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US में भगवान मुरुगन के मंदिर के विरोध में उतरे ईसाई कट्टरपंथी, रिपब्लिकन नेता बोला- ‘ईसाई राष्ट्र’ में कैसे बन रही मूर्ति?: जानें सोशल मीडिया पर कैसे चलाया जा रहा हिंदूफोबिया?

टेक्सास में हनुमान प्रतिमा और गणेश चतुर्थी समारोह के विरोध के बाद अब अमेरिका के केरोलिना में बन रही मुरुगन मंदिर ‘हिन्दु घृणा’ का केन्द्र बन गया है। अमेरिका के ‘रेसिस्ट’ नहीं पचा पा रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा भगवान मुरुगन यानी ‘युद्ध देवता’ का भव्य मंदिर यहाँ बनाया जा रहा है। इसको लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं।

90 के दशक में बनी मंदिर निर्माण की योजना

मुरुगन मंदिर निर्माण की योजना 90 के दशक में बनाई गई। इस योजना पर अमल करते हुए 2018 में दुनिया का सबसे ऊँचा मुरुगन भगवान की प्रतिमा के लिए भूमि तय की गई। इस भूमि पर भव्य मंदिर और भगवान मुरुगन की प्रतिमा के अलावा तमिल संस्कृति से जुड़ा संग्रहालय और एक तमिल लाइब्रेरी बनाई जा रही है।

अमेरिका में भगवान मुरुगन को समर्पित ये पहला मंदिर होगा। ये वाशिंगटन डीसी से करीब 5 मील दूर मैरीलैंड के लैनहम में स्थित है। यहाँ हर हिन्दू तीज-त्यौहारों, खास कर तमिल त्यौहारों पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। 35 फुट के चबूतरे के साथ इस प्रतिमा की कुल ऊंचाई 190 फुट होगी। 

करीब 130 एकड़ के आवासीय जमीन पर बन रहे 155 फीट ऊँचे हिन्दू भगवान की प्रतिमा बनाए जाने पर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। अमेरिका में इतनी ‘बड़ी जमीन’ दिए जाने से लेकर फंडिंग तक पर सोशल मीडिया में सवाल पूछे गए हैं। कहा जा रहा है कि मंदिर निर्माण की इजाजत किसने दी?

मंदिर निर्माण के लिए इजाजत की जरूरत नहीं

जानकारी के मुताबिक मंदिर बनाने के लिए किसी अनुमोदन की जरूरत नहीं है। दूसरे पूजा स्थलों की तरह यहाँ मंदिर निर्माण किया गया है। काउंटी के अध्यादेशों के तहत ऐसा किया गया है। सोशल मीडिया एक्स पर एक यूजर ने लिखा, “यह भूमि R-1 आवासीय क्षेत्र में है, जिसका अर्थ है कि मंदिर को, अन्य पूजा स्थलों की तरह, काउंटी के अध्यादेशों के तहत काउंटी के योजना बोर्ड या आयुक्त बोर्ड से अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।”

एक स्वतंत्र पत्रकार स्टीफन हॉन ने आरोप लगाया है कि मंदिर का निर्माण अभी जारी है। इस बीच आयोजकों ने ‘आशीर्वाद’ के रूप में साड़ी बाँटकर फंड जमा करना शुरू कर दिया है।

“हिंदुओं ने एक विशाल मंदिर के लिए सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हासिल कर ली है। तमिलों की योजना यहाँ दुनिया के सबसे बड़े ‘युद्ध भगवान मुरुगन’ की प्रतिमा बनाने की है, जो स्टेट्यू ऑफ लिबर्टी से ऊँची होगी”

हॉन का कहना है कि कोरोलीना मुरुगन मंदिर क्षेत्र काफी अविकसित है। हालाँकि आयोजक लाखों डॉलर जुटाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम कर रहा है। ‘आशीर्वाद साड़ी’ भी उनमें से एक है।

अमेरिका के जाने माने वैज्ञानिक और पूर्व न्यूक्लियर साइंटिस्ट मैट वैन भी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि यह प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से ऊँची होगी।

अमेरिका की हकीकत ये है कि यहाँ 150 फीट से ज्यादा ऊँची कई चर्च मौजूद हैं। उनका भव्य परिसर है जो सैकड़ों एकड़ में फैला हुआ है। इसकी तुलना स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से नहीं की जाती, लेकिन भव्य मंदिर पर अमेरिका के कट्टरपंथी संगठनों और रेसिस्टों की नजर टेढ़ी हो गई है।

एक्स पर एक यूजर ने मंदिर का समर्थन करते हुए लिखा कि अमेरिका में ऐसे दर्जनों 150 फीट से ज्यादा लंबी मेगा चर्च हैं और इनकी पार्किंग एयरपोर्ट से ज्यादा बड़ी है। एक हिन्दू देवता की बड़ी प्रतिमा बनाई जा रही है और भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। इसका इतना विरोध क्यों। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सबके लिए है।

हनुमान मंदिर का हुआ विरोध

अमेरिका के टेक्सस में 90 फीट के हनुमान प्रतिमा बनने का भी विरोध हुआ था। यहाँ तक कि रिपब्लिकन नेता एलेक्जेंडर डंकन ने महाबली हनुमान को ‘झूठा हिंदू भगवान’ कहा। उन्होंने यहाँ तक दावा किया कि अमेरिका जैसे ‘ईसाई देश’ में मूर्तियाँ नहीं बननी चाहिए। रिपब्लिकन नेता के इस बयान का हिन्दू संगठनों ने जमकर विरोध किया।

अमेरिका को ‘ईसाई राष्ट्र’ कहने पर लोगों ने राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी के इस नेता के खिलाफ कार्रवाई का दबाव भी बनाया।

उपराष्ट्रपति वेंस जता चुके हैं हिन्दू पत्नी के ‘धर्मपरिवर्तन’ की इच्छा

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पत्नी उषा वेंस के हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाइयत स्वीकार करने को लेकर बयान दिया था। ट्रंप के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति पद के दावेदार माने जाने वाले जेडी वेंस के बयान के बाद ये चर्चा दुनियाभर में छिड़ी हुई है कि अमेरिका की ‘फर्स्ट लेडी’ का ईसाई होना जरूरी है क्या?

जेडी वेंस ने अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के मद्देनजर पत्नी के हिन्दू रीति रिवाज मानने पर सवाल खड़े किए और भविष्य में ईसाइयत स्वीकार कर लें, ऐसी इच्छा जताई। 29 अक्टूबर को मिसिसिपी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उषा वेंस ईसाइयत स्वीकार कर लेंगी। उन्होंने कहा कि उन्हें उषा के आस्था से कोई समस्या नहीं है। लेकिन उषा उनके साथ हर रविवार को चर्च जाती हैं। जैसे जेडी चर्च जाते-जाते ईसाइयत की गोस्पेल की ओर आकर्षित हुए, उसी तरह से उनकी पत्नी भी ईसाइयत को मान लेंगी और हिन्दू धर्म छोड़ देंगी।

अमेरिका के हिन्दू संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया। हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने कहा कि जेडी वैंस को अगर उनकी पत्नी ने उनके धर्म से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, तो वे ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये वही जेडी वेंस हैं, जिन्होंने पूरे हिन्दू रीति-रिवाज से ऊषा से 2014 में शादी की थी। हालाँकि जेडी वेंस की छवि एक रूढ़िवादी ईसाई नेता की रही है। लेकिन इंटरफेथ मैरिज कर उन्होंने सबको चौंकाया था।

भारत के लोग दिखा रहे आईना

भारत की चर्चा करते हुए एक यूजर ने बताया है कि यहाँ सभी धर्मों को समान अधिकार है। वक्फ बोर्ड के पास रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीनें है, वही चर्च और ईसाइयत का प्रचार करने वाली संस्था के पास मंदिर से ज्यादा जमीनें हैं। तमिलनाडु के सलेम में मौजूद 65 फीट के जीसस की तस्वीर शेयर कर यूजर ने कहा कि भारत में प्रेम और भाईचारा फैलाया जाता है, आप भी प्रेम औ भाईचारा फैलाएँ।

अमेरिका में हिन्दू धर्म के खिलाफ जहर फैलाने की कोशिश लगातार हो रही है। कभी ‘हनुमान प्रतिमा’ के नाम पर तो कभी मुरुगन प्रतिमा को लेकर कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू समुदाय है।

जेल में बंद उम्मीदवार के समर्थन में लालू का रोड शो, जानें कौन हैं RJD विधायक रीतलाल यादव जो तीन बार जेल से लड़ा है चुनाव

पटना की सड़कों पर एक अजीबोगरीब दृश्य देखने को मिला। जिधर देखिए, हरे झंडे लहरा रहे थे और भीड़ में एक पुराना करिश्माई चेहरा, लालू प्रसाद यादव, अपनी बंद गाड़ी से जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे। यह रोड शो किसी समाज सुधारक या आम नेता के लिए नहीं था। लालू यादव खुद मैदान में उतरे थे, ताकि बाहुबली कहे जाने वाले उम्मीदवार रीतलाल यादव को जिता सकें।

यह चुनावी प्रचार कम और अपराध के महिमामंडन जैसा ज्यादा लगा, क्योंकि लालू यादव उस उम्मीदवार के लिए वोट माँग रहे थे जो खुद गंभीर आपराधिक आरोपों के चलते जेल में बंद है। यह घटना बिहार की राजनीति के एक गहरे सच को उजागर करती है। अपराध और राजनीति का गठजोड़। आईए एक बार आपको भी वाकिफ करा देते हैं रीतलाल यादव की आपराधिक हिस्ट्री।

लालू यादव ने रीतलाल यादव के लिए किया रोड शो

लालू यादव ने पटना के दानापुर विधानसभा क्षेत्र में 3 नवंबर 2025 को करीब 15 किलोमीटर लंबा रोड शो किया। इसका मकसद था- RJD के उम्मीदवार और सिटिंग विधायक रीतलाल यादव को जीताना।

लेकिन रीतलाल यादव जेल में हैं। हाँ, आपने सही पढ़ा- जेल में बंद उम्मीदवार के लिए रोड शो। रीतलाल 17 अप्रैल से बिल्डर कुमार गौरव से 50 लाख रुपए की रंगदारी माँगने और धमकी देने के मामले में जेल में हैं। चुनावी नियम के कारण वे खुद प्रचार में नहीं उत सकता था। हालाँकि, रीतलाल यादव ने नामांकन के लिए कोर्ट से अनुमति माँगी, जो नहीं मिली। अब रीतलाल का परिवार ही चुनाव प्रचार संभाल रहा है।

रोड शो का कारण?

