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वामपंथी मीडिया आउटलेट ‘द वायर’ ने बांग्लादेशी से लिखवाया भारत विभाजन पर लेख, बताया ‘मुस्लिमों का सामाजिक न्याय’: मोपला नरसंहार पर चढ़ाई ‘वर्ग संघर्ष’ की स्याही

वामपंथी और इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ‘द वायर’ नाम के मीडिया आउटलेट ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को बांग्लादेशी लेखक अहमदे हुसैन का एक लेख छापा, जिसमें पाकिस्तान आंदोलन को एक नया रंग देने की कोशिश की गई।

इस लेख के मुताबिक, पाकिस्तान की माँग कोई धार्मिक अलगाववाद नहीं थी, बल्कि ये कथित तौर पर किसानों और दबे-कुचले वर्गों का जमींदारों और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ ‘वर्ग संघर्ष’ था।

लेख ये भी दावा करता है कि बंगाल में इस्लाम ने समानता का रास्ता दिखाया, और इसलिए भारत का बँटवारा कम्युनल प्रोजेक्ट कम और सामाजिक न्याय की खोज ज्यादा थी।

द वायर में प्रकाशित लेख का स्क्रीनशॉट

पहली नजर में ये नजरिया इतिहास को समझने की एक समझदारी भरी कोशिश लग सकती है। लेकिन गौर से देखें तो ये एकदम गलत और छुपाने की कोशिश है। जो बात बौद्धिक व्याख्या के रूप में सामने आती है, वो असल में एक वैचारिक प्रोजेक्ट है: हिंदू पीड़ा को मिटाना और इस्लामिक कट्टरता को मार्क्सवाद और ‘सामाजिक न्याय’ की चमकदार भाषा में जायज ठहराना।

ऐसी कहानियों का खतरनाक नतीजा ये है कि ये उन तर्कों को फिर से जिंदा करती हैं, जिन्हें 1921 के मोपला दंगों, डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार जैसे खूनी कांडों को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

पाकिस्तान आंदोलन: धर्म था असली ताकत, वर्ग नहीं

‘द वायर’ का लेख दावा करता है कि पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान आंदोलन असल में किसानों का विद्रोह था, जहाँ इस्लाम सिर्फ एकता का प्रतीक था। ये नजरिया जानबूझकर पाकिस्तान की माँग के मजहबी चरित्र को कम करता है।

हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मोहम्मद अली जिन्ना की ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ यानी टू नेशन थ्योरी कोई वर्ग क्रांति का घोषणापत्र नहीं था; ये साफ-साफ कहता था कि हिंदू और मुसलमान एक राष्ट्र के तौर पर साथ नहीं रह सकते।

मुस्लिम लीग ने गरीबों को समाजवाद के लाल झंडे के नीचे नहीं, बल्कि इस्लाम के हरे झंडे के नीचे लामबंद किया। इसके भाषण, प्रस्ताव और अभियान मजहबी अपीलों से भरे थे, न कि आर्थिक बराबरी की बातों से।

अगर समस्या सचमुच जमींदारी शोषण थी, तो इसका हल जमीन सुधार या समाजवादी नीतियाँ हो सकती थीं, न कि एक इस्लामिक देश का गठन। ये तथ्य कि नतीजा पाकिस्तान था, जो मुसलमानों के लिए एक मजहबी देश था, इस मिथक को तोड़ देता है कि ये वर्ग संघर्ष था। ये शुद्ध रूप से कम्युनल लामबंदी थी।

बँटवारे का खून – डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली

इस नए नजरिए में सबसे बड़ी चूक है बँटवारे से पहले की भयानक कम्युनल हिंसा को जानबूझकर भूल जाना। 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे पर जिन्ना ने मुस्लिम ताकत दिखाने का आह्वान किया। कोलकाता में जो हुआ, वो कोई किसान विद्रोह नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार था। तीन दिन तक शहर कसाईखाना बना रहा।

हिंसा की भयावहता इंसानी समझ से परे थी। एक अनुमान के मुताबिक 4,000 लोग मारे गए, हालाँकि कई स्रोत 10,000 के करीब आँकड़ा बताते हैं। तीन दिन में एक लाख से ज्यादा हिंदू बेघर हो गए। हिंसा में क्रूरता की कोई हद नहीं थी। हिंदू महिलाओं के साथ उनके परिवारों के सामने सामूहिक बलात्कार हुआ, फिर उनकी हत्या की गई। बच्चों को काट डाला गया, लाशों को क्षत-विक्षत कर दिया गया।

चश्मदीद फिलिप टैल्बॉट ने लिखा, “फूली हुई लाशें, कटे-फटे शरीर, गड्ढों और नालों में फँसी लाशें, खाली मैदानों में ढेर लगाई गई लाशें।” यह जमींदारी सुधार की माँग नहीं थी, बल्कि हिंदुओं को डराने के लिए किया गया इस्लामिक आतंक था।

ये जमीन सुधार की पुकार नहीं थी; ये इस्लामिक आतंक का खुला प्रदर्शन था, जिसका मकसद हिंदुओं को डराकर झुका देना था। निशाने सिर्फ कम्युनल नहीं थे, बल्कि सभ्यतागत थे। हिंदू मंदिरों को अपवित्र और नष्ट किया गया, धार्मिक प्रतीकों का अपमान हुआ, पवित्र ग्रंथ जलाए गए। हमलावरों ने कोलकाता से हिंदू मौजूदगी को मिटाने की कोशिश की, क्योंकि इसे वे पूर्वी पाकिस्तान की भावी राजधानी मानते थे।

इस दौरान मंदिर तोड़े गए, धार्मिक प्रतीकों को अपमानित किया गया और शास्त्र जलाए गए। हमलावरों का मकसद कलकत्ता से हिंदू उपस्थिति मिटाना था, ताकि यह भविष्य के ईस्ट पाकिस्तान की राजधानी बन सके।

महज दो महीने बाद, 10 अक्टूबर 1946 को, पूर्वी बंगाल में नोआखाली नरसंहार हुआ, जो सुनियोजित और भयावह था। 5,000 से ज्यादा हिंदू, ज्यादातर पुरुष और लड़के, मारे गए। कई गुना ज्यादा को जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। हिंदुओं को गोमांस खाने और इस्लामिक आयतें (कलमा) पढ़ने के लिए मजबूर किया गया।

हजारों हिंदू महिलाओं के साथ उनके बच्चों और पतियों के सामने बलात्कार हुआ, और उन्हें सेक्स स्लेव के तौर पर कैद किया गया। हिंदू अल्पसंख्यकों पर ये व्यवस्थित और क्रूर हमले उनकी आबादी को तेजी से कम करने का कारण बने।

हैरानी की बात है कि नोआखाली हिंदू नरसंहार को ‘दंगे’ कहा जाता है, जबकि सारे संकेत बताते हैं कि ये पूर्ण रूप से नरसंहार था।

मोपला नरसंहार: लीपापोती की एक सदी

केरल के मलप्पुरम जिले के तुव्वुर गाँव में 25 सितम्बर 1921 को एक भयानक नरसंहार हुआ।

यह हिंसा अगस्त 1921 में शुरू हुई थी, जब खिलाफत आंदोलन (जो तुर्की के ओटोमन खलीफा से जुड़ा था और महात्मा गाँधी ने भी इसका समर्थन किया था) अचानक हिंदुओं पर हमलों में बदल गया।

तुव्वूर में ही 50 हिंदुओं को मारकर उनके शव कुएँ में फेंक दिए गए। अगले चार महीनों में, जब तक हत्याएँ रोकी गईं, 2500 से ज्यादा हिंदुओं को, अक्सर सिर काटकर मार डाला गया। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना किया, उनकी लाशें कुओं में डाल दी गईं।

लगभग एक लाख हिंदू अपने घरों और गाँवों से भागने को मजबूर हुए, रातोंरात शरणार्थी बन गए। हजारों परिवारों को मौत की धमकी देकर इस्लाम कबूल करवाया गया। यहाँ तक कि बाद में केरल के पहले मुख्यमंत्री बने ईएमएस नंबूथिरीपाद को अपनी जान बचाने के लिए अपने पैतृक घर से भागना पड़ा।

इसके बावजूद, बाद की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने इस घटना को क्लास स्ट्रगल या स्वतंत्रता संग्राम बताकर सच्चाई को छिपाया। जबकि महात्मा गाँधी, एनी बेसेन्ट और भीमराव आंबेडकर ने इन अत्याचारों का जिक्र किया था।

आज भी केरल सरकार इन हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी कहकर सम्मानित करती है। इतिहासकारों की संस्था ICHR (इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च) ने साफ कहा है कि यह कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं था, बल्कि जिहादी हिंसा थी, जिसका मकसद इस्लामिक खिलाफत कायम करना था। इसके बावजूद इस्लामिक हिंसा को मार्क्सवादी भाषा में छुपाने की कोशिशें अब तक जारी हैं।

