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जितने साल से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री, उतने साल जवाहर लाल नेहरू ने जेल में बिताए: वंदे मातरम पर चर्चा के दौरान लोकसभा में प्रियंका गाँधी ने किया जो दावा, वह कितना सच?

लोकसभा में वंदे मातरम पर गरमा गरम बहस में प्रियंका गाँधी ने सदन में अपने संबोधन के दौरान कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के लिए जिए और देश के लिए ही उन्होंने दम तोड़ा। प्रियंका गाँधी ने आगे दावा किया कि ‘जितने दिनों तक मोदी जी प्रधानमंत्री रहे, करीब उतने ही दिन नेहरू जेल में रहे।’ प्रियंका गाँधी ने अपने बयान में पंडित नेहरू के जेल में बिताए वर्षों को 12 साल बताया और इसे प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के बराबर बताया।

जवाहरलाल नेहरू का ‘जेल जीवन’

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू को ब्रिटिश सरकार द्वारा विभिन्न आंदोलनों और अभियानों में भाग लेने के लिए 1921 और 1945 के बीच कुल 9 बार गिरफ्तार किया गया था। इन सभी अवधियों को मिलाकर, नेहरू ने अपनी पूरी ज़िंदगी में जेल में लगभग 3259 दिन बिताए, जो 8 साल और 11 महीने के बराबर है। यह अवधि प्रियंका गाँधी द्वारा सदन में बताए गए 12 साल के आँकड़े से काफी कम है।

जवाहरलाल नेहरू की सबसे लंबी हिरासत नौवाँ कारावास था, जो भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अहमदनगर के किले में थी। इसकी समय सीमा अगस्त 1942 से जून 1945 तक चली थी, यानी पूरे 1041 दिनों तक।

जवाहरलाल नेहरू के नौ कारावासों का विवरण

जवाहरलाल नेहरू को अपनी 9 जेल यात्राओं के दौरान अलग-अलग अवधि के लिए हिरासत में रखा गया था।

  • पहला कारावास लखनऊ जिला जेल में 87 दिनों तक (6 दिसंबर 1921 से 3 मार्च 1922 तक): जवाहरलाल नेहरू करीब 6 महीने जेल में रहें और 100 रुपए का जुर्माना लगा। तकनीकी आधार पर अपनी आधी से भी कम सजा पूरी करने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
  • दूसरा कारावास इलाहाबाद जिला जेल में 10 दिन बिताए (11 मई 1922 से लेकर 20 मई 1922 तक) और लखनऊ जिला जेल में 256 दिन बताए ( 21 मई 1922 से लेकर 31 जनवरी 1923 तक)। इसमें जवाहरलाल नेहरू को विदेशी कपड़ों की बिक्री के विरोध में धरना आयोजित करके कपड़ा व्यापारियों को धमकाने का आरोप जेल की सजा हुई। 18 महीने का कारावास और 100 रुपए का जुर्माना लगा।
  • तीसरा कारावास नाभा जेल में 12 दिन बिताए (22 सितंबर 1923 से लेकर 4 अक्टूबर 1923 तक): जेल जाने का कारण नाभा प्रिंसली स्टेट में महाराजा के पदच्युत होने के विरोध में चल रहे सिख आंदोलन में भाग लेना और नाभा छोड़ने के आदेश का उल्लंघन करना था। जवाहरलाल नेहरू को कुल छह महीने से अठारह महीने तक की सजा सुनाई गईं। नाभा जेल में जवाहरलाल नेहरू को छुड़ाने के लिए उनके पिता ने एड़ी-चोटी का जोड़ लगा दिया था, जो कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके थे। जवाहरलाल नेहरू को जेल से तभी छोड़ा गया था, जब उन्होंने नाभा प्रिंसली स्टेट के क्षेत्र में प्रवेश ना करने के लिए साइन करके दिया था। नाभा जेल में कीचड़ और कमरे के कम एरिया को देखकर ही नेहरू के पसीने छूट गए थे।
  • चौथा कारावास नैनी सेंट्रल जेल, इलाहाबाद में 181 दिन बिताए (14 अप्रैल 1930 से 11 अक्टूबर 1930 तक)। जवाहरलाल नेहरू ने छह महीन जेल में रहे।
  • पाँचवाँ कारावास नैनी सेंट्रल जेल, इलाहाबाद में 99 दिन बिताए (19 अक्टूबर 1930 से 26 जनवरी 1931 तक)। जेल जाने का कारण किसानों के बीच कर-मुक्ति अभियान का सक्रिय प्रचार और राजद्रोह का आरोप था। राजद्रोह के लिए 18 महीने और अन्य आरोपों के लिए छह-छह महीने की सजा काटी। कुल दो साल का कारावास।
  • छठा कारावास- छठा कारावास में जवाहर लाल नेहरू 4 बार जेल गए और 614 दिन बिताए थे। इसमें पहला नैनी सेंट्रल जेल, इलाहाबाद में 42 दिन बिताए (26 दिसंबर 1931 से 5 फरवरी 1932 तक), दूसरा बरेली जिला जेल में 122 दिन बिताए (6 फरवरी 1932 से 6 जून 1932 तक), तीसरा देहरादून जेल में 443 दिन बिताए (6 जून 1932 से 23 अगस्त 1933 तक), चौथा नैनी सेंट्रल जेल, इलाहाबाद में 7 दिन बिताए (24 अगस्त 1933 से 30 अगस्त 1933 तक)। जेल जाने का कारण काश्तकारों के लिए लगान-मुक्त अभियान शुरू करना और इलाहाबाद की सीमा से बाहर जाने पर रोक लगाने वाले अध्यादेश का उल्लंघन था।
  • सातवाँ कारावास- सातवें कारावास में जवाहरलाल नेहरू कुल 4 बार जेल गए और 558 दिन बिताए थे। पहला अलीपुर सेंट्रल जेल, कलकत्ता में 85 दिन बिताए (12 फरवरी 1934 से 7 मई 1934 तक), दूसरा देहरादून जेल में 96 दिन बिताए (8 मई 1934 से 11 अगस्त 1934 तक), तीसरा नैनी सेंट्रल जेल, इलाहाबाद में 66 दिन बिताए (23 अगस्त 1934 से 27 अगस्त 1934 तक), चौथा अल्मोड़ा जेल में 311 दिन बिताए (28 अक्तूबर 1934 से 3 सितंबर 1935 तक)। जेल जाने का कारण बंगाल में दमनकारी नीतियों के विरुद्ध जनसभाओं को संबोधित करना और राजद्रोह का आरोप था।
  • आठवाँ कारावास- आठवें कारावास में भी जवाहरलाल नेहरू कुल 4 बार जेल गए थे और कुल 399 दिन बिताए थे। पहला गोरखपुर जेल में 17 दिन बिताए (31 अक्तूबर 1940 से 16 नवंबर 1940 तक), दूसरा देहरादून जेल में 104 दिन बिताए (17 नवंबर 1940 से 28 फरवरी 1941 तक), तीसरा लखनऊ जिला जेल में 49 दिन बिताए (1 मार्च 1941 से 18 अप्रैल 1941 तक), चौथा देहरादून जेल में 229 दिन बिताए (19 अप्रैल 1941 से 3 दिसंबर 1941 तक)।
  • नौंवा कारावास- नौंवे कारावास में भी जवाहरलाल नेहरू कुल 3 बार जेल गए और 1041 दिन बिताए थे। पहला अहमदनगर किला जेल में 963 दिन बिताए (9 अगस्त 1942 से 28 मार्च 1945 तक), जो अबतक की सबसे लंबी अवधि थी। दूसरा बरेली सेंट्रल जेल में 72 दिन बिताए (30 मार्च 1945 से 9 जून 1945 तक), तीसरा अल्मोड़ा जेल में 6 दिन बिताए (10 जून 1945 से 15 जून 1945 तक)।

इस हिसाब से जवाहरलाल नेहरू के जेल की कुल अवधि 3259 दिन और कुल वर्ष लगभग 8 साल 11 महीने थी।

जेल में जवाहरलाल नेहरू का समय कैसे बीता

जवाहरलाल नेहरू ने कारावास के दौरान जेल की बुनियादी असुविधाएँ और कठोर व्यवस्था बहुत अखरती थीं। उनके तीसरे कारावास (नाभा जेल, 1923) के दौरान, उन्हें एक अस्वच्छ, कीचड़ वाली और नम कोठरी में रखा गया था जहाँ चूहे घूमते थे और उन्हें जमीन पर सोना पड़ता था। उनके साथी कैदी के सन्तानम ने लिखा है कि नेहरू इस व्यवस्था से इतने झुँझला गए थे कि अपनी निराशा निकालने के लिए वह रोज आधे घंटे कमरे में झाड़ू लगाने लगे थे।

