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धर्म बदलो, तभी मिलेगी जमीन: बलरामपुर में डेमोग्राफी बदलने की साजिश में सामने आया पूर्व सपा सांसद रिजवान जहीर का नाम, पीड़ितों ने किया- घुसपैठ, धर्मांतरण और लैंड जिहाद पर खुलासा

विश्व हिंदू रक्षा परिषद ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में डेमोग्राफी बदलने की बड़ी साजिश का भंडाफोड़ किया है। परिषद का कहना है कि इस साजिश के पीछे समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद रिजवान जहीर का हाथ है।

लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय ने आरोप लगाए कि रिजवान जहीर के इशारे पर उसके गुर्गे सईद अहमद और तौकीर अहमद, छांगुर गैंग के साथ मिलकर हिंदुओं की जमीन पर कब्जा, अवैध धर्मांतरण और ‘लैंड जिहाद’ जैसे कृत्य करवा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हर महीने हजारों बच्चियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा है। अंबेडकरनगर को इसका ज्वलंत उदाहरण बताते हुए उन्होंने इस पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। छांगुर पीर उर्फ जलालुद्दीन, जिसे इस साजिश का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, फिलहाल जेल में है। लेकिन उसके गैंग की करतूतें लगातार उजागर हो रही हैं।

बलरामपुर के मुन्ना नाम के एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि उसे सपा सांसद रिजवान के लोगों ने प्रताड़ित किया और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी कर इलाके में डेमोग्राफी बदलने की कोशिश की। मुन्ना ने कहा कि करोड़ों की संपत्ति फर्जी तरीके से अर्जित की गई है और अब हिंदू महिलाओं की जमीनों पर अवैध कब्जा कर उन पर जमीन के बदले धर्म परिवर्तन का दबाव दिया जा रहा है।

इस दौरान बलरामपुर निवासी जबीउल्ला ने दावा किया कि सपा शासनकाल में रिजवान जहीर के गुर्गे सईद अहमद और तौकीर अहमद नेपाल बॉर्डर से मुस्लिम परिवारों को बसाते थे। यहाँ हिंदुओं की जमीनों पर कब्जा कर अवैध धर्मांतरण भी कराया गया।

वहीं, झारखंड से आई एक महिला ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी को पहले दोस्ती कर फँसाया गया। बाद में बहला-फुसलाकर बलरामपुर लाया गया और वहाँ से बंगाल ले जाकर जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया। महिला ने कहा कि आरोपित पैसा देकर पुलिस को चुप करा रहा है।

बलरामपुर, जो नेपाल सीमा से सटा इलाका है, वहाँ पहले भी डेमोग्राफी बदलने की कोशिशों का खुलासा हो चुका है। अब धीरे-धीरे इस साजिश के शिकार लोग सामने आकर अपनी बात रख रहे हैं। विश्व हिंदू रक्षा परिषद का दावा है कि यह सिर्फ एक मामला नहीं है, बल्कि सुनियोजित तरीके से कई हिंदू परिवारों को निशाना बनाकर उनकी जमीनों और आस्था पर हमला किया जा रहा है।

भारत को लेकर फिर झूठ फैला रहा था ट्रंप का ‘तोता’ पीटर नवारो, X ने किया भंडाफोड़ तो भड़का: पहले ‘ब्राह्मणों’ पर उगल रहा था जहर, अब ‘एलन मस्क’ के पीछे पड़ा

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ एक मजबूत रिश्ते की बात की। वहीं, दूसरी तरह अमेरिकी सलाहकार पीटर नवारो का भारत-रूस से तेल खरीदने का आरोप लगातार जारी है। अब इन झूठे आरोपों को X (पहले ट्विटर) ने फैक्ट-चेक किया है और बताया कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है। भारत का रूस से तेल खरीदना मुनाफा नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाना है।

ये सच्चाई पीटर नवारो सहन नहीं कर पाए और एलन मस्क पर आरोप लगाते हुए कह दिया कि प्रचार करना बंद करो और कम्युनिटी नोट को ‘क्राप नोट’ कहकर खारिज कर दिया।

पीटर नवारो का आरोप

पीटर नवारो ने X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया कि भारत रूस से तेल ‘सिर्फ मुनाफे के लिए’ खरीदता है और इससे रूस को युद्ध में मदद मिलती है। इसके अलावा पीटर नवारो ने यह भी कहा कि भारत के टैरिफ लगाने से इसका असर अमेरिकी नौकरियों और टैक्सपेयर्स पर पड़ रहा है।

मस्क का फैक्ट-चेक

पीटर नवारो के इस पोस्ट को X ने कम्युनिटी नोट के जरिए फैक्ट-चेक किया। इस नोट में साफ तौर पर कहा गया कि भारत का रूस से तेल खरीदना उसकी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, ना कि सिर्फ मुनाफे के लिए। इसके अलावा, नोट में यह भी कहा गया कि अमेरिका खुद भी रूस से कुछ सामान खरीदता है, जिसे एक ‘दोहरा मापदंड’ माना गया।

फैक्ट चेक से पीटर नवारो भड़का

फैक्ट-चेक से नाराज पीटर नवारो ने मस्क पर आरोप लगाया कि वह ‘प्रचार’ को प्लेटफॉर्म पर बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने इस कम्युनिटी नोट को ‘क्राप नोट’ कहकर खारिज किया और फिर भारत पर आरोपों की झड़ी लगा दी। पीटर नवारो ने कहा, “भारत रूस से तेल सिर्फ मुनाफे के लिए खरीदता है। रूस-यूक्रेन में जब युद्ध जारी नहीं था, तब भारत भी रूस से तेल नहीं खरीदता था। भारत सरकार की स्पिन मशीनें भी तेजी से आगे बढ़ रही है। यूक्रेनियों को मारना बंद करों, अमेरिकी लोगों की नौकरियाँ छीननी बंद करो।”

भारत का पलटवार

भारत ने पीटर नवारो के आरोपों को सीधे तौर पर खारिज किया और कहा कि ये बयान पूरी तरह गलत और भ्रामक हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते एक ‘विशेष साझेदारी’ पर आधारित हैं और भारत इन झूठे आरोपों का जवाब नहीं देगा।

ट्रंप-मोदी का दोस्ताना

जब ट्रंप खुद भारत को अपना ‘दोस्त’ और भारत-अमेरिका रिश्तों को ‘विशेष‘ बता चुका हैं तो पीटर नवारो की ये बयानबाजी समझ से बाहर लगती है। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को दोस्त बताते हुए उनके साथ अपने रिश्तों को काफी मजबूत बताया था, लेकिन पीटर नवारो ने अपनी बयानबाजी से इस रिश्ते पर सवाल उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

पीटर नवारो की कड़ी आलोचना

पीटर नवारो ने भारत के खिलाफ न सिर्फ राजनीतिक हमले किए हैं, बल्कि कभी-कभी तो जातिवादी टिप्पणियाँ भी की हैं। पीटर नवारों ने आरोप लगाया था कि रूस से भारत जो तेल खरीदता है उसका सबसे ज्यादा लाभ और मुनाफा ब्राह्मण लेते हैं। इस बेहुदा बयान को भारत ने पूरी तरह से खारिज किया।

पीटर नवारो के बयान यह भी उजागर करते हैं कि अमेरिका का रवैया भारत के प्रति कहीं न कहीं दोहरे मापदंडों से भरा हुआ है। जब अमेरिका खुद रूस से कुछ वस्तुएँ खरीद रहा है तो भारत के खिलाफ इतने तीखे बयान क्यों? यह सवाल आज भी खड़ा है।

पीटर नवारो का ये लगातार हमला भारत के खिलाफ सिर्फ एकतरफा और दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भारत और अमेरिका के रिश्तों को और भी तनावपूर्ण बना सकता है। ट्रंप का भारत के प्रति दोस्ताना रुख और पीटर नवारो की लगातार आलोचना, यह दोनों ही अलग-अलग चेहरे हैं।

