अमेरिका में हिंदू और भारतीयों के प्रति जहर उगलने वाले मैट फोर्नी ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को सोशल मीडिया पर दावा किया था कि वह टेक्सास स्थित मीडिया आउटलेट ‘द ब्लेज़’ में बतौर रिपोर्टर शामिल हो रहा है। लेकिन (7 नवंबर 2025) को उसी फोर्नी ने खुद बताया कि उसे ‘द ब्लेज़’ ने निकाल दिया है।
यह वही व्यक्ति है जिसने बार-बार भारतीयों और हिंदू संस्कृति के खिलाफ नफरत भरी टिप्पणियाँ की हैं, कभी दिवाली का मजाक उड़ाया, तो कभी हर भारतीय को देश से ‘निर्वासित’ करने की माँग की। ऐसे में ‘द ब्लेज़’ द्वारा उसे मौका देना और फिर तुरंत हटाना, इस बात का प्रमाण है कि उसकी जहरीली विचारधारा न सिर्फ समाज के लिए, बल्कि मीडिया संस्थानों की साख के लिए भी खतरा बन चुकी है।
कौन है मैट फोर्नी और उसे भारतीयों से क्या है दिक्कत
मैट फोर्नी खुद को लेखक और पत्रकार कहता है, लेकिन उसकी लिखावट और बयानबाजी किसी पत्रकारिता से नहीं, बल्कि नफरत से भरी विचारधारा से निकलती है। उसका अतीत विवादों से भरा है, महिलाओं को लेकर अपमानजनक लेख लिखना, अश्लील किताबें प्रकाशित करना और अब भारतीयों के खिलाफ नस्लभेदी बातें फैलाना, ये उसका ‘कॅरियर प्रोफाइल’ है।
Yet another unqualified Indian takes over an American company. And I guarantee her first action will be to fire every American and replace them with other Indians, either directly or via bodyshops.
पिछले कुछ महीनों में उसने सोशल मीडिया पर लगातार भारत, हिंदुओं और भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाया। उसने न सिर्फ भारत की आलोचना की, बल्कि भारतीयों के प्रति गहरी नफरत जाहिर करते हुए ट्वीट किया “DEI means Deport every Indian” यानी विविधता (Diversity), समानता (Equity) और समावेश (Inclusion) जैसे सकारात्मक शब्दों को भी उसने नफरत के हथियार में बदल दिया।
ऐसा लगता है कि भारत के विकास, तकनीकी बढ़त और वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव से मैट फोर्नी जैसे लोगों की नींद उड़ गई है। पश्चिम में बैठे कुछ कट्टरपंथी अब यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे कि भारतवासी सिर्फ आउटसोर्सिंग मजदूर नहीं, बल्कि विश्व राजनीति और तकनीक के नेतृत्वकर्ता बन रहे हैं।
द ब्लेज ने नफरत को पत्रकारिता में बदल दिया
असली सवाल ये है की अगर कोई व्यक्ति खुलेआम भारतीयों के निर्वासन की बात करता है, तो कोई मीडिया संगठन उसे ‘भारतीय मामलों का रिपोर्टर’ क्यों बनाता है? यही हुआ द ब्लेज के साथ, जो खुद को एक रूढ़िवादी मीडिया संगठन बताता है।
फोर्नी ने हाल ही में दावा किया कि उसे द ब्लेज में भारत से संबंधित रिपोर्टिंग का काम मिला है। लेकिन विडंबना यह रही कि जैसे ही उसने झूठ फैलाना शुरू किया भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया जैसे फेक ट्वीट किए, उसे तुरंत ही Community Notes ने झूठा करार दे दिया। यानी जिसे भारतीय मुद्दों की समझ सिखानी थी, वह खुद बुनियादी तथ्यों से अनजान निकला।
इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पश्चिमी मीडिया अपने पत्रकारों की भर्ती में किस नैतिक स्तर तक गिर चुका है। जो व्यक्ति भारत के लोगों से नफरत करता है, वह भारतीय समाज पर रिपोर्टिंग कैसे कर सकता है? क्या पश्चिमी मीडिया अब ‘हिंदूफोबिया’ को भी ‘स्वतंत्र अभिव्यक्ति’ के नाम पर बेचने लगा है?
हिंदू विरोध की नई परंपरा: मजाक, झूठ और नस्लवाद
मैट फोर्नी के कई पुराने ट्वीट देखें तो पता चलता है कि उसका एजेंडा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक नफरत से भरा है। उसने हिंदुओं के त्योहारों, खासकर दीवाली का मजाक उड़ाया, यहाँ तक कहा कि भारतीयों के कारण अमेरिका की IT कंपनियों का स्तर गिर गया है।
NEW: a reader shares pictures of Delta Airlines staffers at their headquarters in Atlanta. Almost entirely Indians.
He writes that 98 percent of Delta's IT department is Indian, their CTO is Indian, and their VP of IT is also Indian.
उसने कई बार यह भी इशारा किया कि भारतीय अमेरिकी नागरिक अमेरिकी नौकरियाँ छीन रहे हैं, जो वही पुरानी नस्लवादी सोच है जो कभी अश्वेतों और अब एशियाई लोगों पर थोप दी जाती है। यानी फोर्नी के लिए भारतीय सिर्फ एक समस्या हैं, चाहे वे डॉक्टर हों, इंजीनियर हों या शिक्षक।
पश्चिमी मीडिया का दोहरा चेहरा
पश्चिमी मीडिया अक्सर भारत को असहिष्णु देश बताने में सबसे आगे रहता है। लेकिन यही मीडिया तब खामोश हो जाता है जब उनके अपने पत्रकार हिंदुओं और भारतीयों के खिलाफ खुलेआम नफरत फैलाते हैं।
भारत में अगर कोई छोटा बयान भी किसी समुदाय के खिलाफ चला जाए, तो उसे तुरंत ‘hate speech’ बता दिया जाता है। मगर जब अमेरिका में कोई पत्रकार पूरे समुदाय के निर्वासन की बात करता है, तो वही बात ‘freedom of expression’ कहलाती है। यही है पश्चिमी उदारवाद का असली चेहरा दोहरे मानदंडों से भरा हुआ।
‘स्वतंत्र भाषण’ के नाम पर नफरत की आजादी
फोर्नी जैसे लोग ‘free speech’ का झंडा उठाते हैं, लेकिन इस झंडे के नीचे वे सिर्फ एक धर्म और एक समुदाय हिंदुओं पर वार करते हैं। वे जानते हैं कि हिंदू समाज शांतिप्रिय है, जवाब में हिंसा नहीं करेगा, इसलिए ये लोग हिंदू धर्म को निशाना बनाकर अपनी साहसिक पत्रकारिता का तमगा कमाते हैं।
लेकिन अगर यही बातें किसी और धर्म के खिलाफ कही जातीं, तो शायद फोर्नी अब तक अमेरिकी न्याय विभाग की जाँच का सामना कर रहा होता। यह दिखाता है कि अमेरिका और यूरोप में हिंदूफोबिया न केवल सामान्य है, बल्कि कई जगहों पर ‘acceptable hate’ बन चुका है।
भारतीयों के विकास से बौखलाहट
पिछले दशक में भारत का जो वैश्विक प्रभाव बढ़ा है, तकनीकी आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर उसने कई पश्चिमी बुद्धिजीवियों की नींद उड़ा दी है। अमेरिका में भारतीय मूल के सीईओ, प्रोफेसर, वैज्ञानिक और राजनयिक अब शक्ति के केंद्रों में हैं।
फोर्नी जैसे लोग इस उभार को खतरा मानते हैं, क्योंकि यह उनकी पुरानी धारणाओं को तोड़ता है कि एशियाई सिर्फ आदेश पालन करने वाले लोग हैं। इसलिए वे भारत के खिलाफ डर फैलाने की कोशिश करते हैं कभी आईटी आउटसोर्सिंग का डर, कभी इमिग्रेशन का डर, कभी हिंदू राष्ट्रवाद का डर। असल में यह डर भारत की ताकत का प्रमाण है, क्योंकि जो देश कमजोर होता है, उसके खिलाफ कोई प्रचार नहीं करता।
सोशल मीडिया से सड़कों तक नफरत का असर
फोर्नी जैसे लोगों की नफरत सिर्फ ट्वीट तक सीमित नहीं रहती। अमेरिका और कनाडा में कई बार भारतीय मंदिरों पर हमले हुए, हिंदू विद्यार्थियों को कैंपस में अपमानित किया गया और ब्राह्मण कहकर निशाना बनाया गया।
यह माहौल सोशल मीडिया से बनता है, जब एक पत्रकार भारत के खिलाफ खुलेआम गालियाँ देता है, तो आम लोग उसी नफरत को सही ठहराने लगते हैं। इसलिए यह केवल ऑनलाइन ट्रोलिंग नहीं, बल्कि हिंसा की वैचारिक तैयारी है।
क्या यही है भारत पर रिपोर्टिंग?
