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‘वोट चोरी’ के आरोपों पर चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस को दिया करारा जवाब: पूछा- जब राजनैतिक दलों को पहले ही मिल जाती है वोटर लिस्ट, तब गलती क्यों नहीं बताई

चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट पर उठे सवालों का जवाब दिया है। आयोग ने कहा कि कुछ विपक्षी दल (कॉन्ग्रेस) अब गलतियों का आरोप लगा रहे हैं। ये गलतियाँ पहले क्यों नहीं बताई गईं? राजनीतिक दलों को वोटर लिस्ट की जाँच के लिए काफी समय दिया गया था। उन्हें लिस्ट की कॉपी भी मिलती थी। अगर कोई गलती थी तो उन्हें समय रहते शिकायत करनी चाहिए थी।

चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया पारदर्शी होती है। इसमें सभी दल शामिल होते हैं। चुनाव आयोग रविवार (17 अगस्त 2025) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करेगा, जिसमें वह इस मुद्दे पर और जानकारी देगा।

सही समय पर उठानी थी आपत्तियाँ

ECI का कहना है कि वोटर लिस्ट से जुड़ी आपत्तियाँ ड्राफ्ट प्रकाशन के समय उठानी चाहिए थी। उस समय दावों और आपत्तियों के लिए एक महीना दिया गया था। वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद, इसकी डिजिटल और फिजिकल कॉपी सभी राजनीतिक दलों को दी जाती है।

साथ ही, इसे आयोग की वेबसाइट पर भी डाला जाता है ताकि कोई भी इसे देख सके। ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद, मतदाताओं और राजनीतिक दलों को आपत्ति और सुधार के लिए एक महीने का पूरा समय मिलता है। इस दौरान, वे किसी भी गलती को सुधारने के लिए आवेदन कर सकते थे।

वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया

भारत में चुनाव के लिए वोटर लिस्ट बनाना एक तय प्रक्रिया है। यह काम कई स्तरों पर किया जाता है। वोटर लिस्ट बनाने की जिम्मेदारी SDM स्तर के अधिकारियों की होती है। इन्हें ERO यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर कहा जाता है। ये अधिकारी बूथ-लेवल ऑफिसर (BLO) की मदद लेते हैं।

इनका काम होता है कि वोटर लिस्ट सही और पूरी हो। हर योग्य वोटर का नाम उसमें हो। चुनाव आयोग इन अधिकारियों को साफ निर्देश देता है। इन्हीं निर्देशों के आधार पर लिस्ट तैयार की जाती है।

गलती होने पर की जाती है अपील

अगर किसी को अंतिम वोटर लिस्ट में भी कोई गलती लगती है, तो वह शिकायत कर सकता है। पहली अपील जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास की जा सकती है। अगर बात नहीं बनती, तो दूसरी अपील राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) के पास की जा सकती है।

चुनाव आयोग ने कहा कि आपत्ति दर्ज करने का सही समय ड्राफ्ट लिस्ट के बाद था। उस समय सभी को एक महीना दिया गया था। अब कुछ पार्टियाँ और लोग पुरानी लिस्ट की गलतियों पर सवाल उठा रहे हैं। अगर ये बातें सही समय पर कही जातीं, तो SDM या ERO उन्हें ठीक कर सकते थे।

साफ-सुथरी वोटर लिस्ट जरूरी- चुनाव आयोग

चुनाव आयोग ने कहा है कि वह वोटर लिस्ट की जाँच का स्वागत करता है। आयोग ने कहा कि हर पार्टी और हर मतदाता को वोटर लिस्ट देखनी चाहिए। अगर कोई गलती दिखे तो समय पर बतानी चाहिए। इससे SDM और ERO को गलती ठीक करने में मदद मिलेगी।

इस कार्य से वोटर लिस्ट और सही और साफ बन सकेगी। आयोग का मानना है कि साफ-सुथरी वोटर लिस्ट बहुत जरूरी है। सही लिस्ट ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।

पूजा की इजाजत नहीं, नमाज के लिए जगह भरपूर: केरल में CPIM के हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग नियम, कम्युनिस्टों का सनातन विरोधी चेहरा फिर आया सामने

केरल की सत्ताधारी पार्टी सीपीआई(एम) का धर्म को लेकर जो रुख है, वो बार-बार सवालों के घेरे में आता है। ऐसा लगता है कि पार्टी हिंदुओं और मुस्लिमों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करती। वह एक तरफ तो धर्मनिरपेक्षता की बात करती है, लेकिन जब बात हिंदू या इस्लाम की आती है, तो उसका रवैया अलग-अलग दिखता है।

हाल ही में केरल के पूर्व गृह मंत्री कोडियारी बालकृष्णन के बेटे और सीपीआई(एम) के सदस्य बिनीश कोडियारी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो में एक टोपी पहने हुआ व्यक्ति, जिसने टोपी पहनी हुई थी, सीपीआई(एम) के पार्टी ऑफिस के अंदर नमाज़ अदा कर रहा था।

आनंद नाम के एक्स यूजर के मुताबिक, वीडियो में दिखने वाला शख्स कोल्लम का एक फेरीवाला है, जो चादर बेचकर अपनी आजीविका चलाता है। इस मुस्लिम शख्स ने बारिश की वजह से स्थानीय सीपीआई(एम) कार्यकर्ताओं से नमाज पढ़ने के लिए जगह माँगी थी। पार्टी ने तुरंत उसकी बात मान ली और उसे अपने ऑफिस में नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी।

बिनीश ने अपने पोस्ट में सीपीआई(एम) की तारीफ की और कहा कि पार्टी ने उस शख्स को नमाज़ पढ़ने की जगह देकर उसकी धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखा। उन्होंने इसे प्यार और भाईचारे का उदाहरण बताया और कहा कि यह केरल की ताकत है। यह पोस्ट सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रहा, क्योंकि इससे पार्टी का एक खास रवैया सामने आया।

सीपीआई(एम) ने नमाज़ की घटना को बहुत सकारात्मक तरीके से पेश किया और इसे भाईचारे का प्रतीक बताया। लेकिन संयोग से हिंदुओं के मामले में ऐसी उदारता, सहनशीलता और समायोजन का रवैया अक्सर दिखाई नहीं देता। क्योंकि जब बात हिंदुओं की आती है, तो पार्टी का रवैया अक्सर अलग होता है। यह अंतर लोगों के बीच चर्चा का विषय बनता है। कुछ उदाहरण हम आपके सामने रख रहे हैं।

CPIM ने रोक दिया था गणपति हवन

बता दें कि फरवरी 2024 में केरल के कोझिकोड जिले के नेदुमन्नूर एलपी स्कूल में आयोजित गणपति हवन पर CPIM ने आपत्ति जताई थी। जानकारी के अनुसार, CPIM से जुड़े लोगों को जब इस पूजा के बारे में पता चला तो उन्होंने वहाँ पहुँचकर अनुष्ठान रुकवा दिया और आयोजकों के साथ मारपीट भी की। इसके बाद पुलिस ने मामले को अपने हाथ में लिया और आयोजकों को गिरफ्तार कर लिया।

सीपीएम के गुंडों ने गणपति हवन रोका, आयोजकों को पुलिस ने गिरफ्तार किया

घटना यहीं नहीं रुकी। सीपीआईएम कार्यकर्ताओं ने बाद में स्कूल तक विरोध मार्च भी निकाला। जबकि यह पूजा स्कूल प्रशासन की पूर्व अनुमति से हो रही थी और हर साल महानवमी के अवसर पर परंपरा के तौर पर आयोजित की जाती रही है।

इस बार, जब नियमित कार्यक्रम रद्द हो गया था, तब स्कूल ने गणपति हवन का आयोजन किया। लेकिन इसके बावजूद CPI M ने इस धार्मिक आयोजन को सहन नहीं किया और विरोध जताया।

CPIM ने मंदिर में प्रार्थना करने पर पार्टी नेता को फटकार लगाई

सितंबर 2017 में CPIM ने अपने ही मंत्री कडकम्पल्ली सुरेंद्रन को फटकार लगाई। वे त्रिशूर के प्राचीन श्री गुरुवायुर मंदिर गए थे और वहाँ परिवार के आग्रह पर पुष्पांजलि अर्पित की थी। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें वायरल हुईं, जिनमें वे पारंपरिक मुंडू और मेलमुंडू पहने हुए दिखे।

उनके माथे पर चंदनकुरी भी थी और उनके बच्चे भगवान कृष्ण की वेशभूषा में नजर आए। उस समय सुरेंद्रन केरल के देवस्वओम मंत्री के पद पर कार्यरत थे। इस घटना के बाद CPIM की आंतरिक समिति ने कहा कि उनका आचरण पार्टी के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

मामले पर एक जाँच रिपोर्ट भी तैयार की गई। पार्टी ने साफ किया कि श्री गुरुवायुर मंदिर में पूजा-अर्चना करना माकपा के सिद्धांतों के खिलाफ है और सुरेंद्रन को पार्टी नेताओं की परंपरा का पालन करने की हिदायत दी गई।

ज्योतिषी से मुलाकात के लिए CPIM नेता जाँच के घेरे में

अगस्त 2024 में CPIM के राज्य सचिव एम वी गोविंदन विवाद में आ गए। उन पर आरोप लगा कि वे महावा पोडुवल नामक एक हिंदू ज्योतिषी से ज्योतिष पर चर्चा करने गए थे। इस वजह से उन्हें पार्टी की नाराज़गी झेलनी पड़ी।

बाद में ज्योतिषी महावा पोडुवल ने सफाई दी कि गोविंदन सिर्फ उनके परिवार से मिलने और चाय पीने आए थे। उन्होंने कहा कि मुलाकात के दौरान ज्योतिष पर कोई चर्चा नहीं हुई। पोडुवल ने स्पष्ट किया, “व्यक्तिगत संबंधों को ज्योतिष से जोड़ना गलत है।

अगर कोई कहे कि गोविंदन गुरु ने ज्योतिष जाँच करवाई, तो यह असहनीय है।” उन्होंने यह भी बताया कि CPIM नेता एम वी गोविंदन और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन दोनों से उनके व्यक्तिगत रिश्ते हैं।

हर ‘हिंदू’ चीज पर आपत्ति

जुलाई 2022 में CPIM ने राष्ट्रीय प्रतीक के अनावरण कार्यक्रम के दौरान किए गए पूजन-विधि पर आपत्ति जताई थी। पार्टी का मानना था कि ऐसे सरकारी कार्यक्रम धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए।

