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‘अब लोगों के हाथों में होगा पैसा’: वित्त मंत्री ने कहा- GST की नई कीमतों के अनुसार लेबलिंग करें कंपनियाँ, सरकार ने जारी किया नोटिफिकेशन

देश में 22 सितंबर 2025 से वस्तु और सेवा कर (GST) में नए बदलाव होने जा रहे हैं। इसको लेकर बुधवार (17 सितंबर 2025) को सरकार ने नए रेट्स का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि नए बदलावों से अर्थव्यवस्था में ₹2 लाख करोड़ का निवेश होगा।

वित्त मंत्री ने कहा, “इस नई पीढ़ी की टैक्स व्यवस्था में केवल दो स्लैब (5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत) हैं। इससे अर्थव्यवस्था में ₹2 लाख का निवेश होगा। अब पैसा लोगों के हाथों में होगा।” उन्होंने इस पर भी प्रकाश डाला कि नए GST बदलावों से लगभग 99 प्रतिशत वस्तुओं पर 12 प्रतिशत से घटकर अब 5 प्रतिशत GST लगेगी।

इसी बदलाव में 90 प्रतिशत वस्तुएँ, जिन पर 28 प्रतिशत GST था, उन वस्तुओं पर अब सिर्फ 18 प्रतिशत GST ही लगेगा। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि नए GST व्यवस्था को FMCG संस्थानों ने अपनाया है और 22 सितंबर 2025 से लोगों को लाभ पहुँचाने का भी वादा किया है।

निर्मला सीतारमण ने बताया कि NDA सरकार ने दरों में बदलाव करने से पहले पाँच महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान दिया। इनमें गरीब और मध्यम वर्ग को राहत देना, मध्यम वर्ग की जरूरतों को पूरा करना, किसानों का समर्थन करना, छोटे और मध्यम व्यवसायों की मदद करना और रोजगार और निर्यात बढ़ाने वाले क्षेत्रों पर ध्यान देना शामिल है।

GST में बदलाव के नोटिफिकेशन के मुताबिक, 22 सितंबर 2025 से कुछ वस्तुएँ अब नई कीमत से बाजार में उपलब्ध होंगी। अगले कुछ दिनों में हर राज्य में GST की नई दरों को लागू करने के लिए अलग-अलग नोटिफिकेशन भी जारी किए जाएँगे।

उधर, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBIC) भी उद्योग और हितधारकों के साथ मिलकर बदलाव संबंधित मुद्दों को आसान बनाने और तमाम मुद्दों पर स्पष्टीकरण देने के लिए काम कर रहा है। जबकि सरकार ने फिलहाल केवर नई कीमतों के फिर से लेबलिंग के लिए आवश्यक नोटिफिकेशन जारी किया है।

सरकार ने GST में बदलाव कर आम आदमी को पहुँचाया फायदा

उल्लेखनीय है कि हाल ही में हुई GST (वस्तु एवं सेवा कर) काउंसिल की 56वीं बैठक में कई बड़े और अहम फैसले लिए गए, जिनका सीधा फायदा आम लोगों को मिलेगा। पहले जीएसटी में चार प्रमुख स्लैब थे– 5%, 12%, 18% और 28%। अब इसे घटाकर दो मुख्य स्लैब कर दिए गए हैं– 5% और 18%। सिर्फ कुछ खास और महँगे सामानों पर ही 40% टैक्स लगेगा।

ये वो चीजें हैं जिन्हें ‘सिन गुड्स’ या ‘डेमेरिट गुड्स’ कहा जाता है, जैसे तंबाकू, पान मसाला, सिगरेट और बहुत महँगी गाड़ियाँ। सरकार का मकसद था कि आम आदमी पर टैक्स का बोझ कम हो और कारोबार करना आसान हो जाए।

भारत-EU के बीच अंतिम चरण में व्यापार वार्ता, साल के आखिर तक हो जाएगी FTA डील: PM मोदी के जन्मदिन पर यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट ने खुद की घोषणा

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच लंबे समय से चल रहा FTA समझौते पर बातचीत अब अंतिम दौर की ओर बढ़ चुकी है। दोनों पक्षों की 14वीं वार्ता 6 से 10 अक्टूबर तक ब्रसेल्स में होगी। इस समझौते को दोनों देश संतुलित और परस्पर लाभकारी बताकर आगे बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय कमीशन की प्रेसीडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने पीएम मोदी के जन्मदिन पर न सिर्फ उन्हें बधाई दी, साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि इस साल के आखिर तक दोनों पक्षों में FTA समझौता पूरा हो जाएगा।

पीएम मोदी ने भी उर्सुला वॉन डेर लेयेन की शुभकामनाओं को लिए शुक्रिया कहा। साथ ही कहा कि भारत और यूरोपीय यूनियन मिलकर आगे का रास्ता तय करेंगे।

कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने भरोसा जताया है कि भले ही हर मुद्दे पर सहमति न बने, लेकिन नतीजा एक बेहतरीन समझौता होगा। इससे पहले 13वाँ दौर भारत में हुआ था, जिसमें यूरोपीय संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया था। यूरोप की माँग मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल क्षेत्र में शुल्क रियायतों की है। भारत इस समय आयातित गाड़ियों पर 100 प्रतिशत से अधिक टैक्स लगाता है।

ब्रिटेन के साथ हुए हालिया समझौते में भारत ने ऑटो कंपनियों को कुछ रियायतें दी थीं, अब EU भी वैसा ही चाहता है। फॉक्सवैगन और मर्सिडीज-बेंज जैसी कंपनियाँ पहले से भारत में मौजूद हैं और रियायतों के बाद उन्हें और बड़ा अवसर मिलेगा। यूरोपीय संघ का मानना है कि यह साझेदारी केवल व्यापार तक सीमित नहीं है।

बड़े पैमाने पर निवेश आएगा और भारत में हजारों नई नौकरियाँ पैदा होंगी। इसके लिए EU ने हाल ही में नया रणनीतिक एजेंडा भी पेश किया है। इसमें पाँच बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं, व्यापार और निवेश को बढ़ाना, प्रतिभा व कौशल विकास, सप्लाई चेन की सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और रक्षा सहयोग।

खास बात यह है कि इस साल के अंत तक FTA को अंतिम रूप देने की घोषणा भी की गई है। रणनीति में सुरक्षा और रक्षा को विशेष जगह मिली है। हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक में समुद्री सुरक्षा, साइबर डिफेंस, आतंकवाद-रोधी सहयोग और रक्षा उद्योग में तकनीकी साझेदारी इसके अहम हिस्से हैं।

सूचना सुरक्षा पर भी नई बातचीत शुरू होगी। बदलते वैश्विक हालात में EU चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भरता कम करना चाहता है और भारत इसमें भरोसेमंद साथी माना जा रहा है।

इसी बीच अमेरिका का रवैया भी बदला है। पहले जहाँ वह भारत के साथ व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर सख्ती दिखा रहा था, वहीं अब वह भी नरमी बरत रहा है। इंडो-पैसिफिक में चीन का दबदबा और बदलते भू-राजनीतिक हालात ने अमेरिका को मजबूर किया है कि वह भारत को मजबूत सहयोगी माने।

बिहार की हर सीट पर तेजस्वी का चेहरा चुनाव लड़ रहा है… गईल भैंस पानी में

बिहार चुनावी साल में है। राजनीतिक यात्राओं/सभाओं का मौसम है। बयानों की बाढ़ है। इसी में बहकर आया है तेजस्वी यादव का एक बयान है। उनका कहना है कि बिहार की सभी 243 सीटों पर उनका चेहरा चुनाव लड़ रहा है।

एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा,

इस बार तेजस्वी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। चाहे बोचहां हो या मुजफ्फरपुर। तेजस्वी लड़ेगा। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि मेरे नाम पर वोट दें।

लालू प्रसाद यादव की पारिवारिक पार्टी राजद चाहती है कि इस बार चुनाव में INDI गठबंधन तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर उतरे। कॉन्ग्रेस, लेफ्ट सहित राजद के अन्य छोटे सहयोगी इससे कन्नी काट रहे हैं।

तेजस्वी यादव के नाम से क्यों डर रहा INDI गठबंधन

इसका एक कारण यह बताया जाता है कि कॉन्ग्रेस को लगता है कि तेजस्वी यादव के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में जाने पर उसे अगड़ों का जो छिटपुट वोट बिहार में मिल रहा है, वह भी उसके हाथ से निकल जाएगी। साथ ही यह भी बताया जाता है कि सहयोगी दल तेजस्वी यादव के नाम पर मु​हर नहीं लगाकर, ज्यादा से ज्यादा सीट देने के लिए राजद पर दबाव बढ़ाना चाहते हैं।

इसी बौखलाहट में तेजस्वी यादव ने ‘तेजस्वी बिहार के सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा’ का दंभ भरा है। पर इस फेर में वे भूल गए नाम या चेहरा, केवल कुछ शब्द भर नहीं होते हैं। केवल तस्वीर ही नहीं होती है। नाम और चेहरा, इतिहास और जनता की स्मृतियों का प्रतीक भी होते हैं।

