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तेजस्वी यादव: महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा या लालू परिवार की पुरानी छाया, क्या बिहार को बदल पाएँगे या सिर्फ वादों में रह जाएँगे?

तेजस्वी यादव चाहे कितने भी पोस्टर लगवा लें, पर अगर नतीजे वही पुराने रहे, तो महागठबंधन का CM फेस चुनाव के बाद सिर्फ सेल्फी फेस बनकर रह जाएगा।

बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा (CM Face) घोषित किया जाना केवल एक चुनावी घोषणा भर नहीं है, यह बिहार की सत्ता की पुरानी कहानियों को फिर से जिंदा करने जैसा है। सवाल यह है कि क्या तेजस्वी वाकई नए बिहार की तस्वीर हैं या फिर अपने पिता लालू प्रसाद यादव के दौर की जंगल राज’ वाली छवि के वारिस बनकर ही रहेंगे?

लालू की विरासत और परिवारवाद का बोझ

तेजस्वी यादव ऐसे परिवार से आते हैं जिसने बिहार की राजनीति को दशकों तक अपने कब्जे में रखा। लालू प्रसाद यादव, जिनका नाम कभी ‘गरीबों का मसीहा’ तो कभी ‘घोटालों का बादशाह’ कहा गया, वही तेजस्वी के पिता हैं। लालू के राज में बिहार ने जैसा विकास देखा, उसकी गवाही आज भी टूटी सड़कें और बेरोजगारी देती हैं।

अब तेजस्वी उसी विरासत के साथ मैदान में हैं। पर सवाल यह है, क्या वे उस छवि को मिटाकर अपनी पहचान बना पाएँगे? या फिर वही परिवारवाद की राजनीति जारी रखेंगे, जहाँ कुर्सी का रास्ता सिर्फ खानदान से होकर जाता है?

लोग आज भी याद करते हैं कि लालू के दौर में भ्रष्टाचार, जातिवाद और गुंडागर्दी किस हद तक बढ़ी थी। ऐसे में तेजस्वी जब कहते हैं कि वे नया बिहार लाएँगे, तो जनता पूछती है, “भैया, पहले पुराना तो साफ कर लो।”

वादे बड़े- बड़े  पर जमीन खाली

तेजस्वी यादव हर चुनाव में 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा करते हैं। पर जब उनसे पूछा जाता है कि ये नौकरियाँ कहाँ से आएँगी, तो जवाब मिलता है, हम दिखाएँगे।

दरअसल, बिहार के मतदाता अब भाषणों से ज्यादा हिसाब चाहते हैं। तेजस्वी ने जब उपमुख्यमंत्री रहते हुए कोई बड़ी नीति लागू नहीं की, तो लोग सोचने लगे कि अगर आधी कुर्सी पर ये हाल है, तो पूरी कुर्सी पर क्या होगा?

फिर भी, तेजस्वी खुद की तुलना स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग से कर डालते हैं, वो भी तब जब उन्होंने खुद 9वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है! सोशल मीडिया पर लोग बोले- “जॉब्स ने आईफोन बनाया, आपने क्या बनाया – बस भाषण?” ऐसे इनोवेटिव दावों से बिहार में तो हंसी का माहौल बन गया, लेकिन राजनीति में यह ओवरकॉन्फिडेंस अक्सर नुकसानदायक साबित होता है।

महागठबंधन का फेस पर भरोसे की कमी

महागठबंधन ने तेजस्वी को CM उम्मीदवार बनाकर साफ कर दिया है कि अब यह चुनाव ‘लालू परिवार बनाम बाकी सब’ होने वाला है। पर अंदरखाने में सब ठीक नहीं है, कॉन्ग्रेस नाराज है, पप्पू यादव खुलेआम कह रहे हैं कि वोट तो राहुल गाँधी के चेहरे पर पड़ेगा, तेजस्वी पर नहीं।

जब गठबंधन के साथी ही भरोसा न करें, तो जनता क्या करेगी?

उधर, बीजेपी और एनडीए तेजस्वी को भ्रष्टाचार का चेहरा बताकर घेर रही है। चारा घोटाला, भूमि के बदले नौकरी घोटाला और अब ‘माई-बहन योजना’ में धोखाधड़ी, ये सारे पुराने आरोप फिर से गूँज रहे हैं। यानी तेजस्वी का नया बिहार वाला दावा, पुराने आरोपों के कीचड़ में बार-बार फँस जाता है।

तेजस्वी यादव अब महागठबंधन का चेहरा हैं और बिहार की जनता उन्हें गंभीरता से देख रही है। पर समस्या यह है कि तेजस्वी की राजनीति वादों और ट्वीट्स तक सीमित लगती है। जमीनी स्तर पर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं दिखता।

अगर तेजस्वी को वाकई बिहार बदलना है, तो उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल लालू के बेटे नहीं एक सक्षम प्रशासक हैं। फिर चाहे वह नौकरी देने का वादा हो, निवेश लाने का या अपराध पर नियंत्रण का। अब जनता को आंकड़े चाहिए भावनाएँ नहीं।

चेहरा नया, तरीका पुराना

तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री चेहरा बनना महागठबंधन के लिए एक राजनीतिक जुआ है।
अगर उन्होंने वाकई अपने पिता की ‘जंगल राज’ वाली छवि को पीछे छोड़ दिया और सुशासन की नई परिभाषा दी, तो वे बिहार के इतिहास में अलग जगह बना सकते हैं।

पर अगर वही पुराने आरोप, वही परिवारवाद और वही वादों की राजनीति जारी रही तो जनता कहेगी, “नाम बदल गया, पर नजरिया वही रहा, लालू 2.0 बस नए पैकिंग में।”

अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि बिहार की जनता अब परिपक्व है। उसे ‘परिवार का चेहरा’ नहीं, ‘काम का चेहरा’ चाहिए। तेजस्वी यादव चाहे कितने भी पोस्टर लगवा लें, पर अगर नतीजे वही पुराने रहे, तो महागठबंधन का CM फेस चुनाव के बाद सिर्फ सेल्फी फेस बनकर रह जाएगा।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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