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दिल्ली ब्लास्ट से जाँच के घेरे में फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी, जानिए कौन है इसका चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी

दिल्ली में लाल किले के सामने मंगलवार (10 नवंबर 2025) को बड़ा धमाका हुआ, जिससे पूरा देश दहल गया। मिनटों में जाँच एजेंसियाँ मौके पर पहुँचीं और उस ब्लास्ट की जाँच शुरू की जिसमें कम से कम 13 लोगों की जान गई।

जल्दी ही दिल्ली लाल किला ब्लास्ट और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का लिंक सामने आया, क्योंकि धमाका करने वाला आतंकवादी उन तीन मेडिकल डॉक्टर्स का साथी था जो यूनिवर्सिटी से जुड़े थे और हरियाणा पुलिस व जम्मू-कश्मीर पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन में गिरफ्तार हुए थे। पुलिस ने दिल्ली ब्लास्ट से कुछ घंटे पहले गिरफ्तार डॉक्टर्स से जुड़े ठिकानों से 2,900 किलो से ज्यादा विस्फोटक बरामद किए थे।

यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रो (डॉ) भूपिंदर कौर ने आखिरकार बयान दिया कि यूनिवर्सिटी का पकड़े गए टेरर मॉड्यूल से कोई लिंक नहीं है, लेकिन यूनिवर्सिटी के चांसलर और फाउंडर जवाद अहमद सिद्दीकी चुप रहे। हैरानी की बात है कि सिद्दीकी का डिजिटल फुटप्रिंट लगभग नहीं है।

ऑपइंडिया ने चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी पर उपलब्ध जानकारी खँगाली और कुछ परेशान करने वाला इतिहास मिला। उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल पर ज्यादा जानकारी नहीं है। ‘अबाउट’ सेक्शन में लिखा है, ‘मैनेजिंग ट्रस्टी: अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट 1995 से अब तक, चांसलर: अल-फलाह यूनिवर्सिटी, फरीदाबाद 2014 से अब तक, मैनेजिंग डायरेक्टर: अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड 1996 से अब तक।’

सोर्स: लिंक्डइन

ऑपइंडिया को मिल्ली गजट की जुलाई 2000 की रिपोर्ट में लिखा मिला कि जवाद अहमद सिद्दीकी नाम का शख्स अपने दो भाइयों के साथ तिहाड़ जेल में था क्योंकि अल-फलाह इन्वेस्टमेंट लिमिटेड में निवेशकों को ठगा था। कंपनी की जानकारी देखी तो पता चला कि वो 1992 में रजिस्टर्ड हुई और स्टेटस ‘स्ट्राइक ऑफ’ है, यानी कंपनी बंद हो चुकी है।

सोर्स: जौबाकॉर्प

जौबाकॉर्प पर उपलब्ध जानकारी से पता चला कि कंपनी का सिर्फ एक डायरेक्टर था, जवाद अहमद सिद्दीकी।

सोर्स: जौबाकॉर्प

सिद्दीकी के पुराने डायरेक्टोरियल एसोसिएशन से अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड का लिंक मिला। सिद्दीकी मार्च 2019 तक इस कंपनी के डायरेक्टर थे।

सोर्स: जौबाकॉर्प

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड की और जानकारी देखी तो दो पुराने डायरेक्टर मिले, जवाद अहमद सिद्दीकी और सऊद अहमद सिद्दीकी।

सोर्स: जौबाकॉर्प

ये जानकारी जरूरी थी क्योंकि जब ऑपइंडिया ने मिली गजट में बताए केस को देखा, तो दो नाम थे- जवाद और सऊद। इस केस पर बाद में आएँगे।

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन जोड़ने के लिए कंपनी का पता चेक किया। वो था ‘अल-फलाह हाउस, 274-ए, जामिया नगर, ओखला, नई दिल्ली।’

सोर्स: जौबाकॉर्प

ये वही पता है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल वेबसाइट पर है।

सोर्स: अल फलाह यूनिवर्सिटी

हमने ‘[email protected]’ ईमेल से भी कनेक्शन जोड़ा, जो यूनिवर्सिटी प्रोफाइल वाली कई वेबसाइट्स पर ऑफिशियल ईमेल के तौर पर लिस्टेड है।

सोर्स: गूगल सर्च

यूनिवर्सिटी के भारत एजुकेशन पेज पर सिद्दीकी और फरदीन दोनों के ईमेल हैं।

सोर्स: भारत एजुकेशन

ये ईमेल आईडी अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के जौबाकॉर्प पेज पर भी है, वही कंपनी जो फ्रॉड में शामिल थी।

सोर्स: जौबाकॉर्प

साफ है कि जो शख्स गिरफ्तार हुआ और लंबे समय तिहाड़ जेल में रहा, वही जवाद अहमद सिद्दीकी है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी चला रहा है।

कंपनी के मौजूदा डायरेक्टर हैं सुफयान अहमद सिद्दीकी और फरदीन बेग। सुफयान अहमद सिद्दीकी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, फरदीन बेग अल-फलाह यूनिवर्सिटी में टीचर हैं और एंटी-रैगिंग कमिटी के मेंबर भी।

सोर्स: लिंक्डइन

हमारी रिसर्च में पता चला कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी 2 मई 2014 को हरियाणा प्राइवेट यूनिवर्सिटी (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014 से स्थापित की गई, जो हरियाणा विधानसभा ने पास किया। यूजीसी से 5 जनवरी 2015 को सेक्शन 2(एफ) और 12(बी) के तहत मान्यता मिली। एक्सपर्ट कमिटी बनी और इंस्पेक्शन विजिट 29-30 मई 2015 को हुई। बाद में कमियों को पूरा करने पर यूजीसी ने मान लिया।

जवाद अहमद सिद्दीकी 2 साल से ज्यादा जेल में रहा

अब उस केस पर आते हैं, जिसके लिए उसे तिहाड़ भेजा गया था। ऑपइंडिया को दिल्ली हाई कोर्ट का 27 मार्च 2003 का जजमेंट मिला, जो जस्टिस आरसी चोपड़ा ने सुनाया था। कोर्ट डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, 2000 में न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, नई दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुई थी आईपीसी की धारा 420, 409, 406, 468, 471 और 120(बी) के तहत। केस इकोनॉमिक ऑफेंस विंग, क्राइम ब्रांच, नई दिल्ली को भेजा गया।

केस डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, जवाद सिद्दीकी अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर थे, और सऊद सिद्दीकी (अल-फलाह एजुकेशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व डायरेक्टर में से एक) उसका डायरेक्टर था। पिटिशनर्स और उनके साथी आरोपियों ने ढेर सारे निवेशकों को अपनी कंपनीज में डिपॉजिट करवाया। कोर्ट ने नोट किया कि उन्होंने 7.5 करोड़ रुपये की रकम गबन की। शिकायत केआर सिंह ने की थी, जिन्हें 95 लाख रुपए का चूना लगाया गया था।

जजमेंट में लिखा था, “आरोप है कि पिटिशनर्स ने ढेर सारे लोगों को अपनी ग्रुप कंपनीज में डिपॉजिट करवाया लेकिन बाद में उनके सिग्नेचर फर्जी करके और डॉक्यूमेंट्स बनाकर उन डिपॉजिट्स को अपनी कंपनीज के शेयर्स में बदल दिया।”

जाँच और एफएसएल रिपोर्ट्स ने कन्फर्म किया कि निवेशकों के सिग्नेचर फर्जी थे। डिपॉजिट कुछ ऐसी कंपनीज के नाम पर लिए गए जो कभी थीं ही नहीं। फिर पैसा आरोपितों के पर्सनल अकाउंट्स में ट्रांसफर हो गया। जब कोर्ट ने ये जजमेंट पास किया, तब तक जवाद 37 महीने और सऊद 38 महीने जेल में थे।

ट्रिब्यून की जून 2004 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 में अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज ने अल-फलाह सहकारी आवास समिति बनाई। ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने 1996 में समिति को 10,000 स्क्वायर मीटर अलॉट किए, जहाँ मेंबर्स और शेयरहोल्डर्स के लिए 100 फ्लैट्स बनाने थे। लेकिन कुछ फाइनेंशियल दिक्कतों की वजह से कंस्ट्रक्शन नहीं हुआ और जवाद वगैरह गिरफ्तार हो गए।

जवाद जेल में थे, तब उनके कुछ साथियों ने उन्हें ठगा और उनके सिग्नेचर फर्जी करके 13 करोड़ में कुछ फ्लैट्स बेच दिए। ट्रिब्यून रिपोर्ट में उनकी गिरफ्तारी की खबर छपी थी, जिसमें आरोपित थे एसपी यादव, मंजूर हसन जैदी और संजीव श्रीवास्तव।

जवाद अहमद सिद्दीकी को लेकर ये खुलासे अल-फलाह यूनिवर्सिटी चलाने वालों की विश्वसनीयता और बैकग्राउंड पर गंभीर सवाल उठाते हैं। फ्रॉड और फॉर्जरी के पुराने आरोपों से लेकर टेरर मॉड्यूल से जुड़ा विवाद तक, पैटर्न ऐसा है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यूनिवर्सिटी प्रशासन ने खुद को चल रही जाँच से अलग कर लिया है, लेकिन अल-फलाह की लीडरशिप को संदिग्ध फाइनेंशियल और क्रिमिनल गतिविधियों से जोड़ने वाले सबूत बताते हैं कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उसके मैनेजमेंट की तेजी से गहरी जाँच जरूरी है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल कॉपी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

लद्दाख में बना दुनिया का सबसे ऊँचा न्योमा एयरबेस, चीन के लिए साबित होगा सबसे बड़ा सिरदर्द: जानें भारत को LAC पर कैसे मिलेगी रणनीतिक बढ़त

पूर्वी लद्दाख की ऊँचाइयों पर भारतीय वायुसेना का नया न्योमा एयरबेस अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुका है। समुद्र तल से करीब 13,700 फीट की ऊँचाई पर बना यह एयरबेस न सिर्फ भारत का बल्कि दुनिया के सबसे ऊँचे लड़ाकू विमान को तैनात करने वाले एयरबेस में से एक है। यह लद्दाख के नायमो-मुढ़ क्षेत्र में स्थित है, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर है।

LAC से महज कुछ किलोमीटर की दूरी होने के चलते एयरबेस की रणनीतिक अहमियत बेहद बढ़ जाती है। भारत-चीन के बीच पिछले कुछ सालों से लद्दाख सेक्टर में जारी तनातनी और चीन की लगातार बढ़ती सैन्य मौजूदगी के बीच यह एयरबेस भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम साबित हो रहा है।

न्योमा एयरबेस की खासियत?

