Wednesday, April 1, 2026
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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने की मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने की शुरुआत, जानिए कतर के चैनल अल-जजीरा से इसके संबंधों के बारे में सबकुछ

अल जजीरा भले ही औपचारिक रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड का हिस्सा न हो, लंबे समय से इसके वैचारिक और राजनीतिक प्रोपेगेंडा का वैश्विक मंच रहा है। कतर पर दोनों संस्थाओं को संरक्षण देने के आरोप लगे हैं। यह नेटवर्क बार-बार ब्रदरहुड से जुड़े व्यक्तियों को मंच देता रहा है और हमास सहित इस्लामिक झुकाव वाले कारणों को बढ़ावा देता रहा है, जिससे पत्रकारिता के नाम पर उग्रवादी संदेशों को वैध करार होने में मदद मिली है।

इस्लामी आतंकवाद को एक बड़ा झटका देते हुए, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 नवंबर 2025 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इसमें उनके प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) की कुछ शाखाओं को विदेशी आतंकी संगठन/फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (FTO) और खासतौर पर स्पेशली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट्स (SDGTs) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

इस कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट राष्ट्रपति को एक ज्वाइंट रिपोर्ट सौंपेंगे। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की किसी भी शाखा या सब-डिविजन जैसे लेबनान, जॉर्डन और मिस्र में सक्रिय चैप्टर्स को FTO और SDGT घोषित करने की बात भी शामिल होगी।

ट्रंप के पहले कार्यकाल की महत्वाकांक्षाओं को ये कदम पूरा करता है। उस दौरान उन्होंने इस आतंकी संगठन के खिलाफ समीक्षा का आदेश दिया था, लेकिन नौकरशाही विरोध के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी।

ट्रंप की ओर से मुस्लिम ब्रदरहुड की समीक्षा के आदेश को गति देने का काम कॉन्ग्रेस के दोनों पार्टियों के प्रयासों ने किया। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड टेररिस्ट डेजिग्नेशन एक्ट-2025 और रिपब्लिकन नेताओं का यह तर्क शामिल था कि मुस्लिम ब्रदरहुड एक ‘अंतरराष्ट्रीय इस्लामवादी संगठन’ है।

व्हाइट हाउस ने कहा है कि पूरे मुस्लिम ब्रदरहुड को एक साथ आतंकी संगठन घोषित नहीं किया जाएगा, पर ट्रंप का ये कदम अमेरिका की नीति में एक बड़ा बदलाव हो सकता है। ट्रंप का ये कदम इस समय में काफी अहम है जब वे गाजा में शांति बहाल करने की कोशिश में लगे हैं।

इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष महज जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि मूल रूप से धार्मिक संघर्ष है, जहाँ दोनों पक्षों के क्षेत्रीय दावे युद्ध का कारण बने हैं।

ऑपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने 1988 के अपने चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ संपत्ति बताया और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने का संकल्प लिया जब तक कि आखिरी यहूदी की हत्या न हो जाए। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन मिलता रहा है और उसने 7 अक्टूबर 2023 के नरसंहार के बाद इजरायली नागरिकों और सेना पर हवाई हमले किए।

2017 के दस्तावेजों में हमास ने खुद को मुस्लिम ब्रदरहुड से दूर दिखाने की कोशिश की, ताकि मिस्र के साथ संबंध बेहतर हो सकें। उसने यहूदियों और जायोनिस्टों में फर्क करने की बात भी कही। लेकिन 2023 की हिंसा ने उसकी दोहरी नीति और यहूदियों के प्रति नफरत को सामने ला दिया। 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के पाखंड और नफरत को पूरी तरह उजागर कर दिया।

गौरलतब है कि मुस्लिम ब्रदरहुड को औपचारिक रूप से आतंकी संगठन घोषित करना अमेरिकी सरकार के लिए हमेशा ही कठिन रहा है। यह संगठन डिसेंट्रलाइज्ड है और अलग-अलग देशों में इसकी शाखाएँ हैं। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञों और खुफिया अधिकारियों के लिए पूरे संगठन पर एक साथ आतंकी ठप्पा लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है।

इसी वजह से ट्रम्प के हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर केवल विशिष्ट शाखाओं को ही FTO या SDGT घोषित किया जाएगा।

