Home Blog Page 241

अलास्का से लौटकर रूस का ‘तोता’ बने ट्रंप, कहा- यूक्रेन को न क्रीमिया मिलेगा, न नाटो में जगह: नोबेल पुरस्कार के उतावलेपन में बैठक से पहले जेलेंस्की को हड़काया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ मुलाकात से पहले यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर उन्हें ही हड़का दिया है। ट्रंप ने कहा है कि जेलेंस्की, रूस के साथ इस युद्ध को तुरंत रोक सकते हैं। हाल ही में ट्रंप ने अलास्का में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी बैठक की थी।

ट्रंप-पुतिन की इस बैठक का कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकला लेकिन ट्रंप ने बैठक के बाद यह लगभग साफ कर दिया था कि अब शांति स्थापित करने का जिम्मा जेलेंस्की का है। अब ट्रंप ने अपनी बात को और मुखरता के साथ दोहराया है। पुतिन के साथ बैठक को ट्रंप ने सार्थक बताया था।

ट्रंप ने क्या कहा?

ट्रंप ने जेंलेंस्की को हड़काते हुए अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट किया है। ट्रंप ने लिखा है, “यूक्रेन के राष्ट्रपति जेंलेंस्की चाहें तो रूस के साथ युद्ध तुरंत खत्म कर सकते हैं, या फिर वह लड़ाई जारी रख सकते हैं। याद कीजिए कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी।”

हालाँकि, ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ किया कि ना तो यूक्रेन को क्रीमिया वापस नहीं मिलेगा, जिसे 12 साल पहले बराक ओबामा के दौर में बिना गोली चले रूस ने हथिया लिया था और ना ही यूक्रेन को NATO में शामिल होने दिया जाएगा। ट्रंप ने लिखा कि कुछ चीजें कभी नहीं बदलती हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने लगातार यूक्रेन के NATO में शामिल होने का विरोध किया है और मौजूदा रूस-यूक्रेन संघर्ष की बड़ी वजह भी यूक्रेन का NATO की सदस्यता लेने की पहल करना माना जाता है। जनवरी में ट्रंप के दोबारा अमेेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले NATO देशों ने यूक्रेन को सदस्यता दिए जाने पर सहमित व्यक्त कर दी थी।

वहीं, ट्रंप के साथ मुलाकात के लिए जेलेंस्की अमेरिका पहुँच गए हैं। उनका कहना है कि यूक्रेन अपनी अखंडता और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। जेलेंस्की का कहना है कि वह युद्ध रोकने के लिए अपनी शर्तों पर ही तैयार होंगे।

इसके अलावा जेलेंस्की ने शांति समझौते के लिए ट्रंप की सुरक्षा की गारंटी देने की पेशकश की सराहना की है। वहीं, एक अमेरिकी प्रतिनिधि ने दावा किया कि पुतिन यूक्रेन के लिए संभावित नाटो जैसे सुरक्षा समझौते पर सहमत हो गए हैं।

जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मिलेंगे ट्रंप

रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मुलाकात करेंगे। ट्रंप ने इस मुलाकात को लेकर कहा, “व्हाइट हाउस में एक बड़ा दिन होगा। इतने सारे यूरोपीय नेता एक साथ कभी नहीं आए। उनकी मेजबानी करना मेरे लिए सम्मान की बात है।”

NATO के महासचिव मार्क रूटे, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर भी ट्रंप के साथ मुलाकात करेंगे। दावा किया गया है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब और यूरोपीय यूनियन की अध्यक्षा उर्सुला वॉन डेर लेयन भी बातचीत में शामिल होंगे।

इससे पहले जब व्हाइट हाउस में मुलाकात के दौरान ट्रंप, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जेलेंस्की के बीच खूब बहसबाजी हुई थी।

हालाँकि, अब इस चर्चा को लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि इससे रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर कोई ठोस नतीजा सामने आ सकता है। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उतावले ट्रंप अब इस संघर्ष को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाते दिख रहे हैं।

सैमसंग अब नोएडा में करेगा लैपटॉप मैनुफैक्चरिंग का काम, हर साल 60-70 हजार प्रोडक्ट होंगे तैयार: ‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगी धार, इंजीनियर्स को रोजगार

