Home Blog Page 193

कौन है चीन के लिए जासूसी करने वाला US स्टेट डिपार्टमेंट का वरिष्ठ सलाहकार अश्ले टेलिस? हजारों दस्तावेजों के साथ पकड़ा गया, सीक्रेट पेपर्स की करता था चोरी

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के सीनियर सलाहकार अश्ले टेलिस पर सुरक्षित सरकारी जगहों से क्लासिफाइड दस्तावेज चुपके से निकालने का आरोप लगा है। भारतीय मूल का टेलिस एक मशहूर फॉरेन पॉलिसी एक्सपर्ट और डिफेंस स्ट्रैटेजिस्ट है। साल 2023 से ही उसके चीनी अधिकारियों से मीटिंग के आरोप भी हैं।

वर्जीनिया के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के यूएस अटॉर्नी ऑफिस ने मंगलावर (14 अक्टूबर 2025) को बताया कि अश्ले टेलिस को ‘नेशनल डिफेंस इंफॉर्मेशन को गैरकानूनी तरीके से रखने’ के चार्ज पर गिरफ्तार किया गया है। टेलिस को 11 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया, जब यूएस अथॉरिटीज ने उसके वर्जीनिया के वियना में घर की तलाशी ली।

वर्जीनिया के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के यूएस अटॉर्नी लिंडसे हेलिगन ने एक स्टेटमेंट में कहा कि वियना के अश्ले टेलिस को वीकेंड पर गिरफ्तार किया गया और क्रिमिनल कंप्लेंट के जरिए नेशनल डिफेंस इंफॉर्मेशन को गैरकानूनी रखने के चार्ज लगाए गए, जो 18 यूएससी § 793(ई) का उल्लंघन है।

स्टेटमेंट में कहा गया, “हम पूरी तरह फोकस्ड हैं अमेरिकी लोगों को हर तरह के खतरे से बचाने पर, चाहे वो विदेशी हो या घरेलू। इस केस में लगे आरोप हमारे नागरिकों की सेफ्टी और सिक्योरिटी के लिए बड़ा खतरा हैं। इस केस के फैक्ट्स और लॉ क्लियर हैं, और हम इन्हें फॉलो करते रहेंगे ताकि जस्टिस हो सके।”

खास बात ये है कि भारतीय मूल का अमेरिकी नागरिक अश्ले टेलिस स्टेट डिपार्टमेंट का अनपेड सीनियर सलाहकार था। वो डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस (डीओडी) के ऑफिस ऑफ नेट असेसमेंट का कॉन्ट्रैक्टर भी था।

एफबीआई स्पेशल एजेंट जेफरी स्कॉट के एफिडेविट के मुताबिक, टेलिस के पास टॉप सीक्रेट सिक्योरिटी क्लीयरेंस था, जिसमें ‘सेंसिटिव कम्पार्टमेंटेड इंफॉर्मेशन’ तक एक्सेस था।

फेडरल प्रॉसिक्यूटर्स के अनुसार, टेलिस के वियना वाले घर पर रेड के दौरान इन्वेस्टिगेटर्स को टॉप सीक्रेट और/या सीक्रेट लेवल के क्लासिफिकेशन मार्क्स वाले 1000 से ज्यादा पेज के पेपर डॉक्यूमेंट्स मिले।

अश्ले टेलिस ने सुरक्षित फैसिलिटी से कैसे निकाले क्लासिफाइड दस्तावेज?

अश्ले टेलिस ने 2001 में यूएस गवर्नमेंट के साथ क्लासिफाइड इंफॉर्मेशन नॉनडिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर साइन किया था, लेकिन उसने कथित तौर पर ये एग्रीमेंट तोड़ा और सिक्योर्ड कम्पार्टमेंटेड इंफॉर्मेशन फैसिलिटी (एससीआईएफ) से क्लासिफाइड मटेरियल निकाल लिया।

टेलिस की हरकतें तब स्कैनर पर आईं जब 12 सितंबर 2025 को वीडियो सर्विलांस से देखा गया कि वो वर्जीनिया के मार्क सेंटर के डीओडी फैसिलिटी के अंदर ऑफिस ऑफ नेट असेसमेंट (ओएनए) वाले एससीआईएफ में घुसा। कंप्यूटर रिकॉर्ड्स से पता चला कि टेलिस ने एक आईडेंटिफाइड क्यूबिकल पर कंप्यूटर यूज किया और उसके को-वर्कर ने उसी दिन उसके लिए कई क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट्स प्रिंट किए।

एफबीआई एजेंट स्कॉट के एफिडेविट में लिखा है, “उस शाम बाद में, जब टेलिस चला गया, तो इन्वेस्टिगेटर्स को उसी क्यूबिकल में दो रेडवेल्ड फाइल पॉकेट्स मिले, दोनों पर ‘टेलिस’ लिखा था। इनमें वो डॉक्यूमेंट्स थे जो को-वर्कर ने टेलिस के लिए पहले प्रिंट किए थे, जिसमें एक टॉप सीक्रेट लेवल का डॉक्यूमेंट भी था।”

एक और मामले में 25 सितंबर को टेलिस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट के एचएसटी बिल्डिंग पहुँचा। वो साउथ एंड सेंट्रल एशियन अफेयर्स ब्यूरो के सूट 5247 में घुसा और ‘क्लासनेट’ पर लॉग इन किया, जो डीओएस का सीक्रेट-लेवल कंप्यूटर सिस्टम है। वो करीब एक घंटा रुका और फिर चला गया।

एफिडेविट में लिखा है, “उस शाम बाद में टेलिस एक लेदर ब्रीफकेस लेकर एचएसटी बिल्डिंग लौटा और क्लासनेट पर लॉग इन किया। उसने डेस्कटॉप से एक पीडीएफ फाइल खोली, जिसका फाइलनेम एडवर्सरी फाइटर एयरक्राफ्ट और 2024 का रेफरेंस देता था। फाइल 1288 पेज की खुली, जो टाइटल यूएस एयर फोर्स टैक्टिक्स, टेक्नीक्स एंड प्रोसीजर्स का हिस्सा थी। डॉक्यूमेंट के ऊपर डिपार्टमेंट ऑफ एयर फोर्स का सील था और टॉप-बॉटम पर बैनर मार्किंग्स थे – सीक्रेट//फॉरेन गवर्नमेंट इंफॉर्मेशन/रिस्क सेंसिटिव नोटिस/नोफॉर्न//फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस एक्ट।”

टेलिस ने पीडीएफ को ‘ईकॉन रिफॉर्म’ के नाम से री-सेव किया, प्रिंट विंडो खोली और ‘पेजेस’ में ’59-172′ डाला। उसने सेंसिटिव डॉक्यूमेंट के चुनिंदा पेज प्रिंट करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन प्रिंट नहीं हुआ। बाद में उसने एक अनक्लासिफाइड डॉक्यूमेंट खोला, जो किसी यूएस गवर्नमेंट ऑफिशियल के पब्लिक स्पीच का था और उसे प्रिंट किया। कुछ मिनट बाद उसने ‘ईकॉन रिफॉर्म’ डॉक्यूमेंट दोबारा खोला, पेज 943-959 प्रिंट किए और फाइल डिलीट कर दी।

फिर उसने एक पीडीएफ डॉक्यूमेंट खोला जो ‘सीक्रेट’ या ‘नोफॉर्न’ क्लासिफाइड था, मतलब ये इंफॉर्मेशन यूएस पर्सन्स के अलावा किसी को नहीं दी जा सकती।

फाइल यूएस एयर फोर्स वेपन्स स्कूल का डॉक्यूमेंट था, जो मिलिट्री एयरक्राफ्ट कैपेबिलिटीज के बारे में था। टेलिस ने डॉक्यूमेंट स्क्रॉल किया और उसके सारे 40 पेज प्रिंट कर दिए।

एफिडेविट में लिखा है, “रात करीब 8:53 बजे टेलिस ने एक पीडीएफ डॉक्यूमेंट खोला जो सीक्रेट//नोफॉर्न क्लासिफाइड था। ये एक और यूएस एयर फोर्स वेपन्स स्कूल का डॉक्यूमेंट था, मिलिट्री एयरक्राफ्ट के बारे में। टेलिस ने उसके सारे 40 पेज प्रिंट कर दिए।”

अथॉरिटीज ने 10 अक्टूबर को टेलिस को फिर मार्क सेंटर के अंदर ओएनए वाले एससीआईएफ सूट में देखा, उसी क्यूबिकल पर बैठे हुए। वीडियो सर्विलांस से 10 बजे के आसपास देखा गया कि वो लेदर ब्रिफकेस लेकर क्यूबिकल पर पहुँचा। उसने डेस्क पर रेडवेल्ड फाइल पॉकेट से कई पेज निकाले और एक पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जैसा डॉक्यूमेंट (डॉक्यूमेंट ए) रखा। एफिडेविट के अनुसार, ये डॉक्यूमेंट भी टॉप सीक्रेट लगते हैं, क्योंकि ये पहले प्रिंट होकर 12 सितंबर 2025 को उसी क्यूबिकल में छूटे थे जब टेलिस आया था।

टेलिस ने कथित तौर पर क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट को अपने नोटपैड्स के पेजों में मिला दिया, ब्रिफकेस में रखा और ऑफिस से चला गया। वो अपनी वियना वाली घर पर ड्राइव करके लौटा।

अश्ले टेलिस और चीन कनेक्शन

कोर्ट फाइलिंग के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में अश्ले टेलिस ने कई बार पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) के सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की। एक मीटिंग 15 सितंबर 2022 को हुई, जब टेलिस और कई पीआरसी ऑफिशियल्स ने वर्जीनिया के फेयरफैक्स में एक रेस्टोरेंट पर डिनर किया। मीटिंग में टेलिस एक मनीला एनवेलप लेकर आया और पीआरसी ऑफिशियल्स गिफ्ट बैग लेकर रेस्टोरेंट में घुसे। फेडरल प्रॉसिक्यूटर्स का आरोप है कि टेलिस ने एनवेलप पीआरसी (चीनी) ऑफिशियल्स को सौंप दिया।

टेलिस ने 11 अप्रैल 2023 को वर्जीनिया के एक रेस्टोरेंट में चीनी गवर्नमेंट ऑफिशियल्स से मीटिंग की। डिनर के दौरान टेलिस और चीनी ऑफिशियल्स को ‘ओवरहीयर्ड’ करते हुए ईरानी-चीनी रिलेशंस और इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में बात करते सुना गया।

मार्च 2024 में एक इसी तरह की मीटिंग में, टेलिस और चीनी गवर्नमेंट ऑफिशियल्स ने यूएस-पाकिस्तान रिलेशंस पर डिस्कस किया।

जब टेलिस ने 2 सितंबर 2025 को कथित तौर पर क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट्स निकालना शुरू किया, उसके कुछ दिन पहले टेलिस और कुछ चीनी ऑफिशियल्स ने फिर डिनर किया। इस बार उन्होंने टेलिस को एक लाल रंग का गिफ्ट बैग दिया।

टेलिस के घर की तलाशी से क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट्स मिले

फेडरल कोर्ट के ऑर्डर पर 11 अक्टूबर को इन्वेस्टिगेटर्स ने वर्जीनिया के वियना में टेलिस के घर की तलाशी ली गई। तलाशी के दौरान, घर के अलग-अलग जगहों पर टॉप सीक्रेट या सीक्रेट लेवल के क्लासिफिकेशन मार्क्स वाले 1000 से ज्यादा पेज के पेपर डॉक्यूमेंट्स मिले।

एफिडेविट में डिटेल किया गया है और ये जोड़ा गया कि बेसमेंट होम ऑफिस एरिया में “सीक्रेट” पोरशन मार्क्स वाला एक डॉक्यूमेंट रिकवर किया गया। इसमें डॉक्यूमेंट्स मुख्य रूप से चार जगहों पर मिले-

बेसमेंट होम ऑफिस एरिया के क्लोजेट में एक फोर-ड्रॉअर लॉक्ड फाइलिंग कैबिनेट
बेसमेंट होम ऑफिस एरिया में एक टू-ड्रॉअर लॉक्ड फाइलिंग कैबिनेट
बेसमेंट होम ऑफिस एरिया में डेस्क के आसपास
बेसमेंट के अनफिनिश्ड स्टोरेज रूम में तीन बड़े ब्लैक ट्रैश बैग्स में।

अगर दोषी साबित हुआ, तो टेलिस को 10 साल तक की जेल हो सकती है।

अश्ले टेलिस और उसका परेशान करने वाला ट्रैक रिकॉर्ड

अश्ले टेलिस अभी कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस (सीईआईपी) में टाटा चेयर फॉर स्ट्रैटेजिक अफेयर्स और सीनियर फेलो है। दिलचस्प बात ये है कि सीईआईपी को हंगेरियन-अमेरिकी इन्वेस्टर और रिजीम चेंज स्पेशलिस्ट जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है।

सोरोस की मोदी गवर्नमेंट से दुश्मनी जगजाहिर है और वो नई दिल्ली में अपनी पसंद का पपेट एडमिनिस्ट्रेशन लगाने की कोशिश करता रहा है। सोरोस ने पब्लिक फोरम्स पर भारत के खिलाफ अपनी बुरी नीयत खुलकर जाहिर की है। वो अपनी दौलत का इस्तेमाल भारत को कमजोर करने के लिए करता रहता है।

सीईआईपी को सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से लगातार फंड्स मिलते हैं। ग्रुप के ग्रांट्स रिकॉर्ड्स के मुताबिक, ओएसएफ ने सीईआईपी को करीब 40 ग्रांट्स में लाखों डॉलर दिए हैं। 2024 में ओएसएफ ने सीईआईपी को ‘जनरल सपोर्ट’ के लिए 3,000,000 डॉलर दिए।

जॉर्ज डब्ल्यू बुश एडमिनिस्ट्रेशन के दौरान वो अंडरसेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पॉलिटिकल अफेयर्स का सीनियर एडवाइजर था। उसे यूएस-इंडियन सिविल न्यूक्लियर डील नेगोशिएट करने में अहम रोल का क्रेडिट मिलता है। वो यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के स्ट्रैटेजिक इंस्टीट्यूट में रिसर्च डायरेक्टर भी रहा।

