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बिहारियों से घृणा, छठ से नफरत, हिंदी बोलने वाले ‘गुटखा अपराधी’: जानिए Bangla Pokkho को, जिसने मारा बिहारी छात्रों को, TMC से भी कनेक्शन

पश्चिम बंगाल में स्टाफ सिलेक्शन कमिशन जनरल ड्यूटी (SSC GD) का फिजिकल टेस्ट देने गए बिहार के दो युवकों के साथ मारपीट की गई है। वीडियो में एक आदमी इनके साथ बदसलूकी करते हुए कहता है, “बिहार के हो तो बंगाल में परीक्षा देने क्यों आए हो”। इसका वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। सोशल मीडिया से लेकर नेता तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आलोचना कर रहे हैं।

यह घटना पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी की बताई जा रही है। घटना कब की है, इसको लेकर अभी तक साफ नहीं हो पाया है। गुरुवार (26 सितंबर) को वीडियो सामने आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ममता बनर्जी को चिट्ठी लिखी। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने इसकी आलोचना की। छात्रों से मारपीट करने के मुख्य आरोपित रजत भट्टाचार्य और उसके साथी गिरिधारी रॉय को पकड़ लिया गया है।

इस घटना को लेकर बिहार पुलिस का कहना है कि अंकित यादव और उनका एक साथी सिलीगुड़ी में एक कमरे में सो रहे थे। उसी दौरान पश्चिम बंगाल के कुछ स्थानीय लोग इनके कमरे में घुसे और उन्हें जबरदस्ती उठा दिए। इनमें एक व्यक्ति बांग्ला भाषा में इनसे सवाल पूछता है और कहता है कि बिहार से हो तो बंगाल में परीक्षा देने क्यों आए हो। इस दौरान वे छात्रों से उनका डॉक्यूमेंट भी माँगते हैं।

हालाँकि, फाड़े जाने के डर से छात्र ने डॉक्यूमेंट दिखाने से मना कर दिया। इसके बाद उसको थप्पड़ मारा गया और गाली दी गई। इतना ही नहीं, इन लोगों ने इन छात्रों को जेल भेजने की भी धमकी दी। आखिरकार डर छात्र बिना परीक्षा में शामिल हुए ही तुरंत बिहार लौटने की बात कहता है। इसके बाद बंगाल के आरोपित उनसे उठक-बैठक कराते हैं और जल्दी बंगाल से निकलने की धमकी देते हैं।

पीली टी-शर्ट में दिख रहा एक व्यक्ति कहता है, “जब तुम लोग बांग्ला जानते नहीं हो तो क्यों दूसरे जगह आ गए हो।” इस पर एक छात्र कहता है कि वह फिजिकल देने आया, क्योंकि यहाँ सिलीगुड़ी में उसका सेंटर पड़ गया है। उसने कहा कि सिलीगुड़ी में उसका सेंटर पड़ने में उसकी कोई गलती नहीं है। इस पर वह व्यक्ति कहता है, “बंगाल के डोमिसाइल नहीं हो तो क्यों तुमने अप्लाई किया?”

पुलिस की पूछताछ में रजत भट्टाचार्य ने बताया, “बिहार और यूपी से नकली प्रमाणपत्र लेकर बिहार के युवक एसएससी परीक्षा के लिए आ रहे हैं और हमारे युवकों की नौकरियाँ छीन रहे हैं। हम बांग्ला पक्खो संगठन से हैं और हमें बताया गया था कि उनके पास नकली प्रमाणपत्र हैं। इसलिए हम उन्हें पकड़ने के लिए वहाँ गए थे।” दोनों आरोपित सिलीगुड़ी के ही रहने वाले हैं।

जानिए कट्टरपंथी संगठन ‘बांग्ला पक्खो’ के बारे में

बता दें कि ‘बांग्ला पक्खो’ एक कट्टरपंथी संगठन है। ‘बांग्ला पक्खो’ का अर्थ है बांग्ला पक्ष। यह बंगाल की सरकारी नौकरियों में 100 प्रतिशत और अन्य नौकरियों में 90 प्रतिशत बांग्ला भाषियों के लिए आरक्षण की माँग करता है। इसकी स्थापना गार्गा चटर्जी नाम के शख्स ने साल 2018 में की थी। कुछ रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस की यह एक इकाई है।

भाजपा की मुखर विरोधी इस संगठन ने पहले भी पश्चिम बंगाल में हिंदी में लिखे साइनबोर्ड को मिटाने का अभियान चलाया था। यह संगठन पश्चिम बंगाल में सिर्फ बंगाली भाषा की वकालत करता है। इसके साथ ही राज्य में हिंदी भाषियों के खिलाफ कई तरह की आपत्तिजनक पोस्टरबाजी करके उनके खिलाफ माहौल तैयार करता है। इस तरह के कई प्रयासों में उसकी संलिप्तता सामने आ चुकी है।

नवंबर 2023 में छठ महापर्व के दौरान यह संगठन हिंदी भाषी, खासकर बिहारी लोगों के खिलाफ जमकर पोस्टरबाजी की थी। इसमें लिखा था, “जय बांग्ला…जय बांग्ला…’ यानी बंगाल की जय हो, बंगाल की जय हो। ऐसे ही ‘पाहाड़ थेके सोमुद्रो… भूमि पुत्रो, भूमि पुत्रो…’ यानी ‘पहाड़ से समुद्र.. भूमिपुत्र, भूमिपुत्र…।’ आजकल पश्चिम बंगाल में चारों ओर इन्हीं नारों की गूंज है।

छठ पूजा का विरोध और ‘लव जिहाद’ के काउंटर में ‘गुटखा जिहाद’

उस दौरान इस संगठन के संस्थापक गार्गा चटर्जी ने राज्य सरकार, जिला प्रशासन और पुलिस को एक शिकायत पत्र दिया था, जिसमें लिखा था कि छठ पूजा के नाम पर गंगा घाटों, नदियों और तालाबों को दूषित किया जाता है। चटर्जी ने आगे लिखा था कि छठ पूजा के समय जो भोजपुरी या हिंदी गाने बजते हैं, उससे ध्वनि प्रदूषण होता है। इसलिए बंगाल में छठ बंद होना चाहिए। इसे रोकने के लिए नदियों और तालाबों के किनारे सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाने चाहिए।