दक्षिण कोरिया की इलेक्ट्रॉनिक्स दिग्गज कंपनी Samsung ने भारत में अपने मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स का विस्तार करते हुए नोएडा स्थित प्लांट में लैपटॉप बनाना शुरू कर दिया है। यह कदम भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत देश को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।

PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, “सैमसंग ने अपने मैन्युफैक्चरिंग पोर्टफोलियो का विस्तार किया है और नोएडा फैक्ट्री में लैपटॉप बनाने जा रहा है। कंपनी भविष्य में और डिवाइसेज भी भारत में बनाने की योजना बना रही है।”

नोएडा में यह फैक्ट्री 1996 में स्थापित हुई थी और तभी से भारत में सैमसंग की बड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के रूप में काम कर रही है। यहाँ पहले से ही फीचर फोन, स्मार्टफोन, वियरेबल्स और टैबलेट्स बनाए जाते हैं। अब लैपटॉप निर्माण की शुरुआत से कंपनी का फोकस भारत में अपने प्रोडक्ट्स की रेंज बढ़ाने पर है।

यह प्लांट हर साल 120 मिलियन स्मार्टफोन बनाने की क्षमता रखता है और दुनियाभर में सैमसंग का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माण केंद्र है (पहला दक्षिण कोरिया में है)। सैमसंग, भारत से स्मार्टफोन एक्सपोर्ट करने वाली दूसरी सबसे बड़ी कंपनी भी है, वहीं पहले नंबर पर Apple है।

जनवरी 2024 में सैमसंग के मोबाइल एक्सपीरियंस (MX) बिजनेस के प्रमुख टीएम रोह ने कहा था कि नोएडा प्लांट में लैपटॉप बनाने की तैयारी चल रही है। अब यह निर्माण शुरू होने जा रहा है और इस लाइन में हर साल करीब 60,000 से 70,000 लैपटॉप बनाए जा सकेंगे।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सैमसंग की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा, “सैमसंग भारत में उन्नत तकनीकी डिवाइसेज का निर्माण बढ़ा रहा है। यह भारत की प्रतिभा और नवाचार से प्रेरित है।”

हाल ही में उन्होंने Samsung Southwest Asia के CEO जेबी पार्क और कॉर्पोरेट वाइस प्रेसिडेंट एसपी चुन से भी मुलाकात की थी और कंपनी की भारत में भूमिका को सराहा।

भारत में सैमसंग का रिसर्च यूनिट 7,000 से ज्यादा इंजीनियरों को रोजगार देता है, जिससे यह साफ होता है कि कंपनी भारत के टेक इकोसिस्टम में लंबे समय तक निवेश करना चाहती है।

भारत सरकार ने अगस्त 2023 में लैपटॉप इंपोर्ट पर रोक लगाई थी, जिसे बाद में रजिस्ट्रेशन सिस्टम में बदला गया, ताकि देश में ही लैपटॉप निर्माण को बढ़ावा दिया जा सके।

हालाँकि Acer, HP, Lenovo और Asus जैसी कंपनियाँ सरकार की Production Linked Incentive (PLI) योजना का फायदा उठा रही हैं, लेकिन Samsung ने इस योजना में भाग नहीं लिया है। इसके बजाय, कंपनी अपने दम पर भारत में निर्माण क्षमता बढ़ा रही है।

भारत में लैपटॉप बनाकर, सैमसंग अब चीन और वियतनाम से होने वाले आयात पर निर्भरता घटाएगा, जिससे आयात शुल्क में बचत के माध्यम से उपभोक्ताओं के लिए लागत कम होने की संभावना है। 

वर्तमान में सैमसंग भारत के स्मार्टफोन मार्केट में दूसरा सबसे बड़ा ब्रांड है (मूल्य और वॉल्यूम दोनों में)। साथ ही यह टैबलेट पीसी मार्केट में 15% शेयर रखता है। हालाँकि अब तक लैपटॉप मार्केट में इसकी खास मौजूदगी नहीं रही है। यह कदम उस खाली जगह को भरने की दिशा में है।

सैमसंग अब MSI जैसी कंपनियों की कतार में शामिल हो गया है, जिसने हाल ही में चेन्नई में लैपटॉप बनाना शुरू किया है।

बिहार से इंजीनियर बनने शारदा यूनिवर्सिटी आया 24 साल का शिवम, कर्ज लेकर पैसा भेज रहे थे पिता; फाँसी लगाने से पहले लिखा- मैं इस शिक्षा के लायक नहीं: इस सुसाइड का दोषी कौन?