जहाँ उन्हें 2 साल की सजा सुनाई गई थी, वहीं वह मात्र 12 दिनों में ही जेल से बाहर आ गए। यह जल्दी रिहाई उनके पिता मोतीलाल नेहरू के अथक प्रयासों का परिणाम थी। मोतीलाल नेहरू ने अपने बेटे को छुड़ाने के लिए पंजाब के अधिकारियों और यहाँ तक कि वायसराय से भी संपर्क किया था।

नेहरू को नाभा जेल से तब छोड़ा गया जब उन्होंने एक शर्त पर हस्ताक्षर किए कि वह फिर कभी नाभा प्रिंसली स्टेट के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करेंगे। इस तरह, कठोर और अस्वच्छ जेल जीवन से परेशान नेहरू, बॉन्ड (भविष्य में नाभा में प्रवेश न करने का वादा) भरकर बहुत कम समय में बाहर आने में कामयाब रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार सँभाला था। 26 मई 2014 से लेकर 9 दिसंबर 2025 तक की अवधि को मिलाकर पीएम मोदी कुल 4214 दिन इस पद पर रह चुके हैं। समय के वर्षों में रूपांतरण के अनुसार यह अवधि 11 वर्ष, 6 महीने और 13 दिन होती है, और यह कार्यकाल अब भी लगातार जारी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जुलाई 2025 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के 4077 दिनों के कार्यकाल को पीछे छोड़ते हुए भारत के दूसरे सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाया। देश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद संभालने का रिकॉर्ड पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम है, जिन्होंने लगभग 17 वर्ष, यानी 6130 दिन, भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था।

प्रियंका गाँधी के दावे की सत्यता

लोकसभा में बहस के दौरान प्रियंका गाँधी वाड्रा ने दावा किया कि जितने दिनों तक मोदी जी प्रधानमंत्री रहे, लगभग उतने ही दिन जवाहरलाल नेहरू जेल में रह। जवाहरलाल नेहरू की परनाति प्रियंका गाँधी का यह बयान तथ्यात्मक रूप से गलत है और इसका कोई आधार नहीं है। जवाहरलाल नेहरू ने लगभग 8 साल, 11 महीने जेल में बिताए, जबकि प्रधानमंत्री मोदी का मौजूदा कार्यकाल 11 साल, 6 महीने से अधिक है। दोनों अवधियों में लगभग ढाई साल (2.5 वर्ष) का स्पष्ट अंतर है।

प्रियंका गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए 12 साल के आँकड़े की तुलना पीएम मोदी के 11 साल, 6 महीने के कार्यकाल से की, जो वास्तविकता पर आधारित नहीं है। यह स्पष्ट है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मौजूदा कार्यकाल की तुलना में काफी कम समय जेल में बिताया था। सदन में दिया गया प्रियंका गाँधी वाड्रा का बयान, एक सार्वजनिक बहस के दौरान राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा था, जिसका तथ्यात्मक आधार कमजोर है।

भारत का नागरिक बनने से पहले वोटर कैसे बन गईं?: सोनिया गाँधी से दिल्ली की कोर्ट ने माँगा जवाब, जानिए क्या है मामला

दिल्ली की एक अदालत ने कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य सोनिया गाँधी को नोटिस जारी किया है। कोर्ट में दायर अर्जी में दावा किया गया है कि उनका नाम नई दिल्ली से 1980 वोटर लिस्ट में जोड़ा गया, फिर 1982 में हटा दिया गया। नोटिस नागरिकता लेने से पहले वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने को लेकर है। सोनिया गाँधी और राजीव गाँधी की शादी 25 फरवरी 1968 को हुई थी। दावा किया जा रहा है कि उन्होंने 1983 में देश की नागरिकता ली।

अर्जी में कहा गया है कि सोनिया गाँधी का नाम 3 साल पहले वोटर लिस्ट में जोड़ दिया गया था। इस संबंध में एक अर्जी मजिस्ट्रेट कोर्ट में खारिज की गई थी, जिसके खिलाफ रिवीजन अर्जी दायर की गई थी। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देने से मना कर दिया था।

फर्जी दस्तावेज का किया गया होगा इस्तेमाल- याचिकाकर्ता

याचिका में कहा गया है कि पहली बार नाम जोड़ने में फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया होगा। क्योंकि उस वक्त उनके पास देश की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज नहीं थे। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि ये अपराध है इसलिए प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया जाए।

स्पेशल जज (PC Act) विशाल गोगने ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन पर सीनियर एडवोकेट पवन नारंग की शुरुआती दलीलें सुनीं और सोनिया गाँधी और दिल्ली पुलिस से जवाब माँग लिया। इस मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी, 2026 को होगी।

अपनी अर्जी में त्रिपाठी ने कहा है कि सोनिया गाँधी का नाम 1980 में नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र के इलेक्टोरल रोल में शामिल किया गया था, जबकि वह अप्रैल 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं। अर्जी में जानकारी दी गई है कि सोनिया गाँधी का नाम 1980 में जोड़ा गया, 1982 में हटाया गया और फिर 1983 में जोड़ा गया।

इससे पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि कोर्ट याचिकाकर्ता की माँग के अनुसार जाँच शुरू नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति की नागरिकता से जुड़े मामले केंद्र सरकार के खास अधिकार क्षेत्र में आते हैं और किसी व्यक्ति को इलेक्टोरल रोल में शामिल करने या बाहर करने की योग्यता तय करने का अधिकार भारत के चुनाव आयोग (ECI) के पास है।

कोर्ट ने माँगा सोनिया गाँधी से जवाब

नागरिक बने बगैर वोटर लिस्ट में नाम होने के फर्जीवाड़े को लेकर कोर्ट ने सोनिया गाँधी के खिलाफ दाखिल रिवीजन पिटीशन पर नोटिस जारी किया और जवाब माँगा। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को भी इस मामले में नोटिस जारी किया है।

सोनिया गाँधी ने 30 अप्रैल 1983 को भारत की नागरिक बनीं। 1980 में सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट में शामिल किया गया। जबकि 1982 में उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया। याचिका में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का भी जिक्र किया गया है। अब सवाल यह है कि 1980 में नागरिकता किस आधार पर दी गई।

क्या है सोनिया गाँधी के वोटर लिस्ट का मामला

सोनिया गाँधी का नाम पहली बार 1980 में मतदाता सूची में दिखाई दिया था, उस वक्त उनके पास इटली की नागरिकता थी। इसके तीन साल बाद वो भारत की नागरिक बनीं। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था।

बीजेपी नेता अमित मालवीय के मुताबिक, 1980 से पहले पीएम आवास के पते पर पंजीकृत मतदाता सूची में इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी और मेनका गाँधी के नाम थे। नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में 1 जनवरी, 1980 को अर्हता तिथि मानकर 1980 में संशोधन किया गया था। संशोधन के बाद सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 145 के क्रमांक 388 पर जोड़ा गया। यह प्रक्रिया उस कानून का स्पष्ट उल्लंघन थी, जिसके अनुसार मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।”

नाम हटा, फिर 2 साल बाद जुड़ा

सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने और फिर जोड़ने को लेकर अमित मालवीय ने कहा कि 1982 में भारी विरोध के बाद सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया और 1983 में फिर से नाम जोड़ दिया गया। इस बार भी नाम जोड़ने पर सवाल उठे थे। 1983 के मतदाता सूची के संशोधन में सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 140 के क्रम संख्या 236 पर दर्ज था। पंजीकरण की अर्हता तिथि 1 जनवरी, 1983 थी। जबकि उन्हें 30 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई।

कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मालवीय ने कहा, “सोनिया गाँधी का नाम नागरिकता के लिए अनिवार्य शर्तें पूरी किए बिना ही दो बार मतदाता सूची में दर्ज हुआ। पहली बार 1980 में , जब वह एक इतालवी नागरिक थीं और दूसरी बार 1983 में जब कानूनी रूप से वह भारत की नागरिक नहीं बनी थीं।”

सोनिया गाँधी ने शादी के तुरंत बाद नागरिकता क्यों नहीं ली? इस पर सवाल खड़ा न करते हुए बीजेपी नेता ने कहा, “हम यह भी नहीं पूछ रहे हैं कि राजीव गाँधी से शादी करने के बाद उन्हें भारतीय नागरिकता स्वीकार करने में 15 साल क्यों लग गए? लेकिन यह घोर चुनावी धाँधली नहीं है, तो और क्या है?”