अगस्त 2023 में गार्गा चटर्जी की टिप्पणी के साथ चलती ट्रेन से शूट किए गए एक वीडियो सामने आया था। इसमें बताया गया था कि कैसे दक्षिण 24-परगना जिले का मल्लिकपुर इलाका पिछले 10 सालों में ‘यूपी और बिहार के अपराधियों का अड्डा’ बन गया है। इतना ही नहीं, बांग्ला पक्खो ने भाजपा के ‘लव जिहाद’ को काउंटर करने के लिए ‘गुटखा जिहाद’ शब्द गढ़ा गया था।

बांग्ला पोक्खो बंगाली महिलाओं का हिंदी भाषी पुरुषों से शादी का भी विरोध करता है। इस संगठन ने अपने एक पोस्ट में कहा था कि वह ऐसे बंगाली पुरुषों को अधिक देखना चाहता है, जिनकी बीवियाँ हिंदी भाषी हों। इस संगठन ने बंगाली लड़कियों से अपील की थी कि वह ‘गुटखा पुरुषों’ के चंगुल में ना फँसे।

जनवरी 2020 में सिलीगुड़ी के प्रमुख चौराहों के नाम परिवर्तन पर आपत्ति जताई है। उसे शहर के चौराहों के नामों में ‘चौक’ शब्द स्वीकार नहीं था। उस दौरान संगठन ने कहा था कि ‘चौक’ की जगह ‘मोड़’ या ‘सरणी’ का उपयोग किया जाना चाहिए। ‘चौक’ बिहार व यूपी में प्रचलित हिंदी का शब्द है और यह वहाँ की संस्कृति का परिचायक है। बंगाल की बांग्ला संस्कृति के परिचायक ‘मोड़’ अथवा ‘सरणी’ है।

इसी तरह मार्च 2020 में कोलकाता से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में स्थित चंदननगर शहर के फाटकगोरा इलाके में रहने वाले सोमनाथ सिंह के घर पर ‘बांग्ला पक्खो’ के कई कट्टरपंथी पहुँच गए थे। उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के लिए उन्हें धमकी दी थी। इतना ही नहीं, अनीस सिंह नाम के एक अन्य हिंदी भाषी को भी प्रताड़ित किया था।

नौकरी की तलाश में पश्चिम बंगाल के रानीगंज पहुँचे मुकेश भगत ने एक लड़के ने अपने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि बांग्ला पक्खो के सदस्यों ने निवास प्रमाण पत्र में जालसाजी करने का आरोप लगाकर पुलिस को सौंप दिया। इसके कुछ दिन बाद बांग्ला पोक्खो ने अपने फेसबुक पेज पर भगत का एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें वह गार्गा चटर्जी से माफी माँगते दिख रहे थे।

बांग्ला पोक्खो के अनुसार, ‘हिंदी बेल्ट’ वह इलाका है, जहाँ हर कोई गुटखा खाता है, असभ्य और पिछड़ा है, शाकाहारी और भाजपा के मतदाता हैं। तब अपने फेसबुक पेज में बांग्ला पक्खो ने ‘हिंदी/उर्दू बेल्ट’ को ‘काऊ बेल्ट’, ‘बेबी फैक्ट्री बेल्ट’, ‘गुटखा बेल्ट’ और ‘कन्या भ्रूण हत्या बेल्ट’ जैसा नाम दिया था। हिंदी भाषियों के लिए ये लोग ‘गुटखा अपराधी’, ‘गुटखा-आतंकवादी’ या ‘गुटखा जोंटू (जानवर)’ कहते हैं।

कौन है गार्गा चटर्जी, जिसने बनाई है यह संस्था

गार्गा चटर्जी के पास हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री है। उन्होंने मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) से मस्तिष्क और संज्ञानात्मक विज्ञान, दोनों पर पोस्ट-डॉक्टरल शोध किया है। वह खुद को भाषाई कार्यकर्ता कहते हैं। उन्होंने साल 2017-18 के आसपास बंगाल की राजनीति में जातीय आयाम लाने में अहम भूमिका निभाई थी।

साल 2022 में असम के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप में गार्गा के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी। कोलकाता पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया था। इसके बाद गुवाहाटी में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया था।

तब राजनीति खेलते हुए गार्गा चटर्जी ने कहा था, “मैं पूरे भारत में बंगाल और बंगालियों के खिलाफ किए गए अत्याचारों के खिलाफ बहुत मुखर रहा हूँ, जिसमें NRC, CAA, डिटेंशन कैंप शामिल हैं। इसके चलते मुझे निशाना बनाया जा रहा है और यह सब भाजपा के इशारे पर हो रहा है।” गार्गा चटर्जी बांग्ला भाषियों के लिए भारतीय सेना में बंगाल रेजिमेंट बनाने की भी माँग करते रहे हैं।

UNSC में भारत की पक्की सदस्यता को UK का समर्थन, फ्रांस-अमेरिका-रूस पहले ही कह चुके शामिल करने की बात: चीन लगाता रहा है अड़ंगा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति (UNSC) में भारत की पक्की सदस्यता को ब्रिटेन का समर्थन हासिल हुआ है। ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में माँग उठाई है कि भारत को UNSC में जगह दी जाए। ब्रिटेन UNSC का स्थायी सदस्य है। इससे पहले फ्रांस समेत बाकी देश भी भारत की सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं।

वर्तमान में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का अधिवेशन चल रहा है। इसी में ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने अपने संबोधन के दौरान भारत को स्थायी सदस्य बनाए जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “मैं UNSC को लेकर आश्चर्य में हूँ। इसको बदलना पड़ेगा। ताकि यह ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व कर सके। हम यहाँ अफ़्रीकी देशों को स्थायी सदस्य के तौर पर देखना चाहेंगे।”

उन्होंने आगे कहा, “भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी को हम स्थायी सदस्य बनाना चाहेंगे। हम यहाँ के अस्थायी सदस्यों की संख्या भी बढ़ाना चाहेँगे। हम ब्रिटेन के काम करने के तरीके भी बदलेंगे। हम सुनेंगे ज्यादा और बोलेंगे कम ताकि पुरानी परंपरा बदले।”

ब्रिटिश प्रधानमंत्री से पहले फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी भारत का पक्ष लिया। उन्होंने कहा, “जब तक UNSC सदस्य देशों के निजी हितों की वजह से अटकी रहेगी, तब तक आगे बढ़ना मुश्किल होगा। क्या इससे बढ़िया को व्यवस्था है, हमें ये नहीं मालूम। ऐसे में UN को हो अधिक प्रभावी बनाते हैं। इसके लिए हमें इसमें प्रतिनिधित्व बढ़ाना पड़ेगा।”

फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने इसके बाद कहा, “फ्रांस UNSC के विस्तार का समर्थन करता है। जर्मनी, जापान, भारत और ब्राजील इसके स्थायी सदस्य होने चाहिए। इसी के साथ अफ्रीका के दो देश भी महाद्वीप के प्रतिनिधित्व के लिए होने चाहिए।”

ब्रिटिश और फ्रांसीसी नेताओं के अलावा चिली और पुर्तगाल के राष्ट्रध्यक्षों ने भी भारत को UNSC में स्थायी सदस्यता देने का समर्थन UNGA की 2024 की बैठक में किया है। भारत के स्थायी सदस्य बनने का समर्थन अमेरिका और रूस भी करता आया है।

UNSC क्या है, क्यों भारत चाहता है इसकी सदस्यता?

संयुक्त राष्ट्र की कई अलग-अलग शाखाएँ हैं। UNSC भी उनमें से एक है लेकिन यह सबसे महवपूर्ण मानी जाती है। UNSC का जिम्मा विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखना है। UNSC दुनिया भर में हो रही भूराजनीतिक गतिविधियों पर बड़े फैसले लेती है। इसमें 15 सदस्य होते हैं। इनमें से 5 सदस्य- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन स्थायी सदस्य हैं। बाकी 10 सदस्यों अस्थायी तौर पर शामिल किए जाते हैं। UNSC में कोई भी निर्णय पाँचों सदस्यों की सहमति के बिना नहीं हो सकता।

UNSC के महत्व के चलते भारत इसकी सदस्यता चाहता है। चीन UNSC के भीतर भारत को घुसने नहीं देना चाहता है। चीन को लगता है कि यदि भारत UNSC का सदस्य बन गया तो एशिया में उसके दबदबे पर असर पड़ेगा। वर्तमान में UNSC में एशिया से मात्र चीन ही इसका सदस्य है। इसमें अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी महाद्वीप का कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं है।

भारत लगातार माँग करता आया है कि उसे UNSC में जगह दी जाए। भारत का कहना है कि वह वर्तमान में विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, ऐसे में उसे महत्त्वपूर्ण UNSC से बाहर रखना UN के प्रभाव को ही कम कर रहा है।

मुस्लिम लड़की हिंदू बॉयफ्रेंड से मिलने आई तो आसिफ कुरैशी की अगुवाई में कट्टरपंथियों ने मिल कर किया पथराव: देहरादून पुलिस ने भाँजी लाठियाँ, दूसरे दिन भी बाजार बंद

उत्तराखंड में गुरुवार (26 सितंबर 2024) को एक मामूली घटना ने साम्प्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। मामला तब शुरू हुआ, जब एक मुस्लिम किशोरी अपने हिंदू प्रेमी से मिलने देहरादून आ गई। इस घटना के बाद, स्थानीय मुस्लिम और हिंदू समुदायों के बीच विवाद बढ़ा और पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा।

ये मामला एक मुस्लिम नाबालिग लड़की के देहरादून आने से जुड़ा है, जिसमें वो अपने हिंदू प्रेमी से मिलने आ गई थी। इस पूरी घटना में हिंदू संगठन और मुस्लिम कट्टरपंथियों की भीड़ भिड़ गई, तो पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा। इस दौरान अजाद समाज पार्टी के नेता आसिफ कुरैशी के नेतृत्व में आई मुस्लिम कट्टरपंथियों की भीड़ द्वारा किए गए पथराव में कई लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आ रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजय नाम का लड़का बदायूँ का रहने वाला है। लड़की भी बदायूँ की ही है। वो पहले लखनऊ गई, फिर वहाँ से देहरादून आ गई थी, जहाँ अजय उससे मिला। लेकिन वो वापस जाने को तैयार नहीं थी। अजय ने जब उसके साथ आरपीएफ चौकी को रिपोर्ट किया, तो बवाल शुरू हो गया। रिश्तेदारों और कट्टरपंथियों की भीड़ ने रेलवे स्टेशन के बाहर इकट्ठा होकर पुलिस चौकी को घेर लिया और पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस पथराव में कई लोग घायल हो गए। हालात बिगड़ते देख, हिंदू संगठन भी मौके पर पहुँचे और विवाद और बढ़ गया। पुलिस ने स्थिति को काबू में करने के लिए लाठीचार्ज किया।

देहरादून के एसएसपी अजय सिंह और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुँचकर स्थिति का जायजा लेते रहे। कट्टरपंथी मुस्लिमों के आक्रामक रूख को देखते हुए अजय को जीआरपी थाने में रखा गया, तो लड़की को आरपीएफ की चौकी में। देर रात, लड़की के परिजनों के आने पर उसे उन्हें सौंप दिया गया, जबकि अजय को पुलिस सुरक्षा के बीच उसके भाई के पास भेजा गया।

बताया जा रहा है कि हिंदुओं को डर था कि कहीं मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में अजय को जेल न भेज दिया जाए, जबकि उसके लड़की को खुद ही आरपीएफ के सुपुर्द किया था। ऐसे में अजय के समर्थन में भी वहाँ पहुँच गए। हिंदू संगठनों का आरोप था कि मुस्लिम कट्टरपंथी अजय को गलत तरीके से फँसाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अजय ने स्वेच्छा से लड़की को आरपीएफ के हवाले किया था और वह इस मामले में निर्दोष है। दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय के लोग इस घटना को सांप्रदायिक रंग देते हुए हिंसक हो उठे। पुलिस द्वारा मौके से पत्थर और घटनास्थल की वीडियोग्राफी कराई गई, जिन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है। पुलिस का कहना है कि मामले में जो भी दोषी पाए जाएँगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

ये पूरा विवाद गुरुवार की दोपहर से शुरू हुआ और आखिरकार रात के समय पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। वहीं, गुरुवार देर रात लड़की के परिजनों के पहुँचने पर लड़की को उनके हवाले कर दिया गया। इसके साथ ही पुलिस भारी सुरक्षा के बीच अजय को भी उसके भाई के पास छोड़ आई। अजय सिंह, दातागंज जिला बदायूँ-यूपी का रहने वाला है और सेलाकुई में नौकरी करता है। उससे मिलने आई किशोरी भी दातागंज की ही है। वह बिना बताए घर से आई थी।