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा की शारदा यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग के एक छात्र ने अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली है। बिहार के पूर्णिया के रहने वाले 24 वर्षीय शिवम डे नामक छात्र ने बीते 15 अगस्त की रात अपने कमरे में चादर का फँदा बनाकर फाँसी लगा ली। साथी उसे अस्पताल भी लेकर गए लेकिन तब तक उसकी साँसें रुक गई थीं।

शिवम ने 2022 में B.Tech में एडमिशन लिया था लेकिन वो पिछले लंबे वक्त से कॉलेज नहीं जा रहा था। छात्र के परिजन ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने यह जानकारी देना भी उचित नहीं समझा कि उनका बच्चा इतने समय से पढ़ने नहीं आ रहा था। छात्र के कमरे से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है जिसमें उसने तनाव और दबाव को ना झेल पाने की बात कही है।

छात्र ने सुसाइड नोट में क्या लिखा?

शिवम डे ने सुसाइड नोट में खुद को अपनी मृत्यु का जिम्मेदार बताया है और माता-पिता से माफी माँगी है। छात्र ने लिखा, “अगर आप यह पढ़ रहे हैं तो मैं मर चुका हूँ। मेरी मौत का यह निर्णय मेरा है, इसमें कोई और शामिल नहीं है। मैं पिछले एक वर्ष से इसकी तैयारी कर रहा था।”

छात्र ने आगे लिखा, “यह दुनिया मेरे लिए नहीं है या शायद में इसके लिए नहीं हूँ। मैं किसी काम का नहीं हूँ।” शिवम ने सुसाइड नोट में पुलिस से माँग की है कि उनकी मौत के लिए किसी और को जिम्मेदार न ठहराया जाए।

छात्र ने अपने सुसाइड नोट में शारदा यूनिवर्सिटी से माँग कि है कि उनकी बकाया फीस को उनके परिजन को लौटा दिया जाए क्योंकि वह सेकेंड ईयर के बाद से कॉलेज नहीं गया था। छात्र ने लिखा, “मैं अच्छा छात्र नहीं हूँ। शायद मैं इस शिक्षा प्रणाली के लिए नहीं बना था। मैं अपने अंग दान करना चाहता हूँ। मैं उन सभी से माफी माँगता हूँ जो मुझे प्यार करते हैं।”

छात्र ने अपनी पिता और माँ को ‘सॉरी’ भी लिखा है। शिवम ने लिखा, “मैं बुढ़ापे में आपका सहारा नहीं बन सका।” छात्र ने आगे लिखा, “मैं इस तनाव और दबाव को और नहीं झेल पा रहा हूँ। लोगों को डरने की जरूरत नहीं है, मैं अपनी मौत के बाद किसी का पीछा नहीं करूँगा।”

छात्र का सुसाइड नोट

लोन लेकर फीस भर रहे थे पिता

इस घटना के बाद से छात्र के पिता कार्तिक चंद डे सदमे में हैं। कार्तिक चंद डे ने बताया है कि वह लोन लेकर शिवम की फीस जमा कर रहे थे लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उसके कॉलेज ना पहुँचने की कोई जानकारी नहीं दी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कभी नहीं बताया था कि शिवम ने पढ़ाई छोड़ दी है। कार्तिक का कहना है कि इस बीच यूनिवर्सिटी प्रशासन से फीस व अन्य चीजों को लेकर मेसेज और मेल आते रहते थे।

उनका कहना है कि जब शिवम 2023 के बाद कॉलेज नहीं गया था तो फीस क्यों ली गई थी। साथ ही, उन्होंने बताया है कि शिवम के साथ फर्स्ट ईयर में रैगिंग भी हुई थी, जिसका जानकारी छात्र ने ही अपने परिजन को दी थी। कार्तिक ने कहा कि बेटे को इंजीनियर बनाने के लिए भेजा था और अगर उन्हें उसकी समस्याओं को पता होता तो वह कभी उसे दुनिया से जाने नहीं देते।

छात्र के परिजन ने लापरवाही को लेकर यूनिवर्सिटी प्रशासन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी है और पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है। यह एक महीने के भीतर शारदा यूनिवर्सिटी में आत्महत्या का दूसरा मामला है। बीते 18 जुलाई को ज्योति जांगड़ा नामक एक छात्रा ने भी खुदकुशी कर ली थी। जिसके बाद दो प्रोफेसरों को गिरफ्तार किया गया था।

यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?