बम-बंदूक की जगह सड़क, रोजगार और 4G नेटवर्क: बस्तर में खत्म हुआ ‘लाल आतंक’ तो बहने लगी विकास की बयार, जानें कैसे डबल इंजन की सरकार की रणनीति ने बदली तस्वीर

छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका कई सालों से नक्सल हिंसा और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता था। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। सुरक्षा में सुधार और लगातार विकास के कामों ने इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर के 250 गाँवों के लिए ग्रामीण बस सेवा शुरू की है। वहीं, बीजापुर के कोंडापल्ली गाँव में पहली बार 4G मोबाइल नेटवर्क पहुँचा है। यह दोनों बातें दिखाती हैं कि बस्तर अब धीरे-धीरे बाकी दुनिया से जुड़ रहा है।

यह बदलाव सिर्फ नई सुविधाएँ देने तक सीमित नहीं है। यह राज्य सरकार की ‘समन्वित विकास और सुरक्षा’ नीति का सीधा नतीजा है। ताजा आँकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2023 से अब तक चलाए गए अभियानों में 445 नक्सली मारे गए हैं और 1588 ने आत्मसमर्पण किया है। सुरक्षाबलों की इस सफलता के बाद ‘नियद नेल्ला नार’ जैसी योजनाएँ तेजी से आगे बढ़ पाई हैं। इन योजनाओं की मदद से सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएँ अब उन जंगलों तक पहुँच रही हैं, जहाँ पहले पहुँचना लगभग असंभव था।

ये बदलाव लोगों में भरोसा बढ़ा रहे हैं और उन्हें सरकार व मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं। यही वह चीज है जो लंबे समय से नक्सली प्रभाव को कमजोर करने के लिए सबसे जरूरी थी। अब बस्तर के लोग खुद अपने जीवन में विकास को महसूस कर रहे हैं और यही असली बदलाव है।

सुरक्षा अभियानों की सफलता और विकास का खुलता रास्ता

बस्तर में विकास की शुरुआत तभी हुई, जब सरकार ने नक्सलवाद से निपटने पर मजबूत पकड़ बनाई। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गृह मंत्री अमित शाह को बताया था कि राज्य सरकार ‘समन्वित विकास और सुरक्षा’ की नीति पर काम कर रही है। मतलब साफ है, सिर्फ बंदूक से नक्सलवाद खत्म नहीं होंगे, इसके लिए लोगों की जिंदगी में विकास पहुँचाना भी उतना ही जरूरी है।

दिसंबर 2023 से अब तक सरकार को बड़ी सफलता मिली है। 33 बड़ी मुठभेड़ों में 445 नक्सली मारे गए हैं, जिनमें कई बड़े नेता भी थे। लगभग 1554 नक्सली गिरफ्तार हुए हैं और 1588 ने आत्मसमर्पण किया है। ये आँकड़े दिखाते हैं कि नक्सलवाद का नेटवर्क अब पहले जितना मजबूत नहीं रहा।

संवेदनशील इलाकों में नए सुरक्षा कैम्प बनाए गए हैं। इन कैम्पों की वजह से नक्सली हमले कम हुए और सरकार के अधिकारी उन गाँवों तक पहुँच पाए, जहाँ पहले जाना मुश्किल था। इसी से कोंडापल्ली जैसे गाँवों में सड़क, बिजली और नेटवर्क जैसी सुविधाएँ पहुँचना संभव हुआ।

वहीं, सुकमा के कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव ने बताया कि CRPF और पुलिस के साथ मिलकर प्रशासन ‘सिविक एक्शन प्रोग्राम’ चला रहा है। इसके तहत, गाँव वालों को साइकिलें दी जा रही हैं। पहले लोगों को राशन या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने के लिए 5-10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था, लेकिन अब साइकिल से उनकी जिंदगी बहुत आसान हो गई है।

जब सुरक्षा मिली, तब लोगों में भी हिम्मत आई। जो गाँव पहले डर के कारण नक्सलियों का साथ देने को मजबूर थे, अब खुलकर सरकार के साथ खड़े हैं। यही भरोसा इस लड़ाई की सबसे बड़ी जीत है। यह बदलाव दिखाता है कि बस्तर अब धीरे-धीरे डर से निकलकर विकास की राह पकड़ रहा है।

विकास के माध्यम से मुख्यधारा से जुड़ाव

सरकार ने पहले सुरक्षा को मजबूत बनाया और उसी भरोसे के साथ ‘नियद नेल्ला नार’ योजना को कामयाब बनाया। इस योजना का मकसद है कि 403 गाँवों तक बुनियादी सुविधाएँ पहुँचाई जाएँ, जो 69 नए सुरक्षा कैम्पों के आसपास बसे हैं।

इस योजना के तहत, 9 विभागों की 18 सामुदायिक सेवाएँ और 11 विभागों की 25 लाभकारी योजनाएँ सीधे लोगों तक पहुँच रही हैं। इसमें सड़क बनाना, बिजली कनेक्शन, स्कूल और शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और पीने का पानी जैसी जरूरी सुविधाएँ शामिल हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री ने बस्तर के 250 गाँवों में मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा शुरू की। पहले नक्सलवाद खतरे की वजह से इन गाँवों में बस नहीं आती थी। अब 36 नई बसें शुरू होने से ये गाँव शहरों, अस्पतालों और जिला मुख्यालयों से सीधे जुड़ गए हैं। इससे लोगों का आवागमन आसान हुआ है और स्थानीय कारोबार और अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।

कोंडापल्ली की कहानी: डिजिटल कनेक्टिविटी का उत्सव

कोंडापल्ली गाँव की कहानी बस्तर में हो रहे बदलाव को बहुत अच्छे से दिखाती है। यह गाँव तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा पर घने जंगलों में है, जहाँ दशकों तक सड़क, बिजली या पानी जैसी कोई सुविधा नहीं थी। जब पूरे देश में लोग 5G नेटवर्क की बातें कर रहे हैं, तब कोंडापल्ली में पहली बार 4G मोबाइल नेटवर्क आना एक बड़ी बदलाव है। नक्सली हिंसा के कारण यह गाँव सालों तक बाहर की दुनिया से कटा हुआ था।

जैसे ही मोबाइल टावर चालू हुआ, गाँव वाले इसे सिर्फ तकनीकी सुविधा नहीं बल्कि ‘दुनिया से जुड़ने का पहला असली रास्ता’ मानने लगे। महिलाएँ, पुरुष और बच्चे मिलकर रैली निकाले, टावर की पूजा की और मांदर की थाप पर नाचने लगे। सुरक्षा बलों ने भी इसमें हिस्सा लिया और मिठाइयाँ बाँटी। यह दिखाता है कि विकास ने लोगों में उम्मीद और खुशी जगाई है।

अब मोबाइल नेटवर्क से गाँव वाले डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठा पाएँगे। वे अब बैंकिंग, आधार, राशन, पेंशन, ऑनलाइन पढ़ाई और टेलीमेडिसिन जैसी सेवाएँ घर बैठे इस्तेमाल कर सकेंगे। पहले इसके लिए उन्हें मीलों दूर जंगलों में पैदल जाना पड़ता था।

कोंडापल्ली गाँव में मोबाइल नेटवर्क आने के साथ-साथ अन्य विकास के काम भी तेजी से चल रहे हैं। केवल दो महीने पहले ही गाँव में पहली बार बिजली लाइन पहुँची। इससे बच्चों की पढ़ाई आसान हुई है और छोटे व्यवसाय भी चलाने में मदद मिली है।

सुरक्षा कैंप बनने के बाद बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) लगभग 50 किलोमीटर सड़क का निर्माण तेजी से कर रही है। इसके अलावा, सेचुरेशन शिविरों के जरिए प्रशासन यह सुनिश्चित कर रहा है कि हर परिवार को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ बिना किसी रुकावट के मिले।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सही कहा है कि कोंडापल्ली में मोबाइल नेटवर्क का पहुँचना ‘सिर्फ एक टावर का खड़ा होना नहीं है, यह उन लोगों के सपनों का उठ खड़ा होना है जो वर्षों से दुनिया से कटे हुए थे।’

विश्वास, बदलाव और बस्तर का भविष्य

बस्तर में जो बदलाव हो रहा है, वह एक बड़ा परिवर्तन है। यह दिखाता है कि नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद का स्थायी हल केवल सुरक्षा बलों और हथियारों में नहीं है। असली समाधान है सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएँ लोगों तक पहुँचाना। जब नक्सली ग्रामीणों को विकास से दूर रखने की कोशिश करते हैं, तो सरकार का यह कदम उनकी सोच और ताकत को कम करता है।

यहाँ केंद्रीय और राज्य सरकार की ‘डबल इंजन’ नीति साफ नजर आती है। केंद्रीय गृह मंत्री के मार्गदर्शन में सुरक्षा अभियान तेज हुए, जिससे नक्सली प्रभावित इलाकों में उनका दबदबा कम हुआ। साथ ही मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में ‘नियद नेल्ला नार’ जैसी योजनाएँ तेजी से विकास के काम कर रही हैं। सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और संचार के इन कामों ने लोगों का भरोसा जीतकर नक्सली प्रभाव को कमजोर किया।

