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गजवा-ए-हिंद, काफिरों पर हमला, मोदी सरकार निशाने पर… आतंकी शमा परवीन निकली अलकायदा चीफ की फैन, भाषण सुनवाकर करती थी युवाओं का ब्रेनवॉश

गुजरात ATS की ओर से पकड़ी गई अलकायदा की मास्टरमाइंड शमा परवीन के बारे में हर दिन नए खुलासे हो रहें हैं। अब जानकारी में सामने आया है कि वह अलकायदा इंडिया सबकॉन्टिनेंट (AQIS) के चीफ रहे मौलाना असीम उमर से काफी प्रभावित थी। असीम को अलकायदा के चीफ अल जवाहिरी का चेला माना जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, AQIS से जुड़ी आतंकी शमा परवीन और उसके नेटवर्क का मकसद भारत में धार्मिक आधार बनाकर तनाव और हिंसा फैलाना था। इसके लिए वह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेती थी।

जानकारी के अनुसार, ATS ने बताया है कि शमा दो फेसबुक पेज और एक इंस्टाग्राम अकाउंट को संभालती थी, इससे करीब 10 हजार यूजर जुड़े हुए थे। शमा इसके सहारे ही अलकायदा और अन्य कट्टरपंथियों के भड़काऊ भाषण साझा करती थी।

इनमें AQIS नेता मौलाना असीम उमर, अनवर अल-अवलाकी और लाहौर के लाल मस्जिद के मौलाना अब्दुल अजीज के भाषणों के वीडियो शेयर किए जाते थे। इनमें अधिकतर गजवा-ए-हिंद, काफिरों पर हमले और भारत सरकार के खिलाफ बातें कही गई होती थी।

ATS  ने बताया कि इनमें भारतीय मुस्लिम युवाओं को देश के लोकतंत्र को खारिज करके सशस्त्र विद्रोह करके शरिया कानून लागू करने के लिए उकसाया जाता था। शमा के सोशल मीडिया अकाउंट की जाँच में सामने आया है कि वह मौलाना असीम उमर के भड़काऊ बयान सोशल मीडया पर पोस्ट करके लोगों का ब्रेनवॉश करने की कोशिश करती थी।

बता दें कि 2014 में AQIS का चीफ मौलाना असीम उमर को बनाया गया था।अलकायदा चीफ अल जवाहिरी ने ही असीम को AQIS का चीफ भी बनाया था। उमर उत्तर प्रदेश के संभल का रहने वाला था, लेकिन बाद में पाकिस्तान और उसके बाद अफगानिस्तान चला गया था।

पुलिस का कहना है कि शमा और उसके साथ गिरफ्तार सभी आतंकी मौलाना असीम उमर के बयान सुनते थे और सोशल मीडिया पर शेयर भी करते थे।

अन्य जानकारियों के अनुसार, शमा के अब्बू शमशुल हक की 2019 में मौत हो गई थी। इसके बाद से शमा परवीन का पूरा परिवार बेंगलुरु में रहता है। शमा तीन बहन और दो भाइयों में सबसे छोटी है।

जाँच में ये भी सामने आया है कि शमा परवीन बचपन से ही कट्टर इस्लामी सोच की है। वह कभी भी निकाह नहीं करना चाहती थी, घर वालों से कम लगाव रखती थी और पर्दे में रहना ज्यादा पसंद करती थी। जबकि उसके घरवाले पढ़े-लिखे हैं। जहाँ उसकी एक बहन कोलकाता में एग्रीकल्चर साइंटिस्ट हैं, वहीं दोनों भाई शमशेर और आजम कंप्यूटर इंजीनियर हैं। 

क्या हिंदू होना ही है साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और मेजर उपाध्याय का दोष?

मालेगाँव ब्लास्ट मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की विशेष अदालत ने आज (31 जुलाई 2025) उन सातों आरोपितों को बरी कर दिया, जिनके नाम का इस्तेमाल करके कभी UPA सरकार ने ‘हिंदू आतंकवाद’ के नैरेटिव को गढ़ने का प्रयास किया था। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए उस बाइक वाली थ्योरी को भी खारिज किया जिसके आधार पर हिंदू संत और सेना से जुड़े लोग निशाने पर लिए गए थे।

कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहीरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ सबूतों की कमी बताई। स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा और सबूतों में कई असंगतियाँ हैं। कोर्ट ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर होनी चाहिए।

स्पेशल जज एके लाहोटी ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने में कई गलतियाँ कीं। उन्होंने कहा, “पूरी जाँच के बाद यह साफ है कि अभियोजन कोई ठोस सबूत लाने में विफल रहा है। सबूतों में कई असंगतियाँ हैं, इसलिए सभी आरोपितों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।”

हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए छाँटे गए तीन नाम

29 दिसंबर 2008, ब्लास्ट वाले दिन और 31 जुलाई 2025, यानी फैसले वाले दिन के बीच 16 साल 10 महीने (लगभग 17) बीत चुके हैं। इस लंबे अंतराल में निर्दोषों के साथ क्या-क्या हुआ ये सोच भी रूह कँपाने वाली है। केस में तीन ऐसे नाम हैं जिनके साथ अत्याचार की हर हदें पार की गईं।

ये तीन नाम- साध्वी प्रज्ञा, मेजर रमेश उपाध्याय और लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के हैं। केस की जाँच के नाम पर राज्य एटीएस ने इन बेगुनाहों को न केवल मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया, बल्कि इन्हें शारीरिक यातनाएँ भी दीं।

इन्हें इतना तड़पाया गया कि साध्वी प्रज्ञा को तो वेंटिलेटर तक पर जाना पड़ा था और मेजर उपाध्याय को सरेआम धमकी मिलती थी कि उनकी बेटी का रेप हो जाएगा। वहीं कर्नल पुरोहित को ‘देशद्रोही’ साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया गया।

आज जब ये सारे लोग अदालत की नजर में भी बेगुनाह साबित हो चुके हैं तो आइए एक बार फिर याद दिलाएँ कि जाँच के नाम पर इन ‘हिंदुओं’ को कैसे निशाना बनाया गया था।

जाँच के दौरान तीनों पर बरपाया गया कहर

साध्वी प्रज्ञा के साथ अमानवीयता की हर हद की गई पार

  • साध्वी प्रज्ञा की बात करें तो वह कई बार इस मामले में अपना दर्द साझा करके भावुक हो चुकी हैं। वह वो दर्दनाक समय को नहीं भुला पातीं जब जेल के भीतर उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित करने का काम हुआ था। उनके अनुसार, इस केस में हिरासत में लिए जाने के बाद पुरुष कैदियों के साथ रखकर पोर्न वीडियो दिखाए जाते थे और भद्दे सवाल होते थे।
  • इसके अलावा कथिततौर पर 4-5 पुलिसकर्मी लगाकर उन्हें मारा जाता था। उनकी पिटाई चमड़े की बेल्ट से होती थी। उनको बिन किसी सबूत के भगवा आतंकी कहा जाता था। उनपर इतने अत्याचार होते थे कि उनकी हालत खुद के पाँव पर चलने लायक नहीं बची थी।
  • उनकी रीढ़ की हड्डी में समस्या आ गई थी और उन्हें वेंटिलेटर पर जाना पड़ा था। इसके अलावा साध्वी प्रज्ञा ने ये भी बताया था कि इन्हीं सबके कारण उन्हें कैंसर और न्यूरो की बीमारी हो गई थी और उनके शरीर में पस पड़ गया था।

मेजर की पत्नी को नंगा घुमाने, बेटी का रेप करने की धमकी

  • मेजर रमेश उपाध्याय ने भी अपने बारे में बताया था कि मालेगाँव ब्लास्ट में कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार ने उनको फँसाया था। हिरासत में लिए जाने के बाद एटीएस उनके साथ बर्बरता करती थी। उन्हें धमकी दी जाती थी कि पत्नी को नंगा घुमाया जाएगा, बेटी का रेप किया जाएगा, बेटे का जबड़ा तोड़ दिया जाएगा।
  • इसके अलावा उनके मकान मालिक तक को उनके खिलाफ भड़काया गया- आतंकी को क्यों रख रहे हों। जिसके कारण उनके परिवार के सिर से छत छिन गई। उनकी शादीशुदा बेटियों के घरों पर दबिश दी गई । हर वो हालात पैदा कर दिए गए कि वो कैसे भी वो जुर्म कबूलें जो उन्होंने किया ही नहीं।
  • प्रशासन उन्हें इस कदर इस मामले में दोषी बनाना चाहता था कि मेजर का नार्को टेस्ट भी कराया। हालाँकि जब उसमें उन्हें क्लीनचिट मिल गई तो ये बर्दाश्त नहीं हुआ और रिपोर्ट को दबा दिया गया।