मोपला नरसंहार कोई किसान विद्रोह नहीं था

इस्लाम में शहादत (शहीद) का असली मतलब तब बदल गया, जब हिंदुओं के सफाए का मकसद सिर्फ मजहब बन गया। उसी नाम पर गैर-मुस्लिमों को बेरहमी से मारा गया, बलात्कार किया गया और लूटा गया। उनके मुताबिक, इस्लामी शहीद, जो इस तथाकथित विद्रोह में मारे जाते थे, उनका कीमती पत्थरों से सजे घोड़ों पर जन्नत में स्वागत होता था, जहाँ ‘हूरें’ (कुँवारी अप्सराएँ) और दूसरी फँतासियाँ उनका स्वागत करती थीं। एक अनपढ़ एरनाड मोपला के लिए ये बाद के जीवन के वादे उस साधारण जमीन पर जिंदगी से ज्यादा आकर्षक थे।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों ने हर पुरुष और महिला को एक साझा लक्ष्य के लिए हाथ मिलाने को कहा। गाँधी का विचार था कि खिलाफत आंदोलन को स्वराज आंदोलन के साथ जोड़ा जाए, ताकि दूर रहने वाले मुसलमान स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हों। उन्हें क्या पता था कि इस्लाम के नाम पर हजारों हिंदुओं की बलि चढ़ जाएगी। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एक आजाद देश का सपना देखते थे, लेकिन खिलाफतवादी एक आजाद इस्लामिक देश का सपना देखते थे।

ये थी 1921 की मप्पिला जिहाद की शुरुआत। ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’ जैसे नारे न राष्ट्रवादी जोश से गूँजे, न किसानों की ताकत से। न तो उन्होंने स्वराज का झंडा (पिंगली वेंकय्या द्वारा डिजाइन किया गया) उठाया, न ही खिलाफत का झंडा (दो चौराहे वाले गोले)। इसके बजाय, दंगाइयों ने ‘बैनर ऑफ ईगल’ के साथ मार्च किया, जिसे रायत-अल-उकब कहा जाता है, जो इस्लामी परंपरा में मोहम्मद द्वारा इस्तेमाल किया गया ऐतिहासिक झंडा था। ये शिया इस्लाम में एक प्रलयकारी प्रतीक है, जो महदी के आगमन का संकेत देता है। ये साफ तौर पर इस्लामी अतिवाद और जिहादी कामों में इस्तेमाल होने वाला प्रतीक है।

वे लोहे की छड़ों से हमला करते थे। पुलिस की संगीनें उनके बढ़ते हुए हुजूम के सामने बेकार थीं। पुलिस की गोलीबारी में नौ दंगाई मारे गए। जब भीड़ पीछे हटी, तो ब्रिटिश ने थानूर खलिफत कमेटी के सचिव कुंजीखादर और 40 अन्य मप्पिलाओं को पकड़ लिया।

ब्रिटिश प्रशासन के पहिए कुछ समय के लिए थम गए, और कट्टरपंथी हथियार उठाए हुए थे। उन्होंने पुलिस स्टेशनों, खजानों, अदालतों और अन्य सरकारी कार्यालयों को लूटा और तहस-नहस कर दिया। ये मजहबी अशांति जल्दी ही मलप्पुरम के आसपास के इलाकों में जंगल की आग की तरह फैल गई।

सामाजिक न्याय का हथियार सनातनियों के खिलाफ

पैटर्न साफ है। जब भी हिंदू इस्लामिक हिंसा का शिकार होते हैं, उसे ‘सामाजिक न्याय’ की शब्दावली से नया नाम दे दिया जाता है। जब हिंदुओं का नरसंहार होता है, तो व्याख्या बदल जाती है: ये जिहाद नहीं था, ये ‘वर्ग संघर्ष’ था। ये कम्युनल हिंसा नहीं थी; ये ‘औपनिवेशिक विरोध’ था। पीड़ितों को मिटा दिया जाता है, और अपराधियों को क्रांतिकारी बना दिया जाता है।

ये सामाजिक न्याय की भाषा का क्रूर दुरुपयोग है। जातिगत असमानता या किसान शोषण को वास्तव में संबोधित करने के बजाय, इन शब्दों को इस्लामी आक्रामकता को जायज ठहराने के लिए हथियार बनाया जाता है। मोपला को इसलिए माफ कर दिया गया क्योंकि उनके हिंदू शिकार जमींदार थे।

पाकिस्तान आंदोलन को इसलिए नया रूप दिया जाता है क्योंकि हिंदू ‘उच्च-जाति के दबंग’ थे। लेकिन हकीकत ये है कि हजारों गरीब हिंदू किसान, कारीगर और दलित उनमें शामिल थे, जिन्हें मार डाला गया या जबरन धर्मांतरण करवाया गया। उनकी पीड़ा को ‘बड़े संघर्ष’ के बहाने मिटा दिया जाता है।

यह सिर्फ इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना नहीं है, बल्कि यह दूसरी बार किया गया अत्याचार है। पहली बार उनकी जान और घर छीन लिए गए और दूसरी बार उनकी याद और सम्मान को मिटा दिया गया।

विभाजन का विश्वासघात: पाकिस्तान में सामाजिक न्याय नहीं

अगर ये मान भी लें कि बँटवारा एक सामाजिक क्रांति थी, तो इसका नतीजा इस झूठ को उजागर करता है। क्या पाकिस्तान ने दबे-कुचले लोगों को बराबरी दी?

जवाब है, बिल्कुल नहीं। पाकिस्तान जल्दी ही एक सामंती-सैन्य राज्य बन गया, जहाँ कुलीन वर्गों का दबदबा रहा। भूमि सुधार विफल रहे, किसान गरीब बने रहे, और अल्पसंख्यक, खासकर हिंदू पहले से कहीं ज्यादा सताए गए। आजादी के बजाय, पाकिस्तान अपने अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए एक बुरा सपना बन गया।

इस तरह पाकिस्तान किसी के लिए मुक्ति का सपना नहीं बल्कि गरीबों और अल्पसंख्यकों दोनों के लिए एक बड़ा दुःस्वप्न साबित हुआ। इसलिए यह दावा कि पाकिस्तान आंदोलन सामाजिक न्याय के लिए था, न सिर्फ अपनी शुरुआत में गलत था बल्कि अपने नतीजे में भी पूरी तरह ढह गया।

खतरा यहीं खत्म नहीं होता। जब मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे द वायर इस्लामी हिंसा को सामाजिक न्याय की भाषा में ढकते हैं, तो वे उसी विचारधारा को मजबूत करते हैं जो आज भी हिंदू समाज को खतरे में डालती है।

इस तरह असली धार्मिक नफरत को मिटा दिया जाता है और संदेश साफ हो जाता है हिंदुओं की जिंदगी का कोई अपना महत्व नहीं, उनकी मौत का जिक्र तभी होगा जब उसे किसी और की संघर्ष कथा में इस्तेमाल किया जा सके।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

फतेहपुर में मकबरा-मंदिर विवाद पर प्रशासन ने CM योगी को भेजी रिपोर्ट, खतौनी और वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों में दर्ज जमीन के मिले अलग-अलग आँकड़े

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में मकबरा-मंदिर विवाद में प्रयागराज कमिश्नर और आईजी रेंज ने विवाद की विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेज दी है। बीते 11 अगस्त को नवाब अब्दुल समद के मकबरे को हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों ने मंदिर बताते हुए यहाँ पूजा की थी, जिस पर खूब हंगामा हुआ था।

हिंदू संगठन से जुड़े लोगों ने मकबरे के भीतर बनीं 2 मजारों में तोड़फोड़ की थी और मुस्लिम पक्ष ने हिंदुओं पर पथराव किया था। दरअसल, मुस्लिम पक्ष इस मकबरे को नवाब अब्दुल समद खान और उनके बेटे अबू बकर की कब्र बताता है जबकि हिंदू पक्ष इस जगह पर भगवान शिव और भगवान कृष्ण का प्राचीन मंदिर होने का दावा करता है। दावा किया जाता है कि यह मकबरा 200 वर्ष पुराना है।

क्या कहती है शासन की रिपोर्ट?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मकबरे को लेकर हुए विवाद के बाद जिला प्रशासन ने इसकी विस्तृत रिपोर्ट बनाने के लिए उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी। इस समिति में 2 अपर जिलाधिकारी (ADM), 3 उपजिलाधिकारी (SDM), 2 तहसीलदार और 12 लेखपाल शामिल थे। अब करीब 75 पेज की इस रिपोर्ट को कमिश्नर के जरिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजा गया है।