मुस्लिम ब्रदरहुड: सोशियो-पॉलिटिकल मूवमेंट से वैश्विक इस्लामी नेटवर्क तक

1928 में मिस्र के इस्माइलिया में स्थापित मुस्लिम ब्रदरहुड या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ आज भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों में से एक है। इसकी स्थापना एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी।

उसने इसे पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और उस्मानी साम्राज्य के बाद इस्लामी मूल्यों के खत्म होने की आशंका के आधार पर शुरू किया था। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिक आंदोलन के रूप में शुरू किया। ये चैरिटी और इस्लामी वकालत पर केंद्रित था।

अपने शुरुआती वर्षों में मुस्लिम ब्रदरहुड ने कमजोर और उदासीन सरकारों की ओर से पैदा की गई खाइयों को भरा। इसने मिस्र में गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनाईं, साथ ही इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सर्वोच्चता) को सेक्यूलेरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) और साम्राज्यवाद का इलाज बताया।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मकसद में एक बात साफ है कि भले ही इसकी शुरुआत हिंसा से जुड़ी न रही हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा इसका रास्ता रहा है।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो कहता है- “अल्लाह हमारा मकसद है, पैगंबर हमारे मार्गदर्शक हैं; क़ुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी तवक्को है।”

1930 के दशक तक मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) के सदस्य लाखों की संख्या में पहुँच गए और उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया। 1936 में यह इस्लामी संगठन राजनीति में उतरा, धर्मनिरपेक्ष वफ्द पार्टी का विरोध किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विरोध-प्रदर्शन किए।

हालाँकि MB की पैरामिलिट्री विंग (अर्धसैनिक शाखा) ‘सीक्रेट अप्परैटस’, जिसे स्पेशल अप्परैटस या अल-निजाम अल-खास भी कहा जाता है, ने हिंसा, राजनीतिक हत्याओं और विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिया।

1948 में सीक्रेट अप्परैटस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री महमूद एल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने इस्लामी संगठन पर बैन लगाया था। 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए अल-बन्ना की हत्या कर दी।

मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अप्परैटस के सदस्य कठिन शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण लेते थे। उन्हें हथियारों का इस्तेमाल और अंडरग्राउंड ऑपरेशंस को अंजाम देने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

धोखे और गोपनीयता (तकिय्या) में खुद को पारंगत करके, इस अप्परैटस से जुड़े जिहादी राजनीतिक दलों, सेनाओं, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शैक्षिक संस्थानों और यहाँ तक कि एनजीओ में भी घुसपैठ और उसे अलग-थलग करते थे।

1966 में फाँसी की सजा पाने वाले सैयद कुत्ब के नेतृत्व में मुस्लिम ब्रदरहुड और अधिक कट्टरपंथी हो गया। अपनी लेखों, खासतौर पर माइलस्टोन्स (मा’आलिम फि अल-तारीक) के जरिए, कुत्ब ने तकफीर (मुसलमानों को धर्मत्यागी/काफिर घोषित करना) जैसी बातों को बढ़ावा दिया और कहा कि नए राष्ट्र-राज्य ‘गैर-इस्लामी’ हैं।

कुत्ब ने यह प्रोपेगेंडा भी फैलाया कि इस्लामी शरीयत कानून को पूरी तरह लागू करने में नेताओं और सरकारों की असफलता के कारण मुस्लिम दुनिया फिर से प्री-इस्लाम ‘अज्ञानता’ (जाहिलियत) की स्थिति में लौट गई है।

कुत्ब के कट्टर या अधिक शुद्ध इस्लामी कहा जाने वाला दृष्टिकोण जिहादियों के बीच व्यापक रूप से गूँजा और कई तकफीरी समूहों को प्रेरित किया। इन समूहों ने तकफीर का इस्तेमाल उन मुसलमानों की हत्या को जायज ठहराने के लिए किया जिन्हें वे धर्मत्यागी या पूरा मुसलमान नहीं मानते थे।

चाहे मिस्र का इस्लामिक जिहाद हो या बाद में अल-कायदा, सभी ने कुत्ब के जाहिलियत, तकफीर और जिहाद के उसूलों से प्रेरणा ली और गैर-मुसलमानों के साथ उन मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराया जिन्हें वे काफिर मानते थे।

