Home Blog Page 223

अब हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री, कभी कॉन्ग्रेस ने ही ‘धोखे’ से हराया था: सिद्दारमैया ने खोली ग्रैंड ओल्ड पार्टी की पोल, ‘वोट चोरी अभियान’ के बीच राहुल गाँधी को दिखाया आईना

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने कॉन्ग्रेस के कथित ‘वोट चोरी’ आरोपों की पोल खोल दी है। सीएम ने कहा कि 1991 में ‘वोट फ्रॉड’ के चलते हार मिली थी। इसके साथ ही जो कॉन्ग्रेस बीजेपी और चुनाव आयोग पर फर्जी आरोप लगा रही है, सिद्दारमैया का यह बयान अब कॉन्ग्रेस पर सवाल खड़े कर रहा है।

बीजेपी ने भी सिद्दारमैया के बयान पर कॉन्ग्रेस को जमकर घेरा। बीजेपी के अमित मालवीय ने तंज कसते हुए लिखा, “जो सिद्दारमैया एक समय पर कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ लड़े थे, आज उसी पार्टी के मुख्यमंत्री हैं। साथ ही बिहार में कॉन्ग्रेस की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ रैली का समर्थन कर रहे हैं। ये कैसी विडंबना है।”

सिद्दारमैया का यह बयान कर्नाटक में एक कार्यक्रम में बोलते हुए सामने आया, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस की पोल खोलते हुए खुद पर बीती ‘वोट चोरी’ का रोना रोया। उन्होंने कहा, “मैं 1991 में धोखे से हारा। मेरे वकील रविवर्मा कुमार ने मेरी मदद की थी।” उन्होंने खुद को कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ का पीड़ित बताया। सीएम के इस बयान से कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ हंगामे का फैक्टचेक हो गया है।

साल 1991 में सिद्दारमैया के साथ क्या धोखा हुआ?

कर्नाटक के सीएम सिद्दारमैया ने साल 1991 में हुए लोकसभा चुनाव का जिक्र किया। जब 34 साल पहले सिद्दारमैया ने जनता दल सेक्युलर (JDS) के टिकट पर कर्नाटक के कोप्पल से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में सिद्दारमैया को कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार बसवराज पाटिल अनवारी के सामने हार मिली। चुनाव में अनवारी को 2.41 लाख वोट मिले और जीत का अंतर सिर्फ 11,200 वोटों का था।

सिद्दारमैया ने इसके खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट में भी लड़ाई लड़ी। सिद्दारमैया ने हाई कोर्ट में वोटों की गिनती में धाँधली का दावा किया। उन्होंने आरोप लगाया था कि 22,423 वोटों को गलत तरीके से खारिज किया गया, जिनमें से ज्यादात उनके पक्ष में थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने यह भी आरोप लगाए कि अनवारी गैर-कानूनी ढंग से उम्मीदवार बना है क्योंकि लोकसभा स्पीकर ने अनवारी को पहले ही अयोग्य घोषित कर दिया था। आखिर में हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।

कर्नाटक मंत्री ने भी कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा के खिलाफ दिया था बयान

सीएम सिद्दारमैया से पहले कर्नाटक के मंत्री केएन राजन्ना भी कॉन्ग्रेस के ‘वोट चोरी’ वाले फर्जी दावे की पोल खोल चुके हैं। इसका फल उन्हें सरकार में अपना मंत्री पद गवाकर चुकाना पड़ा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉन्ग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक सीएम सिद्दारमैया को कैबिनेट से बर्खास्त करने के आदेश दिए थे।

दरअसल, केएन राजन्ना ने राहुल गाँधी के फैलाए गए कर्नाटक में ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा के खिलाफ अपनी ही पार्टी को घेरा था। उन्होंने कहा था, “मतदाता सूची तब बनाई गई थी, जब कर्नाटक में हमारी पार्टी सत्ता में थी।”

क्या कर्नाटक सीएम को भी देना पड़ेगा इस्तीफा?

ऐसे में बीजेपी ने अब कॉन्ग्रेस से सवाल किया है कि क्या कर्नाटक सीएम सिद्दारमैया के बयान पर भी उनका हश्र केएन राजन्ना जैसे ही किया जाएगा। यानि क्या सीएम राजन्ना को भी उनके पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। यह सवाल बीजेपी के अमित मालवीय ने एक्स पर की गई एक पोस्ट में किया।

अमित मालवीय ने लिखा, “कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुद राहुल गाँधी के तथाकथित ‘वोट चोरी’ अभियान की पोल खोल दी। क्या उनका भी वही हश्र होगा जो वरिष्ठ मंत्री केएन राजन्ना का हुआ था, जिन्हें सच बोलने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था? एक बात तो साफ है: कांग्रेस के भीतर भी, राहुल गाँधी की अंतहीन हरकतों को कोई गंभीरता से नहीं लेता।”

झारखंड में ST समाज की जमीनों को गलत तरीके से हड़पा, पूर्व मंत्री एनोस एक्का समेत 10 को कोर्ट ने पाया दोषी: हाई कोर्ट ने दिए थे CBI जाँच के आदेश

राँची की CBI कोर्ट ने झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का, उनकी पत्नी मेनन एक्का और 8 अन्य को शुक्रवार (29 अगस्त 2025) जनजातीय जमीन घोटाले में दोषी ठहराया। यह मामला 2006-2008 का है, जब एनोस ने अपनी पत्नी के नाम पर 1.18 करोड़ की जनजातीय जमीन खरीदी, जो CNT एक्ट के खिलाफ है। इस कानून में जनजातीय जमीन गैर-जनजातीय को बेचना मना है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन सभी पर CNT एक्ट (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908) का उल्लंघन कर जनजातियों की जमीन धोखे से खरीदने का आरोप था। कोर्ट ने फैसला सुनाने के बाद सभी दोषियों को जेल भेज दिया। फर्जी दस्तावेज और गलत अनुमति के जरिए यह सौदा हुआ। 2008-09 में जनहित याचिकाओं के बाद हाई कोर्ट ने CBI जाँच के आदेश दिए। CBI ने 2010 में केस दर्ज किया और 2012 में चार्जशीट दाखिल की।

दोषी ठहराए गए 10 लोगों में एनोस एक्का (पूर्व मंत्री), उनकी पत्नी मेनन एक्का, कार्तिक कुमार प्रभात, राज किशोर सिंह, फिरोज अख्तर, बृजेश मिश्रा, अनिल कुमार, मणिलाल महतो, ब्रजेश्वर महतो, परशुराम करकेट्टा शामिल हैं। वहीं, गोवर्धन बैठा नाम के एक आरोपित को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।

क्या है मामला?

