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पहलगाम में हिंदू नरसंहार के बाद आतंकियों ने बंद कर लिया सैटेलाइट फोन, 95 दिन बाद किया ऑन… सेना ने हूरों के पास भेजा: जानिए कैसे चला ‘ऑपरेशन महादेव’, कौन था मूसा

जम्मू कश्मीर में 22 अप्रैल, 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले का सरगना सुलेमान मूसा मार गिराया गया है। उसे भारतीय सेना और बाकी सुरक्षाबलों के एक ऑपरेशन में 28 जुलाई, 2025 को श्रीनगर के जंगलों में मार गिराया गया। उसके साथ 2 और आतंकी मारे गए हैं। इनके लिए सेना बीते कई दिनों से तलाश कर रही थी। इनके बारे में सुराग सैटेलाइट फोन से मिला। सेना ने कुछ ही घंटों में इनके ठिकाने को ध्वस्त कर इन्हें मार गिराया। सेना ने इस पूरी कार्रवाई को ऑपरेशन महादेव नाम दिया।

कहाँ हुआ ऑपरेशन महादेव?

ऑपरेशन महादेव को 28 जुलाई, 2025 की सुबह चालू किया गया था। यह विशेष ऑपरेशन श्रीनगर जिले के दाचीगाम इलाके में हुआ। यह इलाका महादेव की पहाड़ियों के नीचे पड़ता है। यहाँ यह आतंकी कई दिनों से छुपे हुए थे। इन्होंने यहाँ अपना टेंट लगाया हुआ था। इलाके में घने जंगल होने के चलते इन्हें कोई जल्दी पहचान नहीं पाता। यह तीन आतंकी यहाँ टेंट में अपने खाने-पीने का सामान रखे हुए थे। यहीं पर बड़ी मात्रा में हथियारों का इंतजाम था। इनके पास अपने हैंडलर्स से बातचीत के लिए भी पूरा इंतजाम था।

कैसे ढूंढें गए आतंकी?

इन तीनों आतंकियों की मूवमेंट के बारे में कई दिनों से सेना को सूचना मिल रही थी। इनको 14 दिनों से ट्रैक किया जा रहा था। रिपोर्ट्स के अनुसार, इनकी मौजूदगी की पुष्टि एक रेडियो सिग्नल से हुई। यह आतंकी चीन में बने सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल कर रहे थे। इससे ही बातचीत करते थे।

इसके सिग्नल को सेना ने शनिवार (26 जुलाई, 2025) को डिटेक्ट किया। इसके बाद सेना ने पुष्टि के लिए स्थानीय मुखबिरों को एक्टिव किया। बताया गया कि इस काम में स्थानीय घोड़े-खच्चर वालों से पूछताछ की गई। यहाँ ड्रोन से भी सर्वे करवाया गया, जिसमें हरकत दिखी।

इनसे इनकी मूवमेंट की पुष्टि हो गई। रेडियो सिग्नल भी इसलिए पकड़ लिया गया क्योंकि पहलगाम हमले के समय भी ऐसा ही हुआ था। पहलगाम हमले के समय भी बैसारन घाटी में यही चीनी सैटेलाइट सिग्नल पकड़ा गया था। सुरक्षाबल इसे तबसे ट्रैक कर रहे थे। जब सेना को इसका सुराग मिला तो पक्का करके उन पर सीधा हमला बोला गया। पक्की सूचना ही वह आधार बनी, जिसके कारण तीनों आतंकी मारे गए और सेना को कोई नुकसान नहीं हुआ।

ऑपरेशन महादेव कैसे हुआ?

रेडियो सिग्नल और स्थानीय मुखबिरों से मिली सूचना के चलते सुरक्षाबलों ने यह अपनी तैनाती चालू कर दी थी। ऑपरेशन वाली साइट के आसपास CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने घेरा बनाया था जबकि जंगल के भीतर सेना की 4 पैरा SF यूनिट सर्च अभियान चला रही थी। यह इलाका सेना की चिनार कोर के अंतर्गत आता है। बताया गया कि 11 बजे सेना की मुठभेड़ आतंकियों से चालू हो गई। इसके बाद सेना की कार्रवाई में यह तीनों आतंकी मारे गए। यह ऑपरेशन कुछ ही देर चला और आतंकी कोई नुकसान नहीं पहुँचा पाए।

कौन-कौन थे मारे गए आतंकी?

इस ऑपरेशन में 3 आतंकी सुरक्षाबलों ने मार गिराए। इनके नाम हाशिम मूसा उर्फ सुलेमान शाह, जिबरान तथा हमजा अफगानी हैं। यह तींनों पाकिस्तानी हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम हाशिम मूसा का है। हाशिम मूसा को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार माना गया है। वह आतंकियों की टीम का मुखिया था। पहलगाम हमले के बाद उसका स्केच भी जारी हुआ था। उस पर जम्मू-कश्मीर पुलिस ने ₹20 लाख का इनाम घोषित किया था।

हाशिम मूसा पाकिस्तानी फ़ौज की SSG यूनिट का पूर्व फौजी है। वह लश्कर-ए-तैयबा के लिए कई सालों से काम कर रहा है। मूसा को विशेष ट्रेनिंग हासिल है। मूसा की तलाश हमले के बाद से जारी थी। बताया गया कि ऑपरेशन चालू होने से कुछ देर पहले तक मूसा सो रहा था। बताया गया कि वह Z मोड़ सुरंग आतंकी हमले को अंजाम देने में शामिल था। इसमें 6 लोग मारे गए थे। मूसा के भारत में कठुआ और साम्बा इलाके से घुसने की सूचना आई थी। अब उसका अंत हो गया है।

आतंकियों के पास से क्या मिला?

सुरक्षाबलों ने आंतकियों को जहाँ ढेर किया है, वहाँ पर वह पिछले लगभग 2 सप्ताह से से टेंट लगाकर रह रहे थे। मारे गए आतंकियों के पास से 1 अमेरिकी M4 राइफल, 2 AK-47 राइफल और बड़ी संख्या में ग्रेनेड बरामद हुए हैं। इसके अलावा यहाँ बड़ी मात्रा में खाने-पीने का सामान मिला है। इससे पता चला है कि यह आतंकी संभवतः किसी बड़े हमले की फिराक में थे और लम्बे समय तक जंगल में रुकने वाले थे।

पहलगाम हमले के 97 दिन बाद यह ऑपरेशन हुआ है और बदला पूरा हुआ है। इस हमले में 26 हिन्दुओं को चुन-चुन कर मारा था। सेना के DGMO राजीव घई ने कहा है कि चिनार कोर आतंकियों को उनके पास भेजेगी, जिन्होंने उन्हें बनाया है।

बाहर से आने लगे मौलवी, उगने लगे मस्जिद-मदरसे: बच्चों का खतना करवाने को कर रहे मजबूर, शवों का दाह संस्कार करने से भी हिंदुओं को रोक रहे

राजस्थान के अजमेर, भीलवाड़ा, ब्यावर, पाली और राजसमंद जैसे जिलों में मेहरात (Mehrat) समुदाय के लोग रहते हैं। इन्हें चीता-मेहरात भी कहा जाता है। मुख्य धारा की मीडिया इन्हें एक ऐसे समुदाय के रूप में पेश करती है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम अपने-अपने रीति-रिवाजों के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहते हैं।