लेफ्टिनेंट कर्नल का तोड़ दिया गया पैर

  • इसी तरह प्रताड़ना की कहानी भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित की है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मालेगाँव ब्लास्ट केस में राज्य (महाराष्ट्र) एटीएस ने कथिततौर पर कर्नल पुरोहित को फँसाने के बहुत प्रयास किए।
  • ये जानते हुए कि जिस समय ये ब्लास्ट हुआ था, उस वक्त वो अपने मिशन पर थे उन्हें हिरासत में लिया गया और देशद्रोही घोषित करने की कोशिश हुई। बाद में उनपर दबाव बनाया गया कि वो पूछताछ में आरएसएस और वीएचपी नेताओं का जबरन नाम लें ताकि हिंदू आतंकवाद की थ्योरी सही साबित हो सके।
  • जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनका पैर तोड़ा गया, उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा, उन्हें नंगा करके मारा गया, उनके प्राइवेट पार्ट पर हमला किया गया, उन्हें बाल से नोचा और खींचा गया।

मालेगाँव ब्लास्ट के इस पूरे मामले में भगवाधारी साध्वी प्रज्ञा या सेना की वर्दी वाले कर्नल पुरोहित-मेजर उपाध्याय जैसे लोग निशाने पर क्यों लिए गए, ये समझना अब कोई कठिन नहीं है। धमाका मस्जिद के पास हुआ था। कॉन्ग्रेस ने इसे अपने वोटबैंक के लिए जमकर भुनाया। रैली कर करके हिंदुओं को आतंकवादी कहा गया।

जब सवाल उठे कि ये किस आधार पर दावे हो रहे हैं तो खुद को सही साबित करने के लिए यूपीए सरकार में फँसाए गए 7 निर्दोष, जिन्हें तरह-तरह की यातना देकर मजबूर किया गया कि वो मानें ब्लास्ट में उनका हाथ था। इन निर्दोषों संत और सेना से जुड़े लोग थे।

पूर्व नौकरशाह आरवीएस मणि ने कॉन्ग्रेस के दौर में गृह मंत्रालय में एक अंडर-सेक्रेटरी के रूप में काम किया था। अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेरर’ में, मणि ने संपूर्ण मिलीभगत का वर्णन किया हुआ है। उन्होंने बताया है कि किन-किन खिलाड़ियों ने ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने के लिए मिलीभगत की और कैसे, कई वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता से लेकर कई अन्य लोग इस साजिश में शामिल थे।

वहीं कोर्ट में भी कोर्ट में भी गवाहों ने यह जानकारी दी थी उनके ऊपर हिंदू नेताओं को फँसाने के लिए कहा गया था। ये जानकारी चौंकाने वाली थी, लेकिन जब तक ये सच सामने आया तब तक कॉन्ग्रेस के तुष्टिकरण का शिकार ‘निर्दोष’ हो चुके थे। कॉन्ग्रेस ने देश की सेना के कर्नल पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय और भगवाधारी साध्वी प्रज्ञा का इस्तेमाल ये फैलाने के लिए किया कि उनकी हिंदू आतंकवाद की थ्योरी एकदम सही है।

ये ध्यान रहे कि आज कोर्ट ने जो फैसला दिया है उससे न तो वो लोग खुश हैं जिनका मकसद हिंदुत्व को बदनाम करने का रहता है और न ही वो लोग, जिन्हें कुछ भी करके हिंदुत्व को आतंकवाद का पर्याय बताना था। 2008 के उस दौर में इस मालेगाँव ब्लास्ट के बाद एक तरफ मुस्लिमों को रैलियों के दौरान ये बताकर खुश किया जा रहा था कि इसे इस्लामी आतंकियों ने अंजाम नहीं दिया है बल्कि हिंदू आतंकवादियों ने दिया है। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू नेताओं को पूरे मामले में फँसाने की साजिश चल रही थी।

खुद गवाहों ने इस बात को स्वीकारा था कि उन पर योगी आदित्यनाथ समेत अन्य हिंदू नेताओं का नाम लेने का दबाव था। इसके अलावा जो प्रताड़नाएँ मेजर और कर्नल को दी गई थीं उसका मकसद भी यही था कि ये अपने बयानों में हिंदू नेताओं का नाम ले… लेकिन ये सब होता कैसे? कुछ दिन यूपीए शासन में ये नैरेटिव गढ़ा-बढ़ा। मगर फिर हकीकत सामने आने लगी।

केस एनआईए के पास गया, चार्जशीट दाखिल हुई, गवाहों की पेशी हुई और हकीकत खुलती गई। ये भी सामने आया कि ये पूरा नैरेटिव सिर्फ जनता का ध्यान CWG घोटाले से हटाने के लिए किया था। इसी बीच ब्यूरोक्रेट आरवीएस मणि की किताब जनता के बीच आई, जिनसे कॉन्ग्रेस के हिंदूविरोधी चेहरे को शीशे जैसा साफ कर दिया।

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मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में NIA की विशेष अदालत ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत सभी 7 आरोपितों को बरी कर दिया है। 17 वर्षों बाद भले ही ‘भगवा आतंकवाद’ की कहानी झूठी साबित हो गई हो लेकिन आरोपित बनाई गईं साध्वी प्रज्ञा को मिली प्रताड़ना कॉन्ग्रेस के काले कारनामों का चिट्ठा दिखाती है।

कोर्ट के निर्णय आने के बाद साध्वी प्रज्ञा ने जज के सामने अपनी बात भी रखी। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा ही कहा कि जिन्हें भी जाँच के लिए बुलाया जाता है, उसके पीछे कोई आधार होना चाहिए। मुझे बिना किसी आधार के जाँच के लिए बुलाया गया और गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया गया। मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो गया। मैं एक साधु का जीवन जी रही थी, पर मुझे फँसाकर झूठे आरोप लगाए गए। कोई भी हमारे साथ खड़ा होने को तैयार नहीं था।”

अपनी बात जारी रखते हुए साध्वी प्रज्ञा ने आगे कहा, “मैं जिंदा हूँ क्योंकि मैं एक संन्यासी हूँ। एक साजिश के तहत भगवा को बदनाम किया गया। आज भगवा की जीत हुई है, हिंदुत्व की जीत हुई है और ईश्वर उन आरोपितों के दंड देगा। हालाँकि, जिन्होंने भारत और भगवा को बदनाम किया, उन्हें अभी तक आपने गलत साबित नहीं किया है।”

गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगाँव में भिक्खू चौक मस्जिद के पास धमाका हुआ। मोटरसाइकिल में बांधकर किए गए इस धमाके में 6 लोग मारे गए थे और 100 से भी अधिक लोग घायल हुए थे। इसके तहत साध्वी प्रज्ञा समेत 7 लोगों पर UAPA, आतंकवाद, आर्म्स एक्ट और IPC की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। 17 वर्षों तक इसे लेकर मुकदमा चला। 323 गवाह पेश किए गए। इनमें से 37 गवाह अपने बयान से मुकर गए। इसके अलावा बचाव पक्ष के भी 8 गवाह पेश हुए।

प्रताड़ना के 17 वर्ष

मध्य प्रदेश के भोपाल से भाजपा की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा को ब्लास्ट के बाद 23 अक्टूबर 2008 को ATS ने गिरफ्तार किया। साध्वी प्रज्ञा पर आरोप लगा कि विस्फोट में इस्तेमाल की गई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल के इंजन और चेसिस नंबर से पता चला कि वह बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर्ड थी। हालाँकि रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी पाया गया था।

महाराष्ट्र ATS ने दावा किया था कि उस मोटरसाइकिल का इस्तेमाल विस्फोटक लगाने के लिए किया गया और इसी आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। इस दौरान उन्हें इस कदर प्रताड़ित किया गया कि मेडिकल इमरजेंसी के तहत वह वेंटिलेटर तक पहुँच गईं।

अप्रैल 2011 में यह मामला राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया, जिसने ATS की जाँच में कई खामियाँ पाईं। NIA ने अपनी जाँच में ये भी कहा कि मोटरसाइकिल भले ही प्रज्ञा के नाम पर थी, लेकिन उसका इस्तेमाल रामचंद्र कलसांगरा नामक फरार आरोपित कर रहा था।

UAPA के तहत साध्वी पर की गई कार्रवाई भी दोषपूर्ण मानी गई। NIA ने जब जमानती वारंट जारी किया तब साध्वी प्रज्ञा ने साल 2020 में अपने साथ हुए अमानवीय व्यवहार को लेकर रिपब्लिक टीवी को एक साक्षात्कार दिया।

इसमें उन्होंने बताया था कि मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह के सामने 3-4 पुलिसकर्मियों ने उन्हें बहुत अधिक प्रताड़ना दी थी। उन्हें हिरासत में लेकर पूरी रात बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और उन्हें वेंटिलेटर पर जाना पड़ा था।

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने बताया कि हिरासत के दौरान उनको पुरुष कैदियों के साथ रखकर पॉर्न वीडियो दिखाया जाता था और साध्वी होने का लिहाज किए बिना उनसे भद्दे सवाल किए जाते थे। उन्होंने बताया था कि पहले उनको भगवा आतंकी कहा गया, फिर भारत को आतंकवादी देश घोषित करवाने का प्रयास किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सारा षड्यंत्र कॉन्ग्रेस का था।

