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रेप और ड्रग्स केस में घिरे रैपर को केरल सरकार ने किया सम्मानित, प्रकाश राज थे ज्यूरी के चीफ: बचाव पर भड़के आम लोग

केरल राज्य फिल्म पुरस्कारों की 55वीं घोषणा सोमवार (3 नवंबर 2025) को हुई, जिसमें रैपर हीरंदास मुरली ‘वेदन’ को सर्वश्रेष्ठ गीतकार (Best Lyricist) का पुरस्कार दिया गया। इस फैसले का सोशल मीडिया पर विरोध तेज हो गया है।

इस पुरस्कार का चयन जिस ज्यूरी ने किया, उसकी अध्यक्षता विवादित और हिंदू-विरोधी बयानों के लिए चर्चित अभिनेता प्रकाश राज ने की। वेदन को यह सम्मान फिल्म ‘मंजुम्मेल बॉयज’ के गीत ‘कुथंत्रम’ के लिए मिला है।

लेकिन उस पर बलात्कार और यौन शोषण के कई गंभीर आरोप हैं। मेडिकल छात्रा रही पीड़िता ने आरोप लगाया कि वेदन ने वित्तीय शोषण किया और कोच्चि व कोझिकोड में उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया।

इन आरोपों के चलते अब लोगों ने पुरस्कार की नैतिकता और वैधता पर सवाल उठाए हैं, खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसे मामलों में आरोपित कलाकारों को चयन प्रक्रिया से बाहर रखा जाता था।

प्रकाश राज ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि समिति वेदन के गीतों में झलकती ऊर्जा और संघर्ष को अनदेखा नहीं कर सकती थी। उन्होंने कहा, “वेदन का संगीत आज की पीढ़ी की आवाज है। रैप विद्रोह और जज़्बे की आधुनिक अभिव्यक्ति है और उसे पहचान मिलनी चाहिए।”

इस बार की ज्यूरी में निर्देशक रंजन प्रमोद, जिबू जैकब, स्क्रीनराइटर संतोष एचिक्कनम, साउंड डिजाइनर नितिन लूकोस, प्लेबैक सिंगर गायत्री अशोकन और एक्ट्रेस व डबिंग आर्टिस्ट भाग्यलक्ष्मी शामिल थीं।

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कई यूजर्स ने राज्य सरकार और प्रकाश राज दोनों पर सवाल उठाते हुए नाराजगी जताई। लोगों ने पूछा कि जब राज्य की नीति के अनुसार किसी भी आपराधिक आरोप वाले व्यक्ति को पुरस्कार की दौड़ से बाहर रखा जाता है, तो फिर वेदन को नामांकित ही क्यों किया गया? नेटिजन्स ने इस निर्णय को पक्षपाती और अनैतिक बताते हुए कहा कि इससे पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।

एक अन्य यूजर ने राज्य सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वेदन को कोर्ट के फैसले से पहले ही सम्मान देना गलत संदेश देता है। उसने यह भी पूछा कि इस मामले में महिला अधिकारों की बात करने वाली फेमिनिस्ट कार्यकर्ता चुप क्यों हैं। यूजर का कहना था कि सरकार का यह कदम न्याय प्रक्रिया और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति लापरवाही दर्शाता है।

एक यूजर ने दोहरा मापदंड (हिपोक्रेसी) पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की कई महिलाओं ने यौन शोषण के आरोपी वैरामुथु को सम्मान देने का विरोध किया था, तो फिर अब वेदन को पुरस्कार देने पर किसी ने प्रकाश राज से सवाल क्यों नहीं किया। यूजर ने कहा कि दोनों पर समान आरोप हैं, लेकिन इस बार सब चुप हैं, जो स्पष्ट पक्षपात दिखाता है।

एक व्यक्ति ने कहा कि कई महिलाओं के यौन शोषण से जुड़े आपराधिक मामले लंबित होने के बावजूद वेदान को सम्मान देना एक खतरनाक उदाहरण है। उसने नाराज़गी जताते हुए लिखा, “केरल सरकार को शर्म आनी चाहिए।”

एक यूजर ने लिखा कि रेप और एमडीएमए रखने के आरोप में हाल ही में गिरफ्तार रैपर वेदान को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मिला, जबकि हिजाब पहनने वाली मुस्लिम अभिनेत्री को अपनी पहली फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान दिया गया। यूजर ने आरोप लगाया कि इन पुरस्कारों में प्रतिभा से ज्यादा वामपंथी राजनीति का असर दिख रहा है।

कॉन्ग्रेस सांसद हिबी ईडन ने खुलकर रैपर वेदान का समर्थन किया, जबकि कई लोगों ने इस पर कड़ी नाराजगी और असहमति जताई। उनका कहना था कि यह फैसला समाज को गलत संदेश देता है। साथ ही, महिला संगठनों और फेमिनिस्ट समूहों पर भी आरोप लगाया गया कि वे इस मुद्दे पर जानबूझकर चुप्पी साधे हुए हैं।

वेदान का विवादास्पद इतिहास गंभीर आरोपों से जुड़ा है

पुलिस शिकायत के अनुसार, एक महिला ने रैपर वेदन पर 2021 से 2023 के बीच शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने का आरोप लगाया। कोच्चि पुलिस ने बताया, “विशेष पूछताछ के बाद उसकी गिरफ्तारी दर्ज की गई है। हमारे पास डिजिटल सबूत भी हैं जो आरोपों की पुष्टि करते हैं।”

मामला एक महिला डॉक्टर की शिकायत से शुरू हुआ, जिसने कहा कि वेदन ने दोस्ती का नाटक किया, संबंध बनाए और फिर दो साल में पाँच बार शादी का वादा करके उसका यौन शोषण किया। उसने यह भी बताया कि वेदान ने गीत रिलीज करने के नाम पर उससे पैसे भी लिए।

वेदन कई हफ्तों तक पुलिस से बचता रहा, जिसके बाद देश छोड़ने से रोकने के लिए लुकआउट नोटिस जारी किया गया। उसके खिलाफ दो और महिलाओं ने भी ऐसे ही आरोप लगाए।

पहली महिला ने बताया कि वह संगीत पर शोध के दौरान वेदान से मिली थी, जिसने होटल में उसके साथ गलत हरकत की, जिससे वह मानसिक आघात के कारण अपना काम छोड़ने को मजबूर हुई। दूसरी महिला ने कहा कि वह अपने दोस्त के घर वेदान से मिली थी और उसके संगीत व राजनीतिक विचारों से प्रभावित होकर करीब आई, लेकिन बाद में वेदन ने कई बार उसका यौन शोषण किया।

इन सभी शिकायतों की कॉपी मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को ईमेल के जरिए भेजी गई। आरोपों के अनुसार, पहली घटना 2020 में और दूसरी 2021 में हुई थी। इसके अलावा, अप्रैल 2025 में वेदान को कोच्चि के वायटिला इलाके से गांजा रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हिल पैलेस पुलिस की छापेमारी में लगभग 6 ग्राम गांजा बरामद हुआ।