दूध-आटा-चावल से टीवी-AC तक, जानिए कितना बचेगा अब आपका पैसा: मोदी सरकार की वेबसाइट पर खुद चेक करिए GST 2.0 के फायदे

देश में GST को लागू हुए 8 साल हो गए और अब इसमें बड़े बदलाव किए गए हैं। GST काउंसिल ने पुराने चार स्लैब (5%, 12%, 18% और 28%) को खत्म करके इसे सिर्फ 5% और 18% की दरों में बदल दिया है। लग्जरी और तंबाकू, पान मसाला और सॉफ्ट ड्रिंक्स जैसी हानिकारक वस्तुओं पर 40% का अतिरिक्त टैक्स लगाया गया है। GST की नई दरें 22 सितंबर 2025 से लागू होंगी।

इस फैसले से आम लोगों को सबसे ज्यादा राहत रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर मिलेगी। उदाहरण के लिए, दूध, ब्रेड, छेना और पनीर जैसे उत्पादों पर अब GST शून्य कर दिया गया है।

साबुन, शैंपू, टूथपेस्ट और टूथब्रश जैसी घरेलू चीजों पर सिर्फ 5% टैक्स लगेगा। पहले 12% और 18% GST वाले कई पैकेज्ड फूड आइटम जैसे नमकीन, भुजिया, चॉकलेट, पास्ता और कॉफी पर अब केवल 5% टैक्स लगेगा। वहीं, टीवी (32 इंच तक), एसी और डिशवॉशर जैसी कंज्यूमर ड्यूरेबल वस्तुओं पर टैक्स 28% से घटाकर 18% कर दिया गया है।

सरकार का दावा है कि यह ‘नेक्स्ट-जेन जीएसटी’ परिवारों को सीधे बचत देगा। इसी को समझाने के लिए सरकार ने एक खास वेबसाइट www.savingswithgst.in लॉन्च की है। इस वेबसाइट पर जाकर लोग किसी भी उत्पाद की पुरानी कीमत और नई कीमत देख सकते हैं। यहाँ ‘बेस प्राइस’, ‘वैट के साथ कीमत’ और ‘नेक्स्ट-जेन जीएसटी कीमत’, तीनों कैटेगरी दिखाई जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर, अगर आप दूध को कार्ट में जोड़ते हैं तो पहले 60 रुपए प्रति लीटर की कीमत वैट के साथ 63.6 रुपए  दिखेगी, जबकि नए GST के बाद वही दूध 60 रुपए का ही मिलेगा।

savingwithgst.in से स्क्रीनशॉट

इसी तरह उपभोक्ता अलग-अलग कैटेगरी, जैसे फूड, स्नैक्स, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और किचन आइटम्स की कीमतें को देख कर पता लगा सकते हैं कि उन्हें कितनी बचत हो रही है।

घरेलू सामान से होती है बड़ी बचत

घरेलू सामान पर GST लागू होने के बाद बचत और भी बढ़ गई है। उदाहरण के लिए, एक कॉटन गद्दा जो वैट में 1,536 रुपए का मिलता था, अब GST में 1,416 रुपए का हो गया है। वहीं टूथपेस्ट की कीमत 38.1 रुपए से घटकर 31.5 रुपए हो गई है।

रोजमर्रा की चीजों में भी अंतर साफ दिख रहा है। एक लीटर डिटर्जेंट, जो पहले वैट में 281.6 रुपए का मिलता था, अब GST में 259.6 रुपए में मिल रहा है। यहाँ तक कि बाँस का फर्नीचर भी 1,230 रुपए से घटकर 1,050 रुपए हो गया है।

savingwithgst.in के माध्यम से स्क्रीनशॉट

कुल मिलाकर, घरेलू सामान की पूरी टोकरी पर वैट टैक्स 635.7 रुपए था, जो GST में घटकर 307.1 रुपए रह गया है। यानी उपभोक्ताओं को लगभग 328.6 रुपए की सीधी बचत हो रही है।

मध्यम वर्ग के लिए एक पारदर्शी पहल

सरकार savingswithgst.in के जरिए उपभोक्ताओं से सीधे जुड़ने की कोशिश कर रही है। यह इंटरएक्टिव प्लेटफॉर्म न सिर्फ नए रेट दिखाता है बल्कि लोगों में यह भरोसा भी पैदा करता है कि नया GST सिस्टम आम जनता की मदद के लिए बनाया गया है।

खाद्य पदार्थों, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसोई और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स पर कीमतें कम होने से परिवारों पर आर्थिक बोझ घटेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम आने वाले त्योहारों के सीजन में रिटेल बिक्री को भी बड़ा बढ़ावा दे सकता है।

मलबे में दबी हुई हैं औरतें क्योंकि इस्लाम में गैर-मर्दों का उन्हें छूना गुनाह, अफगानिस्तान में भूकंप के बाद ‘शरिया’ के चलते तोड़ रहीं दम

अफगानिस्तान में एक हफ्ते के अंदर तीसरी बार भूकंप आया, जिसमें अब तक 2,200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों घायल हुए। इस आपदा ने सिर्फ घरों और गाँवों में तबाही ही नहीं मचाई बल्कि तालिबान राज में महिलाओं की दर्दनाक स्थिति को भी सामने ला दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भूकंप के बाद कई महिलाएँ मलबे के नीचे फँसी रहीं लेकिन उन्हें बचाने की कोशिश नहीं हुई क्योंकि तालिबान के सख्त नियमों के तहत गैर-परिवार के पुरुष महिलाओं को छू नहीं सकते। केवल पिता, पति, भाई या बेटा ही महिला को छूने की अनुमति रखते हैं।

समस्या यह है कि वहाँ महिला रेस्क्यू वर्कर्स लगभग न के बराबर हैं। तालिबान ने वर्षों से महिलाओं को मेडिकल शिक्षा और सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रखा है। ऐसे में राहत कार्य में महिलाएँ लगभग ‘अदृश्य’ हो गई। मलबे से पुरुषों और बच्चों को पहले निकाला गया लेकिन महिलाएँ घंटों-घंटों तक उसी में फँसी रहीं।

कहीं-कहीं महिलाएँ तब तक इंतजार करती रहीं जब तक आस-पास की महिलाएँ आकर उनकी मदद नहीं कर पाईं। कई जगह बचावकर्मियों ने महिलाओं को छूने से बचने के लिए उनके कपड़ों को पकड़कर घसीटकर बाहर निकाला।

कुनार प्रांत की एक महिला बीबी आयशा ने बताया “हमें एक कोने में बैठाकर भुला दिया गया। 36 घंटे बाद रेस्क्यू टीम आई लेकिन सीधे मदद नहीं की।” एक पुरुष स्वयंसेवक तहज़ीबुल्लाह मुहाजिब ने कहा कि बचाव कार्य के दौरान महिलाएँ ‘जैसे दिखाई ही नहीं दे रही थीं’।

उन्होंने बताया कि पुरुष रेस्क्यू टीमें सांस्कृतिक विरोध के डर से महिलाओं को छूने से हिचक रही थीं। इस तरह यह भूकंप न केवल प्राकृतिक त्रासदी बना बल्कि तालिबानी नियमों की वजह से महिलाओं के लिए और भी बड़ी मानवीय त्रासदी साबित हुआ।

महिला चिकित्सा कर्मचारियों की कमी के कारण कई महिलाओं को इलाज नहीं मिल पाया

भूकंप प्रभावित इलाकों से मिली रिपोर्ट्स बताती हैं कि पुरुषों और लड़कों को तुरंत इलाज और मदद मिली लेकिन महिलाएँ दर्द और चोटों के बावजूद बिना इलाज के कोनों में बैठी रहीं। कई अस्पताल भरे हुए थे और वहाँ महिला डॉक्टर लगभग न के बराबर थीं, क्योंकि तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने पर लंबे समय से पाबंदी लगा रखी है।