लालू यादव का दानापुर में उतरना महज रीतलाल की सीट बचाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीतिक चाल थी, जिसका मुख्य उद्देश्य विरोधियों को हराना और अपना वोट बैंक सुरक्षित करना था।

दानापुर विधानसभा क्षेत्र, लालू के दामाद रामकृपाल यादव (जो अब भाजपा में हैं) को हराने वाली मीसा भारती के पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। रीतलाल की जीत मीसा भारती के भविष्य के रास्ते को आसान बनाएगी। लालू का आना यह स्पष्ट संदेश देता है कि परिवार के वर्चस्व के लिए किसी भी कीमत पर सीट जीतनी है, भले ही उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि का हो।

इसके अलावा, दानापुर में यादव वोटर करीब 22% हैं। इसके बाद करीब 20% फॉरवर्ड, करीब 15% दलित, 20-25% EBC और 6-8% मुस्लिम हैं। NDA के उम्मीदवार रामकृपाल यादव (जो खुद लालू के पूर्व शिष्य रहे हैं) की छवि ‘सॉफ्ट’ है। इस इलाके में यादव वोटर बँट सकते थे। खुद को यादवों का सबसे बड़ा नेता मानने वाले लालू यादव ने सड़क पर उतरकर यह सुनिश्चित किया कि यादव वोट एकजुट होकर केवल रीतलाल को ही मिलें। यह एकजुटता अपराध की पृष्ठभूमि को दरकिनार कर केवल जातीय आधार पर वोट डालने का संकेत है।

लालू के करीबी रामकृपाल यादव, 2014 में टिकट न मिलने पर बीजेपी में चले गए थे और उन्होंने मीसा भारती को हराया था। लालू यादव अपने पुराने शिष्य को हराने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। लालू का रोड शो, रामकृपाल के यादव वोटों को अपनी तरफ खींचने के प्रयास को विफल करने की रणनीति का हिस्सा है।

कौन हैं रीतलाल यादव?

रीतलाल यादव, जिन्हें मीडिया में ‘बाहुबली‘ कहा जाता है, लालू यादव के पुराने संपर्क वाले हैं। रीतलाल का राजनीतिक सफर 2003 में लालू यादव की ‘तेल पिलावन, लाठी घुमावन‘ रैली के दौरान शुरू हुआ था। एक दौर ऐसा भी कहा जाता है कि जब दानापुर डिवीजन से रेलवे के जितने भी टेंडर निकलते थे, वो रीतलाल यादव ही डील करते थे।

रीतलाल 50 लाख रुपए की रंगदारी माँगने और धमकी देने के मामले में जेल में बंद हैं। यह मामला बिल्डर कुमार गौरव से जुड़ा है। रीतलाल के चुनावी हलफनामे के अनुसार, उन पर हत्या, रंगदारी, वसूली और धमकी देने जैसे कुल 11 आपराधिक मामले लंबित हैं।

रीतलाल तब चर्चा में आए जब उन पर भाजपा नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या का आरोप लगा। 2010 में विधानसभा चुनाव से पहले रीतलाल ने सरेंडर कर दिया था। रीतलाल ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जेल से ही चुनाव लड़ा और हारे। हालाँकि, रीतलाल को भाजपा नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या मामले में हाल ही में जमानत मिली, लेकिन वे रंगदारी के मामले में फिर जेल में गए और पुलिस की हिरासत में नामांकन करने पहुँचे।

एक ऐसे उम्मीदवार के लिए, जिस पर संगीन आरोप हैं और जो चुनाव प्रचार की अनुमति के बावजूद जेल से बाहर नहीं आ सका, खुद पार्टी सुप्रीमो का प्रचार के लिए उतरना यह दिखाता है कि पार्टी की प्राथमिकता ‘अपराधमुक्त छवि’ नहीं, बल्कि ‘वोट बैंक की जीत’ है। यह सीधे तौर पर एक बार फिर से ‘जंगलराज’ और आपराधिक तत्वों को राजनीति में संरक्षण देने की मानसिकता को दर्शाता है।

अपराधी को टिकट: ‘दोहरी सोच’ की राजनीति

यह घटना लालू यादव की ‘दोहरी सोच‘ को उजागर करती है। एक तरफ, उनके परिवार के सदस्य (जैसे तेजस्वी यादव) अक्सर आपराधिक छवि वाले नेताओं पर बयान देते हैं, लेकिन जब दानापुर में रीतलाल यादव जैसे जेल में बंद उम्मीदवार की बात आती है, तो वे खुद प्रचार में उतर आते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लालू के लिए नैतिकता या कानून मायने नहीं रखता, बल्कि केवल चुनाव जीतना मायने रखता है। एक ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारना, जो गंभीर आरोपों में फँसा है और जिसके लिए खुद पार्टी मुखिया को उतरना पड़े, यह दिखाता है कि RJD की राजनीति में अपराध और राजनीति को अलग-अलग मानने की सोच है। यदि कोई नेता बीजेपी का हो तो वह अपराधी है, लेकिन अगर RJD का हो, तो उसे ‘साजिश का शिकार’ बताकर उसे समर्थन दिया जाता है।

₹1200 में ताबीज, ₹850 का टिकट, माओ के देश में कुत्ते का मंदिर: बौद्ध पैगोडा में ‘दीटिंग देवता’ की पूजा से स्वस्थ-सलामत रहते हैं पेट डॉग्स, जुड़ी है पौराणिक कहानी

चीन में ‘कुत्तों के देवता’ का एक मंदिर है। बीते कुछ दिनों से ये मंदिर काफी चर्चा में है। यहाँ पालतू कुत्तों के मालिक अपने पालतू जानवरों को ‘दीटिंग देवता’ की पूजा के लिए लेकर आते हैं।

देवता को कुत्तों का खाना चढ़ाया जाता है और उनके पट्टे (leashes) को अगरबत्ती की राख में रखकर अपने पालतू जानवरों की सेहत और सुरक्षा की कामना की जाती है। सोशल मीडिया पर इस मंदिर की चर्चा ट्रेंड में है।

पूर्वी चीन में अनहुई प्रांत के चिझोउ शहर में जिउहुआ पर्वत स्थित है। ये चीन के चार प्रमुख बौद्ध पर्वतों में से एक है। इन्हीं में से एक पर अनोखा स्तूप (pagoda) बना है, जो ‘कुत्तों के देवता दीटिंग’ को समर्पित है।

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (एससीएमपी) की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के लोगों का कहना है कि यह देश का एकमात्र स्तूप है जो किसी जानवर के सम्मान में बनाया गया है। स्तूप के सामने कुत्तों का भोजन और स्नैक्स भेंट स्वरूप रखा जाता है।

दीटिंग के मंदिर में दूर दूर से लोग अपने पालतू जानवरों को लेकर आ रहे हैं। मान्यता के अनुसार, यहाँ पर लोग देवता को श्रद्धांजलि देकर अपने पालतू कुत्तों की बीमारी, उनके न खोने और दीर्घायु होने के लिए मन्नत माँगते हैं।

दिव्य ज्ञान पाकर दीटिंग का हुआ अवतरण

रिपोर्ट के अनुसार, दीटिंग को लेकर यहाँ एक कहानी प्रचलित है। कहानी में बताया गया है कि आत्माओं की रक्षा करने और आपदाओं को नियंत्रित करते वाले पृथ्वी के रक्षक बोधिसत्व ‘क्षितिगर्भ’ ने एक सफेद कुत्ते को पाला था जो उनके आध्यात्मिक सफर में साथ चलता था।

जिउहुआ पर्वत पर बोधिसत्व के ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह कुत्ता दिव्य रूप में बदलकर ‘दीटिंग’ नामक एक पौराणिक प्राणी बन गया। इस पौराणिक प्राणी के सिर पर बाघ का चेहरा, एक सींग, कुत्ते के कान, ड्रैगन जैसा शरीर और शेर की पूंछ थी।

दीटिंग को बुद्धिमत्ता, न्याय और निष्ठा का प्रतीक माना गया है। लोगों का ऐसा मानना है कि उसमें इंसानों के दिल को पढ़ लेने के कारण अच्छाई और बुराई को पहचानने की असीम शक्ति थी।

दीटिंग को लेकर प्रचलित इस कहानी के कारण ही देश भर से लोग इस मंदिर में अपने पालतू जानवरों के साथ आते हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यहाँ पर जालतू जानवरों का प्रवेश निःशुल्क है लेकिन लोगों को अंदर आने के लिए 70 युआन (लगभग 850 रुपए) का टिकट लगता है।

हालाँकि यहाँ लोगों का अपने पालतू जानवरों को लाने का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि जिन लोगों के पालतू जानवर खो गए हैं, वे लोग उनकी तस्वीर लेकर आते हैं। तस्वीर को दीटिंग को दिखाकर वे देवता से उनके मिल जाने की दुआ भी माँगते हैं।

केवल लोगों की आस्था के लिहाज से ही नहीं बल्कि एक दर्शनीय स्थल के तौर पर भी काफी प्रसिद्ध है। यहाँ कुत्तों के लिए लगभग 1200 रुपए में ताबीज मिलता है। इसके अलावा ट्राम में कुत्तों के लिए खास तौर पर सीटें बनाई गई हैं।

इस स्तूप की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसे लेकर नेटिजन्स का कहना है कि ये सभी जीवों के समान होने का प्रतीक है। साथ ही ये इंसान और कुत्तों के बीच के प्यार के लिए ये सबसे बेहतर उदाहरण है।

चीन में दीटिंग को लेकर कई धार्मिक मान्यताएँ भी हैं। दीटिंग के प्रतीक को घरों में सुख समृद्धि के लिए रखा जाता है। दीटिंग को बुराई से रक्षा करने वाला और सुख देने वाला शुभ प्रतीक माना जाता है।

इसके अलावा कहा जाता है कि जिन बच्चों के पास दीटिंग का प्रतीक होता है, वे बुद्धिमान, ईमानदार और ज्ञानी बनते हैं। बड़े-बुजुर्गों को दीटिंग के माध्यम से प्रार्थनाओं के उत्तर मिलते हैं।

दीटिंग को लेकर एक नहीं कई किंवदंतियाँ हैं प्रचलित

दीटिंग को लेकर चीन में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। एक अन्य कहानी सिल्ला (वर्तमान कोरिया) के 24 वर्षीय राजकुमार गिम ग्यो-गाक से जुड़ी हुई है। ये राजकुमार चीन के तांग वंश के समय में थे। उन्होंने सांसारिक जीवन से ऊबकर साधु बनने का निर्णय लिया। यात्रा में उनका अपना सफेद कुत्ता भी साथ था।

कहानी के अनुसार, गिम ग्यो-गाक का कुत्ता हमेशा उनके साथ रहा। लोगों का मानना है कि उस कुत्ते में दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की असीम शक्ति थी। वर्ष 794 में गिम ग्यो-गाक की ध्यान मुद्रा (zazen position) के दौरान ही मृत्यु हुई थी। उस समय भी उनका सफेद कुत्ता वहाँ पर उपस्थित था।

