ड्रग तस्करी रैकेट चलाने वाला भोपाल का यासीन मछली और उसके चाचा सारिक मछली ने हिंदू पर अत्याचार किया। हिंदू की जमीन को अतिक्रमण बताकर ढहा दिया। जहाँ रेव पार्टियाँ होती थी, उसी फार्महाउस में ले जाकर बँधकर बनाया। यहाँ तक की झूठे मामले में FIR भी करवा दी। अब पीड़ित राजेश तिवारी ने सामने आकर आपबीती सुनाई है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, राजेश तिवारी ने बताया कि साल 2021 में सारिक ने गणेश झाँकी में अपने और उसके करीबी मंत्री का बैनर लगाने का दबाव बनाया था। राजेश ने वह धार्मिक कार्य में राजनीतिक व्यक्ति के बैनर नहीं लगाते हैं। तभी से सारिक ने उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
दुकान को तुड़वाया, मंदिर बनाकर कब्जे से बचाई
राजेश तिवारी बताते हैं कि सारिक मछली उनकी अशोका गार्डन इलाके में बनी दुकान पर कब्जा करना चाहता था। सारिक ने दुकान को अतिक्रमण बताकर तुड़वा दिया। राजेश ने अपनी जमीन बचाने के लिए वहाँ मंदिर बनवा दिया, जिसके बाद सारिक ने हिंदू स्थल होने के चलते जमीन को छोड़ दिया।
इस बात का बदला लेने के लिए 29 सितंबर 2021 को सारिक और उसके तीन गुर्गे लाल रंग की थार में आए और बंदूक की नोक पर राजेश तिवारी को अगवा कर ले गए। राजेश को उसी हथाईखेड़ के फार्महाउस ले जाया गया, जहाँ रेव पार्टियाँ आयोजित की जाती थीं। यहाँ अलग-अलग कमरों में लड़कियों को बंधक बनाके रखा गया था।
पुलिस की जाँच में भी सामने आया था फार्महाउस में लड़कियों को नशा देकर दुष्कर्म किया जाता था। राजेश तिवारी के साथ भी इसी फार्महाउस में लूट मचाई गई।
‘पंडित’ राजेश तिवारी पर बकरी खरीदने का आरोप लगाकर फँसाया
राजेश तिवारी को फार्महाउस में 16 घंटे तक बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा गया। इस दौरान सारिक ने राजेश से ₹50 हजार रुपए भी वसूल लिए। बाद में इन पैसों के जरिए बेबुनियाद आरोप में फँसाया गया।
राजेश बताते हैं कि सारिक ने जिस व्यक्ति के मोबाइल में ₹50 हजार ट्रांसफर करवाए थे, उसने पुलिस के सामने झूठा बयान दिया। उस व्यक्ति ने कहा कि बकरा खरीदने के बदले राजेश तिवारी से यह पैसे लिए गए हैं। राजेश कहते हैं कि वह पंडित आदमी हैं और इस झूठे आरोप से उनके परिवार की काफी बदनामी हुई।
इतना ही नहीं सारिक ने किसी मंत्री का संरक्षण लेकर राजेश तिवारी के खिलाफ रेप और हत्या के झूठे आरोप भी लगाए। इसके चलते राजेश तिवारी को अपनी नौकरी से निकाल दिया गया। राजेश ने बताया कि हत्या मामले में फरियादी सारिक का कोई करीबी है।
वहीं, जब सारिक के खिलाफ शिकायत करने राजेश तिवारी थाने पहुँचे, तो पुलिस ने 15 दिन तक FIR दर्ज नहीं की थी।
यासीन मछली पर हिंदू युवती के रेप में FIR दर्ज
भोपाल में ड्रग तस्करी के आरोप में पकड़े गए यासीन मछली और चाचा सारिक मछली ने सालों से लोगों पर अत्याचार किए। युवाओं को नशे में धखेलने का काम करते थे। इससे पहले एक हिंदू युवती ने भी यासीन मछली पर रेप का मुकदमा दर्ज करवाया था।
युवती ने शिकायत में बताया था कि करीब एक साल पहले एक पब में यासीन से मुलाकात हुई थी। यासीन ने युवती से दोस्ती की। दोनों के बीच बातचीत बढ़ने लग गईं। यासीन ने युवती को शादी का झाँसा देकर फाइव स्टार में बुलाया और रेप किया।
युवाओं को रेव पार्टी में बुलाकर नशे की लत डालते
यासीन मछली भोपाल में युवाओं को टारगेट कर रेव पार्टी में बुलाता था। इस काम के लिए कई पब और लॉन्ज अड्डा बने हुए थे। पार्टी में आने वाली हिन्दू लड़कियों को ड्रग्स की डिलीवरी के लिए इस्तेमाल करता था। इन लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर उनका रेप करता और फिर ब्लैकमेल करता था। रेव पार्टियों से जुड़े कई वीडियो भी पुलिस के हाथ लगे थे।
वह शहर के बाहरी इलाकों में रेव पार्टी आयोजित करता था। इन पार्टियों में एंट्री के लिए 10 से 25 हजार रुपए वसूले जाते थे। पार्टी में ड्रग्स के लिए अलग से रकम ऐंठी जाती थी। इस पूरे काले कारोबार में यासीन मछली और उसका परिवार शामिल था।
यासीन के परिवार ने 55 साल में अवैध काम कर खड़ा किया ‘साम्राज्य’
ड्रग तस्कर यासीन मछली के परिवार ने 55 साल में अवैध कारोबार के जरिए बड़ा साम्राज्य खड़ा किया। यासीन का परिवार 1970 से पहले बुधवारा में रहता था और मछलियों की दलाली करता था। इसके बाद हथाईखेड़ा आया और यहाँ मछली पालने का ठेका लिया।
1980 में राजनीतिक पार्टियों की मदद कर इलाके में दबदबा बनाया। राजनीतिक मदद से ही मुस्लिमों की बस्ती बसा ली और पत्थर खदानों ने अवैध खनन शुरू किया।
जानें पूरा मामला
18 जुलाई 2025 को भोपाल के गोविंदपुरा से सैफुद्दीन और आशू उर्फ शाहरुख को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से ₹3 लाख और बड़ी मात्रा में ड्रग्स बरामद की गई। इन्हीं की निशानदेही पर ड्रग तस्करी का सरगना शाहवर मछली और उसका भतीजा यासीन मछली को क्राइम ब्रांच ने दबोचा। दोनों के पास से 3 ग्राम एमडी ड्रग और एक देशी पिस्टल बरामद की गई थी।
जाँच में सामने आया कि यासीन और उसके चाचा शाहवर ड्रग्स तस्करी का धंधा करते थे। मुंबई, राजस्थान और पंजाब से चरस और अन्य ड्रग्स लाते थे। फिर इन्हें शहर के पब, लाउंज और क्लब में पार्टियों में बेचा करते थे। ड्रग्स की डिलीवरी के लिए हिंदू लड़कियों को इस्तेमाल किया जाता था।
युवाओं के लिए रेव पार्टी आयोजित कर उन्हें नशे की लत लगाते थे। ये दोनों हिंदू लड़कियों का शारीरिक शोषण करते थे और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव भी बनाते थे।
15 अगस्त को भारत अपना 79वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस स्वतंत्रता की खातिर लाखों लोगों ने अपनी बलिदानी दी । कुछ क्रांतिकारियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन कई ऐसे भी रहे जिन्हें भुला दिया गया। इनमें से एक नाम है उमाकांत कड़िया का।
महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) की शुरुआत 8 अगस्त 1942 को हुई थी। इस आंदोलन का देशव्यापी असर हुआ और आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा मिली। इस आंदोलन के पहले नायक अहमदाबाद के उमाकांत कड़िया थे। वे स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे।
भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत
जब यह आंदोलन शुरू हुआ, उस वक्त एक तरफ दुनिया में दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था और दूसरी तरफ भारत में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष तेज हो गया था। कॉन्ग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। ब्रिटिश सरकार ने जवाब में कॉन्ग्रेस के सभी बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया और आंदोलन को दबाने के लिए बल प्रयोग किया।
