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हिंदी अखबार के 4 दिन पुराने संपादकीय का अक्षर-अक्षर गुजराती में अनुवाद कर छाप दिया, न इजाजत ली-न क्रेडिट दिया: ‘गुजरात समाचार’ ने पत्रकारिता का नया प्रतिमान गढ़ा

समाचार पत्र का संपादकीय किसी भी अखबार की आत्मा होती है। अखबार की सोच होती है, जिसे पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाया जाता है। आज कल अखबारों के साथ संपादकीय भी महत्व खोते जा रहे हैं। हालाँकि ये अभी भी प्रकाशित होते हैं।

गुजराती पत्रकारिता में ‘क्रांति’ हुई है। मोदी से लेकर ट्रंप तक के खिलाफ ‘अग्रणी’ अखबार ‘ गुजरात समाचार ‘ में भी संपादकीय प्रकाशित होते रहते हैं। 18 अगस्त को भी एक लेख ‘गुजरात समाचार’ में प्रकाशित हुआ है। शीर्षक है – ‘देश के सामने की चुनौतियाँ।’ शीर्षक पढ़कर या ‘गुजरात समाचार’ का नाम सुनकर लेख में ‘मोदी के शासन के तहत देश बर्बाद हो चुका है और उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए’ ऐसा भाव होगा, स्वाभाविक तौर पर ऐसा लग सकता है। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। लेख का टोन बहुत सामान्य है। यह एक सामान्य संपादकीय लेख की तरह है।

समाचार के संपादकीय लेख की शुरुआत हाल ही में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस से होती है। लेख में कहा गया है कि जश्न मनाने के लिए उपलब्धियों की कमी नहीं है। भारत ने जो ऊँचाइयाँ हासिल की हैं, वह छोटी बात नहीं है, क्योंकि भिन्नताएँ और विविधताएँ होने के बावजूद देश लगातार मजबूत बनता जा रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और राष्ट्रीय एकता का उल्लेख आता है।

इसके बाद आर्थिक मामलों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है और गरीबी भी घट रही है।इसके बाद दूसरे चरण की शुरुआत होती है। इसमें कुछ खामियों और चुनौतियों की बात की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की थोड़ी चर्चा होती है और अमेरिका और टैरिफ का उल्लेख दिखाई देता है। मजबूत संस्थाएँ होनी चाहिए और नियमों के आधार पर व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, ऐसी सारी बातें लिखी गई हैं।

आखिरी पैराग्राफ में संपादक लिखते हैं, “कभी-कभी बहुमत भेड़ों के झुंड जैसा होता है। भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा सत्र होने से पहले विधायक पूछने वाले प्रश्नों की चिट्ठी पार्टी की तरफ से दी जाती है। विधायक अपने क्षेत्र के असली प्रश्न नहीं पूछ सकते… ये सभी लोकतंत्र को अपंग करने वाली हैं और ये एक बड़ा चुनौती है। विपक्ष भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं पैदा हुई थी।”

आगे लिखा, “चुनाव आयोग का निष्पक्ष व्यवहार भारतीय राजनीतिक प्रणाली की नींव है, जिस पर बाकी सब निर्भर है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों के मन में कोई संदेह या उलझन की स्थिति नहीं होनी चाहिए। यह लेख सामान्य है।” जैसा अखबार में छपता है, वैसा ही है। लेकिन मूल बात यह है कि यही लेख, शब्दशः चार दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के हिंदी संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।

14 अगस्त, 2025 को रात 11:01 बजे प्रकाशित इस लेख का शीर्षक है– ’79वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत की उपलब्धियां और चुनौतियाँ, मजबूत संस्थाओं की आवश्यकता ‘

चार दिन बाद गुजरात समाचार में प्रकाशित संपादकीय और बिजनेस स्टैंडर्ड के इस लेख में अंतर इतना है कि एक हिंदी में है और एक गुजराती में। दूसरी बात ये है कि ‘गुजरात समाचार’ ने अंतिम पैराग्राफ में भाजपा-विरोधी टिप्पणियाँ की हैं, जो बिजनेस स्टैंडर्ड के लेख में नहीं हैं। बाकी का पूरा लेख पहले से आखिरी तक शब्दशः एक जैसा है। कहीं कोई बदलाव नहीं किया गया है। पैराग्राफ भी समान हैं, शुरुआत भी एक जैसी है और अंत में गुजरात समाचार द्वारा जोड़ी गई कुछ टिप्पणियों के अलावा बाकी का हिस्सा समान है।

गुजरात समाचार का अंडरलाइन किया हुआ भाग मूल हिंदी लेख में नहीं है

आमतौर पर एक अखबार का लेख दूसरे में प्रकाशित होती रहती हैं,लेकिन संपादकीय लेखों की अदला-बदली आम तौर पर नहीं होती है। कई अखबार-मीडिया संस्थाएँ एक-दूसरे से सामग्री लेती रहती हैं, लेकिन इसमें उस तथ्‍य का स्पष्ट उल्लेख होता है। कई गुजराती अखबार विदेशी अखबारों की रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। दोनों के बीच एक प्रकार का टाई-अप होता है।

‘गुजरात समाचार’ ने ऐसी कोई स्पष्टता नहीं लिखी है। फिर भी वास्तविकता जानने के लिए ऑपइंडिया ने जब ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से संपर्क किया, तो यह पता चला कि दोनों अखबारों के बीच ऐसा कोई टाई-अप नहीं किया गया है। न ही अंग्रेजी अखबार ने या उसके हिंदी संस्करण ने गुजरात समाचार को अपने लेख प्रकाशित करने के लिए विशेष अधिकार दिए हैं। गुजरात समाचार के सूत्र भी कहते हैं कि उनका कोई टाई-अप नहीं है।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिज़नेस स्टैंडर्ड इस विषय में जाँच कर रहा है और जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

(मूल रूप से ये लेख गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘नईम-सलीम’ का धंधा फले-फूले, क्या इसलिए तेलंगाना में मारवाड़ी-गुजराती टारगेट? जानिए क्या है ‘मारवाड़ी गो बैक’ विवाद, BJP नेता बोले- भड़का रही कॉन्ग्रेस-AIMIM

तेलंगाना में इन दिनों ‘मारवाड़ी गो बैक’ का नारा देकर बवाल मचाया जा रहा है। इस अभियान में मारवाड़ी व्यापारियों के काम-धंधों पर हमला करते हुए उन्हें वापस लौटने को कहा जा रहा हैं। मारवाड़ियों पर स्थानीय व्यापारी कारोबार छिनने से लेकर नकली सामान बेचने तक का आरोप लगा रहे हैं।