इस पूरी घटना के दौरान एसएसपी अजय सिंह समेत वरीय पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। वहीं, रेलवे स्टेशन पर पत्थरबाजी की घटना की पुलिस ने वीडियोग्राफी कराई है। मौके से पुलिस ने पत्थर कब्जे में लिए हैं। इन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा जाएगा। पुलिस ने मौके से पत्थर और वीडियो फुटेज को कब्जे में लेकर थोड़े से जाँच के लिए भेज दिया है। पुलिस का कहना है कि इस मामले में उनकी ओर से केस दर्ज किया जा रहा है। मामले में जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

शुक्रवार को इस मामले ने एक नया मोड़ तब लिया, जब पुलिस ने बजरंग दल के नेता और स्थानीय व्यापारी विकास वर्मा को हिरासत में ले लिया। इसके विरोध में व्यापारियों ने पूरा बाजार बंद कर दिया और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि विकास वर्मा को जल्द से जल्द रिहा किया जाए। इस दौरान करीब 5000 हिंदुओं ने पलटन बाजार को बंद कर सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया और विकास वर्मा की रिहाई की माँग की।

उत्तराखंड पुलिस ने एक बयान जारी करते हुए कहा, “रेलवे स्टेशन पर हुई इस घटना में कानून और शांति व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश की गई है। इसके लिए संगीन धाराओं में केस दर्ज किया गया है, और दोषियों को चिह्नित किया जा रहा है।” पुलिस के अनुसार, पत्थरबाजी और हंगामे में 30 से 35 नामजद लोगों और 150 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

इस घटना के बाद देहरादून के कई हिस्सों में तनाव बना हुआ है। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए संवेदनशील इलाकों में भारी संख्या में जवान तैनात किए हैं। प्रशासन ने कहा है कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

डॉक्टर पर ईशनिंदा का आरोप लगा, पाकिस्तान की पुलिस ने कर दी हत्या: इस्लामी कट्टरपंथियों ने चूमे थे हाथ, अब कमिटी ने बाहर निकाला सच

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के उमरकोट में ईशनिंदा के आरोपित डॉक्टर शाहनवाज का पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर किया था। सिंध प्रान्त की मीरपुर ख़ास पुलिस ने झूठी कहानी गढ़ कर उसे मार दिया था जिसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनको हार पहनाए थे। सिंध सरकार की कमिटी ने अब खुलासा किया है कि यह एनकाउंटर पूरी तरह से फर्जी था और इसमें DIG स्तर तक के अधिकारी शामिल थे।

सिंध प्रांत के गृह मंत्री जियाउल हसन लंजर ने गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को डॉक्टर शाहनवाज के एनकाउंटर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लंजर ने बताया कि उन्होंने इस मामले में पुलिस की कारस्तानी की जाँच पर एक कमिटी गठित की थी। इसकी रिपोर्ट आ गई है। लंजर ने बताया कि कमिटी ने निर्विवाद रूप से यह माना है कि यह एनकाउंटर पहले से बनाई गई योजना के अनुसार किया गया। कमिटी ने इसके लिए घटना के CCTV फुटेज और गाड़ियों की लोकेशन का पता लगाया और इस निष्कर्ष पर पहुँची।

गृह मंत्री लंजर ने कहा है कि इस संबंध में 31 पेज की रिपोर्ट कमिटी ने सौंपी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टर शाहनवाज पर ईशनिंदा के आरोप लगने के बाद पुलिस ने उनकी तलाश चालू की। उमरकोट के SSP ने इस सम्बन्ध में एक टीम को कराची भेजा था। कराची के एक होटल से डॉक्टर शाहनवाज को उमरकोट पुलिस द्वारा उठाया गया और उन्हें सुरक्षा का वादा किया। हालाँकि, इसके बाद उन्हें रास्ते में ही मीरपुर ख़ास की पुलिस को सौंप दिया गया।

इसके बाद मीरपुर ख़ास पुलिस के SSP की गाड़ी में शाहनवाज को ले जाया गया। मीरपुर ख़ास की एक पुलिस यूनिट ने इसके बाद 19 सितम्बर, 2024 को डॉक्टर शाहनवाज की हत्या कर दी। पुलिस ने इसके बाद उनके एनकाउंटर का दावा किया। इसके बाद उनका पोस्टमार्टम करवाया गया। डॉक्टर शाहनवाज के शव के साथ भी रास्ते में इस्लामी कट्टरपंथियों ने बर्बरता की। उन्होंने शाहनवाज के शव को जला दिया था। हालाँकि, जिस वाहन में उनका शव ले जाया जा रहा था, उसके हिन्दू ड्राइवर ने किसी तरह उनका शव बचाया।

डॉक्टर शाहनवाज का फर्जी एनकाउंटर करने पर पुलिस के अधिकारियों के इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाथ चूमे थे और उन्हें हार पहनाए थे। अब इन सभी अधिकारियों पर सिंध की सरकार ने कार्रवाई की है। उन्हें इस मामले में निलंबित कर दिया गया है। इन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध सिंध सरकार ने FIR का आदेश दिया है।

गृह मंत्री लंजर ने कहा है कि उन्होंने इस संबंध में पीड़ित परिवार को पुलिसवालों के विरुद्ध FIR करने का मौक़ा दिया है। यदि वह FIR नहीं करते तो फिर सरकार FIR करेगी। वहीं पीड़ित परिवार के वकील ने कहा है कि वह जल्द इस संबंध में FIR करवाएँगे। पीड़ित परिवार ने इस मामले में न्यायिक जाँच की माँग की है।

बता दें कि डॉ शाहनवाज का मुद्दा 17 सितंबर से ही पाकिस्तान में गर्माया हुआ था। उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के लिए अपशब्द कहे। इस आरोप के बाद उनके कुछ सोशल मीडिया पोस्ट के स्क्रीनशॉट वायरल हुए और उमरकोट के डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर अस्पताल ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। साथ ही बयान में बताया कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया है और चूँकि उनके खिलाफ उमरकोट और अन्य जगहों पर प्रदर्शन हो रहे हैं अब अस्पताल को उनकी सेवा नहीं चाहिए।