फोर्नी जैसे व्यक्ति को भारत पर रिपोर्टिंग का जिम्मा देना वैसा ही है जैसे किसी नस्लभेदी को अफ्रीकी देशों पर रिपोर्टिंग का काम सौंपना। यह पश्चिमी मीडिया के नैतिक पतन का प्रतीक है।
जो व्यक्ति कहता है कि हर भारतीय को देश से बाहर निकालो, वह भारत के समाज, संस्कृति और राजनीति को निष्पक्ष नजर से कैसे देख सकता है? उसकी कलम पहले से ही जहर में डूबी है।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान गुरुवार (6 नवंबर 2025) को संपन्न हुआ, जिसमें रिकॉर्ड 64.66% मतदान दर्ज किया गया। यह अब तक के राज्य के चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा वोटिंग प्रतिशत है। चुनाव आयोग (ECI) ने इसे मतदाताओं के लोकतंत्र पर भरोसे और इस बार लागू की गई नई वोटर-फ्रेंडली पहलियों की सफलता का प्रतीक बताया।
इस बीच, चुनावों के दौरान कुछ लोगों ने फर्जी खबरें फैलाने की कोशिश भी की। AltNews के मोहम्मद जुबैर ने DD News और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक्स पर भ्रामक जानकारी पोस्ट की, जिसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया पर संदेह पैदा करना था।
बिहार चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या ट्वीट किया?
गुरुवार (6 नवंबर 2025) को मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “बिहार विधानसभा चुनावों में पहले चरण की वोटिंग में एनडीए ने भारी बढ़त हासिल कर ली है। इसके साथ ही दूसरे चरण में भी हर तरफ उसकी लहर नजर आ रही है।”
बिहार विधानसभा चुनावों में पहले चरण की वोटिंग में एनडीए ने भारी बढ़त हासिल कर ली है। इसके साथ ही दूसरे चरण में भी हर तरफ उसकी लहर नजर आ रही है। जनता-जनार्दन के इसी जोश के बीच कल दोपहर करीब 1:45 बजे औरंगाबाद और लगभग 3:30 बजे भभुआ में अपने परिवारजनों से संवाद का सौभाग्य प्राप्त…
प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, “जनता-जनार्दन के इसी जोश के बीच कल दोपहर करीब 1:45 बजे औरंगाबाद और लगभग 3:30 बजे भभुआ में अपने परिवारजनों से संवाद का सौभाग्य प्राप्त होगा।” पीएम मोदी का यह पोस्ट चुनावी नेताओं की सामान्य प्रतिक्रिया की तरह था, जिसमें वे अपनी पार्टी की बढ़त का दावा करते हुए जीत का भरोसा जताते हैं।
DD न्यूज ने पीएम मोदी के हवाले से क्या ट्वीट किया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट का हवाला देते हुए DD न्यूज ने ट्वीट किया, “पहले चरण में भी लहर जारी बिहार चुनाव के पहले चरण में कलाकारों ने शानदार बढ़त बनाई है, जनता-जनार्दन के जोश के बीच कल दोपहर 1:45 बजे और 3:30 बजे भभुआ में अपने परिवारजनों से संवाद करेंगे।”
DD न्यूज ने मूलतः प्रधानमंत्री मोदी के पोस्ट के शब्दों को ही ट्वीट किया, जिसमें न केवल उनकी जीत की उम्मीद को दर्शाया गया, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने भभुआ में उनकी व्यस्तता के बारे में भी ट्वीट किया।
जुबैर ने लिखा, “राष्ट्रीय प्रसारक @DDNewsHindi को कैसे पता कि बिहार के पहले चरण में NDA आगे चल रहा है?” उसके इस ट्वीट से यह संकेत दिया गया कि DD News को पहले से मालूम है कि वोट NDA के पक्ष में पड़े हैं यानी चुनाव में पहले से धांधली या ‘वोट चोरी’ हो चुकी है। यह वही झूठा नैरेटिव था जिसे राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस और विपक्षी दल फैला रहे थे।
जुबैर के ट्वीट का मकसद यह दिखाना कि चुनाव पहले से ही NDA के पक्ष में ‘सैट’ कर दिए गए हैं और DD News (जो सरकारी प्रसारक है) को मोदी सरकार या खुद प्रधानमंत्री मोदी की ओर से NDA की जीत का संदेश देने के निर्देश मिले हैं।
फैक्ट चेक: मोहम्मद जुबैर कैसे फैला रहा था फर्जी खबरें?
DD News का ट्वीट दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पोस्ट का हूबहू अनुवाद था। पीएम मोदी ने अपने ट्वीट में केवल राजनीतिक उत्साह व्यक्त करते हुए कहा था कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में NDA को बढ़त मिली है और जनता में जबरदस्त जोश दिख रहा है। यह एक सामान्य राजनीतिक बयान था, न कि किसी तरह का चुनावी नतीजा या भविष्यवाणी।
लेकिन AltNews के मोहम्मद जुबैर ने DD News के इसी ट्वीट का अंग्रेजी अनुवाद डालकर उसे इस तरह पेश किया मानो दूरदर्शन ने खुद NDA की बढ़त की घोषणा कर दी हो। जुबैर का यह तरीका भ्रामक था, क्योंकि अंग्रेजी में अनुवाद के कारण यह तुरंत समझ नहीं आता कि DD News ने सिर्फ प्रधानमंत्री की पोस्ट को शेयर किया है, अपनी कोई स्वतंत्र राय नहीं दी।
जुबैर के पोस्ट से यह झूठा संकेत देने की कोशिश की गई कि प्रधानमंत्री मोदी को पहले से चुनाव परिणामों की जानकारी थी, जबकि यह बिल्कुल गलत है। दरअसल, सभी राजनीतिक दल और नेता मतदान समाप्त होने के बाद अपने-अपने पक्ष में बढ़त का दावा करते हैं, यह चुनावी राजनीति का सामान्य हिस्सा है, न कि किसी नतीजे की पूर्व जानकारी।
उदाहरण के तौर पर पीएम मोदी की तरह ही, राजद के तेजस्वी यादव ने भी एक्स का सहारा लेकर दावा किया कि पहले चरण का मतदान समाप्त होने के बाद राजद आगे चल रही है। महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने एक लंबी पोस्ट में दावा किया कि पहले चरण के बाद महागठबंधन को समर्थन दिखाई देने लगा है।
आज बिहार ने प्रथम चरण में बदलाव के लिए मतदान किया है। हर बिहारवासी ने 20 साल के अंधकार को मिटाने के लिए, घर से निकल कर परिवर्तन की ऐसी रोशनी जलाई कि पूरे बिहार में सुख, समृद्धि, सुरक्षा, सम्मान, सौहार्द, शांति और खुशहाली की दस्तक सुनाई देने लगी है।
उन्होंने ट्वीट किया, “20 साल में पहली बार महागठबंधन के पक्ष में अभूतपूर्व बदलाव की लहर दिख रही है। हर घर से नहीं, बल्कि हर दिल से एक ही आवाज गूँज रही है: अबकी बार हम नई युवा सरकार लाएँगे, हर घर से सरकार चलाएँगे और हर बिहारी को चिंतामुक्त और परिवर्तनकारी, यानी मुख्यमंत्री बनाएँगे।”
अगर कोई न्यूज चैनल तेजस्वी यादव का यही बयान शब्दशः साझा करे, तो क्या इसका मतलब यह होगा कि चैनल या यादव ने चुनाव परिणाम पहले से जान लिए? बिल्कुल नहीं।
ऐसे में मोहम्मद जुबैर का यह भ्रामक पोस्ट न केवल गलत सूचना फैलाने वाला है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है। चुनाव के दौरान इस तरह की फेक न्यूज लोकतंत्र की पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
मोहम्मद जुबैर कैसे नियमित रूप से फैलाता है फर्जी खबरें और बनता है इस्लामवादियों का मुखपत्र
मोहम्मद जुबैर अक्सर इस्लाम या आतंकवाद की आलोचना करने वालों को चुप कराने के लिए फेक न्यूज और व्यक्तिगत हमलों (ad hominem attacks) का सहारा लेता है। जब कोई व्यक्ति इस्लाम से जुड़ी किसी बात पर तथ्य आधारित आलोचना करता है, तो जुबैर उस व्यक्ति को निशाना बनाता है, उसे ‘इस्लामोफोबिया’ का आरोप लगाकर ट्रोल्स की भीड़ उसके पीछे छोड़ देता है। यह उसका पुराना और आजमाया हुआ तरीका बन चुका है।
जुबैर अक्सर असल तथ्यों की जाँच करने के बजाय बहस करने वाले व्यक्ति की छवि खराब करने पर ध्यान देते हैं। उदाहरण के तौर पर, उसने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपनी भीड़ को उकसाया था।
नूपुर शर्मा ने टीवी डिबेट में पैगंबर मोहम्मद और आयशा के रिश्ते पर जो बातें कही थीं, वे कई प्रसिद्ध इस्लामी विद्वानों द्वारा पहले भी दोहराई जा चुकी हैं। लेकिन जुबैर ने उस पर कोई तथ्य-जाँच नहीं की, बल्कि व्यक्तिगत हमले किए और उन्हें निशाना बनाया।