न्योमा एयरबेस लद्दाख में भारतीय वायुसेना का चौधा सक्रिय एयरबेस बना गया है। यह एयरबेस पहले एक एडवांस लैंडिंग ग्राउंड (ALG) के रूप में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब इसे एक पूर्ण सैन्य एयरबेस के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ मिग-29 और सुखोई-30 जैसे लड़ाकू विमान भी तैनात किए जा सकेंगे। इससे भारत की रणनीतिक ताकत में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी और सीमाई इलाकों में निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार आएगा।

न्योमा एयरबेस में अब अत्याधुनिक रनवे और एयर ट्रैफिक कंट्रोल सुविधाएँ बनाई जा रही हैं, जिससे किसी भी मौसम या परिस्थिति में विमानों का संचालन संभव हो सकेगा। इस एयरबेस का निर्माण बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) द्वारा किया जा रहा है, जो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी काम करने के लिए जाना जाता है।

यह एयरबेस लद्दाख के दुर्गम इलाके में स्थित है, जहाँ तापमान कई बार माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है और ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम होता है। इसके बावजूद न्योमा एयरबेस भारत के लिए एक रणनीतिक गेमचेंजर साबित हो सकता है। यह एयरबेस न केवल सीमा की सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि आपात स्थितियों, आपदा राहत अभियानों और सैनिकों की लॉजिस्टिक्स आपूर्ति में भी अहम भूमिका निभाएगा।

न्योमा एयरबेस भारतीय वायुसेना के लिए बड़ी उपलब्धि

न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारतीय वायुसेना की रणनीतिक क्षमता में भारी इजाफा हुआ है, क्योंकि यह सीमा से बेहद नजदीक है और किसी भी संभावित आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकेगा। पहले लद्दाख तक पहुँचने में विमानों और सैनिकों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी लेकिन अब न्योमा एयरबेस की वजह से यह दूरी और समय दोनों घट गए हैं।

यह एयरबेस से भारतीय वायुसेना किसी भी गतिविधि का जवाब मिनटों में दे सकेगी। लद्दाख की गलवान घाटी और पैंगोंग त्सो झील जैसे संवेदनशील इलाकों के ऊपर से हवाई निगरानी और गश्त और भी आसान हो जाएगी। भारत के फाइटर जेट्स अब सीमा से केवल कुछ मिनटों की दूरी पर तैनात रह सकेंगे, जिससे किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का जवाब तुरंत दिया जा सकेगा।

न्योमा एयरबेस से भारत की चीन पर बढ़त

न्योमा एयरबेस से भारत को चीन पर कई स्तरों पर बढ़त मिलेगी। चीन पिछले कुछ सालों से LAC के पार तिब्बत क्षेत्र में अपनी हवाई संरचना को तेजी से विकसित कर रहा है। उसने वहाँ कई नए रनवे, हेलीपोर्ट्स और सैन्य भंडारण सुविधाएँ तैयार की हैं। न्योमा एयरबेस भारत की उसी चुनौती का जवाब है।

अब भारत भी समान ऊँचाई और कठिन इलाकों में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है, जिससे दोनों के बीच रणनीतिक संतुलन कायम हो सके। चीन के लिए यह संकेत है कि भारत अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में नहीं बल्कि सक्रिय रणनीतिक तैयारी के साथ आगे बढ़ रहा है।

भारत की सैन्य क्षमता का उदाहरण है न्योमा एयरबेस

न्योमा एयरबेस के चालू हो जाने से लद्दाख और कारगिल क्षेत्र में सेना के अभियानों को बेहतर सपोर्ट मिलेगा। जरूरत पड़ने पर यह एयरबेस सियाचिन जैसे इलाकों के लिए भी लॉजिस्टिक्स हब बन सकता है। भविष्य में यहाँ ड्रोन और निगरानी विमानों की तैनाती भी बढ़ाई जा सकती है, जिससे सीमा पर हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा सके।

दरअसल, यह एयरबेस सिर्फ एक हवाई अड्डा नहीं बल्कि एक रणनीतिक संदेश है कि भारत अब सीमाओं की सुरक्षा के मामले में किसी भी ढिलाई के मूड में नहीं है। जब चीन तिब्बत में अपनी एयर स्ट्रिप्स और बेस का नेटवर्क बढ़ा रहा है तब भारत ने भी अपनी तैयारी दिखा दी है। न्योमा एयरबेस चीन पर दबाव बढ़ाता है कि भारत सीमा पर कोई भी अचानक कदम उठाने से पहले कई बार सोचे।

कॉन्ग्रेस-AIMIM में सीक्रेट अलायंस, सीमांचल में RJD की बर्बादी के पीछे ग्रैंड ओल्ड पार्टी: वक्फ के बहाने ‘हाथ’ में दिखी ‘पतंग’ की डोर

तेलंगाना के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वक्फ (संशोधन) एक्ट 2025 के तहत UMEED पोर्टल पर संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की डेडलाइन एक साल बढ़ाने की माँग की है। पत्र में तकनीकी मुश्किलें, पुराने रिकॉर्ड्स की उपलब्धता और पोर्टल की खामियों का जिक्र है।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर पोस्ट कर रेड्डी के कदम की सराहना की। उन्होंने लिखा, “जैसी उम्मीद थी, वक्फ संशोधन एक्ट के तहत पोर्टल पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन में बड़ी मुश्किलें आ रही हैं। सीएम रेवंत रेड्डी साहब को धन्यवाद, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वक्फों को दस्तावेज जमा करने के लिए एक्सटेंशन माँगा। मैंने भी एडवोकेट निजाम पाशा के जरिए सुप्रीम कोर्ट में समय बढ़ाने के लिए केस फाइल किया है।”

ओवैसी का यह पोस्ट दिखाता है कि वे इस मुद्दे पर सक्रिय हैं। AIMIM मुख्य रूप से मुस्लिम हितों की राजनीति करती है और वक्फ एक्ट उनके लिए बड़ा मुद्दा है। वे दावा करते हैं कि यह एक्ट मुस्लिम संपत्तियों को कमजोर कर सकता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ओवैसी ने रेड्डी का खुला समर्थन किया, जो कॉन्ग्रेस के नेता हैं। यह उस बड़े राजनीतिक गठजोड़ की ओर इशारा करता है, जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे।

भारत की राजनीति को अगर कोई व्यक्ति सालों से देखता आया है, तो वो जानता है कि यहाँ की हर घटना के पीछे कई परतें होती हैं। कभी ये परतें साफ-साफ दिखती हैं, तो कभी इतनी गहरी होती हैं कि आम आदमी की नजर से ओझल रह जाती हैं। आज हम इसी कड़ी में बात कर रहे हैं वक्फ संपत्तियों के उस बड़े मुद्दे की, जो इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

केंद्र सरकार ने वक्फ (संशोधन) एक्ट, 2025 के तहत वक्फ संपत्तियों को केंद्रीय पोर्टल-यूएमईईडी (UMEED) पर रजिस्टर कराना जरूरी कर दिया है। इस मुद्दे पर तेलंगाना के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने PM मोदी से हस्तक्षेप की माँग करते हुए डेडलाइन को एक साल तक आगे बढ़ाने की माँग की है। रेवंत के पत्र पर AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तुरंत समर्थन जताया और खुद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की बात कही।

दरअसल, पत्र में रेड्डी ने लिखा कि सज्जादा नशीन और मुतवल्लियों ने खुद अतिरिक्त समय माँगा। ये पत्र सिर्फ कागजी नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस की मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति का अहम पहलू है। दरअसल, तेलंगाना में मुस्लिम आबादी 12% के करीब है, जो हैदराबाद में काफी ज्यादा है। रेड्डी कॉन्ग्रेस के नेता हैं, सरकार उनकी… ऐसे में मुस्लिम वोटर्स को खुश रखना उनकी राजनीति का हिस्सा है। लेकिन यहाँ सवाल उठता है- क्या ये सिर्फ मुस्लिम समुदाय की मदद है या इसके पीछे बड़ा खेल है? क्योंकि ओवैसी ने तुरंत समर्थन किया।

कॉन्ग्रेस-AIMIM का छिपा गठजोड़, वोट कटवा की पुरानी रणनीति

ये सब सुनने में तो प्रशासनिक मामला लगता है, जिसमें पुराने रिकॉर्ड्स जुटाना, तकनीकी दिक्कतें सुलझाना, मुतवल्लियों को ट्रेनिंग देना जैसे मुद्दे हैं। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो ये राजनीति की उस पुरानी किताब का एक नया अध्याय है, जहाँ कॉन्ग्रेस और AIMIM का छिपा गठजोड़ सालों से चलता आ रहा है। बाहर से कॉन्ग्रेस ओवैसी को बीजेपी की ‘बी-टीम’ बताती रहती है, लेकिन अंदरखाने AIMIM कई राज्यों में कॉन्ग्रेस के सहयोगियों का वोट काटकर उसे सौदेबाजी की ताकत देती है।

विश्लेषण करेंगे तो पाएँगे कि ओवैसी देश के हर एक उस राज्य में चुनाव लड़ते हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस के सहयोगी राज्य स्तरीय दल मजबूर स्तर पर होते हैं। ओवैसी उन्हीं का वोट काटते हैं, ताकि कॉन्ग्रेस के पास सौदेबाजी की ताकत रहे।

सबसे पहले बिहार की बात करें तो पिछले विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल इलाके में 6 सीटें जीतीं। ये सीटें मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल थीं, जहाँ राष्ट्रीय जनता दल (RJD) मजबूत था। अगर AIMIM नहीं लड़ती, तो ये वोट RJD को जाते और RJD की सीटें बढ़तीं।

नतीजा? कॉन्ग्रेस जो RJD की सहयोगी है वो सौदेबाजी में मजबूत रहती। क्योंकि अगर RJD ज्यादा मजबूत हो जाती, तो कॉन्ग्रेस को गठबंधन में कम हिस्सा मिलता। इसी तरह इस बार भी बिहार में AIMIM पूरी ताकत से लड़ रही है, जहाँ कॉन्ग्रेस कमजोर है लेकिन RJD को कमजोर रखना चाहती है। इस बार 6 सीटों का बदला 36 पर लेने की तैयारी है। यही वजह है कि ओवैसी ने बिहार में तेजस्वी यादव को सीधा निशाना बनाया, जबकि राहुल या कॉन्ग्रेस पर बहुत हल्का हाथ रखते रहे।

ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में है। एनसीपी को नुकसान पहुँचता है। सीट भले ही किसी विपक्षी बीजेपी-शिवसेना को मिलती हो, लेकिन सहयोगियों की संख्या कम होने से कॉन्ग्रेस अपनी प्रासंगिकता बरकरार रख पाती है और बाकी जगहों पर अच्छा प्रदर्शन करके सहयोगियों को दाबे रखती है।

उत्तर प्रदेश में भी AIMIM ने जो नुकसान किया, वो कॉन्ग्रेस या बीजेपी का नहीं, सपा का हुआ। इसी तरह से राजस्थान, एमपी जैसे राज्यों में है। जिन राज्यों में कॉन्ग्रेस है ही नहीं, वहाँ AIMIM नहीं है, जैसे बंगाल में। या जहाँ कॉन्ग्रेस मजबूत है, वहाँ AIMIM नहीं है, जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा… इसी बात से समझ सकते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIMIM का गठजोड़ कितना भीतर तक है।

कॉन्ग्रेस-AIMIM का गठजोड़ जटिल है। बाकी काम आम जनता को मूर्ख बनाने वाला कॉन्ग्रेस इको-सिस्टम और उनका भोंपू-तंत्र कर ही देता है। ऐसे में लोग कॉन्ग्रेस के हल्ले को सही मान लेते हैं कि ओवैसी और उनकी पार्टी बीजेपी को फायदा पहुँचाती है, जबकि अंदरखाने वो सिर्फ कॉन्ग्रेस को समर्थन देती है।

ओवैसी सदन में वो मुद्दे उठाती है, जो कॉन्ग्रेस किसी मजबूरी के चलते उठा नहीं पाती और वोटिंग के समय अक्सर ओवैसी कॉन्ग्रेसी ग्रुप में खड़े दिखते हैं। हालाँकि दिखाने के लिए वो कभी कभी राहुल को निशाने पर भी लेते हैं, लेकिन उनके निशाने पर बीजेपी-हिंदुत्ववादी राजनीति और कॉन्ग्रेस के सहयोगी ही रहते हैं।

इस मुद्दे पर मैंने कई एक्सपर्ट्स से बात की। एक पॉलिटिकल एनालिस्ट ने कहा, “AIMIM कॉन्ग्रेस के लिए सेफ्टी वॉल्व है। वे मुस्लिम गुस्से को हैंडल करते हैं, ताकि कॉन्ग्रेस सेक्युलर बनी रहे।”

इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि तेलंगाना जो ओवैसी का गृह प्रदेश है, वहाँ पार्टी सिर्फ हैदराबाद में लड़ती है, लेकिन जुबली हिल्स जैसी प्रीमियम सीट वो कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ती है और उसका खुलेआम समर्थन करती है।