18 सितंबर को इस बाबत कई कट्टरपंथी सड़क पर आ गए। प्रेस क्लप के सामने इकट्ठा होकर डॉक्टर शहनवाज की फौरन गिरफ्तारी की माँग उठाई। मामला 295 सी के तहत दर्ज कराते हुए खुलेआम सजा-ए-मौत माँगी। इस दौरान पुलिस अधिकारियों के वाहन में भी आग लगाई गई, उनपर पथराव भी हुआ और कई सार्वजनिक और सरकारी प्रॉपर्टी तोड़ी-फोड़ी गई। पुलिस ने हालात कंट्रोल करने के लिए डॉक्टर शहनवाज को पकड़ा तो, लेकिन सजा उन्हें कानून के मुताबिक नहीं दी बल्कि उनका फर्जी एनकाउंटर कर दिया।

बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान न तो मूर्ति विसर्जन… न ही छुट्टियाँ: इस्लामी कट्टरपंथियों ने धमकी देकर कहा – ‘पंडालों पर लिखनी होंगी हिंदुस्तान विरोधी बातें’

बांग्लादेश में दुर्गा पूजा को लेकर हिंदू समुदाय के लिए इस साल हालात काफी तनावपूर्ण हैं। कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने दुर्गा पूजा के आयोजनों के खिलाफ धमकियाँ दी हैं और कहा है कि पूजा के दौरान मूर्ति विसर्जन, छुट्टियाँ और कोई भी धार्मिक कार्यक्रम नहीं होने चाहिए। इस्लामी संगठन ‘इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता’ ने सरकार से साफ तौर पर कहा है कि अगर दुर्गा पूजा के दौरान छुट्टियाँ रद्द नहीं की गईं और मूर्ति विसर्जन जैसी गतिविधियों को रोका नहीं गया, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में इस कट्टरपंथी ग्रुप ने ढाका के सेक्टर 13 में एक मार्च निकाला, जिसमें हिंदुओं द्वारा खेल के मैदान के उपयोग का विरोध किया गया, जो सालों से उस स्थान पर दुर्गा पूजा मनाते आ रहे हैं। इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता नामक संगठन ने विरोध प्रदर्शन किया, हाथों में बांग्ला में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था, “सड़कें बंद करके कहीं भी पूजा नहीं की जाएगी, मूर्ति विसर्जन से जल को प्रदूषित नहीं किया जाएगा, मूर्तियों की पूजा नहीं की जाएगी”।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता’ की तरफ से प्रदर्शन कर रहे लोगों ने 16 सूत्रीय माँगों वाली तख्तियाँ भी पकड़ी हुई थी, जिसमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान का हवाला देते हुए पूजा-अर्चना और मूर्ति विसर्जन के सार्वजनिक प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई है। उनकी माँगों में धार्मिक आयोजनों के लिए सड़क बंद करने और त्योहारों के खर्चों के लिए सरकारी राहत कोष के इस्तेमाल पर रोक लगाना भी शामिल है।

इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता का तर्क है कि चूँकि हिंदुओं की आबादी यहाँ दो प्रतिशत से भी कम है, इसलिए दुर्गा पूजा के लिए सार्वजनिक अवकाश नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम बहुसंख्यकों का जीवन प्रभावित होता है। उनकी माँगों में “बांग्लादेश में कई विशेष भूमि पर कब्जा करके बनाए गए” मंदिरों को हटाना भी शामिल है।

यही नहीं, इस संगठन की एक और माँग भी है, जिसमें कहा गया है, “चूँकि भारत बांग्लादेश का राष्ट्रीय दुश्मन है, इसलिए बांग्लादेश के हिंदू नागरिकों को भी भारत विरोधी होना चाहिए। इसलिए पंडालों-मंदिरों में भारत विरोधी बैनर और भारत विरोधी नारे लगाए जाने चाहिए।” इन घटनाओं से हिंदू समुदाय में चिंता बढ़ रही है, जो अत्यधिक तनाव के बीच दुर्गा पूजा मनाने की तैयारी कर रहा है।

बता दें कि पिछली शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद से समुदाय पर हमलों में वृद्धि हुई है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले प्रशासन द्वारा सुरक्षा के आश्वासन के बावजूद स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। मंदिरों में तोड़फोड़ और मूर्तियों को नष्ट करने की खबरों ने विशेषकर खुलना जैसे जिलों में, जिसने चिंता को और बढ़ा दिया है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में दुर्गा पूजा का आयोजन हर साल बड़े स्तर पर होता है, जिसमें हिंदू समुदाय पूरे उत्साह से भाग लेता है। दुर्गा पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है और बांग्लादेश में करीब 8 प्रतिशत हिंदू आबादी इसे मनाती है। लेकिन इस साल ‘इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता’ जैसे कट्टरपंथी समूहों ने इस त्योहार के खिलाफ चेतावनी देकर हिंदू समुदाय को डर और चिंता में डाल दिया है। इन संगठनों का कहना है कि बांग्लादेश एक इस्लामी देश है और यहां गैर-इस्लामी त्योहारों को सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

यह पहली बार नहीं है जब बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान तनाव का माहौल बना है। पिछले कुछ वर्षों में भी दुर्गा पूजा के समय हिंदू समुदाय को इस तरह की धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ा है। 2021 में दुर्गा पूजा के दौरान हिंसा की घटनाएँ सामने आई थीं, जब कट्टरपंथियों ने कई पूजा पंडालों और हिंदू मंदिरों पर हमले किए थे। इन हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की आलोचना हुई थी, और सरकार को धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की माँग की गई थी।

हिन्दू मंदिर में घुसा यासीन, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी, हिन्दुओं ने पकड़ा: अम्मी बोली- मेरा बेटा दिमाग से कमजोर, बांग्लादेश का मामला

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से हिन्दुओं पर अत्याचार जारी हैं। बांग्लादेश के मैमेनसिंह जिले दुर्गा पूजा से कुछ दिन पहले ही एक इस्लामी कट्टरपंथी ने हिन्दू देवी दुर्गा समेत कई मूर्ति क्षतिग्रस्त कर दीं। उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों में तोड़फोड़ करने वाले इस कट्टरपंथी का नाम यासीन मिया है। यासीन की उम्र 22 वर्ष है और पुलिस ने उसको तलाश कर उसे गुरुवार (26 सितम्बर) को गिरफ्तार कर लिया है। उसने जिन मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किया है, वह अभी तैयार नहीं की जा सकीं थी।

