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पीएम नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड-मालदीव यात्रा से देश को फायदे ही फायदे: CETA समझौते, आर्थिक मदद और रणनीतिक रिश्ते हुए मजबूत, वैश्विक ताकत बनने की ओर भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड (यूनाइटेड किंगडम) और मालदीव की यात्रा ने भारत को वैश्विक मंच पर एक नई ऊँचाई दी है। इन दोनों देशों के साथ हुए ऐतिहासिक समझौतों ने भारत के आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव को और मजबूत किया है। यह यात्रा भारत की ‘पड़ोसी पहले’ और ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) नीति का एक शानदार उदाहरण है।

आइएविस्तार से जानते हैं कि इन दौरों से भारत को क्या-क्या फायदे हुए, कौन-कौन से समझौते हुए और इनका भारत के भविष्य पर क्या असर होगा।

पीएम मोदी की इंग्लैंड यात्रा के दौरान CETA समझौता

24 जुलाई 2025 को पीएम नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड यात्रा के दौरान भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता तीन साल की कठिन मेहनत और 14 दौर की जटिल बातचीत का नतीजा है। भारत की ओर से वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और यूके की ओर से बिजनेस एंड ट्रेड सेक्रेटरी जोनाथन रेनॉल्ड्स ने हस्ताक्षर किए।

इस ऐतिहासिक मौके पर पीएम मोदी, यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और यूके की चांसलर रैचेल रीव्स भी मौजूद थे। यह समझौता भारत को वैश्विक व्यापार में एक नया मुकाम दिलाने वाला है।

CETA से जुड़ी अहम बातें

CETA की शुरुआत 2022 में हुई थी, जब ब्रेक्जिट के बाद यूके नए व्यापारिक साझेदारों की तलाश में था। भारत भी ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के अपने मिशन को गति देना चाहता था। तीन साल की बातचीत में कई मुश्किल मुद्दों पर चर्चा हुई, जैसे टैरिफ कटौती, वीजा नियम, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा। 6 मई 2025 को दोनों देशों ने सैद्धांतिक सहमति जताई, और 22 जुलाई 2025 को भारत की यूनियन कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी। आखिरकार, 24 जुलाई 2025 को यह समझौता हस्ताक्षरित हुआ।

यह समझौता इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। यह वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा, और पेशेवर गतिशीलता को कवर करता है। यह भारत के लिए आर्थिक विकास, रोजगार सृजन, और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में एक बड़ा कदम है।

CETA से भारत को होने वाले फायदे

99% एक्सपोर्ट पर शून्य टैरिफ

  • भारत से यूके जाने वाले 99% सामानों पर अब कोई टैरिफ नहीं लगेगा। इससे कपड़ा, चमड़ा, जूते, रत्न-आभूषण, खिलौने, और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों में निर्यात को भारी बढ़ावा मिलेगा।
  • किसानों और मछुआरों को लाभ: 95% कृषि उत्पादों पर शून्य टैरिफ से भारतीय चाय, कॉफी, हल्दी, काली मिर्च, दालें, आम, नारंगी, जैकफ्रूट, और मिलेट्स जैसे जैविक उत्पादों को यूके के 375 अरब डॉलर के कृषि बाजार में आसान पहुँच मिलेगी। मछुआरों को 99% समुद्री उत्पादों पर शून्य टैरिफ से आय में 20-30% की बढ़ोतरी होगी।
  • संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा: भारत ने डेयरी, सेब, और खाद्य तेल जैसे क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा, ताकि स्थानीय किसानों और उद्योगों को नुकसान न हो।
  • अनुमानित वृद्धि: इन क्षेत्रों से निर्यात में 10-15% की सालाना वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे तिरुपुर, कानपुर, और कोलकाता जैसे टेक्सटाइल और चमड़ा हब में लाखों नौकरियाँ पैदा होंगी।

रोजगार सृजन और MSMEs को बढ़ावा

  • यह समझौता भारत में लाखों नौकरियाँ पैदा करेगा, खासकर मेहनत आधारित क्षेत्रों जैसे टेक्सटाइल, चमड़ा और ज्वैलरी में।
  • छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs), कारीगरों और बुनकरों को वैश्विक बाजार में जगह मिलेगी। बौद्धिक संपदा और भौगोलिक संकेतक (GI टैग) प्रोटेक्शन से भारतीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलेगी।
  • उदाहरण के लिए तिरुपुर के टेक्सटाइल उद्योग और कानपुर के चमड़ा उद्योग को नया बाजार मिलेगा, जिससे स्थानीय कारीगरों और महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

सस्ते आयातित उत्पाद

  • यूके से भारत आने वाली व्हिस्की, कारें (जैसे जगुआर, लैंड रोवर), चॉकलेट, कॉस्मेटिक्स, और मेडिकल उपकरण जैसे ईसीजी और एक्स-रे मशीनें सस्ती होंगी।
  • व्हिस्की पर टैरिफ 150% से घटकर 75% और अगले 10 साल में 40% तक होगा। कारों पर टैरिफ 100% से 10% तक कम होगा।
  • इससे भारतीय उपभोक्ताओं को सस्ते और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलेंगे, और यूके की कंपनियों को भारत जैसे बड़े बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिलेगा।

सर्विस सेक्टर में नए अवसर

  • यूके ने पहली बार इतनी बड़ी प्रतिबद्धताएँ दी हैं। भारतीय आईटी/आईटीईएस, वित्तीय सेवाएँ, शिक्षा, टेलीकॉम, आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग कंपनियों को यूके के बाजार में आसान पहुँच मिलेगी।
  • डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (DCC): 75,000 भारतीय कर्मचारियों को यूके में सामाजिक सुरक्षा भुगतान से 3 साल की छूट मिलेगी। इससे उनकी सैलरी बढ़ेगी और कंपनियों की लागत 20-30% कम होगी।
  • 36 सेवा क्षेत्रों में ‘इकोनॉमिक नीड्स टेस्ट’ की जरूरत नहीं होगी और 35 यूके क्षेत्रों में भारतीय पेशेवर 24 महीने तक बिना स्थानीय कार्यालय के काम कर सकेंगे।
  • हर साल 1,800 से ज्यादा भारतीय शेफ, योग प्रशिक्षक और संगीतकार यूके में काम कर सकेंगे।

शिक्षा क्षेत्र में क्रांति

  • यूके की पाँच मशहूर यूनिवर्सिटी साउथेम्पटन, लिवरपूल, यॉर्क, एबरडीन और ब्रिस्टल भारत में कैंपस खोलेंगी। साउथेम्पटन ने गुरुग्राम में कैंपस शुरू कर दिया है और बाकी बेंगलुरु और मुंबई में खुलेंगे।
  • इससे भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा घर बैठे मिलेगी और विदेश जाने की लागत बचेगी। यह भारत के शिक्षा क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाएगा।

निवेश और स्टार्टअप्स

  • यूके से 6 अरब पाउंड (लगभग 65,000 करोड़ रुपये) का निवेश भारत में आएगा, जो मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देगा।
  • भारतीय स्टार्टअप्स को यूके के निवेशकों और इनोवेशन हब्स तक पहुँच मिलेगी, जिससे वैश्विक विस्तार में मदद मिलेगी।

आर्थिक विकास और वैश्विक नेतृत्व

  • वर्तमान में भारत-यूके का द्विपक्षीय व्यापार 56 अरब डॉलर (लगभग 4.7 लाख करोड़ रुपये) का है। CETA का लक्ष्य इसे 2030 तक 120 अरब डॉलर (10 लाख करोड़ रुपये) तक ले जाना है।
  • 2040 तक 2.8 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यापार होगा, जो भारत की GDP को 0.5-1% बढ़ाएगा।
  • यह समझौता भारत के ‘मेक इन इंडिया’ मिशन को तेज करेगा और भारत को वैश्विक व्यापार में लीडर बनाएगा।

CETA की खासियतें

  • वस्तु और सेवा व्यापार: यह समझौता वस्तुओं, सेवाओं, निवेश और बौद्धिक संपदा को कवर करता है।
  • सतत विकास: पर्यावरण, नवाचार, और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने पर जोर।
  • महिलाओं और MSMEs के लिए प्रावधान: व्यापार वित्त और वैश्विक साझेदारी के लिए विशेष सुविधाएँ।
  • पेशेवर गतिशीलता: भारतीय पेशेवरों को यूके में काम करने के लिए आसान वीजा नियम।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए कहा, “यह समझौता भारत के किसानों, कारीगरों और छोटे व्यवसायियों के लिए नए दरवाजे खोलेगा। यह भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में ले जाएगा।”

मालदीव यात्रा: भारत-मालदीव संबंधों में नया युग

25 जुलाई 2025 को पीएम नरेंद्र मोदी मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के निमंत्रण पर हुई इस यात्रा ने दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण दौर के बाद रिश्तों को नई मजबूती दी। मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान और चीन की ओर झुकाव के बाद यह यात्रा एक सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है।

मालदीव के साथ रिश्तों की पृष्ठभूमि

भारत और मालदीव के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक, व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते रहे हैं। 1965 में मालदीव की आजादी के बाद भारत पहला देश था, जिसने इसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। 1988 में ऑपरेशन कैक्टस, 2004 की सुनामी और 2014 के जल संकट में भारत ने मालदीव की मदद की। कोविड-19 महामारी के दौरान भी भारत ने टीके और आर्थिक सहायता दी।

हालाँकि 2023 में राष्ट्रपति मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद ‘इंडिया आउट’ अभियान ने रिश्तों में खटास ला दी थी। मुइज्जू ने भारत की सैन्य मौजूदगी को संप्रभुता के लिए खतरा बताया और चीन के करीब जाने की कोशिश की। लेकिन भारत की आर्थिक और रणनीतिक मदद ने मालदीव को भारत की अहमियत समझा दी। 2024 में मालदीव के विदेश और रक्षा मंत्रियों की भारत यात्रा और भारत की 400 मिलियन डॉलर की करेंसी स्वैप सुविधा ने रिश्तों को सुधारा।

मालदीव यात्रा के दौरान हुए समझौते और भारत को फायदे

आर्थिक सहायता और ऋण राहत

  • भारत ने मालदीव को 4,850 करोड़ रुपये की ऋण सहायता (एलओसी) दी, जिससे बुनियादी ढाँचा, आवास और सामुदायिक विकास परियोजनाएँ शुरू होंगी।
  • मालदीव के वार्षिक ऋण चुकौती दायित्वों को कम किया गया, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी।
  • 400 मिलियन डॉलर (3,320 करोड़ रुपये) की करेंसी स्वैप सुविधा और 50 मिलियन डॉलर (415 करोड़ रुपये) के ट्रेजरी बिल को आगे बढ़ाया गया।
  • 69 मिलियन डॉलर (572.7 करोड़ रुपये) की अनुदान सहायता का वादा।
  • फायदा: भारत मालदीव का सबसे भरोसेमंद आर्थिक साझेदार बनकर उभरेगा। यह हिंद महासागर में भारत के प्रभाव को बढ़ाएगा और चीन के प्रभाव को संतुलित करेगा।

मुक्त व्यापार समझौता (IMFTA)

  • भारत-मालदीव मुक्त व्यापार समझौते (IMFTA) पर बातचीत शुरू हुई। यह मछली, जलीय कृषि, और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में व्यापार बढ़ाएगा।
  • फायदा: भारतीय मछुआरों और व्यापारियों को मालदीव में नया बाजार मिलेगा। मालदीव को भारतीय उत्पाद सस्ते मिलेंगे, जिससे दोनों देशों का व्यापार बढ़ेगा।

आवास और बुनियादी ढाँचा

  • हुलहुमाले में 3,300 सामाजिक आवास इकाइयों का हस्तांतरण।
  • अड्डू शहर में सड़क और जल निकासी प्रणाली परियोजना का उद्घाटन।
  • 6 उच्च प्रभाव वाली सामुदायिक विकास परियोजनाएँ शुरू, जैसे जल आपूर्ति और सीवरेज सुविधाएँ।
  • फायदा: भारत की मदद से मालदीव में रहन-सहन का स्तर सुधरेगा। यह भारत की सॉफ्ट पावर को बढ़ाएगा और मालदीव में भारत की सकारात्मक छवि बनाएगा।