कुछ दिन पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने ‘‘मुस्लिम मतलब कॉन्ग्रेस, कॉन्ग्रेस मतलब मुस्लिम’ वाला बयान दिया था। अब ओवैसी ने रेवंत रेड्डी का खुला समर्थन किया है। वक्फ को लेकर रेड्डी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। एक तरफ बिहार में रेड्डी सीधे तेजस्वी को चुनौती दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस को हैदराबाद में समर्थन कर रहे हैं। ये छिपा पॉलिटिकल मोटिव नहीं तो और क्या है, जो धीरे-धीरे इस गठजोड़ को सामने ला रहा है।

दिल्ली ब्लास्ट पर जश्न मनाने वाले आतंक के समर्थकों पर कार्रवाई जरूरी, असम की हिमंता सरकार ने कायम की मिसाल

दिल्ली में लाल किला के पास हुए कार ब्लास्ट में 12 लोगों की मौत हो गई। इस ब्लास्ट का कनेक्शन पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जम्मू-कश्मीर के कई प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हैं। इस ब्लास्ट ने जहाँ पूरे देश को झकझोर दिया। वहीं सोशल मीडिया पर इस घटना का जश्न मनाने वाले कुछ लोग हमें यह याद दिला गए कि आतंकवाद सिर्फ बम-गोला नहीं बल्कि विचारधारा से भी पनपता है।

राजधानी में हुई इतने बड़े धमाके के बाद जब पूरा देश शोक में था तब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी खुशियों में व्यस्त थे। ऐसे लोगों की पहचान कर असम की बीजेपी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी ऐसे लोगों को साफ संदेश दिया है।

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का बयान

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था, “दिल्ली बम विस्फोट की घटना निंदनीय है। वहीं कुछ लोगों ने फेसबुक पर इस तरह की घटना पर बधाई दी या खुशी वाले इमोजी पोस्ट किए। इस तरह की प्रतिक्रिया से पता चलता है कि वे लोग वास्तव में आतंकवाद का समर्थन करते हैं। हम कल (10 नवंबर 2025) रात से इन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर हम इनमें से कुछ लोगों को गिरफ्तार भी करेंगे।”

सीएम ने आगे कहा, “असम में हम आतंकवाद को बढ़ावा देने और किसी भी तरह का समर्थन करने की अनुमति नहीं देंगे। हम इसके लिए बहुत सख्त हैं। कल से हमने देखा है कि घटना की खबर मिलने के बाद कुछ लोग बहुत खुश हैं। कोई इस खबर से खुश है, तो कोई किसी की मौत से खुश। मुझे लगता है कि वे लोग भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं। मैंने DGP से उन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच करने को कहा है, अगर वे असम के नागरिक हैं तो हमें उन्हें गिरफ्तार करेंगे।”

दिल्ली ब्लास्ट पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों की गिरफ्तारी

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जो कहा वो किया। सोशल मीडिया पर दिल्ली में हुए ब्लास्ट के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट करने वाले 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। सीएम हिमंता ने एक्स पर पोस्ट कर यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी लिखा कि असम पुलिस की यह कार्रवाई जारी रहेगी।

सीएम हिमंता ने बताया कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले राज्यभर से 5 लोगों में दारांग के मत्तीउर रहमान, गोलपाड़ा के हसन अली मंडल, चिरांग के अब्दुल लतीफ, कामरूप के वजहुल कमाल और बोंगाईगांव के नूर अमीन अहमद को गिरफ्तार किया गया है। सीएम हिमंता ने चेतावनी भी देते हुए कहा, “असम पुलिस नफरत फैलाने या आतंक का महिमामंडन करने के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ तेजी से और दृढ़ता से कार्रवाई करना जारी रखेगी।”

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

ये सारी जानकारी इस बात का सबूत है कि दिल्ली ब्लास्ट कोई आम नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश हो सकती है, जो एक बड़े आतंकी नेटवर्क ने अंजाम दी है। जाँच एजेंसियाँ इस आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ कर चुकी हैं, उनकी कार्रवाई आगे भी जारी है।

असम में गिरफ्तारी आतंकी विचारधारा पर लगाम

ऐसे में असम सरकार की कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आतंक केवल उतना नहीं है जब बम धमाके होते हैं। आतंकवाद की विचारधारा को सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर डाली गई गलीज टिप्पणियों, इमोजी में खुशी मनाने, पोस्टों में देश में हुए निंदनीय ब्लास्ट पर समर्थन दिए जाने से ही पनपने का मौका मिलता है।

जब सरकार उन तक पहुँचती है और ऐसे लोगों को कानून के दायरे में लाती है तो यह एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि आतंक का समर्थन करना अपराध है, सिर्फ आतंक करना नहीं बल्कि उसे बढ़ावा देना, महिमामंडन करना, चुप्पी सहना भी वैध नहीं है। यह एक तरह से उदाहरण सेट करता है कि आतंक की विचारधारा रखने वालों पर भी कार्रवाई होगी।

ऐसे मामलों में तुरंत और निष्पक्ष कार्रवाई से यह भी साबित होता है कि कानून सिर्फ बड़े हमलावरों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो इन धमाकों की खुशी मनाकर ‘दूसरी पंक्ति’ बनते हैं।

हिमंता बिस्वा सरमा का ब्लास्ट पर खुशी मनाने वालों को कड़ा संदेश

और आखिर में हिमंता बिस्वा सरमा के बयान पर लौटते हैं। उन्होंने घोषणा की कि असम पुलिस इन सोशल मीडिया पोस्ट करने वालों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रही है और जरूरत पड़े तो गिरफ्तार करेगी। यह बयान सिर्फ कड़ी भाषा नहीं, कार्रवाई होने तक का ‘डर’ है। जब एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इस तरह स्पष्ट शब्दों में कहता है, “अगर ये लोग असम के नागरिक हैं तो उन्हें नहीं बख्शा जाएगा।” तो यह एक तरह से सरकार की नीति को दर्शाता है कि कैसे आतंक की विचारधारा को पनपने से पहले दबा दिया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर खुशियाँ मनाने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों जैसे लोगों को डर होना चाहिए कि उनकी हर ऑनलाइन पर नजर रखी जा रही है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन जब वो आजादी आतंकी विचारधारा में बदल जाए तो कार्रवाई जरूरी हो जाती है। हिमंता बिस्वा सरमा का यह रवैया न सिर्फ गंभीर है बल्कि समय की माँग भी है।

बिहार विधानसभा चुनाव से फिर हुआ साबित, राहुल गाँधी ही BJP के ‘स्टार’ प्रचारक

बिहार चुनाव के लिए मतदान खत्म हो गया है और दो दिन बाद यानी 14 नवंबर 2025 को नतीजे भी आ जाएँगे। नतीजे से पहले मंगलवार (11 नवंबर 2025) को आए एग्जिट पोल और जमीनी स्थिति को देखकर यही लग रहा है कि एक बार फिर NDA बिहार में सरकार बनाने जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर NDA के दलों के तमाम बड़े नेताओं के धुँधार प्रचार और महिलाओं से लेकर अलग-अलग वर्गों के लिए दी गई योजनाओं के कॉकटेल ने NDA के लिए जमीन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा एक और फैक्टर जिसके इस चुनाव में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में मदद की वो हैं कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी, सुनने में बेशक यह अटपटा लगे लेकिन हकीकत यही दिख रही है।

इस चुनाव में बीजेपी के लिए एक ‘स्टार प्रचारक’ राहुल गाँधी भी साबित हुए हैं। इसके पीछे कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं वो सारे तथ्य हैं जिन्हें कोई भी विश्लेषक झुठला नहीं सकता है। इसके साथ ही, दबे स्वर में और पर्दे के पीछे ही सही लेकिन उनके सहयोगी दल भी इन बातों को मान रहे हैं।

राहुल गाँधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने बिगाड़ा महागठबंधन का मोमेंटम

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले EC ने मतदाता सूची सही करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चलाया। इसमें कई लाख ऐसे वोट काटे गए जो मृत, डबल या कहीं और जा चुके थे। पहले से ही देश भर में कथित ‘वोट चोरी’ का डंका पीट रहे राहुल गाँधी को यह बात अपने पक्ष की लगी और उन्होंने बीते 17 अगस्त से ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की शुरुआत कर दी।

इस यात्रा में उनका मानना था कि आम लोग सड़कों पर उतर आएँगे और नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बनाने में मदद मिलेगी लेकिन वैसा हुआ नहीं। वो लगातार मंचों से लोगों में आक्रोश होने का दावा करते रहे लेकिन वो आक्रोश कहीं नजर नहीं आया। उल्टा जिन असल मुद्दों को लेकर वो राज्य की सरकार को घेर सकते थे, वो इस यात्रा के चलते पीछे छूट गए।

इस यात्रा में एक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माँ की गाली दी गई, जिससे माहौल और महागठबंधन के खिलाफ हो गया। यह यात्रा खत्म होते-होते RJD-कॉन्ग्रेस में दरार साफ दिखने लगी। दावा किया जाने लगा कि RJD नेता तेजस्वी यादव इस यात्रा से खुश नहीं है और उनका व उनके दल का मानना था कि इस यात्रा का जमीन पर कोई फायदा नहीं दिख रहा है।

पटना में इस यात्रा के समापन के दौरान पहले एक बड़ी रैली की जानी थी लेकिन माना गया कि लालू यादव समझ गए थे कि दरअसल इस यात्रा से सिर्फ राहुल गाँधी अपने लिए फेम जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, बिहार चुनाव में इसका कोई असर पड़ने वाला है। इसके कारण वो रैली भी रद्द कर दी गई और पदयात्रा के साथ ही यह यात्रा समाप्त हो गई जिसका जमीन पर असर नहीं दिखाई पड़ा।

यात्रा खत्म होते तक RJD-कॉन्ग्रेस के बीच मतभेद की खबरें खूब सामने आईं। तेजस्वी यादव ने अपनी अलग यात्रा निकाली जिसके केंद्र में वोट चोरी का मुद्दा नहीं था। उन्होंने कोशिश की कि नीतीश कुमार की सरकार को बिहार से जुड़े मुद्दों पर घेरा जाए जो राहुल गाँधी का यात्रा से गायब थे।

यात्रा के तुरंत बाद मलेशिया घूमने पहुँचे राहुल गाँधी

जब राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा खत्म हुई तो वो छुट्टियाँ मनाने मलेशिया निकल गए। इससे राहुल गाँधी पर जो ‘पार्ट टाइम राजनेता’ होने के आरोप लगते रहे थे वो फिर एक बार सामने आए। बीजेपी ने हाथों-हाथ इसे लपका और राहुल गाँधी पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। बीजेपी और उसके समर्थकों ने यह साबित करने की कोशिश की कि दरअसल, राहुल गाँधी बिहार के चुनाव और इस मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं है।

यह छवि जनता के बीच पहुँचनी शुरू हुई और जो मुद्दा राहुल गाँधी ने उठाया था वो कहीं पीछे छूट गया। लोगों के बीच यह बात पहुँची कि बिहार का यह यात्रा राहुल गाँधी के लिए बस एक ‘असाइनमेंट’ की तरह ही थी। यह पहली बार नहीं था, जब राहुल गाँधी की यात्रा पर सवाल उठे हों अमेरिका, इटली और बैंकॉक जैसी यात्राओं के दौरान भी राहुल गाँधी पर सवाल उठ चुके हैं। इस यात्रा के बाद बीजेपी को यह साबित करने में मदद मिली की उनकी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ असल में एक खानापूर्ति भर थी।

बिहार से 2 महीने के लिए गायब हो गए राहुल गाँधी

पटना में अपनी पद यात्रा के बाद राहुल गाँधी बिहार से छूमंतर हो गए। 1 सितंबर को पटना में वोटर अधिकार यात्रा के बाद वो करीब 58 दिनों तक बिहार से गायब रहे और अक्टूबर के बिल्कुल आखिर में मुजफ्फरपुर और दरभंगा में चुनावी रैलियों में शामिल हुए। इस बीच बीजेपी और NDA के बड़े नेता यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री मोदी भी लगातार बिहार से जुड़े हुए थे।

