अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झुके नहीं। भारत ने रूस से तेल लेना चालू रखा। यहाँ तक की चीन और रूस से दोस्ती गहरी की। अब पीएम मोदी की इस दिलेरी की दुनिया तारीफ कर रही है। इजरायल ने खुद के लिए इसे सबक बताया है और पीएम मोदी से सीखने की बात कही है।
इजरायली मीडिया पोर्टल The Jerusalam Post ने एक लेख में बताया है कि इजरायल को पीएम मोदी से सीखने की जरूरत है कि कैसे वो राष्ट्रीय सम्मान को सर्वोपरि रखते हैं। इस रिपोर्ट की हेडलाइन से समझ आता है कि पीएम मोदी विश्वभर के ताकतवर नेताओं में से एक हैं- “What Israel can Learn from Modi: National honor as strategic asset”
The Jerusalam Post के लेख का स्क्रीनशॉट
जकी शालोम द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत से सीख मिलती है, ‘राष्ट्रीय सम्मान कोई विलासिता नहीं बल्कि एक दूरगामी रणनीतिक संपत्ति है।’ इससे साफ है कि कैसे भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय सम्मान और आत्मविश्वास को बढ़ावा दिया है, जो एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति बन गया है।
डोनाल्ड ट्रंप की भारत पर तीखी बयानबाजी
इजरायल की रिपोर्ट में अमेरिका और भारत के रिश्तों पर भी बात की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत-अमेरिका के बीच रिश्तों में गंभीर विश्वास की कमी आई है, जिसका कारण ‘टैरिफ’, भारत-रूस संबंध और अमेरिका का भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद पर नजरिया बताया गया है।
रिपोर्ट में इस बात को भी उल्लेख किया गया कि कैसे डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि भारत के अमेरिका पर ‘दुनिया में सबसे ज्यादा’ टैरिफ लगाने के जवाब में ही भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाया। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप के भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ बताने और पीएम मोदी पर यूक्रेन को व्यापारिक मदद देने की भी बात पर जोर डाला।
जकी शालोम लिखते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का भी दावा किया। इसके बाद पाकिस्तान ने भी इस मामले में ट्रंप की तारीफ की और नोबेल पुरस्कार देने की बात कही। लेकिन भारत ने कभी अमेरिका की मध्यस्थता को नहीं माना, जिससे दोनों देशों के बीच दरार आई।
इन सब तकरारों के बावजूद पीएम मोदी ने अमेरिका की ओर सख्त रुख अपनाया। इजरायली रिपोर्ट में पीएम मोदी की तारीफ करते हुए लिखा मोदी का यह रुख आर्थिक या सैन्य कारणों से नहीं था बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय और व्यक्तिगत सम्मान की भावना से भी जुड़ा था। इजरायली मीडिया लिखती हैं कि इस मामले में इजरायल को भी कुछ सीख मिलती है।
खान यूनिस हमले में इजरायल का रुख
जकी शालोम ने खान यूनिस हमले का उदाहरण देते हुए इजरायल को पीएम मोदी से सीख लेने की बात कही। वे लिखते हैं खान यूनिस में इजरायली गोलीबारी में 20 लोग मारे गए, जिनमें पत्रकार भी शामिल थे। घटना के तुरंत बाद इजरायली सेना ने इसे ‘दुखद घटना’ बताते हुए माफी माँगी।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया इजरायली सेना ने पूरी जानकारी के बिना हमले की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली जबकि मृतकों में हमास के सदस्य भी शामिल थे, जिससे संदेश गया कि इजरायल ने मासूम नागरिकों की हत्या की है।
इस घटना के बाद इजरायली मीडिया अपने प्रशासन को तंज कसते हुए पीएम मोदी की तारीफ करती है।
पीएम मोदी की तारीफ
इजरायली मीडिया पीएम मोदी का उदाहरण बताते हुए लिखती है कि ट्रंप ने जब भारत पर लगातार मौखिक हमले किए तब मोदी ने माफी नहीं माँगी। बल्कि उन्होंने मजबूती से जवाब दिया और देश का सम्मान बचाया।
जकी शालोम कहते हैं कि पीएम मोदी से इजरायल को सीखना चाहिए कि राष्ट्रीय सम्मान को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। इजरायल प्रशासन को तंज कसते हुए वह लिखते हैं कि जल्दी जिम्मेदारी मान लेना कमजोरी समझा जा सकता है और दुश्मन इसका फायदा उठा सकते हैं। अंत में वह लिखते हैं कि भारत की तरह सम्मान को रणनीतिक संपत्ति मानना चाहिए, जिसे बनाए रखना जरूरी है।
जम्मू कश्मीर के श्रीनगर के हजरतबल दरगाह में अशोक स्तंभ का चिह्न तोड़े जाने की घटना के बाद पूरे देश में विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में पुलिस ने 26 लोगों को हिरासत में लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह में हाल ही में हुए सौंदर्यीकरण के दौरान एक बोर्ड लगाया गया था, जिस पर राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का चिह्न बना था। कुछ लोगों ने इसे इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए पत्थरों से तोड़ दिया। उनका कहना था कि धार्मिक स्थल पर किसी भी तरह का प्रतीक या मूर्ति बनाना इस्लाम में मान्य नहीं है।
इस घटना के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान बताते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की माँग की है। वहीं उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने वक्फ बोर्ड पर सवाल उठाया कि धार्मिक स्थल पर अशोक चिह्न क्यों लगाया गया, जबकि देशभर के किसी भी धार्मिक स्थान पर ऐसा नहीं होता।
पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की कई धाराओं और राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत केस दर्ज किया है। अब तक 26 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है और कुछ अन्य से पूछताछ जारी है।
कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वहीं अगर प्रतीक का अनुचित उपयोग या तोड़फोड़ की जाती है, तो दो साल तक की सजा और 5,000 रुपये तक का जुर्माना भी हो सकता है।
वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन और बीजेपी नेता दरख्शां अंद्राबी ने इसे संविधान और राष्ट्रीय प्रतीक पर हमला बताया है और इसे आतंकी मानसिकता से जोड़ते हुए केंद्र सरकार से सख्त कार्रवाई की माँग की है।
वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने वक्फ बोर्ड पर बिना संवेदनशीलता के काम करने का आरोप लगाया है। फिलहाल, पुलिस जाँच कर रही है, लेकिन यह मामला सिर्फ धार्मिक भावना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और राजनीतिक मतभेदों से भी जुड़ गया है।
ओडिशा पुलिस ने राहुल गाँधी के ‘इंडियन स्टेट से लड़ रहे’ वाले बयान के खिलाफ दर्ज FIR में जाँच आगे बढ़ा दी है। पुलिस की जाँच अब राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) तक पहुँच गई है। फाउंडेशन को फाइनेंशियल रिकॉर्ड पेश करने का नोटिस भेजा गया है। इसमें इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक और चीन से फंडिंग का ब्योरा माँगा गया है।
ओडिशा की झारसुगुडा पुलिस मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने 03 सितंबर 2025 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS),2023 की धारा 94 के तहत RGF को नोटिस भेजा है। SDPO उमाशंकर सिंह द्वारा RGF के वित्त निदेशक संदीप आनंद को जारी किए गए नोटिस में माँग की:
1991 से विदेशी योगदान का पूरा रिकॉर्ड।
बैंक खाता विवरण और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता।
लेखा परीक्षकों के नाम और संपर्क।
FCRA लाइसेंस की कॉपी।
जाकिर नाइक (2011) और चीन से 2005-6 के बीच ₹2.49 करोड़ के कथित दान पर स्पष्टीकरण।
UPA शासन के दौरान PM राहत कोष के कथित दुरुपयोग पर स्पष्टीकरण।
ओडिशा पुलिस द्वारा राजीव गाँधी फाउंडेशन को जारी किए गए नोटिस के पहले पन्ने का स्क्रीनशॉट
RGF को 04 नवंबर 2025 तक इन सब जानकारियों के साथ दस्तावेज जमा करने होंगे। नोटिस का पालन न करने पर BNS की धारा 210 के तहत कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी गई है।
मामले की जानकारी देते हुए IG संबलपुर हिमांशु लाल ने बताया, “जाँच अब उस चरण में पहुँच गई है जहाँ राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) जैसी संबंधित संस्थाओं को रिकॉर्ड प्रस्तुत करने होंगे। यह एक कानूनी प्रक्रिया है। कानून अपना काम करेगा।”
गौरतलब है कि राहुल गाँधी भी राजीव गाँधी फाउंडेशन के बोर्ड सदस्यों में से एक हैं। इस फाउंडेशन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी है। बोर्ड के अन्य सदस्यों में प्रियंका गाँधी वाड्रा, पी. चिदंबरम, सुमन दुबे, अशोक गांगुली, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और विजय महाजन शामिल हैं।
राहुल गाँधी के खिलाफ FIR
यह नोटिस राहुल गाँधी पर जनवरी 2025 में दर्ज FIR से जुड़ा है। जब हिंदू संगठनों और BJP नेताओं ने राहुल गाँधी के ‘इंडियन स्टेट’ वाले विवादित बयान पर ओडिशा के झारसुगुडा में पुलिस से शिकायत की थी।
शिकायत में बताया गया कि राहुल गाँधी के बयान से भारत की एकता और अखंडता को खतरा है। शिकायतकर्ता राम हरि पुजारी ने कहा कि गाँधी ने ‘इंडियन स्टेट’ के खिलाफ युद्ध घोषित कर देशद्रोह भड़काया है।
मामले की जाँच के बाद IG हिमांशु लाल ने आरोपों को सही पाया और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। यह मामला झारसुगुडा थाने में धारा 152 (भारत की एकता और संप्रभुता को खतरा) और धारा 197(1)(d) (झूठी या भ्रामक सूचना फैलाना) के तहत दर्ज हुआ।
राहुल गाँधी का देश-विरोधी बयान
यह पूरा विवाद राहुल गाँधी के 15 जनवरी 2025 को दिए गए बयान से शुरू हुआ। जब दिल्ली के कोटला रोड स्थित कॉन्ग्रेस मुख्यालय के उद्घाटन समारोह में राहुल गाँधी ने भाषण के दौरान देश-विरोधी बयान दिया। उन्होंने कहा था कि BJP और RSS ने देश के हर एक संस्थान पर कब्जा कर लिया है और कॉन्ग्रेस, BJP, RSS और ‘इंडियन स्टेट’ के खिलाफ संघर्ष कर रही है।
राहुल गाँधी ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि हम एक निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। अगर आप मानते हैं कि हम BJP या RSS नामक किसी राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं, तो आप समझ नहीं पाए हैं कि क्या हो रहा है। BJP और RSS ने हमारे देश की हर संस्था पर कब्ज़ा कर लिया है। अब हम BJP, RSS और इंडियन स्टेट से ही लड़ रहे हैं।”
#WATCH | Delhi: Lok Sabha LoP and Congress MP Rahul Gandhi says "Do not think that we are fighting a fair fight. There is no fairness in this. If you believe that we are fighting a political organisation called the BJP or RSS, you have not understood what is going on. The BJP and… pic.twitter.com/wuZRnxDysB
इस बयान का हिंदू संगठनों और बीजेपी ने कड़ा विरोध किया। इसे भारतीय राज्य के खिलाफ और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बताया।
जाँच में अब मामला गहराया गया है और राजीव गाँधी फाउंडेशन की फाइनेंसियल हिस्ट्री की भी पड़ताल की जा रही है। विदेशी और विवादित फंडिंग के आरोप साबित होने पर राजनीतिक और कानूनी गंभीर परिणाम हो सकते हैं। फाउंडेशन को नवंबर तक जरूरी दस्तावेज जमा करने के लिए कहा गया है।
अब यह मामला केवल भाषण नहीं, बल्कि गाँधी परिवार से जुड़े संस्थान की जाँच में बदल गया है।
एक आज का दौर है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में आम आदमी को टैक्स से बड़ी राहत मिली है। एक वो दौर था, जब इंदिरा-नेहरू के दौर में कॉन्ग्रेस की सरकार लोगों की मेहनत की कमाई पर बेतहाशा टैक्स वसूलती थीं। यह भारत के उस ‘काले दौर’ से ‘मुक्ति’ का प्रतीक है। एक तरफ पीएम मोदी का ‘विकास और विश्वास’ का मॉडल है, जिसने 12 लाख रुपए तक की आय को टैक्स-फ्री किया। वहीं, दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस का ‘समाजवादी’ जुमला था, जिसने लोगों को कंगाल कर उनकी मेहनत पर खुद का साम्राज्य खड़ा किया।
नेहरू का दौर: 12 लाख की कमाई पर 3-10 लाख टैक्स