इसके अलावा, CPIM नेपाल की राजनीति में भी सक्रिय रही है और उसने वहाँ की दुनिया की एकमात्र हिंदू राजशाही को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

CPIM का हिंदू विरोधी प्रचार

फरवरी 2025 में ऑपइंडिया ने खुलासा किया कि CPIM ने अपने 64 पन्नों के राजनीतिक मसौदे में हिंदू-विरोधी एजेंडा साफ तौर पर सामने रखा। मसौदे में नेपाल के हिंदू राष्ट्र और वहाँ की राजशाही समर्थक ताकतों के खिलाफ बयानबाजी की गई और दावा किया गया कि हिंदुत्व समर्थक और आरएसएस इन ताकतों का समर्थन कर रहे हैं।

पार्टी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को हिंदुत्व अभियान की निरंतरता बताया और काशी-मथुरा विवादों पर भी आपत्ति जताई। उसने धार्मिक जुलूसों को अल्पसंख्यक इलाकों में हिंसा फैलाने का साधन करार दिया और हिंदू समुदाय को दोषी ठहराने की कोशिश की।

पार्टी ने ग्रूमिंग जिहाद विरोधी कानूनों और आदिवासियों के धर्मांतरण पर लगाम लगाने की कोशिशों का भी विरोध किया। नए संसद भवन के उद्घाटन को हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़ने पर भी पार्टी ने आपत्ति जताई और सेंगोल रखने का मजाक उड़ाया।

CPIM ने हिंदू इतिहास को पौराणिक कथा कहकर खारिज करने की कोशिश की और मीडिया, फिल्म और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर हिंदुओं की सकारात्मक छवि दिखाए जाने को भी नकारात्मक बताया। मसौदे में RSS पर इतिहास को सांप्रदायिक नजरिए से फिर से लिखने का आरोप लगाया गया।

सीपीआई(एम) के ड्राफ्ट रिज़ॉल्यूशन का पेज 54 पर लिखा था, “इस्लामी कट्टरवादी और उग्रवादी संगठन जैसे जमात-ए-इस्लामी और एसडीपीआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का राजनीतिक विंग) मुस्लिम जनता के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। वे अल्पसंख्यक समुदाय के बीच अलगाव और डर का फायदा उठाते हैं, जो हिंदुत्व ताकतों के लगातार हमलों का शिकार हैं… हालाँकि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को सत्ता में मौजूद हिंदुत्व सांप्रदायिक ताकतों के बराबर नहीं माना जा सकता, यह समझना ज़रूरी है कि अल्पसंख्यक उग्रवादी गतिविधियाँ केवल बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को और मजबूत करती हैं।”

सीपीआई(एम) की बातों को सरल तरीके से समझें, तो उसका कहना है कि इस्लामी कट्टरवादी संगठन अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं, क्योंकि हिंदुत्व की ताकतें मुस्लिम समुदाय को परेशान कर रही हैं। उसका ये भी कहना है कि मुस्लिम कट्टरता को हिंदुत्व जितना बड़ा खतरा नहीं माना जा सकता। उसका साफ मानना है कि मुस्लिम कट्टरता दरअसल हिंदुत्व की वजह से बढ़ रही है। यह उनकी सोच को दिखाता है कि हिंदुत्व हर समस्या की जड़ है।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

‘रूस-अमेरिका में 20% बढ़ा व्यापार…’: डोनाल्ड ट्रंप के सामने ही व्लादिमीर पुतिन ने दोहराई भारत की बात, दुनिया के आगे बेनकाब कर दिया USA का पाखंड

अमेरिका के अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लंबी बैठक हुई। इस बैठक में रूस-यूक्रेन विवाद का तो समाधान नहीं निकला लेकिन पुतिन ने एक ऐसी बात कह दी जिससे अमेरिका का दोहरा चरित्र दुनिया के सामने बेनकाब हो गया।

ट्रंप दुनिया के तमाम देशों को धमकाते रहते हैं कि वे रूस से व्यापार बंद कर दें। उनका तर्क होता है कि इससे यूक्रेन युद्ध की फंडिंग हो रही है। अब पुतिन ने ट्रंप की मौजूदगी में ही कह दिया है कि उनका अमेरिका के साथ व्यापार ट्रंप सरकार में बढ़ा है।

पुतिन ने क्या कहा?

अलास्का में ट्रंप और पुतिन ने बैठक के बाद एक साझा न्यूज कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। अपने बयान में पुतिन ने कहा, “नया अमेरिकी प्रशासन आने के बाद हमारे आपसी व्यापार में बढ़ोतरी हुई है। अभी यह आँकड़ा प्रतीकात्मक ही है लेकिन फिर भी व्यापार 20% ज्यादा है। हमारे पास सहयोग के लिए कई महत्वपूर्ण क्षेत्र मौजूद हैं।”

पुतिन ने आगे कहा कि रूस और अमेरिका के बीच व्यापार और निवेश की साझेदारी में बहुत बड़ी संभावनाएँ हैं। व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल और उच्च तकनीक और अंतरिक्ष विकास जैसे क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे को बहुत कुछ दे सकते हैं।

पुतिन ने कहा कि अमेरिका और रूस को पुराने पन्ने पलटते और फिर से सहयोग की राह पर लौटने की आवश्यकता है।

भारत ने अमेरिका को दिखाया था आईना

हालाँकि, भारत पहले ही रूस से व्यापार को लेकर अमेरिका को आईना दिखा चुका है। ट्रंप ने बीते 4 अगस्त को भारत के रूसी तेल खरीदने पर सवाल उठाए थे। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में लिखा था, “भारत ना केवल भारी मात्रा में रूसी तेल खरीद रहा है बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊँचे दामों पर बेचकर भारी मुनाफा कमा रहा है।”

ट्रंप ने लिखा था, “भारत को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि रूस के कारण यूक्रेन में कितने लोगों की जान जा रही है। इस वजह से मैं भारत से आने वाले सामानों पर अधिक टैरिफ लगाऊँगा।”

भारत ने ट्रंप की पोस्ट के कुछ समय बाद ही अमेरिका को आईना दिखा दिया था। भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया था कि अमेरिका भी रूस से परमाणु उद्योग के लिए यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, ईवी उद्योग के लिएपैलेडियम के साथ उर्वरक और रसायन आयात करता है।

विदेश मंत्रालय ने कहा, “ऐसे में भारत को निशाना बनाना न केवल अनुचित है, बल्कि गलत भी है। भारत हर बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह अपने राष्ट्रीय हित और आर्थिक सुरक्षा की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।” भारत ने यूरोप और रूस के बीच हो रहे व्यापार की भी पोल खोल दी थी।

ट्रंप ने कहा था- रूस से खरीद की जानकारी नहीं

भारत के इस बयान के बाद ट्रंप से जब यह पूछा गया कि क्या अमेरिका, रूस से रसायन और उर्वरक आयात करता है तो उन्होंने इसकी जानकारी होने से ही इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था, “मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। हमें इसकी जाँच करनी होगी।”

इसके कुछ समय बाद ही आईना दिखाए जाने के बाद भन्नाए ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी थी। इससे पहले 30 जुलाई को वह 25% टैरिफ लगाने का ऐलान कर चुके थे। यानी भारत पर कुल टैरिफ 50% हो गया था। हालाँकि, ट्रंप ने 25% अतिरिक्त टैरिफ पर बातचीत के लिए 21 दिनों का समय दिया था।

अमेरिकी सरकार के एक कार्यकारी आदेश में इस अतिरिक्त टैरिफ की वजह को लेकर बताया गया कि भारत, रूस से सीधे या परोक्ष रूप से तेल खरीद रहा है। अब पुतिन ने जो अमेरिकी नकाब दुनिया के सामने उतारा है उसने ट्रंप की सारी हकीकत उजागर कर दी है। उम्मीद है अब जब ट्रंप से व्यापार बढ़ने को लेकर सवाल पूछा जाएगा तो वो यह नहीं कह पाएँगे कि ‘उन्हें जानकारी नहीं है’।

पाकिस्तान में सेक्युलरों को मिला दर्दनाक अंजाम, बँटवारे के बाद प्रोग्रेसिव लोग मारे गए या वापस भारत भाग आए: आज भी खतरे में सेक्युलर विचार

जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हो रहा था, तब भी कई सेक्युलरों को ठीक वैसे ही डर लग रहा था, जैसे आज कुछ लोगों को भारत में हिंदुओं से डर लगता है। उन्हें लगता था, कि वे विभाजन के बाद पाकिस्तान चले जाएँगे, तो वहाँ उनकी तथाकथित सेकुलर और प्रोग्रेसिव भावनाओं का सम्मान किया जाएगा।

लेकिन 14 अगस्त 1947 से लेकर आज की तारीख तक पाकिस्तान की जमीन में किसी भी सेकुलर और प्रोग्रेसिव इंसान या विचार को जिंदा नहीं रहने दिया गया। जिस हिंदू ने पाकिस्तान को चुना, उसे उसके घर के सामने काफिर कहकर मार दिया गया। और जिस मुसलमान ने प्रोग्रेसिव होने की कोशिश की, उसे या तो मुल्क छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया – या फिर अवसाद में धकेल कर मरने के लिए छोड़ दिया गया। मुल्क छोड़ने के बाद ये सारे मोमिन हजरात हिंदुस्तान में आए और उनकी ही पुश्तें आज तक इकबाल की नज़्म के वो शेर अपनी इस्लामिक करतूतों के साथ गा रही हैं कि…

ऐ आबरुए गंगा – अब तक है याद हमको – उतरा तेरे किनारे – जब काफिला हमारा

पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री से लेकर पाकिस्तान का पहला कौमी तराना लिखने वाले तक की कहानी हम आपको बताएँगे – कि कैसे उन्हें जलालत झेलनी पड़ी, कैसे मॉब लिंचिंग की गई, और कैसे उन्हें कथित अच्छे पाकिस्तान से भागकर – बताए गए बुरे हिंदुस्तान में आकर – जान बचानी पड़ी?