वहीं, भाजपा नेता और हिंदूवादी नेता लगातार मारवाड़ी समुदाय के पक्ष में खड़ा है। भाजपा नेता बंदी संजय कुमार ने इसे कॉन्ग्रेस-AIMIM-BRS की चाल बताकर कहा कि ये हिंदू समुदाय को बाँटने की कोशिश है। जबकि हिंदूवादी नेता टी राजा सिंह ने साफ कहा कि जिस मारवाड़ी समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है वो राज्य की GDP में योगदान देता है।

विशेष वर्ग ने छिना काटिका-रजक समाज का पेशा- बंडी संजय

बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री बंडी संजय ने ‘मारवाड़ी गो बैक’ अभियान पर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह हिंदू समाज को तोड़ने की एक साजिश है, जिसके पीछे कॉन्ग्रेस-बीआरएस-AIMIM का हाथ है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अगर यह आंदोलन बंद नहीं हुआ तो बीजेपी ‘रोहिंग्या वापस जाओ’ आंदोलन चलाएगी।

बंडी संजय ने कहा कि यह शर्म की बात है कि लोग उन रोहिंग्याओं पर चुप हैं जो अवैध रूप से रह रहे हैं और समाज के लिए खतरा हैं। लेकिन वे उस मारवाड़ी समुदाय को निशाना बना रहे हैं, जिसने तेलंगाना की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है और कभी भी राज्य को लूटा नहीं। उन्होंने कहा कि हैदराबाद का पुराना शहर ISI का अड्डा बन चुका है और यहाँ कई रोहिंग्या छिपे हुए हैं।

बंडी संजय ने आरोप लगाया कि कुछ खास व्यवसायों को खास लोगों से छीना गया है। संजय ने कहा कि ‘नईम मटन शॉप’ और ‘सलीम ड्राईक्लिनिंग शॉप’ जैसे नाम इस बात का सबूत हैं। जिन कामों को हिंदू काटिका समाज (मटन की दुकानें) और रजक समाज (ड्राई क्लीनिंग) करते थे, अब वे एक विशेष वर्ग (मुस्लिम वर्ग) के हाथों में चले गए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि इस पर ये लोग चुप क्यों हैं।

उन्होंने कहा कि मारवाड़ी समाज ने कभी भी सत्ता का लालच नहीं किया, बल्कि वे राज्य की तरक्की में भागीदार बने हैं तो फिर उन्हें तेलंगाना क्यों छोड़ना चाहिए?

मारवाड़ी समाज को बदनाम करने वालों को बख्शेंगे नहीं- राजा सिंह

वहीं, विधायक राजा सिंह लगातार मारवाड़ियों के हित में खड़े रहे है। राजा सिंह ने मारवाड़ी व्यापारियों पर निशाना साधने को लेकर कहा कि जो लोग मारवाड़ी समाज को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें हम बख्शेंगे नहीं। ऐसे लोगों को कानून के तहत जेल भेजा जाएगा। मारवाड़ी, गुजराती और राजस्थानी समुदाय तेलंगाना के विकास में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इनके पूर्वज यहीं पैदा हुए थे और यहीं बस गए।

राजा सिंह ने आगे कहा कि इन समुदायों ने मेहनत से व्यापार खड़ा किया है। आज ये राज्य की अर्थव्यवस्था और GDP को मज़बूती देने वाले मुख्य स्तंभ हैं। हाल ही में कुछ लोग इन्हें निशाना बना रहे हैं। उन्हें बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं। यह पूरी तरह गलत है और इसे कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।

विपक्ष का रवैया: रोजगार की बात या बहाना?

कॉन्ग्रेस और उसके साथी दलों का रवैया साफ तौर पर पक्षपाती दिख रहा है। इनकी बातों में हिंदू विरोध साफ झलकता है। ये पार्टियाँ एक तरफ तो बाहरी हिंदू व्यापारियों को हटाने की बात कर रही हैं। कहती हैं कि ये लोग स्थानीय व्यापार को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

दूसरी तरफ, ये लोग रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद कर रहे हैं। उनके लिए रहने, खाने और काम की व्यवस्था कर रहे हैं। कई सालों से ये पार्टियाँ हिंदू व्यापारियों के खिलाफ माहौल बना रही हैं। अब ‘न्याय’ के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। इससे समाज में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है।

वहीं, बीजेपी का कहना है कि यह सब एक साजिश है। इस साजिश का मकसद हिंदुओं को आपस में बाँटना है। साथ ही, इससे कुछ पार्टियाँ अपना वोटबैंक मजबूत करना चाहती हैं।

जिस अलास्का को रूस ने 158 साल पहले अमेरिका को बेच दिया, वहाँ अपनी टट्टी भी छोड़कर नहीं आए पुतिन: ट्रंप से मिलने गए तो बॉडीगार्ड साथ लेकर आए थे ‘पूप सूटकेस’

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को अलास्का में बैठक की। ये वही अलास्का है, जिसे रूस ने 158 साल पहले अमेरिका को बेच दिया था। इस बार जब पुतिन अलास्का में बैठक करने पहुँचे तो उन्होंने अपना मल-मूत्र तक नहीं छोड़ा। पुतिन ‘पूप सूटकेस’ में अपना मल-मूत्र लेकर वापस रूस लौटे।

The Express US की रिपोर्ट में दो वेटेरन पत्रकार रेजिस गेंटे और मिखाइल रुबिन की जानकारी के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सुरक्षा में तैनात रहे बॉडीगार्ड ने उनकी अलास्का की यात्रा के दौरान उनके मल के लिए खास बैग का इंतजाम किया, जिन्हें एक सूटकेस में इकट्ठा किया गया था।

रेजिस गेंटे और मिखाइल रुबिन दोनों ही पत्रकार रूस के विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब पुतिन अपने मल को वापस रूस लेकर लौटे हैं। ऐसा कई सालों से चला आ रहा है। साल 2017 में फ्रांस की यात्रा के दौरान भी पुतिन ने अपने मल को सूटकेस में इकट्ठा करवाकर अपने देश लाए थे।

क्या है ‘पूप सूटकेस’ ?