भूख, मार और बिजली के झटके

साध्वी प्रज्ञा ने बताया था कि उन्हें चमड़े की बेल्ट से पीटा जाता था। उन्हें 24 दिनों तक भूखा रखा गया था। उनको बिजली के झटके दिए जाते थे। गाली-गलौज तो उनके साथ आम बात हो गई थी। उनको लगातार पीटने के लिए 5-6 पुलिस वाले लगाए जाते थे और जब वह थक जाते थे तो दूसरे पुलिसकर्मी उनको पीटने लग जाते थे। इनके पैरे के तलवे तक में बेल्ट से पीटा गया। पिटाई के दौरान उनका पूरा नर्वस सिस्टम सुन्न पड़ जाता था।

साध्वी प्रज्ञा की यातनाएँ सिर्फ बेल्ट की मार तक ही सीमित नहीं रहीं थीं। उन्हें उल्टा लटकाकर मारा जाता था और हाथों को गर्म पानी में नमक डालकर डुबोया जाता था। हाथ फट जाते थे तो जख्मों पर नमक छिड़का जाता था।

उन्होंने बताया कि जेल में उन्हें इतनी गंदी-गंदी गालियां दी जाती थीं जिन्हें कोई स्त्री सुन भी नहीं सकती। उन्हें निर्वस्त्र किए जाने की बार-बार धमकी दी जाती थी। भोजन में उन्हें अंडा खाने के लिए मजबूर किया जाता था जबकि वे शाकाहारी हैं।

साध्वी प्रज्ञा को मिली प्रताड़नाओं से उनके पूरे शरीर में सूजन आ गई थी। कई हिस्सो में पस पड़ गया था। आज भी वह कई शारीरिक परेशानियों से जूझ रही हैं। उन्हें कैंसर और न्यूरो की बीमारी तक हो गई। अपनी प्रताड़ना के बारे में बताते हुए साध्वी प्रज्ञा कोर्ट में रो पड़ी थीं।

आज जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत सभी आरोपितों के बरी किया गया तो साध्वी ने कहा कि षडयंत्र के तहत भगवा को बदनाम किया गया, आज हिंदुत्व की जीत हुई है।

अभिनव भारत, कर्नल ने दिए RDX, साध्वी प्रज्ञा की बाइक… कोर्ट ने खोल दिए कॉन्ग्रेस के ‘भगवा आतंकवाद’ के धागे, कहा- मालेगाँव ब्लास्ट पर थ्योरी तो गढ़ ली, पर सबूत एक भी नहीं

मुंबई की स्पेशल एनआईए कोर्ट ने गुरुवार को 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपितों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल हैं।

स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा और सबूतों में कई असंगतियाँ हैं। कोर्ट ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर होनी चाहिए।

यह फैसला 17 साल पुराने केस में आया है, जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी विवादास्पद रहा है। ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। कोर्ट ने विक्टिम्स के लिए मुआवजे का भी ऐलान किया है।

मालेगाँव ब्लास्ट में कोई सबूत नहीं पेश कर पाया अभियोजन पक्ष

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने में कई गलतियाँ कीं। उन्होंने कहा, “पूरी जाँच के बाद यह साफ है कि अभियोजन कोई ठोस सबूत लाने में विफल रहा है। सबूतों में कई असंगतियाँ हैं, इसलिए सभी आरोपितों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।”

जज ने आगे जोड़ा, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं की जा सकती। यहाँ सबूतों की कमी है, इसलिए बरी करना जरूरी है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से ‘हिंदू आतंकवाद’ के आरोप को खारिज किया, जो अभियोजन की मुख्य थ्योरी थी। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि यह ब्लास्ट ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की साजिश थी और इसमें हिंदू आतंकवाद शामिल है। लेकिन कोई सबूत नहीं मिला कि आरोपित हिंदू आतंकवाद में लिप्त थे। आतंकवाद किसी धर्म से जुड़ा नहीं है। नैतिकता से फैसला नहीं लिया जा सकता; सबूत जरूरी हैं। यहाँ साजिश साबित नहीं हुई, इसलिए हिंदू आतंकवाद जैसी कोई अवधारणा यहाँ लागू नहीं होती।”

जज ने अभियोजन के दावों को एक-एक करके तोड़ा। उन्होंने कहा, “अभियोजन ने सात आरोपितों के बीच साजिश का आरोप लगाया, लेकिन कोई मीटिंग, कॉल रिकॉर्ड या प्लानिंग का सबूत नहीं पेश किया। सबूत असंगत हैं और पुलिस ने घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया, जिससे फॉरेंसिक जाँच प्रभावित हुई।”

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर क्या कहा कोर्ट ने?

फैसले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ लगे आरोपों को विस्तार से खारिज किया गया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन का मुख्य दावा था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल साध्वी ठाकुर की थी, जिस पर बम बंधा था। लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने बाइक के चेसिस का पूरा सीरियल नंबर रिकवर नहीं किया। इसलिए, यह साबित नहीं होता कि बाइक उनकी थी।”

जज ने आगे कहा, “इसके अलावा, साध्वी ठाकुर ने ब्लास्ट से दो साल पहले संन्यास ले लिया था और सभी भौतिक चीजें त्याग दी थीं। ऐसे में बाइक उनके पास कैसे हो सकती है? अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह फेल रहा।”

कोर्ट ने ठाकुर के संन्यासी जीवन पर भी टिप्पणी की, जिसमें कहा गया, “उन्होंने दो साल पहले सब छोड़ दिया था, इसलिए मटेरियल संपत्ति से उनका कोई लेना-देना नहीं था। आरोप बेबुनियाद हैं।”

कर्नल पुरोहित के खिलाफ आरोप भी हुए धराशाई

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर लगे गंभीर आरोपों को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। जज ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि पुरोहित ने कश्मीर से आरडीएक्स मँगवाया और बम असेंबल किया। लेकिन कोई सबूत नहीं – न गवाह, न डॉक्यूमेंट। यह आरोप निराधार है।”

फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस पर बात करते हुए जज लाहोटी ने बताया, “पुरोहित और आरोपित अजय रहीरकर के बीच पैसे के लेन-देन हुए थे, क्योंकि वे अभिनव भारत के पदाधिकारी थे। लेकिन यह पैसा पुरोहित ने अपने घर की निर्माण और एलआईसी पॉलिसी पर खर्च किया, न कि किसी आतंकी गतिविधि पर। अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि पैसा गलत काम में लगा। इसलिए, कोई केस नहीं बनता।”

अन्य आरोपितों पर कोर्ट का रुख

कोर्ट ने बाकी आरोपितों मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहीरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ भी सबूतों की कमी बताई। जज ने कहा, “इन सभी के बीच कोई साजिश साबित नहीं हुई। अभियोजन ने मीटिंग्स या प्लानिंग के सबूत नहीं दिए। एक आरोपित सुधाकर द्विवेदी ने तो दावा किया कि कोई ब्लास्ट हुआ ही नहीं, जिसके बाद अभियोजन ने 100 से ज्यादा विक्टिम्स की जाँच की, लेकिन फिर भी केस कमजोर रहा।”

विक्टिम्स और मुआवजे पर फैसला

कोर्ट ने ब्लास्ट के विक्टिम्स को न्याय देते हुए मुआवजे का ऐलान किया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि छह लोग मारे गए, जो कोर्ट मानता है। लेकिन घायलों की संख्या 101 बताई गई, जबकि कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हेराफेरी पाई गई। इसलिए सिर्फ 95 घायलों को मान्यता दी जाती है।”

मुआवजे पर उन्होंने आदेश दिया, “मारे गए छह लोगों के परिवारों को 2 लाख रुपये प्रत्येक और 95 घायलों को 50,000 रुपये प्रत्येक मुआवजा मिलेगा। यह राज्य सरकार देगी। विक्टिम्स को न्याय मिलना चाहिए, भले ही आरोपित बरी हों।”

क्या था पूरा मामला, जो 17 साल तक चला

यह केस 29 सितंबर 2008 को हुआ था, जब मालेगाँव के एक चौराहे पर रमजान के दौरान ब्लास्ट हुआ। मुस्लिम बहुल इलाके में मोटरसाइकिल पर रखे आईईडी से विस्फोट हुआ था। महाराष्ट्र एटीएस ने शुरुआती जाँच की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया। एटीएस ने जिन 12 लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी शामिल थे। एटीएस ने दावा किया था कि यह विस्फोट अभिनव भारत संगठन की साजिश का हिस्सा था।

इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे।

साल 2010 में जाँच एनआईए को सौंपी गई। एनआईए ने 2016 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और एमसीओसीए हटाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि कुछ आरोपितों के खिलाफ सबूत कम हैं। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने सात आरोपितों पर ट्रायल का आदेश दिया, जबकि तीन को डिस्चार्ज कर दिया। ट्रायल दिसंबर 2018 में शुरू हुआ, जिसमें 323 गवाहों की जाँच हुई। 34 गवाह होस्टाइल हो गए और 30 से ज्यादा मर चुके थे। अप्रैल 2024 में अंतिम बहस खत्म हुई और 19 अप्रैल को फैसला रिजर्व किया गया।

अभियोजन की तरफ से स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अविनाश रसल थे, जबकि आरोपितों की तरफ से कई वकील, जैसे जेपी मिश्रा (ठाकुर और रहीरकर), पासबोला समेत अन्य (उपाध्याय), फड़के और बाबर (पुरोहित), रंजीत सांगले (द्विवेदी), और पुनालेकर समेत अन्य (चतुर्वेदी) ने अपनी दलीलें पेश की।

कोर्ट ने अभियोजन की कमियाँ की उजागर

जज ने पुलिस और अभियोजन की कई कमियों पर उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “पुलिस ने घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया, जिससे सबूत खराब हुए। फॉरेंसिक जाँच में गड़बड़ियाँ हैं। गवाहों की मौत और होस्टाइल होना भी केस को कमजोर किया। कुल मिलाकर अभियोजन का केस असंगत है।”

फिर से हिंदू आतंकवाद पर जज साहब ने दोहराया। “टेररिज्म का कोई धर्म नहीं। लेकिन यहाँ प्रॉसीक्यूशन ने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी बनाई, जो सबूतों पर नहीं टिकी। नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सबूत जरूरी हैं, और यहाँ सबूत नहीं हैं। इसलिए, सभी आरोपितों को बरी किया जाता है।”

एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत साँगले ने कहा, “ये साबित नहीं हुआ कि ब्लास्ट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी। घायलों के सर्टिफिकेट नकली थे। डीजी एटीएस को आदेश दिया गया है कि वो जाँच करें कि ये नकली सर्टिफिकेट किसने बनाए। सुधाकर चतुर्वेदी के घर पर रखा गया आरडीएक्स की भी जाँच डीजी एटीएस को करने को कहा गया है। सभी आरोपितों को यूएपीए और दूसरी धाराओं से बरी कर दिया गया है। अभियोजन यूएपीए के तहत आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा।”

फैसला खत्म होने पर कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। आरोपित खुश दिखे, प्रॉसीक्यूशन वाले निराश। यह पूरा फैसला दिखाता है कि कानून सबूतों पर चलता है, नैतिकता पर नहीं। जज साहब ने हर बयान को विस्तार से दिया, ताकि कोई शक न रहे।

पनामा नहर पर अमेरिकी कब्जे का ट्रंप का सपना टूटा, नहीं हो पाई ब्लैकरॉक-हचिसन डील: चीन बढ़ाएगा अब कंट्रोल, रणनीतिक मोर्चे पर ‘अंकल सैम’ को दी ‘धोबी पछाड़’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रणनीतिक मोर्चे पर पटखनी मिली है। जिस पनामा नहर पर वह वापस कब्जे की बात लम्बे समय से कर रहे हैं, उसका नियंत्रण चीन के हाथों में जाता दिख रहा है। पनामा नहर का संचालन वर्तमान में ऐसे व्यक्ति के हाथों में है, जो चीन का नागरिक है।

पनामा नहर अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ती है और दुनिया के व्यापार के लिए एक बेहद अहम रास्ता है। यह नहर वर्ष 1914 में बनी थी और वर्ष 1999 में अमेरिका ने इसका नियंत्रण पनामा को सौंप दिया था। तब से पनामा ही इसका संचालन करता है और पनामा की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इस नहर पर टिका है।

यह नहर फिर से एक बार कूटनीतिक लड़ाई के केंद्र में आ गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चिंता जताई थी कि इस नहर के नियंत्रण पर चीन का बढ़ता दखल अमेरिकी हितों के लिए आने वाले समय में खतरा बन सकता है।

उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि अमेरिका को पनामा नहर का नियंत्रण फिर से अपने हाथ में लेना चाहिए। ट्रंप का कहना था कि चीनी सरकार की पाली पोषी कम्पनियाँ पनामा नहर और आसपास के बंदरगाहों पर अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रही हैं। अमेरिका अपनी कम्पनियों को इस नहर के कामों में जोड़ना चाहता था।

इसी के तहत पिछले साल अमेरिका की बड़ी निवेश कंपनी ब्लैकरॉक और हांगकांग की CK हचिसन के बीच पनामा के कुछ बंदरगाहों को लेकर समझौता पर बातचीत चालू हुई थी। इस सौदे के तहत ब्लैकरॉक की अगुवाई वाले जॉइंट वेंचर पनामा के दो प्रमुख बंदरगाहों सहित कई अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों का संचालन सौंपा जाना था।

यह लगभग ₹3 लाख करोड़ की डील मानी गई थी। इसका सीधा उद्देश्य इस नहर के संचालन पर चीन का प्रभाव कम करना था। हालाँकि, इस प्रस्ताव ने अमेरिका और चीन के बीच प्रभाव की लड़ाई को और बढ़ा दिया और चीन ने इस डील पर नाराजगी जताई। अब पनामा नहर पर चीन का प्रभाव कम करने की यह धराशायी हो गई है।

इस समझौते की बातचीत आखिरकार फेल हो गई है। CK हचिसन ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा की है कि ब्लैकरॉक के साथ बातचीत की अवधि समाप्त हो चुकी है। इसके परिणामस्वरूप, चीन समर्थित CK हचिसन को पनामा में और अधिक प्रभावी स्थिति मिल गई है।

यह बात उल्लेखनीय है कि CK हचिसन 1997 से ही पनामा के दोनों प्रमुख बंदरगाहों का संचालन कर रही है और इसका मालिकाना हक हांगकांग के अरबपति ली का-शिंग के पास है। वह चीन के नागरिक हैं। पश्चिमी विशेषज्ञों का मानना है कि चीन सरकार द्वारा ऐसे रणनीतिक निवेशों को न सिर्फ स्वीकृति दि जति है, बल्कि वे इसका राजनीतिक लाभ भी उठाते हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “चीन पनामा नहर का संचालन कर रहा है और हमने इसे चीन को नहीं दिया, हमने इसे पनामा को दिया और हम इसे वापस ले रहे हैं।” उन्होंने पनामा पर अत्यधिक शुल्क वसूलने का आरोप लगाते हुए इसके प्रबंधन पर भी सवाल खड़े किए।

ट्रंप ने पनामा सरकार से निर्देश लेने की अपील की, जिससे संकेत मिलता है कि अमेरिका अब इस नहर पर दोबारा नियंत्रण की संभावनाएँ तलाश रहा है। हालाँकि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लगता है कि अमेरिका को अपने प्रभाव को बहाल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

पनामा नहर पर बढ़ता चीनी प्रभाव केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन को दिखलाने वाला बन चुका है। यह घटना स्पष्ट रूप से यह दिखाने का कोशिश कर रही है कि ग्लोबल साउथ में चीन कैसे अपने रणनीतिक निवेश और वाणिज्यिक ताकत के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।

वहीं अमेरिका, जिसकी कभी इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ थी, अब अपने पुराने प्रभाव को फिर से कायम करने की कोशिशों में लगा है। लेकिन मौजूदा हालात में वह लगातार पिछड़ता दिखाई दे रहा है।

MP में मुस्लिम युवती शिफा ने छोड़ा इस्लाम, ‘शानवी’ नाम रखकर की सनातन में घरवापसी: हिन्दू युवक संग सात फेरे लेने के बाद बोली- यहाँ होता है महिलाओं का सम्मान

मध्य प्रदेश के खंडवा में एक मुस्लिम युवती ने सनातन से प्रभावित होकर घर वापसी की है। उसका कहना है कि सनातन में महिलाओं का सम्मान होता है। मुस्लिम युवती ने एक हिन्दू युवक से विवाह भी किया है। यह विवाह एक मंदिर में हुआ है। सनातन में वापसी के बाद उसने अपना नाम भी बदल लिया है।

सनातन में घर वापसी करने वाली इस युवती का नाम शिफा था। उसने सनातन में वापसी के बाद अपना नाम शानवी रखा है। यह घर वापसी खंडवा में बुधवार (30 जुलाई 2025) को हुई। युवती ने इस्लाम छोड़ने के बाद राहुल वर्मा नाम के युवक से विवाह किया। यह विवाह खंडवा के महादेवगढ़ मंदिर में हुआ। यहाँ शानवी ने महादेव का रूद्राभिषेक भी किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शिफा राइन मध्य प्रदेश के खंडवा छतरपुर की रहने वाली है। उसका राहुल वर्मा से विवाह विवाह महादेवगढ़ मंदिर में पंडित अश्विन खेड़े द्वारा सनातन रीति- रिवाज से संपन्न कराया गया। विवाह के दौरान सैकड़ों की संख्या में उपस्थित महिलाओं ने मंगल गीत गाये।