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि इस आपदा का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और लड़कियों को झेलना पड़ेगा। अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र महिला प्रतिनिधि सुसान फर्ग्यूसन ने कहा कि महिलाओं की जरूरतें राहत और पुनर्वास की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में महिलाएँ बचाव और सहायता, दोनों से वंचित हैं।

तालिबान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मान लिया कि महिला डॉक्टरों की कमी है। हालाँकि, उनका कहना था कि प्रभावित प्रांतों में कुछ महिलाएँ सेवा दे रही हैं। मगर बचे लोगों के बयान बताते हैं कि इस कमी की वजह से कई महिला पीड़ितों को इलाज ही नहीं मिला। यह भूकंप एक बड़ी सच्चाई सामने लाता है।

अफगान महिलाएँ दुनिया के सबसे कठोर लैंगिक प्रतिबंधों के बीच जी रही हैं। पिछले चार साल से तालिबान ने शरिया कानून की कठोर व्याख्या लागू की है, जिसने महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और आजादी छीन ली है।

लड़कियों को स्कूल और विश्वविद्यालय जाने की मनाही है। महिलाएँ ज्यादातर नौकरियों में काम नहीं कर सकतीं, न ही NGO या अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में शामिल हो सकती हैं। पुरुष अभिभावक के बिना वे लंबी यात्रा नहीं कर सकतीं।

पार्क और जिम जैसे सार्वजनिक स्थान भी उनके लिए बंद कर दिए गए हैं। इसलिए जब यह आपदा आई, महिलाओं के पास न कोई महिला बचावकर्मी थी, न महिला डॉक्टर, न ही बराबरी से मदद माँगने का अधिकार। उनके लिए यह भूकंप सिर्फ प्राकृतिक त्रासदी नहीं, बल्कि तालिबानी नियमों की वजह से और भी गहरी मानवीय त्रासदी साबित हुआ।

तालिबान के शरिया कानून ने अफगान महिलाओं को खत्म कर दिया है

भूकंप के दौरान महिलाओं के साथ जो हुआ, वह कोई संयोग नहीं था, बल्कि तालिबान के चार साल से जारी कठोर शासन का सीधा नतीजा है। तालिबान के बनाए शरिया नियमों का असली मकसद महिलाओं को समाज से गायब कर देना है।

2021 में सत्ता में आने के बाद से तालिबान ने अफगान महिलाओं को स्कूलों, नौकरियों और सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया। छठी कक्षा से ऊपर की लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी गई, महिलाओं को विश्वविद्यालय जाने से रोक दिया गया और उन्हें दफ्तरों से निकाल दिया गया।

मानवीय संगठन, जो कभी महिला कर्मचारियों के सहारे ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचते थे, अब लगभग ठप हो गए हैं क्योंकि महिलाओं को काम करने की अनुमति नहीं है। यूएनएएमए की रिपोर्ट बताती है कि कई प्रांतों में महिला रेडियो स्टेशन और घरों से चलने वाले ब्यूटी सैलून तक बंद करवा दिए गए।

कंधार में दुकानदारों को आदेश दिया गया कि वे बिना पुरुष अभिभावक (महरम) के आने वाली महिलाओं को रोकें और उनकी जानकारी दें। एक अस्पताल में तो कर्मचारियों को यह तक कहा गया कि वे अकेली महिला मरीजों का इलाज न करें।

तालिबान दावा करता है कि वह ‘इस्लामी कानून’ लागू कर रहा है लेकिन वास्तव में यह उनकी अपनी संकीर्ण और कठोर व्याख्या है। इस्लाम के इतिहास में शरिया अलग-अलग तरीकों से, बहस और करुणा के साथ अपनाई गई है।

तालिबान का संस्करण न तो सर्वमान्य है और न ही जरूरी, यह केवल महिलाओं को दबाने का राजनीतिक हथियार है। नतीजा यह है कि अफग़ान महिलाएँ अपने ही देश में कैद हो चुकी हैं। वे न पढ़ सकती हैं, न स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकती हैं और अगर भूकंप जैसी आपदा में मलबे के नीचे दब जाएँ तो उन्हें बचाना भी नियमों के कारण मुश्किल हो जाता है।

जबरन धर्मांतरण की बढ़ती संख्या

तालिबान ने अफग़ानिस्तान में दमनकारी नीतियों को और कड़ा कर दिया है। मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा दिया गया है, शारीरिक दंड (कोड़े मारना आदि) तेज हो गए हैं और धार्मिक स्वतंत्रता पर भी रोक लगाई जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, 17 जनवरी से 3 फरवरी के बीच उत्तर-पूर्वी अफग़ानिस्तान के बदख्शान प्रांत में कम से कम 50 इस्माइली पुरुषों को रात में उनके घरों से उठा लिया गया और हिंसा की धमकी देकर उन्हें सुन्नी इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। इसी अवधि में, 180 से अधिक लोगों, जिनमें महिलाएँ और लड़कियाँ भी शामिल हैं, उनको  व्यभिचार और समलैंगिकता जैसे अपराधों के लिए सार्वजनिक जगहों पर कोड़े लगाए गए। इन कार्यक्रमों में तालिबान अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया।

सार्वजनिक दंड और भय

तालिबान की तथाकथित शरिया ने एक बार फिर हिंसक सजाओं को जिंदा कर दिया है। अब सार्वजनिक रूप से कोड़े मारना, हाथ काटना और यहाँ तक कि फाँसी जैसी सजाएँ वापस आ गई हैं। 1996 से 2001 तक उनके पहले शासन के दौरान इन्हीं सजाओं ने पूरे देश में डर का माहौल बना दिया था और वही हालात अब फिर से बन रहे हैं।

महिलाओं से कहा जाता है कि वे चुप रहें और पर्दे के पीछे रहें, जबकि पुरुषों को आदेश है कि वे अपनी माँ, बहन और पत्नियों पर इन नियमों को लागू करें। हर तरीके से महिलाओं को स्वतंत्र इंसान नहीं, बल्कि पुरुषों की संपत्ति की तरह देखा जा रहा है और जब महिलाएँ विरोध करती हैं, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं या प्रदर्शन करती हैं तो तालिबान की नैतिकता पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है, धमकाती है और हिंसा करती है।

यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र में काम करने वाली अफगान महिलाएँ भी बढ़ती परेशानियों और उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं, जिसके चलते कई बार एजेंसियों को उन्हें घर पर ही रहने की सलाह देनी पड़ती है।

महिलाओं के योगदान के बिना देश की अर्थव्यवस्था उबर नहीं सकती

भूकंप प्रकृति की त्रासदी थी, लेकिन वे महिलाएँ जो मलबे में दबी रह गईं क्योंकि पुरुष उन्हें ‘छू नहीं सकते थे’, उनकी मौत इंसानों द्वारा बनाई गई त्रासदी थी। यही होता है जब विचारधारा इंसानियत पर हावी हो जाती है।

अफगान महिलाएँ अदृश्य नहीं हैं, न ही बोझ हैं। वे भी इंसान हैं और उन्हें पुरुषों की तरह ही सम्मान, अधिकार और जिंदगी जीने का अवसर मिलना चाहिए।

जब तक तालिबान यह नहीं समझता, या दुनिया उन पर दबाव डालकर बदलाव के लिए मजबूर नहीं करती, तब तक अफ़ग़ान महिलाएँ सिर्फ भूकंप या भूख से नहीं, बल्कि उन कानूनों की क्रूरता से भी मरती रहेंगी जो उन्हें मिटाने के लिए बनाए गए हैं।

2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफग़ानिस्तान की सुरक्षा स्थिति और बिगड़ी है। देश और ज्यादा अलग-थलग और गरीब हो गया है। लगभग आधा देश भूखा है, कई परिवार दिन में सिर्फ एक वक्त का खाना खाकर जी रहे हैं।

महिलाओं को शिक्षा और रोजगार से बाहर कर दिया गया है, जिससे अर्थव्यवस्था सुधरने की कोई संभावना नहीं बची। राहत पहुँचाना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि आधी आबादी यानी अफ़ग़ान महिलाएँ मदद करने से रोकी गई हैं।