टेलिस का रैंड कॉर्पोरेशन से भी गहरा कनेक्शन था, जो एक नॉन-प्रॉफिट ग्लोबल पॉलिसी थिंक टैंक है। उसकी इन्वॉल्वमेंट यूएस गवर्नमेंट सर्विस से पहले की है। अश्ले टेलिस रैंड में सीनियर पॉलिसी एनालिस्ट था, जो ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस से स्पेसिफिक प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग लेता था।

बिना आश्चर्य के अश्ले टेलिस को इंडियन लेफ्ट लिबरल मीडिया सर्कल में हाइप मिला। लेफ्टिस्ट प्रोपगैंडा पोर्टल और चाइनीज फंडिंग लेने व एफसीआरए रूल्स तोड़ने के आरोपि न्यूजक्लिक से लेकर द वायर तक, टेलिस इंडियन लेफ्ट लिबरल गिरोह का फेवरेट रहा। टेलिस करण थापर के एक इंटरव्यू में आ चुका है, जो इंडियन लेफ्टिस्ट्स और पाकिस्तानियों में पॉपुलर है।

अपने आर्टिकल्स और इंटरव्यूज में टेलिस ने मोदी गवर्नमेंट को बुरा कहने का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो अक्सर कहता था कि भारत को अपनी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी छोड़ देनी चाहिए और चीन को काउंटर करने के लिए यूएस का ‘जूनियर पार्टनर’ बन जाना चाहिए।

फॉरेन अफेयर्स मैगजीन में कंट्रीब्यूटर के तौर पर टेलिस ने एक्सपर्ट जियोपॉलिटिकल एनालिसिस के बहाने एंटी-इंडिया आर्टिकल्स लिखे। एक ऐसे पीस में, “इंडिया’s ग्रेट पावर डेल्यूशंस” टाइटल से टेलिस ने कहा कि भारत का मल्टीपोलैरिटी और स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी में विश्वास ‘इफेक्टिव या रियलिस्टिक नहीं हो सकता।’

उसका चीन प्रेम भी आर्टिकल में झलका, जब उसने पाकिस्तान के बेबुनियाद दावे को बढ़ा-चढ़ाकर बताया कि मई के कॉन्फ्लिक्ट में पाक ने चाइनीज डिफेंस सिस्टम्स से इंडियन फाइटर जेट गिराया, जबकि भारत ने पहलगाम में इस्लामिक टेरर अटैक के बाद दुश्मन पड़ोसी को करारा जवाब दिया था।

टेलिस ने इस साल जून में पब्लिश हुए आर्टिकल में लिखा, “हालाँकि भारत ने पिछले दो दशकों में इकोनॉमिक स्ट्रेंथ बढ़ाई है, लेकिन वो चीन को बैलेंस करने जितनी तेजी से नहीं बढ़ रहा, छोड़िए यूएस को, लॉन्ग टर्म में भी। ये मिडसेंचुरी तक रिलेटिव जीडीपी के टर्म्स में ग्रेट पावर बनेगा, लेकिन सुपरपावर नहीं। मिलिट्री टर्म्स में ये साउथ एशिया की सबसे सिग्निफिकेंट कन्वेंशनल पावर है, लेकिन यहाँ भी लोकल राइवल पर इसका एडवांटेज बहुत बड़ा नहीं।”

लेख का स्क्रीनशॉट

उसने आगे लिखा, “मई की लड़ाई में पाकिस्तान ने चाइनीज-सप्लाइड डिफेंस सिस्टम्स यूज करके इंडियन एयरक्राफ्ट गिराए। चीन एक तरफ और एडवर्सरियल पाकिस्तान दूसरी तरफ होने से, भारत को हमेशा अनपैलेटेबल टू-फ्रंट वॉर का डर रहता है।”

बिना आश्चर्य के टेलिस ने भारत के कथित ‘हिंदू नेशनलिज्म’ को अपनाने और ‘लिबरल डेमोक्रेसी’ को छोड़ने पर भी निराशा जताई।

दिसंबर 2023 में टेलिस ने निक्केई एशिया को बताया, ‘न्यू दिल्ली के लिए गलती होगी ये सोचना कि चीन के खिलाफ यूएस स्ट्रैटेजी में भारत की इंपॉर्टेंस उसे यूएस सिटिजन्स को यूनिलेटरल टारगेट करने की छूट देती है।’ ये उसने खालिस्तानी टेररिस्ट गुरपतवंत सिंह पन्नू को कथित तौर पर एक्सासिनेट करने की प्लॉट के कॉन्टेक्स्ट में कहा।

अब कथित तौर पर क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट्स निकालने और चीन के लिए जासूसी करने के आरोपित अश्ले टेलिस की गिरफ्तारी ने वॉशिंगटन के पॉलिसी सर्कल्स में सनसनी फैला दी है। यही नहीं, अब भारत को लेकर अमेरिका की दुश्मनी भरी नीतियों पर भी बहस शुरू हो रही है।

ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जैसा जंगलराज वाला शहाबुद्दीन, वैसा ही RJD का लालटेन लेने वाला ओसामा शहाब: अब्बा विरोधियों को तेजाब से नहलाता था, बेटा फायरिंग से लेकर वसूली तक का सरताज

मोहम्मद शहाबुद्दीन का नाम तो आप जानते ही होंगे, वहीं शहाबुद्दीन जो बीच सड़क पर विरोधियों को तेजाब से नेहलाकर मार देता था। लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने उसी शहाबुद्दीन के बेटे को रघुनाथपुर सीट से विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाया है।

वही ओसामा, जो सीवान में गुंडाराज फैलाने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन का बेटा है। शहाबुद्दीन सीवान का पूर्व सांसद था। 90 के दशक में और 21वीं सदी की शुरुआत में सीवान में वो ऐसा नाम था, जो अपराध और राजनीति की सीमाओं को धुँधला कर देता था। आज भी सीवान के कई लोग उसके खौफ में जीवन जी रहे हैं। उसी शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा अब अपने अब्बा के गुंडाराज को रघुनाथपुर में फैलाने के लिए वापस आया है,और उसको RJD ने टिकट देकर अपनी भूमिका भी तय कर ली है।

कौन है शहाबुद्दीन ?

मोहम्मद सैयद शहाबुद्दीन सीवान शहर से पूर्व सांसद था। 90 के दशक में और 21वीं सदी की शुरुआत में उसने शहर में गुंडाराज चलाया। विभिन्न ठेकों का टेंडर हो या फिर मुखिया से लेकर जिला परिषद तक के चुनाव, हर जगह उसकी ही पसंद चलती थी। उसने 1996, 98, 99 और 2004 में यहाँ से सांसद बन कर जीत का चौका लगाया।

मोहम्मद शहाबुद्दीन पर सीधे राजद सुप्रीमो और 15 साल तक बिहार में सत्ता के सर्वेसर्वा रहे लालू प्रसाद यादव का हाथ था। वो राजद की नेशनल एग्जीक्यूटिव कमिटी का हिस्सा था। उसके समर्थक उसे ‘साहेब’ कहकर बुलाते थे। गैंगस्टर शहाबुद्दीन पर अपहरण, हत्या और लूटे के कई मामलों में जेल जा चुका था।

चंदा बाबू के 2 बेटों की तेजाब से नहला कर की हत्या

शहाबुद्दीन ने रंगदारी नहीं देने और उनकी जमीन शहाबुद्दीन के हवाले न करने के कारण चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों गिरीश और सतीश का अपहरण कर लिया था। इसके बाद उन्हें शहाबुद्दीन के गाँव प्रतापपुर स्थित उसकी कोठी पर ले जाया गया। फिर 16 अगस्त 2004 को वहाँ जो हैवानियत का नंगा नाच हुआ, उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। वहाँ दोनों भाइयों को तेज़ाब से नहलाया गया और तब तक ऐसा किया गया, जब तक उनकी तड़प-तड़प कर मौत न हो गई।

इस मामले में गवाह थे चंदा बाबू के तीसरे बेटे राजीव रौशन, लेकिन कोर्ट जाते समय उनकी भी हत्या कर दी गई। तीनों बेटों की माँ कलावती की शिकायत पर FIR दर्ज की गई थी।लेकिन, इस मामले में शहाबुद्दीन को अभियुक्त बनने में 5 साल लग गए। 2009 में सीवान के तत्कालीन SP अमित कुमार जैन के निर्देश पर केस के IO ने शहाबुद्दीन, असलम, आरिफ और राज कुमार साह को प्राथमिक अभियुक्त बनाया और सभी को उम्रकैद की सजा हुई।

ये मामला स्थानीय कोर्ट और हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ कुछ ही मिनटों में तत्कालीन CJI रंजन गोगोई ने शहाबुद्दीन की याचिका खारिज कर दी और फैसला बरकरार रखा। इस मामले में गवाह थे चंदा बाबू के तीसरे बेटे राजीव रौशन, लेकिन कोर्ट जाते समय उनकी भी हत्या कर दी गई। तीनों बेटों की माँ कलावती की शिकायत पर FIR दर्ज की गई थी।

चंदा बाबू कई सालों तक भय में जीते रहे। उनको डर लगा रहता था कि शहाबुद्दीन उन्हें मरवा देगा। ऐसे में इतने बड़े अपराधी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाना उनके हार न मानने वाले जज्बे की ओर इशारा करता है। वहीं, शहाबुद्दीन की बीवी हीना शहाब ने इस मामले में केंद्र सरकार को दोषी माना।

मई 2021 में शहाबुद्दीन की कोविड से मौत

शहाबुद्दीन कई मामलों में तिहाड़ जेल में सजा काट रहा था। इसी दौरान कोरोनाकाल का वक्त आया। तिहाड़ जेल में बंद मोहम्मद शहाबुद्दीन कोरोना पॉजिटिव निकला। उसे दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया। हाँ अपराधी और हत्यारे शहाबुद्दीन की 01 मई, 2021 को मौत हो गई।

शहाबुद्दीन के बेटे पर आपराधिक मामले

शहाबुद्दीन के आपराधिक जीवन का साया उसके बेटे ओसामा शहाब पर भी पढ़ा। पिछले साल 2024 में ही ओसामा जेल से बाहर निकला था। ओसामा पर कई आपराधिक मामलों में कुछ महीनों तक जेल में बंद रहा। आखिर में उसे हाई कोर्ट से जमानत मिली। इस वक्त तक ओसामा को शहाबुद्दीन की गुडंराज और डर की राजनीति का विरासत कहा जाने लगा था।

सबसे पहला मामला हुसैनगंज थाना क्षेत्र के छपिया बुजुर्ग स्थित 42 कट्ठा जमीन में दर्ज हुआ था। उसके बाद मोतिहारी में उसके बहनोई से आपसी जमीन विवाद में फायरिंग करने पर भी ओसामा पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी। इसी बीच साल 2023 में ओसामा को राजस्थान के कोटा में ट्रैफिक पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

तभी हुसैनगंज पुलिस ने कोटा पहुँचकर ओसामा को गिरफ्तार कर लिया और वापस ले आई। अब उसपर दर्ज फायरिंग और जमीन विवाद मामले में कोर्ट में पेशी हुई। कोर्ट ने ओसामा को मंडल कारा भेज दिया। कुछ दिन बाद ओसामा को हुसैनगंज मामले में जमानत मिल गई। लेकिन मोतिहारी में दर्ज FIR में वह जेल में बंद रहा। इस मामले में मोतिहारी व्यवहार कोर्ट में उसकी जमानत याचिका खारिज की गई, जिसके बाद पटना हाई कोर्ट से उसे जमानत मिली। आखिर में ओसामा साल 2024 में जेल से रिहा हो गया।

इस बीच शहाबुद्दीन के समर्थकों ने ओसामा के भीतर अपने अब्बा की विरासत को आगे बढ़ाने की ललक देखी क्योंकि शहाबुद्दीन पर भी 19 साल की उम्र में ही पहा आपराधिक केस दर्ज हुआ था, जो साल 2016 तक 39 तक बढ़ गया। शहाबुद्दीन के समर्थकों के मुताबिक, ओसामा भी अब अपराध की बदौलत राजनीति में करियर शुरू कर सकता था।

राजद का शहाबुद्दीन के परिवार पर हाथ

बिहार में राजद सरकार में ‘जंगलराज’ प्रदेश की बर्बादी का कारण रहा है। लालू प्रसाद यादव के इस ‘जंगलराज’ में शहाबुद्दीन का आतंक चरम पर था। इस जंगलराज में शहाबुद्दीन ‘बंदर’ और लालू यादव ‘मदारी‘ थे। लालू यादव और शहाबुद्दीन के बीच रिश्ता अब तक राजद निभा रही है।

शहाबुद्दीन की मौत के बाद भी राजद उसके परिवार का पूरा खयाल रखती है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद ने लोकसभा चुनाव 2024 में सीवान से शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब को उम्मीदवार बनाया लेकिन उसकी हार के बाद राजद को ये सीट गँवानी पड़ी।

इसके बाद भी खबरें आईं कि बिहार चुनाव 2025 में राजद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को दावेदार बना सकती है। जुलाई 2025 में तेजस्वी यादव का शहाबुद्दीन के घर पहुँचकर डिनर करने के बाद ये खबरें और तेज हो गईं।

तेजस्वी यादव का आतंक फैलाने वाले शहाबुद्दीन के परिवार को लेकर काफी ‘नरम’ दिल रहा है। इसीलिए जुलाई 2025 में राजद के स्थापना दिवस पर भी वे शहाबुद्दीन को याद करना नहीं भूले। मंच से तेजस्वी यादन ने ‘शहाबुद्दीन अमर रहे’ के नारे लगवाए।