जिस नाम और चेहरा से तेजस्वी यादव को राजद की बागडोर मिली है, उसका इतिहास कुछ ऐसा है, उसकी स्मृतियाँ बिहार के लोगों के मस्तिष्क में कुछ इस तरह अंकित है, कि वह नाम और चेहरा को तेजस्वी यादव के लिए बोझ बना देती है। ऐसे में यह बयान न केवल INDI गठबंधन के भीतर चल रहे द्वंद्व को उजागर करता है, बल्कि बिहार के लोगों के भीतर उस डर को भी पैदा करता है, जिससे पीछा छुड़ाकर वे यहाँ तक पहुँचे हैं।

बिहार को डराता है तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा

बिहार से ही आने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में 2019 के आम चुनावों से पहले एक प्रजेंटेशन का हवाला देते हुए लिखा है, “इस प्रजेंटेशन में सवाल हुआ- अगर आप (दो बड़े उद्योपतियों का नाम लिया गया, जिसमें एक भगोड़ा है तो दूसरा लंबे समय तक जेल में रहा, जिनके नाम का खुलासा करना उचित नहीं होगा) इनका नाम लेते हैं तो आपके जेहन में क्या छवि आती है? जवाब था- फ्रॉड की। लेकिन जब नरेंद्र मोदी का नाम लेते हैं तो क्या जवाब होता है? एक ऐसा नेता जो कोई भी बड़ा निर्णय ले सकता है, चाहे विकास के एजेंडे पर हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा।”

ऐसे ही यदि आपसे यह पूछा जाए कि तेजस्वी यादव का नाम सुनते ही या फोटो देखते ही आपके जेहन में क्या छवि आती है? जाहिर है आपको लालू-राबड़ी का जंगलराज याद आ जाएगा।

राजद के सालों तक सत्ता से बाहर रहने के बाद भी, तेजस्वी को नए दौर का युवा नेता बताए जाने के बाद भी, उस जंगलराज उसका डर ऐसा है कि लोगों को लगता है कि उनके सत्ता में आने से अपराध का तंत्र फिर से मजबूत होगा।

  • तेजस्वी यादव का चेहरा बिहार के लोगों को उस दौर की याद दिलाता है, जब अपहरण उद्योग में बदल गया था। जब लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन करने को मजबूर कर दिए गए। जब देश के अन्य राज्य विकास की दौड़ में शामिल हो रहे थे तो जातिवाद और भ्रष्टाचार ने बिहार को कैद कर रखा था।
  • तेजस्वी यादव की राजनीति ‘MY समीकरण’ पर ही टिकी है। यह न केवल उनकी राजनीतिक जमीन को सीमित करता है, बल्कि यह समीकरण बहुसंख्यक जनता के लिए असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है।
  • तेजस्वी यादव राजनीतिक तौर पर आज जहाँ हैं, वहाँ राजनीति में घिस-घिस कर नहीं पहुँचे हैं। वे वंशवाद की देन हैं। बिहार के लोगों पर राजद की ओर से थोपे गए हैं। क्रिकेटर से नेता बनने की अपनी यात्रा में उनके पास गिनाने/दिखाने के लिए ऐसा कुछ भी ठोस नहीं है जो उनके नाम और चेहरा से उभरने वाली छवि को बदल दे।

इसके उलट नीतीश कुमार ने भले समय-समय पर साझेदार बदले हैं, लेकिन मोटे तौर पर उनकी छवि ऐसे नेता की है जिसने बिहार के लोगों को अपराध और भय से छुटकारा दिलाया है। बिजली, सड़क, शिक्षा के क्षेत्र में सुधार किए हैं।

वहीं तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा, जिस विरासत और परिवार से जुड़ा है, उसकी राजनीति को लोग अपराध और भ्रष्टाचार से अलग कर नहीं देख पाते हैं। यही कारण है कि यदाकदा तेजस्वी यादव अपने भाषणों में भले रोजगार-विकास जैसी बातें कर लें, लेकिन जनता उन्हें उसी पुरानी राजनीति का उत्तराधिकारी मानती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी ने बिहार में विकास की नई आकांक्षाओं को पैदा किया है। ऐसे तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा इन आकांक्षाओं के दफन हो जाने का भय पैदा करता है।

बिहार में एक कहावत है- एक बेर साँप काटलक, दोसर बेर रस्सी देखिते कँपलौं। यानी भयावह अनुभव झेल चुके लोग उस तरह की किसी भी स्थिति की आहट से ही काँप उठते हैं। असल में तेजस्वी यादव वह ‘रस्सी’ हैं, जो जनता को ‘साँप’ की याद दिलाती है। ऐसे में सभी 243 सीट पर अपना नाम और चेहरा होने का उनका दंभ भरना, उस भयावह अतीत की याद दिलाता है जिसकी कल्पना मात्र से ही बिहार सिहरने लगता है।

टेक्सटाइल सेक्टर में ₹15431 करोड़ का निवेश लाई योगी सरकार, कर्मचारियों के अधिकारों की भी करेगी रक्षा: विकसित उत्तर प्रदेश की दिशा में तेजी से बढ़े कदम

उत्तर प्रदेश में अस्थायी और संविदा कर्मचारियों के लिए राज्य सरकार ने हाल ही में उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम लिमिटेड का गठन किया है। यह एक गैर-लाभकारी सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी होगी, जिसका उद्देश्य सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग एजेंसियों के चयन में पारदर्शिता लाना और अस्थायी कर्मचारियों से जुड़े वेतन, नौकरी सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा संबंधी मुद्दों का समाधान करना है।

इस पहल के तहत अब यूपी के 93 सरकारी विभागों में काम करने वाली आउटसोर्स एजेंसियों का चयन सीधे विभागों द्वारा नहीं बल्कि नए पोर्टल GEM (Government e-Marketplace) के माध्यम से निष्पक्ष प्रक्रिया से किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे लाखों कर्मचारियों को एजेंसियों के जरिए मिलने वाले कम वेतन और शोषण से राहत मिलेगी।

अकेले यूपी में ही लगभग 11 लाख ऐसे कर्मचारी हैं, जिन्हें अस्थायी रूप से एजेंसियों के माध्यम से नियुक्त किया गया है और जो वेतन और नौकरी की अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो केंद्र और राज्य दोनों में करीब 30 से 43 प्रतिशत कार्यबल अस्थायी, संविदा या आउटसोर्स व्यवस्था के तहत काम कर रहा है। इसमें डाटा एंट्री, क्लर्की, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सेवाएँ शामिल हैं।

साल 2014 के एक अध्ययन के अनुसार, कुल सरकारी कार्यबल का लगभग 43 प्रतिशत यानि (लगभग 1.23 करोड़) कर्मचारी अस्थायी थे। हाल के रुझानों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 तक यह संख्या डेढ़ से दो करोड़ तक पहुँच सकती है, खासकर स्वास्थ्य, शिक्षा और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में।

संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की इंडिया एंप्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, संगठित क्षेत्र में संविदा कर्मचारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आउटसोर्सिंग की व्यवस्था में कर्मचारी सीधे विभाग के नहीं बल्कि बाहरी एजेंसी के कर्मचारी होते हैं।

एजेंसियाँ कम लागत पर कर्मचारियों को अनुबंध के तहत नियुक्त करती हैं और अनुबंध खत्म होने पर उन्हें हटा देती हैं या रिन्यू कर देती हैं। सरकारी विभागों में इसका उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाना, प्रशासनिक बोझ कम करना और लागत में कटौती करना है।

हालाँकि, इस व्यवस्था में कर्मचारियों को सीमित वेतन, कम सामाजिक सुरक्षा और नौकरी की अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। कई बार एजेंसियों पर कर्मचारियों की सैलरी रोकने और शोषण करने के आरोप भी लगते रहे हैं। यही कारण था कि लंबे समय से सरकारी स्तर पर ऐसे प्रबंधों की जरूरत महसूस की जा रही थी, जो अस्थायी कर्मचारियों के हित सुरक्षित कर सकें।

उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया है। निगम के माध्यम से कर्मचारियों को नियमित मानदेय, सीधे वेतन हस्तांतरण, गारंटीकृत EPF और ESI योगदान के साथ-साथ मातृत्व अवकाश और अंतिम संस्कार सहायता जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएँ मिलेंगी।

इसके अलावा, आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति कम से कम तीन साल के लिए सुनिश्चित की जाएगी। वेतन हर महीने एक से पाँच तारीख के बीच सीधे बैंक खाते में जमा होगा। अगर यह प्रबंध सफल रहा तो यूपी रोजगार क्षेत्र में एक नया मॉडल तैयार कर सकता है।

टेक्सटाइल पार्क बनेगा रोजगार सृजन का आधार

सिर्फ अस्थायी कर्मचारियों की सुरक्षा ही नहीं बल्कि रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर पर विशेष फोकस किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक उच्चस्तरीय बैठक में प्रदेश में टेक्सटाइल पार्क बनाने का निर्णय लिया। इसके तहत हथकरघा और वस्त्र उद्योग में निजी निवेशकों को आकर्षित किया जाएगा।

