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भारत-भूटान के बीच पहली रेलवे लाइन: कनेक्टिविटी से बढ़कर, रणनीति सोच और नेबरहुड फर्स्ट की नीति का बनेगा नया आयाम

भारत और भूटान ने ₹4,033 करोड़ की लागत से अपनी पहली सीमापार रेलवे परियोजना शुरू की है, जो बनारहाट–समत्से (20 किमी) और कोकराझार–गेलेफू (69 किमी) को जोड़ती है। इस पहल से भूटान को भारत के 1.5 लाख किलोमीटर लंबे रेलवे नेटवर्क तक पहुंच मिलेगी, जिससे व्यापार, संपर्क और रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

केंद्र सरकार की ओर से 29 सितंबर 2025 को भारत और भूटान के बीच एक रेलवे लाइन की ऐतिहासिक घोषणा की गई है। भारत और भूटान के बीच यह पहला सीमा पार रेलवे प्रोजेक्ट होगा। ये ‘मेक इन इंडिया’ पहल का एक हिस्सा है।

यूनियन मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि इस नए रेलवे लाइन की लागत 4033 करोड़ रुपए है। ये समत्से और गेलेफू औद्योगिक शहरों को जोड़ेगा। इस भारतीय रेल परियोजना से पश्चिम बंगाल के बनारहाट और असम के कोकराझार को भी जोड़ा जाएगा।

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने घोषणा की कि ये दो प्रोजेक्ट्स दो देशों के बीच रेल संपर्क की पहली श्रृंखला का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, “भारत और भूटान के बीच रेल संपर्क स्थापित करने को लेकर एक बड़ा नया कदम उठाया गया है।”

दो अहम साझेदारों के बीच महत्वपूर्ण पहल

भूटान के विदेश सचिव की नई दिल्ली यात्रा के दौरान एक औपचारिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए और इन परियोजनाओं के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछले वर्ष मार्च में भूटान यात्रा के दौरान तय किया गया था। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जानकारी दी, “कुल लंबाई लगभग 90 किलोमीटर है, जिसमें से 89 किलोमीटर का रेलवे नेटवर्क तैयार किया जाएगा।”

उन्होंने बताया, “भारत भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और भूटान का अधिकांश शुल्क-मुक्त व्यापार भारतीय बंदरगाहों के माध्यम से होता है। इसलिए भूटान की अर्थव्यवस्था के विकास और लोगों को वैश्विक नेटवर्क तक बेहतर पहुँच देने के लिए लोगों के पास एक अच्छी और निर्बाध रेल व्यवस्था होनी चाहिए। इसी वजह से इस परियोजना की शुरूआत की गई है।”

रेल संपर्क के माध्यम से भूटान को भारतीय रेलवे नेटवर्क के 1,50,000 किलोमीटर तक की पहुँच मिलेगी। बनारहाट-समत्से रेल लाइन 3 वर्षों में बनाई जाएगी, जबकि कोकराझार-गेलेफू रेल लिंक अगले 4 वर्षों में विकसित की जाएगी। ये रेलवे लाइनें विद्युत चालित वंदे भारत ट्रेनों के हिसाब से बनाई जाएँगी।

भारत सरकार इन रेलवे लाइनों को बिछाने का खर्च उठाएगी। साथ ही सभी ट्रेन कोच और इससे जुड़ी तकनीक भी देश में ही बनाई जाएगी। लगभग 69 किलोमीटर लंबी कोकराझार-गेलेफू लाइन पर ₹3,456 करोड़ की लागत से 6 स्टेशन, 2 वायाडक्ट, 29 बड़े पुल, 65 छोटे पुल, दो शेड, 1 फ्लाईओवर और 39 अंडरपास बनाए जाएँगे।

20 किलोमीटर लंबी बनारहाट-समतसे लाइन पर ₹577 करोड़ की लागत से दो स्टेशन, 25 पुल, एक बड़ा फ्लाईओवर, 24 छोटे फ्लाईओवर और 37 अंडरपास बनाए जाएँगे।

विक्रम मिस्री ने कहा, “जैसा कि आप सभी जानते हैं, भारत और भूटान के बीच असाधारण विश्वास, पारस्परिक सम्मान और समझ का संबंध है। यह संबंध सांस्कृतिक और सभ्यतागत जुड़ाव, लोगों के बीच गहरे संबंधों और हमारे साझा विकास और सुरक्षा हितों पर आधारित है। यह संबंध उच्चतम स्तर पर भी बेहतर संपर्क को दिखाते हैं।”

उन्होंने बताया, “ये रेल लिंक माल और यात्री परिवहन को बढ़ाने के लिए काफी अहम होंगे। इसी विशेष संबंध के संदर्भ में दोनों सरकारों ने बनारहाट-समत्से और कोकराझार-गेलेफू के बीच दो सीमापार रेल लिंक स्थापित करने पर सहमति जताई है। ये भूटान के साथ पहली रेल संपर्क परियोजनाएँ होंगी।”