CBI के मुताबिक, 2006 से 2008 के बीच एनोस एक्का ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए रांची में करीब 1.18 करोड़ रुपये की जमीन अपनी पत्नी के नाम पर खरीदी। ये जमीन जनजातीय समुदाय से संबंधित थी, जिसे CNT एक्ट के तहत गैर-जनजातीय को बेचना मना है।

इसके बाद भी फर्जी पते और गलत दस्तावेजों के आधार पर यह जमीनें खरीदी गईं। कई मामलों में विक्रेताओं ने भूमि सुधार उपसमाहर्ता (LRDC) से गलत तरीके से अनुमति भी ली थी।

साल 2008 और 2009 में दो जनहित याचिकाएँ दायर की गई थीं, जिनके आधार पर झारखंड हाई कोर्ट ने CBI जाँच के आदेश दिए। इसके बाद CBI ने 11 अगस्त 2010 को एनोस एक्का, हरिनारायण राय और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। 10 दिसंबर 2012 को CBI ने 16 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।

क्या है CNT एक्ट?

CNT एक्ट 1908 (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम) जनजातीय समुदाय की जमीन की सुरक्षा के लिए बना कानून है। इसके तहत जनजातीय जमीन को गैर- जनजातीय को बेचना या ट्रांसफर करना प्रतिबंधित है। यह कानून अंग्रेजों के समय, 1908 में लागू किया गया था और आज भी झारखंड में लागू है।

एनोस एक्का का राजनीतिक और आपराधिक इतिहास

2005, 2009 और 2014 में एनोस एक्का कोलेबिरा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे 2005 से 2008 तक मधु कोड़ा सरकार में मंत्री भी रहे। साल 2014 में एनोस एक्का को एक पारा शिक्षक मनोज कुमार की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था।

जुलाई 2018 में कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस तरह अब एनोस एक्का पर हत्या मामले के बाद जमीन घोटाले में भी दोष सिद्ध हो चुका है।

डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी ने अमेरिका की वैश्विक साख को ‘गटर’ में पहुँचाया: US के पूर्व NSA जेक सुलिवन, कहा – दशकों की मेहनत पर फिरा पानी, बीजिंग के करीब जा रहा भारत

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इन टैरिफ ने अमेरिका की वैश्विक साख को ‘गटर में’ पहुचा दिया है। सुलिवन ने चेतावनी दी कि ये कदम भारत को चीन के करीब ले जा रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच दशकों की मेहनत से बनी रणनीतिक साझेदारी खतरे में पड़ गई है।

सुलिवन ने ‘द बुलवर्क पॉडकास्ट’ में टिम मिलर से बात करते हुए कहा कि ट्रंप की नीतियों ने अमेरिका को अपने सहयोगियों के लिए ‘भरोसेमंद साथी’ की बजाय ‘बड़ा बाधक’ बना दिया है। उन्होंने बताया कि दुनिया भर के नेता अब अमेरिका से दूरी बनाने की बात कर रहे हैं।

सुलिवन ने कहा, “पहले अमेरिका को स्थिर और भरोसेमंद माना जाता था, लेकिन अब कई देशों में चीन की साख बढ़ गई है। लोग कह रहे हैं कि अमेरिका की छवि खराब हो चुकी है और चीन ज़िम्मेदार खिलाड़ी बनकर उभर रहा है।”

भारत पर बात करते हुए सुलिवन ने कहा कि अमेरिका ने सालों तक भारत के साथ गहरे और टिकाऊ रिश्ते बनाने की कोशिश की, खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए। लेकिन ट्रंप के 50% टैरिफ (25% रूस से तेल खरीदने की सजा) की वजह से भारत अमेरिका से इतर भी सोच रहा है।

सुलिवन ने कहा, “भारत अब सोच रहा है कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए हमें बीजिंग जाकर चीन के साथ बात करनी पड़ रही है।” ये टैरिफ 27 अगस्त से लागू हो गए हैं और इससे भारत के टेक्सटाइल, ज्वैलरी और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में नौकरियों और विकास पर बुरा असर पड़ सकता है।

सुलिवन ने ये भी बताया कि भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिशें दोनों पार्टियों (डेमोक्रेट और रिपब्लिकन) ने मिलकर की थीं, लेकिन ट्रंप की नीतियों ने इसे नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे महत्वपूर्ण सहयोगी को खोना अमेरिका के लिए बड़ा नुकसान होगा, खासकर जब भारत को चीन के खिलाफ एक रणनीतिक साझेदार के तौर पर देखा जाता है।

इसके अलावा, एक और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भी ट्रंप की नीतियों को ‘उलझा हुआ’ बताया। उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में कहा कि भारत-अमेरिका रिश्ते अभी ‘बुरे दौर’ में हैं।

बोल्टन ने सवाल उठाया कि जब चीन भी रूस से तेल खरीदता है, तो सिर्फ भारत को ही 25% अतिरिक्त टैरिफ की सजा क्यों दी जा रही है? उन्होंने ट्रंप को ‘असामान्य राष्ट्रपति’ कहा और सुझाव दिया कि उनके बचे हुए कार्यकाल में द्विपक्षीय रिश्तों को और नुकसान से बचाने की कोशिश होनी चाहिए।

जेफ़रीज़ की एक रिपोर्ट ने भी कहा कि टैरिफ की एक वजह ट्रंप की नाराज़गी है, क्योंकि भारत ने उन्हें भारत-पाकिस्तान विवाद में मध्यस्थता करने से मना किया था। साथ ही, भारत के कृषि क्षेत्र को आयात से बचाने की नीति भी टैरिफ का कारण बनी। भारत ने इन टैरिफ को ‘अनुचित और गलत’ बताया है।

सुलिवन और बोल्टन जैसे विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है कि ये टैरिफ न सिर्फ भारत-अमेरिका रिश्तों को नुकसान पहुँचा रहे हैं, बल्कि भारत को चीन के करीब धकेल रहे हैं, जो अमेरिका के लिए रणनीतिक तौर पर बड़ा झटका हो सकता है।