पुलिस ने बताया कि वेदन ने ड्रग्स लेने की बात कबूल की है और मामूली मात्रा होने के कारण उसे स्टेशन बेल पर छोड़ा गया। सितंबर में पुलिस ने चार्जशीट अदालत में दाखिल की। एर्नाकुलम वन विभाग ने भी उसे बाघ के दाँत का लॉकेट पहनने के मामले में पकड़ा, जिसके लिए उसे दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया और कोडनाड मलयाटूर डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिस में पूछताछ की गई।

इसके अलावा, पलक्काड नगर परिषद की सदस्य वी एस मिनीमोल ने उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान करने और जातीय भेदभाव फैलाने के आरोप में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने कहा, “वेदन ने प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक और असत्य बयान दिए हैं, जो देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं।”

वेदन ने 2020 में अपना करियर ‘वॉइस ऑफ द वॉइसलेस’ एल्बम से शुरू किया था और वह एंटी-कास्ट (जातिवाद विरोधी) रैप्स के लिए जाना गया। उसने कई स्वतंत्र गाने और फिल्मी गीत बनाए।

दिलचस्प बात यह है कि पुरस्कारों की घोषणा कुछ ही दिन बाद हुई, जब केरल हाईकोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत की शर्तें ढीली कीं, जिससे उसे विदेश में प्रदर्शन की अनुमति मिल गई। थ्रिक्कक्कारा पुलिस ने इस मामले में अंतिम रिपोर्ट भी जमा कर दी है। गौरतलब है कि हाल के समय में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री (मॉलीवुड) में बलात्कार और यौन शोषण के गंभीर आरोपों ने पूरे उद्योग को हिला कर रख दिया है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

तमिलनाडु में हिंदुओं को अन्नदान के लिए जाना पड़ा HC, फिर भी सड़क जाम कर बैठे 500 ईसाई: स्टालिन प्रशासन ने भी इजाजत देने से किया था इनकार

तमिलनाडु में एक सार्वजनिक भूमि को लेकर विवाद बढ़ गया है, जिससे धार्मिक समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब कोर्ट ने हिन्दू समुदाय को उस जमीन पर भोज आयोजित करने की अनुमति दी। इस फैसले से नाराज स्थानीय ईसाई समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया।

डिंडीगुल में क्या हुआ?

तमिलनाडु के डिंडीगुल शहर में सोमवार (4 नवंबर 2025) को भारी अव्यवस्था देखने को मिली। पंचमपट्टी गाँव के ईसाई समुदाय के 500 से अधिक लोगों ने सड़क जाम कर बड़ा प्रदर्शन किया। उनका विरोध उस ‘अन्नदानम’ कार्यक्रम के खिलाफ था, जो सरकारी जमीन पर आयोजित किया जा रहा था।

यह अन्नदानम एक हिन्दू मंदिर के कुंभाभिषेक का हिस्सा था। प्रदर्शनकारियों ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ विरोध जताया, जिसमें हिन्दू समुदाय को इस भोज की अनुमति दी गई थी।

सुबह के समय सैकड़ों ईसाई पुरुष और महिलाएँ डिंडीगुल कलेक्टर कार्यालय के पास इकट्ठा हुए। वे कोर्ट के फैसले से नाराज थे और विरोध के रूप में अपने सरकारी पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड और वोटर आईडी वापस करने की बात कह रहे थे।

प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर कार्यालय जाने वाले मुख्य मार्ग को जाम कर दिया और ज़िला प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ नारेबाज़ी की। हालात तनावपूर्ण हो गए, जिसके बाद कानून-व्यवस्था संभालने के लिए 100 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा।

बाद में डिंडीगुल के जिला कलेक्टर एस सरवनन और पुलिस अधीक्षक ए प्रदीप ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की। बातचीत के बाद भीड़ शांत हो गई और प्रदर्शन वापस ले लिया गया।

हालाँकि मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। पुलिस ने बताया कि रविवार (2 नवंबर 2025) की रात कार्यक्रम स्थल पर काले झंडों के साथ हुए विरोध प्रदर्शन के मामले में 100 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

विवाद कैसे शुरू हुआ

यह घटना पंचमपट्टी गाँव से शुरू हुई, जहाँ स्थानीय हिन्दू समुदाय अपने मंदिर का कुंभाभिषेक समारोह आयोजित कर रहा था। इस पूजा के बाद वे सरकारी जमीन के एक खाली टुकड़े पर अन्नदानम करना चाहते थे। यह जमीन मंदिर और एक स्थानीय चर्च दोनों के पास ही स्थित है।

जब उन्होंने इसकी अनुमति माँगी, तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि इससे तनाव या कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती है।

इस फैसले को एक ग्रामीण ने अनुचित मानते हुए कोर्ट में चुनौती दी। मामला मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में पहुँचा। पुलिस ने कोर्ट में दलील दी कि उन्होंने अनुमति इसलिए नहीं दी क्योंकि उन्हें कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।

सार्वजनिक भूमि किसी एक धर्म के लिए आरक्षित नहीं

कोर्ट में यह मामला जस्टिस जी आर स्वामीनाथन के सामने आया। उन्होंने सबसे पहले यह पूछा कि जमीन का मालिकाना हक किसके पास है। जाँच में पता चला कि वह खाली जमीन ग्राममथम के रूप में दर्ज है, यानी यह पंचायत और सरकार की संपत्ति है।

इस आधार पर जस्टिस स्वामीनाथन ने फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि अगर जमीन सरकारी है, तो उसका उपयोग सभी समुदायों के लोग कर सकते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। उनके शब्दों में, “सार्वजनिक भूमि या तो सभी के लिए खुली होनी चाहिए या किसी के लिए नहीं।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई सार्वजनिक जगह सबके लिए खुली है, तो किसी एक समुदाय को केवल धर्म के आधार पर वहाँ से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस तरह का धार्मिक आयोजन करने का अधिकार अनुच्छेद 25 के अंतर्गत आता है।

जस्टिस ने पुलिस की कानून-व्यवस्था बिगड़ने वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि पुलिस का कर्तव्य लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है न कि संभावित परेशानी से बचने के लिए कार्यक्रम पर रोक लगाना।

ईसाई समुदाय का तर्क

सुनवाई के दौरान ईसाई समुदाय की दलीलें भी सुनी गईं। उनका कहना था कि करीब 100 साल पहले मैदान के एक हिस्से में एक मंच बनाया गया था, जिसका उपयोग हर साल ईस्टर त्योहार के कार्यक्रमों के लिए होता है। परंपरागत रूप से इस जगह का इस्तेमाल केवल ईसाई समुदाय करता आया है और हिन्दुओं को यहाँ धार्मिक कार्यक्रम करने की अनुमति कभी नहीं दी गई।

उन्होंने 2017 की शांति समिति की बैठक का भी जिक्र किया, जिसमें यह तय किया गया था कि इस मैदान पर कोई नया कार्यक्रम नहीं होगा, सिर्फ वही आयोजन होंगे जो पिछले 100 सालों से होते आ रहे हैं। रविवार (2 नवंबर 2025) की रात हुए विरोध प्रदर्शन में भी यही माँग उठी थी कि इस जमीन को पाश्का ग्राउंड (ईस्टर ग्राउंड) कहा जाए, ताकि यह स्पष्ट हो कि यह ईसाई समुदाय की परंपरागत जगह है।