रक्षा और सुरक्षा सहयोग

  • माले में रक्षा मंत्रालय भवन का उद्घाटन।
  • 72 भारी वाहनों और दो भीष्म हेल्थ क्यूब सैट का हस्तांतरण।
  • मालदीव की राष्ट्रीय रक्षा सेना (MNDF) को 4 मिलियन डॉलर (33.2 करोड़ रुपये) की ग्रांट।
  • फायदा: मालदीव की रक्षा क्षमता बढ़ने से हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन में भारत-मालदीव सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ाएगा।

डिजिटल और तकनीकी सहयोग

  • यूपीआई और रूपे पेमेंट सिस्टम की शुरुआत, जिससे मालदीव में पर्यटन और खुदरा व्यापार बढ़ेगा।
  • भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान और मालदीव मौसम विज्ञान सेवा के बीच समझौता।
  • डिजिटल परिवर्तन के लिए जनसंख्या स्तर पर डिजिटल समाधानों को साझा करने का समझौता।
  • फायदा: भारतीय डिजिटल कंपनियों को मालदीव में नया बाजार मिलेगा। भारतीय पर्यटकों के लिए मालदीव में लेन-देन आसान होगा, जिससे पर्यटन बढ़ेगा।

स्वास्थ्य और मत्स्य पालन

  • मालदीव ने भारतीय फार्माकोपिया (आईपी) को मान्यता दी, जिससे भारतीय दवाएँ मालदीव में आसानी से उपलब्ध होंगी।
  • मत्स्य पालन और जलीय कृषि में सहयोग के लिए समझौता।
  • फायदा: भारतीय फार्मा कंपनियों को मालदीव में बाजार मिलेगा। मछुआरों को मालदीव में व्यापार के अवसर बढ़ेंगे।

सांस्कृतिक और राजनयिक मजबूती

  • भारत-मालदीव राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ पर संयुक्त डाक टिकट जारी।
  • ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत पीएम मोदी और राष्ट्रपति मुइज्जू ने पौधरोपण किया।
  • फायदा: सांस्कृतिक और लोगों के बीच संबंध मजबूत होंगे। मालदीव में भारत की छवि एक भरोसेमंद दोस्त के रूप में और मजबूत होगी।

मालदीव के साथ रिश्तों में सुधार

  • पिछले दो सालों में मालदीव में ‘इंडिया आउट’ अभियान ने भारत के खिलाफ माहौल बनाया था। राष्ट्रपति मुइज्जू ने शुरू में भारत से दूरी बनाई और चीन की ओर झुकाव दिखाया। लेकिन भारत की आर्थिक और रणनीतिक मदद ने मालदीव को भारत की अहमियत समझा दी।
  • 2024 में आर्थिक सहायता: 400 मिलियन डॉलर की करेंसी स्वैप सुविधा और 28 द्वीपों पर जल आपूर्ति और सीवरेज परियोजनाएँ।
  • 2025 में अतिरिक्त सहायता: 69 मिलियन डॉलर की अनुदान सहायता और 50 मिलियन डॉलर के ट्रेजरी बिल को आगे बढ़ाया।
  • उच्चस्तरीय यात्राएँ: मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला खलील और रक्षा मंत्री घस्सान मौमून की भारत यात्रा ने रिश्तों को नया आयाम दिया।

राष्ट्रपति मुइज्जू ने पीएम मोदी की यात्रा के दौरान कहा, “भारत हमारा सबसे करीबी और मूल्यवान साझेदार है। IMFTA हमारी आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करेगा।” यह दर्शाता है कि मालदीव अब भारत के साथ सहयोग को प्राथमिकता दे रहा है।

भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक महत्व

  • हिंद महासागर में प्रभाव: मालदीव हिंद महासागर में एक महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग पर है। भारत की मदद से मालदीव की रक्षा और आर्थिक स्थिति मजबूत होने से भारत का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ेगा।
  • चीन के प्रभाव को संतुलित करना: मालदीव में चीन का बढ़ता प्रभाव एक चुनौती था। भारत की आर्थिक और रक्षा सहायता ने मालदीव को भारत के करीब लाया।
  • पर्यटन और व्यापार: यूपीआई और रूपे जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम से भारतीय पर्यटकों के लिए मालदीव की यात्रा आसान होगी। इससे पर्यटन और व्यापार बढ़ेगा।
  • सॉफ्ट पावर: आवास, स्वास्थ्य, और बुनियादी ढाँचे में भारत की मदद से मालदीव में भारत की छवि एक भरोसेमंद दोस्त के रूप में मजबूत हुई।

दोनों देशों के लिए साझा लाभ

इंग्लैंड

  • यूके को भारत जैसे बड़े बाजार में प्रवेश मिलेगा। उनकी व्हिस्की, कारें, और मेडिकल उपकरण भारत में सस्ते होंगे, और उनकी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ेगी।
  • 90% ब्रिटिश उत्पादों पर भारत में टैरिफ कटौती से यूके को 6 अरब पाउंड का निवेश और निर्यात लाभ मिलेगा।
  • यूके में हजारों नौकरियाँ सुरक्षित होंगी, खासकर व्हिस्की, ऑटोमोबाइल और वित्तीय सेवा क्षेत्रों में।
  • मालदीव
  • भारत की आर्थिक मदद से मालदीव की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। 4,850 करोड़ रुपये की ऋण सहायता और ऋण चुकौती में राहत से मालदीव की वित्तीय स्थिति सुधरेगी।
  • आवास, सड़क और रक्षा परियोजनाएँ मालदीव के लोगों के जीवन को बेहतर करेंगी।
  • यूपीआई और IMFTA जैसे समझौते मालदीव के पर्यटन और व्यापार को बढ़ाएंगे।

भारत

  • दोनों देशों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ने से भारत की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।
  • हिंद महासागर में भारत का रणनीतिक प्रभाव बढ़ेगा, और ‘मेक इन इंडिया’ को नया प्रोत्साहन मिलेगा।
  • किसानों, कारीगरों, युवाओं और MSMEs को नए अवसर मिलेंगे, जिससे भारत की सामाजिक और आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी।

पीएम नरेंद्र मोदी की इंग्लैंड और मालदीव यात्रा ने भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत किया है। यूके के साथ CETA समझौते ने भारत के लिए व्यापार, रोजगार और शिक्षा के नए दरवाजे खोले हैं। मालदीव के साथ समझौतों ने भारत की सॉफ्ट पावर और हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया है। ये दोनों दौरे भारत की ‘पड़ोसी पहले’ और ‘सागर’ नीति के तहत क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि की दिशा में एक बड़ा कदम हैं।

यह सिर्फ व्यापारिक और रणनीतिक समझौते नहीं हैं, बल्कि भारत की तरक्की की नई कहानी हैं। किसानों को नए बाजार, युवाओं को नौकरियाँ और MSMEs को वैश्विक पहचान मिलेगी। पीएम मोदी का नेतृत्व और उनकी दूरदर्शी नीतियाँ भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की राह पर तेजी से ले जा रही हैं।

उत्तर प्रदेश के बहराइच में लव जिहाद की शिकायत पर दो हिंदू युवकों की बेरहमी से पिटाई, शहाबुद्दीन, अनस और जीशान गिरफ्तार: अपहरण-धर्मांतरण का आरोप

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में लव जिहाद का मामला दर्ज कराने पर दो हिंदू युवकों के साथ दिल दहला देने वाली बर्बरता का मामला सामने आया है। यह घटना बुधवार (23 जुलाई 2025) को रामगाँव थाना क्षेत्र के बरुआ घाट इलाके में हुई, जब चंदन मौर्य और उसका चचेरा भाई मोहित वहाँ मौजूद थे।

रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ितों का आरोप है कि शहाबुद्दीन नामक युवक ने उन्हें बंदूक की नोक पर जबरन अपनी कार में बैठा लिया। बाद में अनस और जीशान भी उसके साथ आ गए। तीनों आरोपितों ने दोनों युवकों को एक सुनसान जगह पर ले जाकर उनके कपड़े उतरवा दिए और लोहे की रॉड व डंडों से बेरहमी से पीटा।

आरोप है कि हमलावरों ने उन्हें पानी के बदले  पेशाब पीने के लिए मजबूर किया और बंदूक की नोक पर इस्लाम जिंदाबाद के नारे लगाने को भी कहा। पीड़ित चंदन मौर्य ने घटना की शिकायत रामगाँव थाने में दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया और अपहरण में इस्तेमाल की गई कार को भी जब्त कर लिया है।

पुलिस ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि पीड़ितों को मटेरा क्षेत्र से सुरक्षित बरामद कर लिया गया है और घटना की जाँच जारी है। इस अमानवीय कृत्य से इलाके में तनाव फैल गया है और प्रशासन ने स्थिति पर नजर बनाए रखी है।

मुस्लिम पुरुषों ने फर्जी आईडी का इस्तेमाल कर हिंदू लड़कियों को निशाना बनाया

चंदन ने अपनी शिकायत में बताया कि मुस्लिम युवकों ने उस पर और उसके चचेरे भाई मोहित पर पुरानी रंजिश के चलते हमला किया। उसने आरोप लगाया कि हमलावरों की योजना थी कि वे दोनों को नेपाल ले जाकर मार डालें।

चंदन ने यह भी बताया कि हमलावर बाबा गुरुअप नाम के एक इंस्टाग्राम ग्रुप से जुड़े हुए हैं। इस ग्रुप के सदस्य व्हाट्सएप पर फर्जी हिंदू नामों से अकाउंट बनाकर हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं। चंदन के मुताबिक, ये लोग महंगी गाड़ियाँ और गैजेट्स दिखाकर लड़कियों को आकर्षित करते हैं और जिसके लिए उन्हें विदेशों से फंडिंग मिलती है।

फोटो साभार – इंडिया टुडे

चंदन ने अपनी शिकायत में बताया कि मुस्लिम युवकों का एक गिरोह फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल करके हिंदू लड़कियों को फंसाता है। उन्होंने कहा कि ये लोग पहले लड़कियों की जाति और धर्म की जानकारी निकालते हैं और फिर उन्हीं के मुताबिक नकली सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर उनसे दोस्ती करते हैं।

बाद में वे लड़कियों को प्रेम संबंधों में फँसाकर इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डालते हैं। चंदन ने दावा किया कि इन लोगों ने उनके गाँव की हिंदू लड़कियों को भी निशाना बनाया है।

चंदन के मुताबिक, करीब दो महीने पहले उन्होंने पुलिस को इस पूरे गिरोह की जानकारी दी थी और उनकी गतिविधियाँ रोकने की कोशिश की थी। उन्होंने बाबा गुरुअप नाम के इंस्टाग्राम ग्रुप का जिक्र किया, जिसके सदस्य व्हाट्सएप के जरिए लड़कियों को फँसाने का काम करते हैं और विदेशों से पैसे मिलने का भी आरोप लगाया।

चंदन ने बताया कि इन आरोपितों से उनका झगड़ा भी हुआ था, लेकिन जब उन्होंने पुलिस से शिकायत की, तो पुलिस ने उल्टा उन्हें ही समझौता करने के लिए मजबूर किया और उनके मोबाइल से सारे सबूत भी मिटा दिए।

चंदन ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, ‘पुलिस ने मेरी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की, उल्टा मेरे फोन से सबूत हटवा दिए और समझौता कराने की कोशिश की।’ वहीं, एडिशनल एसपी दुर्गा प्रसाद तिवारी ने बताया कि शुरुआती जाँच में यह मामला आपसी रंजिश का लग रहा है।

उन्होंने कहा कि तीन आरोपितों शहाबुद्दीन, अनस और जीशान को गिरफ्तार कर लिया गया है और केस दर्ज कर लिया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ितों को मजहबी नारे लगाने के लिए मजबूर करने की बात मूल शिकायत में नहीं थी, बल्कि बाद में जोड़ी गई।

हिन्दुओं पर 2000+ हमले, महिलाओं का रेप… आवामी लीग का दमन: तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में बिन चुनाव के ‘तानाशाह’ बनने की ओर अग्रसर हैं मुहम्मद यूनुस

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हुए एक वर्ष पूरा होने को है। इस एक वर्ष में बांग्लादेश में बहुत कुछ बदल चुका है। बांग्लादेश का यह एक वर्ष का सफ़र हिन्दुओं के उत्पीड़न से लेकर विपक्ष का मुंह बंद करने तक और पहचान बदलने का रहा है। इस दौरान लोकतंत्र के नाम पर हंगामा करके सत्ता में आए मोहम्मद यूनुस खुद तानाशाह बनने की कगार पर हैं। बिना चुनाव के सत्ता पर बैठे मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश की आर्थिक नैया भी डुबाई है।