खुद कॉन्ग्रेस के नेता भी राहुल गाँधी की अनुपस्थिति से हैरान थे। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने ‘डेक्कन हेराल्ड’ से कहा, “बिहार के चुनावी मैदान से राहुल गांधी की लंबी अनुपस्थिति से हम भी हैरान हैं। राहुल की इतने लंबे समय तक अनुपस्थिति पार्टी को भारी पड़ सकती है।” राहुल गाँधी की अनुपस्थिति में BJP और अन्य दलों के नेताओं ने चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राहुल की अनुपस्थिति बीजेपी के लिए बिहार में फायदे का सौदा ही साबित हुई।

राहुल गाँधी ने छठ का किया अपमान, PM मोदी को लेकर बोले ‘अपशब्द’

एक कहावत है कि ‘देर आए, दुरुस्त आए’, कॉन्ग्रेस को भी राहुल गाँधी के बिहार चुनाव प्रचार में लौटने से यही उम्मीदें थीं। लेकिन यहाँ भी दाँव उल्टा ही पड़ गया। छठ के दौरान ही राहुल गाँधी पर छठ पूजा के अपमान का आरोप लगा। इसके अलावा उन्होंने मंच से प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्दों को भी प्रयोग किया।

बिहार के मुजफ्फरपुर में गुरुवार (29 अक्टूबर 2025) को जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा था, “छठ पूजा वोट हासिल करने के लिए किया गया नाटक है और मोदी वोट के लिए मंच पर नाच भी सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी को छठ पूजा या बिहार की परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है। उनका मकसद केवल वोट लेना है।”

इसे बीजेपी ने छठ पूजा और पीएम मोदी का अपमान बताते हुए राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पर खूब हमला बोला। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा में कहा कि कॉन्ग्रेस और RJD के लोग छठी मैया का अपमान कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “आप बताएँ क्या कोई वोट पाने के लिए छठ मैया का अपमान करेगा, क्या माताएँ निर्जला उपवास करती हैं, क्या वो सहन करेंगी क्या?”

फेल हुआ राहुल गाँधी का H- बम

बिहार में वोटिंग से ठीक पहले भी राहुल गाँधी ने कथित वोट चोरी का हवाला देते हुए ‘H-फाइल्स’ जारी कीं, इसमें दावा किया गया कि हरियाणा चुनाव में BJP ने वोट चोरी की है। बिहार चुनाव से पहले हरियाणा में वोट चोरी का दावा कहीं से भी लोगों को तार्किक नहीं लगा। हालाँकि, कुछ लोगों को लगा कि शायद वोट चोरी की बात इससे लोगों के मन में बैठ जाए लेकिन वो भी धरा रह गया जब उनके दावों की पोल खुलनी शुरू हो गई।

राहुल गाँधी ने जो दावे अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में किए उनमें कोई दम नहीं निकला और ऐसे में बीजेपी को फिर एक बार राहुल गाँधी पर हमले का मौका मिल गया। बीजेपी ने कहना शुरू कर दिया कि राहुल गाँधी असल में अपनी हार छिपाने के लिए बहाने ढूँढ रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले भी वो बिहार चुनाव के लिए बिना कोई ठोस प्लान के नजर आए।

बीजेपी के नेता और उसके समर्थक अक्सर सोशल मीडिया पर कहते हैं कि राहुल गाँधी दरअसल बीजेपी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं। इसे लेकर जोक्स और मीम्स बनाए जाते हैं। अब, राहुल गाँधी जिस तरह बिहार चुनाव में महागठबंधन को मजबूत करने के बजाय NDA को ताकत देते हुए दिखाई दिए हैं, उससे शायद यह बात साबित भी होती है।

सबरीमाला मंदिर ‘सोना चोरी’ केस में पूर्व TDB अध्यक्ष गिरफ्तार, नए अध्यक्ष की नियुक्ति के बीच SIT ने केरल HC को सौंपे सबूत: जानें वामपंथी सरकार कैसे नियुक्त करती है मंदिर बोर्ड का चीफ

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर से ‘सोना चोरी’ मामले ने एक नया मोड़ आया है। एसआईटी ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) के पूर्व अध्यक्ष और आयुक्त एन. वासु को 11 नवंबर 2025 को गिरफ्तार कर लिया।

वासु का सीपीएम से पुराना रिश्ता रहा है। वह कोल्लम पंचायत अध्यक्ष और पूर्व मंत्री पीके गुरुदासन के निजी सचिव और वकील हैं। केरल के विपक्षी कॉन्ग्रेस नेता वीडी सतीशन ने कहा कि वासु की गिरफ्तारी से वरिष्ठ माकपा नेताओं की संलिप्तता उजागर होगी। एसआईटी सीपीएम नेता और पूर्व टीडीबी अध्यक्ष पद्मकुमार से भी पूछताछ कर सकती है।

केरल हाईकोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए मंदिर प्रबंधन के सोना चोरी में ‘मिलीभगत’ की बात कही है। वहीं केरल की वामपंथी सरकार ने टीडीबी के नए अध्यक्ष के तौर पर पूर्व आईएएस अधिकारी जयकुमार को नियुक्त किया है।

टीडीबी के नए अध्यक्ष बने जयकुमार

केरल सरकार ने रिटायर आईएएस अधिकारी के जयकुमार को टीडीबी यानी त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड का अध्यक्ष बनाया है। पूर्व मंत्री और विधायक के राजू को बोर्ड का सदस्य बनाया गया है। टीडीबी सबरीमाला के भगवान अयप्पा मंदिर सहित प्रमुख मंदिरों का प्रबंधन करता है।

10 नवंबर 2025 को जारी अधिसूचना के मुताबिक वर्तमान त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड के अध्यक्ष पी एस प्रशांत का कार्यकाल 13 नवंबर को खत्म हो रहा है। इसलिए 14 नवंबर से इनका कार्यकाल शुरू होगा, जो 2 साल तक चलेगा।

नई नियुक्ति ऐसे समय हो रही है, जब सबरीमाला मंदिर में सोना चोरी का मामला गरमाया हुआ है। केरल सरकार की इस मुद्दे पर काफी फजीहत हो चुकी है। विपक्ष ने टीडीबी के खिलाफ एक्शन की माँग करते हुए विधानसभा की कार्यवाही का बहिष्कार किया। इस मामले में सीपीएम के कई नेताओं के नाम आ रहे हैं।

कैसे होती है टीडीबी सदस्यों की नियुक्ति

केरल सरकार टीडीबी सदस्यों की नियुक्ति करती है। इसमें एक अध्यक्ष और दो सदस्य होते हैं। इस नियुक्ति के मानदंड को सार्वजनिक नहीं किया जाता है, हालाँकि कहा जाता है कि इसमें एक प्रक्रिया अपनाई जाती है। ये बोर्ड सरकार के प्रति जवाबदेह होता है और मंदिर प्रशासन का काम संभालता है।

बोर्ड भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में काम करता है। इसे त्रावणकोर कोचीन हिंदू धार्मिक संस्थान अधिनियम 1950 के तहत बनाया गया है।

सीपीएम नेता पद्मकुमार से पूछताछ संभव

इस मामले में अब तक 5 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी, सबरीमाला के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू, पूर्व कार्यकारी अधिकारी डी सुदेश कुमार और तिरुवभरणम के पूर्व आयुक्त केएस बैजू और पूर्व टीडीबी अध्यक्ष वासु शामिल हैं।

एसआईटी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता और पूर्व टीडीबी अध्यक्ष के. पद्मकुमार से पूछताछ करने की कोशिश में है। जब एन. वासु देवासम बोर्ड में आयुक्त थे, तब पद्मकुमार टीडीबी के अध्यक्ष थे। फिलहाल वासु न्यायिक हिरासत में हैं, जिनसे एसआईटी पूछताछ कर रही है।

एसआईटी का मानना है कि मंदिर की मूर्तियों और आवरणों पर सोने के बजाय तांबे में बदलने की पूरी प्रक्रिया बहुत बड़े घोटाले को दर्शाता है और इस पूरे मामले में कई हाई प्रोफाइल नाम जाँच के दायरे में आ रहे हैं।

पूर्व टीडीबी अध्यक्ष और वामपंथी वासु की हुई गिरफ्तारी

ताजा मामले में एसआईटी ने टीडीबी के पूर्व अध्यक्ष और कमिश्नर एन वासु को गिरफ्तार किया है। वासु को पहले भी गिरफ्तार किया गया था और पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था। वासु का सीपीएम से पुराना नाता रहा है। वह दो बार टीडीबी के आयुक्त रह चुके हैं। फिलहाल तिरुवनंतपुरम में वकालत करते हैं।

सोना चोरी के मामले में क्राइम ब्रांच ने पता लगाया है कि मार्च 2019 में सन्निधानम द्वार पैनल से सोना पिघलाने के पूरे काम की जानकारी वासु को थी और उनकी सहमति के बाद ही ये काम किया गया। इस दौरान वासु टीडीबी के अध्यक्ष थे। इससे पहले टीडीबी से 2 बार आयुक्त के तौर पर जुड़े रहे।

विपक्ष शुरू से कहता रहा है कि सबरीमाला मामले में सत्तारूढ़ सीपीएम के नेताओं की संलिप्तता रही है। माना जा रहा है कि मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी ने हिरासत में पूछताछ के दौरान वासु की भूमिका के बारे में बताया।

उन्नीकृष्णन पोट्टी के पुराने ईमेल को जाँच रिपोर्ट में शामिल किया गया है। इसमें पोट्टी ने कथित तौर पर वासु को बताया था कि मंदिर के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की मरम्मती के बाद सोना बच गया है। पोट्टी ने कथित तौर पर उस बचे हुए सोना का इस्तेमाल एक जरूरतमंद लड़की की शादी में लगा दिया। इससे संबंधित ईमेल 9 दिसंबर 2019 को भेजा गया था।

वासु ने ईमेल फॉरवर्ड तो कर दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की, जिसके कारण सोना गायब पाया गया। जाँच में पता चला कि वासु को इन सभी मामलों की पूरी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

हालाँकि वासु ने जाँच दल को ऐसे किसी घोटाले में अपनी भूमिका से साफ इनकार किया। उसने कहा कि उसके कार्यकाल के दौरान देवी-देवताओं के मरम्मत का काम नहीं हुआ और वह उन्नीकृष्णन पोट्टी को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता है। उसे केवल ‘स्पांसर’ के तौर पर जानता है। वासु के मुताबिक, उस वक्त कई स्पांसर थे और उन सबकी जाँच करना अव्यावहारिक है।

इस मामले में मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी, मुरारी बाबू और पूर्व आयुक्त केएस बैजू को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। एसआईटी को अब जल्द ही केरल हाईकोर्ट में अंतिम रिपोर्ट सौंपनी है।

केरल हाईकोर्ट ने माना बोर्ड की ‘संदिग्ध’ भूमिका

केरल हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना है कि बोर्ड के सदस्यों का सबरीमाला अयप्पा मंदिर के सोना चोरी में भूमिका है। एसआईटी इस बात पर भी विचार कर रहा है कि टीडीबी के रिटायर और सेवा करने वाले अधिकारियों और हाई प्रोफाइल राजनीतिक नियुक्तियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में लाया जाए या नही

एसआईटी ने सौंपे कई दस्तावेज

ये मामला राजनीतिक और कानूनी तौर पर काफी अहम है, क्योंकि इस मामले की जाँच की आँच उच्च अधिकारियों तक पहुँच रही है। एसआईटी अधिकारियों का कहना है कि यदि ऐसा है, तो एसआईटी संभवतः कोल्लम स्थित जाँच आयुक्त और विशेष न्यायाधीश (सतर्कता) के समक्ष एक रिपोर्ट दाखिल करेगी, जिसका अधिकार क्षेत्र पथानामथिट्टा जिला भी है।

अधिकारियों का कहना है कि एसआईटी टीडीबी अधिकारियों पर ‘गबन करने के इरादे’ का आरोप लगाकर मुकदमा चलाने की कोशिश कर सकती है, क्योंकि उन्होंने मंदिर की नक्काशी और मूर्तियों पर चढ़े सोने के पैनल को ‘जानबूझकर गलत तरीके से श्रेणियों में बाँटा’। इसके बाद मरम्मती के नाम पर मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी को सौंपा।