लव जिहाद की फंडिंग करने वाले कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी उर्फ डकैत को वकीलों ने कूटा, कोर्ट ने दी 8 दिन की रिमांड: हिंदू लड़कियों को फाँसने के लिए मुस्लिम लड़कों को देता था लाखों रुपए

इंदौर में लव जिहाद की फंडिंग करने वाला कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी उर्फ अनवर डकैत ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया। वह डाढ़ी और मूंछ कटाकर बदले हुए वेश में कोर्ट पहुँचा। यहाँ कोर्ट ने पुलिस को कादरी की 8 दिन की रिमांड दी है। कोर्ट से बाहर निकलते ही कादरी को वकीलों ने घेरकर पीटना शुरू कर दिया।

पुलिस हिरासत में कादरी को किसी तरह छुड़ाया गया। पुलिस उसे भगाते हुए कोर्ट के गेट के बाहर ले गई और गाड़ी में बिठाकर रवाना हो गई। अब पुलिस हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए मुस्लिम लड़कों को पैसे देने के मामले में उससे पूछताछ करेगी।

दरअसल, 14 जून 2025 को सामने आए लव जिहाद के मामले में आरोपित साहिल खान और अल्ताफ खान ने स्वीकार किया था कि कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी ने उन्हें लड़िकयों का धर्म परिवर्तन करवाने के लिए ₹3 लाख रुपए दिए थे। दोनों आरोपितों को रेप समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज कर गिरफ्तार किया गया था।

अनवर कादरी पर ₹40 हजार का इनाम था

लव जिहाद की फंडिंग में नाम आने के बाद से ही कॉन्ग्रेस पार्षद फरार चल रहा था। इंदौर के बाणगंगा पुलिस ने पिछले दो महीने में उसकी तलाश में उसके रिश्तेदारों और करीबियों के घर दबिश दी। उसका कुछ पता ना लगने पर पुलिस ने ₹10 हजार इनाम घोषित किया था, जिसे बाद में ₹40 हजार कर दिया गया।

वहीं पुलिस ने लव जिहाद फंडिंग मामले में आरोपित उसकी बेटी आयशा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। हालाँकि, फिलहाल आयशा जमानत पर जेल से बाहर है।

अनवर कादरी पर 19 अपराधिक मुकदमे दर्ज

कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी पर इंदौर के तमाम थानों में 19 अपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें जानलेवा हमला, डकैती, बलवा, अवैध हथियार रखना और जमीन कब्जा करना शामिल है। इन्हीं मामलों में पहले इंदौर कलेक्टर आशीष सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तार करने का आदेश भी जारी किया था।

लव जिहाद फंडिंग मामले में अनवर कादरी का नाम सामने आया

इतने अपराधिक मुकदमे दर्ज होने के बावजूद अनवर कादरी बेखौफ जुर्म की दुनिया में पैर-पसार रहा था। वह मुस्लिम लड़कों को पैसे देकर हिंदू लड़कियों से रेप और धर्म परिवर्तन करवाता था। इंदौर के ही एक लव जिहाद मामले के आरोपितों ने उसका नाम लिया, जिसके बाद से उसकी गिरफ्तारी के आदेश जारी हो गए। हालाँकि, अनवर तभी से फरार हो गया।

यह मामला 14 जून 2025 को दो पीड़िता की शिकायत का है, जिसमें दो आरोपित साहिल खान और अल्ताफ खान पर लव जिहाद और धर्मांतरण का आरोप लगाया था। पुलिस ने दोनों आरोपितो को गिरफ्तार किया। दोनों ने पुलिस की पूछताछ में कॉन्ग्रेस पार्षद अनवर कादरी द्वारा पैसे दिए जाने की बात कबूली थी।

पाकिस्तान से आए हिंदुओं को SC से बड़ी राहत, 800+ के विस्थापन पर लगाई रोक: दिल्ली के मजनू का टीला में रहने वाले परिवारों को मिली राहत, HC ने दिया था बेदखली का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (29 अगस्त 2025) को दिल्ली के मजनू का टीला में रह रहे लगभग 800 पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को हटाने के आदेश पर रोक लगा दी है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने हिंदू शरणार्थियों को हटाने का आदेश जारी किया था।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को नोटिस जारी किया है और दिल्ली हाई कोर्ट के मई 2025 में दिए गए आदेश को फिलहाल के लिए स्थगित कर दिया है।

DDA ने मार्च और जुलाई 2024 में शरणार्थी शिविर को खाली करने के नोटिस जारी किए थे, लेकिन उस समय कार्रवाई नहीं की गई। जुलाई 2025 में फिर से नोटिस चिपकाए गए, जिससे यह अंदेशा बना कि किसी भी वक्त उनको यहाँ से हटाया जा सकता है।

यह याचिका धर्मवीर बागड़ी और अन्य लोगों द्वारा एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हाई कोर्ट का आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है। यह जीने के अधिकार और सम्मान के साथ जीवन जीने की अनुमति देता है। उन्होंने कहा कि बिना छत के इंसान की गरिमा नहीं रह सकती और यह उनके रोजगार के अधिकार को भी प्रभावित करता है।

बता दें कि ये शरणार्थी पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा प्रताड़ना से बचने के लिए भारत आए हैं। शिविर में करीब 250-260 परिवार रह रहे हैं, जिनमें से कुछ को भारतीय नागरिकता मिल चुकी है, जबकि बाकी के आवेदन प्रक्रिया में हैं। इनमें से अधिकतर लोग बहुत गरीब हैं और दिहाड़ी मजदूरी, घरेलू काम आदि करके जीवन यापन करते हैं। अधिकांश लोग अनुसूचित जातियों से आते हैं।

याचिका में कहा गया कि हाई कोर्ट ने 12 दिसंबर 2019 को लागू नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को नजरअंदाज कर दिया, जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि DDA को इन शरणार्थियों के लिए वैकल्पिक आवास या पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए, क्योंकि इन्हें जबरन हटाना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

url – Supreme Court suspends the order to remove about 800 Pakistani Hindus living in the refugee camp built in Majnu Ka Tila, Delhi