बांग्लादेश में जून-जुलाई से छात्रों के नाम पर चालू हुए प्रदर्शन असल में एक रिजीम चेंज ऑपरेशन था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था कि कैसे शेख हसीना को सत्ता से हटाया जाए। छात्र आंदोलन के मुखौटे का सच तो तभी सामने आ गया था जब इस आंदोलन ने हिंसक रूप लिया था। 5 अगस्त, 2025 को आखिरकार दंगाइयों के चलते शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। वह भारत आ गईं थीं। उनके पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों ने सत्ता हथिया ली थी और इसका मुखौटा मोहम्मद यूनुस को बना दिया।

जबसे शेख हसीना सत्ता से बाहर हुई हैं, तब से बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों को हिन्दुओं को मारने का लाइसेंस मिला हुआ है। हिन्दू महिलाओं का घर में घुस कर रेप हो रहा है, उनके वीडियो बनाए जा रहे हैं और वायरल किए जा रहे हैं। मोहम्मद यूनुस की सरकार ही हिन्दू मंदिरों को गिरा दे रही है। हिन्दू साधु-संत गिरफ्तार हो रहे हैं और उनकी सुनवाई तक नहीं हो रही है। यह सब कुछ 1 वर्ष में ही मोहम्मद यूनुस ने अपने नाम कर लिया है।

1 साल में हिन्दुओं पर 2000+ हमले

शेख हसीना के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन में भी हिन्दू ही निशाना थे। इस्लामी कट्टरपंथी लगातार सत्ता विरोधी हिंसा के दौरान हिन्दू पुलिस और सुरक्षाकर्मी निशाना बनाए गए। ASI संतोष साहा को बीच सड़क मार कर लटका दिया गया। उनके शव के साथ तक बर्बरता हुई। शव को उदाहरण बनाया गया कि बाकी हिन्दू भी डरे रहें। जब बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता चली गई तो यह हमले और तेज हो गए।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्था बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने जुलाई में दी गई एक रिपोर्ट में बताया था कि 4 अगस्त, 2024 से 30 जून, 2025 के बीच अल्पसंख्यकों पर 2400 से अधिक हमले हुए। इनमें से लगभग 2000 हमले तो 4 अगस्त, 2024 से 20 अगस्त, 2024 के बीच हुए जबकि 100 से अधिक घटनाएँ बाकी 2024 में हुई। 2025 में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। 2025 में 300 से अधिक हमले अल्पसंख्यकों पर हुए हैं।

अधिकांश अल्पसंख्यक विरोधी हमलों का शिकार हिन्दू ही हैं क्योंकि वह बांग्लादेश में सबसे बड़ी माइनॉरिटी हैं। और यह सिर्फ आँकड़ों की बात नहीं है। बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी हिंसा का सबसे पहला शिकार महिलाएँ हो रही हैं। हाल ही में बांग्लादेश में BNP के नेता फजोर अली ने एक हिन्दू महिला का घर में घुस कर रेप किया था। उसका वीडियो भी वायरल किया था। इसके बाद केस वापस तक लेने का भी दबाव बनाया। इसी तरह एक और नाबालिग का रथ यात्रा से वापस आते समय रेप किया गया।

जिस समय यह लेख मैं लिख रहा हूँ, तभी एक हिन्दू दुकानदार की हत्या की बात बांग्लादेश में सामने आई है। मोहम्मद आबिर ने यह हत्या गला रेत कर की। इससे पहले बांग्लादेश में मंदिरों पर हमलों की असंख्य घटनाएँ सामने आई। इस्लामी कट्टरपंथियों को तो छोडिए, बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने खुद ढाका में रेलवे की जमीन पर बता कर एक पुराना हिन्दू मंदिर ढहा दिया। हिन्दुओं के लिए जिन्होंने आवाज उठाई, उनका भी इस एक वर्ष में बुरा हाल किया गया।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर जारी अत्याचार के चलते चटगाँव में बड़ा प्रदर्शन हुआ। इसका नेतृत्व संत चिन्मय दास ने किया। चिन्मय दास से चिढ़े इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगा दिया। उनको महीनों तक सुनवाई भी नहीं मिली। उनके वकील तक पर हमला हुआ। जब आखिर में उनको जमानत भी मिली तो फिर इस्लामी कट्टरपंथी भड़के और उन्होंने जमानत पर रोक लगवा दी। मैं जो बता रहा हूँ, वह चर्चित मामले हैं। ना जाने कितने हिन्दुओं की पीड़ा सामने तक नहीं आ पाई है।

हिन्दुओं पर हमले को लेकर बांग्लादेश की महम्मद यूनुस सरकार का रवैया भी महा बेशर्मों की तरह रहा है। वह पहले तो मानने से इनकार करती रही कि बांग्लादेश में हिन्दुओं को इस्लामी कट्टरपंथ का निशाना बनाया जा रहा है। इसके बाद उसने बेहरमी बेशर्मी से तर्क पेश किया कि असल में यह हमले हिन्दुओं पर इसलिए नहीं हो रहे क्योंकि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ पैर पसार चुका है, बल्कि इसलिए हो रहे हैं कि वह कथित तौर पर अवामी लीग के समर्थक थे। बांग्लादेश में सिर्फ हिन्दू ही एक पीड़ित नहीं हैं।

विपक्ष का भी यूनुस सरकार ने किया दमन

शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वालों का कहना था कि देश में लोकतंत्र की हालत खराब है। मोहम्मद यूनुस ने भी कई बार यही बात दोहराई। लेकिन विडंबना यह है कि मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद लोकतंत्र को ताखे में सजा कर रख दिया गया है। मोहम्मदद यूनुस की सरकार ने अपना सबसे पहला लक्ष्य अवामी लीग का खात्मा बनाया था। एक वर्ष के भीतर आवामी लीग के हजारों नेता गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

सत्ता बदलते ही यूनुस सरकार ने 1100 से अधिक मामले आवामी लीग के 300+ नेताओं पर ठोंके थे। शेख हसीना के अलावा जो भी आवामी लीग के नेता तख्तापलट के समय बांग्लादेश से नहीं निकल पाए थे, उन्हें गिरफ्तार किया गया। चाहे वह पूर्व मंत्री दीपू मोनी हों या फिर अनिसुल हक़। आवामी लीग के किसी नेता को नहीं छोड़ा गया। एक अभियान चला कर आवामी लीग को तोड़ने का प्रयास किया गया। इसको ऑपरेशन डेविल हंट का नाम दिया गया। इसक इसके अंतर्गत 1000+ लोग गिरफ्तार हुए, इनमें से अधिकांश आवामी लीग से थे।

मोहम्मद यूनुस ने आवामी लीग पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उसकी रैलियाँ नहीं आयोजित होने दी और यहाँ तक कि कार्यकर्ताओं की हत्याओं के सैकड़ों प्रयास हुए। जगह-जगह आवामी लीग के दफ्तरों में ताले लटकाए गए।

विरासत मिटाने का भी हो रहा प्रयास

बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार सिर्फ विपक्ष को दबाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह लोगों की स्मृतियों से तक उसे मिटा देना चाहती है। मोहम्मद यूनुस सरकार ने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान के पैतृक आवास को टूटने दिया। दंगाइयों ने उस धानमंडी घर की ईंट-ईंट तक तोड़ दी, जिससे बांग्लादेश को आजादी मिली। यह सब इसलिए होने दिया गया क्योंकि इसका कनेक्शन शेख हसीना से है। गुरु रबीन्द्र नाथ टैगोर के घर को तोड़ा गया। मोहम्मद यूनुस सरकार देखती रही।

सत्यजित रे का घर भी गिरते-गिरते बचा। इस पर भी मोहम्मद यूनुस सरकार ने बेशर्म रवैया दिखाया। कहानी यहीं तक नहीं रुकती बल्कि शेख मुजीब से जुड़ा हर एक चिन्ह मिटाने का प्रयास लगातार किया गया। चाहे उनकी जयंती पर होने वाले समारोह को रोका जाना हो या फिर नोटों पर से उनका फोटो हटाना। बांग्लादेश की सरकार इस विरासत मिटाने का हर प्रयास कर रही है। मोहम्मद यूनुस की सरकार के इन क़दमों के पीछे उसका इस्लामी कट्टरपंथ का एजेंडा है, जो मुजीब को नहीं देखना चाहता।

तानाशाह बनने की तरफ अग्रसर हैं मोहम्मद यूनुस

यह सब करने के बाद के बाद मोहम्मद यूनुस बिना चुने ही बांग्लादेश को हमेशा के लिए अपने शासन तले रखना चाहते हैं। मोहम्मद यूनुस को जब सत्ता सौंपी गई थी, तब ही उसका कोई संवैधानिक आधार नहीं था। उन्हें अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में लाया गया था। यह नहीं पता चल पाया कि यह अंतरिम सरकार है कौन। खैर, वह जब सत्ता आए थे तो यह उम्मीद जताई गई थी कि पहले की तरह बांग्लादेश में अब चुनाव होंगे।

मोहम्मद यूनुस को सत्ता पर काबिज हुए 1 वर्ष हो गया है। लेकिन चुनाव का नाम लेते ही वह बिदक जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश में इसी को लेकर एक संकट तक पैदा हो गया था। आखिर में मोहम्मद यूनुस ने 2026 के मध्य तक चुनावों की बात किसी तरह कही। उनके इन सब क़दमों से लगता है कि वह स्वयं ही बांग्लादेश के बिना चुने तानाशाह बनना चाहते हैं।

चोल साम्राज्य के महान राजा के नाम पर PM मोदी ने किया सिक्का जारी, धूमधाम से मनी जयंती: महादेव की आराधना के बाद बोले प्रधानमंत्री- चोल विरासत एकता-गौरव का प्रतीक

तमिलनाडु के अरियालुर जिले में बसे छोटे से गाँव गंगईकोंडा चोलपुरम में रविवार (27 जुलाई 2025) को एक भव्य समारोह का आयोजन हुआ। इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती और उनकी दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 साल पूरे होने का जश्न मनाया। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के निर्माण की शुरुआत की स्मृति में भी यह उत्सव आयोजित किया गया।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने मंदिर में पूजा-अर्चना की, एक स्मारक सिक्का जारी किया और चोल वास्तुकला व शैव धर्म पर आधारित एक प्रदर्शनी का अवलोकन किया। यह समारोह न केवल चोल साम्राज्य की गौरवशाली विरासत को याद करने का अवसर था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता था।

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पीएम मोदी ने की पूजा-अर्चना

प्रधानमंत्री का स्वागत पारंपरिक तमिल रीति-रिवाजों के साथ किया गया। मंदिर के पुजारियों ने ‘पूर्ण कुंभम’ के साथ उनका अभिनंदन किया। पीएम मोदी ने वेष्टि (धोती), सफेद कमीज और गले में अंगवस्त्र पहनकर मंदिर की परिक्रमा की और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की।

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा करते पीएम मोदी

गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, वो चोल वास्तुकला का एक अनुपम उदाहरण है। इस मंदिर की भव्यता और इसके नक्काशीदार गलियारे, मूर्तियाँ और प्राचीन शिलालेख आज भी दुनिया भर में प्रशंसा का विषय हैं।

समारोह में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन, वित्त मंत्री टी. थेनारासु, हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ निधि मंत्री पी.के. शेखर बाबू और परिवहन मंत्री एस.एस. शिवशंकर सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

प्रधानमंत्री ने मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा आयोजित चोल शैव धर्म और वास्तुकला पर आधारित प्रदर्शनी का भी दौरा किया। इस प्रदर्शनी में चोल साम्राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत को दर्शाया गया था। इसके बाद पीएम मोदी को चोल मंदिर की तस्वीर और स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।

राजेंद्र चोल-प्रथम की स्मृति में सिक्का जारी

समारोह का एक मुख्य आकर्षण था राजेंद्र चोल-प्रथम की स्मृति में एक स्मारक सिक्के का विमोचन। इस सिक्के के जरिए चोल साम्राज्य के इस महान सम्राट की उपलब्धियों को सम्मान दिया गया। राजेंद्र चोल-प्रथम (1014-1044 ई.) ने अपने शासनकाल में चोल साम्राज्य को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक विस्तारित किया था। उनकी समुद्री यात्रा और सैन्य विजयों ने भारत को वैश्विक मंच पर एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में स्थापित किया था। गंगईकोंडा चोलपुरम को उन्होंने अपनी शाही राजधानी बनाया और वहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी उनकी दूरदर्शिता और स्थापत्य कौशल का प्रतीक है।