सरकार के निवेश सारथी पोर्टल के अनुसार, अब तक वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र से जुड़े 659 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनके लिए लगभग 1642 एकड़ भूमि की आवश्यकता है। अनुमानित निवेश मूल्य 15,431 करोड़ रुपए है और इसके फलस्वरूप 1,01,768 रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है।

सीएम योगी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि निवेश प्रस्तावों के लिए जमीन की पहचान जल्द से जल्द की जाए। योजना का क्रियान्वयन पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल या नोडल एजेंसी के माध्यम से होगा। योजना के तहत टेक्सटाइल पार्क कम से कम 50 एकड़ भूमि पर विकसित किए जाएँगे।

इनमें प्रसंस्करण उद्योगों के लिए कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना अनिवार्य होगी। इसके अलावा बाटन, जिप, लेबल, पैकेजिंग और वेयरहाउस जैसी सहायक इकाइयों का भी विकास किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने योजना को महान संत कबीर के नाम पर समर्पित किया और कहा कि संत कबीर के जीवन दर्शन श्रम, सदगी और आत्मनिर्भरता को योजना का आधार बनाया जाएगा। वर्तमान में प्रदेश का वस्त्र एवं परिधान निर्यात 3.5 अरब अमेरिकी डॉलर है, जो देश के कुल निर्यात का लगभग 9.6 प्रतिशत है।

इस क्षेत्र का यूपी की GDP में योगदान 1.5 प्रतिशत है और लगभग 22 लाख लोग इस उद्योग से सीधे जुड़े हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वैश्विक वस्त्र बाजार 2030 तक 23 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच जाएगा और भारत इसमें सबसे तेजी से बढ़ने वाले देशों में शामिल होगा। ऐसे में यूपी की भागीदारी निर्णायक साबित हो सकती है।

‘भगवान से खुद कुछ करने को कहो’: यदि मूर्ति ठीक करने की गुहार का जवाब ये है तो फिर अदालतों की जरूरत ही क्या है… कभी सोचिएगा ‘माई लॉर्ड’ बीआर गवई

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 सितंबर 2025) को खजुराहो, मध्य प्रदेश के जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की सात फुट लंबी कटी हुई मूर्ति को बहाल करने की एक याचिका खारिज कर दी। ये मूर्ति यूनेस्को द्वारा संरक्षित खजुराहो के स्मारकों का हिस्सा है, जो सदियों पहले मुगल आक्रमणों के दौरान सिर कटवाकर अपवित्र और अपमानित छोड़ दी गई थी।

याचिकाकर्ता एक भक्त राकेश दालाल ने तर्क दिया कि मूर्ति को ठीक करना सिर्फ़ पुरातत्व की बात नहीं, बल्कि आस्था, सम्मान और हिंदुओं का बुनियादी अधिकार है कि वो अपनी पूर्ण देवताओं की पूजा कर सकें। सीनियर एडवोकेट संजय एम नुली के माध्यम से पेश हुए उन्होंने कोर्ट से कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (एएसआई) और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दें कि मूर्ति की मरम्मत करें और मंदिर की पवित्रता को फिर से स्थापित करें।

याचिका में खजुराहो मंदिरों की विरासत का ज़िक्र किया गया, जो चंद्रवंशी राजाओं के समय बने थे। ब्रिटिश काल की उदासीनता के बाद आज़ादी के 70 साल से ज़्यादा बीतने के बावजूद लापरवाही ने मूर्ति को उपेक्षित छोड़ दिया है।

दालाल ने आगे कहा कि सरकार का लगातार बहाली का काम न करने से भक्तों के पूजा के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई विरोध प्रदर्शन, ज्ञापन और जन अभियान होने के बावजूद राज्य से कोई जवाब नहीं आया।

इस पर सीजेआई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच जो कुछ कहा, वो हैरान करने वाला था। क्योंकि उसमें कानूनी तर्क की जगह हिंदुओं को लेकर तंज था। सीजेआई ने याचिकाकर्ता से कहा, “ये पूरी तरह से पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन है। जा के खुद देवता से कहो कि अब कुछ करे। तुम कहते हो कि भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो। तो जा के अब प्रार्थना करो।”

हिंदुओं के लिए ये टिप्पणी मुगल तलवारों से लगाए गए सदियों पुराने घाव से कहीं ज़्यादा गहरी चुभ गई। ये एक पुरानी ताना की गूँज थी, “अगर तुम्हारे देवता असली हैं, तो खुद को क्यों नहीं बचाया?” इस हिंदूफोबिक तंज का इस्तेमाल सदियों से इस्लामी शासकों और आधुनिक धर्मनिरपेक्ष एलीट्स करते हैं और उसका इस्तेमाल कर खुद सीजेआई ने उसका समर्थन कर दिया।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की असमानता

एक पल के लिए कल्पना कीजिए, अगर यही टिप्पणी मुसलमानों पर कही जाती। मान लीजिए वक्फ (संशोधन) एक्ट की सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई ने याचिकाकर्ताओं से कहा होता, “अगर ये कानून पसंद नहीं, तो जा के अल्लाह से मदद माँगो। दुआ करो, शायद वो तुम्हारी ज़मीनें बहाल कर दें।” इसके बाद तो पूरे देश में बवाल हो जाता। कानूनी भाईचारे वाले बयान जारी करते, टीवी एंकर चिल्लाते ‘न्यायिक इस्लामोफोबिया’, एनजीओ वाले संयुक्त राष्ट्र को चिट्ठियाँ भेजते और चीफ जस्टिस को कट्टरपंथी करार दे दिया जाता।

लेकिन जब यही तिरस्कार हिंदुओं के लिए रिज़र्व होता है, तो प्रतिक्रिया की जगह सिर्फ चुप्पी होती है। कोई वकील काउंसिल बयान नहीं देता। सड़कों पर कोई प्रदर्शन नहीं होता। कोर्ट में कोई याचिका नहीं दाखिल होती। दरअसल, भारत में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ़ एक तरफ़ा चलती है। यहाँ हिंदुओं का मज़ाक उड़ाया जाता है। उनका अपमान किया जाता है और बेधड़क तंज कसे जाते हैं। वहीं, अल्पसंख्यकों के किसी गलफहमी की वजह से हुए अपमान को भी अस्तित्व का संकट बनाकर प्रचारित किया जाता है।

जब हम बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले पाखंड की बात कर रहे हैं, तो ये ज़िक्र करना ज़रूरी है कि सीजेआई गवई हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच का हिस्सा थे जिसने वक्फ संशोधन एक्ट, 2025 की कुछ धाराओं पर रोक लगा दी। खास उस प्रावधान पर, जिसमें विवाद सुलझने तक कब्ज़ा वाली सरकारी ज़मीन ‘वक्फ’ नहीं मानी जा सकती, जबकि यही असल में कब्ज़े और अतिक्रमण को बढ़ावा देता है।

सड़क का हिंसा Vs कोर्ट रूम

ये असमानता एक कड़वी हकीकत से उपजी है- अल्पसंख्यक अपनी संवेदनशीलताओं को सड़कों पर थोपते हैं, हिंदू न्याय के लिए अदालतों का रुख़ करते हैं।

जब मुसलमान अपमानित महसूस करते हैं, तो वो ‘सड़क वीटो’ का इस्तेमाल करते हैं। वो प्रदर्शन करते हैं, सड़कें जाम करते हैं और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाते हैं। मजहबी अपमान के शक में लोग हमले का शिकार होते या मारे जाते हैं, जैसे उदयपुर में कन्हैया लाल का भयानक कत्ल। कन्हैया लाल की गलती क्या थी? नूपुर शर्मा का समर्थन करना.. जिन्होंने भगवान शिव का सम्मान बचाने के लिए अपने साथ पैनल में बैठे शख्स को उसी की भाषा में जवाब दिया था। लेकिन तक सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा को न सिर्फ डाँट लगाई थी, बल्कि अकेले ‘देश को आग लगाने’ तक का दोष उनके माथे पर मढ़ दिया था।

जो सड़कों पर घूम-घूम कर कत्ल और तोड़फोड़ कर रहे थे, वो बिना नुकसान के बच निकले। राज्य और न्यायपालिका खूनखराबे के डर से सावधानी से चलते रहे और चुप्पी साधे रहे।

इसके उलट हिंदू कानूनी याचिकाओं के ज़रिए उपाय ढूँढते हैं। वो संवैधानिक अधिकारों का सहारा लेते हैं। संस्थाओं पर भरोसा करते हैं और उन्हें क्या मिलता है? तंज? उन्हें कहा जाता है कि ‘जा के प्रार्थना करो’। उनकी आस्था को छोटा बताया जाता है, भक्ति को कमतर आँका जाता है और याचिकाओं को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार दे दिया जाता है।

संदेश साफ़ और बेहद खतरनाक है- आक्रामकता को सम्मान मिलहै। कानून के रास्ते पर चलना मज़ाक का न्योता देता है। असल व्यवहार में देखें तो भारत की धर्मनिरपेक्षता हिंसा को ईनाम देती है, लेकिन संयम (हिंदू) धारण करने वालों को सजा।

अगर प्रार्थना ही जवाब है, तो अदालतों की क्या ज़रूरत?