जस्टिस स्वामीनाथन ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि अगर ईसाई समुदाय को ईस्टर के लिए इस मैदान का उपयोग करने की अनुमति है, तो हिन्दू समुदाय को भी उसी जगह पर अन्नदानम करने से नहीं रोका जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब ईस्टर का कार्यक्रम हो, उस दिन मैदान का उपयोग केवल ईसाई समुदाय को ही करने दिया जाए।

जस्टिस ने यह भी बताया कि गाँव में लगभग 2,500 ईसाई परिवार और करीब 400 हिन्दू परिवार रहते हैं। उन्होंने कहा कि केवल ईसाई समुदाय के विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या बताना पुलिस की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण सोच है। कोर्ट ने प्रशासन के इनकार वाले आदेश को रद्द कर दिया और अन्नदानम कार्यक्रम के लिए अनुमति देने के निर्देश दिए।

सरकारी जमीन पर अधिकार का सवाल

हाई कोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट था, लेकिन उसके बाद हुए विरोध ने यह दिखा दिया कि दोनों समुदायों के बीच गहरा तनाव मौजूद है। इस घटना ने यह बड़ा सवाल खड़ा किया कि हिन्दू समुदाय को सिर्फ एक दिन का सामुदायिक अन्नदान सरकारी जमीन पर करने के लिए कोर्ट तक क्यों जाना पड़ा?

कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद भी उन्हें बड़े पैमाने पर सड़क जाम और विरोध का सामना करना पड़ा। कई लोगों का कहना है कि यह एकाधिकार की मानसिकता का मामला है, जहाँ एक समूह सार्वजनिक संपत्ति को केवल अपना अधिकार मानता है।

असल बात यह है कि वह जमीन किसी चर्च की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सरकारी भूमि है। सिद्धांत रूप में सरकारी जमीन देश के सभी नागरिकों की होती है, चाहे वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान हों या कोई और। जब तक कोई कार्यक्रम शांतिपूर्वक और दूसरों को बिना नुकसान पहुँचाए आयोजित किया जाता है, तब तक किसी भी समुदाय को इसका उपयोग करने का अधिकार है।

भारत जैसे विविधता भरे देश में जहाँ कई धर्म और समुदाय साथ रहते हैं, पारस्परिक सम्मान ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। साथ ही, विरोध का तरीका भी सवालों में है। विरोध जताना सबका अधिकार है, लेकिन मुख्य सड़कों को जाम करना और आम जनता की आवाजाही रोकना गलत है। इससे आम लोग जो इस विवाद से जुड़े भी नहीं हैं सबसे ज्यादा परेशानी झेलते हैं।

ऐसा ही मामला: विशालगढ़ किले पर बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

डिंडीगुल की घटना अपने आप में अकेली नहीं है। तमिलनाडु में ही एक और ऐसा मामला तिरुपरंकुंद्रम मुरुगन मंदिर पहाड़ी पर सामने आया था। यह पहाड़ी हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यह भगवान मुरुगन के छह प्रमुख तीर्थ स्थलों (अरुपदै वेडु) में से एक है।

विवाद 27 दिसंबर 2024 को शुरू हुआ, जब कुछ मुस्लिम श्रद्धालु सिखंदर बादूशा दरगाह जो इसी पहाड़ी पर स्थित है उस पर बकरों और मुर्गों की बलि देने के लिए उन्हें लेकर आए।

मंदिर प्रशासन और पुलिस ने उन्हें रोक दिया, यह कहते हुए कि इतने पवित्र स्थल के पास पशु बलि की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बाद करीब 20 मुसलमानों ने पहाड़ी के नीचे विरोध प्रदर्शन किया। यह मामला भी मद्रास हाईकोर्ट पहुँच गया।

जस्टिस विजयकुमार ने सरकारी और पुरातात्विक अभिलेखों की जाँच की, जो 1908 तक के थे। उन्होंने निर्णय दिया कि इस स्थल का आधिकारिक और ऐतिहासिक नाम तिरुपरंकुंद्रम हिल है। इसे सिखंदर मलै कहने की कोशिश को उन्होंने भ्रामक और पहचान बदलने की कोशिश बताया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दरगाह पर पशु बलि की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं हुई। साथ ही कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को नेल्लीथोप्पु क्षेत्र के एक छोटे हिस्से में रमजान और बकरीद के दौरान नमाज अदा करने का अधिकार है, लेकिन वहाँ तक जाने वाली सीढ़ियाँ और पहाड़ी पर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर मंदिर प्रशासन की संपत्ति हैं और उन्हें अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।

हिंदू समुदाय के अधिकारों का हो रहा हनन

डिंडीगुल अन्नदान विवाद और तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी मामले को देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है। दोनों ही घटनाओं में हिन्दू समुदाय के अधिकारों को चुनौती दी गई, डिंडीगुल में सार्वजनिक जमीन पर अन्नदान करने के अधिकार को और तिरुपरंकुंद्रम में पवित्र स्थल की पवित्रता की रक्षा के अधिकार को। डिंडीगुल में विरोध एक सामुदायिक भोज को लेकर हुआ, जबकि तिरुपरंकुंद्रम में पवित्र हिन्दू पहाड़ी पर पशु बलि देने की कोशिश की गई।

दोनों मामलों में हिन्दू समुदाय को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। खास बात यह रही कि डिंडीगुल में कोर्ट का साफ आदेश आने के बाद भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ, जिससे यह साफ दिखता है कि जमीनी स्तर पर हालात अब भी बेहद नाजुक हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट दिव्या भारती ने अंग्रेजी में लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हिन्दुओं पर I Love Muhammad वालों का हमला, भागलपुर में हिन्दू अल्पसंख्यक?

बिहार में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए ऑपइंडिया की टीम भागलपुर पहुँची। यहाँ ‘इस्लामी मोहल्ला’ खौफ की दास्तान सुना रहा था। इस गाँव में Muslims ने हिन्दुओं के एक घर पर हमला किया। यह इलाका मुस्लिम बहुल है। यहाँ आसपास सारे घरों पर हरे झन्डे हैं।

हिन्दू परिवार का इसी के चलते जीना मुहाल है। हाल ही में I Love Muhammad विवाद के दौरान एक हिन्दू घर को घेर कर पत्थर बरसाए गए। ऑपइंडिया इन्हीं पीड़ितों की कहानी लेकर आया है।

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

शहाबुद्दीन के गढ़ सिवान में AIMIM लगा रही सेंध, उसी के पुराने शूटर को टिकट देकर ओवैसी ने खींचा वोटबैंक: पुराने माफिया के समर्थक बौखलाए

आरजेडी के मुस्लिम माफिया शहाबुद्दीन के गढ़ सिवान में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM अपने हाथ पैर पसार रही है। सिवान के मुसलमानों का कहना है कि वे आरजेडी के गमछे को पसीना पोंछने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

वहीं शहाबुद्दीन के समर्थक इससे बौखलाए हुए दिखे और अपने प्रतिस्पर्धी को औकात दिखाने की बात करने लगे। एम-वाय राजनीति करनेवाली आरजेडी के हाथ से मुस्लिम वोट बैंक फिसलती नजर आती है।

देखें- सिवान से ग्राउंड रिपोर्ट

बेगूसराय में बोले लोग- PM मोदी और NDA सरकार ने बदली बिहार की सूरत: राहुल-INDI गठबंधन से फेरा मुँह, कहा- नहीं चाहिए जंगलराज