आदि तिरुवथिरई महोत्सव में शामिल हुए पीएम मोदी

यह समारोह आदि तिरुवथिरई महोत्सव का हिस्सा था, जो 23 जुलाई से शुरू हुआ और 27 जुलाई को समाप्त हुआ। यह उत्सव तमिल शैव भक्ति परंपरा का प्रतीक है, जिसे चोल शासकों ने विशेष रूप से प्रोत्साहित किया था। इस परंपरा को 63 नयनमार संतों और उनकी भक्ति कविताओं ने और समृद्ध किया।

इस साल यह उत्सव और भी खास था क्योंकि यह राजेंद्र चोल की जन्म नक्षत्र तिरुवथिरई (अर्द्रा) के साथ मेल खाता था। समारोह में शिवाचार्य और ओथुव (शिव भजनों में पारंगत गायक) ने भक्ति भजनों के साथ पीएम मोदी का स्वागत किया, जिससे माहौल और भी आध्यात्मिक हो गया।

पीएम मोदी ने चोल विरासत को बताया भारत की एकता का सूत्र

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में चोल साम्राज्य को भारत के स्वर्णिम युगों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि राजेंद्र चोल और उनके पिता राजराजा चोल ने भारत की सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

चोल साम्राज्य ने न केवल भारत में, बल्कि श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापार और कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। पीएम ने इस बात पर जोर दिया कि चोल शासकों ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया था और उनकी सरकार भी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विजन के साथ उसी दिशा में काम कर रही है।

उन्होंने काशी-तमिल संगमम और सौराष्ट्र-तमिल संगमम जैसे आयोजनों का जिक्र किया, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का प्रयास हैं।

पीएम मोदी ने यह भी बताया कि नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान तमिल शैव परंपरा के संतों ने आध्यात्मिक नेतृत्व किया था और तमिल संस्कृति से जुड़े पवित्र सेंगोल को संसद में स्थापित किया गया। यह क्षण भारत की सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है।

चोल साम्राज्य की प्रेरणा से सैन्य और प्रशासनिक सुधार

प्रधानमंत्री ने चोल साम्राज्य की सैन्य और प्रशासनिक उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने बताया कि राजराजा चोल ने एक शक्तिशाली नौसेना की नींव रखी, जिसे राजेंद्र चोल ने और मजबूत किया। चोल साम्राज्य ने ‘कुडवोलाई अमैप्पु’ प्रणाली के जरिए लोकतांत्रिक चुनाव की शुरुआत की थी, जो उस समय की वैश्विक मान्यताओं से कहीं आगे थी।

पीएम मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि चोल शासकों ने जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को महत्व दिया था। राजेंद्र चोल ने गंगा जल को उत्तर भारत से दक्षिण भारत लाकर चोल गंगा झील (अब पोन्नेरी झील) में स्थापित किया था, जिसे आज भी उनकी दूरदर्शिता का प्रतीक माना जाता है।

पीएम मोदी ने आधुनिक भारत को चोल विरासत से जोड़ा

पीएम मोदी ने कहा कि चोल साम्राज्य की आर्थिक और रणनीतिक उपलब्धियाँ आज भी भारत को प्रेरित करती हैं। उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ अपनी सरकार के प्रयासों का जिक्र किया।

पीएम मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए मिशन मोड में काम किया है। विदेशों से चुराई गई 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ भारत वापस लाई गई हैं, जिनमें से 36 तमिलनाडु की हैं। इनमें नटराज, लिंगोद्भव, दक्षिणामूर्ति और अर्धनारीश्वर जैसी मूर्तियाँ शामिल हैं।

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि भारत की शैव दर्शनशास्त्र वैश्विक मंच पर भी मान्यता प्राप्त कर रहा है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भारत की सफल लैंडिंग के बाद उस स्थान को ‘शिव-शक्ति’ नाम दिया गया, जो भारत की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रतीक है।

पीएम ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देते हुए हाल ही में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने भारत की संप्रभुता के खिलाफ किसी भी खतरे का जवाब देने की ताकत को दिखाया है। यह ऑपरेशन दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत अपने दुश्मनों के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं छोड़ेगा।

तमिलनाडु में स्थापित होंगी राजाराजा चोल और राजेंद्र चोल की मूर्तियाँ

प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि तमिलनाडु में जल्द ही राजराजा चोल और राजेंद्र चोल की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी, जो भारत के ऐतिहासिक गौरव को दर्शाएँगी। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को डॉ. कलाम और चोल शासकों जैसे लाखों युवाओं की जरूरत है, जो शक्ति और समर्पण से देश के सपनों को साकार करें।

गंगईकोंडा चोलपुरम में आयोजित यह समारोह न केवल चोल साम्राज्य की गौरवशाली विरासत का उत्सव है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा तमिलनाडु के लोगों के लिए एक यादगार पल रहा, जिसमें उन्होंने चोल शासकों की उपलब्धियों को नमन किया और भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के अपने विजन को दोहराया। यह समारोह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के मंत्र को और मजबूत करने का एक शानदार अवसर साबित हुआ।

सेक्स चाहिए या शिक्षा… 16-18 साल के बच्चे खुद करें तय: फर्जी लिबरलपंती में न हों बर्बाद, जानें क्या हो सकते हैं दुष्परिणाम

भारत में ‘सहमति से सेक्स’ करने की उम्र 18 से कम करके 16 करने को लेकर चर्चा लंबे समय से चल रही थी। मामला इतना गंभीर था कि देश की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा सिंह ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक में उठाया और कोर्ट ने भी सुनवाई करते हुए इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब माँग लिया।

केंद्र हाल में इसी मामले पर अपना जवाब दिया और कहा है कि किसी कीमत पर सेक्स करने की आयु 18 से 16 नहीं हो सकती। सरकार ने इसके पीछे कई तर्क दिए। बताया कि कैसे इस कदम से अपराध होने पर बच्चों को दोषी बताया जा सकता है। कैसे बच्चों के खिलाफ अपराध करने वाले को को संरक्षण मिल सकता है आदि-आदि।

केंद्र सरकार ने यह जवाब देश में युवाओं की स्थिति को देखकर दिया है, लेकिन प्रश्न यह है कि उन्हें ये जवाब देने की जरूरत पड़ी ही क्यों और ये विचार कि सहमति से सेक्स की उम्र 18 से भी कम की जाए ये जहन में आया ही कैसे? क्या जिसने ये सवाल उठाया उनके लिए किशोरों के शिक्षित होने के अधिकार से ज्यादा जरूरी कम उम्र में सेक्स करने का अधिकार पाना लगता है?

हो सकता है बुद्धिजीवी वर्ग इसे भी मौलिक अधिकार बताकर जस्टिफाई कर लें और अंतर पूछ लें कि शिक्षा और सेक्स का आखिर क्या लेना-देना होता है? तो चलिए उनके इस प्रश्न का उत्तर देते हैं लेकिन उससे पहले ये समझते हैं कि जिन युवाओं को ये लोग शिक्षा लेने की उम्र में सेक्स का अधिकार दिलवा रहे हैं, उनके सामने चुनौतियाँ क्या हैं।

बात सिर्फ भारतीय परिदृश्य को मद्देनजर में रखकर आगे करेंगे।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था के अनुसार, एक लड़का-लड़की अगर रेगुलर स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करता है तो उसकी 10वीं पूरी होते-होते उसकी उम्र 15 हो जाती है। फिर 12वीं करते-करते वो 17 साल के होते हैं और इसके बाद आती है वो 18 की उम्र, जो सरकार ने लड़की को बालिग मानने के लिए तय कर रखी है।

अब जो लोग इस उम्र से नीचे वाले लड़के/लड़कियों के लिए चाहते हैं कि उन्हें कैसे भी करके कम उम्र में सहमति से सेक्स करने का अधिकार मिले, उन्हें ये बात तो बतानी पड़ेगी कि उनके लिए शिक्षा ऊपर है या सेक्स। ये तुलना सिर्फ इसलिए क्योंकि सेक्स और प्रोफेशनल लाइफ एक उम्र के बाद जरूरत समांतर चल सकती है मगर किशोरवस्था में इसके दुष्परिणाम होते हैं।

आमतौर पर एक किशोर के भीतर हार्मोनल बदलाव 12-13 साल की उम्र से आता है। लड़का और लड़की दोनों ही इस समय में अपने शरीर से जूझ रहे होते हैं। अपने भीतर होने वाले बदलावों को समझ रहे होते हैं। उनके सामने बॉलीवुड की वो फिल्में होती हैं जो उन्हें बताती हैं कि वो बचपन में पढ़ाई में मन न भी लगे तो ठीक, लेकिन प्रेम समय से हो जाना चाहिए।

इसके बाद कभी दोस्ती के नाम पर उनको ठगा जाता है तो कभी आकर्षण को प्रेम का नाम देकर धोखा होता है। कुछ लोग इस उम्र में गलत राह पर जाने से बच जाते हैं, मगर कुछ को इसके अलावा कुछ नहीं समझ नहीं आता।

अगर खासतौर पर लड़कियों को देखते हुए बात की जाए, तो ये मानना होगा कि हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ कुछ लोग अब भी मानते हैं ‘माहवारी’ आते ही लड़की जवान हो जाती है और जल्द से जल्द उसका विवाह/निकाह करवा देना चाहिए…. ये समाज अगर किसी से थोड़ा बहुत डरता है तो वो वही कानून है जो 18 की उम्र के बाद किशोरों को बालिग करार देता है और उसके बाद हुई शादी को ही वैध मानता है।

अगर बुद्धिजीवियों की लड़ाई आज ये ही रह गई है कि सहमति से सेक्स करने की उम्र 18 से 16 होनी चाहिए तो क्या मान लिया जाए कल को उन्हें इस बात से भी समस्या नहीं होगी कि छोटी उम्र में बच्चों की शादी क्यों हो रही है? क्योंकि जब सेक्स का अधिकार मिल सकता है तो शादी कर लेने का क्यों नहीं।

लड़कियों की शादी की उम्र आज के समय में सरकार 18 से बढ़ाकर 21 करना चाहती है ताकि लड़कियाँ सामाजिक, मानसिक और शारीरिक तीनों तरह से परिपक्व हो सकें। उनके पास अकादमिक क्षेत्र में हासिल की गई तमाम डिग्रियों के साथ उन अनुभवों का भी अंबार हो, जो उन्हें इतना समझदार बना सके कि वो अपने लिए फैसले लेने में समर्थ दिखें। उन्हें पता रहे कि उनके लिए क्या सही है और क्या गलत है। वो किसके साथ सहज हैं और किसके साथ नहीं। उन्हें क्या पसंद करना है और क्या नहीं। उन्हें क्या ग्रहण करना है क्या नहीं।

कायदे से ये सारे साल लड़के या लड़की के निजी विकास के होने चाहिए, जिसमें वो खुद को समझें। अगर ये समझने के बाद उसे लगता है कि उसके लिए सेक्स ही है तो वो उसे चुने। लेकिन ये निर्णय उनका तब खुद का हो, जब उन्हें ये पता हो कि शिक्षा लेकर समृद्ध हुआ जा सकता है या सेक्स के नाम पर डिस्ट्रैक्ट होकर… इस मामले में उन्हें ऐसे वर्ग से इन्फ्लुएंस नहीं होना चाहिए जो माने कम उम्र में सेक्स कर पाना ही आजादी की शुरुआत है।

हम चाहे मानें न मानें लेकिन कम उम्र में यौन इच्छाओं का भीतर प्रबल होना ‘डिस्ट्रैक्शन’ के अलावा कुछ नहीं है। अगर ये बात मनगढ़ंत लगती हैं तो लोगों को इंटरनेट पर पड़े युवाओं के उन सवालों को पढ़ना चाहिए जहाँ वो साफ तौर पर सेक्स और स्टडी के बीच उलझे दिखते हैं।

पूरा इंटरनेट आज ऐसे सवालों से भरा पड़ा है जहाँ छोटे बच्चे किसी आभासी मेंटर से सवाल करते हैं कि उनके भीतर यौन इच्छाएँ इतनी प्रबल हो रही हैं कि वो पढ़ाई नहीं कर पाते, अपने लक्ष्य से भटकते हैं… उन्हें क्या करना चाहिए।