ऐसा कहा जाता है कि उनके शव को 3 वर्ष बाद खोलने पर भी उनका चेहरा ऐसा लग रहा था कि जैसे वे जीवित हों। उनके शव की रहस्मयी हालत को देखकर लोग गिम ग्यो-गाक को बोधिसत्व क्षितिगर्भ का अवतार मानने लगे। बाद में उनके लिए एक मंदिर बनाया गया। इस मंदिर में उनके साथ उनके कुत्ते को भी प्रतिष्ठित किया गया।

बौद्ध अनुयायियों ने गिम ग्यो-गाक को गिम क्षितिगर्भ नाम दिया और उनके कुत्ते को एक देवता का रूप मानते हैं। दीटिंग को एक शुभ देवता कुत्ता माना जाने लगा। ये बौद्ध शिक्षाओं का प्रतीक है, जीवन के मार्गदर्शन करता है और बुराई से रक्षा करता है।

OpIndia Exclusive वामपंथी आतंक को खत्म करने की ओर बढ़ी मोदी सरकार, RTI के आँकड़े दे रहे गवाही: 2014 से हजारों का सरेंडर, 2025 में सबसे ज्यादा नक्सली ढेर

पीएम मोदी की अगुवाई वाले पिछले 11 वर्षों के शासनकाल में नक्सलवाद अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है। ‘रेड कॉरिडोर’ में वामपंथी उग्रवाद (LWE) में तेजी से कमी आई है। गृह मंत्रालय ने नक्सलवाद पर ऑपइंडिया की आरटीआई के जवाब से जानकारी दी है कि मई 2014 से 30 सितंबर 2025 तक छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण (6,153) किए और सबसे ज्यादा नक्सलियों की हत्या भी यहाँ (1,129) दर्ज की गईं।

वर्ष 2016 में सबसे ज़्यादा आत्मसमर्पण (1,440) दर्ज किए गए, जबकि 2025 (30 सितंबर तक) में सबसे ज्यादा वामपंथी उग्रवादियों (311) को मौत के घाट उतारा गया। ये खुफिया जानकारी के आधार पर नक्सलियों के खिलाफ किए गए सफलतापूर्वक मिशन को दर्शाता है।

गृह मंत्री अमित शाह ने ‘ऑपरेशन कगार’ के तहत नक्सल समस्या को समाप्त करने के लिए मार्च 2026 का लक्ष्य रखा है।

बीजेपी सरकार के दौरान छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का गिरता ग्राफ ( फोटो साभार- गृह मंत्रालय, LWE विभाग)

खात्मे की ओर नक्सलवाद

ऑपइंडिया को 10 राज्यों – पश्चिम बंगाल, केरल, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आँकड़े उपलब्ध कराए गए हैं। आँकड़ों के अनुसार, मई 2014 से अब तक कुल 8,751 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और 1,801 नक्सली मारे गए हैं। इस दौरान कुल 548 सुरक्षाकर्मियों ने अपना बलिदान दिया। इस दौरान 1630 नागरिक मारे गए। इसके अलावा, सुरक्षा बलों ने मई 2014 से 30 सितंबर 2025 के बीच वामपंथी उग्रवादियों से 5,277 हथियार बरामद किए।

ये आँकड़े केंद्र सरकार की राज्यों के बीच के समन्वय, विकास और पुनर्वास की नीति की सफलता को बताता है। बिहार में चुनावी रैली के दौरान हाल ही में गृह मंत्री शाह ने कहा कि देश भर में नक्सलवाद अब केवल 3 जिलों में सिमट कर रह गया है।

10 राज्यों में छत्तीसगढ़ अव्वल, दो-तिहाई नक्सलियों का खात्मा या आत्मसमर्पण ( फोटो साभार- गृह मंत्रालय, LWE विभाग)

राज्यों में छत्तीसगढ़ सबसे ऊपर बना हुआ है

छत्तीसगढ़ पारंपरिक रूप से नक्सल आंदोलन का मुख्य केंद्र रहा है। वामपंथी उग्रवादियों के आत्मसमर्पण के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा नक्सलवादियों की हत्या हुई है। ये राज्य-केंद्र के बीच बेहतर तालमेल और दूर-दराज के क्षेत्र में विकास की पहुँच को दर्शाता है।

खास बात यह है कि मई 2014 से दिसंबर 2018 तक रमन सिंह के नेतृत्व में यहाँ भाजपा सरकार थी। उस वक्त राज्य में करीब 2697 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और 408 वामपंथी उग्रवादी मारे गए। इस चरण में केंद्र-राज्य के बीच मज़बूत तालमेल देखने को मिला। यहाँ केंद्रीय गृह मंत्रालय के अभियान और राज्य पुलिस की कार्रवाइयाँ एक साथ काम कर रही थीं।

इसके विपरीत, कॉन्ग्रेस शासन (भूपेश बघेल और अजीत जोगी) के दौरान 7 दिसंबर 2018 से 13 दिसंबर 2023 तक, यह आँकड़ा घटकर लगभग 2,019 आत्मसमर्पण और 228 वामपंथी उग्रवादियों की हत्याओं के रहे। हालाँकि नागरिक और सुरक्षा बलों की हताहतों की संख्या में मामूली सुधार हुआ।

दिसंबर 2023 में विष्णु देव साय की भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद, सितंबर 2025 तक 1887 से ज्यादा आत्मसमर्पण और 493 नक्सली मारे जा चुके हैं। इससे पता चलता है कि केंद्र और राज्य के बीच बीजेपी शासित सरकारों के बीच बेहतर तालमेल रहा और नतीजे भी सामने आए।

झारखंड और ओडिशा में इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश अपेक्षाकृत शांत हुआ है। पश्चिम बंगाल और केरल में हाल के वर्षों में घटनाओं की संख्या नगण्य दर्ज की गई है, जो रेड कॉरिडोर के सिकुड़ने को दर्शाता है।

2016 में आत्मसमर्पण की दर सबसे ज्यादा

2016 में नक्सलियों ने सबसे ज्यादा आत्मसमर्पण किया। इससे पता चलता है कि पुनर्वास कार्यक्रम सफल रहा। 2025 (30 सितंबर तक) में नक्सलियों की एक्टिविटी सबसे कम दिखी। ये बेहतर कार्रवाई, गुप्त जानकारी, अच्छा तालमेल और तकनीकी मदद से नक्सलवाद को समाप्त करने के केंद्र सरकार के दृढ़ संकल्प का संकेत है।

समय के साथ आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या ये बताता है कि नक्सलवाद के रीढ़ अब टूट चुके हैं।

सुरक्षा बलों ने दिया बलिदान

सुरक्षा बलों ने नक्सवाद की कीमत चुकाई है। मई 2014 से अब तक 548 जवान बलिदान हो चुके हैं। हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में इसकी संख्या में कमी आई है। इस दौरान 1,630 नागरिकों की जानें गई हैं। हालाँकि विद्रोहियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों के सिकुड़ने के साथ नागरिकों को निशाना बनाकर की जाने वाली घटनाओं में कमी आई है।

2018 के बाद छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों और नागरिकों की मौत का डाटा ( फोटो साभार- गृह मंत्रालय, LWE विभाग)

आत्मसमर्पण और पुनर्वास का फायदा

ग्यारह वर्षों में 8751 आत्मसमर्पण हुए हैं। नक्सलियों में जो गंभीर अपराधों में शामिल नहीं हैं, उनके लिए परामर्श, आर्थिक प्रोत्साहन और कानूनी राहत देकर समस्या के निवारण की ओर कदम बढ़ाया गया।

गृह मंत्री शाह ने नक्सलियों के बातचीत को ठुकराकर आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया है। इस दौरान सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड की संख्या भी बढ़ी, जिससे नक्सलियों के लिए अपने सशस्त्र आंदोलन को जारी रखने की कोई गुंजाइश नहीं बची।

सभी वजहों ने मिलकर नक्सलियों के कमर तोड़ दिए। पिछले 11 वर्षों में 5,277 हथियार बरामद किए गए। इससे विद्रोहियों के पुनर्गठित होने की क्षमता और कम हो गई।

हथियारों की बरामदगी से नक्सलवाद कमजोर हुआ

लगातार हथियारों की बरामदगी और मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या ने नक्सलियों के हौसले पस्त कर दिए। इससे जंगलों में छिपकर हमला करने की उनकी योजनाओं पर भी असर पड़ा है।

मई 2014 से सितंबर 2025 के बीच सुरक्षा बलों ने 5277 हथियार 10 राज्यों में बरामद किए ( फोटो साभार- गृह मंत्रालय,LWE )

मार्च 2026 में हो जाएगा नक्सलवाद खत्म

नक्सलवाद की मौजूदगी अब चुनिंदा जंगल वाले क्षेत्रों तक सीमित रह गया है। मार्च 2026 तक नक्सलवाद को समाप्त करने की सरकार ने घोषणा की है। दूरसंचार का फैलता नेटवर्क, कल्याणकारी योजनाओं का असर और लगातार आत्मसमर्पण कर रहे नक्सलियों को देखकर उम्मीद की जा सकती है कि मार्च 2026 का टारगेट पूरा होगा और देश से नक्सलवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

नाइजीरिया में ईसाइयों का कत्लेआम, भड़के ट्रंप ने दी सैन्य कार्रवाई की धमकी: कौन हैं 40000+ का नरसंहार करने वाले ‘इस्लामी कट्टरपंथी’, जिन्होंने मजहब के नाम पर लाखों को किया विस्थापित

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के सैन्य कार्रवाई की धमकी के बाद नाइजीरिया में ईसाइयों पर हो रहे जुल्म का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। यहाँ हजारों ईसाइयों की अब तक हत्या कर दी गई है जबकि हजारों गैरइस्लामिक लोगों को विस्थापित होने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