सिरपुर निवासी कृष्णा पटेल ने विवाह में कन्यादान कर नव-विवाहित जोड़े को श्रीरामचरित मानस भेंट की। शिफा ने बताया है कि वह बचपन से सनातन के प्रति आकर्षित थी।

शिफा ने बताया कि बचपन से ही हिंदू देवी-देवता उसे सपने में आकर आशीर्वाद देते थे। इसलिए वह सनातन धर्म को मानने लगी थी। उसका कहना है कि सनातन धर्म में महिलाओं का सम्मान किया जाता है। माँ सीता, माँ दुर्गा के रुप में इस धर्म में स्त्री की पूजा की जाती है। यह सब देखकर उसे अच्छा लगता था।

सनातन से प्रभावित शिफा ने अपने मन से राहुल वर्मा से शादी की है। उसने बताया, “सोशल मीडिया के माध्यम से मैंने महादेवगढ़ का काफी नाम सुना था। इसीलिए संकल्प लिया था कि विवाह महादेवगढ़ मंदिर पर जाकर ही करूँगी। मेरी इच्छा भोलेनाथ ने पूरी की। अब उनका आशीर्वाद हम दोनों पर बना रहेगा।”

अमेरिकी धौंस के सामने भारत ने नहीं टेके घुटने, व्यापार वार्ता बीच में ही छोड़ी… 25% टैरिफ लगाकर ट्रंप ने निकाली खीझ, रूस के साथ संबंधों पर बोले- मुझे इसकी परवाह नहीं

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर महीनों बातचीत के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार (30 जुलाई 2025) को भारत से व्यापार पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने के साथ-साथ भारत पर अतिरिक्त पैनल्टी लगाने की भी घोषणा की।

अमेरिका का ये कदम दर्शाता है कि नई दिल्ली अमेरिका के आगे झुकने को तैयार नहीं हुआ। मोदी सरकार की ‘राष्ट्र प्रथम’ नीति का भी ये एक प्रमाण है। भारत किसी भी तरह की आर्थिक अधीनता स्वीकार नहीं कर सकता।

रूस के साथ भारत के संबंध और व्यापार वर्षों पुराने हैं। भारत रूस से ऊर्जा और सैन्य हार्डवेयर खरीदता रहा है। अमेरिका ने इसे मुद्दा बनाते हुए भारत पर अतिरिक्त पैनल्टी की घोषणा कर दी।

‘असफल दबाव’ का संकेत है टैरिफ

राष्ट्रपति ट्रंप ने खास स्टाइल में भारत पर टैरिफ लगाने की घोषणा की। भारत पर टैरिफ की वजह ‘असहयोग या खराब व्यवहार’ नहीं है, बल्कि ये टैरिफ अमेरिका के तमाम दबाव के बावजूद भारत के नहीं झुकने का प्रमाण है।

ऐसे समय में जब जापान अमेरिका की शर्तों पर टैरिफ व्यवस्था में छूट दे रहा था, भारत एकतरफा समझौता करने के लिए तैयार नहीं हुआ और बातचीत छोड़कर बीच में ही निकल गया। अगर भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों और डेयरी प्रोडक्ट को खुली छूट दे देता तो भारत के घरेलू उद्योग और किसानों पर इसका बुरा असर पड़ता।

भारत अगर अमेरिकी शर्तों को मान लेता तो शायर भारत को टैरिफ वाली मुसीबत नहीं झेलनी पड़ती। लेकिन देशहित से समझौता करने के लिए भारत तैयार नहीं हुआ। अमेरिकी टैरिफ में छूट मिलने से भले ही थोड़े समय के लिए भारत को फायदा मिलता, लेकिन दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित प्रभावित होता।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर ट्रंप के फैलाया था झूठ

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने को लेकर अमेरिका राष्ट्रपति 25 से ज्यादा बार ‘सफेद झूठ’ बोल चुके हैं। यह पूरा घटनाक्रम ट्रंप के उन दावों की पोल भी खोल रहा है जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि भारत- पाकिस्तान के बीच सीजफायर उन्होंने कराया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तनाव कम करने में मदद की थी। लेकिन यह भारतीय सेना का अभियान था जिसने न केवल पहलगाम आतंकी हमले का बदला लिया, बल्कि सीमा पार आतंकवाद में पाकिस्तान की भूमिका को भी उजागर किया।

ऐसे आतंकवादियों के अंतिम संस्कार में पाकिस्तानी सेना के अधिकारी शामिल हुए जिसे संयुक्त राष्ट्र ने भी आतंकी घोषित कर रखा था। इसकी ऑनलाइन तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखी। भारत ने 11 पाकिस्तानी एयरबेस और 9 से ज़्यादा आतंकी शिविरों पर बमबारी की।

ऐसा करके भारत ने ये साबित किया कि सीमा पार पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी भी अब सुरक्षित नहीं रह सकते। आतंकवादी चाहे कहीं भी हों, भारत उन्हें ढूँढ कर मार देगा। भारत के सटीक हमले से डरे हुए पाकिस्तान ने तुरंत युद्धविराम की गुहार लगाई।

हालाँकि ट्रंप दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने का श्रेय लेने के लिए जरा जल्दी में थे। उन्होंने बार-बार लगातार इस दावे को दोहराया की भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध उन्होंने रुकवाया। जबकि भारत लंबे समय से कहता आ रहा है कि दोनों देशों के बीच किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप हमें बर्दाश्त नहीं है।

भारत ने पाकिस्तान के लगातार अनुरोध के बाद ही हमलों को रोकने का फैसला किया। अगर भारत ने सचमुच अमेरिकी हुक्म का पालन किया होता और अपने फैसले ट्रंप की समझदारी पर छोड़ दिए होते, तो उसे अब व्यापार दंड का सामना नहीं करना पड़ता। ट्रंप का ताजा गुस्सा साफ तौर पर दर्शाता है कि भारत ने स्वतंत्र रणनीतिक फैसले लिए।

रूसी तेल और हथियारों का भारत खरीदार रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप को ये बात भी चुभती रही है। कई बार उन्होंने अपनी निराशा जताई है। लेकिन भारत ये खुद तय करता है कि उसके लिए क्या सही है।

भारत के लिए रूसी ऊर्जा फायदेमंद

भारत का रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने का फैसला एक व्यावहारिक आर्थिक कदम रहा है। 2022 से रूस- यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस पर पश्चिमी देशों ने कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। ऐसे में रूस काफी कम दाम पर कच्चा तेल भारत को बेचता है।

दुनिया में कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों और पश्चिमी देशों की शर्तों का विकल्प भारत को रूस के रूप में मिला है। इससे भारत को ऊर्जा बिलों में अरबों की बचत करने और मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में मदद मिल रही है।

ऐसे में भारत से ये उम्मीद करना कि रूस- यूक्रेन युद्ध को देखते हुए भारत अमेरिकी नजरिए का समर्थन करेगा और रूस से व्यापारिक रिश्ता तोड़ देगा, पूरी तरह काल्पनिक लगता है, खास कर तक जब कई पश्चिमी देश रूस से रेयर अर्थ मिनरल्स आज भी खरीद रहे हैं।

रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक रक्षा संबंध

भारत रूस का पारंपरिक रक्षा संबंध रहा है। रूस से हथियार खरीदने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को सख्त ऐतराज रहा है। भारत लगातार उनकी शिकायतों की अनदेखी करता रहा है। नेहरू और इंदिरा गाँधी से लेकर वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक के काल में भी मास्को के साथ भारत के रक्षा संबंध जरूरत पर आधारित और विश्वसनीय रहे हैं।

ट्रंप ने भारत पर टैरिफ की घोषणा के बाद ये साफ करने की भी कोशिश की कि उन्हें रूस और भारत के रिश्ते से कोई फर्क नहीं पड़ता पर असलियत इससे बिल्कुल उलट है।

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने अफगानिस्तान में युद्ध लड़ने के लिए पाकिस्तान को कई रियायतें दी, जिससे भारत उसके रक्षा सौदों से बाहर हो गया। उस वक्त रूस ही था जिसने भारत की हर मुश्किल घड़ी में साथ दिया।

यहाँ तक कि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी सैन्य सहायता उपलब्ध कराई। ट्रंप या अमेरिका के किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए अब यह उम्मीद करना कि भारत दशकों पुराने रिश्तों को त्याग देगा, क्योंकि वह ऐसा चाहते हैं तो ये संभव नहीं है।

भारत के लिए संप्रभुता सर्वोपरि

ट्रंप के आगे नहीं झुकना सिर्फ व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता के लिए भी जरूरी है। ट्रंप की आक्रामक लेन-देन संबंधी कूटनीति के आगे न झुक कर भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि वह किसी भी वैश्विक शक्ति का जागीरदार नहीं बनेगा। चाहे सैन्य निर्णय हों, ऊर्जा स्रोत हों, या व्यापार नीति, भारत अपने राष्ट्रीय हित में कार्य करेगा। ट्रंप के सामने खड़े होकर नई दिल्ली ने दिखा दिया है कि वह अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आर्थिक घाटा भी सहन करने को तैयार है।