बिहार विधानसभा चुनाव में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग की टीम बेगूसराय पहुँची। इस दौरान बेगूसराय की जनता ने साफ-साफ NDA को समर्थन दिया। चाय की टपरी से लेकर घर-घर तक लोग मोदी-नीतीश की तारीफ करते नहीं थक रहे। एक बुजुर्ग ने कहा, “सड़कें बनीं, बिजली आई, स्कूल-हॉस्पिटल सुधरे, पहले तो जंगलराज में डर लगता था।”

बेगूसराय में राहुल गाँधी और INDI गठबंधन पर कोई चर्चा नहीं होती। एक महिला ने हंसकर कहा, “राहुल जी तो वादे करते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। RJD आया तो अपराध लौटेगा, हमें विकास चाहिए, डर नहीं।”

बिहार के बेगूसराय से ग्राउंड रिपोर्ट

राहुल गाँधी ने फिर की GenZ को भड़काने की कोशिश, लोकतंत्र-संविधान की रक्षा की आड़ में PM मोदी का घर घेरने की भी कर चुके हैं अपील: युवराज जी- युवा जागरूक है

हरियाणा से लेकर बिहार तक हर मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी देश के GenZ को भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। ताजा मामला हरियाणा विधानसभा चुनाव में कथित ‘वोट चोरी’ के आरोप का है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने GenZ को बताने की कोशिश की, कि कैसे हरियाणा चुनाव में ‘वोट चोरी’ की गई।

उन्होंने इस दौरान सीएम सैनी की मुस्कुराहट और व्यवस्था जैसे शब्द को आधार बनाया और आरोप जड़ दिए। ये तब उन्होंने किया है जब हरियाणा के लोगों ने कॉन्ग्रेस पार्टी को चुनाव में मात दे दी। जाहिर है वोटिंग करने वालों में बड़ी संख्या में GenZ थे। ऐसे में राहुल गाँधी चुनाव नतीजों को ‘वोट चोरी’ का नाम देकर राज्य के वोटरों का अपमान कर रहे हैं। इनमें GenZ भी शामिल हैं।

राहुल गाँधी ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि भारत के युवा, GenZ इसे स्पष्ट रूप से समझें, क्योंकि यह आपके भविष्य के बारे में है…मैं भारत में चुनाव आयोग, लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा हूँ, इसलिए मैं इसे 100% सबूत के साथ कर रहा हूँ। हमें पूरा यकीन है कि कॉन्ग्रेस की भारी जीत को हार में बदलने की योजना बनाई गई थी। “

बिहार चुनाव में पीएम मोदी के घर पहुँचने के लिए GenZ को उकसाया

ये पहला मौका नहीं है, जब राहुल गाँधी ने GenZ को भड़काया हो। 29 अक्टूबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव में दरभंगा की रैली में उन्होंने GenZ को उकसाया कि वो मोदीजी के घर तक पहुँच जाएँ।

राहुल गाँधी ने कहा कि “अगर बेरोजगारों को इंस्टाग्राम और फेसबुक में ‘बिजी’ नहीं रखोगे, तो ये मोदीजी के घर पहुँच जाएँगे” उन्होंने GenZ से बेरोजगारी पर बात करते हुए कहा कि ” युवा 24 घंटे इंस्टा पर इसलिए हैं क्योंकि आपने नौकरी नहीं दी। आप जितना चाहे इंस्टा पर रह सकते हो… अगर आप फेसबुक, इंस्टाग्राम पर नहीं रहोगे, तो रोजगार के लिए मोदीजी के घर पहुँच जाओगे। रील में कुछ नहीं है आपके लिए, एक दो लोग इंफ्लुएंसर बनेंगे और एक दो साल बाद बेरोजगारी में डूब जाएँगे।”

चुनाव आयोग पर सवाल उठा कर युवाओं को भड़काया

हर चुनाव के पहले वे उन्होंने पहले भी चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है। 18 सितंबर 2025 को उन्होंने कर्नाटक में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जाने का आरोप आयोग पर लगाया था। हालाँकि कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की सरकार है। फिर भी राहुल गांधी ने कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के गढ़ रहे क्षेत्रों में 6,000 से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। ये तब कहा जब अलंद में भी कॉन्ग्रेस का ही विधायक है। इस दौरान राहुल गाँधी ने देश के युवा से ‘लोकतंत्र को बचाने’ की अपील की।

एक्स पर उन्होंने लिखा, “देश के युवा, GenZ संविधान की रक्षा करेंगे, लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी से बचाएँगे”

18 सितंबर को राहुल गाँधी ने ये भी कहा था कि संस्थानों को बचाने का काम उनका नहीं है, बल्कि ये जेनजी का है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कहा, “सच कहूँ तो, मैं यहाँ जो कर रहा हूँ वह मेरा काम नहीं है। मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाग लेना है। मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है।”

हिंदुस्तान के लोकतंत्र को बचाने का काम उनका नहीं और वे इसकी रक्षा नहीं करेंगे। उसके बाद में ये कहना कि यह काम GenZ का है। यह साफ दिखा रहा है कि राहुल युवाओं को अपने ही देश, अपने ही लोकतंत्र के खिलाफ भड़काने का प्रयास कर रहें हैं। उनकी इस तरह की हरकत के पीछे उनकी क्या मंशा है? यह देश देख रहा है।

नेपाल में GenZ विरोध से हुआ सत्ता परिवर्तन

कॉन्ग्रेस नेता ने अपनी पोस्ट में ‘GenZ’ का जिक्र किया। यह कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन इन दिनों यह काफी चर्चा में है। इसकी एक बड़ी वजह नेपाल में हाल ही में हुआ राजनीतिक बदलाव है। बीते दिनों नेपाल में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए, जिनकी अगुवाई GenZ यानी आज की युवा पीढ़ी ने की। यहाँ हुए विरोध प्रदर्शनों को जेनजी आंदोलन कहा गया। इसकी वजह से पीएम ओली को इस्तीफा देना पड़ा।

जेनजी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए लोगों को जेनरेशन जूमर्स यानी जेन जी कहा जाता है। माना जाता है कि ये जेनरेशन बचपन से ही स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, इंटरनेट की दुनिया में जी रहा है और ‘डिजिटली फिट’ है।

GenZ कौन हैं?