कोरा जैसी सवाल-जवाब वाली साइट पर यदि आप जाएँगे तो ऐसे सवालों की वहाँ भरमार देखने को मिलेगी। युवा वहाँ अपनी स्थिति खुलकर बताते है। साफ-साफ सवाल पूछा जाता है कि वो ऐसी स्थिति में क्या करे…।

तमाम ऐसी साइट्स हैं, ऐसी स्टडीज हैं जिसका आधार सिर्फ यही है कि ऐसी स्थिति में फोकस को कैसे सही जगह पर लगाए। अगर आज के युवा के लिए ये चुनौती नहीं होती तो इंटरनेट पर ऐसे सवाल नहीं होते।

हमारे समाज में युवा वर्ग के जीवन में चैलेंज पहले से ज्यादा व्यापक हो चुके हैं। उन्हें अब सिर्फ रूढ़िवादी सोच और समाज की पिछड़ी मानसिकता से नहीं लड़ना, उन्हें अब खुद की अस्मिता बचाने के लिए अश्लीलता करने को उकसाने वाले तत्वों से भी लड़ना है और साथ ही लड़ना है उस बुद्धिजीवी वर्ग से भी जो शिक्षा के ऊपर सेक्स को बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

अंत में, जिस उम्र में बच्चों को सेक्स का अधिकार देने की बात हो रही है, उस उम्र को लेकर बुद्धिजीवियों को थोड़ा शोध भी करना चाहिए और समझना चाहिए कि इस उम्र में होने वाली गलतियों को सुधारने के लिए क्या बच्चे तैयार हैं? क्या उन्हें पता है कि यौन शोषण और प्रेम के स्पर्श में अंतर क्या है? क्या उन्हें पता है कि 18 से कम उम्र में सेक्स की आजादी मिलने का फायदा कभी कोई अपराधी नहीं उठाएगा? क्या एक 16 की लड़की जानती है कि गर्भवती होने पर उसे क्या करना है? क्या 18 साल के लड़के को पता है कि ऐसी स्थिति से डील करना है…. या सिर्फ यौन इच्छाओं की पूर्ति ही बच्चों के लिए क्रांति माना जाएगा।

सहमति से सेक्स का अधिकार मिल भी जाए तो होगा क्या?

बता दें कि एक ऐसे समाज में, जहाँ लोग यौन संबंधों पर खुलकर बात भी न करते हों, इसे पर्दे के पीछे रखने का विषय माना जाता हो… उसमें कम उम्र में सहमति से सेक्स की आजादी देना लड़के-लड़की दोनों पर बुरा प्रभाव डालेगा। वो भावनात्मक तौर पर कभी परिपक्व नहीं हो पाएँगे। एक समय आए शायद उन्हें ग्लानि में जीवन गुजारना पड़े, उन्हें डिप्रेशन से गुजरना पड़े या आत्महत्या तक के ख्याल आएँ।

इसके अलावा अनचाही प्रेगनेंसी, यौन संबंधी रोग, शारीरिक विचार में रोक वो स्वास्थ्य पहलू हैं जिन्हें ये अधिकार माँगने से पहले नकारा जा रहा है। साथ ही वो माहौल को भी नजरअंदाज कर रहे हैं जो ऐसा करने पर एक आम भारतीय के घर में देखा जा सकता है। हो सकता है कि बुद्धिजीवी वर्ग किशोरों को कानूनी रूप से आजादी दिलवा भी दें, लेकिन क्या उनके परिवार इसे स्वीकार कर पाएँगे। नतीजा यहाँ तक हो सकता है कि बच्चों को अपनी शिक्षा तक से समझौता करना पड़े। इसके बाद वो स्थिति भी न भूली जाए जिसमें ये समझना मुश्किल हो जाएगा कि बच्चे ने सच में सहमति से संबंध बनाया या फिर वो किसी यौन अपराध का शिकार हुआ है।

शुभांशु शुक्ला से लेकर मराठा किलों तक, पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में बताई देश की उपलब्धियाँ: कहा- देश त्योहारों की रौनक से सजने जा रहा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर 124वीं बार ‘मन की बात’ के जरिए देशवासियों से दिल से दिल की बात की। इस बार उन्होंने खेल, विज्ञान, संस्कृति और देश के गौरवशाली इतिहास की बात की। सरल और आम बोलचाल की भाषा में उन्होंने देश की उपलब्धियों को गर्व के साथ सामने रखा और भविष्य के लिए प्रेरणा दी।

अंतरिक्ष में भारत की उड़ान, बच्चों में नई जिज्ञासा पर की बात

पीएम मोदी ने अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला की धरती पर सुरक्षित वापसी की तारीफ की। उन्होंने कहा कि जैसे ही शुभांशु धरती पर उतरे, देशवासियों के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई। चंद्रयान-3 की सफलता को याद करते हुए पीएम ने बताया कि इसने बच्चों में अंतरिक्ष और विज्ञान के प्रति नई जिज्ञासा जगाई है। बच्चे अब अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनने के सपने देख रहे हैं।

इंस्पायर-मनक अभियान और स्पेस स्टार्टअप्स का जिक्र

पीएम मोदी ने ‘इंस्पायर-मनक’ अभियान का जिक्र किया, जिसमें स्कूलों के बच्चे नए-नए आइडिया लाते हैं। चंद्रयान-3 के बाद इस अभियान से जुड़ने वाले बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई है। देश में स्पेस स्टार्टअप्स भी तेजी से बढ़ रहे हैं। पाँच साल पहले जहां 50 से कम स्टार्टअप थे, आज 200 से ज्यादा हैं। पीएम ने 23 अगस्त को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ मनाने की बात कही और लोगों से इस मौके पर अपने आइडिया नमो ऐप पर भेजने की अपील की।

विज्ञान और गणित ओलंपियाड में भारत का जलवा

पीएम मोदी ने बताया कि हाल ही में इंटरनेशनल केमिस्ट्री ओलंपियाड में भारत के चार छात्रों देवेश पंकज, संदीप कुची, देबदत्त प्रियदर्शी और उज्ज्वल केसरी ने मेडल जीते। गणित में भी भारत ने ऑस्ट्रेलिया में हुए इंटरनेशनल मैथमेटिकल ओलंपियाड में 3 गोल्ड, 2 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज मेडल हासिल किए। अगले महीने मुंबई में होने वाले एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स ओलंपियाड में 60 से ज्यादा देशों के छात्र हिस्सा लेंगे।

मराठा किलों को यूनेस्को की मान्यता मिलने पर जताई खुशी

पीएम मोदी ने खुशी जताई कि यूनेस्को ने 12 मराठा किलों को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की सूची में शामिल किया है। इनमें महाराष्ट्र के 11 और तमिलनाडु का एक किला शामिल है। सल्हेर, शिवनेरी, खानदेरी, प्रतापगढ़ और विजयदुर्ग जैसे किलों की कहानियाँ सुनाते हुए पीएम ने कहा कि ये किले सिर्फ पत्थरों के ढाँचे नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और इतिहास के प्रतीक हैं। उन्होंने देशवासियों से इन किलों को देखने और इतिहास को समझने की अपील की।

आजादी के दीवानों को किया याद

अगस्त को क्रांति का महीना बताते हुए पीएम ने खुदीराम बोस की वीरता को याद किया, जिन्होंने 18 साल की उम्र में देश के लिए फाँसी स्वीकार की। उन्होंने 1 अगस्त को लोकमान्य तिलक की पुण्यतिथि, 8 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन और 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का जिक्र किया। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने की बात कही।

स्वदेशी और हथकरघा को बताया देश की ताकत

7 अगस्त को ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ की बात करते हुए पीएम ने स्वदेशी आंदोलन को याद किया। उन्होंने बताया कि हथकरघा और टेक्सटाइल सेक्टर देश की ताकत बन रहा है। महाराष्ट्र की कविता धवले, ओडिशा की आदिवासी महिलाएँ और बिहार के नवीन कुमार जैसे लोगों की कहानियाँ सुनाईं, जो हथकरघा को नई ऊँचाइयों पर ले जा रहे हैं। पीएम ने ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा दोहराया और भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की।

तमिलनाडु, ओडिशा, असम, झारखंड का किया जिक्र

ओडिशा के क्योंझर में राधाकृष्ण संकीर्तन मंडली की कहानी सुनाते हुए पीएम ने बताया कि यह टोली भक्ति गीतों के जरिए जंगल की आग से बचाव का संदेश दे रही है। तमिलनाडु के मणि मारन की तारीफ की, जो तमिल पांडुलिपियों को सहेज रहे हैं। पीएम ने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ की भी बात की, जिसके तहत प्राचीन पांडुलिपियों को डिजिटाइज किया जाएगा।

असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में हुए ग्रासलैंड बर्ड सेंसस का जिक्र करते हुए पीएम ने बताया कि वहाँ 40 से ज्यादा पक्षी प्रजातियों की पहचान हुई। तकनीक और एआई के इस्तेमाल से बिना पक्षियों को परेशान किए यह काम हुआ। पीएम ने ऐसी पहलों को बढ़ावा देने की बात कही।

झारखंड के गुमला में ओमप्रकाश साहू की कहानी सुनाई, जिन्होंने माओवादी हिंसा छोड़कर मछली पालन शुरू किया। ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ की मदद से आज 150 से ज्यादा परिवार इस काम से जुड़े हैं। पीएम ने इसे बदलाव की मिसाल बताया।

पीएम मोदी ने वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स में भारत के 600 मेडल जीतने की तारीफ की। पीएम ने बताया कि 2029 में यह आयोजन भारत में होगा। ‘खेलो भारत नीति 2025’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसका लक्ष्य भारत को खेलों में महाशक्ति बनाना है।

पीएम मोदी ने ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को जन-आंदोलन बताया, जो 11 साल बाद भी उतना ही जरूरी है। भोपाल की ‘सकारात्मक सोच’ टीम, लखनऊ की गोमती नदी टीम और गोवा के पणजी जैसे उदाहरणों से साफ हुआ कि स्वच्छता अब देश की आदत बन रही है।

पीएम मोदी ने दी त्योहारों की शुभकामनाएँ

अंत में पीएम मोदी ने हरियाली तीज, नाग पंचमी, रक्षाबंधन और जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने देशवासियों से अपने विचार नमो ऐप और मायगव पर साझा करने की अपील की। पीएम ने कहा कि अगले महीने फिर मिलेंगे, नई उपलब्धियों और प्रेरणाओं के साथ। उन्होंने सभी से अपना ध्यान रखने और देश के लिए योगदान देने की बात कही।

नहीं, दक्षिणपंथी यूँ ही नहीं कर रहे Special Ops-2 पर बवाल, सीरीज में भरपूर है प्रोपगेंडा का माल: सुधीर-चड्ढा-सुब्रमण्यम ‘दगाबाज’, फारूक-सुलेमान-रुहानी ‘पक्के देशभक्त’

देशभक्ति दिखाने के लिए कोई मजहब जरूरी नहीं होता, लेकिन अगर फिल्म में प्रोपगेंडा दिखाना हो तो उसमें मजहब का छौंक एक महत्वपूर्ण इंग्रीडिएंट है। आपने 1980 में आई ‘शान’ फिल्म में एक गाना सुना होगा- ‘नाम अब्दुल है मेरा सबकी खबर रखता हूँ’ अब समय बदला है, दुनिया ‘शान’ से ‘स्पेशल ऑप्स के सीजन 2’ तक पहुँच गई है, तो कैरेक्टर के हिसाब से गाना भी अलग होना चाहिए। 

जैसे-

  • नाम फारूक है मेरा- देश की रक्षा करता हूँ।
  • नाम सुलेमान है मेरा- मैं वतन से प्यार करता हूँ।
  • नाम रुहानी है मेरा- देश की सुरक्षा में हरदम सूटकेस तैयार रखती हूँ।
  • नाम अब्बास है मेरा- वाइन छोड़कर देश के लिए काम करता हूँ।
  • नाम साहिल है मेरा-बेबस बनकर बीवी पर नजर रखता हूँ।

इन नए गानों की लाइन सुन अगर आपके मन में कोई सवाल आए तो आपको जाकर स्पेशल ऑप्स का सीजन-2 देखना चाहिए। ‘साइबर अटैक’ को फोकस में रखकर बनाई गई एक सीरीज- जिसमें लाचार, बेचारा, हारा, बहादुर और सबसे ईमानदार अगर कोई दिखाया गया है तो वो यही कुछ कैरेक्टर हैं।