एसआईटी ने कोर्ट को दस्तावेज सौंपते हुए दावा किया है कि सोने की परत चढ़े पैनलों में सोने की जगह तांबे का इस्तेमाल करने को ‘आधिकारिक छूट देना’, ये दर्शाता है कि पोट्टी को फायदा पहुँचाने की कोशिश की गई। ऐसा जानबूझकर किया गया, ताकि चोरी का मामला सामने आने पर ‘आधिकारिक पेपर’ दिखाकर कानूनी रूप से पोट्टी और अन्य अधिकारियों को बचाया जा सके।

प्रतिमाओं पर सोने की परत चढ़ाने में अनियमितता का मामला

सबरीमाला के गर्भगृह में द्वारपालकों की सोने की परत वाली मूर्तियों को मरम्मत के लिए चेन्नई की एक निजी आभूषण फर्म को भेजा गया था। इस पर उठे विवाद के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था।

दरअसल कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया था कि सबरीमाला के आभूषणों की कोई भी मरम्मत या रखरखाव विशेष आयुक्त को पूर्व सूचना देने के बाद ही किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं किया गया था।

टीडीबी ने 2019 में 40 साल की वारंटी के साथ मूर्तियों पर स्वर्ण परत चढ़ाने की जिम्मेदारी चेन्नई की फर्म स्मार्ट क्रिएशन्स को दिया था।

साल 2025 की शुरुआत में जब मूर्तियों को मरम्मत करने की जरूरत पड़ी, तो टीडीबी ने फिर से मूर्तियों को उसी फर्म को भेज दिया। लेकिन इस बार जरूरी अनुमति नहीं लिए गए।

अदालत ने मरम्मत कार्य चेन्नई को आउटसोर्स करने के टीडीबी के फैसले पर सवाल उठाते हुए मरम्मती कार्य को तत्काल प्रभाव से रोकने का आदेश दिया। साथ ही मंदिर की कीमती वस्तुओं और प्रतिमाओं को केरल वापस भेजने का निर्देश दिया।

4.5 किलोग्राम सोना ‘गायब’ मिला था

साल 2019 में सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह (सन्निधानम) के द्वारपालकों की प्रतिमाओं पर सोने की परत चढ़ाने का काम शुरू हुआ। इसके लिए लगभग 42 किलो सोना मंदिर से लिया गया था। योजना के मुताबिक इन सोने की प्लेटों पर विशेष प्रक्रिया से गोल्ड प्लेटिंग कर उसे दोबारा गर्भगृह में लगाया जाना था।

जब ये प्लेटें वापस आईं और मंदिर में स्थापित की गईं, तब चौंकाने वाला सच सामने आया। 42.8 किलोग्राम सोने की जगह मात्र 38 किलोग्राम सोने का ही रिकॉर्ड फर्म के पास था। बाकि 4.5 किलोग्राम सोना गायब हो गया।

इसके बावजूद, टीडीबी ने 2025 में मूर्तियों की मरम्मती का काम उसी फर्म स्मार्ट क्रिएशन्स को दिया। इसके बाद विवाद बढ़ गया और कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।

पाकिस्तान में धमाके के बाद PM ने भारत पर तो रक्षा मंत्री ने अफगानिस्तान पर लगाए आरोप, ‘ऑपरेशन सिंदूर 2.0’ के डर से खुद को पीड़ित दिखा रहा है PAK?

दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर 2025 को हुए कार धमाके के कुछ ही घंटों बाद इस्लामाबाद के कोर्ट परिसर में 11 नवंबर को आत्मघाती विस्फोट हो गया। इन दोनों धमाकों ने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को और गहरा कर दिया है।

दिल्ली हमले में दर्जनभर से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि इस्लामाबाद धमाके में भी लगभग उतने ही लोग मारे गए और कई घायल हुए। इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।

दोनों हमलों में सुसाइड बॉम्बर शामिल थे और ANFO आधारित विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ। इस्लामाबाद धमाके की जिम्मेदारी पाकिस्तानी तालिबान के गुट जमात-उल-अहरार ने ली है।

इसके बावजूद पाकिस्तानी फौज और सरकार ने आरोप लगाया कि हमले में भारत का हाथ है। भारत ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया और कहा कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक अस्थिरता और सत्ता संघर्ष से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे बयान दे रहा है।

सोशल मीडिया और विश्लेषकों का एक वर्ग इस्लामाबाद धमाके को ‘फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन’ कह रहा है। इसका मतलब है कि पाकिस्तान ने खुद हमला करवाकर दोष भारत पर डालने की कोशिश की, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को पीड़ित दिखा सके।

इस नैरेटिव के पीछे यह आशंका भी जताई जा रही है कि दिल्ली में हुए धमाके के बाद पाकिस्तान भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई, जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर 2.0′ कहा जा रहा है, को टालने के लिए भी इस तरह का दांव चल रहा है।

दिल्ली-इस्लामाबाद के धमाके- संयोग या स्क्रिप्ट?

यह संयोग नहीं हो सकता बल्कि समयबद्ध पटकथा है। भारत और पाकिस्तान के घटनाओं की टाइमलाइन खुद एक स्क्रिप्ट जैसी लगती है। लाल किले का धमाका सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम 6:45 बजे हुआ। महज 18 घंटे बाद, मंगलवार (11 नवंबर 2025) की दोपहर 12:39 बजे इस्लामाबाद कोर्ट कॉम्प्लेक्स आत्मघाती विस्फोट से हिल गया।

दोनों हमलों में आत्मघाती हमलावर शामिल थे, दोनों में ANFO आधारित विस्फोटक इस्तेमाल हुए और दोनों ठीक उसी समय हुए जब भारत फरीदाबाद, कश्मीर और उत्तर प्रदेश तक फैले जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के ‘डॉक्टर मॉड्यूल’ को ध्वस्त कर रहा था।

पाकिस्तानी फौज के फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने इस्लामाबाद में धमाकों के जरिए पाकिस्तान को पीड़ित दिखलाने की कोशिश की है। मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर की दहल अब भी पाकिस्तानी फौज के जहन में बैठा है।

साथ ही दिल्ली धमाके के बाद हर खुफिया इंटरसेप्ट, हर जब्त किया गया उपकरण, जाँच का सुराग और विस्फोटक पाकिस्तान-समर्थित जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की ओर इशारा करता है।ये वही आतंकी संगठन है जिसे मुनीर ने वर्षों तक अपनी निजी प्रॉक्सी की तरह पाला-पोसा।

इतना ही नहीं, ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए JeM आतंकियों को पाकिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार दिया गया, जिसमें सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। ऐसे में मुनीर की घबराहट लाजिमी है।

डॉक्टरों से बम बनाने वालों तक- फरीदाबाद मॉड्यूल और दिल्ली धमाका

दिल्ली का हमला अचानक नहीं बल्कि JeM-सम्बंधित मॉड्यूल के नेटवर्क का हिस्सा था। इस नेटवर्क में डॉक्टर, शिक्षाविद और मेडिकल प्रोफेशनल्स शामिल थे, जिन्हें आतंकवादी लॉजिस्टिक्स चेन चलाने के लिए कट्टरपंथी बनाया गया था।

इस नेटवर्क के केंद्र में था जमात-उल-मोमिनात, JeM का नया महिला विंग, जिसका नेतृत्व मसूद अजहर की बहन सादिया अजहर बहावलपुर से कर रही थी। उनकी भारत में प्रमुख ऑपरेटिव हैंडलर डॉ. शाहेना शाहिद को हथियार और अमोनियम नाइट्रेट के साथ लखनऊ से पकड़ा गया।

उनका हैंडलर पुलवामा निवासी और फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी में लेक्चरर डॉ. मुझम्मिल शकील को 2,900 किलो विस्फोटक सामग्री के साथ गिरफ्तार किया गया।

जब उन दोनों के सरगना ऑपरेटिव उमर मोहम्मद को लगा कि नेटवर्क उजागर हो चुका है तो उसने दिल्ली के लाल किले के पास कार बम विस्फोट कर दिया, जिसमें 10 लोग मारे गए। इस आत्मघाती हमले ने इस बात पर ध्यान दिलाया किया कि पाकिस्तान का नेटवर्क भारत के शहरी इलाकों में भी कितनी गहराई तक फैला हुआ है।

ऑपरेशन सिंदूर से डरा है पड़ोसी मुल्क

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जवाबी कार्रवाई के तहत मई 2025 में भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान के आतंकी ढाँचे को तहस-नहस कर दिया था। पाकिस्तान में पल रहे 9 आतंकी कैंप, 10 सैन्य ठिकाने और कई रडार स्टेशन इस कार्रवाई में नष्ट हो गए।

इस कार्रवाई में भारत ने ब्रह्मोस-A क्रूज़ मिसाइल से नूर खान एयरबेस को भी निशाना बनाया था, जो पाकिस्तान के परमाणु कमांड के बेहद नजदीक है। पाकिस्तान को खास तौर पर इस ऑपरेशन में अपनी वायुसेना के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपमानित होना पड़ा था।

अब दिल्ली धमाकों के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर 2.0’ की चर्चा है, जिसे लेकर पाकिस्तान में भय और असुरक्षा साफ तौर पर देखी जा सकती है। इसीलिए पाकिस्तान ने ‘फाल्स फ्लैग’ का हथकंडा अपना कर भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर 2.0 को टालने के लिए यह ‘पीड़ित दिखने’ की रणनीति अपनाई।

दिल्ली लाल किला कार ब्लास्ट के बाद चर्चा में ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’, सुरक्षा एजेंसियों को तोड़ना ही होगा ये मकड़जाल

दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास 10 नवंबर 2025 की शाम हुआ विस्फोट केवल एक साधारण शरद संध्या को नहीं बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा की प्रकृति को भी झकझोर गया। जाँच एजेंसियों का कहना है कि यह कोई अकेला, अशिक्षित आतंकी द्वारा किया गया हमला नहीं था बल्कि एक व्यापक, गुप्त लॉजिस्टिक्स और तकनीकी मॉड्यूल का हिस्सा था, जिसमें उच्च शिक्षित, पेशेवर रूप से प्रशिक्षित लोग जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर और विश्वविद्यालय-शिक्षित ऑपरेटिव शामिल थे।

इन लोगों ने विस्फोटक सामग्री की खरीद, छिपाने और तकनीकी सहायता जैसे कार्यों को अंजाम दिया। सुरक्षा विश्लेषक अब इस प्रवृत्ति को ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ कह रहे हैं, अर्थात शिक्षा और पेशेवर विश्वास का दुरुपयोग कर देश के भीतर ऐसी हिंसा को अंजाम देना, जिसे नकारा जा सके और जिसका प्रभाव घातक हो।

प्रारंभिक जाँच और फोरेंसिक निष्कर्ष

विस्फोट के कुछ ही दिनों बाद बहु-एजेंसी छापों और जाँचों का दायरा दिल्ली से बाहर तक फैल गया। अधिकारियों ने ऐसे नमूने बरामद किए, जिनमें प्रयुक्त विस्फोटक सामान्य अमोनियम नाइट्रेट से कहीं अधिक शक्तिशाली थे। प्रेस ब्रीफिंग्स और मीडिया रिपोर्टों में विभिन्न राज्यों से बड़ी मात्रा में बम बनाने की सामग्री और रसायनिक घटकों की बरामदगी का विवरण आया।

समेकित रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली-NCR, श्रीनगर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हुए इन ऑपरेशनों से सैकड़ों किलो विस्फोटक जब्त किए गए। कुछ रिपोर्ट्स ने इस पूरी मात्रा को टन स्तर तक बताया। गिरफ्तार लोगों में कुछ डॉक्टर और शिक्षण संस्थानों से जुड़े व्यक्ति भी शामिल थे।

रणनीतिक संदर्भ: ऑपरेशन सिंदूर और प्रॉक्सी वॉर की दिशा

सुरक्षा विश्लेषक इस मॉड्यूल को सीधे तौर पर साल 2025 के मध्य में भारत की सीमा-पार की कार्रवाई, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जोड़कर देखते हैं। इस अभियान के तहत कई आतंकी ढाँचों को तबाह किया गया था। उसके बाद यह साफ दिखा कि प्रतिपक्ष ने अपनी रणनीति बदल ली है।

जब भारत की सीधी सैन्य कार्रवाइयाँ उसके लिए महँगी और कठिन साबित हुईं, तब उसने ‘डिनाएबल’ यानी नकारे जा सकने वाले स्थानीय प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय कर दिए। दूसरे शब्दों में कहें तो जब बाहरी विकल्प सीमित हो जाते हैं, तो बाहरी सरगनाओं के लिए यह आसान हो जाता है कि वे भीतर के कम-संदिग्ध चेहरों को सक्रिय करें और हिंसा को अंदर से अंजाम दें।

शिक्षित पेशेवरों को क्यों बनाया जाता है हथियार?