GenZ वे युवा हैं, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। आज इनकी उम्र 12 से 27 साल के बीच है। भारत में इनकी संख्या करीब 37 करोड़ मानी जाती है, जो देश की आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। यानी भारत का भविष्य GenZ के हाथों में ही है। कंपनियाँ, सरकारें और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक इन्हीं को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ तय कर रहे हैं।

स्लैंग से मशहूर GenZ

भारत के GenZ की इंटरनेट पर अपनी भाषा है, जिसे स्लैंग के रूप में जाना जाता है। ये स्लैंग अब हर जगह छाए हुए हैं। अब ये स्लैंग सिर्फ व्हाट्सऐप के चैट्स तक सीमित नहीं है बल्कि बॉलीवुड के गानों और विज्ञापनों तक पहुँच गए हैं। कुछ स्लैंग का अर्थ समझते हैं

rizz – मतलब किसी को इम्प्रेस करने की कला।
delulu– जब इंसान हकीकत छोड़कर ख्वाबों में जीने लगे।
brat– थोड़ा बागी, थोड़ा नखरीला अंदाज।

इसले अलावा skibidi, delulu, और tradwife जैसे कुछ स्लैंग तो कैम्ब्रिज डिक्शनरी तक में भी शामिल किए गए हैं। यह पीढ़ी अपने अलग बोलचाल और अंदाज से बाकी सबको प्रभावित कर रही है।

भारत में GenZ हर साल ₹72 लाख करोड़ करते है खर्च

GenZ न सिर्फ इंटरनेट पर बल्कि अर्थव्यवस्था में भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत के GenZ हर साल 72 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करते हैं। देश के कुल उपभोक्ता खर्च का करीब 43 प्रतिशत हिस्सा GenZ से ही आता है। वहीं अन्य रिपोर्ट बताती है कि GenZ अपनी कमाई का 30 प्रतिशत हिस्सा सेविंग में डालते हैं।

GenZ सबसे ज्यादा फैशन, डाइनिंग और मनोरंजन में खर्च कर रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, उनका 50 प्रतिशत खर्च फुटवियर, 48 प्रतिशत डाइनिंग, 48 प्रतिशत बाहरी मनोरंजन और 47 प्रतिशत फैशन और लाफस्टाइल पर खर्च होता है। यही नहीं GenZ ट्रैवलर्स साल में दो से तीन बार ट्रिप पर भी जाते हैं, जिनमें 94 प्रतिशत युवा साल में एक बार तो जरूर ही ट्रैवल करते हैं।

पूर्णिया या पाकिस्तान: जिस हिंदू कार्यकर्ता की हुई हत्या उसके भाई ने खोले पप्पू यादव के राज, बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ाने-हत्या का लगाया आरोप

ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम बिहार के सीमांचल इलाके में पूर्णिया पहुँची। यहाँ सीमांचल में बांग्लादेशी घुसपैठ ने हिंदुओं की जिंदगी मुश्किल बना दी है। कई पार्टियाँ वोटबैंक के लिए इन घुसपैठियों को बसाती आई हैं। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पर भी इस्लामी घुसपैठ बढ़ाने और हत्या कराने के गंभीर आरोप हैं।

साल 1992 में पूर्णिया में एक हिंदू स्वयंसेवक किशोर सिंह की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई थी। उनके छोटे भाई मनोज सिंह ने अनुराग सिंह से खास बातचीत में सबकुछ उजागर किया। मनोज बोले, “भाई को मारकर हमें चुप कराना चाहते थे, लेकिन आज भी डर नहीं। पप्पू यादव जैसे नेता घुसपैठियों को शह देते हैं, वोट के लिए हिंदू मारते हैं।”

मनोज ने सबूतों के साथ पुरानी कहानी दोहराई कि कैसे राजनीतिक साजिश से हत्या हुई। उन्होंने बताया कि सीमांचल में हिंदू अब जाग रहे हैं। मनोज ने आम लोगों से अपील की है- “वोट दो, लेकिन घुसपैठ रोकने वालों को।”

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

मुस्लिम लीग के इशारे पर सरदार पटेल को मारने के लिए तलवारें-छुरे लेकर दौड़े थे इस्लामी कट्टरपंथी, मस्जिद में जमा थे हथियार: जाने भावनगर का वो इतिहास जो भुला दिया गया

भावनगर और सरदार वल्लभभाई पटेल का रिश्ता बहुत पुराना है। सरदार पटेल का महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी से गहरा संबंध था, और इसी कारण आज भी भावनगर के इतिहास में पटेल का नाम सम्मान के साथ दर्ज है। कहा जाता है कि सरदार पटेल की यादें भावनगर से दो ऐतिहासिक घटनाओं के रूप में जुड़ी हुई हैं। एक स्मृति स्वतंत्रता के बाद देश के बने नक्शे से जुड़ी है। लेकिन एक दूसरी याद भी है जो अब लगभग भुला दी गई है। वह याद अब भावनगर की गलियों में वक्त की धूल में कहीं दब गई है।

यह बात है साल 1939 की। देश तब तक अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद नहीं हुआ था लेकिन उसी समय भावनगर रियासत ने एक ऐतिहासिक घोषणा की थी कि आजादी मिलने के बाद भावनगर भारत में शामिल होने वाली पहली रियासत बनेगी। इस घोषणा के बाद भावनगर में चर्चाओं का माहौल गर्म हो गया। इसी बीच, 14 और 15 मई 1939 को भावनगर में ‘भावनगर स्टेट काउंसिल’ का 5वाँ अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता खुद सरदार पटेल ने की थी और महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी ने उन्हें विशेष रूप से भावनगर आने का निमंत्रण भेजा था।

सरदार पटेल ने आमंत्रण स्वीकार किया और 14 मई को भावनगर पहुँचे। रेलवे स्टेशन से उनका स्वागत एक खुले जीप में जुलूस के रूप में किया गया। सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ी थी, लोग ‘सरदार पटेल की जय!’ के नारे लगा रहे थे। इसी बीच, परदे के पीछे एक खतरनाक साजिश रची जा चुकी थी। मुस्लिम लीग ने पहले ही सरदार पटेल की इस यात्रा को निशाना बनाने की योजना बना ली थी। स्थानीय कट्टरपंथी मुस्लिम, मुस्लिम लीग के इशारे पर, शहर की एक मस्जिद में इकट्ठा होकर हमले की तैयारी कर रहे थे। योजना इतनी भयानक थी कि उसमें सरदार पटेल की हत्या तक की साजिश शामिल थी।

सरदार पटेल का आगमन और मुसलमान कट्टरपंथियों का हमला

सरदार वल्लभभाई पटेल रेलवे स्टेशन से खुले जीप में बैठकर लोगों का अभिवादन करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जब उनका जुलूस खारगेट चौक पहुँचा, तो नगीना मस्जिद के पास अचानक हंगामा शुरू हो गया। पहले से बनाई गई साजिश के तहत, मस्जिद में बैठे कई इस्लामी कट्टरपंथी हथियार लेकर बाहर निकल आए और सरदार पटेल की जीप की तरफ दौड़ पड़े। उनके हाथों में तलवारें, छुरे, कुल्हाड़ियाँ और तेज धार वाले हथियार थे।

हालाँकि, सरदार पटेल तक हमला पहुँचने से पहले, कानबिवाड़ के एक नौजवान बचुभाई पटेल और लोकभारती के संस्थापक नानाभाई भट्ट ने अपनी जान की परवाह किए बिना सरदार पटेल की जीप पर चढ़कर उनके लिए ढाल बन गए। कट्टरपंथियों के सारे वार इन दोनों युवकों पर पड़े। इसमें बचुभाई पटेल बुरी तरह घायल हो गए और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। नानाभाई भट्ट भी घायल हुए लेकिन इलाज के बाद वे बच गए।