इस रिपोर्ट में मकबरे की जमीन गाटा संख्या 753 के साथ-साथ आसपास पूरे इलाके के 8 गाटा संख्या की जानकारी दी गई है। 753 के साथ मकबरे से सटे 1159 गाटा संख्या का ब्यौरा दिया गया है। 1159 गाटा संख्या के 23 खातेदारों में 6 नंबर पर ठाकुर जी विराजमान मंदिर भी दर्ज है।

इस रिपोर्ट में सामने आया है कि खतौनी में गाटा संख्या 753 के तहत मकबरे की कुल 11 बीघा जमीन दर्ज है। वहीं, वक्फ बोर्ड ने जो दस्तावेज दिए हैं उनमें सिर्फ 15 बिस्वा जमीन ही वक्फ संपत्ति के तौर पर दर्ज है। इन दोनों कागजातों के बीज करीब 10 बीघा जमीन की अंतर दिखाई दिया है।

रिपोर्ट में जिस गाटा संख्या 753 में मकबरा दर्ज है उसके मालिकाना हक से लेकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित होने और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में दर्ज होने का विवरण इस रिपोर्ट में दिया गया है।

रिपोर्ट में मकबरे के अस्तित्व, निर्माण काल और इस्तेमाल की भी जानकारी दी गई है। साथ ही, इसमें बवाल के दिन चूक को लेकर भी जानकारी दी गई है।

इस पूरे विवाद के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद कर दी गई है। मकबरे के एक किलोमीटर के दायरे की सड़कों पर निगरानी रखी जा रही है। पुलिस ने इस पूरे मामले में 10 नामजद और 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। इस FIR में एक सपा नेता का भी नाम है जिसे इस घटना के बाद अब पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है।

‘न कोई पक्ष – न विपक्ष, सभी दल और मतदाता बराबर’: चुनाव आयोग ने बिहार SIR पर ‘वोट चोरी’ के आरोप किए खारिज, कहा- मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़े

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार (17 अगस्त 2025) को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि चुनाव आयोग किसी भी राजनीतिक दल के साथ पक्षपात नहीं करता। उनके लिए न कोई पक्ष है, न विपक्ष, बल्कि सभी दल और मतदाता बराबर हैं। यह बयान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों के जवाब में आया, जिसे आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया।

ज्ञानेश कुमार ने कहा कि बिहार में SIR का काम पूरी पारदर्शिता के साथ हो रहा है। इस प्रक्रिया में 1.6 लाख बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) ने मतदाता सूची का मसौदा तैयार किया है। इस मसौदे को सभी राजनीतिक दलों के एजेंट्स ने अपने हस्ताक्षरों से सत्यापित किया है। मतदाताओं ने इस दौरान 28,370 दावे और आपत्तियाँ दर्ज की हैं। आयोग ने गलतियों को ठीक करने के लिए 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक का समय दिया है।

सीईसी ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कुछ राजनीतिक दलों के जिला स्तर के अध्यक्षों और उनके द्वारा नामित एजेंट्स के सत्यापित दस्तावेज या तो उनके राष्ट्रीय नेताओं तक नहीं पहुँच रहे या फिर जानबूझकर भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि यह बेहद गंभीर मसला है। अगर कोई शिकायत है, तो आयोग के दरवाजे हमेशा खुले हैं। लेकिन ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके जनता को गुमराह करना संविधान का अपमान है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह भी बताया कि कुछ नेताओं ने बिना सबूत के दोहरे मतदान के आरोप लगाए। जब उनसे सबूत माँगे गए, तो कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि जब लोकसभा चुनाव में एक करोड़ से ज्यादा कर्मचारी, 10 लाख से ज्यादा बूथ लेवल एजेंट्स और 20 लाख से ज्यादा पोलिंग एजेंट्स पारदर्शी तरीके से काम करते हैं, तो क्या कोई वोट चुरा सकता है?

ज्ञानेश कुमार ने यह भी कहा कि कुछ समय पहले कई मतदाताओं की तस्वीरें बिना उनकी सहमति के मीडिया में दिखाई गईं। उन्होंने पूछा, “क्या चुनाव आयोग को माताओं, बहनों, बेटियों के सीसीटीवी वीडियो सार्वजनिक करने चाहिए?” उन्होंने साफ किया कि मतदाता सूची में जिनके नाम हैं, वही अपने उम्मीदवार को चुनने के लिए वोट डालते हैं।

बिहार में SIR के तहत 7.89 करोड़ लोगों का सत्यापन हुआ, जिसमें से 7.24 करोड़ फॉर्म 30 दिन के भीतर वापस मिले। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि नेपाली और बांग्लादेशी नागरिक भारत में सांसद या विधायक का चुनाव नहीं कर सकते। 30 सितंबर तक ऐसे लोगों की गहन जाँच होगी और इस दौरान उनका वोट काट दिया जाएगा। पश्चिम बंगाल में SIR की घोषणा जल्द होगी, और बाकी देश में भी यह प्रक्रिया चलेगी।

उन्होंने कहा कि शिकायत करना, शिकायत को बढ़ाना और भ्रम फैलाना, ये तीन अलग-अलग चीजें हैं। अगर 45 दिन तक कोई गलती नहीं दिखी, तो अब आरोप लगाने का क्या मतलब? जनता सब समझती है। SIR का मकसद मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि कोई गलत व्यक्ति वोट न डाल सके।

ज्ञानेश कुमार ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग निडर होकर काम करता है। यह गरीब, अमीर, युवा, बुजुर्ग, महिला और सभी धर्मों के मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। उन्होंने कहा कि आयोग का काम संविधान के तहत हर भारतीय नागरिक को वोट देने का हक देना है। सभी राजनीतिक दलों का पंजीकरण भी आयोग के पास होता है, फिर भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता।

मुख्य चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि बिहार में SIR की प्रक्रिया में सभी हितधारक मिलकर काम कर रहे हैं। बूथ स्तर पर मतदाता, अधिकारी और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि पारदर्शी तरीके से सत्यापन कर रहे हैं। कई जगह वीडियो प्रशंसापत्र भी दिए जा रहे हैं। आयोग का मकसद है कि मतदाता सूची में कोई गलती न रहे और हर पात्र व्यक्ति को वोट देने का मौका मिले।

चुनाव आयोग के प्रेस कॉन्फ्रेंस की अहम बातें

  • चुनाव आयोग के लिए न कोई पक्ष है, न कोई विपक्ष है। चुनाव आयोग के लिए सब समकक्ष हैं
  • सभी राजनीतिक दलों ने बिहार SIR में 1.6 लाख बूथ लेवल एजेंट्स ने हस्ताक्षर किए हैं
  • मतदाताओं ने 28 हजार क्लेम और ऑब्जेक्शन दिए हैं
  • चुनाव आयोग त्रुटियों को हटाने के लिए 1 अगस्त से 1 सितंबर का समय दिया
  • यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि राजनीतिक दलों के जिलाध्यक्ष और एजेंट के हस्ताक्षर किए हुए कागज राष्ट्रीय स्तर के नेताओं तक पहुँच नहीं पा रहे हैं या भ्रम फैलाने का प्रयास हो रहे है
  • वोट चोरी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके जनता को गुमराह किया जाए तो यह संविधान का अपमान है
  • हमने बीते दिनों देखा कि कई मतदाताओं की फोटो बिना उनकी सहमति के बिना मीडिया में रखी गई
  • क्या चुनाव आयोग को माताओं बेटियों की वीडियो साझा करनी चाहिए क्या?
  • कुछ मतदाताओं द्वारा दोहरे मतदान के आरोप लगाए गए, साक्ष्य नहीं दिया गया। इनसे चुनाव आयोग नहीं डरता है
  • चुनाव आयोग निडरता के साथ सभी वर्ग के मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़ा है, खड़ा रहेगा
  • बिहार में 7.89 करोड़ लोगों का SIR हुआ। 7.24 करोड़ फॉर्म वापस मिले 30 दिन के अंदर
  • नेपाली बांग्लादेशी भारत के MP MLA का चुनाव नहीं कर सकते।
  • 30 सितंबर तक नेपाली-बांग्लादेशी नागरिकों की जाँच होगी, गहन जाँच प्रक्रिया के दौरान उनका वोट काट दिया जाएगा।
  • पश्चिम बंगाल में SIR का ऐलान आने वाले समय में उचित समय पर लिया जाएगा। बाकी देश में भी होगा।
  • एक होता है, शिकायत करना, एक होता है शिकायत बढ़ाना और एक होता है भ्रम फैलाना।
  • जब चुनाव के 45 दिन के बाद कोई गलती नजर नहीं आई, तो अब आरोप लगाने का मतलब क्या यह पूरे देश की जनता समझती है
  • SIR का काम वोटर लिस्ट को पूरी तरह से प्यूरीफाई करना है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना ठीक नहीं। जब सात करोड़ से ज्यादा मतदाता आयोग के साथ हैं, तो उसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने नेताओं से अपील की कि वे बिना सबूत के आरोप न लगाएँ और अगर कोई शिकायत है, तो कोर्ट में याचिका दायर करें।