नाइजीरिया में एक्टिव बोको हराम, इस्लामिक स्टेट ऑफ अफ्रीका, फुलानी चरवाहा जैसे संगठन गैरइस्लामी लोगों का कत्लेआम कर रहे हैं। इन संगठनों ने अनौपचारिक तौर पर देश के कई हिस्सों में शरिया कानून लागू कर दिया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने दी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाइजीरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा है कि पेंटागन को उन्होंने इसकी योजना बनाने के आदेश दिए हैं। उन्होंने नाइजीरियन सरकार पर ईसाइयों के खिलाफ हो रहे सामूहिक नरसंहार को नहीं रोक पाने का आरोप भी लगाया।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि नाइजीरिया में हजारों ईसाइयों की हत्या की जा रही हैं। इससे यहाँ ईसाइयों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। इस्लामी कट्टरपंथी इन सामूहिक हत्याओं के लिए जिम्मेदार है। अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसके खिलाफ बड़े एक्शन की योजना बनाया जा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 1 नवंबर 2025 को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “अगर नाइजीरियाई सरकार ईसाइयों की हत्या की इजाजत देती रही, तो अमेरिका नाइजीरिया को दी जाने वाली सभी तरह की मदद तुरंत बंद कर देगा, और हो सकता है कि उस बदनाम देश में ‘गोलियाँ बरसाकर’ उन इस्लामी आतंकवादियों का सफाया कर दे, जो ये भयानक अत्याचार कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं अपने युद्ध विभाग को संभावित कार्रवाई के लिए तैयार रहने का निर्देश दे रहा हूँ। अगर हम हमला करेंगे, तो वह तेज, क्रूर और तीखा होगा, ठीक वैसे ही जैसे आतंकवादी गुंडे हमारे प्यारे ईसाइयों पर हमला करते हैं! चेतावनी: नाइजीरियाई सरकार को जल्दबाज़ी में कार्रवाई करनी चाहिए।”

उन्होंने नाइजीरिया को स्पेशल वॉच लिस्ट में शामिल किया है। इस लिस्ट में चीन, रूस, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया समेत कई देशों को शामिल किया गया है। अमेरिका की माने तो जिस देश में धार्मिक आजादी का उल्लंघन होता है, उस देश को अपने स्पेशल लिस्ट में डालता है।

फोटो साभार-बीबीसी

नाइजीरिया में हुई ईसाइयों की हत्या की ताजा घटनाएँ

नाइजीरिया में ईसाइयों और इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच टकराव की शुरुआत 1950 के दशक में शुरू हो गई थी। बोको हरम और फुलानी चरवाहों जैसे इस्लामी कट्टरपंथी संगठन 2009 में अस्तित्व में आए। इस्लामी कट्टरपंथी शुरुआत से ही ईसाइयों के गाँवों और चर्च को अपना निशाना बनातेआ रहे हैं। गाँव के गाँव उजाड़ दिए गए और चर्च को नष्ट कर दिया गया।

साल 2025 की बात करें तो 14 अक्टूबर को नाइजीरिया के प्लेटू राज्य के रचास और रावुरु गाँव में फुलानी मिलिटेंट्स ने हमला कर 13 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

23 सितंबर 2025 को बोको हराम ने अदमवा राज्य के वाग्गा मोंगारो गाँव में 4 ईसाइयों की हत्या कर दी, घरों और चर्च को नेस्तनाबूद कर दिया। इस हमले में कई लोग घायल भी हुए। वहीं 5 सितंबर को इसी संगठन ने बोर्नो राज्य के दरुल जमाल गाँव में हमला कर 63 लोगों को मार डाला।

13-14 जून की रात बेन्युए राज्य के इएलेवाटा गाँव में फुलानी चरवाहों ने 100 से ज्यादा ईसाइयों की हत्या कर दी और उनके घरों में आग लगा दी। इससे पहले 24 मई को फुलानी चरवाहों ने ही ताराबा राज्य के करिम लामिदो पर हमला कर 42 ईसाइयों की हत्या कर दी और 60 से ज्यादा घर जला दिए।

गाँव के आसपास के करीब 5000 लोग अपना घर-बार छोड़ कर विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए हैं। अमेरिका स्थित काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से अब तक अलग-अलग वजहों से 60000 लोगों की मौत हो चुकी है।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 से बोको हराम ने 40000 से ज्यादा ईसाइयों की यहाँ हत्या कर दी। हजारों बच्चे मारे गए हैं और करोड़ों लोग विस्थापित हुए हैं। 2011 से अभी तक बोको हराम और इस्लामिक स्टेट इन वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस ने 37500 से अधिक लोगों की हत्या कर दी।

बोको हराम और अल कायदा का कनेक्शन

बोको हराम एक कट्टर इस्लामी संगठन है। इसकी नाइजीरिया की राजनीति में दखंलदाजी है। बोको हराम ने अगस्त 2011 में नाइजीरिया की राजधानी अबुजा में संयुक्त राष्ट्र भवन में हुए एक आत्मघाती बम विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी। इसके बाद दुनिया का ध्यान इस संगठन पर गया। इस हमले में कम से कम 25 लोग मारे गए थे और 110 से ज्यादा घायल हुए थे।

इसके बाद लगातार ईसाइयों को ये संगठन अपना निशाना बनाता रहा है। संगठन पश्चिमी शिक्षा और सभ्यता के खिलाफ है और वैश्विक इस्लामिक आतंकवाद से जुड़ा हुआ है। इस संगठन को अल-सुन्नाह लिल-दावा वल-जिहाद (इस्लाम और जिहाद के प्रचार के लिए सुन्नत के लोगों का समूह) से भी जाना जाता है।

अल-कायदा और उत्तरी अफ्रीका की शाखा एक्यूआईएम और एमयूजेएओ के साथ कनेक्शन है। अलकायदा आतंकी नेटवर्क का हिस्सा होने की वजह से इसे हर तरह की सहायता मिल जाती है, नाईजीरिया में इसने राजनीतिक रूप से पैर पहले ही जमा लिए हैं। यहीं वजह है कि ईसाइयों की हत्या करने वाले इस संगठन के समर्थक नाईजीरिया में ऊँचे पदों पर हैं।

नाइजीरिया के संचार मंत्री इसा अलियू पंतामी को लेकर कुछ दिन पहले विदेशी समाचार में खबर चली कि पंतामी के संबंध बोको हरम नाम के आतंकी संगठन से हैं और अमेरिका की खूफिया एजेंसी ने उन्हें अपनी वॉचलिस्ट में रखा हुआ है। उन्होंने कहा था कि “यह जिहाद हर एक आस्तिक के लिए एक दायित्व है, विशेष रूप से नाइजीरिया में।” आगे वह दुआ करते हुए कहता है, “या अल्लाह, तालिबान और अलकायदा को जीत दिलाओ।” बोको हराम के नेता मोहम्मद यूसुफ पर अल-कायदा से संबंध होने का आरोप था, हालाँकि हिरासत में उसकी मौत हो गई।

पिछले साल गर्मी के दिनों में बोको हराम ने तीन उत्तरी राज्यों में एक साथ हमले किए। अधिकारियों ने इस विद्रोह को काफी क्रूरता से दबा दिया, इस दौरान 700 से ज्यादा लोगों की जान गई। इनमें कई नागरिक शामिल थे।

इस्लामिक स्टेट भी एक्टिव

नाइजीरिया में एक्टिव इस्लामिक स्टेट में कई बच्चे भी शामिल हैं। पिछले दिनों 8 साल के एक आईएस आतंकी ने एक ईसाई की गोली मारकर हत्या कर दी। आतंकी संगठन की न्यूज एजेंसी अमाक ने इस घटना का वीडियो जारी किया है। 8 साल का यह आतंकी वीडियो में ईसाई समुदाय के लोगों को धमकी देता हुआ दिखाई दिया। इसमें वह कह रहा है कि वे तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक वह उन सभी खूनों का बदला नहीं ले लेते जो उनके लोगों का बहाया गया।

एक अन्य घटना में एक पादरी का सिर कलम कर दिया गया। इससे एक महीने पहले भी आईएस आतंकियों ने 11 ईसाइयों का सिर कलम कर दिया था।

कट्टरपंथी इस्लामी जिहादियों का समर्थन

करीब 22 करोड़ की आबादी वाले इस देश में करीब करीब आधी-आधी आबादी मुस्लिम और ईसाइयों की है। जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि नाइजीरियाई आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लामी कट्टरपंथ का समर्थक है । प्यू ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रोजेक्ट द्वारा 2009 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक नाइजीरिया में 43 फीसदी मुसलमान आत्मघाती बम विस्फोट को सही मानते हैं। सर्वेक्षण में शामिल आधे से ज्यादा मुसलमानों ने आतंकी ओसामा बिन लादेन पर ‘विश्वास’ था।

इस्लामी कट्टरपंथियों ने नाइजीरिया में दो रास्ते अपनाए हैं- पहला, बोको हराम जैसे कट्टरपंथियों द्वारा चलाया गया मार काट का रास्ता। इसका मकसद गैर इस्लामी जनसंख्या को कम करना है। दूसरा, कानूनी और संवैधानिक रास्ता यानी शरिया कानून लागू करने की कोशिश करना। ऐसा उत्तरी राज्यों में हो रहा है।

1999 और 2002 के बीच, 12 उत्तरी नाइजीरियाई राज्यों में शरिया कानून लागू किया गया था। इसका असर इन राज्यों में दिखता है। नाइजीरिया की सरकार भले ही इससे इनकार करे, लेकिन इस्लामिक कट्टरवाद नाइजीरिया की हकीकत बन गई है और गैरमुस्लिमों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।

अमेरिकी करें ईसाइयत की बात तो ‘प्रोग्रेसिव’, हिंदुओं का सनातन पर आवाज उठाना- ‘इस्लामोफोब’: जानिए कैसे सेकुलरों की दोगली दुनिया में अलग-अलग है धर्म की परिभाषा

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में धर्म और सुरक्षा का मुद्दा अक्सर संवेदनशील होता है, लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि किस देश की धार्मिक चिंता को दुनिया किस नजरिए से देखती है। हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाइजीरिया में ईसाइयों के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर ऐसा बयान दिया जो एक गंभीर चेतावनी थी, जिसे धर्म-सुरक्षा की लड़ाई के रूप में भी प्रस्तुत किया गया था।

ट्रंप ने नाइजीरिया को खुली धमकी दी कि अगर वे देश में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा नहीं रुकवाएगा तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई पर उतर जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान को धर्म-सुरक्षा की लड़ाई के रूप में देखा गया और उन्हें कई जगह प्रगतिशील धर्म-रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके विपरीत जब भारत हिंदुओं की सुरक्षा और पड़ोसी देशों में उनके खिलाफ हिंसा के मामलों पर आवाज उठाता है तो उसे अक्सर इस्लामोफोबिक, हिंदुत्ववादी और सांप्रदायिक कह दिया जाता है।

नाइजीरिया में ईसाइयों पर हिंसा के बीच ट्रंप की चेतावनी

नाइजीरिया में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा पर ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर वे देश में ईसाइयों की हत्या रोकने में विफल रहे तो अमेरिका तुरंत नाइजीरिया को दिया जाने वाली सारी सहायता बंद कर देगा और जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई भी कर सकता है।” उन्होंने कहा कि अमेरिका ‘गन्स-ए-ब्लेजिंग’ कर इस्लामी आतंकवादियों का खात्मा कर देगा, जो ईसाइयों को निशाना बना रहे हैं।