यासीन मिया बुधवार (25 सितम्बर, 2024) को मैमेनसिंह जिले के गौरीपुर शहर में बने एक मंदिर में घुस गया और पिछले लगभग 20 दिनों से तैयार की जा रहीं हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों में तोड़फोड़ करना चालू कर दिया। उसने मूर्तियों को उठा कर ले जाने की कोशिश की। इसी दौरान उस पर डॉली नाम की एक हिन्दू महिला की नजर पड़ गई।

हिन्दू महिला ने यासीन को देख कर शोर मचाया, इसी दौरान आसपास मौजूद दो स्थानीय हिन्दू युवक आ गए और यासीन को पकड़ लिया। इसके बाद हिन्दुओं ने मौके पर पुलिस को बुला लिया। यासीन को पुलिस को सौंप दिया गया है। यासीन ने यह तोड़फोड़ गौरीपुर के गोबिन्दाज्यू मंदिर में की।

यासीन ने जिन मूर्तियों में तोड़फोड़ की है वह लगभग तैयार हो चुकीं थी और उन्हें 9 अक्टूबर, 2024 से चालू होने वाली दुर्गा पूजा में इस्तेमाल किया जाना था। इन मूर्तियों को केवल रंगना ही बाकी रह गया था। यासीन की तोड़फोड़ के कारण पूजा में बड़ा व्यवधान पड़ गया है।

यासीन को पुलिस गिरफ्तार करके उससे पूछताछ कर रही है। वह भी मैमेनसिंह जिला का ही रहने वाला है। उसकी अम्मी ने दावा किया है कि यासीन मानसिक रूप से विक्षिप्त है। पुलिस ने उसके खिलाफ हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए मुकदमा भी दर्ज कर लिया है।

इस मामले पर बात करते हुए बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद (गौरीपुर उपजिला) के अध्यक्ष ने कहा, “सभी मूर्तियाँ लगभग टूट गई हैं। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों किया गया। मैंने अपने जीवन में ऐसी घटना पहले कभी नहीं देखी।”

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमला

शेख हसीना को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के पद से हटाए जाने के बाद से हिंदू मंदिरों, दुकानों और व्यवसायों पर कम से कम 205 हमले हो चुके हैं। ऑपइंडिया ने इससे पहले बताया था कि कैसे खुलना शहर के सोनाडांगा क्षेत्र में ‘ईशनिंदा’ के आरोप में उत्सव मंडल नामक एक हिंदू लड़के को मुस्लिम भीड़ ने पीट-पीटकर लगभग मार डाला था।

हमने यह भी बताया था कि कैसे मुस्लिम छात्रों ने 60 हिंदू शिक्षकों, प्रोफेसरों और सरकारी अधिकारियों को अपने पदों से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर, असद नूर ने हाल ही में खुलासा किया है कि अल्पसंख्यक समुदाय को अब ‘जमात-ए-इस्लामी’ में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। 6 सितंबर को, बांग्लादेश के चटगाँव शहर के कदम मुबारक इलाके में भगवान गणेश की मूर्ति ले जा रहे हिंदू भक्तों के जुलूस पर हमला किया गया था।

‘मेरे अब्बू कलेक्टर के साथ उठते-बैठते हैं’: उदयपुर के कॉलेज में महिला प्रोफेसर को धमका रहा था MBA का छात्र मोहम्मद कैफ, क्लास में थूक कर निकला

राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के MBA कॉलेज का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें मोहम्मद कैफ नाम का एक छात्र महिला प्रोफेसर को धमकी दे रहा है। प्रोफेसर को धमकाते हुए उसने कहा कि उसके अब्बू कलेक्टर के साथ उठते-बैठते हैं और वो चाहे तो ऐसे चार कॉलेज बना सकते हैं। इसके बाद वह प्रोफेसर को धमकाते हुए क्लास में थूक कर चला गया।

दरअसल, मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के FMM कॉलेज में MBA फर्स्ट ईयर के फर्स्ट सेमेस्टर की क्लास चल रही थी। महिला प्रोफेसर सोनू नागौरी क्लास में पढ़ा रही थीं। इसी दौरान मोहम्मद कैफ नाम का छात्र करीब 40 मिनट लेट से क्लास में घुस आया। उसने क्लास में घुसने के लिए प्रोफेसर से अनुमति भी नहीं ली। देर से आने पर महिला प्रोफेसर ने मोहम्मद कैफ को टोका तो वह भड़क गया।

वह प्रोफेसर के पास जाकर उनसे बहस करने लगा। बहस के दौरान उसने महिला प्रोफेसर को धमकी भी दी। उसने कहा, “मेरे पिता चाहें तो ऐसे चार कॉलेज और बना सकते हैं। मेरे पिता कलेक्टर के साथ उठते-बैठते हैं। पैसों या किसी चीज की कोई कमी नहीं है। यहाँ पढ़कर मैं 20-25 हजार की नौकरी करूँगा क्या?” प्रोफेसर ने बदतमीजी करने से मना किया तो वह क्लास में थूक कर चला गया।

क्लास में बैठे एक छात्र ने इसका विडियो बना लिया और सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। प्रोफेसर सोनू नागौरी ने घटना की शिकायत कॉलेज की डायरेक्टर डॉक्टर मीरा माथुर से की। इसके बाद मीरा ने मोहम्मद कैफ को निलंबित करते हुए उसके खिलाफ प्रतापनगर थाने में रिपोर्ट दी है। पुलिस का कहना है कि जाँच कमिटी की रिपोर्ट मिलने के बाद आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

वहीं, एबीवीपी के महानगर मंत्री पुष्पेन्द्र सिंह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर यूनिवर्सिटी के कुलपति से मुलाकात की और उनसे मोहम्मद कैफ को तुरंत निष्कासित करने की माँग की है। मामले की जाँच के लिए प्रोफेसर एसवीएस भानावत, प्रोफेसर हनुमान प्रसाद, डॉक्टर राजश्री चौधरी और डॉक्टर गरिमा मिश्रा की सदस्यता में एक कमेटी बनाई गई है। यह कमिटी सात दिन में रिपोर्ट देगी।

देश के 25 हाई कोर्ट में 749 जज, लेकिन संपत्ति का ब्यौरा केवल 98 का मौजूद: RTI पर जवाब- हमें इसमें नहीं दिखता कोई ‘जनहित’