जापान दौरे के दूसरे दिन PM मोदी ने की बुलेट ट्रेन की सवारी, ट्रेनिंग ले रहे भारतीय ड्राइवरों से भी की मुलाकात: 16 राज्यों के गवर्नर्स से भी मिले, आतंकवाद के खिलाफ दोनों देश आए साथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जापान दौरे के दूसरे दिन टोक्यो में 16 जापानी प्रांतों के गवर्नर से मुलाकात की। इस दौरान पीएम मोदी ने भारत-जापान विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी के तहत राज्य-प्रांत सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया।

इस चर्चा में टेक्नोलॉजी, नवाचार, निवेश, कौशल, स्टार्टअप और छोटे-मध्यम उद्यमों (SME) के क्षेत्र में भारत के राज्यों और जापानी प्रांतों के बीच साझेदारी को और मजबूत करने के तरीकों पर ध्यान दिया गया।

इसके बाद पीएम मोदी बुलेट ट्रेन से जापान के पीएम शिगेरु इशिबा के साथ टोक्यो से सेंदाई गए। इससे पहले पीएम मोदी ने भारतीय ट्रेन ड्राइवरों से भी मुलाकात की, जो जापान में रहकर ट्रेनिंग ले रहे हैं।

जापान के पीएम शिगेरू इशिबा ने पीएम मोदी के साथ बुलेट ट्रेन में सफर करते हुए तस्वीरें एक्स पर पोस्ट की। उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेंडई की ओर जा रहा हूँ। कल रात से ही सिलसिला जारी है और मैं आपके साथ कार में रहूँगा।”

जापान के अपने दूसरे दिन के दौरे पर अब पीएम मोदी जापानी प्रधानमंत्री के साथ लंच करेंगे। फिर 4 इलेक्ट्रोन फैक्ट्रियों का दौरा करेंगे, जिनमें से एक E10 शिंकानसेन बुलेट ट्रेन का प्रोटोटाइप है। इसे भारत के खरीदने की भी उम्मीद जताई जा रही हैं। इसके बाद पीएम मोदी चीन के लिए रवाना होंगे।

पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की

जापान ने भारत में पहलगाम आतंकी हमले की भी कड़ी निंदा की। साथ ही कहा कि इस हमले के जिम्मेदार आतंकी, उनके आयोजक और फाइनेंसर को बिना किसी देरी के न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए। पीएम मोदी और जापान के पीएम शिगेरु इशिबा के बीच शिखर वार्ता के बाद शुक्रवार (29 अगस्त 2025) को जारी संयुक्त बयान में यह बात कही गई।

दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र ने घोषित किए आतंकी संगठनों और उनके सहयोगी जैसे लश्कर-ए-तैयबा(LeT), जैश-ए-मोहम्मद (JeM), अल कायदा और ISIS के खिलाफ ठोस और सामूहिक कार्रवाई की अपील भी की।

दोनों नेताओं ने यह भी दोहराया कि इन आतंकी संगठनों के ठिकानों को तोड़ना, आतंकी फंडिंग चैनलों को खत्म करना और आतंकवाद के नेटवर्क को तोड़ना बहुत जरुरी है।

चंद्रयान-5 जापान के रॉकेट से होगा लॉन्च

पीएम नरेंद्र मोदी 15वें भारत-जापान समिट में हिस्सा लेने पहुँचे। यहाँ दोनों देशों के बीच कई MoU एक्सचेंज किए गए। इसमें चंद्रयान-5 को लेकर भी भारत-जापान के बीच समझौता हुआ है। यह मिशन दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों, ISRO और JAXA का संयुक्त मिशन होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मिशन के तहत चाँद के दक्षिणी ध्रुव का अध्ययन किया जाएगा। इस मिशन में JAXA के H3-24L रॉकेट को भेजा जाएगा, जिसमें ISRO द्वारा बनाए गए चंद्र लैंडर होंगे। जो जापान में बने चंद्र रोवर को ले जाएगा।

ट्रंप की टैरिफ नीति संविधान के खिलाफ, शक्तियों का किया गलत इस्तेमाल… US कोर्ट ने ‘वसूली’ को बताया गैरकानूनी: डोनाल्ड बोले – ये फैसला अमेरिका को कर देगा बर्बाद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी कोर्ट ने उनके द्वारा लगाए टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया है। यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स ने कहा कि ट्रंप ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकनॉमिक पॉवर्स एक्ट का सहारा लेकर कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए, जो संविधान के खिलाफ है।

कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा

अमेरिका की बड़ी अदालत यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने 7-4 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने टैरिफ लगाने के लिए अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट का कहना था कि अमेरिकी संविधान के मुताबिक, टैरिफ या टैक्स लगाने का अधिकार मुख्य रूप से कॉन्ग्रेस के पास है। राष्ट्रपति को हर देश पर अपनी मर्जी से टैरिफ लगाने की छूट नहीं दी जा सकती।

डोनाल्ड ट्रंप ने इन टैरिफ को लागू करने के लिए इंटरनेशनल इमरजेंसी इकनॉमिक पॉवर्स एक्ट (IEEPA) का सहारा लिया था। इस कानून के तहत राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में कुछ खास कदम उठा सकते हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि ट्रंप का यह कदम इस कानून के दायरे से बाहर था।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ट्रंप की टैरिफ नीति उनकी शक्तियों का अतिक्रमण थी। इसका मतलब है कि उन्होंने उस अधिकार का इस्तेमाल किया, जो उनके पास था ही नहीं। हालाँकि कोर्ट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए तुरंत टैरिफ हटाने का आदेश नहीं दिया। इसके बजाय ट्रंप प्रशासन को अक्टूबर 2025 तक का समय दिया गया है, ताकि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकें। इससे पहले न्यूयॉर्क की फेडरल ट्रेड कोर्ट ने भी ऐसा ही फैसला सुनाया था, जिसे अब इस अपील कोर्ट ने बरकरार रखा है।

ट्रंप को टैरिफ लगाने का असीमित अधिकार खतरनाक

अमेरिकी कानूनी जानकारों का मानना है कि कोर्ट का यह फैसला अमेरिकी व्यापार के हित में है। अगर सुप्रीम कोर्ट भी इस फैसले को बरकरार रखता है, तो यह ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी चेतावनी होगी। यह साफ हो जाएगा कि राष्ट्रपति अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर टैरिफ हटाए गए, तो सरकार को कुछ आयात करों को वापस करना पड़ सकता है, जिससे अमेरिकी ट्रेजरी को नुकसान हो सकता है। लेकिन कोर्ट का मानना है कि ट्रंप को दुनिया के हर देश पर टैरिफ लगाने का असीमित अधिकार नहीं दिया जा सकता।