अब ओसामा शहाब राजद के सिंबल पर बिहार चुनाव में मैदान में है। ये वही समय है जब शहाबुद्दीन पहली बार राजद से चुनाव लड़ा था। फर्क सिर्फ यह है कि अपराधी का चेहरा बदल गया है, चरित्र नहीं। राजद ने ओसामा को टिकट देकर साफ कर दिया कि वह बिहार की राजनीति में अब भी अपराधी छवि को ऊपर मानती है। जबकि नीतीश सरकार में बिहार से जंगलराज हटा है और प्रदेश शिक्षा, विकास की ओर बढ़ा है।


37% शादी कुंडली नहीं मिलाने के कारण टूटी, 63% सनातनी रीतियों की उपेक्षा से… BHU के शोध से सामने आए आँकड़े: 36 गुण ही नहीं, ग्रहों का मिलान भी जरूरी

आज के दौर में शादियाँ टूटने की खबरें आम हो गई हैं। लव अफेयर, लिव-इन रिलेशनशिप और घरेलू हिंसा जैसे कारणों के बीच अब एक नया पहलू सामने आ रहा है- कुंडली मिलान की लापरवाही। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ज्योतिष विभाग के तीन प्रोफेसरों और दो शोधार्थियों ने इस मुद्दे पर गहन रिसर्च की है। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं।

रिसर्च में पाया गया कि 37 प्रतिशत शादियाँ सिर्फ इसलिए टूट रही हैं क्योंकि वर-वधु की कुंडली ठीक से मिलाई ही नहीं गई। ग्रह दोषों को नजरअंदाज कर शादियाँ कर ली जाती हैं, जिसके बाद रिश्ते बिखर जाते हैं। कभी लव अफेयर में फँसकर एक-दूसरे का मर्डर करवा देते हैं, तो कभी नया साथी तलाशने लगते हैं।

यह रिसर्च बीएचयू के ज्योतिष विभाग में सोमवार (13 अक्टूबर 2025) को आयोजित एक सेमिनार में पेश की गई। सेमिनार में इंदौर के माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसंधान संस्थान ने मेजबानी की। भारत के 15 राज्यों से शोधार्थी पहुँचे, साथ ही नेपाल, सिंगापुर और दुबई से भी विशेषज्ञ शामिल हुए। इस सेमिनार में प्रोफेसर विनय पाण्डेय ने अपना शोधपत्र पढ़ा।

प्रोफेसर विनय पाण्डेय ने कहा, “लड़का-लड़की की कुंडली में 36 में से 32 गुण मिलने के बावजूद ग्रहों का मिलान जरूरी है। लेकिन आजकल लोग मॉडर्न दिखने के चक्कर में सनातन रस्में निभाते ही नहीं। शादी में फोटोशूट और सेल्फी में व्यस्त रहते हैं। मंत्रों का उच्चारण तक नहीं होता। नतीजा? शादियाँ टूट रही हैं, पति-पत्नी एक-दूसरे का खून कर रहे हैं।”

रिसर्च की जरूरत क्यों पड़ी?

प्रोफेसर विनय पाण्डेय से ऑपइंडिया ने खास बातचीत की। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में पति-पत्नी के बीच जघन्य हत्याओं के मामले बढ़े हैं। ज्यादातर केसों में एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर का हाथ होता है। प्रो. विनय ने कहा, “ये चौंकाने वाले हैं। जब कुंडली और ग्रह मिलान ठीक से होता है, तो रिश्ता 100 प्रतिशत सही चलता है। ज्योतिष तो एक तरह की गणित है, वैज्ञानिक तथ्य है।”

रिसर्च की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि हिंदू धर्म में विवाह को अटूट बंधन माना जाता है। लेकिन आधुनिकता के नाम पर परंपराओं को ठुकरा दिया जा रहा है। ज्योतिष विभाग के प्रमुख प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी कहते हैं, “लोग आधुनिक होने का ढोंग करते हैं। कुंडली मिलान को बकवास मानते हैं। नतीजे आपके सामने हैं – तलाक, हिंसा और हत्याएँ।” रिसर्च टीम ने महसूस किया कि ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक यही समस्या फैल रही है। लिव-इन और लव अफेयर को बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन शादी के बाद रिश्ते संभाल नहीं पाते।

रिसर्च कैसे की गई? कितने बड़े दायरे में?

ये रिसर्च करीब डेढ़ साल से चल रही है। आँकड़े आने के बाद उन पर रिसर्च में छह महीने लगे। टीम में प्रो. विनय पाण्डेय, प्रो. आशुतोष त्रिपाठी, प्रो. अमित कुमार मिश्रा, शोधार्थी गणेश प्रसाद और नेपाल की पीएचडी छात्रा रोदना घिनरे शामिल थे।

डेटा इकट्ठा करने के लिए दो तरीके अपनाए गए। पहला बीएचयू ज्योतिष विभाग की ओपीडी से। यहाँ पूरे देश से लोग कुंडली दिखाने आते हैं। दूसरे शोधार्थियों को यूपी के 12 जिलों में भेजा गया। वहाँ उन जोड़ों को चुना गया जिनकी शादी के तीन साल के अंदर तलाक हो गया था। कुल 250 केस इकट्ठे किए गए।

इनके परिवारों से तीन सवाल पूछे गए

  1. शादी से पहले कुंडली मिलाई गई? कितने गुण मिले? कोई ग्रह दोष तो नहीं था?
  2. अगर दोष मिला, तो शादी क्यों की?
  3. शादी के दौरान सनातन रीति-रिवाज पूरी तरह फॉलो किए गए?

ये सवाल सरल थे, लेकिन जवाबों ने सच्चाई उजागर कर दी। प्रो. विनय कहते हैं, “डेटा एनालिसिस में पाया कि 37 प्रतिशत केसों में शादी के एक-दो साल में ही टूटाव आ गया। कारण? कुंडली ठीक से नहीं मिलाई गई। लोग जल्दबाजी में रिश्ता पक्का कर लेते हैं।” बाकी 63 प्रतिशत मामलों में सनातन रीति-रिवाजों की अनदेखी हुई। मुहूर्त होटल बुकिंग के हिसाब से तय किया गया। मंत्रोच्चारण अधूरा रहा। उन्होंने कहा, “शादी एक धार्मिक संस्कार है, लेकिन लोग इसे पार्टी बना देते हैं।”

ज्योतिष आधारित इस रिसर्च का दायरा बड़ा है। यूपी के जिलों के अलावा ओपीडी से राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों के केस शामिल हुए। कुल मिलाकर 250 परिवारों से बातचीत हुई, जो एक मजबूत सैंपल साइज है। अभी शोध को प्रकाशित करने में काफी समय है। डाटा भी और जोड़ा जा रहा है। केसों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है।

शोधार्थी रोदना घिनरे ने नेपाल के परिप्रेक्ष्य से योगदान दिया। उन्होंने बताया कि वहाँ भी कुंडली मिलान की अनदेखी से रिश्ते टूट रहे हैं। हालाँकि प्रो. विनय पाण्डेय कहते हैं कि आँकड़े लगभग इसी राह पर चलने वाले हैं।

इस दौरान प्रो. विनय पाण्डेय से जब सवाल पूछा गया कि जिन लोगों की कुंडलियाँ विवाह के समय नहीं मिलाई जाती, वो भी तो सफल या फिर असफल-दो ही श्रेणियों में आती हैं। ऐसे में सफल और असफल होने के पीछे भी ज्योतिष की गणनाओं को माना जाए? प्रो. विनय पाण्डेय ने कहा, ‘सफल या असफल शादियों, चाहे वो किसी भी धर्म-देश की हों, उनकी भी ज्योतिषीय गणना निकाली जा सकती है। कुंडली न मिलाने का मतलब ये नहीं हुआ कि उनकी कुंडली मिल नहीं रही। पीछे से सबकुछ सही होने पर ही शादियाँ चलती हैं।’

प्रो. विनय पाण्डेय ने कहा कि ज्योतिष को गणितीय नजर से देखेंगे, तो फर्क समझ में आएगा। उन्होंने कहा कि प्रेम-विवाह करने वाली शादियाँ भी टूट रही हैं और वो चल भी रही हैं। अगर उनकी कुंडलियों का मिलान किया जाए, तो सबकुछ सामने आ जाएगा। प्रो. विनय पाण्डेय का कहना है कि गणित हर जगह मौजूद है, चाहे उसकी जानकारी किसी को हो या न हो।

रिसर्च के नतीजों में क्या-क्या सामने आया?

रिसर्च के मुख्य निष्कर्ष यही हैं कि कुंडली मिलान सिर्फ गुणों की गिनती नहीं, बल्कि ग्रहों का गहरा विश्लेषण है। प्रो. विनय ने स्पष्ट किया, “कुंडली मिलान दो तरह का होता है – अष्टकूट (गुण मिलान) और ग्रह मिलान। ज्यादातर ज्योतिषी गुण तो मिला देते हैं, लेकिन ग्रहों की गहराई नहीं देखते। 36 में से 32 गुण मिलने पर भी अगर ग्रह दोष है, तो रिश्ता नहीं चलता।”

हिंदू विवाह
हिंदू विवाह की प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

मुख्य दोष जो सामने आए

मांगलिक दोष: कुंडली में मंगल पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में हो तो मांगलिक दोष। ऐसे में मांगलिक से ही शादी करनी चाहिए। उपाय तो हैं, लेकिन रिसर्च में पाया कि उपाय के बावजूद 40 प्रतिशत मामलों में समस्या बनी रहती है।

नाड़ी दोष और गण दोष: ये स्वास्थ्य और स्वभाव की असंगति पैदा करते हैं।

चंद्र बल विचार: चंद्रमा वर-वधु की राशि से तीसरा, छठा, सातवाँ, दसवाँ या ग्यारहवाँ भाव शुभ। लेकिन चौथा, आठवाँ या बारहवाँ अशुभ। दान से सुधार संभव, लेकिन अनदेखा करने से वैवाहिक कलह।

शुभ लग्न: तुला, मिथुन, कन्या, वृषभ या धनु लग्न शुभ। लग्न शुद्धि में शनि बारहवें, मंगल दसवें या शुक्र तीसरे भाव में न हो।

मुहूर्त की अनदेखी: पंचांग के आधार पर मुहूर्त चुनना जरूरी। पंचेश्ट अभाव से संतान या रिश्ते की समस्या।

63 प्रतिशत केसों में मुहूर्त होटल बुकिंग पर निर्भर था। प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी कहते हैं, “36 गुणों में कम से कम 18 का मिलान जरूरी है, लेकिन लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। हिंदू धर्म में तलाक का कोई स्पष्ट वर्णन नहीं है। विवाह मेलापक से पक्का होता है।”

रिसर्च में पाया कि जहाँ कुंडली सही मिलाई गई, वहाँ तलाक की दर शून्य रही। लेकिन लापरवाही से न सिर्फ तलाक, बल्कि घरेलू हिंसा और हत्याएँ बढ़ीं। एक केस में पत्नी ने लव अफेयर के चक्कर में पति का मर्डर करवा दिया। वजह? ग्रह दोष को अनदेखा किया गया।

देशभर में तलाक की दर, जानें – राज्यवार आँकड़े

रिसर्च ने राज्यवार तलाक दरों पर भी रोशनी डाली। भारत में कुल तलाक दर करीब 1 प्रतिशत है, लेकिन शहरी इलाकों में 30 प्रतिशत तक। ग्रामीण क्षेत्रों में कम, लेकिन बढ़ रही है। रिसर्च टीम ने सरकारी आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि ज्योतिषीय लापरवाही ही मुख्य कारण है।

यहाँ राज्यवार प्रमुख आँकड़े दिए जा रहे हैं (प्रतिशत में नवीनतम 2025 डेटा के आधार पर)-

तलाक दर के आँकड़े

ये आँकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय और विभिन्न सर्वे से लिए गए। उत्तर प्रदेश में 11.6 प्रतिशत दर के साथ रिसर्च के निष्कर्ष मेल खाते हैं – यहाँ कुंडली मिलान की लापरवाही से ही मामले बढ़े। महाराष्ट्र में 18.7 प्रतिशत तक शहरी तलाक, जहाँ फोटोशूट और मॉडर्निटी हावी है। कुल मिलाकर शहरी बनाम ग्रामीण में 30 गुना फर्क है। खास बात ये है कि जॉइंट फैमिली में तलाक दर बेहद कम है, जबकि न्यूक्लियर फैमिली में ये दर ज्यादा है।

सुझाव: परंपराओं को न छोड़ें

रिसर्च टीम ने सुझाव दिए कि शादी से पहले पंडित की सलाह लें। मुहूर्त पंचांग से चुनें, न कि होटल बुकिंग से। ग्रह दोष पर उपाय करवाएँ, लेकिन अनदेखा न करें। प्रो. आशुतोष त्रिपाठी कहते हैं, “लव अफेयर ठीक है, लेकिन शादी के लिए ज्योतिष जरूरी है। ये गणित है, विश्वास नहीं।” सेमिनार में विशेषज्ञों ने कहा कि मॉडर्निटी में परंपरा को अपनाना भी जरूरी है। ऐसे में फोटोशूट तो कराते रहिए, लेकिन मंत्रोच्चार और ज्योतिष की भी भूमिका को स्वीकार करें।

यह रिसर्च न सिर्फ भारत, बल्कि नेपाल-सिंगापुर जैसे देशों के लिए मार्गदर्शक बनेगी। प्रो. अमित कुमार मिश्रा ने कहा, “हमारी कोशिश है कि तलाक की दर 50 प्रतिशत कम हो। बस कुंडली को गंभीरता से लें।”

क्या है IPS पूरन कुमार और ASI संदीप लाठर की आत्महत्या का मामला, सुसाइड नोट कानून की नजर में कितना अहम: खुद की ही जान ले लेने का क्या है मनोविज्ञान?

