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‘कुछ देशों द्वारा आतंकवाद का खुला समर्थन…’: PM मोदी ने SCO समिट से पहलगाम हमले पर पाकिस्तान को सुनाई खरी-खरी, शहबाज की मौजूदगी में बोले- दोहरा रवैया स्वीकार नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के तियानजिन में शंगाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन को संबोधित किया। संबोधन में पीएम ने कहा कि आतंकवाद दुनिया के लिए खतरा है। इस दौरान पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र भी किया और हमले को आतंकवाद का ‘सबसे बुरा रूप’ बताया। यह बातें पीएम मोदी ने पाकिस्तान की पीएम शहबाज शरीफ की मौजूदगी में कहीं।

पीएम मोदी ने कहा, “पहलगाम में आतंकी हमला न केवल भारत पर हमला था बल्कि मानवता में विश्वास करने वाले सभी देशों के लिए एक चुनौती थी। यह एक बड़ा सवाल उठाता है- क्या कोई देश जो आतंकवाद का खुलेआम समर्थन करता है, हमें स्वीकार करना चाहिए?”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “हमें स्पष्ट कहना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई दोहरा रवैया नहीं चलेगा।” इस दौरान पीएम ने आतंकवाद के लिए फंडिंग को सबसे बड़ी चिंता बताते हुए SCO समूह से जुड़े सभी देशों से आतंकवाद पर जीरो टोलरेंस नीति अपनाने का भी आग्रह किया।

आतंकवाद पर सभी देशों को आगाह करते हुए पीएम ने कहा, “आतंकवाद और उग्रवाद मानवता के लिए एक साझा चुनौती है। जब तक ये खतरे हैं, कोई भी देश या समाज सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता।” पीएम ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा हर देश का अधिकार है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत ने अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ लड़ाई में आगे बढ़कर काम किया है और हम आतंकवाद के लिए किसी भी तरह के फंडिंग का विरोध करते हैं।”

पहलगाम आतंकी हमले पर आगे बोलते हुए पीएम ने कहा, “पहलगाम में आतंकवाद का बहुत ही बुरा रूप देखा। मैं उन सभी मित्र देशों का धन्यवाद करता हूँ जो हमारे साथ खड़े रहे।” पीएम ने आगे कहा, “हमने अपने बच्चों को खोया है और कई बच्चे अनाथ हो गए हैं। भारत पिछले चार दशकों से आतंकवाद की समस्या का सामना कर रहा है।”

SCO समिट से भारत की डिप्लोमेसी को मिली नई धार, पीएम मोदी ने कई वैश्विक नेताओं से की मुलाकात: व्यापार से लेकर सांस्कृतिक संबंधों तक पर हुई चर्चा

प्रधानमंत्री मोदी ने SCO समिट से अलग नेपाल, मालदीव, मिस्र, बेलारूस, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, वियतनाम, म्यांमार, लाओस, तुर्कमेनिस्तान और आर्मेनिया के राष्ट्राध्यक्षों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की। इस दौरान व्यापार से लेकर सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दिया गया।

रविवार (31 अगस्त 2025) को तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के राष्ट्राध्यक्षों के आधिकारिक स्वागत समारोह में पीएम मोदी पहुँचे, तो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी ने पूरे जोश ने उनका स्वागत किया।

चीनी राष्ट्रपति ने शिखर सम्मेलन में आए सभी राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों का भी आधिकारिक रूप से स्वागत किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भव्य रात्रिभोज से पहले विश्व नेताओं से मुलाकात की। शी जिनपिंग के साथ स्वागत समारोह के बाद सभी नेताओं की पारंपरिक सामूहिक तस्वीर ली गई।

इसके बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यक्रम स्थल पर कई राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों से बातचीत की। उन्होंने सबसे पहले नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली से मुलाकात की। उन्होंने एक्स पर एक तस्वीर पोस्ट करते हुए कहा, “नेपाल के साथ भारत के संबंध गहरे और बेहद खास हैं।”

इसके बाद उन्होंने मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू से मुलाकात की। करीब एक महीने पहले पीएम मोदी ने मालदीव का दौरा किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट किया, “तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू से बातचीत की। मालदीव के साथ भारत का विकासात्मक सहयोग दोनों देशों के लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ शिखर सम्मेलन में मिस्र के प्रधानमंत्री मुस्तफा मदबौली से भी मुलाकात की। बातचीत के दौरान उन्होंने कुछ साल पहले की अपनी मिस्र यात्रा को याद किया। उन्होंने कहा कि भारत-मिस्र मित्रता प्रगति की नई ऊँचाइयों को छू रही है।

इसके बाद, उन्होंने बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको से मुलाकात की। मोदी ने एक्स पर लिखा, “जहाँ तक हमारे देशों का सवाल है, हम दोनों ही भविष्य में मिलने वाले अवसरों को लेकर बेहद आशान्वित हैं।” गौरतलब है कि यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में बेलारूस रूस का एक अहम सहयोगी रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमान से भी बात की। उन्होंने कहा कि मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान के साथ भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध बढ़ रहे हैं।

मध्य एशिया के देश, कजाकिस्तान के राष्ट्रपति तोकायेव से भी प्रधानमंत्री मोदी ने मुलाकात की। उन्होंने एक्स पर ट्वीट किया, “हमारे देश ऊर्जा, सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और फार्मा सहित कई प्रमुख क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं।”

SCO शिखर सम्मेलन में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वियतनाम के प्रधानमंत्री फाम मिन्ह चिन के साथ संक्षिप्त चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत रक्षा, व्यापार, हरित ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में वियतनाम के साथ संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए उत्सुक है।

म्यांमार के कार्यवाहक राष्ट्रपति, वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग से भी पीएम मोदी ने मुलाकात की। प्रधानमंत्री मोदी ने ? पर एक पोस्ट में कहा, “म्यांमार भारत की एक्ट ईस्ट और नेबरहुड फर्स्ट नीतियों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हम दोनों इस बात पर सहमत हुए कि व्यापार, संपर्क, ऊर्जा, रेयर मिनरल्स और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में संबंधों को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएँ हैं।”

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण पूर्व एशियाई देश लाओ पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के प्रधानमंत्री थोंगलाउन सिसोउलिथ से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि “हमारे देशों के बीच घनिष्ठ मित्रता, विशेष रूप से व्यापार और संस्कृति के क्षेत्र में, अत्यंत लाभकारी है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति सरदार बर्दीमुहामेदोव से भी बातचीत की। उन्होंने अलग-अलग मुद्दों पर अपने विचार साझा किए।

अर्मेनिया के राष्ट्रपति निकोल पाशिनयान से मुलाकात और वार्ता को प्रधानमंत्री मोदी ने एक ‘बहुत अच्छी बातचीत’ कहा। उन्होंने ट्वीट किया, “भारत और आर्मेनिया के बीच मधुर और प्रगाढ़ संबंध हैं, जो मित्रता और आपसी सहयोग पर आधारित हैं।” अमेरिका की मध्यस्थता से आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच हुए समझौते के बाद, यह भारत और अर्मेनियाई राष्ट्रपति के बीच पहली सीधी बातचीत थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव से मुलाकात के बारे में भी एक्स पर पोस्ट किया। उन्होंने कहा, “भारत और उज्बेकिस्तान एक अहम साझेदार हैं। ये संस्कृति, अर्थव्यवस्था और लोगों के बीच संबंधों के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ रहा है।”

इसके अलावा, उन्होंने किर्गिज़स्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव से भी बातचीत की। इसके बारे में एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा, “तिआनजिन में किर्गिज राष्ट्रपति सदिर जापारोव के साथ बहुत ही अहम बातचीत हुई। हमारे देशों के बीच एक मजबूत साझेदारी है और हम अपने विकास के इस सहयोग को और मज़बूत बनाने के लिए मिलकर काम करते रहेंगे।” दरअसल पीएम मोदी ने व्यक्तिगत रूप से सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात कर आपसी रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया है। इस मुलाकात से व्यापार, रक्षा, संपर्क, सांस्कृतिक संबंध समेत कई क्षेत्रों में दूरगामी परिणाम सामने आएँगे।

राजस्थान में जबरन धर्मांतरण करवाने पर उम्रकैद: CM भजनलाल ने की मिशनरियों और इस्लामी कट्टरपंथियों पर नकेल कसने की तैयारी, विधानसभा में बिल पेश करेगी BJP सरकार

राजस्थान की बीजेपी सरकार धर्म परिवर्तन के खिलाफ विधानसभा में विधेयक पेश करने जा रही है। इस राजस्थान विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक 2025 में जबरन धर्मांतरण करवाने पर उम्रकैद की सजा के प्रावधान हैं। वहीं विधेयक में ‘घर वापसी’ को धर्मांतरण नहीं माना गया है।