नतीजा यह है कि महिलाएँ हर तरह से हार रही हैं। उन्हें पढ़ाई से वंचित किया गया, काम से रोका गया, इसलिए न महिला डॉक्टर बचीं और न ही महिला देखभाल करने वाली और क्योंकि कार्यबल में महिलाएँ नहीं हैं, आपदा के वक्त मलबे में दबी महिलाएँ सिर्फ इसलिए मर जाती हैं क्योंकि इस्लामी कानून उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं देता।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

मुंबई की तरह मेरठ में भी मुस्लिमों ने बनाया ‘हलाल इलाका’, अब्दुल्ला कॉलोनी में हिंदुओं की एंट्री पर रोक: UP के मंत्री बोले- गड़बड़ी मिलेगी तो गरजेगा बुलडोजर

उत्तर प्रदेश के मेरठ में अब्दुल्ला रेजीडेंसी में हिंदू धर्म के लोगों की एंट्री पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस कॉलोनी में हिंदुओं को प्लॉट बेचने पर भी पाबंदी लगाई गई है। यह भी सामने आया कि कॉलोनी को जेल में बंद गैंगस्टर शारिक की जमीन पर बनाया गया है, जहाँ मस्जिद का निर्माण भी करवा दिया गया है।

मामला सामने आने के बाद ऊर्जा राज्य मंत्री सोमेंद्र तोमर ने अब्दुल्ला कॉलोनी की उच्च स्तरीय जाँच की माँग करते हुए मेरठ जिलाधिकारी को पत्र लिखा है। पत्र में कॉलोनी के नक्शा और मस्जिद निर्माण की जाँच की माँग की गई है। मंत्री तोमर ने कहा कि कॉलोनी में गड़बड़ी मिली तो बुलडोजर गरजेगा।

अब्दुल्ला कॉलोनी का नक्शा की वैधता पर उठे सवाल

मीडिया से बातचीत करते हुए मंत्री तोमर ने कहा कि उनके संज्ञान में आया है कि अब्दुल्ला रेजीडेंसी पिछले 10 सालों से विकसित की जा रही है, जिसमें केवल मुस्लिम लोगों को बसाने की योजना बनाई गई है। तोमर ने कहा कि यह सोच पूरी तरह गलत है, किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हो सकता।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कॉलोनी में बनी मस्जिद का नक्शा वैध तरीके से स्वीकृत हुआ है या नहीं। साथ ही गैंगस्टर शारिक की जमीन शामिल होने की बात पर कहा कि इसकी गहराई से जाँच की जाएगी। तोमर ने कहा कि धार्मिक आधार पर बाँटने का प्रयास किसी भी सूरत में सफल नहीं हो पाएगा।

अब्दुल्ला कॉलोनी में 75 प्लॉट में सिर्फ 4 हिंदू परिवार को बेचे

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब्दुल्ला रेजीडेंसी में 90 प्रतिशत प्लॉट मुस्लिम लोगों को बेचे गए हैं। कॉलोनी में कुल 75 प्लॉट हैं, जिनमें सिर्फ 4 प्लॉट हिंदुओं के हैं। कॉलोनी के प्रोजेक्टर के दो पार्टनर हैं, मेजर जनरल जावेद इकबाल और महेंद्र गुप्ता।

जावेद इकबाल के भाई आबिद इकबाल ने सफाई देते हुए कहा कि यह एक बिजनेस प्रोजेक्ट है, जो सभी के लिए खुला है। यहाँ अधिकतर मुस्लिम लोगों ने निवेश किया है। हिंदू खरीदार सिर्फ 10 प्रतिशत हैं। साथ ही आबिद ने मस्जिद निर्माण की बात को भी नकार दिया।

वहीं बिल्डर महेंद्र गुप्ता ने कहा कि सभी आरोप निराधार हैं, अब्दुल्ला रेजीडेंसी में किसी को भी प्लॉट खरीदने पर रोक नहीं लगाई गई है। गुप्ता ने कहा कि यह कॉलोनी आवास विकास की स्वीकृति से बनाई गई है। साथ ही गुप्ता ने कहा कि वे कॉलोनी की जाँच के लिए तैयार हैं।

हालाँकि, आबिद इकबाद और महेंद्र गुप्ता की बातों में कितनी सच्चाई है, यह तो जाँच के बाद ही साफ हो सकेगा। अब्दुल्ला कॉलोनी की जाँच के लिए मंत्री सोमेंद्र तोमर ने डीएम को पत्र लिखा है। फिलहाल प्रशासन की ओर से कॉलोनी पर किसी भी तरीके की कार्रवाई नहीं की गई है।

मुंबई में हलाल अपार्टमेंट को लेकर भी छिड़ा था विवाद

मेरठ की तरह ही इससे पहले मुंबई के हलाल अपार्टमेंट को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। जहाँ मीरा रोड स्थित गैलेक्सी फेस-2 प्रोजेक्ट पर एक विज्ञापन सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।

विज्ञापन में कहा गया कि इस प्रोजेक्ट को केवल मुस्लिम लोगों को ही बेचा जाएगा। यहाँ तक 22 मंजिला इस इमारत के पहले फ्लोर पर मस्जिद और नमाज के लिए अलग जगह और दूसरे फ्लोर पर हलाल के लिए व्यवस्था तय की गई।।

संघर्ष, सेवा, समर्पण और संस्कार की भट्ठी में तपकर 100 वर्ष का हुआ है RSS का संगठन: अब राष्ट्रहित के ‘पंच परिवर्तन’ से परम वैभव की प्राप्ति का संकल्प

वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। संघ की स्थापना का मुख्य ध्येय हिंदू समाज को जागृत और संगठित करते हुए राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का विकास करना था। दैनंदिन शाखाओं के माध्यम से अनुशासन और चरित्र-निर्माण पर बल देते हुए व्यक्तित्व विकास और सामाजिक संगठन को समर्पित संघ आज विश्व का सबसे बड़ा और प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बन गया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा संघर्ष, सेवा, समर्पण, संगठन और संस्कारों से परिपूर्ण रही है, जिसका व्यापक प्रभाव भारतीय समाज में देखा जा सकता है। संघ ने समाज सेवा, स्वदेशी, शिक्षा, ग्राम-विकास, आपदा-राहत, वनवासी कल्याण  और सामाजिक समरसता आदि अनेक क्षेत्रों में निरंतर काम करते हुए सकारात्मक बदलाव लाने का सराहनीय प्रयास किया है।

संघ की विचारधारा सभी को साथ लेकर चलने एवं समरसता पर केंद्रित रही है। संघ का उद्देश्य व्यक्तियों में नैतिकता, कर्तव्यबोध और नेतृत्वक्षमता विकसित करना है। संघ अपने स्वयंसेवकों को एक राष्ट्रीय दृष्टि देता है। संघ का मानना है कि व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि वह अपने राष्ट्र को किस दिशा में ले जाना चाहता है और उसमें उस व्यक्ति का क्या योगदान हो सकता है। संघ अपने स्वयंसेवकों को भारत-बोध से अनुप्राणित करते हुए निष्काम कर्म और निस्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा देता है। यह जीवन में अध्यात्म के समावेश से ही संभव है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल विचार एवं दर्शन ‘राष्ट्र को परम वैभव’ की ओर ले जाना है। इसके लिए समाज में एकता, समरसता और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा आवश्यक  है। संघ का मुख्य उद्देश्य एक सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में एक ऐसे बलशाली और वैभवशाली भारत का पुनर्निर्माण करना है, जो अपनी गौरवशाली सनातन संस्कृति, समृद्ध प्राचीन इतिहास और उन्नत मानव मूल्यों पर गर्व करता हो। अनुशासन, निस्वार्थ सेवा, और ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना संघ के दर्शन की आधारसरणि है। ‘संघ शक्ति कलियुगे’ का मूल मंत्र संघ की विचारधारा का केंद्रीय भाव है। उपरोक्त साध्य के लिए संगठन और सेवा को सर्वोत्तम साधन माना गया है।