इनमें सबसे पहला नाम अर्थशास्त्री प्रोफेसर बृज नारायण का है। इन्होंने खुलकर जिन्ना की ‘टू नेशन थ्योरी’ का समर्थन किया। पाकिस्तान को भारत से बेहतर आर्थिक मॉडल और अधिक बेहतर भविष्य की संभावनाओं वाला देश करार दिया। और इसका नतीजा ये था, कि अपनी आजादी के ही दिन, 14 अगस्त 1947 को इस्लामी भीड़ ने काफिर कहकर लाहौर में बृज नारायण के घर के सामने ही उन्हें मार डाला।

उनके ही एक और दोस्त थे जोगेंद्र नाथ मंडल। इनका नाम तो आपने सुना ही होगा। जिन्ना के साथ मिलकर इन्होंने भी एक थ्योरी दी। कहा, कि भारत में दलित और मुसलमान दोनों ही अल्पसंख्यक हैं। और पाकिस्तान बनेगा तो मुसलमान बहुसंख्यक होने के बावजूद भी दलितों के अधिकारों की रक्षा करेंगे। आजकल असदुद्दीन ओवैसी जो ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ की बात करते हैं ना? ये कुछ वैसा ही था।

मोहम्मद अली जिन्ना ने जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री बनाया। और जिन्ना की मौत के साथ इनका मंत्रालय भी गया और कानून भी। 1950 में मण्डल ने जब वहाँ की इस्लामी सत्ता के द्वारा हिंदुओं को दी जा रही यातनाओं को देखा, तो डरकर ऐसे भागे कि सीधे भारत आ लौटे।

इस्लाम के नाम पर बन रहे मुल्क के तराने में उस समय की प्रोग्रेसिव आवाजों ने जमकर अपना कौमी कोरस दिया था। शायर साहिर लुधियानवी, मौसिकी के उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उर्दू अदब के बेअदब सरताज सआदत हसन मंटो ये सब पहले तो कायद-ए-आज़म के पाकिस्तान में ही रुक गए। लेकिन वहाँ रहते हुए उन्हें ये समझ आया कि उन्होंने किस स्वर्ग को छोड़कर कौन सा नर्क चुन लिया है। बड़े गुलाम अली खान ने तो सीधे कहा कि वहाँ सिर्फ मुसलमान रह सकते हैं, और भारत आ गए।

साहिर लुधियानवी को सवेरा नामक उर्दू पत्रिका में कम्युनिस्ट विचारधारा को बढ़ावा देने वाले और सरकार के खिलाफ अवाम को उकसाते उत्तेजक लेख लिखने के लिए गिरफ्तारी और उसके बाद मौत का डर सताने लगा। लाहौर की रौशन-ए-दीन सड़कों पर सरे बाजार घूमते हुए उनको लगता था कि कोई आएगा और उनका सर तन से जुदा कर देगा। उन्हें अचानक से हिंदोस्तान ही सारे जहाँ से अच्छा लगने लगा। उन्हें रातों रात भेस बदलकर अपनी पहचान पर बुरखा डालकर भारत आना पड़ा। और भारत आकर उन्हें प्रकाश पंडित नामक एक हिंदू के ही संरक्षण में पूरा जीवन गुजारना पड़ा।

सआदत हसन मंटो भारत से पाकिस्तान गए। उनकी ठंडा गोश्त जैसी रचनाओं के लिए उनपर मुकदमे हुए। उन्हें इस्लामिक शासन व्यवस्था द्वारा प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उनके इनकम सोर्स को खत्म किया गया और वो अवसाद में चले गए। मजहब की आग ने ठंडे गोश्त को सिर्फ भूना ही नहीं, बल्कि लेखक की जिजीविषा तक को जला दिया। और पाकिस्तान बनने के कुछ वर्षों के भीतर ही शराब पी-पी कर लीवर सड़ने से वो अल्लाह को प्यारे हो गए।

सज्जाद जहीर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के संस्थापक सदस्य थे। उन्होंने भी मजहब के नाम पर बने पाकिस्तान को चुना। वहाँ जाकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ पाकिस्तान बनाई। लेकिन उन्हें रावलपिंडी षडयंत्र मामले में गिरफ्तार किए गया, जेल में यातनाएँ दी गईं और 1955 में जेल से छूटते ही वे ऐसे भागे ऐसे भागे कि सीधे भारत आ गए।

इनके अलावा जावेद अख्तर के ससुर कैफ़ी आजमी, कुर्रतुल ऐन हैदर इन जैसे दर्जनों नाम थे, जिन्हें बँटवारे के वक्त पाकिस्तान अच्छा लगता था। और पाकिस्तान बनते ही इनको वहां से भागने के लिए मजबूर किया गया।

ऐसे भी कई नाम हैं जो पार्टीशन के वक़्त मुस्लिम लीग में थे, जिन्होंने भरभर के मुस्लिम लीग को वोट दिलवाए। लेकिन बँटवारे के बाद भारत में ही रुक गए – अधूरे मकसद को पूरा करने के लिए। और अपने महान सामाजिक कार्य को बौद्धिक जामा पहनाने के लिए रातोंरात कम्युनिस्ट विचारधारा के कार्ड होल्डर सदस्य भी बन गए।

आज भी इस सरज़मीन-ए-हिंद में ऐसे किरदार मौजूद हैं जिनकी नज़रें सरहद पार के उस मुल्क में कोई मसीहा तलाशती हैं। किसी के दिल में औलाद के मुस्तक़बिल की फ़िक्र जलती है, तो किसी को लगता है कि हिंदुवादी हुकूमत के साए में भारत, हिंदुओं का पाकिस्तान या तालिबान बन चुका है।

मगर ऐ अहल-ए-सकूनत-ए-सैकुलर! ज़रा उन पुराने दौर के नामचीन सैकुलर हुलियों को पढ़ लो, उनके चेहरे अपनी आँखों में बसा लो और ता-क़यामत याद रखो कि पाकिस्तान में उनका क्या अंजाम हुआ।

ये याद रखो कि पाकिस्तान नाम की सोच कोई फ़िक्र नहीं, कोई रूहानी तसव्वुर नहीं। वो तो बस एक आसमानी किताब के पन्नों की आड़ में बहकाकर, बरगलाकर जमा की गई मज़हबी जुनूनियत का वहशी हुजूम है। और याद रखो कि जिसने भी उस हुजूम से इश्क़ किया, अंजाम में वही हुजूम उसे नोच-नोच कर खा जाएगी।

नोएडा से दिल्ली IGI एयरपोर्ट का सफर अब 20 मिनट में, PM मोदी करेंगे ‘UER-II’ और ‘द्वारका एक्सप्रेसवे’ का उद्घाटन: इन 2 प्रोजेक्ट्स से ट्रैफिक का भार होगा कम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार (17 अगस्त 2025) को दो बड़े सड़क प्रोजेक्ट ‘अर्बन एक्सटेंशन रोड-II’ (UER-II) और ‘द्वारका एक्सप्रेसवे’ के दिल्ली सेक्शन का उद्घाटन करेंगे। इन दोनों सड़कों के खुल जाने से अब नोएडा से दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे IGI एयरपोर्ट तक का सफर सिर्फ 20 मिनट में पूरा हो सकेगा, जिससे यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।

नए रास्तों के बनने से दिल्ली-NCR के पश्चिमी इलाकों से आने वाले लोगों के लिए सफर करना बहुत आसान हो जाएगा। अभी इन इलाकों से आने वाले लोगों को शहर की सबसे व्यस्त रिंग रोड से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे वहाँ बहुत ज़्यादा ट्रैफिक रहता है। लेकिन इन नए रास्तों के शुरू होने के बाद रिंग रोड पर गाड़ियों का बोझ कम हो जाएगा। इसका सीधा फायदा NH-48, NH-44, रिंग रोड और बारापुला जैसे बड़े और मुख्य रास्तों पर भी दिखेगा, जहाँ भीड़ कम हो जाएगी और लोगों को जाम में नहीं फँसना पड़ेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के साथ उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और कई भाजपा नेता मौजूद रहेंगे।

UER-II: दिल्ली की नई आउटर रिंग रोड

UER-II एक नई सड़क है जो अलीपुर से शुरू होकर महिपालपुर तक जाती है। यानी दिल्ली एयरपोर्ट के पास तक। इसकी लंबाई करीब 76 किलोमीटर है। यह सड़क पाँच हिस्सों में बनकर तैयार हुई है और इसे बनाने में करीब ₹6,445 करोड़ खर्च हुए हैं।

अब इस सड़क की मदद से गुड़गाँव, वेस्ट दिल्ली और साउथ दिल्ली से आने-जाने वाले लोगों को सफर में काफी आसानी होगी। उन्हें अब पुराने ट्रैफिक वाले रास्तों से नहीं गुजरना पड़ेगा।

इस सड़क के खुलने से अब लोग सीधे NH-44 तक पहुँच सकते हैं, जिससे चंडीगढ़, पंजाब और जम्मू-कश्मीर की तरफ जाना भी आसान हो जाएगा। पहले जिन जगहों पर ट्रैफिक जाम लगता था, जैसे धौला-कुआँ और रिंग रोड, वहाँ अब भीड़ कम हो जाएगी।

जानकारी के अनुसार, UER-II सड़क दिल्ली मास्टर प्लान 2021 के हिसाब से बनाई गई है। यह सड़क दिल्ली में 54 किलोमीटर और हरियाणा में लगभग 21 किलोमीटर लंबी है। इस सड़क पर आठ लेन हैं। साथ ही सर्विस रोड, चार बड़े इंटरचेंज और कई अंडरपास भी बनाए गए हैं, जिससे यातायात आसान और बिना रुके चलेगा।

अब UER-II सड़क को दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे से जोड़ा जा रहा है। इसके साथ ही एक नई 65 किलोमीटर लंबी सड़क बनेगी, जो ट्रॉनिका सिटी से FNG एक्सप्रेसवे तक जाएगी। इससे नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और दिल्ली के दूसरे हिस्सों के हाईवे एक-दूसरे से जुड़ जाएँगे, जिससे सफर और आसान हो जाएगा।

UER-II को बनाने के लिए 10 लाख मीट्रिक टन पुराने और बेकार पड़े मलबे का इस्तेमाल किया गया। यह सारा मलबा दिल्ली के पुराने कूड़ेदानों (लैंडफिल साइट्स) से निकाला गया था। इस तरह, इन सड़कों के बनने से न सिर्फ यात्रा आसान होगी, बल्कि यह हमारे पर्यावरण के लिए भी एक अच्छा कदम माना जा रहा है।

द्वारका एक्सप्रेसवे: एयरपोर्ट का नया रास्ता

द्वारका एक्सप्रेसवे का जो हिस्सा दिल्ली में है, वो करीब 10 किलोमीटर लंबा है। इसमें एक सुरंग भी बनी है जो 5 किलोमीटर से ज्यादा लंबी है। यह सुरंग सीधे IGI एयरपोर्ट तक जाती है, जिससे वहाँ पहुँचना अब बहुत आसान हो जाएगा।

इस एक्सप्रेसवे का जो हिस्सा हरियाणा में है, वो पहले ही मार्च 2024 में शुरू हो चुका था। अब दिल्ली वाला हिस्सा भी चालू हो गया है, जिससे दिल्ली और गुरुग्राम के बीच सफर और भी तेज और आरामदायक हो गया है।