कैबिनेट मंत्री जोगाराम पटेल ने बताया कि यह विधेयक प्रलोभन, बल, कपट या अन्य अनुचित तरीकों से कराए जाने वाले धर्मान्तरण को रोकने के लिए लाया गया है। रविवार (31 अगस्त 2025) को राजस्थान के सीएम भजनलाल शर्मा ने कैबिनेट की बैठक में विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ मंजूरी भी दे दी है। अब सरकार सोमवार (01 अगस्त 2025) से शुरू हो रहे राजस्थान विधानसभा सत्र में विधेयक को पेश कर सकती है।

मंत्री ने कहा कि राज्य में अवैध रूप से धर्मान्तरण को रोकने के संबंध में कोई विशिष्ट कानून नहीं थे इसीलिए राजस्थान विधिविरूद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2025 को पिछले सत्र (फरवरी 2025) में विधानसभा में लाया गया था। अब कठोर प्रावधान करते हुए विधेयक का नया प्रारूप विधानसभा के आगामी सत्र (सितंबर 2025) में पेश किया जाएगा।

जबरन धर्म परिवर्तन पर उम्रकैद की सजा

विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक 2025 के तहत जबरन धर्मांतरण करवाने पर उम्रकैद की सजा होगी। साथ ही 50 लाख रुपए का जुर्माना भी भरना होगा। इसके अलावा भी धर्मांतरण को अपराध की अलग-अलग श्रेणी में सजा का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।

इसमें अवैध धर्मांतरण करवाते पकड़े जाने पर 7 से 14 साल तक की सजा और 5 लाख रुपए तक का जुर्माना देना होगा। नाबालिग, दिव्यांग, महिला, एससी, एसटी वर्ग पर धर्मांतरण का दबाव बनाने पर 10 से 20 साल की सजा और 10 लाख रुपए का जुर्माना होगा।

वहीं, सामूहिक धर्मांतरण करवाने पर 20 साल से उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ में 25 लाख रुपए तक का जुर्माना भी देना होगा। धर्मांतरण करवाने के लिए फंडिंग के सबूत मिलने पर 10 से 20 साल की सजा और 20 लाख रुपए जुर्माना भरना होगा।

लव जिहाद, जबरन निकाह और नाबालिग लड़कियों संग अवैध व्यापार जैसे अपराधों में पकड़े जाने पर 20 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा सुनाई जा सकती है। इसके साथ 30 लाख रुपए का जुर्माना भी देना होगा।

संपत्ति को जब्त या ध्वस्तीकरण की भी होगी कार्रवाई

सरकार ने विधेयक में यह भी प्रावधान रखा है कि अवैध धर्मांतरण में लिप्त संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा। साथ ही संस्थान को मिलने वाली सरकारी अनुदान भी बंद कर दी जाएगी। जिस संपत्ति पर अवैध धर्मांतरण हुआ है, उसकी जाँच कर जब्ती और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाएगी।

विधेयक में प्रस्तावित कानून में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होगा, जिसने धर्मांतरण करवाया है। फरवरी 2025 में पेश किए गए विधेयक में अधिकतम 10 वर्ष की सजा का प्रावधान था, जिसे अब संशोधित कर आजीवन कारावास तक बढ़ा दिया गया है।

राजस्थान में धर्मांतरण के लिए अपनाए जा रहे हथकंडे

राजस्थान में अलग-अलग हथकंडे अपनाकर धर्म परिवर्तन के जाल में हिंदुओं को फँसाया जा रहा है। परंतु अब तक इसके विरुद्ध कानून लागू ना होने पर ये अपराधी खुले में धर्मांतरण का खेल रच रहे हैं। राजस्थान के झुंझुनू, हनुमानगढ़, श्रीगंगागनर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भरतपुर समेत इलाकों में गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।

यहाँ धर्मांतरण गैंग हिंदू ग्रामीण महिलाओं को प्रार्थना सभाओं में बुलाते हैं। यहाँ महिलाओं का ब्रेनवॉश किया जाता है। उनके माथे से बिंदी, सिंदूर और गले से मंगलसूत्र हटा दिए जाते हैं। इसकी जगह उनके गले में क्रॉस लटका देते हैं। इन महिलाओं को घर के बाकी सदस्यों का धर्मांतरण करवाने के लिए 8 लाख रुपए तक ऑफर किए जाते हैं।

इस लालच में फँसकर गरीब लोग धर्मांतरण कर रहे हैं। ऐसे लोगों को ईसाई बनाने के नाम पर पैसे, घर, कपड़े और राशन देने का लालच भी दिया जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांसवाड़ा के जनजातीय समुदाय के इलाके में ईसाइयों ने लोगों को लालच दिया कि अगर वे 10 लोगों को ईसाई बनवाएँगे तो उन्हें हर महीने वेतन, राशन और कपड़े दिए जाएँगे। इसके अलावा ईसाई बनने पर 1 लाख रुपए भी दिए जाएँगे।

राजस्थान सरकार इन्हीं अपराध और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए विधेयक को नए संशोधनों के साथ आगामी विधानसभा सत्र में पेश करने जा रही है।

जहाँ सुनाई देने लगी थी बम-बंदूक की आवाज, वहाँ फिर गूँजेगा ‘माता का जयकारा’: कश्मीर में 35 साल बाद खोला गया माँ शारदा का मंदिर, आतंकवाद के दौर में हुआ था बंद

कश्मीर घाटी जिसे प्राचीन काल से ऋषियों की भूमि कहा जाता है, कभी ज्ञान, अध्यात्म और विविध संस्कृतियों का गढ़ रही है। यहाँ आदिकाल से कई प्राचीन मंदिर और तीर्थ रहे हैं, जिनका उल्लेख नीलमत पुराण सहित विभिन्न ग्रंथों में मिलता है।

माना जाता है कि महान ऋषि कश्यप से ही कश्मीर का नाम पड़ा। लेकिन बीते दशकों में आतंकवाद और पलायन के चलते इस भूमि की सांस्कृतिक पहचान पर गहरी चोट पहुँची। इसी घाटी के बडगाम जिले में अब एक बार फिर नई शुरुआत हुई है। 35 साल बाद यहाँ का शारदा भवानी मंदिर फिर से खोला जा चुका है।

कश्मीरी पंडित समुदाय ने तीन दशक से भी अधिक समय बाद घाटी में अपनी आस्था और जड़ों की ओर वापसी का एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। रविवार (31 अगस्त 2025) को बडगाम जिले के इचकूट गाँव में स्थित शारदा भवानी मंदिर को फिर से खोला गया।

समारोह के दौरान विधिवत पूजा और प्राण प्रतिष्ठा की गई। यह वही मंदिर है जो 1990 में आतंकवाद शुरू होने के बाद बंद हो गया था और कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद खंडहर में बदल गया था।

लंबे समय बाद जब पंडित परिवार यहाँ लौटे तो स्थानीय लोगों ने न केवल उनका स्वागत किया बल्कि आयोजन को सफल बनाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई। शारदा स्थापना समुदाय के अध्यक्ष सुनील कुमार भट ने कहा कि यह मंदिर पाकिस्तान स्थित शारदा माता मंदिर की एक शाखा माना जा सकता है।

उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों की इच्छा भी लंबे समय से यही थी कि मंदिर को फिर से खोला जाए। भट ने कहा, “जब हम यहाँ पहली बार आए थे तब केवल चार लोग थे, लेकिन आज पूरा गाँव हमारे साथ खड़ा है। यह स्थानीय लोगों के सहयोग का सबसे बड़ा प्रमाण है।”

समारोह में शामिल एक बुज़ुर्ग ने कहा, “ये लोग इसी गाँव के रहने वाले हैं। हालात बिगड़ने से पहले हम सब साथ रहते और खाते-पीते थे। हमें खुशी है कि वे वापस आए और प्रार्थना की। कश्मीर उनकी जन्मभूमि है और हम उनका स्वागत करते हैं।”

मंदिर के पुनः उद्घाटन के साथ ही पुनर्निर्माण की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं। कुछ कश्मीरी पंडित, जो प्रधानमंत्री पैकेज के तहत घाटी में काम कर रहे हैं, मंदिर के जीर्णोद्धार और नए निर्माण के लिए जिला प्रशासन से संपर्क में हैं। उन्होंने राना मंदिर में भी एक शिवलिंग स्थापित किया है, जो सफाई और मरम्मत के दौरान मिला था।