चीफ जस्टिस की टिप्पणी ‘जा के अपने भगवान से प्रार्थना कर’ न सिर्फ़ अपमानजनक है बल्कि तर्क की दृष्टि से बेतुकी। अगर दिव्य हस्तक्षेप ही हल है, तो अदालतें क्यों? सुनवाई क्यों, फैसले क्यों, कानून की व्याख्या क्यों? हर मुकदमेबाज़ को बस प्रार्थना करने को कहा जा सकता, चाहे वो कंपनियाँ अनुबंध लड़ रही हों, नागरिक ज़मीन विवाद कर रहे हों या पीड़ित न्याय माँग रहे हों।

लेकिन ज़ाहिर है, ऐसा तंज सबके लिए नहीं बाँटा जाता। किसी कॉर्पोरेट वकील से कभी नहीं कहा गया कि वित्तीय झगड़ों के लिए ‘देवी लक्ष्मी से प्रार्थना करो’। किसी ईसाई से नहीं कहा गया कि राहत के लिए ‘येशु से प्रार्थना करो’। किसी मुसलमान से नहीं कहा गया कि वक्फ दावों की जगह ‘अल्लाह की रहमत माँगो’। सिर्फ़ हिंदुओं से कहा जाता कि उनकी आस्था उनके कानूनी हक को अमान्य कर देती है।

बेंच से हिंदूफोबिया को सामान्य बनाना

इस घटना का सबसे खतरनाक पहलू ये है कि ये हिंदूफोबिया को सामान्य कैसे बनाता है। जब भारत का चीफ जस्टिस हिंदू आस्था का मज़ाक उड़ाता है, तो वो पूरे सिस्टम के लिए टोन सेट करता है। इससे बुद्धिजीवी, अकादमिक और मीडिया एलीट्स को हौसला मिलता कि हिंदू मान्यताओं को अंधविश्वास कहते रहें, हिंदू शिकायतों को ‘बहुसंख्यकवाद’ ठहराएँ और हिंदू दावों को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ कहें।

यही तरीका है जिससे पूर्वाग्रह गहरा होता है, न सिर्फ़ भीड़ द्वारा मंदिर जलाने से, बल्कि चोगे वाले ताकतवरों के हल्के-फुल्के तंजों से। हर तिरस्कार हिंदुओं की गरिमा को चोट पहुँचाता है। उनके देवताओं का मज़ाक सामाजिक रूप से स्वीकार्य बना दिया जाता है और उसे संस्थागत रूप से स्वीकृति दे देता है।

अगर कानूनी तौर पर सीजेआई को लगता था कि ये याचिका एएसआई के दायरे में है न कि सुप्रीम कोर्ट के, तो ये बात वो सीधे तरीके से भी कह सकते थे। चूँकि सुप्रीम कोर्ट भारत के संविधान का मध्यस्थ और व्याख्याकार है, उसी को कहने का हक है। लेकिन सीजेआई ने जो कुछ नगण्य आदेश एएसआई के पास जाने का होना चाहिए था, उसे ओपन कोर्ट में एक तमाशे में बदल दिया, जहाँ देश की सबसे ऊंची न्यायिक अथॉरिटी ने एक अरब लोगों की आस्था का मज़ाक उड़ाया।

बहुत समय बीत चुका हो सकता है, लेकिन समय अन्याय का बचाव नहीं है। गुलामी सदियों बाद खत्म हुई। अपार्थीड दशकों बाद जड़ से उखड़ी। ऐतिहासिक गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं और सुधारनी चाहिए, चाहे कितनी पुरानी हों। इसके उलट सीजेआई ने अपने तंज से जो किया, उसका हिंदुओं को सदियों तक दंश झेलना पड़ सकता है।

सिर्फ़ भक्ति का नहीं, सदियों की हिंदू उत्पीड़न का मजek

याचिकाकर्ता का मज़ाक उड़ाकर चीफ जस्टिस ने सिर्फ़ एक गुहार खारिज नहीं की; उन्होंने हिंदुओं द्वारा सहन सदियों के धार्मिक उत्पीड़न को खारिज किया उसके दर्द को, और इतिहास से सुलह की संभावना को ठुकराया। वही कोर्ट जिसने राम जन्मभूमि मामले में राम लला को एक पक्ष माना, वो अब विष्णु के भक्तों पर हँस रहा है। वही न्यायपालिका जो अल्पसंख्यकों के मामले में आँख बंद कर लेती है, वो हिंदुओं से कहता है कि संवैधानिक तरीके से न्याय माँगने की जगह जाकर प्रार्थना करो और भगवान को बुलाओ।

यही आज भारतीय धर्मनिरपेक्षता की हालत है- एकतरफा रास्ता, जहाँ हिंदू अपनी आस्था के लिए ताने खाते हैं, तो अल्पसंख्यकों की शिकायतों को लाड़-प्यार से सहलाया जाता है। न्याय इस आधार पर दिया जाता है कि कौन सबसे ज़ोर से चिल्लाता है या फिर हिंसा की धमकी देता है।

इतिहास यहीं नहीं रुकेगा। हर कटी मूर्ति, हर अपवित्र मंदिर, हर चुप करा गया भक्त, सभ्यता के न्याय की लड़ाई के जारी रहने की याद दिलाता रहेगा। कोर्ट ताने कस सकते, लेकिन सभ्यता का कर्तव्य अमर है- याद रखना, बहाल करना और जो हमारा है वो वापस लेना।

तब तक हिंदुओं को कड़वी सच्चाई के साथ जीना पड़ेगा कि अपनी ही धरती पर 2025 में भी जब वो अपने देवताओं के लिए सम्मान माँगते हैं, तो देश की सर्वोच्च अदालत कहती है- “जा के प्रार्थना करो।”

सहिष्णुता सिखाने का नैतिक अधिकार खो गया

और आखिर में… याचिका कबूल करें या खारिज… ये तो कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच थोड़ी सहिष्णुता बरत सकती थी। वो आसान तरीके से इस याचिका को खारिज कर सकती थी। इसके बजाय सीजेआई की बेंच ने हिंदू भक्त की आस्था का मजाक उड़ाने का रास्ता चुना। जजों से संयम और गरिमा की अपील की जाती है, न कि 16वीं शताब्दी के मूर्ति भंजकों की भाषा बोलने की।

जब न्यायपालिका बहुसंख्यतों की गहरी आस्था की उपेक्षा कर उनका मजाक उड़ाती है, तब वो दूसरों को सहिष्णुता और सम्मान सिखाने का ज्ञान देने का नैतिक आधार खो देती है।

मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

देश की मजबूत आंतरिक सुरक्षा से लेकर सांस्कृतिक विरासत, मध्यम से लेकर निचले वर्ग को सुविधाएँ: PM मोदी के 75वें जन्मदिवस पर जानें- कैसे उनके नेतृत्व में बदला भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर 2025 को अपना 75वाँ जन्मदिन मना रहे हैं। उन्होंने अपना पूरी जीवन राष्ट्र को समर्पित किया है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते देश ने कई बदलाव देखे हैं। पिछले 10 साल में उनकी सरकार ने देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया। इसके साथ देश की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने से लेकर हाशिए पर पड़े SC-ST समुदायों को सशक्त बनाने का काम किया है। मध्यम वर्गीय के लोगों और महिलाओं को बराबर का हक देने के लिए मोदी सरकार ने विशेष योजनाएँ चलाई हैं।

देश की मजबूत आंतरिक सुरक्षा

किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा के दो कंपोनेंट होते हैं। External Security और Internal Security। एक्सटर्नल सिक्योरिटी का जिम्मा तो सेनाओं के पास होता है और उसे सेना अच्छे से संभाल भी लेती हैं। लेकिन कोई भी राष्ट्र कितना मजबूत होगा या कितना कमजोर होगा यह इसकी इंटरनल सिक्योरिटी पर निर्भर करता है। भारत तो अपने आप में इस बात का उदाहरण है कि जब-जब हमारे यहाँ आंतरिक सुरक्षा कमजोर हुई है तब-तब यह राष्ट्र टूटा है। 

यदि बीते एक दशक में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की आंतरिक सुरक्षा की बात की जाए तो हमें यह देखने को मिलता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 10 वर्षों में strong internal security system तैयार किया है।

Strong system इसलिए, क्योंकि 2014 से पहले का भी एक समय था जब आए दिन देश के अलग-अलग स्थानों पर बम धमाके होते थे, जिसमें सैकड़ो नागरिक अपनी जान गवाते थे।दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में सुबह दफ्तर के लिए निकलने वाला आदमी सोचता था कि मैं वापस जीवित पहुँचूँगा या नहीं। 