हालाँकि ये टैरिफ भारत की निर्यात को थोड़े वक्त के लिए नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिख सकता है। लेकिन बड़े कैनवास पर देखें तो ये दीर्घकालिक स्वायत्तता के लिए चुकाई जाने वाली एक छोटी सी कीमत हैं। ट्रंप द्वारा भारत पर ‘दंड’ लगाना कोई कूटनीतिक हार नहीं है, बल्कि एक कूटनीतिक घोषणा है कि भारत अपनी संप्रभुता को गिरवी नहीं रख सकता।

जैसे-जैसे भारत एक स्वतंत्र विदेश नीति और आर्थिक लचीलेपन के साथ दुनिया के छोटे-बड़े हर देश से अपनी दोस्ती को मजबूत कर रहा है, इससे आने वाले वर्षों में भारत एक विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खुद को स्थापित करेगा। भारत एक ऐसा संप्रभु राष्ट्र है, जो अपनी शर्तों पर निर्णय लेता है।

(ये मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन द्वारा लिखी गई है। इसे यहाँ क्लिक कर देखा जा सकता है)

J&K में चिनाब नदी पर 1856 मेगावट का पावर प्रोजेक्ट होगा तैयार, ‘सिंधु नदी’ का सारा जल भारत के काम आएगा: पाकिस्तान को मोदी सरकार ने फिर दिया झटका

भारत सरकार ने ‘सिंधु जल संधि’ रोकने के बाद एक और बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले के सिद्धू गाँव के पास चिनाब नदी पर 1,856 मेगावाट क्षमता वाले सावलकोट जलविद्युत परियोजना के निर्माण की शुरुआत कर दी है। इस परियोजना पर पहली बार 1960 में विचार किया गया था।

जानकारी के अनुसार, भारत द्वारा 22 अप्रैल 2025 को सिंधु जल संधि को निलंबित करने के बाद विकास संबंधी यह फैसला पाकिस्तान के लिए एक बड़ी समस्या का कारण हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की ओर बहने वाले पानी को रोकने के लिए भारत को जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। कहा जा रहा है कि सावलकोट परियोजना पूरी होने के बाद भारत सिंधु नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल कर पाएगा।

यह परियोजना ऊपर की ओर बगलीहार डैम और नीचे सालाल डैम के बीच आने वाले चिनाब नदी के हिस्से पर बनाई जा रही है। यह परियोजना रामबन और उधमपुर जिलों में फैली हुई है और जम्मू और श्रीनगर दोनों से लगभग 120-130 किलोमीटर की दूरी पर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोजेक्ट में एक ‘रोलर कॉम्पैक्टेड कंक्रीट ग्रैविटी डैम’ बनेगा, जिसकी ऊँचाई 192.5 मीटर होगी। नदी का बहाव मोड़ने के लिए घोड़े की नाल के आकार की तीन सुरंगें बनाई जाएँगी, जिनकी लंबाई क्रमशः 965 मीटर, 1130 मीटर और 1280 मीटर होगी। यह नदी का रुख मोड़ने में सक्षम होगा।

परियोजना के तहत डैम के बाएँ किनारे पर एक भूमिगत पावर हाउस बनेगा, जिसमें 225 मेगावाट के 8 यूनिट होंगे यानी कुल मिलाकर इसकी क्षमता 1,800 मेगावाट होगी। इसके अलावा, पर्यावरणीय जल प्रवाह के लिए छोड़े गए पानी से 56 मेगावाट की अतिरिक्त बिजली बनाई जाएगी, जिसके बाद इसकी क्षमता 1856 मेगावाट हो जाएगी।

बता दें कि बाढ़ नियंत्रण के लिए भी योजना तैयार की गई है। योजना के मुताबिक, अन्य मौसम में 2,977 क्यूमेक और मॉनसून में 9,292 क्यूमेक पानी मोड़ने की क्षमता होगी। परियोजना के तहत कार्यों की देखरेख की जिम्मेदारी राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) को सौंपी गई है।

यह पूरी परियोजना ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (नदी प्रवाह आधारित) सिस्टम पर आधारित है। सावलकोट जल विद्युत परियोजना से प्रतिवर्ष 7,994.73 मिलियन यूनिट ऊर्जा उत्पन्न होने की उम्मीद है, जिससे ऊर्जा की कमी वाले उत्तरी ग्रिड में बिजली की आपूर्ति को बढ़ावा मिलेगा और साथ ही क्षेत्र में औद्योगिक विकास में भी सहायता मिलेगी।

अमेरिका से बिगड़े रिश्ते, रणनीतिक संप्रभुता को पहुँचे नुकसान… राहुल गाँधी ने लोकसभा में यूँ ही नहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उगला जहर, जानिए कितने खतरनाक मंसूबे

लोकसभा में राहुल गाँधी की ओर से ऑपरेशन सिंदूर पर दिया गया बयान एक ऐसे मौके पर आया, जब देश पहलगाम आतंकी हमले की जवाबी कार्रवाई और एक सफल सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर एकमत था।

हालाँकि इस मौके पर राष्ट्रीय एकता की उम्मीदों को दरकिनार करते हुए, गाँधी का भाषण न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला था, बल्कि भारतीय संप्रभुता, सैन्य प्रतिष्ठा और विदेश नीति की स्थिरता पर भी सीधा प्रहार था।

राहुल ने इस सैन्य ऑपरेशन को महज एक ‘जनसंपर्क अभियान’ बताया। उन्होंने सेना के हाथ बंधे होने का दावा किया और सरकार पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का आरोप लगाया।

इसके पीछे छिपा असली उद्देश्य था- मोदी को उकसाकर उनकी प्रतिक्रिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेतुका दिखाना और अमेरिका जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ भारत की सावधानीपूर्वक बनाई गई विदेश नीति को नुकसान पहुँचाना।

जानबूझकर उकसावे की कोशिश: राहुल का असली निशाना मोदी की अमेरिकी रणनीति

राहुल गाँधी के भाषण का सबसे हैरान करने वाला पल वह था जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को संसद में खुलेआम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘झूठा’ कहने की चुनौती दी। यह सिर्फ एक तीखा बयान नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी।

गाँधी का मकसद था मोदी को भावनात्मक रूप से भड़काना, ताकि वे कोई ऐसा जवाब दें जिससे भारत और अमेरिका के बीच बने मजबूत लेकिन नाजुक रिश्तों को नुकसान पहुँचे।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से उनका व्यवहार कितना अस्थिर और अप्रत्याशित रहा है। अगर भारत-अमेरिका के रिश्तों में कोई खटास आती है, तो इसका असर सीधे-सीधे भारत की रणनीतिक स्थिति पर पड़ेगा, खासकर ऐसे समय में जब भारत, चीन से बढ़ते तनाव के बीच खुद को पश्चिमी देशों के लिए एक भरोसेमंद और पसंदीदा साझेदार के रूप में सामने रख रहा है।

यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के समर्थक माने जाने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी राहुल गाँधी के बयानों को ‘दिखावा’ कहा और माना कि अगर राहुल खुद प्रधानमंत्री होते, तो शायद ऐसा कुछ नहीं कहते, जैसा वह दूसरों से कह रहे हैं।

हालाँकि, मोदी ने इस उकसावे में नहीं आए और अपनी रणनीतिक समझ और धैर्य का परिचय दिया। मोदी सरकार की विदेश नीति का मकसद है- अमेरिका जैसे ताकतवर देश से एक बराबरी वाले साझेदार की तरह अपनी शर्तों पर बात करना, न कि किसी कमजोर या दबाव में आए देश की तरह उसकी बात को मानना।

आज जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था, तकनीक और रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है, तब एक भी गलत कदम देश को पीछे धकेल सकता है। राहुल गाँधी का ये बयान जवाबदेही से ज्यादा एक तरह की राजनीतिक तोड़फोड़ की कोशिश लगती है। ऐसा प्रयास जिससे सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर दिखाया जा सके और बाद में उसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।

मोदी का दृष्टिकोण: संयम, लाभ और रणनीतिक धैर्य

राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर जो ‘साहस की कमी’ का आरोप लगाया, वह पूरी तरह गलत साबित हुआ। इसके उलट, ऑपरेशन सिंदूर एक सटीक, शांत और सोच-समझकर किया गया सैन्य कदम था, जो अच्छे नेतृत्व और दूरदर्शी रणनीति का उदाहरण है।

पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के सिर्फ 48 घंटे के अंदर भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों में एक सटीक सैन्य कार्रवाई की, जिसमें कई आतंकी ठिकाने तबाह कर दिए गए। प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में साफ बताया कि यह कार्रवाई किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर नहीं रोकी गई, बल्कि इसलिए रुकी क्योंकि पाकिस्तान खुद पीछे हट गया और दया की गुहार लगाने लगा।