‘पूप सूटकेस’ अलास्का पहुँचे रूसी राष्ट्रपति के सुरक्षा इंतजामों का हिस्सा रहा था। इस सूटकेस में पुतिन के मल को इकट्ठा कर वापस रूस लाया गया। वेटेरन पत्रकार बताते हैं कि ऐसा माना गया है कि पुतिन को अपने स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लीक होने का खतरा है इसीलिए वे मल अपने साथ लेकर लौटते हैं। विदेशी ताकतों को राष्ट्रपति के मल के नमूने से उनके स्वास्थ्य की जानकारी पता लग सकती है और वो ऐसा नहीं चाहते हैं।

इस बार राष्ट्रपति के मल को पूप सूटकेस में इकट्ठा किया गया लेकिन इससे पहले भी अलग-अलग तरीके अपनाए गए हैं, जिससे राष्ट्रपति के मल का नमूना दूसरे देशों के पास ना पहुँच सके। BBC की पूर्व पत्रकार फ़रीदा रुस्तमोवा बताती हैं कि 1999 में रूस के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही पुतिन की सुरक्षा में उनके मल को इकट्ठा करके वापस रूस लाया गया है।

पत्रकार के अनुसार वियना की यात्रा में तो पुतिन अपने प्राइवेट बाथरूम के साथ पहुँचे थे, जिसमें पोर्टेबल टॉयलेट था। पुतिन अपने स्वास्थ्य की जानकारी विदेशी ताकतों तक नहीं पहुँचाना चाहते हैं। वैसे ही पुतिन की स्वास्थ्य को लेकर कुछ वर्षों में कई दावे सामने आए हैं। इससे बचने के लिए राष्ट्रपति ऐसा करते हैं।

राष्ट्रपति पुतिन के स्वास्थ्य पर पहले भी हुई चर्चाएँ

72 साल के रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने स्वास्थ्य को लेकर कुछ सालों में कई बार चर्चा में आए हैं। पुतिन के स्वास्थ्य को लेकर रूसी प्रशासन ने हमेशा गोपनीयता बरती है। इसके बावजूद उनके कुछ वीडियो और फोटो से उनके स्वास्थ्य गड़बड़ी से संबंधित कयास लगा लिए जाते हैं। अफवाहें यह भी सामने आई हैं कि पुतिन को थायराइड का कैंसर या कमर की समस्या या साइकोसिस है।

वहीं, नवंबर 2024 में जब कजाकिस्तान के अस्ताना में एक प्रेस वार्ता के दौरान पुतिन अपने पैरों को अचानक झटकाने लगे तब अंदाजा लगाया गया था कि वे किसी न्यूरो संबंधी पार्किंसन रोग से जूझ रहे हैं।

इससे पहले भी साल 2023 में बेलारूसी राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको से मीटिंग के दौरान राष्ट्रपति पुतिन अपनी कुर्सी पर हिलते हुए नजर आए थे। साल 2022 में अफवाहें सामने आई थीं कि सीढ़ियों से गिरने के बाद पुतिन का पखाना निकल गया और पूरे कपड़े गंदे हो गए थे।

कुछ रिपोर्ट्स में राष्ट्रपति पुतिन को दिल का दौरा पढ़ने की भी बातें सामने आई थीं, जिसके बाद राष्ट्रपति को उनके आवास पर खास मेडिकल केयर में रखा गया था।

जिस सासाराम से ‘वोट चोरी’ का प्रोपेगेंडा फैलाने निकले राहुल गाँधी, वहीं की जनता ने ‘खानदानी चोर’ बता निकाली हवा: कहा- इनको रोहिंग्या के नाम कटने से हो रहा दर्द

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी बिहार में 16 दिनों की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाल रहे हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने 17 अगस्त 2025 को सासाराम से की थी। वोट चोरी के नाम पर जनता को बरगलाने के लिए जो मजमा लगाया गया था उसमें लालू यादव सहित कॉन्ग्रेस के सहयोगी दलों के नेता भी थे। लेकिन सासाराम के लोगों ने ही इस यात्रा के मकसद पर सवाल उठाए हैं।

कॉन्ग्रेस और RJD के पाप गिनाते हुए लोगों ने कहा है कि वे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने के लिए, यह ढोंग कर रहे हैं। बिहार के लोगों का यह भी कहना है कि चुनाव आयोग ने SIR की प्रक्रिया के तहत जो कुछ भी किया है वो सही है। इन लोगों से बातचीत का वीडियो बिहार के डिजिटल पोर्टल लाइव सीटीज ने अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया है।

‘जिसका खानदान चोर है वो दूसरों को वोट चोर बोलेगा’

बातचीत के दौरान एक शख्स ने राहुल गाँधी के आरोपों पर कहा, “जिसका खानदान ही चोर हो और अगर वो दूसरे को चोर बोले तो यह ठीक नहीं है। सरदार पटेल जी को प्रधानमंत्री बनना था लेकिन जवाहरलाल नेहरू बन गए और तभी से कॉन्ग्रेस वोट चोरी कर रही है।” शख्स ने कहा कि राहुल गाँधी का कोई असर नहीं है।

उन्होंने कहा, “वह (राहुल गाँधी) कह रहे हैं कि अगर वोट चोरी हुआ है तो हमारे पूरे रोहतास जिले में देखा जाए कि विधायक किस पार्टी के हैं। मनोज राम अभी-अभी जीते हैं तो फिर वो भी वोट चोरी करके जीते हैं।”

जिन मनोज का जिक्र इस शख्स ने किया है वो सासाराम सीट से कॉन्ग्रेस के सांसद हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार को करीब 20,000 वोटों से हराया था। अब लोग तो पूछेंगे है कि जहाँ से आप रैली कर रहे हैं, आपकी पार्टी का सांसद है क्या वहाँ आपने भी वोट चोरी की थी?

पूरे रोहतास जिले के बात करें तो इसके तहत आने वाली तीनों लोकसभा सीटों (बक्सर, सासाराम और काराकाट) पर गैर बीजेपी दलों के सांसद हैं। इनमें एक सांसद RJD, एक कॉन्ग्रेस और एक CPI (ML)(L) से है। इस जिले के तहत आने वालीं 7 विधानसभा सीटों पर भी सिर्फ एक बीजेपी विधायक हैं। बाकी 4 सीटें RJD और 1-1 सीट कॉन्ग्रेस व CPI (ML)(L) के पास है।

‘कॉन्ग्रेस की वोट चोरी की परंपरा’

एक अन्य शख्स ने बातचीत के दौरान कहा कि राहुल गाँधी का बयान ऐसा है जैसे उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। शख्स ने कहा, “कॉन्ग्रेस की वोट चोरी की परंपरा है। सबसे पहली वोट चोरी 1975 में हुई, जब इंदिरा गाँधी ने वोट चोरी कर चुनाव जीता, कोर्ट ने उनका चुनाव रद्द किया और देश को आपातकाल जैसा गंभीर परिणाम भुगतना पड़ा।”

‘तेजस्वी यादव के बिहार को चूना लगाने’ के बयान पर शख्स ने कहा, “तेजस्वी के पिताजी खुद चारा घोटाले में बिहार को चुना लगा चुके हैं। तो वह वहीं बात कहेंगे।”

एक अन्य शख्स ने कहा, “ये लोग बेल पर छूटे हुए लोग हैं और नकारात्मकता की राजनीति कर रहे हैं। इसी नकारात्मकता की राजनीति के चलते ये लोग हाशिए पर हैं। कोई भी इनके साथ नहीं है।”

‘गाँधी परिवार ने उड़ाईं संविधान की धज्जियाँ’

एक अन्य शख्स ने गाँधी परिवार पर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने और राष्ट्रपति का अपमान करने का भी आरोप लगाया है। शख्स ने कहा, “ये चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे। आयोग पर सवाल उठाने का मतलब है कि आप संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। संविधान को इन्होंने मजाक बना डाला है।”

उन्होंने आगे कहा, “भाई, बहन, माँ ये जितने भी लोग हैं इन्होंने संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इन्होंने बाबा साहब का अपमान किया हैं और सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अपमान किया है।” ऐसे लोगों का कहना है कि अगर वोट चोरी की होती तो उन क्षेत्रों में भी बीजेपी जीत जाती जहाँ अभी हारी है। कुछ लोगों खुलकर चुनाव आयोग के समर्थन में हैं और बिहार की SIR प्रक्रिया को पूरी तरह सही बता रहे हैं।

‘SIR गलतियों को सुधारने की कोशिश, इससे तकलीफ क्यों?’

बिहार चुनाव में विपक्ष ने मतदाता सूची की SIR प्रक्रिया को लेकर हल्ला बोला हुआ है। विपक्ष द्वारा लगातार वोट काटने के आरोप लगाए जा रहे हैं। SIR के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची से चुनाव आयोग ने पुराने 65 लाख से अधिक नाम हटा दिए हैं, जिसे लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है।

एक शख्स ने इसे लेकर कहा, “जिन लोगों का नाम हटा है उनमें से 50% लोगों का दो जगह नाम होगा। मेरा नाम मेरे गाँव में भी है और सासाराम में भी है और एक जगह कटना बहुत जरूरी है। इसलिए SIR बहुत जरूरी है। कहीं ना कहीं गलतियाँ तो हैं और अगर कोई उस गलती को सुधारने का प्रयास करे तो हमें क्यों तकलीफ हो रही है? मतलब कि हम खुद गलत हैं। चुनाव आयोग जो कर रहहे है वो देश हित में है।” वहीं, एक अन्य शख्स ने कहा कि गलत अफवाह फैलाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर पूछ रहे हैं कि नाम कैसे कटा है।

‘कॉन्ग्रेस को रोहिंग्याओं के वोट कटने का दर्द है’

एक शख्स ने दावा किया है कि कॉन्ग्रेस का असल दर्द विदेशी ताकतों का कमजोर होना और रोहिंग्याओं का वोट कटना है। शख्स ने कहा, “नाम देश में किसी का नहीं कटा है। कॉन्ग्रेस दोमुँही बातें करती है। कर्नाटक के मुद्दे को लेकर इसने पूरे देश में हंगामा मचाया कि वोटर लिस्ट गलत है। वहाँ चुनाव जीती भी। लेकिन जब यहाँ SIR के तहत चुनाव आयोग पूरी तरह लगा कि मतदाता सूची को शुद्ध कर दिया जाए, तो कॉन्ग्रेस ने फिर ड्रामा शुरू कर दिया है।”

शख्स ने आगे कहा, “इनका असली दर्द क्या है? इनका दर्द रोहिंग्याओं का दर्द है। इनका दर्द विदेशियों का दर्द है। यह पार्टी देशहित में नहीं, विदेशियों के लिए जीती है। कॉन्ग्रेस के पेट में दर्द इस बात का है कि विदेशी ताकतें कमजोर हो रही हैं और रोहिंग्या जैसे विदेशी घुसपैठियों का वोट कट रहा है।”

‘4-4 जगह वोट दे रहे थे रोहिंग्या, उनका नाम कटा’

एक शख्स ने कहा कि SIR के तहत अवैध नामों को काटा गया है। शख्स ने कहा, “रोहिंग्या यहाँ पर आकर पनाह लेकर के वो चार-चार जगह नाम जुड़वा करके वोट देने का काम करते थे।” उसने कहा कि अब फिर से तेजस्वी यादव और लालू यादव का जंगलराज बिहार में नहीं लौटेगा।

‘लोकतंत्र पर सवाल उठा रहे लोकतंत्र के हत्यारे’

एक शख्स ने कहा, “लोकतंत्र की हत्या करने वाले कॉन्ग्रेसी और RJD के लोग आज लोकतंत्र के ऊपर सवाल उठा रहे हैं। जो सेना के ऊपर सवाल उठा सकता है तो उनके लिए चुनाव आयोग क्या चीज है?”

एक शख्स ने कहा कि जिन वोटरों का निधन हो गया है राहुल गाँधी उन्होंने जिंदा करने आए थे। राहुल उन्हें बताने आए थे कि जाओ और अवैध रूप से वोट करो। जो लोग यहाँ से चले गए हैं, उनको राहुल गाँधी बोल रहे हैं कि जिंदा हो जाओ और यही रहो डबल वोटर बनकर।

एक अन्य शख्स ने कहा कि विपक्षियों ने बिहार को एक ऐसा नासूर दिया है जिसके चलते बिहार में कोई उद्योग लगाने को तैयार नहीं है। विपक्षियों ने घोटाले किए जिसके बाद उद्योगपति यहाँ आने से कतरा रहे हैं।

कुछ मिलाकर देखा जाए तो राहुल गाँधी या अन्य विपक्षी दलों के चुनाव आयोग पर जो आरोप हैं, उनका असर लोगों तक नहीं पहुँचा है। जिन 65 लाख कटे नामों के सहारे राहुल गाँधी राजनीतिक संजीवनी खोजने की कोशिश कर रहे हैं उनका असर लोगों पर इसलिए भी नहीं दिख रहा है क्योंकि लगभग सभी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में मौजूद हैं। ऐसे में लोगों द्वारा विरोध किए जाने का कोई तुक नहीं हैं।

15 महीने की बच्ची, वजन सिर्फ 3.7KG… माँ के सामने कुपोषण से हुई मासूम की मौत, ससुराल वाले कहते रहे- मरने दे, लड़की ही तो है

मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले से एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहाँ 15 महीने की एक मासूम बच्ची दिव्यांशी की शनिवार (16 अगस्त 2025) को जिला अस्पताल में कुपोषण की वजह से मौत हो गई। बच्ची का वजन सिर्फ 3.7 किलोग्राम था, जो उसकी उम्र के मुताबिक बेहद कम है। बच्ची की माँ का कहना है कि लड़की होने की वजह से ससुरालवाले इलाज नहीं कराने देते थे।

रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टरों ने बताया कि उसका हीमोग्लोबिन स्तर केवल 7.4 ग्राम/डीएल था, जो जीवित रहने के लिए बेहद कम है। दिव्यांशी को पहले ही राज्य की ‘दस्तक अभियान’ योजना में कुपोषित के रूप में पहचाना गया था। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने उसके परिवार को पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में इलाज के लिए राजी भी किया था।

दुखद बात यह है कि दिव्यांशी की माँ ने बताया कि उसके ससुराल वाले इलाज नहीं करवाने दे रहे थे, सिर्फ इसलिए क्योंकि बच्ची एक लड़की थी। उन्होंने कहा, “जब भी वह बीमार होती थी, वे कहते थे – मरने दो, लड़की ही तो है।”

इस घटना के दो दिन पहले ही, श्योपुर जिले में एक और बच्ची राधिका की मौत हुई थी। वह भी डेढ़ साल की थी और मौत के समय उसका वजन सिर्फ 2.5 किलो था। उसकी माँ ने बताया कि जन्म के समय वह ठीक थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर होता गया और उसके हाथ-पाँव बिलकुल सूख गए थे।

भिंड जिले से भी हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहाँ एक और बच्ची की मौत कुपोषण के कारण हुई, हालाँकि डॉक्टरों की राय इससे विपरीत थी।

इन लगातार हो रही मौतों से एक सच्चाई सामने आती है कि सरकार की योजनाओं के बावजूद मध्यप्रदेश अब भी देश के सबसे ज्यादा कुपोषण-प्रभावित राज्यों में बना हुआ है। यहाँ बेटियों के साथ हो रहा भेदभाव इस स्थिति को और भी गंभीर बना रहा है।

विभिन्न राज्यों में कुपोषण के मामले

कुपोषण का मतलब है कि शरीर को सही मात्रा में जरूरी पोषण नहीं मिल रहा है। बच्चों में यह समस्या और भी खतरनाक होती है क्योंकि यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास को रोक सकती है, उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकती है और गंभीर मामलों में मृत्यु भी हो सकती है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2024 में जारी सरकारी आँकड़े इस समस्या की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। इसके तहत उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 46.36% बच्चे बौनेपन से पीड़ित हैं, यानी वहाँ लगभग हर दूसरा बच्चा उम्र के अनुसार ठीक से नहीं बढ़ पा रहा है।

इसके बाद लक्षद्वीप में 46.31%, महाराष्ट्र में 44.59% और मध्य प्रदेश में 41.61% बच्चे बौनापन झेल रहे हैं। मध्य प्रदेश में 26.21% बच्चे ऐसे हैं, जिनका वजन सामान्य की अपेक्षा बहुत कम हैं। इसके बाद दादरा- नगर हवेली और दमन एवं दीव (26.41%) और लक्षद्वीप (23.25%) में भी हालात चिंताजनक हैं।

बात करें द्रुत कुपोषण (Wasting) की तो यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बच्चे का वजन अचानक कम होने लगता है। इसमें लक्षद्वीप सबसे आगे है। यहाँ 13.22% बच्चे इस समस्या से जूझ रहे हैं। बिहार (9.81%) और गुजरात (9.16%) भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। यह दिखाता है कि वहाँ के बच्चे या तो पर्याप्त भोजन नहीं कर पा रहे या बार-बार बीमार पड़ रहे हैं।

url – Another girl child died of malnutrition in Madhya Pradesh, discrimination against daughters also exposed

क्या होता है माथा खा जाने वाला अमीबा, जिसके कारण केरल में चली गई 9 साल की बच्ची की जान: कैसे इंसानी दिमाग में करता है प्रवेश, क्या हैं लक्षण-बचाव के उपाय

केरल के कोझीकोड में 9 साल की बच्ची की दिमागी संक्रमण से मौत हो गई। ये मौत Naegleria fowleri amoeba (नेग्लेरिया फोलेरी अमीबा) के नाक से घुसने और ब्रेन में संक्रमण फैलाने के कारण हुई है। जिले में अब तक 4 लोगों की मौत इस बीमारी से हो चुकी है।

क्या है ब्रेन इटिंग अमीबा

अमीबा एक कोशिकीय जीव होता है जिसके शरीर में प्रवेश करने पर संक्रमण पैदा होता है। ये ताजा पानी, हल्के गर्म पानी और गीली मिट्टी में पाया जाता है। झील, नदी, तालाब, स्वीमिंग पूल जैसे जलीय स्थानों पर ये रहते हैं। ब्रेन इटिंग अमीबा यानी नेग्लेरिया फोलेरी अमीबा नाक के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। इस दौरान नाक से होकर ये ब्रेन तक जाता है और उसे नष्ट करना शुरू कर देता है।

ये ज्यादातर गर्मी के दिनों में तेजी से बढ़ते हैं क्योंकि उस वक्त कोशिका-विभाजन तेजी से होता है। ये जब दिमाग तक पहुँचता है तो उसके टिश्यू को खाना शुरू कर देता है। इससे बाद तेजी से विभाजित होने लगता है। तेज गति से नए अमीबा के बनने और ब्रेन टिश्यू के नष्ट होने के कारण दिमाग में सूजन आ जाता है। इससे रेयर और खतरनाक ब्रेन संक्रमण पैदा होता है।

दो तरह का होता है अमीबा

अमीबिक एन्सेफलाइटिस दो तरह का होता है। पहला प्राथमिक अमैबिक मेनिन्जोएन्सेफलाइटिस (primary amoebic meningoencephalitis) या PAM। दूसरा ग्रैनुलोमैटस अमाइबिक एन्सेफलाइटिस (granulomatous amoebic encephalitis) यानी GAE। विशेषज्ञों के अनुसार, PAM को आमतौर पर Naegleria fowleri भी कहते हैं, जिसके कारण दिमाग में सूजन आ जाती है। ये काफी तेजी से फैलता है। दूसरी ओर GAE धीमी गति से फैलता है।

कैसे आप अमीबा से संक्रमित होते हैं

डॉक्टरों के मुताबिक, आम तौर पर दोनों तरह के अमीबा की शरीर में एंट्री नाक के द्वारा ही होती है। ज्यादातर तैरने के दौरान स्वीमिंग पूल, नदियों, तालाबों या दूसरे जलस्रोतों का ऐसा पानी, जिसमें अमीबा मौजूद हों, वह नाक के अंदर चला जाए और ब्रेन तक पहुँच जाए। आम तौर पर गर्मियों में यह तेजी से बढ़ता है। अमीबा मस्तिष्क के टिश्यू को खा जाता है और पचा लेता है। इससे संक्रमण फैलता है।

ब्रेन इटिंग अमीबा के लक्षण

ये बीमारी बहुत तेजी से फैलती है। जब नाक से होकर अमीबा शरीर में प्रवेश करता है तो इसके 12 दिनों के अंदर लक्षण दिखने लगते हैं।

  • तेज बुखार
  • तेज सिर दर्द
  • साँस लेने में दिक्कत
  • कपकपाना
  • गले को घुमाने में तकलीफ होना
  • लाइट से दूर भागना
  • मानसिक दिक्कत आना

बीमारी से बचने के उपाय लक्षण

  1. तैरते वक्त हमेशा नोज क्लिप का इस्तेमाल करना चाहिए।
  2. स्विमिंग पूल की सफाई बेहद जरूरी है।
  3. तैरते वक्त नाक में पानी जाने से बचाना जरूरी है।
  4. स्वीमिंग पूल की सफाई में क्लोरीन का इस्तेमाल करना चाहिए।
  5. पीने के पानी को फिल्टर करने ही इस्तेमाल करना चाहिए।
  6. अगर तेज बुखार के साथ दूसरे लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से जरूर मिलें।

पहली बार ब्रेन इटिंग अमीबा साल 1965 में आस्ट्रेलिया में पाया गया था। यह 46 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी एक्टिव रहता है। अमीबा खुद से आकार बदलने में सक्षम है। यह पृथ्वी पर पाए जाने वाले प्राचीन जीवों में से एक है।

अमीबा में एक कोशिका होता है इसलिए मेल-फीमेल जैसा कुछ नहीं होता। कोशिका विभाजन से इसकी संख्या बढ़ती है। ये टूटकर चार हो जाते हैं और इस तरह इनकी आबादी बढ़ती है। इसका आकार तय नहीं होता। बीते 50 साल में अब तक दुनिया भर में 382 मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से अकेले अमेरिका में 154 मामले सामने आ चुके हैं। पहली बार ब्रेन इटिंग अमीबा साल 1965 में आस्ट्रेलिया में पाया गया था। यह 46 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी एक्टिव रहता है।

उत्तराखंड में खत्म होगी मदरसा व्यवस्था, CM धामी की कैबिनेट ने लिया अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाने का फैसला : सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों भी मिलेगी सुविधा

देवभूमि उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी राज्य से मदरसा शिक्षा व्यवस्था हटाने की तैयारी कर रहें हैं। इसके लिए कैबिनेट ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना करने का फैसला लिया है।

जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड में 452 पंजीकृत मदरसे है इसके अलावा 500 से अधिक मदरसे गैर कानूनी रूप से चल रहे थे जिनमें से 237 को धामी सरकार ने बंद करा दिया है। गौरतलब है कि पिछले दिनों उत्तराखंड के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने मदरसों के छात्रों को मिलने वाली केंद्रीय छात्रवृति में भी भारी अनियमितताएँ सामने लाईं थी। इसके आलावा मिड डे मील को लेकर भी गड़बड़ियाँ पाई थी।

अब धामी सरकार ने मदरसा व्यवस्था को अपने अधीन रखने के लिए कैबिनेट से प्रस्ताव पारित कराया है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में राज्य में मदरसा शिक्षा व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

फिलहाल धामी सरकार द्वारा उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक पर गंभीर मंथन किया जा रहा है। इस विधेयक का उद्देश्य उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USAME) की स्थापना करना है।

यह प्राधिकरण अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा स्थापित और प्रशासित शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता देने, शैक्षिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने और उनसे संबंधित सभी मामलों का प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार होगा।

राज्य सरकार के मुताबिक, अब तक राज्य में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान का दर्जा केवल मुस्लिम समुदाय को दिया जाता था, लेकिन प्रस्तावित अधिनियम के लागू होने के बाद सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों को भी यह सुविधा मिलेगी। सरकार का दावा है कि इस कदम के साथ उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन जाएगा जिसने सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को मान्यता देने के लिए एकाकीकृत और पारदर्शी प्रक्रिया तैयार की है।

क्या हैं मुख्य प्रावधान:

रिपोर्ट के अनुसार, विधेयक के तहत USAME का गठन किया जाएगा। इसमें अध्यक्ष के अलावा कुल 11 सदस्य होंगे। इन्हें राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाएगा। अध्यक्ष अल्पसंख्यक समुदाय का एक शिक्षाविद् होगा। उसे कम से कम 15 साल का शिक्षण अनुभव होना जरुरी है।

अधिनियम के तहत  पूर्व में उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों को शैक्षणिक सत्र 2026-27 से मजहबी शिक्षा प्रदान करने के लिए प्राधिकरण से पुनः मान्यता प्राप्त करना आवश्यक होगा। वहीं 1 जुलाई, 2026 से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड अशासकीय अरबी एवं फारसी मदरसा मान्यता विनियमावली, 2019 को निरस्त माना जाएगा।

इसके आलावा अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए, संस्थानों को कुछ शर्तें पूरी करना भी अनिवार्य होगा। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि संस्थान किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित और संचालित हो, परिषद से संबद्ध हो, और इसका प्रबंधन एक पंजीकृत निकाय (सोसायटी, न्यास, या कंपनी) द्वारा किया जा रहा हो।

वहीं अतिरिक्त, गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों का नामांकन 15% से अधिक नहीं होना चाहिए। प्राधिकरण अल्पसंख्यक समुदाय के धर्मों और भाषाओं से संबंधित विषयों के लिए पाठ्यक्रम विकसित करेगा और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को अतिरिक्त विषयों से संबंधित परीक्षाएँ आयोजित करने, छात्रों का मूल्यांकन करने और प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए मार्गदर्शन देगा।

इस विधेयक को राज्य के भीतर अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पहली बार है कि उत्तराखंड में इस तरह की व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक समुदायों के संविधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए सभी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को मान्यता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।

द्रौपदी मुर्मू, जगदीप धनखड़ और अब CP राधाकृष्णन…हर बात में तमिल राग अलापने वाले स्टालिन कर पाएँगे विरोध? BJP के मास्टरस्ट्रोक से उपराष्ट्रपति चुनाव में भी बैकफुट पर INDI गठबंधन

NDA के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन के नाम पर BJP ने आम सहमति बनाने की शुरुआत कर दी है। BJP की कोशिश है कि उपराष्ट्रपति के चुनाव की नौबत ना आए और सर्वसम्मति से ही राधाकृष्णन को अगला उपराष्ट्रपति चुन लिया जाए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसके लिए कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से बातचीत की है।

BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि BJP उपराष्ट्रपति पद के लिए निर्विरोध चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विपक्ष से बात करेगी। BJP सभी विपक्षी दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश में पूरी तरह से जुटी हुई है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने इस पर अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

चुनाव आयोग द्वारा जारी शेड्यूल के मुताबिक, 21 अगस्त 2025 उपराष्ट्रपति के उम्मीदवारों द्वारा नामांकन दाखिल किए जाने की आखिरी तारीख है। ऐसे में अगर आम सहमति नहीं बनती है तो विपक्षी गठबंधन INDI को अगले 1-2 दिन में ही अपने उम्मदीवार के नाम का ऐलान करना होगा। 9 सितंबर को उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराया जाना है।

बीजेपी ने अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर विपक्ष का सिर दर्द बढ़ा दिया है। मूल रूप से तमिलनाडु से आने वाले और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन का नाम बीजेपी द्वारा मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और बीजेपी लगातार दक्षिण भारत में विस्तार की कोशिश में लगी है। ऐसे में राधाकृष्णन का नाम बीजेपी की सोची समझी चाल के तौर पर देखा जा रहा है। इसकी एक नहीं बल्कि कई वजहें हैं।

स्टालिन की बढ़ेगी दुविधा

राधाकृष्णन की उम्मीदवारी के बाद सबसे अधिक दुविधा में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और DMK के प्रमुख एमके स्टालिन हैं। स्टालिन अब तक केंद्र के फैसलों का तमिल अस्मिता के नाम पर विरोध करते रहे हैं। अब अगर INDI गठबंधन अपने उम्मीदवार का ऐलान करता है और वो तमिलनाडु से नहीं होता है तो तमिल अस्मिता का प्रश्न फिर स्टालिन को ही घेरेगा।

अगर स्टालिन इस निर्णय पर NDA के साथ खड़े हो जाते हैं तो यह INDI गठबंधन में टूट का स्पष्ट संकेत होगा। स्टालिन ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन उनकी पार्टी ने अपना नरम रुख दिखाना शुरू कर दिया है।

DMK के प्रवक्ता टीकेएस इलानगोवन ने राधाकृष्णन की उम्मीदवारी को अच्छा कदम बताया है। उन्होंने एक चैनल से बातचीत में कहा, “यह एक स्वागत योग्य कदम है। राधाकृष्णन तमिल हैं और लंबे समय के बाद कोई तमिल व्यक्ति भारत का उपराष्ट्रपति बन सकता है।” हालाँकि, उन्होंने राधाकृष्णन के समर्थन की बात नहीं कही है लेकिन दबी जबान ही सही DMK का असमंजस साफ नजर आने लगा है।

राधाकृष्णन ने तमिलनाडु में लंबे वक्त तक राजनीति की है। वे दो बार के सांसद रहे हैं और तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष भी रहे हैं। ऐसे में उनके स्टालिन परिवार से संबंध भी बहुत पुराने हैं। करीब एक हफ्ते पहले (11 अगस्त 2025) ही स्टालिन से मिलने के लिए राधाकृष्णन चेन्नई पहुँचे थे।

यह मुलाकात स्टालिन का उद्देश्य स्टालिन के स्वास्थ्य का हाल-चाल लेना था लेकिन इस दौरान दोनों के बीच गर्मजोशी साफ दिखाई दी थी। अब राधाकृष्णन का विरोध करना स्टालिन के सामने एक बड़ी चुनौती है। अगर वो विरोध करते हैं तो तमिल अस्मिता का प्रश्न उठेगा और अगर समर्थन में आते हैं तो INDI गठबंधन की टूट साफ दिखाई देगी।

चेन्नई में स्टालिन से मिले थे राधाकृष्णन

शिवसेना (UBT) भी देगी INDI को दगा?

राधाकृष्णन महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं। वहाँ के सभी राजनीतिक दलों से उनका मेलजोल बढ़िया है। बीजेपी के खिलाफ मुखर रहने वाले शिवसेना (UBT) के नेता संजय राउत ने भी राधाकृष्णन की तारीफ की है। उद्धव ठाकरे की पार्टी द्वारा राधाकृष्णन की तारीफ किए जाने से INDI गठबंधन की टेंशन बढ़ गई है।

राउत ने कहा है, “मैं मानता हूँ कि राधाकृष्णन का व्यक्तित्व बहुत अच्छा है। वे गैर-विवादास्पद हैं और उनके पास राजनीति और संगठन का लंबा अनुभव है। मैं उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ।” राउत की बातों से लग रहा है कि INDI गठबंधन के लिए मामला इतना आसान भी नहीं होने वाला है।

पहले भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में विपक्षी गठबंधन में आई थी दरार

यह पहली बार नहीं है कि विपक्षी गठबंधन की एकता में दरार आने की अटकलें लग रही हैं। इससे पहले भी ऐसे हालात बन चुके हैं, जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में विपक्षी एकता छिन्न भिन्न हो गई हो। जिन जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के चलते उपराष्ट्रपति की कुर्सी खाली हुई है उनके चुनाव में भी विपक्षी एकता में दरार साफ दिखी थी। जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति बनने से पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी उनसे तल्ख रिश्तों के बाद भी धनखड़ का विरोध नहीं कर पाई थी।

