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5G से भी 1000 गुना ज्यादा होगी सूचना भेजने की रफ्तार, स्टार्टअप से लेकर रोबॉटिक सर्जरी सबमें आएगा काम: विस्तार से जानिए क्या है मोदी सरकार का 6G प्लान, 2030 तक पूरा होगा विजन

भारत ने 6G को लेकर अपना विजन साफ कर दिया है। भारत उन देशों में शामिल होगा, जहाँ सबसे पहले 6G सेवा शुरू होगी। सरकार ने ‘6G विजन’ लॉन्च कर दिया है। इसमें सभी स्टेकहोल्डर्स को एक साथ लाकर काम करने पर बल दिया गया है।

मौजूदा 5G से 6G करीब 1000 गुना ज्यादा तेजी से डेटा ट्रांसफर कर सकेगा। पलक झपकते ही बड़े से बड़ा डेटा ट्रांसफर हो जाएगा। वहीं बहुत तेज गति से इंटरनेट एक्सेस किया जा सकेगा।

केन्द्र सरकार के मुताबिक, 5G के रोल आउट और एडॉप्शन के बाद अब 6G पर पूरा फोकस किया गया है। इसकी खासियत यह है कि इसमें स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। सरकार का ये लक्ष्य है कि साल 2030 तक भारत में 6G तकनीक को विकसित किया जा सके।

6G क्या है?

6G यानी छठी पीढ़ी की वायरलेस तकनीक, आने वाले समय में इंटरनेट की दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आएगी। इसे 5G से लगभग 1000 गुना तेज माना जा रहा है यानी इतनी रफ्तार कि एक माइक्रोसेकेंड में डाटा का आदान-प्रदान संभव होगा।

जहाँ 5G ने स्मार्ट डिवाइसों और तेज नेटवर्क का नया दौर शुरू किया था, वहीं 6G उससे कहीं आगे जाकर मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र को बदलने की क्षमता रखता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा सर्जरी, खासकर दूरस्थ (remote) सर्जरी में देखने को मिलेगा, जहां डॉक्टर हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी रीयल टाइम में ऑपरेशन कर सकेंगे।

इसके अलावा रोबोटिक्स, ऑगमेंटेड और वर्चुअल रियलिटी के साथ-साथ रीयल टाइम ऑनलाइन गेमिंग जैसे क्षेत्रों में भी यह तेजी और सटीकता प्रदान करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार 6G नेटवर्क 1 टेराबाइट प्रति सेकंड तक की डेटा स्पीड दे सकता है, जो सूचना, मनोरंजन, शिक्षा और उद्योग जगत के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा।

6G नेटवर्क उच्च तकनीक से लैस सटीक लोकेशन ट्रैकिंग और वर्चुअल अनुभव को ज्यादा ‘रियल’ बनाने में मददगार साबित होगा। एआई के साथ मिलकर ये नेटवर्क इतना स्मार्ट हो जाएगा कि किसी भी डेटा को कहीं भी स्टोर, प्रोसेस और शेयर करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। और ये खुद ब खुद हो जाएगा।

2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लक्ष्य में 6G काफी सहयोग करेगा। उद्योग, शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के साथ भारत को ये दूरसंचार के क्षेत्र में विश्व का एक अहम केन्द्र बनने में मदद करेगा।

भारत का 6G विजन किफायती, स्थिरता और यूनिवर्सल एक्सेस के सिद्धांतों पर आधारित है। स्वदेशी नवाचार, उन्नत अनुसंधान एवं विकास और वैश्विक सहयोग के माध्यम से ये समाज को और सशक्त बनाएगा। इसके जरिए से तय किया जाएगा कि भारत के हर नागरिक को आसानी से 6G मिल सके। यह इसलिए भी खास है, क्योंकि इसमें पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इस विजन का मुख्य लक्ष्य 2030 तक भारत में 6G तकनीक विकसित करना है।

भारत के 6G रोडमैप की बात करें तो 2035 तक राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी को बढ़ाने की है। सरकार का अनुमान है कि अगले कुछ सालों में भारत की GDP में 6G के जरिए 1.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।

5जी और 6जी तंत्र को मजबूत करने के लिए दूरसंचार प्रौद्योगिकी विकास निधि (TTDF) के तहक 310.6 करोड़ रुपए और 115 से ज्यादा अनुसंधान और विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। देश के 100 5जी लेब में अब 6जी की तैयारी हो रही है।

6G विजन 2030 का मकसद दूरसंचार नवाचार के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी राष्ट्रों में शामिल होना है। इसमें स्वदेशी नवाचार के लिए स्टार्टअप, उद्योग, शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों को एकजुट लाया जाएगा, ताकि देश को विकसित राष्ट्र बनाया जा सके।

भारत का 6जी विजन और मिशन

भारत ने मार्च 2023 में इस दिशा में कदम उठाया था। उस वक्त भारत 6जी विजन डॉक्यूमेंट्स रिलीज किया गया। इसने तय किया गया कि भारत को इस दिशा में ग्लोबल लीडर बनना है। इसे 2023 तक कार्यान्वित करने का लक्ष्य रखा गया। इसका फोकस साफ था। देश के हर नागरिक तक इस तकनीक की पहुँच हो। चाहे वह शहरों में रहता हो या गाँवों, कस्बों में। इसको सफल बनाने के लिए देशभर में 100 से ज्यादा रिसर्च संस्थान काम कर रहे हैं। कई नवाचार प्रोजेक्ट्स को अनुमति भी मिल गई है। ये कदम भारत को दूरसंचार के क्षेत्र में कंज्यूमर से क्रिएटर और एक्सपोर्टर बनाएगा।

6जी मिशन के दो फेज हैं। पहले फेज में 2023 में इसका विजन आना था। 2025 तक इसका फोकस रिसर्च, आईपी क्रिएशन, 6 जी के लिए पूरा ग्राउंड वर्क तैयार करना था। दूसरा फेज 2026 से शुरू हो रहा है, जो 2030 तक चलेगा। इसमें विश्वस्तर पर 6G और इसका इस्तेमाल, परीक्षण के लिए जगह, लोगों में जागरूकता लाना और बुनियादी ढाँचों के विकास पर केन्द्रित होगा।

भारत 6G एलायंस

भारत सरकार ने उद्योग एक्सपर्ट, दूरसंचार ऑपरेटरों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों को एक मंच पर लाने के लिए भारत 6G गठबंधन की शुरुआत की है। इस गठबंधन का उद्देश्य भारत में निर्मित 6G तकनीकों का निर्माण करना है। ऐसा तकनीक, जो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तकनीक को टक्कर दे सके।

ये एलायंस अमेरिका में नेक्स्टजी एलायंस, यूरोप में 6G IA और फिनलैंड में 6G फ्लैगशिप कार्यक्रम सहित अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ-साथ अन्य देशों में इसी तरह की पहलों पर भी काम कर रहा है। ये विश्वस्तर का गठजोड़ भारत को विचारों के आदान-प्रदान, साझा मानक निर्धारित करने और भविष्य के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय प्रणालियाँ विकसित करने में मदद कर रहे हैं।

दुनिया भारत पर निर्भर होगा- सिंधिया

मोबाइल कॉन्ग्रेस 2025 में भारत के दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा था कि भारत का मकसद 6जी पेटेंट का 10 फीसदी हासिल करना है। भारत को एक आत्मनिर्भर और डिजिटल अगुवा के रूप में उभरना तय है। उन्होंने कहा, “वह दिन दूर नहीं जब लोग कहेंगे कि दुनिया, भारत पर निर्भर है।” उन्होंने कहा था कि भारत नई खोज करेगा और दुनिया को बदलेगा।

क्या-क्या कर रही सरकार

कई सरकारी पहल भारत को 6G के लिए तैयार करने में मदद कर रही हैं। विश्वविद्यालयों में 5G प्रयोगशालाएँ छात्रों और स्टार्ट-अप्स को दूरसंचार नवाचारों पर सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

इन प्रयोगशालाओं में युवा रिसर्च कर रहे हैं। परीक्षण कर रहे हैं और 6G के लिए आधार तैयार कर रहे हैं। एक दूसरी पहल दूरसंचार प्रौद्योगिकी विकास कोष ने किया है। इसे 2022 में लॉन्च किया गया था। यह इस क्षेत्र में भारतीय अनुसंधान और स्टार्ट-अप्स का समर्थन करता है। अब तक, सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी में सुधार और भारत के अपने दूरसंचार केन्द्र बनाने पर 310 करोड़ रुपए की 100 से अधिक परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

आईआईआईटी बैंगलोर में एक टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब, भविष्य की संचार प्रणालियों जैसे कि रीकॉन्फिगरेबल इंटेलिजेंट सरफेस और ओ-आरएएन मैसिव एमआईएमओ पर अनुसंधान कर रहा है। ये तकनीक 5जी-एडवांस्ड और 6जी को ताकत देगी। ये सभी पहल एक साथ मिलकर एक स्पष्ट दिशा दिखाती है कि भारत एक सुरक्षित, समावेशी और भविष्य के लिए डिजिटल तंत्र का निर्माण करना चाहता है। ऐसा तंत्र जिससे सभी को लाभ हो, न कि कुछ लोगों को।

भारत की 6जी यात्रा एक तकनीकी विकास से कहीं अधिक है। यह आत्मविश्वास, नवाचार और वैश्विक सहयोग के बारे में है। अनुसंधान केंद्रों और एलायंस से इतर अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों में अहम भूमिका निभाने की है। भारत का हर कदम अनुसरण करने के नहीं, बल्कि नेतृत्व करने के लिए है। भारत 6जी विजन दरअसल एक वादा है। एक ऐसा वादा, जो संचार का भविष्य भारत में बनाएगा और दुनिया के साथ साझा करेगा।

नहीं थम रही ममदानी की PM मोदी को लेकर घृणा, गुरुद्वारे में जाकर सिखों को भारत सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश: जानें न्यूयॉर्क मेयर पद के उम्मीदवार का भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

अमेरिका के न्यूयॉर्क में मेयर पद के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जोहरान ममदानी का अब चुनावी एजेंडा सिर्फ भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर घृणा ही बनता जा रहा है। ममदानी जो कुछ दिनों पहले तक एक ‘आतंकी’ के साथ मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवा रहा था उसे अब मोदी सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा करती दिखने लगी है। इस्लामी कट्टरपंथी का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह गुरुद्वारे में जाकर भी मोदी सरकार के खिलाफ जहर उगल रहा है।

ममदानी की सिखों को भड़काने की कोशिश

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वीडियो शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) का है। गुरुद्वारे में जाकर मोदी विरोधी घृणा फैलाने को ममदानी की सिख समुदाय को भड़काने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस वीडियो में ममदानी ने मौजूदा मेयर एरिक एडम्स को मोदी सरकार के विचारों का समर्थक बताते हुए उन पर भी हमला बोला है।

इस वायरल वीडियो में ममदानी कह रहा है कि वह एरिक एडम्स के खिलाफ इसलिए चुनाव लड़ रहा है क्योंकि यह शहर अब उन लोगों के लिए बहुत महँगा हो गया है जो इसे अपना घर कहते हैं। ममदानी ने आगे कहा, “मुझे पता है कि इस गुरुद्वारे में कई लोग इसी चिंता से जूझ रहे हैं कि किराया, पानी का बिल, बिजली, बच्चों की देखभाल और जिंदगी जीने के लिए दूसरी जरूरी जरूरतें कैसे पूरी करें।”

ममदानी ने मेयर पर हमला करते हुए आगे कहा, “इस मेयर (एडम्स) ने जिंदगी को और महँगा बनाने का हर मौका भुनाया है। साथ ही, हमारे समुदाय के सदस्यों के खिलाफ हिंसा वाले प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार के रवैये का समर्थन भी किया है।”

यह वीडियो X (पूर्व ट्विटर) पर तेजी से फैला, जहाँ पत्रकार शशांक मट्टू जैसे यूजर्स ने इसे शेयर किया। वीडियो वायरल होने के बाद, शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने ममदानी पर हमला बोला है। प्रियंका ने X पर लिखा, “हालाँकि यह हमारा काम नहीं है कि न्यूयॉर्क अपना मेयर किसे चुनता है लेकिन जोहरान यहाँ गुरुद्वारे में जो कह रहा है, वह बेहद खतरनाक है। उसकी स्क्रिप्ट कौन लिख रहा है? गुरपतवंत सिंह पन्नू?”