अब डाटा से समझते हैं कि क्या वाकई में नाइजीरिया में ईसाई खतरे में हैं? तो रिपोर्ट्स बताती हैं कि नाइजीरिया में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा वास्तव में गंभीर हैं। Open Doors की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में नाइजीरिया में लगभग 3,100 ईसाई मारे गए और 2,830 को अगवा कर लिया गया।

साल 2023 में यह स्थिति और भी भयावह थी, जब 8000 ईसाइयों की नाइजीरिया में हत्या कर दी गई। यह कुछ चरमपंथी समूहों का करा-धरा था। इंटरसोसायटी ने इन मौतों के लिए विभिन्न चरमपंथी समूहों को जिम्मेदार ठहराया, जिनमें कट्टरपंथी फुलानी चरवाहे, बोको हराम और अन्य समूह शामिल है। साथ ही नाइजीरियाई सुरक्षा बलों की कार्रवाई के चलते भी बड़ी संख्या में ईसाई मारे गए।

अमेरिका में धार्मिक ध्रुवीकरण तेज

डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान अमेरिका के भीतर राजनीतिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को भी दर्शाता है। Pew Research Center के अनुसार, जहाँ अमेरिका में केवल ईसाई धर्म का प्रचार है, वहाँ अब भी केवल 62 प्रतिशत लोग ही खुद को ईसाई मानते हैं।

अमेरिका में धार्मिक पहचान और राजनीतिक झुकाव गहराई से जुड़े हैं। ईसाई धर्म को मानने वाले लोग रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक हैं जबकि कम धार्मिक या सेकुलर लोग डेमोक्रेट्स की ओर झुकते हैं। ईसाई धर्म अब अमेरिका में केवल निजी आस्था नहीं रहा बल्कि राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है। यही वजह रही कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल ही में ईसाई वोटर्स को साधने के लिए अपनी हिंदू पत्नी उषा को ईसाई अपनाने का दबाव डालने की कोशिश की थी।

सोशल मीडिया पर ट्रंप के बयान को समर्थन

डोनाल्ड ट्रंप के बयान से यह भी साफ है कि अमेरिका एक सेकुलर देश होने के बावजूद अपने धर्म-गुटों के लिए वैश्विक रूप से भी आवाज उठा रहा है। सोशल मीडिया पर इस बयान को कई समीकरणों में स्वागत मिला है। यहाँ तक कि त्रिनिदादियन रैपर निकी मिनाज ने भी ट्रंप को ईसाइयों की आवाज बनने के लिए धन्यवाद दिया है।

इससे देखा जा सकता है कि अमेरिका में ‘धर्म-रक्षा’ करने वाले नेता को समर्थन मिल रहा है। खासतौर पर उन बड़ी हस्तियों से, जिनके अमेरिका में धर्म-संवेदनशील मतदाताओं के बीच खास चर्चा है। इससे ये भी साफ है कि सेकुलर देश कहे जाने वाले अमेरिका के लिए अब धर्म सर्वोपरि है। सोशल मीडिया पर डोनाल्ड ट्रंप को प्रगतिशील नेता के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है और अमेरिका को अपने धर्म के लिए लड़ाई लड़ने वाले देश के तौर पर।

भारत के लिए सबक: अमेरिका बना प्रगतिशील और हिंदुओं पर लगे आरोप

अब सवाल यह है कि जैसे डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम ईसाइयों की हक की लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है वैसे ही अगर भारत भी हिंदुओं की आवाज बन रहा है तो उसे भी सुना जाए। यहाँ अमेरिका जब धर्म हितों की बात करता है तो धर्म-रक्षक बन जाता है लेकिन भारत को इस्लामोफोबिक और धार्मिक स्वार्थी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

सबसे पहले पश्चिमी मीडिया ही सामने आती हैं, जो भारत को एक सेकुलर देश के रूप में प्रस्तुत करने में लगी हुई हैं। अब तक पश्चिमी मीडिया ने भारत को इसके धर्म-संवेदनशील निर्णयों जैसे CAA, NRC और आर्टिकल 370 के निरस्त होने के मामलों में मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही करने वाला दिखाती आई है।

वहीं पड़ोसी देशों बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा पर भी पश्चिमी मीडिया चुप्पी साधे है। भारत कई बार वैश्विक मंच पर आवाज उठा भी चुका है। कई बार पश्चिमी मीडिया में भारत में हुए मुस्लिम अपराधों में हस्तक्षेप कर मुस्लिम को पीड़ित पेश करने की कोशिश की है। यहाँ तक कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए हमलों को विदेशी मीडिया ने ‘बदला लेने के लिए हमले‘ साबित करना भी चाहा है।

अब साफतौर पर भारत कहना चाहता है कि अगर अमेरिका अपने धर्म के हक की लड़ाई लड़ता है और प्रगतिशील कहलाता है तो वैसे ही भारत में भी हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर आवाज उठाता रहेगा लेकिन उसे सेकुलर देश के रूप में प्रस्तुत करने की नासमझी न की जाए क्योंकि भारतवासी भी धर्म-सुरक्षा की ही लड़ाई लड़ रहा है।

कभी ₹10 हजार भी नहीं थे पास, आज ईनाम ₹51 करोड़ मिला: जानिए वर्ल्ड कप में भारतीय महिला टीम की जीत क्यों हैं इतनी ज्यादा खास, प्राइज मनी भी सम्मान और बराबरी का प्रतीक

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की वर्ल्ड कप 2025 जीत सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता पर जीत है जिसने लंबे समय तक महिला खिलाड़ियों को दूसरे दर्जे का खिलाड़ी माना। हरमनप्रीत कौर और उनकी टीम ने मैदान पर जीत दर्ज कर यह साबित किया कि अब महिला क्रिकेट किसी भी तरह से पुरुष क्रिकेट से पीछे नहीं है। इस जीत पर BCCI का 51 करोड़ रुपए का इनाम जो कि ICC की प्राइज मनी से भी 12 करोड़ अधिक है, सिर्फ एक पुरस्कार नहीं, बल्कि बराबरी की घोषणा है।

समान वेतन की घोषणा: जय शाह की ऐतिहासिक पहल

अक्टूबर 2022 में जब BCCI सचिव जय शाह ने यह घोषणा की थी कि भारतीय पुरुष और महिला क्रिकेट टीमों को अब समान मैच फीस मिलेगी, तब यह फैसला एक औपचारिक नीति से कहीं अधिक था। यह संदेश था कि अब प्रतिभा का मूल्य लिंग से नहीं, प्रदर्शन से तय होगा।

नई नीति के तहत महिला खिलाड़ियों को अब टेस्ट, वनडे और टी-20 में वही फीस मिलती है जो पुरुष खिलाड़ियों को मिलती है, यानी 15 लाख टेस्ट, 6 लाख वनडे और 3 लाख टी-20 के लिए। पहले यही रकम क्रमशः 4 लाख और 1 लाख हुआ करती थी।

यह अंतर न सिर्फ आर्थिक था, बल्कि मानसिक भी। जय शाह का यह कदम उस असंतुलन को ठीक करने की दिशा में था जो वर्षों से भारतीय क्रिकेट के ढाँचे में बना हुआ था। महिला क्रिकेट को केवल प्रेरणा के नजरिए से देखा जाता था, पेशे के रूप में नहीं। अब BCCI का संदेश साफ है कि जो खेलोगे, वही पाओगे, चाहे पुरुष हो या महिला।

डायना एडुल्जी की यादें: संघर्ष से सीखी गई समानता की कीमत

महिला क्रिकेट की यह सफलता समझने के लिए हमें पीछे लौटना होगा उस दौर में जब डायना एडुल्जी जैसी खिलाड़ी अपने खर्चे से देश के लिए खेलती थीं। मार्च 2022 में ऑपइंडिया से हुई बातचीत में उन्होंने कहा था, “हम बिना रिजर्वेशन के ट्रेन में सफर करते थे, स्टेशन के वेटिंग रूम में सोते थे। कभी टिकट के पैसे भी खुद देने पड़ते थे। लेकिन हमें मजा आता था, क्योंकि हमें पता था कि हम इतिहास बना रहे हैं।”

यह वही खिलाड़ी थीं जिनके लिए एक बार वर्ल्ड कप खेलने के लिए हर लड़की को 10,000 देने पड़े थे। आज जब देश में महिला क्रिकेटरों को करोड़ों का इनाम और समान वेतन मिल रहा है, तो यह बदलाव केवल नीति का नहीं बल्कि संवेदनशीलता के विकास का प्रमाण है।

महिला क्रिकेट: अब प्रेरणा नहीं, प्रोफेशन है

पहले महिला क्रिकेट को प्रेरणादायक कहानी के रूप में पेश किया जाता था, मानो यह कोई सामाजिक सेवा हो, लेकिन अब महिला क्रिकेटर ‘खिलाड़ी’ के रूप में पहचानी जाती हैं, न कि ‘महिला खिलाड़ी’ के रूप में।

BCCI की नई नीतियों, महिला IPL और समान भुगतान व्यवस्था ने यह साबित किया है कि क्रिकेट अब सिर्फ पुरुषों का खेल नहीं रहा। हरमनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, दीप्ति शर्मा या शेफाली वर्मा जैसी खिलाड़ी अब सिर्फ नाम नहीं, ब्रांड बन चुकी हैं और यह परिवर्तन लंबे संघर्ष के बाद संभव हुआ है।

(फोटो साभार: दैनिक जागरण)

डायना एडुल्जी ने एक बार कहा था कि उनके दौर में मैदान पर भीड़ होती थी, लेकिन कैमरे नहीं। आज टीवी और डिजिटल मीडिया महिला क्रिकेट को उसी प्रमुखता से दिखाता है जैसे पुरुष टीम को। सवाल यह भी है कि क्या यह पहचान ट्रॉफी के बिना मिल पाती? शायद नहीं। इसलिए 2025 की यह जीत सिर्फ एक कप नहीं, बल्कि दशकों के प्रयासों की स्वीकृति है।

51 करोड़ का इनाम: एक प्रतीकात्मक मील का पत्थर

BCCI का 51 करोड़ रुपए का इनाम सिर्फ एक आर्थिक घोषणा नहीं है। यह उस संघर्ष की सराहना है जो महिला क्रिकेट ने पिछले 50 वर्षों में किया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह रकम ‘1983 की पुरुष टीम’ और ‘2025 की महिला टीम’ के बीच समान सम्मान का सेतु है।

(फोटो साभार: मिंट)

जहाँ पहले कपिल देव का नाम इतिहास में अंकित हुआ था, वहीं अब हरमनप्रीत कौर का नाम उसी किताब के अगले पन्ने पर लिखा गया है। समान वेतन सिर्फ रकम नहीं, मानसिकता का सुधार है। किसी भी खेल में समान भुगतान का अर्थ यह नहीं कि केवल बैंक बैलेंस बराबर होगा। इसका असली मतलब है समान अवसर, समान सम्मान और समान जिम्मेदारी।

