन सिर्फ 3.7 किलोग्राम था, जो उसकी उम्र के मुताबिक बेहद कम है। बच्ची की माँ का कहना है कि लड़की होने की वजह से ससुरालवाले इलाज नहीं कराने देते थे।

रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टरों ने बताया कि उसका हीमोग्लोबिन स्तर केवल 7.4 ग्राम/डीएल था, जो जीवित रहने के लिए बेहद कम है। दिव्यांशी को पहले ही राज्य की ‘दस्तक अभियान’ योजना में कुपोषित के रूप में पहचाना गया था। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने उसके परिवार को पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में इलाज के लिए राजी भी किया था।

दुखद बात यह है कि दिव्यांशी की माँ ने बताया कि उसके ससुराल वाले इलाज नहीं करवाने दे रहे थे, सिर्फ इसलिए क्योंकि बच्ची एक लड़की थी। उन्होंने कहा, “जब भी वह बीमार होती थी, वे कहते थे – मरने दो, लड़की ही तो है।”

इस घटना के दो दिन पहले ही, श्योपुर जिले में एक और बच्ची राधिका की मौत हुई थी। वह भी डेढ़ साल की थी और मौत के समय उसका वजन सिर्फ 2.5 किलो था। उसकी माँ ने बताया कि जन्म के समय वह ठीक थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर होता गया और उसके हाथ-पाँव बिलकुल सूख गए थे।

भिंड जिले से भी हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहाँ एक और बच्ची की मौत कुपोषण के कारण हुई, हालाँकि डॉक्टरों की राय इससे विपरीत थी।

इन लगातार हो रही मौतों से एक सच्चाई सामने आती है कि सरकार की योजनाओं के बावजूद मध्यप्रदेश अब भी देश के सबसे ज्यादा कुपोषण-प्रभावित राज्यों में बना हुआ है। यहाँ बेटियों के साथ हो रहा भेदभाव इस स्थिति को और भी गंभीर बना रहा है।

विभिन्न राज्यों में कुपोषण के मामले

कुपोषण का मतलब है कि शरीर को सही मात्रा में जरूरी पोषण नहीं मिल रहा है। बच्चों में यह समस्या और भी खतरनाक होती है क्योंकि यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास को रोक सकती है, उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकती है और गंभीर मामलों में मृत्यु भी हो सकती है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2024 में जारी सरकारी आँकड़े इस समस्या की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। इसके तहत उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 46.36% बच्चे बौनेपन से पीड़ित हैं, यानी वहाँ लगभग हर दूसरा बच्चा उम्र के अनुसार ठीक से नहीं बढ़ पा रहा है।

इसके बाद लक्षद्वीप में 46.31%, महाराष्ट्र में 44.59% और मध्य प्रदेश में 41.61% बच्चे बौनापन झेल रहे हैं। मध्य प्रदेश में 26.21% बच्चे ऐसे हैं, जिनका वजन सामान्य की अपेक्षा बहुत कम हैं। इसके बाद दादरा- नगर हवेली और दमन एवं दीव (26.41%) और लक्षद्वीप (23.25%) में भी हालात चिंताजनक हैं।

बात करें द्रुत कुपोषण (Wasting) की तो यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बच्चे का वजन अचानक कम होने लगता है। इसमें लक्षद्वीप सबसे आगे है। यहाँ 13.22% बच्चे इस समस्या से जूझ रहे हैं। बिहार (9.81%) और गुजरात (9.16%) भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। यह दिखाता है कि वहाँ के बच्चे या तो पर्याप्त भोजन नहीं कर पा रहे या बार-बार बीमार पड़ रहे हैं।

url – Another girl child died of malnutrition in Madhya Pradesh, discrimination against daughters also exposed

क्या होता है माथा खा जाने वाला अमीबा, जिसके कारण केरल में चली गई 9 साल की बच्ची की जान: कैसे इंसानी दिमाग में करता है प्रवेश, क्या हैं लक्षण-बचाव के उपाय

केरल के कोझीकोड में 9 साल की बच्ची की दिमागी संक्रमण से मौत हो गई। ये मौत Naegleria fowleri amoeba (नेग्लेरिया फोलेरी अमीबा) के नाक से घुसने और ब्रेन में संक्रमण फैलाने के कारण हुई है। जिले में अब तक 4 लोगों की मौत इस बीमारी से हो चुकी है।