बस्तर का यह मॉडल सिर्फ छत्तीसगढ़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के उन क्षेत्रों के लिए उदाहरण है जहाँ नक्सली या अन्य उग्रवादी हैं। यह दिखाता है कि जब सरकार स्थानीय लोगों का भरोसा जीत लेती है, तो विकास खुद ही एक क्रांति बन जाता है। जैसे डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कहा कि आज भी हमारे राज्य में ऐसे युवा हैं जिन्होंने कभी टीवी नहीं देखा, लेकिन अब उनके गाँव में 4G मोबाइल टावर खड़े हैं। यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन में नए अवसर और गौरव की बहाली है।

आज बस्तर ‘भरोसा, बदलाव और नई संभावनाओं’ के युग में कदम रख रहा है। यह बताता है कि सुरक्षा, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और तीव्र विकास नीति के साथ सबसे कठिन इलाकों में भी शांति और समृद्धि लाई जा सकती है। अब बस्तर के हर गाँव के लोग मुख्यधारा से जुड़ने और राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनने के लिए तैयार हैं।

क्या है चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर, इससे कितने करीब आ जाएँगे भारत-रूस: जानिए कैसे स्वेज नहर रूट पर घटेगी निर्भरता, सप्लाई होगी आसान

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारत में हुई द्विपक्षीय बैठक ने दोनों देशों के बीच समुद्री कनेक्टिविटी को नए चरण में पहुँचा दिया है। इस वार्ता में चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री कॉरिडोर को जल्द शुरू करने पर सहमति बनी, जिसे भारत और रूस के व्यापारिक संबंधों में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

यह सहमति ऐसे समय में बनी है, जब वैश्विक समुद्री व्यापार पारंपरिक रूट्स पर बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रहा है।

नया समुद्री मार्ग और इसकी पृष्ठभूमि

चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर का विचार 2019 में सामने आया था, लेकिन अब यह व्यवहारिक रूप ले रहा है। मौजूदा स्थिति में भारत से रूस तक समुद्री व्यापार स्वेज नहर होते हुए लगभग 16,060 किलोमीटर लंबा मार्ग तय करता है। जिसमें औसतन 40 दिन लगते हैं।

नए कॉरिडोर के परिचालन में आने के बाद यह दूरी घटकर 10,370 किलोमीटर और समय घटकर लगभग 24 दिन रह जाएगा। यानी करीब 16 दिन और 5,700 किलोमीटर की सीधी बचत होगी, जो इसे तेजी से प्रतिस्पर्धात्मक और प्रभावी विकल्प बनाती है।

भू-राजनीतिक महत्व और सुरक्षा का नया विकल्प

पिछले कुछ वर्षों में स्वेज नहर और रेड सी क्षेत्र में अस्थिरता, युद्धों और हमलों के कारण वैश्विक शिपिंग मार्ग असुरक्षित और महँगे होते जा रहे हैं। गाजा युद्ध के बाद रेड सी में हौते हमलों ने इसका जोखिम और बढ़ा दिया है।

ऐसे माहौल में चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर एक नया सुरक्षित विकल्प प्रदान करता है, जो दक्षिण चीन सागर और जापान सागर से होते हुए सीधे रूस के फेयर ईस्ट तक पहुँच देता है। इसके साथ ही रूस भारत को नॉर्दर्न सी रूट और आर्कटिक मार्ग तक प्राथमिक पहुँच देने पर भी सहमत हुआ है, जो भारतीय जहाजों को साल भर ऊर्जा और खनिज संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करेगा।

भारत को इससे क्या फायदा होगा?

यह नया मार्ग भारत के लिए सिर्फ व्यापारिक लाभ नहीं, बल्कि रणनीतिक अवसर भी लेकर आएगा। रूस भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है और यह मार्ग कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला, उर्वरक, लकड़ी, हीरे और धातु जैसे संसाधनों की नियमित और किफायती सप्लाई सुनिश्चित करेगा। भारत मशीनरी, दवाइयाँ, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स और समुद्री फूड रूस भेज सकेगा।

इस रूट का सीधा फायदा पूर्वी भारत के बंदरगाहों जैसे चेन्नई, विशाखापट्टनम और पारादीप को मिलेगा। इससे नौकरियाँ, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और निवेश तेजी से बढ़ेंगे। साथ ही यह आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता और आयात लागत में उल्लेखनीय कमी लाएगा।

यह कॉरिडोर भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक रास्ता नहीं, बल्कि रणनीतिक बदलाव का संकेत है। अभी तक भारत का अधिकांश व्यापार पश्चिमी देशों पर आधारित रहा है, लेकिन चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर भारत को सीधे रूस के पूर्वी हिस्से से जोड़ देगा।

यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों में समृद्ध है, इसलिए भारत को भविष्य में इन संसाधनों तक आसान और तेज पहुँच मिल सकेगी। यही नहीं, भारत और रूस मिलकर अपने व्यापारिक गठजोड़ को मजबूती से आगे बढ़ा सकेंगे। इस रूट से भारत की चाबहार और स्वेज नहर पर निर्भरता भी कम होगी। नया मार्ग सुरक्षित होगा और सामान की ढुलाई पहले की तुलना में कम लागत और कम समय में की जा सकेगी।

इसके साथ ही भारत को दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में रणनीतिक मौजूदगी हासिल होगी, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को चुनौती देने में मदद मिलेगी। यह कॉरिडोर दोनों देशों के लिए एक वैकल्पिक समुद्री मार्ग बनकर उभरेगा। इस कनेक्शन से दोनों देशों के बीच व्यापार में भी नई ऊर्जा आएगी। भारत जहाँ रूस से तेल, उर्वरक और कोयला आयात करता है, वहीं वहाँ कपड़ा, दवाइयाँ और इंजीनियरिंग उत्पाद निर्यात करता है।

यह परियोजना भारत की ‘Act Far East’ नीति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। भविष्य की योजना के अनुसार, इस कॉरिडोर को चरणबद्ध तरीके से वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे इंडो-पैसिफिक देशों से भी जोड़े जाने की तैयारी चल रही है।

आर्थिक अवसर और बढ़ता द्विपक्षीय व्यापार

वर्तमान में भारत और रूस का व्यापार लगभग 65 अरब डॉलर के आस-पास है और दोनों देशों ने इसे 2030 तक 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। हालाँकि पुतिन और मोदी का मानना है कि यह लक्ष्य निर्धारित समय सीमा से पहले हासिल हो सकता है।

इस कॉरिडोर के शुरू होने के बाद ऊर्जा, खनिज, रक्षा उद्योग, जहाज निर्माण, आर्कटिक संसाधन और पूर्वी एशिया व्यापार कनेक्टिविटी में नई संभावनाएँ पैदा होंगी। इससे भारत की वैश्विक व्यापारिक उपस्थिति और रणनीतिक प्रभाव दोनों में वृद्धि होगी।

अन्य कॉरिडोर्स के साथ रणनीतिक एकीकरण

चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर (INSTC) और नॉर्दर्न सी रूट के साथ जोड़ा जा रहा है। INSTC पहले से परिचालन में है और मुंबई-ईरान-कास्पियन-रूस मार्ग से समय 25–30 दिनों तक घटाता है।

वहीं मध्य पूर्व के रास्ते इंडिया–मिडिल ईस्ट–यूरोप कॉरिडोर युद्ध और राजनीतिक अनिश्चितता के कारण धीमा है। ऐसे में भारत के पास तीन स्थिर वैकल्पिक रूट्स होंगे, जिससे भू-आर्थिक निर्भरता और जोखिम काफी कम होंगे।

बदलती दुनिया में भारत-रूस की नई रणनीतिक धुरी

चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर केवल एक व्यापार मार्ग नहीं, बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक शतरंज पर भारत और रूस की नई चाल है।

यह भारत को ऊर्जा सुरक्षा, लॉजिस्टिक स्वायत्तता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थान देता है तो रूस को हिंद-प्रशांत में स्थायी आर्थिक रास्ता। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच यह कॉरिडोर भविष्य में भारत-रूस संबंधों और एशियाई व्यापार व्यवस्था दोनों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।

डेडलाइन खत्म… UMEED पोर्टल पर सिर्फ 27% वक्फ संपत्तियाँ ही हो पाईं रजिस्टर, पश्चिम बंगाल में सबसे कम: क्या बची संपत्तियों पर होगा सरकारी हस्तक्षेप?