मोदी सरकार 2.0 के अंतिम दिनों में देश के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति का ब्यौरा अनिवार्य रूप से सार्वजनिक करने को लेकर नियम बनाने की बात कही गई थी। इस संबंध में दिवंगत राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति को सरकार ने फरवरी, 2024 में नियम बनाने की जानकारी दी थी।

देश में वर्तमान में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों का अपनी संपत्ति का ब्यौरा जनता के सामने रखना अनिवार्य नहीं है। इसी कड़ी में एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में हाई कोर्ट के लगभग 87% जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। देश के सुप्रीम कोर्ट के जजों का संपत्ति का ब्यौरा भी सार्वजनिक नहीं है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी दी गई थी कि यहाँ सेवाएँ देने वाले 27 जजों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन जजों के नाम बताए थे लेकिन संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक पटल पर नहीं रखा गया था।

क्या बताती है रिपोर्ट?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में देश के अलग-अलग 25 हाई कोर्ट में 749 जज सेवाएँ दे रहे हैं। इनमें से मात्र 98 की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक तौर पर मौजूद है। इन 98 जजों की संपत्ति का ब्यौरा उन हाई कोर्ट की वेबसाइट पर डाला गया है जहाँ यह वर्तमान में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली हाई कोर्ट के 39 में से 11, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 55 में से 31, हिमाचल प्रदेश के 12 में से 10 और केरल के 39 में से 37 जजों की अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक पटल पर रखा गया है। इनके अलावा मद्रास हाई कोर्ट के 62 में से 5, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 17 में से 2 और कर्नाटक हाई कोर्ट के 50 में से 2 जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक किया गया है।

रिपोर्ट बताती है कि देश के बाकी 18 हाई कोर्ट के एक भी जज की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसमें जजों की सबसे बड़ी संख्या वाले इलाहाबाद और बॉम्बे हाई कोर्ट भी शामिल हैं। रिपोर्ट का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि किसी भी हाई कोर्ट के 100% जजों की संपत्ति सार्वजनिक नहीं की गई है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति का का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं है, उन्हें RTI भी भेजी गई है। RTI के जवाब में अधिकांश हाई कोर्ट ने जजों की संपत्ति का खुलासा ना करने को लकर अलग-अलग कारण बताए हैं।

जहाँ बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि वह RTI की परिभाषा के तहत नहीं आता तो वहीं उत्तराखंड हाई कोर्ट ने जजों की संपत्ति का ब्यौरा RTI के तहत लाने पर ऐतराज जताया है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने कहा है कि उसे जजों की संपत्ति घोषित करने में कोई ‘जनहित’ नहीं दिखाई पड़ता। अन्य हाई कोर्ट ने भी कमोबेश ऐसे ही जवाब दिए हैं।

जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने को लेकर अभी क्या नियम?

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट बताती है कि उसकी एक फुल बेंच ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया था कि प्रत्येक जज को अपनी संपत्ति का ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को देना होगा। इसके अलावा उन्हें किसी बड़ी खरीद-फरोख्त का ब्यौरा भी देना होगा। हालाँकि, यह जानकारी वेबसाइट पर डाल कर सार्वजनिक करना उनकी मर्जी की बात होगी।

जिस निर्णय की सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर बात की गई है, वह वर्ष 1997 में लिया गया था। इस दौरान कहा गया था कि जजों को अपने घरों और बाकी संपत्तियों की जानकारी चीफ जस्टिस को देनी होगी। इसमें उनके पति/पत्नी और उन पर आश्रित लोगों की संपत्ति का ब्यौरा भी होता।

संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर अपलोड कर उसे सार्वजनिक करने को लेकर 2009 में सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच ने एक और निर्णय लिया था। कहा गया था कि सभी जज अपनी संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर डालेंगे, लेकिन कहा गया था कि यह जजों की स्वेच्छा पर निर्भर होगा।

केंद्र सरकार ने उठाए हैं कदम

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने को लेकर अभी कोई कानून नहीं है। यह पूरी तरह से जज पर निर्भर है कि वह अपनी संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर अपलोड करें। इस संबंध में केंद्र सरकार कानून बनाने को लेकर कदम बढ़ा चुकी है।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों में कानून मंत्रालय ने राज्यसभा की एक कमिटी को यह जानकारी दी थी कि वह जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने सबंधित नियम बना रही है। यह जवाब इस कमिटी की रिपोर्ट पर दिया गया था। कमिटी ने अगस्त, 2023 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

30 सदस्यों वाली इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया था कि आखिर नेता और अफसर ही क्यों बल्कि जजों को भी अपनी संपत्ति जनता के सामने रखनी चाहिए। कमिटी का कहना था कि इससे जनता का व्यवस्था पर विश्वास बढ़ाने में सहायता मिलेगी।

यह जानकारी भी सामने आई है कि केंद्र सरकार संपत्ति सार्वजनिक करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट से सलाह मशविरा कर रही है। अभी तक इस संबंध में कोई नियम सामने नहीं आए हैं। केंद्र सरकार अब आगे इस पर क्या एक्शन लेती है और न्यायपालिका का इस पर क्या रुख होता है, यह देखने वाला होगा।

हाई कोर्ट जजों पर लगे हैं भ्रष्टाचार के आरोप

देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति के सार्वजनिक किए जाने की माँग लम्बे समय से उठती रही है। तर्क दिया जाता रहा है कि जज भी एक सार्वजनिक पद है और ऐसे में उसकी शुचिता अनिवार्य है। पूर्व में भी हाई कोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगते आए हैं।

2008 के ऐसे ही एक मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की पूर्व जज निर्मला यादव पर ₹15 लाख कि रिश्वत लेने के आरोप लगे थे। या ₹15 लाख की रिश्वत एक जमीनी विवाद में फैसला दिए जाने को लेकर लगाए गए थे। इस रिश्वत से भरा हुआ एक बैग निर्मला यादव के घर भेजा जाना था लेकिन गलती से यह दूसरे जज के पास पहुँच गया और भेद खुल गया। वर्तमान में इस मामले की सुनवाई अंतिम चरण में है।

इसी तरह के एक और मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज एसएन शुक्ला और उनकी पत्नी पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में भी CBI जाँच और मुकदमा चल रहा है। एक अन्य मामले में मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मार्कन्डेय काटजू ने एक जज के भ्रष्ट होने की बात कही थी।