सीरीज में जितना इन कैरेक्टर्स को ‘देशभक्त’ दिखाया गया है उतना तो मेकर्स ‘विलेन’ को भी विलेन दिखाना भूल गए। कहने को सीरीज ‘साइबर वारफेयर’ और ‘न्यूक्लियर धमाके’ का प्लॉट देकर निर्मित की गई है, मगर तकनीकी समस्याएँ इतनी हैं कि कोई भी समझ जाए असली फोकस कहाँ और क्या प्लॉट सेट करने में था।

सीरीज में साइबर वायरफेयर का खतरा दिखाने का प्रयास हुआ है वो भी फिक्शनल लाइन और आभासी तथ्य पर। शुरू में दिखाया जाता है कि भारत 2014 में एक साइबर अटैक हुआ था लेकिन उस समय भारत ने उसे जैसे-तैसे करके रोक लिया और जब जाँच हुई तो पता चला कि इसके पीछे चीन का हाथ था। आगे कहानी बढ़ती है और पता चलता है कि चीन तो छोटा दुश्मन है, असली लड़ाई तो भारत की एक भारतीय जिसका नाम ‘सुधीर अवस्थी’ है उससे है।

सुधीर अवस्थी अपने आपको ‘ग्लोबल सिटिजन’ बताता है और देश की अर्थवस्वस्था को हिलाने के लिए चीन से सौदा करके बैठा है। उसने देश के महान वैज्ञानिक डॉक्टर पीयूष भार्गव को भी किडनैप कर लिया है और अब देश की आन अगर कोई बचा सकता है तो वो सिर्फ एक अंडर कवर एजेंट फारूक ही है। फारूक- हिम्मत सिंह का सबसे काबिल असेट है और नेपाल में किसी ने उसे पकड़ लिया है।

सीरीज में हिंदू गद्दार

अब फारूक को छुड़ाने के लिए ‘हिम्मत सिंह’ पाकिस्तानी की मदद लेते हैं। (इस सीरीज में इस पाकिस्तानी से एक नहीं बल्कि दो बार मदद लेते हुए दिखाया गया है। एक बार फारूक को छुड़ाने के लिए और दूसरी बार एक लोकेशन की जानकारी लेने के लिए।)

खैर… हिम्मत सिंह के पाकिस्तानी नेटवर्क की मदद से नेपाल में फँसे फारूक को छुड़ाते हैं और इसके बाद फारूक काम पर लगता है।

यहाँ गौर करने वाली बात है- फारूक को बचाना किसे है- डॉक्टर पीयूष को। फारूक को सामना किसका करता है- सुधीर अवस्थी का। फारूक ईमानदार किसके लिए- हिम्मत सिंह के लिए और फारूक लड़ किसके लिए रहा है- भारत के लिए।

अजीब बात ये नहीं है कि भारत को बचाने के लिए ‘फारूक’ ही सबसे बेहतर विकल्प हिम्मत सिंह को दिखता है। अजीब ये है कि उससे बेहतर किसी को सीरीज में दिखने नहीं दिया जाता। सीरीज में एक कैरेक्टर अभय सिंह का है, जो उन ‘विनोद शेखावत’ के बेस्ट हैंड थे जिन्होंने साइबर फ्रॉड रोकने का काम संभाला था। बाद में उन्हें गोली मार दी गई तो अभय सिंह ने दोषियों से बदला लेने की कोशिश की। सीरीज में वहाँ भी यही दिखाया गया कि अभय सिंह की बेवकूफी के कारण फारूक डॉ पीयूष को नहीं बचा पाया। अगर अभय सिंह गलती नहीं करते तो फारूक बस डॉक्टर पीयूष को बचा ही लेता। यहाँ निर्माता चाहते तो अभय के ‘इमोशन्स’ का इस्तेमाल करके उन्हें आगे रखा जा सकता था। मगर नहीं, हाईलाइट तो किसी और को ही करना था।

अब बात अगले कैरेक्टर की। आपने सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप को देखा गया जिसमें सुलेमान को वतन से मोहब्बत पर पैसे भेजने को कहा जाता है और फिर एक गाली होती है। असल में इस एक क्लिप को देख आप जैसा सोच रहे हैं वैसा नहीं है। सीरीज में ‘सुलेमान’ को लेकर असल में ये दिखाया गया है कि वो भले ही धंधा गलत कर रहा है लेकिन देखा जाए तो उसकी वतनपरस्ती उस पीएमओ के अधिकारी नरेश चड्ढा से कहीं ज्यादा है जो सुधीर अवस्थी के हाथों बिक गया है।

आगे बचा रुहानी का कैरेक्टर। रुहानी वही खास एजेंट है जिसे फारूक के साथ जिम्मेदारी दी गई है कि वो देश के महान वैज्ञानिक को बचाए। इस काम के लिए उसे अचानक एक कॉल आती है और दिखाया जाता है कि वो अपने बिस्तर से उठकर अपना सूटकेस उठाकर चल देती है देश की रक्षा में। 

ये सब उसके लिए सहज है नहीं है- इस पर कहीं कोई बात नहीं होती। उलटा इस सीरीज में एक कैरेक्टर को इतना नर्म और मासूम दिखाया गया है कि आपको देखकर लगे कि कोई ‘साहिल’ आपके जीवन में भी हो तो आपके लिए भी चीजें आसान हो जाएँगी।

साहिल है रुहानी का शौहर। सीरीज के सीन में दिखाया जाता है कि रुहानी को जब देश के लिए ऑपरेशन में शामिल होने के लिए कॉल आती है तो रुहानी रातोंरात उठकर निकल जाती है और शौहर से सिर्फ इतना ही कहती है कि वो क्लाइंट से मिलने जा रही है।

सवाल ये है कि आज के समय में जब चीजें इतनी स्पष्ट हैं तो उन्हें इतना हवा-हवाई रखने का क्या अर्थ हो सकता है। क्या किसी सामान्य घर की महिला के लिए खासकर मुस्लिम परिवार की महिला के लिए रातोंरात क्लाइंट से मिलने के लिए निकलना इतना आसान है?

मुस्लिम दंपति को आदर्श दंपति दिखाने में मेकर्स को इतनी तसल्ली नहीं मिली कि उन्होंने आगे सीन में ये भी दिखाया कि साहिल जो है रुहानी का पीछा करते हुए आता है और उसे दूसरे मर्द के साथ देखकर भी मासूमियत से सवाल करता है।

सात समंदर पार से तीन तलाक देने वाली खबरों से जहाँ मीडिया भरा पड़ा है, वहाँ सीरीज में दिखाया जा रहा है कि एक शौहर अपनी बीवी की चिंता में सात हैदराबाद छोड़कर जॉर्जिया आ गया और हकीकत जानने के बाद चुपचाप केवल बर्गर खाता है और एक शब्द नहीं कहता। किसको इस दृश्य में साहिल में सबसे मासूम जीवनसाथी नहीं दिखेगा?

न्यूक्लियर प्लांट पर फर्जीवाड़ा

सीरीज में मुस्लिम कैरेक्टर्स को ऐसे परोसा गया है कि फिल्ममेकर्स भूल गए हैं कि जो फिल्म को साइबर वॉर पर बना रहे हैं उसमें कोई तकनीकी चीजों का ध्यान भी उन्हें रखना था। मेकर्स की सबसे बड़ी गलती ये है कि उन्होंने एक फिक्शनल कहानी को बूम करने के लिए अपनी क्रिएटिव बुद्धि लगाई, मगर वैज्ञानिक सिद्धांतों की पुष्टि करने में कोताही कर दी। अगर न्यूक्लियर प्लांट जैसा एंगल डालनेसे पहले वो थोड़ा सा वैज्ञानिक पक्ष समझते तो उन्हें पता चला कि उन्होंने फिल्म के जरिए कितना गलत विज्ञान परोसने की कोशिश की है।

दरअसल, फिल्म में ये दिखाया जाता है कि अगर डॉक्टर पीयूष ने भारतीयों का डेटा सुधीर को नहीं दिया तो फिर वो न्यूक्लियर की कूलिंग डाउन कर सकता है जिससे विस्फोट होगा और भारत में नरसंहार होगा। ऐसा दिखाया जाता है कि इस नरसंहार से तो बेहतर है भारतीय कंगाल ही हो जाएँ।

सुधीर अवस्थी यही तर्क देकर डॉक्टर पीयूष भार्गव से भारतीयों के बैंक डेटा को माँगता है और डॉक्टर भी नरसंहार की कल्पना करके ये मानने को तैयार हो जाते हैं। अब क्या इतनी रिसर्च करके बनाई गई सीरीज में वैज्ञानिक गलती बताने वाला कोई नहीं था कि कूलिंग डाउन होने से क्या होता है।

ऑपइंडिया अंग्रेजी के अनुराग इस तकनीकी समस्या पर अपने लेख में बात करते हैं। वह बताते हैं कि आखिर कैसे ये पूरा सीन ही एक फॉल्टी सीन है और दर्शकों को भ्रमित करने का प्रयास है।

समझिए अनुराग के लेख से कि जो सीरीज में दिखाया गया उससे ज्यादा से ज्यादा क्या होने की संभावना थी।

जब किसी न्यूक्लियर पावर प्लांट की कूलिंग सिस्टम फेल हो जाती है, तब बम जैसी विस्फोटक स्थिति नहीं, बल्कि मेल्टडाउन का खतरा होता है। रिएक्टर बंद होने के बाद भी फ्यूल रॉड्स 5–6% डिके हीट पैदा करते हैं। बिना ठंडक के यह गर्म होकर हाइड्रोजन और खतरनाक कोरियम बनाते हैं।

Source: Dall-E

चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी घटनाओं में भी परमाणु विस्फोट नहीं हुआ। आज के आधुनिक रिएक्टर्स में पासिव कूलिंग, ऑटोमैटिक शटडाउन और कंटेनमेंट सिस्टम होते हैं, जो बिजली या मानव त्रुटि के बावजूद काम करते हैं। इसलिए, आधुनिक रिएक्टर “चेर्नोबिल-प्रूफ” माने जाते हैं।

आगे बढ़ने से पहले बता दें कि “चेर्नोबिल-प्रूफ” एक अनौपचारिक शब्द है जिसका उपयोग यह बताने के लिए किया जाता है कि आधुनिक परमाणु रिएक्टर इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि वे चेर्नोबिल जैसी दुर्घटना के दोबारा  होने की संभावना को लगभग खत्म कर देते हैं।

Source: MIT

इसकी खासियत होती है:

बेहतर डिज़ाइन: आधुनिक रिएक्टरों में ऐसे डिज़ाइन फीचर्स होते हैं जो फेल-सेफ होते हैं- यानी अगर कोई सिस्टम काम करना बंद कर दे) हो जाए तो भी रिएक्टर सुरक्षित रहता है।
निगेटिव टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट: जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, रिएक्शन धीमी हो जाती है, जिससे फिसन रिएक्शन खुद रुकने लगती है।
कंटेनमेंट डोम: चेर्नोबिल घटना के वक्त RBMK रिएक्टर में यह नहीं था, लेकिन आधुनिक रिएक्टरों में मोटा कंक्रीट का डोम होता है जो रेडियोएक्टिव मटेरियल को बाहर नहीं निकलने देता।
पासिव कूलिंग सिस्टम: बिजली कटने या ऑपरेटर की गलती के बावजूद ये सिस्टम अपने आप काम करते हैं और रिएक्टर को ठंडा रखते हैं।
ऑटोमैटिक शटडाउन: इमरजेंसी में कंट्रोल रॉड्स अपने आप गिर जाती हैं और रिएक्शन को रोक देती हैं।

Source: MIT

अब इस गलती के बारे में जानकर तो लगता है कि सीरीज का पूरा प्लॉट जिस आधार पर सेट किया गया है यानी वो ही फुस्स है। न्यूक्लियर प्लांट में जब ब्लास्ट होने ही वाला नहीं था तब आखिर डॉक्टर पीयूष भार्गव को डरा-सहमा दिखाने का क्या अर्थ। क्या ये भारत के वैज्ञानिकों की बौद्धिक क्षमता पर संदेह उठाने जैसा नहीं है कि कोई भी अपनी बातों में फँसाकर भारतीय वैज्ञानिकों से भारतीयों के डेटा को ले सकता है?