भारत के सामाजिक– राष्ट्रीय जीवन में संघ के स्वयंसेवकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और महनीय रहा है। स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष किया।  स्वयंसेवकों ने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1947, 1965, 1971 और 1999  के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उल्लेखनीय योगदान किया, दादरा और नगर हवेली एवं गोवा के मुक्ति आन्दोलन में निर्णायक भूमिका निभाई।

भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय आपातकाल के विरोध में भी लाखों स्वयंसेवक जेल गए। लम्बे समय तक भूमिगत आंदोलन चलाकर लोकतंत्र की रक्षा और पुनर्प्रतिष्ठा की। विभाजनकारी अनुच्छेद 370 की समाप्ति द्वारा जम्मू–कश्मीर के अधिमिलन के अलावा संघ ने प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं और संकटों के समय सदैव बचाव एवं राहत कार्य किया, भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में स्तुत्य योगदान किया, और समाज में शिक्षा, संस्कार एवं स्वदेशी को बढ़ावा दिया।

इसके अलावा, स्वयंसेवकों ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक सुधार, सकारात्मक परिवर्तन और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए काम किया। संघ के स्वयंसेवक कठिनतम परिस्थितियों में देश और समाज के लिए अपनी अडिग प्रतिबद्धता दिखाते आए हैं। विडंबना ही है कि समाज सेवा, सामाजिक संगठन और राष्ट्र निर्माण का अभूतपूर्व कार्य करने के बावजूद संघ को अनेकशः प्रतिबंधों और अनवरत विरोध का सामना करना पड़ा।

संघ की हिन्दू और हिन्दुत्व की अवधारणा सांस्कृतिक, राजनीतिक और धार्मिक तत्वों का समावेशी संगम है। संघ के अनुसार, हिन्दुत्व एक मत/पंथ नहीं, बल्कि एक सभ्यता, संस्कृति और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने हिन्दू को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जो भारत को अपनी मातृभूमि और संस्कृति के रूप में स्वीकार करता है।

मतलब यह है कि हिन्दू वही है जिसकी पितृभूमि (जैसे सिंधु से हिंद महासागर तक की भूमि) और पुण्यभूमि एक हो। इस दृष्टिकोण में अन्य मत-पंथों के लोग भी शामिल हो सकते हैं, यदि वे सनातन संस्कृति और भारतीय जीवन-मूल्यों में आस्था रखते हैं। यह आपसी अविश्वास और असुरक्षा बोध की समाप्ति समाप्ति का सूत्र है। संघ विविधताओं का सम्मान करते हुए उनमें एकता के सूत्र ढूंढ़ने के लिए समर्पित और संकल्पित है।

हिन्दुत्व को संघ ने एक समावेशी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में देखा है, जिसमें सारे भेदभाव से ऊपर उठकर भारत की सांस्कृतिक एकता और अखंडता को महत्व दिया गया है। संघ का यह भी मानना है कि हिन्दू राष्ट्रवाद भारत की बहुसंख्यक हिन्दू संस्कृति और मूल्यों पर आधारित है, लेकिन इसका उद्देश्य किसी भी समुदाय की उपेक्षा या अवहेलना करना नहीं, बल्कि सभी को भारतवासियों के रूप में संगठित करना है।

पिछले दिनों दिल्ली के विज्ञानं भवन में संपन्न तीन दिवसीय व्याख्यानमाला में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत हिंदुत्व के समावेशी स्वरूप पर जोर देते हुए कहा है कि संघ के हिंदुत्व का मतलब स्वीकार और समावेशिता है न कि बहिष्कार और विरोध। समरसता, सद्भाव और सहअस्तित्व हिन्दू जीवन पद्धति की मूल पहचान है। इसमें मुस्लिम तथा अन्य मताबलम्बियों के प्रति भी सहज स्वीकार्यता का भाव है।

उन्होंने नेशन-स्टेट और राष्ट्र, पंथ-निरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव,परम्परा और आधुनिकता, मनुष्य और तकनीक, भारतीय भाषाओँ और राष्ट्र भाषा हिंदी तथा औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी जैसी विचार सरणियों के सम्बन्ध में भी संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट कियाI यह व्याख्यान–माला कार्यक्रम वस्तुतः नागरिक समाज के साथ प्रत्यक्ष संपर्क और संवाद करते हुए निहित स्वार्थवश फैलाई गई भ्रांतियों के निराकरण का गंभीर प्रयास था।

शताब्दी वर्ष में संघ का समाज में ‘पंच-परिवर्तन’ लाने पर विशेष ध्यान है। इन पंच-परिवर्तनों के माध्यम से भारतीय समाज में सकारात्मक, सर्वांगीण और समीचीन परिवर्तन लाना है। इसमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुम्ब प्रबोधन, स्वदेशी जीवनशैली और नागरिक कर्तव्य शामिल हैं। पंच परिवर्तन के माध्यम से भारत राष्ट्र की एकता, अखंडता और समृद्धि को बढ़ाया जा सकेगा।

सामाजिक समरसता का आधार संघ की समावेशी राष्ट्र और समाज की अवधारणा है। यह अवधारणा जातीय भेदभाव से मुक्त समानता पर आधारित समरस समाज के निर्माण की है।

स्वदेशी के अंतर्गत अपनी चेतना को भारतीय मनीषा के अनुरूप ढालने पर बल है। उपभोक्तावाद की चपेट में न आना और आर्थिक रूप से अपने राष्ट्र को सुदृढ़ करने हेतु स्वदेशी सामानों का ही उपभोग करना चाहिए। ऐसे सामान दूसरे देशों से आयात न करना जिनका उत्पाद हम स्वयं कर रहे हैं। संयमित उपभोग ही उपभोक्तावाद की चुनौती का सही उत्तर होगा।

स्व का बोध और स्व के प्रति गौरव का भाव ही हमें औपनिवेशिक दासता से सच्ची और पूरी मुक्ति दिला सकता है। भाषा, भूषा, भोजन, भवन, भ्रमण और भजन आदि में हमें स्वदेशी को प्राथमिकता देनी चाहिए। औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के प्रयास में भाषाई परतंत्रता से मुक्त होना आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत भारतीय भाषाओं के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है।

भारतीय भाषाओं में अध्ययन-अध्यापन और पाठ्य-सामग्री उपलब्ध होन से सुदूरवर्ती  क्षेत्रों के वंचित वर्गों के विद्यार्थी भी अपनी प्रतिभा का विकास करते हुए राष्ट्र-निर्माण में अपना पूर्ण योगदान दे सकेंगे। औनिवेशिक भाषा अंग्रेजी की जकड़न प्रतिभा विकास की बड़ी बाधा रही है। अपने भाषाई स्वबोध को जागृत करके ही एक आत्मनिर्भर और स्वतंत्रचेता राष्ट्र बना जा सकता है। ऐसा करके ही हम सुनहरे भविष्य के निर्माणकर्ता बन सकेंगे।

आजकल पर्यावरण संबंधी समस्याओं और आपदाओं दुनिया के देश पीड़ित हैं। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। पिछले कुछ दशकों में भू-स्खलन होने, बादल फटने, बाढ़ आने, सूखा पड़ने जैसी आपदाओं से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गर्मियों में गर्मी के, बारिश में बारिश के और सर्दियों में सर्दी के रिकॉर्ड टूटते रहते हैं।

भारत का सिरमौर और सर्वाधिक विश्वसनीय सुरक्षा प्रहरी हिमालय भी खतरे में है।  ऋतु-चक्र पूरी तरह तहस-नहस हो गया है। पर्यावरण-संकट प्राकृतिक असंतुलन का परिणाम है। आज हमें विकास के ऐसे मॉडल को विकसित करना है जो प्रकृति का सहगामी और सहकारी हो। प्रकृति के दोहन-शोषण पर आधारित संघर्षपूर्ण सम्बन्ध के स्थान पर साहचर्यपूर्ण सम्बन्ध बनाना ही मनुष्यता के लिए कल्याणकर है।