साल 2005 में दीपावली के समय दिल्ली में हुए ब्लास्ट, 2006 में मुंबई लोकल ट्रेन में हुए ब्लास्ट, 2008  में जयपुर शहर में हुए ब्लास्ट या फिर 26/11 का हमला, ये सारी घटनाएँ कमजोर हो चुकी internal security का ही example थी।

लेकिन आज विगत 10 वर्षों में देश किसी भी बड़े आतंकवादी हमले का शिकार नहीं हुआ है। पहले की तरह आज सड़कों पर धमाके नहीं होते। इम्प्रूवमेंट सिर्फ आतंक के मोर्चे पर ही नहीं बल्कि वामपंथी आतंकियों से निपटने में हुई है। 

जिन नक्सलियों ने सरकार और नागरिकों की नाक में दम कर रखा था उन नक्सलियों को भी eliminate किया जा रहा है। बीते 2 वर्षों में 500 से भी ज्यादा नक्सलियों को हमारे जवानों ने मार गिराया है और जल्द ही 31 मार्च 2026 एक भारत पूर्ण रूप से नक्सल मुक्त भी हो जाएगा। 

चाहे नक्सली क्षेत्र हो या फिर कश्मीर का अशांत क्षेत्र हो सरकार के प्रयासों से इन सभी क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला है। 

Vibrant village program के तहत देशभर के सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाना या फिर पिछले 10 वर्षों में नॉर्थ ईस्ट में 14 लाख करोड़ रुपए के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की बात हो। सरकार भारत के हर vulnerable areas को विकास के मुख्य धारा से जोड़कर आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत का पुनरुद्धार

दिनकर ने कहा था कि रोटी के बाद इंसान की सबसे कीमती चीज उसकी संस्कृति होती है। इसलिए संस्कृति की रक्षा हर सभ्यता का दायित्व है।

विगत 10 वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार ने जिस तरह से कल्चरल हेरिटेज को संरक्षित करने और उसको बढ़ावा देने में ध्यान दिया है, वह incredible है। खुद को माँ गंगा का बेटा कहने वाले प्रधानमंत्री ने नमामि गंगे के माध्यम से गंगा के नवीनीकरण का प्रयास किया है। 

अपने मंदिरों के लिए विख्यात भारत भूमि में आज World class Kashi Vishwanath Corridor और उज्जैन कॉरिडोर के निर्माण के साथ-साथ सोमनाथ मंदिर का नवीनीकरण भी हो चुका है। इन सबसे इतर पाँच शताब्दियों की लड़ाई को खत्म करते हुए अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण भी किया गया। 

मंदिर और भूमि के अलावा हमारे पूर्वज भी हमारी संस्कृति और हमारे विरासत के प्रतीक होते हैं। पूर्वजों की विरासत को संरक्षित रखने के लिए भी मोदी सरकार ने अनेक प्रयास किए हैं। 

केदारनाथ धाम में जगतगुरु आदि शंकराचार्य की मूर्ति और गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति का स्थापित होना इन्हीं प्रयासों का परिणाम है। इसके अलावा जिन रणबांकुरो ने इस देश के लिए बलिदान दिया, उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए वर्षों से लंबित National War Memorial और National Police Memorial की भी स्थापना की गई।

संस्कृति के हर aspect को cover करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जिस तरह से सरकार काम कर रही है, उसे देखते हुए यदि इस दौर को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दौर कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा।

SC और ST समुदाय के लिए सरकार की योजनाएँ

विकास का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता की GDP के आँकड़े बदल जाए या चमकती मेट्रो और चमकते हाइवे दिखने लगें। असली विकास तब दिखता है, जब समाज के वंचित वर्गों तक सरकार की पहुँच हो।

विगत 10 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने इसी approach के साथ काम करते हुए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए हैं ताकि उन्हें विकास की मुख्य धारा में लाया जा सके।

आज प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रिमंडल में लगभग 60% मंत्री SC/ST या OBC समुदाय से आते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के अलावा आर्थिक रूप से इन्हें सशक्त करने के लिए भी कई योजनाएँ शुरू की गई हैं।

Stand Up योजना के तहत SC और ST को खुद का रोजगार शुरू करने के लिए अब तक 7,351 करोड़ से भी ज्यादा का लोन बैंक द्वारा दिया जा चुका है। इसके अलावा देश के 80 करोड़ लोग जिस गरीब कल्याण अन्य योजना के तहत राशन प्राप्त कर रहे हैं उसमें भी सबसे बड़ा तबका SCs और STs का ही है।

आयुष्मान भारत योजना, जिसके तहत हर साल ₹5,00,000 तक का हेल्थ कवरेज प्रदान किया जाता है, उसके अंतर्गत अब तक 34 करोड़ आयुष्मान कार्ड जो बने हैं, उसमें भी बड़ी संख्या SC और ST समुदाय की है। 

कुल मिलाकर देखा जाए तो चाहे स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय बनवाना हो, उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर देना हो या फिर सौभाग्य योजना के तहत हर घर बिजली पहुँचाना हो। सरकार की सारी योजनाओं का सीधा फायदा समाज के वंचित वर्गो तक यानी SC और STs तक ही पहुँच रहा है। 

मध्यम वर्ग को बेहतर सुविधाएँ

आम आदमी के साधारण जीवन को और आसान करना हो, चाहे 12 lakh तक की इनकम में टैक्स में छूट देना हो, घर खरीदना अफोर्डेबल बनाना हो,  मेडिकल सेवाएँ या भारत को ग्लोबली डिजिटल करना हो कुछ 10 सालों में इसमें बदलाव साफ दिखाई देता है।

मिडल क्लास चाहे रूरल एरिया या अर्बन एरिया का, उनके जीवन में मोदी सरकार बड़े बदलाव लाई है। चाहे हाल ही में दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर से GST (photo sent inbox) को घटाना हो। ज्यादातर गाड़ियों को 18% वाले रेट में लाना हो या फिर बजट में इनकम टैक्स का स्लैब 12 लाख पहुँचाना। 

इसके अलावा 2019 में Special Window for Affordable and Mid-Income Housing यानी SWAMIH फंड लॉन्च किया गया, जिसके माध्यम से रुके हुए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लिए ₹25,000 करोड़ की मदद दी गई।

PM आवास योजना के अंतर्गत 3 करोड़ से अधिक घर बनाए गए , जिससे रूरल और अर्बन दोनों एरिया में परिवारों को पक्की छत्त मिली है। इंटरनेट डेटा की कीमतें भी 97% तक घट गईं, जिससे ऑनलाइन शिक्षा, काम और सेवाएँ हर वर्ग तक पहुँचीं।

भारतनेट के जरिए 1.93 लाख ग्राम पंचायतें ऑप्टिक फाइबर से जुड़ चुकी हैं। Health facilities में आयुष्मान भारत के तहत 22.62 करोड़ हेल्थ कार्ड बनाए गए हैं, जिससे 40% भारतीयों को मुफ्त इलाज की सुविधा मिली है।

यात्रा और कनेक्टिविटी के लिए Ude Desh ka Aam Naagrik यानी udan,योजना से 1.16 करोड़ लोग हवाई यात्रा afford कर पाए। वंदे भारत मिशन के तहत 2.17 लाख उड़ानों से लगभग 3 करोड़ लोगों को सुरक्षित घर लाया गया।

यानि मोदी सरकार में फोकस देश के उस मिडिल क्लास पर भी है, जिसकी कोई संगठित आवाज नहीं है, जो प्रदर्शनों के लिए सड़क पर तो नहीं उतरता लेकिन चाहे टैक्स में contribution हो या फिर देश में कंसम्पशन को बढ़ावा देना, वो अपना साइलेंट कॉन्ट्रिब्यूशन करता रहता है।

समाज में महिलाओं को बराबरी का सम्मान

“I measure the progress of a community by the degree of progress which have achieved”- ये डॉक्टर भीम राव अंबेडकर ने कहा था।

इसका अर्थ है- “किसी भी समाज की तरक्की ऐसे देखी जाति है की उस समाज की महिलाएँ शिक्षा, काम और अधिकार में कितनी आगे बढ़ी हैं।”

आज भारत में महिलाएँ रोज एक इतिहास रच रही हैं, जहाँ कभी बच्चे का जेंडर पता लगाकर भ्रूणहत्या के मामले सुनने को मिलते थे, वहीं आज की तारीख में NFHS-5 की report ये साफ बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में महिला स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर जमीनी स्तर पर सुधार हुआ है।

महिलाओं की paid maternity leave 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते कर देना। जन औषधि केंद्रों पर ₹1 में पेड मिल रहे हैं, जिससे महिलाओं को स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी परेशानियों से राहत मिली है। 3.18 करोड़ बेटियों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने ले लिए सुकन्या समृद्धि खाते खोले गए हैं। 

धुएँ वाले चूल्हों से होने वाली साँस की बीमारियों से महिलाओं को राहत मिली। सबसे बड़ी सौगात प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से 9.6 करोड़ घरों को LPG कनेक्शन दिए गए हैं। 