हरियाणा में एक हफ्ते के भीतर एक आईपीएस और एक एएसआई के आत्महत्या कर लेने के बाद पूरे प्रशासनिक महकमे में खलबली मची हुई है। सबसे गंभीर बात ये है कि दोनों ने प्रशासनिक अधिकारियों पर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। कानून की नजर में सुसाइड नोट व्यक्ति द्वारा दिया गया अंतिम वक्तव्य होता है, हालाँकि परिस्थितियों को भी इसके साथ देखा जाता है। ऐसे में दोनों अधिकारियों के सुसाइड नोट का काफी महत्व है। मनोवैज्ञानिक इसे मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंजाइटी से जोड़ रहे हैं।

आईपीएस पूरन कुमार ने कई आईएएस अधिकारियों पर जातिवाद, करप्शन समेत कई आरोप लगाए, वहीं एएसआई ने आईपीएस पूरन कुमार और उनके परिवार पर करप्शन और जातिवाद का सहारा लेने का आरोप लगाया। दोनों ने ही जान देने से पहले सुसाइड नोट में सारी जानकारी दी। एएसआई संदीप कुमार लाठर ने एक वीडियो भी बनाया है।

एएसआई संदीप लाठर और आईएएस पूरन कुमार के ‘फाइनल नोट’ की तुलना

एएसआई संदीप लाठर ने अपने सुसाइड नोट में दिवंगत आईपीएस पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। एएसआई के मुताबिक पूरन कुमार के खिलाफ बहुत से सबूत मौजूद हैं। संदीप ने लिखा है कि भ्रष्टाचारी परिवार को नहीं छोड़ा जाए।

पूरन कुमार की तरह अपने सुसाइड नोट पर संदीप लाठर ने ‘फाइनल नोट’ लिखा। वीडियो में वह कहते हैं, ”मैं भगत सिंह का भक्त हूं. ये लड़ाई अधूरी नहीं छोड़ी जाएगी. अगले जन्म में भी इसे पूरा करूंगा।” उन्होंने पूरन कुमार और उनके परिवार की संपत्ति की जाँच की माँग की है।

उन्होंने कहा है कि पूरन कुमार ने अपने मातहत आने वाले कई ईमानदार अफसरों को फँसाया। उनका ट्रांसफर करवाया। अपने पसंद के अधिकारियों को लगाए। कई महिला अफसरों के यौन शोषण किए गए। भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं और पूरन कुमार के खिलाफ शिकायत हुई थी। परिवार को बचाने के लिए उन्होंने जान दी।

एएसआई संदीप ने पूरन कुमार की आईएएस पत्नी और विधायक साले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, संदीप लाठर ने नोट में लिखा-“पूरन कहते थे कि मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा. घरवाली आईएएस है, साला एमएलए है और परिवार एससी आयोग में है.”

एएसआई ने कहा, “आईपीएस पूरन कुमार ने सदर थाना मर्डर केस में पैसे लिए। राव इंद्रजीत को बचाने के लिए 50 करोड़ की डील की गई। ” उन्होंने कहा कि पूरन कुमार अपनी जाति के भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देते थे।

दरअसल आईपीएस पूरन कुमार के करीबी गन मैन सुशील कुमार की गिरफ्तारी में एएसआई संजीव कुमार का अहम रोल था। गन मैन सुशील को वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उस पर शराब कारोबारी से पैसे की उगाही के आरोप हैं। शराब कारोबारी ने वीडियो जारी कर आईपीएस पूरन कुमार पर वसूली के आरोप लगाए थे। इसकी जाँच चल रही है।

एडीजीपी पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में इसकी जानकारी देते हुए आलाधिकारियों द्वारा फँसाए जाने की बात कही है। उन्होंने मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी और डीजीपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों पर जातिगत प्रताड़ना, अपमानित करने और भ्रष्टाचार के केस में फँसाने के आरोप लगाए।

करीब 1 दर्जन अधिकारियों और पूर्व अधिकारियों का नाम लिखकर पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, “मैं अब नहीं सह सकता, जो लोग मुझे इस स्थिति तक पहुँचाया कि मैं जीना नहीं चाहता, वही मेरी मौत के जिम्मेदार हैं।” उन्होंने अपने साथ प्रोमोशन, पोस्टिंग और सामाजिक बहिष्कार तक के आरोप लगाए।

आईपीएस पूरन कुमार ने जिस डीजीपी पर प्रताड़ना का आरोप लगाया, उसे एएसआई संदीप लाठर ने ईमानदार अधिकारी कहा। उन्होंने कहा, “राज्य में कई आईएएस अफसर भ्रष्ट हैं, लेकिन बीजेपी सरकार में कुछ ईमानदार अधिकारी हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की कोशिश की। डीजीपी साहब ईमानदार और निडर हैं।”

सुसाइड नोट का कानूनी महत्व

दोनों पुलिस अधिकारियों ने खुद को गोली मारने से पहले सुसाइड नोट लिखा। कानून की नजर में डाइंग डिक्लिरेशन ( dying declaration) यानी मरने से पहले कही गई बातों का काफी महत्व होता है। ये कोर्ट में सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है। इसका महत्व उस वक्त और बढ़ जाता है, जब व्यक्ति की मौत हो जाती है। ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि व्यक्ति मरने से पहले झूठ नहीं बोलता। ये अहम सबूत बन सकता है, अगर झूठ बोलने का कोई कारण न नजर आए।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत यह मान्य है। इसमें कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु या मृत्यु के लिए जिम्मेदार किसी भी परिस्थिति के बारे में बताता है, तो उन मामलों में ये प्रासंगिक होता है।

दोनों अधिकारियों के आत्महत्या के मामले में ये साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। जाँच के दौरान सच्चाई उजागर करने में ये सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है और इस मामले में अहम भूमिका निभा सकता है।

क्या कहता है सुसाइड को लेकर मनोविज्ञान

दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर नवीन कुमार ने ऑपइंडिया से बात करते हुए आत्महत्या करने की वजहों पर प्रकाश डाला। उनका कहना है कि आत्महत्या करना एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जब व्यक्ति खुद को कई समस्याओं से घिरा महसूस करता है और उसका समाधान खुद को खत्म करने में पाता है। उनका कहना है, “आम तौर पर सुसाइड करना, तुरंत का निर्णय नहीं होता है। ये कुछ दिनों से दिमाग में चल रहा होता है। हो सकता है कि पूरन कुमार या संदीप लाठर डिप्रेशन या एंजाइटी के शिकार हों। मानसिक तौर पर तनावग्रस्त हों।”

मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर कुमार का मानना है कि पुलिस विभाग में काम करने वाले लोगों पर अक्सर अपने काम को लेकर कई तरह के दबाव होते हैं। उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। कई बार न चाहते हुए भी वैसे काम करने पड़ जाते हैं, जो वह नहीं करना चाहता। इससे कुंठा घर कर जाती है।

आईपीएस पूरन कुमार और एएसआई संदीप लाठर को लेकर ऐसा माना जा सकता है कि विभागीय परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं रही होंगी। ऐसा उन्होंने अपने सुसाइड नोट में भी लिखा है। घर बाहर अपने मन की बात वो किसी से शेयर नहीं कर पा रहे होंगे। मनोबल लगातार गिरता जा रहा होगा, नकारात्मकता हावी हो गई होगी। इसलिए ये कदम उठाया होगा।

इन परिस्थितियों से बचने के लिए दिनचर्या में बदलाव, बातों को शेयर करना, मनोरोग विशेषज्ञों से परामर्श लेना जरूरी होता है। डिप्रेशन, एंजाइटी का गरीबी या आर्थिक हालत से संबंध नहीं होता। ये किसी भी वजह से ये हो सकता है।

(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है। अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं, तो भारत सरकार की हेल्पलाइन नंबर 1800 233 3330 पर मदद ले सकते हैं। आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए। दिनचर्या में बदलाव करना चाहिए।)

राघोपुर से पहिले त तू तेजस्वी के यार रहलू… ये PK न ‘जन्मभूमि’ का, न ‘कर्मभूमि’ का

भोजपुरी के एक गायक अभिनेता हैं- रितेश पांडे। जन सुराज ने इन्हें अपने नेता प्रशांत किशोर की जन्मभूमि करगहर से उम्मीदवार बनाया है। रितेश पांडे का एक चर्चित गाना रहा है- पियवा से पहिले हमार रहलू। पर ऐसा लगता है कि प्रशांत किशोर अपनी बातों के भी नहीं हैं।

बिहार में जन सुराज की राजनीति शुरू करने के बाद से ही वे नीतीश कुमार या तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनाव लड़ने की बात कहते रहे हैं। नीतीश कुमार चुनाव लड़ते नहीं हैं, इसलिए बाद में प्रशांत किशोर भी जन्मभूमि या कर्मभूमि से लड़ने की बात करने लगे। कर्मभूमि से उनका तात्पर्य तेजस्वी यादव की सीट राघोपुर से था।

लेकिन अब जन सुराज ने राघोपुर से चंचल सिंह को मैदान में उतारा है। यानी प्रशांत किशोर कर्मभूमि या जन्मभूमि से चुनाव नहीं लड़ेंगे। इतना ही नहीं उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में वे राज्य की किसी भी सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे।

प्रशांत किशोर का कहना है कि चुनाव के दौरान वे प्रचार और संगठन के काम पर ध्यान केंद्रित करेंगे। उनका यह भी कहना है कि पार्टी ने उन्हें इसी भूमिका का आदेश दिया है।

प्रशांत किशोर और जन सुराज की राजनीतिक शैली की तुलना अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी से होती रही है। यह दूसरी बात है कि प्रशांत किशोर इस टैग से खुद को बचाने की कोशिश करते रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में करीब एक दशक तक AAP की सरकार रहने के बाद केजरीवाल की छवि ‘राजनीतिक धूर्त’ की बन चुकी है। पर इस मामले में केजरीवाल का साहस प्रशांत किशोर से कहीं अधिक था। उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सीधे मैदान में उतरकर चुनौती दी थी।

यह बात सत्य है कि सीटों, जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से दिल्ली और बिहार में काफी अंतर है। लेकिन राजनीति में ‘ज्वाइंट किलर’ का हमेशा से काफी महत्व रहा है। चुनाव लड़ने से पीछे हटकर प्रशांत किशोर ने यह मौका गँवा दिया है।

प्रशांत किशोर चुनाव न लड़ने की वजह संगठन के कार्य को बता रहे हैं पर सच्चाई इसके उलट है। सुनियोजित कैंपेन की बदौलत जनसुराज भले सोशल मीडिया में खुद को विकल्प के तौर पर पेश करने में सफल रही हो, लेकिन जमीन पर वह अपने संगठन का उस तरह से विस्तार नहीं कर पाई है।

ऐसे में यदि प्रशांत किशोर खुद चुनाव हार जाते हैं तो जनसुराज की भविष्य की राजनीति के लिए ही संकट पैदा हो जाएगा। इससे पीके की ब्रांड वैल्यू सीधे तौर पर प्रभावित होगी। उनके इसी ब्रांड वैल्यू के दम पर फिलहाल जनसुराज का मायाजाल टिका हुआ है।

प्रशांत किशोर ने खुद की छवि देश के सफल चुनावी रणनीतिकार के तौर पर गढ़ी है। लेकिन खुद की चुनावी हार से जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि दूसरों को जीत दिलाने का दावा करने वाला खुद एक चुनाव नहीं जीत सकता।

इसके अलाव, प्रशांत किशोर ने जन सुराज की सारी गतिविधियों को अपने ईद-गिर्द समेट कर रखा है। वे पार्टी के एकमात्र चेहरे है। ऐसे में राघोपुर में तेजस्वी को चुनौती देने की स्थिति में प्रशांत किशोर इसी सीट की परिधियों में बंध जाते, क्योंकि यह सीट लालू परिवार का गढ़ रहा है। प्रशांत किशोर अगर इसी सीट पर अपना पूरा ध्यान देते, तो पार्टी का बाहर प्रचार-प्रसार कौन करता।

प्रशांत किशोर को अपने पैतृक जिला बक्सर या गोपालगंज के बाहर ज़्यादा लोग नहीं जानते है। उन्होंने लंबी पदयात्रा की, लोगों से संवाद किया, लेकिन वो जन नेता वाली छवि अब तक नहीं बना सके हैं। कुछ वैसी ही स्थिति पप्पू यादव के साथ भी रही। वो अपने गाँव या सीमित इलाके तक ही पहचान रखते हैं, लेकिन राज्य या देशभर में उनकी पकड़ कमजोर है। पप्पू यादव ने भी चुनावी राजनीति में कई बार बड़ा दावा किया, लेकिन जब वोटिंग का समय आया, तो जमीनी सच्चाई सामने आ गई।

पैसे लेकर भी नहीं दिया टिकट, जलाए लाभ कार्ड और झंडे

प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ में टिकट बँटवारे को लेकर मची कलह अब सरेआम आ गई है। बिहार विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिलने से नाराज एक संभावित प्रत्याशी ने विरोध जताते हुए पार्टी के हजारों ‘जन सुराज लाभ कार्ड’ और झंडे जला दिए।

नाराज नेता ने प्रशांत किशोर पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि पीके ने उनसे टिकट देने का वादा किया था। इसी वादे के भरोसे पर उन्होंने चुनाव क्षेत्र में लगभग 50 लाख रुपए खर्च कर दिए थे। हालाँकि, अंतिम समय में उन्हें टिकट नहीं दिया गया और वह टिकट किसी और उम्मीदवार को दे दिया गया।

इसके अलावा, उजियारपुर में टिकट बँटवारे के बाद राजू सहनी और जनसुराज के प्रदेश अध्यक्ष के बीच हुई बातचीत का ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा है, जिसमें राजू सहनी कह रहे हैं कि काम हमसे करवाया और टिकट किसी और को मिला।

ऑपइंडिया का दावा- जन सुराज में होगी ‘कलह’

‘ऑपइंडिया’ प्रशांत किशोर की राजनीतिक शैली और पार्टी के अंदर होने वाली बगावत पर चर्चा पहले ही कर चुकी है। बिहार के वोटकटुआ कहे जा रहे ‘प्रशांत किशोर का मायाजाल’ अब खुलकर सामने आ रहा है और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी पैसों के बदले सीटें बाँटने का आरोप लगा दिया है। इसका वीडियो आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।

प्रशांत किशोर कई बार कह चुके हैं कि वे बिहार में जो कुछ भी कर रहे हैं, वह वे कॉन्ग्रेस के बैनर तले करना चाहते थे। कई जानकारों का मानना भी है कि वे जिस तरह से काम कर रहे हैं वह महागठबंधन की बी टीम जैसा है। अब राघोपुर में तेजस्वी यादव का रास्ता आसान कर उन्होंने इस पर मुहर लगा दी है।

प्रशांत किशोर का ‘जनधन पार्टी’

प्रशांत किशोर ने जन सुराज की शुरुआत ‘बदलाव’ के नारे के साथ की थी। कहा था कि ये पार्टी आम लोगों की होगी, पारदर्शिता से चलेगी। लेकिन टिकट बँटवारे को लेकर जो हालात दिखे, उससे यही लग रहा है कि राजनीति का वही पुराना खेल यहाँ भी दोहराया जा रहा है। जहाँ पैसे वालों को टिकट मिलता है, जमीन से जुड़े लोग सिर्फ ताली बजाते रह जाते हैं। अब ये तो जनता के हाथ में है कि जन सुराज की असली पहचान क्या है, जनता की पार्टी या जनधन पार्टी?