एक आज का समय है, जब 2025 के बजट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम आदमी को राहत देते हुए ऐतिहासिक फैसला किया। मोदी सरकार ने ऐलान किया कि अब ₹12 लाख तक की आय पर किसी भी प्रकार का कोई टैक्स नहीं लगेगा। यह फैसला सीधे तौर पर मीडिल-क्लास परिवारों को बहुत बड़ी राहत देने वाला साबित हुआ।
एक वो दौर था जब जवाहरलाल नेहरू के शासन में 12 लाख की इनकम पर 2 लाख से ज्यादा की वसूली की जाती थी। पीएम मोदी ने कहा कि अगर उस समय ₹12 लाख की आय होती, तो सरकार को ₹10 लाख टैक्स के रूप में दे दिए जाते थे। यह वह वक्त था जब टैक्स दरें इतनी ऊँची थीं कि एक आम आदमी की कमाई का बड़ा हिस्सा कॉन्ग्रेस सरकार के पास चला जाता था।
#WATCH | #DelhiAssemblyElection2025 | At Delhi's RK Puram public meeting, PM Modi says, "…If someone had a salary of Rs 12 lakhs at the time of Jawaharlal Nehru – one-fourth would have gone to tax; if today have been the govt of Indira Gandhi – Rs 10 lakhs of your 12 lakh would… pic.twitter.com/gR3dQflckZ
इसके साथ ही पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस शासनकाल पर यह कहते हुए निशाना साधा कि ‘आज 12 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं लगता, जबकि कॉन्ग्रेस के समय यह रकम ₹2.6 लाख तक पहुँच जाती थी।’
इंदिरा का टैक्स राज: जब कमाई पर लगता था 97.5% कर
नेहरू के शासन में टैक्स की दरें बहुत ज्यादा थीं, लेकिन इंदिरा गाँधी के दौर में टैक्स की दरों ने तो हिला कर रखा दिया था। आजादी के बाद से ही देश पर कॉन्ग्रेस ने राज किया था। उस समय ‘समाजवाद’ के नाम पर इंदिरा गाँधी जनता पर भारी-भरकम टैक्स लादती थी। 1970 के दशक को याद करें, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के राज में आयकर की दरें आसमान छूती थीं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 में आयकर की दर 93.5% थी, जो 1973-74 तक बढ़कर 97.5% हो गई।
इसका मतलब था कि अगर आप 100 रुपए कमाते थे, तो सरकार 97.5 रुपए टैक्स के तौर पर ले लेती थी। उस समय की सरकार का मानना था कि अमीरों पर भारी टैक्स लगाकर गरीबी खत्म की जा सकती है। लेकिन, यह नीति बुरी तरह से फेल हो गई।
इतनी ज्यादा टैक्स दरों से कोई भी कमाई नहीं करना चाहता था। लोग ईमानदारी से टैक्स भरने की बजाय चोरी करने लगे। इस वजह से सरकार का राजस्व बढ़ने के बजाय घट गया। अंत में, सरकार को अपनी इस गलत नीति को वापस लेना पड़ा। यह कॉन्ग्रेस का वह शासन था, जहाँ जनता को टैक्स के जाल में फँसाकर लूटा जाता था और अमीरों पर शिकंजा कसने के नाम पर पूरे देश को बर्बाद किया जा रहा था।
अब अगर हम नेहरू और इंदिरा गाँधी के समय की तुलना मोदी सरकार से करें, तो यह बहुत स्पष्ट होता है कि पीएम मोदी ने टैक्स नीति में सुधार के मामले में बड़ी राहत दी है। जहाँ नेहरू और इंदिरा गाँधी के समय में टैक्स दरें इतनी अधिक थीं कि लोग अपनी पूरी कमाई टैक्स में दे देते थे, वहीं मोदी सरकार ने जनता की तकलीफों को समझते हुए टैक्स को बहुत ही सामान्य और आसान बना दिया है। इससे लोग अब अपनी कमाई अपनी जेब में रख सकेंगे ओर टैक्स चुकाने वालों के लिए यह सम्मान और राहत की बात होगी।
एक महिला अपने घर से काम पर निकलती है। बीच रास्ते में उसे एक नंगा युवक गन्ने के खेत में खींचने की कोशिश करता है। यह घटना मेरठ की है। जहाँ पिछले कई दिनों से ‘न्यूड गैंग’ का आतंक पसरा हुआ है।
पीड़ितों की मानें तो इस गैंग के लड़के नंगे होते हैं। उनके बाल लंबे और घने होते हैं। बदन में तेल पोते होते हैं ताकि कोई पकड़ ना सके।
ये उसी तरह का खौफ है। जैसे कुछ साल पहले दिल्ली में ‘काला बंदर’ का था। कानपुर में ‘मुँह नोंचवा बंदर’ का था। पर मेरठ का मामला इन दोनों से अलग है। दिल्ली और कानपुर के मामले कहीं न कहीं सामूहिक भय और अफवाह से पैदा हुए थे और लोगों को घरों में कैद कर दिया था।
लेकिन मेरठ के मामले में एक पीड़िता FIR दर्ज करवा चुकी है। FIR दर्ज होने के बाद कई और पीड़िताएँ भी सामने आई है। जो कहती हैं कि उन्होंने बदनामी के डर से उन पर बीती घटनाओं के बारे में किसी को नहीं बताया था।
पुलिस सादी वर्दी में गन्ने के खेतों में इस गैंग के लोगों की तलाश कर रही है। ड्रोन से निगरानी की जा रही है। पुरुष खुद पहरा दे रहे हैं। पर अभी तक कुछ ठोस हाथ नहीं लगा है।
मेरठ के भराला और इकलौता गाँव में नंगे युवकों ने बनाया निशाना
‘न्यूड गैंग’ का ये आतंक मेरठ के भराला और इकलौता गाँव में पैर पसार रहा है। इन दोनों गाँवों में महिलाओं को निशाना बनाया गया। दो घटनाओं में FIR हुई हैं। एक महिला को नौकरी पर जाते वक्त तो अन्य 3 छात्राओं को स्कूल से घर लौटते वक्त नंगे युवकों ने खेत की तरफ खींचा।
भराला गाँव में जिस महिला को गन्ने के खेत की ओर खींचा था, उसने युवक का शरीर देखा था। महिला ने बताया कि युवक ने कपड़े नहीं पहने थे और मुँह को ढका हुआ था। महिला के चींखने पर जब उसे बचाने पास में काम कर रहे मजदूर दौड़े हुए आए तो युवक भाग निकला।
वहीं इकलौता गाँव में दोपहर के समय 3 छात्राएँ घर लौट रही थी जब अचानक गन्ने के खेत से एक युवक निकला। छात्राओं ने भी यही बताया कि युवक ने कपड़े नहीं पहने थे। छात्रा जब चिल्लाने लगी तो युवक भाग गए। इस बार भी युवक का चेहरा नहीं देखा गया।
महिलाएँ-बेटियों ने शर्म से नहीं बनाई आपबीती, अब सुरक्षा का डर
सिर्फ दो मामलों में FIR दर्ज की गई है। जबकि कई और महिलाओं ने मामला सामने आने के बाद आपबीती सुनाई है, जो शर्म से पहले चुप बैठी थीं। गाँव की बाकी महिलाएँ घटनाएँ सुनकर खौफ में आ गई हैं। अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।
दैनिक भास्कर से बातचीत में गाँव के निवासी विनीत भराला बताते हैं कि महिलाओं ने अब गाँव से बाहर निकलना बंद कर दिया है, सिर्फ मजबूरी में बाहर आती हैं। घर से बाहर भी अब महिलाओं ने समूह बनाकर निकलना शुरू कर दिया है।
भराली गाँव की पीड़िता की सास संतोष खुद डंडा लेकर घर के बाहर पहरा दे रही हैं। संतोष कहती हैं हमारे घर में और भी बहन-बेटियाँ हैं, सबकी सुरक्षा जरूरी है, इसीलिए मैं खुद लाठी लेकर बाहर खड़ी हो जाती हूँ।
पुलिस ने चलाया तलाशी अभियान
पुलिस भी ‘न्यूड गैंग’ की दहशत के बाद अलर्ट हो गई है। पूरे गाँव में तलाशी अभियान चलाया गया है। खेतों के ऊपर ड्रोन से निगरानी की जा रही है। पुलिसकर्मी लाठी-डंडे लेकर गाँव की सीमा पर पहरा दे रहे हैं। दिन में तीन बार QRT की गाड़ियाँ गाँव में गश्त कर रही हैं। पूरे गाँव में सीसीटीवी लगाए गए हैं।
SSP विपिन टाडा ने बताया कि गाँववालों की सूचना के बाद ही पुलिस ने तलाशी अभियान शुरू किया है, अब तक कोई संदिग्ध गतिविधि नहीं देखी गई है।
भारत के अंग्रेजी-भाषी उदारवादी एलिट वर्ग के बारे में एक अजीब सी बात है। जब भी पश्चिमी देश भारत के खिलाफ नाराजगी जताते हैं, ये लोग तुरंत विदेशी मीडिया की ओर दौड़ पड़ते हैं और ‘मैंने तो पहले ही कहा था’ वाला प्रवचन शुरू कर देते हैं। इसमें भी वे भारत को ही दोषी ठहराते हैं।
मुकुल केसवन भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में The Guardian में एक कॉलम लिखा। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव के लिए जिम्मेदार ठहराया।
कॉलम का हेडलाइन ही खुद में औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है- “Blindsided by Trump, Modi is learning hard lessons about India’s place in the new world order” दूसरे शब्दों में, “भारत बराबरी की बात सोचना बंद करो, अपनी जगह पहचानो और अमेरिका के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसे 50 के दशक में होता था। टैरिफ का सामना करो।”
The Guardian ने हाल ही में मुकुल केसवन द्वारा लिखा गया एक अपमानजनक लेख प्रकाशित किया, जिसमें बताया गया कि अमेरिकी के खिलाफ खड़ा होना भारत की गलती थी
लेकिन शायद इस पूरे प्रकरण का सबसे खास पहलू ट्रंप का अहंकार या पश्चिमी देश के नेताओं की मौकापरस्ती है, जो चीन को बख्शते हुए भारत को निशाना बनाते हैं। यह भारत के अपने ही केसवन जैसे ‘ब्राउन सेपॉय’ की सोच है, जो उस अहंकार को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और उसे ‘बुद्धिमानी’ के रूप में दर्शाते हैं।
विदेशों की धौंस के खिलाफ अपने देश के साथ खड़े होने के बजाए, वे खुशी-खुशी उस धौंस का साथ देते हैं, अपने पाठकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि भारत ने अपने सम्मान की रक्षा करके और एक खुद की प्रशंसा करने वाले अहंकारी को संतुष्ट ना करके एक बड़ी भूल की है।
ट्रम्प के टैरिफ: नीति नहीं बल्कि धमकाने का हथियार
The Guardian में अपने लेख में मुकुल केसवन ने ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाए जाने को इस तरह से बताया है मानों यह ‘राजनीति’ का कोई अहम सबक हो, जिसे पीएम मोदी समझ नहीं पाए। वे इस तथ्य को आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं कि ये टैरिफ आर्थिक मामला नहीं बल्कि सजा के तौर पर लगाया गया था।
अप्रैल 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जो कि अमेरिका के सहयोगियों की तुलना में काफी ज्यादा है। जब भारत ने झुकने से इनकार कर दिया तो टैरिफ दोगुना करके 50 प्रतिशत कर दिया गया। वजह क्या थी? यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद, रिफाइनिंग और पुनर्नियात।
रूस से तेल लेने वालों में अब तक चीन सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बावजूद चीन पर टैरिफ नहीं बढ़ाया गया। क्यों? क्योंकि अमेरिका अच्छे से जानता है कि उसकी इकोनॉमी चीन की सप्लाई चेन पर निर्भर है, इसीलिए बीजिंग से व्यापार-संघर्ष शुरू करने से खुद को बचाया। दूसरी ओर अमेरिका ने भारत को ऐसा देश समझा, जिसको आसानी से दबाया जा सकता है।
लेकिन अमेरिका का सारा जोड़-घटाव धरा रह गया। भारत अब भी अपने नागरिकों के लिए सस्ती ऊर्जा और एक स्थिर रिफाइनिंग उद्योग सुनिश्चित कर रहा है। वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के बजाए भारत के रिफाइनरियों ने वैश्विक ईंधन आपूर्ति को स्थिर करने में मदद की। विडंबना यह है कि यूरोप इसका सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। पश्चिमी देश, जिन्होंने रूस के कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था, अंत में उन्हें भी भारत का रिफाइन्ड तेल खरीदना पड़ा।
चाहे कुछ भी हो, भारत ने यूरोप को उसके ऊर्जा संकट से बचाया तो है। फिर भी केसवन के अनुसार, भारत को सजा मिलनी चाहिए और मोदी को अपमान सहना चाहिए।
अंबानी और ‘ब्राह्मण’ पर हमला: भारत की जातिगत दरारों का फायदा उठाना
डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ सिर्फ एक रणनीति का हिस्सा था। बाकी तो भारत के एलिट वर्ग के खिलाफ एक संगठित बदनामी करने वाला अभियान था। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने मुकेश अंबानी को निशाना बनाया। उसने कहा कि भारत का सबसे अमीर परिवार रूसी कच्चे तेल से मुनाफा कमा रहा है। इसका संकेत स्पष्ट था: अंबानी को आलोचनाओं के केन्द्र में लाओ, उन्हें खलनायक बनाओ और भारत में विभाजन की सोच बढ़ाओ।
डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत की जातिगत राजनीति का हवाला देते हुए ‘ब्राह्मणों’ पर भारत की जनता की कीमत पर मुनाफा कमाने का आरोप लगाया। सोचिए एक वरिष्ठ व्हाइट हाउस अधिकारी ने भारत की आंतरिक जातिगत दरारों को वैश्विक व्यापार वार्ताओं में आसानी से शामिल कर लिया।
इस अहंकार में एक और स्वर जोड़ते हुए अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने हाल ही में घोषणा की कि भारत एक या दो महीने में डोनाल्ड के आदेशों का विरोध करने के लिए ‘माफी माँगेगा।’ यह टिप्पणी वॉशिंगटन की विशेषाधिकार वाली मानसिकता को ही उजागर करती है। भारत से एक जागीरदार देश की तरह पेश आने की अपेक्षा करना। यह दिखाता है कि कैसे केसवन जैसे लोग इस दबाव को ‘राजनीति की हकीकत’ कहकर बढ़ावा देते हैं। वास्तव में मोदी सरकार ने संयम और परिपक्वता का प्रदर्शन किया। इस तरह की अहंकारपूर्ण बातों पर प्रतिक्रिया न देकर भारत ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया।
यह कूटनीति नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन था। यह भारत की सामाजिक दरारों को हथियार बनाकर मोदी सरकार पर व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव डालने की सोची-समझी साजिश थी। उम्मीद यह थी कि भारत के अंदर मोदी विरोधी इन हमलों को और बढ़ाएँगे, जिससे मोदी अलग-थलग पड़ जाएँगे।
और देखिए, मुकुल केसवन ने इस भूमिका को बखूबी निभाया। ट्रंप के सलाहकारों की नस्लवादी और जातिवादी बयानबाज़ी की आलोचना करने के बजाए उन्होंने The Guardian में एक लेख लिखा, जिसमें मोदी पर ‘हद से ज्यादा हस्तक्षेप’ और ‘गलत आकलन’ के आरोप लगाए। केसवन के लिए असली विवाद यह नहीं है कि अमेरिकी अधिकारियों ने भारत की जातिगत संरचना का मजाक उड़ाया, बल्कि यह है कि भारत ने झुकने से इनकार कर दिया।
पाकिस्तान के साथ झूठी तुलना: पुरानी अमेरिकी रणनीति
केसवन के तर्क का एक और पहलू है, जिसमें उन्होंने ट्रंप की बात को दोहराया है कि भारत और पाकिस्तान ‘झगड़ालू ‘दक्षिण एशियाई पड़ोसी” हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने तेजी और निर्णायक प्रतिक्रिया दी। ट्रंप और उनके उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसे ऐसे पेश करने की कोशिश की, जैसे उनके फोन कॉल ने युद्ध रुक गया। जब भारत ने सीजफायर के दावे का समर्थन करने से इनकार कर दिया, तो व्हाइट हाउस नाराज हो गया।
केसवन इसे मोदी की नाकामी बताते हैं। लेकिन अमेरिकी की दशकों से भारत- पाकिस्तान को एक तराजू में तौलने की रणनीति रही है। वॉशिंगटन भारत और पाकिस्तान को एक साथ रखना चाहता है, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को एक आतंकवाद-प्रायोजित देश के बराबर समझा जाए।
मोदी ने इस झूठी तुलना को सिरे से नकार दिया। भारत अपनी आतंकवाद-रोधी नीतियों को नोबेल पुरस्कार के लिए बेताब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों में कभी नहीं जाने देगा। फिर भी केसवन के लिए भारत का इस मामले में शामिल ना होना एक कूटनीतिक चूक है। उन्हें ट्रंप द्वारा भारत को अपमानित करने से कम मोदी द्वारा इस अपमान को चुपचाप स्वीकार करने का ज्यादा दुख है।
भारत दबाव में आए बिना रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखेगा
केसवन के लेख का मुख्य मुद्दा यह है कि मोदी के नेतृत्व में भारत गलत तरीके से अमेरिका के बहुत करीब आ गया है, जो कि गलत है। उनका मानना है कि भारत ने अमेरिका के साथ बहुत ज्यादा नजदीकी बढ़ाई है, यह सोचकर कि उसे पश्चिमी देशों का समर्थन मिल जाएगा। यह ऐतिहासिक रूप से गलत और विश्लेषणात्मक रूप से बेईमानी भरी बात है।
मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति काफी सुसंगत रही है। भारत ने अमेरिका के साथ संबंध मजबूत किए हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता की कीमत पर कभी नहीं। इसीलिए भारत रूसी तेल खरीदता है, फ्रांस के साथ रक्षा संबंध बढ़ाता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ Quad में शामिल होता है और पुतिन और शी जिनपिंग के साथ SCO शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा लेता है।
यह रणनीतिक स्वायत्तता है। यही वो सिद्धांत है, जिसने शीत युद्ध के समय भारत की गुटनिरपेक्षता को बढ़ाया और अब इसे 21वीं सदी की मल्टीपोलर दुनिया के हिसाब से बदल लिया गया है।
विडंबना यह है कि केसवन खुद कहते हैं, “आज गुटनिरपेक्षता रणनीतिक स्वायत्तता के तले झंडे फहरा रही है।” लेकिन फिर वे इसे आलोचना में बदल देते हैं, जैसे कि मोदी को इसके लिए माफी माँगनी चाहिए। जबकि नेहरू से लेकर वाजपेयी तक सभी भारतीय राजनेता यही चाहते थे- एक ऐसा भारत जो अपने साझेदार खुद चुने और किसी गुट के निर्देश पर ना चले।
विडंबना यह भी है कि ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिका ने “भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया है।” उन्होंने यह नहीं कहा कि उनकी धौंस, उनके टैरिफ, उनके जातिवादी ताने, भारतीय व्यापार पर उनके हमले ही थे, जिन्होंने भारत को बहुध्रुवीयता को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
केसवन का गुस्सा इस बात पर नहीं है कि मोदी ने अमेरिका को ‘खो दिया’ बल्कि इस बात पर है कि मोदी ने अमेरिका को खुश करने के लिए भारत की गरिमा को खोने से इनकार कर दिया।
मौन की गरिमा बनाम सेपॉय की कायरता
तमाम टैरिफ, अंबानी पर हमले, ब्राह्मणों पर कटाक्ष और धमकियों के बावजूद, भारत ने एक सम्मानजनक चुप्पी बनाए रखी है। हाल ही में जब ट्रंप ने शांति की पेशकश की, तो मोदी ने भी उन्हें अपना ‘अच्छा दोस्त’ बताया। यही तो कूटनीति है। कीचड़ में घसीटे जाने से इनकार करना, अल्पकालिक नफा-नुकसान से ऊपर लंब समय तक की रणनीतिक हितों को ध्यान में रखना।
पीएम मोदी के इस आकर्षक प्रहार को शायद केसवन कमजोरी समझेंगे। लेकिन जिसे वे कमजोरी कह रहे हैं, वह दरअसल परिपक्वता है। आत्मविश्वास से भरे भारत को X पर बयान देने की जरूरत नहीं है। भारत लंबे समय की रणनीति बना रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैचारिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त और बौद्धिक छीछलेपन से भरे केसवन जैसे लोग इस बारीकी को समझने की क्षमता नहीं रखते हैं।
केसवन का लेख उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है, क्योंकि वे प्रगतिशील विचारों के नाम पर औपनिवेशिक सोच वाले मंच The Guardian की ओर भागते हैं और भारत को अपनी जगह समझाने के बारे में व्याख्यान देते हैं।
‘ब्राउन सेपॉय’ की असलियत यही है, जब भारत का अपमान पश्चिम देश करते है तो चुप्पी लेकिन जब भारत झुकने से मना करता है तो गुस्सा।
ऐतिहासिक तुलना: नेहरू के समय से लेकर मोदी के नेतृत्व तक
इस विरोधाभास को समझने के लिए इतिहास पर नजर डालते हैं। 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया तब नेहरू ने अमेरिका से सैन्य मदद माँगी। लेकिन अमेरिका ने अपमानजनक शर्तें रखीं, भारत की समाजवादी नीतियों पर उपदेश दिए और बदले में कश्मीर पर मध्यस्थता की बात कही। नेहरू ने यह अपमान सह लिया क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।
1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान इंदिरा गाँधी को भी अमेरिकी अहंकार का सामना करना पड़ा। रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने उन्हें गालियाँ दीं, सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा और भारत को डराने की कोशिश की। लेकिन इंदिरा ने नेहरू की तरह हार नहीं मानी। भारत ने बांग्लादेश को आजाद कराया और दक्षिण एशिया का नक्शा बदल दिया।
अब साल 2025 में मोदी को भी ऐसी ही धमकी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस बार टैरिफ और तेल कूटनीति के जरिए। मोदी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। वह भारत के हितों को सबसे ऊपर रखते हैं। चाहे रूसी तेल खरीदना हो या दूसरा व्यापार समझौता करना।
यही सेपॉय, जिन्होंने एक समय पर नेहरू के अपमान को सराहा, वही अब मोदी की ललकार की आलोचना कर रहे हैं। ये भारत के उदारवादी एलिट वर्ग का उलटा रूप है। आत्मसमर्पण ‘परिष्कार’ है लेकिन संप्रभुता ‘अहंकार’ है।
असली ‘कठिन सबक’
The Guardian की हेडलाइन व्यंग्यात्मक लहजे में कहती है कि “मोदी दुनिया में भारत की स्थिति को लेकर कठिन सबक सीख रहे हैं।” लेकिन सच्चाई इसके उलट है। असली कठिन सबक वॉशिंगटन में सीखा जा रहा है कि भारत अब आसानी से पराजित नहीं हो सकता।
ट्रंप को यह बात समझ आ रही है कि भारत और पाकिस्तान को एक साथ जोड़ना एक बड़ी भूल थी। मोदी, असीम मुनीर जैसे व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ व्हाइट हाउस में शानदार भोजन के लिए आमंत्रित करने से आसानी से प्रभावित किया जा सके।
भारत को यह नहीं बताया जाना चाहिए कि वह किसके साथ व्यापार करेगा। भारत सस्ता तेल खरीदने के लिए माफी नहीं माँगेगा। भारत कभी भी पाकिस्तान के साथ एक ही श्रेणी में रखा जाना स्वीकार नहीं करेगा। भारत सिर्फ इसलिए कोई खराब व्यापार समझौता नहीं करेगा क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं।
अगर इससे ट्रंप को निराश होते हैं, तो ठीक है। अगर इससे मुकुल केसवन को औपनिवेशिक हैंगओवर से घुटन होती है, तो और भी अच्छा है।
क्योंकि ये 2025 का भारत है। गौरवान्वित, दृढ़निश्चयी और सभ्यतागत रूप से आत्मविश्वासी। यह जानता है कि पश्चिम की ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ हमेशा पश्चिमी प्रभुत्व का दूसरा नाम रही है। और यह भी जानता है कि बहुध्रुवीय विश्व अब स्थायी हो गया है।
सेपॉय और पश्चिम के लिए सीख: झुकने को कहने पर भी भारत नहीं झुकेगा
मुकुल केसवन और उनके जैसे लोग भारत के झुकने से इनकार को राष्ट्रवादी अपमान नहीं बल्कि असफलता मानते हैं। वे सफलता का आकलन इस बात से नहीं करते कि भारत अपने लोगों के लिए क्या हासिल करता है बल्कि इस बात से करते हैं कि पश्चिमी देशों को भारत कितना स्वीकार्य है।
प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक चाहे कुछ भी कहें, वे सफलता को अलग तरह से मापते हैं। उनके लिए भारत की गरिमा सर्वोपरि है। और यही कारण है कि सेपॉय वर्ग उनसे घृणा करता है: क्योंकि वे उस दुनिया में उनकी अप्रासंगिकता को उजागर करते हैं, जहाँ भारत को अब उनके औपनिवेशिक समर्थन की जरूरत नहीं है।
तो आइए साफ तौर पर समझते हैं: मोदी ‘अंधे’ नहीं हैं। भारत ‘अपनी जगह’ नहीं सीख रहा है। असल में ट्रंप और उनके सेपॉय सीखना चाहिए कि नए विश्व में भारत झुकने को तैयार नहीं है। यह सबको याद दिलाता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत अब डरपोक नहीं है बल्कि एक आत्मविश्वासी शक्ति है, जो दबाव के सामने खड़ी रहती है और अपने हितों की रक्षा करती है।
मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में Jinit Jain ने लिखी है। इस रिपोर्ट को पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ें।
दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में 2020 के दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे के आरोपित उमर खालिद और अन्य आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपितों पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया (prima facie) सही लगते हैं।
इस फैसले से तथाकथित लेफ्ट-लिबरल गैंग खासा परेशान हो गया है। पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी उमर खालिद की जमानत खारिज होने पर नाराज दिखे।
उनके मुताबिक, सोशल मीडिया पर यह ‘नैरेटिव’ फैलाया जा रहा है कि उमर खालिद वर्षों से जेल में हैं और इसकी वजह कोर्ट की देरी नहीं है, बल्कि उनके वकील ही बार-बार सुनवाई टलवाते रहे हैं।
Now even Rajdeep Sardesai, one of the most compromised journalists of our times, has admitted that Umar Khalid and his counsel Kapil Sibal were actively engaged in “bench hunting” and “forum shopping”.
राजदीप सरदेसाई यह तो नहीं नकारते कि उमर खालिद के वकील बार-बार तारीख (adjournments) माँगते रहे हैं लेकिन वे इस देरी की रणनीति और फोरम शॉपिंग को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। हाई कोर्ट ने इन तरीकों को भांप लिया था।
सरदेसाई का कहना है कि खालिद के वकील तारीखें लेने और सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) वापस लेने में सही थे, क्योंकि यह मामला उस जज के पास लगा था जिसकी पहचान ऐसे मामलों में जमानत न देने के लिए रही है।
खालिद अपनी लंबी कैद को जमानत के आधार के रूप में कैसे इस्तेमाल करना चाहता था?
उमर खालिद की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि खालिद के वकील ही जानबूझकर देरी कर रहे हैं। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023 से 2024 के बीच कुल 14 तारीखों में से 7 बार सुनवाई खालिद के वकीलों ने ही टलवाई। यानी जमानत याचिका में देरी कोर्ट की धीमी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि खालिद की कानूनी रणनीति से हुई, ताकि जेल में लंबी कैद को जमानत का आधार बनाया जा सके।
अभियोजन ने यह भी बताया कि 2022 में हाई कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद खालिद ने लगभग 6 महीने तक सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल नहीं की और फिर अप्रैल 2023 में दाखिल करने के बाद इसे वापस ले लिया।
इसके लिए वकीलों ने ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला दिया। यह तथाकथित बदलाव दो कारणों से जुड़ा था। पहला जस्टिस अनिरुद्ध बोस के रिटायर होने के बाद बेंच में बदलाव हुआ और मामले को जस्टिस बेला त्रिवेदी के सामने सूचीबद्ध किया गया, जिसे खालिद के वकीलों ने बार-बार बदलवाने की कोशिश की।
दिलचस्प बात यह है कि ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने देरी का ठीकरा सुप्रीम कोर्ट पर फोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि SLP की सुनवाई टलने और अंत में फरवरी 2023 में इसे वापस लेने की वजह सुप्रीम कोर्ट की धीमी कार्यवाही और बदलती परिस्थितियाँ थीं। सिब्बल ने खालिद को न्यायिक व्यवस्था का शिकार दिखाने की कोशिश की, जबकि हकीकत यह थी कि वे इसी व्यवस्था का दुरुपयोग करके उसे रिहाई दिलाना चाहते थे।
यह भी महत्वपूर्ण है कि खालिद का मामला उस सिद्धांत पर खरा नहीं उतरता कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’, क्योंकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि UAPA मामलों में ‘जेल नियम है और जमानत अपवाद’।
पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने खालिद की टालमटोल की रणनीति की आलोचना की
उमर खालिद के वकीलों की फोरम शॉपिंग और जानबूझकर देरी करने की रणनीति पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ ने भी आपत्ति जताई थी। उन्होंने वही बातें दोहराईं जो अभियोजन पक्ष ने दिल्ली हाई कोर्ट में खालिद की जमानत सुनवाई के दौरान रखी थीं।
पूर्व CJI ने कहा कि खालिद के वकील बार-बार सुनवाई टलवाते रहे और सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले ली, लेकिन ऐसा माहौल बनाया जैसे पूरी न्यायिक व्यवस्था ही उनके खिलाफ काम कर रही हो।
Rajdeep supports Umarr Khalid bench hunting and bail plea withdrawals
मोदी सरकार ने हाल ही में बीमा पॉलिसियों पर ‘GST जीरो’ कर एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार के इस कदम की तारीफ चारों ओर हो रही है। लेकिन, हमेशा की तरह प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार इस फैसले से भी नाखुश दिख रहे हैं। पहले जब बीमा पर 18% जीएसटी लगता था, तब रवीश कुमार सरकार पर जमकर हमला करते थे। अब जब सरकार ने लोगों को राहत देते हुए इंश्योरेंस पर टैक्स 0% कर दिया है, उसके बाद भी वह सवाल उठा रहे हैं कि क्या वाकई GST जीरो होने से लाभ होगा।
रवीश कुमार 8 साल वाला हवाला तो दे रहे हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस काल में ऐसा फैसला कभी नहीं लिया गया, ये नहीं बता रहे हैं। इससे उनकी पत्रकारिता साफ झलकती है कि उनकी दुकान सिर्फ मोदी सरकार को कोसने से चलती है। और उनका लाभ कॉन्ग्रेस सरकार की खामियों पर पर्दा डालने से हैं।
रवीश का दोहरा मापदंड
पिछले साल प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल @ravishkumar.official पर एक वीडियो बनाकर डाला, जिसकी हेडलाइन ‘ममता की माँग: वापिस लो 18% GST’ थी। इस वीडियो में रवीश कुमार सरकार पर कई आरोप लगाते है। रवीश कुमार मेडिकल और स्वास्थ्य बीमा पर 18% GST का मुद्दा जोर-शोर से उठाते हैं। इसके अलावा इसे ‘जनविरोधी’ बताते हैं।
रवीश कुमार बताते है कि 18% GST होने से वरिष्ठ नागरिक सबसे ज्यादा परेशान है और दूसरे देशों की तुलना में यह सबसे ज्यादा है। रवीश कुमार सरकार पर गरीबों से पैसा लूटने का आरोप भी मड़ते है। उनके वीडियो में वह लगातार सरकार से सवाल करते कि वह बीमा पर टैक्स क्यों वसूल रही है। उस समय उनका तर्क था कि इस टैक्स से आम आदमी पर बोझ बढ़ रहा है, जिसे सरकार को वापस ले लेना चाहिए।
अब राहत मिली तो फिर हंगामा
अब जब सरकार ने वही किया, जिसकी माँग हो रही थी तो रवीश कुमार ने एक नई कहानी गढ़ ली। अब वह फिर से यूट्यूब पर वीडियो बनाकर पूछ रहे हैं कि क्या वाकई इंश्योरेंस पर ‘GST जीरो’ होने से कुछ लाभ होने वाला है??? रवीश कुमार को अब भी यकीन नहीं हो रहा कि जो काम कॉन्ग्रेस काल में नहीं हो पाया, वो काम मोदी सरकार ने एक झटके में कर दिखाया।
रवीश कुमार इस बात को बस हज़म नहीं कर पा रहे हैं कि इंश्योरेंस पर GST 18% से 0% कैसे हो गई, जो 70 साल से राज कर रही कॉन्ग्रेस में नहीं हो पाई। अपनी वीडियो में रवीश कुमार कह रहे है कि मोटा-मोटी वाला अनुमान दीजिए, क्योंकि उन्हें ‘जीरो’ GST समझ आने वाला नहीं है। इसके अलावा रवीश कुमार अपनी वीडियो में आरोप लगाते है, कि लोग प्राइवेट अस्पताल में इसलिए जाते हैं, क्योंकि सरकारी अस्पतालों की हालत ठीक नहीं है।
वहीं, सरकारी अस्पतालों की बात करते हुए उन्हें आइना दिखा देते हैं और याद दिलाते है 2014 के बाद की। स्वास्थ्य व्यय लगभग तीन गुना बढ़कर 95,958 करोड़ रुपए हुआ। सरकारी अस्पतालों में 50 करोड़ से ज्यादा नागरिकों को 5 लाख रुपए का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा मिला। ये पैसा अस्पताल में इलाज के लिए दिया गया, जिससे लोग इलाज के लिए अपनी जेबों से पैसा खर्च ना करें और सरकार की तरफ से मुफ्त इलाज आसानी से करवा सके।
इस योजना में पहले सिर्फ गरीब-मिडिल क्लास लोग ही शामिल थे, लेकिन अब इसमें 70 से ज्यादा उम्र के वृद्ध लोग भी शामिल कर दिए गए है। 40 करोड़ से ज्यादा लोग आयुष्मान कार्ड बनवाकर 17000+ सरकारी अस्पताल में लाभ ले रहे हैं। वहीं, 2014 के 80 केंद्रों से बढ़कर अब 16000+ केंद्र हुए, जहाँ 90% तक सस्ती दवाओं का लाभ लिया जा सकता है। इस सेवा से भी लोगों के 28,000 करोड़ रुपए की बचत का लाभ लिया हैं। रवीश कुमार कॉन्ग्रेस काल के सरकारी अस्पतालों की स्थिति को याद करते हुए रोते हैं और मोदी सरकार पर आरोप मढ़ देते हैं।
रवीश कुमार ने वीडियो में एक क्लिप दिखाई जिसमें पीएम मोदी इंदिरा गाँधी के टॉफी पर 21 प्रतिशत GST लगाने की बात कहते हैं और इसी का हवाला देते हुए निशाना साधते है। लेकिन रवीश कुमार भूल गए कि उसी इंदिरा गाँधी के दौर में इनकम टैक्स की दर एक समय में 97.5% तक पहुँच गई थी। और जवाहरलाल नेहरू के समय में 12 लाख कमाने वाले को 3 लाख टैक्स देना पड़ता था। लेकिन पुरानी बातें सोचने में शायद उन्हें मेहनत लगती है, इसलिए वह 10 साल वाली बातें ही सोच सकते हैं।
मोदी सरकार ने 12 लाख रुपए तक की आय को पूरी तरह से टैक्स-फ्री किया। यह फैसला मिडिल क्लास के लिए एक बड़ी राहत बनकर उभरा, जिससे उनकी जेब पर बोझ कम हुआ। लेकिन रवीश कुमार और उनके जैसे पत्रकार इस सकारात्मक बदलाव को देखने के बजाय सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं। रवीश जी, आरोप तो बहुत है, लेकिन अगर खोलने पर आए, तो एक किताब बन सकती है।
रवीश कुमार की ‘पत्रकारिता’ सिर्फ मोदी सरकार को गाली देने और कॉन्ग्रेस के ‘काले कारनामों’ पर पर्दा डालने तक सीमित है। उनकी हर रिपोर्ट और वीडियो में एक ही एजेंडा नजर आता है- सरकार की हर नीति में कमी निकालना, चाहे वह अच्छी हो या बुरी। GST पर उनके बदलते रुख से साफ है कि वह एक ‘टूटे हुए टेप रिकॉर्डर’ की तरह हैं जो हमेशा ‘सरकार के खिलाफ’ बजता रहता है।
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में इलाज और प्रार्थना के बहाने जनजातीय समुदाय के लोगों पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाए जाने का मामला सामने आया है। यहाँ लोगों से कहा जाता था कि दवा से ठीक ना हो तो प्रभु यीशु की प्रार्थना करो और ईसाई बन जाओ। पुलिस ने इस मामले में चार लोगों पर केस दर्ज किया है, जिनमें से तीन को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं एक अब भी फरार है।
शुक्रवार (5 सितंबर 2025) को रतलाम के औद्योगिक क्षेत्र स्थित टैंकर रोड पर एक झोपड़ी में प्रार्थना और इलाज के नाम पर जनजातीय महिलाओं और बच्चों को इकट्ठा किया गया था। सूचना मिलने पर हिंदू संगठनों के लोग वहाँ पहुंचे, तो उन्हें वहाँ बाइबल और क्रॉस मिले। कई लोगों की आँखों पर कपड़ा बाँधकर, सिर पर हाथ रखकर सामूहिक प्रार्थना करवाई जा रही थी। इनमें 18 साल से कम के लोग भी थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विरियाखेड़ी निवासी कैलाश निनामा, जो कि अनुसूचित जनजाति से हैं और मजदूरी करते हैं, उन्होंने पुलिस को बताया कि 4-5 महीने पहले बीमार होने पर वे मेडिकल कॉलेज इलाज के लिए गए थे। वहाँ उनकी मुलाकात जगदीश निनामा से हुई। जगदीश ने कहा कि अगर दवाइयों से फायदा न हो, तो प्रभु यीशु की प्रार्थना से राहत मिलेगी।
बाद में जगदीश ने कैलाश को बताया कि हर शुक्रवार को उसके भाई विक्रम के घर पर प्रार्थना होती है और वहाँ आकर वह भी ठीक हो सकते हैं। शुक्रवार (5 सितंबर) को कैलाश विक्रम के घर शिवनगर पहुँचे, जहाँ पहले प्रार्थना हुई, फिर प्रसाद दिया गया।
इसके बाद कैलाश ने बताया कि वहाँ मौजूद लोगों में शामिल जगदीश, विक्रम, मांगीलाल और अन्य ने उन पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया। कहा गया कि प्रार्थना से कई लोगों की बीमारियाँ ठीक हुई हैं। कैलाश का कहना है कि वहाँ का प्रसाद खाने से उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया।
पुलिस ने धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर तीन आरोपितों गंगासागर निवासी जगदीश निनामा, शिवनगर निवासी विक्रम निनामा और राजस्थान निवासी मांगीलाल को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, मौके से मुख्य आरोपी ‘डॉक्टर’ विक्रम फरार हो गया है।
आगरा में धर्मांतरण कराने वाले गिरोह को लेकर हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। अब ये पता चला है कि धर्मांतरण की प्रक्रिया काफी क्रूर और हैरान करने वाली थी। हिन्दू से ईसाई बनाने वाला गिरोह प्रार्थना सभा में लोगों को मांस खिलाकर खून पिलाता था। इसके बाद बाइबिल पढ़ाया जाता और कहा जाता था कि वे ईसाई बन गए हैं। इसके लिए उन्हें किसी तरह का सर्टिफिकेट या पेपर नहीं दिया जाता था।
इनलोगों को कभी भी कलावा नहीं बाँधने, तिलक नहीं लगाने और हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करने के लिए कहा जाता था। यहाँ तक कि अपने घर में ये देवी-देवताओं की मूर्तियाँ नहीं रख सकते थे। सभा में शामिल होने वालों से वादा किया जाता था कि ईसाई बनने पर उनकी जिंदगी सुधर जाएगी और सरकारी नौकरी भी मिल सकती है।
प्रार्थना सभा में गुगल मीट के जरिए कई लोग जुड़ते थे। यूट्यूब पर इसका वीडियो अपलोड किया जाता था। साथ ही ईसाईयत का प्रचार किया जाता था। ये बात भी आरोपितों ने पुलिस को बताया है कि अक्सर स्पेन और दुबई के लोग प्रार्थना सभा में जुडते थे। राजकुमार ने एक यूट्यूब चैनल भी बना रखा था, जिसका नाम है ‘Church of God Agra,’ इस पर हर रविवार की सभाओं के वीडियो डाले जाते थे।
इसके 176 सबस्क्राइबर हैं और 93 वीडियो अपलोड हैं। सभी वीडियो प्रार्थना सभा या उसके द्वारा दिए गए उपचार के हैं। इनमें से कुछ वीडियो ऐसे भी हैं जो मतांतरित होने वाले लोगों के हैं। इसमें वे कह रहे हैं कि प्रार्थना सभा में शामिल होने से उनकी बीमारी ठीक हो गई।
धर्मांतरण करने वाले गिरोह का मुख्य आरोपी राजकुमार लालवानी को फंड मुहैया कराया जाता था। उसके पास से डायरी और रजिस्टर बरामद हुए हैं। इनमें कई लोगों के नाम और नंबर हैं, जिसकी जाँच पुलिस कर रही हैं। राजकुमार को विदेश से भी फंडिंग हो रही थी। इसके अलावा महाराष्ट्र, हरियाणा से फंडिंग के सबूत मिले हैं। हालाँकि पैसे किसके खाते में आ रहे थे, कौन भेज रहा था। इसकी अभी जाँच चल रही है। लोग राजकुमार की बेटी के खाते में भी पैसे भेज रहे थे, इसकी जानकारी पुलिस के पास है।
उसने अब तक 500 से ज्यादा लोगों को ईसाइयत का पाठ पढ़ाया। करीब 5 साल पहले मुंबई के उल्लासनगर से राजकुमार ने ईसाइयत का प्रचार करना शुरू किया। इसके बाद आगरा उसके धर्मांतरण का अड्डा बना।
धर्म परिवर्तन करने वाला गिरोह ज्यादातर गरीबों और बीमारों को टारगेट करता था। इनलोगों को कष्ट दूर करने के बहाने बुलाता था और फिर उनका ब्रेनवॉश किया जाता था। हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को घर से बाहर करने और प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए कहा जाता था। राजकुमार केदारनगर में स्थित अपने घर में हर रविवार को ये सभा करता था। वहाँ आए लोगों से कहा जाता था कि मूर्तियाँ हटा दो, कलावा काट दो, सिंदूर और बिछुए उतार दो, तभी खुशहाली आएगी।