‘सोरोस फंडेड पत्रकारों’ ने बिहार की वोटर लिस्ट पर फैलाया झूठ, 67826 नाम दोहराए जाने का दावा: चुनाव आयोग ने खोली पोल, कहा- ये ड्राफ्ट है, फाइनल लिस्ट नहीं

बिहार में वोटर लिस्ट को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य में 67,826 डुप्लिकेट वोटर हैं, जिससे मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। हालाँकि, बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने इस रिपोर्ट को गलत और भ्रामक बताया है। उन्होंने साफ किया है कि अभी जारी की गई लिस्ट केवल एक ड्राफ्ट है, फाइनल नहीं। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट में अगर कोई गलती है तो उसे बाद में सुधारा जाएगा। इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने वाले समूह पर विदेशी फंडिंग से जुड़े होने का भी आरोप लगा है।

रिपोर्ट में क्या दावें किए गए

दरअसल, कुछ पत्रकारों की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 15 विधानसभा क्षेत्रों में 67,826 ऐसे नाम मिले हैं जो दो बार दर्ज हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ये नाम एक जैसे दस्तावेजों के साथ रजिस्टर्ड हैं। इससे मतदाता सूची की सच्चाई पर सवाल उठने लगे हैं।

रिपोर्ट का दावा है कि यह जानकारी डेटा माइनिंग से निकाली गई है। इसमें कहा गया है कि 2025 के वोटर लिस्ट सुधार अभियान के दौरान जारी की गई लिस्ट में कई नाम दोहराए गए हैं। इस पर अब चुनाव आयोग ने जवाब दिया है।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि ये आरोप गलत और भ्रम फैलाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वो आखिरी नहीं है। यह सिर्फ जाँच के लिए है। अभी भी कोई गलती हो तो लोग उस पर दावा या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं।

बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने सोशल मीडिया X (पहले ट्विटर) पर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो रिपोर्ट आई है, उसमें सच्चाई पूरी नहीं बताई गई है। रिपोर्ट में उस प्रक्रिया की अनदेखी की गई है जिससे वोटर लिस्ट को ठीक किया जाता है। उन्होंने कहा कि जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। इसे बाद में सही करके ही फाइनल लिस्ट बनाई जाती है।

ये केवल ड्राफ्ट, फाइनल लिस्ट नहीं

मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) ने एक रिपोर्ट पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, वो अधूरी हैं। SIR अभी खत्म नहीं हुआ है। जो लिस्ट अभी जारी हुई है, वह सिर्फ़ ड्राफ्ट है। ये फाइनल नहीं है।

सीईओ ने साफ किया कि यह लिस्ट लोगों की जाँच के लिए जारी की गई है। इसमें लोग अपना नाम देख सकते हैं। अगर कोई गलती है, तो वे दावा या आपत्ति कर सकते हैं। राजनीतिक दल और बाकी लोग भी सुझाव दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर इस लिस्ट में कोई नाम दो बार है तो उसे अभी गलती या गड़बड़ी नहीं माना जा सकता। नियमों के मुताबिक लोगों को अपनी बात रखने का मौका दिया जाता है। उसके बाद ही लिस्ट को ठीक कर फाइनल किया जाएगा।

पत्रकारों की रिपोर्ट को बताया गलत, कहा- डुप्लीकेट मतदाता नहीं

चुनाव अधिकारी (CEO) ने रिपोर्ट में बताए गए 67,826 नकली वोटरों के दावे को गलत बताया। उन्होंने कहा कि यह दावा कुछ समान जानकारियों पर ही बना है। जैसे नाम, उम्र और रिश्तेदारों का नाम। इन बातों से यह साबित नहीं होता कि वोटर फर्जी हैं।

CEO ने कहा कि बिहार के गाँवों में बहुत से लोगों के नाम और उम्र एक जैसे होते हैं। माता या पिता के नाम भी मिलते-जुलते होते हैं। यह आम बात है। ऐसा होना कोई गड़बड़ी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि सिर्फ नाम और उम्र एक जैसे होने से दोहराव साबित नहीं होता।

उन्होंने कहा कि ऐसी समान जानकारी वाली एंट्रीज को जाँच के दौरान पहचाना जाता है। अगर कोई गलती होती है, तो उसे ठीक भी किया जाता है। किसी को भी अगर शक है, तो वह चुनाव अधिकारी के पास आपत्ति दर्ज करा सकता है। यह अधिकार हर वोटर और पार्टी को है।

चुनाव आयोग ने बताया, कैसे हटते हैं डुप्लीकेट नाम

CEO ने यह साफ किया कि डुप्लिकेट वोटरों की जाँच नहीं होती, यह बात पूरी तरह गलत है। उन्होंने बताया कि भारत का चुनाव आयोग इसके लिए एक खास तकनीक इस्तेमाल करता है। ECI का एक ईआरओनेट 2.0 सॉफ्टवेयर है। यह सॉफ्टवेयर एक जैसे नाम, उम्र या रिश्तेदारों के नाम वाले वोटरों की पहचान करता है। इन्हें ‘समान प्रविष्टियाँ’ या DSE कहा जाता है।

लेकिन यह सिस्टम ऐसे नामों को सीधे हटाता नहीं है। पहले इनकी पूरी जाँच की जाती है। बूथ लेवल अफसर और चुनाव अधिकारी खुद जाकर देखते हैं कि यह डुप्लिकेट है या नहीं। यह तरीका इसलिए अपनाया जाता है ताकि गलती से किसी असली वोटर का नाम न हट जाए। यानी मशीन की बजाय इंसान ही आखिरी फैसला करते हैं।

वाल्मीकिनगर की बात करते हुए CEO ने कहा कि वहाँ जिन 5,000 वोटरों को नकली बताया गया है, उस पर सबूत के साथ रिपोर्ट होनी चाहिए। बिना जानकारी और बिना जाँच के कोई भी संख्या बता देना सही नहीं है।

डुप्लीकेट मतदाताओं के उदाहरण

रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि त्रिवेणीगंज की ‘अंजलि कुमारी’ और लौकहा के ‘अंकित कुमार’ जैसे नामों के दोहराव मिले हैं। इसे दिखाकर कहा गया कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ी है।

इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले इक्का-दुक्का हैं। ये गलतियाँ लिखते समय हो सकती हैं। कभी-कभी लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो दो बार नाम जुड़ जाता है। कई बार घर पर गलत जानकारी दे दी जाती है।

उन्होंने यह भी बताया कि सुधार का काम पहले से ही शुरू हो गया है। अंजलि कुमारी और अंकित कुमार दोनों के लिए फॉर्म-8 भर दिया गया है। इसका मतलब है कि गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया पहले से जारी है।

पत्रकारों के आरोप पर चुनाव आयोग का जवाब

कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट के डेटा को जानबूझकर लॉक कर दिया गया है। उनका कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि मशीन से जाँच न हो सके। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यह आरोप गलत है।

मतदाता सूची को एक तय फॉर्मेट में दिया जाता है। ऐसा कानून के मुताबिक किया जाता है ताकि डेटा की सुरक्षा बनी रहे और उसका गलत इस्तेमाल न हो। उन्होंने साफ किया कि डेटा को लॉक करना एक सुरक्षा तरीका है। इसका मकसद दोहराव छुपाना नहीं है।

सीईओ ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया। कमलनाथ बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2018) केस में अदालत ने भी इन सुरक्षा तरीकों को सही माना था।

अनुमान पर आपत्ति

कुछ लोगों ने कहा था कि 15 इलाकों में पाए गए दोहराव पूरे राज्य में हो सकते हैं। इस पर बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सुझाव का कड़ा विरोध किया। सीईओ ने इसे गलत बताया। उनका कहना था कि इतने बड़े स्तर पर डुप्लिकेट होने का विचार बस कल्पना है।

उन्होंने कहा कि कानून के हिसाब से ऐसे आरोपों को सही साबित करने के लिए ठोस सबूत होना जरूरी है। सिर्फ आँकड़ों या अनुमान से ऐसे बड़े आरोप नहीं लगाए जा सकते। सीईओ ने बताया कि अदालतें भी बार-बार कह चुकी हैं कि बिना प्रमाण के आरोप स्वीकार नहीं किए जाएँगे।

कानूनी उपाय मौजूद

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि कानून में पहले से ही डुप्लिकेट नाम हटाने के लिए कड़े नियम हैं। उन्होंने बताया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 के तहत, अगर कोई पक्का सबूत मिलता है, तो निर्वाचन अधिकारी डुप्लिकेट नाम हटाने का अधिकार रखते हैं। इसलिए दोहराव से निपटने का एक मजबूत कानून पहले से मौजूद है।

उन्होंने ट्विटर पर भी बताया कि अगर किसी मतदाता या बूथ के एजेंट को कोई डुप्लिकेट नाम दिखे तो वे मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13 के अनुसार आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। इस तरह हर कोई शिकायत कर सकता है और मामले की जाँच हो सकती है।

खंडन और निष्कर्ष

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने खंडन खत्म करते हुए कहा कि ड्राफ्ट रोल में कुछ डुप्लिकेट नाम होना सामान्य है। यह प्रक्रिया को गलत या अमान्य नहीं करता। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट का यह कहना कि SIR से धोखाधड़ी बढ़ेगी या डुप्लिकेट वोटिंग होगी, गलत है। यह सिर्फ अटकलें हैं और समय से पहले बनी राय है। मतदाता सूची के नियम और कानून ऐसा होने नहीं देते।

विदेशी फंडिंग और संदिग्ध रिपोर्ट

रिपोर्टर्स कलेक्टिव के पीछे जो संगठन काम कर रहे हैं, उन्हें समझना बहुत जरूरी है। इसका संचालन एक NGO करता है, जिसका नाम ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया‘ है। यह संस्था सरकार से एफसीआरए लाइसेंस लेकर विदेशी चंदा ले सकती है।

इस फाउंडेशन को पैसा देने वालों में कुछ बड़े और विदेशी नाम शामिल हैं। जैसे– फोर्ड फाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, और रॉकफेलर फाउंडेशन। ये सभी संगठन ऐसे नेटवर्क से जुड़े माने जाते हैं जिन्हें अमेरिका की छुपी हुई ताकत या ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है।

इन संगठनों पर पहले भी आरोप लगे हैं कि इन्होंने भारत के खिलाफ कई अभियान चलाए हैं। रिपोर्टर्स कलेक्टिव को भी इन्हीं ताकतों का हिस्सा माना जा रहा है। दिसंबर 2024 में इस ग्रुप ने जो रिपोर्टें छापीं, वे कई मामलों में झूठी और भ्रामक पाई गईं। कहा जा रहा है कि ये रिपोर्टें जॉर्ज सोरोस के एजेंडे के मुताबिक थीं। इनका मकसद लोगों की सोच को गलत दिशा में मोड़ना और देश के अंदर गलतफहमी फैलाना था।

कॉन्ग्रेस ने बिहार में SIR से जुड़ी 89 लाख शिकायतें देने का किया दावा: पूर्वी चंपारण-सुपौल DM ने फैक्ट चेक कर बताया बेबुनियाद, कहा- न कोई शपथ पत्र, न आरोपों का प्रमाण मिला

बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान करीब 65 लाख नामों के हटाए जाने पर कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि उसने चुनाव आयोग को 89 लाख शिकायतें दी हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि एक भी फॉर्म आधिकारिक रूप से जमा नहीं कराया गया है।

इसके अलावा चुनाव आयोग ने कहा कि राहुल गाँधी ने ना तो कोई शपथ पत्र दिया और ना ही अपने आरोपों का प्रमाण। ऐसे में बार-बार चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर खुद की ही फजीहत कराने में अब कॉन्ग्रेस को काफी मजा आ रहा है।

फर्जी आँकड़ों का दावा, बिना प्रक्रिया अपनाए

कॉन्ग्रेस ने जब यह कहा कि उसने 89 लाख शिकायतें दर्ज करवाई हैं, तो यह सुनकर सभी चौंक गए। पार्टी के नेता पवन खेड़ा और राजेश राम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस दावे को पूरे आत्मविश्वास से रखा। उन्होंने कहा कि पार्टी के पास शिकायतों की रसीदें भी मौजूद हैं और यह सब चुनाव आयोग को सौंपा गया है।

पवन खेड़ा ने अपने बयान में कहा कि 20,000 से अधिक बूथों पर 100 से ज्यादा नाम काटे गए। कई बूथों पर महिलाओं के नाम 70 फीसदी तक हटाए गए। पवन खेड़ा ने इसे एक ‘पैटर्न‘ बताया। पवन खेड़ा ने यह भी कहा कि BLOs के जरिए आवेदन इकट्ठा कर DEO को सौंपे गए हैं।

पूर्वी चंपारण और सुपौल DM ने दावों को झूठलाया

लेकिन अगले ही दिन पूर्वी चंपारण के DM ने खुद कॉन्ग्रेस के पोस्ट पर जवाब देते हुए बताया कि बिहार में 1 अगस्त 2025 को जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित हुई, उस पर कॉन्ग्रेस की ओर से न तो फॉर्म 6 (नाम जोड़ने के लिए) और न ही फॉर्म 7 (नाम हटाने पर आपत्ति) में कोई आवेदन जमा हुआ है।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस के इसी पोस्ट पर सुपौल के DM ने भी जवाब में कहा कि अब तक बिहार में कॉन्ग्रेस पार्टी के किसी भी जिला अध्यक्ष द्वारा अधिकृत किसी बूथ लेवल एजेंट (BLA) ने 1 अगस्त 2025 को जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में किसी भी नाम को लेकर ना तो नाम जोड़ने का फॉर्म (फॉर्म 6) भरा है और न ही किसी नाम पर आपत्ति (फॉर्म 7) दर्ज कराई है और ये सब तय फॉर्मेट में होना चाहिए था।

ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि 89 लाख शिकायतों का यह आँकड़ा आखिर आया कहाँ से? और अगर वाकई शिकायतें थीं तो वो किसको दी गईं, और कैसे दी गईं?

राहुल गाँधी का आरोप भी खोखला, आयोग को नहीं मिला कोई शपथ पत्र

कॉन्ग्रेस के इस दावे की अगुवाई राहुल गाँधी खुद कर रहे थे। राहुल गाँधी ने दावा किया कि बड़े पैमाने पर विपक्षी मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और यह लोकतंत्र की हत्या है। लेकिन जब चुनाव आयोग ने उनसे शपथ पत्र और प्रमाण माँगा, तो राहुल गाँधी चुप हो गए।

निर्वाचन आयोग ने खुद कहा है कि राहुल गाँधी की तरफ से कोई शपथ पत्र नहीं दिया गया। ना तो कोई आधिकारिक दस्तावेज, ना डेटा और न ही किसी तरह का ठोस प्रमाण। यानी जो भी बातें राहुल मंच से बोलते रहे, वो सिर्फ भाषण तक सीमित रहीं। कानूनन ना तो कोई कार्रवाई की गई और न ही किसी स्तर पर कॉन्ग्रेस ने प्रक्रिया का पालन किया।

शिकायतें तो छोड़िए, अनुमति भी नहीं माँगी राहुल ने

एक और फजीहत तब हुई जब यह खबर चली कि राहुल गाँधी को पटना के गाँधी मैदान में रुकने की अनुमति नहीं दी गई। कॉन्ग्रेस ने इसे लेकर भी प्रशासन पर सवाल उठाए। लेकिन जब पटना जिला प्रशासन ने स्पष्टीकरण जारी किया, तो कॉन्ग्रेस का यह आरोप भी झूठा निकला।

प्रशासन ने साफ किया कि न राहुल गाँधी और न ही कॉन्ग्रेस की ओर से रात रुकने की कोई अनुमति माँगी गई थी। जो दो अनुमतियाँ माँगी गई थीं, वो सभा और रैली के लिए थी, जो दे दी गई थी।

जिहादियों का नया अड्डा: मोहम्मद यूनुस के शासन में अराजकता, आर्थिक तबाही और इस्लामी कट्टरपंथ की चपेट में आता जा रहा बांग्लादेश; अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचार

17 करोड़ से अधिक आबादी वाला बांग्लादेश आज खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहा है। हर गुजरते दिन के साथ यह देश न सिर्फ दक्षिण एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा बनता जा रहा है।

प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद, अंतरिम सरकार की बागडोर मोहम्मद यूनुस ने संभाली। लेकिन उनके नेतृत्व में देश अराजकता, आर्थिक तबाही और बढ़ती इस्लामी कट्टरपंथ की चपेट में आ गया है।

सत्ता संभालते समय यूनुस ने लोकतांत्रिक सुधार, मानवाधिकारों की रक्षा, प्रेस की आजादी और कानून के राज को बहाल करने का वादा किया था। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली। देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है, कट्टरपंथी संगठन फिर से मजबूत हो रहे हैं और बड़ी संख्या में युवा चरमपंथ और जिहादी सोच की ओर खिंचते जा रहे हैं।

शुरुआत में मोहम्मद यूनुस को सुधारक माना गया और लोग उन्हें बांग्लादेश की कमजोर लोकतंत्र को बचाने वाला समझने लगे थे। लेकिन यह उम्मीद जल्द ही टूट गई। भारतीय रणनीतिकार प्रोफेसर ब्रह्मा चेलानी ने चेतावनी देते हुए कहा कि बांग्लादेश अब उसी रास्ते पर बढ़ रहा है जिस पर पाकिस्तान गया था।

इसी बीच, यूनुस का नोबेल शांति पुरस्कार भी दोबारा विवादों में आ गया है। नॉर्वे की नोबेल कमेटी के अध्यक्ष प्रोफेसर ओले डैनबोल्ट म्योस ने कभी उन्हें इस्लाम और पश्चिम के बीच पुल की तरह बताया था। लेकिन अब यह माना जा रहा है कि यह पुरस्कार उन्हें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की सालों की लॉबिंग के चलते मिला था।

मोहम्मद यूनुस और क्लिंटन परिवार के रिश्ते गहरे और चिंताजनक माने जा रहे हैं। 26 सितंबर 2024 को क्लिंटन ग्लोबल इनिशिएटिव के एक कार्यक्रम में यूनुस ने खुले तौर पर उन नेताओं को पेश किया, जिन्हें बांग्लादेश में हुए तथाकथित ‘जनविद्रोह’ के पीछे माना जाता है। अब यह विद्रोह बड़े पैमाने पर एक जिहादी तख्तापलट समझा जा रहा है।

उसी कार्यक्रम में बिल क्लिंटन ने महफूज आलम की तारीफ की, जो कि हिज़्ब उत-तहरीर का नेता है  यह संगठन दुनिया भर में आतंकवादी घोषित है।

गैटस्टोन इंस्टीट्यूट की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूनुस क्लिंटन फाउंडेशन के बड़े दानदाताओं में से हैं। वहीं, विकीलीक्स के 2007 में लीक हुए एक केबल के मुताबिक, हिलेरी क्लिंटन ने बांग्लादेश सेना पर दबाव डाला था कि वह अपने करीबी दोस्त यूनुस को उस समय की सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाए।

शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद इस्लामी और जिहादी संगठनों को खुला मैदान मिल गया है और वे पहले से कहीं ज्यादा ताकत और बेखौफी के साथ सक्रिय हो गए हैं।

अटलांटिक काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, कट्टरपंथियों ने बांग्लादेश में मूर्तियों और कला कृतियों को तोड़फोड़ कर नष्ट कर दिया। इसके तुरंत बाद अल-कायदा की मीडिया शाखा ‘अस-सहाब’ ने बारह पन्नों का बयान जारी किया, जिसमें इन घटनाओं को मुसलमानों की जीत बताते हुए बांग्लादेश को दक्षिण एशिया में इस्लामी फतह का नया केंद्र बताया गया।

मार्च में हिज़्ब उत-तहरीर ने ढाका में ‘मार्च फॉर खिलाफा’ का आयोजन किया, जिसका व्यापक प्रचार हुआ और सरकार ने इसे रोकने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की। ये घटनाएँ सिर्फ कानून-व्यवस्था के पतन को नहीं दिखातीं, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि देश अब एक जिहादी राज्य की ओर बढ़ रहा है।

भारत में निर्वासन के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यूनुस को ‘आतंकी नेता’ करार दिया और उन पर आरोप लगाया कि वे बांग्लादेश को अमेरिका के हाथों बेच रहे हैं। उनकी पार्टी की छात्र इकाई ने कहा कि देश ‘लोकतंत्र का कब्रिस्तान’ बन चुका है।

इस्लामी विद्रोह के एक साल बाद इंडिया टुडे डिजिटल ने एक लेख में खुलासा किया कि हसीना-विरोधी ताकतें वर्षों से प्रशासन में अपने वफादार बिठाती रही थीं। जब छात्र आंदोलन चरम पर पहुँचा, तो इन लोगों ने सरकारी संस्थाओं को ठप कर दिया, जिससे शासन पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

अब बांग्लादेश की स्थिति वही हो गई है जैसी पाकिस्तान की 1980 के दशक में थी। एक ऐसा विचारधारा-प्रधान राज्य, जो जिहादी ताकतों का बंधक बन चुका है। हिंदू, बौद्ध और ईसाई, जिन्हें असली ‘धरतीपुत्र’ कहा जाता है या तो देश से खदेड़े जा रहे हैं या टूटे-फूटे मंदिरों के मलबे में दबाए जा रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस ने एक संपादकीय में लिखा कि मोहम्मद यूनुस के वादों के बावजूद पिछले एक साल में बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरवाद तेजी से बढ़ा है और कानून-व्यवस्था पूरी तरह ढह गई है। अवामी लीग के नेताओं को बड़ी संख्या में जेल भेज दिया गया जबकि आतंकवाद से जुड़े लोगों को या तो रिहा कर दिया गया या उन्हें भागने दिया गया।

बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान का पैतृक घर भी नष्ट कर दिया गया। देश की बहुलतावादी पहचान अब घोर संकट में है। अमेरिका की कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम ने भी अपनी रिपोर्ट में इन चिंताओं की पुष्टि की और कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर व्यवस्थित दबाव लगातार बढ़ रहा है।

मई में हजारों हिफाजत-ए-इस्लाम समर्थकों ने मुस्लिम महिलाओं को बराबरी के अधिकार देने के प्रयासों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। इसी दौरान हिंसक अपराध बढ़ रहे हैं और जनता पर बढ़ते कर्ज और खराब शासन की वजह से अर्थव्यवस्था लगातार डगमगा रही है।

फर्स्टपोस्ट ने बांग्लादेश की स्थिति को साफ शब्दों में बताया, “देश अब पूरी तरह अराजकता में है। अवामी लीग के तहत चलने वाली रंगदारी अब अलग-अलग राजनीतिक गुटों, कट्टरपंथी छात्र संगठनों और आपराधिक गिरोहों की खुली प्रतिस्पर्धा में बदल गई है।”

शेख हसीना ने सत्ता परिवर्तन को अंधकारमय पल बताया और यूनुस की सरकार को असंवैधानिक और तानाशाही करार दिया। 5 अगस्त 2025 को यूनुस ने फरवरी तक चुनाव कराने की घोषणा तो की, लेकिन उनके कदम कुछ और ही इशारा कर रहे हैं।

उन्होंने प्रधानमंत्री आवास को तानाशाही संग्रहालय में बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। नए सरकारी ढाँचे की तैयारी न होना यह दिखाता है कि लोकतंत्र बहाल करने की उनकी कोई मंशा नहीं है। उधर, यूनुस तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और फिलिस्तीन जैसे इस्लामी देशों से गहरे रिश्ते बना रहे हैं और लगातार इस्राइल-विरोधी प्रचार कर रहे हैं।

घरेलू स्तर पर इस्लामी आतंकवाद खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है। 1970-80 के दशक में अफगानिस्तान जाकर सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने वाले मदरसा-शिक्षित बांग्लादेशी युवाओं ने लौटकर हूजी-बी (HuJI-B) और जेएमबी (JMB) जैसे संगठन बनाए।

आज इनके साथ अंसर अल इस्लाम (अल-कायदा की बांग्लादेश शाखा), हिज्ब उत-तहरीर, हिफाजत-ए-इस्लाम, खिलाफत मजलिस और इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश जैसे कई नए संगठन भी सक्रिय हैं।

हाल ही में अमेरिकी राजनयिक ट्रेसी ऐन जैकबसन से मुलाकात में यूनुस ने दावा किया कि आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है। लेकिन जनवरी में उनकी ही सरकार ने अल-कायदा से जुड़े उस आतंकी को माफ करने की कोशिश की, जिस पर 2015 में एक अमेरिकी नागरिक की हत्या का आरोप है और जिसके सिर पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने 5 मिलियन डॉलर का इनाम रखा है। यह दिखाता है कि यूनुस के दावे झूठे हैं और वे आतंकी ताकतों को बचा रहे हैं।

दुनिया अब और चुप नहीं रह सकती। बांग्लादेश की स्थिति सिर्फ एक आंतरिक राजनीतिक संकट की नहीं है बल्कि एक ऐसा टाइम बम है जिसका असर पूरी दुनिया पर होगा।

देश तेजी से जिहादियों का अड्डा, नशीली दवाओं की तस्करी, हथियारों की तस्करी और कट्टरपंथी विचारधारा का केंद्र बनता जा रहा है। अगर इसे रोका नहीं गया तो जल्द ही हजारों जिहादी सीमाओं को पार कर पश्चिमी सभ्यता, ईसाइयों, यहूदियों, हिंदुओं और सेक्युलर लोगों को निशाना बनाएँगे।

अब शालीन कूटनीति का समय खत्म हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय खासकर अमेरिका, भारत, यूरोपीय संघ और क्षेत्रीय सहयोगियों को सख़्त कदम उठाने होंगे। आर्थिक प्रतिबंध, वीजा रोक, वित्तीय निगरानी और आतंकवाद-विरोधी कार्रवाइयों के जरिए यूनुस शासन को जवाबदेह ठहराना जरूरी है। जितनी देर दुनिया इंतजार करेगी, उतना ही अंधेरा बढ़ेगा। बांग्लादेश का पतन उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इसके नतीजे वैश्विक होंगे विनाशकारी और अपूरणीय।

(मूल रूप से यह खबर अंग्रेजी में सला उद्दीन शोएब चौधरी ने लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

नवोदय स्कूल में ईसाई मिशनरी का धर्मांतरण खेल, छात्रों और माता-पिता को बहलाने के आरोप में 3 पर FIR: जब्त हुई बाइबल और प्रचार सामग्री, SDM की जाँच के बाद सामने आई गड़बड़ियाँ

मध्य प्रदेश के डबरा में एक स्कूल में ईसाई मिशनरी का मामला सामने आया है। एक अभिभावक की शिकायत के बाद खुलासा हुआ कि स्कूल में बच्चों और उनके माता-पिता को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया जा रहा था। इसके बदले उन्हें नौकरी और पैसों का लालच दिया जा रहा था। पुलिस ने 3 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। स्कूल में बाइबल बाँटने और प्रचार सामग्री मिलने के बाद SDM ने जाँच के आदेश दिए। जाँच में कई गंभीर गड़बड़ियाँ भी सामने आईं।

मामला क्या है?

यह मामला तब उजागर हुआ जब एक अभिभावक ने स्कूल में हो रही गतिविधियों की शिकायत की। उनका बेटा नवो कांति स्कूल (वार्ड 18, नवोदय विद्यालय) में पढ़ता है। अभिभावक ने आरोप लगाया कि स्कूल में कुछ लोग बच्चों और माता-पिता को ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसा रहे थे। इसके बदले में उन्हें नौकरी और अन्य लाभों का लालच दिया जा रहा था।

पुलिस ने 29 अगस्त 2025 को इस मामले में FIR दर्ज की। यह शिकायत इटारसी थाने में दर्ज की गई। FIR में श्यामनारायण, रेविका नंदा और डेनज़िल इन 3 लोगों का नाम हैं। इन पर मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 की धारा 5 के तहत मामला दर्ज किया गया है। बताया गया है कि पिछले एक साल से स्कूल में ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा था। पुलिस जांँच कर रही है कि और कौन-कौन इसमें शामिल था। सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है।

शिकायतकर्ता को इस पूरे मामले की जानकारी तब मिली जब उसके बेटे ने बताया कि स्कूल में टीचर ईसा मसीह और ईसाई मजहब के बारे में बातें करते हैं। बेटे ने यह भी बताया कि स्कूल की प्रिंसिपल को भी इन सब बातों की जानकारी है।

शिकायतकर्ता ने कहा कि स्कूल में बच्चों को धर्म से जुड़ी बातें बताई जाती हैं, जो सरकारी नियमों के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीचर बच्चों को प्रवचन देते हैं और ईसा मसीह की महिमा करते हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि वह काफी समय से स्कूल में इस तरह की गतिविधियाँ देख रहे थे। अब जाकर उन्होंने इसकी शिकायत दर्ज कराई।

स्कूल में दो लोग बाँट रहे थे बाइबल और पर्चे

25 अगस्त 2025 को शिकायतकर्ता अपने एक दोस्त के साथ स्कूल पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर उसने देखा कि स्कूल में दो अजनबी लोग मौजूद थे। छात्रों को ईसाई मजहब से जुड़ी किताबें और पर्चे बाँटे जा रहे थे। शिकायतकर्ता के मुताबिक, उन दोनों लोगों ने उसे भी एक बाइबल दी, ईसा मसीह की तारीफ की और ईसाई मजहब अपनाने के लिए कहा। बदले में नौकरी और पैसे का लालच दिया गया।

इसी दौरान शिक्षा विभाग के अधिकारी दीपक चौकोटिया और विश्व हिंदू परिषद व बजरंग दल के कुछ सदस्य भी स्कूल पहुँच गए। हिंदू संगठनों ने शिक्षा अधिकारी से पूछा कि स्कूलों की नियमित जाँच क्यों नहीं होती। इसी वजह से ऐसी गतिविधियाँ पनप रही हैं।

इस बहस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। स्कूल से मिले ईसाई मजहब से जुड़े साहित्य को जब्त कर लिया गया। शिक्षा अधिकारी ने उस सामग्री को एक अलमारी में सील कर दिया।

स्कूल में जाँच समिति का गठन, कई गड़बड़ियाँ सामने आईं

स्कूल में ईसाई प्रचार की शिकायत के बाद SDM ने तीन सदस्यीय जाँच समिति बनाई। जाँच के दौरान स्कूल में कई अनियमितताएँ पाई गईं। स्कूल के प्राचार्य का नाम अनिल निगम और संचालक का नाम अब्राहिम क्रांति बताया गया है।

यह स्कूल 2012 से नवा कान्ति समिति द्वारा चलाया जा रहा है। स्कूल मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल से संबद्ध है। साल 2025 में इसकी मान्यता दोबारा बढ़ाई गई थी। फिलहाल स्कूल में करीब 70 छात्र अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं।

स्कूल में एक NGO द्वारा व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र भी चलाया जा रहा था। लेकिन वहाँ पढ़ाने के लिए कोई प्रशिक्षित स्टाफ मौजूद नहीं था। जाँच में यह भी सामने आया कि स्कूल परिसर में बने आवासीय क्वार्टर में दो बाहरी लोग रह रहे थे।

बिहार वोटर लिस्ट पर राहुल गाँधी का हर दावा हुआ फेल, चुनाव आयोग के बुलेटिन से खुलासा-कॉन्ग्रेस ने नहीं दाखिल की एक भी आपत्ति: वोट चोरी के नाम पर सिर्फ नौटंकी कर रहे युवराज!

बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रही सियासी बहस अब एक नए मोड़ पर आ गई है। चुनाव आयोग ऑफ इंडिया ने 30 अगस्त 2025 को एक डेली बुलेटिन जारी किया है, जो राहुल गाँधी और विपक्ष के उन दावों पर सवाल उठाता है, जिनमें SIR प्रक्रिया को वोट चोरी का हथियार बताया गया था।

इस बुलेटिन के मुताबिक, 1 अगस्त से 30 अगस्त तक ड्राफ्ट रोल पर दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में सिर्फ 2 दिन बचे हैं और जो आँकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। आइए, इस रिपोर्ट में हर पहलू को विस्तार से समझते हैं, ताकि जनता को सचाई का पता चले।

चुनाव आयोग के बुलेटिन के मुताबिक, अब तक राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीतिक पार्टियों ने जो दावे-आपत्तियाँ दर्ज कीं, वे काफी कम हैं। नेशनल पार्टियों में आम आदमी पार्टी (AAP) ने 1, बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 74, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 53,338, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) ने 899, और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस (INC) ने 0 दावे-आपत्तियाँ दर्ज कीं।

बिहार की पार्टियों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी लिबरेशन) ने 1,496 (जिनमें 103 बहिष्करण के लिए), जनता दल (यूनाइटेड) ने 36,550, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने 1,210, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने 47,506 (जिनमें सिर्फ 10 बहिष्करण के लिए), राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी ने 1,913, और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने 270 दावे-आपत्तियाँ दर्ज कीं।

सबसे हैरानी की बात यह है कि कॉन्ग्रेस ने एक भी दावा या आपत्ति नहीं की जबकि राहुल गाँधी SIR को लेकर लगातार हमलावर रहे हैं।

सामान्य मतदाताओं की ओर से दायर दावों-आपत्तियों में भी आँकड़े चौंकाने वाले हैं। कुल 2,27,636 दावों में से सिर्फ 29,872 नामों को शामिल करने और 1,97,764 नामों को हटाने के लिए आवेदन आए। 7 दिन के निपटान के बाद सिर्फ 33,771 मामले सुलझे। नई वोटरों के लिए 18 साल या उससे अधिक उम्र के 13,33,793 फॉर्म-6 और डिक्लेरेशन आए, जिनमें से 61,248 का निपटान हो चुका है। यह आँकड़ा साफ करता है कि ज्यादातर आवेदन नाम हटाने के लिए हैं न कि जोड़ने के लिए, जो विपक्ष के 65 लाख वोटरों के नाम कटने के दावों के उलट है।

चुनाव आयोग द्वारा जारी आँकड़ें

अब बात करते हैं राहुल गाँधी के उन दावों की, जो SIR को लेकर हवा में तैर रहे थे। राहुल गाँधी ने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा के दौरान बार-बार आरोप लगाया कि चुनाव आयोग और BJP के बीच साठगाँठ है और SIR के जरिए 65 लाख वोटरों के नाम जानबूझकर काटे गए। उन्होंने दावा किया कि यह गरीब, दलित, और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला है। लेकिन चुनाव आयोग का बुलेटिन इन दावों को खोखला साबित करता है। कॉन्ग्रेस ने एक भी दावा दायर नहीं किया, जो उनके आरोपों की गंभीरता पर सवाल उठाता है। क्या यह दर्शाता है कि उनके दावे महज प्रचार थे?

राहुल गाँधी ने एक और वीडियो वायरल किया था, जिसमें उन्होंने दावा किया कि मृत वोटरों के नाम सूची में बने हुए हैं और SIR उनकी सफाई नहीं कर रहा। इस वीडियो में उन्होंने बीएलओ रानी कुमारी पर सवाल उठाए, लेकिन चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि रानी कुमारी सिर्फ सत्यापन कर रही थीं, न कि कोई गड़बड़ी। यह वीडियो फर्जी निकला और राहुल के दावों पर सवाल उठे। इसके अलावा, उन्होंने कर्नाटक के महादेवपुरा में एक लाख फर्जी वोटरों का डेटा पेश किया, लेकिन चुनाव आयोग ने जवाब माँगा, जो अब तक नहीं आया। क्या यह उनकी तैयारी की कमी को दर्शाता है?

राहुल ने विदेशी मीडिया जैसे Al Jazeera, NYT, BBC को इस्तेमाल करके ‘वोट चोरी’ प्रोपगैंडा फैलाया, दावा किया कि SIR से लाखों असली नाम कट रहे हैं। ये सब सपोर्ट राहुल के नैरेटिव को था, लेकिन ECI की रिपोर्ट्स से साफ है कि कोई सबूत नहीं, बस पॉलिटिकल नौटंकी। राहुल ने EC की चुनौती पर हलफनामा तक नहीं दिया।

एक और बड़ा दावा राहुल गाँधी ने यह किया कि SIR के जरिए संस्थागत वोट चोरी हो रही है, और उन्होंने इसे गुजरात मॉडल बताया। उन्होंने अररिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि चुनाव आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है। लेकिन चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि 22 लाख मृत वोटर पिछले 20 साल की गलतियों से जुड़े हैं और SIR इनको ठीक करने की प्रक्रिया है। राहुल के दावों के जवाब में आयोग ने चुनौती दी कि अगर गड़बड़ी थी, तो ड्राफ्ट जारी होने पर आपत्ति क्यों नहीं की गई? यह सवाल अब जनता के सामने है।

राहुल गाँधी ने मिंता देवी और शकुन रानी के नाम लेकर भी हंगामा मचाया। उन्होंने दावा किया कि मिंता देवी की उम्र 124 साल बताई गई, जो फर्जीवाड़ा है, और शकुन रानी ने दो बार वोट डाला। लेकिन जाँच में पता चला कि मिंता देवी का नाम सही था और शकुन रानी का मामला डुप्लिकेट EPIC नंबर से जुड़ा था, जो तेजस्वी यादव के साथ भी हुआ। चुनाव आयोग ने तेजस्वी के दो वोटर कार्ड का खुलासा किया, जो उनके अपने दावों पर सवाल उठाता है। क्या यह विपक्ष की अपनी गलतियों को छिपाने की कोशिश थी?

योगेंद्र यादव जैसे विश्लेषकों ने भी दावा किया था कि SIR से 2 करोड़ वोटरों के नाम कटेंगे, और यह जनता को वोट से वंचित करने की साजिश है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 1.97 लाख नाम हटाने के लिए आवेदन आए, जो उनके दावों से कोसों दूर है। राहुल गाँधी की 16 अगस्त से शुरू हुई वोटर अधिकार यात्रा जो 1 सितंबर को पटना में खत्म होगी, को जनता का समर्थन नहीं मिल रहा। नवादा में एक शख्स सुबोध कुमार ने दावा किया कि उनका नाम कटा, लेकिन आँकड़ों से यह साबित नहीं होता।

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR एक पारदर्शी प्रक्रिया है, जिसमें हर मतदाता और दल के लिए दरवाजे खुले हैं। उन्होंने कहा कि 90,817 मतदान केंद्रों की सूची शेयर की गई और 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावे-आपत्तियाँ आमंत्रित की गईं। बुलेटिन में यह भी कहा गया कि कोई भी नाम 1 अगस्त की सूची से बिना जाँच के नहीं हटाया जाएगा। यह दर्शाता है कि आयोग हर एलिजिबल वोटर को शामिल करने की कोशिश कर रहा है, जैसा कि 13.33 लाख नए फॉर्म से जाहिर होता है।

जनता के मन में सवाल है कि अगर वाकई 65 लाख नाम कटे, तो इतने कम दावे-आपत्तियाँ क्यों? क्या यह विपक्ष की नाकामी है या उनके दावों में दम नहीं था? राहुल गाँधी की यात्रा और बयानों ने सियासी माहौल गरम किया, लेकिन आँकड़े उनकी बातों को चुनौती दे रहे हैं। बिहार की जनता अब सचाई को समझ रही है और यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले कुछ दिन में क्या नया मोड़ आता है।

ये डेटा राहुल गाँधी को पूरी तरह एक्सपोज़ कर रहा है। बिहार में कोई ‘वोट चोरी’ नहीं, बल्कि ECI ने पारदर्शिता से काम किया। योगेंद्र यादव जैसे ‘चार्लटन’ की बातें भी हवा हो गईं। लोग SIR का सपोर्ट कर रहे हैं, फर्जी नाम हटाने चाहते हैं। ECI ने 3 लाख संदिग्ध वोटर्स को नोटिस भेजे, लेकिन सही लोगों को लेकर कोई समस्या नहीं। ये रिपोर्ट बताती है कि चुनाव प्रक्रिया मजबूत है और प्रोपगैंडा फैलाने वाले अब चुप हैं। बिहार के लोग समझदार हैं, वे ऐसे झूठ में नहीं फँसते। कुल मिलाकर SIR सफल हो रहा है और राजनीतिक शोर सिर्फ चुनावी स्टंट था।

हाथी-ड्रैगन फिर आए साथ: हजारों वर्ष पुराने भारत-चीन संबंधों में गर्माहट से डोनाल्ड ट्रंप को सीधा संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीन पहुँचे हैं। पीएम मोदी के दौरे की अहमियत का अंदाजा इससे भी लगता है कि यह उनका चीन दौरा 7 वर्षों के बाद हो रहा है।

SCO सम्मेलन से इतर पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रविवार (31 अगस्त 2025) को द्विपक्षीय वार्ता हुई है। दोनों नेताओं ने रसातल में चले गए भारत-चीन संबंधों में फिर से गर्माहट लाने के लिए काम पहल शुरू की है। दोनों नेताओं ने अपनी बैठक में भारत-चीन के एक बार फिर से साथ आने पर जोर दिया है।

पीएम मोदी ने क्या कहा?

पीएम मोदी ने बैठक के दौरान पिछले कुछ समय में दोनों देशों के संबंधों में आई प्रगति का जिक्र किया है। पीएम मोदी ने कहा, “सीमा पर डिसएंगेजमेंट के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना हुआ है। हमारे विशेष प्रतिनिधियों के बीच बॉर्डर मैनेजमेंट के संबंध में सहमति बनी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हुई है।”

उन्होंने बात का जिक्र किया है कि भारत-चीन का आपसी सहयोग कितना जरूरी है। पीएम ने कहा, “हमारे सहयोग से दोनों देशों के 2.8 बिलियन लोगों के हित जुड़े हुए हैं। इससे पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त होगा। परस्पर विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर हम अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

पीएम मोदी ने कहा कि भारत और चीन दोनों ही रणनीतिक स्वायत्तता के पक्षधर हैं और उनके संबंधों को किसी तीसरे देश के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही, पीएम मोदी ने जिनपिंग को 2026 में भारत द्वारा आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आमंत्रित भी किया। पीएम मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर राष्ट्रपति जिनपिंग का साथ माँगा है।

जिनपिंग बोले- ‘साथ आएँ ड्रेगन-हाथी’

चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने पीएम मोदी का चीन में स्वागत किया है। जिनपिंग का कहना है कि ड्रैगन (चीन) और हाथी (भारत) को एक साथ आने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “दुनिया परिवर्तन की ओर बढ़ रही है और ऐसे समय में भारत और चीन की भूमिका बेहद अहम है।”