ब्रिटिश नहीं चाहते थे बँटवारा फिर भी कॉन्ग्रेस को था स्वीकार: विभाजन विभीषिका में राजनीतिक इस्लाम और मुस्लिम लीग की हिंसा पर क्या कहता है NCERT का नया मॉड्यूल?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए दो अलग-अलग मॉड्यूल जारी किए हैं। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस हर वर्ष 14 अगस्त को मनाया जाता है।

NCERT एक स्वायत्त संस्था है जो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है। यह राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा तैयार करती और किताबें प्रकाशित करती है। इन किताबों का उपयोग CBSE के कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों द्वारा किया जाता है।

अब हाल ही में जारी किए गए NCERT के एक मॉड्यूल में यह बताया गया है कि भारत के बँटवारे के पीछे सबसे बड़ी ताकत राजनीतिक इस्लाम और उसकी विचारधारा थी। इसमें हिंदुओं पर हुए अत्याचार, मुस्लिम लीग की हिंसा, कॉन्ग्रेस पार्टी की जिम्मेदारी और यह बात भी शामिल की गई है कि पाकिस्तान के लिए वोट करने वाले ज्यादातर मुसलमान भारत में ही रह गए थे।

राजनीतिक इस्लाम और बंटवारा, पाक नहीं गए ज्यादातर मुस्लिम

मॉड्यूल में कहा गया कि मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाया गया था फिर भी ज्यादातर मुस्लिम पाकिस्तान नहीं गए।

मॉड्यूल के पेज नंबर 4 पर लिखा गया है, “मुसलमानों के लिए एक पृथक देश बना दिया गया, फिर भी लगभग 3.5 करोड़ मुसलमान भारत में ही रह गए। पाकिस्तान की माँग और उस का निर्माण इसी आधार पर हुआ था कि यह समस्त भारतीय मुसलमानों का अलग देश होगा।”

मॉड्यूल में कहा गया है कि 1946 में हुए संविधान सभा के चुनावों में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित 78 में से 73 सीटें जीत लीं। इस मुस्लिम लीग की मुख्य माँग पाकिस्तान थी।

मॉड्यूल में साफ तौर पर कहा गया है कि पाकिस्तान बनाने वाली संदेह, द्वेष और शत्रुता-भावना आज भी भारत में मौजूद है। इसमें बँटवारा और पाकिस्तान आंदोलन का मुख्य कारण राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा को माना गया है।

इसमें पेज 6 पर लिखा है, “धर्म, संस्कृति, साहित्य, रीति-रिवाज, इतिहास, प्रेरणा-स्रोत और जीवन-दृष्टि के सभी आधारों पर मुस्लिम नेताओं ने अपने को हिन्दुओं से स्थाई रूप से भिन्न घोषित किया। इस की जड़ राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा में थी, जो गैर-मुसलमानों के साथ किसी स्थायी या समान संबंध की संभावना को सिद्धांत रूप से ही नकारती है। यह सिद्धांत विश्व के विभिन्न हिस्सों में सदियों से लागू होता आया है, और आज भी अनेक देशों में देखा जा सकता है।”

इस मॉड्यूल में मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना के 22 मार्च 1940 के भाषण का भी जिक्र किया गया है। जिसमें जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए अलग राष्ट्र की स्पष्ट माँग की थी।

जिन्ना ने कहा था, “हिंदू और मुसलमान दो भिन्न-भिन्न धार्मिक दर्शनों, सामाजिक रीति-रिवाजों, और साहित्य से जुड़े रहे हैं। वे न तो आपस में विवाह सम्बन्ध करते हैं, न ही साथ-साथ खाते-पीते हैं। वस्तुतः दोनों दो भिन्न सभ्यताओं से जुड़े हैं जिन के विचार और धारणाएं एक-दूसरे से विपरीत हैं।”

भारतीय नेताओं को विभाजन के भयावह परिणामों का अनुमान नहीं था। उन्होंने इस निर्णय के पहलुओं पर विचार नहीं किया था। इसमें विभाजन को जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया गया है।

मॉड्यूल में पेज 12 पर कहा गया है, “जिन कारणों से विभाजन स्वीकार किया गया था, वे आज भी बने हुए हैं। यह भी दिखाता है कि नेताओं ने उस मूल प्रश्न पर गंभीरता से विचार नहीं किया – मजहबी अलगाववाद की विचारधारा और किसी एक मजहब के लिए विशेष अधिकारों की माँग।”

NCERT ने बताया है कि भारतीय नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों की सच्चाइयों को नजरअंदाज कर सांप्रदायिकता का दोष भी ब्रिटिश शासकों पर डाल दिया।

इसमें पेज 11-12 पर लिखा है, “भारतीय नेताओं ने…अपने विमर्श को मुख्यतः ‘देशी बनाम विदेशी’ के रूप में सीमित रखा। भारत का वास्तविक इतिहास उपेक्षित किया गया। 1919 से, खलीफत-असहयोग आंदोलन से शुरू करके, राष्ट्रीय नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की ऐतिहासिक सच्चाइयों को लगातार नजरअंदाज किया। उन्होंने प्रत्येक समस्या, यहाँ तक कि सांप्रदायिकता का दोष भी, केवल ब्रिटिश शासकों पर डाल दिया। यह एक अतिशयोक्तिपूर्ण दोषारोपण था। यदि वे सच्चे इतिहास के आधार पर विचार कर निर्णय करते तो वे मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति को प्रारंभ से ही रोक सकते थे।”

जिहादी आतंक फैलाता है पाकिस्तान, दूसरे देशों से मिलती है मदद

NCERT के मॉड्यूल में पाकिस्तानी की भारत में जिहादी आतंकवाद फैलाने की कोशिशों और ‘हजार घाव’ देने की नीति का भी जिक्र किया गया है।

मॉड्यूल में लिखा है, “पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए तीन युद्ध किए, और उस में बार-बार हारने पर अंदर-बाहर से ‘हजार घाव’ देने की नीति अपनाई। इस के अंतर्गत भारत में जिहादी आतंकवाद फैलाने की कोशिशें चलती रही है। इस के फलस्वरूप और इस से निपटने में अब तक हजारों भारतीय नागरिक और सैनिक मारे जा चुके हैं। यह सब भारत विभाजन के परिणाम हैं।”

साथ ही, इसमें पाकिस्तान को कई देशों से मिलने वाले हथियारों और भारत के खिलाफ पाकिस्तान का उपयोग किए जाने की भी बात की गई है।

पेज 5 पर मॉड्यूल में लिखा है, “कुछ महत्वपूर्ण देश पाकिस्तान का उपयोग भारत पर दबाव बनाने के लिए करते रहते हैं। कई देश आज भी पाकिस्तान को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देते रहते हैं। परिणामस्वरूप, भारत को अपने रक्षा व्यय पर लगातार भारी खर्च करना पड़ता रहा है।”

विभाजन के लिए कॉन्ग्रेस भी जिम्मेदार: NCERT

मॉड्यूल में NCERT ने विभाजन के लिए लॉर्ड माउंटबेटन और जिन्ना के साथ-साथ कॉन्ग्रेस को भी जिम्मेदार बताया है।

इसमें कहा गया है, “ऐतिहासिक दृष्टि से भारत विभाजन के लिए तीन तत्व जिम्मेदार थे। जिन्ना, जिन्होंने इस की माँग की। दूसरे, कॉन्ग्रेन जिस ने इसे स्वीकार किया। तीसरे, माउंटबेटन जिन्होंने इसे औपचारिक रूप देकर कार्यान्वित किया।”

इसमें बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार ने अंत तक भारत को एक बनाए रखने की कोशिश की थी और वायसराय लिनलिथगो और वायसराय वावेल दोनों विभाजन के खिलाफ थे। लॉर्ड वावेल ने 1940 से लेकर मार्च 1947 तक बार-बार कहा था कि विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का समाधान नहीं होगा।

पेज 9 पर मॉड्यूल में लिखा गया है, “यह जल्दबाजी और करोड़ों लोगों के भविष्य, जीवन व सुरक्षा का ऐसे फैसला करना एक गंभीर राजनीतिक लापरवाही थी। जो भी लोग सत्ता-हस्तांतरण की तिथि घटाकर निकट कर लेने पर सहमत हुए, वे सभी इस के उत्तरदायी थे।”

मॉड्यूल में कहा गया है कि ब्रिटिश सरकार हमेशा विभाजन के खिलाफ थी और कॉन्ग्रेस नेताओं ने जिन्ना को कम आँका था।

इसमें कहा गया है, “1947 में पहली बार भारतीय नेताओं ने ही देश का एक विशाल भाग कई करोड़ नागरिकों सहित स्वेच्छा से स्थायी रूप से राष्ट्रीय सीमा के बाहर कर दिया। वह भी बिना उन करोडों नागरिकों की सहमति के। यह मानव इतिहास में एक अद्वितीय दुर्घटना थी, जब किसी देश के नेताओं ने बिना युद्ध के, शांतिपूर्वक और बंद कमरों में अचानक करोड़ो लोगों को अपने ही देश से काट दिया!”