कुटुम्ब प्रबोधन का उद्देश्य संकटग्रस्त पारिवारिक-सामाजिक जीवन को बचाना है। परिवार भारत की सबसे बड़ी विशेषता और उपलब्धि रही है। परिवार सामाजिक परम्पराओं और संस्कारों के भी संवाहक होते हैं। वे सामाजिक सुरक्षा और संतोष के आदिस्रोत हैंI व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद की पश्चिमी आंधी ने इसकी नींव की हिला दिया है।

आज परिवार टूट रहे हैं, सम्बन्धों में सरसता और आत्मीयता के स्थान पर अलगाव और संघर्ष दिखाई पड़ता है। दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है। इस विकराल होती चुनौती को समय रहते हुए पहचानकर संघ प्राथमिकता के आधार पर इससे निपटने के लिए कृतसंकल्प है।

यह विचारणीय प्रश्न है कि एक नागरिक के रूप में हमारे क्या कर्तव्य हैं? हम कर्तव्य-सचेत समाज की जगह अधिकार सचेत और आत्मकेंद्रित समाज बनते जा रहे हैं। हमारे समाज में हम सारे काम सरकार के ऊपर छोड़ देते हैं। जबकि सच यह है कि बिना नागरिक सहभागिता के सरकार भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं कर सकती।

टैक्स और बिल आदि समय पर जमा, लाइसेंस आदि को नियत समय पर नवीनीकृत करवाना, मतदान करना, यातायात नियमों का पालन करना, बिजली-पानी आदि संसाधनों की बचत करना, राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति न पहुँचाना, राष्ट्रीय पर्वों, प्रतीकों और संस्थाओं का सम्मान करना आदि कार्य दैनिक जीवन की देशभक्ति है। अतः यह अत्यावश्यक है कि नागरिकों को अपने कर्तव्य का बोध हो और वे राष्ट्र निर्माण में अपना समुचित योगदान दें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रतिपादित पंच-परिवर्तन से सामाजिक जीवन में अनुशासन, देशभक्ति और नागरिक सहभागिता बढ़ेगी। इससे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और राष्ट्रोन्नयन की आधारभूमि तैयार होगी।

संघ भविष्य की भावी कार्य योजना में शाखाओं के माध्यम से संघ-कार्य का विस्तार शामिल है। आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार की कल्पना थी कि ‘संघ अंततः समाज में विलय हो जाएगा और समाज संघमय हो जाएगा’। इस एकात्मता और एकमेकता के सन्दर्भ में कबीर वाणी प्रासंगिक लगती है – “जल में कुंभ, कुंभ में जल है बाहिर भीतर पानी …….।”

इसके अलावा संघ के शताब्दी-संकल्प में शिक्षा में भारतीय दृष्टि का समावेश, स्वावलंबन आधारित अर्थव्यवस्था, संसाधनों और सत्ता का विकेंद्रीकरण, ग्रामोदय से राष्ट्रोदय और युवाओं को संस्कार एवं रोजगार देते हुए प्रतिभा पलायन को रोकना शामिल है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के आदर्श का अनुसरण करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे कल्याण-मन्त्र पर कार्यशील रहते हुए विश्व शांति और मानव-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा।

कनाडा ने अपनी रिपोर्ट में पहली बार मानी खालिस्तानी संगठनों को फंडिंग मिलने की बात, अपनी नाकामी कबूल भारत के दावों पर लगाई मुहर

भारत लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि खालिस्तानी कट्टरपंथी संगठनों को विदेशों से, खासकर कनाडा से, आर्थिक मदद मिलती है। अब पहली बार खुद कनाडा की आधिकारिक रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि कर दी है।

कनाडा की खुफिया एजेंसी Assessment of Money Laundering and Terrorist Financing Risks in Canada की ताजा रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि खालिस्तानी संगठन न केवल कनाडा में सक्रिय हैं, बल्कि उन्हें विदेशों से लगातार आर्थिक सहयोग भी मिल रहा है। उनकी तरफ से यह स्वीकार करना भारत के उस दावे को मजबूत करता है, जिसमें कहा गया था कि कनाडा खालिस्तान समर्थक गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रहा है।

नई रिपोर्ट में क्या है खास

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले कनाडा में खालिस्तानी संगठनों का एक बड़ा फंडरेजिंग नेटवर्क था। समय के साथ यह नेटवर्क छोटे-छोटे समूहों और व्यक्तियों तक सिमट गया है। ये लोग भले ही किसी विशेष संगठन से जुड़े न हों, लेकिन खालिस्तान आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और आर्थिक सहयोग इस पूरे नेटवर्क को जिंदा रखने का काम कर रहा है।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कनाडा समेत कई देशों से इन संगठनों को लगातार फंडिंग हो रही है। यही वजह है कि भारत में खालिस्तान समर्थक हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने की लगतार कोशिश कर रहे हैं।

पुख्ता सबूतों की बात

कनाडा के आपराधिक कानून (Criminal Code) के तहत कई संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है। इसमें हमास, हिजबुल्लाह, बब्बर खालसा इंटरनेशनल और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन जैसे संगठन शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, इन संगठनों को कनाडा से वित्तीय मदद मिलने के सबूत खुफिया एजेंसियों और कानून प्रवर्तन इकाइयों ने जुटाए हैं। यानी अब यह बात केवल आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि आधिकारिक रूप से दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं कि कनाडा की धरती का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जा रहा है।

खलिस्तानियों पर भारत का दावा सही साबित

भारत वर्षों से कहता रहा है कि कनाडा खालिस्तानी तत्वों को खुली छूट देता है। भारतीय अधिकारियों का कहना था कि वहाँ से न केवल फंडिंग होती है बल्कि प्रचार-प्रसार और राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिशें भी होती हैं।

इस मुद्दे को लेकर भारत और कनाडा के बीच कई बार तल्ख बयानबाज़ी हुई। अब जब कनाडा की अपनी एजेंसी ने स्वीकार किया है कि यह नेटवर्क मौजूद है और सक्रिय भी है, तो भारत का दावा पूरी तरह सही साबित होता है।

कनाडा ने अपनी जमीन पर खालिस्तानी गतिविधियों की मौजूदगी मानी

दिलचस्प बात यह है कि कनाडा की खुफिया एजेंसी की इस रिपोर्ट ने यह भी स्वीकार किया है कि उसकी धरती से खालिस्तानी कट्टरपंथी सक्रिय हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि 1980 के दशक से ही कनाडा स्थित खालिस्तानी समूह पंजाब में अलग सिख राज्य की माँग के लिए हिंसक तरीकों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं।

भारत लंबे समय से इस खतरे की तरफ ध्यान दिला रहा था, लेकिन कनाडा की सरकारें अक्सर इसे नजरअंदाज करती रहीं। खासकर पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो पर यह आरोप लगता रहा कि उन्होंने खालिस्तानी समर्थकों को राजनीतिक वजहों से नजरअंदाज किया।

कनाडा का दोहरा रवैया और कूटनीतिक संकट

रिपोर्ट में एक और अहम बात सामने आई। रिपोर्ट में जहाँ खालिस्तानी तत्वों की मौजूदगी और फंडिंग का सच स्वीकार किया, वहीं उसने भारत पर भी आरोप लगाया कि वह कनाडा में हस्तक्षेप और जासूसी करता है। रिपोर्ट में भारत का नाम चीन, रूस, ईरान और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ ‘विदेशी हस्तक्षेप के प्रमुख आरोपितों’ में शामिल किया गया है।

यानी एक तरफ तो कनाडा यह मान रहा है कि खालिस्तानी आतंकवाद उसकी जमीन से पनप रहा है, दूसरी तरफ भारत पर हस्तक्षेप का आरोप लगाकर कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश भी कर रहा है। यह दोहरी स्थिति कनाडा को उलझन में डाल रही है।