8 अगस्त को गाँधीजी द्वारा ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिए जाने के अगले ही दिन, यानी 9 अगस्त 1942 को, अहमदाबाद में भी विरोध शुरू हो गया। अंग्रेजों ने यहाँ भी कॉन्ग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारियाँ शुरू कर दीं, लेकिन प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे थे। जगह-जगह जुलूस और रैलियाँ निकलने लगीं। अंग्रेजों ने आंदोलन को दबाने के लिए क्रान्तिकारियों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं।
पहले बलिदानी: उमाकांत कड़िया
उमाकांत मोतीराम कड़िया, अहमदाबाद के दरियापुर इलाके के रहने वाले थे। आंदोलन के समय उनकी उम्र सिर्फ 21 साल थी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवक थे और शाखा के मुख्य शिक्षक भी थे। संघ के स्वयंसेवकों के अनुसार, उमाकांत संघ की विचारधारा को लेकर पूरी तरह समर्पित थे और शाखा के कार्यों में सक्रिय रहते थे।
स्वाधीनता आंदोलन में 9/8/1942 के दिन #RSS की शाखा के मुख्य शिक्षक, अपने माता-पिता के एकमात्र पुत्र ऐसे श्री उमाकांत कडियाने 1942 'भारत छोडो आंदोलन' में बलिदान' दिया, उस उनके साथ 14 वर्ष के चिनुदादा आज वीर बलिदानी उमाकांत की बात बताते है। @vskgujarat@editorvskbharat@RSSorgpic.twitter.com/aee5B7WGML
9 अगस्त को जब प्रदर्शन शुरू हुआ तो उमाकांत सबसे आगे खड़े थे। भीड़ में किसी ने उन्हें पीछे हटने को कहा, लेकिन वे डटे रहे। एक युवा में इतनी निडरता देख, एक अंग्रेज ने उन पर गोली चलाई, जो सीधे उनके माथे पर लगी और वहीं उनकी मौत हो गई। इस तरह उमाकांत भारत छोड़ो आंदोलन में वीरगति पाने वाले पहले युवक बने।
अहमदाबाद के खाडिया इलाके में जहाँ यह घटना हुई, वहाँ बाद में एक स्मारक बनाया गया। उस पर लिखा है कि उमाकांत मोतीराम कड़िया ने यहीं शहादत प्राप्त की थी। वे इस आंदोलन के प्रथम बलिदानी थे।
उमाकांत के बलिदान के अगले ही दिन, 10 अगस्त को लॉ कॉलेज के छात्रों ने एक रैली निकाली। जब यह रैली गुजरात कॉलेज पहुँची, तो और छात्र भी जुड़ गए। अंग्रेजों ने रैली को रोकने के लिए लाठीचार्ज और फिर गोलीबारी की।
इस दौरान विनोद किनारीवाला नाम के एक युवा ने भारतीय तिरंगा फहराने की कोशिश की और एक ब्रिटिश अफसर ने उन्हें गोली मार दी। विनोद ने भी इस आंदोलन में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
उमाकांत कड़िया जैसे स्वयंसेवकों का बलिदान यह सिद्ध करता है कि RSS ने भारत की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। हालाँकि अक्सर कॉन्ग्रेस और वामपंथी विचारधारा द्वारा इसे नजरअंदाज ही किया जाता रहा है।
ऐसे ही कई स्वयंसेवकों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और उमाकांत जैसे कई स्वयंसेवकों ने देश प्रेम को प्राणों से भी ऊपर रखा। उमाकांत कड़िया 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में देश के पहले बलिदानी थे, जिन्हें कॉन्ग्रेस ने नजरअंदाज किया। यहाँ तक कि इतिहास में भी उनका नाम देश के पहले बलिदानी नहीं बल्कि गुजरात के पहले बलिदानी के रूप में लिखा गया।
कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। सावरकर मानहानि केस में पुणे की अदालत में उनके वकील ने उनकी जान को खतरा बताते हुए एक अर्जी दायर की थी। इस अर्जी ने राजनीतिक गलियारों में तूफान मचा दिया। लेकिन अब खबर है कि राहुल ने इस अर्जी से खुद को अलग कर लिया है।
कॉन्ग्रेस की आईटी सेल प्रमुख सुप्रिया सुनेत ने एक्स पर पोस्ट कर बताया कि ये अर्जी बिना राहुल की सहमति के दायर की गई थी और वो इस बात से बेहद नाराज हैं। गुरुवार को उनके वकील इस बयान को कोर्ट से वापस लेंगे। इस पूरे घटनाक्रम ने कॉन्ग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
ये पूरा विवाद विनायक दामोदर सावरकर से जुड़ा है। मार्च 2023 में लंदन में एक भाषण के दौरान राहुल गाँधी ने सावरकर की रचनाओं का हवाला देते हुए दावा किया था कि सावरकर ने अपनी किताब में लिखा था कि उन्होंने और उनके पाँच-छह दोस्तों ने एक मुस्लिम व्यक्ति की पिटाई की थी और उन्हें इस बात पर खुशी हुई थी।
इस बयान को सावरकर के वंशज सत्यकी सावरकर ने अपमानजनक माना और राहुल के खिलाफ पुणे की स्पेशल MP-MLA अदालत में मानहानि का केस दर्ज कराया था।
इस बीच, बुधवार (13 अगस्त 2025) को राहुल के वकील मिलिंद दत्तात्रय पवार ने कोर्ट में एक अर्जी दायर की, जिसमें दावा किया गया कि सत्यकी सावरकर की वंशावली को देखते हुए राहुल की जान को खतरा है। अर्जी में कहा गया कि सत्यकी, नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे यानी महात्मा गाँधी की हत्या के मुख्य आरोपितों के मातृ पक्ष से जुड़े हैं।
इसके अलावा, सत्यकी का सावरकर से भी संबंध होने का दावा किया गया। अर्जी में ये भी जिक्र था कि सावरकर की विचारधारा और उनके अनुयायियों की हिंसक प्रवृत्तियों के इतिहास को देखते हुए राहुल को नुकसान पहुँचाए जाने या गलत फँसाए जाने का डर है।
अर्जी में और क्या था?
वकील ने अर्जी में कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी ने हाल ही में संसद में “वोट चोर सरकार” का नारा दिया और चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ सबूत पेश किए। इसके बाद उनकी राजनीतिक दुश्मनी बढ़ गई।
अर्जी में दो बीजेपी नेताओं की धमकियों का जिक्र था। केंद्रीय मंत्री रवीनीत सिंह बिट्टू ने राहुल को ‘देश का नंबर वन आतंकवादी’ कहा था, जबकि बीजेपी नेता तरविंदर सिंह मारवाह ने खुलेआम धमकी दी कि अगर राहुल ‘सही व्यवहार’ नहीं करेंगे, तो उनका अंजाम उनकी दादी इंदिरा गाँधी जैसा हो सकता है।
अर्जी में ये भी कहा गया कि महात्मा गाँधी की हत्या कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी, जो एक खास विचारधारा से जुड़ी थी। वकील ने कोर्ट से माँग की कि राहुल की सुरक्षा के लिए ‘निवारक उपाय’ किए जाएँ।
अर्जी के जरिए कहा गया कि ये कदम न केवल राहुल की जान बचाने के लिए जरूरी है, बल्कि ये राज्य का संवैधानिक कर्तव्य भी है। अर्जी में ये भी जिक्र था कि सत्यकी सावरकर अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर सकते हैं, जिससे राहुल को निशाना बनाया जा सकता है।
राहुल का यू-टर्न
लेकिन इस अर्जी के कुछ ही घंटों बाद कॉन्ग्रेस की ओर से सुप्रिया सुनेत का बयान आया, जिसने सबको हैरान कर दिया।
सुप्रिया श्रीनेता ने एक्स पर लिखा कि वकील ने राहुल से बिना पूछे ये अर्जी दायर की थी। राहुल ने इस पर सख्त आपत्ति जताई और इसे वापस लेने का फैसला किया। सुप्रिया ने वकील के प्रेस नोट को भी शेयर किया, जिसमें वकील ने माना कि उन्होंने राहुल की सहमति के बिना ये बयान कोर्ट में दिया। सुप्रिया ने लिखा, “राहुल गाँधी ने इस अर्जी के कंटेंट से असहमति जताई है। उनके वकील गुरुवार को इसे कोर्ट से वापस लेंगे।”
राहुल गांधी जी के वकील ने बिना उनसे बात किए या उनकी सहमति लिए अदालत में लिखित बयान दाखिल करके उनकी जान पर खतरे का हवाला दिया था.