विभाजन के दौर में कैसे हुआ हिंदुओं का उत्पीड़न?

मॉड्यूल में पेज 3-4 पर विभाजन से हुईं हानि को लेकर लिखा गया है, “साम्प्रदायिक हिंसा में लाखों लोगों की जा गई और करोड़ों विस्थापित हुए। बहुत-से परिवारों को अपने प्राण सम्मान या संपत्ति बचाने के लिए जबरन इस्लाम कबूल करना पड़ा।”

बँटवारे के बाद जम्मू-कश्मीर की सामाजिक संरचना में परिवर्तन और कश्मीरी पंडितों की खराब होती गई स्थितियों का भी इस मॉड्यूल में जिक्र किया गया है। इसमें लिखा है, “कश्मीरी पंडितों की स्थिति दयनीय होती गई। आगे आने वाले दशकों में यह स्थिति और अधिक बिगड़ी जब वहाँ आंतरिक और बाहरी आतंकवाद ने अपना दबदबा बनाया।”

NCERT ने बताया कि कैसे जिन्ना ने अपनी माँग मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया था और 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की थी।

मॉड्यूल में लिखा है, “इस ‘डायरेक्ट एक्शन’ के मात्र दो-तीन दिनों में कलकत्ता में लगभग 6000 लोग मारे गए। यह हिंसा मुस्लिम लीग और उस के स्थानीय शासन द्वारा आयोजित थी, जिस के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी थे।”

मुस्लिम लीग को वोट देने के बाद भी भारत में बड़ी संख्या में रह गए मुस्लिम

1946 के प्रांतीय चुनावों में मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर मुस्लिम लीग को वोट दिया। मुस्लिम लीग ने उस समय मजहब के आधार पर लोगों की भावनाएँ भड़काते हुए यह माँग उठाई थी कि मुस्लिमों के लिए अलग इस्लामिक देश बने।

मुस्लिम लीग का कहना था कि हिंदू और मुस्लिम एक ही देश में साथ नहीं रह सकते है। मुसलमानों के लिए भारत से अलग एक देश बनना चाहिए।

1946 के चुनावों में पूरे भारत में मुस्लिम लीग ने लगभग 87% सीटें जीतीं। अगर 1937 और 1946 के चुनावों की तुलना करें तो साफ दिखाई देता है कि 1946 में जिन्ना की मुस्लिम लीग द्वारा जीते गए प्रांतों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई थी।

बिहार में 1937 में मुस्लिम लीग को एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन 1946 में 40 में से 34 सीटें जीत गई।मद्रास में 1937 में 9 सीटें मिली थीं लेकिन 1946 में सभी 29 सीटें जीत लीं।

यह पैटर्न उस समय सभी प्रांतों में दिखाई दिया। हमें याद रखना चाहिए कि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत स्वयं बहुत लंबे समय तक अस्तित्व में रहा फिर भी मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की औपचारिक राजनीतिक माँग 1940 में की गई।

असल में 1940 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में साफ-साफ पाकिस्तान की मांग रखी थी। जिन्ना ने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, उत्तर-पश्चिमी प्रांत और बंगाल जैसे इलाकों को मिलाकर मुसलमानों के लिए एक स्वतंत्र और संप्रभु देश बनाने का लक्ष्य रखा था।

इसे ही लाहौर प्रस्ताव कहा गया जिसे बंगाल के मुख्यमंत्री ए.के. फजलुल हक ने पेश किया था और 23 मार्च 1940 को यह पास हो गया था। प्रस्ताव में गैर-मुस्लिम धर्मों के संरक्षण की भी गारंटी दी गई थी। यही पाकिस्तान के पहले संविधान की नींव बना था।

स्रोत: शिकागो विश्वविद्यालय

1940 में पाकिस्तान की माँग औपचारिक रूप से सामने आने के बाद मुस्लिम लीग को मुसलमानों का जबरदस्त समर्थन मिलने लगा। यह सीधे तौर पर अलग इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान की माँग को बढ़ावा था।

फिर भी यह हैरानी की बात है कि कुछ लोग आज यह तर्क देते हैं कि ज्यादातर मुसलमान भारत में अपनी इच्छा से ही रहे और उस समय वे अलग इस्लामी देश नहीं चाहते थे।

यह सच है कि उस समय कई मुसलमान भी पाकिस्तान की माँग के खिलाफ थे लेकिन राजनीतिक बयान और असल में वोट डालने के समय लिए गए फैसले, दोनों बहुत अलग बातें होती हैं।

अगर मुसलमान सचमुच पाकिस्तान चाहते थे और भारी संख्या में उसके पक्ष में वोट भी दिया था तो फिर इतने बड़े पैमाने पर मुसलमान भारत में क्यों रह गए?

पाकिस्तान के निर्माण के लिए मिले भारी समर्थन का मुकाबला करने के लिए बिना किसी ठोस तथ्य के यह दिया जाता है कि अगर ज्यादातर मुसलमानों ने दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया था, तो फिर वे भारत में क्यों ठहरे? और अगर वे ठहर गए तो इसका मतलब है कि उन्होंने दो-राष्ट्र सिद्धांत को ठुकरा दिया।

दरअसल, विभाजन के बाद कई नेता पूरी आबादी के आदान-प्रदान के पक्ष में थे। इनमें डॉ. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे।

विभाजन पर अपनी किताब में अंबेडकर ने साफ लिखा था कि वे क्यों पूरी तरह से जनसंख्या के आदान-प्रदान के पक्ष में हैं। इसका मतलब था कि पाकिस्तान में रहने वाले सभी हिंदू और अन्य धर्मों के लोग भारत आ जाएँ और भारत के सभी मुसलमान पाकिस्तान चले जाएँ। उन्होंने तो जनसंख्या से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक खाका भी तैयार किया था।

यहाँ तक कि सरदार पटेल ने भी विभाजन के बाद भी इस बारे में विस्तार से बात की थी कि कैसे मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाने में मदद की थी। 1948 में कोलकाता में एक भाषण में कहा था, “ज्यादातर मुसलमान जिन्होंने हिंदुस्तान में रहना चुना वे पाकिस्तान बनाने में मददगार रहे। अब मुझे समझ नहीं आता कि एक रात में ऐसा क्या बदल गया कि वे हमसे अपनी वफादारी पर शक ना करने की उम्मीद कर रहे हैं।

इसी तरह, कई बड़े नेताओं ने उस समय पूरी आबादी की अदला-बदली की माँग का समर्थन किया था।

Sunday Guardian की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और राजकुमारी अमृत कौर, गाँधी से मिलने गए थे ताकि वे जिन्ना के प्रस्ताव (आबादी की अदला-बदली) पर सहमत हों। उन्होंने (गाँधी) साफ कह दिया कि विभाजन तो क्षेत्रीय आधार पर हुआ है, धार्मिक आधार पर नहीं। इसलिए हिंदुओं और मुसलमानों के आदान-प्रदान का सवाल ही नहीं उठता। जबकि सच्चाई यही थी कि विभाजन पूरी तरह हिंदू और मुसलमान के आधार पर हुआ था।”

शाकिर, हसन अली, नासिर ढिल्लो… पाकिस्तान के इन एजेंटों से ज्योति मल्होत्रा की होती थी बात: SIT को जासूसी के मिले सबूत, 2500 पन्नों की चार्जशीट दायर

पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा के खिलाफ SIT ने 14 अगस्त 2025 को चार्जशीट दाखिल कर दी है। चार्जशीट लगभग 2,500 पन्नों की है। पुलिस ने बताया कि ज्योति पाकिस्तानी एजेंट्स के साथ लगातार संपर्क में थी और उनके लिए जानकारी इकट्ठा करती थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस की SIT टीन ने अपनी चार्जशीट में बताया है कि यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा लंबे समय से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के जासूसों के संपर्क में थी। वह पाकिस्तान उच्चायोग में तैनात एहसान-उर-रहीम के अलावा हसन अली, शाकिर और नासिर ढिल्लों से भी लगातार बातचीत करती थी।