द्वारका एक्सप्रेसवे और UER-II सड़कों की वजह से अब दिल्ली के अंदर के रास्तों पर भीड़ कम हो जाएगी। इससे NH-48, रिंग रोड और बारापुला फ्लाईओवर जैसे बड़े रास्तों पर गाड़ियों का दबाव पहले से कम होगा। लोग अब बाहर से आने-जाने के लिए सीधे इन नए रास्तों का इस्तेमाल कर सकेंगे।

मैं हिंदू हूँ, मुझे मुस्लिम बनने से बचाओ: 21 साल की लड़की ने लगाई गुहार, कहा- जब से रूबिया को घर लेकर आया भाई, बनाया जा रहा दबाव

प्रयागराज के एक हिंदू परिवार की युवती रीतिका कुशवाहा ने पुलिस से मदद की गुहार लगाई है। उसका कहना है कि उनके घर मौलवी आते हैं। उसे और उसके अन्य भाई-बहनों को जबरजस्ती दरगाह ले जाया जाता है और धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता है। ऐसा करने वाला और कोई नहीं उसका अपना भाई राहुल कुशवाहा है।

रीतिका कैंट थाना इलाके के राजापुर उचवागढ़ी मोहल्ले में रहती है। पाँच भाई-बहनों में रीतिका सबसे छोटी है। उसके पिता रमेश कुशवाहा की पहले ही मौत हो चुकी है। उसका कहना है कि भाई राहुल अपराधी स्वभाव का है। वह बमबाजी के आरोप में जेल भी जा चुका है। जेल से आने के बाद उसने बताया कि एजाज नाम के एक अन्य अपराधी ने जेल में उसकी मदद की थी, इसलिए वह उसके एहसानों तले दब चुका है।

उसके एहसान को चुकाने के लिए जेल से बाहर आने के बाद वह बाद एजाज की बीवी रूबिया और उसके बच्चे को घर ले आया और तभी से पूरी तरह बदल गया। वह मजार जाने लगा, मुस्लिम टोपी पहनने लगा और बाकी भाई-बहनों पर इस्लाम कुबूलने का दबाव बनाने लगा। तंग आकर रीतिका घर से भाग निकली और पुलिस से मदद माँगी, उसके साथ उसकी दूसरी बहन ने भी भाई राहुल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

उसके पिता की पहले ही मौत हो चुकी है। पिता की मौत के बाद माँ का भी दिमागी संतुलन बिगड़ गया। तब बड़े भाई राहुल ने पूरे घर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। मई 2023 में वह अपने दोस्त एजाज की बीवी रूबिया को घर ले आया। वह उसके कहने पर हिंदुओं की तरह श्रृंगार करती है और राहुल उसके कहने पर मजार जाता है।

वह घर के लोगों पर भी ऐसा करने का दबाव डालता है। उसकी छोटी बहन राधिका ने इसका विरोध किया तो उसको बीमार बताकर वह मौलाना के पास ले गया। वह ये सब झेल नहीं पाई और एक साल बाद मई 2024 में उसकी मौत हो गई।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, रीतिका का कहना है, “राधिका की मौत के बाद भाई अब मुझे भी दुआ-ताबीज बाँधने को कहता है। विरोध करने पर भाई-भाभी मिलकर मेरे साथ मारपीट करते हैं। तमाम मौलाना घर में आते हैं। भाई उनसे जबरन बात करने और करीब जाकर बैठने का दबाव बनाता है। मुझे मुस्लिम बनाने पर भाई आमादा है, लेकिन मुझे मुस्लिम नहीं बनना है।”

वहीं रीतिका की बहन कंचन ने बताया कि उसकी शादी 4 साल पहले राजस्थान के जयपुर में हुई थी तब से वह मायके 2-3 बार ही आई है। उसका कहना है कि भाई ने माँ को पिता की मौत के बाद पागल बना दिया और खुद अपराधी बन गया है।

एहसान चुकाने के लिए दोस्त की बीवी रूबिया को पत्नी की तरह ले आया घर

कंचन के अनुसार, राहुल की संगत अपराधियों के साथ थी। साल 2021 में वह दारागंज इलाके मे हुई एक बमबाजी की घटना में भी शामिल था, तब पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर जेल भेज दिया था। राहुल ने जेल से बाहर आकर परिवार को बताया कि उसके दोस्त एजाज की वजह से ही वह बाहर आ सका है। इसलिए अब वह उसके लिए कुछ भी करेगा।

कंचन ने कहा, “भाई ने इसके बाद एजाज के परिवार की मदद करनी शुरू कर दी। करीब 2 साल बाद भी एजाज जेल से बाहर नहीं आ सका, लेकिन उसकी पत्नी रूबिया जरूर भाई राहुल की जिंदगी मे आ गई। वह अब उनके घर में राहुल के साथ रहती है।”

बहन कंचन ने बताया कि राहुल ने पूरे घर को मजार में बदल दिया है। रीतिका और कंचन के दो भाई कुणाल और रजत भी हैं। रीतिका पर राहुल के दबाव और मारपीट को देखकर रजत ने राहुल पर तमंचे से गोली चला दी थी। जिसके बाद से वह जेल में बंद है।

दूसरे भाई कुणाल ने बताया कि राहुल ने छोटी बहन से पहले उसको भी मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए अपने साथ दरगाह ले गया था। उसकी इन हरकतों से तंग आकर वह घर छोड़कर दिल्ली चला गया था, लेकिन राधिका की मौत के बाद उसे वापस आना पड़ा।

कुणाल के मुताबिक, राहुल अब रितिका का धर्मांतरण कराकर कलकत्ता के किसी मौलाना को भेजने की कोशिश में है। विरोध करने पर वह सब भाई-बहनों को पीटता है। उसने घर में तमंचा भी रखा है। उसके साथ उसके गुंडे दोस्तों का पूरा गैंग है। पुलिस ने भी शिकायत के बाद कार्रवाई नहीं की।

पड़ोसियों का भी यहीं कहना है कि वह पूरी तरह से अपराधी बन चुका है। थाना कैंट के प्रभारी इंस्पेक्टर के अनुसार, “राहुल कुशवाहा अपराधी किस्म का व्यक्ति है। पुलिस के रिकार्ड मे वह दारागंज थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश है। चोरी, बमबाजी, राहजनी और गैंगस्टर जैसे मुकदमे उसके ऊपर दर्ज हैं।”

इंस्पेक्टर ने कहा, “उसकी बहन ने अपने भाई के खिलाफ थाना पुलिस मे प्रताड़ित करने व अश्लीलता करने जैसे आरोप लगा कर प्रार्थना पत्र दिया था। जाँच में उत्पीड़न की बात सामने आई थी। बदमाश राहुल की तलाश कराई जा रही है।”

यूँ ही सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार ने नहीं कहा- इससे पैदा होगी संवैधानिक अराजकता, राष्ट्रपति ने भी ‘डेडलाइन’ पर पूछे थे 14 सवाल: जानिए क्या है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हुए विधेयकों की मंजूरी देने की डेडलाइन तय की थी। अब इस पर केंद्र सरकार ने गंभीर चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने बीते अप्रैल में राष्ट्रपति द्वारा बिल की मंजूरी के लिए 3 महीने की समयसीमा तय की थी जिस पर सरकार ने ‘संवैधानिक अराजकता’ की स्थिति पैदा होने की चेतावनी दी है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं हैं। जिसके बाद खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले को लेकर 14 गंभीर सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर सुनवाई से पहले केंद्र और राज्य सरकारों से अपना जवाब देने को कहा था।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ 19 अगस्त से इस मामले की सुनवाई करने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना लिखित जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने कहा कि ऐसी समयसीमाएँ सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों का हड़पना होगा जो उसे नहीं दी गई हैं।

सरकार ने कहा कि इसके चलते शक्तियों का पृथक्करण बिगड़ जाएगा। सरकार ने चेतावनी दी कि इसके चलते ‘संवैधानिक अराजकता‘ की स्थिति पैदा होगी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने बयान में कहा, “अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सर्वोच्च न्यायालय संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या या संविधान बनाने वालों की मंशा के खिलाफ नहीं जा सकता। जब तक संविधान के लिखित नियमों में कोई तय प्रक्रिया मौजूद ना हो।”

मेहता ने कहा कि राज्यपाल की सहमति की प्रक्रिया लागू करने में कुछ छोटी-मोटी दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि राज्यपाल जैसे ऊँचे पद को घटाकर एक छोटे या अधीनस्थ पद की तरह बना दिया जाए।

मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद अपने आप में ‘पूर्ण राजनीतिक’ पद हैं और ये लोकतांत्रिक शासन के ऊँचे आदर्शों के प्रतीक हैं। यानी इन्हें संपूर्ण राजनीतिक वैधता मिली हुई है। उन्होंने कहा कि अगर कभी इन पदों से जुड़ी कोई गड़बड़ी नजर आती है तो उसका समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए ना कि अदालत के जरूरत से ज्यादा दखल से।

सरकार ने आगे बताया कि अनुच्छेद 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वे किसी बिल पर विचार करने में पूरी स्वतंत्रता रखें और उन्हें किसी निश्चित समयसीमा का पालन करना जरूरी नहीं है। समयसीमा ना होना जान-बूझकर और सोच-समझकर संविधान में रखा गया एक विशेष नियम है।

संविधान में कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं बताई गई है जिससे बिना संविधान में बदलाव किए इन सीमाओं को लागू कर सके। संविधान में बदलाव करना केवल संसद की विशेष शक्ति है जो अनुच्छेद 368 के तहत ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति ने पूछे थे 14 सवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े कुछ अहम सवाल पूछे थे। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ बनाई है।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास ये सवाल भेजे थे। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की इजाजत देता है।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था-

  1. जब राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत कोई बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या संवैधानिक विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

सुप्रीम कोर्ट का क्या था फैसला?