इसी तरह, हाल ही में उसने धर्मस्थल को लेकर झूठी खबर फैलाने की कोशिश की ताकि हिंदुओं को बदनाम किया जा सके। इसके अलावा, उसने महू में मुस्लिमों द्वारा की गई हिंसा के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, बांग्लादेश में हिंदुओं के नरसंहार को सफेद झूठों से ढकने की कोशिश की और कांवड़ यात्रियों द्वारा पुलिस पर हमले की झूठी खबर फैलाई।
ऐसे कई मामलों में मोहम्मद जुबैर ने झूठी खबरें फैलाकर समाज में भ्रम और नफरत पैदा करने का काम किया है। उसके इन कारनामों पर विस्तार से OpIndia ने कई बार रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिन्हें यहाँ पढ़ा जा सकता है।
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी होने के बाद, चुनाव आयोग ने अब दूसरे चरण में देश के 12 राज्यों में यह प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें गुजरात भी शामिल है।
यह प्रक्रिया मंगलवार (4 नवंबर 2025) से शुरू हुई है। इसी दौरान अहमदाबाद के बापूनगर विधानसभा क्षेत्र से एक गंभीर शिकायत सामने आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हिंदू बहुल इलाकों की मतदाता सूची में मुस्लिम नाम दर्ज किए गए हैं, जबकि वहाँ मुस्लिम आबादी नहीं रहती।
यह मामला बापूनगर के राखियाल इलाके की प्रेरणा सोसाइटी और नरोत्तमदासनी चाली से जुड़ा है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि उनके इलाके में कुछ ईसाई परिवार तो रहते हैं, लेकिन मुस्लिम नहीं। फिर भी मतदाता सूची में मुस्लिम नाम दर्ज मिल रहे हैं।
लोगों ने यह भी बताया कि मतदाता सूची में उनके मकान नंबर तक गलत लिखे गए हैं। उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी त्रुटियों को सुधारने के लिए SIR प्रक्रिया जरूरी है ताकि फर्जी या डुप्लिकेट नाम हटाए जा सकें।
ऑपइंडिया की टीम जब मौके पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बात की, तो उन्होंने इस प्रक्रिया का समर्थन किया और कहा कि मतदाता सूची को पारदर्शी और सही बनाए रखना बेहद जरूरी है।
(फोटो: ऑपइंडिया)
जब ऑपइंडिया की टीम अहमदाबाद के बापूनगर स्थित राखियाल इलाके की प्रेरणा सोसाइटी पहुँची, तो वहाँ के लोगों ने बताया कि इस सोसाइटी में सालों से सिर्फ हिंदू और ईसाई लोग ही रहते आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ कभी कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहा, फिर भी मतदाता सूची में कुछ मुस्लिम नाम दर्ज हो गए हैं।
सोसाइटी में लंबे समय से रह रहे एक व्यक्ति ने बताया कि वोटर लिस्ट में कुछ नाम गलत हैं और इन्हें हटाने के लिए SIR प्रक्रिया जरूरी है। वहीं, कनुभाई क्रिश्चियन नाम के निवासी ने बताया कि वह बचपन से यहीं रह रहे हैं और उन्होंने कहा, “हमारी सोसाइटी में न तो अक्षबानू नाम की कोई महिला रहती हैं, न ही कोई और मुस्लिम परिवार।” उनका मानना है कि मतदाता सूची में सिर्फ उन्हीं लोगों के नाम होने चाहिए जो वास्तव में यहाँ रहते हैं।
एक बुज़ुर्ग महिला ने भी यही बात दोहराई। उन्होंने बताया कि वह लगभग 40 सालों से इस सोसाइटी में रह रही हैं और उनकी चाली में सिर्फ हिंदू परिवार हैं। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में कुछ गलत नाम जोड़ दिए गए हैं जिन्हें हटाया जाना चाहिए।
ऑपइंडिया ने जब इलाके के एक 18-19 साल के युवक से बात की, तो उसने बताया कि वह जन्म से ही इसी सोसाइटी में रह रहा है। उसके अनुसार, इस चाली और सोसाइटी में सिर्फ हिंदू परिवार रहते हैं, कोई मुस्लिम नहीं। उसने कहा कि अगर वोटर लिस्ट में मुस्लिम नाम आए हैं, तो यह गलत है और ऐसे नामों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। युवक ने कहा कि ऐसी गड़बड़ियों को दूर करने के लिए SIR प्रक्रिया बहुत जरूरी है।
महेशभाई नाम के एक और स्थानीय निवासी ने बताया कि वह पिछले 53 सालों से इस इलाके में रह रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कभी नहीं सुना कि इस सोसाइटी या चाली में किसी मुस्लिम व्यक्ति ने घर खरीदा हो या किराए पर लिया हो।” उन्होंने शक जताया कि यह किसी साजिश का हिस्सा हो सकता है और इसकी पूरी जाँच होनी चाहिए कि हिंदू बहुल इलाके की मतदाता सूची में मुस्लिम नाम कैसे शामिल हो गए।
SIR प्रक्रिया को लेकर महेशभाई ने कहा कि मतदाता पंजीकरण का सत्यापन बिल्कुल सही कदम है। उन्होंने कहा, “ऐसी गड़बड़ियों को अभी ही ठीक करना जरूरी है, क्योंकि अगर बाद में मामला बढ़ गया तो इसे संभालना मुश्किल होगा। अभी जो जाँच चल रही है, वह बिल्कुल सही दिशा में है।”
જે વ્યક્તિ જન્મથી આ વિસ્તારમાં રહે છે તેઓએ જણાવ્યું કે અહીંયા છેલ્લા 50 વર્ષોમાં ના તો કોઈ મુસ્લિમે મકાન ખરીદ્યું છે, ના તો કોઈ ભાડે રહેવા આવ્યા છે… છતાય જો મતદારયાદીમાં મુસ્લિમ નામ હોય તો તે કોઈ ષડયંત્ર હોવું જોઈએ.
आमतौर पर हर चुनाव से पहले मतदाता सूची में केवल छोटे-मोटे संशोधन किए जाते हैं, लेकिन पूरी तरह से समीक्षा नहीं होती। इसी वजह से कई गलतियाँ और फर्जी नाम सूची में बने रह जाते हैं। ऐसे में SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) जैसी प्रक्रिया बेहद जरूरी है ताकि मतदाता सूची को पूरी तरह सही किया जा सके।
बापूनगर से आई शिकायतें यह दिखाती हैं कि गुजरात समेत पूरे देश में SIR क्यों जरूरी है। पिछली बार यह प्रक्रिया कई दशक पहले हुई थी और अब चुनाव आयोग फिर से पूरी मतदाता सूची का सत्यापन और संशोधन कर रहा है ताकि डुप्लिकेट नाम हट सकें और सही मतदाता सूची में शामिल रहें।
बिहार में यह प्रक्रिया सफल रही थी और अब इसे गुजरात, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू किया गया है। SIR के तहत बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) घर-घर जाकर दस्तावेज़ों की जाँच करेंगे और मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार करेंगे। इससे फर्जी या गलत नाम हटाए जा सकेंगे।
यह प्रक्रिया करीब एक महीने तक चलेगी। इसके बाद जिनके नाम हटाए जाएँगे, उन्हें अपील करने का मौका दिया जाएगा। अंतिम मतदाता सूची फरवरी में जारी होने की संभावना है।
गुजरात में पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा जाली दस्तावेज बनाकर मतदाता सूची में नाम जोड़े गए। SIR प्रक्रिया से ऐसे अवैध मतदाताओं की पहचान कर उनके नाम हटाए जा सकेंगे, जिससे चुनाव प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी बनेगी।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।
पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।
यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।
फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।
‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।
मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज
आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”
हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।
(फोटो साभार- द हिन्दू)
इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।
मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।
अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।
सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।
‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा
लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।
दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’
परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।
(फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)
इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।
ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।
इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?
दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?
फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह
तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?
(फोटो साभार- आउटलुक ट्रेवलर)
इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।
लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।
कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।
इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुलकर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।
हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया
यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।
लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।
अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।
लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।
लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”
निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”
पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।
गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।
इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।
इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।
मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।
कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है
लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।
निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।
इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।
अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।
मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू
हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है। लगातार ग्राउंड पर बनी ऑपइंडिया की टीम इस बीच कटिहार पहुँची, यहाँ मतदाताओं की पहली पसंद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। क्षेत्र के मतदाता बिहार की सरकार से काफी खुश दिखाई दिए।
कटिहार में पीएम नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल हुए बुजुर्ग व्यक्ति कहते हैं, “पीएम नरेंद्र मोदी से काफी प्रेम है, उतना बाल-बच्चा से भी नहीं है। उन्होंने पुलिया बनाया, राशन-पानी दिया, विकास दिया और सारी सुविधाएँ दी।” रैली में आए युवाओं का भी कहना है कि रोजगार देने वाले सिर्फ नीतीश कुमार की सरकार है, वोट उन्हीं को देंगे।
योगेंद्र नाथ नाम के व्यक्ति कहते हैं, “NDA की सरकार ही आएगी। पीएम मोदी पारस है, जिसको चाहेंगे सोना बना देंगे देगा, विकास की गंगा बहा देंगे। हमारे घर में जितना भी कुछ है उन्हीं की देन है। पंखा, बिजली, घर सिलेंडर सब कुछ।”
बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज में ऑपइंडिया की टीम पहुँची तो राहुल गाँधी का ‘वोट चोरी’ वाला बयान हवा में उड़ता मिला। एक चाय की दुकान पर बैठे अब्दुल बोले, “राहुल साहब झूठ बोल रहे, हमारा वोट कोई नहीं चुराता। हमें SIR चाहिए, घुसपैठिए बाहर निकलें।” पास ही खड़े जावेद ने हँसते हुए कहा, “राहुल गाँधी को लगता है हम बेवकूफ हैं? हम जानते हैं कौन हमारा हितैषी है।”
हमसे बातचीत में मुस्लिम महिलाएँ भी खुलकर बोलीं। रुकसाना बीबी ने बताया, “पहले बांग्लादेशी आकर बस जाते थे, अब SAR नहीं, SIR से डरते हैं। वोट चोरी की बात बकवास है।”
अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है-70% मुस्लिम आबादी वाला किशनगंज घुसपैठ से त्रस्त है, लोग राहुल के दावे को सिरे से खारिज कर रहे हैं और SIR को अपना हिफाजत कवच बता रहे हैं।
लंदन की पुलिस उन कैदियों की तलाश में है, जिसे एक हफ्ते के अंदर वेंड्सवर्थ जेल से ‘गलती से’ रिहा कर दिया गया था। इस घटना के बाद ब्रिटेन का जेल प्रशासन सवालों के घेरे में है।
29 अक्टूबर 2025 को ‘गलती’ से छूटा पहला कैदी 24 साल का ब्राहिम कद्दौर-चेरिफ था, जो एक अल्जीरियाई यौन अपराधी था। कुछ दिन बार 3 नवबंर को उसी जेल से दूसरा कैदी विलियम स्मिथ भी ‘गलती’ से रिहा हो गया।
ऐसी ही ‘गलती’ एक और हुई है। इथियोपियाई नागरिक और सजायाफ्ता यौन अपराधी हादुश केबातु को एसेक्स की एक जेल से ‘गलती’ से रिहा कर दिया गया। इन ‘गलतियों’ की वजह से न्याय सचिव डेविड लैमी की देशभर में आलोचना हो रही है। वे राजनीतिक आलोचनाओं के केन्द्र में हैं। हालाँकि उन्होंने केबातु के मामले के बाद भविष्य में ऐसी घटना नहीं होने देने की बात कही थी।
संसद में सवाल और राजनीतिक बवाल
यह मुद्दा इस हफ्ते प्रधानमंत्री से पूछे गए सवालों (पीएमक्यू) में भी था। हालाँकि प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की जगह डेविड लैमी से घटना को लेकर सवाल पूछा गया। सांसद ये जानना चाहते थे कि क्या केबातु के मामले के बाद से किसी शरण माँगने वाले अपराधी को गलती से रिहा किया गया है। हालाँकि, लैमी ने इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया।
संसद सत्र के समापन के बाद मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने पुष्टि की कि 29 अक्टूबर को एक विदेशी कैदी को ग़लती से हिरासत से रिहा कर दिया गया था। इसकी सूचना उन्हें लगभग एक हफ्ते बाद मिली।
मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने उस व्यक्ति की पहचान कद्दौर-शेरिफ के रूप में की, जिसके लंदन के टावर हैमलेट्स और वेस्टमिंस्टर से संबंध हैं।
नवंबर 2024 में उसे एक नग्न प्रदर्शन करने के मामले में दोषी ठहराया गया था। और 18 महीने जेल की सजा के साथ साथ यौन अपराधियों की सूची में पाँच साल के लिए शामिल कर दिया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, कद्दूर-शेरिफ 2019 में विज़िट वीजा पर कानूनी तरीके से यूके आए थे, लेकिन वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी वे नहीं गए। अधिकारियों ने उन्हें 2020 में ही ‘ निर्धारित समय से ज्यादा समय तक रहने वाले’ के रूप में पहचान की थी।
बीबीसी ने बाद में बताया कि वे शरणार्थी नहीं हैं और डेविड लैमी को रातोंरात उनकी ‘गलती’ से हुई रिहाई के बारे में सूचित कर दिया गया था। न्याय सचिव लैमी ने इस गलती को ‘अस्वीकार्य’ बताया। पुलिस के बयान को लेकर लैमी ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे ‘बेहद अपमानजनक और भयावह’ करार दिया। उन्होंने कहा कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए और ऐसी गलतियाँ ‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’ हैं।
लैमी ने डेम लिन ओवेन्स के नेतृत्व में एक स्वतंत्र जाँच की घोषणा की। उन्होंने कहा, “मैंने पहले ही कड़ाई से जाँच शुरू कर दी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इन गलतियों को हमेशा के लिए रोकने के लिए और भी कुछ किया जाना चाहिए।”
हालाँकि, विपक्षी दल इससे सहमत नहीं थे। कंजर्वेटिव से जुड़े गृह सचिव क्रिस फिलिप ने कहा, “यह चौंकाने वाला है कि एक बार फिर एक विदेशी अपराधी को गलती से रिहा कर दिया गया। इससे लैमी के दावे की मजाक उड़ रही है। उन्होंने ‘अब तक की सबसे कड़ी जाँच’ शुरू करने की बात कही थी।