दिलचस्प बात ये है कि इस पूरी सीरीज में एक कहानी साथ-साथ और चल रही है। एक पूर्व अधिकारी सुब्रमणयम की, जिनकी बीवी बीमार थी और वो चाहकर भी बैंक से पैसे नहीं निकाल पा रहे थे क्योंकि कोई दिनेश ढोलकिया नाम का बिजनेसमैन बैंक से धोखा करके बाहर भाग गया था। सीरीज में दिखाया जाता है कि गुजरात का एक बिजनेसमैन इतना बड़ा धोखेबाज है कि वो भारतीयों के पैसे लेकर भाग गया है और सुब्रमण्यम, जिनकी पत्नी का देहांत हो चुका है, वो किसी भी कीमत पर चाहते हैं कि ढोलकिया को पकड़कर लाया जाए। इसके लिए वो हिम्मत सिंह को बोलते हैं और धमकी देते है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो संसद का साउथ ब्लॉक उड़ा देंगे।

इस कहानी… एक अधिकारी पर कितना प्रेशर होता है, उसे कितने केस एक साथ देखने पड़ते हैं, उसे अपने ही धमकी देते हैं, वो किस जद्दोजहद में होता है…. किस कारण से जोड़ी गई है, ये भी शायद मेकर्स ही समझा पाएँगे… क्योंकि एक बिंदु को छोड़कर वो पूरी सीरिज में हर प्वाइंट समझाने में विफल रहे हैं। सीरीज के मुख्य किरदार ‘हिम्मत सिंह’ को अगर दो मिनट भी किनारे कर दिया जाए तो आपको समझ आएगा कि सीरीज आपके दिमाग में ये डाल रही है कि देश से गद्दारी ‘सुधीर अवस्थी, चड्ढा ‘ करते हैं और देश को बचाने का काम ‘फारूक-रुहानी’ करते हैं।

क्यों न हों दक्षिणपंथी नाराज?

कुछ लोगों का मानना है कि इस फिल्म को इन कैरेक्टर्स के कारण दक्षिणपंथियों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है जो कि बेवजह है, लेकिन वो ये नहीं मान रहे कि फिल्म में चालाकी से दिखाए जाने वाले नैरेटिव के दिन चले गए हैं। अब दर्शक समझदार हैं। उन्हें मालूम चलता है कि फिल्मों में पंडित ‘ढोंगी’ और मौलवी ‘साहब’ क्यों दिखाए जाते हैं। कैरेक्टर बैलेंस करने की बात थी तो फिक्शनल कहानियों में तो कुछ भी जोड़ा जा सकता था, फिर इसमें क्यों नहीं।

हमें भी पता है कि देशभक्त होने के लिए किसी का धर्म और मजहब नहीं देखा जाता और न कभी धर्म-मजहब देखकर देशभक्ति को आँकना चाहिए। इसीलिए ये देश कभी भारतीय सेना के जवान औरंगजेब के बलिदान को नहीं भूलता, उनके भाइयों के भारतीय सेना में शामिल होने के जज्बे को सलाम भी करता है और ज्योति मल्होत्रा जैसे जासूसों का समय आने पर खुलकर विरोध भी करता है। लेकिन, पर्दे पर एक नैरेटिव गढ़ने लिए मेकर्स विलेन वाली पंक्ति में किसे खड़ा कर रहे हैं, किसे हीरो बना रहे हैं, दर्शकों के मन पर क्या छाप छोड़ रहे है… ये सब उनकी मंशा पर जरूर सवाल उठाता है। साथ ही आज के उनकी कैरेक्टर बैंलेंसिंग करने की रिवायत से संदेह भी होता है।

ममता राज के 14 साल में 6600+ कंपनियों ने बंगाल को कहा ‘बाय’, UP-दिल्ली जैसे राज्यों में बनाया ठिकाना: जानिए कैसे उद्योग-धंधों का कब्रिस्तान बन रहा ‘शोनार बांग्ला’

केंद्र सरकार ने हाल ही में बताया है कि बीते डेढ़ दशक में पश्चिम बंगाल से 6 हजार से अधिक कंपनियों ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा है। इनमें से 2 हजार से अधिक कंपनियाँ बीते 5 वर्षों में राज्य छोड़ कर गई हैं। यह भी सामने आया है कि इस दौरान यह कंपनियाँ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को गई हैं। 

पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का यह पलायन तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के राज में हुआ है। पश्चिम बंगाल में जहाँ एक ओर कंपनियाँ राज्य छोड़ कर जा रही हैं, वहीं नए निवेश भी नाममात्र को हो रहे हैं। देश के चौथे सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के लिए यह स्थिति गंभीर और चिंताजनक है।

यह आँकड़े भले ही चौंकाने वाले हों, लेकिन उद्योग-धंधों का पलायन और पश्चिम बंगाल का पुराना रिश्ता है। देश के बड़े कारोबारी घरानों के अपना मुख्यालय शिफ्ट करने से बड़े ब्रांड्स के फैक्ट्री बंद करने तक यही हाल बीते कई सालों से है। इसमें एक कारण ममता बनर्जी सरकार का उद्योग विरोधी रुख और राज्य की खस्ताहाल कानून-व्यवस्था है।

कभी एशिया की बड़ी औद्योगिक ताकतों में से एक गिने जाने वाले कोलकाता के अवसान की यह पटकथा ममता बनर्जी के राज से पहले वामपंथियों ने लिख दी थी। लेकिन ममता बनर्जी ने इस पटकथा को अंतिम रूप दिया है और उद्योग-धंधों में इजाफा करने के बजाय उनके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की कसर पूरी कर दी है।

कितनी कंपनियों ने बंगाल को कहा बाय-बाय

राज्यसभा में मानसून सत्र के दौरान भाजपा के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल पर एक प्रश्न पूछा। उनके उत्तर में केन्द्र सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने बताया है कि वर्ष 2011-12 से वर्ष 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल से 6688 कंपनियाँ राज्य छोड़ कर गई हैं।

मंत्रलाय के उत्तर के अनुसार, इनमें से एक तिहाई यानी 2200 से अधिक कंपनियाँ वर्ष 2019 के बाद से राज्य छोड़ कर गई हैं। यह ट्रेंड 2011 में TMC के सत्ता में आने के बाद से लगातार जारी है। मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली 6688 कंपनियों में से 110 कंपनियाँ ऐसी थीं जो शेयर बाजार में भी सूचीबद्ध थीं।

मंत्रालय का डाटा बताता है कि 2017-18 के दौरान सबसे अधिक 1027 कंपनियों ने पश्चिम बंगाल छोड़ा है। 2015-16 और और 2016-17 के दौरान क्रमशः 869 और 918 कंपनियों ने पश्चिम बंगाल से कारोबार समेटा है।

कहाँ गईं यह कंपनियाँ

कॉर्पोरेट मंत्रालय के उत्तर के अनुसार, पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली कंपनियाँ दूसरे राज्यों में जा रही हैं। इनका पलायन ऐसे राज्यों में हो रहा है, जहाँ उद्योग को लेकर नीतियाँ सरल हैं और उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है। 2011-25 के बीच पश्चिम बंगाल छोड़ कर सर्वाधिक कंपनियाँ महाराष्ट्र गईं हैं।

इसके अलावा दिल्ली और उत्तर प्रदेश उनकी पसंदीदा लोकेशन में शामिल हुए हैं। कॉर्पोरेट मंत्रालय का उत्तर बताता है कि पश्चिम बंगाल छोड़ने वाली 1300 से अधिक कंपनियाँ 2011-25 के बीच महाराष्ट्र गईं हैं। वहीं 1297 ने दिल्ली को चुना है। इसके अलावा 879 कंपनियाँ पश्चिम बंगाल छोड़ कर उत्तर प्रदेश में गई हैं।

छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान भी 1000+ कंपनियाँ पश्चिम बंगाल से छीनने में सफल रहे हैं। हालाँकि, इस सबका तृणमूल सरकार पर कोई असर नहीं दिखाई पड़ता है। वह उद्योग धंधों को राज्य में लाने के बजाय उन्हें और राज्य निकाला देने पर तुली दिखाई पड़ती है।

उद्योग-धंधों पर नीति भी बदली

पश्चिम बंगाल में दशकों से व्यापार करने वाली कंपनियाँ एक ओर राज्य छोड़ रही हैं तो वहीं हाल ही में बनर्जी की सरकार ने कुछ ऐसा किया है, जिससे यह पलायन और तेज हो सकता है। अप्रैल, 2025 में राज्य की ममता सरकार ने उद्योगों को लाभ पहुँचाने वाली सभी सरकारी योजनाओं को बंद कर दिया था।

उद्योग-धंधों को लुभाने के लिए 1993 से लेकर 2021 तक बनाई गई सभी नीतियाँ एक झटके में राज्य सरकार ने खत्म कर दी थीं। इसका असर यह होगा कि राज्य में कोई भी उद्योग स्थापित करने पर किसी कारोबारी को कोई लाभ नहीं मिलेगा। चाहे वह जमीन से जुड़ा हो, बिजली से जुड़ा हो या फिर अन्य किसी एंगल से।

एक रिपोर्ट बताती है कि ममता सरकार ने उद्योग धंधों को यह फायदे देने इसलिए बंद किए थे, ताकि वह ‘सामाजिक कार्यों’ के लिए और पैसा सरकारी खजाने से मुक्त कर सके। इसका अर्थ है कि ममता सरकार उद्योग धंधों को बंद करके लोगों को और खुद पर निर्भर करना चाहती है।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के इस कदम से कई सीमेंट कंपनियाँ बड़ा झटका झेलेंगी। इनमें डालमिया जैसे देश के पुराने और विशाल कारोबारी घराने भी शामिल हैं। यह नुकसान ₹500 करोड़ तक का बताया गया था।

उद्योग धंधों को कोई भी लाभ ना देने का यह कदम पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसे समय में उठाया है जब बाकी राज्य उनके लिए बाँहें खोल कर खड़े हैं। कहीं ₹1 में जमीन दी जा रही है तो कहीं पूरे-पूरे नए शहर बनाए जा रहे हैं, ताकि उद्योग-धंधे उनके यहाँ आ सकें।

ऐलान बड़े, निवेश नहीं

पश्चिम बंगाल में पुरानी कंपनियाँ तो बाहर जा रही हैं, नया निवेश भी सिर्फ घोषणाओं और कागजों में ही आ रहा है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया था कि जनवरी-नवम्बर 2024 में पश्चिम बंगाल में ₹39 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए थे। उन्होंने दावा किया था कि यह देश में तीसरा सर्वाधिक है।

केंद्र सरकार के एक और विभाग की एक रिपोर्ट इस दावे की सच्चाई खोलती है। भले ही राज्य में बड़े-बड़े निवेश के वादे किए गए हो लेकिन असल में यह वादों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। DPIIT की IEM रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2024 में नवम्बर माह तक ₹3735 करोड़ के निवेश ही हुए थे जबकि वादा कहीं अधिक था।

पश्चिम बंगाल औद्योगिक निवेश के मामले में भी बाक़ी राज्यों के सामने कहीं नहीं ठहरता। यही रिपोर्ट बताती है कि 2020-24 के बीच जहाँ उत्तर प्रदेश में ₹71 हजार करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है तो वहीं इस दौरान पश्चिम बंगाल मात्र ₹15 हजार करोड़ का ही निवेश आकर्षित करने में सक्षम रहा। निवेश आकर्षित करने के मामले में वह झारखंड तक से पीछे है।

बड़े ब्रांड छोड़ रहे बंगाल

पश्चिम बंगाल छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी ही रहा है। 2024 में राज्य में ब्रिटानिया ने अपनी दशकों पुरानी बिस्किट फैक्ट्री को ताला लगा दिया था। यह फैक्ट्री कोलकाता के पास स्थापित थी। इसी तरह कई जूट मिलें भी राज्य में बंद हो चुकी हैं, या फिर अंतिम साँसे गिन रही हैं।

ब्रांड्स के बंगाल छोड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है। असल में ममता बनर्जी के राजनैतिक करियर का सबसे बड़ा मोड़ यही एक कारण रहा है। 2008 में राज्य को टाटा मोटर्स ने छोड़ा था, वह सिंगूर में में नैनो की फैक्ट्री लगा रहा था। लेकिन ममता बनर्जी के लगातार विरोध के चलते उसे बनी-बनाई फैक्ट्री उखाड़नी पड़ी और गुजरात भागना पड़ा।