लक्षित समूह के रूप में शिक्षित लोगों को चुनने के पीछे कठोर तर्क है। डॉक्टर, इंजीनियर और विश्वविद्यालय-प्रशिक्षित व्यक्ति समाज में भरोसेमंद माने जाते हैं। उनके पास तकनीकी दक्षता, गतिशीलता, सप्लाई-चेन तक पहुँच और सामाजिक विश्वसनीयता होती है। ये सभी गुण उन्हें कम संदिग्ध बनाते हैं जबकि आतंकी नेटवर्क के लिए उन्हें अधिक उपयोगी बना देते हैं।

इनकी पेशेवर पहचान उन्हें औद्योगिक रसायनों की वैध खरीद, परिवहन, भंडारण और विस्फोटक प्रणालियों की संरचना में सहायता देती है। कई मामलों में यह भी पाया गया है कि जो तथाकथित ‘प्रेरक’ या कट्टर मौलवी स्वयं तकनीकी रूप से अनपढ़ हैं, वे शिक्षित युवाओं को प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, शिक्षा और कट्टरता का यह संयोजन अत्यंत घातक रूप ले लेता है।

घरेलू चुनौती: वैध अवसरों का दुरुपयोग

भारत सरकार की छात्रवृत्तियाँ, लैपटॉप वितरण, उच्च शिक्षा का विस्तार और कौशल विकास योजनाएँ देश की ताकत हैं। लेकिन इन्हीं अवसरों का दुरुपयोग भी कट्टर तत्व अपने प्रचार और हिंसा के औजारों में बदल रहे हैं।

जाँच में सामने आया है कि कुछ मामलों में सरकारी योजनाओं से मिले संसाधनों जैसे उपकरण, डिजिटल एक्सेस या यात्रा की सुविधा को आतंकी कार्यों के लिए प्रयोग किया गया। नीति निर्धारकों के सामने यह दोहरी चुनौती है। एक ओर अवसरों को जारी रखना और दूसरी ओर संस्थागत सुरक्षा के ऐसे उपाय सुनिश्चित करना जो इन अवसरों के दुरुपयोग को रोक सकें।

देश कितनी बड़ी त्रासदी से बचा?

अधिकारियों की ब्रीफिंग और मीडिया रिपोर्टे्स इस बात पर जोर देती हैं कि इस मामले में रोकथाम और तबाही के बीच की दूरी बेहद कम थी। जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पकड़े गए विस्फोटक पदार्थों का नेटवर्क यदि सफलतापूर्वक सक्रिय होता तो यह देश के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों पर व्यापक हमलों की क्षमता रखता था।

जाँच में संकेत मिले हैं कि नियोजित लक्ष्य उच्च जनसंख्या घनत्व वाले और प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण स्थल थे। यदि खुफिया एजेंसियों ने समय रहते कार्रवाई न की होती तो परिणाम भयानक हो सकते थे। यह सफलता संयोग नहीं थी। यह लंबे समय तक की गई मानवीय खुफिया निगरानी, कई एजेंसियों के समन्वय और फोरेंसिक विश्लेषण का परिणाम थी।

मौन प्रहरी: इंटेलिजेंस ब्यूरो की निर्णायक भूमिका

इन घटनाओं के पीछे जो सबसे निर्णायक और अदृश्य शक्ति रही, वह भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) है। जो देश की सबसे पुरानी और गुप्त सुरक्षा एजेंसी है। इस पूरे अभियान में IB की मानव स्रोतों से मिली जानकारी, राज्यों के बीच समन्वय और विश्लेषणात्मक कड़ियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

IB के अधिकारी बिना किसी प्रशंसा या पुरस्कार की अपेक्षा के दिन-रात काम करते हैं। वे महीनों तक सूचनाओं को जोड़ते हैं, संपर्कों को विकसित करते हैं और गुप्त निगरानी से जमीनी हकीकत तक पहुँचते हैं। इन्हीं मौन रक्षकों के कारण कई बड़े हमले समय रहते विफल कर दिए जाते हैं। उनकी पेशेवर निष्ठा और मौन सेवा ही देश की वास्तविक ढाल है। यह ‘शांत सुरक्षा’ भारत की रक्षा का सबसे सशक्त स्तंभ है।

सामुदायिक जिम्मेदारी और शिक्षित वर्ग की भूमिका

यह प्रवृत्ति केवल सुरक्षा नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक चुनौती भी है। भारत के मुस्लिम इस राष्ट्र की आत्मा, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उनमें से विशाल बहुमत हिंसा को अस्वीकार करता है और देश की प्रगति में भागीदार बनना चाहता है। लेकिन जब कट्टर तत्व शिक्षित युवाओं को लक्ष्य बनाते हैं तो समाज और परिवारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों, प्रोफेशनल संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को सतर्क निगरानी तंत्र और परामर्श प्रणाली विकसित करनी चाहिए। स्कॉलरशिप या डिजिटल कार्यक्रमों में नागरिक नैतिकता और डिजिटल सुरक्षा के तत्वों को शामिल करना आवश्यक है ताकि युवाओं को ब्रेनवॉश होने से बचाया जा सके। शिक्षित वर्ग को न केवल स्वयं सचेत रहना चाहिए बल्कि अपने ज्ञान और विवेक से दूसरों को भी जागरूक करना चाहिए।

नीति-स्तर पर दोहरी रणनीति

इस चुनौती से निपटने के लिए जवाब भी दो स्तरों पर होना चाहिए:

  • खुफिया नेटवर्क को और गहराई देना ताकि लॉजिस्टिक चैन जल्दी पकड़ी जा सके।
  • शैक्षणिक और कल्याणकारी योजनाओं में डिजिटल सुरक्षा और पारदर्शिता के नए मानक बनाना।
  • सामुदायिक स्तर पर ऐसे प्रयासों को बढ़ावा देना जो असहिष्णुता के बजाए संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करें।
  • और राष्ट्रीय विमर्श को इस दिशा में ले जाना कि अहिंसा, नागरिक उत्तरदायित्व और साझा समृद्धि ही असली राष्ट्र-धर्म हैं।

निष्कर्ष

लालकिला क्षेत्र में हुआ विस्फोट और उससे जुड़े मॉड्यूल ने यह दिखा दिया है कि आधुनिक आतंकवाद अब शिक्षा, तकनीकी दक्षता और सामाजिक विश्वास का भी हथियार बना रहा है। इसका उत्तर भय या बहिष्कार नहीं है बल्कि दोहरी क्षमता में है। एक ओर मौन, पेशेवर खुफिया काम जो खतरे को जड़ से रोक सके और दूसरी ओर समाज की वह सजीव चेतना जो कट्टरता को अस्वीकार करे।

यदि हमारे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षित नागरिक राष्ट्रनिर्माण की दिशा में अपनी भूमिका निभाएँ और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी संस्थाएँ उसी निष्ठा से अपने कार्य करती रहें, तो ‘व्हाइट कॉलर जिहाद’ जैसी विकृत प्रवृत्तियों को समाप्त किया जा सकता है। शांत खुफिया कौशल और जागरूक नागरिकता- यही भारत की सबसे मजबूत सुरक्षा की ढाल है।

(यह लेख नितिन राय द्वारा लिखा गया है।)

PM मोदी ने पुनात्सांगछू-II पावर प्रोजक्ट का किया उद्घाटन, जानें कैसे भूटान में परियोजनाओं के विकास में योगदान दे रहा है भारत?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन की राजकीय यात्रा पर भूटान पहुँचे हुए हैं। इस ऐतिहासिक दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने भारत और भूटान की सरकार द्वारा मिलकर बनाए गए पुनात्सांगछू-II जलविद्युत (हाइड्रो इलेक्ट्रिक) परियोजना का उद्घाटन किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने X पर उद्घाटन समारोह की कुछ तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, “विकास को गति देना, दोस्ती को गहराई देना और टिकाऊ भविष्य की दिशा में आगे बढ़ना! ऊर्जा सहयोग भारत और भूटान की साझेदारी का एक मजबूत स्तंभ है। आज हमने पुनात्सांगछू-II हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया। यह हमारे दोनों देशों की दोस्ती का एक स्थायी प्रतीक है।”

1,020 मेगावॉट की इस जलविद्युत परियोजना का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक के साथ किया। यह भारत और भूटान के संबंधों में एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना का काम इस साल अगस्त में पूरी तरह पूरा हो गया था। इसकी आखिरी यूनिट को 27 अगस्त 2025 को भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे और भूटान में भारत के राजदूत सुधाकर दलेला की मौजूदगी में जोड़ा गया था।

भारत-भूटान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग से मजबूत कर रहे हैं रिश्ते: जानिए कैसे भारत ने बनाई और फंड की पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना

पश्चिमी भूटान में पुनात्सांगछू नदी पर बनी पुनात्सांगछू-II जलविद्युत परियोजना एक ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ यानी नदी के प्राकृतिक प्रवाह से चलने वाली परियोजना है। इसका मतलब है कि इसमें बड़े बाँध या विशाल जलाशय नहीं बनाए जाएँगे बल्कि यह नदी के बहाव से ही स्वच्छ और टिकाऊ बिजली पैदा करती है। इस परियोजना की शुरुआत दिसंबर 2010 में भारत सरकार और भूटान सरकार ने मिलकर की थी। 1960 के दशक से ही यह परियोजना भारत-भूटान के गहरे रिश्तों का प्रतीक मानी जाती है।

इस पूरी परियोजना के लिए भारत ने लगभग 7,500 करोड़ रुपए का वित्तीय सहयोग दिया है। इसमें 30 प्रतिशत हिस्सा अनुदान (यानी लौटाने की जरूरत नहीं) के रूप में और 70 प्रतिशत हिस्सा रियायती दर पर ऋण के रूप में दिया गया। इस व्यवस्था का मकसद था कि भूटान जैसे मित्र देश को आसान भुगतान शर्तों के साथ मदद मिले। इस परियोजना से भूटान की बिजली उत्पादन क्षमता में करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।

यह परियोजना टर्नकी जॉइंट वेंचर के रूप में पूरी की गई जिसमें भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) मुख्य भारतीय डेवलपर थी। इस परियोजना में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियरों ने भूटान की द्रुक ग्रीन पावर कॉरपोरेशन (DGPC) के साथ मिलकर डिजाइन, निर्माण और संचालन का काम संभाला। भारतीय टीम ने भूटान के इंजीनियरों को भौगोलिक सर्वे, बांध निर्माण और टरबाइन स्थापना में तकनीकी सहायता दी ताकि हिमालयी इलाकों में आने वाली चुनौतियों जैसे भूकंपीय गतिविधियाँ और भूस्खलन से निपटा जा सके।

इस परियोजना को भारत की इंजीनियरिंग परामर्श कंपनियों का पूरा सहयोग मिला। इसमें वॉटर एंड पावर कंसल्टेंसी सर्विसेज (WAPCOS) ने इंजीनियरिंग और डिजाइन का काम संभाला जबकि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ रॉक मैकेनिक्स (NIRM) ने मॉडलिंग और भू-तकनीकी सेवाएँ दीं।