घटना की खबर मिलते ही भावनगर की पुलिस तुरंत नगीना मस्जिद पहुँची। सिपाहियों ने भाले और बंदूकों के साथ भीड़ को तितर-बितर कर दिया। अगर उस दिन ये कट्टरपंथी अपनी साजिश में सफल हो जाते, तो आजादी के बाद भारत का इतिहास शायद कुछ और ही होता। इस हमले ने पूरे भावनगर शहर को हिला कर रख दिया। हर जगह डर और सन्नाटा फैल गया। बाद में परिषद की बैठक में सरदार पटेल ने खुद कहा था, “यह कोई अचानक गुस्से में किया गया काम नहीं था बल्कि इसके पीछे पहले से रची गई सोची-समझी साजिश थी।”

पूर्व नियोजित थी साजिश: तत्कालीन पुलिस अधिकारी

इस पूरे मामले में उस समय भावनगर की अदालत में मुकदमा भी दर्ज किया गया था। इसमें कुल 14 लोगों को आरोपी बनाया गया था। जिनमें वरस अली, बिलाल इब्राहिम, अब्दुल सत्तार मूसा, अब्दुल्ला सिद्दी, उस्मान खान मोहम्मद खान, उस्मान नूरमिया, अब्दुल गफूर, अब्दुल कादिर, अलीवद, मूसा अब्दुल, कासम, मोहम्मद सुलेमान, इस्माइल और अलरखान इब्राहिम शामिल थे। 12 जुलाई 1939 को उस समय के अखबार ‘द काठियावाड़ टाइम्स’ ने इस मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी। यह रिपोर्ट पुलिस अधिकारी पोपटभाई की गवाही पर आधारित थी, जो उन्होंने अदालत में दी थी।

पोपटभाई ने अपनी गवाही में बताया कि कार्यक्रम से पहले मुस्लिम लीग के कुछ लोगों ने एक अर्जी दी थी कि जुलूस के दौरान कोई बाजा या ढोल नहीं बजाया जाए। बाद में पता चला कि यह अर्जी अब्दुल कादर लाखानी नाम के व्यक्ति ने मुस्लिम लीग के उपाध्यक्ष के कहने पर लिखी थी। पोपटभाई ने इस बात की जानकारी परिषद के सचिव जादवजी मोदी को दी और उनसे कहा कि नगीना मस्जिद के सामने बाजे न बजाए जाएँ।

साथ ही, वहाँ ज्यादा पुलिस बल तैनात करने की भी बात की गई थी। इसके अलावा, पोपटभाई ने एक प्रमुख मुस्लिम नेता से भी बात की थी। उन्होंने आश्वासन दिया था कि मुस्लिम समुदाय की ओर से कोई हंगामा नहीं होगा और वे खुद 14 मई 1939 को सरदार पटेल के स्वागत समारोह में मौजूद रहेंगे।

पोपटभाई के दावे पर रिपोर्ट

13 मई की रात करीब साढ़े नौ बजे पुलिस को टेलीफोन से सूचना मिली कि नगीना मस्जिद में डंडे, तलवारें और पत्थर जमा किए गए हैं और वहाँ करीब पाँच सौ मुसलमान इकट्ठा हैं। हालाँकि, पुलिस ने इस सूचना को पुख्ता नहीं माना और मस्जिद पर छापा नहीं मारा। अगली सुबह सरदार पटेल भवनगर पहुँचे। नगीना मस्जिद के सामने सुरक्षा बल तैनात थे।

फिर भी, जब जुलूस वहाँ पहुँचा तो भीड़ में शामिल कुछ इस्लामी कट्टरपंथी भड़क उठे। हालाँकि, वहाँ ढोल या बाजे नहीं बजाए गए थे लेकिन वे गुस्से में हिंदुओं पर टूट पड़े। अचानक “मारो, मारो” की आवाज़ें गूँजने लगीं और भीड़ ने डंडों, तलवारों, छतरियों और चाकुओं से हिंदुओं पर हमला कर दिया।

इधर, पुलिस अधिकारियों ने तुरंत समझदारी दिखाते हुए सरदार पटेल से कहा कि वे दूसरी दिशा से निकल जाएँ। इसी वजह से उनकी जान बच गई। बाद में और पुलिस बल बुलाया गया और स्थिति पर काबू पाया गया। दंगाइयों को गिरफ्तार भी कर लिया गया।

सरदार पटेल ने दी श्रद्धांजलि

21 मई 1939 के ‘गुजरात मित्र’ अखबार में भी इस घटना का ज़िक्र किया गया था। रिपोर्ट में लिखा गया था कि मुस्लिम कट्टरपंथियों के हमले में एक स्वयंसेवक की मौत हो गई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

इस हंगामे की वजह से कार्यक्रम बीच में ही रद्द कर दिया गया और सरदार पटेल को सीधे उनके निवास स्थान पर पहुँचा दिया गया। इसके बाद शहर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई। जगह-जगह भाले लिए हुए सैनिक और पैदल सेना तैनात की गई। नगीना मस्जिद को चारों तरफ से घेर लिया गया ताकि किसी तरह की गड़बड़ी दोबारा ना हो सके।

जब पुलिस ने मस्जिद की तलाशी ली, तो वहाँ से छिपाए गए हथियार बरामद हुए। इसके बाद शहर भर से कई मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया। इस हमले में घायल हुए लोगों को सिर तख्तसिंहजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। सरदार पटेल खुद अस्पताल पहुँचे और घायल लोगों से मिले। उसी समय महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी, जो गर्मी के कारण महुवा में ठहरे हुए थे, उन्हें भी इस पूरी घटना की जानकारी दी गई।

सरदार पटेल की जान बचाने वाले बचुभाई पटेल की शहादत के सम्मान में पूरे भावनगर में बंद (हड़ताल) रखा गया। शाम को उनका अंतिम यात्रा जुलूस निकाला गया, जिसमें 20,000 से ज्यादा लोग शामिल हुए। सरदार पटेल भी इस जुलूस में मौजूद थे। श्रद्धांजलि देते हुए सरदार पटेल ने कहा, “ऐसी मौत कुछ ही लोगों को नसीब होती है।” मुस्लिम लीग की साजिश के बारे में उन्होंने कहा, “राष्ट्र सेवा के लिए ऐसी गुंडागर्दी से मैं डरने वाला नहीं हूँ।”

यह सचमुच हैरान करने वाली बात थी कि उस समय जैसी प्रगतिशील और उदार रियासत भावनगर मानी जाती थी, वहीं पर सरदार पटेल की हत्या की साजिश रची गई। अगर यह हमला सफल हो जाता, तो भावनगर के नाम के साथ राष्ट्रीय अपमान का कलंक जुड़ जाता और शायद आजाद भारत का इतिहास ही नहीं बल्कि उसका नक्शा भी कुछ और होता।

मुस्लिम लीग की ऐसी कई साजिशें इतिहास से हमेशा मिटा दी गईं। इसी वजह से सरदार पटेल पर हुए इस हमले के बारे में न तो किताबों में पढ़ने को मिलता है, न ही कहीं इसका जिक्र सुनाई देता है। यह घटना धीरे-धीरे इतिहास की धूल में दब गई जबकि इसका असर उस दौर में पूरे देश को हिला देने वाला था।

काशी में ‘स्वर्ग से उतरेंगे देवता’, लाखों दीपों से जगमगाएँगे घाट: जानिए कैसे 2 कनस्तर तेल से शुरू हुई ‘देव दीपावली’ बनी विश्व का अनोखा दीपोत्सव