मिस्री के अनुसार, भारतीय रेलवे मंत्रालय इन दोनों लिंक के भारतीय हिस्सों को वित्ती सहायता देगा, साथ ही भूटान के क्षेत्र में निर्माण के लिए 2024-2029 की 13वीं पंच-वर्षीय योजना के तहत भारत ₹10,000 करोड़ की सहायता देगा। दोनों लाइनों के भूटानी हिस्से की लंबाई दो किलोमीटर से थोड़ी अधिक है।

फोटो साभार-@AshwiniVaishnaw/X

मिस्री ने आगे कहा, ‘भारत और भूटान के रिश्ते असाधारण विश्वास, परस्पर सम्मान और समझ पर आधारित हैं। यह एक ऐसा रिश्ता है, जिसकी जड़ें सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत कड़ियों, लोगों से लोगों के बीच व्यापक रिश्तोों और हमारे साझा विकास एवं सामरिक हितों से जुड़ी हैं।’

भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक ने प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक प्राधिकरण के साथ गेलेफू को स्वतंत्र आर्थिक केंद्र के रूप में स्थापित किया है। भारत सरकार ने भी इस महत्वपूर्ण (फ्लैगशिप) परियोजना को अपना समर्थन प्रदान किया है, जिसका उद्देश्य भूटान और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच व्यापक वाणिज्यिक एवं अन्य प्रकार के रिश्तों को स्थापित एवं पोषित करना है।

भूटान को भी भारत के व्यापक रेल नेटवर्क तक पहुँच और उसके उपयोग की सुविधा प्राप्त होगी। इसके माध्यम से वह अपनी वस्तुओं के व्यापार को बढ़ाने में सक्षम हो सकेगा। इसके जरिये उसे पत्तनों तक पहुँच सुगम बनाने के साथ ही बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों तक अपने सामान पहुँचाने में सुविधा मिलेगी।

विकास के साथ साथ रणनीतिक सोच भी

भूटान भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, पर साथ ही भौगोलिक लिहाज से भी भारत के लिए ये देश और भी अधिक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है। यह देश भारत और चीन के बीच पूर्वी हिमालय में स्थित है और भारत के चार राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और सिक्किम के साथ 699 किलोमीटर की खुली सीमा साझा करता है।

इस लिहाज से भारत का अपने पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाना काफी जरूरी भी है। खासकर तब, जब चीन के साथ संबंधों में हाल ही में कुछ नरमी आई है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने यह आभास कराया है कि वैश्विक नेताओं पर आँख बंद कर भरोसा नहीं किया जा सकता और भरोसेमंद साझेदारियों पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं। ऐसे में यह रेलवे परियोजना एक ठोस कदम है।

भारत और चीन के बीच सीमा और नियंत्रण रेखा को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण अक्सर संघर्ष का कारण बनते रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी की झड़प और उससे पहले डोकलाम में ये संघर्ष पहले भी देखे जा चुके हैं।

चीन, भूटान और भारत के मुहाने पर त्रिकोणीय पड़ाव, डोकलाम, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पठार और घाटी है। नई रेल संपर्क भारत और भूटान के बीच रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत और भूटान डोकलाम को भूटान का क्षेत्र मानते हैं, जबकि चीन इसका विरोध करता है।

फोटो साभार- visionias.in

भारत और चीन की सेनाओं के बीच हाल के वर्षों की सबसे बड़ी सैन्य झड़प तब शुरू हुई जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने डोकलाम पठार पर सड़क निर्माण शुरू किया। इसे चीन अपने डोंगलांग प्रांत का हिस्सा मानता है। भारतीय सेना ने इसका विरोध किया और PLA ने वहाँ भारतीय सेना के एक पुराने बंकर को भी ध्वस्त कर दिया।

इस टकराव के जवाब में चीन ने सिक्किम के नाथू ला मार्ग से कैलाश-मानसरोवर की यात्रा को भी रोक दिया। दोनों देशों ने क्षेत्र में अपनी सैन्य तैनाती को बढ़ा दिया।

भारत ने ऊँचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। इससे रणनीतिक रूप से भारत बेहतर स्थिति में था। नई दिल्ली ने 16 जून से 28 अगस्त तक चले 73 दिनों के संघर्ष के बाद बीजिंग को पीछे हटने पर मजबूर किया। इस दौरान दोनो पक्षों के बीच कई बार हुई बातचीत भी शामिल थी।

सिक्किम, भूटान और तिब्बत का त्रिसंधि क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक और रक्षा दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि उस क्षेत्र में सड़क बन जाती, तो भारत को बड़ा नुकसान होता। यह भारत और भूटान के बीच संबंधों की अहमियत को चीन का मुकाबला करने के संदर्भ में दिखाता है।