मुस्लिम ब्रदरहुड की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाने में अरब स्प्रिंग काफी कारगर रहा। 2012 में MB ने चुनाव जीते और मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति चुना। लेकिन 2013 में तत्कालीन जनरल अब्देल फत्ताह अल-सीसी के नेतृत्व में सैन्य तख्तापलट हुआ और मोर्सी को हटा दिया गया। इस्लामी संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और इसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया गया।

मुस्लिम ब्रदरहुड भले ही यह कहता हो कि उसने हिंसा का रास्ता छोड़कर अपने उद्देश्यों के लिए लोकतांत्रिक तरीका अपना लिया है, लेकिन वरिष्ठ स्तर पर संगठन छोड़ चुके सदस्यों और स्वतंत्र विशेषज्ञों के आकलन से संकेत मिलता है कि उसका गुप्त तंत्र अब भी छिपे हुए नेटवर्क के जरिये काम कर रहा है।

मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने घोषणा की कि मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसमें काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस भी शामिल है, को ‘विदेशी आतंकी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ माना जाएगा।

यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस पहले ही ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं। जॉर्डन ने रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल कर हमले की साजिश रचने वाले आंदोलन से जुड़े लोगों को गिरफ्तार करने के बाद अप्रैल में इस समूह पर बैन लगा दिया। इसी साल जनवरी में यूएई ने यूनाइटेड किंगडम-आधारित 8 संगठनों को मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया।

मुस्लिम ब्रदरहुड की बाहरी अव्यवस्थित संरचना के कारण ये अपना अस्तित्व और संचालन बनाए रखती है, जबकि इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ खड़े देशों के लिए ठोस कार्रवाई करना कठिन हो जाता है। कुल मिलाकर, मुस्लिम ब्रदरहुड ‘सोशल वेलफेयर’, राजनीति और आतंकवाद को अपनी जरूरत के अनुसार जोड़कर चलाते रहने से ही अस्तित्व में है।

मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने के लिए ट्रंप की कोशिशें चुनौतियों से भरी हैं। 2013 में मिस्र के MB पर लगाए गए प्रतिबंध भले ही तुरंत राहत देने वाला कदम लगा हो, लेकिन आखिरकार इसने हिंसक और उग्रपंथी समूहों में भारी इजाफा किया। सिनाई प्रायद्वीप में सलाफी-जिहादी समूह उभर कर सामने आए, जिनमें आईएसआईएस से जुड़े गुट भी शामिल थे।

मुस्लिम ब्रदरहुड और अल जजीरा कनेक्शन

दोहा स्थित अल-जजीरा भले ही मुस्लिम ब्रदरहुड की ओर से घोषित शाखा न हो, लेकिन इसे इस्लामी संगठन का चेहरा (मेगाफोन) माना जाता है। 2017 में सऊदी अरब, यूएई और मिस्र का कतर के साथ राजनयिक विवाद हुआ क्योंकि कतर पर मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास का समर्थन करने का आरोप था।

सऊदी अरब ने अल-जजीरा और उसके सहयोगी चैनलों को बंद करने की माँग भी की थी, क्योंकि उसका आरोप था कि कतर अल-जजीरा का इस्तेमाल इस्लामी उग्रवाद भड़काने और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे जिहादी संगठनों को समर्थन देने के लिए करता है। उस समय अल-जजीरा ने निर्वासित मुस्लिम ब्रदरहुड नेता यूसुफ अल-करदावी की बातें ब्रॉडकास्ट की थी।

अरब स्प्रिंग के दौरान अल-जजीरा की पक्षपाती और प्रोपेगेंडा से भरी रिपोर्टिंग को भी भूला नहीं जा सकता। जनवरी 2024 में एक यमनी-ब्रिटिश पत्रकार अदनान अल-अमेरी ने खुलासा किया कि अल-जजीरा कतर सरकार के इशारे पर मुस्लिम ब्रदरहुड का एजेंडा चलाता है।