ममता बनर्जी इसी सिंगूर के आंदोलन के बाद ही राज्य में बड़ी जीत हासिल कर पाईं और सत्ता में तीन दशक से अधिक से जमे बैठे कम्युनिस्टों की जगह ली। हालाँकि, जिस नेता के सत्ता में आने का कारण ही किसी उद्योग का विरोध रहा हो, उससे उद्योग समर्थक नीति की उम्मीद करना बेईमानी है।

बताते हैं कि इसी बंगाल में कभी आदित्य बिरला को उनकी गाड़ी से खींच कर सड़क पर पीटा गया था और नंगा कर बेईज्जत किया गया था। इसके बाद उन्होंने अपना कारोबार समेट लिया। यही हाल और भी उद्योग घरानों का हुआ।

क्यों चिंता की बात है बंगाल से उद्योग का पलायन

पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का पलायन राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल देश में चौथा सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है लेकिन इसका देश के औद्योगिक आउटपुट में मात्र 3.5% हिस्सा है। इसमें पीछे होने के चलते राज्य में भारी बेरोजगारी की समस्या है।

अवैध घुसपैठियों का पश्चिम बंगाल में आना इस समस्या को और भीषण बनाता है। राज्य में आए दिन होते दंगे और बहुसंख्यक आबादी पर हमले भी ब्रांड्स के घटते विश्वास का कारण बने हैं। राज्य में कानून-व्यवस्था की दयनीय स्थिति के चलते कोई बड़ी कम्पनी निवेश नहीं करना चाहती।

यही कारण है कि 1960 के दशक में जिस पश्चिम बंगाल का देश की जीडीपी में 10% से अधिक योगदान था, वह अब मात्र 5% तक आकर टिक गया है। उससे छोटे राज्य उससे आगे निकलने वाले हैं। यदि पश्चिम बंगाल की ममता सरकार का यही रवैया रहा तो इससे बाकी देश भी प्रभावित होगा।

उसकी धीमी आर्थिक विकास की गति देश को पीछे खींचेगी।

2050 तक भारत को इस्लामी मुल्क बनाना चाहता था ‘धर्मांतरण गैंग’, यूट्यूब से फंडिंग उठाते थे गुर्गे… फिलिस्तीन को भी भेजे: ‘दावा’ देकर हिन्दुओं को मुस्लिम बनाते थे

आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह ने 2050 तक पूरे देश में इस्लाम फैलाने का टारगेट सेट किया था। इसके लिए नए लोगों को जोड़ने में लगे थे। गिरोह का नेटवर्क पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में भी था। इसके अलावा सोशल मीडिया को गिरोह ने हथियार बनाया हुआ था। इसके जरिए पाकिस्तान में बैठे लोगों से बात करते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने बताया कि जम्मू-कश्मीर के छात्र भी गिरोह से जुड़े हैं। छात्र स्लीपर सेल का काम करते हैं। उनका काम सिर्फ हिंदुओं को जाल में फँसाना होता है। आगरा की दो सगी बहनों को भी जम्मू-कश्मीर की ही छात्रा साइमा ने फँसाया था। बाकी गिरोह के सदस्य सोशल मीडिया का सहारा लेकर हिंदुओं को फँसाते हैं।

गिरोह का पहला काम हिंदुओं से दोस्ती करना होता है। चाहे वह पहचान छिपाकर हो या बताकर हो। फिर ‘दावा’ के लिए न्यौता दिया जाता है। यहाँ दावा का अर्थ है, इस्लाम की ओर खींचना है। इस दौरान हिंदुओं को इस्लाम की अच्छाइयाँ और हिंदू धर्म की बुराइयाँ की जाती हैं। इस ब्रेनवॉश से सामने वाला युवक या युवती आसानी से इस्लाम को मानने लगेगा।

आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह में ब्रेनवॉश किए हिंदू युवक और युवतियों को पाकिस्तान के लोगों से जोड़ा जाता है। इस्लाम की किताबें पढ़ने को कहा जाता है। फिर इससे संबंधित सवाल-जवाब करते हैं। जाँच एजेंसी के मुताबिक, इस गिरोह में अब तक जिन युवतियों का धर्मांतरण हुआ है। उन्हें पाकिस्तान के तनवीर अहमद और साहिल अदीम से जोड़ा गया। जाँच एजेंसियाँ इनकी तलाश कर रही हैं।

रहमान कुरैशी फिलिस्तीन को भेजता था फंड

रिपोर्ट्स के मुताबिक, धर्मांतरण गिरोह में अब तक 14 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। इनमें से एक है सराय ख्वाजा निवासी रहमान कुरैशी। रहमान धर्म परिवर्तन करने के लिए यूट्यूब चैनल चला रहा था। इसके जरिए क्राउड फंडिंग भी करता था और उन पैसों को फिलिस्तीन की मदद के लिए भेजता था। यह मदद क्रिप्टो करंसी और डॉलर में पहुँचाई जाती थी। पुलिस इसके माध्यम की जाँच में जुटी है।

जानें पूरा मामला

हाल ही में आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया, जिन्हें कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से रेसक्यु किया गया।

मामले में पुलिस ने 10 आरोपितों को अलग-अलग राज्य से गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ के बाद गिरोह के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद से ही धर्मांतरण गैंग से जुड़े नए-नए खुलासे हो रहे हैं। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 14 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

इनमें गोवा से आयशा उर्फ एसबी कृष्णा, कोलकाता से शेखर रॉय उर्फ अली हसन, कोलकाता से ओसामा, आगरा से रहमान कुरैशी, मुजफ्फरनगर अब्बू तालीब, देहरादून से अबुर रहमान, कोलकाता से रित बानिक उर्फ इब्राहिम, जयपुर से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से मुस्तफा उर्फ मनोज, जयपुर से मोहम्मद अली, दिल्ली से सरगना अब्दुल रहमान, दिल्ली से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को गिरफ्तार किया है। इनमें से 11 को 10 दिन की पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया है। वहीं, जुनैद कुरैशी, अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को जेल भेजा जा चुका है।

‘अब मेरा नया इस्लामी नाम इमरान खान होगा’, एफिडेविट ने खोले शब्बीर अहमद के सारे राज: कॉन्ग्रेस ने बनाई 3 वकीलों की टीम, धर्मांतरण के आरोपित का करेगी कानूनी बचाव

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर से धर्मांतरण रैकेट का मामला सामने आया है, जिसमें एक हिंदू युवक को नौकरी की आड़ में धर्मांतरित करने की कोशिश की गई। उसका फर्जी एफिडेविट भी बनवा लिया गया और लगातार उस पर दबाव डाला गया। इस मामले में अल फारुक इंटर कॉलेज के मैनेजर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस बीच, पीड़ित हिंदू युवक के हाथ वो एफिडेविट लगा है, जिससे शब्बीर अहमद के सारे हथकंडे बाहर आ गए हैं। पीड़ित के नाम से बने इस एफिडेविट में लिखा है, ‘अब मेरा नया इस्लामी नाम इमरान खान होगा।’

मैनेजर मोहम्मद शब्बीर अहमद पर जबरन धर्म बदलवाने का आरोप लगाने वाले अखंड प्रताप सिंह ने ऑपइंडिया को बताया कि 2020 में उन्होंने वहाँ 8-10 दिन बाबू की नौकरी की थी। उस दौरान मैनेजर ने 100 रुपये के खाली एफिडेविट पर एग्रीमेंट के नाम पर उनके हस्ताक्षर करवा लिए।

कुछ दिन बाद मैनेजर ने अखंड प्रताप को एक एफिडेविट दिखाया, जिसमें धर्म बदलने की बात लिखी थी। यह देखकर वे हैरान रह गए और नौकरी छोड़कर चले गए। इसके बाद भी मैनेजर द्वारा लगातार अखंड प्रताप सिंह पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता रहा।  

इंटर कॉलेज से बाबू की नौकरी छोड़ने के बाद अखंड प्रताप सिंह कहते हैं कि वह फर्जी एफिडेविट को लेकर बेहद चिंतित थे और उस एफिडेविट को पाने की जुगत में लग गए। किसी तरह कॉलेज से एफिडेविट उनके हाथ लगा, जिसे पढ़ने के बाद अखंड प्रताप सिंह के पैरों तले जमीन खिसक गई। इंटर कॉलेज के मैनेजर मोहम्मद शब्बीर अहमद द्वारा अखंड प्रताप सिंह के नाम से बनाया गया ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इस एफिडेविट में लिखा था…

  1. मैं कहता हूँ कि मैं धर्म से हिंदू हूँ।
  2. मैं इस्लाम की शिक्षा से बहुत प्रभावित हूँ।  
  3. मैं इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं में आस्था रखता हूँ।
  4. मैंने इस्लाम धर्म अपनी इच्छा से अपनाया है मेरे ऊपर किसी का कोई दबाव नहीं है।
  5. अब मेरा नया इस्लामी नाम इमरान खान होगा।

15-16 हिंदुओं का धर्मांतरण करा चुका है शब्बीर

आगे ऑपइंडिया से बात करते हुए पीड़ित अखंड प्रताप सिंह ने दावा किया कि इसी तरह मैनेजर शब्बीर अहमद पिछले कुछ वर्षों में 15-16 हिंदुओं का धर्मांतरण करा चुका है। इतना ही नहीं 2018 में ही गोल्हौरा थाना क्षेत्र के निवासी एक यादव के बेटे का शब्बीर ने धर्मांतरण कराया था। आज वह लड़का कहाँ है किसी को नहीं पता। अखंड प्रताप सिंह को आशंका है कि स्कूल में पढ़ाने वाले अन्य हिंदुओं ने भी शब्बीर के प्रभाव में आकर इस्लाम मजहब को अपना लिया है।

अखंड प्रताप सिंह ने दावा किया कि विदेश की धरती से व्हाट्सऐप कॉल पर बात कर रहे मौलाना ने उन्हें इस्लाम में आने की दावत दी थी साथ ही कहा था कि इस्लाम अपनाने पर आपको गाड़ी, गुजरात में रहने के लिए मकान और 20 लाख रुपए की रकम दी जाएगी, लेकिन मौलाना के इस लालच को अखंड प्रताप सिंह ने ठुकरा दिया।

जीप चलाने वाला शब्बीर कुछ वर्षों में बन गया करोड़पति

पहला पार्ट: सिद्धार्थनगर के अल फारुक कॉलेज का मैनेजर शब्बीर अहमद गिरफ्तार, नौकरी के नाम पर करवा रहा था धर्मांतरण: छांगुर पीर से निकला कनेक्शन, शिकायतकर्ता बोला- ₹20 लाख का लालच भी दिया

अखंड प्रताप सिंह का दावा है कि एनजीओ के नाम पर चला रहे इंटर कॉलेज की आड़ में शब्बीर अहमद खाड़ी देशों से चंदा इकट्ठा करता है और फिर उस पैसे से धर्मांतरण के साथ दूसरों के नाम पर अपना बिजनेस करता है। प्रताप सिंह की मानें तो करीब 15-20 वर्ष पहले शब्बीर इटवा-बांसी रोड पर जीप चलाने का काम करता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ही शब्बीर अहमद देखते ही देखते करोड़पति हो गया। अब अखंड प्रताप सिंह ने यूपी पुलिस से शब्बीर अहमद के खातों और संपत्ति की भी जाँच करने की माँग की है।

कॉन्ग्रेस पार्टी लड़ेगी धर्मांतरण के आरोपित शब्बीर अहमद का केस

जबरन धर्मांतरण के आरोप में जेल में बंद शब्बीर अहमद के केस को लेकर उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी(विधि विभाग), लखनऊ ने एक पत्र जारी कर कहा है कि मौलाना शब्बीर अहमद को धर्मांतरण के झूठे केस में गिरफ्तार किया गया है। इनके मुकदमे की पैरवी इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ में एड. रवीन्द्र सिंह, एड. इमरान आसिम खान और एड. सहोदर त्रिपाठी करेंगे।

कॉन्ग्रेस पार्टी लड़ेगी शब्बीर के लिए कानूनी लड़ाई

बता दें कि जबरन धर्मांतरण के मामले में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से छांगुर पीर की गिरफ्तारी के बाद सिद्धार्थनगर के अखंड प्रताप सिंह की शिकायत पर यूपी पुलिस ने अल फारुक इंटर कॉलेज के मैनेजर शब्बीर अहमद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। अब यूपी पुलिस शब्बीर अहमद के छांगुर पीर के कनेक्शन की तलाश कर रही है।