देशभर की वक्फ संपत्तियों के डिजिटल रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के लिए केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा बनाए गए UMEED पोर्टल पर तय समयसीमा में कुल वक्फ संपत्तियों में से करीब एक चौथाई ही दर्ज हो सकी हैं। 6 महीने की तय समयसीमा 6 दिसंबर 2025 को पूरी होने के बाद इस पोर्टल को फिलहाल बंद कर दिया गया है।

जब देश में वक्फ बोर्ड के दावों को लेकर आए दिन कहीं ना कहीं बवाल होता रहते हैं ऐसे में ये आँकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में करीब आठ लाख वक्फ संपत्तियाँ हैं लेकिन आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, केवल 2.16 लाख संपत्तियों (करीब 27%) का ही पंजीकरण UMEED पोर्टल पर हो पाया। इसके अलावा कुल 5.17 लाख आवेदनों में से 10,872 को खारिज भी किया गया है। यानी इनके कागजातों या प्रक्रिया में कुछ ना कुछ गड़बड़ियाँ रही होंगी।

अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय ने क्या बताया?

अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्रालय के मुताबिक, मंत्रालय और राज्यों की ओर से अंतिम दिनों में लगातार समीक्षा बैठकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सचिव स्तर तक के हस्तक्षेप के चलते अंतिम समय में रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में तेजी आई।

अंतिम आँकड़ों के अनुसार, कुल 5,17,040 संपत्तियों की एंट्री पोर्टल पर शुरू की गई, जिनमें से 2,16,905 को जाँच के बाद मंजूरी मिली। वहीं 2,13,941 संपत्तियाँ अपलोड तो कर दी गईं लेकिन वे अंतिम अनुमोदन के लिए पाइपलाइन में ही रह गईं। जाँच के दौरान 10,869 संपत्तियों को खारिज भी किया गया।

अधिकारियों का कहना है कि अंतिम दिनों में बढ़ी रजिस्ट्रेशन की इस तेज गति ने दिखाया कि राज्यों ने समयसीमा नजदीक आते ही प्रक्रिया को गंभीरता से आगे बढ़ाया था। अब जिन संपत्तियों का पंजीकरण पूरा नहीं हो पाया है अथवा जिनमें विवाद हैं, उनके मामलों पर वक्फ बोर्ड और ट्रिब्यूनल आगे काम करेंगे।

कौन राज्य आगे, कौन फिसड्डी?

अलग-अलग राज्यों के वक्फ बोर्ड की बात करें तो कर्नाटक इस प्रक्रिया में सबसे आगे रहा। राज्य ने अपनी कुल संपत्तियों में से 52,917 संपत्तियों को दर्ज कर लिया जो उसके कुल आँकड़े का करीब 81% है। इसके बाद जम्मू-कश्मीर ने 25,046 संपत्तियों का पंजीकरण किया, जो 77 प्रतिशत है। पंजाब ने 24,969 संपत्तियाँ दर्ज कराई, जो उसकी कुल संपत्तियों का करीब 90% है। वहीं, गुजरात में 24,133 संपत्तियों का पंजीकरण हुआ, जो करीब 61% है।

इसके उलट पश्चिम बंगाल इस मामले में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्य के रूप में सामने आया। यहाँ 80,480 वक्फ संपत्तियों में से सिर्फ 716 का ही पंजीकरण हो पाया, जो 1 प्रतिशत से भी कम (करीब 0.89%) है। रिपोर्टों के अनुसार, राज्य सरकार ने वक्फ संशोधन अधिनियम को लागू करने में लंबा समय लिया और पोर्टल पर जानकारी अपलोड करने के निर्देश भी समयसीमा पूरी होने से ठीक पहले जारी किए।

उत्‍तर प्रदेश जहाँ देश की सबसे अधिक वक्फ संपत्तियाँ हैं, वहाँ भी स्थिति धीमी रही। यूपी शिया वक्फ बोर्ड की 789 संपत्तियों (लगभग 5 प्रतिशत) और सुन्नी वक्फ बोर्ड की 12,982 संपत्तियों (लगभग 11 प्रतिशत) का ही पंजीकरण हो पाया। बिहार और यूपी दो ऐसे राज्य हैं जहाँ शिया और सुन्नी के लिए अलग-अलग वक्फ बोर्ड बने हुए हैं। महाराष्ट्र में कुल 36,700 संपत्तियों में से 17,971 का पंजीकरण हुआ जो लगभग 48% है।

कैसे काम करता है UMEED पोर्टल?

किरेन रिजिजू ने 6 जून को दिल्ली से UMEED पोर्टल की शुरुआत की थी। सरकार के मुताबिक, यह पोर्टल वक्फ संपत्तियों की वास्तविक समय पर अपलोडिंग, सत्यापन और निगरानी के लिए एक सेंट्रल डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। सरकार को उम्मीद थी कि इससे देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।

जानकारी के मुताबिक, इस पोर्टल में 3-स्तरों वाली सत्यापन प्रणाली ‘निर्माता-जाँचकर्ता-स्वीकृतकर्ता’ है। इसके तहत एक मुतवल्ली संपत्ति के विवरण को ‘निर्माता’ के रूप में दर्ज करता है जिसके बाद वक्फ बोर्ड के अधिकारियों द्वारा इसका सत्यापन और निर्धारित सरकारी प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड की जाँच के बाद स्वीकृति दी जाती है।

पोर्टल की दिक्कत या कागजों का कमी?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुतवल्लियों को संपत्ति पोर्टल पर दर्ज कराने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें UMEED पोर्टल क्रैश होने जैसी कई समस्याएँ आ रही हैं। मुतवल्लियों का यह भी कहना था कि सदियों पुरानी संपत्तियों के कागजात ढूँढने में भी समस्याएँ हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में माप की अलग-अलग ईकाइयाँ भी समस्या पैदा कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद अली जैदी ने ‘दैनिक भास्कर’ से बातचीत में कहा है कि पोर्टल साथ नहीं दे रहा है। उनका कहना है कि इस पूरे डेटा को अपलोड होने में करीब 6 महीने का समय और लगेगा। वहीं, एक अन्य अधिकारी ने कहा कि हर दिन केवल 2-3 संपत्तियाँ ही अपलोड हो पा रही हैं।

हालाँकि, पोर्टल के क्रैश होने के दावे हाल के ही कुछ दिनों में सामने आने शुरू हुए थे जब इसकी डेडलाइन नजदीक आ रही थी। अतीत में कई बार इस तरह के दावे अलग-अलग जगहों से सामने आए हैं कि वक्फ बोर्ड ने जबरन संपत्तियों पर कब्जा किया है या अपना दावा ठोका है। ऐसे में इतनी कम संख्या में संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन किया जाना भी इसे लेकर सवाल उठा रहा है। सुगबुगाहट है कि दरअसल बड़ी संख्या में कागज ना होने के चलते कई प्रॉपर्टीज को पोर्टल पर रजिस्टर नहीं किया गया है।

क्या सरकार करेगी बची संपत्तियों पर कब्जा?

मौजूदा स्थिति की बात करें तो UMEED पोर्टल पर नए रजिस्ट्रेशन बंद हैं लेकिन जिन लोगों ने प्रकिया शुरू कर दी है उन्हें 3 महीने तक कोई जुर्माना देने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके अलावा अभी वक्फ बोर्ड्स के पास वक्फ ट्रिब्यूनल में जाने का विकल्प भी खुला हुआ है और वहाँ से पोर्टल पर नई संपत्तियों के रजिस्ट्रेशन की तारीख भी बढ़ सकती है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वक्फ बोर्ड के अधिकारियों ने कहा कि वे अपने राज्यों के वक्फ न्यायाधिकरणों में आवेदन जमा करना शुरू कर देंगे जिसमें पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने और संपत्तियों के पंजीकरण के लिए समय सीमा बढ़ाने की माँग की जाएगी। उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा, “जिन राज्यों में पंजीकरण कम हैं, वहाँ के ट्रिब्यूनल में इस प्रक्रिया के लिए समय सीमा बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन डाले जाएँगे।” सुप्रीम कोर्ट में इसका समय बढ़ाने की माँग के साथ एक याचिका डाली गई थी लेकिन कोर्ट ने इस मामले को ट्रिब्यूनल पर ही छोड़ दिया था।

ट्रिब्यूनल से भी जिन संपत्तियों को राहत नहीं मिलेगी उन्हें लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील शारिक अब्बासी बताते हैं कि जो संपत्तियाँ अपलोड नहीं हो पाएँगी, उनके लिए ट्रिब्यूनल जाना होगा। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल से भी अगर फैसला खिलाफ आता है तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रास्ते खुले हैं। हालाँकि, इसके बाद भी अगर राहत नहीं मिलती है तो संपत्तियाँ सरकारी हस्तक्षेप के दायरे में आ सकती हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत में कम नहीं हुई है सलमान रुश्दी, आपके ‘दोस्त’ कर रहे गुमराह: इतिहास के ‘सच’ को सामने लाना छेड़छाड़ नहीं

पीएम मोदी को ‘कट्टरपंथियों में भी कट्टरपंथी’ और मोदी समर्थकों को टोडीज करने वाले सलमान रुश्दी एक बार फिर भारत सरकार पर ‘आजादी’ के नाम पर अमेरिका में बैठ कर आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके ‘दोस्तों’ से भारत में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को लेकर बात होती है, तो पता चलता है कि उनके बोलने की आजादी सीमित है।