इस बात से राहुल जी की घोर असहमति है.
इसलिए कल उनके वकील इस लिखित बयान को कोर्ट से वापस लेंगे.
ये पहली बार नहीं है जब राहुल गाँधी ने सावरकर को लेकर विवादित बयान दिए हों। 17 नवंबर 2022 को महाराष्ट्र के अकोला में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल ने एक रैली में सावरकर पर निशाना साधा था। उन्होंने एक चिट्ठी दिखाते हुए कहा कि सावरकर ने अंग्रेजों को लिखा था कि वो उनका नौकर बने रहना चाहते हैं और डर के मारे माफी माँगी थी।
राहुल ने कहा, “गाँधी, नेहरू और पटेल ने सालों तक जेल में समय बिताया, लेकिन उन्होंने कभी ऐसी चिट्ठी पर साइन नहीं किए। सावरकर ने ऐसा करके गाँधी और पटेल को धोखा दिया।”
इस बयान के बाद लखनऊ के वकील नृपेंद्र पांडे ने 14 जून 2023 को राहुल के खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कराया। पांडे ने आरोप लगाया कि राहुल ने सावरकर को ‘अंग्रेजों का नौकर’ और ‘पेंशनभोगी’ कहकर समाज में नफरत फैलाने की कोशिश की।
सुप्रीम कोर्ट से लग चुकी है फटकार
सावरकर पर राहुल के बयानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी 26 अप्रैल को उन्हें फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा, “हम स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ अनाप-शनाप बयानबाजी की इजाजत नहीं दे सकते। उन्होंने हमें आजादी दिलाई, और हम उनके साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं।” कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर राहुल ने भविष्य में ऐसा कोई बयान दिया, तो स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि, कोर्ट ने सावरकर मामले में राहुल के खिलाफ ट्रायल कोर्ट के समन पर रोक लगा दी थी।
कॉन्ग्रेस पर सवाल, नहीं चलेगा पुराना पैंतरा
इस पूरे घटनाक्रम ने कॉन्ग्रेस की रणनीति पर सवाल उठा दिए हैं। कुछ लोग इसे राहुल की छवि को चमकाने का हथकंडा बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर चर्चा गरम है कि पहले जान को खतरा बताकर सुर्खियाँ बटोरी गईं और अब अर्जी वापस लेकर नया ड्रामा रचा जा रहा है। एक यूजर ने लिखा, “कॉन्ग्रेस पहले डर का माहौल बनाती है, फिर सहानुभूति बटोरने के लिए अर्जी वापस लेती है। ये पुराना पैतरा अब नहीं चलेगा।”
अब सबकी नजर गुरुवार को पुणे कोर्ट की सुनवाई पर है। क्या वकील की अर्जी वाकई वापस ली जाएगी? और अगर हाँ, तो इसका सावरकर मानहानि केस पर क्या असर पड़ेगा? कॉन्ग्रेस की इस रणनीति का राजनीतिक फायदा होगा या नुकसान, ये भी देखने वाली बात होगी। फिलहाल, ये मामला कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी के लिए एक नई चुनौती बन गया है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कॉन्ग्रेसी राजनीति में ड्रामे और ट्विस्ट की कोई कमी नहीं है।
इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर संदीपा विर्क को 40 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग केस में ED ने गिरफ्तार किया है। उसने मनी लॉन्ड्रिंग के लिए फर्जी वेबसाइट बनाई थी। संदीपा विर्क को अक्सर सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार का समर्थन करते देखा गया है।
कौन हैं संदीपा विर्क
संदीपा सोशल मीडिया इन्फ्लएंसर हैं, जो इंस्टाग्राम पर 12 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। उनके इंस्टाग्राम आईडी के मुताबिक वह एक बिजनेसमैन और अभिनेत्री हैं। साथ ही hyboocare.com वेबसाइट की ऑनर हैं। मनी लॉन्ड्रिंग का मामले को लेकर 12 और 13 अगस्त को ईडी ने दिल्ली और मुंबई के कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। इसके बाद 14 अगस्त को संदीपा को हिरासत में लिया गया।
पूछताछ के दौरान संदीपा ने कहा कि hyboocare.com वेबसाइट त्वचा की देखभाल से जुड़ी प्रोडक्ट को बेचने का प्लेटफॉर्म है। जबकि ईडी का कहना है कि ये वेबसाइट मनी लॉन्ड्रिंग के लिए मुखौटा है।
सेतुरमन और संदीपा के करीबी रिश्ते
संदीपा विर्क और अब बंद हो चुके रिलायंस कैपिटल लिमिटेड के पूर्व निदेशक अंगाराई नटराजन सेतुरमन के बीच काफी करीबी रिश्ता था। सेतुरमन के घर पर भी ईडी ने तलाशी ली थी, उस वक्त गैरकानूनी लेन-देन से जुड़े दस्तावेज और फंड डायवर्जन समेत कई सबूत मिले थे, जिससे पता चलता है कि पर्सनल फायदे के लिए पैसों का दुरुपयोग किया गया।
ईडी की जाँच में सामने आया है कि 2018 में सेतुरमन को नियमों को ताक पर रख कर रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड ने 18 करोड़ रुपए का लोन दिया था। लोन का व्याज और मूलधन भी नहीं दिया गया। इसके बाद फिर 22 करोड़ रुपए का रिलायंस कैपिटल ने दिया। इसकी रकम अभी भी बकाया है।
पंजाब पुलिस ने इसको लेकर पहले एफआईआर दर्ज किया था। जिसके बाद पीएमएलए के तहत 12 अगस्त को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद ईडी ने जाँच शुरू की। इस दौरान एक व्यक्ति फारुख अली को पकड़ा गया जो खुद को संदीपा का मददगार बता रहा था। उसके बयान भी दर्ज किए गए।
वेबसाइट पर दिखाए गए प्रोडक्ट पर सवाल
संदीपा वर्क की वेबसाइट पर जो सौंदर्य उत्पाद बेचा जा रहा है। उसमें जो दावा किया जा रहा था वह उत्पाद में नहीं थे। एफडीए अप्रूवल भी फर्जी था और पोर्टल में कंज्यूमर रजिस्ट्रेशन का कोई ऑपशन नहीं था। ईडी का कहना है कि वेबसाइट की जाँच में पता चलता है कि इसके सोशल मीडिया, व्हाट्सअप नंबर निष्क्रिय हैं और पारदर्शिता का अभाव है। ये लोगों को गलत जानकारी देती है। ईडी इसकी जाँच भी कर रहा है।
पाकिस्तान के लोग सिंधु जल समझौते पर स्थाई मध्यस्थता अदालत (PCA) के फैसले को अपनी बड़ी जीत मानकर जश्न मना रहे हैं। शाहबाज शरीफ और आसिम मुनीर इसे भारत के खिलाफ कूटनीतिक कामयाबी बता रहे हैं, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि भारत एकतरफा इस समझौते को नहीं रोक सकता।
पाकिस्तान का मानना है कि यह फैसला उनकी पानी की सुरक्षा को मजबूत करता है। वो न सिर्फ जश्न में डूबे हैं, बल्कि भारत को मिसाइल हमले जैसी गीदड़भभकियाँ भी दे रहे हैं, जबकि कुछ समय पहले ही वो ऑपरेशन सिंदूर में बुरी तरह से मार खाए हैं।
दरअसल, ये बात है सिंधु जल समझौते की, जिसे भारत ने अस्थाई रूप से रोक दिया है। इस समझौते के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का पानी पाकिस्तान को मिलता है और अब स्थाई मध्यस्थता अदालत के फैसले को अपनी जीत बताकर पेश कर रहे हैं। हालाँकि भारत ने साफ कह दिया है कि इस फैसले का उसके लिए कोई मतलब नहीं है।
आखिर ये पूरा मामला क्या है और भारत क्यों इस कोर्ट के फैसले को नहीं मानता? इस बात को समझते हैं।
क्या है सिंधु जल समझौता?