ये फैसला अमेरिका को कर देगा बर्बाद: ट्रंप

कोर्ट के इस फैसले से डोनाल्ड ट्रंप भड़क गए हैं। उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण और गलत बताया। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर ट्रंप ने लिखा, “सभी टैरिफ अभी भी लागू हैं। एक अति पक्षपातपूर्ण अपील कोर्ट ने गलत फैसला सुनाया, लेकिन हमें यकीन है कि अंत में अमेरिका की जीत होगी। अगर ये टैरिफ हटाए गए, तो यह अमेरिका के लिए विनाशकारी होगा। यह हमें आर्थिक रूप से कमजोर कर देगा।”

ट्रंप का कहना है कि टैरिफ अमेरिकी मजदूरों और कंपनियों की रक्षा करते हैं। उनके मुताबिक, दूसरे देशों ने सालों तक अमेरिका के खिलाफ टैरिफ और व्यापारिक बाधाओं का इस्तेमाल किया, जिससे अमेरिकी निर्माता और किसान कमजोर हुए। अब वे टैरिफ के जरिए अमेरिका को फिर से मजबूत और समृद्ध बनाना चाहते हैं। ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी कि अगर कोर्ट का फैसला लागू हुआ, तो अमेरिका को भारी व्यापार घाटे का सामना करना पड़ेगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।

टैरिफ का मतलब और ट्रंप का फैसला

अब इस टैरिफ का मतलब समझ लें। टैरिफ यानी आयात कर, जो किसी देश से आने वाले सामान पर लगाया जाता है। इससे सामान की कीमत बढ़ जाती है और उस देश का सामान खरीदना महँगा पड़ता है। ट्रंप ने अपने कार्यकाल में कई देशों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए, खासकर उन देशों पर जिनके साथ अमेरिका का व्यापार घाटा था। व्यापार घाटा यानी जब कोई देश दूसरे देश से ज्यादा सामान खरीदता है और कम बेचता है।

ट्रंप का कहना था कि ये टैरिफ अमेरिकी कंपनियों और मजदूरों को फायदा पहुँचाएँगे, क्योंकि इससे विदेशी सामान महंगा होगा और लोग अमेरिकी सामान खरीदेंगे। 2 अप्रैल 2025 को ट्रंप ने करीब 60 देशों और व्यापारिक समूहों पर नए टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। यह पिछले 100 सालों में अमेरिका द्वारा टैरिफ में की गई सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी। उन्होंने इसे ‘मुक्ति दिवस’ का नाम दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया यही फैसला, तो ट्रंप को हटाने पड़ जाएँगे टैरिफ

ट्रंप अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। उनके पास 14 अक्टूबर 2025 तक का समय है। अगर सुप्रीम कोर्ट भी अपील कोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो ट्रंप को अपने टैरिफ हटाने पड़ सकते हैं। इससे उनकी नीतियों को बड़ा झटका लगेगा। ट्रंप का मानना है कि टैरिफ अमेरिका को आर्थिक रूप से मजबूत बनाते हैं, लेकिन कोर्ट और कई जानकार इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि टैरिफ से उपभोक्ताओं को नुकसान होता है, क्योंकि सामान की कीमतें बढ़ जाती हैं।

सीमावर्ती इलाकों में तेजी से बदल रही डेमोग्राफिक, गृह मंत्रालय ने जताई चिंता: UP से लेकर असम और नेपाल तक 10 सालों में मुस्लिम आबादी हुई दोगुनी, धर्मांतरण-विदेशी फंडिंग सबसे बड़ा कारण

देश के कई सीमावर्ती इलाकों खासकर उत्तर प्रदेश, असम और नेपाल से सटे जिलों में अचानक और असंतुलित जनसांख्यिकीय बदलाव (डेमोग्राफिक बदलाव) को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गहरी चिंता जाहिर की है। हाल ही में यूपी के संभल और असम के 11 जिलों में हुई जाँचों और रिपोर्टों से सामने आया है कि इन इलाकों में हिंदू आबादी तेजी से घट रही है, जबकि एक विशेष समुदाय (मुस्लिम) की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी के तीन सबसे संवेदनशील जिले श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में बीते 10 वर्षों में एक विशेष समुदाय (मुस्लिम) की जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है। सुरक्षा एजेंसियों ने इन इलाकों में विदेशी फंडिंग, जाली नोटों की तस्करी और अवैध धर्मांतरण जैसे गंभीर मामले पकड़े हैं। इन गतिविधियों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI की भूमिका की भी आशंका जताई गई है।

यह सिर्फ यूपी की बात नहीं है। असम में स्थिति और भी गंभीर है। यहाँ के कम से कम 11 जिलों में हिंदू अब अल्पसंख्यक बन चुके हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी वजह बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ, ज्यादा जन्म दर और संगठित अतिक्रमण है। खुद असम के मुख्यमंत्री का कहना है कि अगर यही रफ्तार बनी रही तो 2041 तक राज्य में हिंदू और मुस्लिम आबादी 50-50 हो सकती है।

ये आँकड़े केवल जनसंख्या बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरे की घंटी हैं। गृह मंत्रालय ने संबंधित जिलों के अधिकारियों को सख्त निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। नेपाल बॉर्डर पर भी यही पैटर्न देखा जा रहा है, जहाँ हिंदू जनसंख्या घट रही है, जबकि अन्य समुदायों की आबादी में बढ़ोतरी हो रही है।

यूपी में डेमोग्राफी का बदलाव

संभल जिले से आई एक ताज़ा कमेटी रिपोर्ट ने जनसंख्या के बदलाव को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए। रिपोर्ट के अनुसार, आज़ादी के समय संभल नगर पालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी करीब 45 फीसदी थी, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 15 फीसदी रह गई है। यह बदलाव महज़ आँकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं माना जा रहा, बल्कि रिपोर्ट में इसे एक ‘सुनियोजित साजिश’ और ‘एथनिक क्लीनिंग’ जैसा गंभीर मामला बताया गया है। इसमें न सिर्फ जनसंख्या का संतुलन बदला गया है, बल्कि मंदिरों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने के भी प्रमाण मिले हैं, जिससे साफ है कि यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से हुआ है।