अल-अमेरी ने इजरायली अखबार द जेरूसलम पोस्ट को बताया कि उसने दोहा में अल-जजीरा के युवा चैनल जीम (Jeem) TV के लिए काम किया। शुरुआत में उन्हें कतर मुखपत्र के इस खतरनाक एजेंडे के बारे में पता नहीं था, लेकिन 2010 के दशक के मध्य में उन्हें इसका एहसास हुआ।

उस समय अल-अमीरी का अपना देश यमन, हूतियों के कब्जे में था और यूएई और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले खाड़ी देश मिलकर बमबारी कर रहे थे। यही दोनों देश अन्य खाड़ी देशों से कतर को अलग-थलग करने के पीछे भी थे। जब यमन में गृहयुद्ध छिड़ा, तो देश का दक्षिणी हिस्सा यूएई और सऊदी अरब दोनों के प्रति सहानुभूति रखता था।

यमनी-ब्रिटिश पत्रकार ने बताया कि अल-जजीरा में काम करने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रचार को दोहराना पड़ता है। उन्होंने कहा, “जब आप उनके न्यूज़ चैनल के लिए काम करते हैं, तो उन्हें जरूरत होती है कि आप उनके मुस्लिम ब्रदरहुड एजेंडे को बढ़ावा दें और अगर आप वैचारिक रूप से उनके साथ नहीं हैं, तो वे आपको खरीदने की पूरी कोशिश की जाएगी।” अदनान अल-अमेरी ने यह भी कहा कि अल-जजीरा हमास का समर्थन करता है।

अल-जजीरा का लगातार चलता भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

कतर स्थित इस्लामी प्रोपेगेंडा चलाने वाला अल-जजीरा भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार पक्षपाती बयानबाजी करता रहता है। चाहे 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हों, नागरिकता संशोधन अधिनियम या अयोध्या राम मंदिर मुद्दा, अल-जजीरा लगातार मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को गढ़ता रहा है और भारतीय हिंदू बहुमत को दोषी ठहराता रहा है।

अल-जजीरा को मुस्लिम पीड़ितत्व (विक्टिमहुड) की नकली कहानियाँ गढ़ने की आदत है जबकि वह इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद की असल घटनाओं को कम आंककर दिखाता है।

ऑपइंडिया ने पहले ही रिपोर्ट किया था कि अल-जजीरा ने 2002 के गोधरा नरसंहार को कम महत्व दिया, जबकि असल में 31 मुस्लिमों को साबरमती एक्सप्रेस को आग लगाने का दोषी पाया गया था। इस अग्निकांड में 59 हिंदू (ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे) मारे गए थे।

2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमलों के दौरान भी अल-जजीरा ने मुस्लिम भीड़ के हिंदुओं की हत्या, बलात्कार, घरों की लूटपाट और मंदिरों की तोड़फोड़ को ‘राजनीतिक बदला’ बताने की कोशिश की।

इस इस्लामी प्रोपेगेंडा संगठन ने भारतीय मीडिया पर भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्टिंग करने वाले इस्लामोफोबिक हैं। अल-जजीरा कश्मीर मुद्दे पर भी भारत विरोधी भूमिका निभाता है और कश्मीरी पंडितों के कष्टों को कम आंकता रहा है।

अल-जजीरा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी झूठ फैलाता रहा है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को पहले ही क्लीन चिट दे दी है।

इस प्रोपेगेंडा आउटलेट ने भारत और हिंदुओं के प्रति नफरत करने वाले व्यक्तियों को भी मंच दिया है। अल-जजीरा का कश्मीर पर विशेष पेज है, जहाँ वे भारत को अत्याचारी के रूप में दिखाते हैं और युद्धग्रस्त फिलीस्तीन की स्थिति के साथ इसे समानांतर दिखाने की कोशिश करते हैं।

हाल के महीनों में, अल-जजीरा ने भारत में ‘आई लव मुहम्मद’ विवाद की रिपोर्ट करते हुए तथ्य छिपाए और मुस्लिमों को उत्पीड़न का शिकार साबित करने की कोशिश की। इस वर्ष अप्रैल में, जब वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे मुस्लिम भीड़ ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिंदुओं पर हमले किए तो अल-जजीरा ने इस्लामी अत्याचारों को कमतर बताया और हिंसा को वक्फ कानून के खिलाफ ‘प्रदर्शन’ के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