कार्तिक पूर्णिमा की वह पावन तिथि आ चुकी है। भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) एक अलौकिक ऊर्जा और सौंदर्य से सराबोर होने को तैयार है। बुधवार (5 नवंबर 2025) की शाम, जैसे ही सूर्य देव अस्त होंगे, पतित पावनी माँ गंगा के ऐतिहासिक घाटों पर दीपों की अनगिनत कतारें जल उठेंगी और वह शुभ क्षण आ जाएगा जब धरती पर देवताओं की दीपावली- देव दीपावली मनाई जाती है। यह गहरा विश्वास है कि इस रात स्वयं देवता स्वर्ग से काशी में उतरकर दीप प्रज्ज्वलित करते हैं, और संपूर्ण वाराणसी क्षण भर के लिए देवलोक का रूप ले लेती है।

पौराणिक काल की विजयगाथा: त्रिपुरासुर का वध

देव दीपावली का इतिहास स्कंद पुराण और शिव पुराण के पन्नों में दर्ज है। यह कथा भगवान शिव की एक महान विजय से जुड़ी है। दैत्य त्रिपुरासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया था। वरदान के अनुसार, उसे केवल उसी समय मारा जा सकता था जब सूर्य, चंद्र और अग्नि का दुर्लभ संयोग (जिसे त्रिपुर संयोग कहा गया) बने। इस शक्ति के अहंकार में त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

देव दीपावली मनाते हुए बनारस के घाट की तस्वीर (फोटो साभार : Aajtak)

तब, स्वयं भोलेनाथ ने अपने प्रचंड पिनाक धनुष से केवल एक बाण चलाकर, उसके तीन अभेद्य नगरों- स्वर्ण, रजत और लौह के त्रिपुरों का नाश कर दिया। भगवान शिव की इस अजेय विजय से देवताओं का भय दूर हुआ। इस खुशी में, सभी देवताओं ने मिलकर काशी में दीप जलाए और शिव की आराधना की। तभी से यह दिन ‘देव दीपावली’ के रूप में मनाया जाने लगा।

दो कनस्तर तेल से निकले दीपोत्सव की आधुनिक शुरुआत

भले ही यह पर्व सदियों पुराना है, लेकिन इसे आज के भव्य रूप में लाने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। यह आधुनिक परंपरा वर्ष 1984 में शुरू हुई, जब पंडित विजय उपाध्याय ने अकेले सिंधिया घाट पर केवल दो कनस्तर तेल से दीप जलाकर इस भव्य दीपोत्सव की नींव रखी। अगले ही वर्ष, काशी के तत्कालीन नरेश डॉ विभूति नारायण सिंह भी इस अभियान से जुड़े, जिससे आयोजन को जन समर्थन मिला और सहयोग के लिए दुकानों पर दान-पात्र रखवाए गए।

साल 1986 में केंद्रीय देव दीपावली महासमिति का गठन हुआ और धीरे-धीरे यह आयोजन केवल घाटों तक सीमित नहीं रहा। 1990 के दशक तक, दीपों की यह श्रृंखला कुंडों, तालाबों और संपूर्ण नगर में फैल गई, जिससे आज यह काशी का सबसे बड़ा उत्सव बन गया है।

श्रद्धा और भव्यता का महासंगम

आज रात, वाराणसी के सभी प्रमुख घाटों- जिनमें अस्सी, दशाश्वमेध, पंचगंगा, नमो और चेतसिंह घाट शामिल है, पर लाखों दीप प्रज्वलित होंगे। सभी घाट समितियों ने दीपक और तेल का वितरण पहले ही पूरा कर लिया है।

वाराणसी के घाट पर पटाखों की बौछार (The Quint)

इस बार चेतसिंह किला मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेगा, जहाँ 25 मिनट का भव्य लेजर शो दिखाया जाएगा। इस शो में शिव-पार्वती की कथाओं, गंगा अवतरण, लक्ष्मी-नारायण की कहानियों के साथ-साथ काशी के गौरवशाली इतिहास, संत कबीर, तुलसीदास और बीएचयू की झलकियाँ दिखाई जाएँगी। यह शो रात 8:15, 9:00 और 9:35 बजे प्रदर्शित किया जाएगा।

अस्सी स्थित पुष्कर तालाब पर एक विशेष दीपदान किया जाएगा, जहाँ महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, विदुषी गिरिजा देवी और प्रो वीरभद्र मिश्र जैसी काशी की महान विभूतियों की स्मृति में दीप जलाए जाएँगे।

गंगा का जलस्तर ऊँचा होने के बावजूद, कलाकार और छात्र मिलकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थीम पर विशेष दीप डिजाइन तैयार कर रहे हैं, जो काशी की कलात्मकता और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है। गंगा पार रेत पर ग्रीन क्रैकर्स की आतिशबाजी और संगीत की धुन पर नाचती रोशनी पूरे आकाश को रंगीन कर देगी।

जब गंगा के तट लाखों दीपों से आलोकित होते हैं, तो यह पर्व केवल दीयों की रोशनी का नहीं, बल्कि भक्ति, सौंदर्य और शिव की विजय का उत्सव बन जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन गंगा में दीपदान करने से सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

देव दीपावली काशी के हृदय में बसे उस शाश्वत और शाश्वत संदेश को दोहराती है: ‘जहाँ प्रकाश है, वहीं शिव हैं और जहाँ शिव हैं, वहाँ सृष्टि का उत्सव है।’

QS रैंकिंग में 10 साल में दस गुना बढ़ी भारत की भागीदारी, संस्थान के VP ने कहा- साफ दिख रहा है NEP 2020 का असर: जानें मोदी सरकार ने कैसे बदले उच्च शिक्षा के हालात?

हाल ही में, क्यूएस (QS) नाम की संस्था ने एशिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों की लिस्ट जारी की है, जिसका नाम है क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026। इस लिस्ट में भारत ने कमाल कर दिया है। एशिया के टॉप 100 सबसे बेहतरीन कॉलेजों में भारत के कुल 7 बड़े शिक्षण संस्थान शामिल हुए हैं। इनमें पाँच बड़े आईआईटी, IIT दिल्ली, IIT मद्रास, IIT बॉम्बे, IIT कानपुर, और IIT खड़गपुर शामिल हैं। अन्य दो में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU)।

IIT दिल्ली को इस साल 59वीं रैंक मिली है और यह लगातार पाँचवीं बार भारत का नंबर-1 संस्थान बना है। सिर्फ टॉप 100 ही नहीं, बल्कि टॉप 200 में भारत के 20 कॉलेज और टॉप 500 में 66 कॉलेज शामिल हैं। क्यूएस के मुताबिक, भारत में PhD किए हुए टीचरों की संख्या पूरे एशिया में सबसे अच्छी है। इसका मतलब है कि हमारे कॉलेज गुणवत्ता के मामले में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। पिछली बार की तुलना में, भारत के 36 कॉलेजों ने अपनी रैंक सुधारी है, जबकि 105 कॉलेज नीचे चले गए हैं। क्यूएस ने बताया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस बार रैंकिंग में बहुत सारे नए कॉलेजों को शामिल किया गया था, जिससे रिजल्ट में थोड़ा बदलाव आया है।