इसी तरह महिलाओं के स्वच्छ भारत मिशन से 11.72 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं। इससे महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वास्थ्य तीनों में सुधार हुआ है। सौभाग्य योजना से 2.86 करोड़ बिजली कनेक्शन दिए गए हैं, जिससे केरोसिन के लैम्प इतिहास हो गए।

चाहे संसद में महिलाओं को 33% reservation देना हो या ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर एक्शन लेना, लखपति दीदी योजना या फिर सेल्फ हेल्प ग्रुप को लोकल से ग्लोबल करना महिलाओं को और उनकी समस्याओं को prioritize किया गया है। वो महिला भले ही किसी बड़े घर से हो या किसी सुदूर इलाके से या आदिवासी तबके से.. महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिला है।  

बठिंडा में धमाकों की जाँच करेगी NIA, गुरप्रीत सिंह के घर में बम बनाते फटे कई बम: पाकिस्तानी आतंकी सरगना मसूद अजहर से प्रभावित है आरोपित

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 10 सितंबर 2025 को जीदा गाँव में हुए बठिंडा के दोहरे बम धमाकों की जाँच शुरू कर दी है। पुलिस ने मामले की सारी जानकारी इंटेलिजेंस ब्यूरो और NIA सहित केंद्रीय एजेंसियों को दी, जिसके बाद NIA ने जाँच शुरू की। पिछले दिनों NIA के चंडीगढ़ ऑफिस से SP लेवल के अधिकारी ने घटनास्थल का निरीक्षण किया था।

इससे पहले पुलिस की शुरुआती जाँच में सामने आया कि आरोपित 19 वर्षीय LLB का छात्र गुरप्रीत सिंह पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर की कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था।

SSP अमनीत कोंडल ने बताया कि NIA ने आरोपित से विस्तार से पूछताछ की, जिसाक बठिंडा के AIIMS अस्पताल में इलाज चल रहा है। उल्लेखनीय है कि आरोपित अब तक अधिकारिक तौर पर गिरफ्तार नहीं किया गया है। आरोपित के ठीक होने के बाद ही दोबारा पूछताछ की जाएगी ताकि उसके नेटवर्क का पता लगाया जा सके।

दोहरे बम धमाकों का प्रभाव

10 सितंबर 2025 की सुबह गुरप्रीत सिंह के घर में छिपाए गए विस्फोटक में अचानक धमाका हो गया, जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गया। विस्फोट से पूरा घर तबाह हो गया और गुरप्रीत का दाहिना हाथ तक काटना पड़ गया।

इसके बाद शाम करीब 4 बजे जब गुरप्रीत सिंह के पिता जगतार सिंह विस्फोट की सफाई करने लगे तो एक और विस्फोट हो गया। इस धमाके में उन्हें गंभीर चोटें आईं। बम धमाके की जानकारी पुलिस को अगले दिन जगतार सिंह का इलाज कर रहे अस्पताल की सूचना से मिली।

इसके बाद 14 सितंबर 2025 को विस्फोट की जाँच करने आई बम निरोधक टीम के सामने भी 3 छोटे विस्फोट हुए। फिर टीम को घटनास्थल को साफ करने के लिए रोबोट लगाने पड़े। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरप्रीत ने जिन केमिकल का इस्तेमाल कर रहा था, वो बेहद अस्थिर थे और अगर अपनी जगह से हटाए जाते तो विस्फोट हो सकते थे।

मसूद अजहर कनेक्शन और कट्टरपंथी एंगल

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, गुरप्रीत सिंह मसूद अजहर और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी प्रोपेगेंडा से प्रभावित था। गुरप्रीत के फोन से इस्लामी कट्टरपंथियों के वीडियो, विस्फोटक इकट्ठा करने की जानकारी और पाकिस्तानी आतंकवादियों के फोन नंबर मिले हैं।

इसके अलावा गुरप्रीत सिंह ने कट्टरपंथी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक फेक ID भी बनाई थी। जाँच में यह भी सामने आया है कि गुरप्रीत ने विस्फोटक बनाने की सामग्री ऑनलाइन मँगवाई थी और वीडियो देखकर बम बनाना सीख रहा था।

खुफिया जानकारी से यह भी पता चला है कि उसने जम्मू जाने के लिए ट्रेन और बस के टिकट भी बुक करवा लिए थे, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि वह अपने कच्चे विस्फोटकों को किसी बड़े ऑपरेशन के लिए ले जाने वाला था लेकिन अचानक हुए विस्फोट ने उसका सारा प्लान नाकाम कर दिया।

SSP कोंडर ने एक बयान में कहा कि आरोपित का PGIMER चंडीगढ़ में मानसिक उपचार चल रहा था, जिसे दो साल पहले परिवार ने खत्म करवा दिया। SSP ने बताया कि पहले डॉक्टरों ने लगातार निगरानी की सलाह दी थी लेकिन कथित तौर पर उसकी हालत को नजरअंदाज किया गया।

मामले में दर्ज हुई FIR

ऑपइंडिया को मिली FIR कॉपी के अनुसार, 10 सितंबर 2025 को गश्त के दौरान पुलिस को सूचना मिली कि गुरप्रीत सिंह ने अपने घर में विस्फोटक सामग्री इकट्ठा की है। सुबह लगभग 5 या 6 बजे विस्फोटक बनाने की कोशिश में लगे गुरप्रीत सिंह से अचानक विस्फोट हो गया, जिसमें वह बुरी तरह से घायल हो गया और उसका घर भी तबाह हो गया।

पंजाब पुलिस ने दर्ज की FIR का स्क्रीनशॉट

FIR में यह भी लिखा कि उसी दिन शाम लगभग 4 बजे घर की सफाई करते हुए एक दूसरा विस्फोट हुआ, जिसमें उसका पिता जगतार सिंह भी घायल हो गया।

मामले में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम,1908 (संशोधन अधिनियम 2001) की धारा 3,4,5 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 287, 288, 326 ( F) के तहत FIR दर्ज की गई है।

SSP ने बताया कि बम निरोध टीमें घर को सुरक्षित घोषित करने से पहले उसकी तलाशी ले रही हैं। केमिकल के करण और गुरप्रीत के फोन से मिले डिजिटल सबूतों को भी फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।

मीडिया को निशाना बनाने के लिए ‘अदालती आदेश का इस्तेमाल’ कर रही सरकार: NewsLaundry ने कोर्ट के फैसले को भी बनाया प्रोपेगेंडा टूल, कंटेंट हटाने से जुड़ा है मामला

वामपंथी प्रोपेगेंडा संस्थान न्यूज़लॉन्ड्री ने 16 सितंबर 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें कहा गया था कि सरकार उद्योगपति अडानी की आलोचना करने वाले पत्रकारों और मंचों को चुप कराने के लिए “अदालती आदेश का इस्तेमाल” कर रही है। धन्या राजेंद्रन से जुड़े वामपंथी मीडियाकर्मियों ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में दखलंदाजी का आरोप सरकार पर लगाया।

दिल्ली की कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि उद्योगपति गौतम अडानी और अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के खिलाफ बिना सबूत वाले निराधार कंटेट और आर्टिकल को तमाम प्लेटफॉर्म्स से हटाने का निर्देश दिया था। लेकिन प्रोपेगेंडा पत्रकारों ने जोर देकर कहा कि सरकार अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रही है। जबकि आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि चूँकि प्रकाशक सत्र न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने में विफल रहे, इसलिए सरकार द्वारा सामग्री हटाने का नोटिस जारी किया गया।

कोर्ट ने मानहानिकारक सामग्री हटाने का निर्देश दिया

कोर्ट के आदेश की वास्तविकता उससे अलग है, जो दिखाई जा रही है। दिल्ली की रोहिणी कोर्ट के जस्टिस अनुज कुमार सिंह ने अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम परंजॉय गुहा ठाकुरता एवं अन्य के मामले में अंतरिम आदेश दिया था। इसमें पत्रकारों परंजॉय गुहा ठाकुरता, रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, आयुष जोशी और अन्य को अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) के खिलाफ मानहानि वाली सामग्री प्रकाशित करने से रोक दिया गया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट, लेखों और वीडियो से ‘गलत, असत्यापित और प्रथम दृष्टया मानहानिकारक’ सामग्री हटाई जानी चाहिए। यदि तुरंत हटाना संभव न हो, तो 5 दिनों के भीतर सोशल मीडिया से कंटेंट, वीडियो, ट्वीट वगैरह हटाना सुनिश्चित करें। सरकार ने 16 सितंबर को मानहानिकारक सामग्री को हटाने का आदेश तभी जारी किया जब सोशल मीडिया पर इसे 5 दिन में हटाने के अदालती आदेश के बावजूद नहीं हटाया गया।

अदालत के समक्ष अडानी की दलीलें

अडानी एंटरप्राइजेज ने अपनी याचिका में दलील दी कि कुछ पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के एक नेटवर्क ने कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया है, निवेशकों को अरबों का नुकसान हुआ है और भारत के बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं में बाधा डाली है। इसने आगे कहा गया कि ये प्रतिवादी “भारत-विरोधी हितों” से जुड़े हुए थे और घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों परियोजनाओं में बाधा डाल रहे हैं।