सबसे पहले बात करते हैं कि ये सिंधु जल समझौता है क्या। 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से एक समझौता हुआ था, जिसे सिंधु जल समझौता कहते हैं। इसके तहत छह नदियों – सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज के पानी का बँटवारा हुआ। रावी, ब्यास और सतलुज का पूरा नियंत्रण भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का ज्यादातर पानी पाकिस्तान को देने का फैसला हुआ।
भारत को इन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का कुछ हद तक इस्तेमाल करने का हक मिला, जैसे बिजली बनाने के लिए, लेकिन पानी रोकने की इजाजत नहीं थी। इस समझौते की वजह से दोनों देशों के बीच पानी को लेकर बड़ा विवाद टलता रहा, भले ही 1965, 1971 और 1999 के युद्धों में तनाव रहा।
क्यों भड़का पाकिस्तान?
दरअसलस अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भाकत ने पाकिस्तान को लेकर बड़ा कदम उठाया और सिंधु जल समझौते को अस्थाई रूप से रोक दिया। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद नहीं करता, वह इस समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
इसी के बाद भारत ने जम्मू-कश्मीर के सिंधु गाँव के पास चिनाब नदी पर नेशनल हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की। पाकिस्तान को डर है कि इस प्रोजेक्ट से भारत इन नदियों का पानी रोक सकता है, जिससे उसकी खेती, बिजली और पीने के पानी की सप्लाई पर बुरा असर पड़ेगा।
पाकिस्तान की 80% खेती और 70% पानी की जरूरतें इन तीनों नदियों पर निर्भर हैं। लाहौर, कराची जैसे बड़े शहरों में पीने का पानी और टेक्सटाइल जैसे उद्योग, जो पाकिस्तान के 60% निर्यात का हिस्सा हैं, इन नदियों के पानी पर चलते हैं।
अगर पानी रुका, तो पाकिस्तान में खेती ठप हो सकती है, बिजली उत्पादन कम हो सकता है, और बड़े शहरों में पानी की किल्लत हो सकती है। यही वजह है कि पाकिस्तान बौखलाया हुआ है।
शाहबाज और मुनीर की गीदड़भभकी
पाकिस्तान के फौजी मुखिया जनरल आसिम मुनीर ने पहले बयान दिया था कि सिंधु जल समझौता उनके लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ है और वे पानी के मसले पर कभी झुकेंगे नहीं। उन्होंने भारत पर बलूचिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। इसके बाद शाहबाज शरीफ ने भी भारत को धमकी दी कि “पाकिस्तान अपने हक का एक बूँद पानी भी नहीं छोड़ेगा।” मुनीर ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर भारत डैम बनाएगा, तो पाकिस्तान मिसाइल से उसे उड़ा देगा।
पाकिस्तान की ये बयानबाजी कोई नई नहीं है। वह अक्सर भारत को डराने की कोशिश करता है, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगा। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत मई 2025 में पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमला किया था, जिसमें जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के अड्डे तबाह हुए। इसके बाद पाकिस्तान ने सीजफायर की गुहार लगाई थी।
स्थाई मध्यस्थता अदालत का फैसला क्या?
पाकिस्तान अब स्थाई मध्यस्थता अदालत (Permanent Court of Arbitration – PCA) के एक फैसले का हवाला दे रहा है। 27 जून 2025 को हेग में स्थित इस कोर्ट ने कहा कि भारत का सिंधु जल समझौते को एकतरफा रोकना गलत है, क्योंकि इस समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह समझौता बाध्यकारी है और इसे एकतरफा निलंबित नहीं किया जा सकता। इस फैसले को पाकिस्तान अपनी जीत बता रहा है।
लेकिन भारत ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कोर्ट अवैध है, क्योंकि इसका गठन ही 1960 के समझौते का उल्लंघन करके किया गया। भारत ने कभी इस कोर्ट को मान्यता नहीं दी और न ही इसके पहले के फैसलों को स्वीकार किया। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, वह इस समझौते से जुड़े किसी दायित्व को नहीं मानेगा।
स्थाई मध्यस्थता अदालत क्या है?
स्थाई मध्यस्थता अदालत (PCA) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो 1899 में हेग, नीदरलैंड्स में स्थापित हुई थी। यह देशों, संगठनों और निजी पक्षों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता और मंच प्रदान करती है। यह कोई पारंपरिक कोर्ट नहीं है, बल्कि एक ऐसा मंच है जो विवादों के लिए तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति करता है। इसका इस्तेमाल अक्सर अंतरराष्ट्रीय संधियों से जुड़े मामलों में होता है।
सिंधु जल समझौते में भी विवादों को सुलझाने के लिए एक तंत्र है, जिसमें तटस्थ विशेषज्ञ या मध्यस्थता अदालत शामिल हो सकती है। लेकिन भारत का कहना है कि PCA का गठन इस मामले में गलत तरीके से हुआ, क्योंकि पाकिस्तान ने एकतरफा इसे चुना, जबकि समझौते में दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है। भारत ने इस कोर्ट की वैधता को ही नकार दिया है।
भारत ने विश्व बैंक की क्यों नहीं सुनी?
सिंधु जल समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था, और इसमें विवादों को सुलझाने के लिए विश्व बैंक की भूमिका भी तय थी। लेकिन भारत ने हमेशा कहा है कि वह इस समझौते को तभी मानेगा, जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए।
साल 2016 में उरी हमले के बाद भी भारत ने इस समझौते की समीक्षा की बात की थी, लेकिन इसे रद्द नहीं किया। इस बार, पहलगाम हमले के बाद भारत ने साफ कर दिया कि वह विश्व बैंक या किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के दबाव में नहीं आएगा।
भारत का तर्क है कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है, जिसके चलते वह समझौते के नियमों का पालन करने का हक खो चुका है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि PCA का फैसला ‘पाकिस्तान की नौटंकी’ है, जिसका मकसद आतंकवाद से ध्यान हटाना है।
भारत के लिए इस फैसले का कोई महत्व क्यों नहीं?
भारत के लिए PCA के फैसले का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि भारत इस कोर्ट को मान्यता ही नहीं देता। भारत का कहना है कि यह कोर्ट गैरकानूनी तरीके से बनाया गया और इसका कोई भी फैसला भारत पर लागू नहीं होता। दूसरा, भारत ने साफ किया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति को प्राथमिकता देगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा है, और वह ऐसी नौटंकी करके दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है।
इसके अलावा भारत का कहना है कि सिंधु जल समझौता 1969 की वियना संधि के तहत आता है, जिसमें किसी समझौते को एकतरफा खत्म करने के लिए ‘भौतिक उल्लंघन’ जैसे गंभीर आधार चाहिए। भारत का मानना है कि पाकिस्तान का आतंकवाद को समर्थन देना ऐसा ही उल्लंघन है।
बहरहाल, पाकिस्तान की बयानबाजी और PCA के फैसले को जीत बताने की कोशिश को भारत ने ‘फर्जी नौटंकी’ करार दिया है। भारत का कहना है कि वह अपने हितों और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखेगा। अगर पाकिस्तान आतंकवाद बंद नहीं करता, तो भारत और सख्त कदम उठा सकता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक रेप मामले में फरार आरोपित मीर उस्मान अली को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने मंगलवार (12 अगस्त 2025) को यूपी के गाजियाबाद गिरफ्तार कर लिया।
CBI के मुताबिक, तकनीकी जानकारी और लगातार मेहनत के बाद मीर उस्मान अली उर्फ आरा गाजियाबाद के इलायचीपुर इलाके में एक मस्जिद के पास से पकड़ा गया। यह मामला 30 अगस्त 2021 को दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप था कि 4 मई 2021 को उस्मान अली ने पीड़िता के घर में घुसकर उसके साथ बलात्कार किया।
CBI Arrests Absconding Accused in a Rape Case related to Post Poll Violence during State Assembly Elections in West Bengal pic.twitter.com/TCYjAOlbwO
— Central Bureau of Investigation (India) (@CBIHeadquarters) August 13, 2025
रिपोर्ट्स के मुताबिक, CBI ने 5 मई 2022 को तमलुक, पुरबा मेदिनीपुर की विशेष अदालत (SC/ST POA एक्ट) में उस्मान अली के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। 25 सितंबर 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी, लेकिन CBI ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट में नोटिस भेजने के बावजूद न तो उस्मान और न ही उसका वकील पेश हुआ। इसके बाद 2 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस्मान के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया और CBI को उसे 13 अगस्त को कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया। CBI ने आखिरकार उसे पकड़ लिया और उसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया।
CBI ने बताया कि उस्मान अली, जिसे मीर उस्मान अली या आरा के नाम से भी जाना जाता है.. वो लंबे समय से फरार था। हाल ही में CBI ने 2021 की चुनाव बाद हिंसा के मामलों में सक्रियता दिखाई है। जुलाई में तृणमूल कॉन्ग्रेस के एक विधायक और कोलकाता नगर निगम के दो पार्षदों को इस हिंसा से जुड़े एक मामले में आरोपित बनाया गया था। हालाँकि, तृणमूल कॉन्ग्रेस का कहना है कि यह बीजेपी की साजिश है, ताकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पार्टी पर दबाव बनाया जाए।
अमेरिका ने हाल ही में दुनिया के 90 देशों पर सख्त टैरिफ लगा दिया है। ट्रंप का मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली अमेरिका के साथ अन्याय कर रही है और इसी सोच के तहत उन्होंने ये कड़े कदम उठाए हैं।
शुरुआत में ट्रंप ने चीन के साथ एक बड़ा टैरिफ युद्ध शुरू किया था, जो बाद में सुलझ गया। अब उन्होंने भारत को निशाना बनाया है। ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करता है, तो उसे 50% टैरिफ देना पड़ेगा।
हालाँकि भारत ने इस दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया और अपना मजबूत रुख बनाए रखा। भारत की तरह ही अन्य देशों ने भी ट्रंप की धमकियों का जवाब देने के लिए अपनी-अपनी रणनीति तैयार की।
राष्ट्रपति ट्रंप 2 अप्रैल को ‘लिबरेशन डे’ पर नया टैरिफ लगाने वाले थे। इसके तहत वियतनाम पर सबसे ज्यादा 46% टैरिफ लगने वाला था। लेकिन बाद में यह घटा कर 20% कर दिया गया। यह बदलाव उस वक्त हुआ जब ट्रंप परिवार को वियतनाम में 1.5 बिलियन डॉलर (लगभग 12,500 करोड़ रुपये) के एक भव्य गोल्फ रिसॉर्ट बनाने की अनुमति मिली।
ट्रम्प परिवार का गोल्फ रिसॉर्ट बना वियतनाम में टैरिफ घटाने की ‘कीमत’!
रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, वियतनाम की राजधानी हनोई के पास अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ब्रांड का एक भव्य गोल्फ और रेसिडेंशियल रिसॉर्ट बनने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत मई में वियतनामी प्रधानमंत्री फाम मिन्ह चिन्ह और एरिक ट्रंप (डोनाल्ड ट्रंप के बेटे) द्वारा किए गए भूमि पूजन समारोह से हुई थी।
निर्माण कार्य अगले महीने से शुरू होने वाला है। यह प्रोजेक्ट 990 हेक्टेयर (2,446 एकड़) क्षेत्र में फैला होगा और इसमें तीन 18-होल गोल्फ कोर्स, लग्जरी रेसिडेंशियल अपार्टमेंट और कई सुविधाएँ होंगी।
प्रधानमंत्री चिन्ह ने एरिक ट्रंप की यात्रा को प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाने की प्रेरणा बताया और स्थानीय अधिकारियों को इसे 2027 के अंत तक पूरा करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसे अमेरिका-वियतनाम रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम भी बताया।
यह वियतनाम में ट्रंप परिवार के ब्रांड का पहला प्रोजेक्ट है। दिलचस्प बात यह है कि जब यह योजना मंजूर की गई, उसी समय वियतनाम और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता वार्ता भी चल रहा था।
वियतनामी रियल एस्टेट कंपनी ‘किन्हबाक सिटी’ और उसके साझेदार इस प्रोजेक्ट का निर्माण करेंगे। इन कंपनियों ने 5 मिलियन डॉलर (लगभग 42 करोड़ रुपए) ट्रंप ऑर्गनाइजेशन को सिर्फ उसका नाम इस्तेमाल करने के लिए दिए हैं।
हालाँकि ट्रंप ऑर्गनाइजेशन निर्माण, जमीन अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया में शामिल नहीं है, लेकिन प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद इसका संचालन ट्रंप परिवार की कंपनी ही करेगी रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट को धड़ाधड़ मंजूरी दी गई, यहाँ तक कि कई जरूरी प्रक्रियाएँ जैसे पर्यावरणीय समीक्षा भी पूरी नहीं हुईं।
ट्रस्ट की कमाई का असली लाभार्थी ट्रंप खुद
व्हाइट हाउस ने ट्रंप के बिजनेस ट्रस्ट में किसी भी तरह के हितों के टकराव (conflict of interest) से इनकार किया है। डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनके बच्चे ही बिजनेस ट्रस्ट को संभाल रहे हैं, लेकिन जून 2025 में सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, इस ट्रस्ट से मिलने वाली अधिकांश कमाई के असली लाभार्थी ट्रंप स्वयं हैं।
Vietnamese officials stated in a letter that a Trump golf project requires special support from top ranks of government because it was “receiving special attention from the Trump administration and President Donald Trump personally.” @damiencavehttps://t.co/BXlVhU62UM
ट्रम्प कंपनी की परियोजना के लिए ली गई जमीन के बदले किसान विस्थापित, मिला मामूली मुआवजा
वियतनाम में एक 990 हेक्टेयर जमीन पर गोल्फ कोर्स बनाने की योजना के चलते वहाँ पर लंबे समय से रह रहे और खेती कर रहे किसानों को जमीन खाली करने के लिए कहा गया। बदले में उन्हें सिर्फ 3,200 डॉलर और कुछ महीनों के लिए चावल दिए जा रहे हैं। इस मामले से जुड़े छह लोगों और कुछ दस्तावेजों से पता चला है कि कई स्थानीय लोगों को इसी तरह का मुआवजा देकर वहाँ से हटने को कहा गया है।
इस जमीन पर फिलहाल लॉन्गन, केले और दूसरी फलों की खेती होती है। ज्यादातर किसान बुजुर्ग हैं और उन्हें डर है कि वियतनाम की युवा-आबादी वाली अर्थव्यवस्था में उन्हें नया काम मिलना मुश्किल होगा। वे चिंता में हैं कि सरकार उनकी जमीन जब्त कर लेगी और वे बेरोजगार हो जाएँगे।
शुरुआत में इस प्रोजेक्ट के लिए 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा के मुआवजे की बात थी, लेकिन अब डेवलपर्स मुआवजा घटाने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप परिवार का इस निवेश और किसानों को भुगतान में कोई सीधा संबंध नहीं है। अंतिम मुआवजे की राशि जमीन के स्थान और आकार के आधार पर तय होगी और इसका आधिकारिक ऐलान अगले महीने होने की उम्मीद है।
Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, पाँच किसानों को 12 से 30 डॉलर प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा मिला है। साथ ही, जिन पौधों को जमीन से हटाया गया, उनके लिए कुछ अतिरिक्त पैसे और कुछ महीनों के लिए चावल भी दिए गए हैं। लेकिन किसानों ने इन दरों को बहुत कम बताया है। एक और चिट्ठी में स्थानीय अधिकारियों ने कहा है कि अंतिम भुगतान का फैसला अगले महीने होगा और इससे हजारों लोग प्रभावित होंगे।
वियतनाम में सारी जमीन सरकार की होती है। किसानों को केवल लंबे समय तक इस्तेमाल करने के लिए जमीन दी जाती है, लेकिन सरकार जब चाहे जमीन वापस ले सकती है। मुआवजा सरकार देती है, लेकिन उसका खर्च निजी डेवलपर्स उठाते हैं।
मई में हुए भूमि पूजन समारोह में प्रधानमंत्री फाम मिन चिन्ह ने वादा किया था कि किसानों को उचित मुआवजा मिलेगा। लेकिन किसानों ने शिकायत की है कि वे मोलभाव नहीं कर सकते और देश में विरोध-प्रदर्शन भी असरदार नहीं होते।
किसानों के हितों से नहीं होगा कोई समझौता- भारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए अनुचित टैरिफ (शुल्क) पर सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “हमारे किसानों का हित ही हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत कभी भी अपने किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगा। मुझे पता है कि हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और मैं इसके लिए तैयार हूँ। भारत इसके लिए तैयार है।”
PM Modi during his address at the M.S. Swaminathan Centenary International Conference in Delhi: "Protecting the interests of our farmers, fisherfolk & livestock rearers is our first priority. I know I will have to pay a price for it. But I am ready" pic.twitter.com/d6WWshKMKc
ट्रंप ने भारत पर यह शुल्क रूस से तेल आयात के मुद्दे को लेकर लगाया है और इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा व विदेश नीति से जुड़े कारणों का हवाला दिया है। व्हाइट हाउस के आदेश के अनुसार, ट्रंप का कहना है कि भारत द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूस से तेल मँगाना अमेरिका के लिए ‘असाधारण और असामान्य खतरा’ है।
भारत ने स्पष्ट किया है कि तेल आयात बाजार की स्थितियों के अनुसार होता है और इसका उद्देश्य देश की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत सरकार ने यह भी कहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कोई भी कदम उठाने को तैयार है।
इससे पहले भी मोदी सरकार ने अमेरिका और यूरोपीय संघ की दोहरी नीति पर सवाल उठाया था। भारत ने बताया कि ये देश खुद रूस से गैर-जरूरी वस्तुओं का व्यापार कर रहे हैं, जबकि भारत ने केवल तेल खरीदा जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति स्थिर बनी रही। इसके बावजूद भारत को निशाना बनाया जा रहा है।
एक अधिकारी ने जानकारी दी कि भारत सरकार धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर कोई रियायत नहीं देगी, जैसे कि माँसहारी गायों का दूध और उसके डेयरी प्रोडक्ट (non-vegetarian milk) और बीफ उत्पाद। मोदी सरकार ने अमेरिका को भारतीय डेयरी और कृषि बाजार खोलने से साफ इनकार किया है और इन पर शुल्क कम करने से भी मना किया है।
अगर भारतीय कृषि और डेयरी बाजार अमेरिका के लिए खोले गए, तो करोड़ों भारतीय किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए भारत ने कृषि क्षेत्र को व्यापार समझौतों से बाहर रखा है।