लेकिन अब इस समुदाय के लोगों पर जबरन मजहब थोपा जा रहा है। हिंदुओं को दाह संस्कार से रोका जा रहा है। बच्चों का खतना करवाने को मजबूर किया जा रहा है। होलिका दहन जैसी हिंदू परंपराओं को रोका जा रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इलाके में इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए बाहर से मौलवी आ रहे हैं। वे गाँव में मस्जिद और मदरसे बनवाकर धर्मांतरण की कोशिश कर रहे हैं।

मेहरात समुदाय OBC वर्ग में आता है। गौर करने वाली बात है कि जो मेहरात इस्लाम का अनुकरण करते हैं। उनके पूर्वज भी हिंदू से मुस्लिम बने थे। लेकिन उन्होंने इस्लाम की कुछ ही रिवाजों को अपनाया था। इन इलाकों को मजहबी कट्टरपंथ के प्रभाव से पहले तक ये लोग भी हिंदू परंपराओं का निर्वहन करते थे।

मेहरात समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को छीनने की चल रही साजिश पर राजस्थान पत्रिका ने विस्तार से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस्लामिक कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव के कारण कई गाँवों में शव का दाह संस्कार कराने के लिए लोगों का पुलिस का सहयोग तक लेना पढ़ा।

राजस्थान चीता मेहरात हिंदू मगरा-मेरवाड़ा महासभा के संरक्षक छोटू सिंह चौहान के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है, “अजमेर, ब्यावर, पाली, राजसमंद और भीलवाड़ा में चीता, मेहरात और काठात समुदाय के धर्मांतरण का प्रयास इस्लामी संस्थाएँ कर रही हैं। गाँवों में मस्जिदें और मदरसे बनवा कर मौलवी ओबीसी में आने वाली जातियों के लोगों को मुस्लिम बनाने के प्रयास कर रहे हैं।”

छोटू सिंह के अनुसार करीब 800 साल पहले उनके समाज के कुछ लोगों ने इस्लामी रीतियों को अपना लिया था। बावजूद हिंदू धर्म का प्रभाव बना रहा। समाज के लोग पूजा से लेकर विवाह तक हिंदू परंपराओं का निर्वहन करते रहे हैं। लेकिन बीते दो दशक से क्षेत्र में बाहर के मौलवियों का आना-जाना बढ़ गया है। इसके बाद से दाढ़ी-टोपी रखने, इस्लामी नाम रखने, मस्जिद जाने का चलन बढ़ गया है।

मेहरात जाति बताते ही मुस्लिम समझा

ब्यावर के राजियावास गाँव निवासी सूरज काठात बताते हैं कि वह यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। फॉर्म भरते समय जाति में मेहरात लिखा, लेकिन फिर भी धर्म के कॉलम में हिंदू धर्म के बजाए मुसलमान बना दिया गया। सूरज कहते हैं कि वह हिंदू हैं और उन्हें इसी धर्म से पहचाना जाए।

बच्चों का खतना नहीं करवाया तो गाँव से निकाला

सुहावा गाँव में बच्चों का खतना ना करवाने वाले लोगों को दुश्मन बना लिया जाता है। इस गाँव में 90 के दशक से बाहर से मौलवी आकर इस्लामी तौर-तरीके बताते हैं। जब इनपर रोक लगाई गई तो कट्टरपंथियों ने गाँव के ही मोहन को शम्सुद्दीन बनाकर मस्जिद का मौलवी लगा दिया।

गाँव के सज्जन काठात ने बताया कि उनके बेटे का खतना करवाना चाहते थे, उन्होंने मना किया तो गाँव से निकाल दिया। यहाँ तक की सज्जन को उनके ही खेतों पर जाने से तक रोका गया।

दाह संस्कार के बजाए देह दफनाने का डाला दबाव

ब्यावर के सराधना गाँव में हिंदू रीति-रिवाजों से दाह संस्कार करने से रोका जाता है। यहाँ इस्लामी कट्टरपंथी शव को दफनाने का दबाव डालते हैं। गाँव के कालू सिंह कहते हैं कि पिता का दाह संस्कार करना चाहा, तो भीड़ ने पथराव किया। यहाँ तक लोगों ने उनके बूथ से दूध खरीदने बंद कर दिया। अब वह बूथ को किराए पर देकर टैंकर चलाते हैं।

बाडिया गाँव के रहने वाले प्रेम चीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब उनके पिता का देहांत हुआ और वे दाह संस्कार करवाने पहुँचे तो लोगों ने विरोध किया। बाद में पुलिस की सुरक्षा में दाह संस्कार करवाया गया। वह बताते हैं कि गाँव में पहले शवदाह स्थल भी नहीं था, जिसे उन्होंने ही आवंटित करवाया है।

बांग्लादेश के रंगपुर में 15 हिंदुओं के घरों को लूटा, किया आग के हवाले: इस्लामी भीड़ ने ईशनिंदा के नाम पर 50 परिवारों को किया भागने पर मजबूर

बांग्लादेश के रंगपुर जिले में इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं को निशाना बनाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गंगाचारा उपजिला के बेटगारी यूनियन में रविवार (27 जुलाई 2025) को 500-600 मुस्लिमों की भीड़ ने 15 से ज्यादा हिंदू घरों पर हमला किया। उन्होंने ‘ईशनिंदा’ के बहाने घरों में तोड़फोड़ की और सामान लूट लिया।

खबरों के मुताबिक, यह हमला रविवार शाम करीब 4:30 बजे हुआ। मुस्लिम भीड़ ने सिर्फ हिंदू घरों को निशाना बनाया और उनका सामान लूट लिया। डर की वजह से कम से कम 50 हिंदू परिवार अपने घर छोड़कर भाग गए।

यह हिंसा शनिवार (26 जुलाई 2025) से शुरू हुई, जब मुस्लिमों ने एक हिंदू व्यक्ति के घर पर लाठी और हथियारों से हमला किया।

रविवार शाम को फिर से मुस्लिम भीड़ ने हिंदू परिवारों के घरों को घेर लिया, तोड़फोड़ की और लूटपाट की। उनके पास लाठियाँ और देसी हथियार थे। एक हिंदू महिला ने रोते हुए कहा, “अब हम कैसे जिएँगे? हम पूरी तरह बर्बाद हो गए। उन्होंने (मुस्लिमों ने) सब कुछ छीन लिया।”

एक युवा हिंदू लड़की ने ‘आजकर पत्रिका’ को बताया कि जब हमलावर उनके घरों में तोड़फोड़ करने आए, तब पुलिस वहाँ थी। पुलिस ने पहले भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन बाद में भाग गई और हिंदुओं को उनकी किस्मत के भरोसे छोड़ दिया।

लड़की ने पूछा, “हम जैसे निर्दोष लोगों के घर क्यों तोड़े और लूटे गए?” उसे नहीं पता था कि मुस्लिम भीड़ ‘सामूहिक सजा’ देने के लिए ऐसा करती है।

गंगाचारा पुलिस के ओसी अल इमरान ने माना कि उन्होंने 500-600 मुस्लिमों की भीड़ को इकट्ठा होने दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि यह ‘शांतिपूर्ण मार्च’ है। उन्होंने कहा, “लेकिन अचानक उन्होंने हमला शुरू कर दिया। एक पुलिसवाला गंभीर रूप से घायल हो गया।”

उन्होंने यह भी बताया कि मुस्लिम भीड़ ने दोपहर की नमाज के बाद यह हमला किया।

स्थानीय हिंदू निवासी प्रमोद महंत ने ‘प्रथम आलो’ को बताया कि मुस्लिमों ने बाजार में विरोध प्रदर्शन की बात कही थी, लेकिन जल्द ही नारे लगाने शुरू किए और हिंदू घरों पर हमला कर दिया।

बाद में पुलिस और फौज ने स्थिति को नियंत्रण में किया। हमलावर मौके से भाग गए। ऑपइंडिया के सूत्रों ने बताया कि हिंदू घरों को नष्ट करने के मामले में अभी तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई है।

इसी तरह की हिंसा और आगजनी का तरीका मई में बांग्लादेश के जेसोर जिले में हिंदू समुदाय को सजा देने के लिए मुस्लिम भीड़ ने इस्तेमाल किया था।

कैसे शुरु हुए इस्लामी भीड़ के हमले?