जिनपिंग ने कहा है कि भारत और चीन दुनिया की दो सबसे पुरानी सभ्यताएं हैं और सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं व ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, “ऐसे में मित्र बने रहना, अच्छे पड़ोसी बनना और ड्रैगन व हाथी का साथ आना जरूरी है।”

जिनपिंग ने कहा है, “चीन-भारत प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि सहयोगी साझेदार हैं और दोनों देश एक-दूसरे के लिए खतरा नहीं बल्कि विकास के अवसर हैं। दोनों देशों को द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखने और संभालने की आवश्यकता है।”

जिनपिंग ने कहा कि भारत-चीन को अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सौहार्द सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। साथ ही, सीमा के मुद्दे को पूरे भारत-चीन संबंधों की धुरी नहीं बनने देना चाहिए।

भारत-चीन का अमेरिका को संदेश

पीएम मोदी और जिनपिंग की इस मुलाकात पर जितनी भारत-चीन के लोगों की नजरें हैं, उतनी ही अमेरिका की भी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए बेतुके टैरिफ से दोनों ही देशों को समस्याएँ हैं। हालाँकि, उनका असर भारत पर ज्यादा है लेकिन चीन भी कब इसके लपेट में आ जाए कहना मुश्किल है।

हालाँकि, ट्रंप के इस टैरिफ वॉर से पहले ही भारत-चीन ने अपने संबंधों में सुधार के संकेत देने शुरू कर दिए थे। नरमी पिछले साल अक्टूबर से ही शुरू हुई जब पीएम मोदी और जिनपिंग ने रूस में ब्रिक्स समिट के दौरान मुलाकात की। अमेरिकी राष्ट्रपति की इस चुनौती के बाद संबंधों के सुधार की दिशा तेज हो गई है।

एक्सपर्ट भी यह मान रहे हैं कि ट्रंप के बेतुके टैरिफों ने अमेरिकी विदेश नीति को उल्ट-पुल्ट कर दिया है। इससे पहले अमेरिका में भारत को चीन के लिए एक संतुलन के रूप में देखा जाता था। लेकिन भारत के बढ़ते कद ने अमेरिका को भी परेशान किया है। भारत भी SCO समिट के जरिए यह साबित कर रहा है कि वह सिर्फ अमेरिकी खेमे में नहीं है। बल्कि दुनिया में उसके पास भी विकल्प मौजूद हैं।

फिनोक्रेट टेक्नोलॉजीज के संस्थापक गौरव गोयल ने मिंट से कहा है कि चीन-रूस अपनी अर्थव्यवस्थाओं को भारत के लिए खोल रहे हैं, जिससे व्यापार को पुनर्निर्देशित करने और टैरिफ के बोझ को कम करने में मदद मिल रही है।

गोयल ने कहा, “SCO शिखर सम्मेलन…एक रणनीतिक मोड़ है जहाँ भारत, चीन और रूस अपनी आर्थिक राह खुद तय करने, साझेदारी को मजबूत करने और यह संकेत देने के लिए तैयार हैं कि अमेरिकी व्यापार दबाव उनके भविष्य को तय नहीं करेगा।”

ट्रंप इस टैरिफ के पीछे भारत द्वारा रूसी तेल का खरीदा जाना बताते हैं। चीन में SCO बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी पीएम मोदी की मुलाकात होगी जिसका संदेश स्पष्ट होगा कि भारत अपनी नीतियाँ अपनी स्वायत्ता के हिसाब से तय करेगा ना कि दुनिया के किसी स्वघोषित चौधऱी के दबाव में।

भारत-चीन के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंध

भारत और चीन के सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्ष पुराने हैं। चीन में भारतीय दूतावास का कहना है कि भारत और चीन के बीच संपर्कों के लिखित रिकॉर्ड दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मौजूद हैं, जो आगे चलकर बौद्ध धर्म और व्यापार के माध्यम से और मजबूत हुए हैं।

चीनी भिक्षु फाह्यान 402 ईस्वी में भारत आए और करीब 10 साल यहाँ रहकर संस्कृत और बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया। उनकी किताब ‘फो गुओ जी’ आज भी एक अहम ऐतिहासिक दस्तावेज मानी जाती है। भारतीय पिता और चीनी माता से जन्मे विद्वान कुमारजीव ने भी संस्कृत सूत्रों का चीनी में अनुवाद किया, जो आज तक प्रासंगिक हैं।

पाँचवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के भिक्षु बोधिधर्म चीन गए और उन्होंने शाओलिन मठ की स्थापना की। यहीं से जेन बौद्ध धर्म की नींव चीन में पड़ी। सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग (शुआनजांग) भारत आए। हर्षवर्धन के शासनकाल में उन्होंने बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन किया और उन्हें चीन ले गए।

19वीं और 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलनों के दौरान दोस्ती का भाव फिर से उभरा। चीनी विद्वान कांग युई 1890 के दशक में भारत आए। वहीं, रवींद्रनाथ टैगोर ने 1924 में चीन का दौरा किया और 1937 में उनकी प्रेरणा से विश्वभारती विश्वविद्यालय में चीना भवन की स्थापना हुई।

भारत-चीन कूटनीतिक संबंधों के 75 साल

भारत और चीन के कुटनीतिक संबंधों को भी इस वर्ष 75 वर्ष पूरे हुए हैं। इन वर्षों में दोनों देशों के संबंध ‘रोलर कोस्टर राइड’ की तरह रहे हैं। आजादी के बाद हिंदी चीनी भाई-भाई को दौर था और भारत-चीन के बीच 1 अप्रैल 1950 को कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। भारत ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता देने वाला पहला गैर-साम्यवादी देश बनकर इतिहास रचा था।

इसके बाद 1962 के युद्ध ने दोनों देशों के रिश्तों पर गहरा असर डाला और इसके बाद लंबे समय तक दोनों के बीच दूरी बनी रही। इस बीच पाकिस्तान और चीन करीब आते गए। हालाँकि, 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बीजिंग यात्रा से संबंधों को पटरी पर लाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि तंत्र (Special Representatives Mechanism) की स्थापना की गई। 2005 में चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत आए और दोनों देशों के बीच सामरिक और सहयोगात्मक साझेदारी की शुरुआत हो गई।

पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच भी रिश्तें में गर्माहट दिखी, जिनपिंग भारत आए तो पीएम मोदी भी अपने कार्यकाल में चीन गए। हालाँकि, 2020 में गलवान में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई झड़प ने रिश्तों को एक बार फिर पटरी से उतार दिया। अब पीएम मोदी की इस यात्रा के बाद एक बार फिर भारत-चीन करीब आते दिख रहे हैं।

दोनों देशों के आर्थिक संबंध भी मजबूत बने हुए हैं। चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 2024 में दोनों देशों के बीच 127 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था। वहीं, बहुपक्षीय मंच पर भारत और चीन BRICS, SCO और G-20 जैसे मंचों पर एक-दूसरे सहयोग करते हैं। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसी पहलों का समर्थन करते हैं।

भारत को सतर्कता के साथ दोस्ती बढ़ाने की जरूरत

कूटनीतिक कदमों से दोनों देशों के संबंधों में गर्माहट जरूर आई है लेकिन अब भी भारत को संभलकर चलने की जरूरत है। 2020 की गलवान झड़प की कड़वी यादें, अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश पर जारी चीन का दावा अभी भी दोनों देशों के बीच दीवार बने हुए हैं।

साथ ही, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन का पाकिस्तान को खुला समर्थन यह दिखाता है कि चीन किसी भी समय अपने रणनीतिक हित भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है। साथ ही, पाकिस्तान के साथ चीन की नजदीकी और बेल्ट ऐंड रोड पहल भारत की रणनीतिक चिंताओं को और गहरा करती है।

चीन की विस्तारवादी सोच के भारत हमेशा खिलाफ रहा है और चीनी सामानों पर निर्भरता कम करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहल भी चलाई गई हैं, जो दिखाती हैं कि भारत को चीन पर अत्यधिक निर्भरता का खतरा भी नहीं लेना होगा।

इसके अलावा, चीन की आक्रामक सैन्य तैनाती, इंडो-पैसिफिक में बढ़ती मौजूदगी और दक्षिण एशिया में छोटे देशों पर उसका आर्थिक दबाव भारत के लिए चुनौती रहते ही हैं। नेपाल, श्रीलंका और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को प्रभावित करता है। ऐसे माहौल में भारत के लिए जरूरी है कि वह संतुलन साधते हुए आगे बढ़े।