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि इस दौरान किसी भी वैश्विक नेता ने भारत को रोकने की कोशिश नहीं की। जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन्हें सैन्य ब्रीफिंग के बीच फोन किया, तो मोदी का जवाब साफ था: “अगर वे हमें रोकना चाहते हैं, तो इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हम गोली का जवाब गोले से देंगे।”

भारत ने इस पूरे अभियान में संयम दिखाया। उसने आम नागरिकों या शहरों को निशाना नहीं बनाया, बल्कि आतंक के खिलाफ सटीक जवाब दिया। इस तरह भारत ने न सिर्फ अपनी ताकत दिखाई, बल्कि तनाव बढ़ने से भी बचा और अपनी अंतरराष्ट्रीय साख भी बनाए रखी। यही असली नेतृत्व होता है, सोच समझकर किया गया एक मजबूत फैसला।

अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर भी यही समझदारी दिखती है। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में बताया गया है कि कैसे दुनिया के नेता ट्रंप जैसे अस्थिर स्वभाव वाले नेता से डील करने के लिए चापलूसी, रणनीतिक चुप्पी और सीमित असहमति का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अपने देश के लिए बेहतर सौदे हासिल कर सकें।

जो देश ट्रंप से सीधे टकराते हैं, उन्हें नुकसान भी झेलना पड़ता है। इसका उदाहरण यूक्रेन है, जहाँ राष्ट्रपति जेलेंस्की से विवाद के बाद अमेरिका ने कुछ समय के लिए यूक्रेन को हथियार भेजना रोक दिया, जबकि वह पहले से रूस के साथ जंग में फँसा हुआ था।

ऐसे में भारत का संयम दिखाना कमजोरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ताकत है। जहाँ जवाब भी दिया गया और भविष्य के लिए रिश्तों को भी संभाल कर रखा गया।

ग्लोबल साउथ, रूस और स्वतंत्रता की पुनर्परिभाषा

सबसे अहम बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का मकसद सुर्खियों में आना या दिखावा करने का नहीं है, बल्कि इसका असली लक्ष्य है भारत की ऐतिहासिक रूप से पश्चिम पर रही निर्भरता को कम करना और देश को एक आत्मनिर्भर, स्वतंत्र ताकत बनाना।

पहली बात, भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में पेश कर रहा है। इसके तहत वह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और आसियान देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है। साथ ही, ब्रिक्स जैसे समूहों को और मजबूत करके उन्हें पश्चिमी देशों के दबदबे के एक संतुलन के रूप में खड़ा कर रहा है।

दूसरी बात, भारत और रूस के बीच रिश्ते केवल पुरानी दोस्ती की वजह से नहीं टिके हुए हैं, बल्कि ये पूरी तरह से व्यवहारिक सोच पर आधारित हैं। जब यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और यूरोप ने भारत से उम्मीद की कि वह उनके लगाए प्रतिबंधों का साथ दे, तब भारत ने एक तटस्थ और स्वतंत्र रुख अपनाया। इससे कई पश्चिमी सरकारें नाराज भी हुईं, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह अब किसी का मोहताज नहीं है न ही किसी के दबाव में आने वाला देश है।

तीसरी और शायद सबसे अहम बात यह है कि मोदी सरकार ने चुपचाप लेकिन ठोस कदमों के साथ भारत में टेक्नोलॉजी और डेटा संप्रभुता की नींव रखनी शुरू कर दी है। यह आज की दुनिया में बेहद जरूरी और रणनीतिक रूप से अहम मुद्दा है। कॉन्ग्रेस ने या तो इस पर ध्यान नहीं दिया, या फिर विदेशी कंपनियों और ताकतों के साथ समझौता कर लिया।

इन तीनों पहलुओं से साफ होता है कि मोदी की विदेश नीति भारत को एक आत्मनिर्भर, मजबूत और सम्मानित वैश्विक ताकत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

तकनीकी संप्रभुता: पश्चिम की सेंसरशिप मशीन से सबक

यूक्रेन युद्ध ने एक कड़वी सच्चाई को सबके सामने ला दिया है, जिसे भारत अब नजरअंदाज नहीं कर सकता। बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियाँ जैसे मेटा, गूगल, यूट्यूब और एप्पल, सिर्फ बिजनेस नहीं करतीं, बल्कि वे अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बन चुकी हैं। इन कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके लोगों की बातों को दबाया, कंटेंट को सेंसर किया और ऐसे नैरेटिव बनाए जो वाशिंगटन की रणनीति के हिसाब से फिट बैठते हों।

सोचिए, अगर कल भारत का अमेरिका से किसी मुद्दे जैसे व्यापार, टैरिफ या कश्मीर पर मतभेद हो जाए, तो क्या गारंटी है कि ये टेक कंपनियाँ भारत की आवाज को दबाने या भारत विरोधी बातें फैलाने में इस्तेमाल नहीं होंगी? ये कोई कल्पना नहीं है, बल्कि दुनिया में पहले से हो चुका है। मोदी सरकार ने इस खतरे को समय रहते समझ लिया है और इसके खिलाफ तैयारी शुरू कर दी है।

इंडिया स्टैक, डिजिटल इंडिया एक्ट और सेमीकॉन इंडिया मिशन- ये सब केवल डिजिटल प्रगति के नाम पर नहीं हो रहे, बल्कि इनका असली मकसद है भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाना और विदेशी कंपनियों की पकड़ को कमजोर करना।

सरकार अब डेटा को देश के भीतर रखने (डेटा लोकलाइजेशन), सीमाओं के पार डिजिटल डेटा के प्रसार पर सख्ती और ओपन-सोर्स तकनीक पर आधारित पब्लिक डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दे रही है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत की डिजिटल आजादी और सुरक्षा किसी बाहरी दबाव में न आ कर अपनी शर्तों पर बनी रहे।

नयारा मामला: भारत की संप्रभुता की लड़ाई, एक-एक क्षेत्र में

इस पूरे संघर्ष का एक साफ उदाहरण नायरा मामला है, जिसमें भारत ने अपने अहम राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे पर विदेशी कंपनियों से नियंत्रण वापस लेने की कोशिश की। बाहर से देखने पर यह बस एक निजी ऊर्जा सौदे जैसा लगता है, लेकिन असल में यह भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता से जुड़ा मामला है।

सरकार का मकसद साफ है, यह सिर्फ निवेश की बात नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि कोई भी विदेशी पूँजी या कंपनी इतनी ताकतवर न बन जाए कि वह भारत के अंदर राजनीतिक फैसलों को प्रभावित कर सके या सरकार पर दबाव बना सके।

चाहे बात ऊर्जा की हो, डेटा की या फिर रक्षा क्षेत्र की भारत अब यह संदेश साफ दे रहा है- देश का भविष्य भारत खुद तय करेगा, न कि विदेशी निवेशक या विदेशी सरकारें।

कॉन्ग्रेस और अमेरिकी डीप स्टेट: समर्पण का इतिहास

विडंबना यह है कि भारत की मौजूदा विदेश नीति पर सवाल उठाने का सबसे कम हक अगर किसी को है, तो वह कॉन्ग्रेस पार्टी को है। नेहरू के समय में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, लेकिन असल में यह नीति रणनीतिक गहराई देने के बजाय सिर्फ अमेरिका को नाराज करने का कारण बनी।

बाद में इंदिरा गाँधी के सोवियत संघ से गहरे रिश्तों ने अमेरिका की नजरों में भारत को और संदिग्ध बना दिया। लेकिन असली झुकाव तो यूपीए-2 सरकार के समय दिखा, जब कॉन्ग्रेस ने अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ के सामने पूरी तरह झुकने का रवैया अपना लिया। निगरानी सहयोग (सर्विलांस), व्यापार में छूट और नीति संबंधी फैसलों में अमेरिका को खुश करने की कोशिश साफ नजर आई।

विकीलीक्स द्वारा सामने आए दस्तावेजों से यह भी साफ हुआ कि उस समय अमेरिकी दूतावास भारत के नीति-निर्माण वाले गलियारों में कितनी गहराई तक घुसा हुआ था। आज, मोदी सरकार उसी असंतुलित विरासत को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।

भारत को आत्मनिर्भर और स्वतंत्र रणनीतिक सोच वाला देश बनाने के लिए। लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी वही बातें दोहरा रहे हैं जो विदेशी मीडिया, पश्चिमी फंड से चलने वाले NGO, और जॉर्ज सोरोस जैसे विवादित अंतरराष्ट्रीय चेहरों से जुड़ी थिंक टैंक संस्थाएँ फैला रही हैं।

चाहे वो जानबूझकर कर रहे हों या अनजाने में, पर राहुल ऐसी ताकतों की मदद कर रहे हैं जो नहीं चाहतीं कि भारत एक मजबूत, आत्मनिर्भर और निर्णय लेने में स्वतंत्र देश बने। वे भारत को फिर से कमजोर, दबाव में रहने वाला और विदेशों पर निर्भर बनाना चाहते हैं और राहुल की बातें उसी दिशा में जाती दिखती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर दुनिया के लिए एक संदेश था, और यह तोड़फोड़ भी एक संदेश है