मोदी विरोध का रहा है ममदानी का इतिहास

ममदानी की पीएम मोदी को लेकर घृणा नई नहीं है, वो आए दिन ऐसे बयान देकर कट्टरपंथी जमात में अपनी जगह बनाने को कोशिश करता नजर आ रहा है। कुछ दिन पहले की ही बात है जब ममदानी ने कहा था कि पीएम मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी का यह नजरिया है कि देश में केवल कुछ खास तरह के भारतीयों के लिए ही जगह रह पाए। इसी वीडियो में ममदानी ने दावा किया था कि वह हमेशा पीएम मोदी का आलोचक रहा है।

अब ममदानी की बात सही भी है कि उसको पीएम मोदी का ओलचक होना की पड़ेगा क्योंकि ममदानी तो आंतिकयों को अपना आका मानता है। 1993 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (WTC) बम धमाके का एक सह-साजिशकर्ता के साथ मुस्कराते हुए तस्वीर शेयर करते हुए उसे ‘इस्लाम का स्तंभ’ बताता है। दूसरी और पीएम मोदी हैं जो आतंकवाद के खिलाफ जीरो ट़ॉलेंरस की नीति लेकर चलते हैं।

कुछ दिनों पहले एक मंदिर में जूते पहनकर घुसा ममदानी भारत में राम मंदिर के निर्माण से भी दुखी था। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के उद्घाटन को लेकर ममदानी ने विवादित बयान दिया था। उसने इस ऐतिहासिक अवसर को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘उत्पीड़न का हथियार’ बताया था।

ममदानी ने पीएम नरेंद्र मोदी पर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। उसने यहाँ तक कहा था कि गुजरात से मुस्लिमों को मिटा दिया गया है, अब लोगों को लगता ही नहीं कि हम मौजूद हैं। ममदानी यहीं नहीं रुका, एक अन्य कार्यक्रम में उसने पीएम मोदी की तुलना इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से करते हुए दोनों को ‘युद्ध अपराधी’ कहा था।

2023 में पीएम मोदी के न्यूयॉर्क दौरे से पहले ममदानी ने जेल में बंद छात्र दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद का पत्र पढ़ा था, जिसमें मोदी सरकार पर अल्पसंख्यकों के दमन का आरोप था। ममदानी के ऐसे दावों और बयानों की एक लंबी फेहरिस्त है।

खालिस्तानी तत्वों को उकसा रहा ममदानी?

गुरुद्वारे में जाकर पीएम मोदी और भारत विरोधी बयान देने को एक बड़ा वर्ग सिखों को भड़काने के साथ-साथ खालिस्तानी तत्वों को उकसाने की भी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका खालिस्तानी गतिविधियों के नए केंद्र के तौर पर उभरकर सामने आ रहा है। खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ अमेरिका की धरती से चलता है।

अमेरिका में खालिस्तानी तत्वों ने समय-समय पर भारत विरोधी बयान देने के साथ-साथ भारतीय कॉन्सुलेट तक को निशाना बनाया है। खालिस्तानी प्रदर्शनकारियों ने मार्च 2023 में सैन फ्रांसिस्को के भारतीय कॉन्सुलेट पर हमला किया। उन्होंने संपत्ति को नुकसान पहुँचाया, अधिकारियों पर पथराव किया और ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए। इसके कुछ ही महीनों बाद जुलाई 2023 में वाणिज्य दूतावास पर खालिस्तान समर्थकों ने फिर हमला कर दिया और वहाँ आग लगाने तक की कोशिश की गई।

अमेरिका के कई शहरों में बीते वर्षों में हिंदू मंदिरों पर हमलों की घटनाएँ भी बढ़ी हैं। कैलिफॉर्निया से लेकर न्यूयॉर्क तक मंदिरों को तहस-नहस करने की साजिशे की गई। मंदिरों पर भारत विरोधी बयान लिखे गए और सितंबर 2024 में तो कैलिफॉर्निया में एक मंदिर पर लिखा गया कि ‘पीएम मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर आतंकवादी हैं’। बीते अगस्त में भी इन्हीं खालिस्तान समर्थक तत्वों ने एक हिंदू मंदिर पर हमला बोल दिया था।

ममदानी के हालिया बयानों और गुरुद्वारे में दिए गए भाषण को केवल राजनीतिक रणनीति के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह एक सोची-समझी मुहिम का हिस्सा लगता है, जिसका उद्देश्य भारत विरोधी नैरेटिव को अमेरिकी राजनीति के मंच पर वैधता देना है।

जिस तरह से वह गुरुद्वारे में जाकर न केवल प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोलता है बल्कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार को ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा करने वाली’ बताता है, उससे साफ है कि ममदानी के पीछे केवल चुनावी महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि एक वैचारिक विरोध भी काम कर रहा है।

ममदानी के बयानों ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल मोदी-विरोध की राजनीति नहीं कर रहा बल्कि भारत की एकता और अखंडता को निशाना बनाने वाली ताकतों के साथ वैचारिक रूप से खड़ा है। ऐसे में, सिख समुदाय और प्रवासी भारतीयों दोनों के लिए जरूरी है कि वे इस तरह की भड़काऊ राजनीति से दूर रहें और भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नुकसान पहुँचाने वाले प्रयासों का विरोध करें।

मिशनरियों से बचने के ‘धर्मांतरण वर्जित’ बोर्ड असंवैधानिक नहीं: HC ने जनजातियों के अधिकार को रखा बरकरार, कहा- लालच देकर धर्मांतरण से बिगड़ती है समरसता

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कांकेर जिले के आठ गाँवों में जनजातीय समुदाय को जबरन या धोखे से धर्मांतरण से बचाने के लिए लगे होर्डिंग को असंवैधानिक नहीं माना है। उच्च न्यायालय ने कहा है कि जनजातीय लोगों को अवैध धर्मांतरण के प्रति आगाह करने वाले बैनर लगाना, ‘असंवैधानिक’ नहीं हो सकता। कोर्ट ने माना कि होडिंग्स जनजातीय समुदाय के सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए लगाए गए हैं।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की पीठ ने होर्डिंग हटाने की माँग करनेवाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान ये बातें की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि ये होर्डिंग पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के गाँवों में प्रवेश पर रोक लगाते हैं और उनके साथ भेदभाव करते हैं।

यह रिट याचिका कांकेर जिले के रहने वाले दिग्बल टांडी ने दायर की थी, इसमें ईसाइयों को ग्रामीणों से अलग करने का आरोप लगाया गया था। याचिकाकर्ता ने माँग की थी कि कुदल, पारवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हबेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलागी सहित कई जनजातीय गाँवों में लगाए गए होर्डिंग को असंवैधानिक घोषित किया जाए और उन्हें तत्काल हटाने का आदेश दिया जाए।

याचिका में पंचायत विभाग पर आरोप लगाया गया था कि इसने जिला पंचायत, जनपद पंचायत और ग्राम पंचायतों को ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ के नाम से एक प्रस्ताव पारित करने का निर्देश दिया था, ताकि गाँव में ‘पादरियों और ईसाइयों’ के प्रवेश पर रोक लगाई जा सके।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, उच्च न्यायालय ने कहा कि पंचायत विभाग के पत्र, बैनर या होर्डिंग्स में ईसाइयत के खिलाफ कुछ नहीं लिखा गया है। अपने फैसले में अदालत ने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित ग्राम सभाओं ने स्थानीय जनजातियों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के हितों की रक्षा के लिए एहतियाती उपाय के रूप में ये होर्डिंग्स लगाए हैं।”

अवैध धर्मांतरण सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ता है- हाई कोर्ट

उच्च न्यायालय ने माना कि सामूहिक धर्मांतरण सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ता है और जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान के खिलाफ है। समाज सेवा की आड़ में, मिशनरी समूह भोले-भाले लोगों को ईसाइयत अपनाने के लिए लुभा रहे हैं।

कोर्ट ने कहा, “भारत में मिशनरी गतिविधियाँ औपनिवेशिक काल से चली आ रही हैं, जब ईसाई संगठनों ने स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थान स्थापित किए थे। शुरुआत में सामाजिक उत्थान, साक्षरता और स्वास्थ्य सेवा के लिए ये संस्थान खोले गए। समय के साथ कुछ मिशनरी समूहों ने इन मंचों का उपयोग धर्मांतरण के लिए करना शुरू कर दिया। आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के बीच, बेहतर आजीविका, शिक्षा या समानता के वादे के तहत धीरे-धीरे धर्मांतरण हुआ।”

गरीबों को अवैध धर्मांतरण के लिए टारगेट करना गलत- कोर्ट

उच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर डाला कि कैसे ईसाई मिशनरियों ने गरीब और अशिक्षित लोगों को अवैध धर्मांतरण के लिए टारगेट किया। कोर्ट ने माना कि धर्मांतरण गरीब समाजों में विभाजन और ‘सांस्कृतिक दबाव’ पैदा करते हैं।

कोर्ट के मुताबिक “ईसाई मिशनरियों पर अक्सर निरक्षर और गरीब जनजातीय परिवारों का धर्मांतरण करने और आर्थिक सहायता, मुफ्त शिक्षा, चिकित्सा या रोजगार देने का लालच देने के आरोप लगते है। ये स्वेच्छा से स्वीकार किए गये आस्था के खिलाफ है और ‘सांस्कृतिक दबाव’ के समान हैं। इस प्रक्रिया ने जनजातीय समुदायों के भीतर गहरे सामाजिक विभाजन को भी जन्म दिया है। जनजातीय रिवाज और परंपराएँ टूट रही हैं और गाँवों में ध्रुवीकरण हो रहा है, जिससे तनाव, सामाजिक बहिष्कार और हिंसक झड़पों की खबरें भी आती रहती हैं। ”

उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के इस आरोप को खारिज कर दिया कि होर्डिंग्स से ईसाइयों के साथ भेदभाव हुआ है। अदालत ने कहा, “ऐसा कोई भी प्रमाण रिकॉर्ड में नहीं रखा गया है, जिससे यह पता चले कि पत्र किसी भी धार्मिक भेदभाव को बढ़ाने वाला है।” कोर्ट ने कहा कि होर्डिंग्स में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे ईसाइयों के साथ भेदभाव समझा जाए। होर्डिंग्स केवल कुछ पादरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाता है। इनपर धर्मांतरण को बढ़ावा देने का आरोप है।

लालच देकर धर्मांतरण समाज के लिए खतरनाक: कोर्ट

कोर्ट ने साफ कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत दिया गया धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार एक पूर्ण अधिकार नहीं है और यह स्थानीय व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य से भी जुड़ा है। इस अधिकार के दुरुपयोग की संभावना है, इसलिए कई राज्य सरकारों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं। उच्च न्यायालय ने आगाह किया कि धोखाधड़ी या अवैध धर्मांतरण की गतिविधियाँ देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकती हैं, जो अलग-अलग धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित है।

कोर्ट ने कहा, “भारत का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना सह-अस्तित्व और विविधता के सम्मान पर आधारित है।”

स्वैच्छिक धर्मपरिवर्तन विवेक पर आधारित होता है। जब लालच या बहला-फुसलाकर धर्मांतरण कराया जाता है, तो यह आस्था और स्वतंत्रता, दोनों को कमजोर करता है। कुछ मिशनरी कथित तौर पर ‘प्रलोभन द्वारा धर्म परिवर्तन’ कराते हैं। ये न सिर्फ धर्म बल्कि समाज के लिए भी खतरनाक है। ये भारत की एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के लिए भी खतरनाक है। उच्च न्यायालय ने कहा, “इसका उपाय असहिष्णुता में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में निहित है कि आस्था दृढ़ विश्वास का विषय बनी रहे, न कि मजबूरी का।”

याचिका का निपटारा करते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पहले किसी भी वैकल्पिक वैधानिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया। जबकि वैकल्पिक उपायों पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए था।