न्यायालय ने अपने आदेश में पाया कि AEL ने प्रथम दृष्टया निषेधाज्ञा का मामला बनाया था। हालाँकि न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि असत्यापित, निराधार और मानहानिकारक रिपोर्टिंग जारी नहीं रह सकती।

राजेंद्रन ने एक और पोस्ट डाल कर वकील इंदिरा जयसिंह के उस बयान को दोहराया, जिसमें उन्होंने कहा था, “प्रतिवादियों ने आदेश के विरुद्ध अपील दायर की है, जिसका उन्हें अधिकार है। न्यायालय जानता है कि अपने आदेशों का क्रियान्वयन कैसे करना है, इसलिए उन्हें मंत्रालय की आवश्यकता नहीं है। मंत्रालय न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल रहा है।”

वास्तव में जब कोई कोर्ट कोई आदेश जारी करता है, तो सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इसकी जानकारी देती है और इसका पालन करने के लिए बाध्य करती है। इस मामले में भी यही हुआ। कोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिए मंत्रालय ने संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मानहानिकारक सामग्री हटाने का निर्देश दिया। ये कहना गलत होगा कि मंत्रालय कोर्ट के आदेश का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए ‘उपयोग’ कर रहा है।

असीम मुनीर ने आंतकियों का नमाज-ए-जनाजा पढ़ने भेजे थे फौजी: जैश कमांडर ने पाकिस्तान को किया बेपर्दा, बोला- दिल्ली और मुंबई हमलों में मसूद अजहर का हाथ

जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी का एक और कबूलनामा सामने आया है। मसूद इलियास ने कबूल किया कि दिल्ली में संसद भवन हमले और मुंबई में 26/11 आतंकी हमले कराने के पीछे मसूद अजहर का ही हाथ है। इससे पाकिस्तान की आतंकी को पनाह ना देने वाले दावे की भी पोल खुल गई है।

मसूद इलियास कश्मीरी मे एक भड़काऊ भाषण देते हुए बताया कि पाँच साल बाद भारत की जेल से छूटने के बाद मसूद अजहर ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान में रहकर आतंकी हमले की साजिश रची। कश्मीरी ने अजहर के ठिकाने का भी खुलासा करते हुए कहा कि उसका आतंकी बेस बालाकोट में था, जिसे भारत ने 2019 की एयरस्ट्राइक में निशाना बनाया।

वीडियो में मसूद इलियास कश्मीरी ने कहा, “दिल्ली की तिहाड़ जेल को तोड़कर अमीर-उल-मुजाहिदीन मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान आते है। उनके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए बालाकोट की मिट्टी ही उनको ठिकाना देती है।”

उसने आगे कहा, “बालाकोट की मिट्टी और यहाँ का जर्रा-जर्रा, उसके हम अहसानमंद हैं। इस मिट्टी का किरदार कयामत तक याद रखा जाता है। दिल्ली और मुंबई को दहलाने वाले मौलाना मसूद अजहर को ये धरती ही पनाह देती है।”

पाकिस्तान में आतंकी संगठन का ‘मिशन मुस्तफा’ कार्यक्रम

पाकिस्तान हमेशा से आतंकी संगठनों को पनाह देता रहा है, इसके सबूत भी कई बार सामने आए हैं। अबकी बार साफ हो गया जब आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने पाकिस्तान के बालाकोट में अपना मिशन ‘मुस्तफा कार्यक्रम’ आयोजित किया, जिसमें भारत के मोस्ट वॉन्टेड आतंकी मसूद अजहर की जमकर तारीफ की।

इस कार्यक्रम में ही जैश के कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी ने भड़काऊ भाषण देते हुए भारत पर किए गए आतंकी हमलों का जश्न मनाया। इस दौरान कश्मीरी ने कहा, “हमने आतंक को अपनाकर पाकिस्तान की सीमाओं की रक्षा के लिए दिल्ली, काबुल और कंधार से जंग लड़ी।”

पाकिस्तानी फौज के आतंकी संगठन से रिश्ते

जैश कमांडर मसूद इलियास ने पाकिस्तानी फौज की पोल खोलते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर मे मारे आतंकियों के जनाजे मं शामिल होने का आदेश पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर ने अपने जनरलों को दिया था।

इस जनाजे के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। भारत ने इन आतंकियों को सम्मान के साथ जनाजा देने के लिए पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की थी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद डरे आतंकी

जैश कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी ने बयान में यह भी कहा कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों के बीच डर का माहौल है। कश्मीरी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद कुछ लोगों ने जिहाद से मुँह मोड़ लिया है लेकिन हम उसे दोबारा जिंदा करेंगे।”

कश्मीरी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद कुछ लोगों ने जिहाद से मुँह मोड़ लिया है लेकिन हम उसे दोबारा जिंदा करेंगे।”

ऑपरेशन सिंदूर में मारा गया मसूद अजहर का परिवार

इससे पहले भी जैश कमांडर मसूद इलियास का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उसने कबूल किया कि ऑपरेशन सिंदूर में आतंकी मसूद अजहर का परिवार मारा गया। वीडियो में मसूद इलियास ने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुए बहावलपुर हुए हवाई हमले में जैश का हेडक्वार्टर तबाह हो गया, इसमें मसूद अजहर के परिवार के भी टुकड़े-टुकड़े हो गए।

जिस वायनाड ने राहुल गाँधी को दी ‘शरण’, जिसने प्रियंका वाड्रा को लोकसभा पहुँचाया, वहाँ एक-एक कर खुद की ही जान क्यों ले रहे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता?

केरल के वायनाड जिले में कॉन्ग्रेस पार्टी इन दिनों भारी संकट से जूझ रही है। यह वही इलाका है जहाँ पहले राहुल गाँधी सांसद थे और उन्होंने दो बार यहाँ से चुनाव जीता। बाद में उन्होंने सीट छोड़ दी और अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा को यहाँ से सांसद बनवाया। लेकिन अब वायनाड कॉन्ग्रेस का गढ़ कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता लगातार आत्महत्या कर रहे हैं या सुसाइड की कोशिश कर रहे हैं।

इन सब के पीछे जो वजह हैं, वो हैं- पार्टी के अंदरूनी कलह, भ्रष्टाचार, कर्ज के जाल और वादाखिलाफी। कई कार्यकर्ताओं ने कॉन्ग्रेस पार्टी के काम के लिए करोड़ों का लोन लिया था, पार्टी ने वादा किया था कि पैसे लौटाने में मदद करेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कर्ज चुकाने के दबाव में पिता-पुत्र ने जान दे दी, अब बहू ने भी सुसाइड नोट लिखकर पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हुए जान देने की कोशिश की।

कुछ दिन पहले ही एक नेता को फर्जी केस में फँसाया गया, जिसके बाद दूसरे नेता ने जान दे दी। ये घटनाएँ कॉन्ग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही हैं। केरल की वायनाड लोकसभा सीट से राहुल-प्रियंका को लगातार चुनाव जिताने के चक्कर में कार्यकर्ता कर्ज के बोझ तले दब गए और अब जान देने को मजबूर हो रहे हैं। पार्टी ने कर्ज चुकाने का वादा किया था, लेकिन पिता-पुत्र की मौत के बाद भी मदद नहीं की। कर्जदार पैसे माँग रहे थे, तो बहू ने सुसाइड नोट में कॉन्ग्रेस को कातिल बताया। ये सब पार्टी की खराब व्यवस्था की वजह से हो रहा है। प्रियंका गाँधी ने हाल ही में वायनाड का दौरा किया, लेकिन इन मुद्दों पर चुप्पी साधे रही।

वायनाड में कॉन्ग्रेस ने कराया जॉब स्कैम, बेरोजगारों से की ठगी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली बड़ी घटना दिसंबर 2024 की है, जब पूर्व डिस्ट्रिक्ट कॉन्ग्रेस कमिटी (डीसीसी) ट्रेजरर एनएम विजयन और उनके बेटे जिजेश ने आत्महत्या कर ली। विजयन लंबे समय से कॉन्ग्रेस के वफादार कार्यकर्ता थे। उन्होंने पार्टी के काम के लिए करीब 2.5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था।

ये कर्ज सुल्तान बाथेरी कोऑपरेटिव बैंक में नौकरियों के नाम पर लिया गया था। उन पर पार्टी के जिलाध्यक्ष एनडी अप्पाचन, पूर्व डीसीसी प्रेसिडेंट आईसी बालाकृष्णन एमएलए, पूर्व ट्रेजरर केके गोपीनाथन मास्टर और अन्य ने घोटाला करने के लिए दबाव डाला। उनसे जॉब के बदले कैश स्कैम कराया। लोग नौकरी के लिए लाखों रुपये देते थे, लेकिन नौकरी नहीं मिली। स्कैम फेल हो गया तो सारा बोझ विजयन पर आ गया।