फिर भी अमेरिका लगातार दबाव बनाता रहा है, क्योंकि वह भारत जैसे बड़े बाजार से अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहता है। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान जैसे आतंकवाद-समर्थक देश की ओर बढ़ता दिख रहा है।
कतर ने ट्रम्प को दिया 400 मिलियन डॉलर का उपहार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कतर की शाही फैमिली की ओर से एक लग्जरी बोइंग 747-8 विमान तोहफे में दिया गया है, जिसकी कीमत करीब 400 मिलियन डॉलर (लगभग 3,300 करोड़ रुपये) है। यह विमान अमेरिकी रक्षा विभाग को मई में सौंपा गया और इसे भविष्य में ‘एयर फोर्स वन’ के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है, यानी राष्ट्रपति के आधिकारिक विमान के रूप में।
हालाँकि इस विमान को पूरी तरह तैयार करने और सुरक्षा व तकनीकी अपग्रेड करने में कई साल और करोड़ों डॉलर लगेंगे। लेकिन व्हाइट हाउस के एक वक्तव्य पर विवाद हो गया है। इसके अनुसार, ट्रंप के कार्यकाल के बाद यह विमान उनके राष्ट्रपति पुस्तकालय (Presidential Library) में रखा जाएगा। इसका मतलब है कि ट्रंप इसे पद छोड़ने के बाद भी इस्तेमाल कर सकेंगे।
जैसे ही यह खबर सामने आई, अमेरिका में राजनीतिक हलकों में हंगामा मच गया। ट्रंप ने अपने बचाव में कहा, “अमेरिका का विमान दुनिया के बाकी नेताओं से बेहतर और ज्यादा शानदार होना चाहिए।” उन्होंने मौजूदा एयर फोर्स वन को ‘छोटा और कम प्रभावशाली’ बताया।
लेकिन इस फैसले पर दोनों पार्टियों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट) ने कड़ी आलोचना की। कई नेताओं ने इसे संभावित सुरक्षा खतरा बताया और इस पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे।
सीनेट अल्पसंख्यक नेता चक शूमर ने कहा कि जब तक व्हाइट हाउस इस ‘तोहफे’ से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं करता, वह जस्टिस डिपार्टमेंट के सभी नामांकनों को रोके रखेंगे। उन्होंने अटॉर्नी जनरल पैम बॉन्डी को भी कॉन्ग्रेस के सामने गवाही देने को कहा।
रिपब्लिकन सीनेट मेजॉरिटी लीडर जॉन थ्यून ने कहा, “इस मामले में गंभीर सवाल उठने तय हैं।” वहीं, रिपब्लिकन सीनेट कॉमर्स कमेटी के चेयरमैन टेड क्रूज ने कहा कि “इस विमान से जासूसी और निगरानी जैसे सुरक्षा खतरे हैं।”
ट्रंप के इस कदम की आलोचना रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों पार्टियों के नेताओं ने मिलकर की। यह अमेरिका की राजनीति में एक असामान्य बात मानी जा रही है।
दूसरे देशों को मजबूर करने की चाल है ट्रंप का टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में दावा किया कि उनके लगाए गए टैरिफ से अमेरिका को अरबों डॉलर की आमदनी हो रही है। इसके साथ ही उन्होंने धमकी दी कि विदेशों में बने कंप्यूटर चिप्स पर 100% शुल्क लगाया जाएगा। उन्होंने अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय कीं और कहा कि समय के साथ इसमें बदलाव भी आएगा।
ट्रम्प ने बातचीत के लिए अगस्त तक की समय सीमा तय की। इसके अलावा, स्टील और ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों से जुड़े कई अन्य टैरिफ के कारण अमेरिका का औसत टैरिफ रेट अब पिछले सौ सालों में सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है।
इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों पर पड़ा, जो निर्यात (exports) पर अधिक निर्भर हैं। खासकर, लाओस और म्यांमार जैसे मैन्युफैक्चरिंग आधारित देशों पर ट्रम्प ने 40% तक के भारी टैरिफ लगाए। जनवरी में व्हाइट हाउस में वापसी के बाद ट्रम्प ने अमेरिका के तीन सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन, कनाडा और मैक्सिको पर भी नए टैरिफ लागू किए।
ट्रम्प का मकसद खुद को एक मजबूत और प्रभावशाली वैश्विक नेता के रूप में पेश करना है, जो अपने टैरिफ के जरिए दुनिया की राजनीति को अपनी शर्तों पर प्रभावित कर सकता है। वे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव डालना भी चाहते हैं ताकि उन्हें गंभीरता से लिया जाए।
इसके अलावा, ट्रम्प चाहते हैं कि अन्य देश उनके अनुसार चलें। इसी वजह से उन्होंने भारत के प्रति सख्त रुख अपनाया, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मध्यस्थता को लेकर भारत द्वारा उनके दावों को खारिज करने पर। ट्रम्प ने पाकिस्तान से जैसी ‘शुक्रगुजारी’ की उम्मीद की थी, वैसी भारत से नहीं मिली, जो उन्हें नागवार गुजरी।
ट्रम्प खुद को विश्व शांति दूत के रूप में दिखाना चाहते हैं और नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लिए भी उत्सुक हैं। कुछ देशों, जैसे पाकिस्तान, ने उन्हें इसके लिए नामांकित भी किया।
स्पष्ट है कि ट्रम्प टैरिफ्स का इस्तेमाल अन्य देशों पर अपनी शर्तें थोपने के लिए कर रहे हैं। उनके कुछ अधिकारियों ने भी इस बात को स्वीकार किया, खासकर तब जब अमेरिका की एक कोर्ट ने उनके इस कदम को अवैध करार दिया।
कोर्ट ने कहा कि व्हाइट हाउस की ओर से लागू की गई आपातकालीन कानून ट्रम्प को यह अधिकार नहीं देता कि वे लगभग सभी देशों पर टैरिफ्स लगा दें। तीन जजों के पैनल ने फैसला दिया कि ट्रम्प ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया और 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत घोषित की गई राष्ट्रीय आपातकाल स्थिति भी कानूनी तौर पर सही नहीं थी।
व्हाइट हाउस पर ‘कानून के विपरीत’ काम करने का आरोप भी लगा। वहीं सरकार के वकीलों ने तर्क दिया कि टैरिफ्स ने अंतरराष्ट्रीय बातचीत को बढ़ावा दिया है और अगर इन पर रोक लगाई गई तो अमेरिका का वैश्विक प्रभाव कम हो जाएगा। न्याय विभाग के वकील ब्रेट शुमेट ने कोर्ट में कहा, “अगर टैरिफ्स पर रोक लगाई गई, तो यह राष्ट्रपति की ताकत को पूरी तरह खत्म कर देगा।”
निजी और राजनीतिक फायदे के लिए लगाया टैरिफ
ट्रंप साफ तौर पर टैरिफ का इस्तेमाल अपने निजी और राजनीतिक फायदों के लिए कर रहे हैं। वियतनाम में उनके गोल्फ कोर्स और पाकिस्तान से मिली नोबेल पुरस्कार की नामांकन जैसी बातें इसका संकेत देती हैं।
अगर मोदी सरकार ने ट्रंप की शर्तें मान ली होती तो भारत भी बढ़ी हुई टैरिफ की धमकियों से बच सकता था, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय मोदी सरकार ने मजबूती दिखाई, जो ट्रंप को और ज्यादा नाराज कर गई।
ट्रंप टैरिफ को इनाम या सजा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। जिस देश से उनकी मर्जी चलती है, उसे फायदा देते हैं और जो विरोध करता है, उस पर दबाव डालते हैं।
मूल रुप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में बीजेपी सरकार बंगाली भाषी लोगों को जबरदस्ती उनके घरों से निकाल रही है। संसद में साफ कर दिया गया कि सरकार की तरफ से ऐसी कोई बेदखली का आदेश कभी जारी ही नहीं हुआ।
कुछ दिन पहले ममता बनर्जी ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि बीजेपी शासित दिल्ली के वसंत कुंज में जय हिंद कॉलोनी में रहने वाले बंगाली भाषी लोगों को परेशान किया जा रहा है और उन्हें वहाँ से हटाया जा रहा है। लेकिन अब इस मामले में सच्चाई सामने आई है।
गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) की सांसद जून मालिया के एक लिखित सवाल के जवाब में स्पष्ट किया कि दिल्ली सरकार ने जय हिंद कॉलोनी में कोई बेदखली अभियान नहीं चलाया।
जून मालिया ने संसद में पाँच सवाल उठाए थे, जो इस कथित बेदखली से जुड़े थे। उनके सवाल कुछ इस तरह थे:
क्या सरकार को जय हिंद कॉलोनी और वसंत कुंज, नई दिल्ली में बिजली और पानी की आपूर्ति काटने की कोई शिकायत मिली है?