बलूच विद्रोहियों को ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ बता भारत पर नाकामियों का ठीकरा फोड़ रहा पाक, पहले इस्लाम के नाम पर बनाए आतंकी अब TTP को बता रहा मजहब का ‘ख्वारिज’

अक्टूबर 2007 की बात है, पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने एक इंटरव्यू में कहा था, “आतंकवाद पाकिस्तान की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अगर इसे खत्म न किया गया तो पाकिस्तान बिखर सकता है और उसके लोग खूनी गृहयुद्ध में झोंक दिए जाएँगे।” इस इंटरव्यू के 2 महीने के भीतर भुट्टो की हत्या कर दी गई।

बेनजीर भुट्टो का यह डर बेजा नहीं था, दशकों से अपने आँगन में उन्होंने आतंकवाद के साँप को पलते देखा था। आज इस बात को 18 साल बीत गए और भुट्टो की कही हर एक बात सच साबित हो रही है। आतंकवाद का वही साँप आज पाकिस्तान की छाती पर कुंडली मारकर बैठा है।

पाकिस्तान एक या दो तरफा नहीं बल्कि चौतरफा घिरा हुआ है। अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) तक, बलूच स्वतंत्रता सेनानियों से लेकर POK और सिंध के आंदोलनों तक हर ओर से पाकिस्तान की पिटाई हो रही है जिससे वह खोखला हुआ जा रहा है। इस्लामी कट्टरपंथ ने पाकिस्तान को बरबाद कर दिया है।

मगर जो बाज आ जाए वो पाकिस्तान कैसा? आज भी वो अपनी बरबादी के लिए भारत को जिम्मेदार बता रहा है। यानी पाकिस्तान की जनता वहाँ के हुक्मरानों से सवाल पूछे इससे पहले ही वो देश के भीतर लगी आग के लिए भारत को जिम्मेदार बताने पर तुले हैं।

बीते 12 अक्टूबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने TTP के घातक हमले के बाद एक बयान जारी किया। इसमें पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा, “पाकिस्तान को अफगान तालिबान, फितना-अल-ख्वारिज और फितना-अल-हिंदुस्तान द्वारा 11 और 12 अक्टूबर 2025 की रात को पाक-अफगान सीमा पर की गई अनावश्यक और अनुचित हिंसा पर गहरी चिंता है।”

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का बयान

इस लेख में जानेंगे कि फितना-ए-ख्वारिज और फितना-ए-हिंदुस्तान क्या हैं और कैसे इनके आड़ में पाकिस्तान देश के भीतर लगी आग का ठीकरा भारत और इस्लाम पर फोड़ना चाहता है।

TTP को पाकिस्तान ने घोषित किया फितना-अल-ख्वारिज?

26 जुलाई 2024 को पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया। इसमें पाकिस्तान सरकार ने प्रतिबंधित ‘आतंकी संगठन’ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अब ‘फितना-अल-ख्वारिज’ घोषित कर दिया था।

पाकिस्तान के गृह मंत्रालय के इस आदेश में कहा गया, “तथाकथित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियाँ इस्लामी धर्म और उसके सही शिक्षाओं के विपरीत हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए फैसला लिया गया है कि अब से इस संगठन को ‘फितना-अल-ख्वारिज’ कहा जाएगा।”

साथ ही, इस TTP से जुड़े लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहीं मजहबी उपाधियों जैसे ‘मौलवी’, ‘मुफ्ती’ और ‘हाफिज’ अब इस्तेमाल पर रोक लगा दी और इसकी जगह इनके लिए ‘खारिजी’ शब्द इस्तेमाल करने का आदेश दे दिया।

पाकिस्तान के गृह मंत्रालय का 26 जुलाई 2024 का आदेश

इसके अर्थ पर गौर करें तो ‘फितना’ एक अरबी मूल का शब्द है जिसका मतलब ‘विद्रोह या बगावत’ होता है। वहीं, ख्वारिज का मतलब ‘चरमपंथ के रास्ते पर चले जाने वाले लोग’ होते हैं।

रिसर्च डेटाबेस से जुड़ी EBSCO की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “ख्वारिज जिन्हें अक्सर खारिजी कहा जाता है, इस्लाम के शुरुआती समय में उभरी एक कट्टरपंथी शाखा थी। यह समूह पहले फितना के बाद पैदा हुआ था, जो 656 से 661 ईस्वी के बीच चला गृहयुद्ध था।”

इसमें कहा गया है, “ख्वारिज का मतलब ‘बगावती’ या ‘अलग होने वाले’ लोगों से है। इस्लामी शिक्षाओं की अपनी अतिवादी व्याख्याओं और चौथे खलीफा अली इब्न अबी तालिब के नेतृत्व को अस्वीकार करने के कारण ये मुसलमानों के मुख्य समूह से अलग हो गए थे।”

पाकिस्तान सिर्फ इन्हें ‘खारिजी’ बताने पर ही नहीं रुका बल्कि इन्हें भारत से भी जोड़ दिया है। पाकिस्तान की सेना की 13 सितंबर 2025 की एक प्रेस रिलीज में कहा गया है, “10 से 13 सितंबर के बीच खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दो अलग-अलग ऑपरेशनों में 35 ख्वारिज को खत्म कर दिया गया है।

पाकिस्तानी सेना की प्रेस रिलीज

पाकिस्तानी सेना ने कहा कि मारे गए ख्वारिज भारतीय प्रॉक्सी ‘फितना-अल-ख्वारिज’ से जुड़े हुए थे। यह ट्रेंड अब लगातार चल रहा है। बीते 12 अक्टूबर को पाकिस्तानी सेना ने कहा, “10/11 अक्टूबर 2025 की रात एक कायरतापूर्ण आतंकी हमले में, भारतीय प्रॉक्सी ‘फितना-अल-ख्वारिज’ से जुड़े ख्वारिजों ने डेरा इस्माइल खान जिले में स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल को निशाना बनाया।”

जिस TTP को आज पाकिस्तान भारत का प्रॉक्सी बता रहा है असल में वो उसका ही पाला हुआ है। TTP की जड़ें अल-कायदा से जुड़ी हैं, वही अल-कायदा जिसके मुखिया और आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने अपने घर में शरण दी थी।

UNSC की वेबसाइट बताती है, “TTP पहले अलग-अलग सक्रिय आतंकवादी समूहों का गठजोड़ है, जो 2007 में फेडरल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्राइबल एरिया (FATA) में पाकिस्तान की सेना द्वारा अल-कायदा से जुड़े आतंकवादियों के खिलाफ अभियान के बाद एक साथ आए।” बैताल्लाह मेहसूद के नेतृत्व में इस संगठन की नींव पड़ी थी।

FATA अफगानिस्ता से सटा एक कबीलाई इलाका है और 2018 से पहले यह क्षेत्र सेमी-ऑटोनोमस हुआ करता था। यानी फैसले कबीलाई कानूनों के मुताबिक भी होते थे। 9/11 के हमले के बाद जब अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ छेड़ा और सेना अफगानिस्तान में घुसी तो वहाँ से आतंकी/चरमपंथी संगठनों के लोग भागकर FATA आ गए।

तब पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ की सरकार थी और अमेरिका ने इन्हें FATA से निकालने के लिए पाकिस्तान को खूब पैसा दिया। पाकिस्तान ने FATA में अपनी सेना भेजी और कबीलों पर जुर्म भी किए गए। इससे स्थानीय लोग भड़के और चरमपंथी संगठनों ने इस नाराजगी को भुनाया और साथ मिलकर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ना शुरू कर दिया। यहीं से आगे चलकर TTP की नींव पड़ी थी जो पूरे पाकिस्तान में अपना इस्लामिक कानून लागू करना चाहता था।

बलूच विद्रोहियों को पाकिस्तान ने बनाया ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’

पाकिस्तान ने केवल TTP पर ही ठप्पा नहीं लगाया है बल्कि बलूच विद्रोहियों को भी ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ का नाम दिया है। पाकिस्तान की सेना के अत्याचारों से प्रताड़ित होकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे बलूचों को पाकिस्तान ने भारत द्वारा प्रायोजित बता दिया है।

मई 2025 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने बलूचिस्तान में सक्रिय सभी विद्रोही गुटों को ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ घोषित कर दिया। पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने 31 मई 2025 को इसे लेकर एक आदेश भी जारी किया।

पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने भारत पर आरोप मढ़ते हुए कहा, “हिंदुस्तान के इशारे पर बलूचिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों में कुछ संगठनों और समूहों की संलिप्तता को ध्यान में रखते हुए, जो पाकिस्तान की इस्लामी आस्था और संप्रभुता और पारंपरिक परंपराओं के लिए हानिकारक हैं, यह निर्णय लिया गया है कि अब से बलूचिस्तान में सक्रिय सभी आतंकवादी समूहों और संगठनों को ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ कहा जाएगा।”

इसमें आगे कहा गया, “इस बदलाव का उद्देश्य इन आतंकवादी संगठनों और समूहों की वास्तविक प्रकृति और विचारधारा तथा पाकिस्तान के लोगों के खिलाफ भारत (हिंदुस्तान) के नापाक मंसूबों को सामने लाना है।”

पाकिस्तान के गृह मंत्रालय का आदेश

इसके बाद से पाकिस्तान की सेना द्वारा इस शब्द का बार-बार जिक्र किया जा रहा है। पाकिस्तान की सेना की कोशिश है कि किसी तरह लोगों को मन में यह बात बिठा दी जाए तो बलूचिस्तान में जो हो रहा है वो उनके कुकर्मों को फल नहीं है बल्कि उसमें हिंदुस्तान का हाथ है।

पाकिस्तानी सेना ने 1 अक्टूरब 2025 के अपने X पोस्ट में लिखा, “1 अक्टूबर 2025 को सुरक्षा बलों ने भारतीय प्रॉक्सी, ‘फितना-अल-हिंदुस्तान’ से संबंधित आतंकवादियों की उपस्थिति की सूचना पर बलूचिस्तान के खुजदार जिले में एक खुफिया जानकारी पर आधारित अभियान चलाया।”

PAK सेना का ट्वीट

अब पाकिस्तान से त्रस्त बलूचिस्तान के लड़ाके जो भी घटनाएँ करते हैं उन्हें पाकिस्तान भारत के मथे मढ़कर अपनी कारगुजारियों से बचने की कोशिश करता है। स्कूल में हमला हो या जाफर एक्सप्रेस का हाईजैक सभी को पाकिस्तान ने भारत से जोड़ दिया है।

इस्लाम और हिंदुस्तान के नाम पर जान बचाने की कोशिश में लगा पस्त पाकिस्तान

पाकिस्तान ने दशकों तक इस्लामी कट्टरपंथ के नाम पर आतंक फैलाया है। पाकिस्तान से चलने वाले आतंकियों संगठनों ने मजहब की आड़ में आतंकी तैयार किए और भारत उनका निशाना बनता रहा। ऐसा वक्त तक आया कि जब दुनिया के हर आतंकी हमले के तार पाकिस्तान से जुड़े निकलने लगे और यह सब मजहब की आड़ में किया जा रहा था।

पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी नाकामी छिपाने के लिए इस्लाम का सहारा लेते आए हैं। पाकिस्तान का फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पाकिस्तान को कलमें की बुनियाद पर मदीना के बनी दूसरी रियासत तक बता चुका है। जाहिर है कि इस तरह के शब्दों के प्रयोग से वो इस्लामी कट्टरपंथियों को अपने काबू में करने की कोशिश करता है।

पहले तो पाकिस्तान ने लोगों को इस्लाम के नाम पर भड़काया, दुनिया को इकट्ठा करने की कोशिश की और जब इससे भी उसकी दाल ना गली तो उसके इस्लाम के नाम पर ही अपने लोगों को बाँटकर नया पैंतरा चलने की कोशिश की है।

दरअसल, तहरीक-ए-तालिबान के नाम को लेकर भी पाकिस्तान परेशान था। ‘तहरीक’ का अर्थ होता है ‘आंदोलन’ जबकि ‘तालिबान’ या ‘तालिब’ का अनुवाद ‘छात्र’ होता है। इसलिए, इसे समूह को ‘पाकिस्तान के छात्रों का आंदोलन’ समझा जाता था जिससे पाकिस्तान परेशान था और इस जुड़ाव को खत्म करने के लिए ही ‘ख्वारिज’ शब्द दिया गया है। जो इन्हें ‘इस्लामी विद्रोही’ साबित करने की कोशिश है।

पाकिस्तान TTP को इस्लाम का दुश्मन बता रहा है लेकिन इस्लाम और उसके पैंगबर के नाम पर बने जैश-ए-मोहम्मद (मुहम्मद की सेना), लश्कर-ए-तैयबा (पवित्र सेना), हिज्बुल मुजाहिदीन (इस्लामी पवित्र लड़ाकों का दल) जैसे दलों को खुलकर आतंकवाद फैलाने के लिए संरक्षण देता है।

अब यही आतंकवाद जब पाकिस्तान पर भारी पड़ रहा है तो वो किसी भी स्थिति में इससे बचना चाहता है। पाकिस्तान में फौज और आतंकवाद का गठजोड़ किसी से भी छिपा नहीं है। हाल ही में जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान पर भारत ने हमला किया और आतंकियों को मार गिराया तो उनके लिए नमाज-ए-जनाजा पढ़ने के लिए पाकिस्तानी फौज के जवान मौजूद थे।

पाकिस्तान को अगर आतंकवाद और गृह युद्ध से बचना है तो इस तरह भारत पर आरोप लगाकर या इस्लाम के नाम पर लोगों को बरगलाकर वो नहीं बच सकता है। उसे अपनी नीतियों में बदलाव लाने होंगे और अपने यहाँ पल रहे आतंकवाद को जड़ से खत्म करना होगा। वरना वो दिन अब दूर नहीं पाकिस्तान टुकड़े-टुकड़े में टूट जाएगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में 100+ फौजियों की मौत, 12 एयरक्राफ्ट तबाह और आतंकी ठिकानों पर बमबारी: DGMO राजीव घई बोले- 88 घंटों में युद्धविराम की गुहार लगाने लगा था पाकिस्तान

भारत के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने मंगलवार (14 अक्टूबर 2025) को खुलासा किया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के मात्र 88 घंटों के भीतर ही युद्धविराम की गुहार लगाई थी। पाकिस्तान के 100 से ज्यादा फौजी इस दौरान मारे गए। ये जानकारी उन्होंने मरणोपरांत दिये गए पाकिस्तानी पुरस्कारों की सूची का हवाला देते हुए कही।

डीजीएमओ घई ने कहा, “संभवतः उन्होंने 14 अगस्त को अपने पुरस्कारों की सूची जारी की। उनके द्वारा मरणोपरांत दिए गए पुरस्कारों की संख्या से असली तस्वीर सामने आई, नियंत्रण रेखा पर उनके हताहतों की संख्या 100 से ज़्यादा थी।”

पाकिस्तान ने मई महीने में 12 से ज्यादा एयरक्राफ्ट खो दिए। 7 मई को भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान ने सीमा पार से गोलीबारी शुरू कर दी थी।

संयुक्त राष्ट्र में सैन्य योगदान देने वाले देशों (यूएनटीसीसी) के प्रमुखों के सम्मेलन में उन्होंने ये खुलासे किए। डीजीएमओ ने कहा कि भारत का इरादा आतंकियों पर कार्रवाई के बाद मामले को आगे बढ़ाना नहीं था, जब तक कि ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता।

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि पाकिस्तान के जल्दबाजी में किए गए आत्मसमर्पण ने भारत के राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को पुष्ट किया। उन्होंने चेतावनी दी, “आगे का संघर्ष उनके लिए विनाशकारी होता।” उन्होंने बताया कि कैसे भारत की सोची-समझी प्रतिक्रिया ने इस्लामाबाद के पास कोई रणनीतिक विकल्प नहीं छोड़ा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान रणनीतिक परिवर्तन

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सैद्धांतिक बदलाव आया कि आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं है। इससे रणनीतिक बदलाव देखा गया। डीजीएमओ ने ज़ोर देकर कहा कि ऑपरेशन सिंदूर न केवल एक सैन्य हमला था, बल्कि भारत के आतंकवाद-रोधी सिद्धांत में एक रणनीतिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता था, जिसे खुद प्रधानमंत्री मोदी ने बताया था।

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा, “आतंकवाद के विरुद्ध हमारी रणनीति में सैद्धांतिक बदलाव आया है। हमारे प्रधानमंत्री ने इस बारे में बात की है। उन्होंने तीन बातें स्पष्ट रूप से कही हैं। पहला, आतंकवादी हमला युद्ध जैसा ही हैं। दूसरा, भारत निर्णायक जवाबी कार्रवाई करेगा और तीसरा, हम परमाणु ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेंगे। आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों में कोई अंतर नहीं है।”

यह अभियान 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार करके 26 पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। उन्हें धर्म पूछ- पूछकर मारा गया था। हालाँकि शुरुआत में एक आतंकी संगठन ने इसकी ज़िम्मेदारी ली थी। लेकिन उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो गई है और वे तुरंत पीछे हट गए।

डीजीएमओ ने कहा कि हालाँकि भारत की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, लेकिन यह सोची-समझी कार्रवाई थी, जिसके बाद तनाव को रोकने और नागरिकों की सुरक्षा के लिए सीमा पर अहम तैनाती की गई।

थलसेना, वायुसेना और नौसेना की समन्वित कार्रवाई

डीजीएमओ घई के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना की भागीदारी वाली ‘सैन्य क्षमता और सफल रणनीति’ की जीत थी।

घई ने विस्तार से बताया, “हमने उनके 11 हवाई ठिकानों पर हमला किया, आठ प्रमुख ठिकानों, तीन हैंगरों और चार रडारों को क्षतिग्रस्त कर दिया। जमीन पर पाकिस्तानी हवाई संपत्तियाँ नष्ट कर दी गईं, जिनमें एक C-130 विमान, एक AEW प्रणाली और कई लड़ाकू विमान शामिल थे।”

नौसेना ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “भारतीय नौसेना पहले ही अरब सागर में आगे बढ़ चुकी थी। अगर पाकिस्तान इसे और आगे बढ़ाता, तो समुद्र और उसके पार, उसके लिए परिणाम विनाशकारी होते।”

पहलगाम हमलावरों को मार गिराया- DGMO घई

डीजीएमओ ने खुलासा किया कि भारतीय सेना ने पहलगाम हमले के तीन मुख्य साजिशकर्ताओं का लगभग 96 दिनों तक पीछा किया और खत्म किया।

घई ने कहा, “हमने उन्हें आराम नहीं करने दिया। जब हमने आखिरकार उन्हें ढूंढा, तो वे थके हुए और कुपोषित लग रहे थे, दौड़ने से थके हुए थे।” हमने सभी को मार गिराया गया था।

उन्होंने 7 मई की तड़के लश्कर-ए-तैयबा के मुरीदके मुख्यालय और बहावलपुर के शिविरों सहित, आतंकवादी ठिकानों पर किए गए सटीक हमलों की तस्वीरें भी साझा किए। इन हमलों में 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए।

सिंधु जल संधि स्थगित कर दी गई

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की प्रतिक्रिया युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक फैली हुई थी। उन्होंने कहा, “पहलगाम हमले के तुरंत बाद 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित करना उसी रणनीति का हिस्सा था जो यह संकेत देती थी कि आतंक और बातचीत की पुरानी रणनीति एक साथ नहीं चल सकती।”

उन्होंने कहा कि इससे भारत की सैन्य शक्ति को कूटनीतिक और आर्थिक साधनों के साथ जोड़ने की क्षमता का पता चलता है।

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद वर्षों से जारी

सीमा पार से दशकों से जारी आतंकवाद पर बात करते हुए, लेफ्टिनेंट जनरल घई ने वैश्विक समुदाय को बताया कि भारत में इससे कितने लोग मारे गए और कितना नुकसान हुआ। उन्होंने कहा, “1980 के दशक में अकेले जम्मू और कश्मीर में 28,000 से ज्यादा आतंकवादी घटनाएँ हुई। 60,000 से ज्यादा परिवार यानी एक लाख से ज्यादा लोग, अपने घरों से भागने को मजबूर हुए। 15,000 नागरिक और 3,000 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं।”

कोई सवाल नहीं, केवल सरेंडर… यही चाहते हैं इस्लामी कट्टरपंथी: AltNews वाले प्रतीक सिन्हा ने तालिबान और ‘तहजीब’ पर खोला मुँह तो ‘डिजिटल पत्थरों’ से कूच दिया

‘हमने रणनीति बदली है, विचारधारा नहीं।’ भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों को अपनी वैचारिक और मजहबी सीमाओं की जितनी साफ समझ है, शायद ही किसी और को हो। उन्होंने दिखावे के तौर पर लिबरल्स और वामपंथियों को गले लगाया ताकि उन्हें अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ‘यूजफुल इडियट्स’ की तरह इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन जैसे ही कोई इनके बिना सवाल किए सरेंडर वाले अनकहे नियमों से जरा भी हटता है, तभी ये लोग तुरंत उन्हें किनारे कर देते हैं, नकार देते हैं और उनकी बेइज्जती करने लगते हैं।

इसी सिलसिले में एक नया मामला ‘लिबरल्स भी संघियों से अलग नहीं है’ सामने आया है। इस्लामी कट्टरपंथी Alt News जैसे वामपंथी झुकाव वाले पोर्टल को फंड न देने की माँग कर रहे हैं क्योंकि इसके फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों की आलोचना कर दी। उन्होंने तालिबान को गले लगाने और अफगानिस्तान वाले ‘इस्लामी मॉडल’ को सही ठहराने पर सवाल उठाया था।

ये सब शुरू हुआ 12 अक्टूबर 2025 को, जब ‘प्रोफेसर नूरुल’ नाम के एक चर्चित इस्लामी कट्टरपंथी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट की। पोस्ट में एक शेर था, “तेरी तहजीब ने उतारा है तेरे सर से हिजाब, मेरी तहजीब ने मेरी नजरों को झुका कर रखा है।”

इसमें एक तस्वीर शामिल थी, जिसमें तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी पांरपरिक पोशाक और तालिबानी हेडगियर में नजर आ रहे थे। उनके सामने एक महिला पत्रकार गुलाबी ब्लेजर और पैंट्स में खुले बालों के साथ (यानी बिना हिजाब के) उनसे सवाल पूछ रही थी। यह तस्वीर साल 2022 में एंटाल्या डिप्लोमेसी फोरम के दौरान ली गई थी।

यह पोस्ट उस समय सामने आई जब मुत्ताकी भारत के दौरे पर थे। इस दौरान मुत्ताकी उत्तर प्रदेश के देवबंद भी पहुँचे थे, जो तालिबान की विचारधारा का स्थान है।

इस पोस्ट पर Alt News के को-फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने इस्लाम के इस प्रतिगामी संस के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने इस कट्टरपंथी इस्लामी सोच की तुलना हिंदुत्व से की और लिखा, “जो लोग इस इस्लाम के संस्करण को मानते हैं और तालिबानी को गले लगाने में खुश हैं। वे उतने ही खतरनाक है, जितना हिंदुत्व ब्रिगेड।”

प्रोफेसर नूरुल/इलाहाबादी ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि प्रतीक सिन्हा जैसे नास्तिकों को किसी की मजहबी भावनाओं पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने हममजहब लोगों से अपील की कि Alt News को फंड देना बंद करें क्योंकि उनके मुताबिक सिन्हा जैसे लोग ‘संघियों से भी ज्यादा जहरीले’ हैं।

उन्होंने लिखा, “तुम जैसे नास्तिक जो ना हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं और ना इस्लाम में। ऐसे लोगों की किसी भी धार्मिक भावनाओं पर लिखने का कोई अधिकार नहीं है। मुस्लिमों आप लोग फैक्ट चेक के नाम पर इसको 13 लाख देते हो और अंदर से संघियों से भी ज्यादा जहरीला है। आप लोग जुबैर को टैग कर दें।”

इस बहस में को आगे बढ़ाते हुए प्रतीक सिन्हा ने एक बार फिर हिंदुत्ववादियों की तुलना इस्लामी कट्टरपंथियों से की और कहा, तुम लोग हिंदुत्व ब्रिगेड से अलग नहीं हो, उनकी रणनीति भी बिल्कुल यही होती है और वे भी पूछते हैं कि हिंदू Alt News को डोनेट क्यों कर रहे हैं। तुम उसी सिक्के के दूसरे पहलू हो। अगर तुम सोचते हो कि सिर्फ मुस्लिम ही Alt News को डोनेट करते हैं तो तुम भी उतने ही गलतफहमी मे हो। Alt News को हर तबके के लोग डोनेट करते हैं।”

इसके जवाब में नूरुल ने आरोप लगाया कि सिन्हा लगातार मुस्लिमों को इस्लाम से दूर करने की कोशिश करते हैं और बीच-बीच में कुछ हिंदू कट्टरपंथियों को उजागर करना उनका एक ‘बैलेंसिंग एक्ट’ है।

वहीं एक और इस्लामी कट्टरपंथी आसिफ खान भी इस बहस में कूद पड़े और इशारा किया कि सिन्हा इस्लामी कट्टरपंथियों की पिछड़ी ‘तहजीब’ को महिमामंडित करने वालों की आलोचना करके लगभग पूरे ‘मुस्लिम-विरोधी’ हो गए हैं।

आसिफ खान ने लिखा, “ऐ पैगंबर! ईमान वाले मर्दों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें। यही उनके लिए ज्यादा पवित्र है, निस्संदेह अल्लाह उनसे वाकिफ है, जो वे करते हैं। और ईमान वाली औरतों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी पवित्रता की रक्षा करें और अपने शृंगार को केवल वही दिखाएँ जो सामान्य रूप से दिखाई देते हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “~ क़ुरान (24:30-31) यह क़ुरान की एक आयत है… एक ऐसी किताब जिस पर एक अरब से ज़्यादा लोग विश्वास करते हैं। और प्रतीक सिन्हा ने इन अरबों मुस्लिमों की तुलना मुस्लिमों की लिंचिंग और उन पर अत्याचार करने वाली हिंदुत्व ब्रिगेड से की है। मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह का स्तर इतना ज्यादा है कि आप उन्हें सिर्फ इसलिए ‘खतरनाक’ कहते हैं क्योंकि वे आस्था रखते हैं।”

जवाब में प्रतीक सिन्हा ने शर्मनाक तरीके से तालिबान और मुस्लिम कट्टरपंथियों की तुलना हिंदुत्व ब्रिगेड से कर दी जबकि दोनों में दूर-दूर तक कोई समानता नहीं है। जहाँ तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा और अफगान महिलाओं की नौकरी करने, महरम या परिवार के पुरुषों के बिना सार्वजनिक स्थानों पर घूमने की आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं तथाकथित हिंदुत्व ब्रिगेड महिलाओं पर ऐसी कोई प्रतिगामी प्रथा लागू नहीं करती और महिला सशक्तिकरण का जश्न मनाती है।

इसके अलावा, तालिबान ने भूकंप के मलबे से महिलाओं को बचाने तक की कोशिश नहीं की क्योंकि उनकी शरीयत मान्यताओं के अनुसार पुरुषों को अपनी बीवी के अलावा किसी भी महिला को छूना मना है। इसके उलट, RSS और ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ हमेशा संकट के समय सबसे पहले आगे आकर पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों की मदद करते रहे हैं।

प्रतीक सिन्हा ने लिखा, “असल जिंदगी में जितने भी मुस्लिम पुरुषों को मैं जानता हूँ, वे महिलाओं से बात करते समय अपनी नजरें नहीं झुकाते। साफ है कि वे कुरान को शब्द दर शब्द नहीं मानते। धर्मों का गठन मध्यकाल में हुआ था और उनमें से बहुत कुछ अब अप्रासंगिक हो चुका है, जिसे छोड़ देना चाहिए। आधुनिक देश धर्म के नियमों से नहीं, कानून के शासन से चलते हैं। और यही वजह है कि वर्तमान सरकार में जिस तरह कानून का शासन कमजोर किया जा रहा है, उसके खिलाफ लड़ाई जरूरी है। हाँ, कुछ मुस्लिम पुरुष मजहब कट्टरपंथी होते हैं और मैं उनकी तुलना हिंदुत्व ब्रिगेड से कर रहा हूँ। शायद समझने के लिए कुछ क्लासेस जरूरी हैं, आसिफ।”

इसी बीच ‘मुस्लिम पीड़ित’ नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए फेक न्यूज फैलाने वाले मोहम्मद शादाब खान नाम का एक शख्स ने प्रतीक सिन्हा की तुलना बीजेपी के पूर्व फायरब्रांड नेता टाइगर राजा सिंह से कर दी। शादाब खान ने लिखा, “इनको मुस्लिमों से नफरत है, इस्लाम से नफरत है। बस 19-20 का ही फर्क है।”

यहाँ एक और चर्चित इस्लामी कट्टरपंथी वसीम अकरम त्यागी ने भी प्रतीक सिन्हा पर निशाना साधा और लिखा, “बहुत सारे ‘फ्री थिंकर’ इस तस्वीर की आलोचना कर रहे हैं। आलोचना की वजह बस यह है कि महिला पत्रकार के सामने तालिबान सरकार के विदेश मंत्री नजर नीचा करके बात कर रहे हैं, वो उस महिला पत्रकार की आँखों में आँखें डालकर बात क्यों नहीं कर रहे हैं। कमाल है! वो आँखों में आँखें डालकर बात करें तो भी बवाल, और ना करें तब भी बवाल। अगर वो आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे तब यही ‘फ्री थिंकर’ उस पर चटखारे लेकर फब्तियाँ कसेंगे! लेकिन अब इसे ‘खतरनाक’ बता रहे हैं।”

दिलचस्प बात यह है कि Alt News और उसके सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा और मोहम्मद ज़ुबैर को इस्लामी कट्टरपंथियों की नाराजगी का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा गढ़ी गई ‘भगवा लव ट्रैप’ साजिश थ्योरी पर रिपोर्टिंग की। वही इस्लामी कट्टरपंथी जो असली और दर्ज लव जिहाद और ग्रूमिंग जिहाद के मामलों को ‘झूठा’ बताकर खारिज कर देते हैं या कभी-कभी उनका जश्न भी मनाते हैं। उन्होंने Alt News की उस रिपोर्टिंग की आलोचना की, जिसमें मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदू लड़कों और उनकी मुस्लिम महिला दोस्तों या पार्टनर्स पर हमले की घटनाओं को कवर किया गया था और इन हमलों को ‘भगवा लव ट्रैप’ कहकर जायज ठहराया गया।

प्रतीक सिन्हा की बार-बार तालिबान की आलोचना को ‘संतुलित’ दिखाने के लिए जबरन हिंदुत्व को घसीटने की कोशिशें किसी काम नहीं आईं।

मजे की बात यह है कि मजबी कट्टरता और महिला विरोधी सोच का बचाव करते हुए पुरुष इस्लामी कट्टरपंथी मुस्लिम महिलाओं को भी नहीं बख्शते। इसी संदर्भ में जब RJ सायमा, जो अक्सर मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेलने और अपने हिंदू-विरोधी सोशल मीडिया बयानों को लेकर आलोचना झेलती हैं, उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी महिला से नजरें झुकाकर बात करना तालिबान मंत्री के महिलाओं पर किए गए अत्याचारों को माफ कर देता है?

उन्होंने लिखा, “जो लोग औरतों पर ज़ुल्म की सारी हदें पार कर चुके हैं, क्या उन्हें लगता है कि किसी से नजरें झुकाकर बात करने से उनके गुनाह माफ हो जाएँगे? क्या वे अब अच्छे किरदार वाले लोग बन गए हैं? वाकई, वसीम?”

इसके जवाब में वसीम अकरम त्यागी ने न सिर्फ तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों पर लगाए गए कट्टरपंथी प्रतिबंधों और उनके शासन में महिलाओं को झेलनी पड़ी तमाम ज़्यादतियों को हल्के में लिया बल्कि तालिबान की महिला-विरोधी नीतियों की तुलना उन देशों से कर दी जो ‘आधुनिक’ संस्कृति के दावे करते हैं।

इस्लामी कट्टरपंथी पूरी तरीके से समर्पण चाहते हैं, आलोचना नहीं

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब सेक्युलर लिबरल्स को इस्लामो-लेफ्टिस्ट ‘प्रोग्रेसिव’ इकोसिस्टम से बाहर कर दिया गया हो, उन्हें ‘संघी’ कहकर बदनाम किया गया हो या पूरी तरह से किनारे कर दिया गया हो। इसी साल सितंबर में केरल की एक यूनिवर्सिटी में हुए एक कार्यक्रम को लेकर बवाल मच गया था, जहाँ हिजाब पहनी मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों से अलग बैठाया गया, वो भी बिल्कुल तालिबानी अंदाज में।

इस Profcon नाम के इवेंट की जो तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन सामने आए, उन पर प्रतिक्रिया देते हुए रुचिका शर्मा, जो खुद को ‘इतिहासकार’ बताती हैं और जिनका मानना है कि इस्लामी आक्रांताओं के हिंदू-विरोधी अपराधों को सफेदपोश बनाना उनका मिशन है, उन्होंने लिखा, “सिर्फ हिजाब काफी नहीं है, महिलाओं को अलग बैठाओ, पीछे बैठाओ, पर्दे के पीछे रखो। यानी उन्हें सिर्फ औरत होने की सजा दो और इसे ‘उनकी पसंद’ कहकर पेश करो।”

मुस्लिम महिलाओं को जानबूझकर अदृश्य करने की इस आलोचना पर वही इस्लामी कट्टरपंथी, जो रुचिका शर्मा की तारीफ करते नहीं थकते थे, उन्हें ‘ईमानदार’ और ‘बहादुर’ इतिहासकार कहते थे क्योंकि उन्होंने औरंगजेब जैसे मध्यकालीन इस्लामी शासकों के अत्याचारों को हल्का करके पेश किया। अब वही लोग उन्हें ‘इस्लामोफोब’ कहने लगे।

यहाँ तक कि शर्मा को इस्लामोफोब कहने वाले भूल गए कि उन्होंने खुद एक बार यह स्वीकार किया था कि उन्होंने अपने मुस्लिम अब्यूजर का नाम सिर्फ इसलिए नहीं लिया था ताकि ‘संघी’ लोग उस घटना का इस्तेमाल अपने ‘इस्लामोफोबिक सांप्रदायिक एजेंडे’ के लिए न कर सकें।

ठीक इसी तरह, जब इस्लामो-लेफ्टिस्ट प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ से जुड़ी अर्फा खानम शेरवानी ने रुचिका शर्मा की राय का समर्थन किया तो वे भी इस्लामी कट्टरपंथियों के गुस्से से नहीं बच सकीं। उन्हें यह समझाया गया कि इस्लाम में पुरुषों और महिलाओं का आपस में खुलकर मेल-जोल रखना जायज नहीं है।

दरअसल, इस्लामी कट्टरता और मजहब आधारित महिला-विरोधी सोच से कोई भी सुरक्षित नहीं है। इसका असर ऑनलाइन नाराजगी, ‘संघी’ कहकर लेबलिंग, तालिबानी महिला-विरोधी नीतियों और बड़े मामलों में ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारों तक में देखा जा सकता है। इस्लामी कट्टरपंथी न सिर्फ अपने लिबरल सहयोगियों को जरा सी असहमति पर खारिज कर देते हैं बल्कि अपने ही हममजहब लोगों को भी इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि वे उनके तय किए गए ‘मुस्लिम होने के मानकों’ पर खरे नहीं उतरते।

(मूलरूप से यह खबर अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों को दिए गए हथियारों के लाइसेंस, राजस्थान में खुला J&K का ₹100 करोड़ का ‘गन लाइसेंस घोटाला’: निशाने पर 8 IAS अधिकारी, जानें क्या है पूरा मामला?

जम्मू कश्मीर में करीब 100 करोड़ के गन लाइसेंस घोटाले में एमएचए ने अहम कदम उठाया है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से तीन अधिकारियों, यशा मुद्गल, शाहिद इकबाल चौधरी और नीरज कुमार को लेकर जानकारी माँगी है। ये कार्रवाई राजस्व सचिव कुमार राजीव रंजन पर राज्य में हथियार लाइसेंस में कथित अनियमितताओं के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति देने के दो महीने बाद माँगी गई है।

गन लाइसेंस स्कैम में 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदेह के घेरे में हैं। अब गृह मंत्रालय ने सीबीआई से पूछा है कि यशा मुर्दल, शाहिद इकबाल और नीरज कुमार समेत तमाम अधिकारियों के खिलाफ हथियार डीलरों से जुड़ने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं या नहीं। ये घोटाला 2012 से 2016 के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस को अवैध तरीके से जारी किए जाने को लेकर है।

जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव से पूछा गृह मंत्रालय ने

गृह मंत्रालय में अवर सचिव सीपी विनोद कुमार ने 21 फरवरी 2025 को एक खत जम्मू -कश्मीर के मुख्य सचिव को लिखा है। इसमें बताया गया है कि तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देने की सिफारिश करने वाले पत्रों के साथ न तो केंद्रीय जाँच ब्यूरो के पत्र/प्रस्ताव और डीवीडी थे और न ही जम्मू-कश्मीर के कानून विभाग की कोई कानूनी राय।

इस घोटाले में 16 पूर्व जिलाधिकारी (13 आईएएस अधिकारी और तीन केएएस अधिकारी) शामिल हैं। इनमें ये तीनों अधिकारी भी शामिल हैं, जिनको लेकर सवाल पूछे गए हैं। सभी पूर्व जिलाधिकारियों पर तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य के अलग-अलग जिलों में तैनाती के दौरान लाखों अवैध हथियारों के लाइसेंस जारी करने के आरोप हैं।

गृह मंत्रालय ने सीबीआई से क्या पूछा

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई को गृहमंत्रालय ने 1 सिंतबर 2025 को पत्र लिखा है।

पत्र में ये साफ करने को कहा है कि क्या इन अधिकारियों को अवैध हथियार लाइसेंस जारी करने के बदले आर्थिक फायदा हुआ था। क्या जाँच में किसी आईएएस अधिकारी के आर्म्स डीलरों के साथ साँठ-गाँठ के सबूत मिले हैं। क्या संपत्ति के सौदे या पैसों के लेन-देन के सबूत मिले हैं।

सीबीआई की जाँच में क्या सामने आया

सीबीआई ने अपनी जाँच कर आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ज्यादातर हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए। लाइसेंस जारी करने में कई डीलर, बिचौलिए और प्रशासनिक अधिकारियों की संलिप्तता थी।
जम्मू कश्मीर प्रशासन ने 2021 में KAS अधिकारियों और क्लर्कों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दे दी थी। इसके बाद सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी। लेकिन आईएएस अधिकारियों का मामला अब तक लंबित है, क्योंकि इसके लिए गृहमंत्रालय से अनुमति की जरूरत है। गृहमंत्रालय इस मामले में काफी फूँक-फूँक कर कदम रख रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद गृहमंत्रालय पर फैसला लेने का दबाव भी आ गया है।

जम्मू-कश्मीर गन घोटाला क्या है

2017 में राजस्थान की एंटी टेररिज्म स्क्वाड की एक जाँच में जम्मू कश्मीर में बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज के आधार पर लाइसेंस जारी करने का पता चला था। इस मामले को सीबीआई को जाँच के लिए सौंपा गया। सीबीआई को पता चला कि 2012 से 2016 तक के बीच 2.74 लाख हथियारों के लाइसेंस जारी किए गए थे। इनमें से 95 फीसदी वे लोग थे, जो जम्मू-कश्मीर के निवासी नहीं थे। यहाँ तक कि उनका राज्य से कोई लेना-देना नहीं था।

सीबीआई के मुताबिक, ये लाइसेंस सेना, अर्धसैनिक बलों और दूसरे बाहरी लोगों को पैसों की लेन-देन के बाद जारी किए गए।

इस मामले में 9 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जाँच की गई। इनमें से 8 वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर अभियोजन की अनुमति गृहमंत्रालय ने दी। ये सभी अधिकारी 2012 से 2016 के बीच जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पदस्थापित थे।

जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस अरुण पाली और जस्टिस राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने इस मामले में गृहमंत्रालय से 6 हफ्तों में फैसला लेने को कहा था कि इन आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी जाएगी या नहीं। इसको देखते हुए गृहमंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के उच्चाधिकारी को पत्र लिखा है।

हाईकोर्ट में इससे संबंधित एक जनहित याचिका शेख मोहम्मद शफी और अन्य ने दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि आरोपित अधिकारी अभी भी राज्य के उच्च पदों पर पदस्थापित हैं और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए कोर्ट उन पर निगरानी रखे।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर ये मामला काफी अहम है। ये कोई प्रशासनिक गलती भी नहीं है, बल्कि जम्मू कश्मीर प्रशासन की छवि से जुड़ा मामला है। गृहमंत्रालय अब इस पर जल्दी निर्णय लेने के मोड में आ गई है।

बंगाल में महिलाओं पर सबसे ज्यादा फेंके गए तेजाब, ‘घुसपैठियों’ ने किए सबसे ज्यादा अपराध: NCRB की रिपोर्ट में खुलासा, क्यों महिला सुरक्षा पर ‘गंभीर’ नहीं है ममता सरकार

महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार के क्षेत्र में महिला मुख्यमंत्री का राज्य आदर्श होना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। लगातार हो रहे यौन अपराध की घटनाएँ और हाल ही में प्रकाशित नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट दर्शाती है कि राज्य सरकार महिलाओं की सुरक्षा को कमतर आँकती है।

दुर्गापुर में हुए एमबीबीएस की दूसरी वर्ष की छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले में अब तक अपू बाउरी, फिरदौस शेख और शेख रिजाउद्दीन समेत 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है।
पीड़िता के पिता ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में उनकी बेटी सुरक्षित नहीं है। उनका विश्वास टूट गया है और हम यहाँ नहीं रहना चाहते। उनका कहना है कि उनकी बेटी अपनी आगे की शिक्षा ओडिशा में पूरा करेगी। उन्होंने कहा है कि बंगाल में ‘औरंगजेब का शासन’ है।

विश्वास का टूटना कोई आश्चर्य में डालने वाली बात नहीं है। कुछ महीने पहले ही कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एमबीबीएस की छात्रा के साथ दर्दनाक तरीके से रेप और हत्या की खबर सामने आई थी। वर्तमान स्थिति में सबसे खराब बात ये है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस मामले पर तुरंत कार्रवाई करना तो दूर, पीड़िता को ही दोषी ठहराने और राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को कम करके आँकने की कोशिश की।

जिम्मेदारी से बचने के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना? पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री की असंवेदनशीलता को दर्शाता है। हालाँकि मुख्यमंत्री बनर्जी ने हमले पर दुख व्यक्त किया और अपराधियों के खिलाफ ‘कड़ी कार्रवाई’ का वादा भी किया, लेकिन अंत में उन्होंने पीड़िता को ही अपने साथ हुई क्रूरता के लिए दोषी ठहरा दिया। उन्होंने कहा, “पीड़िता को रात के 12.30 बजे परिसर से बाहर कैसे जाने दिया गया? निजी संस्थान को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए… लड़कियों को रात में बाहर (कॉलेज) जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी सुरक्षा भी करनी होगी।”

हालाँकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का यौन उत्पीड़न के मामलों को कम करके आँकने वाली टिप्पणियाँ करने का शर्मनाक रिकॉर्ड रहा है। पिछले कुछ वर्षों में, बनर्जी और उनकी तृणमूल कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सदस्यों को बलात्कार की घटनाओं पर अपनी असंवेदनशील प्रतिक्रियाओं के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।

साल 2012 का पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार सबसे चर्चित रहा। 6 फरवरी, 2012 को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट से घर लौट रही एक एंग्लो-इंडियन महिला सुज़ेट जॉर्डन के साथ चलती कार में 5 लोगों ने बलात्कार किया था। खबर सामने आने के तुरंत बाद, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आरोपितों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। उन्होंने इस घटना को ‘शजानो घोटोना’ (मनगढ़ंत घटना) करार दिया था, जो कथित तौर पर ‘सरकार को बदनाम करने के लिए रची गई’ थी।

टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार सहित उनकी पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाया और इस घटना को ‘एक महिला और उसके मुवक्किल के बीच गलतफहमी’ बताया। 2015 में कोलकाता की एक अदालत ने इस मामले के तीन आरोपितों को दोषी ठहराया, जिससे यह साबित हुआ कि हमला वास्तव में हुआ था।

पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान, 2013 में मुख्यमंत्री ने यह आरोप लगाया था कि यह राज्य की जनसंख्या में वृद्धि के कारण है। उन्होंने बलात्कार के बढ़ते मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी जिम्मेदार ठहराया था।

2024 के संदेशखली दंगों के दौरान भी, ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों द्वारा महिलाओं के उत्पीड़न और यौन शोषण को ‘मामूली घटना’ बताकर कमतर आँकने की कोशिश की थी। ममता बनर्जी ने कहा, “इसके बाद, कुछ मीडिया संस्थानों ने इस घटना का फ़ायदा उठाया। एक मामूली घटना को लेकर शोर मचाया।”

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों को ‘मामूली घटना’ बताया। एनसीआरबी के आँकड़े राज्य की स्थिति को उजागर करते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने हाल ही में वर्ष 2023 के लिए अपनी ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष एवं स्थानीय कानूनों (एसएलएल) के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 34,691 मामले दर्ज किए गए। यह देश में किसी भी राज्य में हुए महिलाओं के प्रति अपराध की सबसे ज्यादा मामलों में एक है। हालाँकि यह 2022 के 34,738 मामलों से थोड़ा कम है।

राज्य में क्राइम रेट हर एक लाख महिलाओं में 71.3 है। राज्य की जनसंख्या 48.64 मिलियन यानी 4.864 करोड़ है।

कुल मिलाकर ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार कुछ खास तरह की हिंसा में देश में सबसे आगे है। राज्य में 2023 में विदेशियों द्वारा किए गए अपराधों की सबसे अधिक दर्ज की गई। विदेशी अधिनियम, 1946 और विदेशियों के पंजीकरण अधिनियम, 1939 के तहत ये मामले दर्ज किए गए।

वर्ष 2023 में, पश्चिम बंगाल में विदेशियों ने 1,021 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। इन दोनों अधिनियमों के तहत 989 मामले दर्ज किए गए, जबकि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 के तहत 7 मामले, आर्म्स एक्ट 1959 के तहत दो मामले दर्ज किए गए। विदेशियों से जुड़े कुछ मामले धोखाधड़ी, मानव तस्करी जैसे अपराधों के तहत दर्ज किए गए।

2023 में, भारत में एसिड हमलों के 207 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में 57 मामले सामने आए। एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चला है कि एसिड हमलों के 57 मामलों में पश्चिम बंगाल में 60 पीड़ित थे, जबकि देश भर में 207 मामलों में 220 पीड़ित थे।

एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2023 में देश भर में हुए सभी एसिड हमलों में से 27.5% अकेले पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए। 2022 में, देश भर में हुए 202 मामलों में से, पश्चिम बंगाल में 48 एसिड हमले दर्ज किए गए, जिनमें 52 पीड़िता थी। इसमें बंगाल 2018 से देश में सबसे आगे है। एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, देश भर में एसिड हमलों के सभी मामलों में 267 गिरफ्तारियाँ हुईं और गिरफ्तार लोगों में 246 पुरुष और 21 महिलाएँ थीं।

पश्चिम बंगाल में 2023 में बलात्कार/सामूहिक बलात्कार के साथ हत्या के 7 मामले, दहेज हत्या के 350 मामले और महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने की 419 घटनाएँ दर्ज की गईं।

पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किए गए क्रूरता से जुड़े आईपीसी की धारा 498 ए के तहत दर्ज मामलों में पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। यहाँ 19698 मामले दर्ज किए गए और 20462 पीड़ित हैं। देश भर में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित कुल 128814 मामले दर्ज किए गए। इनमें उत्तर प्रदेश 19889 मामलों के साथ सबसे आगे रहा।

कुल मिलाकर, ‘पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ के मामलों में सबसे ज़्यादा 29.8% (1.33 लाख मामले) मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1.35 लाख पीड़ित शामिल थे। इस श्रेणी में वर्ष 2022 में ऐसे अपराधों का हिस्सा 31.4% था।

इस बीच, पश्चिम बंगाल में वर्ष 2023 में धारा 364ए के तहत फिरौती के लिए अपहरण के 17 मामले और 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को शादी के लिए मजबूर करने (आईपीसी की धारा 366) के तहत अपहरण के 515 मामले दर्ज किए गए। नाबालिगों के मामले में पश्चिम बंगाल में यह संख्या 390 थी। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे ज़्यादा नाबालिगों के साथ अपराध दर्ज की गईं।

महिलाओं के अपहरण और अपराध की (आईपीसी की धारा 363ए, 365, 367, 368, 369) के तहत, देश भर में 7964 मामले दर्ज किए गए। इनमें पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा 2054 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस बीच, पश्चिम बंगाल में महिलाओं के अपहरण कुल संख्या 6544 रही, जो देश में सबसे ज़्यादा है।

एनसीआरबी रिपोर्ट के राज्यों के आँकड़ों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में बलात्कार की 1110 घटनाएँ दर्ज की गईं। इनमें 1112 पीड़िताएँ थीं। इनमें से 917 मामलों में अपराधी पीड़िता के परिचित थे, 27 मामलों में अपराधी परिवार के सदस्य, 11 दोस्त/ऑनलाइन दोस्त/लाइव पार्टनर थे, और 193 मामलों में अपराधी पीड़िताओं के लिए अजनबी या अज्ञात थे।

‘बलात्कार के प्रयास’ अपराध श्रेणी में, पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर था, जहाँ 825 मामले दर्ज किए गए, जिनमें सभी पीड़िताएँ 18 वर्ष से अधिक आयु की थीं। इस श्रेणी में राजस्थान सबसे आगे रहा, जहाँ 845 मामले दर्ज किए गए।

‘महिलाओं की गरिमा भंग करने के इरादे से उन पर हमला’ श्रेणी में, पश्चिम बंगाल में 2023 में 2487 पीड़िताओं से जुड़े 2479 मामले दर्ज किए गए। वहीं, ‘महिलाओं की गरिमा का अपमान’ श्रेणी में पश्चिम बंगाल के आंकड़े 412 थे। महिलाओं के खिलाफ आईपीसी के तहत कुल अपराध 31928 थे, जो देश में सबसे अधिक हैं।

पश्चिम बंगाल में वर्ष 2023 में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत 2721 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 1798 मामले बच्चों के साथ बलात्कार (POCSO अधिनियम की धारा 4 और 6/आईपीसी की धारा 376) से संबंधित थे, 644 घटनाएँ बच्चों के यौन उत्पीड़न (POCSO अधिनियम की धारा 8 और 10/आईपीसी की धारा 354) से संबंधित थीं और 244 घटनाएँ यौन उत्पीड़न (POCSO अधिनियम की धारा 12/आईपीसी की धारा 509) के थे।

पश्चिम बंगाल में पोर्नोग्राफी के लिए बच्चों का इस्तेमाल/बाल पोर्नोग्राफी सामग्री रखने (POCSO अधिनियम की धारा 14 और 14) के 29 मामले दर्ज किए गए।

महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामलों में 125 घटनाएँ ऐसी मिलीं जो झूठी पाई गई। 1165 मामले ऐसे थे जिनमें मामले कानून या दीवानी विवाद के रूप में समाप्त हुए। पश्चिम बंगाल पुलिस ने 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34344 मामलों का निपटारा किया, जिनमें लंबित मामलों की दर 23.2% रही।

एनसीआरबी की रिपोर्ट में दिए गए तथ्य और आँकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा और अपहरण की घटनाएँ अभी भी प्रमुख हैं, जो 2023 में दर्ज घटनाओं में 75% से अधिक हैं। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि वास्तविक संख्या न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि दूसरे राज्यों में भी कहीं अधिक हो सकती है। आँकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में सजायाफ्ता दर केवल 3.7% है, जो राष्ट्रीय दर 21.3% से काफी कम है। 3,68,000 से अधिक लंबित मामलों की संख्या स्थिति को और भी बदतर बना देती है, हालाँकि पश्चिम बंगाल में आरोप-पत्र दाखिल करने की दर अच्छी है।

एनसीआरबी की भारत में अपराध 2023 रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर प्रति लाख महिला जनसंख्या पर 71.3 है, जो राष्ट्रीय औसत 65.3 मामलों के काफी अधिक है।

इन आँकड़ों के बावजूद, पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने और कोलकाता को महिलाओं के लिए ‘सबसे सुरक्षित शहर’ बता रही है। हालाँकि, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष अर्चना मजूमदार ने तृणमूल कॉन्ग्रेस पर एनसीआरबी के आँकड़ों को ‘गलत तरीके से पेश करने’ का आरोप लगाया और कहा कि पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित लगभग 4 लाख मामले लंबित हैं, जो भारत में सबसे ज़्यादा हैं, और जिनमें न तो कोई कार्रवाई हुई है और न ही कोई दोषी साबित हुआ है।

उन्होंने कहा, “यह एनसीआरबी के आँकड़ों की आधी-अधूरी व्याख्या और गलत व्याख्या है… 2023 में, राज्य सरकार ने महिलाओं के खिलाफ अपराध पर अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें पश्चिम बंगाल में चार लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं, जिनमें किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है या कोई कार्रवाई नहीं की गई है। यह देश में सबसे ज़्यादा है… पुलिस प्रशासन इन पर काम नहीं कर रहा है। प्रशासन और पुलिस के असहयोग के कारण न्यायपालिका भी विफल हो रही है। वे समय पर आरोप-पत्र दाखिल नहीं कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में यह सब चल रहा है, और वे तथ्य छिपा रहे हैं… यह तो बस एक छोटी सी बात है… ये कुछ मामले हैं।”

आरजी कर मामले के जख्म अभी भरे भी नहीं हैं उससे पहले दुर्गापुर में मेडिकल कॉलेज की छात्रा से गैंगरेप की खबर आ गई। बीरभूम में भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं और स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता की दिखी, फिर भी टीएमसी खुद की पीठ थपथपा रही है। जाहिर है, टीएमसी पर राजनीतिक हमले के लिए महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। इसलिए ममता सरकार जवाबदेही से बचने की कोशिश में इसे ‘मामूली मुद्दा’ बता देती है।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में बनी है। इसे देखने के लिए यहाँ क्लिक करें)