सोशल मीडिया पर वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी जहाँ मुस्लिम पक्ष का नैरेटिव फैलाने में जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं वहीं बीबीसी ने प्रयास किया कि मामले से मजहबी एंगल बिलकुल दूर ही रखें।
हकीकत ये है कि योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा उठाया जरूर था लेकिन उन्होंने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया ही नहीं। न उन्होंने पीएम को लेकर ऐसी भाषा बोली है।
बंगाल में चिकन पैटीज बेचने वाले रियाजुल के लिए वामपंथी आवाज उठा रहे हैं लेकिन उनके लिए संदेशखाली के गवाह भोला घोष की आपबीती चर्चा करने का विषय नहीं है।
आरफा को कभी भी हलाला, तीन तलाक जैसे मुद्दे विरोध के लायक नहीं लगे, उन्हें दिक्कत हुई तो राम मंदिर से, वहाँ फहराते केसरिया झंडे से और भगवा कपड़ों में वहाँ पहुँचे भक्तों से।