इसके अलावा, मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारत ने पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के अंदर इस्लामी आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया तब अल-जजीरा ने पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इसने फेक न्यूज भी चलाई कि पाकिस्तान ने भारतीय वायु सेना की पायलट स्क्वाड्रन लीडर शिवानी सिंह को पकड़ लिया। इेसे दोनों पक्षों ने खारिज किया और बाद में शिवानी सिंह की तस्वीर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ सोशल मीडिया पर आई, जिससे कतर के इस्लामी प्रोपेगेंडा वाले मीडिया आउटलेट के झूठ सबके सामने उजागर हो गए।

भारत में मुस्लिम ब्रदरहुड की छाया

हालाँकि मुस्लिम ब्रदरहुड का भारत में प्रत्यक्ष तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन इसकी विचारधारा का भारत में इस्लामी संगठनों पर काफी असर पड़ा है। ध्यान देने वाली बात ये है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरण दी थी।

प्रतिबंधित इस्लामी आतंकी संगठन जैसे स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं पर जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

दोनों ने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, धर्मनिरपेक्ष एजेंडे का विरोध करने और बहुसंख्यक समुदाय के साथ मुख्यधारा सरकार को ‘मुसलमानों का उत्पीड़न करने वाले’ के तौर पर पेश करने पर भरोसा किया।

कई कश्मीरी इस्लामी आतंकी संगठन भी मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रभावित बताए जाते हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से अलगाववादी आंदोलनों का समर्थन किया है और भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया है। बौद्धिक ढाँचा उपलब्ध कराने के अलावा, मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े समूहों के बारे में यह भी बताया गया है कि वे भारत-विरोधी जिहादी लोगों को आर्थिक और प्रोपेगेंडा को बढ़ाने वाली सहायता देते हैं।

2021 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने भारत के खिलाफ़ #BoycottIndianProducts अभियान शुरू किया, जिसका लक्ष्य भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाना था। यह अभियान सोशल मीडिया पर उस समय शुरू हुआ जब असम में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ चलाए गए बेदखली अभियान के दौरान हिंसा हुई थी, क्योंकि कुछ अतिक्रमणकारियों ने पुलिस पर हमला कर दिया था।

इस घटना के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, पाकिस्तान और तुर्की, मिस्र और इराक जैसे मध्य पूर्वी देशों के लोगों ने भारत में बने उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान शुरू किया।

जाहिर तौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े कई मीडिया संस्थानों ने इस भारत-विरोधी अभियान को बढ़ावा देने वाले ‘समाचार लेख’ भी प्रकाशित किए। इनमें अल-जजीरा भी शामिल है।

2023 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने इस्लामी पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने भारत की छवि खराब करने की साजिश रची। उस समय डिजिटल फॉरेंसिक्स, रिसर्च एंड एनालिटिक्स सेंटर (DFRAC) ने रिपोर्ट किया कि मुस्लिम ब्रदरहुड खाड़ी देशों में काम करने वाले हिंदुओं के खिलाफ भी बदनाम करने वाला अभियान चलाता है।

इस्लामी आतंकवाद से निपटने में डोनाल्ड ट्रम्प का दोहरा रवैया साफ दिखाई देता है। वह सीरिया के नामित आतंकी-से-राजनीतिज्ञ बने शारा और पाकिस्तान की इस्लामी आतंकवाद को समर्थन देने वाली फौज द्वारा चलने वाली व्यवस्था को समर्थन देते हैं, जबकि मुस्लिम ब्रदरहुड के खिलाफ कार्रवाई करते हैं।

हालाँकि, मुस्लिम ब्रदरहुड पर समीक्षा के बाद ट्रम्प की कार्रवाई भारत को इस्लामी आतंकवाद और उसे समर्थन देने वाले विदेशी नेटवर्क के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है।

ये रिपोर्ट मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ

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Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
Shraddha Pandey is a Senior Sub-Editor at OpIndia, where she has been sharpening her edge on truth and narrative. With three years in experience in journalism, she is passionate about Hindu rights, Indian politics, geopolitics and India’s rise. When not dissecting and debunking propaganda, books, movies, music and cricket interest her. Email: [email protected]

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