शनिवार (26 जुलाई) को गंगाचारा में 18 साल के हिंदू लड़के रंजन रॉय को ‘ईशनिंदा’ के बिना सबूत के आरोपों में गिरफ्तार किया गया।

खबरों के मुताबिक, रंजन पर इस्लाम का अपमान करने और फेसबुक पर पैगंबर मुहम्मद के बारे में अपमानजनक पोस्ट करने का आरोप था। कहा गया कि उसने ‘रंजन रॉय एलआरएम’ नाम के आईडी से पाँच दिनों तक ऐसी पोस्ट कीं।

पत्रकार और फैक्ट-चेकर सोहन आरएसबी ने बताया कि रंजन का फेसबुक पर एक डुप्लिकेट अकाउंट था, और कथित तौर पर अपमानजनक पोस्ट उसी नए अकाउंट से की गई थीं। उन्होंने बताया कि नए अकाउंट ने रंजन के पुराने अकाउंट की तस्वीरें लेकर उसके परिवार के बारे में अपमानजनक कैप्शन के साथ पोस्ट की थीं।

बिना तथ्यों की जाँच किए, गुस्साई मुस्लिम भीड़ गंगाचारा की सड़कों पर उतर आई और हिंदू लड़के के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने लगी।

पुलिस ने जल्दी ही उनकी माँग मान ली और यह जाँच किए बिना कि नया फेसबुक अकाउंट रंजन का है भी या नहीं, 18 साल के लड़के को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ओसी अल इमरान ने कहा, “जब लोग गुस्सा हो गए, तो हमने उसे गिरफ्तार करने के लिए छापा मारा और कानून-व्यवस्था को नियंत्रित किया। उससे पूछताछ हो रही है।”

इसके बावजूद, यह मुस्लिमों के लिए हिंदू घरों में तोड़फोड़ और लूटपाट का बहाना बन गया, जिससे उनकी घर, दुकान और जीवन जीने के साधन नष्ट हो गए।

ऑपइंडिया ने पहले भी 13 ऐसे मामलों को उजागर किया था, जहाँ ‘ईशनिंदा’ के बहाने हिंदुओं पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया, उन्हें प्रताड़ित किया और सताया।

हिंदू लड़कों ने खोली लव जिहाद की पोल तो पेशाब पीने को किया मजबूर, खुद को ‘RSS कार्यकर्ता’ बताते थे बहराइच ‘मुस्लिम गैंग’ के मेंबर: जाति की लड़ाई करवाना चाहते थे

बहराइच में लव जिहाद गैंग में शामिल मुस्लिम लड़के हिंदुओं में जातिगत लड़ाई करवाना चाहते थे। उन्होंने हिंदू नाम से फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट बनाए थे और वह हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण में भी लगे हुए थे। यह खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य भी बताया करते थे। इन मुस्लिमों को हिन्दू लड़कों पर हमले के बाद गिरफ्तार किया गया था।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुस्लिम गैंग में शामिल शहाबुद्दीन ने सोशल मीडिया पर सन्नी प्रताप सिंह नाम से अकाउंट बनाया हुआ था। इससे वह हिन्दुओं के बीच जातिगत घृणा फैलाता था। वह इसी अकाउंट के माध्यम से जातिगत टिप्पणियाँ करता था। वह खुद को बजरंग बली का भक्त बताता था।

उसके अकाउंट पर और भी जाँच चल रही है। वर्तमान में वह गिरफ्तार हो चुका है। हिन्दुओं को जातिगत तौर पर लड़ाने की मंशा रखने वाले यह युवक हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए भी पहचान छुपाने का पैंतरा अपनाते थे।

उसने और उसके साथियो युवकों ने हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फँसाने के लिए फर्जी पहचान अपनाई थी। गुरुवार (24 जुलाई 2025) को पुलिस ने लव जिहाद गैंग के तीन मुख्य आरोपितों शहाबुद्दीन, अनस और जीशान को गिरफ्तार किया है।

RSS के जिला प्रचार प्रमुख विपिन कुमार ने मामले को गंभीर बताते हुए मुख्यमंत्री और प्रशासन को पत्र लिखकर सख्त कार्रवाई की माँग की है। उनके अनुसार इस गैंग में 15 से अधिक युवक शामिल हैं, जिन्होंने हिंदू नामों से फर्जी आइडी बनाकर समाज में नफरत फैलाने की कोशिश की है।

गौरतलब है कि इन मुस्लिमों ने लव जिहाद का विरोध करने पर 2 हिन्दू युवकों को बुरी तरह पीटा था। उन्हें जबरन पेशाब पिलाकर इस्लाम जिंदाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगवाए थे। पुलिस ने इसके बाद इन्हें गिरफ्तार किया था।

‘क्या अपने पक्ष में चाहते थे जाँच रिपोर्ट’: सुप्रीम कोर्ट ने ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा से पूछा, कहा- दायर ही नहीं होनी चाहिए थी आपकी याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने ‘घर से निकले जले नोट’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा को सोमवार को जमकर लताड़ लगाई। जाँच रिपोर्ट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा, “अगर जस्टिस वर्मा को जाँच प्रक्रिया में दिक्कत थी, तो समिति के सामने पेश क्यों हुए। क्या अपने पक्ष में रिपोर्ट चाहते थे?”

सुप्रीम कोर्ट की इन हाउस कमेटी ने जस्टिस वर्मा को इस मामले में दोषी पाया था। इसके खिलाफ जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, “ये याचिका दायर ही नहीं होनी चाहिए थी।”

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की खंडपीठ ने कहा कि याचिका में माँगी गई राहत दरअसल सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ ही है।

कोर्ट ने पूछे जस्टिस वर्मा के वकील से सवाल

जस्टिस दत्ता ने कहा, “अगर जस्टिस वर्मा को जाँच प्रक्रिया में दिक्कत थी, तो जाँच कमेटी के सामने क्यों पेश हुए, क्या आप जाँच के पूरा होने और रिपोर्ट के आने का इंतजार कर रहे थे। क्या आप अपने पक्ष में रिपोर्ट चाहते थे। आप उस वक्त ही कोर्ट की शरण में क्यों नहीं आए?”