यही स्थिति अब उत्तर प्रदेश के नेपाल सीमा से सटे संवेदनशील जिलों श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में भी सामने आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में इन इलाकों में जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदला है। रिपोर्टों के अनुसार, यहाँ अवैध रूप से धार्मिक स्थलों का निर्माण बढ़ा है और सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से अतिक्रमण किया जा रहा है। स्थानीय लोग पलायन को मजबूर हो रहे हैं, जबकि बाहरी लोग बड़ी संख्या में यहाँ बसते जा रहे हैं। इसी के साथ इन क्षेत्रों में मानव तस्करी, अवैध धर्मांतरण और आपराधिक गतिविधियों में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिससे यह इलाका सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

असम में भी वही कहानी

असम में जनसंख्या के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जिसे लेकर राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही चिंतित हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, उस समय असम के 9 जिले मुस्लिम बहुल थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर कम से कम 11 हो गई है। इस बदलाव के पीछे क्या कारण हैं, इसे लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने साफ तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठ, मुस्लिम समुदाय की ऊँची जन्म दर और जमीन पर अवैध कब्जों को जिम्मेदार ठहराया है।

मुख्यमंत्री सरमा का मानना है कि अगर यही प्रवृत्ति बनी रही तो 2041 तक राज्य में हिंदू और मुस्लिम आबादी का अनुपात बराबरी पर आ सकता है। उन्होंने इस बदलाव को केवल जनसंख्या का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन से जुड़ा एक गंभीर विषय बताया है। असम जैसे सीमावर्ती और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील राज्य के लिए यह बदलाव कई तरह की चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।

धर्मांतरण और विदेशी फंडिंग का जाल

जाँच में सामने आया है कि सीमावर्ती इलाकों में हो रहे जनसांख्यिकीय और धार्मिक बदलावों के पीछे विदेशी फंडिंग की बड़ी भूमिका है। खासकर बलरामपुर में अवैध धर्मांतरण के आरोपित छांगुर पीर का मामला इस साजिश की गहराई को उजागर करता है। छांगुर पीर ने नेपाल के बैंक खातों के ज़रिए विदेश से बड़ी मात्रा में पैसा मँगवाया और उसका इस्तेमाल सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण के लिए किया।

जाँच में यह भी पाया गया कि क्षेत्र में ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय रूप से दलित और गरीब परिवारों को निशाना बनाकर उनका धर्मांतरण करा रही थीं। इन घटनाओं के बीच एक और गंभीर मामला तब सामने आया जब पाकिस्तान को ₹100 करोड़ की टेरर फंडिंग का सुराग मिला।

सरकार की कार्रवाई

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीमावर्ती इलाकों में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव और अवैध धार्मिक गतिविधियों के मामलों को बेहद गंभीरता से लिया है। दरअसल, अक्टूबर 2024 में ‘अमर उजाला’ ने इस मुद्दे पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें नेपाल सीमा से सटे इलाकों में अवैध मदरसों के निर्माण, घुसपैठ की साजिश और मजहबी शिक्षा की आड़ में देशविरोधी गतिविधियों का खुलासा किया गया था। अब मंत्रालय ने इस रिपोर्ट के आधार पर उत्तर प्रदेश के सभी सीमावर्ती जिलों के DM और SP को सख्त कार्रवाई के निर्देश जारी किए हैं।

बलरामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी अरविंद सिंह ने भी 2024 में इस पूरे नेटवर्क और विदेशी फंडिंग के संबंध में शासन को एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट भेजी थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने कुछ स्थानीय पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि उस वक्त उनकी रिपोर्ट को दबा दिया गया और उन्हें जिले से हटा दिया गया। अब जबकि केंद्र सरकार इस मामले को प्राथमिकता दे रही है, उसी रिपोर्ट को फिर से खंगालकर नए सिरे से जाँच शुरू कर दी गई है।

इस पूरे मुद्दे की गंभीरता सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल में भी 2021 की जनगणना में हिंदू आबादी में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि मुस्लिम और ईसाई आबादी में बढ़ोतरी देखी गई है। चूंकि इन दोनों देशों की सीमाएँ खुली हैं और सामाजिक व धार्मिक गतिविधियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं, इसलिए भारत सरकार ने नेपाल से भी सहयोग माँगा है ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखी जा सके और अवैध गतिविधियों पर कड़ा अंकुश लगाया जा सके।

जापान के निवेश से भारत के आर्थिक विकास की नई उड़ान: जानें बिजली उत्पादन से सेमीकंडक्टर और ऑटो सेक्टर से गाँवों तक कैसे बदल रही है अर्थव्यवस्था की तस्वीर

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय जापान यात्रा पर हैं। इस दौरान उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के साथ द्विपक्षीय वार्ता की है। दोनों नेता सांस्कृतिक रिश्तों, सभ्यतागत जुड़ाव और आर्थिक साझेदारी को और मजबूत कर रहे हैं।

मई 2025 में भारत नॉमिनल जीडीपी (GDP) के मामले में जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। इसके बावजूद भारत को जापान से विनिर्माण, तकनीक, निवेश और मानव संसाधन सहयोग के क्षेत्र में बड़ा लाभ मिलता है। भारत-जापान की साझेदारी सिर्फ उद्योगों को नहीं बल्कि किसानों, छात्रों और उद्यमियों के जीवन को भी नई दिशा दे रही है।

भारत में लगातार बढ़ रहा है जापानी निवेश

पिछले दो वर्षों में भारत में जापान से लगातार निवेश बढ़ा है, जो हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर जापान का भरोसा दिखाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत और जापान के बीच अब तक 170 से ज्यादा समझौते (MoUs) हुए हैं, जिनकी कुल कीमत 13 अरब डॉलर (1,07,900 करोड़ रुपए) से अधिक है।

उदाहरण के तौर पर, निप्पॉन स्टील गुजरात और आंध्र प्रदेश में बड़े प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। इसमें 56 अरब रुपए की लागत से एक विशाल स्टील प्लांट शामिल है, जो भारत की निर्माण क्षमता को और मजबूत करेगा।

इसी तरह, जेएफई स्टील 445 अरब रुपए बिजली उत्पादन में काम आने वाले ‘इलेक्ट्रिकल स्टील’ बनाने पर खर्च करेगी, जो भारत के बढ़ते पावर सेक्टर के लिए बेहद जरूरी है। ये प्रोजेक्ट्स हजारों नए रोजगार भी देंगे।