निज्जर मामले से भारत-कनाडा के रिश्तों पर पड़ा असर

यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब भारत और कनाडा के रिश्ते हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद ठंडे पड़े थे। कनाडा ने इस मामले में भारत पर आरोप लगाया था, लेकिन भारत ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। अब जब सीएसआईएस ने आधिकारिक तौर पर खालिस्तानी गतिविधियों की मौजूदगी स्वीकार कर ली है, तो यह कनाडा के लिए असहज स्थिति है।

हाल ही में जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच मुलाकात हुई। दोनों देशों ने रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए नए उच्चायुक्त नियुक्त करने और व्यापार वार्ता फिर से शुरू करने पर सहमति जताई। ऐसे में यह रिपोर्ट दोनों देशों के बीच बातचीत का अहम मुद्दा बन सकती है।

खलिस्तानी गतिविधियों से खतरा अब भी बरकरार

रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि आतंकवादी संगठनों के लिए विदेशों से मिलने वाला आर्थिक सहयोग उनकी गतिविधियों को जिंदा रखने का सबसे बड़ा साधन है। खालिस्तानी समूह भी इसी तरह प्रवासी समुदायों और गैर-लाभकारी संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। कनाडा के सामने अब यह चुनौती है कि वह अपने लोकतांत्रिक ढांचे और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए कैसे इन कट्टरपंथी गतिविधियों पर लगाम लगाए।

‘मुस्लिम मेरी हत्या करना चाहते हैं’: कुरान जलाने वाली अमेरिका की महिला नेता को मिल रही धमकी, बताया- यहूदी और हिंदू भी निशाने पर

अमेरिका में टेक्सास से रिपब्लिकन उम्मीदवार वेलेंटीना गोमेज (Valentina Gomez) एक बार फिर इस्लाम के विरोध में उतर आई हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम मजहब के लोग उन्हें जान से मारना चाहते हैं। गोमेज ने यह जानकारी FBI के हवाले से दी है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो शेयर करते हुए वेलेंटीना गोमेज ने कहा, “FBI ने मुझे कॉल किया और बताया कि मुस्लिम मुझे मारना चाहते हैं। सच यह है कि वे हम सभी और जो भी शास्त्रों को मानते हैं, उन सभी को मारना चाहते हैं। सिर्फ कुरान को मानने वाले लोगों को नहीं मारा जाएगा।”

वेलेंटीना गोमेज ने आगे कहा, “इसमें यहूदियों, ईसाइयों, हिंदुओं और सभी धर्मों के लोगों को निशाना बनाया जाएगा। मिशिगन में इस्लामी आतंकवादी को अधिकारिक पुलिस बैज दिए गए हैं ताकि वे किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकें जो इस्लामी कानून का पालन नहीं करता है।”

बेटियों का बलात्कार करेंगे मुस्लिम: गोमेज

वीडियो के कैप्शन में वेलेंटीना गोमेज लिखती हैं, “अगर मुस्लिम बहुसंख्यक हो गए तो वे आपकी बेटियों का उनकी मासूमियत के बावजूद बलात्कार करेंगे और आपके समुदायों को ब्रिटेन की तरह ही गुलामी में ले जाएँगे।”

वेलेंटीना गोमेज द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो का कैप्शन

वे आगे लिखती हैं, “FBI जानती है कि इस्लाम का युद्ध मेरे खिलाफ नहीं है- यह अमेरिका के खिलाफ है और मैं यहूदियों और हिंदुओं के साथ बस बीच में खड़ी हूँ। कॉन्ग्रेस इन आतंकवादियों से अमेरिका की रक्षा नहीं करेगी इसीलिए मुझे भेज दो, क्योंकि मैं ये करूँगी।”

वेलेंटीना गोमेज ने जलाई कुरान, लगाए इस्लाम-विरोधी नारे

यह पहली बार नहीं है जब वेलेंटीना गोमेज ने इस्लाम का विरोध किया है। हाल ही में अगस्त 2025 में उन्होंने कुरान को गन के फायर शॉट से जला डाला था। यह वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसके बाद उनके एक्स अकाउंट से वीडियो को हटवा दिया गया था।

इससे पहले वेलेंटीना गोमेज विवादों में घिरी थीं। जब मई 2025 में टेक्सास स्टेट कैपिटल में आयोजित मुस्लिम नागरिक सहभागिता कार्यक्रम में अचानक मंच पर खड़ी हो गईं और माइक छीनकर इस्लाम विरोधी नारे लगाने लगीं।

इस घटना का वीडियो भी वेलेंटीना गोमेज ने शेयर किया था, जिसमें उन्होंने लिखा, “टेक्सास में इस्लाम के लिए कोई जगह नहीं है। मेरी मदद करें ताकि हम अमेरिका के इस्लामीकरण को खत्म कर सकें।”

कौन है वेलेंटीना गोमेज ?

रिपब्लिकन उम्मीदवार गोमेज राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) कैम्पेन की समर्थक हैं। वे टेक्सास में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन कॉन्ग्रेस से टेक्सास से उम्मीदवार हैं। फिलहाल वे अमेरिका में LGTBQ और इस्लाम के विरोध में अभियान चला रही हैं।

वेलेंटीना गोमेज का जन्म 8 मई 1999 को कोलंबिया के मेडेलिन शहर में हुआ था। 2009 में वह परिवार के साथ अमेरिका आ कर बस गईं। पढ़ाई-लिखाई के बाद रियल एस्टेट और फाइनेंस सेक्टर में हाथ आजमाया। वह नेस्ले से भी जुड़ी रही हैं।

राजनीति में आते ही गोमेज का करियर विवादों से घिर गया। सार्वजनिक तौर पर मुसलमानों, LGBT+ कम्युनिटी, अश्वेतों और इमिग्रेंट्स के खिलाफ उन्होंने विवादित बयान दिए।

पेरियार के लिए ऑक्सफोर्ड पहुँच गए स्टालिन, पर नहीं याद रहे राधाकृष्णन: जिसने हिन्दुओं को ‘कीड़े-मकोड़े’ कहा, उसके लिए कितना गिरेगी DMK

5 सितंबर 2025 को शिक्षक दिवस के अवसर पर जब देशभर में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, उन्हें याद कर शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक जगहों पर आयोजन किए जा रहे थे, तब तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी DMK ने अपने सोशल मीडिया मंचों पर पेरियार ई वी रामासामी के लिए कई ट्वीट कर रही थी।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसी दिन ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पेरियार की पोट्रेट का अनावरण किया, लेकिन दिनभर में DMK के किसी नेता या पार्टी के आधिकारिक हैंडल पर राधाकृष्णन का नाम तक नहीं लिया गया। दक्षिण भारत की राजनीति में ये वैचारिक मतभेद लगातार गहराता जा रहा है।

तमिलनाडु के तिरुत्तनी में जन्मे और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़ाई करने वाले राधाकृष्ण ने भी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाया। वे भारतीय दर्शन को पश्चिमी दुनिया में सम्मान दिलाने वाले प्रमुख विचारकों में से एक थे। इसके बावजूद राधाकृष्णन को दरकिनार करना DMK की अपनी ही रणनीति को ही दिखाता है।

ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पेरियार की पोट्रेट का अनावरण करते हुए स्टालिन ने उन्हें ‘रैशनलिज्म की वैश्विक रोशनी’ बताया। उन्होंने पेरियार को ‘स्वाभिमान आंदोलन का सूरज’ कहा और खुद को उनके विचारों से ओतप्रोत बताया।

असल में ऑक्सफोर्ड में हुआ ये यह आयोजन न केवल पेरियार की विचारधारा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने का प्रयास था, बल्कि DMK की वैचारिक विरासत को भी वैश्विक मान्यता दिलाने की रणनीति थी।