उस अदनान को कोर्ट ने दी जमानत, जिसने ज्ञानवापी सर्वे का आदेश देने वाले जज को ‘काफिर’ बता हलाल करने की कही थी बात

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित विशेष एनआईए कोर्ट ने अदनान खान नाम के इस्लामी कट्टरपंथी को जमानत दे दी, जिसने जज रवि कुमार दिवाकर को जान से मारने की धमकी दी थी। यही नहीं, जज की तस्वीर पोस्ट करते हुए उसने जज को काफिर कह कर संबोधित किया था और कहा था कि ऐसे लोगों का खून हलाल हैं, जो आपके ‘दीन’ के खिलाफ है। जज दिवाकर ने 2022 में ज्ञानवापी ढाँचे का सर्वे कराने का आदेश दिया था।

इस मामले में अदनान खान को एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने 4 जून 2024 को गिरफ्तार किया था। उस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 115, 506 और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

एफआईआर के मुताबिक, अदनान ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर जज रवि कुमार दिवाकर की एक फोटो पोस्ट की थी, जिसमें उनके चेहरे के ऊपर लाल रंग से “काफ़िर” लिखा हुआ था। साथ ही कैप्शन में लिखा था, “THE KAFIRS BLOOD IS HALAL FOR YOU THOSE WHO FIGHT AGAINST YOUR DEEN”। यह पोस्ट देखने के बाद यूपी पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और अदनान खान को हिरासत में लिया था।

कोर्ट में पेश की गई एफआईआर में कहा गया है कि अदनान की इस पोस्ट को कई लोगों ने देखा, जिससे उनकी विचारधारा से जुड़े लोगों को जज की हत्या के लिए प्रेरित किया गया। इसके साथ ही यह पोस्ट धार्मिक आधार पर वर्गों के बीच वैमनस्य और नफरत फैलाने के उद्देश्य से की गई थी। अदनान के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल की कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है और जिन धाराओं के तहत उन पर मामला दर्ज किया गया है, वे सात साल से कम सजा वाली हैं। इसके अलावा, अदनान जून 2024 से जेल में बंद था और इस दौरान अभियोजन पक्ष ने कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया जो अदनान के खिलाफ किसी बड़ी साजिश को साबित कर सके।

विशेष एनआईए जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदनान को जमानत दे दी। जज ने अपने फैसले में कहा कि जिन धाराओं के तहत अदनान पर मुकदमा चल रहा है, उनकी सजा सात साल से कम है और अभियोजन पक्ष ने अदनान के किसी पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को साबित नहीं किया है। जज ने यह भी कहा कि अदनान को पहले से ही काफी समय से जेल में रखा गया है और इस आधार पर उसे जमानत दी जाती है।

बता दें कि जज रवि कुमार दिवाकर ने ज्ञानवापी ढाँचे का सर्वे कराने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद उन्हें कई बार धमकियाँ मिल चुकी हैं। उन्होंने इस साल की शुरुआत में शासन को पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा बढ़ाने की माँग की थी और मौजूदा सुरक्षा इंतजामों को ‘अपर्याप्त’ करार दिया था। कोर्ट का मानना है कि अदनान खान पर लगे आरोप गंभीर हैं, लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा पर्याप्त सबूत न होने की वजह से जमानत दी जा रही है।

जला दी गई थी फातिमा मस्जिद, आरोप लगा था मिट्ठन सिंह और जॉनी कुमार पर… दिल्ली दंगों के केस में पिता-पुत्र कोर्ट से बाइज्जत बरी

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने साल 2020 के दिल्ली विरोधी दंगों के दौरान एक मस्जिद और आसपास के घरों में आग लगाने के आरोपित पिता-पुत्र को बरी कर दिया है। कोर्ट ने इसमें आरोपित पिता मिट्ठन सिंह और बेटे जॉनी कुमार को संदेह का लाभ दिया। मोहम्मद मुनाजिर नामक के एक व्यक्ति ने दोनों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।

कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला ने दोनों को बरी करते हुए कहा कि सभी पीड़ित या सार्वजनिक गवाह दोनों आरोपितों की पहचान से मुकर गए थे। सभी ने इन दोनों पिता-पुत्र को दंगाइयों की भीड़ के बीच देखने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दंगाइयों की भीड़ के बीच अनुमान लगाना सही नहीं है।

कोर्ट ने आगे कहा, “कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि ऐसे बयान दोनों आरोपियों के खिलाफ पूर्व-निर्धारित मानसिकता के साथ दिए गए थे या तैयार किए गए थे, जो पहले से ही 05.03.2020 से पुलिस हिरासत में थे।” इसके बाद कोर्ट ने कहा कि दोनों संदेह के लाभ के हकदार हैं और इस आधार पर कोर्ट ने दोनों को इस मामले में बरी कर दिया।

मुनाजिर ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि फातिमा मस्जिद से नमाज पढ़ करके वह अपने घर लौट रहा था। उसी समय उसने अपनी गली में भीड़ देखी थी। उस दौरान भीड़ ने फातिमा मस्जिद के शीशे तोड़कर उसमें आग लगा दी। इसके बाद आसपास के घरों में भी आग लगा दी थी। उसने यह भी आरोप लगाया था कि उसके घर पर पत्थर और गैस सिलेंडर फेंके जा रहे थे और गोलियों की आवाजें आ रही थीं।

मुनाजिर ने आरोप लगाया था कि उसका घर पूरी तरह से जला दिया गया। इसके साथ ही उसने यह भी क हा था कि उसके घर से रखे सोने के गहने और 1,50,000 रुपए नकद भी लूट लिए गए थे। शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली और उसमें मिट्ठन और उसके बेटे जौनी कुमार को नामजद अभियुक्त बनाया। इसमें अज्ञात लोगों को भी शामिल बताया गया था।

इसके बाद 20 दिसंबर 2021 को दोनों पिता-पुत्र के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा करना), 148 (घातक हथियार से लैस होकर दंगा करना), 392 (डकैती), 436 (घर या अन्य इमारत को नष्ट करने के इरादे से आग या विस्फोटक पदार्थों से उत्पात मचाना) और 149 (गैरकानूनी सभा करना) के तहत आरोप तय किए गए थे। हालाँकि, बाप-बेटे की इस जोड़ी ने खुद को निर्दोष बताया था।