RSS पर बैन हटने से खुश थे पटेल, नेहरू को लिखे पत्र में बताई थी ‘गाँधी हत्या’ की सच्चाई: संघ पर प्रतिबंध लगाने की सोचने से पहले इतिहास तो पढ़ लें खरगे

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर बैन लगाने की बात कही है। खरगे ने इसके लिए देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल का हवाला दिया है। उनका कहना था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, सरदार पटेल के विचारों का सम्मान करते हैं तो संघ पर बैन लगा देना चाहिए।

खरगे ने अपने बयान में 18 जुलाई 1948 के सरदार पटेल के एक लेटर का भी हवाला दिया है जो उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी (तब हिंदू महासभा के नेता) को लिखा था। इस पत्र में महात्मा गाँधी की हत्या के लिए बने माहौल को RSS से जोड़कर देखा गया था। खरगे के दावे और इस पत्र से आगे भी संघ और पटेल के रिश्तों की कहानी है जिसे कॉन्ग्रेस अध्यक्ष छिपाना चाहते हैं।

गाँधी हत्या और संघ पर बैन की कहानी

1925 में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आजाद भारत में 3 बार प्रतिबंध लगाया गया है और ऐसा तीनों ही बार कॉन्ग्रेस की सरकारों ने किया है। हालाँकि, इसमें सबमें अहम तथ्य यह है कि हर बैन के बाद संघ और मजबूती के साथ वापस लौटा है। हर बार सरकार को संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा है।

संघ पर बैन के रूप में पहली मुसीबत आजादी के कुछ ही महीनों बाद 1948 में ही आ गई थी। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। RSS की वेबसाइट के मुताबिक, संघ ने इस दुखद घटना पर अपनी गहरी संवेदना जताई लेकिन हालात जल्द ही उसके खिलाफ मुड़ गए। 1 फरवरी को संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) को नागपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।

जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने संघ पर गाँधीजी की हत्या का आरोप लगा दिया। इसके बाद 4 फरवरी को संघ पर बैन लगा दिया गया और करीब 17,000 स्वयंसेवकों को जेल में डाल दिया गया। हालात इतने खराब हो गए कि 5 फरवरी को गुरुजी ने खुद ही सभी शाखाएँ बंद करने की घोषणा कर दी। जिस समय संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था उस समय देश के गृह मंत्री सरदार पटेल ही थे।

कुछ महीनों तक सरकार और संघ के बीच बातचीत चलती रही लेकिन जब कोई रास्ता नहीं निकला तो दिसंबर में स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह शुरू किया। 9 दिसंबर 1948 को देशभर में हजारों स्वयंसेवक सड़कों पर उतरे और शांतिपूर्ण तरीके से सरकार से माँग की कि संघ पर लगा प्रतिबंध हटाया जाए।

अगले साल यानी 1949 में संघ ने अपना एक लिखित संविधान तैयार किया। धीरे-धीरे सरकार को भी अपनी गलती का अहसास हुआ, गाँधी जी की हत्या में संघ के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले थे और फिर 12 जुलाई 1949 को संघ से बैन हटा लिया गया। RSS की वेबसाइट के मुताबिक, यह बैन बिना किसी शर्त के हटाया गया था।

अगले ही दिन, यानी 13 जुलाई को गुरुजी जेल से रिहा हुए। उनकी रिहाई के बाद पूरे भारत में जैसे खुशी की लहर दौड़ गई। जहाँ-जहाँ वे गए, वहाँ लोगों ने उनका दिल खोलकर स्वागत किया।

गाँधी हत्या में शामिल नहीं RSS: नेहरू को पटेल का पत्र

RSS को गाँधी की हत्या से जोड़कर बेशकर उस पर बैन लगा दिया गया था लेकिन एक महीने से पहले-पहले ही सरदार पटेल को यह समझ आ गया था कि गाँधी की हत्या में संघ का कोई लेना-देना नहीं हैं। रतन शारदा ने अपनी किताब ‘RSS 360: Demystifying Rashtriya Swayamsevak Sangh’ में पटेल और नेहरू के बीच हुए एक पत्राचार का हवाला दिया है।

पटेल ने 27 फरवरी 1948 को नेहरू को एक लंबा पत्र लिखा था। शारदा ने लिखा, “उस दस्तावेज़ के कुछ हिस्से इस प्रकार हैं ‘जो भी सूचनाएँ हमें मिलीं चाहे वे सही हों या गलत, नाम वाले हों या गुमनाम, सबकी अच्छी तरह जाँच की गई। इन में से 90% बातें झूठी और अटकलों पर आधारित निकलीं। अधिकतर आरोप RSS पर लगाए गए थे कि उन्होंने मिठाइयाँ बाँटीं या हत्या पर खुशी मनाई। लेकिन जाँच में ये सारे आरोप गलत पाए गए’।”

इस पत्र में पटेल ने आगे लिखा, “बापूजी की नीतियों और विचारों के विरोधी, जिनमें कई लोग हिंदू महासभा और RSS से जुड़े थे, उन्होंने इस हत्या का स्वागत जरूर किया था। लेकिन इसके अलावा, मौजूद सबूतों के आधार पर RSS या हिंदू महासभा के सदस्यों को इस साजिश से जोड़ने का कोई ठोस कारण नहीं है। RSS कुछ और घटनाओं के लिए जिम्मेदार हो सकता है लेकिन इस हत्या के लिए नहीं।”

पटेल ने इस पत्र में लिखा, “साजिश में शामिल लोगों के इकबालिया बयानों से भी यह साफ़ होता है कि RSS का इस साजिश से कोई लेना-देना नहीं था।”

पटेल का नेहरू को लिखा गया पत्र (साभार: Selected Correspondence Of Sardar Patel 1945-50, Vol. 6)

रतन शारदा लिखते हैं, “यह बात साफ हो जाती है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों को ही संघ के बारे में सच्चाई का पता उससे पाँच महीने से ज्यादा समय पहले से था, जब सरसंघचालक उन्हें पत्र लिख रहे थे। कटु सत्य यह है कि उस समय के राजनीतिक नेताओं ने जानबूझकर इस सच्चाई को छिपाया और संघ के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया।”

RSS से प्रतिबंध हटने पर पटेल ने जताई थी खुशी

जिस समय संघ पर प्रतिबंध लगाया गया तो मद्रास प्रेसीडेंसी के एडवोकेट-जनरल रहे थिरुवलंगडु राजू वेंकटराम शास्त्री ने संघ के स्वयंसेवकों पर किए जा रहे पुलिस के अत्याचारों का खुलकर विरोध किया था। बाद में, वह संघ-सरकार के बीच बातचीत के लिए मध्यस्थ जैसी भूमिका में आ गए थे। उन्होंने गृह मंत्रालय में सरदार पटेल और जेल में बंद गुरुजी ने कई मुलाकातें की थीं।

RSS से प्रतिबंध हटाए जाने के कुछ ही दिनों बाद 16 जुलाई 1949 को सरदार पटेल ने वेंकटराम शास्त्री को पत्र लिखा था। इसमें पटेल ने लिखा था, “मैं खुद जल्द से जल्द (RSS से) प्रतिबंध हटाने के लिए उत्सुक था। मैंने अतीत में आरएसएस को सलाह दी है कि अगर उन्हें लगता है कि कॉन्ग्रेस गलत रास्ते पर जा रही है, तो उनके लिए एकमात्र रास्ता कॉन्ग्रेस में भीतर से सुधार करना है।”

संघ से जुड़ी ऑर्गनाइजर पत्रिका में छपे एक लेख के मुताबिक, संघ से प्रतिबंध हटने के बाद सरदार पटेल ने गुरुजी को लिखे एक पत्र में प्रतिबंध हटने पर अपनी खुशी व्यक्त की थी। पटेल ने लिखा था, “केवल मेरे करीबी लोग ही जानते हैं कि संघ पर से प्रतिबंध हटने पर मुझे कितनी खुशी हुई थी। मैं आपको शुभकामनाएँ देता हूँ।”

बिना शर्त हटा था संघ से प्रतिबंध

अक्सर यह भी दावा किया जाता है कि सरकार ने संघ पर शर्तें लगाई थी और उन्हें मानने के बाद ही संघ प्रतिबंध हटा था। लेकिन यह भी पूरी तरह सच नहीं है। मोरेश्वर गणेश तपस्वी ने अपनी किताब ‘राष्ट्राय नम:’ में संघ के बिना किसी शर्त के प्रतिबंध हटने को लेकर अहम दावे किए हैं।

इसमें 14 अक्टूबर 1949 की बंबई विधान सभा की कार्यवाही का एक उल्लेख किया गया है। लल्लूभाई मकानजी पटेल ने गृह एवं राजस्व मंत्री से संघ से प्रतिबंध हटाए जाने को लेकर कर सवाल पूछे जिसमें एक सवाल यह भी था कि क्या संघ से प्रतिबंध सशर्त हटाया गया है या बिना शर्त के। इस पर दिनकरराव एन. देसाई द्वारा जवाब दिया गया कि प्रतिबंध बिना शर्त के उठाया गया था।

‘राष्ट्राय नम:’पुस्तक का एक अंश

इसी पुस्तक में गुरुजी की 22 जुलाई 1949 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है, “एक प्रेस रिपोर्टर ने पूछा, ‘भूतकाल में जैसा था, उसकी तुलना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किन मामलों में आज परिवर्तन किया है?’

इस पर गोलवलकर ने कहा कि ‘उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों में से किसीका भी त्याग नहीं किया है। भारत सरकार चाहती थी कि हम अपना संविधान लिखित कर दें। हमने वैसा कर दिया। जनता यदि चाहे तो इसे स्पष्टीकरण कह सकती है’।” साथ ही, पुस्तक में 1 अगस्त 1949 को ‘हितवाद’ में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर कहा गया है कि गुरुजी ने खुद ही कोई समझौता ना होने का दावा किया था।

अब खरगे ने एक पत्र का हवाला देकर संघ पर प्रतिबंध लगाने की वकालत तो कर दी लेकिन पूरी सच्चाई वो शायद ना जानते हों या जानते हुए भी छिपाने की कोशिश कर रहे थे। वे ये भी भूल गए है कि ये वही स्वयंसेवक संघ है जिसके स्वयंसेवकों को जवाहरलाल नेहरू ने 1963 में गणतंत्र दिवस पर लाल किले की परेड में हिस्सा लेने के लिए बुलाया था।

क्योंकि इन स्वयंसेवकों ने 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के दौरान सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। यहाँ तक कि बंकरों में सैनिकों को मदद पहुँचाई। जिसे नेहरू तक प्रभावित हुए थे। देश में बाहरी हमलों के संकट से लेकर हर आपदा तक संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र सेवा में जुटे रहते हैं और खरगे उन पर ही प्रतिबंध लगाना चाहते हैं।

गणतंत्र दिवस परेड में RSS के स्वयंसेवक (फोटो साभार: आर्गेनाइजर)

खरगे का ताजा बयान ना इतिहास की सच्चाई पर टिका है और न ही तथ्यों की बुनियाद पर। जिन पटेल का वो हवाला दे रहे हैं उनका खुद कॉन्ग्रेस ने कितना सम्मान किया था, ये अगर कोई खरगे को याद दिलाएगा तो उन्हें अपनी पार्टी की सच्चाई का पता चलेगा।

पहले भी संघ पर प्रतिबंध की कोशिशें की गईं लेकिन वे खुद आज हाशिए पर हैं जिन्होंने संघ को समाप्त करने की सोची थी। वहीं, संघ गर्व से अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और देश सेवा के नए प्रण के साथ लोगों के बीच जा रहा है।

अब राज्यों के पुलिसकर्मी पहनेंगे एक जैसी वर्दी, ‘वन नेशन, वन पुलिस यूनिफॉर्म’ पर केंद्र सरकार ने 16 राज्यों से माँगी रिपोर्ट: जानें पुलिस वर्दी के रंगों का रोचक इतिहास