विजयन ने अपनी संपत्ति गिरवी रख दी, लेकिन कर्ज चुकाने के लिए पैसे नहीं बचे। पार्टी ने वादा किया था कि कर्ज की जिम्मेदारी लेगी, लेकिन सिर्फ थोड़ी मदद की। केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (केजेपीसीसी) ने कहा कि वो बाइंडिंग एग्रीमेंट नहीं था, सिर्फ मानवीय मदद है। विजयन ने 25 दिसंबर 2024 को जहर खाकर सुसाइड की कोशिश की, उनके बेटे जिजेश ने भी ऐसा ही किया। दोनों 27 दिसंबर को मर गए।

विजयन ने अपने सुसाइड नोट में सीधे अप्पाचन, बालाकृष्णन और गोपीनाथन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने लिखा कि इन नेताओं ने उन्हें फँसाया और अब मदद नहीं कर रहे। परिवार का कहना है कि विजयन ने पार्टी के लिए सब कुछ किया, लेकिन बदले में धोखा मिला।

पुलिस ने सुसाइड नोट के आधार पर एमएलए बालाकृष्णन और तीन अन्य पर एबेटमेंट टू सुसाइड का केस दर्ज किया। लेकिन पार्टी ने इन नेताओं को अभी तक कोई सजा नहीं दी। परिवार आज भी कर्ज के बोझ तले दबा है। विजयन के बेटे ने कहा कि पिता ने पार्टी को बचाने के लिए खुद को झोंक दिया, लेकिन पार्टी ने पीठ दिखा दी। ये केस दिखाता है कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी के अंदर के भ्रष्टाचार ने विजयन और उनके बेटे की जान ले ली।

बदनामी से परेशान नेता को देनी पड़ी जान

दूसरी घटना 12 सितंबर 2025 की है, जिसमें मुल्लानकोली पंचायत सदस्य जोस नेलेडम ने आत्महत्या कर ली। जोस कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेता थे और मुल्लानकोली ग्राम पंचायत के वॉर्ड मेंबर थे। उनकी मौत पार्टी के अंदरूनी कलह की वजह से हुई।

दरअसल, कुछ दिन पहले जुलाई में एक डेवलपमेंट सेमिनार में डीसीसी प्रेसिडेंट अप्पाचन पर हमला हुआ था। ये फैक्शनल फाइट का नतीजा था। उसके बाद कनत्तुमालयिल थंकाचन, जो मारक्काडावु के लोकल कॉन्ग्रेस नेता हैं, को अवैध शराब और कंट्री बॉम्ब्स के केस में गिरफ्तार किया गया। थंकाचन 17 दिनों तक जेल में रहे। बाद में पुलिस ने कोर्ट में कहा कि केस फर्जी था और थंकाचन को रिहा कर दिया।

थंकाचन ने आरोप लगाया कि अप्पाचन गुट ने उन्हें फंसाया, जिसमें जोस भी शामिल थे। इसके बाद जोस पर साइबर अटैक शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम किया गया, अपमानित किया गया। जोस ने एक वीडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी ने उनका साथ नहीं दिया। सुसाइड से पहले जोस ने जहर खाया, कलाई काटी और तालाब में कूद गए। पड़ोसी ने उन्हें पाया और हॉस्पिटल ले गए, लेकिन रास्ते में ही मौत हो गई।

सुसाइड नोट में जोस ने लिखा, “पार्टी ने संकट में साथ नहीं दिया, साइबर अटैक ने तोड़ दिया।” डीसीसी प्रेसिडेंट अप्पाचन ने माना कि पार्टी के अंदर ताकतें जिम्मेदार हैं। लेकिन पार्टी ने इसे कवर-अप करने की कोशिश की। मलयाला मनोरमा और मथ्रुभूमि जैसे अखबारों में जोस के नोट को छिपाया गया। ये सबकुछ प्रियंका गाँधी के वायनाड दौरे के समय हुआ, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी।

विजयन की परेशान बहू ने दी जान देने की कोशिश

वायनाड की तीसरी घटना 13 सितंबर 2025 की है, जब एनएम विजयन की बहू पद्मजा ने सुसाइड की कोशिश की। पद्मजा 2024 में आत्महत्या कर लेने वाले विजयन की बहू हैं। उन्हें उनका बेटा प्राइवेट हॉस्पिटल ले गया।

सुसाइड नोट में पद्मजा ने लिखा, “किलर कॉन्ग्रेस, यहाँ एक और विक्टिम।” उन्होंने कहा कि पार्टी ने कर्ज नहीं चुकाया, जिसकी वजह से परिवार टूट रहा है। पद्मजा ने 12 सितंबर को मीडिया से कहा था कि पार्टी ने 30 जून 2025 तक 2.5 करोड़ का कर्ज चुकाने का वादा किया था, लेकिन सिर्फ 20 लाख दिए।

पद्मजा ने एमएलए टी सिद्दीक पर भी आरोप लगाया कि वो लिखित वादों को पूरा नहीं कर रहे। अस्पताल बिल तक के पैसे नहीं दे रहे। प्रियंका गाँधी ने परिवार को सपोर्ट का आश्वासन दिया था, लेकिन 13 सितंबर को वायनाड विजिट के दौरान भी नहीं मिलीं। पद्मजा ने पूछा, “क्या हमें मरना पड़ेगा तभी कॉन्ग्रेस को आँखें खुलेगी?”

अस्पताल में पद्मजा (फोटो साभार: Deshabhimani)

पद्मजा ने एक ऑडियो क्लिप जारी की, जिसमें थिरुवनचूर राधाकृष्णन कह रहे हैं कि पार्टी को कर्ज चुकाना चाहिए था। लेकिन पार्टी कह रही है कि कुछ कर्ज सेटल हो गया। ये सुसाइड अटेम्प्ट ने वायनाड में विरोध प्रदर्शन भड़का दिए।

आत्महत्या के कम से कम 5 मामले, लेकिन राहुल-प्रियंका ने साधी चुप्पी

वायनाड में कॉन्ग्रेस का ये संकट नया नहीं है। पिछले दशक में कम से कम पाँच कार्यकर्ताओं ने आत्महत्या की है। 2015 में पीवी जॉन, मनांथावादी ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी के प्रेसिडेंट ने पार्टी ऑफिस में ही फाँसी लगा ली थी। वो लोकल बॉडी इलेक्शन में हार के बाद अपमानित हो रहे थे। इसके अलावा साल 2023 में राजेंद्रन नायर ने सुसाइड किया, क्योंकि कॉन्ग्रेस कंट्रोल्ड प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक पुलप्पल्ली में उनके लैंड डॉक्यूमेंट्स का दुरुपयोग करके लोन लिया गया। पूर्व डीसीसी प्रेसिडेंट केएल पौलोस और जनरल सेक्रेटरी केके अब्राहम पर केस हैं। ये सभी घटनाएँ फैक्शनल फाइट, भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी से जुड़ी हैं।

पीवी जॉन, NM विजयन और बेटा जितेश (फोटो साभार: OnManorama)

प्रियंका बदलना चाहती हैं नेता, इतनी जान लेने बाद

प्रियंका गाँधी ने वायनाड की हालत पर नाराजगी जताई है। उन्होंने केपीसीसी से रिपोर्ट माँगी और डिस्ट्रिक्ट लीडरशिप चेंज की माँग की। अप्पाचन को हटाने की बात चल रही है। हटाए जाने वाले नामों में टीजे आइजैक और केई विनयान शामिल हैं। प्रियंका ने कहा कि मंडक्कई-चूरालमाला लैंडस्लाइड विक्टिम्स के लिए हाउसिंग प्रोजेक्ट में देरी हो रही है, क्योंकि डीसीसी साथ नहीं दे रही है। वो फंड्स जुटाने को तैयार थीं, लेकिन लोकल लीडर्स ने काम नहीं किया।

अंडरवर्ल्ड गैंग जैसी हो गई है कॉन्ग्रेस

विपक्षी सीपीएम कह रहा है कि कॉन्ग्रेस अंडरवर्ल्ड गैंग जैसी हो गई है। सीपीएम लीडर एमवी जयराजन ने विजयन परिवार का कर्ज चुकाने का ऐलान किया। मंत्री वी शिवंकुट्टा ने कहा कि कॉन्ग्रेस मर्डर, सुसाइड एबेटमेंट और वायलेंस का प्रतीक है।

इन सबके बीच, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता निराश हैं। एक नेता ने कहा कि पार्टी ने अपना मास बेस खो दिया। केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) पंचायत इलेक्शन की तैयारी कर रहा है, लेकिन ये सुसाइड्स ने पार्टी को पैरालाइज्ड कर दिया।

कॉन्ग्रेस को अब अपनी कार्यप्रणाली सुधारनी होगी। कार्यकर्ता जो पार्टी के लिए जान देते हैं, उन्हें धोखा नहीं मिलना चाहिए। वायनाड जैसे ट्रेडिशनल स्ट्रॉन्गहोल्ड में ये संकट पार्टी की साख को बर्बाद कर रहा है। समाज को ऐसी पार्टी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए जो अपने ही लोगों को मार डालती है। ये समय है कि कॉन्ग्रेस आँखें खोले और सुधार करे, वरना वायनाड में उनका गढ़ ढह जाएगा।