जस्टिस ने कहा कि याचिका में असली आपत्ति सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया पर है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से ऐसी चूक कैसे हो गई? कोर्ट से साफ किया है कि वह रिकॉर्ड से बाहर के किसी दस्तावेज पर विचार नहीं करेंगे। जस्टिस दत्ता ने कहा, ” अगर आप रिपोर्ट पर बहस करना चाहते हैं तो उसे रिकॉर्ड में लाना जरूरी है।”

समिति की प्रक्रिया पर कोर्ट ने साफ किया, “समिति ने प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखी है। ये सिर्फ एक अनुशंसा है, फैसला नहीं।”

जस्टिस वर्मा की दलीलें

जस्टिस वर्मा के वकील कपिल सिब्बल ने जब संविधान का हवाला दिया, तो टॉप कोर्ट ने पूछा, ” क्या कहीं ये लिखा है कि इन हाउस समिति जाँच नहीं कर सकती है।”

जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की थी, जो असंवैधानिक और उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। सुनवाई के दौरान ये भी तर्क कपिल सिब्बल ने दिया कि अगर नकदी बरामद हुई थी तो ये किसकी थी? कितनी थी और उसे जस्टिस वर्मा के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है?

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही किसी बड़े ज्यूडिशियल ऑफिसर को इसकी जानकारी दी थी।

महिला डॉक्टर ने पढ़ रखी थी ‘गीता’, इसलिए ब्रेनवॉश नहीं कर पाया आगरा का ‘मुस्लिम गैंग’: फिर ‘दोस्त’ जुनैद ने किया रेप, काजी के पास ले जाकर जबरन धर्मांतरण-निकाह

आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह के जाल में हरियाणा की हिंदू डॉक्टर भी फँस चुकी है। अब्दुल रहमान के शागिर्द जुनैद ने डॉक्टर संग धोखे से निकाह किया। इसके बाद भी डॉक्टर उसकी बातों में पूरी तरह नहीं आई तो रेप किया। अब गिरोह का खुलासा होने पर डॉक्टर ने सामने आकर आपबीती सुनाई। अब कोर्ट में बयान दर्ज किए जाएँगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के झज्जर निवासी 25 वर्षीय युवती होम्योपैथी की पढ़ाई करने ओडिशा गई थी। पिता मजदूरी कर जैसे-तैसे पढ़ाई का खर्च उठा रहे थे, इसीलिए युवती ने अपने खर्च के लिए नौकरी की तलाश शुरू की, तब उसकी मुलाकात गिरोह की आयशा उर्फ एसबी कृष्णा से हुई।

आयशा ने ही युवती को जुनैद से मिलवाया। दोनों का ग्रुप बनाकर बातचीत शुरू करवाई। इस दौरान जुनैद ने युवती का ब्रेनवॉश करने की कोशिश की, लेकिन युवती को गीता का ज्ञान होने के चलते जुनैद अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ। युवती ने बताया कि एक रोज जब वह अपने घर हरियाणा जा रही थी, तब जुनैद ने उसे दिल्ली में मिलने बुलाया।

युवती के मुताबिक, दिल्ली में जुनैद उसे एक काजी के घर ले गया। यहाँ धोखे से निकाह भी कर लिया। काजी के घर से बाहर निकले तो जुनैद ने युवती से कहा, “अब तुम मेरी बेगम बन गई हो। हमारा निकाह हो गया है।”

युवती ने इसका विरोध किया, लेकिन जुनैद युवती को अपने साथ रखने का दबाव बनाने लगा। युवती को बदनाम करने की धमकी देने लगा। युवती ने बताया कि जुनैद ने उसका रेप भी किया और वीडियो बनाकर धर्मांतरण के लिए ब्लैकमेल करने लग गया।

युवती भी जुनैद के चंगुल से पीछा छुड़ाना चाहती थी। इसी बीच आगरा से जुड़े धर्मांतरण गैंग का खुलासा हुआ। तब पुलिस ने युवती से संपर्क किया और अपनी आपबीती सुनाई। पुलिस ने युवती और उसके पिता को आगरा बुलाकर बयान दर्ज कराए हैं। जल्द ही कोर्ट में भी युवती के बयान दर्ज कराए जाएँगे।

बता दें कि आगरा पुलिस ने धर्मांतरण गिरोह से जुड़ी जाँच में ही जुनैद कुरैशी को जयपुर से गिरफ्तार किया था। फिलहाल जुनैद 10 दिन की पुलिस कस्टडी में है। जुनैद ने हरियाणा की डॉक्टर समेत अन्य हिंदू लड़कियों को फँसाया है। जुनैद गैंग के सरगना अब्दुल रहमान का शागिर्द है।

जानें पूरा मामला

19 जुलाई 2025 आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया, जिन्हें कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से रेसक्यू किया गया।

मामले में पुलिस ने 10 आरोपितों को अलग-अलग राज्य से गिरफ्तार किया। इनसे पूछताछ के बाद गिरोह के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। इसके बाद से ही धर्मांतरण गैंग से जुड़े नए-नए खुलासे हो रहे हैं। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 14 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

इनमें गोवा से आयशा उर्फ एसबी कृष्णा, कोलकाता से शेखर रॉय उर्फ अली हसन, कोलकाता से ओसामा, आगरा से रहमान कुरैशी, मुजफ्फरनगर अब्बू तालीब, देहरादून से अबुर रहमान, कोलकाता से रित बानिक उर्फ इब्राहिम, जयपुर से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से मुस्तफा उर्फ मनोज, जयपुर से मोहम्मद अली, दिल्ली से सरगना अब्दुल रहमान, दिल्ली से जुनैद कुरैशी, दिल्ली से अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को गिरफ्तार किया है।

इनमें से 11 को 10 दिन की पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया है। वहीं, जुनैद कुरैशी, अब्दुल्ला और अब्दुल रहीम को जेल भेजा जा चुका है।

‘महाराज बहुत हो गया अब रोक दीजिए’: राजनाथ सिंह ने संसद से बताया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से कैसे पाकिस्तान कर रहा था बाप-बाप, इधर कश्मीर में ‘ऑपरेशन महादेव’ में पहलगाम अटैक का मास्टरमाइंड ढेर

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले पर सरकार का पक्ष रखा। इस दौरान उन्होंने भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक सफलता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि 6-7 मई 2025 की रात भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, जिसका उद्देश्य पहलगाम हमले का बदला लेना और आतंकवाद की नर्सरियों को नष्ट करना था। इस कार्रवाई में 100 से अधिक आतंकी और उनके हैंडलर मारे गए।

रक्षामंत्री ने कहा कि पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में आतंकियों ने पर्यटकों से धर्म पूछकर 26 लोगों की हत्या की थी, जिसमें ज्यादातर हिंदू थे। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी।

इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने सेना को निर्णायक कार्रवाई की छूट दी। भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में सिर्फ 22 मिनट में सभी आतंकी हमलों को हिट किया और 100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया।

इसके बाद पाकिस्तान की ओर से हमले 7 मई से 10 मई की रात 1 बजकर 30 मिनट तक मिसाइल और लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया। उसके निशाने पर हमारे सैन्य अड्डे थे। हमारा डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम कर दिया और पाकिस्तान किसी भी टार्गेट को हिट नहीं कर पाया। भारत के रक्षा तंत्र ने सभी हमलों को विफल कर दिया।

राजनाथ सिंह ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान एक भी लक्ष्य को हिट नहीं कर पाया। इसके जवाब में 10 मई की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयरफील्ड पर करारा प्रहार किया, जिसके बाद पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारत से संपर्क कर कार्रवाई रोकने की अपील की।

रक्षामंत्री ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन को केवल पॉज किया गया है और यदि पाकिस्तान ने फिर उकसाया तो इसे दोबारा शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन युद्ध छेड़ने के लिए नहीं, बल्कि आतंकवाद को खत्म करने के लिए था, जिसमें भारत ने अपने सभी लक्ष्य हासिल किए।