दूसरे कैदी को भी गलती से रिहा कर दिया गया
कद्दौर-शेरिफ़ की गलत रिहाई की जब पुलिस ने पुष्टि की, उसके कुछ ही घंटों बाद सरे पुलिस (surrey police) से एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। उन्होंने खुलासा किया कि विलियम स्मिथ को भी इसी हफ्ते उसी जेल वैंड्सवर्थ से, गलती से रिहा कर दिया गया।
स्मिथ को सोमवार, 3 नवंबर को धोखाधड़ी से जुड़े विभिन्न अपराधों के लिए 45 महीने की जेल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन उसी दिन वह गलती से रिहा कर दिया गया।
बीबीसी की पड़ताल में सामने आया है कि ऐसा तब हुआ, जब अदालत के कर्मचारियों ने अनजाने में उसे हिरासत में लेने के बजाय छोड़ दिया गया। हालाँकि थोड़ी देर बाद गलती सुधारने की कोशिश की गई। लेकिन जानकारी गलत अधिकारी को दे दी गई, जिसने उसे वापस पकड़ा नहीं जा सका।
पुलिस ने स्मिथ को गोरा, गंजा और क्लीन शेव बताया है। उसे आखिरी बार सफ़ेद नाइकी लोगो वाला नेवी ब्लू जम्पर, नेवी ब्लू ट्रैक पैंट और काले रंग के स्नीकर्स पहने देखा गया था। अधिकारियों ने ऐसे व्यक्ति को देखने पर तुरंत पुलिस को सूचित करने की लोगों से अपील की है।
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, मार्च 2025 तक इंग्लैंड और वेल्स में 262 कैदियों को गलती से रिहा कर दिया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 128% अधिक है। वैंड्सवर्थ के कर्मचारियों ने बीबीसी को बताया कि इन हालिया गलतियों के बाद से जेल में दहशत फैल गई है। वैंड्सवर्थ में सुरक्षा संबंधी चिंताएँ नई नहीं हैं।
पिछले साल की रिपोर्ट में भी व्यापक अराजकता और कैदियों की खराब ट्रैकिंग का उल्लेख किया गया था। साल 2023 में भी इसी जेल ने तब सुर्खियाँ बटोरीं जब ईरान के लिए जासूसी करने के मुकदमे का इंतजार कर रहे डैनियल खलीफ भाग गया था।
यौन अपराधी हदुश केबातु का मामला
हदुश केबातु एक इथियोपियाई शरणार्थी है, जिसे एसेक्स में एक किशोरी और एक महिला के यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था। उसे 1 साल जेल की सजा हुई थी। लेकिन एक महीने बाद ही वह गलती से रिहा कर दिया गया।
इस मामले में डेम लिन ओवेन्स की अध्यक्षता में एक जाँच पहले से ही चल रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इतनी गंभीर गलती कैसे हुई।
हदुश केबातु (फोटो साभार- इंडिपेंडेंट)
दो दिनों तक तलाशी अभियान चलाया गया और केबातु को 26 अक्टूबर को उत्तरी लंदन के फिन्सबरी पार्क में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। वह चेम्सफोर्ड से वहाँ आया था। दो दिन बाद उसे निर्वासित कर दिया गया, लेकिन निर्वासन प्रक्रिया में बाधा डालने की धमकी देने पर अधिकारियों ने उसे £500 दिए।
14 वर्षीय पीड़िता के पिता ने आईटीवी न्यूज़ को बताया कि सरकार पूरी तरह फेल रही। अपराधी को पकड़ा गया, फिर उसे निर्वासित कर दिया गया। जिस तरह से इस मामले को हेंडल किया गया, उससे उनका परिवार काफी निराश है।
उन्होंने गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “हमें बस असफलता के बाद असफलता ही हाथ लग रही है। मैं नाराज नहीं हूँ, मैं निराश हूँ।”
उस युवती ने आईटीवी को लिखित बयान साझा किया। बयान में उसने कहा था कि वह ‘सो नहीं पा रही है’ क्योंकि उसे डर था कि वह मुझे ढूँढ़ने के लिए एपिंग वापस आ जाएगा”।
केबातु प्रकरण के बाद शरणार्थियों के होटलों के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान कई हिंसक झड़पें भी हुई।
उन्होंने कहा कि केबातु की गिरफ्तारी से लेकर उसके निर्वासन तक की पूरी प्रक्रिया में सिर्फ़ 17 हफ्ते लगे। परिवार का मानना है कि इससे उनके बेटी के साथ ‘न्याय’ नहीं हुआ।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर बुधवार (5 नवंबर 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ‘वोट चोरी’ का ‘हाईड्रोजन बम’ फोड़ने का फर्जी दावा किया है। बिहार चुनाव से पहले राहुल गाँधी ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 का हवाला देते हुए चुनाव आयोग और बीजेपी पर 25 लाख वोटों की चोरी का गंभीर आरोप लगाया। राहुल गाँधी ने ‘एच फाइल्स‘ के नाम से प्रेजेंटेशन देकर दावा किया कि हर आठ में से एक वोटर फर्जी था, जिसकी वजह से कॉन्ग्रेस हारी।
हालाँकि, जब इन आरोपों की पड़ताल की गई और चुनाव आयोग ने तथ्य सामने रखे, तो राहुल गाँधी के दावे एक बार फिर कमजोर और आधारहीन साबित हुए। अब आपको फैक्ट चेक के आधार पर बताते है कि राहुल गाँधी ने क्या आरोप लगाए और उसके जवाब में क्या सच सामने आया।
आरोप नंबर 1: ‘ब्राजीलियन मॉडल’ ने 22 बार डाला वोट
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि सोनीपत के राई विधानसभा क्षेत्र की वोटर लिस्ट में ब्राज़ील की एक मॉडल का फोटो लगा हुआ था। राहुल गाँधी ने बताया कि इस मॉडल ने अलग-अलग नाम (जैसे स्वीटी या सीमा) से 10 बूथों पर 22 बार वोट डाले। राहुल गाँधी के अनुसार, यह ‘वोट चोरी’ की बड़ी साजिश थी।
वोट चोरी से हरियाणा में कांग्रेस की सरकार चोरी की गई है – और इसका ब्लैक एंड व्हाइट सबूत आपके सामने हैं।
– ब्राज़ील की एक मॉडल हरियाणा की वोटर लिस्ट में 10 बूथों पर 22 वोट – अलग-अलग नाम से – एक ही फोटो के साथ 223 वोट एक बूथ में – नाम हर बार नया – एक ही घर में 501 वोटर दर्ज – वो… pic.twitter.com/mCfNLc62P2
फैक्ट चेक का सच: पड़ताल के लिए जब राई क्षेत्र के 8 गाँवों (मच्छरौला, मुरथल, बारोटा आदि) में जाँच की गई, तो सामने आया कि वोट किसी मॉडल ने नहीं डाले, बल्कि असली मतदाताओं ने ही डाले थे। 22 में से 13 महिला मतदाताओं ने पुष्टि की कि उन्होंने विधानसभा चुनाव में अपना वोट खुद डाला था।
मतदाताओं (जैसे मच्छरौला की पिंकी और मुनेश) ने बताया कि वोटर लिस्ट में भले ही उनकी जगह किसी और का फोटो लगा था, लेकिन उनका नाम, पति का नाम और पता बिल्कुल सही था। वोट डालते समय उन्होंने अपना पहचान पत्र (जैसे वोटर आई कार्ड) दिखाया, जिसके बाद चुनाव अधिकारियों ने उन्हें वोट देने दिया।
‘ब्राजीलियन मॉडल’ ने क्या कहा: राहुल गाँधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हरियाणा की वोटर लिस्ट में अपनी तस्वीर दिखने के बाद, ब्राजील की डिजिटल इन्फ्लुएंसर और हेयरड्रेसर ने सोशल मीडिया पर इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने वीडियो जारी कर साफ किया, “मेरी तस्वीर का इस्तेमाल… मुझे नहीं पता कि यह चुनाव है या कुछ और, जहाँ वोटिंग जरूरी है। और… भारत में… सच में?? ये लोग मुझे एक भारतीय महिला के रूप में दिखा रहे हैं ताकि दूसरों को धोखा दिया जा सके, दोस्तों। यह मैं नहीं हूँ, मैं कभी भारत गई भी नहीं हूँ, मैं एक ब्राजीलियन डिजिटल इन्फ्लुएंसर और हेयरड्रेसर हूँ, और मैं भारतीय लोगों से बहुत प्यार करती हूँ।”
Brazilian Model Larissa whose image was used by Rahul Gandhi to peddle his fake narrative of Vote Chori has come out and slammed Rahul Gandhi for using her image and scam people.