जाँच में यह भी सामने आया है कि ज्योति पिछले साल 2024 पाकिस्तान, चीन और नेपाल भी गई थी। पुलिस को शक है कि इन यात्राओं के दौरान ज्योति ने कई जरूरी जानकारी पाकिस्तान को दी।

पुलिस ने ज्योति के मोबाइल और लैपटॉप से डिलीट की गई कुछ फाइलों और चैट्स को भी वापस निकाला है, जिनसे यह साबित होता है कि वह जासूसी कर रही थी।

जाँच अभी बाकी- SIT

पुलिस ने यह चार्जशीट 14 अगस्त 2025 को इसलिए दाखिल की, ताकि ज्योति को जमानत न मिल सके। अगर वे 90 दिन की समय सीमा में चार्जशीट दाखिल नहीं करते तो ज्योति को जमानत मिल जाती।

फिलहाल, पुलिस का कहना है कि कुछ मामलों में जाँच अभी बाकी है और वे बाद में एक और पूरक चार्जशीट दाखिल करेंगे। 18 अगस्त 2025 को इस मामले की अदालत में सुनवाई होगी।

चार्जशीट दाखिल मामले में ज्योति मल्होत्रा के वकील का भी बयान सामने आया है। वकील ने कहा, “हो सकता है कि ज्योति को पुलिस रिमांड पर लिया जाए और नियमों के मुताबिक उन्हें चार्जशीट की कॉपी दी जाएगी।”

मामला क्या है?

यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा को मई 2025 में हरियाणा के हिसार से गिरफ्तार किया गया था। ज्योति मल्होत्रा पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप लगा था।

पुलिस को ज्योति पर तब शक हुआ, जब उन्होंने देखा कि ज्योति मल्होत्रा की कमाई और खर्च में बहुत ज़्यादा अंतर है। ज्योति के पिता एक बढ़ई हैं और उनका परिवार आमदनी के हिसाब से साधारण है, लेकिन ज्योति अचानक बहुत महंगी-महंगी यात्राएँ करने लगी थीं।

ज्योति मल्होत्रा ने पाकिस्तान में कई बड़े और प्रभावशाली लोगों से मुलाकात की, जिससे पुलिस का शक और बढ़ गया। पुलिस का कहना है कि ज्योति पाकिस्तानी एजेंटों के लिए एक ‘टूल किट’ यानी एक हथियार या साधन के तौर पर काम कर रही थीं।

‘हम जिंदा हैं तब भी हमें मार दिया, हमारा वोट चोरी कर लिया’: AI वीडियो से SIR पर प्रोपेगेंडा फैला रही थी कॉन्ग्रेस, चुनाव आयोग ने कहा- बिहार के लोगों को न करें गुमराह

चुनाव आयोग ने AI की मदद से तैयार की गई कॉन्ग्रेस की वीडियो की मंशा पर सवाल उठाया है। इस वीडियो में एक बुजुर्ग महिला समेत कुछ लोग ‘वोट चोरी’ की बातें करते हुए अपना गुस्सा दिखा रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ने यह वीडियो अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर साझा किया था। वीडियो में दिखाया गया कि एक बुजर्ग महिला कह रही है- “हम जिंदा है तब भी हमें मार दिया। हमारा वोट चोरी कर लिया गया। हमारा अधिकार चोरी कर लिया।”

ऐसे ही एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ने दावा किया कि उसके घर पर 80 फर्जी मतदाता पंजीकृत हैं। इसके अलावा, कई अन्य लोगों की आवाजों के जरिए भी मतदाता सूची में गड़बड़ी और वोटिंग प्रक्रिया में धांधली का आरोप लगाया गया।

बता दें कि ये वीडियो राहुल गाँधी की बिहार सासाराम में यात्रा शुरू होने से पहले जारी की गई थी। कैप्शन में लिखा था- “17 अगस्त से हमारे साथ आना है, वोट चोरों को गद्दी से हटाना है।”

कॉन्ग्रेस द्वारा साझा की गई इस वीडियो का मकसद स्पष्ट तौर पर बिहार की जनता को भ्रमित करने का है, क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो चालाकी से छोटे फॉन्ट में एआई जनरेटेड नहीं लिखते। चुनाव आयोग ने भी इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ये वीडियो सिर्फ एआई से बनाई गई है जिसमें कोई सच्चाई नहीं है। ये सिर्फ और सिर्फ बिहार के लोगों को भ्रमित करने के लिहाज से बनाई गई है।

सोशल मीडिया पर भी लोग इसे देख बोल रहे हैं कि कॉन्ग्रेसियों को अब झूठ बोलने से बाज आ जाना चाहिए। कुछ बोल रहे हैं कि कॉन्ग्रेस को आरोप सिद्ध करने के लिए वास्तविक लोग नहीं मिल रहे इसलिए वो AI वीडियो को जनरेट कर रही है।

विपक्ष के आरोप और चुनाव आयोग

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों का गठबंधन इंडी ब्लॉक लंबे समय से चुनाव आयोग पर पक्षपात और केंद्र सरकार के साथ मिलकर चुनाव प्रक्रिया में हेराफेरी करने के आरोप लगाता रहा है। हाल ही में राहुल गाँधी ने भी एक विरोध मार्च के दौरान वोट चोरी का मुद्दा उठाया था, जिसे चुनाव आयोग ने तथ्यात्मक रूप से गलत बताया था।

चुनाव आयोग ने इस मामले पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है। आयोग ने इसके सबूत भी सार्वजनिक किए हैं। इनमें विभिन्न राजनीतिक दलों राजद, कॉन्ग्रेस और भाकपा के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठकों के रिकॉर्ड, मसौदा मतदाता सूची पर उनकी प्रतिक्रियाएँ और प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं।

आयोग का कहना है कि मतदाता सूची के प्रकाशन से पहले और बाद में सभी स्तरों पर राजनीतिक दलों से परामर्श किया गया और किसी भी गड़बड़ी की शिकायत का निवारण किया गया। तथ्य-जाँच से यह साफ हो गया कि कॉन्ग्रेस  का साझा किया गया ‘वोट चोरी’ का वीडियो वास्तविक नहीं है।

बिहार SIR पर 17 दिन में एक भी आपत्ति नहीं दे पाया INDI गठबंधन, पर ‘चारा चोर’ परिवार के साथ ‘वोट चोरी’ रोकने निकल पड़ा राहुल गाँधी का गैंग: 16 दिन चलेगी सासाराम से शुरू हुई यात्रा

बिहार के सासाराम से कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने 17 अगस्त 2025 को अपनी 16 दिन की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की। यह यात्रा लगभग 1,300 किलोमीटर लंबी होगी और 1 सितंबर 2025 को पटना में एक रैली के साथ खत्म होगी।

इस रैली की शुरुआत में ही चारा चोरी के मामले में सजा याफ्ता और मेडिकल ग्राउंड पर जमानत पर चल रहे लालू प्रसाद यादव, लैंड फॉर जॉब स्कैम के सह-आरोपित तेजस्वी यादव जैसे नेता मंच पर नजर आए और राहुल गाँधी के साथ ‘संविधान बचाने’ के नाम पर अपनी पारिवारिक पार्टी के लिए वोट माँगे।

विपक्षी INDI गठबंधन इसे आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बचाने का बड़ा अभियान बता रहा है। राहुल गाँधी ने इस मौके पर बीजेपी और आरएसएस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि ये दोनों संगठन पूरे देश में संविधान को खत्म करने की साजिश रच रहे हैं।

हैरानी की बात नहीं है कि राहुल गाँधी समेत तमाम नेताओं ने रैली में उन्हीं पुराने आरोपों को दोहराया, जिनके खुद वो जवाब नहीं दे रहे हैं। यहाँ तक कि चुनाव आयोग भी बता चुका है कि बिहार SIR को लेकर कॉन्ग्रेस हो या आरजेडी, किसी ने भी एक भी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई ही नहीं है।

राहुल ने सासाराम की रैली में कहा कि जहाँ भी चुनाव होते हैं, वहाँ बीजेपी गड़बड़ी करके जीत हासिल करती है। उन्होंने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच वोटरों की संख्या में अंतर का हवाला दिया। राहुल ने दावा किया कि जाँच में पता चला कि एक करोड़ नए वोटर जोड़े गए, जिससे बीजेपी को फायदा हुआ।