शारदा यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर पीआर डॉ. अजित कुमार ने बताया है कि मेंटर ने छात्र से संपर्क बनाया हुआ था। कुमार ने बताया कि मई 2024 में चौथे सेमेस्टर की परीक्षाओं के बाद छात्र का CGPA तृतीय वर्ष में प्रमोशन के लिए जरूरी 5.0 के मानदंड तक नहीं पहुंचा था। जिसके बाद अगस्त 2024 में उसे विशेष परीक्षा का अतिरिक्त अवसर प्रदान दिया गया था।

कुमार ने बताया कि 2024-25 के सत्र के लिए शिवम ने खुद की रजिस्टर नहीं कराया और ना ही किसी क्लास में शामिल हुआ। हालाँकि, मेंटर ने छात्र से संपर्क बनाए रखा था। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने छात्र की फीस को वापस उसके परिवार को लौटाने की बात कही है।

16 साल की उम्र में RSS से जुड़े, तमिलनाडु़ बीजेपी अध्यक्ष रहते हुए निकाली 19000 किलोमीटर लंबी ‘रथ यात्रा’: जानें- कौन हैं CP राधाकृष्णन, जिन्हें NDA ने बनाया उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने उपराष्ट्रपति पद के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल चंद्रपुरम पोन्नुसामी राधाकृष्णन (सी.पी. राधाकृष्णन) को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई एक बैठक के बाद किया बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उनके नाम का एलान किया है।

मूल रूप से तमिलनाडु से आने वाले राधाकृष्णन वर्तमान में महाराष्ट्र के 24वें राज्यपाल हैं। इससे पहले वे लगभग डेढ़ वर्ष तक झारखंड के राज्यपाल रहे। झारखंड के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने तेलंगाना के राज्यपाल और पुडुचेरी के उपराज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी संभाला था।

शिक्षा और राजनीतिक जीवन की शुरुआत

20 अक्टूबर 1957 को तमिलनाडु के तिरुप्पुर में जन्मे राधाकृष्णन ने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की है। सिर्फ 16 साल की उम्र वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए थे। 1974 में भारतीय जनसंघ के राज्य कार्यकारी समिति के सदस्य बने थे।

1996 में उन्हें BJP का तमिलनाडु सचिव नियुक्त किया गया। 2004 से 2007 तक राधाकृष्णन ने BJP तमिलनाडु के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था। इसके अलावा वे 1998 में वे पहली बार कोयंबटूर से लोकसभा सांसद चुने गए और 1999 में फिर से लोकसभा पहुँचे थे।

राधाकृष्णन ने तमिलनाडु बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए 19,000 किलोमीटर लंबी ‘रथ यात्रा’ निकाली जो 93 दिनों तक चली थी। इस यात्रा का उद्देश्य नदियों को जोड़ना, आतंकवाद खत्म करना, समान नागरिक संहिता लागू करना, अस्पृश्यता मिटाना और मादक पदार्थों की समस्या से निपटना था। इसके अलावा राधाकृष्णन ने अलग-अलग मुद्दों पर दो पदयात्राएँ भी निकालीं थीं।

सांसद रहते हुए उन्होंने वस्त्र मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। साथ ही, वे शेयर बाजार घोटाले की जांच करने वाली संसदीय विशेष समिति के सदस्य भी थे। 2004 में वे संसदीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने गए थे।

18 फरवरी 2023 को उन्हें झारखंड का राज्यपाल बनाया गया। पद सँभालने के शुरुआती चार महीनों में ही उन्होंने झारखंड के सभी 24 जिलों का दौरा किया और नागरिकों व जिला अधिकारियों से सीधे संवाद किया।

9 सितंबर को उपराष्ट्रपति पद के लिए मतदान

उपराष्ट्रपति पद के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 21 अगस्त है। यदि विपक्ष भी अपने उम्मीदवार की घोषणा करता है तो चुनाव 9 सितंबर को आयोजित होगा। एनडीए को निर्वाचक मंडल में पूर्ण बहुमत प्राप्त है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सभी सदस्य शामिल हैं। ऐसे में मुकाबले की स्थिति में सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही है। गौरतलब है कि जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों के चलते इस्तीफा देने के बाद यह पद खाली हुआ है।