जापानी ऑटोमोबाइल कंपनियाँ भी भारत के विकास में बड़ा योगदान दे रही हैं। सुजुकी मोटर गुजरात में 350 अरब रुपए का नया प्लांट बना रही है और उत्पादन क्षमता बढ़ा रही है। वहीं टोयोटा किरलोस्कर कर्नाटक (33 अरब रुपए) और महाराष्ट्र (200 अरब रुपए) में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के उत्पादन के लिए निवेश कर रही है। ये पहल भारत को भविष्य का ‘क्लीन मोबिलिटी हब’ बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

निर्माण के अलावा, जापानी कंपनियाँ रियल एस्टेट, नवीकरणीय ऊर्जा और एयरोस्पेस में भी उतर रही हैं। सुमितोमो रियल्टी 4.76 अरब डॉलर (39,508 करोड़ रुपए) शहरी विकास में लगाने जा रही है।

ओसाका गैस नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन पर ध्यान देगी। वहीं, एस्त्रोस्केल इसरो के साथ मिलकर भारत के PSLV के जरिए उपग्रह प्रक्षेपण करेगी। भारत-जापान की ये साझेदारी उद्योग, ऊर्जा, रोजगार और तकनीक हर क्षेत्र में देश के भविष्य को नई उड़ान दे रही है।

जापान के साथ साझेदारी के कारण भारतीय एसएमई वैश्विक वैल्यू चेन का बन रहे हिस्सा

भारत–जापान साझेदारी की एक बड़ी खासियत यह है कि इसका सीधा असर छोटे और मझले उद्योगों (SMEs) पर पड़ रहा है। कई दशकों से भारतीय SMEs सीमित बाजार और तकनीक की कमी जैसी चुनौतियों से जूझते रहे हैं।

जापानी कंपनियों के सहयोग से अब ये अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में शामिल हो रहे हैं। सेमीकंडक्टर क्षेत्र में Tokyo Electron, Fujifilm और Tata Electronics के साथ साझेदारी से भारतीय सप्लायर्स वैश्विक चिप उद्योग का हिस्सा बन रहे हैं। इससे स्थानीय कंपनियाँ उत्पादन और गुणवत्ता नियंत्रण में विश्वस्तरीय मानक अपनाने लगी हैं।

ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी SMEs की तेजी से भागीदारी बढ़ रही है। Toyota और Suzuki अपने सप्लायर नेटवर्क को भारत की टियर-2 और टियर-3 कंपनियों तक बढ़ा रहे हैं।

डिजिटल क्षेत्र में Fujitsu का ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर 9,000 भारतीय इंजीनियरों को नियुक्त कर रहा है, जिससे आईटी से जुड़े SMEs को भी कारोबार मिल रहा है। इन पहलों के कारण भारतीय SMEs को उन्नत तकनीक, आधुनिक कारोबारी तरीकों और वैश्विक बाजारों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। यही भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को और मज़बूत बना रहा है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए जापान और भारत सहयोग करेंगे

भारत–जापान की आर्थिक साझेदारी अब केवल शहरों तक सीमित नहीं है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी गहराई से असर डाल रही है। सोजित्ज कॉर्पोरेशन इंडियन ऑयल के साथ मिलकर 30 प्लांट्स में 395 मिलियन डॉलर का निवेश कर रहा है।

ये प्लांट कृषि अवशेषों से हर साल करीब 16 लाख टन बायोगैस बनाएँगे। इससे किसानों को फसल के अवशेष बेचकर अतिरिक्त आय होगी और वे स्वच्छ ऊर्जा मिशन में भी योगदान देंगे।

इसी तरह, सुज़ुकी मोटर राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ मिलकर गाय के गोबर से बायोगैस बनाने और उसे सीएनजी वाहनों के ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है।

भारत की लगभग 20% यात्री कारें सीएनजी पर चलती हैं, इसलिए यह परियोजना न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगी बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में नए रोजगार के अवसर भी पैदा करेगी।

जापान-भारत साझेदारी से विनिर्माण और निर्यात में वृद्धि सुनिश्चित होगी

जापान के साथ साझेदारी भारत को खपत आधारित अर्थव्यवस्था से निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था की ओर ले जा रही है और वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति मज़बूत बना रही है।

निप्पॉन स्टील की नई परियोजनाएँ भारत की खास स्टील (विशेषकर ऑटोमोबाइल और ऊर्जा उद्योगों के लिए) के निर्यात क्षमता को बढ़ाएँगी। वहीं फुजीफिल्म और टाटा मिलकर भारत की भूमिका को वैश्विक चिप सप्लाई चेन में और मजबूत कर रहे हैं।

टोयोटा और सुज़ुकी भारत में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बना रहे हैं। इन गाड़ियों को अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व में निर्यात करने की योजना है। यह भारत की ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड’ की सोच के अनुरूप है।

भारत और जापान के बीच मानव संसाधन और ज्ञान का आदान-प्रदान

भारत–जापान सहयोग का सबसे महत्वाकांक्षी पहलू मानव संसाधन है। इसके तहत इंडिया–जापान टैलेंट ब्रिज प्रोग्राम चलाया जा रहा है, जिसे जापान के METI मंत्रालय का समर्थन प्राप्त है और जिसके लिए 15 अरब येन का बजट तय किया गया है।

इस कार्यक्रम का लक्ष्य अगले 5 साल में 5 लाख छात्रों और पेशेवरों को उच्च शिक्षा, इंटर्नशिप और रोजगार के अवसरों के जरिए जोड़ना है। भारत के प्रमुख संस्थान जैसे IIT खड़गपुर, IIT कानपुर, IIT गुवाहाटी, IISc बेंगलुरु और अन्ना यूनिवर्सिटी जापानी संस्थानों के साथ करियर फेयर और एक्सचेंज प्रोग्राम आयोजित कर रहे हैं, जिससे भारतीय छात्रों को जापानी शोध और तकनीकी कंपनियों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

जापानी कंपनियाँ भी भारतीय प्रतिभा में तेजी से निवेश कर रही हैं। Nidec बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट सेंटर स्थापित कर रही है, Musashi Seimitsu भारतीय ग्रेजुएट्स के साथ मिलकर इलेक्ट्रिक वाहनों के कंपोनेंट्स विकसित कर रही है और दाई-इची लाइफ तेचनों क्रॉस (Dai-ichi Life Techno Cross) द्विभाषी इंजीनियरों को भर्ती कर रही है।

इसके अलावा, मनी फॉरवर्ड जैसी फिनटेक कंपनियाँ भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर विशेष ध्यान दे रही हैं। केवल कॉर्पोरेट हायरिंग ही नहीं बल्कि जापानी वेंचर फर्म्स भारतीय स्टार्टअप्स में भी बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं, खासकर डीप-टेक क्षेत्र में। वे केवल पूंजी ही नहीं, बल्कि मेंटॉरशिप और शोध के अवसर भी प्रदान कर रही हैं।

इन पहलों के जरिए भारत और जापान मिलकर ऐसी नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो उन्नत कौशल और वैश्विक अनुभव से लैस होगी और आने वाले समय की चुनौतियों का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकेगी।

अन्य मोर्चों पर सहयोग

असम सरकार और ASEAN Holdings के बीच हाल ही में एक महत्वपूर्ण समझौता (MoU) हुआ है। यह भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को मजबूती देता है और औद्योगिक ढाँचा, लॉजिस्टिक्स और कृषि-आधारित उद्योगों पर केंद्रित है। इस साझेदारी से असम में रोजगार और विकास के नए अवसर मिलेंगे और राज्य का जुड़ाव ASEAN बाजारों से और मजबूत होगा।

भारत और जापान अपनी साझेदारी को वैश्विक प्राथमिकताओं से जोड़ रहे हैं। जापान–भारत–अफ्रीका फोरम और TICAD समिट में दोनों देशों ने खनिज सुरक्षा, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन और स्वच्छ ऊर्जा पर साझा एजेंडा तय किया।

यह साझेदारी न सिर्फ भारत–जापान के लिए बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और कनेक्टिविटी के लिए भी महत्वपूर्ण है। गुजरात के स्टील हब से लेकर बनासकांठा की डेयरी, बेंगलुरु के आईटी कॉरिडोर से लेकर असम के औद्योगिक गेटवे तक जापान का सहयोग हर जगह दिख रहा है। यह केवल निवेश और व्यापार की कहानी नहीं है, बल्कि आजीविका और भविष्य को नया रूप देने की यात्रा है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा टोक्यो में मिल रहे हैं, तब भारत–जापान आर्थिक साझेदारी 21वीं सदी की एक परिभाषित साझेदारी बनकर उभर रही है।

भारत अपनी जनसंख्या, बाजार और पैमाने के साथ योगदान दे रहा है जबकि जापान अपनी तकनीक, पूंजी और विशेषज्ञता से साथ निभा रहा है। दोनों मिलकर वैश्विक सप्लाई चेन बना रहे हैं, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दे रहे हैं, किसानों को सशक्त कर रहे हैं और नई पीढ़ी की टैलेंट को मौका दे रहे हैं। भारत की ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड’ की सोच 2025 में जमीनी हकीकत बनती दिखाई दे रही है।

बिहार में SIR के बाद 3 लाख वोटरों की नागरिकता पर संदेह, दस्तावेजों में मिली गड़बड़ियाँ तो चुनाव आयोग ने भेजे नोटिस: 7 दिनों में कागजात दिखाने का दिया आदेश

बिहार में चल रही वोटर लिस्ट की विशेष जाँच (SIR) में एक बड़ा खुलासा हुआ है। इलेक्शन कमीशन (EC) की जाँच में अब तक करीब 3 लाख वोटरों के दस्तावेजों में गड़बड़ी पाई गई है। इन सभी को नोटिस भेजा गया है और 7 दिनों के भीतर अधिकारियों के सामने हाजिर होकर अपने कागजात दिखाने को कहा गया है।

यह संख्या और भी बढ़ सकती है, क्योंकि अभी भी दस्तावेजों की जाँच चल रही है। जाँच के दौरान ऐसे कई वोटर मिले हैं, जिनके भारतीय नागरिक होने पर शक है। खासकर नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोगों के वोटर बनने की आशंका जताई जा रही है। रविवार (24 अगस्त 2025) को चुनाव आयोग ने एक बयान में कहा था कि 98.2% मतदाताओं के दस्तावेज प्राप्त हो चुके हैं।

कैसे मिला गड़बड़ी का सुराग?

इलेक्शन कमीशन के अधिकारियों के मुताबिक, जिन लोगों को नोटिस भेजा गया है, उन्होंने या तो कोई दस्तावेज जमा नहीं किया या गलत दस्तावेज दिए हैं। कुछ मामलों में तो वोटर की नागरिकता ही संदिग्ध पाई गई है। ये जानकारी बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) और पुलिस जैसी एजेंसियों से मिली है।

नोटिस में कहा गया है कि उनके द्वारा दिए गए दस्तावेजों में कुछ गड़बड़ियाँ पाई गई हैं, जिससे इस बात पर शक होता है कि उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल होना चाहिए या नहीं।

कहाँ से आए हैं ये ‘संदिग्ध वोटर’?

जानकारी के अनुसार, ज्यादातर नोटिस पूर्वी और पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, अररिया और सुपौल जिलों में भेजे गए हैं। ये इलाके सीमांचल क्षेत्र में आते हैं, जिनकी सीमाएँ खुली हैं। भाजपा जैसे राजनीतिक दलों ने इस इलाके में बांग्लादेशी और रोहिंग्या लोगों के अवैध रूप से बसने का आरोप लगाया है। हालाँकि, कुछ पार्टियाँ इसे शिक्षा की कमी और बाढ़ की वजह से दस्तावेज खोने का मामला बता रही हैं।

इलेक्शन कमीशन ने साफ किया है कि बिना सुनवाई के किसी भी वोटर का नाम लिस्ट से नहीं हटाया जाएगा। सभी संदिग्ध लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। अधिकारियों ने बताया कि इन 3 लाख लोगों में से ज्यादातर का नाम 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं था। उनके आधार कार्ड और बाकी दस्तावेजों में भी नाम और पता मेल नहीं खा रहा था।

बिहार में कुल 7.89 करोड़ वोटर थे, जिनमें से पहले चरण की जाँच में ही 65 लाख नाम हटा दिए गए। हटाए गए नामों में या तो मर चुके थे, या कहीं और चले गए थे, या फिर एक से ज़्यादा जगह पर नाम रजिस्टर्ड थे।