ऑपरेशन महादेव में हासिम मूसा समेत 3 आतंकी ढेर, जारी है एनकाउंटर

वहीं, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन महादेव के तहत श्रीनगर के लिदवास में 28 जुलाई को सुरक्षाबलों ने तीन आतंकियों सुलेमान साहा, अबु हमजा और यासिर को मार गिराया। चिनार कॉर्प्स के अनुसार, मुठभेड़ सुबह 11:30 बजे शुरू हुई, जब 24 राष्ट्रीय राइफल्स और 4 पैरा ने आतंकियों को घेर लिया।

मारे गए आतंकी सुलेमान साहा को मीडिया रिपोर्ट्स में हासिम मूसा बताया जा रहा है, जो पहलगाम आतंकी हमले का मास्टरमाइंड था।

आतंकियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और ग्रेनेड बरामद हुए। माना जा रहा है कि ये आतंकी पहलगाम हमले से जुड़े थे, जिसके लिए एनआईए ने पहले दो आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ऑपरेशन अभी जारी है, क्योंकि एक अन्य आतंकी की तलाश चल रही है।

रक्षामंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि वे सही सवाल नहीं पूछ रहे। उन्होंने जोर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक शक्ति का प्रतीक है। भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता पर किसी भी हमले का करारा जवाब देगा।

राजनाथ सिंह ने कॉन्ग्रेस पर तंज करते हुए कहा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को दोनों देशों की डायलॉग प्रॉसेस से 2009 की सरकार ने डीलिंक कर दिया था। साल 2006 में यह मान लिया गया था कि पाकिस्तान आतंक से पीड़ित है। इसने भारत की रणनीति को कमजोर किया। हमारे डेलिगेशन ने दुनिया के देशों में जाकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत के स्टैंड को प्रभावी तरीके से रखा।

रक्षामंत्री ने कहा, “पीएम मोदी ने भी कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर रुका है, समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान अगर फिर कोई हरकत करता है, तो हम और भी कठोर कार्रवाई करेंगे। पाकिस्तान के मन में गलतफहमी थी, उसे हमने ऑपरेशन सिंदूर से दूर कर दिया। अगर कुछ बचा होगा तो उसे भी दूर कर देंगे।”

SIR से अभी ‘पूर्ण स्वच्छ’ नहीं हुआ है बिहार का वोटर लिस्ट? चुनाव आयोग ने 65 लाख ‘मुर्दा-फ्रॉड-घुसपैठिए’ पहचाने, IIM प्रोफेसरों के रिसर्च ने 77 लाख ‘फर्जी मतदाताओं’ का लगाया है अनुमान

बिहार में चुनाव आयोग की ओर से चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान का पहला चरण पूरा हो चुका है। 24 जून से 25 जुलाई 2025 तक चले इस अभियान के दौरान राज्य के कुल 7.89 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने अपने फॉर्म जमा किए, जो कुल का 91.69% है।

लेकिन इस प्रक्रिया में करीब 65 लाख मतदाताओं के नामों पर सवाल उठे हैं, जिनमें से 36 लाख का कोई अता-पता नहीं है, 22 लाख की मौत हो चुकी है और 7 लाख नामों में दोहराव पाया गया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि ये आँकड़े अंतिम नहीं हैं, क्योंकि 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावे और आपत्तियाँ स्वीकार की जाएँगी।

इसी बीच, आईआईएम के दो प्रोफेसरों की हालिया स्टडी ने दावा किया है कि बिहार की वोटर लिस्ट में असली फर्जीवाड़ा 77 लाख तक हो सकता है, जो SIR के नतीजों से भी ज्यादा है। इससे सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग ने अब तक कोई कड़ा कदम उठाया है?

चुनाव आयोग की प्रेस नोट के मुताबिक, SIR का मुख्य उद्देश्य सभी योग्य मतदाताओं को शामिल करना और कोई भी पात्र व्यक्ति को छूटने न देना था। राज्य में 38 जिलों, 243 विधानसभा क्षेत्रों और 77,855 पोलिंग बूथों पर यह अभियान चलाया गया।

चुनाव आयोग ने दिए ये आँकड़े (फोटो साभार: चुनाव आयोग)

मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) बिहार, जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO), इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO), असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) और बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) की टीम ने घर-घर जाकर फॉर्म बांटे और कम से कम तीन बार विजिट की। इसके अलावा 12 प्रमुख राजनीतिक दलों के 1.60 लाख बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। BLA की संख्या SIR के दौरान 18% बढ़ गई, जो दलों की भागीदारी को दर्शाता है।

आयोग ने विशेष रूप से प्रवासी, शहरी और युवा मतदाताओं पर फोकस किया। प्रवासियों के लिए हिंदी में पूरे देश के 246 अखबारों में विज्ञापन दिए गए, जिनकी कुल सर्कुलेशन 2.60 करोड़ थी। साथ ही, CEO बिहार ने अन्य राज्यों के CEO को पत्र लिखकर बिहार के प्रवासियों तक पहुँचने का अनुरोध किया। प्रवासियों ने ऑनलाइन पोर्टल voters.eci.gov.in या ECI ऐप के जरिए 16 लाख फॉर्म भरे, जबकि 13 लाख ने फॉर्म डाउनलोड किए।

हरी इलाकों में विशेष कैंप लगाए गए और युवाओं (18-19 साल) को शामिल करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए। कुल 5.7 करोड़ मोबाइल नंबरों पर SMS भेजे गए और राजनीतिक दलों के साथ कई मीटिंग्स हुईं। BLO ने BLA के साथ बूथ लेवल मीटिंग्स कीं और BLA को प्रति दिन 50 फॉर्म जमा करने की अनुमति दी गई।

आईआईएम के 2 प्रोफेसरों के रिसर्च पेपर में आँकड़े अलग

लेकिन SIR के इन नतीजों से ठीक पहले जुलाई 2025 में आईआईएम कलकत्ता के पूर्व छात्र और वर्तमान प्रोफेसर डॉ. विदु शेखर (एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च) और डॉ. मिलन कुमार (आईआईएम विशाखापत्तनम) की स्टडी ने बड़ा खुलासा किया। “Estimating Legitimate Voter Numbers in Bihar (2025): A Demographic and Migration-Based Reconstruction” नाम की इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बिहार में असली योग्य मतदाताओं की संख्या सिर्फ 7.12 करोड़ हो सकती है, जबकि आधिकारिक रोल में 7.89 करोड़ हैं। यानी 77 लाख (9.7%) का अंतर है।

यह स्टडी डेमोग्राफिक और माइग्रेशन डेटा पर आधारित है, जिसमें 2003 के वोटर लिस्ट से सर्वाइवर्स, 1985-2007 में जन्मे नए वोटर्स और 2003-2025 के बीच पर्मानेंट आउटमाइग्रेशन को कैलकुलेट किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2003 में 4.6 करोड़ वोटर्स थे, जिनमें से 2025 तक सिर्फ 4.1 करोड़ जिंदा बचे हैं (मोर्टैलिटी रेट को ध्यान में रखकर)। 1985-2007 में जन्मे नए वोटर्स 4.83 करोड़ हैं। लेकिन पर्मानेंट आउटमाइग्रेशन (अन्य राज्यों में स्थाई रूप से बस जाना) 1.12 करोड़ है, जो मुख्य रूप से रोजगार, शादी और फैमिली मूवमेंट के कारण है।