केंद्र सरकार अब पूरे देश में ‘वन नेशन, वन पुलिस यूनिफॉर्म’ योजना को लागू करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इस योजना के तहत देशभर में पुलिस की वर्दी को एक समान बनाने की तैयारी चल रही है। गृह मंत्रालय (MHA) ने इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से उनकी पुलिस वर्दी से जुड़ी जानकारी माँगी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गृह मंत्रालय ने राज्यों को 4 नवंबर 2025 तक वर्दी की डिजाइन, गुणवत्ता और लागत से संबंधित सभी विवरण भेजने के निर्देश दिए हैं। जिन राज्यों से जानकारी माँगी गई है, उनमें आंध्र प्रदेश, केरल, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं।

गृह मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह जानकारी सिपाही से लेकर डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) तक के सभी रैंकों की वर्दी से जुड़ी होनी चाहिए। साथ ही हर रैंक के लिए तय वार्षिक वर्दी भत्ता और पूरी वर्दी की औसत लागत का ब्योरा भी देने को कहा गया है। सरकार का उद्देश्य है कि देशभर में पुलिस की वर्दी एक जैसी हो, जिससे एक समानता और एकता की भावना मजबूत हो।

प्रधानमंत्री ने प्रस्तुत किया विचार, बताए फायदे

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2022 में हरियाणा के फरीदाबाद में आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी राज्यों के गृह मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए ‘वन नेशन, वन पुलिस यूनिफॉर्म’ (एक देश, एक पुलिस वर्दी) का विचार प्रस्तुत किया था।

उन्होंने कहा कि यह कोई थोपने वाला विचार नहीं है बल्कि इस पर विचार-विमर्श किया जा सकता है। पीएम मोदी ने कहा था कि जैसे देश में वन नेशन, वन राशन कार्ड, वन नेशन, वन मोबिलिटी कार्ड और वन नेशन, वन साइन लैंग्वेज की पहलें लागू की गईं, उसी तरह वन नेशन, वन पुलिस यूनिफॉर्म पर भी सोचना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने समझाया कि अगर पूरे देश में पुलिस की वर्दी एक जैसी होगी, तो इससे कई फायदे होंगे, बेहतर गुणवत्ता की यूनिफॉर्म बड़े पैमाने पर तैयार की जा सकेगी और पुलिस की पहचान पूरे देश में एक जैसी दिखेगी। उन्होंने कहा, “जिस तरह लाल और काले रंग के पोस्ट बॉक्स को लोग दूर से पहचान लेते हैं, उसी तरह एक समान वर्दी से पुलिस की अलग और स्पष्ट पहचान बनेगी।”

वर्तमान में देश की ज्यादातर पुलिस बल खाकी रंग की वर्दी पहनते हैं जबकि कोलकाता, तमिलनाडु और गोवा पुलिस सफेद वर्दी का इस्तेमाल करती है।

सम्मेलन में नागालैंड के उप-मुख्यमंत्री और गृह मंत्री वाई. पैटन ने कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था में सुधार के कारण केंद्र सरकार ने सात जिलों के 15 पुलिस थानों के इलाकों से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) हटा लिया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में राज्य के और क्षेत्रों से भी AFSPA हटाया जाएगा।

पुलिस की वर्दी का इतिहास

भारत में पुलिस वर्दी का इतिहास उतना ही दिलचस्प है जितनी उसकी पहचान। अंग्रेजी राज के दौर में जब पुलिस बल की स्थापना हुई, तब उसकी वर्दी सफेद रंग की थी, जो शाही और सभ्य मानी जाती थी। लेकिन जल्द ही अंग्रेज अधिकारियों को अहसास हुआ कि सफेद कपड़े पर जरा सी गंदगी भी साफ दिखती थी, जिससे वर्दी की चमक बनाए रखना मुश्किल हो गया।

इस चुनौती ने एक नए विचार को जन्म दिया। 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश सैनिकों ने अपनी वर्दी को धूल जैसे रंगों में रंगना शुरू किया, ताकि यह वातावरण से मेल खा सके और गंदगी छिपी रहे। उन्होंने चाय की पत्तियों, गंदे पानी और कत्थे जैसे प्राकृतिक पदार्थों से प्रयोग किए। इन रंगों के मेल से बना ‘खाकी’ जिसका मतलब ही है धूल या मिट्टी जैसा।

सर हैरी बर्नेट लम्सडेन ने 1847 में इसे पहली बार औपचारिक रूप से वर्दी के रूप में अपनाया। वहीं, सर हेनरी लॉरेंस, जो उस समय लाहौर में ‘कोर ऑफ गाइड फोर्स’ के प्रमुख थे, उन्होंने इस व्यावहारिक रंग की उपयोगिता को देखते हुए इसे पुलिस की आधिकारिक वर्दी घोषित कर दिया।

इस तरह, भारत में खाकी का जन्म हुआ। एक ऐसा रंग जो न सिर्फ उपयोगी था बल्कि सादगी और दृढ़ता का प्रतीक भी बन गया। समय के साथ चाय और कत्थे से बना प्राकृतिक खाकी अब सिंथेटिक रंगों से तैयार किया जाने लगा। यह हल्के भूरे और पीले रंग का मिश्रण होता है, ऐसा रंग जो न ज्यादा चमकीला है, न ज्यादा फीका, पर बिल्कुल भरोसेमंद।

वर्दी के रंग में हुए दिलचस्प बदलाव

सालों के सफर में अलग-अलग राज्यों ने अपनी पुलिस वर्दी में कई प्रयोग किए। दिल्ली पुलिस ने खाकी में हल्का बदलाव लाने की कोशिश की, जिसके बाद कार्गो पैंट और टी-शर्ट का ट्रायल हुआ, मगर नई वर्दी अभी आधिकारिक रूप से लागू नहीं हो पाई। वहीं कोलकाता पुलिस परंपरा निभाते हुए आज भी सफेद वर्दी पहनती है।

गोवा पुलिस ने एक समय खाकी छोड़कर नेवी ब्लू ट्राउजर और सफेद शर्ट अपनाई। यह डिजाइन अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर वेंडेल रॉड्रिक्स ने तैयार किया था। हालाँकि बाद में खाकी वर्दी वापस लौटी, पर ट्रैफिक पुलिस आज भी वही आधुनिक डिजाइन पहनती है।

हिमाचल प्रदेश ने 2008 में नीली वर्दी का प्रयोग किया लेकिन कुछ ही वर्षों में खाकी की गरिमा लौट आई। वहीं, महाराष्ट्र पुलिस ने 2020 में खाकी के लिए एक मानक रंग कोड (Pantone 18-1022 TCX) तय किया जिससे राज्य में एक जैसी वर्दी सुनिश्चित हो सके।

मुझे वेस्टर्न कंजर्वेटिव्स की एक कॉन्फ्रेंस में बुलाया गया था: एक हिंदू होने के नाते, मैंने इसलिए ना जाने का फैसला किया

नोट: मुझे हाल ही में ARC कॉन्फ्रेंस (अलायंस फॉर रिस्पॉन्सिबल सिटिजनशिप कॉन्फ्रेंस) के लिए निमंत्रण मिला था। यह कॉन्फ्रेंस जून 2026 में होने वाली है, जिसका मकसद कंजर्वेटिव्स आवाजों को एक साथ लाना है। इस कॉन्फ्रेंस की सलाहकार समिति में जॉर्डन पीटरसन, डगलस मरे, विवेक रामास्वामी जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं। एक हिंदू होने के नाते, इस तरह के बड़े सम्मेलन में आमंत्रित होने वाली मैं पहली व्यक्ति थी, इसलिए मैं इसमें शामिल होने के लिए बहुत उत्साहित थी। लेकिन, मैंने अंत में इस निमंत्रण को ठुकराने का फैसला किया। मैंने ऑर्गनाइजर को जो जवाब भेजा, उसकी एक कॉपी नीचे हैं।

प्रिय ऑर्गनाइजर्स,

सबसे पहले, मैं आपको इस निमंत्रण के लिए दिल से धन्यवाद देना चाहती हूँ। मुझे अच्छी तरह से पता है कि आपकी इस इज्जतदार मीटिंग में, हिंदू कंजर्वेटिव का स्वागत शायद ही कभी होता है। इसलिए, मेरे लिए यह एक बहुत बड़ा सम्मान होगा कि मैं पहले हिंदुओं में से हूँ, जो यहाँ आकर अपने समुदाय के सामने मौजूद खतरों, हमारे साझे दुश्मनों और सभ्यता के दुश्मनों से लड़ने के लिए एक साथ आने पर खुलकर बात कर पाती। मैं अपने यहूदी दोस्त को भी धन्यवाद देना चाहती हूँ, जिसने मेरा नाम सुझाया। उनका मानना था (शायद अब भी) कि कोई भी कंजर्वेटिव गठबंधन हिंदुओं के बिना उतना ही अधूरा है, जितना यहूदियों के बिना। क्योंकि हम दोनों समुदाय धार्मिक कारणों से अत्याचार और दुश्मनी का सामना कर रहे हैं।

जब मेरे यहूदी दोस्त और मैंने ARC (द अलायंस फॉर रिस्पॉन्सिबल सिटिजनशिप) के बारे में बात की और उसने इनवाइट के लिए मेरा नाम रिकमेंड किया, तो मुझे थोड़ा शक हुआ।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अमेरिका में होने वाले कंजर्वेटिव कॉन्फ्रेंस (रूढ़िवादी सम्मेलन) मुख्य रूप से क्रिश्चियन रिवाइवल (ईसाई पुनरुत्थान) पर केंद्रित होते हैं। मैं निश्चित रूप से इसकी आलोचना नहीं करूँगी। हर समुदाय को अपनी संस्कृति, धर्म और सभ्यता को फिर से खड़ा करने का पूरा अधिकार है। लेकिन एक हिंदू होने के नाते, मैं इस बात को लेकर निश्चित नहीं थी कि ऐसे कॉन्फ्रेंस में मेरी भूमिका या मेरा रोल क्या होगा।

मेरे दोस्त ने मुझे याद दिलाया कि मैं हमेशा से कहती आई हूँ कि हिंदू अपनी सभ्यता की लड़ाई अकेले लड़ रहे हैं। मैं लंबे समय से मानती रही हूँ कि अगर हिंदुओं को जीत मिलती है, तो उसका जश्न हमें अकेले मनाना होगा और अगर हार मिलती है तो उसका बोझ भी हमें ही उठाना होगा। मैंने उनसे जॉर्डन पीटरसन के शर्मनाक तरीके से हिंदू देवी (माँ काली) के अपमान और डगलस मरे द्वारा भारत के औपनिवेशीकरण का गलत तरीके से बचाव करने का भी जिक्र किया। मैंने पूछा था कि ऐसे लोगों के साथ मेरी क्या बात कॉमन हो सकती है।

हमेशा से सकारात्मक सोच रखने वाले मेरे दोस्त ने कहा कि अब दुनिया ऐसी नहीं रही, जहाँ अत्याचार झेलने वाले समुदाय बिना सहयोगियों के अकेल बच सकें। उन्होंने कहा कि शायद ARC कॉन्फ्रेंस आम खतरों और दुश्मनों के खिलाफ सहयोगी ढूँढने का एक बेहतरीन मौका हो सकता है।

असल में, मेरा यह भी मानना ​​है कि आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम एक तरह का ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ बनाएँ। यानी, अपनी धार्मिक आस्थाओं में अंतर होने के बावजूद, हिंदू, ईसाई और यहूदी एक साथ आकर सभ्यता के साझे खतरों का सामना करें। हालाँकि, यह बात हमेशा मेरी समझ से बाहर है कि यह गठबंधन कैसा दिखेगा, क्योंकि हिंदू और ईसाइयों के बीच के धार्मिक मतभेद इतने गहरे हैं कि उन्हें दूर करना बहुत मुश्किल है।

जब राम माधव ने जुलाई 2024 में ‘नेशनल कंजर्वेटिज़्म कॉन्फ्रेंस’ में भाषण दिया तो उन्होंने वहाँ एकजुटता दिखाई। राम माधव ने कहा था कि ग्लोबल लेफ्ट के खिलाफ क्रिश्चियन कंजर्वेटिव (ईसाई रूढ़िवादियों) की लड़ाई में एक अरब भारतीय उनके साथ कँधे से कँधा मिलाकर खड़े रहेंगे। राम माधव ने यहाँ तक कहा था, “इस लड़ाई में हम सबसे आगे रह सकते हैं।” इतनी मदद की पेशकश (ऑलिव ब्राँच) के बावजूद, क्रिश्चियन कंजर्वेटिव (ईसाई रूढ़िवादियों) ने ही उन्हें X ( पहले ट्विटर) पर उनके हिंदू धर्म के कारण अपमानित किया, मजाक उड़ाया और गालियाँ दीं।