एमपी में मोहसिन ने राहुल बनकर की हैवानियत, हिंदू समाज ने इछावर कस्बे को बंद कर किया प्रदर्शन: आरोपित के खिलाफ बुलडोजर एक्शन की माँग, सीहोर में लव जिहाद को लेकर बवाल

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के इछावर में लव जिहाद की घटना ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया। 23 साल की एक हिंदू युवती ने मोहसिन नाम के शख्स पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने पुलिस को बताया कि मोहसिन ने खुद को राहुल शर्मा बताकर सोशल मीडिया पर उससे दोस्ती की।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, धीरे-धीरे उसने युवती का भरोसा जीता और शादी का झाँसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में उसकी असलियत सामने आई कि वह राहुल नहीं, बल्कि इछावर का रहने वाला मोहसिन है। उसने युवती पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला और शादी के लिए मजबूर किया।

युवती ने हिम्मत दिखाते हुए 14 जुलाई को सीहोर कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और मामला भोपाल के निशातपुरा थाने में ट्रांसफर कर दिया। निशातपुरा पुलिस ने मोहसिन को गिरफ्तार कर लिया और उससे पूछताछ शुरू कर दी। पुलिस अब उसके मोबाइल और सोशल मीडिया चैट की जाँच कर रही है ताकि पूरी सच्चाई सामने आए।

इस घटना ने इछावर में तनाव पैदा कर दिया। हिंदू संगठनों ने रविवार (17 अगस्त 2025) को पूरे नगर में बंद का ऐलान किया, जिसे लोगों का भारी समर्थन मिला। हजारों लोग आजाद चौक से तहसील कार्यालय तक पैदल मार्च करते हुए पहुँचे। वहाँ नारेबाजी, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ हुआ।

लोगों ने मोहसिन की संपत्ति पर बुलडोजर चलाने की माँग की और सख्त कार्रवाई की अपील की। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि ऐसी घटनाएँ समाज की बेटियों की सुरक्षा पर सवाल उठाती हैं।

इछावर एसडीएम जमील खान ने बताया कि मोहसिन की संपत्तियों की जाँच की जा रही है। अगर कोई निर्माण अवैध पाया गया तो उसे तोड़ा जाएगा। तनाव को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया ताकि कोई अप्रिय घटना न हो।

कोतवाली प्रभारी रविंद्र यादव ने कहा कि युवती के आरोप गंभीर हैं और जाँच में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। यह मामला मध्य प्रदेश में लव जिहाद के खिलाफ बने सख्त कानूनों के बावजूद सामने आया है।

7 दिनों में हलफनामा दें या माफी माँगें…चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी के दावों की खोल दी पोल: CEC ने बिहार SIR में गड़बड़ी से लेकर 0 मकान नंबर तक आरोपों की बताई सच्चाई

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर कड़ा पलटवार किया है। उनका कहना है कि राहुल गाँधी या तो अपना हलफनामा दाखिल करें या वो देश से माफी माँगें। ज्ञानेश कुमार ने राहुल गाँधी के निराधार आरोपों पर हलफनामा दाखिल करने के लिए उन्हें 7 दिन का समय दिया है।

ज्ञानेश कुमार ने राहुल गाँधी द्वारा बार-बार ‘वोट चोरी’ का जिक्र किए जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों से जनता को गुमराह करना ‘लोकतंत्र का अपमान’ है।

7 दिन में हलफनामा दीजिए या माफी माँगिए: राहुल से EC

7 अगस्त 2025 को राहुल गाँधी ने एक लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। हालाँकि, इसके तुंरत बाद ही चुनाव आयोग ने उनके आरोपों को लेकर शपथ-पत्र देने का कहा लेकिन राहुल गाँधी ने आज तक शपथ पत्र नहीं दिया है।

अब CEC ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे लेकर कहा, “या तो हलफनामा दीजिए या देश से माफी माँगिए। कोई तीसरा विकल्प नहीं है। अगर हमें 7 दिनों के भीतर हलफनामा नहीं मिलता है, तो इसका मतलब होगा कि ये सभी आरोप बेबुनियाद हैं और जो व्यक्ति कह रहा है कि हमारे मतदाता धोखेबाज हैं, उसे माफी माँगनी चाहिए।”

EC के कंधे पर बंदूक रखकर मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है: CEC