फोटो साभार: रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

स्टडी ने 2011 की जनगणना, जीवित बचे लोगों की अनुमानित संख्या और अन्य सरकारी विभागों के डेटा का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट कहती है कि वोटर लिस्ट में इन्फ्लेशन की वजहें हैं- माइग्रेंट्स का नाम नहीं हटना, डुप्लिकेट एंट्रीज और अनडॉक्यूमेंटेड रजिस्ट्रेशन। स्टडी ने कंजर्वेटिव एस्टिमेट्स इस्तेमाल किए, जैसे माइग्रेशन रेट को 2011 के बाद नहीं बढ़ाया, ताकि आँकड़ा ज्यादा न लगे।

SIR के 65 लाख संदिग्ध नामों और आईआईएम स्टडी के 77 लाख के अंतर को जोड़कर देखें, तो साफ है कि समस्या गहरी है। SIR में 36 लाख लापता, 22 लाख मृत और 7 लाख डुप्लिकेट पाए गए, लेकिन स्टडी कहती है कि ये संख्या और बड़ी हो सकती है, क्योंकि माइग्रेशन को पूरी तरह अकाउंट नहीं किया गया।

उदाहरण के लिए, बिहार से हर साल लाखों लोग दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे राज्यों में जाते हैं, लेकिन उनका नाम लिस्ट से नहीं हटता। इससे डबल रजिस्ट्रेशन होता है और चुनाव में फ्रॉड का खतरा बढ़ता है।

फोटो साभार: रिसर्च पेपर का स्क्रीनशॉट

बिना आदेश के नहीं हटाए जाएँगे नाम

बता दें कि चुनाव आयोग ने SIR के 10 उद्देश्यों का जिक्र किया है, जिनमें सभी मतदाताओं की भागीदारी, कोई पात्र न छूटे, प्रवासियों और युवाओं को शामिल करना शामिल है। आयोग ने दावा किया कि हर शिकायत का व्यक्तिगत समाधान किया गया, चाहे वो प्रिंट, टीवी या सोशल मीडिया से आई हो। अब 1 अगस्त को ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल जारी होगा, जो सभी दलों को प्रिंट और डिजिटल फॉर्म में दिया जाएगा। CEO की वेबसाइट पर भी यह उपलब्ध होगा।

1 अगस्त से 1 सितंबर तक कोई भी व्यक्ति या दल फॉर्म भरकर नाम जोड़ने या हटाने की अपील कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई नाम ड्राफ्ट रोल से बिना नोटिस और ERO/AERO के स्पष्ट आदेश के नहीं हटाया जा सकता। अगर कोई असंतुष्ट होता है, तो वो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या CEO के पास अपील कर सकता है। अपील के लिए स्टैंडर्ड फॉर्म तैयार किया जा रहा है और वॉलंटियर्स को ट्रेनिंग दी जाएगी।

चुनाव आयोग ने SIR को एक बड़ा कदम बताया है, लेकिन अब तक कोई हार्ड स्टेप नहीं दिख रहा। जैसे, मृतकों और लापता वोटर्स को तुरंत हटाने के लिए कोई सख्त डेडलाइन नहीं है।

रिसर्च में सुझाव दिया गया है कि डेमोग्राफिक मॉडलिंग को इलेक्टोरल प्रशासन में शामिल किया जाए। राजनीतिक दलों ने भी SIR की सराहना की, लेकिन कुछ ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में BLO की पहुँच कम थी। विपक्षी दलों ने माँग की है कि ड्राफ्ट रोल में पारदर्शिता बरती जाए।

कुल मिलाकर SIR एक सकारात्मक कदम है, लेकिन आईआईएम स्टडी से साफ है कि बिहार की वोटर लिस्ट में सुधार की जरूरत और गहरी है। अगर 77 लाख फर्जी नाम रह गए, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। आयोग को अब माइग्रेशन डेटा को लिंक करने और Aadhaar जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। 1 अगस्त का ड्राफ्ट रोल देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि ये तय करेगा कि बिहार के लोकतंत्र में कितने ‘भूत’ वोटर्स बचे हैं।

बिहार में विदेशी फंडिंग के दम पर चल रहे अवैध मदरसे, नेपाल सीमा पर घुसपैठियों की भरमार: फर्जी कागजातों पर एडमिशन, बनाए जा रहे जिहादी; NHRC बोला- ले रहे एक्शन

बिहार में भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में चल रहे अवैध और बिना पंजीकरण वाले मदरसों के नेटवर्क का खुलासा किया है। मीडिया रिपोर्ट के सामने आते ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इसका संज्ञान लेते हुए कार्रवाई शुरूकर दी है। रिपोर्ट में इन मदरसों में जिहादी ट्रेनिंग, फर्जी पहचान पत्र, विदेशी फंडिंग और जाकिर नाइक के भड़काऊ वीडियो दिखाने जैसी गंभीर गतिविधियों का खुलासा हुआ है।

NHRC ने तुरंत लिया संज्ञान

NHRC के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने शनिवार (26 जुलाई 2025) को कहा कि आयोग ने रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है। उन्होंने रविवार (27 जुलाई 2025) को सोशल मीडिया पर बताया कि इन मदरसों में बांग्लादेशी घुसपैठियों को फर्जी भारतीय पहचान पत्र दिलवाए जा रहे हैं, बच्चों को ब्रेनवॉश कर कट्टरपंथी बनाया जा रहा है और हवाला के जरिए विदेशी फंडिंग हो रही है।

रिपोर्ट में क्या-क्या आया सामने?

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के कुछ मदरसों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। मुजफ्फरपुर जिले के ‘जामिया नूरिया मिराजुल उलूम’ मदरसे में एक शिक्षक ने कैमरे पर यह कबूल किया कि उन्हें हवाला के जरिए पैसे मिलते हैं और वहाँ बच्चों को ‘जिहादी सोच’ सिखाई जाती है।

वहीं, सीतामढ़ी में स्थित ‘मदरसा इस्लामिया महमूदिया’ बिना किसी पंजीकरण और सुविधा के टिन की छत के नीचे संचालित हो रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, इस मदरसे में बांग्लादेशी बच्चों को फर्जी पहचान पत्रों के माध्यम से दाखिला दिया जाता था।

इन संस्थानों में कट्टरपंथी मौलाना ज़ाकिर नाइक के वीडियो दिखाकर बच्चों में गैर-मुसलमानों के प्रति नफरत भरी विचारधारा भरी जा रही है। इसके अलावा, पढ़ाई में इस्तेमाल होने वाली पुस्तक ‘तालीम-उल-इस्लाम’ में गैर-मुसलमानों को ‘काफिर’ बताया गया है, जो इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने वाला माना जा रहा है।

वही जाँच में पता चला कि नेपाल की सीमा के भीतर भी ऐसे ही इस्लामी संस्थानों का बड़ा नेटवर्क मौजूद है, जो बिना किसी नियंत्रण के चल रहा है। वही इस नेटवर्क को विदेशों से भी फंडिंग मिलती है।

NHRC उठा रहा सख्त कदम

प्रियंक कानूनगो ने स्पष्ट किया है कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और NHRC इस पर कड़ी जाँच और उचित कार्रवाई कर रहा है। सरकार से भी इन मदरसों की सतर्कता से जाँच की माँग की गई है।