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने राज्यपाल RN रवि के उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी ना देने के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में इस पर सुनवाई की। तमिलनाडु की सरकार की दलील थी कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा 2 बार पारित किए जाने के बावजूद विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लटका रखा है।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी और साथ ही राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।

राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लंबे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

जब कोई विधेयक संसद या विधानसभा में पास हो जाता है, तो इसे लागू करने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है। ‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और कानून नहीं बनता।

राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।

राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।

दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने उठाया था।

उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदाहरण था।

क्यों SC का फैसले बताया जा रहा न्यायिक दखल?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही न्यायिक दखल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। संविधान से इतर जाकर देश के प्रमुख के ऊपर समयसीमा लगाने को लेकर कई कानूनविदों ने इस पर सवाल उठाए थे।

पूर्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की थी। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट के ‘सुपर संसद’ के रूप में काम करने तक का दावा कर दिया था।

केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि विधेयकों पर कार्यपालिका को समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के लिए कहना संविधान में ना तो दिया गया है और ना ही इसकी भावना निहित है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता राजन सिंह ने चेताया था कि ऐसे फैसलों से न्यायपालिका सरकार की कार्यप्रणाली में बहुत गहराई तक दखल कर सकती है और अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल से भविष्य में अप्रत्याशित परिणाम भी हो सकते हैं।

संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं, जैसा केंद्र सरकार ने भी अपने जवाब में बताया है। कुछ समय पहले की बात है जब चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

कानूनविद मानते हैं कि न्यायपालिका में जवाबदेही के अभाव के चलते ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जहाँ अधिक न्यायिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं और अब कुछ दिनों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी तो देखना होगा कि कोर्ट अपने फैसले को लेकर क्या रुख रखता है।

10 साल में 24.6% की रेट से बढ़े मुस्लिम, जानिए कैसे घुसपैठ से बदल रहा भारत: किन राज्यों में संकट गंभीर, क्यों PM मोदी लेकर आए ‘हाई-पावर डेमोग्राफी मिशन’?

स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2025) को जब पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से एक अहम बात कही। उन्होंने कहा कि देश की जनसंख्या की बनावट यानी जनसांख्यिकी को लेकर एक बड़ा खतरा सामने आ रहा है। पीएम मोदी ने बताया कि सीमावर्ती इलाकों में यह बदलाव तेजी से हो रहा है और यह सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोग एक साजिश के तहत देश की जनसांख्यिकी को बदलना चाहते हैं। यह सिर्फ जनसंख्या का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल है। उन्होंने बताया कि घुसपैठिए देश में आकर न सिर्फ भारत के युवाओं की नौकरी और रोज़गार छीनते हैं, बल्कि देश की बहनों और बेटियों को भी निशाना बनाते हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि ये लोग भोले-भाले जनजातीय लोगों को धोखा देकर उनकी जमीन भी हड़प लेते हैं। यह सब कुछ सोच-समझकर किया जा रहा है और अगर समय रहते इसे रोका नहीं गया तो यह भारत के भविष्य के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है। इसी के साथ पीएम मोदी ने ‘उच्च-शक्ति जनसांख्यिकी मिशन‘ की शुरुआत का ऐलान किया, ताकि इस खतरे का मुकाबला किया जा सके। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश अब यह सब और बर्दाश्त नहीं करेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में एक बहुत गंभीर बात कही। उन्होंने कहा कि अगर देश के सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या की बनावट बदलती है तो यह सिर्फ सामाजिक मुद्दा नहीं होता, यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने देश के इलाके पर घुसपैठियों को कब्जा करने दे।

यह बात उन्होंने ऐसे समय में कही जब केंद्र सरकार पहले से ही बांग्लादेशी और रोहिंग्या जैसे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ पूरे देश में अभियान चला रही है। खासकर सीमावर्ती राज्यों में ये लोग तेजी से बसते जा रहे हैं, जिससे स्थानीय आबादी और सुरक्षा दोनों पर असर पड़ रहा है।

केंद्र सरकार ने इन अवैध प्रवासियों का पता लगाने, उन्हें हिरासत में लेने और वापस भेजने के लिए ‘ऑपरेशन पुशबैक‘ शुरू किया है। इसी बीच यह नया जनसांख्यिकी मिशन इस संकट के प्रति सरकार की गंभीरता को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि यह खतरा सिर्फ बाहरी घुसपैठियों तक सीमित नहीं है। भारत के भीतर भी कुछ संगठन और समूह देश की धार्मिक बनावट को बदलने में लगे हुए हैं। जैसे, कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मांतरण के लिए विदेशी पैसों से काम कर रहे हैं। छांगुर पीर जलालुद्दीन जैसे लोग इसमें शामिल पाए गए हैं। वहीं, कुछ ईसाई मिशनरी भी ‘प्रार्थना सभा‘ के नाम पर गरीब लोगों को धर्म बदलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने इन सब बातों को जोड़ते हुए देश को चेतावनी दी कि अब समय आ गया है कि इस तरह की साजिशों को रोका जाए। वरना जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई मुश्किल होगी।

असम और बंगाल में बढ़ते घुसपैठिए

जनसंख्या में यह बदलाव सिर्फ गैर-कानूनी तरीके से आए लोगों की वजह से नहीं हो रहा है। इसके पीछे कुछ स्थानीय कारण भी हैं, जैसे कि अलग-अलग मजहबों के लोगों के बीच बच्चे पैदा करने की दर में अंतर।

असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर कार्रवाई– असम में भारत और बांग्लादेश की सीमा खुली है, जिसकी वजह से बहुत से अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुस पाते हैं। ये लोग आधार कार्ड, राशन कार्ड आदि जैसे नकली कागजात बनवाकर भारत में ही रहने लगते हैं।

ऐसे में भाजपा सरकार असम में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने के लिए सख्त कदम उठा रही है। साल 2019 में, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया में असम के 19 लाख लोगों को रजिस्टर से बाहर कर दिया गया था। इसका मतलब है कि ये लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए थे।

2011 की जनगणना के मुताबिक, असम में मुस्लिमों की आबादी 2001 के 30.9% से बढ़कर 34% हो गई है। इसी कारण, धुबरी, बारपेटा और गोलपाड़ा जैसे जिले मुस्लिम-बहुल बन गए हैं।

पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में अवैध घुसपैठियों की समस्या- पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी की अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। इस घुसपैठ के कारण उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार (TMC) पर आरोप लगते रहे हैं कि वह राजनीतिक फायदे के लिए इन अवैध मुस्लिम घुसपैठियों के साथ सख्ती से पेश नहीं आती है। पश्चिम बंगाल के अलावा, त्रिपुरा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी अवैध प्रवासियों के आने की समस्या देखी गई है।

भारत में धार्मिक जनसंख्या में बदलाव पर रिचर्स

एक रिसर्च पेपर के अनुसार, भारत की धार्मिक पॉपुलेशन की संरचना में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। इस स्टडी को इकोनॉमिस्ट और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य प्रोफेसर शमिका रवि और उनके साथियों ने मिलकर किया है। इस स्टडी में 2001 से 2011 तक की जनगणना के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें भारत के 640 जिलों की धार्मिक स्ट्रक्चर को देखा गया।

2001 से 2011 के बीच भारत की जनसंख्या में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। इस दौरान देश की कुल जनसंख्या 17.7% बढ़ी। इस वृद्धि के बावजूद, धार्मिक-मजहबी समूहों की जनसंख्या बढ़ने की गति अलग-अलग रही। सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला समूह मुस्लिमों का था, जिनकी जनसंख्या 24.6% बढ़ी। वहीं, जैन समुदाय की जनसंख्या सबसे धीमी गति से बढ़ी, जो केवल 5.4% थी।

इस दशक में, भारत की कुल आबादी में हिंदुओं का हिस्सा थोड़ा कम हो गया। यह 2001 में 80.46% से घटकर 2011 में 79.8% हो गया। इसके विपरीत, मुस्लिमों का हिस्सा 13.43% से बढ़कर 14.23% हो गया। एक और दिलचस्प बात यह सामने आई कि जिन लोगों ने जनगणना में अपना धर्म नहीं बताया, उनकी संख्या तीन गुना से ज़्यादा बढ़ गई। इससे पता चलता है कि समाज में कुछ और बदलाव भी हो रहे हैं, जिनका संबंध धार्मिक पहचान बताने से नहीं है।

पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ और कुछ जिलों में मुस्लिम पॉपुलेशन में बढ़ोतरी के कारण जनसांख्यिकी में बदलाव देखा गया है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में मुस्लिम पॉपुलेशन हिंदू पॉपुलेशन की तुलना में तेजी से बढ़ी है। यह सिर्फ एक प्राकृतिक बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि सीमा पार से हो रही अवैध घुसपैठ भी इसमें एक बड़ा कारण है।

इस बदलाव के कारण, कुछ जिलों में हिंदुओं की आबादी एक प्रतिशत से ज़्यादा घट गई है, जो राष्ट्रीय स्तर पर आबादी में होने वाले बदलाव की तुलना में काफी ज़्यादा है। यह स्थिति राज्य के इन हिस्सों में सामाजिक और राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर रही है।

असम के कई जिलों में मुस्लिमों की आबादी पहले से ज़्यादा हो गई है। खासकर वे जिले जो बांग्लादेश की सीमा के पास हैं, वहाँ यह बढ़ोतरी साफ देखी गई है। धुबरी, बारपेटा, ग्वालपाड़ा और मोरीगाँव जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि कई कारणों से धीरे-धीरे हुआ है।

एक बड़ा कारण अवैध प्रवासन है। बांग्लादेश से लोग बिना अनुमति के सीमा पार करके असम में आते रहे हैं। इनमें ज़्यादातर लोग मुस्लिम समुदाय से होते हैं। इसके अलावा कुछ जगहों पर धर्मांतरण भी हुआ है, जिससे मुस्लिम आबादी और बढ़ी है।

इस बदलाव से स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ी है। उन्हें लगता है कि इससे उनकी पहचान और जीवनशैली पर असर पड़ेगा। बहुत से लोगों को डर है कि कहीं उनकी संस्कृति और धर्म खतरे में न पड़ जाए। साथ ही, रोज़गार और ज़मीन जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ने की भी आशंका है। इस वजह से लोगों में नाराज़गी और असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

अगर हम भारत के अलग-अलग जिलों में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई आबादी के बढ़ने की रफ्तार देखें, तो हमें कुछ खास बातें पता चलती हैं। एक शोध में यह पाया गया कि 458 जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 18% से ज़्यादा थी। यह देश के कुल जिलों का 72% है।

इसके मुकाबले, हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 268 जिलों (42%) में 18% से ज़्यादा थी, जबकि ईसाइयों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 417 जिलों (65%) में 18% से ज़्यादा पाई गई।

यह भी देखा गया कि 79 जिलों में ईसाइयों की आबादी कम हुई, जबकि हिंदुओं के मामले में यह संख्या 50 और मुस्लिमों के लिए 28 थी। इसके अलावा, शोध में यह भी पता चला कि 238 जिलों में ईसाई आबादी 50% से भी ज़्यादा बढ़ी। हिंदुओं के लिए यह संख्या केवल 23 और मुस्लिमों के लिए 55 थी।