राहुल गाँधी जब ऑपरेशन सिंदूर को सिर्फ एक प्रचार का हथकंडा बताते हैं, तो वह सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी पर हमला नहीं कर रहे, बल्कि वे हमारे सशस्त्र बलों के हौसले और बलिदान को भी छोटा दिखा रहे हैं।

वे इस सैन्य अभियान की सफलता को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं, उन जवानों के साहस और त्याग को कमतर बता रहे हैं जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर इस मिशन को पूरा किया। इतना ही नहीं, यह कहकर कि भारत ने झिझक दिखाई, राहुल दुश्मन को गलत संदेश दे रहे हैं और उनका हौसला बढ़ा रहे हैं।

जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने मंगलवार को लोकसभा में बहुत साफ शब्दों में कहा, “भारत ने जो ठान लिया था, वह हासिल करके दिखाया। हमारी सेना ने यह सुनिश्चित किया कि पाकिस्तान आने वाले दशकों तक इस सबक को कभी न भूले।”

राहुल गाँधी जिस बात को ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी’ कह रहे हैं, असल में वह एक तरह की अराजकता फैलाने की कोशिश है। यह कोई सामान्य असहमति नहीं है। यह राष्ट्रीय हितों के साथ किया गया एक गंभीर विश्वासघात है।

उनकी यह बयानबाज़ी किसी साहस या सोच से नहीं, बल्कि राजनीति में खुद को जरूरी बनाए रखने की हताशा से भरी है। इसके लिए अगर देश को अनावश्यक विवादों में धकेलना पड़े या भारत को फिर से बाहरी ताकतों के दबाव में झुकाना पड़े तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

मोदी संप्रभु भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, राहुल औपनिवेशिक अतीत बेच रहे हैं

ऑपरेशन सिंदूर मोदी की छवि चमकाने के लिए नहीं था। यह दुनिया को एक साफ संदेश देने के लिए था।
मेसैज साफ था: भारत जवाब देगा, लेकिन अपनी शर्तों पर। भारत आतंकवाद से लड़ेगा, लेकिन विदेशी ताकतों या पूंजीपतियों को खुश करने के लिए नहीं। भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा, ना कि उसे किसी के साथ ‘समझौते’ में सौंप देगा।

जहाँ प्रधानमंत्री मोदी चुपचाप लेकिन मजबूती से भारत की तकनीकी, कूटनीतिक और आर्थिक आजादी की नींव रख रहे हैं, वहीं राहुल गाँधी संसद में सिर्फ गुस्सा निकालने और नारेबाज़ी करने में लगे हैं। वो चाहते हैं कि भारत ठोस नीति बनाए बिना शोर मचाए लेकिन इससे देश को कोई फायदा नहीं होगा।

ये साहस नहीं, बल्कि एक तरह की मिलीभगत है। ऐसे लोगों के साथ, जो नहीं चाहते कि भारत अपने पैरों पर खड़ा हो। लोकसभा में राहुल गाँधी के कुछ डायलॉग पर उनके समर्थक इंटरनेट पर तालियाँ जरूर बजा सकते हैं, लेकिन भारत का भविष्य अब ऐसे ‘वायरल पलों’ से तय नहीं होगा।

भारत अब खुद फैसले करता है, वो जमाना गया जब वाशिंगटन में बैठकर भारत के लिए नीतियाँ लिखी जाती थीं। अब देश शोर या ड्रामे से नहीं, बल्कि रणनीति, आत्मनिर्भरता और स्थिर नेतृत्व से आगे बढ़ रहा है और एक हताश ‘राजकुमार’ की यह दिखावटी कोशिशें भारत की इस रफ्तार को नहीं रोक सकतीं।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे। हिंदी में इसका अनुवाद विवेकानंनद मिश्र ने किया है।

‘जिन्होंने किया पहलगाम हमला, उनके सिर में मारी गोली’: गृह मंत्री अमित शाह ने बताई बदले की कहानी, कहा- वोटबैंक के लिए लश्कर-ए-तैयबा को भी बचाएगी कॉन्ग्रेस

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि कॉन्ग्रेस वोट बैंक बचाने के लिए पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा तक का समर्थन भी करेगी। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर पर कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम के प्रश्नों को लेकर भी जम कर सुनाया। गृह मंत्री अमित शाह ने कॉन्ग्रेस की ऐतिहासिक गलतियाँ भी गिनाईं। यह सब बातें उन्होंने राज्यसभा में बुधवार (30 जुलाई, 2025) को अपन वक्तव्य में कहीं। उन्होंने इस दौरान पहलगाम आतंकी हमले के बदले के बारे में भी बात की।

गृह मंत्री शाह के बयान से पहले विपक्ष ने काफी हंगामा मचाया और कहा कि प्रधानमंत्री जवाब दें। हालाँकि, इस पर सुबह ही बात तय हो चुकी थी। विपक्ष ने हंगामा मचाने के बाद राज्यसभा से वॉकआउट भी कर दिया। गृह मंत्री शाह ने इस पर हमला बोला और कहा, “विपक्ष वालों ने सालों से वोटबैंक बचाने के चक्कर में आतंकवाद के खिलाफ कुछ नहीं किया, इसलिए इनसे जवाब नहीं सुना जाएगा”

उन्होंने ऑपरेशन महादेव के विषय में भी बताया, जिसमे पहलगाम हमला करने वाले तीन आतंकी सुलेमान, जिब्रान और अफगान मारे गए थे। उन्होंने बताया, “आतंकियों की डेड बॉडी की पहचान उनके 2 मददगारों और उनकी माँ ने भी की है… तीनों लोगो ने कहा है कि यही आतंकी थे जो 21 अप्रैल को यहाँ ढोक में आए थे और खाना लेकर गए थे।”

गृह मंत्री शाह ने इस ऑपरेशन पर एक और बात बताई। उन्होंने कहा, “मुझे मैसेज आए थे कि इन आतंकियों को जब भी मारें, सिर में गोली मारें। संयोग है कि इन तीनों के एनकाउंटर में सिर में ही गोली लगी है।” उन्होंने इसके बाद उन लोगों पर प्रश्न उठाए जो इस ऑपरेशन को लेकर शोर मचा रहे थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम को भी घेरा।

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी की मानसिकता पूरी दुनिया के सामने चिदंबरम साहब ने उजागर कर दी कि वोट बैंक के लिए हम पाकिस्तान का समर्थन करते हुए भी नहीं डरेंगे, हमारी वोट बैंक के लिए लश्कर ए तैयबा को बचाने के लिए भी नहीं डरेंगे और हमारी वोट बैंक के लिए हम आतंकियों को शाब्दिक शेल्टर भी देंगे।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस पर हमला जारी रखते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस की प्राथमिकता देश की सुरक्षा नहीं है, राजनीति है। इनकी प्राथमिकता आतंकवाद को समाप्त करना नहीं है, अपनी वोट बैंक है। इनकी प्राथमिकता हमारी सीमा की सुरक्षा नहीं है, सेक्यूलर और तुष्टिकरण की राजनीति है।”

POK को लेकर भी उन्होंने स्टैंड स्पष्ट कर दिया। गृह मंत्री शाह ने कहा,”मैं कॉन्ग्रेस को कहना चाहता हूँ पाकिस्तान को पाक अधिकृत कश्मीर आपने दिया था, लेकिन वापस लेने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार करेगी।” गृह मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर भी बात की और कॉन्ग्रेस पर प्रश्न उठाए।

उन्होंने कहा, “चिदंबरम जी कहते हैं कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ निर्णायक नहीं है… 1965 की लड़ाई निर्णायक थी क्या, 1971 की लड़ाई निर्णायक थी क्या, तो फिर आंतक क्यों फैला।” गृह मंत्री ने यह भी कहा कि 30 साल तक भाजपा की सरकार रहेगी, इसकी आदत डाल लेनी चाहिए।

गृह मंत्री शाह ने 2008 में 26/11 हमले पर कॉन्ग्रेस सरकार के एक्शन ना लेने पर भी निशाना साधा। गृह मंत्री ने कहा, “कॉन्ग्रेस की सरकार होती तो हमले के बाद पाकिस्तान को तुरंत क्लीन चिट मिल जाती, रक्षा मंत्रालय की जगह विदेश मंत्रालय काम करता… रातों रात डोजियर तैयार होता, डोजियर वहाँ भेज कर चर्चा करते सरम-अल-शेख की।”

गृह मंत्री शाह ने यह भी प्रश्न उठाया कि कॉन्ग्रेस राज में दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन जैसे अपराधी भागे और इस पर कोई जवाब नहीं है। गृह मंत्री ने इससे पहले लोकसभा में भी इस मामले पर जवाब दिया था और कॉन्ग्रेस को घेरा था।