मुझे पता था कि अगर मैं ARC कॉन्फ्रेंस में गई होती तो मेरे साथ भी वैसा ही अपमानजनक व्यवहार हो सकता था। लेकिन इस बात से मुझे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ऑनलाइन नफरत तो हर उस व्यक्ति को झेलनी पड़ती है जो वामपंथी विचारों का नहीं होता, चाहे वह कहीं का भी हो। इन सब कड़वी सच्चाइयों के बावजूद, मैंने सोचा कि ARC कॉन्फ्रेंस मेरे समुदाय के लिए फायदेमंद हो सकता है। क्योंकि, राम माधव के खिलाफ जो नस्लीय हमले हुए थे, वह ज्यादातर ऐसे लोगों की तरफ से थे जिन्हें मामूली मानकर खारिज किया जा सकता है। मुझे लगा कि ये ऐसे रैंडम सोशल मीडिया अकाउंट्स हैं जिनमें नीति या गंभीर चर्चा को प्रभावित करने की ताकत नहीं है।

सोशल मीडिया पर जो नस्लीय बातें हो रही थीं, उनका नीतियों या बातचीत के नियमों पर कोई असर नहीं पड़ा, इस बात को थोड़ा और बल तब मिला जब डोनाल्ड ट्रम्प ने श्रीराम कृष्णन को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर व्हाइट हाउस का सीनियर पॉलिसी एडवाइजर चुना। इसके बाद, जब MAGA समर्थकों ने श्रीराम कृष्णन के खिलाफ बहुत सारे नस्लीय दुर्व्यवहार वाले मैसेज छोड़े, तो एलन मस्क, डेविड सैक्स और ऐसे ही अन्य लोगों ने उनका खुलकर बचाव किया।

तभी मैंने सोचा कि शायद मैं बहुत ज्यादा निराशावादी हो रही हूँ। हो सकता है कि हम एक साझा, सीमित सहमति पर पहुँच सकें और मेरे समुदाय को इस तरह के गठबंधन से फायदा मिल सके। यहाँ तक कि बढ़ते हुए नस्लीय हमलों और टिप्पणियों के बावजूद, मुझे लगा कि यह सम्मेलन मुझे इस भेदभाव को दूर करने का मौका देगा।

श्रीराम कृष्णन के मामले में जो विरोध या नाराजगी थोड़ी-बहुत दिखाई दी थी, वह पूरी तरह से गायब थी जब डोनाल्ड ट्रम्प की H1B वीजा नीतियों पर बहस छिड़ने के बाद भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। दरअसल, MAGA आंदोलन या एंटी-वोक आंदोलन के जो भी बड़े बुद्धिजीवी नेता थे, वे या तो अपनी चुप्पी के जरिए उन टिप्पणियों से सहमत दिखे या फिर वे विरोध में अपनी आवाज उठाने से बहुत डरे हुए लगे।

मैंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर समय हिंदुओं के अधिकारों की वकालत करने और धर्म के नाम पर हिंदुओं के खिलाफ होने वाले नफरती अपराधों का हिसाब रखने में बिताया है। इसलिए, मैं उन हिंदू-विरोधी टिप्पणियों को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी, जो किसी मामूली व्हाइट सुप्रीमेसिस्ट (श्वेत श्रेष्ठतावादी) ने नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने खुद की थीं।

जब जेडी वेंस ने अमरीका को बताया कि उन्हें उम्मीद है कि उनकी पत्नी ऊषा वेंस ईसाई धर्म अपना लेंगी, तो उन्होंने एक तरह से एक अरब से ज्यादा हिंदुओं को यह संदेश दिया कि उनका धर्म (हिंदू धर्म) काफी अच्छा नहीं है। इस बात से उनके समर्थकों द्वारा की गई हिंदू-विरोधी टिप्पणियों को मंजूरी मिल गई, जिसमें उन्होंने हिंदू धर्म को ‘झूठा धर्म’ कहा था और हमारे देवी-देवताओं को राक्षस बताया था।

अब, मैं यह पक्के तौर पर नहीं कह सकती कि जेडी वेंस सच में क्या मानते हैं, लेकिन अगर यह उनकी सच्ची राय नहीं थी, तो यह बात साफ थी कि कम से कम वह कट्टरपंथी लोगों को नाराज करने से बहुत डरे हुए थे। एक एथनिक इंडियन और अभ्यास करने वाली हिंदू महिला से शादी करने के बावजूद, वेंस ने दिवाली पर हिंदुओं को शुभकामनाएँ देने से परहेज किया (जो साफ तौर पर सोच-समझकर लिया गया फैसला था)। बल्कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह उम्मीद जताई कि उनकी पत्नी ईसाई मजहब अपना लेंगी। अगर और कुछ नहीं, तो जेडी वेंस का यह बयान यह साबित करता है कि अब अमेरिका में नस्लवादी कट्टरपंथी लोग ही मुख्यधारा यानि मेनस्ट्रीम बन गए हैं और वे ही तय कर रहे हैं कि नेता कैसा व्यवहार करें और वे किसका समर्थन करें।

इस बात की तुलना भारत और भारतीय लीडरशिप से करनी चाहिए, जिन्हें हिंदू राष्ट्रवादी माना जाता है। भारत में हिंदुओं की एक बड़ी आबादी मानती है कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र होना चाहिए। लेकिन यह सोच भी यहाँ के लीडरशिप को ईसाई या मुस्लिम समुदाय तक पहुँचने और उनसे बात करने से नहीं रोकती है, क्योंकि मौजूदा लीडरशिप और उनकी विचारधारा की नींव यानी RSS मानती है कि इस जमीन पर पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति, चाहे उसके धार्मिक विचार अलग हों, उसे एक भाई की तरह देखा जाना चाहिए।

असल में, USCIRF अक्सर गलत डेटा का हवाला देकर यह दावा करता है कि भारत में ईसाइयों को सताया जा रहा है। लेकिन हकीकत में सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। ऐसे सैकड़ों मामले और हजारों हिंदू हैं, जिन्हें उनके अपने ही देश में ईसाइयों द्वारा सताया गया है। इन मामलों को हिंदूफोबिया ट्रैकर पर बारीकी से दर्ज किया गया है, जो हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का एक डेटाबेस है। इसके बावजूद, भारत सरकार, जिसे अमेरिका के कुछ लोग हिंदू राष्ट्रवादी बताकर बदनाम करते हैं, अल्पसंख्यकों के डर को दूर करने का ईमानदारी से प्रयास करती है।

सच कहूँ तो, मैं उन हिंदुओं में से हूँ जो मानते हैं कि भारत हिंदुओं की सभ्यता, सांस्कृतिक और धार्मिक जमीन है। और अगर मैं यह कहती हूँ, तो मुझे यह भी रिकॉर्ड में रखना होगा कि एक ऐसा व्यक्ति होने के नाते जो भारत को हिंदू भूमि मानता है, मुझे इस बात से कोई ऐतराज नहीं है कि ईसाई लोग अमेरिका को ईसाई देश समझते हैं। हालाँकि, हिंदुओं के लिए, भारत का हिंदू देश होने का मतलब ईसाइयों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि हिंदुओं के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों को बचाना है। भारत ही वह अकेली धरती है जिसने दुनिया भर से सताए गए समुदायों ‘यहूदियों से लेकर पारसियों, ईसाइयों और यहाँ तक कि मुस्लिमों तक’ सबको स्वीकार किया है और उनसे कभी भी अपना मजहब छोड़ने की उम्मीद नहीं की।

ईसाइयों के खिलाफ जो भी विरोध होता है, वह हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन तक ही सीमित है। दूसरे शब्दों में, हिंदू ईसाइयों का विरोध तभी करते हैं जब वे जबरदस्ती हिंदुओं को उनके धर्म से अलग करने और उन पर अपने धार्मिक विश्वास थोपने की कोशिश करते हैं। यह विरोध धार्मिक मतभेदों की वजह से नहीं है। असल में, हिंदू शायद दुनिया के एकमात्र ऐसे लोग हैं जो मतभेदों ‘धार्मिक हों या कोई और’ को एक साथ रहने का हिस्सा मानते हैं।

जहाँ एक तरफ हिंदुओं के सिद्धांत साफ हैं, वहीं अब ईसाइयों को यह तय करना होगा कि उनका ‘ईसाई राष्ट्र’ कैसा दिखेगा। इस बारे में राय देना मेरा काम नहीं है। लेकिन अभी यह साफ दिखाई देता है कि अमेरिका में कट्टरपंथी नस्लवादी लोग ही लीडरशिप को कंट्रोल कर रहे हैं। वे कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए अपने परिवार के लोगों की भी बलि चढ़ा देंगे।

श्रीराम कृष्णन पर हुए नस्लीय हमलों और उनकी जातीय-धार्मिक पहचान की निंदा करने के बाद एलन मस्क और अन्य लोगों से एक वैश्विक गैर-वामपंथी गठबंधन की जो थोड़ी-बहुत उम्मीद बची थी, वह अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

जब खुद लीडरशिप ही एकमत या डरी हुई दिखे, तो ऐसे इवेंट में जाने से कोई फायदा नहीं होगा।

जो कुछ हाल ही में हुआ, उसका बचाव करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि कैथोलिक जेडी वेंस के लिए यह उम्मीद करना स्वाभाविक है कि उनकी पत्नी ईसाई मजहब अपना लें। क्योंकि ईसाइयों का मानना है कि यही मुक्ति का एकमात्र रास्ता है। और मुझे ऊषा वेंस की तरफ से बोलने का कोई अधिकार नहीं है। सच कहूँ तो इससे मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है कि ऊषा वेंस क्या फैसला करती हैं। मगर, संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति जो कुछ भी एक अरब लोगों के धर्म (हिंदू धर्म) के बारे में कहते हैं, वह बहुत मायने रखता है। क्योंकि उनका बयान यह तय करता है कि पश्चिमी दुनिया या कम से कम उसका एक बड़ा हिस्सा, उस धर्म को मानने वालों के साथ कैसे पेश आता है।

जब जेडी वेंस ने कहा कि उनकी पत्नी ज्यादा धार्मिक नहीं हैं तो यह बात ऊषा वेंस के पहले के बयान के खिलाफ थी, जिसमें ऊषा वेंस ने खुद को एक धार्मिक हिंदू बताया था। ऐसा कहकर, उन्होंने एक तरह से हिंदू धर्म को पूरी तरह से नकार दिया। उन्होंने मूल रूप से यह कहा कि ऊषा वेंस ‘धर्महीन’ हैं, इसलिए नहीं कि वह नास्तिक हैं, बल्कि इसलिए कि वह कैथोलिक धर्म को नहीं मानती हैं। जब उन्होंने यह माना कि उनके बच्चों को कैथोलिक तरीके से पाला जा रहा है, जबकि कुछ ही महीने पहले उन्होंने कहा था कि उनके बच्चे हिंदू रीति-रिवाजों के साथ दोनों धर्मों को मानते हैं, तो उन्होंने हिंदू धर्म की वैधता को ही खत्म कर दिया। यह सब उन्होंने शायद इसलिए किया ताकि वह अपने कट्टरपंथी वोट बैंक को खुश कर सकें।

यहाँ मैं अपनी बात फिर दोहराना चाहूँगी: मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ऊषा वेंस या उनके बच्चे किस धर्म को मानते हैं। उनकी शादी कोई ग्लोबल चिंता की बात नहीं है।

लेकिन, अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय यह है कि उनके बयानों का हिंदुओं के लिए क्या मतलब है, और यह कैसे उनके अमानवीकरण और उनके धर्म को गलत साबित करेंगे। वेंस का बयान सिर्फ उनकी पत्नी के बारे में नहीं था। इसका सीधा मतलब यह था कि हिंदू धर्म नीचा है और इसने हिंदू संस्कृति को मिटाने और स्टीरियोटाइपिंग (रूढ़िवादिता) को और बढ़ाया है।