लेकिन उनके दोस्त ये नहीं बताते हैं कि भारत में ‘प्रेस की आजादी’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ ही है कि मोदी सरकार के हर काम पर संसद के अंदर और बाहर बहस होती है। टीवी डिबेट होते हैं और हर किसी को बोलने की आजादी होती है। सोशल मीडिया मोदी विरोधियों के पोस्ट से भरा रहता है। देश में हर बुरे काम के लिए पीएम मोदी को जिम्मेदार बताया जाता है।

यही वजह है कि बिहार चुनाव से पहले जब दिल्ली ब्लास्ट हुआ तो लोगों ने इसे आतंकी घटना मानने में मुँह सिल लिए। कई दिनों तक मुस्लिम आतंकी मॉड्यूल को लेकर खुलासे हुए। एनआईए ने कई सबूत रखे और 3000 किलो अमोनियम नाइट्रेट जमा करने के सबूत दिये, एके-47 जैसे हथियार बरामद किए। लेकिन कॉन्ग्रेस और आरजेडी ने तो इसे चुनाव में वोट पाने के लिए ध्रुवीकरण कह कर गला फाड़ते ही रहे, बाकी विपक्षी पार्टियों ने भी उनका साथ दिया। इसक मामले का पूरा खुलासा होने के बावजूद किसी भी पार्टी ने माफी नहीं माँगी।

पीएम मोदी ने खुद कहा है कि उनके हर काम को सांप्रदायिकता के नजरिए से देखा जाता है और आलोचना की जाती है। प्रधानमंत्री मोदी की हर सामाजिक कल्याण की योजनाएँ सभी धर्मों और जातियों के लिए है। ऐसा नहीं है कि किसी को नाम, जाति, धर्म के आधार पर रोका जाता है। लेकिन देश से घुसपैठियों को हटाने को लेकर अगर मोदी सरकार गंभीर है तो इसमें आपत्ति क्या है।

क्या देश से रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना गलत है? देश में साजिश के तहत डेमोग्राफी बदलाव हो रहा है। हिमाचल, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों से लेकर सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफी बदलने की कोशिश हो रही है। इन पर एक्शन लेना क्या गलत है।

पीएम मोदी ने 2022 में हटवाई थी बैन

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के बाद विवादों में आए लेखक सलमान रुश्दी की किताब 36 साल बाद पीएम मोदी ने ही बैन हटवाई थी। पूर्व पीएम राजीव गाँधी की सरकार ने साल 1988 में इस पर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगाया था। उस वक्त कॉन्ग्रेस सरकार प्रचंड बहुमत के बाद भी मुस्लिम वोट बैंक की खातिर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पीएम मोदी ने कुछ मुस्लिम संगठनों जैसे ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड के विरोध के बावजूद द सेटनिक वर्सेज से प्रतिबंध उठा लिया। इसके बाद इस किताब की भारत में जबरदस्त बिक्री हुई।

भारत में मौखिक तौर पर प्रतिबंध का ये कारनामा कॉन्ग्रेस सरकार ने किया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सरकार कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाई कि इस किताब पर कभी प्रतिबंध भी लगा था। इसके बावजूद रुश्दी जैसे बुद्धिजीवियों को कॉन्ग्रेस ‘लोकतांत्रिक’ नजर आती है।

क्या कहा सलमान रुश्दी ने

ताजा मामला सलमान रुश्दी के एक इंटरव्यू के बाद सामने आया है। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर एक बार फिर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाया है। ये इंटरव्यू ब्लूमबर्ग में 5 दिसंबर 2025 को छपा है। ये इंटरव्यू मिशल हुसैन ने लिया है।

इंटरव्यू में पीएम मोदी को लेकर पूछे गए सवाल पर सलमान रुश्दी ने कहा है कि पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर जैसे लोग भारत में परेशान हैं क्योंकि उन्हें पूरी ‘आजादी’ नहीं है।

ये पहला मौका नहीं है जब सलमान रुश्दी ने पीएम मोदी की आलोचना की हो। 2014 से पीएम बनने के बाद से उन्होंने कई मौकों पर पीएम मोदी की आलोचना की है। यहाँ तक प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर चिंता जताई थी और कहा था कि बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता की अभिव्यक्ति औ साहित्यिक गतिविधियों की आजादी खतरे में पड़ जा सकती है।

रुश्दी के मुताबिक उनके कई दोस्त, जो भारत में ही रहते हैं, उनसे बात होती है और ये जानकारी उन्होंने दी है। इस दौरान उन्होंने नायपॉल का जिक्र किया और कहा कि मोदी सरकार इतिहास से छेड़छाड़ कर रही है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों का कहना है कि उनकी सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है और प्रेस, सिविल सोसाइटी ग्रुप्स और राजनीतिक विरोधियों पर कार्रवाई की है। फिर भी, चुनाव होते हैं, भारतीय मीडिया आउटलेट्स को पब्लिश करने के लिए परमिशन की जरूरत नहीं होती है और बुनियादी अधिकारों की संवैधानिक गारंटी लागू रहती है।

रुश्दी के मुताबिक, ऐसा लगता है कि देश का इतिहास फिर से लिखने की इच्छा है, असल में हिंदुओं को अच्छा, मुसलमानों को बुरा कहना गलत है। यह विचार कि भारत एक हिंदू सभ्यता है जो मुसलमानों के आने से घायल हो गई है। इसे साबित करने के लिए बहुत एनर्जी लगी है। वी.एस. नायपॉल ने एक बार इसे ‘घायल सभ्यता’ कहा था।

सलमान रुश्दी उन पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने ‘डिवाइन इन चीफ ‘ लिखने वाले पत्रकार आतिश तासीर की OCI रद्द करने पर मोदी सरकार को पत्र लिखा था।

दादरी हत्याकांड और पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के भारत में विरोध जैसी घटनाओं पर नाराज होकर अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल समेत 40 साहित्याकारों ने अपना सम्मान लौटाया, तो सलमान रुश्दी ने भी उनका साथ दिया और सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराया।

मोदी सरकार के खिलाफ जब भी मौका मिला, रुश्दी ने अपनी आवाज बुलंद की। मोदी विरोधी हर प्रोपेगेंडा का उन्होंने समर्थन किया। फिर भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की कमी उन्हें भारत में नजर आती है। मोदी सरकार में भारत में बोलने की आजादी इतनी है कि हर कोई अपनी बात बेखौफ कह सकता है, चाहे वह मोदी समर्थक हो या मोदी विरोधी।

DRDO का कमाल, हवा में रूप बदलेंगे फाइटर जेट: 0.17 सेकेंड में पंख मोड़ने वाली ‘मॉर्फिंग विंग तकनीक’ का ट्रायल सफल, जाने कैसे बदलेगा युद्ध का भविष्य?

भारत के फाइटर जेट के पंख जल्द ही मॉर्फिंग विंग में बदलने वाले हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पहली बार मॉर्फिंग विंग तकनीक का सफल ट्रायल पूरा कर लिया है। इस अत्याधुनिक तकनीक से विमान आसमान में ही अपने पंखों का आकार बदल सकता है। यह वही तकनीक है, जिसे अब तक दुनिया के सिर्फ कुछ ही उन्नत देश विकसित कर पाए हैं।

इस सफलता को भारत के लिए काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे देश उन चुनिंदा राष्ट्रों में शामिल हो जाएगा जिनके पास वाकई में मॉर्फिंग विंग तकनीक है। यह भारत की 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की ओर बड़ा कदम है। DRDO ने इस तकनीक का उपयोग ड्रोन्स (UAVs) में लगाने की भी योजना है।

मॉर्फिंग विंग तकनीक क्या है?

मॉर्फिंग विंग तकनीक एक ऐसी तकनीक है, जिससे विमान के पंख उड़ान के दौरान अपने आकार को बदल सकते हैं। इस तकनीक से विमान हर स्थिति में पंखों के आकार बदल सकता है। चाहे जब विमान टेक-ऑफ कर रहा हो, क्रूज मोड में हो या किसी लड़ाकू मिशन में हो। ताकि ड्रैग कम हो और ईंधन बच सके।

अब तक सामान्य पंखों में उड़ान के दौरान आकार नहीं बदला जा सकता था। लेकिन मॉर्फिंग विंग तकनीक में पंखों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उनका आकार उड़ान के दौरान बदल सकें, वो भी बिना किसी आसान जॉइंट्स या खतरनाक गैप्स के। इन पंखों को लचीला बनाया गया है, जिसमें अलग-अलग हिस्से मिलकर एक समतल, चिकनी सतह बनाए रखते हैं और जरूरत के हिसाब से उसकी आकृति बदलते हैं।

कैसे काम करती है मॉर्फिंग विंग तकनीक?