निर्माण कार्य 2011 में शुरू हुआ था लेकिन बीच में परियोजना को कई भौगोलिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा इसमें जमीन धंसने (sinkholes) और नींव की अस्थिरता जैसी समस्याएँ प्रमुख थीं। इन कठिनाइयों के बावजूद भारत और भूटान की टीमों ने मिलकर उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकों के जरिए इन रुकावटों को दूर किया और परियोजना को आगे बढ़ाया। भारत ने इस परियोजना के दौरान पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर भी विशेष ध्यान दिया ताकि पुनाखा-वांगड्यू घाटी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पारिस्थितिक प्रभाव को न्यूनतम रखा जा सके।

भूटान के एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जो इस साल सितंबर में प्रकाशित हुई इस परियोजना ने अब तक लगभग 2,160 मिलियन यूनिट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन किया है, जिससे करीब 6 अरब भूटानी मुद्रा (1 भूटानी मुद्रा =1 भारतीय रुपया) की घरेलू आय हुई है।

पुनात्सांगछू-II परियोजना भूटान में भारत की मदद से बनी एकमात्र जलविद्युत परियोजना नहीं है। भारत ने भूटान में अब तक छह बड़ी संयुक्त जलविद्युत परियोजनाओं को वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग के साथ पूरा किया है, जिनसे भूटान की कुल स्थापित बिजली क्षमता में 3,400 मेगावॉट से अधिक का योगदान हुआ है। भारत, भूटान की बिजली का सबसे बड़ा खरीदार भी है। पिछले कई वर्षों में भारत ने भूटान के साथ छुखा, कुरिचू, ताला, मंगदेछू, पुनात्सांगछू और प्रस्तावित खोलोंगछू जलविद्युत परियोजनाओं में साझेदारी की है। वर्ष 2021 में मंगदेछू जलविद्युत परियोजना (Mangdechhu HEP) को सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय बाँध का पुरस्कार मिला था, जो भारत-भूटान के ऊर्जा सहयोग की बड़ी सफलता मानी जाती है।

भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) नीति से बदल रहा है भूटान

ऐतिहासिक रूप से भारत ने भूटान के विकास में अहम भूमिका निभाई है और वह हमेशा इसकी प्रगति की कहानी का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। भूटान की 13वीं पंचवर्षीय योजना (2024 से 2029) के लिए भारत सरकार ने 10,000 करोड़ रुपए की सहायता देने का वादा किया है। इसमें परियोजनाओं के लिए मदद, सामुदायिक विकास योजनाएँ, आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रम और अनुदान शामिल हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह राशि पिछली 12वीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में 100 प्रतिशत अधिक है।

भारत और भूटान के बीच व्यापारिक संबंध भी काफी मजबूत हैं। वर्ष 2024-25 में भारत ने भूटान को 1.3 अरब डॉलर का निर्यात किया। इनमें पेट्रोलियम उत्पाद, लोहा-इस्पात, अनाज और स्मार्टफोन शामिल थे। वहीं, भूटान ने भारत को कुल 513 मिलियन डॉलर के उत्पादों का निर्यात किया जिनमें बिजली और निर्माण सामग्री प्रमुख थीं।

जलविद्युत परियोजनाओं के अलावा भारत ने भूटान को रेलवे ढाँचे को मजबूत करने में भी मदद दी है। 11 नवंबर को थिम्फू में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि इस वर्ष सितंबर में भारत सरकार ने भूटान के गेलेफू और समत्से शहरों को असम के कोकराझार और पश्चिम बंगाल के बनरहाट से जोड़ने का फैसला किया है। यह परियोजना तीन साल में पूरी होने की उम्मीद है।

करीब 4,033 करोड़ रुपए की इस रेलवे परियोजना के तहत 89 किलोमीटर लंबी दो रेल लाइनों का निर्माण किया जाएगा। इससे यात्रा का समय काफी घट जाएगा और भूटान में भारत की मदद से विकसित की जा रही ‘गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी’ को भी बड़ी बढ़त मिलेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “इस परियोजना के पूरा होने से यहाँ के उद्योगों और भूटानी किसानों को भारत के विशाल बाजार तक आसानी से पहुँच मिल सकेगी।”

भारत थिम्फू-फुएंतशोलिंग हाईवे और बॉर्डर की सड़कों बढ़ाने में भी योगदान दे रहा है। इसके अलावा नई दिल्ली, थिम्फू और पारो में स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में भी मदद कर रही है। भारत ने इन कार्यों और स्वास्थ्य व शहरी ढांचे से जुड़ी अन्य योजनाओं के लिए कुल 1,113 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।

इसके साथ ही भारत, भूटानी छात्रों को भी उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान कर रहा है। नेहरू-वांगचुक छात्रवृत्ति और राजदूत छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं के माध्यम से हर साल 1000 से अधिक भूटानी विद्यार्थियों को भारत में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति दी जाती है। भूटान के लोगों के जीवन को और सुविधाजनक बनाने के लिए भारत अपने UPI सिस्टम को भी वहाँ विस्तार दे रहा है, जिससे डिजिटल भुगतान आसान और तेज हो सके।

दिल्ली धमाके के अगले दिन PM मोदी की भूटान यात्रा: प्रधानमंत्री की इस यात्रा को क्यों नहीं किया जा सका कैंसिल, जानिए कारण

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूटान की राजधानी थिंफू के लिए मंगलवार (11 नवंबर 2025) को दो दिवसीय यात्रा के लिए निकल गए हैं। इस यात्रा के जरिए दोनों देशों के बीच दोस्ती गहरी करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने दिल्ली में लालकिले के पास हुए ब्लास्ट के दोषियों के लिए कड़ा संदेश दिया।

पीएम मोदी ने कहा कि वे भारी मन से भूटान आए हैं। उन्होंने ब्लास्ट में मरने वाले 10 लोगों के लिए शांति प्रार्थना की बात कही। साथ ही ये भी संदेश दिया कि दोषियों को किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जाएगा।

दिल्ली में ब्लास्ट जैसे राष्ट्रीय संकट के समय देश के नेताओं के यात्रा समेत हर गतिविधि पर दुनिया की नजर रहती है। असल में ध्यान से देखा जाए तो यह यात्रा एक सोच-समझकर बनाई गई रणनीति जैसी दिखती है, जिसके तहत संकट से निपटने और भारत की विदेश नीति और लंबे समय की सुरक्षा जरूरतों के बीच संतुलन बनाया गया। हालाँकि कुछ लोगों ने इतनी जल्दी विदेश यात्रा पर जाने के फैसले पर सवाल भी उठाए।

दिल्ली धमाके के तुरंत बाद यात्रा के पीछे की स्थिति

10 नवम्बर, 2025 की शाम दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास काफी भीड़भाड़ वाले चौराहे पर कार में भीषण विस्फोट हुआ। विस्फोट में 10 लोगों की जान जाने के साथ, लोगों में दहशत और सतर्कता का माहौल पैदा हो दिया। इस हादसे में कई लोग अब भी घायल हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए देशवासियों को जाँच का आश्वसन दिया है। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह और अन्य अधिकारियों के साथ स्थिति की तुरंत समीक्षा की ताकि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) जैसी सुरक्षा और फॉरेंसिक एजेंसियों को तैनात किया जा सके, जिससे जाँच और सुरक्षा दोनों सुनिश्चित हों।

इतिहास बताता है कि अचानक संकट के समय राज्यनीति में किए गए बदलाव कभी-कभी दुश्मनों को देश की क्षमता परखने का साहस दे सकते हैं। मोदी ने यह दिखाया कि किसी हमले का सदमा या अव्यवस्था भारत की प्राथमिक विदेश नीति हितों से ऊपर नहीं होगी। उन्होंने भूटान यात्रा जारी रखकर यह संदेश दिया।

पड़ोस में, जहाँ चीन और पाकिस्तान भारत की दबाव झेलने की क्षमता पर नजर रखते हैं, वहाँ पर यह यात्रा बेहद अहम है। घबराहट दिखाने के बजाय स्थिरता दिखाना एक छोटा लेकिन प्रभावी कदम है।

थॉमस मेसजारोस और लॉरेंट डाने के अनुसार, जब किसी फैसले लेने वाली टीम को अचानक कोई अप्रत्याशित या मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ता है तो ‘असाधारण समस्याओं से सामना होने की स्थिति’ के चलते उलझन पैदा हो जाती है। यह उलझन सोचने और सही कदम उठाने की प्रक्रिया को बिगाड़ देती है।

यह स्थिति कभी उलझे हुए संदेशों, कभी अधिक प्रतिक्रिया या देरी के रूप में सामने आती है और ये सब मिलकर टीम की कमजोरी का संकेत देते हैं जिससे विरोधी ताकतें फायदा उठा सकती हैं।

मेजारोस-डैनेट ढाँचे के अनुसार, सदमा एक अचानक और गहरा झटका होता है जो सामान्य सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसके उलट, संकट एक ऐसी प्रक्रिया है जो पूरे सिस्टम को बदल सकती है।

ऐसा ट्रॉमा दिमाग को तार्किक प्रक्रिया को छोड़कर उस स्थिति में ले जाता है जिसे लेखक ‘मानसिक जड़ता’ (psychic sideration) कहते हैं। यानी विचार और व्यवहार का पक्षाघात। इसका परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर नीति पक्षाघात होता है, जब राजनीतिक संस्थाएँ हिचकिचाहट में फँस जाती हैं और बदलाव की बजाय ठहरने का शिकार हो जाती हैं।

इतिहास के उदाहरण बताते हैं कि यह मनोवैज्ञानिक बोझ समाज को कमजोर कर देता है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने 11 सितम्बर के हमलों के बाद पहले ‘रणनीतिक और सामरिक शून्य’ का सामना किया, फिर धीरे-धीरे एक संगठित प्रतिक्रिया तैयार की। बाद में इराक में संस्थागत पक्षाघात और फैसला लेने की क्षमता के अस्त-व्यस्त होने से नीति का अधिक विस्तार हुआ जिससे हालात और बिगड़े।

इसी तरह, भारत 1962 के चीन-भारत युद्ध के दौरान आत्ममंथन और सतर्कता में उलझ गया और वर्षों तक अपनी सीमाओं से बाहर शक्ति प्रदर्शित करने में हिचकिचाता रहा। इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि जब भावनात्मक भ्रम राज्यनीति पर हावी हो जाता है, तो उसके परिणाम गंभीर होते हैं। समाज कमजोर पड़ता है, संस्थाएँ ठहर जाती हैं और दुश्मन इसका फायदा उठाते हैं।

पीएम मोदी के लिए यह दिखाना बेहद जरूरी था कि सदमे और संकट के बीच भी शासन की प्रक्रिया जारी रह सकती है। उनकी भूटान यात्रा एक प्रतीकात्मक संदेश थी कि आंतरिक अशांति के बावजूद भारत अपने कूटनीतिक और क्षेत्रीय दायित्वों को पूरा करता रहेगा।

क्राइसिस थ्योरी में इसे ‘संकट में प्रवेश का प्रबंधन’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य होता है कि घबराहट फैलने से पहले पूरे सिस्टम को स्थिर किया जाए। जो नेता इस शुरुआती दौर में निर्णायक कदम उठाते हैं वे बाजारों, नौकरशाही और लोगों के बीच अनिश्चितता को फैलने से रोकते हैं।

सदमे के जवाब में रणनीतिक निरंतरता

मेजारोस और डैनेट के अनुसार, एक सकारात्मक सदमा असल में संकट को नियंत्रण करने की क्षमता रखता है। इसे वे ‘मानसिक सूजन-रोधी’ (psychic anti-inflammatory) कहते हैं, जो स्थिति को बिगड़ने से रोकता है।