अगर हाँ, तो ये कार्रवाइयाँ किन कानूनी नियमों या सरकारी आदेशों के तहत की जा रही हैं?
इस बेदखली अभियान से कितने परिवार प्रभावित हुए हैं?
क्या सरकार ने बेदखल किए गए लोगों की भारतीय नागरिकता या उनके कानूनी निवास की स्थिति की जाँच की है?
क्या प्रभावित परिवारों के लिए कोई मुआवजा या पुनर्वास की योजना शुरू की गई है? अगर हाँ, तो उसका पूरा ब्योरा क्या है?
इसके जवाब में 5 अगस्त को नित्यानंद राय ने संसद में लिखित जवाब दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने जय हिंद कॉलोनी, वसंत कुंज में न तो कोई बेदखली अभियान चलाया और न ही बिजली या पानी की आपूर्ति काटने की कोई लिखित शिकायत मिली। हाँ, 10 जुलाई 2025 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस बारे में एक पोस्ट जरूर सामने आई थी, लेकिन इसके अलावा कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली।
राय ने आगे बताया कि जय हिंद कॉलोनी एक झुग्गी-झोपड़ी (जे.जे. क्लस्टर) वाला इलाका है। वहाँ पानी की पाइपलाइन बिछी हुई नहीं है, इसलिए वहाँ के लोगों को रोजाना टैंकरों से पानी पहुँचाया जाता है। यह काम नियमित रूप से चल रहा है और इसमें कोई रुकावट नहीं आई। साथ ही 8 जुलाई 2025 को दो बिजली कनेक्शन जरूर काटे गए थे, लेकिन यह कार्रवाई एक सिविल कोर्ट के फैसले (14 मई 2024, सिविल सूट नंबर 56914/2016) के पालन में की गई थी।
इससे पहले, 31 जुलाई 2025 को जून मालिया ने लोकसभा में यही सवाल उठाया था। उन्होंने पूछा था कि क्या सरकार को जय हिंद कॉलोनी में चल रहे बेदखली अभियान और बिजली-पानी की आपूर्ति काटने की शिकायतों की जानकारी है।
साथ ही उन्होंने यह भी पूछा था कि ये कार्रवाइयाँ किन कानूनी नियमों के तहत हो रही हैं, कितने परिवार प्रभावित हुए हैं, क्या बेदखल लोगों की नागरिकता या कानूनी निवास की जाँच हुई है, और क्या प्रभावित परिवारों के लिए कोई मुआवजा या पुनर्वास योजना बनाई गई है।
इसका जवाब देते हुए आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री तोखराम साहू ने साफ कहा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने जय हिंद कॉलोनी में कोई बेदखली अभियान नहीं चलाया और न ही बिजली-पानी काटने की कोई शिकायत मिली। उन्होंने कहा कि जब कोई बेदखली हुई ही नहीं, तो न तो कानूनी कार्रवाई का सवाल उठता है, न प्रभावित परिवारों की संख्या का और न ही मुआवजे या पुनर्वास योजना का।
उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली जल बोर्ड को पानी की आपूर्ति काटने की कोई लिखित शिकायत नहीं मिली, सिवाय 10 जुलाई 2025 को X पर एक पोस्ट के। इसके अलावा, दिल्ली सरकार के बिजली विभाग ने बताया कि 8 जुलाई 2025 को दो बिजली कनेक्शन काटे गए, लेकिन यह कोर्ट के आदेश (14 मई 2024) के मुताबिक किया गया।
जुलाई में ममता बनर्जी ने बीजेपी पर जमकर हमला बोला था। उन्होंने आरोप लगाया था कि बीजेपी अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई के बहाने बंगाली भाषी भारतीय नागरिकों को निशाना बना रही है। उन्होंने X पर लिखा था, “पानी की सप्लाई काट दी गई, बिजली के मीटर जब्त कर लिए गए, और परसों अचानक बिजली काट दी गई।”
ममता ने जय हिंद कॉलोनी से बंगालियों की कथित बेदखली को बीजेपी की ‘बंगला-विरोधी’ नीति करार दिया। उन्होंने कहा, “बीजेपी शासित राज्यों में बंगालियों को घुसपैठिया माना जा रहा है। बंगाली बोलने से कोई बांग्लादेशी नहीं हो जाता।”
ममता बनर्जी का ट्वीट
13 अगस्त को बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ममता बनर्जी पर पलटवार करते हुए उनके दावों को झूठा बताया। उन्होंने कहा कि टीएमसी सांसद जून मालिया ने अपने सवालों से ही ममता के झूठ को उजागर कर दिया। मालवीय ने कहा कि जय हिंद कॉलोनी में कोई बेदखली अभियान नहीं हुआ। पानी की आपूर्ति काटने की कोई शिकायत दिल्ली जल बोर्ड को नहीं मिली, सिवाय एक सोशल मीडिया पोस्ट के। सिर्फ दो बिजली कनेक्शन काटे गए, और वह भी सिविल कोर्ट के आदेश (14 मई 2024) के तहत।
अमित मालवीय ने कहा, “टीएमसी सांसद ने ममता बनर्जी के झूठ का पर्दाफाश कर दिया। जून मालिया ने लोकसभा में जय हिंद कॉलोनी में बेदखली के बारे में सवाल पूछा था। सरकारी जवाब से सच्चाई साफ हो गई: कोई बेदखली नहीं हुई। पानी काटने की एक भी शिकायत दिल्ली जल बोर्ड को नहीं मिली, सिवाय 10 जुलाई 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट के। सिर्फ दो बिजली कनेक्शन काटे गए, और वह भी कोर्ट के आदेश पर। टीएमसी का झूठा प्रचार उनके ही सवाल से संसद में बेनकाब हो गया। ममता बनर्जी अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए बंगालियों को निशाना बनाए जाने का झूठा आरोप लगा रही हैं। तथ्य उनके झूठ से ज्यादा जोर से बोलते हैं।”
TMC MP busts West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee’s lies.
In the Lok Sabha, June Maliah asked about “evictions” in Jai Hind Colony, Vasant Kunj.
