उन्होंने कहा, “भारत शेखी बघारता है कि उसके पास 1.4 अरब लोग हैं, फिर भी वह हमसे एक बुशल मक्का क्यों नहीं खरीदता? क्या यह बात आपको बुरी नहीं लगती कि वह हमें सब कुछ बेचता है, और हमारा मक्का नहीं खरीदता? वह हर चीज़ पर टैरिफ लगाता है। या तो आप इसे मान लीजिए, वरना दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता के साथ व्यापार करना आपके लिए मुश्किल हो जाएगा।”
राष्ट्रपति ट्रंप का जिक्र करते हुए ल्यूटनिक ने कहा, “वे ( ट्रंप ) कहते हैं कि हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा हम तुम्हारे साथ करते हैं। हमने वर्षों की गलतियों को सुधारा है। इसलिए हम चाहते हैं कि टैरिफ दूसरी तरफ हो। हम इसे ठीक करेंगे।” यही राष्ट्रपति का आदर्श वाक्य है।
.@mikeallen asks on The Axios Show if the U.S. is “pissing away valuable relationships” with steep tariffs against allies.@howardlutnick: “India brags that they have 1.4 billion people. Why won’t their 1.4 billion people buy one bushel of U.S. corn?” pic.twitter.com/SPZUJLzWEM
— Axios (@axios) September 12, 2025
लेकिन लुटनिक की बात आंशिक रूप से गलत हैं, क्योंकि भारत ने 2024-25 में कुछ अमेरिकी मक्का खरीदा था। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने 1100 टन अमेरिकी मक्का का आयात किया। ये 1100 टन 2024-25 में भारत के कुल मक्का आयात का छोटा-सा हिस्सा था। कुल आयात 0.97 मिलियन टन हुआ, जिसका अधिकांश हिस्सा म्यांमार और यूक्रेन से आता है।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, भारत ने 2024-25 में म्यांमार से 0.53 मिलियन टन और यूक्रेन से 0.39 मिलियन टन मक्के का आयात किया।
भारत अमेरिका से अधिक मक्का क्यों नहीं आयात करता?
- भारत की मक्के की घरेलू माँग उसकी तीव्र आर्थिक वृद्धि के साथ लगातार बढ़ रही है। भारत मुख्य रूप से पशुधन और मुर्गी पालन उद्योग में चारे के लिए और इथेनॉल उत्पादन उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में मक्के का आयात करता है। म्यांमार और यूक्रेन भारत के पारंपरिक रूप से मक्के के सबसे बड़े निर्यातक रहे हैं।
- लगभग सभी अमेरिकी मक्का आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों से प्राप्त होता है। भारत जीएम फसलों के आयात की अनुमति नहीं देता है। इससे अमेरिका के ज्यादातर मक्के की किस्में भारत में आयात नहीं की जा सकती।
- भारत मक्के के आयात के लिए टैरिफ दर कोटा (TRQ) लागू करता है। सीमित मात्रा में आयात कम शुल्क पर किया जा सकता है, लेकिन इससे अधिक मात्रा पर 50% शुल्क लगता है, जिससे अमेरिकी मक्का महँगा हो जाता है।
- रूस से युद्ध से पहले यूक्रेन और म्यांमार भारत को सस्ती कीमत पर मक्का बेचते रहे हैं। म्यांमार से आयात करने पर माल ढुलाई शुल्क कम लगता है। इसके अलावा, भारत सरकार पारंपरिक रूप से अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत म्यांमार से आयात को प्राथमिकता देती रही है।
- मोदी सरकार में आत्मनिर्भरता पर पूरा जोर है। भारत सरकार दूर-दराज़ के देशों से महँगे कृषि आयात से बचने की कोशिश करती है। यहाँ तक कि जब अमेरिका से गैर-जीएम मक्के की छोटी खेप उपलब्ध होती है, तब भी उनकी गैर-जीएम स्थिति प्रमाणित करना और भारत की सख्त फाइटोसैनिटरी आवश्यकताओं को पूरा करना भारतीय आयातकों के लिए मुश्किल होता है।
अमेरिका भारत को मक्का क्यों बेचना चाहता है?
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा मक्का उत्पादक है। दुनिया का लगभग एक-तिहाई मक्का यहाँ पैदा होता है। अच्छी पैदावार होने पर घरेलू खपत के काफी ज्यादा मक्का इनके पास बच जाता है। अगर निर्यात ठीक से नहीं होता है, तो घरेलू बाजार में अतिरिक्त मक्का होगा, जिससे मक्का की कीमतें गिरेंगी और मक्का किसानों को नुकसान होगा।
अमेरिका में मक्का उत्पादन ज्यादा होने की वजह से वह जापान, मेक्सिको और दक्षिण कोरिया जैसे कई देशों के साथ अमेरिका की व्यापार वार्ताओं और समझौतों में अक्सर मक्का निर्यात को शामिल करता है।
यूएस ग्रेन्स काउंसिल और नेशनल कॉर्न ग्रोअर्स एसोसिएशन जैसे कृषि लॉबी और कमोडिटी समूह अमेरिकी सरकार पर नए निर्यात बाज़ार खोलने, घरेलू किसानों को खुश रखने और ज़मीन की कीमतें ऊँची रखने के लिए जबरदस्त दबाव डाल रहे हैं। अमेरिका में इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढ़ता जा रहा है। इससे घरेलू स्तर पर इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की माँग और खपत में कमी आ रही है।
इसके अलावा, बड़े एशियाई बाजारों में मक्का निर्यात के लिए अमेरिका को ब्राजील, अर्जेंटीना जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।
चीन अमेरिका के मक्के का सबसे बड़ा आयातक देश रहा है। चीन ने अमेरिका से 2022 में करीब 5.21 अरब डॉलर का मक्का आयात किया। 2024 में ये घटकर मात्र 33.1 करोड़ डॉलर रह गया। डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा टैरिफ लगाए जाने के बाद चीन के आयात में भारी गिरावट आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, 2025 के पहले 7 महीनों में, चीन ने केवल 24 लाख डॉलर का अमेरिकी मक्का आयात किया है।
इसलिए, अमेरिका को अपने मक्का के निर्यात के लिए एक नए और पर्याप्त बड़े बाजार की सख्त जरूरत है। वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक का रोना धोना इसी को लेकर है। ये अमेरिकी मक्का को भारत में नहीं बेच पाने को लेकर हताशा ज्यादा लगता है, व्यापार संतुलन को लेकर बेचैनी कम।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