यह नस्लीय और धार्मिक नफरत का ही नतीजा है कि हिंदुओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी धार्मिक पहचान छोड़ दें और अपनी सांस्कृतिक पहचान को कम कर दें ताकि वे ‘मिल-जुल’ सकें। जबकि हिंदू न तो धर्म परिवर्तन करवाते हैं और न ही दूसरों पर अपने धार्मिक रीति-रिवाज थोपते हैं, वे किसी भी समाज के अच्छे सदस्य होते हैं। धार्मिक पहचान छोड़ने का दबाव इतना ज्यादा है कि अमेरिका में ज्यादातर हिंदू खुद को मुश्किल से ही धार्मिक बताते हैं। वे दावा करते हैं कि वे ‘आध्यात्मिक’ हैं या विवेक रामास्वामी की तरह यह दावा करते हैं कि ईसाई मूल्य और हिंदू मूल्य एक जैसे ही हैं।

दरअसल, भेदभाव और अपमान से बचने के लिए, जिन हिंदुओं के पास राजनीतिक ताकत है, उन्हें भी ईसाई दबदबे वालों के सामने झुकना पड़ता है। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि अपनी विशेष हिंदू पहचान छोड़कर यह दावा कर सकें कि वे ईसाई नहीं, तो कम से कम ईसाइयों के समर्थक तो हैं ही।

जाहिर है, मैं ऐसे हिंदुओं को भी उतना ही गलत मानती हूँ जितना कि मैं ईसाई कट्टरपंथियों को जिम्मेदार ठहराती हूँ। हिंदुओं की व्हाइट सुप्रीमेसिस्ट लोगों से घुलने-मिलने और थोड़ी-सी स्वीकृति पाने की चाहत, बाकी हिंदुओं के अपमान में उतना ही योगदान देती है। लेकिन जब संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति खुद अपनी पत्नी के धर्म का बचाव करने के लिए खड़े नहीं हो सकते, तो मुझे बाकी ईसाई कंजर्वेटिव से बहुत कम उम्मीद है, भले ही वे आम दुश्मनों से लड़ने के लिए एक छोटा-मोटा गठबंधन क्यों न बना लें।

ईमानदारी से कहूँ तो, मेरी दिलचस्पी सिर्फ हिंदुओं को सुरक्षित रखने और उनका बचाव करने में है। अगर कोई भी बड़ा गैर-वामपंथी वैश्विक गठबंधन इस मकसद को पूरा नहीं करता, तो मेरे लिए उसका कोई मतलब नहीं है। मुझे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं है कि वामपंथी या ईसाई कंजर्वेटिव मुझे सही मानते हैं या नहीं।

मेरा मानना है कि वामपंथ और शायद इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ एक वैश्विक गठबंधन मेरे समुदाय के लिए फायदेमंद होगा। लेकिन शर्त यह है कि ऐसा कोई भी गठबंधन बराबरी के आधार पर होना चाहिए। मैं न कभी ऐसी थी और न कभी होऊँगी, कि किसी गठबंधन के लिए मैं अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को कम कर दूँ और न ही मैं कभी उन लोगों के आगे झुकूँगी जो खुद को हमसे श्रेष्ठ समझते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि यह पत्र मेरे समर्थकों और पाठकों के बीच बहस छेड़ देगा। वे पूछेंगे, “क्या मुझे यह सब वहाँ कॉन्फ्रेंस में जाकर नहीं कहना चाहिए था?”, “वहाँ न जाकर, दूर से अपमान झेलने से बेहतर नहीं था कि मैं वहाँ मौजूद रहती?”, “क्या मेरे इस पत्र से कुछ बदलेगा? और अगर नहीं बदलेगा, तो क्यों न मैं वहाँ जाती और एक मौका लेती। भले ही वह बहुत छोटा क्यों न होता, बाकी कंजर्वेटिव लोगों को यह समझाने का कि हिंदू सहयोगी होने के लिए बने हैं।”

मुझे अब पहले से कहीं ज्यादा डर है कि एक वैश्विक गैर-वामपंथी गठबंधन शायद बन ही न पाए। धार्मिक रूप से ईसाई हमेशा हिंदुओं को उनके धर्म से दूर करने की कोशिश करेंगे। भारत में, ऐसे हजारों मामले हैं जहाँ ईसाइयों ने हिंदुओं पर जुल्म किया है, उन्हें जबरदस्ती या धमकाकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए मजबूर किया है। राजनीतिक रूप से, ‘राइट’ (दक्षिणपंथी) हमेशा अपने स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगा, जबकि वामपंथ को वैश्विक समर्थन मिलता है। हिंदू अपने लोगों के धर्म और अपने पूर्वजों की जमीन की धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक सुरक्षा पर ध्यान देना चाहेंगे। इसके विपरीत, ईसाई लोग अपनी संस्कृति और मजहब को फिर से खड़ा करने के अलावा, धार्मिक रूप से हिंदुओं और उनके धर्म को मिटाने में भी लगे रहेंगे।

मुझे यकीन है कि ARC कॉन्फ्रेंस या दूसरे कंजर्वेटिव कॉन्फ्रेंस को कई और ऐसे हिंदू मिल जाएँगे जो झुकने को तैयार होंगे और जो अपने ही अत्याचार और अपमान के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराएँगे। मैं उनमें से एक नहीं बनना चाहती।

मेरा मानना है कि इस वक्त क्रिश्चियन कंजर्वेटिव्स को ही अपना घर ठीक करने की जरूरत है, क्योंकि फिलहाल उनका दुनिया को दिया गया संदेश साफ है कि क्रिश्चियन कंजर्वेटिव्स (ईसाई रूढ़िवादिता) या तो कट्टरपंथ की गुलाम है या फिर कट्टरपंथ से अलग नहीं है। जो नस्लवाद और पुरानी धार्मिक मान्यताओं में गहराई तक समाई हुई है जो हिंदुओं के अस्तित्व से ही नफरत करती है।

मैं उम्मीद करती हूँ कि भविष्य में एक ऐसा समय आएगा जब क्रिश्चियन कंजर्वेटिव्स (ईसाई रूढ़िवादी) यह महसूस करेंगे कि जिस समय वे ‘काफिरों’ को धर्म बदलने में अपनी ताकत लगा रहे थे, उसी समय उनके अपने देश और उनकी पहचान को आम दुश्मनों द्वारा चुराया जा रहा था। मैं उम्मीद करती हूँ कि एक दिन, एक आम गठबंधन बनाने के लिए हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को कम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जब तक ऐसा नहीं होता, मुझे यह कॉन्फ्रेंस अटेंड करने में असहजता महसूस होगी, हालाँकि मैं दिए गए निमंत्रण के लिए दिल से आभारी हूँ।

मैं जाहिर तौर पर जेडी वेंस की हिंदू-विरोधी सोच के लिए ARC कॉन्फ्रेंस को दोष नहीं दे रही हूँ। लेकिन कंजर्वेटिव्स की तरफ से किसी भी निंदा के न होने और इसके उलट बड़े पैमाने पर सहमति न होने के कारण, मेरा मानना है कि यह क्रिश्चियन कंजर्वेटिव (ईसाई रूढ़िवादी) सभा ऐसी नहीं है जहाँ मुझे जाने की जरूरत महसूस हो।

मालीवाल का दावा- केजरीवाल ने पंजाब में बनाया शीशमहल 2.0, AAP प्रमुख के समर्थन में आया Alt News का जुबैर: MP ने कहा- बिना रिसर्च पोस्ट किया, माफी माँगे तथाकथित फैक्ट चेकर

राजनीति और सोशल मीडिया का रिश्ता हमेशा दिलचस्प रहा है। यहाँ बहसें मिनटों में ट्रेंड बन जाती हैं। कुछ ऐसा ही इन दिनों देखने को मिला राज्यसभा सांसद स्वाती मालिवाल और Alt News के सह-संस्थापक मुहम्मद जुबैर के बीच, जब दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कथित ‘शीशमहल 2.0’ को लेकर दोनों के बीच X (पहले ट्विटर) पर जुबानी जंग छिड़ गई। यह विवाद दिल्ली से लेकर पंजाब और चंडीगढ़ की सियासत तक चर्चा का विषय बन गया है।

‘दिल्ली से भी शानदार शीशमहल 2.0’: स्वाति मालीवाल

विवाद की शुरुआत 31 अक्टूबर को हुई, जब स्वाति मालीवाल ने दावा किया कि दिल्ली का ‘शीशमहल’ खाली करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अब पंजाब में ‘दिल्ली से भी शानदार शीशमहल’ तैयार करवा लिया है। मालीवाल ने आरोप लगाया कि चंडीगढ़ के सेक्टर-2 में मुख्यमंत्री कोटे की 2 एकड़ जमीन पर बनी एक आलीशान 7-स्टार सरकारी कोठी केजरीवाल को मिल गई है।

स्वाती मालीवाल ने सीधे तौर पर पंजाब सरकार पर एक व्यक्ति (केजरीवाल) की सेवा में लगने का आरोप लगाया। स्वाती मालीवाल ने यह भी कहा कि केजरीवाल अंबाला जाने के लिए इसी घर के सामने से सरकारी हेलीकॉप्टर में बैठे और फिर पंजाब सरकार का प्राइवेट जेट उन्हें पार्टी के काम से गुजरात ले गया। मालीवाल के इन दावों ने तुरंत ही सोशल मीडिया पर एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया।

दावे झूठे और तस्वीर पुरानी: जुबैर का पलटवार

वहीं, केजरीवाल के बचाव में उतरे खुद को ‘फैक्ट चेकर’ बताने वाले मोहम्मद जुबैर। जुबैर ने मालीवाल के दावों को चुनौती देते हुए कहा कि जिस बिल्डिंग का स्क्रीनशॉट दिखाया जा रहा है, वह हरियाणा के कृषि मंत्री के दफ्तर के बगल में है।

प्रोपेगेंडा फैलाने वाले फैक्ट चेकर जुबैर ने गूगल इमेजेज़ का हवाला देते हुए कहा कि यह बिल्डिंग अभी नहीं बनी है, बल्कि 2013 से 2024 तक यानी सालों से वहीं मौजूद है। इसके साथ ही, जुबैर ने मालीवाल के 2 एकड़ जमीन के आँकड़े पर भी सवाल उठाकर कहा कि बिल्डिंग के सामने की खाली जमीन अधिकतम 20,000 वर्ग फुट हो सकती है, न कि 2 एकड़।

‘झूठा प्रचार’ और ‘सच का पर्दाफाश’: मालीवाल का जवाबी हमला

फैक्ट चेकर जुबैर के पलटवार के बाद, 1 नवंबर 2025 को स्वाति मालीवाल ने जुबैर को ‘थाकथित फैक्ट चेकर’ कहते हुए जवाबी हमला किया और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के आर्टिक्ल की एक तस्वीर साझा की, जिसमें केजरीवाल के शीशमहल के बारे में लिखा हुआ है।

स्वाती मालीवाल ने लिखा, “अरविंद केजरीवाल जी के चंडीगढ़ के शीश महल पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की ये रिपोर्ट पढ़ें। कोठी को केजरीवाल जी के लिए तैयार करने के लिए अक्टूबर महीने में युद्ध स्तर पर सरकार ने काम करवाया, केजरीवाल जी इस घर में रहते भी हैं और मीटिंग भी लेते हैं। CM का कैंप ऑफिस कोठी नंबर 43 में है। ये आलीशान कोठी नंबर 50 केजरीवाल जी के लिए है।” इन दावों के साथ ही, मालीवाल ने केजरीवाल को खुली चुनौती दी और कहा, “हिम्मत है तो ये बताओ इस शीश महल में कितना खर्च हुआ है। इस घर को एक दिन के लिए जनता और मीडिया के लिए खोलो।”

मालीवाल ने जुबैर पर ओवरटाइम काम करके यह साबित करने की कोशिश करने का आरोप लगाया कि केजरीवाल द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा आलीशान बंगला ‘कोई रैंडम बिल्डिंग’ है। स्वाती मालीवाल ने जुबैर के ट्वीट को ‘झूठा प्रचार’ यानि फेक प्रोपेगेंडा करार दिया और उसे अपना ट्वीट डिलीट करने और बिना रिसर्च के पोस्ट करने के लिए माफी माँगने को कहा।

स्वाती मालिवाल के और आरोप

स्वाती मालिवाल यहीं नहीं रुकीं। स्वाती मालिवाल यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने एक और ट्वीट करते हुए कहा कि चंडीगढ़ में सिर्फ केजरीवाल ही नहीं, बल्कि मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन के लिए भी आलीशान सरकारी बंगले तैयार किए गए हैं। स्वाती मालीवाल ने ट्वीट कर कहा, “चंडीगढ़ में शीशमहल सिर्फ केजरीवाल जी का नहीं है। मनीष सिसोदिया का बंगला नंबर 960, सेक्टर 39 और सत्येंद्र जैन का बंगला नंबर 926, सेक्टर 39 है। ये सब वही आलीशान कोठियाँ हैं जो अब दिल्ली के नेताओं को पंजाब सरकार ने रहने के लिए दी हैं। सरकारी संपत्ति पर इस तरह कब्जा अपराध है।”

बिना विधायक कैसे मिला केजरीवाल को ‘शीशमहल 2.0’: स्वाती मालीवाल

मालीवाल ने अपने एक बयान में पूछा कि केजरीवाल को यह आलीशान ‘शीशमहल 2.0’ किस हैसियत से दिया गया है, क्योंकि वह दिल्ली में विधायक भी नहीं हैं। स्वाती मालीवाल ने मुख्यमंत्री के कैंप ऑफिस बताए जाने के दावे को झूठ बताते हुए सवाल किया, “अगर यह कैंप ऑफिस है, तो यह जनता के लिए क्यों नहीं खुलता? यह अंदर से बंद क्यों रहता है? और पिछले चार सालों में यहाँ कितनी बैठकें हुई हैं?”

अंत में स्वाती मालीवाल ने इस घर पर हुए खर्च का खुलासा करने और इसे एक दिन के लिए जनता और मीडिया के लिए खोलने की चुनौती दी और दोहराया कि यह आलीशान बंगला अब पंजाब के सुपर सीएम अरविंद केजरीवाल का है।

आखिर क्या है ‘शीशमहल’ विवाद?

‘शीशमहल विवाद’ की जड़ें असल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दिल्ली स्थित सरकारी आवास (6, फ्लैग स्टाफ रोड) के रेनोवेशन पर हुए भारी-भरकम खर्च से जुड़ी हैं। विपक्ष ने उस समय यह गंभीर आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार ने इस सरकारी आवास के सौंदर्यीकरण और रेनोवेशन पर 45 करोड़ रुपए से भी अधिक की राशि खर्च की, जिसके चलते इस आवास को तंज कसते हुए ‘शीशमहल’ का नाम दिया गया।

यह विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। दिल्ली का वह पुराना आवास खाली होने के बाद, अब पंजाब सरकार द्वारा केजरीवाल को चंडीगढ़ में एक और आलीशान सरकारी बंगला दिए जाने के आरोपों ने एक नए विवाद को जन्म दिया है। राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने इस नए बंगले को ‘शीशमहल 2.0’ का नाम दिया है, और यहीं से जुबानी जंग शुरू हुई है। यह पूरा मामला सिर्फ एक बंगले का नहीं है, बल्कि यह सरकारी धन के कथित दुरुपयोग और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के मानकों पर बड़े सवाल खड़े करता है।

निर्जन रेगिस्तान में आस्था, लोक-संस्कृति और व्यापार का संगम: पढ़िए राजस्थान के पुष्कर मेले की पूरी कहानी, भगवान ब्रह्मा से जुड़ा है जिसका इतिहास

राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पुष्कर शहर साल के ग्यारह महीने शांत और सूना रहता है। लेकिन जैसे ही कार्तिक महीने की पूर्णिमा आती है, यह छोटा-सा कस्बा दुनिया के सबसे बड़े पशु मेले के कारण जीवंत हो उठता है। इस साल भी यह प्रसिद्ध मेला 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2025 तक आयोजित हो रहा है, जिसे पुष्कर मेले के नाम से जाना जाता है। यह मेला धार्मिक महत्व, पशुओं के व्यापार, रंगा-रंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पर्यटन का एक अद्भुत संगम है। गुजरात के पड़ोसी राज्य होने के कारण, गुजराती पर्यटक भी बड़ी संख्या में यहाँ पहुँचकर इस पशु मेले का आनंद लेते हैं।

वह इलाका जो साल भर वीरान/खाली रहता है, कार्तिक पूर्णिमा के नजदीक आते ही रंग-बिरंगे तंबुओं, ऊँटों की घंटियों की आवाज और हजारों पर्यटकों की भीड़ से गुलजार हो जाता है। पुष्कर का यह मेला दुनिया का सबसे बड़ा पशु मेला है, जहाँ ऊँटों की कई बेहतरीन नस्लें देखने को मिलती हैं। पशु व्यापार के साथ-साथ, इस मेले का महत्व राजस्थान की लोक-संस्कृति में भी बहुत ऊँचा माना जाता है। यहाँ राजस्थान की समृद्ध विरासत का शानदार प्रदर्शन होता है।

पुष्कर सरोवर: ‘पंच सरोवर’ में से एक

हिंदू धर्म में पुष्कर सरोवर को एक अत्यंत विशिष्ट स्थान प्राप्त है, इसे पाँच पवित्र सरोवरों यानी ‘पंच सरोवर‘ में से एक माना जाता है। ये पाँच पवित्र सरोवर हैं- मानसरोवर (तिब्बत), गुजरात के बिंदु सरोवर (सिद्धपुर), नारायण सरोवर (कच्छ), पंपा सरोवर (कर्नाटक) और राजस्थान का पुष्कर सरोवर। इसी धार्मिक महत्व के कारण पुष्कर को ‘तीर्थराज’ भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ कार्तिक पूर्णिमा के दिन इसके घाटों पर एक बार स्नान करने से व्यक्ति को हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है।

यह विशाल और रंगा-रंग मेला मुख्य रूप से इसी पवित्र झील के किनारे और उससे सटे हुए 85 हेक्टेयर के एक विशाल मैदान में आयोजित होता है। यहाँ जब ठंडी रेगिस्तानी हवा चलती है, तो हरे-लाल मंदिरों और रंगीन तंबुओं के बीच एक जादुई और मनमोहक माहौल बन जाता है। मेले में आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु एक ही जगह पर कई तरह के अनुभव लेते हैं। वे न केवल सरोवर में स्नान करके धार्मिक अनुष्ठान और मंदिरों के दर्शन करते हैं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े ऊँट मेले का रोमांच भी महसूस करते हैं। यह स्थान आस्था, व्यापार और संस्कृति का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

भगवान ब्रह्मा और विश्वामित्र से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

पुष्कर नाम की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों से हुई है। ‘पुष्प’ (कमल) और ‘कर’ (हाथ)। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान का गहरा संबंध भगवान ब्रह्मा से है। पद्म पुराण में वर्णित है कि जब वज्रनाभ नामक राक्षस देवताओं के बच्चों को मारकर आतंक फैला रहा था, तब उसका वध करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने हाथ से एक कमल फेंका। उस कमल की तीन पंखुड़ियाँ धरती पर गिरीं, जिनसे ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठा नाम के तीन पुष्कर सरोवरों का निर्माण हुआ।

इसके बाद ब्रह्मा जी ने यहाँ एक यज्ञ शुरू किया, लेकिन शुभ मुहूर्त पर उनकी पत्नी देवी सावित्री (सरस्वती) देरी से पहुँचीं। मुहूर्त चूकने से बचने के लिए, ब्रह्मा जी ने गायत्री से विवाह करके उनके साथ यज्ञ पूरा किया। इससे क्रोधित होकर, देवी सावित्री ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि उनकी पूजा केवल पुष्कर में ही होगी। यही कारण है कि दुनिया में ब्रह्मा जी का एकमात्र मुख्य मंदिर यहीं पर स्थित है, जिसका पुन:निर्माण 14वीं शताब्दी में महाराणा मोकलजी द्वारा करवाया गया था।

विश्वामित्र और पुष्कर की महत्ता

पुष्कर का इतिहास केवल ब्रह्मा जी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थान महर्षि विश्वामित्र की कथा से भी जुड़ा हुआ है। रामायण के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र ने इसी स्थान पर हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें राजर्षि से ब्रह्मर्षि का पद प्रदान किया। हालाँकि, अप्सरा मेनका ने इसी सरोवर में स्नान करके उनकी तपस्या भंग की थी। अंततः, यह भी माना जाता है कि विश्वामित्र जी ने ही यहाँ ब्रह्मा मंदिर का निर्माण करवाया था। रामायण के सर्ग 62 के 28वें श्लोक में पुष्कर की महिमा का उल्लेख मिलता है, जिसमें विश्वामित्र द्वारा यहाँ तपस्या करने की बात कही गई है। इस धार्मिक महत्व को दर्शाने वाला विश्वामित्र आश्रम भी इसी क्षेत्र में स्थित है।

पुष्कर मेले की 150 वर्ष पुरानी परंपरा

पुष्कर मेले का इतिहास 18वीं शताब्दी जितना पुराना है, जब मराठा शासन के दौरान यह व्यापार मार्गों का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था। हालाँकि, मेले को आधिकारिक पहचान ब्रिटिश शासनकाल में मिली, जब इसका पहला आधिकारिक आयोजन 1869 में किया गया था।

1900 के दशक की शुरुआत में, यहाँ के राजपूत राजाओं ने इस आयोजन में घोड़े और ऊँटों की दौड़ को शामिल करना शुरू कर दिया। स्वतंत्रता के बाद, 1950 के दशक के बाद राजस्थान सरकार ने इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों को जोड़ा, जिससे मेले का महत्व तेजी बढ़ता चला गया। इसकी वैश्विक महत्ता को देखते हुए, यूनेस्को ने 2005 में इसे ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में मान्यता दी।

भले ही पहला सरकारी मेला 1869 में आयोजित हुआ हो, लेकिन राजस्थान की लोक संस्कृति और लोक कथाओं के अनुसार, यह मेला दशकों से यहाँ तक कि सदियों से, पुष्कर के रेगिस्तान में आयोजित होता आ रहा है। यह प्राचीन परंपरा आज भी जीवंत है और हर साल इस मेले में 2 लाख से 5 लाख तक पर्यटक शामिल होते हैं।

विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला और उसका आकर्षण

पुष्कर मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ होने वाला पशु व्यापार है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा ऊँट मेला भी कहा जाता है। इस मेले में 30,000 से 50,000 तक ऊँट, घोड़े, गाय और बैल इकट्ठा होते हैं। यहाँ व्यापारी अपने ऊँटों को रंग-बिरंगे कपड़ों, घंटियों और गहनों से खूब सजाते हैं, जिनकी कीमत ₹20,000 से लेकर ₹5 लाख तक पहुँच जाती है। हालाँकि, नागौर का रामदेव पशु मेला भी भारत में प्रसिद्ध है, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक मेल के कारण पुष्कर मेला बिल्कुल अनूठा बन जाता है।

मेले में हर दिन विभिन्न प्रतियोगिताओं और आयोजनों की धूम रहती है। जहाँ पशुओं की प्रतियोगिताओं में ऊँट दौड़, सबसे सुंदर ऊँट और ऊँट दुहने की प्रतियोगिता आकर्षण का केंद्र होती हैं, वहीं मनुष्यों के लिए भी कई मजेदार खेल आयोजित किए जाते हैं। पहले दिन मांडणा प्रतियोगिता, स्कूल नृत्य और ‘चक दे राजस्थान’ फुटबॉल मैच होता है। अगले दिनों में लंगड़ी टाँग, गिल्ली डंडा, कबड्डी, मटका दौड़, सबसे लंबी मूँछ और पगड़ी बाँधने की प्रतियोगिताएँ शामिल रहती हैं। इन सबके अलावा, शाम होते ही कालबेलिया नृत्य, लोक गीत और रामायण के मंचन जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों से रातें रंगीन हो जाती हैं।

वैश्विक मंच तक पहुँची अवधी व्यंजनों की महक, UNESCO की ‘क्रिएटिव सिटीज’ सूची में शामिल हुआ लखनऊ: ‘पाक कला’ श्रेणी में मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को अपनी समृद्ध और विविध पाक कला परंपरा के लिए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की ‘क्रिएटिव सिटीज’ सूची में शामिल किया गया है। UNESCO की महानिदेशक ऑड्रे अजोले ने इस साल 58 नए शहरों को ‘रचनात्मक शहरों’ के नेटवर्क का हिस्सा बनाया, जिनमें लखनऊ को ‘पाक कला’ श्रेणी में चुना गया है।

यह घोषणा शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को उज्बेकिस्तान के समरकंद में हुई यूनेस्को की 43वीं जनरल कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘वर्ल्ड सिटीज डे 2025’ पर की गई। उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि लखनऊ की इस उपलब्धि के पीछे पर्यटन विभाग की मेहनत रही, जिसने शहर के नामांकन का प्रस्ताव तैयार कर जनवरी 2025 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को भेजा था।

मंत्रालय द्वारा जरूरी समीक्षा किए जाने के बाद भारत सरकार ने मार्च में इसे UNESCO के पास भेजा, जिसके चलते शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को लखनऊ को यह सम्मान मिला। भारत के यूनेस्को में स्थायी प्रतिनिधिमंडल ने इस उपलब्धि को देश के लिए गर्व का क्षण बताया और जानकारी दी कि ‘वर्ल्ड सिटीज डे’ के अवसर पर लखनऊ को ‘यूनेस्को क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ नामित किया गया है।

लखनऊ के स्वादिष्ट व्यंजनों को मिला वैश्विक सम्मान

यह सम्मान लखनऊ की समृद्ध अवधी पाक परंपरा, चाट, कबाब, बिरयानी और मिठाइयों जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की वैश्विक पहचान का प्रतीक है। इससे पहले भारत से केवल हैदराबाद को यह सम्मान प्राप्त था और अब लखनऊ इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल होने वाला दूसरा भारतीय शहर बन गया है।

UNESCO ने बताया कि इस सम्मान का उद्देश्य उन शहरों को प्रोत्साहित करना है जो रचनात्मकता (क्रिएटिवीटी) और संस्कृति को सतत विकास का आधार बनाते हैं। संगठन की महानिदेशक अजोले ने कहा कि रचनात्मक शहर यह साबित करते हैं कि संस्कृति और क्रिएटिव उद्योग न केवल आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देते हैं बल्कि सामाजिक सामंजस्य और स्थानीय विकास के भी सशक्त माध्यम हैं।

UNESCO का क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क (UCCN) वर्ष 2004 में शुरू किया गया था, ताकि ऐसे शहरों को जोड़ा जा सके जो संस्कृति के माध्यम से समावेशी और सतत विकास को आगे बढ़ाते हैं। यह नेटवर्क उन पहलों को प्रोत्साहित करता है जो रोजगार के अवसर बढ़ाने, सांस्कृतिक जीवन्तता बनाए रखने और सामाजिक एकता को सशक्त करने में सहायक हैं।

सीएम योगी बोले- ऐतिहासिक उपलब्धि

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। सीएम योगी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के यशस्वी मार्गदर्शन में भारत की परंपरा, संस्कृति और मूल्यों को वैश्विक पटल पर निरंतर नई पहचान और प्रतिष्ठा प्राप्त हो रही है।” उन्होंने आगे लिखा, “इस ऐतिहासिक उपलब्धि की प्रदेश वासियों को हार्दिक बधाई!”

विश्वभर के शहरों ने रचनात्मकता से बढ़ाया अपनी सांस्कृतिक पहचान का मान

लखनऊ के अलावा इस साल संगीत, डिजाइन, फिल्म, पाककला और साहित्य जैसी विभिन्न श्रेणियों में कई अन्य शहर भी शामिल किए गए हैं, जिनमें संगीत के लिए केन्या का किसुमु और अमेरिका का न्यू ऑरलियंस, डिजाइन के लिए सऊदी अरब का रियाद, पाक कला के लिए पुर्तगाल का मातोसिन्होस और इक्वाडोर का कुएनका शामिल हैं।

वहीं फिल्म के लिए मिस्र के गीजा, वास्तुकला के लिए फिनलैंड के रोवेनेमी, मीडिया कला के लिए इंडोनेशिया के मलंग और साहित्य के लिए ब्रिटेन के एबरिस्टविथ को शामिल किया गया है। अगला वार्षिक सम्मेलन वर्ष 2026 में मोरक्को के एस्सौइरा शहर में आयोजित किया जाएगा, जिसे 2019 में संगीत श्रेणी में यूनेस्को की सूची में स्थान मिला था।

मैच फिक्सिंग केस से मिली राहत तो HCA में किया करोड़ों का ‘खेल’, अब मोहम्मद अजहरुद्दीन बने तेलंगाना सरकार में मंत्री: कॉन्ग्रेस पर मुस्लिम वोटबैंक की पॉलिटिक्स का आरोप

पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान और कॉन्ग्रेस नेता मोहम्मद अजहरुद्दीन ने तेलंगाना सरकार में शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को राजभवन में एक सादे समारोह में मंत्री पद की शपथ ले ली। राज्यपाल तमलिसाई सौंदरराजन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस मौके पर मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी समेत कई बड़े नेता मौजूद थे। अजहरुद्दीन के शामिल होने से कैबिनेट की संख्या 16 हो गई है, जबकि दो पद अभी खाली हैं। तेलंगाना में कुल 18 मंत्री हो सकते हैं।

मोहम्मद अजहरुद्दीन ने शपथ ग्रहण के बाद कहा, “मैं बेहद खुश हूँ और पार्टी नेतृत्व तथा अपने समर्थकों का दिल से आभार व्यक्त करता हूँ।”

ये नियुक्ति कॉन्ग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक चाल मानी जा रही है, खासकर जुबली हिल्स विधानसभा उपचुनाव से पहले। यहाँ एक लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, जो चुनाव का फैसला कर सकते हैं। लेकिन अजहरुद्दीन का ये नया रोल उनके पुराने विवादों को फिर से सुर्खियों में ला रहा है। मैच फिक्सिंग से लेकर देशद्रोह के आरोप तक, उनका सफर हमेशा से विवादों से भरा रहा है। क्या ये कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण है?

अजहरुद्दीन का राजनीतिक सफर ज्यादा पुराना नहीं है, लेकिन क्रिकेट के मैदान से मैदान-ए-राजनीति तक उनका रुख तेज रहा। 2009 में उन्होंने कॉन्ग्रेस जॉइन की और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा। वो वहाँ से सांसद भी बने। मुरादाबाद मुस्लिम बहुल इलाका है, और अजहरुद्दीन की लोकप्रियता ने कॉन्ग्रेस को वहाँ मजबूत वोटबैंक दिया। लेकिन 2014 में राजस्थान के टोंक-सवाई माधोपुर से चुनाव लड़ा, तो हार गए। फिर 2018 में तेलंगाना कॉन्ग्रेस के वर्किंग प्रेसिडेंट बने।

साल 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में जुबली हिल्स सीट से लड़े, लेकिन बीआरएस के उम्मीदवार से हार गए। अब उसी सीट पर उपचुनाव है, जो बीआरएस विधायक मगंती गोपीनाथ की जून में दिल का दौरा से मौत के बाद जरूरी हो गया।

कॉन्ग्रेस ने अजहरुद्दीन को अगस्त में राज्यपाल कोटे से विधान परिषद (एमएलसी) नामित किया, लेकिन राज्यपाल ने अभी मँजूरी नहीं दी। फिर भी उपचुनाव से पहले ही उन्हें मंत्री बना दिया गया। कॉन्ग्रेस सूत्र बताते हैं कि पार्टी हाईकमान ने ये फैसला लिया, क्योंकि कैबिनेट में कोई मुस्लिम या अल्पसंख्यक प्रतिनिधि नहीं था।

मुस्लिम वोटबैंक की पॉलिटिक्स कर रही कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के इस कदम को कई लोग मुस्लिम तुष्टिकरण बता रहे हैं। बीजेपी ने तो इसे खुलकर ‘वोटबैंक पॉलिटिक्स‘ कहा है। केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी ने टिप्पणी की कि अजहरुद्दीन से जुड़े मामलों ने देश की इमेज को नुकसान पहुँचाया है। बीजेपी अध्यक्ष रामचंदर राव ने इसे ‘तुष्टिकरण’ कहा और बोले कि उपचुनाव के ठीक पहले ऐसा फैसला वोट खरीदने जैसा है। क्योंकि जुबली हिल्स में मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। कॉन्ग्रेस को लगता है कि अजहरुद्दीन की साख से अल्पसंख्यक नाराजगी दूर हो जाएगी।

कभी चमकदार था करियर, फिर फिक्सिंग ले डूबा

अब बात अजहरुद्दीन के कभी चमकदार रहे क्रिकेट करियर की, जिसे विवादों ने फीका कर दिया। साल 1984 में इंग्लैंड के खिलाफ डेब्यू टेस्ट में 110 रन बनाकर धमाल मचा दिया। अगले दो टेस्ट में भी शतक ठोके। 99 टेस्ट और 334 वनडे खेले, 22 टेस्ट शतक लगाए। कप्तान बने, 1990-91 और 1995 एशिया कप जिताया। लेकिन 2000 में मैच फिक्सिंग स्कैंडल ने सब बर्बाद कर दिया।

अजहरुद्दीन ने कराई थी बुकियों से मुलाकात

साउथ अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रॉन्जे ने खुलासा किया कि अजहरुद्दीन ने उन्हें बुकियों से मिलवाया। सीबीआई ने जाँच की, जिसमें अजहरुद्दीन का नाम आया। उन्होंने कथित तौर पर तीन वनडे फिक्स करने कबूला- 1996 में राजकोट में साउथ अफ्रीका के खिलाफ, 1997 में श्रीलंका और 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ। बीसीसीआई ने नवंबर 2000 में उन्हें आजीवन बैन कर दिया। अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर पर भी 5-5 साल का बैन लगा था।

इस स्कैंडल ने भारतीय क्रिकेट को हिला दिया। बुकियों से नेक्सस, पिच रिपोर्ट बेचना, मैच का रिजल्ट पहले बता देना – सब सामने आया। अजहरुद्दीन ने कोर्ट का रुख किया। हैदराबाद कोर्ट ने बैन बरकरार रखा, लेकिन आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 2012 में फैसला उलट दिया। कोर्ट ने कहा कि बीसीसीआई ने बिना पुख्ता सबूत के बैन लगाया। अजहरुद्दीन बेदाग साबित हुए।

बरी होने के बाद भी तमाम विवादों से घिरे रहे अजहरुद्दीन

इसके बाद वो साल 2019 में हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन (एचसीए) के अध्यक्ष बने। लेकिन यहाँ भी विवादों से उनका नाता रहा। कभी बेटे के लिए फेवरिज्म के आरोप, तो कभी क्षेत्रवाद के। फिर साल 2023 में तेलंगाना चुनाव से पहले एचसीए में उन पर भ्रष्टाचार के चार केस दर्ज हुए थे। इसमें फंड मिसयूज, टेंडर घोटाले भी शामिल हैं। फंड मिसयूज का मामला 20 करोड़ का है, जिसमें बीते साल अजहरुद्दीन को ईडी ने पूछताछ बुलाया भी था।

अजहरुद्दीन की मंत्री बनने से तेलंगाना की राजनीति गर्म हो गई। कॉन्ग्रेस को लगता है कि ये अल्पसंख्यकों को मजबूत संदेश देगा। लेकिन विपक्ष इसे वोटबैंक गेम बता रहा। लेकिन सच्चाई ये है कि उपचुनाव नजदीक है और सत्ताधारी कॉन्ग्रेस के लिए मुस्लिम वोटरों का गुस्सा ठंडा करना जरूरी है। हालाँकि ये कितना सफल होता है, ये आने वाले समय में पता चल ही जाएगा।