क्या है ब्रेन इटिंग अमीबा

अमीबा एक कोशिकीय जीव होता है जिसके शरीर में प्रवेश करने पर संक्रमण पैदा होता है। ये ताजा पानी, हल्के गर्म पानी और गीली मिट्टी में पाया जाता है। झील, नदी, तालाब, स्वीमिंग पूल जैसे जलीय स्थानों पर ये रहते हैं। ब्रेन इटिंग अमीबा यानी नेग्लेरिया फोलेरी अमीबा नाक के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। इस दौरान नाक से होकर ये ब्रेन तक जाता है और उसे नष्ट करना शुरू कर देता है।

ये ज्यादातर गर्मी के दिनों में तेजी से बढ़ते हैं क्योंकि उस वक्त कोशिका-विभाजन तेजी से होता है। ये जब दिमाग तक पहुँचता है तो उसके टिश्यू को खाना शुरू कर देता है। इससे बाद तेजी से विभाजित होने लगता है। तेज गति से नए अमीबा के बनने और ब्रेन टिश्यू के नष्ट होने के कारण दिमाग में सूजन आ जाता है। इससे रेयर और खतरनाक ब्रेन संक्रमण पैदा होता है।

दो तरह का होता है अमीबा

अमीबिक एन्सेफलाइटिस दो तरह का होता है। पहला प्राथमिक अमैबिक मेनिन्जोएन्सेफलाइटिस (primary amoebic meningoencephalitis) या PAM। दूसरा ग्रैनुलोमैटस अमाइबिक एन्सेफलाइटिस (granulomatous amoebic encephalitis) यानी GAE। विशेषज्ञों के अनुसार, PAM को आमतौर पर Naegleria fowleri भी कहते हैं, जिसके कारण दिमाग में सूजन आ जाती है। ये काफी तेजी से फैलता है। दूसरी ओर GAE धीमी गति से फैलता है।

कैसे आप अमीबा से संक्रमित होते हैं

डॉक्टरों के मुताबिक, आम तौर पर दोनों तरह के अमीबा की शरीर में एंट्री नाक के द्वारा ही होती है। ज्यादातर तैरने के दौरान स्वीमिंग पूल, नदियों, तालाबों या दूसरे जलस्रोतों का ऐसा पानी, जिसमें अमीबा मौजूद हों, वह नाक के अंदर चला जाए और ब्रेन तक पहुँच जाए। आम तौर पर गर्मियों में यह तेजी से बढ़ता है। अमीबा मस्तिष्क के टिश्यू को खा जाता है और पचा लेता है। इससे संक्रमण फैलता है।

ब्रेन इटिंग अमीबा के लक्षण

ये बीमारी बहुत तेजी से फैलती है। जब नाक से होकर अमीबा शरीर में प्रवेश करता है तो इसके 12 दिनों के अंदर लक्षण दिखने लगते हैं।

  • तेज बुखार
  • तेज सिर दर्द
  • साँस लेने में दिक्कत
  • कपकपाना
  • गले को घुमाने में तकलीफ होना
  • लाइट से दूर भागना
  • मानसिक दिक्कत आना

बीमारी से बचने के उपाय लक्षण

  1. तैरते वक्त हमेशा नोज क्लिप का इस्तेमाल करना चाहिए।
  2. स्विमिंग पूल की सफाई बेहद जरूरी है।
  3. तैरते वक्त नाक में पानी जाने से बचाना जरूरी है।
  4. स्वीमिंग पूल की सफाई में क्लोरीन का इस्तेमाल करना चाहिए।
  5. पीने के पानी को फिल्टर करने ही इस्तेमाल करना चाहिए।
  6. अगर तेज बुखार के साथ दूसरे लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से जरूर मिलें।

पहली बार ब्रेन इटिंग अमीबा साल 1965 में आस्ट्रेलिया में पाया गया था। यह 46 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी एक्टिव रहता है। अमीबा खुद से आकार बदलने में सक्षम है। यह पृथ्वी पर पाए जाने वाले प्राचीन जीवों में से एक है।

अमीबा में एक कोशिका होता है इसलिए मेल-फीमेल जैसा कुछ नहीं होता। कोशिका विभाजन से इसकी संख्या बढ़ती है। ये टूटकर चार हो जाते हैं और इस तरह इनकी आबादी बढ़ती है। इसका आकार तय नहीं होता। बीते 50 साल में अब तक दुनिया भर में 382 मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से अकेले अमेरिका में 154 मामले सामने आ चुके हैं। पहली बार ब्रेन इटिंग अमीबा साल 1965 में आस्ट्रेलिया में पाया गया था। यह 46 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी एक्टिव रहता है।