एक अध्ययन में 2001 से 2011 तक के बीच ईसाइयों, हिंदुओं और मुस्लिमों की आबादी में आए बदलावों को ध्यान से देखा गया। इस दौरान यह देखा गया कि देश के ज़्यादातर जिलों में मुस्लिम आबादी का हिस्सा बढ़ा है। कुल 80% जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या का अनुपात पहले से ज़्यादा हो गया है।

हिंदुओं की बात करें तो केवल 27% जिलों में ही उनकी आबादी का हिस्सा बढ़ा है। ईसाई आबादी का हिस्सा 69% जिलों में बढ़ा। यानी ईसाई और मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या ज़्यादातर जिलों में बढ़ी है, जबकि हिंदुओं की अपेक्षाकृत कम जिलों में।

अगर आबादी के हिस्से में बढ़ोतरी को थोड़ा गहराई से देखें, तो पाया गया कि 150 जिलों में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 0.8% से ज़्यादा बढ़ा है। हिंदुओं के लिए यह बढ़त केवल 60 जिलों में हुई और ईसाइयों के लिए सिर्फ 50 जिलों में। इसका मतलब है कि सबसे तेज़ बढ़ोतरी मुस्लिम आबादी में हुई है।

अब गिरावट की बात करें तो 227 जिलों में हिंदुओं की आबादी का हिस्सा 0.7% से ज़्यादा घट गया है। वहीं, मुस्लिमों की आबादी में ऐसी गिरावट सिर्फ 24 जिलों में और ईसाइयों की सिर्फ 32 जिलों में दर्ज की गई है।

पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में ईसाई आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह बदलाव साफ देखा गया है। 2001 से 2011 के बीच, देश के 238 जिलों में ईसाई आबादी में 50% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है। इन इलाकों में ईसाई मिशनरियाँ काफी सक्रिय रही हैं। कहा जाता है कि वे गरीब और गैर-ईसाई जनजातीय लोगों को आर्थिक मदद, नौकरी, शिक्षा और इलाज का वादा देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रही हैं।

दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में हिंदुओं की आबादी में गिरावट देखी गई है। यही हाल उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में भी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक के तटीय जिले और केरल का मालाबार क्षेत्र भी इस बदलाव का हिस्सा रहे हैं। यहाँ भी हिंदू आबादी कम हुई है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच के जिलों में भी हिंदू आबादी में कमी आई है।

पेपर में यह भी बताया गया है कि कुछ खास इलाकों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है, जैसे- महाराष्ट्र के बीच के जिले, कर्नाटक और मालाबार के तटीय इलाके और पश्चिम बंगाल व असम के पूर्वी जिले। यहाँ मुस्लिम आबादी के अनुपात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इन सब बातों को अगर एक नक्शे में देखें तो भारत में धर्म के आधार पर जनसंख्या में जो बदलाव आ रहे हैं, वो चिंता पैदा करने वाले हैं। यह दिखाता है कि कुछ जगहों पर जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदल रहा है और इससे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

इस विश्लेषण में यह बताया गया है कि भारत में धार्मिक बदलाव सिर्फ राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर देखने से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। जिला स्तर पर जो बदलाव हो रहे हैं, वे कई बार नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। जबकि असली बदलाव वहीं से शुरू होते हैं।

धार्मिक जनसंख्या में जो परिवर्तन होता है, वह केवल यह नहीं दिखाता कि कितने लोग बढ़े हैं। यह भी देखना जरूरी होता है कि किस धर्म की आबादी कितनी तेजी से बढ़ रही है। यानी बात केवल कुल संख्या की नहीं, बल्कि बढ़ने की रफ्तार की भी है।

साथ ही, यह बात भी मायने रखती है कि किसी जिले में किसी धर्म की शुरूआती हिस्सेदारी कितनी थी। अगर किसी धर्म की जनसंख्या पहले से कम थी, लेकिन वह तेजी से बढ़ी तो उसका असर ज्यादा दिखाई देगा। इसलिए धार्मिक बदलाव को समझने के लिए सिर्फ बड़ी तस्वीर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे इलाकों की स्थिति को भी ध्यान से देखना जरूरी है।

जनवरी 2025 में एक रिपोर्ट आई थी जिसे सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़ (CPS) नाम के थिंक-टैंक ने जारी किया था। इसमें बताया गया कि भारत के कई राज्यों में धर्म के आधार पर जनसंख्या का संतुलन बदल रहा है। खासकर केरल में यह बदलाव साफ दिखता है। केरल में मुस्लिमों की जनसंख्या 2011 में 27% थी, लेकिन 2015 के बाद पैदा होने वाले बच्चों में उनकी हिस्सेदारी हिंदुओं से ज़्यादा हो गई।

2019 में केरल में जितने बच्चों का जन्म हुआ, उनमें 44% मुस्लिम थे और 41% हिंदू। यह बदलाव अचानक नहीं आया। 2008 से 2021 के बीच मुस्लिमों की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ती गई। कई सालों में तो उनकी हिस्सेदारी हिंदुओं से ज़्यादा हो गई। वहीं, ईसाइयों की हिस्सेदारी भी कम होती गई।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 2008 से 2019 के बीच मुस्लिमों की हिस्सेदारी 36% से बढ़कर 44% हो गई। इसी दौरान हिंदुओं की हिस्सेदारी 45% से घटकर 41% और ईसाइयों की 17% से घटकर 14% रह गई। इसका मतलब है कि जन्म के आँकड़ों में मुस्लिमों की संख्या, उनकी कुल जनसंख्या से कहीं ज्यादा है। यानी उनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है।

एक और अध्ययन प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने किया था। इसमें बताया गया कि 1950 से 2015 के बीच, भारत में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84% से घटकर 78% हो गई। वहीं, मुस्लिमों की हिस्सेदारी 9.8% से बढ़कर 14% हो गई। यानी मुस्लिमों की आबादी में बहुत तेज बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही ईसाई और सिख आबादी भी थोड़ी बढ़ी है।

ये सारे आँकड़े दिखाते हैं कि मुस्लिमों की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। जबकि हिंदुओं की कुल मिलाकर घट रही है। भारत की कुल प्रजनन दर अब 2 से भी कम हो गई है और कुछ राज्यों में यह और भी नीचे है। यह जनसंख्या संतुलन के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।

इस बदलाव के पीछे धर्मांतरण, लालच और अन्य सामाजिक दबावों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया गया एक रणनीतिक बदलाव है। इसलिए यह विषय सिर्फ आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

बदलती जनसांख्यिकी: भारत की संस्कृति, सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता पर गहराता संकट

यह बात शायद बार-बार सुनने को मिलती है, लेकिन सच यही है कि ‘जनसांख्यिकी’ यानी लोगों की संख्या और उनकी बनावट बहुत मायने रखती है। इतिहास में देखा गया है कि जहाँ भी हिंदू लोग कम हो गए, वहाँ धर्मनिरपेक्षता यानी सभी धर्मों को समान मानने की नीति खत्म हो गई। भारत का जो धर्मनिरपेक्ष स्वभाव है, वह इसलिए बना हुआ है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं।

जब जनसंख्या में बदलाव होता है, जैसे सीमाओं के पास अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिए आने लगते हैं या मुस्लिमों की संख्या जल्दी बढ़ने लगती है तो इससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। कई बार ये अवैध लोग सीमा पार तस्करी करते हैं, हिंसा फैलाते हैं और धर्म परिवर्तन भी कराते हैं। साथ ही, वे स्थानीय लोगों की नौकरियाँ, आजीविका और संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं। इससे भारत के अपने लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं और उनका भविष्य खतरे में आ जाता है।

इसके अलावा, जिन इलाकों में मुस्लिम ज्यादा हैं, वहाँ हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुँचाने की कई घटनाएँ हुई हैं। इन घटनाओं में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा गया और मंदिरों के पास गायों के सिर और बाकी हिस्से भी फेंके गए। जैसे, जून 2025 में धुबरी में हनुमान मंदिर में बकरीद के बाद गाय का कटा हुआ सिर मिला था।

जनसंख्या में इन बदलावों से भारत की संस्कृति को भी खतरा है। त्रिपुरा में देखा गया है कि वहाँ की हिंदू जनजातीय आबादी, मुस्लिमों के मुकाबले कमजोर हो गई है। इन बदलावों के कारण हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भी बढ़ रही है। अपनी ताकत दिखाने के लिए मस्लिम मंदिरों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, गोहत्या कर रहे हैं और भीड़ बनाकर हिंदुओं पर हमला कर रहे हैं।

कई जगहों पर ऐसा देखा गया है कि जहाँ मुस्लिम आबादी बहुत अधिक है, वहाँ हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम लोग खुलकर अपने त्योहार या परंपराएँ नहीं निभा पाते। ऐसे इलाके ‘मुस्लिम क्षेत्र’ जैसे बन जाते हैं, जहाँ बाकी समुदायों को डर लगता है।

कई बार ऐसा हुआ है कि हिंदू लोग जब अपने धार्मिक जुलूस लेकर मुस्लिम इलाकों से गुजरे तो उन पर पथराव हुआ। कुछ मामलों में तो मस्जिदों से ऐलान कर लोगों को जमा किया गया और फिर भीड़ ने हमला किया। सिर्फ त्योहार ही नहीं, अगर कोई हिंदू क्रिकेट मैच जीतने की खुशी मना रहा हो, तब भी उस पर हमला कर दिया गया।

ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग कई बार हुई है। रामनवमी, हनुमान जयंती, कावड़ यात्रा जैसे धार्मिक कार्यक्रमों के समय हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। यहाँ तक कि जब देश ने क्रिकेट विश्व कप जीता या किसी फिल्म में इस्लामी हमलावरों को सच दिखाया गया, तब भी प्रतिक्रिया हिंसक रही। इन घटनाओं से पता चलता है कि कुछ लोगों को दूसरों की धार्मिक अभिव्यक्ति या जीत की खुशी भी सहन नहीं होती।

धार्मिक जनसंख्या में बदलाव धीरे-धीरे होता है। लेकिन इसके असर बहुत गहरे और दूरगामी होते हैं। कई जगहों पर देखा गया है कि जहाँ मुस्लिमों की संख्या ज़्यादा हो गई, वहाँ हिंदू त्योहारों को खुलेआम मनाने में दिक्कत आने लगी। जैसे होली, दिवाली, दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव जैसे त्योहारों पर आपत्ति जताई गई। कई बार हिंदुओं को धमकाया गया, मारा गया या दबाव डाला गया कि वे अपने त्योहार न मनाएँ।