जब महिला खिलाड़ी को यह अहसास होता है कि उनका प्रदर्शन पुरुष खिलाड़ियों जितना ही मूल्यवान है, तब उनके भीतर आत्मविश्वास और जिम्मेदारी दोनों बढ़ते हैं। यह बदलाव मैदान से लेकर लॉकर रूम तक असर डालता है। आज भारतीय महिला टीम सिर्फ बेहतर खेल नहीं रही, बल्कि बेहतर सोच भी खेल रही है। वही सोच जो कहती है, “हम बराबर हैं, हमें बराबरी चाहिए।”

(फोटो साभार: sports digest Hindi)

डायना एडुल्जी की सीख: एक ट्रॉफी बहुत जरूरी थी

साक्षात्कार में डायना एडुल्जी ने कहा था, “महिला क्रिकेट को असली पहचान तब मिलेगी जब वह एक वर्ल्ड कप जीत जाएगी।” उनकी यह बात आज शत-प्रतिशत सही साबित हुई है। यह ट्रॉफी महिला क्रिकेट को न केवल पहचान दे रही है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए संभावना के द्वार भी खोल रही है।

अब लड़कियाँ सिर्फ स्कूल स्तर पर खेलकर नहीं रुकेंगी, क्योंकि उनके सामने हरमनप्रीत कौर जैसी मिसाल मौजूद है और BCCI का पूरा ढाँचा उन्हें सपोर्ट कर रहा है।

आगे की राह: आर्थिक बराबरी से सामाजिक बराबरी तक

अब जबकि समान भुगतान, महिला IPL और बेहतर कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था लागू हो चुकी है, तो अगला कदम यह होना चाहिए कि घरेलू स्तर पर भी यह सुधार पहुँचे। हर राज्य बोर्ड को अब महिला क्रिकेट के लिए उतनी ही सुविधाएँ देनी चाहिए जितनी पुरुष क्रिकेट को दी जाती हैं।

BCCI सचिव देवजीत सैकिया का बयान, “हम चाहते हैं कि भारत की हर लड़की को अपने ही शहर में इंटरनेशनल लेवल की ट्रेनिंग सुविधा मिले।” इसकी उम्मीद जगाता है। यह वही भारत है जहाँ कभी डायना एडुल्जी को ट्रेन में सोना पड़ता था और वही भारत अब अपनी बेटियों को एयरबस में बैठाकर वर्ल्ड कप जितवा रहा है।

समानता का स्कोर अब है बराबर

भारत की इस जीत ने यह साबित कर दिया है कि बराबरी केवल कानून से नहीं, सम्मान से आती है। जय शाह की नीतियाँ, BCCI का समर्थन और डायना एडुल्जी जैसी पथप्रदर्शक खिलाड़ियों की विरासत, ये सब मिलकर उस बदलाव का प्रतीक है जिसकी जरूरत हर क्षेत्र को है।

बांग्लादेश तख्तापलट में CIA का था हाथ, हसीना की पीठ में छुरा घोंपने वाला था आर्मी चीफ वकार: ‘इंशाअल्लाह बांग्लादेश’ में पूर्व गृह मंत्री का दावा, बोले- अभिमन्यु की तरह घिरी थीं PM

बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापल्ट के बाद से कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। इसमें सैन्य हस्तक्षेप से लेकर अमेरिकी की खुफिया एजेंसी CIA की भूमिका तक की अलग-अलग जगहों पर चर्चा की जा रही थी। अब एक किताब में यह दावा किया गया है कि दरअसल शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के पीछे CIA का हाथ था।

न्यूज18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर में गृह मंत्री रहे असदुज्जमाँ खान कमाल ने इस तख्तापलट को ‘CIA की सटीक साजिश’ बताते हुए देश के सेना प्रमुख और हसीना के रिश्तेदार वकर-उज-जमाँ पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। असदुज्जमाँ खान ने दावा किया है कि वकार-उज-जमाँ CIA की जेब में है और उन्होंने हसीना की पीठ में छुरा घोंप दिया है।

यह चौंकाने वाला खुलासा दीप हलदर, जयदीप मजूमदार और साहिदुल हसन खोकन द्वारा लिखित और जगरनॉट द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन’ में किया गया है। हालाँकि, यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है।

इंशाअल्लाह बांग्लादेश पुस्तक

पुस्तक में असदुज्जमाँ खान के हवाले से लिखा गया है, “यह हसीना को उखाड़ फेंकने के लिए लंबे समय से रची गई CIA की एक सटीक साजिश थी। हमें नहीं पता था कि वकार पर CIA का हाथ था।” कुछ समय पहले तक बांग्लादेश के दूसरे सबसे ताकतवर शख्स रहे असदुज्जमाँ खान ने बताया है, “हमें नहीं पता था कि जनरल वकार-उज-जमाँ CIA के पे-रोल पर हैं।”

असदुज्जमाँ ने बताया कि उनके देश की प्राथमिक रक्षा खुफिया एजेंसी, बांग्लादेश के सैन्य खुफिया महानिदेशालय और साथ ही बांग्लादेश की प्रमुख नागरिक खुफिया एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा खुफिया ने प्रधानमंत्री हसीना को यह चेतावनी नहीं दी थी कि वकार ने उन्हें धोखा देने का मन बना लिया है। साथ ही, उन्होंने शक जताया है कि इस साजिश में में शीर्ष अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।

क्यों किया CIA ने तख्तापलट?

असदुज्जमाँ खान ने दावा किया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) दक्षिण एशिया में मजबूत नेतृत्व नहीं चाहती। उनका कहना है कि अमेरिका ऐसे देशों में कमजोर सरकारें देखना पसंद करता है ताकि अपने हितों को आसानी से साध सके। जब उनसे पूछा गया कि CIA के सहयोग से बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन करने से अमेरिका को क्या फायदा होगा।

उन्होंने कहा, “इसके दो कारण हैं। पहला, दक्षिण एशिया में बहुत ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष न हों। नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और शेख हसीना जैसे मजबूत नेता अगर उपमहाद्वीप पर राज करें, तो CIA के लिए अपने हित साधना मुश्किल हो जाता है। अमेरिकी रणनीति हमेशा कमज़ोर सरकारों के साथ काम करने की रही है।” खान ने यह भी दावा किया कि इसके पीछे एक तात्कालिक कारण सेंट मार्टिन द्वीप था।

उनका कहना है कि भारतीय प्रेस अब इस पर रिपोर्ट कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हमें बहुत पहले ही आगाह कर दिया था कि अमेरिका उन्हें सत्ता से बाहर करने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि वह सेंट मार्टिन द्वीप पर अपना नियंत्रण चाहता है।

सेंट मार्टिन द्वीप क्यों चाहता है अमेरिका?

सेंट मार्टिन द्वीप को लेकर पहले शेख हसीना खुद भी ऐसा ही दावा कर चुकी हैं। हसीना ने सत्ता गँवाने से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि अगर वह इस द्वीप को अमेरिकियों को सौंप दें तो वह बिना किसी समस्या के सत्ता में बनी रह सकती हैं।

भौगोलिक दृष्टि से सेंट मार्टिन द्वीप की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दुनिया के किसी भी हिस्से से समुद्री मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। यह एक प्रमुख जलमार्ग होने के साथ-साथ रणनीतिक रूप से भी अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। बंगाल की खाड़ी के उत्तर-पूर्वी हिस्से में, बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा के करीब स्थित 7.3 किलोमीटर लंबा यह द्वीप समुद्र तल से लगभग 3.6 मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है।

माना जाता है कि लगभग 5,000 वर्ष पहले यह टेकनाफ प्रायद्वीप का हिस्सा था लेकिन धीरे-धीरे समुद्र में डूब गया। करीब 450 वर्ष पूर्व इसका दक्षिणी भाग फिर से उभरा और अगले 100 वर्षों में उत्तरी और शेष भाग भी समुद्र से ऊपर उठ आए। वर्ष 1900 में ब्रिटिश भारत ने भूमि सर्वेक्षण के दौरान इस द्वीप को अपने नियंत्रण में ले लिया और इसे चटगाँव के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर मार्टिन के नाम पर सेंट मार्टिन द्वीप कहा गया।

इस द्वीप से बंगाल की खाड़ी और आस-पास के समुद्री इलाकों पर नजर रखी जा सकती है, जिससे यह बांग्लादेश के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बन जाता है। दक्षिण एशिया के परिप्रेक्ष्य में भी यह द्वीप जियो-पॉलिटिक्स में शक्ति संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। बंगाल की खाड़ी स्वयं दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक सेतु की तरह कार्य करती है और व्यापारिक मार्गों के माध्यम से क्षेत्रीय देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाती है।

किसी आकस्मिक युद्ध की स्थिति में भी यहाँ से संपर्क और संचालन स्थापित करना आसान होता है, यही कारण है कि शक्तिशाली देश इस द्वीप की ओर आकर्षित हैं। व्यापारिक और सामरिक हितों के कारण चीन और अमेरिका दोनों ही इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं जबकि भारत के लिए भी सेंट मार्टिन द्वीप का रणनीतिक महत्व अत्यधिक है। अमेरिका की रुचि का मुख्य कारण यह है कि यदि उसे इस द्वीप पर प्रभाव जमाने का अवसर मिलता है, तो वह यहाँ से पूरे क्षेत्र, विशेष रूप से चीन और भारत पर निगरानी रख सकता है।

अभिमन्यु की तरह घिर गई थीं शेख हसीना

दीप हलदर ने का कहना है कि यह खुलासा बांग्लादेश को और बेचैन कर सकता है। उनका कहना है कि जनरल वकार को हसीना ने अपने पद से हटने से ठीक पहले नियुक्त किया था। उन्होंने कहा, “पिछले साल और इस साल भी NCP (नेशनल सिटिजन्स पार्टी) के नेताओं द्वारा लगातार यह बयान दिया जाता रहा कि जनरल वेकर भारत के एजेंट हैं। अब यह बड़ा खुलासा हुआ है, जिससे यह सवाल उठता है कि वकार किसकी तरफदारी कर रहे हैं।”

असदुज्जमाँ खान ने अपनी बात को समझाने के लिए महाभारत का हवाला भी दिया है। उन्होंने कहा, “जैसे अभिमन्यु को चारों तरफ से घेर लिया गया और फिर युद्ध में अपने ही हाथों ढेर कर दिया गया, वैसे ही वकार ने हसीना को गिराने के लिए बांग्लादेश की कट्टरपंथी ताकतों से हाथ मिला लिया। जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश ने इससे पहले भी सभी कट्टरपंथी ताकतों को एक साथ लाया था।”

यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) जमात के साथ मिलकर काम कर रही थी। उन्होंने कहा, “कुछ ISI-प्रशिक्षित लोग जमात में घुसपैठ कर चुके थे और जून के अंत में पुलिसकर्मियों की हत्या में उनकी अहम भूमिका थी।”

उन्होंने दावा किया कि जब अराजकता फैली तो उन्हें शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने बताया कि ISI-प्रशिक्षित लोग जमात में घुसपैठ कर चुके हैं और छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए हैं। उन्होंने कहा कि वह तत्कालीन प्रधानमंत्री हसीना के पास गए थे लेकिन उन्होंने उन्हें बताया गया कि सेना प्रमुख ने हसीना को आश्वासन दिया है कि वह आंदोलनकारी छात्रों की बढ़ती भीड़ को सँभाल लेंगे।

असदुज्जमाँ ने 4 अगस्त 2024 से पहले वाली शाम को हुई बैठक को लेकर कहा, “शेख हसीना के सामने वकार ने मुझसे कहा कि सड़कों पर हो रही हिंसा के कारण लोगों का पुलिस पर से भरोसा उठ गया है और बेहतर होगा कि सेना ही प्रवेश द्वारों पर आंदोलनकारियों को रोके। वकार ने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। वह यह सुनिश्चित करेंगे कि सेना किसी को भी प्रधानमंत्री आवास के पास न आने दे।”

असदुज्जमाँ ने कहा कि इस बैठक के अगले दिन क्या हुआ यह सब जानते हैं। दरअसल, हिंसक प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने हसीना के आवास पर धावा बोल दिया था और हजारों की संख्या में लोग उनके आवास में दाखिल हो गए थे जिसके कारण उन्हें देश छोड़कर भारत आने को मजबूर होना पड़ा।

35 वर्षो में 355 झटके, 12000+ लोगों की मौत: जानें क्यों अफगानिस्तान में आता है इतना भूचाल, नहीं मिल पाती समय पर राहत

अफगानिस्तान में सोमवार (3 नवंबर 2025) की सुबह 6.3 तीव्रता वाला भूकंप आया। इस भूकंप का केंद्र उत्तरी अफगानिस्तान में मजार-ए-शरीफ के पास खोल्म क्षेत्र में था। इसकी गहराई जमीन से 28 किलोमीटर थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके कारण अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है। दो महीने पहले पूर्वी अफगानिस्तान में भूकंप के तेज झटकों के कारण 2200 लोगों की मौत हो गई थी। 3 नवंबर को आए इस भूकंप के झटके अफगानिस्तान के साथ साथ ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के कुछ हिस्सों में भी महसूस किए गए।

भूकंप के प्रति क्यों संवेदनशील है अफगानिस्तान

2020 से 2025 के बीच अफगानिस्तान में दर्जनों भूकंप आए हैं। इनमें से कई की तीव्रता 6.0 या उससे अधिक रही। भूगर्भीय एजेंसियों और समाचार रिपोर्टों के अनुसार 5 वर्षों में कम से कम 50 से अधिक भूकंप दर्ज किए गए हैं।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से अब तक अफगानिस्तान में 5.0 या उससे अधिक तीव्रता वाले कम से कम 355 भूकंप आ चुके हैं। बीते 35 वर्षों में भूकंपों के कारण 12,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि अफगानिस्तान में हर साल औसतन 560 लोगों की मौत अलग अलग भूकंप के कारण होती है। इसके कारण हर साल लगभग 8 करोड़ डॉलर (लगभग ₹660 करोड़) का आर्थिक नुकसान होता है।

USGS की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान के भूकंप की जानकारी

इसके पीछे कारण ये है कि अफगानिस्तान एक ऐसे भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है, जहाँ भारतीय टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराती है। यह टक्कर उत्तर और पूर्वी हिस्सों में फैली हिंदूकुश और पामीर पर्वत श्रृंखलाओं को जन्म देती है।

टेक्टोनिक प्लेटें पृथ्वी की सतह के नीचे स्थित बड़ी बड़ी चट्टानें हैं जो धीरे-धीरे अपनी जगह से खिसकती रहती हैं। 50 से 250 किलोमीटर मोटी ये प्लेटें पृथ्वी के ऊपरी हिस्से (लिथोस्फेयर) में स्थित होती हैं।

इनके नीचे गर्म, तरल पदार्थों वाली परत होती है जिसे एस्थेनोस्फेयर कहते हैं। जब ये प्लेटें टकराती हैं, अलग होती हैं या एक-दूसरे के पास से गुजरती हैं तो भूकंप, ज्वालामुखी जैसी घटनाएँ होती हैं या पर्वत खड़े हो जाते हैं।

भारतीय प्लेट दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ रही है। वहीं, यूरेशियन प्लेट उत्तर में स्थित है जो भारतीय प्लेट टकरा रही है। इन दोनों के अलावा अरबियन प्लेट दक्षिण-पश्चिम की ओर है और थोड़ा बहुत प्रभाव डालती है।

अफगानिस्तान के हिंदू कुश क्षेत्र में अक्सर लगभग 1 लाख किमी गहराई वाले भूकंप आते हैं। इस तरह के भूकंप पृथ्वी की सतह पर कम नुकसान पहुँचाते हैं। हालांकि जैसे-जैसे गहराई कम होती जाती है वैसे वैसे भूकंप के ये झटके तेज होते हैं और अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।

अफगानिस्तान के आसपास के क्षेत्र में कई सक्रिय भ्रंश रेखाएं मौजूद हैं, जिनके कारण नियमित रूप से भूकंप के मध्यम से तीव्र झटके आते हैं। असल में अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति ही इसे प्राकृतिक रूप से भूकंप के लिए संवेदनशील बनाती है।

पिछले 5 वर्षों में आए कितने भूकंप

पिछले 5 वर्षों में अफगानिस्तान में कई बार विनाशकारी भूकंप आए हैं। अक्टूबर 2023 में हेरात क्षेत्र में 2 बार 6.3 तीव्रता के भूकंप आए, जिनमें 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई और 2,000 से ज्यादा घायल हुए। अगस्त 2025 में पूर्वी अफगानिस्तान में 6.0 तीव्रता का भूकंप आया, जिससे 500 से अधिक मौतें हुईं। नवंबर 2025 में खोल्म क्षेत्र में 6.3 तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें 4 लोगों की मौत और 60 से अधिक घायल हुए।

विस्तार से देखा जाए तो वर्ष 2025 में 12 अप्रैल को पाकिस्तान में 39 किमी की गहराई पर 5 तीव्रता के भूकंप के झटके आए। इसके अलावा 16 और 19 अप्रैल को हिंदू कुश और अफगानिस्तान-ताजिकिस्तान सीमा पर 5.6 और 5.8 तीव्रता के भूकंप आए।

इसके बाद 10 मई और 29 जून को पाकिस्तान में 5.7 और 5.5 तीव्रता वाला भूकंप आया। इसका असर अफगानिस्तान पर भी पड़ा। इसके बाद 27 अगस्त को अफगानिस्तान के हिंदू कुश क्षेत्र में 5.6 तीव्रता का और 19 अगस्त को 186 किमी की गहराई पर 5.2 तीव्रता का भूकंप आया। 1 सितंबर को अफगानिस्तान में 6 तीव्रता का भूंकप आया। इसमें 800 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।

इससे पहले वर्ष 2024 में 5 जनवरी को अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान सीमा क्षेत्र में 5 तीव्रता का भूकंप आया। इसके बाद 11 जनवरी को अफगानिस्तान के हिंदू कुश में 6.3 तीव्रता का भूकंप आया। इसके बाद 17 अक्टूबर को एक बार फिर इसी क्षेत्र में 5.5 तीव्रता का भूकंप आया।

वर्ष 2023 में 5 जनवरी को अफगानिस्तान के हिंदू कुश क्षेत्र में ही 5.8 तीव्रता का भूकंप आया। मार्च के अंत में उत्तरी अफगानिस्तान में 6.5 तीव्रता के भूकंप के झटकों में 13 लोगों की मौत हो गई।

इसके बाद 3 मई और 5 अगस्त को एक बार फिर हिंदू कुश क्षेत्र में 5.6 और 5.7 तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए। 6 अगस्त को अफगानिस्तान-ताजिकिस्तान सीमा पर 5.1 तीव्रता का भूकंप आया। अक्टूबर में अफगानिस्तान में आए कई भूकंपों में कई लोगों की मौत हो गई। 15 नवंबर को अफगानिस्तान-ताजिकिस्तान सीमा क्षेत्र में 5.3 तीव्रता का भूकंप आया।

साल 2022 में 17 जनवरी को पश्चिमी अफगानिस्तान में 30 किमी की गहराई पर 5.6 तीव्रता का भूकंप आया। 5 फरवरी को हिंदू कुश में 5.7 तीव्रता और जून में 6 तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए। इसमें 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए।

इसके बाद 5 और 6 सितंबर को अफगानिस्तान में लगातार दो या उससे अधिक बार भूकंप के झटके महसूस किए गए। इसमें 8 लोग मारे गए। इसके बाद 16 दिसंबर को दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान में 4.3 तीव्रता का भूकंप आया।

साल 2021 में 19 मई को अफगानिस्तान में 17.6 किमी की गहराई पर 4.6 तीव्रता का भूकंप आया। 7 अक्टूबर को दक्षिणी पाकिस्तान में आए भूकंप में कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई।

इसी तरह 2020 में 22 जनवरी को अफगानिस्तान-ताजिकिस्तान सीमा क्षेत्र में 6.1 तीव्रता वाला भूकंप आया। इसके बाद 5 मार्च को हिंदू कुश में 5.4 तीव्रता वाला भूकंप आया। अगस्त में अफगानिस्तान के पूर्वी क्षेत्र में 5.5 तीव्रता वाला भूकंप आया।

आपदा से निपटने की भी हैं कई चुनौतियाँ

अफगानिस्तान में आपदा से निपटने की व्यवस्था वहाँ की सबसे बड़ी चुनौती है। 2021 में तालिबानी सत्ता आने के बाद से अतंरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश के संबंध कमजोर हुए।

इस राजनीतिक अस्थिरता के साथ आर्थिक संकट और तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण राहत और बचाव कार्य धीमा होता है। ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में पहुँचना भी कठिन होता है। जिससे राहत कार्य प्रभावित होते है।

भारत करता रहा है भूकंप पीड़ितों की मदद

भूकंप के बाद कई देशों और संगठनों ने अफगानिस्तान को सहायता भेजी। भारत ने दवाइयाँ, टेंट और मेडिकल टीम भेजी। वहीं ईरान और पाकिस्तान ने सीमावर्ती क्षेत्रों में प्राथमिक चिकित्सा और शरण दी।

संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस, और WHO ने भोजन, पानी, चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान की। हालाँकि, राहत की मात्रा जरूरत के हिसाब से बहुत कम रही और कई प्रभावित क्षेत्रों तक समय पर मदद नहीं पहुँच सकी।

अफगानिस्तान में भूकंप केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक मानवीय संकट बन चुका है। भूगर्भ की संवेदनशीलता के साथ-साथ देश का कमजोर बुनियादी ढांचा, सीमित संसाधन और राजनीतिक चुनौतियाँ इसे और गंभीर बनाती हैं।

इससे निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर आपदा से निपटने की तैयारी, भवन निर्माण के सख्त मानक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

कोई कर रहा बैन की माँग तो कोई बता रहा ‘तालिबान’: मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक कर्नाटक में RSS के पीछे पड़ी कॉन्ग्रेस सरकार, शाखाओं-पथ संचलन की भी नहीं मिल रही पूरी छूट

कर्नाटक की पूरी कॉन्ग्रेस सरकार किसी भी तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को बदनाम करने और उसकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश में जुटी हुई है। कभी शाखाओं को रोका जा रहा है, कभी पथ संचलन की इजाजत नहीं मिल रही है तो कभी संघ को लेकर अर्नगल बनायबाजी की जा रही है। संघ को कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ अदालत तक में लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

अब कर्नाटक के एक और मंत्री ने RSS पर निशाना साधा है। इस बार राज्य के स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव ने संघ को ‘सांप्रादयिक संगठन’ करार देते हुए कहा कि RSS कानून से ऊपर नहीं है। इससे पहले कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे ने संघ पर बैन लगाने की बात कही थी। प्रियांक के क्षेत्र में 2 नवंबर को होने वाले पथ संचलन पर भी रोक लगी हुई है।

राव का यह बयान शनिवार (1 नवंबर 2025) को मीडिया से बातचीत के दौरान आया, जब उन्होंने संघ की गतिविधियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि RSS को भी कानून के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए।

दिनेश गुंडू राव ने कहा, “RSS को नियमों का पालन करना होगा। वे कानून से ऊपर नहीं हैं। सिर्फ RSS ही नहीं बल्कि SDPI को भी सार्वजनिक कार्यक्रम करने से पहले अनुमति लेनी चाहिए।”

मंत्री ने आगे कहा, “RSS बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है, इसलिए यह एक राजनीतिक और सांप्रादयिक संगठन बन चुका है। इसी कारण लोगों के मन में इसके कार्यकलापों को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।”

2 नवंबर के पथ संचलन को नहीं मिली इजाजत, प्रियांक ने की बैन की माँग

RSS लंबे वक्त से कर्नाटक की सरकार के निशाने पर निशाने पर रहा है। RSS अपने शताब्दी वर्ष को लेकर देश भर में कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है जिसमें पथ संचलन भी शामिल हैं। कर्नाटक में भी कई जगहों पर संघ पथ संचलन निकलने हैं लेकिन कॉन्ग्रेस की सरकार इन्हें अनुमित देने में कभी शर्तें लगा रही है तो कभी आना-कानी कर रही हैं।

प्रियांक खरगे के विधानसभा क्षेत्र चित्तपुर में भी रविवार (2 नवंबर 2025) को RSS को पथ संचलन निकालना था जिसकी अभी तक संघ को इजाजत नहीं मिली है। इसके लिए प्रशासन के साथ बीते 28 अक्टूबर को RSS के पदाधिकारियों की बैठक हुई थी। तब यह बैठक बेनतीजा रही। RSS ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का में भी याचिका दी हुई है और कोर्ट ने अब आगामी 5 नवंबर को एक और बैठक कर इस ‘डेडलॉक’ की स्थिति को खत्म करने की बात कही है।

खुद प्रियांक खरगे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर सरकारी परिसर में RSS की गतिविधियों पर बैन लगाने की माँग कर चुके हैं। प्रियांक ने लिखा था कि RSS सरकारी स्कूलों, खेल के मैदानों और मंदिरों में शाखाओं का आयोजन कर बच्चों-युवाओं के बीच विभाजनकारी विचार फैला रहा है।

शिक्षकों को RSS के पथ संचलन में शामिल होने पर नोटिस

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार RSS पर किसी भी तरह से प्रतिबंध लगाने को लेकर सरकारी कर्मियों तक को धमकाने पर उतर आई है। संघ विरोध में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करते हुए बीदर जिले के औराद तालुक के 4 सरकारी स्कूल शिक्षकों को आरएसएस के पथसंचलन में भाग लेने के लिए नोटिस जारी किया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, औराद तालुक के चार शिक्षकों महादेव, शालीवन, प्रकाश और सतीश ने 7 और 13 अक्टूबर को हुए आरएसएस के पथसंचलन में भाग लिया था। इन कार्यक्रमों के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद स्थानीय दलित सेना के नेताओं ने 27 अक्टूबर को औपचारिक शिकायत दर्ज कराई और शिक्षकों पर तुरंत कार्रवाई की मांग की।

शिकायत मिलते ही औराद के ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर (BEO) ने अगले ही दिन चारों शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि सरकारी कर्मचारी होकर भी उन्होंने ‘राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों’ में हिस्सा लिया, जो कि कर्नाटक सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट से भी कर्नाटक सरकार को मिली है फटकार

RSS की गतिविधियों पर रोक लगाने की कोशिश कर रही कर्नाटक की कांग्रेस सरकार को हाईकोर्ट से भी झटका लग चुका है। कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने उस सरकारी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत सरकारी परिसरों में 10 से अधिक लोगों के जुटने पर पाबंदी लगाई गई थी। माना जा रहा था कि यह आदेश विशेष रूप से आरएसएस की शाखाओं और सभाओं को निशाना बनाकर जारी किया गया था।

RSS की ड्रेस पहनने पर सरकारी कर्मी सस्पेंड, KSAT ने लगाई रोक

कर्नाटक सरकार ने RSS के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर सरकारी कर्मचारी प्रवीण कुमार को सस्पेंड भी कर दिया था। हालाँकि, कर्नाटक स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (KSAT) ने उनके सस्पेंशन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।

प्रवीण कुमार लिंगासुगुर तालुक में पंचायत विकास अधिकारी हैं और भाजपा विधायक मनप्पा डी. वज्जल के निजी सहायक (PA) के रूप में भी कार्यरत हैं। आरोप है कि वे 12 अक्टूबर को RSS का गणवेश पहनकर संगठन के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इसके बाद राज्य सरकार ने अनुशासनहीनता के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया था।

सरकारी कार्रवाई को चुनौती देते हुए प्रवीण कुमार ने ट्रिब्यूनल में अपील दायर की, जिस पर सुनवाई करते हुए ट्रिब्यूनल के न्यायिक सदस्य एस.वाई. वटवती की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को अंतरिम आदेश जारी किया। पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मामले पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज करे। अब इस प्रकरण की अगली सुनवाई 14 नवंबर को होगी।

RSS और संघ परिवार से दूर रहना चाहिए: सिद्धारमैया

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खुद भी RSS को लेकर अनर्गल बयानबाजी कर चुके हैं। बीते 18 अक्टूबर को मैसूर यूनिवर्सिटी के रजत जयंती समारोह में बोलते हुए उन्होंने RSS और सनातन परंपरा के खिलाफ बयानबाजी की थी। मुख्यमंत्री ने मंच से कहा कि लोगों को संघ परिवार और उन सनातनियों से दूर रहना चाहिए जो सामाजिक बदलाव का विरोध करते हैं।

कार्यक्रम के दौरान सिद्धारमैया ने कहा, “अपनी संगति सही रखिए। समाज के भले के लिए काम करने वालों के साथ रहिए, न कि उन सनातनियों के साथ जो समाज में सुधार के रास्ते में बाधा बनते हैं।” उन्होंने आगे RSS पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि संघ के लोग अब भी डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान का विरोध करते हैं और जनता को गुमराह कर रहे हैं। सिद्धारमैया ने संघ परिवार पर झूठ फैलाने का भी आरोप लगाया।

सिद्धारमैया के बेटे ने तालिबान से की RSS की तुलना

कर्नाटक में संघ विरोध सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र सिद्धारमैया तक भी पहुँच गया है। वो अपने पिता से भी चार कदम आगे निकले हैं। यतींद्र सिद्धारमैया ने RSS की तुलना सीधे तालिबान से कर दी।

यतींद्र ने कहा, “RSS की मानसिकता तालिबान जैसी है। दोनों यह मानते हैं कि केवल एक ही मजहब या विचारधारा वाले लोग रह सकते हैं। तालिबान कहता है कि इस्लाम का सिर्फ एक ही फिरका रहेगा, महिलाओं को आजादी नहीं है। उसी तरह RSS कहता है कि सिर्फ हमारे तरीके से हिंदू धर्म मानने वाले ही रहेंगे।” उन्होंने आगे आरोप लगाया कि आरएसएस समाज में एकरूपता थोपना चाहता है और विभिन्न विचारों को दबाने की कोशिश करता है।

संघ के खिलाफ सुनियोजित साजिश के चेहरे कौन?

कर्नाटक में पिछले कुछ समय में जो कुछ होता दिख रहा है, वह सिर्फ RSS का विरोध नहीं बल्कि एक संगठित राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा लग रहा है, जैसे एक विचारधारा के विरुद्ध सरकार की व्यवस्थित मुहिम हो। जब मुख्यमंत्री से लेकर उनके बेटे, राज्य के मंत्री और स्थानीय अफसर तक संघ को ‘खतरा’ बताने लगे हों, तो यह महज संयोग तो नहीं रह जाता है।

कांग्रेस सरकार जिस तरह सरकारी कर्मचारियों को डराने, शाखाओं पर रोक लगाने और पथ संचलन जैसी पारंपरिक गतिविधियों को रोकने में जुटी है, वह दिखाता है कि राज्य में असहिष्णुता चरम पर पहुँच चुकी है। कॉन्ग्रेस जैसा दल जो खुद को ‘धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा झंडाबरदार बताता है, वही संगठन को सिर्फ इसलिए दबाने में लगा है क्योंकि उसकी जड़ें राष्ट्रवाद और सनातन मूल्यों से जुड़ी हैं।

अब सवाल यही उठता है कि क्या यह सब महज राज्य सरकार की अपनी सोच है या फिर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा एक संघ विरोधी सुनियोजित साजिश चलाई जा रही है? क्या शीर्ष नेतृत्व को खुश करने के लिए कर्नाटक की पूरी सरकार संघ विरोध में उतर आई है? ऐसे कई सवाल है जिनके उत्तर शायद अभी ना मिलें लेकिन अगर सभी कड़ियों को जोड़ा जाए तो जो तस्वीर बनकर सामने आती है, वो जाहिर तौर पर एक सुनियोजित साजिश ही नजर आती है।