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जहाँ कभी लाल आतंकी करते थे बारूद की खेती, वहाँ की जमीनें अब पैदा कर रही हरियाली: सुकमा में ‘आम बगीचा-लखपति दीदी’ से आम लोग लिख रहे विकास की गाथाएँ

नक्सल प्रभावित रहा सुकमा अब आम बागीचा परियोजना और केंद्र की लखपति दीदी योजना से बदल रहा है, जहाँ ग्रामीणों को बागवानी, बोरवेल-बाड़बंदी और सरकारी समर्थन से स्थायी आय के नए अवसर मिल रहे हैं।

कभी नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।

यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।

‘आम बगीचा परियोजना’ का उद्देश्य

‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं।

फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं। प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।

स्थानीय लोगों की भागीदारी

जब भी किसी योजना की सफलता की बात आती है, तो सबसे जरूरी चीज होती है लोगों की भागीदारी। सुकमा में कलेक्टर और उनकी टीम ने गाँव-गाँव जाकर सीधे लोगों से बात की, उनके सवाल सुने और पौधारोपण के फायदों की अच्छी तरह जानकारी दी।

‘आम बगीचा’ जैसी नई विकास योजनाओं का जमीन पर असर अब साफ दिखाई देने लगा है। इस स्कीम के लाभार्थियों में शामिल स्थानीय निवासी मर्काम धूला बताते हैं कि कैसे प्रशासन की पहल ने उनकी आमदनी और जीवन दोनों को बदल दिया है।

धूला कहते हैं, “एक दिन प्रशासन के लोग हमारे घर आए और नींबू, आम और नारियल के पौधे लगाने के बारे में पूछा। हमने हामी भर दी। अब दो साल हो गए हैं… फसल आने वाली है। यहाँ करीब 350 पौधे लगे हैं और इन्हें हमने कमाई के लिए ही लगाया था।”

‘आम बगीचा परियोजना’ न सिर्फ ग्रामीणों की आय बढ़ा रही है बल्कि खेती के प्रति उनकी समझ और जिम्मेदारी भी मजबूत कर रही है। इस स्कीम के लाभार्थी मर्काम शंतु बताते हैं कि कैसे वे पौधों की देखभाल पूरी सावधानी से कर रहे हैं और प्रशासन ने उन्हें हर कदम पर सहयोग दिया है।

शंतु कहते हैं, “हम पौधों की पूरी देखभाल कर रहे हैं। जड़ों या पत्तों में अगर सूखापन दिखता है, तो हम उन्हें तुरंत साफ कर देते हैं…कलेक्टर साहब से हमें बहुत मदद मिली है।” सरकारी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और नियमित फील्ड विज़िट्स की वजह से ग्रामीण अब बागवानी को आय के स्थाई स्रोत के रूप में देख रहे हैं।

प्रशासन कर रहा लोगों की मदद

कलेक्टर और स्थानीय प्रशासन सिर्फ योजनाएँ घोषित नहीं करते बल्कि वे मैदान में आकर लोगों से मिलते हैं। प्रशासन का रोल कई तरह का है जैसे योजना बनाना, बजट का इंतजाम करना, जरूरी तकनीकी और यांत्रिक सहायता देना और लोगों को बाजार तक पहुँचने में मदद करना।

उदाहरण के लिए, अगर किसी गाँव में धान की बजाय फलों की बिक्री के लिए एक छोटी मंडी लगाई जा सके, तो प्रशासन उससे भी जोड़ता है। इसी तरह प्रशिक्षण सत्रों में कृषि विशेषज्ञ भी आते हैं जो बताते हैं कि किस मौसम में कौन-सा काम करना है। इससे गाँव वालों को आत्मनिर्भर होने में मदद मिलती है और परियोजना की सफलता की संभावना बढ़ती है।

क्या है लखपति दीदी योजना

लखपति दीदी योजना भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य देश की ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इस योजना के तहत महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जाता है, ताकि वे खुद का व्यवसाय शुरू कर सकें और स्थायी आजीविका स्थापित कर सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई मंचों पर इस योजना का उल्लेख कर चुके हैं, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

लखपति दीदी योजना की बेसिक कान्सेप्ट ‘स्वयं सहायता समूहों’ (Self Help Groups – SHGs) को मजबूत करना है। इस योजना के तहत पहले महिलाओं को किसी SHG से जोड़ा जाता है, जहाँ उन्हें सिलाई, पेंटिंग, डेयरी, खेती, खाद्य प्रसंस्करण, छोटे बिजनेस, ब्यूटी पार्लर, पैकेजिंग आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद महिलाएँ अपना बिजनेस प्लान तैयार करती हैं और SHG के माध्यम से यह प्लान सरकार तक पहुँचाया जाता है। योजना की खास बात यह है कि व्यवसाय शुरू करने के लिए महिलाओं को 5 लाख रुपए तक का बिना किसी ब्याज के लोन दिया जाता है।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त बनाना, उनकी आमदनी में वृद्धि करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और उन्हें रोजगार देने वाले व्यक्तियों के रूप में विकसित करना है। सरकार चाहती है कि हर महिला अपनी क्षमता के अनुसार काम करे और लखपति दीदी बनकर सालाना कम से कम 1 लाख रुपए की आय प्राप्त कर सके।

नक्सलवाद में आई भारी कमी

नक्सलवाद के पीछे कई कारण होते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, असमानता और कई मौकों पर सरकार की उपस्थिति का अभाव। जब सरकार ना केवल सुरक्षा बल भेजती है बल्कि विकास-कार्य भी दिखाती है, जैसे सड़क का बनाना, बिजली का पहुँचना, स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र का खुलना, तो लोगों का भरोसा सरकार पर बनता है और सरकार से लोगों को दूर करने की नक्सलियों की कोशिशें टूटने लगती हैं।

साथ ही, जब ग्रामीणों को सीधी आय के अवसर मिलते हैं, युवाओं को रोजगार मिलता है और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ती है, तब सामुदायिक समर्थन भी बदलता है। सुकमा में सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ इन विकास कदमों ने मिलकर नक्सल असर को घटाया है, लोग अब आपराधिक रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन चुन रहे हैं और मुख्य धार से जुड़ रहे है।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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