ऐसा सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में ही नहीं, बल्कि मिली-जुली आबादी वाले क्षेत्रों में भी हुआ है। ये घटनाएँ बताती हैं कि कुछ इलाकों में धार्मिक असहिष्णुता इतनी बढ़ गई है कि लोग डरकर जीने लगे हैं।

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक बड़ा उदाहरण मिला। वहाँ एक मस्जिद के सर्वे को लेकर बड़ा हंगामा हुआ। कहा गया कि वह मस्जिद असल में एक पुराना हरिहर मंदिर था। उस इलाके में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। वहाँ के कई हिंदू मंदिर अब सुनसान और बंद पड़े हैं। वजह ये है कि मुस्लिमों ने उन इलाकों में धीरे-धीरे कब्जा कर लिया और हिंदू समुदाय को या तो वहाँ से हटना पड़ा या चुपचाप रहना पड़ा।

जब किसी जगह पर मुस्लिमों की आबादी ज़्यादा हो जाती है, तो वहाँ की राजनीति भी बदलने लगती है। मुस्लिम आमतौर पर एकजुट होकर वोट करते हैं। इसलिए कई राजनीतिक पार्टियाँ उनका समर्थन पाने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करने लगती हैं। इससे इस्लामवादियों को ताकत मिलती है। उन्हें लगता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि उनके पीछे राजनीतिक ताकत खड़ी है।

हिंदू या दूसरे गैर-मुस्लिम समुदाय इतनी एकता से वोट नहीं करते। इसलिए उनका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। जैसे-जैसे जनसंख्या में बदलाव होता है, वैसे-वैसे चुनाव के नतीजे भी बदल जाते हैं। जो समुदाय ज़्यादा होता है, उसका प्रतिनिधित्व बढ़ जाता है और बाकियों की आवाज दब जाती है।

ऐसा पहले भी हो चुका है। आजादी से पहले बंगाल और पंजाब जैसे इलाकों में मुस्लिमों की आबादी बढ़ी। वहाँ सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ने लगे। इस माहौल का फायदा मुस्लिम लीग ने उठाया। उन्होंने माँग की कि मुसलमानों को अलग से चुनाव में सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवारों को ही वोट देने का अधिकार मिले।

अंग्रेजों ने इस माँग को मान लिया। उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधारों के जरिए मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचिकाएँ बन गईं। फिर 1935 में भारत सरकार अधिनियम के जरिए इन्हें और बढ़ा दिया गया। इस तरह मुस्लिमों को खास राजनीतिक अधिकार मिल गए, जबकि हिंदुओं को ऐसा कुछ नहीं मिला। यही चीज़ें बाद में भारत के बँटवारे की वजह बनीं।

1876 में सैयद अहमद खान ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ का विचार सामने रखा था। इसका मतलब था कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। यानी वे एक साथ नहीं रह सकते। यह सोच मुस्लिमों के बीच अलगाव की भावना को जन्म देती गई। जब बाद में मुस्लिमों को पृथक निर्वाचिका यानी अलग से सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट देने का अधिकार मिला तो इस सोच को और मजबूती मिली।

इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को खास सम्मान नहीं दिया जाता। मूर्ति पूजने वाले हिंदुओं को तो ‘मुशरिक’ यानी सबसे बड़ा पापी कहा गया है। इसलिए अगर कुछ मुस्लिम हिंदुओं, सिखों या दूसरे गैर-मुस्लिमों को पसंद नहीं करते तो यह बहुत चौंकाने वाली बात नहीं है। मुस्लिम लीग ने इस सोच का फायदा उठाया। उन्हें जो राजनीतिक अधिकार मिले थे, उनका इस्तेमाल भारत को बाँटने की माँग करने में किया गया। इससे देश में अलगाव की भावना और बढ़ गई।

आज कई लोग कहते हैं कि 1947 में भारतीय मुस्लिमों ने भारत को चुना, पाकिस्तान को नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि 1946 के चुनावों में ज़्यादातर मुस्लिमों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया था। मुस्लिम लीग उस समय एक अलग इस्लामी देश की माँग कर रही थी। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए मुसलमानों को आजादी के बाद अपना अलग देश चाहिए। यही माँग बाद में पाकिस्तान के निर्माण की वजह बनी।

1946 में जब भारत आज़ादी की दहलीज पर खड़ा था, तब मुस्लिम लीग ने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लिया। उस साल हुए प्रांतीय चुनावों में उन्होंने कुल 87% मुस्लिम सीटें जीत लीं। यह दिखाता है कि ज़्यादातर मुसलमान उस समय लीग के साथ थे, जो भारत को धर्म के आधार पर बाँटकर एक अलग इस्लामी देश की माँग कर रही थी।

इसी सोच के तहत जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया। इसके बाद देश में हिंसा भड़क गई। जगह-जगह खून बहा, बलात्कार हुए, आगजनी हुई और चारों तरफ अराजकता फैल गई। लाखों निर्दोष लोग मारे गए और इन्हीं लाशों के ऊपर पाकिस्तान बना।

इस इतिहास को याद करना जरूरी है क्योंकि आज भी कई जगह वही सोच फिर से दिखने लगी है। जहाँ कहीं मुस्लिमों की आबादी ज़्यादा हो जाती है, वहाँ वे अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश करते हैं। चाहे वह कोई छोटी बस्ती हो या कोई पूरा इलाका। कई बार वे सरकार पर दबाव बनाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं, जैसा हाल ही में वक्फ विधेयक के विरोध के दौरान देखा गया, जहाँ हिंदुओं को निशाना बनाया गया। कुछ जगहों पर वे आरक्षण जैसी विशेष माँगें भी करने लगते हैं।

विभाजन का घाव आज भी भारत के मन में ताजा है। खासकर हिंदू समाज अब ऐसी किसी भी सोच या योजना को स्वीकार नहीं कर सकता, जो भारत की एकता और अखंडता को चोट पहुँचाए। देश के कुछ मुस्लिम बहुल इलाके अब ‘मिनी पाकिस्तान’ जैसे बनते जा रहे हैं, जहाँ देश की मुख्यधारा से अलग सोच हावी होती दिखती है। यही चिंता का विषय है।

जब भारत कोई बड़ा क्रिकेट मैच जीतता है, तो देशभर में लोग खुशी मनाते हैं। लेकिन कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में जब हिंदू लोग जीत का जश्न मनाते हैं तो उन पर हमला किया जाता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर हिंसा की। इसी तरह, कई जगहों पर जब हिंदू अपने त्योहार जैसे दीवाली, होली या रामनवमी मनाते हैं तो मुस्लिम समुदाय उसका विरोध करता है। लेकिन इसके बावजूद, अक्सर यह दिखाया जाता है कि मुस्लिम ही पीड़ित हैं, जबकि सच्चाई उलटी होती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जनसंख्या में हो रहे बदलाव को लेकर जो चिंता जताई है, वह सही है। 2021 में एक सर्वे हुआ था जिसमें 74% भारतीय मुस्लिमों ने कहा था कि वे भारत के कानूनों से ज़्यादा शरिया कानून को मानते हैं। यह दिखाता है कि बहुत से मुस्लिम भारत की न्याय व्यवस्था से खुद को नहीं जोड़ते। उनकी सोच मुख्य समाज से अलग है। अगर मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ती रही तो इसका सबसे बुरा असर हिंदुओं पर पड़ेगा।

बांग्लादेश में जब हाल ही में सरकार बदली और चरमपंथी ताकतें मज़बूत हुई तो वहाँ हिंदुओं पर हमले शुरू हो गए। यही हाल भारत के कुछ हिस्सों में भी देखने को मिला, जैसे मुर्शिदाबाद, जहाँ वक्फ कानून का विरोध करते समय हिंदुओं पर हमला हुआ। इन सभी घटनाओं में एक बात साफ है कि ‘जब मुस्लिम प्रभुत्व बढ़ता है तो सबसे पहले हिंदू समुदाय को ही उसका शिकार बनना पड़ता है।’

भारत का विभाजन सिर्फ जमीन का बँटवारा नहीं था, यह सोच और विचारधारा का भी टकराव था। उस समय, कई मुस्लिमों ने हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार किए, लेकिन खुद को दुनिया के सामने पीड़ित बताने की कोशिश की। यह सब इस्लामी सोच से प्रेरित था, जिसमें वे अपने मजहब को दूसरों से ऊँचा मानते थे। दुर्भाग्य से, उस समय भारत के धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने इस कट्टरपंथी सोच के सामने झुकाव दिखाया। इसी झुकाव के कारण भारत का बँटवारा हुआ।

अब भारत अपनी आज़ादी की 79वीं सालगिरह मना रहा है। इतने सालों में भारत ने हर क्षेत्र में प्रगति की है और तकनीक, शिक्षा, सेना, अर्थव्यवस्था, हर जगह आगे बढ़ा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान एक असफल देश बनकर रह गया, जिसका 1971 में खुद ही बँटवारा हो गया और बांग्लादेश बना।

लेकिन चिंता की बात यह है कि अगर भारत की जनसंख्या की बनावट यानी जनसांख्यिकी बदली गई तो हमारी सारी तरक्की व्यर्थ हो जाएगी। अगर मुस्लिम आबादी कुछ इलाकों में बहुत ज़्यादा बढ़ती गई और अवैध प्रवासियों को समय पर रोका नहीं गया तो देश का सामाजिक संतुलन बिगड़ जाएगा।

सरकार ने इस पर ध्यान देना शुरू किया है। एक जनसांख्यिकी मिशन की शुरुआत की गई है। इसके साथ-साथ जरूरी है कि अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर निकाला जाए। साथ ही, जो लोग हिंदुओं, सिखों या अन्य गैर-मुस्लिमों का जबरन धर्मांतरण कराना चाहते हैं, उनके खिलाफ सख्त कानून बने और लागू हों।

आज भारत धर्मनिरपेक्ष है, यानी हर धर्म को बराबरी दी जाती है। लेकिन यह इसलिए संभव है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्या में हैं। अगर हिंदू ही कम हो गए तो भारत का चेहरा भी बदल जाएगा। फिर यह देश वैसा नहीं बचेगा, जैसा आज है, बल्कि यह एक और पाकिस्तान बनने की दिशा में बढ़ सकता है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