मोदी सरकार की ‘पड़ोसी प्रथम नीति’ और पूर्वोत्तर भारत का विकास

सुरक्षा के अलावा भारत-भूटान रेल संपर्क मोदी सरकार की ‘पड़ोसी प्रथम नीति’ को भी सुदृढ़ करता है। यह नीति 2008 में ही प्रस्तावित हुई थी, लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार बनने के बाद इसे प्रमुखता मिली। इसका उद्देश्य भारत के पड़ोसी देशों जैसे श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और भूटान के साथ संबंधों को बेहतर बनाना है।

इस नीति का लक्ष्य व्यापार और व्यवसाय को बढ़ाना है। साथ ही क्षेत्र में भौतिक, डिजिटल और मानवीय संपर्क को मजबूत करना है। हालाँकि इसके साथ ही यह भारत की क्षेत्रीय शक्ति को बढ़ाने और बाहरी प्रभावों को चुनौती देने के लिए आपसी निर्भरता बढ़ाने की भी कोशिश करता है।

भारत अपने पड़ोसियों के साथ मिलकर काम करके दक्षिण-पूर्व एशिया में एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर सकता है। भूटान के साथ विकास इसी दिशा में एक कदम है। इसके अलावा भारत का वैश्विक दक्षिण (Global South) के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आगे बढ़ाने का नेतृत्व भी पड़ोसी देशों के साथ सहयोग से मजबूत होता है।

चीन ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी मौजूदगी को काफी बढ़ाया है और नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में भारी निवेश किया है। इसलिए भारत के लिए अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को मजबूत करना भी कापी जरूरी हो गया है।

साथ ही, यह नीति भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में विकास और प्रगति के लिहाज से काम करती है। यह क्षेत्र लंबे समय तक कॉन्ग्रेस की सरकारों द्वारा उपेक्षित रहा है और यहाँ पर बुनियादी ढाँचे की भी कमी रही है।

पूर्वोत्तर भारत की विकास गाथा असल में मोदी सरकार के शासन में आने के बाद ही शुरू हुई। सुरक्षा का संबंध अंदरूनी और क्षेत्रीय संपर्कों से जुड़ा होता है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर ने न केवल स्थानीय जनसंख्या को लाभ पहुँचाया पर साथ ही उस क्षेत्र में विकास के नए आयाम स्थापित किए जिसे पहले की सरकारों ने लंबे समय तक अनदेखा किया था।

2014 से सरकार पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। पीएम मोदी का ‘संपर्क से विकास’ एजेंडा खास तौर पर रेलवे को सामाजिक-आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिहाज से एक अहम कड़ी के रूप में आगे बढ़ा रहा है।

मिजोरम में बैराबी- सैरांग लाइन, नागालैंड में दीमापुर-जुबजा लाइन, सिक्किम में सेवोक- रंगपो परियोजना और असम में अरुणाचल प्रदेश से जोड़ने वाला इंजीनियरिंग चमत्कार बोगीबील पुल जैसी प्रमुख रेलवे परियोजनाएँ भारत के सात बहनों और एक भाई को ठोस प्रगति की ओर ले गई हैं। यह सब केंद्र सरकार की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और आधारभूत संरचना आधारित विकास पर केंद्रित दृष्टिकोण का परिणाम है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जिसमें सड़कों, दूरस्थ क्षेत्रों की संरचना, बांधों और राष्ट्रीय राजमार्गों का विकास शामिल है, जिससे देश के बाकी हिस्सों से संपर्क बेहतर हुआ है और सुरक्षा को भी मजबूती मिली है।

इसी प्रकार, भारत और भूटान को जोड़ने वाला रेलवे नेटवर्क न केवल दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाएगा और आधारभूत संरचना को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि यह रणनीतिक और भू-राजनीतिक सहयोग को भी नई दिशा दे सकता है।

भारत की क्षेत्रीय शक्ति के रूप में पहचान

भारत और भूटान के बीच रेलवे संपर्क की घोषणा देश की विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि ही नहीं, बल्कि एक चतुराईपूर्ण भू-राजनीतिक कदम भी है जो भारत को एक आत्मविश्वास से ओत-प्रोत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है। साथ ही यह पूर्वोत्तर भारत के विकास का मार्ग भी प्रशस्त करता है, जो मोदी सरकार की विकास योजना का एक प्रमुख हिस्सा है।

इसके अलावा, नई दिल्ली की ऊर्जा आवश्यकताओं को भूटान के विशाल जलविद्युत संसाधनों से पूरा किया जा सकता है।

भूटान मुख्यतः एक बौद्ध राष्ट्र है। भारत बौद्ध धर्म की जन्मभूमि है और यहाँ हिंदू बहुलता के साथ एक जीवंत बौद्ध समुदाय भी मौजूद है। यह सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करने वाला एक अन्य सूत्र बन सकता है।

ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में रुकमा राठौर ने लिखी है। मूल कॉपी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

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Rukma Rathore
Rukma Rathore
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