यह रिपोर्ट केवल बिहार या उससे सटे सीमावर्ती क्षेत्रों की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए सावधान करने वाली चेतावनी है कि किस तरह शिक्षा के नाम पर नफरत और आतंक की विचारधारा बच्चों के दिमाग में बोई जा रही है।

कौन थे राजेंद्र चोल, जिन्होंने कंबोडिया-इंडोनेशिया तक फहराई सनातन की विजय पताका: PM मोदी ने तमिलनाडु के जिस मंदिर में की पूजा, क्यों पड़ा गंगईकोंडा चोलपुरम उसका नाम

तमिलनाडु के अरियालुर जिले में बसे छोटे से गाँव गंगईकोंडा चोलपुरम में रविवार (27 जुलाई 2025) को एक भव्य समारोह हुआ। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती और उनकी दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 साल पूरे होने का उत्सव मनाया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा-अर्चना की, एक स्मारक सिक्का जारी किया और चोल वास्तुकला व शैव धर्म पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

यह आयोजन न केवल चोल साम्राज्य की समृद्ध विरासत को याद करने का मौका था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता था। आइए, गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, चोल वंश और राजेंद्र चोल की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

गंगईकोंडा चोलपुरम एक ऐतिहासिक नगरी

गंगईकोंडा चोलपुरम तमिलनाडु के अरियालुर जिले में जयकोंडम के पास एक छोटा सा गाँव है, जो कभी चोल साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। इसे 1025 ईस्वी में राजेंद्र चोल-प्रथम ने अपनी राजधानी बनाया और लगभग 250 वर्षों तक यह चोल साम्राज्य का केंद्र रहा।

इस नगरी का नाम गंगा नदी की विजय के प्रतीक के रूप में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘गंगा को जीतने वाले चोल की नगरी’। आज यह गाँव अपनी प्राचीन भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, खासकर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त बृहदेश्वर मंदिर के लिए।

चोल वास्तुकला का अनमोल रत्न है बृहदेश्वर मंदिर

गंगईकोंडा चोलपुरम के बृहदेश्वर मंदिर को गंगईकोंडा चोलेश्वरम मंदिर भी कहा जाता है। ये चोल वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण 1035 ईस्वी में राजेंद्र चोल-प्रथम ने करवाया था। यह मंदिर तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर से प्रेरित है, जिसे उनके पिता राजराजा चोल ने बनवाया था। हालाँकि गंगईकोंडा का मंदिर तंजावुर के मंदिर से छोटा है, लेकिन इसकी मूर्तिकला और बारीक नक्काशी इसे और भी खास बनाती है।

मंदिर की विशेषताएँ

वास्तुकला: मंदिर द्रविड़ शैली में निर्मित है और इसका आधार वर्गाकार है। इसका विमान (मंदिर का शिखर) 55 मीटर ऊँचा है, जो तंजावुर के मंदिर से 3 मीटर छोटा है। इतिहासकारों का मानना है कि राजेंद्र ने अपने पिता के मंदिर के प्रति सम्मान दिखाने के लिए इसे थोड़ा छोटा रखा। विमान का आकार थोड़ा अवतल (कर्व्ड) है, जो इसे तंजावुर के मंदिर से अलग बनाता है। इसमें आठ स्तर हैं, जिनमें पौराणिक कथाओं, शिव, विष्णु, और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और नक्काशी उकेरी गई हैं।

शिवलिंग: मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ 4 मीटर ऊँचा और 18 मीटर परिधि वाला एक विशाल शिवलिंग स्थापित है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है।

मूर्तिकला: मंदिर की दीवारों पर करीब 50 मूर्तियाँ और राहतें हैं, जिनमें नटराज, सरस्वती, और शिव द्वारा भक्त को माला पहनाने वाली मूर्ति सबसे प्रमुख हैं। एक विशेष मूर्ति में राजेंद्र चोल को छोटे रूप में दर्शाया गया है, जिसमें शिव और पार्वती उन्हें विजय की माला पहना रहे हैं।

नंदी मूर्ति: मंदिर के प्रांगण में एक विशाल नंदी (शिव का वाहन बैल) की मूर्ति है, जो गर्भगृह की ओर 200 मीटर की दूरी पर अक्षीय रूप से संरेखित है।

अन्य मंदिर और संरचनाएँ: मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर, गोपुरम और नौ ग्रहों की एकाश्म (मोनोलिथिक) मूर्तियाँ हैं। एक शेर के आकार का कुआँ भी 19वीं सदी में जोड़ा गया।

चोल गंगा झील: राजेंद्र ने गंगा नदी का जल उत्तर भारत से लाकर इस मंदिर के पास एक कृत्रिम झील में डाला, जिसे चोल गंगा झील कहा जाता है। इसे ‘विजय का तरल स्तंभ’ भी कहा गया।

यूनेस्को विश्व धरोहर

2004 में यूनेस्को ने गंगईकोंडा चोलपुरम के बृहदेश्वर मंदिर को तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर और दारासुरम के ऐरावतेश्वर मंदिर के साथ ‘ग्रेट लिविंग चोल मंदिर’ के रूप में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। ये मंदिर आज भी सक्रिय हैं और इनमें पूजा-अर्चना होती है। मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारक के रूप में देखरेख की जाती है।

मंदिर में उत्सव और पूजा

मंदिर में चार बार दैनिक पूजा होती है: कालसंधि (सुबह 8:30 बजे), उचिकालम (दोपहर 12:30 बजे), सायरक्षाई (शाम 6:00 बजे), और अर्धजामम (रात 7:30-8:00 बजे)। प्रमुख त्योहारों में शिवरात्रि (मासी माह, फरवरी-मार्च), ऐप्पसी पूर्णिमा (ऐप्पसी माह, अक्टूबर-नवंबर) और तिरुवदिराई (मार्गझी माह, दिसंबर-जनवरी) शामिल हैं। ऐप्पसी उत्सव के दौरान भगवान शिव की मूर्ति का चावल से अभिषेक किया जाता है।

दक्षिण भारत का स्वर्णिम युग था चोल युग

चोल वंश दक्षिण भारत का एक शक्तिशाली तमिल राजवंश था, जिसने 9वीं से 13वीं सदी तक दक्षिण भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य, आर्थिक, और सांस्कृतिक शक्ति का परचम लहराया। चोलों का मूल क्षेत्र कावेरी नदी की उपजाऊ घाटी था, लेकिन उनके साम्राज्य ने तुंगभद्रा नदी तक और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों को शामिल किया। आज के कंबोडिया, थाईलैंड, जावा-सुमात्रा जैसे द्वीपीय इलाकों यानी इंडोनेशिया और मलेशिया तक चोलों का प्रभुत्व रहा, जिसका असर आज भी देखने को मिलता है।

चोल वंश का इतिहास

शुरुआती चोल वंश: चोलों का उल्लेख तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिलता है। शुरुआती चोल छोटे क्षेत्रों तक सीमित थे, लेकिन 9वीं सदी में विजयालय चोल ने इसे पुनर्जीवित किया।

मध्यकालीन चोल: 9वीं सदी के मध्य से 13वीं सदी की शुरुआत तक चोल साम्राज्य अपने चरम पर था। इस दौरान राजराजा चोल प्रथम, राजेंद्र चोल प्रथम, राजाधिराज और कुलोत्तुंग चोल जैसे शासकों ने साम्राज्य का विस्तार किया।

साम्राज्य का विस्तार: चोलों ने पांड्य, चेर और श्रीलंका के अनुराधापुरम साम्राज्य को जीता। राजेंद्र चोल ने दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय, केदाह और तम्रलिंगम पर विजय प्राप्त की।