न खुदा मिला, न विसाल-ए-सनम… बिना सीजफायर-बिना डील के खत्म हो गई अलास्का में ट्रंप-पुतिन की बैठक: अमेरिकी राष्ट्रपति ने जेलेंस्की पर डाला ‘शांति’ का जिम्मा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अलास्का के एंकोरेज में शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को हुई बैठक रूस-यूक्रेन संघर्ष पर बिना किसी ठोस समझौते के खत्म हो गई।

हैरानी की बात यह रही कि दोनों देशों के बीच पुराने दुश्मनी भरे रिश्तों के बावजूद इस मुलाकात के दौरान ट्रंप और पुतिन के बीच काफी गर्मजोशी दिखी। इससे पहले ट्रंप ने रूस को धमकी दी थी कि अगर उसने यूक्रेन के साथ युद्धविराम नहीं किया तो अमेरिका उस पर कड़े प्रतिबंध लगाएगा।

ट्रंप का रूस को लेकर रुख अधिकतर आक्रामक ही रहा है इसलिए पुतिन का उन्होंने जिस तरह खुले दिल से स्वागत किया, वह पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाला था।

ट्रंप जब दूसरी बार सत्ता में आए थे तब से ही वे बार-बार रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर जोर देते रहे हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद उनका पहला बड़ा वादा यही था कि वे 24 घंटे के अंदर इस युद्ध को खत्म कर देंगे।

पुतिन से मुलाकात से पहले भी ट्रंप ने कहा था कि अगर रूस ने शुक्रवार तक यूक्रेन के साथ युद्ध नहीं रोका तो उस पर प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे। हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट नहीं किया था कि ये प्रतिबंध किस तरह के होंगे। इससे पहले ही ट्रंप ने भारत और चीन जैसे रूस के व्यापारिक साझेदारों को भी ‘सेकेंडरी टैरिफ’ लगाने की धमकी दी थी। अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर पहले ही भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है।

ट्रंप को सत्ता में आए हुए 6 महीने हो चुके हैं लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध अभी भी खत्म नहीं हुआ है। अब पुतिन और ट्रंप की मुलाकात के बाद यह साफ हो गया है कि अमेरिका के जरिए युद्धविराम की जो उम्मीद बची हुई थी वो भी लगभग खत्म हो गई है।

ट्रंप ने बैठक को बताया ‘सार्थक’

बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए ट्रंप ने मुलाकात को ‘बेहद सार्थक‘ बताया है। हालाँकि, इसमें रूस-यूक्रेन युद्ध पर किसी ठोस समझौते की घोषणा नहीं हुई है। ट्रंप ने कहा, “हमारी बैठक बेहद उपयोगी रही। कई मुद्दों पर सहमति बनी है, बस कुछ ही मुद्दे ऐसे हैं जिन पर बात बाकी है। हम वहाँ (युद्ध विराम) तक नहीं पहुँचे हैं लेकिन वहाँ तक पहुँचने की पूरी संभावना है।”

पुतिन ने भी इस बैठक के बाद बयान दिया। उन्होंने यूक्रेन संघर्ष को लेकर टिप्पणी करते हुए यूक्रेन और यूरोपीय देशों को चेतावनी दी कि वे ‘किसी तरह की रुकावटें न डालें’ और ‘इस प्रगति को उकसावे या चालों से बिगाड़ने की कोशिश न करें’। पुतिन ने कहा, “हमें उम्मीद है कि जो सहमति बनी है, वह यूक्रेन में शांति का रास्ता खोलेगी।” हालाँकि, दोनों ने प्रेस से कोई सवाल नहीं लिए।

बैठक में मौजूद ही नहीं था यूक्रेन

दिलचस्प बात यह रही कि यह बैठक रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए आयोजित की गई थी लेकिन इसमें यूक्रेन को बुलाया ही नहीं गया। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब युद्ध में शामिल एक पक्ष ही बैठक में मौजूद ना हो तो शांति समझौता आखिर कैसे हो सकता था?

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी इस पर चिंता जताई थी। अमेरिका-रूस बैठक से पहले ही उन्होंने कहा कि असली शांति समझौता तभी संभव है जब तीनों देश यूक्रेन, रूस और अमेरिका एक साथ बैठें।

जेलेंस्की ने कहा, “रूस को वह जंग खत्म करनी होगी जिसे उसी ने शुरू किया और सालों से खींच रहा है। हत्याएँ बंद होनी चाहिए। नेताओं की बैठक जरूरी है जिसमें कम से कम यूक्रेन, अमेरिका और रूस शामिल हों। इसी तरह के प्रारूप में ही सही फैसले लिए जा सकते हैं। सुरक्षा की गारंटी चाहिए, स्थाई शांति चाहिए। सबको पता है कि मुख्य लक्ष्य क्या हैं। मैं उन सबका धन्यवाद करता हूँ जो असली नतीजे लाने में मदद कर रहे हैं।”

कई देशों के बीच शांति कराने का दावा कर खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का दावेदार बता रहे ट्रंप, रूस-यूक्रेन युद्ध में भी मध्यस्थ बनकर नाम कमाना चाहते थे। उनकी रूस और यूक्रेन के बीच कराई गई बैठक से कोई नतीजा नहीं निकला। इसके बाद ट्रंप ने पूरा जिम्मा यूक्रेन पर डाल दिया और कहा कि अब शांति स्थापित करना उसकी जिम्मेदारी है।

ट्रंप ने पुतिन से हुई अपनी बैठक को ’10 में से 10′ अंक दिए और कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की जिम्मेदारी अब यूक्रेन की है। Fox News के मुताबिक, ट्रंप ने इस वार्ता के बाद कहा, “अब यह राष्ट्रपति जेलेंस्की के ऊपर है कि वो इसे सुलझाएँ। यूरोपीय देशों को भी इसमें शामिल होना चाहिए लेकिन असली जिम्मेदारी जेलेंस्की की है।”

इस बैठक से रूस-यूक्रेन युद्ध में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया लेकिन भारत के लिए थोड़ी राहत की खबर जरूर निकली। बैठक के बाद ट्रंप ने कहा कि वो फिलहाल उन देशों पर कोई ‘सेकेंडरी टैरिफ’ लगाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं जो रूस से तेल खरीदते हैं। इन देशों में भारत भी शामिल है।

ट्रंप ने कहा, “हो सकता है मुझे दो-तीन हफ्ते में इसके बारे में सोचना पड़े लेकिन अभी इसकी जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि बैठक बहुत अच्छी रही।”

गुजरात नर्क, आपदा का पर्याय… सोशल मीडिया में ‘लेक्चर’ दे रहे थे IIT गाँधीनगर के प्रोफेसर, संस्थान ने किया बर्खास्त: ऑपइंडिया की रिपोर्टिंग से उजागर हुआ था ‘ज्ञान’

IIT गाँधीनगर ने अपने एक प्रोफेसर डॉ. आशीष खाखा को सेवा से हटा दिया है। यह जानकारी खुद संस्थान ने RTI के जवाब में दी है। पहले एक RTI के जरिए यह पूछा गया था कि डॉ आशीष खाखा अब संस्थान में कार्यरत हैं या नहीं, जिस पर जवाब आया कि उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया गया है।

मई 2025 में ऑपइंडिया ने एक रिपोर्ट में डॉ खाखा की सोशल मीडिया एक्टिविटी पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्होंने अपना सोशल मीडिया अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया था, लेकिन बाद में वह फिर से सक्रिय हो गए।

डॉ आशीष खाखा सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस नेताओं जैसे राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी के पोस्ट्स को लगातार शेयर करते हैं। उनके हैंडल से फिलिस्तीन के समर्थन में भी पोस्ट किए गए हैं। उन्होंने पत्रकार मोहम्मद जुबैर, यूट्यूबर ध्रुव राठी जैसे लोगों के पोस्ट भी रीपोस्ट किए हैं।

एक पोस्ट में उन्होंने कहा था कि लोगों को सड़क पर उतर कर लोकतंत्र को वापस लाना होगा। इसे भड़काऊ और उकसाने वाला बयान माना गया। उनके कुछ पोस्ट्स में गुजरात और वहाँ के लोगों को लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया गया है।

उन्होंने गुजरात को ‘hellhole’, ‘scam society’, ‘करप्शन की खान’ और ‘त्रासदी का पर्याय’ जैसे शब्दों से संबोधित किया है। एक पोस्ट में उन्होंने यह भी कहा है कि ‘गुजरात तबाही का पर्याय’ है।

आशीष खाखा ने एक पोस्ट को रीपोस्ट किया और लोगों से उन्हें पढ़ने का आग्रह किया। इसमें दो प्रकाशन थे, ‘कोलोनाइजिंग कश्मीर’ और ‘कोलोनाइजिंग फिलिस्तीन’। पूर्व प्रोफेसर का साफ इशारा था कि भारत ने कश्मीर को ‘कोलोनाइज’ कर लिया है।

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा, “अगर राहुल गाँधी नहीं, तो और कौन?” यानी राहुल गाँधी को भारत का उद्धारक बताया। इसके आलावा एक वायरल पोस्ट में उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का मजाक उड़ाने वाले एक ट्वीट को भी रीपोस्ट किया।

एक पोस्ट में एक यूजर ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का मजाक उड़ाते हुए लिखा, “उनसे इस्तीफा कैसे माँगा जा सकता है? उन्हें बताइए कि भारत ‘अनियन ऑफ स्टेट्स’ है।” इस पोस्ट को पूर्व प्रोफेसर ने भी रीपोस्ट किया है।

एक सोशल मीडिया यूजर ने उन पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया और कहा कि बाद में डॉ खाखा ने उन्हें ब्लॉक कर दिया। यह पोस्ट भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

उनकी एक रिसर्च ‘Covid-19 and the Indigenous Migrants Question in Urban India’ नामक लेख 2025 में लंदन से प्रकाशित एक पुस्तक ‘Governing the Crisis: Narratives of Covid-19 in India’ में छपी थी।

इसमें उन्होंने कोविड लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की परेशानियों पर लिखा था। लेख में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं की कमी, गरीबी और पानी की समस्या और पर्याप्त डॉक्टरों की कमी के कारण मृत्यु दर ज्यादा बताई गई थी।

हालाँकि लेख में उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ (जो उस समय INDI गठबंधन शासित राज्य थे) की तारीफ की। उन्होंने हेमंत सोरेन और भूपेश बघेल जैसे नेताओं की व्यक्तिगत सराहना की, जबकि अन्य राज्यों के प्रयासों का उल्लेख नहीं किया गया।

इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह लेख किसी राजनीतिक झुकाव से प्रेरित था, क्योंकि उस समय सभी राज्य कोविड से निपटने के लिए प्रयासरत थे।

यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।