राजनीति में इसका अर्थ है कि नेता निर्णायक और स्थिरता लाने वाले कदम उठाकर राष्ट्रीय माहौल को पहले जैसा कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की भूटान यात्रा ठीक उसी तरह का काउंटर-शॉक थी। इसने उस डर और अटकलों के चक्र को तोड़ दिया जिसे हमले ने पैदा करने की कोशिश की थी और उसकी जगह व्यवस्था और सामान्यता की तस्वीर पेश की।

इतिहास में भी इससे जुड़े कई उदाहरण मौजूद हैं

  • 1940 में लंदन ब्लिट्ज के दौरान विंस्टन चर्चिल ने अपने सार्वजनिक कार्यक्रम जारी रखे और क्षतिग्रस्त इलाकों में घूमे, ताकि जनता को दिखा सकें कि सरकार अब भी मौजूद और सक्रिय है।
  • 2011 में अरब स्प्रिंग के जवाब में मोरक्को के राजा मोहम्मद VI ने सबको चौंकाते हुए अपनी व्यक्तिगत शक्तियाँ कम कर दीं और संवैधानिक बदलावों की घोषणा की। इस कदम ने ‘सामाजिक-राजनीतिक संकट को कम किया’ और अशांति को समाप्त कर दिया।

क्या होता अगर पीएम मोदी रुक जाते

अगर प्रधानमंत्री मोदी अपनी यात्रा को स्थगित कर देते तो उसका प्रतीकात्मक असर तुरंत और नकारात्मक होता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे भारत के रक्षात्मक आत्ममंथन के रूप में देखा जा सकता था जबकि घरेलू स्तर पर यह चिंता और असुरक्षा का संकेत देता। ऐसे संकेत इतिहास में कई बार भारी रणनीतिक नुकसान का कारण बने हैं।

1986 की चेर्नोबिल त्रासदी में सोवियत नेतृत्व की हिचकिचाहट और चुप्पी ने उनकी प्रतिष्ठा को देश और विदेश दोनों में नुकसान पहुँचाया। इसी तरह, 1993 के मुंबई सिलसिलेवार धमाकों में भारत की देर से आई राष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने असुरक्षा का भाव पैदा किया जिससे वर्षों तक सीमा-पार नेटवर्कों को प्रोत्साहन मिला।

1979 के ईरान बंधक संकट में अमेरिका की शुरुआती अनिश्चितता ने तेहरान को आत्मविश्वास दिया और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी रोकथाम की क्षमता को कमजोर किया।

इसके विपरीत वे देश जो संकट के समय आगे बढ़ते हैं, अक्सर अधिक मजबूत होकर निकलते हैं। उदाहरण के लिए 1973 के योम किप्पुर युद्ध में इजराइल का नेतृत्व पहले तो झटके में आया, लेकिन तुरंत सदमे से निकलकर जवाबी कार्रवाई में जुट गया और रणनीतिक पहल बनाए रखी। यही सिद्धांत कूटनीति में भी लागू होता है। दबाव के बीच कई कार्य करने की क्षमता संस्थागत परिपक्वता और मानसिक तैयारी का संकेत देती है।

नेतृत्व की छवि और निदान को लेकर तर्क

विदेश नीति में विश्वसनीयता केवल भाषणों पर नहीं बल्कि दबाव की स्थिति में दिखाए गए व्यवहार पर आधारित होती है। भारत की ‘पड़ोस पहले’ और ‘हिमालय सुरक्षा’ नीतियों का अहम हिस्सा रहे भूटान की यात्रा को जारी रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय संपर्क और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी।

भूटान डोकलाम और अन्य क्षेत्रों में चीनी दबाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण बफर राज्य है। पीएम मोदी के इस निर्णय से भूटान आश्वस्त हुआ कि भारत के वादे आंतरिक उथल-पुथल के बावजूद अटल हैं।

निवारण सिद्धांत (Deterrence Theory) के अनुसार, ऐसे कदम किसी राज्य के दृढ़ संकल्प संकेत को मजबूत करते हैं यानी यह विश्वास कि छोटे पैमाने के उकसावे उसके निर्णय-निर्माण को प्रभावित नहीं कर सकते।

इसके उलट, अगर यात्रा रद्द कर दी जाती और यह दिखाया जाता कि छोटे आतंकी हमले भारत की रणनीतिक योजनाओं को बदल सकते हैं तो इससे वही नेटवर्क प्रेरित होते जिन्होंने विस्फोट की साजिश रची थी। इसलिए, पीएम मोदी की स्थिरता ने एक संभावित कमजोरी को दृढ़ता की घोषणा में बदल दिया।

लीडरशिप में संकट आने पर सामने आता है मोदी सिद्धांत

क्राइसिस मैनेजमेंट के पाठ में ‘सदमे के लिए मानसिक तैयारी’ के महत्व पर जोर दिया गया है। इसका अर्थ है कि नेताओं को दिनचर्या में आने वाली रुकावट के लिए तैयार रहना चाहिए और सिस्टम को इस तरह सक्षम बनाना चाहिए कि वे संकट के बावजूद काम करता रहे।

पिछले 10 वर्षों में भारत की शासन संस्कृति ने इस सोच को धीरे-धीरे आत्मसात किया है। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर 2020 के गलवान संघर्ष तक, ध्यान हमेशा इस बात पर रहा है कि बल प्रयोग से पहले शांतिपूर्ण और संयमित प्रतिक्रिया दी जाए। यही पैटर्न भूटान यात्रा में भी दिखा, जिसने यह साबित किया कि तनाव की स्थिति में भारत की स्वाभाविक प्रतिक्रिया घबराहट नहीं बल्कि शांति है।

दिल्ली धमाके का उद्देश्य अनिश्चितता पैदा करना था। एक रणनीतिक नकारात्मक सदमा जो नीति में चिंता, विचलन और हिचकिचाहट ला सके। लेकिन इस नकारात्मक सदमे को प्रधानमंत्री मोदी के यात्रा जारी रखने के फैसले ने एक सकारात्मक सदमे से निष्क्रिय कर दिया। जैसा कि मेजारोस और डैनेट ने कहा है, “सदमे के दो असर हो सकते हैं- या तो यह सोचने और कार्य करने की क्षमता खत्म हो जाए और या फिर यह प्रतिक्रिया देने की क्षमता को बढ़ा देता है।” मोदी की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से दूसरे असर के अनुरूप थी।

कूटनीतिक निरंतरता बनाए रखते हुए उन्होंने असुरक्षा की तस्वीर को किनारे कर दिया, भारत की अंतरराष्ट्रीय गति को बनाए रखा और यह दोहराया कि शासन आतंक के बीच भी चलता रहना चाहिए। ऐसी स्थिरता इतिहास से भी समर्थित है। चर्चिल के उदाहरण से लेकर मोरक्को के सुधारों तक और आधुनिक निवारण सिद्धांत तक, सबक यही है, “जो राज्य सदमे पर नियंत्रण पा लेते हैं, वे अपनी नियति खुद तय करते हैं।”

भारत-भूटान के संबंध: परंपरा और रणनीतिक साझेदारी

भारत और भूटान के लंबे समय से चले आ रहे विशेष संबंधों की नींव असल में गहराई से अपनाया गया आपसी विश्वास, साझा आध्यात्मिक परंपरा और भौगोलिक निकटता हैं। हाइड्रोपॉवर, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और रक्षा सहयोग इस साझेदारी की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

हिमालयी क्षेत्र में स्थित भू-आवेष्ठित (landlocked) राष्ट्र भूटान, चीन और भारत के बीच एक महत्वपूर्ण बफर राज्य की भूमिका निभाता है। अपनी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, भारत भूटान का सबसे विश्वसनीय साझेदार बना हुआ है और सुरक्षा सहयोग तथा विकास पहलों में लगातार समर्थन देता है।

रडार के पीछे के उद्देश्य

हालाँकि आधिकारिक बयान दोस्ती, विकास और सांस्कृतिक उत्सव पर केंद्रित था, लेकिन इस यात्रा के पीछे कई कम स्पष्ट लेकिन महत्वपूर्ण लक्ष्य भी थे।

  • चीनी प्रभाव का मुकाबला: अधूरे सीमा विवादों के बीच चीन भूटान में लगातार कूटनीतिक और बुनियादी ढाँचे से जुड़ी पहल कर रहा है। मोदी की यात्रा ने पूर्वी हिमालय में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती दी और भूटान के प्रति भारत की सुरक्षा प्रतिबद्धता को दोहराया।
  • सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढाँचा: संवेदनशील क्षेत्रों के पास सड़क और निगरानी सुधारों के माध्यम से सीमा नियंत्रण को मजबूत करने पर गोपनीय चर्चाएँ इस यात्रा का हिस्सा हैं।
  • आर्थिक परस्पर निर्भरता: भारत के निवेश का उद्देश्य भूटान की जलविद्युत परियोजनाओं और नई सीमा-पार रेल कनेक्शनों के जरिए आर्थिक निर्भरता बढ़ाना है, ताकि वैकल्पिक व्यापार मार्गों से चीन के प्रभाव के प्रति भूटान की संवेदनशीलता कम हो।
  • सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन: मोदी की प्रार्थनाएँ और राजा का जन्मदिन जैसे भूटान के उत्सवों में भागीदारी भारत के सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करती है और सॉफ्ट पावर के जरिए भूटान की जनता और अभिजात वर्ग की राय भारत के पक्ष में प्रभावित करती है।
  • खुफिया और संकट तैयारी: संभावित सीमा या आंतरिक सुरक्षा खतरों के खिलाफ बंद दरवाजों के पीछे खुफिया जानकारी साझा करना और समन्वय जारी है। ऐसी यात्राएँ अपडेट और संयुक्त योजना बनाने में मदद करती हैं।
  • जल और जलवायु सहयोग: जलवायु लचीलापन और साझा जल संसाधन प्रबंधन पर चर्चाएँ खासकर पर्यावरण से जुड़े अहम क्षेत्रों में भारत को भूटान का पसंदीदा साझेदार बनाती हैं।

भू-राजनीतिक प्रभाव

इस अहम समय पर भारत-भूटान के कूटनीतिक संबंधों को दक्षिण एशिया और हिमालयी क्षेत्र की बड़ी रणनीतिक तस्वीर में देखना जरूरी है। भूटान भारत की उस रणनीति का अहम हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उत्तर-पूर्वी सीमा की रक्षा करना और चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को रोकना है।

बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे की परियोजनाओं का उद्घाटन और सांस्कृतिक कूटनीति सोची-समझी कार्रवाइयाँ थीं, जिन्होंने भूटान की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता के लिए भारत पर निर्भरता को और मजबूत किया। इस यात्रा ने यह संदेश भी दिया कि आतंकवादी हमलों के बावजूद भारत के रणनीतिक हित और विदेशी प्रतिबद्धताएँ प्रभावित नहीं होंगी।

दिल्ली धमाके के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूटान यात्रा का विचारपूर्ण निर्णय लिया, जो कठिन सुरक्षा परिस्थिति में उनके राजनेता-सुलभ नेतृत्व को दर्शाता है। इस यात्रा ने न केवल महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाया, बल्कि भारत-भूटान की अटूट दोस्ती को भी मजबूत किया और भारत की दृढ़ता को प्रदर्शित किया।

पीएम मोदी ने यह दिखाया कि संकट के समय भी भारत की स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ मजबूत स्तंभ बनी रहती हैं क्योंकि उन्होंने तात्कालिक संकट प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक कूटनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाया है।

इस यात्रा ने भारत-भूटान संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ भारत के बड़े क्षेत्रीय लक्ष्य को भी सामने रखा। अडिग सहयोग और रणनीतिक दृष्टि के साथ स्थिरता को बढ़ावा देना और बाहरी दबावों का सामना करना।

इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी का नेतृत्व रणनीतिक दृष्टि और सहानुभूति का मिश्रण था। उन्होंने विस्फोट में मारे गए परिवारों के प्रति सार्वजनिक रूप से संवेदना व्यक्त की और साथ ही एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाया। यह भारत के संस्थानों पर विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा व विदेश नीति के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था।

ये लेख मूल रूप से दिव्यांश तिवारी ने लिखा है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।