The truth, as revealed in the official Government reply, is crystal clear:
बता दें कि सोशल मीडिया पर कुछ दिनों पहले अफवाह फैली थी कि दिल्ली में बंगाली भाषी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। हालाँकि बाद में ये दावे फर्जी निकले। इसके बावजूद टीएमसी सांसद ने इस मुद्दे को संसद में उठाया। ये अलग बात है कि केंद्र सरकार ने सभी तथ्यों को सामने रखते हुए ऐसी किसी भी कार्रवाई की बात को खारिज कर दिया।
बिहार में SIR के खिलाफ पूरा विपक्ष संसद से सड़क तक हंगामा मचा रखा है। चुनाव आयोग के साथ बीजेपी की ‘मिलीभगत’ का आरोप लगाया जा रहा है। इस बीच बीजेपी ने सोनिया गाँधी को घेरा है। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने पूछा है कि सोनिया गाँधी इटली की नागरिक रहते हुए वोटर कैसे बन गईं?
सोशल मीडिया एक्स पर 1980 की वोटर लिस्ट की कॉपी शेयर करते हुए अमित मालवीय ने लिखा, ” भारत की मतदाता सूची के साथ सोनिया गाँधी का रिश्ता चुनाव कानूनों के घोर उल्लंघनों से जुड़ा हुआ है। शायद यही कारण है कि राहुल गाँधी अयोग्य और अवैध मतदाताओं को नियमित करने के पक्षधर हैं और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का विरोध करते हैं।”
Sonia Gandhi’s tryst with India’s voters’ list is riddled with glaring violations of electoral law. This perhaps explains Rahul Gandhi’s fondness for regularising ineligible and illegal voters, and his opposition to the Special Intensive Revision (SIR).
मालवीय ने कहा है कि सोनिया गाँधी का नाम पहली बार 1980 में मतदाता सूची में दिखाई दिया था, उस वक्त उनके पास इटली की नागरिकता थी। इसके तीन साल बाद वो भारत की नागरिक बनीं। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था।
1980 में पहली बार मतदाता सूची में आया नाम
बीजेपी नेता के मुताबिक, “1980 से पहले पीएम आवास के पते पर पंजीकृत मतदाता इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी और मेनका गाँधी थे। नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में 1 जनवरी, 1980 को अर्हता तिथि मानकर 1980 में संशोधन किया गया था। संशोधन के बाद सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 145 के क्रमांक 388 पर जोड़ा गया। यह प्रक्रिया उस कानून का स्पष्ट उल्लंघन थी जिसके अनुसार मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।”
नाम हटाया फिर जोड़ा गया
सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने और फिर जोड़ने को लेकर अमित मालवीय ने कहा कि 1982 में भारी विरोध के बाद सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया और 1983 में फिर से नाम जोड़ दिया गया। इस बार भी नाम जोड़ने पर सवाल उठे थे। 1983 के मतदाता सूची के संशोधन में सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 140 के क्रम संख्या 236 पर दर्ज था। पंजीकरण की अर्हता तिथि 1 जनवरी, 1983 थी। जबकि उन्हें 30 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई।
कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मालवीय ने कहा, “सोनिया गाँधी का नाम नागरिकता के लिए अनिवार्य शर्तें पूरी किए बिना ही दो बार मतदाता सूची में दर्ज हुआ—पहली बार 1980 में , जब वह एक इतालवी नागरिक थीं और दूसरी बार 1983 में जब कानूनी रूप से वह भारत की नागरिक नहीं बनी थीं।”
सोनिया गाँधी ने शादी के तुरंत बाद नागरिकता क्यों नहीं ली? इस पर सवाल खड़ा न करते हुए बीजेपी नेता ने कहा, “हम यह भी नहीं पूछ रहे हैं कि राजीव गाँधी से शादी करने के बाद उन्हें भारतीय नागरिकता स्वीकार करने में 15 साल क्यों लग गए? लेकिन यह घोर चुनावी धाँधली नहीं है, तो और क्या है?”
गुरु-शिष्य परंपरा को बदनाम करने के लिए कॉन्ग्रेस को साधु-संतों ने फटकार लगाई है। इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी है। मठ में ‘बुद्धि शुद्धि पूजा’ का आयोजन किया गया ताकि ऐसी भ्रामक जानकारी फैलाने वालों की बुद्धि शुद्ध हो सके।
राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों को हवा देने के लिए कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम रामकमल दास को 50 बच्चों का पिता बताते हुए गुमराह करने की कोशिश कर रहा था। जिसके बाद संतों की प्रतिक्रिया सामने आई।
संत समाज की चेतावनी
कॉन्ग्रेस के इस आरोप पर संतों ने कड़ी आपत्ति जताई है। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कॉन्ग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे सनातन हिंदू परंपरा को बदनाम करने की साजिश बताया। उन्होंने कहा कि यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और इसे बिना सही जानकारी के राजनीतिक कारणों से बदनाम किया जा रहा है।
कांग्रेस का यह आरोप सनातन हिन्दू धर्म और हिन्दू धर्माचार्यों को बदनाम करने की साजिश है, बोले अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती @NavbharatTimespic.twitter.com/01UcdXdh8O
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की गलत जानकारी फैलाई जाती रही तो संत समिति कानूनी कार्रवाई करेगी।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि कॉन्ग्रेस जिस मामले को लेकर भ्रम फैला रही है असल में वह मकान नहीं बल्कि एक मंदिर है। मतदाता सूची में दर्ज पता B 24/19 कोई आम मकान नहीं बल्कि राम जानकी मठ मंदिर है, जिसकी स्थापना आचार्य रामकमल दास ने की थी।
वहीं, धार्मिक परंपरा में साधु-संत अपने आधिकारिक दस्तावेजों जैसे- आधार कार्ड या वोटर आईडी में जन्म देने वाले पिता की जगह अपने गुरु का नाम पिता के रूप में लिखवाते हैं। और वाराणसी के राम जानकी मठ में भी ऐसा ही हुआ। इसी वजह से मतदाता सूची में 48 लोगों के पिता के नाम की जगह गुरु का नाम ‘रामकमल दास’ लिखा हुआ है। इसलिए शिष्यों के पते के तौर पर B 24/19 का पता लिखा गया है।
मठ के वरिष्ठ शिष्य अभिराम दास ने भी बताया कि भारत सरकार ने 2016 में एक आदेश जारी कर यह साफ किया था कि साधु-संन्यासी अपने दस्तावेजों में अपने गुरु का नाम पिता के रूप में दर्ज करा सकते हैं।
कॉन्ग्रेस का दुष्प्रचार: परंपरा को बनाया चुनावी हथियार
यूपी कॉन्ग्रेस ने X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर लिखा, “वाराणसी में चुनाव आयोग का एक और चमत्कार देखिए! मतदाता सूची में एक ही व्यक्ति ‘राजकमल दास’ के नाम पर 50 बेटों का रिकॉर्ड दर्ज है।”
वाराणसी में चुनाव आयोग का एक और चमत्कार देखिए!
मतदाता सूची में एक ही व्यक्ति 'राजकमल दास' के नाम पर 50 बेटों का रिकॉर्ड दर्ज है!
सबसे छोटा बेटा राघवेन्द्र- उम्र 28 साल, और सबसे बड़ा बेटा बनवारी दास- उम्र 72 साल!
इसी मसले पर तथाकथित प्रोपेगेंडाई पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने भी अपने X अकाउंट से भ्रामक जानकारियाँ फैलाई और लिखा, “ये वाराणसी है… 50 बच्चों के पिता का नाम राजकमल दास.. सबसे छोटा बेटा राघ्वेन्द्र 28 साल का.. सबसे बड़ा बेटा बनवारी दास 72 साल का..”
ये वाराणसी है… 50 बच्चों के पिता का नाम राजकमल दास.. सबसे छोटा बेटा राघ्वेन्द्र 28 साल का.. सबसे बड़ा बेटा बनवारी दास 72 साल का.. pic.twitter.com/6488ZBwIQr
संत राजकमल दास को लेकर विपक्ष ने 2 साल पहले भी भ्रामक जानकारियाँ फैलाई थी। लेकिन चुनाव आयोग ने फैक्ट चेक तथ्यों के साथ विपक्ष को जवाब दिया था कि ये पिता-पुत्र नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य है। लेकिन कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम फिर पुराने विवाद को लेकर हंगामा करने पर उतर आया है और मोदी सरकार पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रहा है।