Congress IT Cell members like Jitu Rehmani, Abdur Razzak, Abid Hasan, Fawad Shaikh messaged her and… pic.twitter.com/nPHPTZe3pg
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दावा किया कि हरियाणा में एक घर में 501 वोटर और दूसरे घर (मकान नंबर 150) पर 66 वोटर दर्ज थे, और ये घर सिर्फ ‘कागजों पर’ थे।
फैक्ट चेक का सच: होडल विधानसभा क्षेत्र के गुदराना गाँव में मकान नंबर 150 की जाँच में पता चला कि यह कोई छोटा मकान नहीं, बल्कि करीब 1 एकड़ में फैला एक बड़ा पुश्तैनी भूखंड है। यहाँ रहने वाले जिला परिषद के वाइस चेयरमैन उमेश ने बताया कि उनके परिवार में करीब 200 सदस्य और 150 वोटर हैं, क्योंकि उनके दादाजी के चार भाई और पिताजी के 9 भाई थे। पूरा परिवार एक ही नंबर पर रजिस्टर्ड होने के कारण वोटों की संख्या ज्यादा दिखती है। मकान नंबर 265 पर 501 वोटर होने का दावा जाँच में मिला ही नहीं, जिससे यह तथ्य पूरी तरह से झूठा साबित हुआ।
आरोप नंबर 3: ’25 लाख वोट चोरी’
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दावा किया कि 5 लाख से ज्यादा डुप्लीकेट वोटर और 19 लाख बल्क वोटर्स थे, जिससे कुल 25 लाख वोटों की चोरी हुई। राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग (EC) पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के बयान को लेकर भी ‘खुलेआम झूठ बोलने’ का आरोप लगाया।
फैक्ट चेक का सच: चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी के आरोपों को आधारहीन बताते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने मतदाता सूची के रिवीजन (SSR) के दौरान डुप्लीकेट मतदाताओं को हटाने के लिए कोई शिकायत या आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। EC ने कहा कि अगर आरोप सही हैं, तो कॉन्ग्रेस निर्धारित नियमों के अनुसार हर एक आरोप के संबंध में शपथ पत्र दे, जिसके बाद आयोग हर शिकायत पर कार्रवाई करेगा।
EC ने यह भी बताया कि हरियाणा चुनाव से पहले 4,16,408 दावों और आपत्तियों पर सुनवाई हुई थी, लेकिन चुनाव के बाद किसी भी उम्मीदवार द्वारा मतदान या मतगणना पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इसे ‘नाकामी छुपाने का बहाना’ बताया, क्योंकि कॉन्ग्रेस को महाराष्ट्र और हरियाणा में हार मिली।
आरोप नंबर 4: CCTV फुटेज डिलीट और डुप्लीकेट वोटिंग
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दावा किया कि चुनाव आयोग ने CCTV फुटेज डिलीट कर दिए, ताकि एक ही महिला द्वारा 223 बार वोट डालने जैसे मामले सामने न आ सकें।
फैक्ट चेक का सच: राहुल गाँधी ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई पुख्ता सबूत (जैसे डिलीटेड फुटेज का साक्ष्य) पेश नहीं किया, जबकि चुनाव आयोग नियमों से बँधा होता है और हर चरण की निगरानी होती है। चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि वह बिना शपथ पत्र और निर्धारित शिकायत के स्वतः संज्ञान नहीं ले सकता, क्योंकि इससे आधारहीन आरोपों की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।
आरोप नंबर 5: नायब सिंह सैनी की प्रेस कॉन्फ्रेंस
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने CM सैनी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का क्लिप दिखाया। इस क्लिप में सीएम सैनी यह कहते दिख रहे हैं कि ‘बीजेपी अकेले सरकार बनाएगी… हमारे पास सारी व्यवस्थाएँ हैं।’ राहुल गाँधी ने सीएम सैनी के ‘मुस्कुराते चेहरे’ और ‘व्यवस्था’ शब्द पर सवाल उठाया। राहुल का दावा था कि सीएम सैनी का इतना आश्वस्त दिखना और ‘व्यवस्था’ शब्द का उपयोग करना यह साबित करता है कि बीजेपी ने वोट चोरी की कोई ‘सेंट्रलाइज्ड साजिश’ रची थी, क्योंकि एग्जिट पोल कॉन्ग्रेस के पक्ष में थे।
#WATCH दिल्ली: कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा, "…मैं चाहता हूं कि भारत के युवा, GenZ इसे स्पष्ट रूप से समझें क्योंकि यह आपके भविष्य के बारे में है…मैं भारत में चुनाव आयोग, लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा हूं, इसलिए मैं इसे 100% सबूत के साथ… pic.twitter.com/NLVEIdP4uq
फैक्ट चेक का सच: पूरे संदर्भ में जाँच करने पर पता चला कि सीएम सैनी का बयान ‘वोट चोरी’ या चुनावी धांधली से बिल्कुल संबंधित नहीं था। सीएम सैनी से असल में एक रिपोर्टर ने पूछा था कि क्या बीजेपी सरकार बनाने के लिए किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन (गठबंधन की संभावना) करेगी। इसके जवाब में सीएम सैनी ने आत्मविश्वास से कहा था, “हमें किसी भी तरह के गठबंधन की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैंने शुरू से ही कहा है कि भाजपा अकेले सरकार बनाएगी। हमारे पास सारे इंतजाम हैं…।”
#WATCH | Panchkula | Haryana CM Nayab Singh Saini says, "We will not need any kind of alliance, I have said from the very beginning that the BJP will form the govt alone. We have all the arrangements… I am confident that BJP will alone form the government but if we need that… pic.twitter.com/pnQJOgf3p4
आरोप नंबर 6: मकान नंबर ‘शून्य’ (0) का मतलब फर्जी वोटर
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने दादरी शहर की मतदाता सूची में नरेंद्र नामक एक युवक का उदाहरण दिया, जिसके पास खुद का मकान होने के बावजूद उसका मकान नंबर ‘शून्य’ (0) दिखाया गया था। राहुल गाँधी ने दावा किया कि चुनाव आयोग (CEC) मकान नंबर ‘0’ उन लोगों का दिखाता है, जिनके पास घर नहीं होता (जैसे फुटपाथ या पुल के नीचे सोने वाले), और ऐसा करना मतदाता की जाँच को मुश्किल बनाने का एक तरीका है।
फैक्ट चेक का सच:जमीनी जाँच में पता चला कि यह आरोप भी आधारहीन है और स्थानीय प्रशासनिक समस्या को गलत ढंग से पेश किया गया है। जिस नरेंद्र का जिक्र किया गया, वह अपने परिवार के साथ 30 वर्षों से दादरी में खुद के मकान में रह रहा है।
जाँच में यह सामने आया कि उस वार्ड में नगर परिषद की ओर से कोई मकान नंबर आवंटित यानि अलोट ही नहीं किया गया है। इसी कारण नरेंद्र के ही नहीं, बल्कि उनके माता-पिता और पत्नी के वोटर कार्ड और यहाँ तक कि आधार कार्ड में भी मकान संख्या ‘शून्य’ दर्ज है।
आरोप नंबर 7: वोटर लिस्ट ‘आखिरी मिनट’ मिली
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी से जब पूछा गया कि आने वाले चुनावों में ‘वोट चोरी’ रोकने के लिए उनकी क्या तैयारी है, तो राहुल गाँधी बोले, “सबसे पहले आपको यह समझना है कि वोटर लिस्ट बहुत मुश्किल से मिलती है।” हरियाणा की वोटर लिस्ट पर राहुल गाँधी ने कहा, “ये जो हरियाणा की वोटर लिस्ट थी, लास्ट मिनट, चुनाव से एकदम पहले हमें दी जाती है, फाइनल लिस्ट।” राहुल गाँधी ने इस दावे का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया कि उन्हें तैयारी के लिए समय ही नहीं मिला। वीडियो आप 1:08:29 से सुन सकते हैं।
फैक्ट चेक का सच: राहुल गाँधी के इस दावे पर हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने तुरंत फैक्ट शीट जारी करके सच्चाई सामने रखी। चुनाव आयोग के मुताबिक, हरियाणा चुनाव से लगभग दो महीने पहले (2 अगस्त 2024) ही सभी राजनीतिक दलों के साथ ‘ड्राफ्ट मतदाता सूची’ बाँट दी गई थी।
— Chief Electoral Officer, Haryana (@ceoharyana) November 5, 2025
इसके बाद, आपत्तियों को ठीक करके फाइनल मतदाता सूची भी चुनाव से करीब 40 दिन पहले (27 अगस्त 2024) राजनीतिक दलों के साथ शेयर कर दी गई थी। चुनाव आयोग ने साफ कहा कि राहुल गाँधी का यह दावा कि उन्हें ‘आखिरी वक्त’ पर वोटर लिस्ट दी गई, पूरी तरह गलत है। इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के बाद, कॉन्ग्रेस या किसी भी दल ने जिलाधिकारी (DM) के पास एक भी शिकायत या अपील दाखिल नहीं की थी।