आईआईटी, आईआईएससी की बढ़ती धाक और नई शिक्षा नीति का कमाल

हमारे देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान, जैसे कि आईआईटी (IITs) और आईआईएससी (IISc), अब सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया में खूब चमक रहे हैं। क्यूएस एशिया रैंकिंग 2026 के जो नंबर आए हैं, वे बताते हैं कि पिछले दस सालों में भारत ने एशिया की टॉप यूनिवर्सिटी की लिस्ट में अपनी जगह दस गुना ज्यादा पक्की कर ली है। इसका मतलब है कि हमारे कॉलेज अब टेक्नोलॉजी, रिसर्च और अच्छी पढ़ाई के मामले में दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। यह दिखाता है कि भारत अब शिक्षा की दुनिया में एक बड़ा नाम बन रहा है।

इस बड़ी कामयाबी के पीछे एक बड़ी वजह है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020। इस नई शिक्षा नीति ने पढ़ाई के तरीकों को काफी बदल दिया है। अब पढ़ाई में अलग-अलग विषयों को जोड़कर पढ़ाया जा रहा है, रिसर्च यानी खोजबीन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है और विदेशी यूनिवर्सिटी से दोस्ती (अंतरराष्ट्रीय सहयोग) बढ़ाई जा रही है। क्यूएस ने खुद कहा है कि पूरे एशिया के कॉलेजों का नाम दुनिया में बढ़ रहा है और भारत इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। यह नीति हमारे छात्रों और रिसर्च करने वालों को नए मौके दे रही है और कॉलेजों को और ताकतवर बना रही है।

क्यूएस (QS) के वाइस प्रेसिडेंट की प्रतिक्रिया

क्यूएस संस्था के वाइस प्रेसिडेंट, मैटेओ क्वाककेरेली ने भारत की इस कामयाबी पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में भारत ने शिक्षा में बहुत बड़ा बदलाव किया है, जैसे रिसर्च (खोजबीन) को बढ़ाना और नए-नए तरीके अपनाना। उनकी बात से पता चलता है कि रैंकिंग में भारत के कॉलेज दस गुना बढ़ गए हैं, जो एशिया की शिक्षा में भारत के बढ़ते योगदान को दिखाता है।

क्यूएस संस्था के वाइस प्रेसिडेंट मैटेओ क्वाककेरेली ने भारत की तारीफ की

उन्होंने यह भी कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कारण यह असर दिख रहा है, क्योंकि यह नीति कॉलेजों को मजबूत बना रही है और सहयोग के नए रास्ते खोल रही है। उन्होंने माना कि एशिया के कॉलेज दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं, और क्यूएस इस बदलाव में सबको मदद करता रहेगा।

पीएम मोदी ने की सराहना

भारत के नेताओं ने इस उपलब्धि पर बहुत खुशी जताई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि क्यूएस रैंकिंग में भारतीय कॉलेजों की संख्या में हुई इतनी बड़ी बढ़ोतरी देखकर उन्हें बहुत खुशी हुई है। उन्होंने साफ किया कि सरकार चाहती है कि हमारे युवाओं को सबसे अच्छी पढ़ाई मिले, इसलिए उनका ध्यान रिसर्च और इनोवेशन (नई खोजों) पर है।

पीएम मोदी ने कहा कि सरकार देश भर में नए शिक्षण संस्थान खोलकर उनकी ताकत बढ़ा रही है। वहीं, (भारतीय) उपराष्ट्रपति ने भी भारतीय कॉलेजों की इस प्रगति की तारीफ करते हुए इसे शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी जीत बताया। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि भारत अब शिक्षा और रिसर्च में पूरे एशिया में सबसे आगे निकलने की राह पर है।

भारत की शिक्षा में बड़ा बदलाव: NEP 2020 का असर

पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने ‘विद्या लक्ष्मी योजना’ (2024) शुरू की, जिसके तहत 860 बड़े कॉलेजों के गरीब छात्रों को बिना कुछ गिरवी रखे ₹2,358 करोड़ का लोन दिया गया है, ताकि वे आसानी से पढ़ सकें। इसके अलावा, हमारी IITs अब विदेश में भी खुल रही हैं, जैसे जंजीबार, अबू धाबी और दुबई। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया के डेकिन और वोलोंगोंग जैसे बड़े विदेशी कॉलेज भी अब भारत आकर कैंपस खोल रहे हैं। यह सब दिखाता है कि भारतीय शिक्षा अब ग्लोबल हो रही है।

ऑनलाइन पढ़ाई और संस्थानों को मजबूती

ऑनलाइन पढ़ाई के लिए भी बहुत काम हुआ है। ‘स्वयं’ पोर्टल पर 5 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने नाम दर्ज कराया है, जिसमें वे ऑनलाइन पढ़कर अपनी डिग्री का क्रेडिट (अंक) कॉलेज में जोड़ सकते हैं। ‘वर्चुअल लैब्स’ ने 900 से ज़्यादा ऑनलाइन प्रयोगशालाएँ बनाई हैं, और ‘डिजिटल लाइब्रेरी’ में 8 करोड़ से ज़्यादा किताबें मौजूद हैं। इसके अलावा, ‘पीएम-ऊषा’ स्कीम के तहत 35 विश्वविद्यालयों को ₹100-100 करोड़ दिए गए हैं, ताकि वे अपनी पढ़ाई की गुणवत्ता सुधार सकें और खुद को आधुनिक बना सकें। ये सारे कदम नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के लक्ष्यों को पूरा कर रहे हैं।

लक्ष्य और कॉलेज का नया ढाँचा

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का सबसे बड़ा लक्ष्य 2035 तक ज्यादा से ज्यादा छात्रों को कॉलेज तक पहुँचाना है (50% GER)। इसके लिए, सरकार चाहती है कि 2040 तक सभी कॉलेज ऐसे बनें जहाँ कई विषय एक साथ पढ़े जा सकें (जैसे साइंस के साथ आर्ट्स)। 2030 तक हर जिले में कम से कम एक बड़ा कॉलेज (HEI) खोलने का भी प्लान है। इसके साथ ही, ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ बनाया जा रहा है ताकि रिसर्च (खोजबीन) को बढ़ावा मिले। कॉलेजों को उनके काम के हिसाब से रिसर्च या सिर्फ पढ़ाने वाले कॉलेज में बाँटा जाएगा, ताकि उनकी जिम्मेदारी और अच्छी पढ़ाई की गारंटी बढ़ सके।

छात्रों को आजादी और ऑनलाइन पढ़ाई

इस नीति से छात्रों को पढ़ाई में पूरी आजादी मिल रही है। छात्र अब अपनी जरूरत के हिसाब से बीच में पढ़ाई छोड़ सकते हैं और बाद में फिर से शुरू कर सकते हैं (मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट)। साथ ही, ‘अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ शुरू हुआ है, जिससे छात्र कहीं भी पढ़ें, उनके अंक (क्रेडिट) सुरक्षित रहेंगे। ऑनलाइन पढ़ाई को भी खूब बढ़ावा मिला है, अब छात्र ऑनलाइन कोर्स (जैसे स्वयं MOOCs) से अपनी डिग्री के 40% तक अंक कॉलेज में जोड़ सकते हैं। इससे देश भर के करीब 19 लाख से ज्यादा छात्र ऑनलाइन कोर्स और दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) का फायदा उठा रहे हैं।