2022 में जब राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ था तो भी विपक्षी एकता टूट गई थी। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विपक्षी खेमे में रहते हुए ही द्रौपदी मुर्मू के समर्थन का ऐलान किया था। अब फिर वैसी ही स्थिति विपक्ष के लिए बनती दिख रही हैं। इस बार मुश्किलें DMK के लिए बढ़ी हुई हैं। बीजेपी ने अपने मास्टर स्ट्रोक से एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की है जिसका असर आने वाले दिनों में साफ नजर आ सकता है।

रामनाथ कोविंद को 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में NDA का उम्मीदवार बनाया गया था। कोविंद उससे पहले बिहार के राज्यपाल रहे थे। तब नीतीश कुमार की पार्टी JDU ने विपक्ष में रहते हुए भी कोविंद के नाम का समर्थन किया था।

पत्रकार ने घुसपैठ-इस्लामी कट्टरपंथ को बताया असम के लिए खतरा, मुस्लिम नेता ने कर दिया केस: हाई कोर्ट ने रद्द की FIR, कहा- यह सांप्रदायिक नहीं, यही पत्रकारिता का मूल धर्म

घुसपैठ के जरिए भारत की डेमोग्राफी चेंज करने की कोशिश की बात सबके सामने है। कट्टरपंथी चाहते हैं कि इस पर भी लोगों का मुँह सिला रहे। असम के पत्रकार ने घुसपैठ पर रिपोर्ट लिख दी तो एक मुस्लिम संगठन के नेता ने पत्रकार के खिलाफ FIR कर दी। अब गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का आदेश दिया है।

क्या था मामला?

8 नवंबर 2016 को पत्रकार कोंगकोन बोर्थाकुर ने ‘दैनिक जन्मभूमि’ अखबार में अवैध घुसपैठियों को लेकर एक लेख लिखा था। इस लेख में पड़ोसी देशों से आए अवैध प्रवासियों से बने डेमोग्राफी बदलने के खतरे, मजहबी कट्टरवाद और कट्टरवाद की आड़ में होने वाली ‘आतंकी गतिविधयों’ का जिक्र किया गया था।

इस लेख के प्रकाशित होने के बाद शिवसागर के ऑल असम मुस्लिम स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) के अध्यक्ष फरीद इस्लाम हजारिका ने पत्रकार के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। इस FIR में दावा किया गया कि इस रिपोर्ट से सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ गया है। साथ ही, फरीद इस्लाम ने दावा किया कि रिपोर्ट से पत्रकार विभिन्न समुदायों के बीच शांति भंग करे की कोशिश कर रहे हैं।

इस FIR के खिलाफ पत्रकार ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी और दावा किया था कि उनका लेख जमीनी स्तर के शोघ पर आधारित था।

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने क्या कहा?

गुवाहाटी हाई कोर्ट की जस्टिस प्रांजल दास की बेंच ने पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज करने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि पत्रकारिता का मूल धर्म ही समाज से जुड़े ज्वलंत मुद्दों को उठाना है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है, “अवैध प्रवासियों, धार्मिक कट्टरवाद, आतंकी गतिविधियों और मूल निवासियों के लिए डेमोग्राफी के खतरों के बारे में चिंता व्यक्त करना समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करने या हिंसा भड़काने का प्रयास नहीं माना जा सकता है।”

हाई कोर्ट ने पत्रकार द्वारा दी गईं दलीलों को सही माना है और इस मामले में की जा रही कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश का अंश

हाई कोर्ट ने कहा, “अखबार की जिस रिपोर्ट के आधार पर FIR दर्ज की गई थी, उसकी जाँच करने पर पता चला कि आरोपी पत्रकार ने किसी भी जातीय या धार्मिक समूह पर आक्षेप नहीं लगाया है।”

हाई कोर्ट ने पत्रकार द्वारा दी गईं दलीलों को सही माना है और इस मामले में की जा रही कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया है।

‘विकसित भारत 2047’ का विजन लेकर न्यूयॉर्क में निकली ‘इंडिया परेड डे’, रश्मिका मंदाना-विजय देवरकोंडा को ‘ग्रैंड मार्शल’ सम्मान

भारत के 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर न्यूयॉर्क में ‘इंडिया डे परेड’ का आयोजन किया गया। यह भारत के बाहर किसी देश में होने वाला सबसे बड़ा परेड समारोह था। समारोह में अभिनेत्री रश्मिका मंदाना और अभिनेता विजय देवरकोंडा को 2025 के ‘ग्रैंड मार्शल’ के रूप में सम्मानित किया गया।

भारत के वाणिज्य दूतावास (Consulate General of India) द्वारा इस वर्ष की झाँकी ‘विकसित भारत 2047’ थीम पर आधारित थी। इसमें यह दिखाया गया कि भारत कैसे अपने 100वें स्वतंत्रता दिवस तक एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस समारोह में बुनियादी ढाँचे, प्रौद्योगिकी और डिजिटल परिवर्तन में भारत की प्रगति पर प्रकाश डाला गया। समारोह में बड़ी संख्या में लोग केसरिया, हरे और सफेद रंग के परिधान में पहने नजर आए।

रिपोर्ट के अनुसार, परेड में शामिल हुए राज्यसभा सांसद सतनाम सिंह संधू ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीयों का आना गर्व की बात है। संधू ने कहा, “यह बेहद खुशी की बात है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय न्यूयॉर्क शहर में एकत्रित हुए हैं। भारत की आजादी का जश्न मनाया जा रहा है। न्यूयॉर्क के मेयर भी यहाँ मौजूद हैं।”

परेड का आयोजन फेडरेशन ऑफ इंडियन एसोसिएशन (FIA) ने किया था। इसके अध्यक्ष अंकुर वैद्य ने कहा कि यह आयोजन गर्व और जिम्मेदारी दोनों को दर्शाता है। उन्होंने कहा, “अपने साथी समुदाय के सदस्यों के साथ यहाँ उपस्थित होना गर्व का क्षण है। इस समारोह में बड़ी संख्या में प्रवासी समुदाय शामिल हुआ है। भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाला है, इसलिए प्रत्येक प्रवासी सदस्य की जिम्मेदारी है कि वह दोनों देशों के बीच एक सेतु का काम करे।”

बता दें कि इसके अलावा श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर न्यूयॉर्क के इस्कॉन द्वारा एक रथ यात्रा का भी आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।