आरोप नंबर 8: हरियाणा की महिला वोटर का वीडियो क्लिप
राहुल गाँधी का आरोप: राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक महिला वोटर की वीडियो क्लिप चलाई। क्लिप का इस्तेमाल करते हुए राहुल ने यह बताने की कोशिश की कि हरियाणा में बड़े पैमाने पर धाँधली हुई है और यह महिला उनकी ‘वोट चोरी’ की थ्योरी का सबूत है।
OPINDIA EXCLUSIVE: Hydrogen Bomb drops on Rahul Gandhi's claim itself. Haryana lady shown in his presentation denies 'vote chori' in assembly elections pic.twitter.com/Clm6moOIgz
फैक्ट चेक का सच:ऑपइंडिया ने जब उस महिला वोटर से बात की, तो पता चला कि राहुल गाँधी ने उनके वीडियो का इस्तेमाल गलत संदर्भ में किया था। महिला वोटर का नाम अंजलि त्यागी है और वह सोनीपत, हरियाणा की रहने वाली हैं। अंजलि त्यागी ने ऑपइंडिया के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में राहुल गाँधी के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा, “मेरे वीडियो का गलत संदर्भ में इस्तेमाल किया गया। मैं राहुल गाँधी के आरोपों से सहमत नहीं हूँ।”
दरअसल, राहुल गाँधी का यह ‘हाइड्रोजन बम’ चुनाव आयोग की वैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए, अपनी पार्टी की हार के बाद, राजनीतिक विफलता को बाहर के कारकों पर डालने की एक कोशिश मात्र साबित हुआ है।
बिहार के सिवान में ऑपइंडिया की यात्रा दौरान अनुराग मिश्रा ने कॉलेज पढ़े मुस्लिम युवकों से बात की। एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने कहा, “राम मंदिर तोड़कर बनाया गया, बाबरी मस्जिद हमारी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था ना?” दूसरा MA पास युवक बोला, “मुगल हमारे पूर्वज हैं, औरंगजेब ने हिंदू मंदिर तोड़े तो क्या गलत किया? वो इस्लाम फैला रहे थे।”
शहाबुद्दीन को लेकर सब एक स्वर में बोले, “साहेब गरीब मुसलमानों के मसीहा थे, ऊँची जाति वालों से लड़ते थे।”
राम मंदिर पर गुस्सा साफ था। एक टीचर ने कहा, “हिंदू हमेशा मुसलमानों को दबाते हैं, राम मंदिर इसका सबूत है।” लोग मुगलों को गौरवशाली योद्धा बताते हैं और राम मंदिर को अन्याय।
ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – सिवान के पढ़े-लिखे मुस्लिम अभी भी बाबरी को अपनी जमीन और मुगलों को अपना इतिहास मानते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को IndiaAI मिशन के तहत ‘इंडिया AI गवर्नेंस गाइडलाइन्स’ लॉन्च कीं। यह पहल देश में सुरक्षित, जिम्मेदार और समावेशी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल की दिशा में एक अहम कदम है।
इस कार्यक्रम में देश के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद और MeitY के सचिव एस कृष्णन सहित IndiaAI मिशन के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। यह लॉन्चिंग India-AI Impact Summit 2026 से पहले हुई है, जो भारत की जिम्मेदार AI गवर्नेंस में बढ़ती नेतृत्व भूमिका को दर्शाती है।
नई गाइडलाइन्स का उद्देश्य एक मजबूत गवर्नेंस ढाँचा तैयार करना है ताकि नवाचार को बढ़ावा देते हुए AI तकनीक का सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग किया जा सके और इससे समाज या व्यक्ति को होने वाले जोखिमों को कम किया जा सके।
इस फ्रेमवर्क के चार मुख्य घटक हैं –
1. सात मार्गदर्शक सिद्धांत (सूत्र) – जो भारत की नैतिक और जिम्मेदार AI नीति की नींव तय करते हैं।
2. छह स्तंभों पर आधारित सिफारिशें – जो AI गवर्नेंस के विभिन्न पहलुओं को कवर करती हैं।
3. कार्रवाई योजना (Action Plan) – जिसमें अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों का खाका तैयार किया गया है।
4. व्यावहारिक दिशानिर्देश (Practical Guidelines) – जो उद्योग, डेवलपर्स, नियामक और अन्य हितधारकों के लिए पारदर्शी और जवाबदेह एआई उपयोग सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई हैं। इन गाइडलाइन्स के माध्यम से भारत का लक्ष्य है कि AI तकनीक का विकास न केवल नवाचार और प्रगति के लिए हो, बल्कि सुरक्षा, पारदर्शिता और नैतिकता को भी प्राथमिकता दी जाए।
सात मार्गदर्शक सिद्धांत (सूत्र)
भारत की नई AI शासन रूपरेखा (AI Governance Framework) को सात मूलभूत सिद्धांतों या ‘सूत्रों’ पर आधारित किया गया है, जिन्हें सभी क्षेत्रों और तकनीकों में लागू किया जाएगा।
ये सूत्र RBI की FREE-AI समिति की सिफारिशों से लिए गए हैं और भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाए गए हैं। समिति का मानना है कि यही सिद्धांत देश में सुरक्षित, जिम्मेदार और मानव-केंद्रित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास की दिशा तय करेंगे।
नीचे इन सात मार्गदर्शक सूत्रों का सरल रूप में विवरण दिया गया है –
1. विश्वास ही है आधार (Trust is the Foundation): AI के पूरे मूल्य-श्रृंखला में तकनीक, उसे विकसित करने वाले संगठन, निगरानी संस्थान और उपयोगकर्ता सभी में विश्वास (Trust) जरूरी है। यदि लोगों को AI पर भरोसा नहीं होगा, तो इसका व्यापक लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए तकनीक के हर स्तर पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ भरोसे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
2. जन प्रथम (People First): AI का केंद्र मानव होना चाहिए। इसका अर्थ है कि AI सिस्टम ऐसे बनाए जाएँ जो लोगों को सशक्त करें, उनकी मूल्यों और आवश्यकताओं के अनुरूप हों और अंतिम निर्णय पर मानव नियंत्रण (human oversight) बना रहे। ‘पीपल-फर्स्ट’ दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि तकनीक इंसानों की सेवा में रहे, न कि उन पर हावी हो।
3. संयम की बजाय नवाचार (Innovation over Restraint): AI का विकास नवाचार (Innovation) पर आधारित होना चाहिए, न कि अनावश्यक प्रतिबंधों पर। हालाँकि सुरक्षा और जिम्मेदारी जरूरी हैं, लेकिन तकनीक के प्रयोग को केवल डर या सावधानी के कारण रोकना उचित नहीं। उत्तरदायी नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए देश के सामाजिक-आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत किया जाना चाहिए।
4. न्याय और समानता (Fairness & Equity): AI का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचना चाहिए। सिस्टम में किसी तरह का भेदभाव या पक्षपात नहीं होना चाहिए। AI का प्रयोग समावेशी विकास (inclusive development) के लिए किया जाए ताकि कोई भी व्यक्ति या समुदाय पीछे न रह जाए।
5. जवाबदेही (Accountability): AI से जुड़ी हर इकाई, डेवलपर, उपयोगकर्ता, संस्था की जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए। जो भी जोखिम या नुकसान की संभावना है, उसके अनुसार जिम्मेदारी तय की जाए। नीतिगत, तकनीकी और बाजार-आधारित उपायों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी बिना जिम्मेदारी के काम न करे।
6. समझने योग्य डिजाइन (Understandable by Design): AI सिस्टम इतने स्पष्ट और पारदर्शी (transparent) होने चाहिए कि उपयोगकर्ता और नियामक दोनों यह समझ सकें कि सिस्टम कैसे काम करता है। AI का निर्णय ‘ब्लैक बॉक्स’ जैसा न हो, बल्कि उपयोगकर्ता को यह बताया जाए कि उसका परिणाम किस आधार पर आया। यही समझ, भरोसे की नींव रखती है।
7. सुरक्षा, लचीलापन और स्थिरता (Safety, Resilience & Sustainability): AI सिस्टम सुरक्षित, मजबूत और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार (sustainable) होने चाहिए। इनमें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि किसी भी गड़बड़ी या खतरे का समय रहते पता चल सके। संसाधनों की बचत करने वाले और हल्के (lightweight) मॉडल्स को बढ़ावा दिया जाए ताकि तकनीक पर्यावरण पर बोझ न बने।