राहुल ने कर्नाटक का उदाहरण देते हुए कहा कि एक विधानसभा में एक लाख वोटों की चोरी हुई, जिसके चलते बीजेपी ने वहाँ जीत हासिल की। यहाँ भी चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से शिकायत दर्ज कराने को कहा, लेकिन कॉन्ग्रेस ने इसकी जहमत नहीं उठाई। यही नहीं, चुनाव आयोग ने साफ कहा था कि मतदाता सूची 2 बार कॉन्ग्रेस के साथ साझा की गई थी, लेकिन कॉन्ग्रेस ने एक बार भी शिकायत दर्ज नहीं कराई।

सासाराम में राहुल गाँधी (फोटो साभार : INC Bihar)

राहुल ने चुनाव आयोग पर भी निशाना साधा और कहा कि जब उन्होंने इस मुद्दे को उठाया, तो आयोग ने उनसे एफिडेविट माँगा, लेकिन बीजेपी से कोई सवाल नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने वोटिंग की वीडियोग्राफी देने से भी इनकार कर दिया। राहुल ने बिहार की जनता को भरोसा दिलाया कि वे बिहार का चुनाव चोरी नहीं होने देंगे।

रैली में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता तेजस्वी यादव ने भी भाषण दिया। उन्होंने कहा कि बिहार में वोट का अधिकार छोटे लोगों का राज है, जैसा कि लोहिया और लालू यादव कहते थे। तेजस्वी ने बीजेपी और चुनाव आयोग पर मिलीभगत का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में गड़बड़ी करके लोगों के वोट छीने जा रहे हैं।

तेजस्वी ने तंज कसते हुए कहा कि जिन लोगों को मृत घोषित किया गया, उनके साथ राहुल गाँधी ने चाय पी, जो चुनाव आयोग की नाकामी को दिखाता है। उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र पर डकैती’ करार दिया और कहा कि बिहार की जनता धोखा नहीं सहेगी।

चारा-चोरी के दोषी ने भी वोट चोरी पर रखी बात

चारा-चोरी के मामले में सजायाफ्ता और मौजूदा समय में मेडिकल ग्राउंड पर चल रहे लालू यादव ने भी रैली को संबोधित किया। खुद सरकारी खजाने से फंड चोरी के दोषी ने कहा- “चोरों को हटाइए, बीजेपी को भगाइए, हमारी पार्टी को जिताइए।” आखिर में उन्होंने कहा- “लागल-लागल झुलनिया में धक्का, बलम कलकता चले. राहुल गाँधी जिंदाबाद, खड़गे जी जिंदाबाद, तेजस्वी यादव जिंदाबाद।” और बेटे के जिंदाबाद का नारा लगाकर मंच पर बैठ गए।

उधर, बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने राहुल गाँधी पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि बिहार में जननायक सिर्फ कर्पूरी ठाकुर हैं, और राहुल गाँधी को ‘तिरंगे का खलनायक’ करार दिया। मालवीय ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस ने अपने पोस्टर से तिरंगे का भगवा रंग हटाकर ‘घुसपैठिया बचाओ यात्रा’ शुरू की है, जो सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है। उन्होंने दावा किया कि बिहार की जनता इसका जवाब देगी।

‘वोटर अधिकार यात्रा’ बिहार में विपक्ष की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। यह यात्रा न सिर्फ मतदाता जागरूकता बढ़ाने की कोशिश है, बल्कि विपक्ष जनता को एकजुट करना चाहता है। इस अभियान से बिहार विधानसभा चुनाव में नया माहौल बन सकता है। हालाँकि इंडी गठबंधन इसमें कितना सफल हो पाएगा, ये देखने वाली बात होगी।

न माथ से बिंदी हटी, न हिली कटार: धराली में मलबे से निकली 400 साल पुरानी राजराजेश्वरी माता की प्रतिमा देख ग्रामीण हैरान, बताया- 2 अग्निकांड भी नहीं पहुँचा पाए थे मूर्ति को नुकसान

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली में बीते 5 अगस्त को आए सैलाब के बाद लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इस बीच आपदा के 12वें दिन रेस्क्यू टीम को करीब 400 साल पुरानी माँ राजराजेश्वरी की चाँदी की मूर्ति पूरी तरह सुरक्षित मिली है। यह मूर्ति मलबे में करीब 25 फीट नीचे दबी थी। हैरानी की बात यह है कि इस मूर्ति को लगाई गई बिंदी भी जस की तस थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मूर्ति एक पेड़ के नीचे दबी मिली है। साथ ही, गलाणथोक की कुलदेवी माँ राजराजेश्वरी के साथ रखी कटार और 5 पांडवों व भगवान शिव की पंचमुखी मूर्तियाँ भी सुरक्षित मिली हैं।

धराली गाँव के प्रवेश द्वार के पास राजराजेश्वरी माता का देवदार से बना प्राचीन मंदिर था। इसी मंदिर में हिमाचल प्रदेश से लाई गई यह मूर्ति भी रखी थी। सैलाब में यह मंदिर ध्वस्त हो गया और मूर्ति मलबे में दब गई थी।

शनिवार (16 अगस्त) को एक ग्रामीण को माता की चुनरी दिखाई दी जिसके बाद उन्होंने बीआरओ से उस स्थान पर खुदाई करने की माँग की थी। इस खुदाई के दौरान प्राचीन मंदिर से कुछ ही फीट की दूरी पर करीब 25 फीट नीचे माँ राजराजेश्वरी की व अन्य मूर्तियाँ सुरक्षित मिलीं।

ग्रामीणों ने मूर्ति को सुरक्षित निकालकर माँ राजराजेश्वरी की पूजा अर्चना की है। फिलहाल माता की मूर्ति को एक होटल के कमरे में विराजित किया गया है। ग्रामीणों ने इस घटना को चमत्कार बताते हुए कहा है कि आपदा का दौर बीतने के बाद भव्य मंदिर तैयार कर उसमें माता की मूर्ति को स्थापित किया जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि यह तीसरी बार है जब आपदा की स्थिति में माँ की मूर्ति सुरक्षित मिली है। बताया जा रहा है कि इस गाँव में 1971 व 1982-83 में दो बार भीषण अग्निकांड हुआ था और तब भी माता की मूर्ति वाला भवन आग की चपेट में आने से बचा रहा था।

धराली में आए सैलाब के बाद से ही रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। रेस्क्यू टीमें लगातार लापता लोगों को तलाशने में जुटी हुई हैं। सर्च टीमें लापता लोगों को ढूंढने के लिए तकनीक का बडे़ स्तर पर इस्तेमाल कर रही है। साथ ही, धराली के लोगों के पुनर्वास की प्रक्रिया भी तेजी से चल रही है।

15 जगह दिखाकर कहा- महिलाएँ-बच्चे यहीं दफन, कर्नाटक SIT ने 17 जगहों पर की खुदाई पर कोई सबूत नहीं मिला: क्या धर्मस्थल को बदनाम करने की थी साजिश?

कर्नाटक के धर्मस्थल में सामूहिक दफन का मामला अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। SIT की खुदाई में अब तक कोई बड़ा सबूत नहीं मिला है। एक सफाईकर्मी ने आरोप लगाया था कि धर्मस्थल में महिलाओं और बच्चियों के शवों को दफनाया गया और उनके शरीर पर यौन उत्पीड़न के निशान भी थे। उसने 15 जगहों का भी जिक्र किया था। SIT ने 17 जगहों की छानबीन कर खुदाई की, लेकिन अभी तक कुछ हाथ नहीं लगा है।

इस मामले में राजनीति गरमा गई है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि मंदिर को बदनाम किया जा रहा है और साजिश करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। वहीं, कॉन्ग्रेस ने बीजेपी पर आरोप मढ़ते हुए इसे राजनीति का नाम दिया है और कहा कि अगर आरोप झूठे साबित हुए तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कैसे शुरू हुआ मामला

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब धर्मस्थल मंदिर के एक पूर्व सफाईकर्मी ने आरोप लगाया था कि उसे 1995 से 2014 के बीच महिलाओं और लड़कियों के शवों को दफनाने के लिए मजबूर किया गया था।

सफाईकर्मी ने 3 जून को अपनी शिकायत के साथ कुछ ‘सबूत’ भी दिखाए थे। एक हफ्ते बाद, वह अपनी पहचान छिपाकर और नाकाब के साथ चेहरा ढके कोर्ट में पेश हुआ था। उसने कुछ हड्डियाँ भी दिखाईं और कहा कि ये कब्र से निकाली गई हैं। मामले में एक महिला ने भी शिकायत दर्ज कर बताया था कि उसकी बेटी धर्मस्थल यात्रा के दौरान लापता हो गई थी।

SIT की जाँच

यह पूरा मामला बहुत गंभीर था। इसलिए, कर्नाटक सरकार ने इसकी जाँच के लिए 19 जुलाई 2025 को एक SIT गठित की। शिकायत करने वाले ‘सफाईकर्मी’ ने टीम को 15 जगहों के बारे में बताया, जहाँ शव दफनाने का आरोप था। SIT ने 17 जगहों की खुदाई शुरू कर दी।