इस मॉर्फिंग विंग तकनीक की नींव स्मार्ट मेटल है, विशेषष रूप से Shape Memory Alloys (SMA) है। इन धातुओं की खासियत यह है कि तापमान या इलेक्टिंग करंट के प्रभाव से वे सिकुड़ या फैल सकती हैं। DRDO की इन विंग्स संरचनाओं में SMA को इस तरह से लगाया गया है कि जब भी जरूरत हो तब करंट देने पर वो सिकुड़ें और पंख का अगला किनारा झुक जाए, जिससे पंख का आकार बदल जाएगा। जब करंट बंद होगा, SMA फिर ठंडा होकर अपने पुराने रूप में लौट आता है।

DRDO ने परीक्षण के दौरान 300 मिलीमीटर के विंग मॉडल पर दिखाया कि पंख 35 डिग्री प्रति सेकेंड की गति से झुक सकते हैं और फ्लैट से पूरी तरह ‘बेंट’ स्थिति में सिर्फ 0.17 सेकेंड में आ सकते हैं। इस प्रक्रिया में विंग सतह पूरी तरह से चिकनी रहती है और किसी तरह के हिंज या जोड़ नहीं होते, जिससे हवा में गड़बड़ी कम होती है और रडार सिग्नल पकड़ने की मुश्किल बढ़ जाती है। यानी दुश्मन के लिए फाइटर जेट की रडार पकड़ना असंभव हो जाएगा।

मॉर्फिंग विंग तकनीक की खासियत क्या है?

मॉर्फिंग विंग तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे विमान की ईंधन खपत कम हो जाती है। जैसे-जैसे विमान अलग-अलग उड़ान मोड में जाता है, उसके पंख अपने आकार बदलकर हवा के प्रतिरोध को कम कर देते हैं। इससे कम ईंधन खर्च होता है और विमान ज्यादा दूरी आसानी से तय कर लेता है।

इसके अलावा तकनीक का दूसरा बड़ा फायदा इसकी शानदार मैन्यूवरबिलिटी (Maneuverability) है। पंख अपने कोण और आकार को हर पल बदलते रहते हैं, जिससे विमान जरूरत पड़ने पर बहुत तेजी से मोड़ ले सकता है, तेजी से ऊपर चढ़ सकता है या अचानक नीचे आ सकता है। ऐसी फुर्ती हवाई लड़ाइयों में बेहद जरूरी होती है क्योंकि वहाँ मिलीसेकेंड का फर्क भी नतीजा बदल सकता है।

तीसरी अहम बात यह है कि मॉर्फिंग विंग भविष्य के 6वीं पीढ़ी लड़ाकू विमानों की मूल जरूरत मानी जा रही है। आने वाले समय में ऐसे जेट्स को स्टील्थ, ऊर्जा-कुशल उड़ान और तेज प्रतिक्रियाओं जैसी क्षमताएँ एक साथ चाहिए होंगी। यह तकनीक इन्हें एक ही प्लेटफॉर्म पर संभव बना देती है। इसलिए DRDO का हालिया ट्रायल सिर्फ एक प्रयोग नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की हवाई शक्ति की महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा रहा है।

कैसे भारत के एयरोस्पेस का भविष्य बदलेगी यह तकनीक?

मॉर्फिंग विंग तकनीक आने वाले समय में भारत के एयरोस्पेस का भविष्य बदलने वाली तकनीक साबित होने वाली है। क्योंकि इस तकनीक से विमान का सिर्फ डिजाइन नहीं बल्कि पूरा मॉडल बदल दिया जाएगा। यह तकनीक भारत के एयरोस्पेस को गति देगी और स्वदेशी के साथ प्रतिस्पर्धी भी बनेगी।

अभी तक भारत 4.5 और 5वीं पीढ़ी के विमानों पर काम कर रहा है लेकिन मॉर्फिंग विंग के सफल ट्रायल से यह साफ संकेत मिलता है कि भारत अब 6वीं पीढ़ी के फाइटर जेट की नींव डाल चुका है। इसके अलावा आधुनिक लड़ाइयों में ऐसे ड्रोन की जरूरत है जो चुपचाप उड़ सके, आकार बदलकर बचाव कर सकें और कम ईंधन में लंबी दूरी तय कर सकें, यह तकनीक भविष्य के UAV और UCAV कार्यक्रमों को भी बदल देगी।

इन फ्यूचर जेट्स में स्टील्थ, हाई सुपरमैन्यबवरबिलिटी, स्मार्ट कंट्रोल और फ्यूल ऑप्टिमाइजेशन अनिवार्य होंगे और मॉर्फिंग विंग इन सभी को एक ही सिस्टम में संभव बनाती है। इसीलिए यह सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के एयरोस्पेस भविष्य का वह मोड़ है जो आने वाली पीढ़ियों के रक्षा प्लेटफॉर्म को दिशा देगा।

मुंडन समारोह में अनुसूचित जाति की गरीब महिलाओं को बुलाया: लालच देकर ईसाइयत अपनाने के लिए उकसाया, पुलिस ने एक महिला समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया, गोरखपुर की घटना

गोरखपुर पुलिस ने शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें एक महिला भी शामिल है। इनलोगों ने घर में मुंडन कार्यक्रम बोल कर गरीब महिलाओं को बुलाया था। महिलाओं को लालच देकर ईसाइयत अपनाने के लिए प्रेरित किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले में दर्ज FIR की कॉपी ओपइंडिया के पास है।

गुरुवार (4 दिसंबर 2025) को दो आरोपित गाँव में पहुँचे और करीब 30 आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को अपने झाँसे में लेने लगे। उन्होंने महिलाओं से कहा कि यदि वे ईसाइयत अपना लें, तो उन्हें बेहतर जीवन, नकद, कष्टों से छुटकारा और हर परेशानी से मुक्ति मिलेगी। जब कुछ महिलाओं ने इसका विरोध किया, तो आरोपितों ने उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की।

घटना की जानकारी बजरंग दल के सदस्यों को दी गई, जो तुरंत मौके पर पहुँचे। पुलिस को बुलाया गया और बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की शिकायत पर FIR दर्ज हुई। पुलिस ने देवरिया के रहने वाले दो आरोपितों प्रदीप कुमार और रीना देवी को गिरफ्तार कर लिया। दोनों को शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

FIR में क्या लिखा है?

FIR बजरंग दल गोरखपुर ग्रामीण के जिला सह-समन्वयक बिट्टू जायसवाल की शिकायत पर दर्ज की गई है। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318, 61 और 351(2) तथा उत्तर प्रदेश अवैध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

स्रोत – यूपी पुलिस

अपनी शिकायत में बिट्टू जायसवाल ने बताया कि उन्हें विश्व हिंदू परिषद (VHP) के विभागीय संगठन मंत्री निखिल तोमारी से जानकारी मिली थी कि ब्रह्मसरी गाँव के हरिजन बस्ती में धर्मांतरण की गतिविधि चल रही है।

शिकायत में बताया गया कि प्रदीप और रीना ने सीता देवी के घर 25 से 40 महिलाओं को इकट्ठा किया और उन्हें आरामदायक जीवन, नकद, ईश्वरीय आशीर्वाद और सभी परेशानियों से मुक्ति का लालच देकर मानसिक दबाव बनाया।

आरोपित बाइबल दिखाकर ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे थे, घर में प्रार्थना करा रहे थे और जो महिलाएँ मानने से इंकार करतीं, उन्हें धमका रहे थे। वहाँ मौजूद ज्यादातर महिलाएँ अनुसूचित जाति से थीं।

स्रोत – यूपी पुलिस

जायसवाल ने कहा कि आरोपित समाज सेवा का दिखावा कर रहे थे, जबकि असल में उनका मकसद महिलाओं का धर्मांतरण कराना था। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियाँ कमजोर वर्ग की महिलाओं को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए लालच दिया जाता है, जो समाज और राष्ट्रहित दोनों के लिए नुकसानदायक है।

मीडिया से बात करते हुए बेलघाट थाने के SHO विकासनाथ ने बताया कि मामला बेहद संवेदनशील है और आरोप गंभीर हैं। पुलिस यह भी जाँच कर रही है कि क्या इस धर्मांतरण प्रयास में और लोग भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि जाँच जारी है और जो भी जानकारी सामने आएँगे, उनके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

धधकाई राष्ट्रप्रेम की ज्वाला, पर इस्लामवादियों ने नहीं किया कबूल: नेहरू ने हटवाए माँ दुर्गा की स्तुति वाले छंद, ‘वंदे मातरम के 150 साल’ पर संसद में बेनकाब होगा लिबरल गैंग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा होगी।

सरकार इस बहस को विशेष रूप से युवाओं तक वंदे मातरम् के संदेश को पहुँचाने का अवसर मान रही है। यह वही गीत है, जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय स्वाभिमान की नींव रखी।