अपने संबोधन में प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डॉ अजय कुमार सूद ने कहा कि पूरे ढाँचे की भावना ‘Do No Harm’ (किसी को नुकसान न पहुँचाना) पर आधारित है। यानी, AI का हर उपयोग समाज के हित में हो और किसी भी रूप में हानिकारक न साबित हो।
AI शासन के 6 स्तंभ
गाइडलाइंस के दूसरे भाग में छह प्रमुख स्तंभों पर सिफारिशें दी गई हैं, जिन्हें तीन मुख्य क्षेत्रों में बाँटा गया है –
1. इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure): गाइडलाइंस में कहा गया है कि भारत को AI के लिए मजबूत आधारभूत ढाँचा तैयार करना चाहिए, ताकि सभी को समान अवसर मिल सके। इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उपयोग करके AI को बड़े पैमाने पर और समावेशी रूप से फैलाने की बात कही गई है।
सरकार द्वारा 38,231 GPUs स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और डेवलपर्स को रियायती दरों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। 3,000 आधुनिक GPUs वाला सुरक्षित क्लस्टर रणनीतिक कार्यों के लिए तैयार किया जा रहा है।
AIKosh प्लेटफॉर्म पर अब तक 1,500 डेटा सेट और 217 AI मॉडल जोड़े गए हैं, जो 20 सेक्टरों की 34 संस्थाओं से लिए गए हैं। MSME (लघु उद्योग) के लिए टैक्स छूट, AI से जुड़े ऋण और सस्ती कंप्यूटिंग सुविधाओं जैसी प्रोत्साहन योजनाओं की सिफारिश की गई है।
2. क्षमता निर्माण (Capacity Building): यह स्तंभ शिक्षा, प्रशिक्षण और जागरूकता पर केंद्रित है। AI साक्षरता को बढ़ाने के लिए टियर-2 और टियर-3 शहरों, व्यावसायिक संस्थानों और सरकारी अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की सिफारिश की गई है।
मौजूदा कार्यक्रम जैसे IndiaAI FutureSkills और FutureSkills PRIME को आगे बढ़ाने और विस्तार करने की जरूरत बताई गई है ताकि AI का लाभ अधिक लोगों तक पहुँचे।
3. नीति और नियमन (Policy & Regulation): इस भाग में एक लचीला और संतुलित नियामक ढाँचा अपनाने की बात कही गई है। सुझाव दिया गया है कि नई ‘AI Act’ लाने के बजाय मौजूदा कानूनों (जैसे IT Act 2000, DPDP Act, कॉपीराइट कानून आदि) में संशोधन करके AI से जुड़े मुद्दों को शामिल किया जाए।
खास तौर पर, IT Act में यह स्पष्ट करने की आवश्यकता बताई गई है कि डिजिटल इंटरमीडियरी और AI सिस्टम की कानूनी जिम्मेदारी किस पर होगी।
4. जोखिम प्रबंधन (Risk Mitigation): गाइडलाइंस में भारत के संदर्भ में एक जोखिम मूल्यांकन ढाँचा (Risk Assessment Framework) तैयार करने की बात कही गई है। शुरुआत में उद्योगों के लिए स्वैच्छिक (voluntary) नियम लागू करने और बाद में कानूनी ढाँचा बनाने की सलाह दी गई है।
संवेदनशील क्षेत्रों जैसे सरकारी सेवाएँ या कमजोर वर्गों से जुड़ी परियोजनाएँ में अतिरिक्त सुरक्षा नियम लागू होंगे। साथ ही डीपफेक, कंटेंट ऑथेंटिकेशन, डेटा स्रोत की सत्यता (dataset provenance) और जेनरेटिव एआई में कंटेंट की पहचान (attribution) पर भी सख्त निगरानी रखने की जरूरत बताई गई है।
5. जवाबदेही (Accountability): जिम्मेदारी तय करने के लिए ग्रेडेड लायबिलिटी सिस्टम की सिफारिश की गई है। यानी किसी के कार्य, जोखिम स्तर और सावधानी के आधार पर उसकी जवाबदेही तय की जाए। AI वैल्यू चेन के हर हिस्से, डेवलपर, डिप्लॉयर और थर्ड-पार्टी प्रदाता के बीच पारदर्शिता आवश्यक बताई गई है, ताकि नियामक संस्थाएँ सही और उचित कार्रवाई कर सकें।
6. संस्थान (Institutions): गाइडलाइंस में ‘Whole-of-Government’ दृष्टिकोण अपनाने की बात कही गई है, यानी सभी सरकारी संस्थाएँ मिलकर एआई गवर्नेंस को लागू करें। एक AI Governance Group (AIGG) बनाया जाएगा जो नीति और क्रियान्वयन की निगरानी करेगा।
इसके तहत एक Technology & Policy Expert Committee (TPEC) और एक तकनीकी निकाय AI Safety Institute (AISI) का गठन प्रस्तावित है। इसके साथ BIS, TEC, राज्य सरकारें और सेक्टोरल रेगुलेटर भी इस ढाँचे में भाग लेंगे।
कार्य योजना: लघु, मध्यम, दीर्घकालिक
भारत की नई AI गवर्नेंस गाइडलाइंस में एक स्पष्ट कार्ययोजना (Action Plan) दी गई है, जिसे तीन चरणों, लघु अवधि (Short-term), मध्यम अवधि (Medium-term) और दीर्घ अवधि (Long-term) – में बाँटा गया है।
लघु अवधि (Short-term) लक्ष्य: AI गवर्नेंस के लिए मुख्य संस्थान (Institutions) स्थापित किए जाएँ। भारत-विशिष्ट जोखिम ढाँचे (Risk Frameworks) तैयार किए जाएँ। उद्योग जगत से स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएँ (Voluntary Commitments) ली जाएँ ताकि जिम्मेदार AI उपयोग बढ़े।
कानूनी संशोधन (Legal Amendments) के सुझाव दिए जाएँ और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था (Liability Regime) स्पष्ट की जाए। कंप्यूटिंग और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुँच बढ़ाई जाए। जनजागरूकता अभियान चलाए जाएँ और AI सुरक्षा उपकरणों (AI Safety Tools) की पहुँच सभी तक सुनिश्चित की जाए।
मध्यम अवधि (Medium-term) लक्ष्य: साझा मानक (Common Standards) प्रकाशित किए जाएँ। संबंधित कानूनों व नियमों में संशोधन किए जाएँ। AI घटनाओं की रिपोर्टिंग प्रणाली (Incident Reporting System) को लागू किया जाए। रेगुलेटरी सैंडबॉक्स (Regulatory Sandbox) परियोजनाएँ शुरू की जाएँ।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) में AI के एकीकरण को बढ़ाया जाए। क्षमता निर्माण (Capacity Building) और मानकीकरण कार्य लगातार जारी रखा जाए।
दीर्घ अवधि (Long-term) लक्ष्य: समय-समय पर गवर्नेंस फ्रेमवर्क की समीक्षा और अद्यतन (Review & Update) किया जाए ताकि यह टिकाऊ और प्रभावी बना रहे। उभरते जोखिमों और नई तकनीकों के अनुसार नए कानून तैयार किए जाएँ। भारत का डिजिटल इकोसिस्टम मजबूत, लचीला और अनुकूलनशील (Resilient & Adaptive) बना रहे, यह सुनिश्चित किया जाए।
हितधारकों के लिए व्यावहारिक दिशानिर्देश
दस्तावेज का चौथा भाग व्यावहारिक दिशा-निर्देश देता है, जिसमें उद्योग, डेवलपर, नियामक और नीति-निर्माताओं के लिए साफ-साफ सुझाव दिए गए हैं।
उद्योग, डेवलपर्स और AI लागू करने वाले संगठनों के लिए सुझाव: उन्हें मौजूदा भारतीय कानूनों का पालन करना होगा, साथ ही स्वैच्छिक सिद्धांतों और मानकों को अपनाने की सलाह दी गई है। कंपनियों को पारदर्शिता या ‘सेल्फ-असेसमेंट’ रिपोर्ट जारी करने, शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने और तकनीकी व कानूनी उपायों के जरिए जोखिम कम करने के निर्देश दिए गए हैं।
नियामकों (Regulators) के लिए सुझाव: नियामकों को नवाचार (innovation) को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ AI से होने वाले संभावित नुकसान या जोखिमों पर सक्रिय रूप से ध्यान देना चाहिए। दिशानिर्देशों में कहा गया है कि नियम इतने कठोर न हों कि वे नवाचार को रोक दें।
इसके बजाय, तकनीक और कानून के मिश्रित (techno-legal) दृष्टिकोण को अपनाने और समय-समय पर नीतियों की समीक्षा करने की सलाह दी गई है ताकि बदलती तकनीक के साथ तालमेल बना रहे।
गाइडलाइंस जारी करते हुए MeitY सचिव एस कृष्णन ने कहा कि भारत का उद्देश्य AI का इस्तेमाल नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए करना है, साथ ही इससे जुड़े खतरों और नुकसानों को भी संबोधित करना है।
उन्होंने जोर दिया कि जहाँ संभव हो, देश मौजूदा कानूनों का ही उपयोग करेगा और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण (human-centric approach) को केंद्र में रखेगा। यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 की तैयारियाँ चल रही हैं, जो अगले वर्ष नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी।