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हिमाचल प्रदेश की आर्थिक हालत बदहाल, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने CM-मंत्री-MLAs की सैलरी 25% तक बढ़ाई: जनता बेहाल पर माननीयों की मौज

दिवाली का त्योहार करीब आते ही हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने माननीयों को बड़ा तोहफा दे दिया। मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों और यहाँ तक कि पूर्व विधायकों की सैलरी और भत्तों में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी गई। एक तरफ मार्च 2025 में लाया गया सुक्खू सरकार का बिल अब राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू हो गया, तो दूसरी तरफ राज्य का खजाना खाली पड़ा है।

हिमाचल प्रदेश सरकार का कर्ज बढ़ता जा रहा है, सरकारी कर्मचारियों को वेतन-भत्ते समय पर नहीं मिल रहे, विकास के काम रुक गए हैं और रोडवेज की बसें तक कम पड़ रही हैं। जनता बेहाल है, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार माननीयों को दिवाली का तोहफा दे रही है।

CM-मंत्रियों-विधायकों की सैलरी बढ़ी

हिमाचल प्रदेश सरकार ने 28 मार्च 2025 को विधानसभा में तीन बिल पेश किए थे। इनमें विधायकों के वेतन, भत्तों और पूर्व विधायकों की पेंशन से जुड़े बदलाव थे। अब राज्यपाल ने हरी झंडी दे दी और नोटिफिकेशन जारी हो गया। दिवाली से पहले ये बढ़ोतरी लागू हो गई।

सरल शब्दों में कहें तो मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पहले हर महीने 2.65 लाख रुपये मिलते थे, अब ये ₹3.50 लाख हो गए। यानी 85 हजार रुपए का फायदा। विधानसभा स्पीकर को 2.55 लाख से 3.45 लाख, कैबिनेट मंत्री को 2.55 लाख से 3.10 लाख, डिप्टी स्पीकर को 2.50 लाख से 3.40 लाख। विधायकों की तो बात ही अलग है। पहले 2.10 लाख मिलते थे, अब 2.80 लाख। बेसिक सैलरी 55 हजार से बढ़कर 85 हजार हो गई।

पूर्व विधायकों की भी बल्ले-बल्ले

पूर्व विधायकों की पेंशन में भी अच्छा इजाफा किया गया है। बेसिक 36 हजार से 50 हजार, डीए मिलाकर कुल 93 हजार से बढ़कर 1.29 लाख रुपए महीना हो गया है। हालाँकि अधिसूचना में साफ लिखा है कि हर पाँच साल में ऐसी समीक्षा होगी। 9 साल बाद ये बढ़ोतरी हुई है। सरकार का कहना है कि ये विधायकों को बेहतर काम करने के लिए प्रोत्साहन है। लेकिन सवाल ये है कि जब खजाना सूना है, तो ये पैसा कहाँ से आएगा?

कर्ज से कराह रहा हिमाचल प्रदेश, सुक्खू सरकार ने किया बेड़ा गर्क

अब आते हैं असली मुद्दे पर – हिमाचल की आर्थिक तंगी। राज्य सरकार कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। अगस्त 2025 में ही सुक्खू सरकार ने ₹1500 करोड़ का नया कर्ज लिया। ये दो हिस्सों में था – ₹1000 करोड़ 15 साल के लिए और 500 करोड़ 10 साल के लिए। जुलाई के आखिर में भी ₹1000 करोड़ लिया गया था। कुल मिलाकर ढाई साल में कॉन्ग्रेस सरकार ने ₹37,739 करोड़ का कर्ज चढ़ा लिया

तुलना करें तो भाजपा की 2017-22 वाली सरकार ने पूरे पाँच साल में ₹30 हजार करोड़ लिया था। अब प्रदेश का कुल कर्ज एक लाख करोड़ पार कर गया। वित्त मंत्रालय की सीमा है कि दिसंबर तक 7 हजार करोड़ और कर्ज लिया जा सकता है, लेकिन अगस्त तक ही ₹6700 करोड़ की लाइन लग चुकी। बाकी ₹300 करोड़ के साथ वित्त वर्ष खत्म हो जाएगा। केंद्र से राहत की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल तो हालत पतली है।

जनता और सरकारी कर्मचारियों पर पड़ रहा बोझ

हिमाचल प्रदेश के इस कर्ज का बोझ सीधे जनता और कर्मचारियों पर पड़ रहा है। सरकारी कर्मचारियों को मई में घोषित 3 फीसदी महँगाई भत्ता (डीए) अब जाकर घोषित किया गया है। कब मिलेगा, पता नहीं। विकास कार्य ठप पड़े हैं। सड़कें टूटी हैं, पुल निर्माण लटके हैं। ठेकेदारों के बिल अटके हैं।

जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने तो चेतावनी ही दे दी। एक ठेकेदार शशि ठाकुर की याचिका पर कोर्ट ने कहा कि बकाया न चुकाने पर अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल घोषित कर देंगे। मामला 2022 का है – 13.88 लाख का बिल और 18 फीसदी ब्याज। सरकार ने माना कि पैसा देना है, लेकिन खजाने में कमी का रोना रोया। कोर्ट ने बार-बार समय दिया, लेकिन भुगतान नहीं किया। हिमाचल सरकार ने 2022-23 में 2376 लाख के टेंडर दिए थे, बजट सिर्फ 357 लाख का ही रखा गया था। ठेकेदार परेशान हैं, लेकिन सुक्खू सरकार बहानेबाजी में मस्त है।

कर्मचारियों का हाल तो और बुरा। आउटसोर्स वाले तो तरस रहे हैं। 16 अक्टूबर 2025 की खबर आई कि दिवाली से पहले ठेकेदारों को 10 लाख तक पेमेंट मिलेगा। लेकिन कुल 800 करोड़ का बकाया अभी भी लटका है। ये वो लोग हैं जो स्कूलों, अस्पतालों में काम करते हैं। उनका मानदेय महीनों से अटका है। सरकार कहती है कि कोशिश कर रही, लेकिन कर्ज ही तो सहारा है। ये अलग बात है कि सुक्खू सरकार ने कर्ज लेने में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

रोडवेज का हाल बेहाल, कई रूट बंद

हिमाचल रोडवेज का तो हाल देखिए। 29 अप्रैल 2025 से निगम ने रूट बंद करने की कवायद शुरू कर दी। आर्थिक संकट में बसें कम, घाटा ज्यादा। 31 डिपो, 2684 रूट, 3871 बसें रोज 5.60 लाख किलोमीटर दौड़ती हैं। लेकिन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा वाले रूट घाटे में हैं। पहले ही 6 रूट बंद हो चुके – दिल्ली और हरिद्वार के। अब रोडवेज के लोग डाटा जुटा रहे हैं कि कौन से रूट मर्ज हों, कौन बंद। दो साल में 52 नए रूट शुरू हुए हैं, लेकिन 88 बंद भी कर दिए गए। ग्रामीण क्षेत्र इससे बेहद प्रभावित हैं।

मंदिरों के पैसों पर भी सरकार की नजर

और तो और सरकार ने मंदिरों की नजर कर ली। फरवरी 2025 में भाषा एवँ संस्कृति विभाग ने 35 बड़े मंदिरों को पत्र लिखा। सुखाश्रय और सुख शिक्षा योजना के लिए पैसे माँगे-जरूरतमंद बच्चों की मदद के नाम पर। डीसी ने भी पत्र जारी किए। लेकिन अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने बड़ा झटका दिया। 14 अक्टूबर को जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और राकेश कैंथला की बेंच ने दान की राशि पर सख्त निर्देश दिए। हाई कोर्ट ने कहा, “धन देवता का है, सरकार का नहीं।”

कोर्ट ने साफ कहा कि दान वेद-योग की शिक्षा, गुरुकुल, पुजारी प्रशिक्षण, अंतर्जातीय विवाह बढ़ावा, नेत्र शिविर, गौशाला, वृद्धाश्रम पर खर्च हो। यज्ञशाला, संस्कार हॉल बनें। लेकिन सड़क-पुल, सरकारी योजनाएँ, होटल-मॉल, वीआईपी गिफ्ट्स पर सख्त पाबंदी लगा दी।

कुल मिलाकर हिमाचल में दोहरी तस्वीर। एक तरफ माननीयों की मौज, दूसरी तरफ जनता का रोना। क्या ये बढ़ोतरी विकास लाएगी या बोझ बढ़ाएगी? आने वाले दिनों में विधानसभा सत्र में ये मुद्दा गरमाएगा। फिलहाल दिवाली के तोहफे में नेताओं को खुशी तो मिल ही रही है। बाकी हिमाचल की जनता सोच रही – सरकार कब सुनेगी हमारी?

सिद्धारमैया को UK की जिस ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ से मिला सर्टिफिकेट वो पहले से बंद, कर्नाटक सरकार ने खुद ही किया था आवेदन: जानें ‘ऑपइंडिया’ को जाँच में क्या मिला?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंगलवार (16 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि उनकी सरकार की ‘शक्ति योजना’, जो राज्य की महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देती है, को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (LBWR) ने दुनिया में सबसे अधिक महिलाओं द्वारा ली गई मुफ्त बस यात्राओं के लिए प्रमाणित किया है। इसके साथ ही, कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) को भी LBWR ने मान्यता दी है।

हालाँकि, इस घोषणा के बाद लोगों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ वास्तव में किसी विश्वसनीय संस्था द्वारा दिया गया है या सिर्फ एक प्रचार अभियान है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने X पर लिखा, “कर्नाटक ने दो ऐतिहासिक विश्व रिकॉर्ड के साथ वैश्विक मंच पर प्रवेश किया है, जिन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा प्रमाणित किया गया है। शक्ति योजना: महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा मुफ्त बस यात्राओं का लाभ उठाया गया, 564.10 करोड़ यात्राएँ, रोजमर्रा की गतिशीलता को सशक्त बनाया।”

उन्होंने आगे कहा, “KSRTC: दुनिया का सबसे अधिक पुरस्कार विजेता सड़क परिवहन निगम, 1997 से अब तक 464 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कर चुका है। हमारी शासन दृष्टि सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और विश्वस्तरीय जनसेवा पर आधारित है। ये मान्यताएँ इस बात का प्रतिबिंब हैं कि समावेशी और संवेदनशील नीति-निर्माण से क्या हासिल किया जा सकता है।”

मुख्यमंत्री द्वारा जारी एक्स पोस्ट में शक्ति योजना और केएसआरटीसी के लिए जारी किए गए ‘प्रमाण-पत्र’ भी शामिल हैं।

LBWR के प्रमाण-पत्र के अनुसार, “कर्नाटक में 11 जून 2023 को शुरू हुई ‘शक्ति योजना’ के तहत 30 सितंबर 2025 तक महिलाओं ने कुल 564.10 करोड़ मुफ्त बस यात्राएँ कीं। महिलाओं को मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की सुविधा देकर सशक्त बनाने की इस पहल को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सामाजिक कल्याण और लैंगिक समानता में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में मान्यता देती है।”

दूसरे प्रमाण-पत्र में कहा गया, “कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) ने 1997 से लेकर 3 अक्टूबर 2025 तक कुल 464 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए हैं। सार्वजनिक सड़क परिवहन सेवा में उत्कृष्टता और नवाचार के लिए यह उपलब्धि वैश्विक मानक स्थापित करती है।”

दोनों प्रमाणपत्रों पर डॉ अविनाश डी सकुंडे (LBWR के इंटरनेशनल चेयरमैन, भारत) और डॉ इवान गाचीना (यूरोपीय संघ प्रमुख, क्रोएशिया) के हस्ताक्षर हैं। हालाँकि, मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर विपक्ष ने आलोचना की है।

विपक्ष का कहना है कि कॉन्ग्रेस सरकार मुफ्त योजनाओं जैसे ‘शक्ति योजना’ पर अधिक खर्च कर रही है, जबकि राज्य की परिवहन कंपनियाँ गंभीर वित्तीय संकट झेल रही हैं। कर्नाटक की चार परिवहन कंपनियाँ — KSRTC, BMTC, NWKRTC और KKRTC पर कुल 6,330.25 करोड़ रुपए का कर्ज है।

कौन है अविनाश सकुंडे और बाल्कनोफैंटास्टिका के अध्यक्ष इवान गैसीना?

मुख्यधारा की मीडिया ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के उस ऐलान को खूब कवर किया जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (London Book of World Records – LBWR) से प्रमाणपत्र मिला है। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि यह संस्था असल में है क्या और इसे चलाता कौन है।

OpIndia की जाँच में पता चला कि लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स वास्तव में एक निजी कंपनी थी, जिसे 15 जुलाई 2025 को यूके सरकार के रिकॉर्ड्स में भंग (dissolved) दिखाया गया है। कंपनी के कामकाज में इवेंट कैटरिंग, न्यूज एजेंसी गतिविधियाँ, किताबें प्रकाशित करना और मीडिया प्रतिनिधित्व सेवाएँ शामिल थीं।

दस्तावेजों के अनुसार, अविनाश धनंजय सकुंडे को 28 जून 2024 को इस कंपनी का डायरेक्टर नियुक्त किया गया था।

जब उनकी सोशल मीडिया इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर प्रोफाइल देखी गईं, तो पता चला कि अविनाश खुद को दिल्ली सरकार के Delhi Minorities Commission (DMC) की एक एडवाइजरी कमेटी के सदस्य बताते हैं। लेकिन DMC की आधिकारिक वेबसाइट पर उनका नाम कहीं दर्ज नहीं है।

अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सकुंडे ने कई वीडियो पोस्ट किए हैं, जिनमें वे अलग-अलग लोगों को ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ के सर्टिफिकेट देते हुए दिखते हैं। एक वीडियो में वे अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट देते नजर आए हैं और यह कार्यक्रम जयपुर (राजस्थान) में हुआ था।

अब बात करते हैं डॉ इवान गाचीना (Ivan Gacina) की, गाचीना का नाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के प्रमाणपत्र पर ‘European Union Head’ के रूप में लिखा था।

जाँच में पता चला कि उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर वे खुद को ‘HRHHE Pangeran Prince Love YM Dato Rdo Sri Academician Amb Prof Dr Kt Exp LM GM Genius’ बताते हैं। उनके एक पोस्ट के अनुसार, वे ‘President of Balkanofantastika’ भी हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ‘Pangeran’ शब्द मलेशिया और इंडोनेशिया की भाषा में राजा और रानी के पुत्र के लिए प्रयोग होता है। उनका लिंक्डइन रिज्यूमे बताता है कि वे जादार (Zadar), क्रोएशिया के रहने वाले हैं।

उनके कामकाजी अनुभव में कंप्यूटर इंजीनियरिंग टीचर, फिजिक्स टीचर, एडल्ट एजुकेशन में गणित शिक्षक, कैशियर, और वेटर जैसी भूमिकाएँ शामिल हैं। वे खुद को कवि भी बताते हैं। उनकी ऑनलाइन मौजूदगी काफी अजीब है। ढेरों उपाधियाँ और सर्टिफिकेट्स लेकिन इंटरनेट पर उनकी कुछ ही असली तस्वीरें मिलती हैं।

इन संदिग्ध व्यक्तियों के अलावा, लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के बारे में एक और बात ध्यान देने योग्य है। यह खुद को ‘UK-based’ बताता है, लेकिन इसका मुख्य कार्यालय (Head Office) दिल्ली के पहाड़गंज में स्थित है।

इसकी वेबसाइट पर पता लिखा है: Hotel Superb, तिलक गली, चूना मंडी, पहाड़गंज, नई दिल्ली। इसके अलावा वेबसाइट पर यह भी लिखा है कि इसका ‘International Office (UK Branch)’ — 71–75 Shelton Street, London, United Kingdom, और ‘Registered Office (USA)’ — 30 N Gould St Ste R, Sheridan, WY 82801 बताया गया है।

अविनाश सकुंडे ने ऑपइंडिया को बताया: कर्नाटक सरकार ने प्रमाणपत्र के लिए किया आवेदन

OpIndia ने ‘London Book of World Records’ (LBWR) से संपर्क किया और इसके कामकाज को लेकर कई सवाल पूछे। वेबसाइट पर दिए संपर्क नंबर से बात करते हुए अविनाश सकुंडे ने बताया कि LBWR अलग-अलग क्षेत्रों, जैसे खेल, कला और मनोरंजन, सामाजिक सेवा आदि में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों या संस्थानों को उनके कार्यों के आधार पर सर्टिफिकेट देता है।

जब उनसे पूछा गया कि कर्नाटक सरकार और KRSTC को यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट कैसे मिला, तो उन्होंने कहा कि सरकार ने खुद आवेदन किया था। सकुंदे ने बताया, “हमने कर्नाटक सरकार द्वारा भेजे गए दस्तावेज़ों के विश्लेषण के आधार पर उन्हें प्रशंसा पत्र दिया। यह उनके अच्छे कार्य की सराहना के रूप में था। हाल ही में हमने अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट दिया है।”

OpIndia ने उनसे इवान गाचिना (Ivan Gacina) की भूमिका के बारे में भी पूछा। इस पर सकुंदे ने कहा, “वो सिर्फ नाम के लिए हैं। असल में मैं ही सब कुछ सँभालता हूँ, प्रशासन मेरे नाम से चलता है।”

जब उनसे पूछा गया कि LBWR भारत में किस रूप में पंजीकृत है, NGO या निजी कंपनी और यूके में इसकी स्थिति क्या है, तो उन्होंने कहा, “हम भारत में NGO के रूप में रजिस्टर्ड हैं और यूके में यह एक प्राइवेट बुक पब्लिशिंग कंपनी के रूप में पंजीकृत है।”

यह जानना दिलचस्प है कि एक ‘बुक पब्लिशिंग’ कंपनी, जो भारत में NGO होने का दावा करती है, ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ जैसे प्रमाणपत्र बाँट रही है। सबसे अहम बात, बातचीत के दौरान अविनाश सकुंडे ने एक बार भी यह नहीं बताया कि उनकी कंपनी लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स यूके में इस साल जुलाई में आधिकारिक रूप से बंद (dissolved) हो चुकी है।

OpIndia की जाँच कई सवाल खड़े करती है। जैसे- आखिर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने एक यूके-आधारित निजी कंपनी से ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट के लिए आवेदन क्यों किया?

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘I Love Muhammad’ विवाद में इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा को छिपाया, अल-जजीरा ने की भारत को विलेन बनाने की कोशिश: इस्लामोफोबिक नैरेटिव का प्रोपेगेंडा चला रहा विदेशी मीडिया

भारत और हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात कतर की सरकार के पैसे पर चलने वाले ‘अल-जजीरा’ का एक बार फिर भारत विरोध चेहरा सामने आया है। भारत में ‘I Love Muhammad’ से जुड़े विरोध प्रदर्शनों को लेकर ‘अल जजीरा’ ने एक लंबा-चौड़ा लेख लिखा है। हालाँकि, इसमें ‘अल-जजीरा’ ने तथ्यों को छिपाते हुए मुस्लिमों को प्रताड़ना का शिकार दिखाने की कोशिश की है।

अल जजीरा की खबर की हेडलाइन

‘अल-जजीरा’ के इस भारत विरोधी प्रोपेगेंडा की शुरुआत उसकी हेडलाइन से ही हो गई। ‘अल-जजीरा’ ने लिखा “Why is India prosecuting Muslims who said ‘I love Muhammad’?” यानी “भारत उन मुसलमानों पर मुकदमा क्यों चला रहा है जिन्होंने ‘I Love Muhammad’ कहा था?” जाहिर है कि ‘अल-जजीरा’ ने पहले ही फैसला सुना दिया है कि ‘किन मुसलमानों पर मुकदमा चलाया जा रहा है’ और वो सब ये बता रहा है कि मुकदमा क्यों चलाया जा रहा है।

विवाद की शुरुआत को लेकर ‘अल-जजीरा’ का झूठ?

‘अल-जजीरा’ ने इस विवाद की शुरुआत को लेकर भी सच्चाई छिपा ली। ‘अल-जजीरा’ ने लिखा की 4 सितंबर को कानपुर में मुस्लिमों द्वारा ‘I Love Muhammad’ का बोर्ड लगाने को लेकर विवाद हुआ और इसकी शिकायत पर FIR दर्ज कर ली गई। ‘अल-जजीरा’ की रिपोर्ट में दी गई जानकारी आधी-अधूरी है।

अल-जजीरा के लेख के अंश

यह बात सही है कि ‘I Love Muhammad’ के बैनर लगाने को लेकर विवाद हुआ था लेकिन असली कहानी इसके बाद की है। इस बोर्ड को दूसरी जगह लगवाए जाने के बाद यह मामला शांत हो गया था और यह दोनों पक्षों की जानकारी में हुआ था। लेकिन असली विवाद इसके अगले दिन यानी 5 सितंबर को हुआ।

5 सितंबर के दिन बारावफात का जुलूस निकाला जाना था और इस दिन मुस्लिम युवकों ने हिंदू समुदाय के पोस्टर को जानबूझकर फाड़ दिया था। FIR के मुताबिक, “जुलूस निकाले जाने पर रावतपुर गाँव में हिंदू बस्ती से जुलूस निकाल रहे मुस्लिम समुदाय के कुछ अज्ञात मुस्लिम युवकों के द्वारा रास्ते में लगे हिंदू समुदाय के धार्मिक पोस्टर को जानबूझकर जुलूस में शामिल गाड़ी…में सवार मुस्लिम युवको द्वारा डंडों की मदद से फाड़ दिया गया।”

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR का एक हिस्सा

आप इन शब्दों पर भी ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह मामला केवल ‘I Love Muhammad’ के बैनर से जुड़ा हुआ नहीं है। यानी ‘अल-जजीरा’ जो कहानी बेचने की कोशिश कर रहा है वो दरअसल एक आध-अधूरा और अपने मन से चुना गया ‘सच’ है जो कई मायनों में झूठ से भी खतरनाक होता है। ‘अल-जजीरा’ का प्रोपेगेंडा सिर्फ इतना भर नहीं है।

बरेली और गुजरात को लेकर भी अल-जजीरा ने फैलाया झूठ

यूँ तो कई राज्यों में इसे लेकर बवाल हुआ था लेकिन इसकी सबसे अधिक तीव्रता बरेली और गुजरात में नजर आई। अल-जजीरा ने अपनी रिपोर्ट में इन दोनों घटनाओं का जिक्र किया है लेकिन यहाँ भी उसने सच को छिपाया ही है। अल-जजीरा ने कहा कि बरेली में प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हिंसक झड़प हुई।

बरेली के दंगे पर अल-जजीरा

मीडिया आउटलेट ने यह नहीं बताया कि बरेली में प्रदर्शनकारियों की बस हिंसक झड़प नहीं हुई थी बल्कि पुलिस पर हमले की प्लानिंग के साथ कथित प्रदर्शनकारी वहाँ पहुँचे थे। जाँच में ये तक सामने आया कि तौकीर रजा ने पुलिसकर्मियों की हत्या तक की साजिश रची थी।

कथित प्रदर्शनकारियों ने इस बात की पुरी तैयारी की थी कि किसी तरह बरेली में दंगा भड़काया जा सके। बाहर से सैकड़ों लोगों को बुलाया गया, उन्हें अलग-अलग मस्जिदों में ठहराया गया था। कथित प्रदर्शन के दिन पुलिस पर दंगाइयों ने पेट्रोल बम से हमला किया, पुलिस पर फायरिंग की और पथराव किया गया। इस्लामी कट्टरपंथियों की इस पूरी साजिश को ‘अल-जजीरा’ ने सिर्फ ‘हिंसक झड़प’ कहकर टाल दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात भी इसे लेकर हुई हिंसा पर भी ‘अल-जजीरा’ ने सच नहीं बताया। ‘अल-जजीरा’ ने लिखा, “गुजरात समेत कई राज्यों में सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियोज़ के लिए मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें ‘I Love Muhammad’ के नारे थे।”

गुजरात में एक्शन पर अल-जजीरा

गुजरात के गोधरा में इस्लामी कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव किया था। गुजरात के गाँधीनगर में ‘I Love Mahadev’ के पोस्ट को लेकर खूब हंगामा हुआ। इस्लामी कट्टरपंथियों ने चुन-चुनकर हिंदुओं के घरों-दुकानों को निशाना बनाया गया। गरबा पंडाल और आस-पास पत्थरबाजी तक की गई लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों से मोहब्बत का चश्मे पहने ‘अल-जजीरा’ को ये सब नहीं दिख रहा है।

‘अल-जजीरा’ ने इस खबर में आगे भी एमनेस्टी जैसे संस्थानों से जुड़ों लोगों के बयानों के जरिए पूरा प्रोपेगेंडा खड़ा करने की कोशिश की है लेकिन इसमें कहीं भी तथ्य नहीं है। नालों-तालाबों और अन्य सरकारी जमीनों पर कब्जा कर किए गए अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई को भी मुस्लिमों के घर तोड़ने की तरह दिखाया गया है। लेकिन यह नहीं बताया कि ये घर अवैध अतिक्रमण कर बनाए गए थे।

बम-बंदूक नहीं नैरेटिव की लड़ाई

अल-जजीरा, बीबीसी, वॉशिंगटन पोस्ट जैसी संस्थाएँ बार-बार भारत की हर आंतरिक घटना को ‘मुस्लिम बनाम राज्य’ के चश्मे से दिखाने की कोशिश करती हैं। वे सिर्फ खबर नहीं देते बल्कि नैरेटिव बनाने की कोशिश करते हैं कि भारत को एक हिंदू बहुल और मुस्लिम विरोधी देश के रूप में किस तरह दिखाया जाए। जाहिर है इसके जरिए वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख को चोट पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

किसी भी धर्म में अपने पैगंबर के लिए प्रेम होना स्वाभाविक है। लेकिन जब ऐसे भावनात्मक नारों का इस्तेमाल भीड़ को भड़काने, राजनीति करने या किसी समुदाय के खिलाफ लामबंदी के लिए किया जाता है, तो वह धार्मिक प्रेम नहीं बल्कि ‘धार्मिक हथियार’ बन जाता है।

ऐसे में इस हथियार का इस्तेमाल कट्टरपंथी करते हैं और उनके खिलाफ जब जब पुलिस कानून के तहत कार्रवाई करती है, विदेशी मीडिया इसे मुस्लिमों के खिलाफ षड्यंत्र बताते हैं। ये संस्थान कभी ये सवाल नहीं उठाते हैं कि क्या पत्थरबाज़ी, दंगे या हिंसा की योजना बनाना किसी मजहब का हिस्सा है? क्या पुलिस को केवल इसलिए हाथ बाँध लेना चाहिए कि आरोपी एक विशेष समुदाय से आते हैं?

आज का दौर सिर्फ बम और बंदूक का नहीं नैरेटिव की लड़ाई का है। भारत जब अपने कानून-व्यवस्था के कदमों को मजबूती से लागू करता है तो वैश्विक मीडिया उसका इस्तेमाल अपनी सुविधा के हिसाब से भारत के खिलाफ ही करना चाहता है। ऐसे संस्थानों की कोशिश रहती है कि किसी भी तरह मुस्लिमों को पीड़ित दिखाकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया जा सके।

‘जिंदा जला देंगे’: I Love Muhammad पोस्टर हटाने वाले को ढूँढ रहा RJD प्रत्याशी (ओसामा, शहाबुद्दीन का बेटा) का समर्थक- बिहार से ग्राउंड रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के कानपुर से शुरू हुआ ‘I Love Muhammad’ पोस्टर का विवाद देश भर में दंगा, फसाद और हंगामे के बाद भी अब तक शांत नहीं हुआ है। अब भी इस्लामी कट्टरपंथियों के मन में इसे लेकर एक चिंगारी सुलग रही है। बिहार के सिवान में एक शख्स ने ‘ऑपइंडिया’ के कैमरे पर यह दावा किया है कि वो कथित तौर पर ‘I Love Muhammad’ का पोस्टर फाड़ने वाले एक युवक को ढूँढ रहे हैं और मिल गया तो उसे जिंदा जला दंगे।

दरअसल, ‘ऑपइंडिया’ की टीम बिहार चुनाव की कवरेज को दौरान सिवान पहुँची थी। इस जिले की रघुनाथपुर सीट पर RJD ने बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को विधानसभा चुनाव का टिकट दिया है। कवरेज के दौरान हमारी मुलाकात ओसामा शहाब के एक समर्थक से हो गई।

खुली धमकी और शहाबुद्दीन का खौफ

ऑपइंडिया के रिपोर्टर अनुराग मिश्रा से बातचीत में मुस्लिम युवक ने कहा कि “भाईजान (ओसामा) बोले- पोस्टर फाड़ने वाले को जिंदा जला देंगे।” उसने यह भी बताया कि पोस्टर फाड़ने वाले को वे ढूँढ़ रहे हैं और अगर वह मिला तो उसे सीधे शहाबुद्दीन के घर ले जाया जाएगा। युवक ने यह भी कहा कि शहाबुद्दीन के रहते किसी की हिम्मत नहीं होती कि कोई पोस्टर हटा दे।

‘I Love Muhammad’ विवाद कहाँ-कहाँ हुआ था

‘आई लव मुहम्मद’ वाले पोस्टर का विवाद केवल सीवान तक सीमित नहीं है। इससे पहले, इस तरह के पोस्टर कई अन्य राज्यों में भी विवाद का कारण बने हैं। यह विवाद सबसे पहले उत्तर प्रदेश के कानपुर में शुरू हुआ था, जब बारावफात जुलूस के दौरान ‘I Love Muhammad’ लिखा साइन बोर्ड लगाया गया। इसके बाद यह विवाद यूपी के कानपुर, उन्नाव, बरेली, बागपत, कौशांबी, लखनऊ, महाराजगंज, शाहजहाँपुर तक फैला। इसके अलावा, उत्तराखंड के काशीपुर, महाराष्ट्र के नागपुर, गुजरात के गोधरा, तेलंगाना के हैदराबाद तक हुआ।

जिस नूर वली महसूद को पाक ने ‘मार गिराने’ का किया दावा, उसने वीडियो जारी कर खोल दी झूठ की पोल: जानें कैसे मदरसे में बच्चों को तालीम देने वाला बन गया TTP का सरगना?

पाकिस्तान की फौज ने 9 अक्टूबर 2025 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हवाई हमला किया और दावा किया कि उन्होंने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के कुख्यात सरगना नूर वली महसूद को मार गिराया है।

पाकिस्तानी मीडिया ने इसे बड़ी जीत बताया, लेकिन सिर्फ एक हफ्ते बाद गुरुवार (16 अक्टूबर 2025) को TTP ने ऐसा वीडियो जारी किया जिसने पूरे पाकिस्तान की पोल खोल दी। 7 मिनट 55 सेकंड के उस वीडियो में नूर वली न केवल जिंदा नजर आया, बल्कि उसने खुलकर कहा कि वो अफगानिस्तान में नहीं, पाकिस्तान की खैबर पहाड़ियों में रह रहा है।

उसने दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वाह की कुकी खेल और कंबर खेल कबीले उसके साथ हैं। यानी पाकिस्तान ने झूठे इनपुट पर हमला किया, रिश्ते बिगाड़े और आखिर में अपनी ही नाकामी का तमाशा दुनिया के सामने कर दिया।

पाकिस्तानी खुफिया की सबसे बड़ी चूक

काबुल पर एयर स्ट्राइक पाकिस्तान के इंटेलिजेंस इनपुट पर की गई थी। फौज को यकीन था कि नूर वली महसूद काबुल में है और उसकी गाड़ी को निशाना बनाया गया।

पाकिस्तान ने इसे सटीक ऑपरेशन बताया, लेकिन जब नूर वली का वीडियो सामने आया तो साफ हुआ कि वो न तो अफगानिस्तान में था, न ही हमले में मरा। इस एक गलती से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ संबंध और भी खराब किए और खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर हँसी का पात्र बना लिया।

नूर वली महसूद: जन्म, तालीम और शुरुआती जीवन

नूर वली महसूद का जन्म 26 जून 1978 को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के दक्षिण वजीरिस्तान में तियारजा नामक गाँव में हुआ। वह पश्तून जनजाति के मेहसूद कबीले के मेचीखेल उपकबीले से ताल्लुक रखता है। उसने शुरुआती तालीम मदरसा सिद्दीकिया उस्पास में ली।

1990 के दशक में उसने फैसलाबाद, गुजरांवाला और कराची जैसे शहरों के अलग-अलग मदरसों में मजहबी तालीम ली। 1996-97 के दौरान उसने पढ़ाई बीच में छोड़ी और अफगानिस्तान चला गया, जहाँ उसने अफगान तालिबान के साथ रहकर अहमद शाह मसूद की नॉर्दर्न अलायंस के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया।

काबुल और मजार-ए-शरीफ के मोर्चों पर उसने तालिबान के साथ लड़ाई लड़ी। बाद में अब्बू हाजी गुल शाह खान की सलाह पर पाकिस्तान लौटकर 1999 में इस्लामी अध्ययन में स्नातक किया और मुफ्ती की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उसने गोरगोराय में स्थित मदरसा इमदाद-उल-उलूम में 1999 से 2001 तक तालीम देने का भी कार्य किया।

तालिबान से जुड़ाव और नेतृत्व की ओर सफर

2003 में नूर वली महसूद ने पाकिस्तानी तालिबान (TTP) की मेहसूद शाखा में शामिल होकर सशस्त्र गतिविधियाँ शुरू कीं। उस समय पाकिस्तान फौज फाटा क्षेत्र में सैन्य अभियान चला रही थी, जिसे वह पश्तून परंपराओं और ‘पश्तूनवाली’ के खिलाफ मानता था। उसने इसे अमेरिका के प्रभाव के खिलाफ ‘रक्षात्मक जिहाद’ बताया।

2004 में वाना की लड़ाई के दौरान उसने पाकिस्तानी फौज पर कई हमले किए। जल्द ही वह बैतुल्लाह महसूद का भरोसेमंद साथी बना और संगठन में काजी (जज) के रूप में नियुक्त हुआ। बाद में उसे डिप्टी कमांडर का दर्जा भी मिला। बैतुल्लाह की मौत के बाद उसने गोरगोराय में एक प्रशिक्षण शिविर संचालित किया, उस वक्त उसके सिर पर 20 लाख रुपए का इनाम था।

2013 में उसे कराची चैप्टर का प्रमुख बनाया गया, जहाँ TTP ने फिरौती, अपहरण और बैंक लूट जैसी घटनाएँ अंजाम दीं। 2015 के बाद सुरक्षा अभियानों के कारण नेटवर्क कमजोर हुआ। इसके बावजूद नूर वली संगठन में प्रभावशाली बना रहा और खालिद महसूद का डिप्टी नियुक्त हुआ।

2018 में खालिद की मौत के बाद उसने मौलाना फजलुल्लाह के साथ काम किया और जून 2018 में फजलुल्लाह के मारे जाने के बाद उसे TTP का अमीर (मुखिया) घोषित किया गया उसके नेतृत्व में TTP ने अपनी रणनीति बदली। उसने आम नागरिकों को निशाना बनाना बंद किया और केवल सुरक्षा बलों पर हमले केंद्रित किए।

विचारधारा, लेखन और हाल की घटनाएँ

नूर वली महसूद मजहबी रूप से प्रशिक्षित विद्वान और सैन्य अनुभव रखने वाला कमांडर है। 9/11 के बाद उसने अफगान तालिबान का समर्थन किया। वह पहले TTP के प्रकाशन विभाग का प्रमुख था और 2007 में बेनजीर भुट्टो की हत्या का जिक्र अपनी लिखी किताब में किया।

2017 में उसने ‘इंकलाब-ए-मेहसूद: साउथ वजीरिस्तान फिरंगी राज से अमेरिकी सम्राज्य तक’ नाम की 690 पेज की किताब लिखी, जिसमें उसने संगठन के इतिहास, विचारधारा और वित्तीय नेटवर्क का वर्णन किया।

अमेरिका ने 2019 में उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित किया और 2020 में संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में शामिल किया। 2021 के बाद TTP ने अफगानिस्तान से पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों पर हमले तेज कर दिए। 9 अक्टूबर 2025 को संगठन ने एक हमला किया जिसमें 11 पाकिस्तानी फौजी मारे गए।

इसके जवाब में पाकिस्तान ने काबुल, खोस्त, जलालाबाद और पक्तिका में हवाई हमले किए। कहा गया कि इन हमलों में नूर वली को निशाना बनाया गया, लेकिन तालिबान और TTP दोनों ने उसकी मौत की खबरों को झूठा बताया। बाद में TTP ने उसका एक ऑडियो जारी कर दावा किया कि नूर वली महसूद जिंदा है और सुरक्षित है।

निष्कर्ष: जिंदा नूर वली, मुसीबत में पाकिस्तान

नूर वली महसूद का जिंदा होना पाकिस्तान के लिए सिर्फ खुफिया नाकामी नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। उसकी मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान अपने ही देश में आतंक को खत्म करने में नाकाम रहा है। अब नूर वली महसूद सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि पाकिस्तान की असफल नीतियों और झूठे दावों का प्रतीक बन गया है।

अलीगढ़ में मंदिर विवाद की वजह से करन अहेरिया की हत्या, असद का परिवार फेंकता था हड्डियाँ: पीड़ित परिवार के आरोप गंभीर, प्रशासन ने चलाया बुलडोजर

अलीगढ़ जिले के जवाँ कस्बे में शनिवार(11 अक्टूबर) की रात 20 वर्षीय करन अहेरिया की असद ने गला रेतकर दर्दनाक तरीके से हत्या कर दी। हत्या के बाद हिंदुओं में आक्रोश पैदा हुआ तो हिंदू आरोपितों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए घर पर बुलडोजर कार्रवाई की माँग करने लगे। युवक की हत्या के पीछे पुलिस द्वारा एक सोशल मीडिया पर पोस्ट होना बताया गया तो दूसरी ओर मुस्लिम समाज की जिस महिला को करन दवा दिलाने अलीगढ़ ले गया था, हत्या के पीछे उनका हाथ भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

घटना की इसी गुत्थी को सुलझाने और करन की हत्या की असली वजह जानने के लिए हम मंगलवार (14 अक्टूबर 2025) दोपहर को दिल्ली के करीब 150 किलोमीटर दूर जवाँ कस्बे में पहुँचे। हमने देखा कि जवाँ पुलिस स्टेशन से करीब 100 मीटर आगे बड़ी सँख्या में पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोजर कार्रवाई हो रही है। बाजार बंद है, लेकिन लोगों जमावड़ा लगा हुआ है।

आरोपित के घर पर चलता बुलडोजर
आरोपितों के अतिक्रमण पर चला बुलडोजर

यह बुलडोजर कार्रवाई करन की हत्या के बाद मेन बाजार में अतिक्रमण के खिलाफ हो रही थी, लेकिन इस कार्रवाई का भी मुस्लिम दुकानदार मीडिया के सामने विरोध कर रहे थे। मिठाई की दुकान करने वाले इमरान खान कहते हैं कि हमें तीन दिन का नोटिस दिया गया था लेकिन दूसरे दिन ही बुलडोजर आ गया। अतिक्रमण तो हिंदुओं ने भी कर रखा है लेकिन कार्रवाई हमारे (मुसलमानों) खिलाफ ही हो रही है ये गलत है। दूसरे दुकानदार ने कहा, “करन के साथ जो हुआ गलत है लेकिन ये कार्रवाई भी गलत है।”

इसके बाद हम मुख्य सड़क से 200 मीटर अँदर मृतक करन के घर जाते हैं इससे पहले आरोपित असद के घर के आस-पास पुलिस लगी हुई है। असद के घर पर ताला लटका हुआ है आस-पास के घरों की छत व खिड़कियों से महिलाएँ झाँकते हुए बाहर के हालात से रूबरू होने की कोशिश में जुटी हैं। इस बीच हम उस खंडहर मकान में पहुँच गए, जहाँ असद ने अपने परिवार के साथ मिलकर करन को मौत के घाट उतारा था।

खंडहर पड़े मकान के एक हिस्से में (हत्या वाली जगह) मिट्टी और पत्थरों के बीच करन का खून बिखरा हुआ था जोकि सूख चुका था। दीवारों पर खून के छींटे करन की दर्दनाक मौत का मंजर बयाँ कर रहे थे। मकान के बाहर खड़ी रेहड़ी पर रखे एक औजर (रेती) को पड़ोसियों ने दिखाया जिससे असद ने अपने चाकू को धार दी थी। ताकि करन के लगे को आसानी से काटा जा सके।

इसके बाद हम मृतक करन के घर पहुँचे। आँगन में साँत्वना देने वाली महिलाओं से घिरी और बेसुध बैठी माँ महारानी देवी व चाची राधा देवी की आँखों से आँसू मानो सूख चुके हैं, जिस कमरे में करन अपनी माँ के साथ रहता था, उस बेड पर तीन कंबल पड़े हुए हैं। छोटे से कमरे में सामने पूजा की अलमारी है। आँगन में दो चूल्हे हैं दोनों साफ सुथरे पड़े हैं, मानो करन की हत्या के बाद से घर में चूल्हा नहीं जला।

हत्यारोपितों का बंद पड़ा मकान
हत्यारोपितों का बंद पड़ा मकान

करन के परिवार की गरीबी का अँदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आँगन में सिल-बटना रखे हुए हैं जिस पर चटनी बनाई जाती है। पूछने पर माँ कहती है, “बेटा नोएडा से दीवाली पर छुट्टी लेकर घर आया था लेकिन आते ही पड़ोसी मुस्लिम महिला को दवा दिलाने अलीगढ़ चला गया। इसके बाद वह तो घर वापस नहीं आया उसकी मौत की खबर घर पर आ गई।”

मंदिर पर हड्डियाँ फेंकता था असद का परिवार

आगे पेट पर हाथ रखते हुए माँ कहती है, “मेरे बेटे ने खाना भी नहीं खाया था वो भूखा ही चला गया” और फिर बिलखने लग जाती है। माँ के पीछे बैठी चाची राधा कहती है कि जब से पीपल के नीचे मंदिर बना ,है तभी से असद और उसके परिवार को हमसे दिक्कत थी। वो लोग हमारे मँदिर पर हड्डियाँ फेंकते थे। गंदगी फैलाते थे। इसलिए हम सभी ने मिलकर मंदिर बनवाया और तब मंदिर निर्माण का भी असद के परिवार ने खुलकर विरोध किया था। माँ ने भी कहा कि असद का परिवार मंदिर पर हड्डियाँ फेंकता था।

घटनास्थल के पास मौजूद पुलिस
घटनास्थल के पास मौजूद पुलिस

करन के दूसरे दोस्त राजकुमार ने बताया कि असद और उसका पूरा परिवार भी गुंडा टाइप का है। ये लोग मंदिर का विरोध करते थे, मंदिर पर विवाद करते थे, मंदिर पर हड्डियाँ तक डालते थे। करन के करीबी दोस्त ने बताया कि असद व उसका परिवार पहले से ही झगडालू किस्म का है। पहले से गुंडागर्दी में ही रहता है। दोस्त का दावा है कि करन की हत्या के समय असद का अब्बू भी खंडहर मकान में बैठकर शराब पी रहा था और उसने ही बेटे असद के साथ मिलकर करन के लगे को काटा था।

भाई की चीख सुनकर घर से भागे थे गोविंद और सनी

गोविंद ने बताया कि वह बरामदे में चारपाई पर लेटा हुआ था। अचानक से भाई करन के चिल्लाने की आवाज आई, पहले छोटा भाई सनी बाहर भागा, उसने आरोपितों को करना की हत्या करते हुए देखा तो शोर मचाने पर मैं भी चला गया। मैंने देखा कि खंडहर मकान से 7-8 लोग असद के साथ निकल रहे थे। अंदर देखा तो भाई जमीन में पड़ा हुआ था और बहुत खून निकल रहा था।

पड़ोस में रहने वाली जिस मुस्लिम महिला को करन दवा दिलाने के लिए अलीगढ़ ले गया था, उस अमीना ने बताया कि करन बहुच अच्छा लड़का था। हमारे घर में कोई मर्द नहीं है तो वह अक्सर दवा दिलवाने या अन्य किसी काम के लिए जाता रहता था। उसे मार दिया बहुत गलत हुआ है। आरोपितों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए। अमीना की माँ ने कहा कि असद को फाँसी दे दो और पूरे परिवार को खत्म कर दो, यही उसकी सजा है।

अलीगढ़ में बीजेपी के जिलाध्यक्ष कृष्णपाल सिंह ने कहा, “हत्यारे सभी जेल जा चुके हैं किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा। योगी सरकार की नीति साफ है कानूनी प्रक्रिया के तहत अपराधियों के खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।”

अलीगढ़ की एसडीएम महिमा सिंह ने कहा, “प्रशासन लगातार आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। पीड़ित परिवार के हम साथ हैं, उनकी लगातार मदद कर रहे हैं। मृतक के भाई को नगर पंचायत में नौकरी दी गई है और हम परिवार की सभी माँगें नियमानुसार पूरी करने का हर संभव प्रयास करेंगे।”

बता दें कि करन की हत्या के बाद आरोपित असद ने खुद थाने जाकर अपना जुर्म कुबूल किया था। इसके बाद पीड़ित परिवार की तहरीर पर पुलिस ने सभी आठ आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। वहीं प्रशासन ने आरोपित असद के उस खंडहर मकान पर भी बुलडोजर चला दिया है, जिसमें करन की हत्या की गई थी।

अहमदाबाद में बनाए जा रहे 10 नए स्टेडियम, 650 एकड़ में सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव: कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 के साथ ओलंपिक 2036 पर नजर

कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 अब अहमदाबाद में होने लगभग तय हैं, केवल औपचारिकताएँ बाकी हैं। इन खेलों के लिए भारत के अलावा नाइजीरिया ने भी बोली लगाई थी। लेकिन 15 अक्टूबर 2025 को हुई राष्ट्रमंडल कार्यकारी बोर्ड की बैठक में अहमदाबाद के नाम पर मुहर लगी। नवंबर 2025 में ग्लासगो में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में अहमदाबाद की औपचारिक तौर पर घोषणा की जाएगी।

ओलंपिक एसोसिएशन ऑफ इंडिया की अध्यक्ष पीटी उषा ने इस पर खुशी जताते हुए कहा कि भारत के लिए यह गर्व की बात है कि उसे इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की मेजबानी का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि ये खेल भारत की आयोजन क्षमता दिखाएँगे और 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने की दिशा में भी योगदान देंगे।

पीटी उषा ने आगे कहा कि ये खेल युवाओं को प्रेरित करेंगे, भारत की दूसरे देशों से दोस्ती मजबूत करेंगे और कॉमनवेल्थ देशों के साथ हमारे अच्छे भविष्य को आगे बढ़ाएँगे।

दरअसल, कॉमनवेल्थ गेम्स अहमदाबाद में आयोजित होने की चर्चा लंबे समय से जारी है। गुजरात सरकार भी इसमे सक्रिय रूप से रूचि दिखा रही है। केंद्र और राज्य सरकार दोनों मिलकर अहमदाबाद को एक खेल हब बनाने पर काम कर रही हैं और यहाँ खेलों के लिए ढाँचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) तैयार किया जा रहा है।

अहमदाबाद में खेल हब का विकास किस प्रकार किया जा रहा है?

इसी कड़ी में अहमदाबाद में दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम, नरेंद मोदी स्टेडियम बनाया गया है। इसकी क्षमता एक लाख से ज्यादा दर्शकों की है। इसके अलावा अहमदाबाद में 650 एकड़ में सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव भी तैयार किया जा रहा है, जो स्टेडियम का ही हिस्सा है।

निर्माणाधीन इस खेल परिसर में कुल 10 नए स्टेडियम बनाए जा रहे हैं, जहाँ जिमनास्टिक, स्केटबोर्डिंग, सॉफ्टबॉल, टेनिस जैसे खेलों के लिए स्थायी और अस्थायी सुविधाएँ होंगी। इन सभी प्रोजेक्ट्स का काम गुजरात स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड कर रही है। यहाँ एक फुटबॉल स्टेडियम, एथलीट विलेज और होटल भी बनाने की तैयारी है। इस एथलीट विलेज में तीन हजार खिलाड़ियों के रहने की सुविधा होगी।

इसके अलावा, हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने नारनपुरा में वीर सावरकर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का भी उद्घाटन किया। आधुनिक सुविधाओं से लैस इस स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में कई खेलों के लिए आयोजन स्थल भी उपलब्ध होंगे। इस कॉम्पलेक्स को कॉमनवेल्थ गेम्स के मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है। इसमें 20 से ज्यादा खेलों को शामिल किया जाएगा। इस कॉम्पलेक्स पर सरकार ने ₹824 करोड़ खर्च किए हैं।

खेलों के साथ-साथ यातायात सुविधाओं को भी बेहतर किया जा रहा है। अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन 2030 तक शुरू हो जाएगी। सरखेज-गांधीनगर हाईवे पर भी एक बड़ा स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की योजना है।

साथ ही, साबरमती रिवरफ्रंट का पुनर्विकास किया जा रहा है, जहाँ वॉटर स्पोर्ट्स के लिए भी सुविधाएँ तैयार की जा रही हैं। इस तरह अहमदाबाद को एक विश्वस्तरीय खेल शहर बनाने की दिशा में सरकार तेजी से काम कर रही है ताकि 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स को सफल और यादगार बनाया जा सके।

भारत अपनी ओलंपिक दावेदारी को कैसे मजबूत करेगा?

ये सारी तयारियाँ 2036 ओलंपिक के लिए है, जिसकी मेजबानी के लिए भारत सरकार लगातार काम कर रही है। लेकिन ओलंपिक जैसे विश्वस्तरीय खेल आयोजन से पहले, कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को सफलतापूर्वक आयोजित करना बेहद जरूरी होता है। इसी उद्देश्य से भारत ने 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए भी पूरी तैयारी और गंभीरता दिखाई है।

कॉमनवेल्थ गेम्स भारत के लिए एक बड़ा मौका होंगे, जहाँ वह दुनिया को यह दिखा सकेगा कि उसके पास विश्वस्तरीय खेल बुनियादी ढाँचा, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और संगठित खेल व्यवस्था मौजूद है। यह आयोजन भारत को एक जिम्मेदार, आधुनिक और खेलों के लिए तैयार राष्ट्र के रूप में पेश करने में मदद करेगा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब भारत ने 2010 में पहली बार दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी की थी तब कई घोटाले और वित्तीय अनियमितताएँ सामने आई थीं, जिससे देश की छवि को नुकसान पहुँचा था। उसके बाद भारत में कोई बड़ा खेल आयोजन नहीं हुआ। अब मोदी सरकार और गुजरात सरकार इस छवि को सुधारने और भारत को खेलों की दुनिया में एक नई पहचान दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं।

साल 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले अहमदाबाद में कई अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन होंगे। साल 2025 में यहाँ कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप और एशियाई तैराकी चैंपियनशिप का आयोजन होगा। 2027 में महिला वॉलीबॉल वर्ल्ड चैंपियनशिप, 2028 में विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप और 2029 में विश्व पुलिस और अग्निशमन खेल (World Police and Fire Games) भी अहमदाबाद में ही आयोजित किए जाएँगे। ये सभी आयोजन भारत की मेज़बानी क्षमता को दुनिया के सामने दिखाने का अवसर होंगे।

हालाँकि, यह संभव है कि 2036 ओलंपिक की मेजबानी का फैसला 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले ही हो जाए लेकिन तब तक भारत की तैयारियों, आयोजनों की सफलता और उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर दुनिया का ध्यान जा चुका होगा। इन सबका सीधा लाभ भारत की ओलंपिक दावेदारी को मिलेगा।

मोदी सरकार ने G20 जैसे बड़े आयोजन को सफलतापूर्वक कर यह साबित किया है कि वह ऐसे आयोजनों को कितनी गंभीरता और योजना से पूरा करती है। अहमदाबाद में होने वाले सभी आगामी खेल आयोजन भी उसी सोच और तैयारी के साथ किए जाएँगे, जो भारत को खेलों की दुनिया में एक ऊँचा स्थान दिलाएँगे।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

PM मोदी ने जिस मल्लिकार्जुन मंदिर में की पूजा-अर्चना, भगवान शिव और माता पार्वती से है उसका नाता: शैव ही नहीं शाक्यों के लिए भी है महत्वपूर्ण, इतिहास और मान्यताओं को जानिए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार (16 अक्टूबर 2025) को आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में स्थित श्री भ्रामराम्बा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना की। यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों और 52 शक्तिपीठों में से एक है। इसकी खासियत यह है कि एक ही परिसर में ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों हैं। ऐसा देश में किसी और मंदिर में नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने पंचमुरलु (दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बना पवित्र मिश्रण) से रुद्राभिषेक किया। इस अवसर पर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण भी मौजूद रहे।

मल्लिकार्जुन मंदिर का परिचय और महत्व

आंध्र प्रदेश का मल्लिकार्जुन मंदिर राज्य का सबसे प्राचीन धार्मिक स्थल माना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और शैव तथा शाक्त दोनों संप्रदायों के लिए पवित्र है। यह भारत का एकमात्र मंदिर है, जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्ति पीठ दोनों एक ही स्थान पर हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, अमावस्या के दिन भगवान शिव अर्जुन रूप में और पूर्णिमा के दिन माता पार्वती मल्लिका रूप में प्रकट हुईं, इसी कारण इस स्थान का नाम मल्लिकार्जुन पड़ा। यहाँ प्रार्थना करने से मन की शांति, धन और यश की प्राप्ति होती है। मंदिर में सहस्रलिंग (हजार लिंगों वाला शिवलिंग) भी है, जिसे भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित माना जाता है।

मंदिर की कलाकृति और इतिहास

मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण द्रविड़ शैली में हुआ है, जिसमें चार विशाल गोपुरम और कई प्रांगण हैं। प्रारंभिक निर्माण में चालुक्य वंश का प्रभाव देखा जाता है जबकि सातवाहन, पल्लव, रेड्डी और विजयनगर राजवंशों ने इसे आगे बढ़ाया।

सातवाहन राजा सातकर्णि ने अपने नाम में ‘मल्लना’ जोड़कर मंदिर की प्रसिद्धि को दर्शाया। पुलुमावी की नासिक प्रशस्ति (2वीं सदी ई.) में पहली बार श्रीशैल पर्वत का उल्लेख मिलता है।

(फोटो साभार: pilgrimagetour)

विजयनगर वंश के हरिहर द्वितीय ने पाताल गंगा तक सीढ़ियाँ बनवाईं, कृष्णदेवराय के मंत्री चंद्रशेखर ने मंदिर के मंडप बनवाए और छत्रपति शिवाजी ने उत्तर दिशा के गोपुरम के निर्माण की अनुमति दी। अंग्रेजों ने 1929 में मंदिर प्रशासन के लिए समिति बनाई और 1949 में इसे एंडोमेंट्स विभाग के अधीन कर दिया गया।

पौराणिक कथाएँ और आध्यात्मिक परंपरा

मल्लिकार्जुन मंदिर से कई पौराणिक कथाएँ जुड़ी हैं। कहा जाता है कि जब भगवान शिव और पार्वती ने अपने पुत्रों गणेश और कार्तिकेय के विवाह की योजना बनाई तो गणेश का विवाह सिद्धि और बुद्धि से हुआ, जिससे कार्तिकेय नाराज होकर पलनी पर्वत चले गए।

जहाँ शिव-पार्वती रुके, वही स्थान श्रीशैलम कहलाया। अग्नि पुराण के अनुसार राक्षस राजा हिरण्यकश्यप ने यहाँ तपस्या की थी और स्कंद पुराण में बताया गया है कि त्रेता युग में भगवान राम और सीता तथा द्वापर युग में पांडव यहाँ आए और पूजा की।

ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति कथा के अनुसार, ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता विवाद को सुलझाने के लिए शिव ने अनंत ज्योति स्तंभ बनाया। इसमें विष्णु ने सत्य स्वीकार किया जबकि ब्रह्मा ने झूठ बोला, इसलिए विष्णु की पूजा सदा होती रही पर ब्रह्मा की नहीं।

एक और कथा के अनुसार भगवान शिव तीन स्थानों पर शिवलिंग रूप में प्रकट हुए- श्रीशैलम (मल्लिकार्जुन), द्राक्षाराम (भीमेश्वर) और कलेश्वरम। पर्वत ऋषि की कथा के अनुसार, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पर्वत बना दिया और स्वयं वहीं निवास किया, जिससे यह स्थान श्रीशैल पर्वत कहलाया। इस मंदिर में आदि शंकराचार्य, सिद्ध नागार्जुन, अल्लम प्रभु और अक्का महादेवी जैसे संतों ने भी तपस्या की थी।

भारत विरोधी पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर अलीश्बा से मालाबार गोल्ड ने किया कोलैब, कंपनी का मालिक है MP अहमद: एक्सपोज करने वाले हिंदू कार्यकर्ता को दी जेल भेजने की धमकी, जानें पूरा विवाद

भारत का मशहूर ज्वैलरी कंपनी मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स इन दिनों ‘पाकिस्तान समर्थित’ गतिविधियों से विवादों में है। कंपनी ने हाल ही में पाकिस्तान की एक इंफ्लुएंसर से प्रमोशन करवाया, जिससे सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। यहाँ तक की कंपनी इसकी शिकायत लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट के पास पहुँची। कोर्ट ने भी कंपनी के समर्थन में फैसला सुनाते हुए सभी सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट करने का आदेश दिया। इतना ही नहीं अब ये कंपनी अपनी ‘पाकिस्तान समर्थित’ गतिविधियों की आलोचना करने वालों को जेल भी भिजवाना चाहती है।

मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स ने हिंदू कार्यकर्ता विजय पटेल को जेल भेजने की धमकी दी है। कंपनी ने विजय पटेल को कानूनी नोटिस भेजा है। विजय पटेल ने बताया कि मालाबार गोल्ड कंपनी उन्हें जेल भेजना चाहती है क्योंकि उन्होंने कंपनी के भारत की आलोचना करने वाली पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर के साथ कोलैब का खुलासा किया था।

विजय पटेल ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, “तो एमपी अहमद के स्वामित्व वाली मालाबार गोल्ड मुझे उनके पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर के साथ कोलैब का खुलासा करने के लिए जेल भेजना चाहती है, जिन्होंने हमारे ऑपरेशन सिंदूर का मजाक उड़ाया है। मैं अपनी सेना के गौरव के लिए जेल जाने को तैयार हूँ। देखते हैं कौन जीतता है: आपका पैसा, ताकत, या भारतीयों का समर्थन। आप सिर्फ पैसे की ताकत से मुझे चुप नहीं करा सकते।”

इसके साथ पटेल ने कंपनी के कानूनी नोटिस स्क्रीनशॉट भी साझा किया, जिसमें उन्हें तीन महीने तक की सिविल जेल में हिरासत में रखने की धमकी दी गई है। इसके अलावा बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेशानुसार कंपनी के खिलाफ किए गए पोस्ट भी डिलीट करने को कहा है।

मालाबार गोल्ड का पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर के साथ कोलैब पर विवाद

तो विवाद शुरू हुआ 06 सितंबर 2025 को मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स कंपनी के ब्रिटेन के बर्मिंघम में नए शोरूम के उद्घाटन समारोह से। इस हाई प्रोफाइल समारोह में मशहूर एक्ट्रेस करीना कपूर भी पहुँची थी। लेकिन विवाद का कारण अलीश्बा खालिद नाम की पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर बनीं, जिसे कंपनी के समारोह में देखा गया। इस इंफ्लुएंसर के साथ कंपनी ने प्रमोशन वीडियो भी बनाई, जिसे इंस्टाग्राम पर शेयर भी किया गया।

ये वही पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर अलीशबा खालिद है, जो अपने इंस्टाग्राम पर अक्सर भारत की आलोचना करते हुए पोस्ट डालती है। अलीश्बा के अधिकतर पोस्ट मई 2025 में सामने आए, जिसमें उसने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत पर अपमानजनक टिप्पणी की थी। इन पोस्ट को अब अलीश्बा ने अपने अकाउंट से डिलीट कर दिया है।

इस पोस्ट में अलीश्बा ने ऑपरेशन सिंदूर को ‘कायरतापूर्ण कृत्य’ करार दिया।

इस पोस्ट में अलीश्बा ने पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर एक लंबा चौड़ा पैराग्राफ लिखा है और ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ से अंत में #SayNoToWar को सपोर्ट किया है। इसी इंफ्लुएंसर ने पाकिस्तान के प्रति वफादारी को अलग रखते हुए अब भारत की कंपनी के साथ कोलैब किया है।

इसी तरह की एक अन्य पोस्ट ‘शर्म करो भारत’ से शुरू की और भारत को चुनौती दी कि इंतजार करो, पाकिस्तान को मौका मिलेगा तब वह भी सच्चाई के साथ जवाब देगा।

अलीश्बा के इन भारत-विरोधी पोस्ट के कारण मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स की सोशल मीडिया पर आलोचना शुरू हो गई। लोग ‘बॉयकॉट मालाबार’ ट्रेंड करने लगे क्योंकि कंपनी ने एक ऐसी पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर के साथ कोलौब किया, जो अक्सर भारत के खिलाफ पोस्ट डालती है।

इन आलोचकों में सबसे ऊपर विजय पटेल का नाम सामने आया। विजय पटेल ने अलीश्बा के इन भारत-विरोधी पोस्ट के साथ मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स की ‘पाकिस्तानी समर्थित’ गतिविधि का खुलासा किया। विजय पटेल ने 10 सितंबर 2025 को एक्स पर पोस्ट किया, जिसमें बताया कि कैसे केरल के उद्यमी एमपी मोहम्मद की मालाबार गोल्ड ने पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर के साथ कोलैब किया, जिसने ऑपरेशन सिंदूर को ‘कायरतापूर्ण कृत्य’ करार दिया था।

मालाबार गोल्ड ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर किया मुकदमा

सोशल मीडिया की कड़ी आलोचना के बाद मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स कंपनी ने सार्वजनिक रूप से माफी माँगने के बजाए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपने खिलाफ किए गए ‘अपमानजनक’ कंटेंट को हटाने की माँग के लिए कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया। इसमें कहा गया कि इन पोस्ट से उनके कारोबार पर असर हो रहा है, खासकर जब भारत में त्योहारों का सीजन है।

हाई कोर्ट ने 29 सितंबर 2025 को मालाबार गोल्ड के मुकदमे पर सुनवाई की। इस दौरान कंपनी ने तर्क दिया कि उन्होंने बर्मिंघम में नए शोरूम के प्रमोशन के लिए एक तीसरी पार्टी, JAB स्टूडियोज नाम की एजेंसी को हायर किया था। उसी एजेंसी ने ब्रिटेन के लोकल सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर को कंपनी के प्रमोशन के लिए बुलाया था। इनमें से एक पाकिस्तानी इंफ्लुएंसर अलीश्बा खालिद भी थी, जो ब्रिटेन की निवासी हैं।

कंपनी ने यह भी दावा किया कि उन्होंने बाद में पता लगा कि अलीश्बा खालिद ने सोशल मीडिया पर भारत की आलोचना करते हुए पोस्ट किए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि अलीश्बा खालिद को अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले से पहले ही हायर किया जा चुका था। कंपनी ने कोर्ट में दलील दी कि उन्हें जानकारी ही नहीं थी कि अलीश्बा खालिद पाकिस्तान से है।

मालाबार गोल्ड एंड डायमंड की इन दलीलों को सुनकर हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी किया, जिसमें इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप और एक्स (X) से सभी ‘अपमानजनक’ पोस्ट को हटाने को कहा गया और आगे ऐसे किसी भी कंटेंट पर भी रोक लगा दी गई।

जंग में आसमान से दुश्मनों के सामने लैंड करेंगे भारतीय सैनिक, DRDO ने पैराट्रूपर्स के लिए बनाया स्वदेशी पैराशूट: बेहतरीन रही टेस्टिंग, जानें खास बातें

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्वदेशी सैन्य लड़ाकू पैराशूट प्रणाली (एमसीपीएस) विकसित किया है। 32,000 फीट की ऊँचाई से सफलतापूर्वक लड़ाकू फ्रीफॉल जंप पर इसका परीक्षण किया गया। यह छलांग भारतीय वायु सेना के जम्परों, विंग कमांडर विशाल लखेश, वीएम (जी), एमडब्ल्यूओ आर जे सिंह और एमडब्ल्यूओ विवेक तिवारी ने लगाई।

आगरा के मलपुरा ड्रॉपिंग जोन में इस पैराशूट प्रणाली को तैनात किया गया था। परीक्षण के दौरान स्वदेशी प्रणाली की दक्षता, विश्वसनीयता और उन्नत डिजाइन का शानदार प्रदर्शन हुआ। इस उपलब्धि के साथ एमसीपीएस ऐसी एकमात्र पैराशूट प्रणाली बन गई है, जो 25,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर तैनाती में सक्षम है। इसका इस्तेमाल भारतीय सेना करेगी।

पैराशूट सिस्टम एमसीपीएस की खासियत

डीआरडीओ की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिसमेंट (ADRDE) और डिफेंस बायो-इंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रोमेडिकल लैबोरेटरी बेंगलुरु (DEEL) ने मिलकर इस मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम को विकसित किया है। इसे धीरे धीरे उतारा जा सकता है। यानी इसकी स्पीड को कंट्रोल करने की क्षमता बेहतर स्टीयरिंग के कारण है। इसे पहले से निर्धारित ऊंचाई पर तैनात कर, सटीक नेविगेशन करने और टारगेट तक पहुँचना आसान हो जाएगा।

ये सिस्टम भारत के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन के अनुकूल भी है। इसे दुश्मन पर स्वतंत्र रूप से भी संचालित किया जा सकता है। इसमें बाहरी हस्तक्षेप या दुश्मन द्वारा टारगेट बदलने की कोशिशों का कोई असर नहीं होगा। यानी ये सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित है।

इसका डिजाइन Ram-Air (Rectangular Canopy) यानी आसानी से नियंत्रित और दिशा बदलने वाला पैराशूट है। इसका इस्तेमाल कॉन्बेट फ्री फॉल मिशन में किया जा सकता है यानी उड़ते हुए विमान से कूदा जा सकता है। इस किट के साथ सैनिक का वजह अधिकतम 150 किलो हो सकता है।

दिन-रात काम करने वाला ब्रीथिंग सिस्टम से लैस

अगर मेन और रिजर्व कैनोपी फट जाए तो दूसरी काम आएगी। यदि जवान बहुत बिजी हो और पैराशूट खोलना भूल जाए, तो सिस्टम खुद ब खुद खुल जाएगा। इसका नेविगेशन सिस्ट जीपीएस और एनएवीआईसी पर आधारित हैं। यानी सही स्थान पर लैंडिंग संभव है। अधिक ऊँचाई पर ऑक्सीजन कम होने पर साँस लेने में दिक्कत न हो, इसके लिए ब्रीथिंग सिस्टम लगाया गया है। इसका इस्तेमाल दिन-रात कभी भी किया जा सकता है क्योंकि इसमें नाइट विजन हेडगियर लगाया गया है।

स्वदेशी पैराशूट सिस्टम को मिलेगी पहचान

इस प्रणाली ने भारतीय स्वदेशी पैराशूट प्रणालियों को व्यापक रूप से अपनाने का रास्ता खोल दिया है। विदेशों से मँगाए जाने वाले उपकरणों की तुलना में इस सिस्टम का रखरखाव और मरम्मत कम समय में और कम खर्च पर किया जा सकेगा। यानी इसका अधिकतम इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे युद्ध या संकट के वक्त विदेशों पर निर्भरता तो कम होगी ही, साथ ही सेना की कार्यक्षमता में भी वृद्धि होगी

रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ और सेना को दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफल प्रदर्शन पर डीआरडीओ, सशस्त्र बलों और उद्योग जगत को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर करार दिया। राजनाथ सिंह ने अपने एक्स अकाउंट पर डीआरडीओ के पोस्ट को शेयर करते हुए लिखा, “देश के लिए गौरव का क्षण! @DRDO_India द्वारा स्वदेश में विकसित सैन्य लड़ाकू पैराशूट प्रणाली (MCPS) ने 32,000 फीट की ऊँचाई से लड़ाकू फ्रीफॉल जंप हासिल किया है।”

महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम उपलब्धि

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने इस प्रदर्शन में योगदान देने वाली रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की टीम की सराहना की। उन्होंने इसे एयर डिफेंस सिस्टम के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बताया। वहीं डीआरडीओ के दूसरे वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे विदेशी पैराशूट प्रणालियों पर निर्भरता कम होगी। साथ ही मरम्मत और रखरखाव में लगने वाला समय भी कम होगा। युद्ध के वक्त ये काफी काम आने वाला है।