प्रशासनिक सुधार: चोलों ने ‘कुडवोलाई अमैप्पु’ नामक लोकतांत्रिक प्रणाली शुरू की, जिसमें गाँव स्तर पर चुनाव होते थे। जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में भी उनकी विशेषज्ञता थी।

सांस्कृतिक योगदान: चोलों ने कला, वास्तुकला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया। तमिल साहित्य में तिरुमुरई, कंबन रामायण और मुवर उला जैसे कार्य इस युग की देन हैं।

चोलों की अद्वितीय नौसैनिक शक्ति

चोल साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत उनकी नौसेना थी। राजराजा चोल ने इसकी नींव रखी, जिसे राजेंद्र ने और मजबूत किया। चोल नौसेना ने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अभियान चलाए। उनकी नौसैनिक शक्ति ने व्यापार और कूटनीति को बढ़ावा दिया, जिससे चोल साम्राज्य वैश्विक मंच पर एक शक्ति बन गया।

राजेंद्र चोल-प्रथम उर्फ गंगईकोंडा चोल

राजेंद्र चोल-प्रथम (971-1044 ईस्वी) चोल साम्राज्य के सबसे महान सम्राटों में से एक थे। उनके शासनकाल (1014-1044) में चोल साम्राज्य ने दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने चरम को छुआ।

प्रारंभिक जीवन और सत्ता में आगमन

जन्म और परिवार: राजेंद्र का जन्म 971 ईस्वी में तंजावुर में हुआ था। उनके पिता राजराजा चोल प्रथम और माता वनति (तिरिपुवाना मादेवियार) थीं। उनकी जन्म नक्षत्र तिरुवदिराई (अर्द्रा) थी। उनके कई भाई-बहन थे, जिनमें उनकी बहन कुंदवाई, चालुक्य राजा विमलादित्य की रानी थीं।

सह-शासक (को-रीजेंट): 1012 में राजेंद्र को उनके पिता ने सह-शासक नियुक्त किया। 1014 में राजराजा की मृत्यु के बाद राजेंद्र पूर्ण सम्राट बने। 1018 में उन्होंने अपने बेटे राजाधिराज को सह-शासक बनाया।

सैन्य विजय

राजेंद्र की सैन्य उपलब्धियाँ चोल साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक थीं। उनकी प्रमुख विजय इस प्रकार हैं-

दक्षिण भारत: राजेंद्र ने चेर, पांड्य और अनुराधापुरम (श्रीलंका) पर विजय प्राप्त की। 1017 में उन्होंने श्रीलंका के दक्षिणी भाग रुहुना को जीता और वहाँ के राजा महिंद V को बंदी बनाकर भारत लाए।

उत्तर भारत: 1019-1023 के बीच राजेंद्र ने गंगा नदी तक अभियान चलाया। उन्होंने कलिंग, बंगाल और पाल साम्राज्य को हराया। इस अभियान में उन्होंने पाल राजा महिपाल और चंद्र वंश के गोविंदचंद्र को परास्त किया। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने गंगईकोंडा चोलपुरम की स्थापना की और चोल गंगा झील बनवाई।

दक्षिण-पूर्व एशिया: 1023-1025 में राजेंद्र ने श्रीविजय (सुमात्रा), केदाह (मलेशिया), और तम्रलिंगम पर हमला किया। उन्होंने श्रीविजय के राजा संग्राम विजयतुंगवर्मन को बंदी बनाया। इस अभियान ने चोलों को दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार और प्रभाव का केंद्र बनाया।

मालदीव और लक्षद्वीप: 1018 में राजेंद्र ने मालदीव और लक्षद्वीप पर कब्जा किया, जिसे उन्होंने ‘मुन्निर पलंतिवु पन्निरायिरम’ (12,000 द्वीपों का समुद्र) नाम दिया।

सांस्कृतिक और प्रशासनिक योगदान

गंगईकोंडा चोलपुरम: राजेंद्र ने इस नई राजधानी की स्थापना की, जिसमें बृहदेश्वर मंदिर, चोल गंगा झील और कई अन्य मंदिर बनवाए। यह शहर व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।

शैव धर्म का प्रचार: राजेंद्र शैव धर्म के अनुयायी थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को भी प्रोत्साहन दिया। उन्होंने श्रीविजय में चूडामणि विहार बनवाने में मदद की।

जल प्रबंधन: राजेंद्र ने चोल गंगा झील और अन्य जलाशय बनवाए, जो सिंचाई और जल प्रबंधन के लिए उपयोगी थे। मधुरंतक वडवरु नहर भी उनके समय की देन है।

साहित्य और कला: राजेंद्र के शासनकाल में तमिल साहित्य और कला फली-फूली। मूवर उला और कालिंगत्तुपरानी जैसे साहित्यिक कार्य उनके समय में लिखे गए।

मृत्यु : राजेंद्र की मृत्यु 1044 में ब्रह्मदेसम (वर्तमान तिरुवन्नमलई जिला, तमिलनाडु) में हुई। उनकी रानी वीरमहादेवी ने उनके साथ सती प्रथा का पालन किया। उनके भाई मधुरंतक परकेसरी वेलन ने उनकी स्मृति में एक जलाशय बनवाया।

चोल साम्राज्य का पतन

13वीं सदी के अंत तक चोल साम्राज्य कमजोर होने लगा। पांड्यों ने चोलों को हराया और गंगईकोंडा चोलपुरम को नष्ट कर दिया। इसके अलावा, 1311 में दिल्ली सल्तनत के मलिक काफूर, 1314 में खुसरो खान और 1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के आक्रमणों ने शहर को और नुकसान पहुँचाया। हालाँकि बृहदेश्वर मंदिर किसी तरह बच गया। 1378 में विजयनगर साम्राज्य ने इस क्षेत्र को पुनः हिंदू शासकों के अधीन लाया और मंदिरों की मरम्मत की।

चोल विरासत का आधुनिक महत्व

चोल साम्राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत आज भी जीवित है। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर और तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोलों की स्थापत्य कला और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक हैं। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि चोलों ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बाँधा था। उनकी सरकार भी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विजन पर काम कर रही है।

चोलों से प्रेरणा लेता आधुनिक भारत

सांस्कृतिक संरक्षण: पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। विदेशों से 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ वापस लाई गई हैं, जिनमें 36 तमिलनाडु की हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा: पीएम ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र करते हुए कहा कि यह भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाया गया कदम है, जो चोलों की सैन्य शक्ति की याद दिलाता है।

मूर्तियाँ और स्मारक: तमिलनाडु में जल्द ही राजराजा चोल और राजेंद्र चोल की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी।

गंगईकोंडा चोलपुरम और राजेंद्र चोल की गाथा भारत के गौरवशाली इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। चोल साम्राज्य ने न केवल सैन्य और प्रशासनिक क्षेत्र में बल्कि कला, वास्तुकला, और साहित्य में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। गंगईकोंडा चोलपुरम का बृहदेश्वर मंदिर आज भी उस युग की भव्यता और शिल्प कौशल का प्रतीक है।

पीएम मोदी का यह दौरा न केवल चोल विरासत को सम्मान देने का अवसर था, बल्कि यह भारत की एकता और आधुनिक विकास के संकल्प को भी दर्शाता है। यह समारोह ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को साकार करता है और हमें अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की ओर बढ़ने का संदेश देता है।