संसद में ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत

लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार (8 दिसंबर 2025) को ‘राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा’ शामिल की गई है और इसके लिए दस घंटे का समय निर्धारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहस की शुरुआत करेंगे और उनके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने विचार रखेंगे।

विपक्ष की ओर से कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी वाड्रा और सांसद गौरव गोगोई को इस बहस में हिस्सा लेने के लिए चुना है। वहीं राज्यसभा में मंगलवार (9 दिसंबर 2025) को गृह मंत्री अमित शाह इस बहस का नेतृत्व करेंगे और उनके बाद स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बोलेंगे। यह चर्चा उस समय हो रही है, जब हाल ही में चुनाव सुधारों और एसआईआर को लेकर संसद में कई बार गतिरोध देखने को मिला था।

वंदे मातरम् की रचना: साहित्य से राष्ट्रगीत बनने की यात्रा

वंदे मातरम् की रचना बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।

यह गीत केवल कविता नहीं था, बल्कि माँ और मातृभूमि दोनों की आराधना का एक अद्भुत संगम था। इसमें भारत की धरती, प्रकृति और संस्कृति को देवी रूप में प्रस्तुत किया गया। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, तब वंदे मातरम् एक साधारण गीत से आगे बढ़कर आंदोलन की आवाज बन गया। स्कूलों, कॉलेजों, जनसभाओं और रैलियों में युवा इसे गाते थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा देते थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीत में ढालकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना दिया। उस समय यह गीत हर भारतीय के हृदय में साहस और प्रेरणा की अग्नि जलाने वाला एक मन्त्र बन चुका था।

अंग्रेजों का भय और प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार इस गीत को विद्रोह और स्वतंत्रता की भावना बढ़ाने वाला मानती थी। इसलिए 1910 के बाद प्रशासन ने स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बोलने या गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

छात्रों को स्कूलों से निकाला गया, नेताओं को जेल भेजा गया और कई लोगों को सजाएँ दी गईं, लेकिन फिर भी इस गीत की आवाज को दबाया नहीं जा सका। प्रतिबंध जितना कड़ा होता गया, वंदे मातरम् उतनी ही ताकत के साथ जनमानस में गूँजता रहा।

विदेशों में भारतीय पहचान का प्रतीक

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का पहला तिरंगा फहराया और उस तिरंगे पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था। यह वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्वभर में भारत की आजादी और अस्मिता का प्रतीक बन गया।

मुस्लिम लीग ने किया विरोध और नेहरू ने की काँट-छाँट

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है।

नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ। नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कट्टरपंथियों ने हमेशा ही खड़ा किया विवाद

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।

बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”

यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

आज का वंदे मातरम्: भावना, पहचान और राष्ट्रगौरव

150 वर्ष बीत जाने के बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है। यह राष्ट्रगौरव, समर्पण और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह गीत धर्म या राजनीति की सीमाओं में कैद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में संसद में होने वाली यह चर्चा केवल इतिहास याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का क्षण है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

जहाँ कभी लाल आतंकी करते थे बारूद की खेती, वहाँ की जमीनें अब पैदा कर रही हरियाली: सुकमा में ‘आम बगीचा-लखपति दीदी’ से आम लोग लिख रहे विकास की गाथाएँ

कभी नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।

यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।

‘आम बगीचा परियोजना’ का उद्देश्य

‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं।

फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं। प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।

स्थानीय लोगों की भागीदारी

जब भी किसी योजना की सफलता की बात आती है, तो सबसे जरूरी चीज होती है लोगों की भागीदारी। सुकमा में कलेक्टर और उनकी टीम ने गाँव-गाँव जाकर सीधे लोगों से बात की, उनके सवाल सुने और पौधारोपण के फायदों की अच्छी तरह जानकारी दी।

‘आम बगीचा’ जैसी नई विकास योजनाओं का जमीन पर असर अब साफ दिखाई देने लगा है। इस स्कीम के लाभार्थियों में शामिल स्थानीय निवासी मर्काम धूला बताते हैं कि कैसे प्रशासन की पहल ने उनकी आमदनी और जीवन दोनों को बदल दिया है।

धूला कहते हैं, “एक दिन प्रशासन के लोग हमारे घर आए और नींबू, आम और नारियल के पौधे लगाने के बारे में पूछा। हमने हामी भर दी। अब दो साल हो गए हैं… फसल आने वाली है। यहाँ करीब 350 पौधे लगे हैं और इन्हें हमने कमाई के लिए ही लगाया था।”

‘आम बगीचा परियोजना’ न सिर्फ ग्रामीणों की आय बढ़ा रही है बल्कि खेती के प्रति उनकी समझ और जिम्मेदारी भी मजबूत कर रही है। इस स्कीम के लाभार्थी मर्काम शंतु बताते हैं कि कैसे वे पौधों की देखभाल पूरी सावधानी से कर रहे हैं और प्रशासन ने उन्हें हर कदम पर सहयोग दिया है।

शंतु कहते हैं, “हम पौधों की पूरी देखभाल कर रहे हैं। जड़ों या पत्तों में अगर सूखापन दिखता है, तो हम उन्हें तुरंत साफ कर देते हैं…कलेक्टर साहब से हमें बहुत मदद मिली है।” सरकारी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और नियमित फील्ड विज़िट्स की वजह से ग्रामीण अब बागवानी को आय के स्थाई स्रोत के रूप में देख रहे हैं।

प्रशासन कर रहा लोगों की मदद

कलेक्टर और स्थानीय प्रशासन सिर्फ योजनाएँ घोषित नहीं करते बल्कि वे मैदान में आकर लोगों से मिलते हैं। प्रशासन का रोल कई तरह का है जैसे योजना बनाना, बजट का इंतजाम करना, जरूरी तकनीकी और यांत्रिक सहायता देना और लोगों को बाजार तक पहुँचने में मदद करना।

उदाहरण के लिए, अगर किसी गाँव में धान की बजाय फलों की बिक्री के लिए एक छोटी मंडी लगाई जा सके, तो प्रशासन उससे भी जोड़ता है। इसी तरह प्रशिक्षण सत्रों में कृषि विशेषज्ञ भी आते हैं जो बताते हैं कि किस मौसम में कौन-सा काम करना है। इससे गाँव वालों को आत्मनिर्भर होने में मदद मिलती है और परियोजना की सफलता की संभावना बढ़ती है।

क्या है लखपति दीदी योजना

लखपति दीदी योजना भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य देश की ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इस योजना के तहत महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जाता है, ताकि वे खुद का व्यवसाय शुरू कर सकें और स्थायी आजीविका स्थापित कर सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई मंचों पर इस योजना का उल्लेख कर चुके हैं, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

लखपति दीदी योजना की बेसिक कान्सेप्ट ‘स्वयं सहायता समूहों’ (Self Help Groups – SHGs) को मजबूत करना है। इस योजना के तहत पहले महिलाओं को किसी SHG से जोड़ा जाता है, जहाँ उन्हें सिलाई, पेंटिंग, डेयरी, खेती, खाद्य प्रसंस्करण, छोटे बिजनेस, ब्यूटी पार्लर, पैकेजिंग आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद महिलाएँ अपना बिजनेस प्लान तैयार करती हैं और SHG के माध्यम से यह प्लान सरकार तक पहुँचाया जाता है। योजना की खास बात यह है कि व्यवसाय शुरू करने के लिए महिलाओं को 5 लाख रुपए तक का बिना किसी ब्याज के लोन दिया जाता है।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त बनाना, उनकी आमदनी में वृद्धि करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और उन्हें रोजगार देने वाले व्यक्तियों के रूप में विकसित करना है। सरकार चाहती है कि हर महिला अपनी क्षमता के अनुसार काम करे और लखपति दीदी बनकर सालाना कम से कम 1 लाख रुपए की आय प्राप्त कर सके।

नक्सलवाद में आई भारी कमी

नक्सलवाद के पीछे कई कारण होते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, असमानता और कई मौकों पर सरकार की उपस्थिति का अभाव। जब सरकार ना केवल सुरक्षा बल भेजती है बल्कि विकास-कार्य भी दिखाती है, जैसे सड़क का बनाना, बिजली का पहुँचना, स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र का खुलना, तो लोगों का भरोसा सरकार पर बनता है और सरकार से लोगों को दूर करने की नक्सलियों की कोशिशें टूटने लगती हैं।

साथ ही, जब ग्रामीणों को सीधी आय के अवसर मिलते हैं, युवाओं को रोजगार मिलता है और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ती है, तब सामुदायिक समर्थन भी बदलता है। सुकमा में सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ इन विकास कदमों ने मिलकर नक्सल असर को घटाया है, लोग अब आपराधिक रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन चुन रहे हैं और मुख्य धार से जुड़ रहे है।