ऑक्सफोर्ड में स्टालिन को पेरियार की तस्वीर के अनावरण के लिए खास तौर पर बुलाया गया। इसके पीछे भी गहरी रणनीति शामिल है। एमके स्टालिन के पिता करुणानिधि की पूरी राजनीति पेरियार के विचारों पर आधारित थी। स्टालिन भी अपनी राजनीति में जब तब पेरियार का नाम और विचार के बारे में बात करते और अमल में लाने का प्रयत्न करते रहे हैं।

पेरियार वही शख्स है जिसने यहूदियों और ब्राह्मणों को कीड़े-मकोड़े जैसा माना था। स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने भी सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया के मच्छर से करते हुए इसे जड़ से मिटा देने की बात तक कही है। ऐसे में स्टालिन का इस कार्यक्रम में शामिल होना कोई नई बात नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत का ही विस्तार कहा जा सकता है।

नेहरू ने पेरियार को दिया था विकृत मानसिकता का तमगा

5 नवंबर 1957 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मद्रास के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कामराज को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने पेरियार ईवी रामासामी नायकर की ओर से लगातार चलाए जा रहे ब्राह्मण-विरोधी अभियान की आलोचना की थी।

नेहरू ने लिखा था, “मैं पेरियार द्वारा लगातार चलाए जा रहे ब्राह्मण-विरोधी अभियान से अत्यंत व्यथित हूँ। मैं पहले भी इस विषय पर लिख चुका हूँ और मुझे बताया गया था कि यह मामला विचाराधीन है।”

यह पत्र उस समय लिखा गया था जब पेरियार ने 3 नवंबर 1957 को तंजावुर में एक सम्मेलन आयोजित किया था। इसमें उसने संविधान से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को हटाने की माँग की थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, पेरियार की पार्टी द्रविड़ कड़गम ने उस सम्मेलन में ब्राह्मणों की हत्या और उनके घरों को जलाने तक की बात कह डाली थी।

नेहरू ने अपने पत्र में साफ तौर पर लिखा था कि पेरियार लोगों को ‘छुरा घोंपने और हत्या करने’ के लिए उकसा रहे हैं और यह भाषा केवल ‘किसी अपराधी या पागल’ द्वारा ही इस्तेमाल की जा सकती है।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस तरह की बयानबाजी देश में असामाजिक और आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है। इसके चलते राष्ट्र का नैतिक पतन होता है। नेहरू ने सुझाव दिया था कि पेरियार को ‘पागलखाने में भेजा जाना चाहिए और उनकी विकृत मानसिकता का इलाज किया जाना चाहिए।’

पेरियार की ब्राह्मणों के प्रति नफरत इतनी गहरी थी कि उन्होंने अपने समर्थकों से ये तक कह दिया था, “अगर रास्ते में ब्राह्मण और साँप मिलें, तो पहले ब्राह्मण को मारो।”

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पेरियार पर आयोजित संगोष्ठी का आयोजन फैसल देवजी एक व्यक्ति की ओर से किया गया था। खुद को इतिहासकार बताने वाले फैसल ने अपनी किताब ‘द इंपॉसिबल इंडियन’ में महात्मा गाँधी पर कई अपमानजनक बातें लिख चुका है।

किताब में फैसल देवजी ने गाँधी की तुलना जोसेफ स्टालिन, एडॉल्फ हिटलर और माओ जेडोंग जैसे तानाशाहों से की है। इसमें उसने लिखा है, “कई मायनों में गाँधी लेनिन, हिटलर और माओ के की श्रेणी में आते हैं। उन्हें बीसवीं सदी की मुख्यधारा की राजनीति से अलग किसी तरह की नैतिकता वाला इंसान नहीं माना जाना चाहिए।”

असल में तो फैसल की विचारधारा पेरियार जितनी ही उग्र मानी जाती है। उसने नरेंद्र मोदी सरकार के तहत भारत में लोकतंत्र की स्थिति को लेकर भी कई लेख लिखे हैं, जिनमें उसने सरकार को ‘निराशाजनक और भयावह’ बताया है।

एमके स्टालिन के अलावा इस तथाकथित ‘इतिहासकार’ ने एक अन्य वक्ता को भी इस संगोष्ठी में शामिल किया था। ‘Dravidian Geography and the History of Respect’ नाम की इस संगोष्ठी के वक्ता थे- एक एंथ्रोपॉलोजिस्ट अर्जुन अप्पादुराई।

अर्जुन अप्पादुराई ने भी 2021 में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के तहत भारत में ‘राष्ट्रवाद’ की तुलना ‘नरसंहारवाद’ से की थी। एक रिसर्च पेपर में उन्होंने अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण को ‘मुस्लिम-विरोधी नीति निर्माण’ के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

राधाकृष्णन को भूली DMK

विदेश में जाकर हिंदू विरोधी पेरियार की तस्वीर का अनावरण करने वाले स्टालिन अपने ही देश के महान शिक्षाविद और तमिलनाडु की धरती पर ही जन्मे सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भूल गए।

राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952–1962) और दूसरे राष्ट्रपति (1962–1967) बने। साथ ही उन्होंने UNESCO और सोवियत संघ में भारत के राजदूत के रूप में भी कार्य किया। उनके सम्मान में ही भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

इसके बावजूद DMK शिक्षक दिवस के दिन ही पेरियार के लिए कई ट्वीट करती है लेकिन राधाकृष्णन को भूल गई। एक ओर पेरियार ने ब्राह्मणवाद और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ बोला, वहीं राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को दुनिया में सम्मान दिलाया। दोनों ही दक्षिण भारत से थे, लेकिन राधाकृष्णन पर DMK की चुप्पी एक वैचारिक असहजता को दर्शाती है।

DMK की यह रणनीति अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश देती है कि हम केवल उस विरासत को स्वीकारते हैं जो हमारे वैचारिक ढाँचे में फिट बैठती है। सवाल ये है कि क्या यह चुप्पी केवल राजनीतिक प्राथमिकताओं का परिणाम है, या फिर यह उस वैचारिक संघर्ष का हिस्सा है जिसमें पेरियार की नास्तिकता और सामाजिक न्याय की राजनीति को राधाकृष्णन के अध्यात्मिक और अकादमिक प्ररूपों से टकराव में देखा जाता है?

अब योगी सरकार देगी टीचर्स का मेडिकल खर्च, UP में शिक्षक-अनुदेशक-रसोइया को मिलेगी कैशलेस चिकित्सा सुविधा: CM ने कहा- 9 लाख परिवारों को पहुँचेगा लाभ

उत्तर प्रदेश में सभी शिक्षकों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी। यह सुविधा प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और वित्त पोषित विद्यालयों में कार्यरत सभी कर्मचारियों को दी उपलब्ध होगी। सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि शिक्षकों की सेवा को देखते हुए सरकार ने उनके स्वास्थ्य को लेकर यह फैसला लिया है।

सीएम योगी ने शिक्षक दिवस पर शुक्रवार (05 सितंबर 2025) को लखनऊ स्थित लोकभवन में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में यह तोहफा शिक्षकों को दिया। इस दौरान 81 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इस योजना का लाभ सभी शिक्षक, शिक्षक मित्र, अनुदेशक और रसोइया को मिलेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीएम योगी ने बताया कि इस सुविधा से प्रदेश के 9 लाख परिवार को सीधे तौर पर लाभ पहुँचेगा। इस घोषणा को ऐतिहासिक बताते हुए उन्होंने कहा कि बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा विभाग सभी औपचारिकताएँ तुरंत पूरी करेंगे और तय समय के भीतर इस सुविधा का विस्तार करेंगे।

शिक्षा मित्र और अनुदेशकों का बढ़ेगा मानदेय

सीएम योगी ने यह भी बताया कि आने वाले समय में शिक्षा मित्र और अनुदेशकों के मानदेय बढ़ाने को लेकर भी काम होगा, इसके लिए उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है। सीएम ने कहा कि समिति की रिपोर्ट जल्द आने वाली है, जिसके बाद उनका मानदेय बढ़ा दिया जाएगा।