खोदे गए 17 स्थानों में से कुछ भी नहीं मिला। यहाँ तक कि उस व्यक्ति ने कोर्ट में जो खोपड़ी दी थी, वह भी एक आदमी की निकली। जाँच से पता चला कि वह खोपड़ी करीब 30 साल पहले मरे हुए एक शख्स की थी। खुदाई के समय एक जगह पर कुछ पहचान पत्र भी मिले, जो एक ऐसे व्यक्ति के थे जिसकी बीमारी से मौत हो चुकी थी।

सफाईकर्मी ने दावा किया था कि एक जगह पर 16 फीट की गहराई में 60 से 100 शवों को दफन किया गया था। SIT ने रडार से वहाँ की भी जाँच की, लेकिन कुछ नहीं मिला। जाँच के दौरान सफाईकर्मी का बर्ताव भी थोड़ा अजीब था।

एक जगह की खुदाई करते समय, उसे अचानक याद आया कि असली जगह तो वहाँ से 150 मीटर दूर है। जब टीम वहाँ गई तो उन्हें जमीन पर 81 हड्डियाँ मिलीं, जो दफन नहीं थीं।

जो हड्डियाँ मिली थीं, उन्हें डॉक्टरों ने देखा। पहली नजर में ये हड्डियाँ किसी आदमी की लग रही थीं। वहाँ एक पेड़ से लटकी हुई लाल साड़ी भी मिली। पास में मर्दों के कपड़े भी पड़े थे। डॉक्टरों का कहना है कि यह आत्महत्या का मामला लग रहा है। जब उस जगह की खुदाई की गई तो वहाँ और कुछ नहीं मिला।

SIT अब एक और जगह की जाँच करेगी। यह वह जगह है जहाँ एक दूसरे गवाह ने कहा था कि उसने एक 13 साल की बच्ची को दफनाते देखा था।

SIT ने पहले ही दो जगहों से मिले कंकालों के मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है। वे इसकी जाँच कर रहे हैं। साथ ही, वे लापता हुई अनन्या भट्ट के मामले की भी जाँच कर रहे हैं। अनन्या की माँ ने उसकी गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी।

राजनीति और परिणाम

धर्मस्थल में जो कुछ हो रहा था, उसे लेकर वहाँ के पुजारी और भक्तों ने ‘सफाईकर्मी’ और उसका समर्थन करने वालों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। ये लोग धर्मस्थल पुजारियों पर झूठे आरोप लगा रहे थे।

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को कहा कि धर्मस्थल की छवि खराब करने की जो कोशिश की जा रही है, उसकी जाँच से सच्चाई सामने आ जाएगी। डीके शिवकुमार ने यह भी चेतावनी दी कि अगर धर्मस्थल में ‘सामूहिक दफन’ की बात झूठी निकली तो सख्त कदम उठाए जाएँगे।

वहीं, बीजेपी ने शनिवार (16 अगस्त 2025) को धर्मस्थल मंदिर तक एक बड़ी रैली निकाली। इस रैली में उन्होंने उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की, जो मंदिर की छवि को बदनाम करने की साजिश रच रहे।

बीजेपी नेता एसआर विश्वनाथ ने बताया कि पार्टी पहले चुप थी क्योंकि उन्हें लगा था कि आरोपों में कुछ सच्चाई हो सकती है। लेकिन, अब जब खुदाई में कोई शव नहीं मिल पाया है तो पार्टी ने मंदिर के पक्ष में खड़े होने का फैसला किया है। वे इस झूठे प्रचार के खिलाफ हैं। फिल्हाल सफाईकर्मी राज्य सरकार की सुरक्षा में है।

प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली को दी ₹11 हजार करोड़ की सौगात: द्वारका एक्सप्रेसवे और UER-II का उद्घाटन भी किया, अब 20 मिनट में पूरा होगा दिल्ली से गुरुग्राम का सफर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (17 अगस्त 2025) को दिल्ली-NCR के दो बड़े सड़क प्रोजेक्ट्स ‘अर्बन एक्सटेंशन रोड-II’ (UER-II) और ‘द्वारका एक्सप्रेसवे’ के दिल्ली सेक्शन का उद्घाटन कर दिया। इन नई सड़कों के शुरू होने से अब गुरुग्राम से दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI एयरपोर्ट) तक का सफर सिर्फ 20 मिनट में पूरा हो सकेगा। इससे लाखों यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी और दिल्ली-NCR के ट्रैफिक की समस्या भी काफी हद तक कम होगी। इसकी लागत ₹11000 करोड़ से भी अधिक है।

इन सड़कों के चालू होने से दिल्ली-NCR के पश्चिमी इलाकों से आने-जाने वाले लोगों का सफर अब पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। अभी तक इन इलाकों से आने वाले लोगों को दिल्ली की व्यस्त रिंग रोड से होकर गुजरना पड़ता था, जहाँ ट्रैफिक जाम की वजह से घंटों लग जाते थे। लेकिन अब UER-II और द्वारका एक्सप्रेसवे के खुलने से रिंग रोड पर गाड़ियों का बोझ कम होगा। इसका फायदा न सिर्फ रिंग रोड, बल्कि NH-48, NH-44 और बारापुला जैसे बड़े रास्तों पर भी दिखेगा, जहाँ अब जाम में फंसने की परेशानी कम होगी।

उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री मोदी के साथ केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और कई बड़े भाजपा नेता मौजूद रहे। इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि ये सड़कें न सिर्फ यात्रा को आसान बनाएँगी, बल्कि दिल्ली-NCR के विकास को भी नई गति देंगी।

UER-II: दिल्ली की नई आउटर रिंग रोड

ER-II दिल्ली की एक नई सड़क है, जो अलीपुर से शुरू होकर महिपालपुर तक जाती है। यह सड़क 76 किलोमीटर लंबी है और इसे बनाने में करीब 6,445 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह पाँच हिस्सों में बनकर तैयार हुई है। इस सड़क की खास बात यह है कि यह गुरुग्राम, वेस्ट दिल्ली और साउथ दिल्ली के लोगों के लिए सफर को बहुत आसान बना देगी। अब लोगों को ट्रैफिक से भरे पुराने रास्तों से नहीं गुजरना पड़ेगा।

यह सड़क NH-44 से सीधे जुड़ती है, जिससे चंडीगढ़, पंजाब और जम्मू-कश्मीर की यात्रा भी आसान हो जाएगी। धौला-कुआँ और रिंग रोड जैसे इलाकों में अब ट्रैफिक जाम की समस्या कम होगी। UER-II में आठ लेन हैं, साथ ही सर्विस रोड, चार बड़े इंटरचेंज और कई अंडरपास भी बनाए गए हैं, जिससे यातायात सुगम रहेगा।

UER-II को दिल्ली मास्टर प्लान 2021 के हिसाब से बनाया गया है। यह सड़क दिल्ली में 54 किलोमीटर और हरियाणा में 21 किलोमीटर लंबी है। इसे दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे से भी जोड़ा जा रहा है। साथ ही, एक नई 65 किलोमीटर लंबी सड़क बन रही है, जो ट्रॉनिका सिटी से FNG एक्सप्रेसवे तक जाएगी। इससे नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद जैसे इलाकों के हाईवे भी आपस में जुड़ जाएंगे।

खास बात यह है कि UER-II बनाने में 10 लाख मीट्रिक टन पुराने मलबे का इस्तेमाल किया गया, जो दिल्ली के कूड़ेदानों से निकाला गया था। इससे न सिर्फ सड़क बनी, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा हुआ।

द्वारका एक्सप्रेसवे से IGI एयरपोर्ट तक तेज रास्ता

द्वारका एक्सप्रेसवे का दिल्ली वाला हिस्सा 10 किलोमीटर लंबा है। इसमें 5 किलोमीटर से ज्यादा लंबी एक सुरंग भी शामिल है, जो सीधे IGI एयरपोर्ट तक जाती है। इस सुरंग की वजह से एयरपोर्ट तक पहुँचना अब बहुत आसान और तेज हो गया है। इस एक्सप्रेसवे का हरियाणा वाला हिस्सा मार्च 2024 में पहले ही शुरू हो चुका था। अब दिल्ली वाला हिस्सा भी चालू होने से गुरुग्राम और दिल्ली के बीच का सफर और भी आरामदायक हो गया है।

इन दोनों सड़कों की वजह से दिल्ली के अंदर के रास्तों पर ट्रैफिक का दबाव कम होगा। लोग अब बाहर से आने-जाने के लिए इन नए रास्तों का इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे दिल्ली-NCR में रहने वाले लोगों का समय बचेगा और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी आसान होगी।