राहुल गाँधी ने एक वोटर द्वारा कई बार वोट डालने का दावा किया गया था। CEC ने चुनाव आयोग के कंधे पर बंदूक रखकर मतदाताओं को निशाना बनाए जाने की बात कही है। इस पर CEC ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा, “न तो चुनाव आयोग और न ही मतदाता ऐसे झूठे आरोपों से डरते हैं।”

ज्ञानेश कुमार ने कहा, “जब चुनाव आयोग के कंधों पर बंदूक रखकर इस देश के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है, तो हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि चुनाव आयोग निडर होकर चट्टान की तरह, बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी वर्गों और धर्मों के सभी मतदाताओं के साथ खड़ा है, चाहे वे गरीब हों, अमीर हों, बूढ़े हों, महिलाएँ हों या युवा।”

राहुल गाँधी की PPT प्रेजेंटेशन में गड़बड़ डेटा?

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में PPT प्रेजेंटेशन के जरिए डेटा दिया था और इस पर भी चुनाव आयोग ने सवाल उठाए हैं। CEC ने कहा, “PPT बनाई जाती है और ECI के डेटा का गलत तरीके से विश्लेषण किया जाता है।”

CEC ने कहा, “इसके माध्यम से यह कहा जाता है कि क्योंकि मतदाता सूची में ऐसा नाम है और चुनाव सही तरीके से नहीं हुए हैं। मतदाता सूची और चुनाव दो अलग-अलग मुद्दे हैं… दोनों के लिए कानून और नियम अलग-अलग हैं।”

उन्होंने कहा, “अगर कोई यह सोचता है कि वह PPT प्रेजेंटेशन का उपयोग आँकड़ों को गलत साबित करने और तथ्यों की गलत व्याख्या करने के लिए कर सकता है, तो यह कानून और संविधान दोनों के खिलाफ है।”

मकान नंबर 0 होने पर CEC ने दिया जवाब

राहुल गाँधी ने मतदाता सूची में मकान नंबर 0 होने पर भी सवाल उठाए थे। ज्ञानेश कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि मकान नंबर 0 होने का मतलब फर्जी मतदाता नहीं है। उन्होंने कहा कि कई पंचायत क्षेत्रों में लाखों घर ऐसे हैं जिनके पते में मकान नंबर नहीं है।

CEC ने कहा कि मतदातओं को छोड़ना संभव नहीं है और ऐसे में पतों पर काल्पनिक संख्या 0 दे दी जाती है। कुछ लोग पुलों के नीचे, लैंपपोस्ट के पास और शहरों में अनधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं और ECI कोशिश करता है कि कोई मतदाता ना छूटे।

ज्ञानेश कुमार के मुताबिक, मतदान के लिए पता अनिवार्य नहीं है। उनका कहना है कि राष्ट्रीयता, मतदान केंद्र से निकटता और 18 वर्ष की आयु वोटिंग के लिए अधिक मायने रखते हैं।

मतदाता सूची में दोहरे नाम पर ECI ने क्या कहा?

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में दोहरे नाम और दोहरे मतदान के आरोपों पर बड़ा बयान दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक मतदान केंद्रों पर दर्ज होना और एक व्यक्ति का दो जगह मतदान करना दोनों अलग-अलग बातें हैं।

कुमार ने कहा, “अगर किसी मतदाता का नाम दो जगहों पर भी दर्ज है, तो उसे केवल एक ही जगह वोट डालने का अधिकार है। अगर कोई व्यक्ति दो जगहों पर मतदान करता है, तो यह एक अपराध है।”

कुमार ने आगे कहा कि जब सबूत मांगे गए, तो कोई जवाब नहीं दिया गया था। CEC ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची तैयार करने और मतदान कराने की प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं और इनके लिए अलग-अलग कानून और पदाधिकारी जिम्मेदार हैं।

बिहार की SIR प्रक्रिया पर चुनाव आयोग का जवाब

बिहार में जारी चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर भी कॉन्ग्रेस और RJD समेत कई विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। CEC ने कहा कि राजनीतिक दलों ने मतदाता सूची में दोहराव, गलत तरीके से नाम जोड़ने और हटाने के बारे में लगातार सवाल उठाए थे इसलिए SIR प्रक्रिया जरूरी हो गई थी।

ज्ञानेश कुमार ने कहा, “यह बहुत चिंता की बात है कि कुछ राजनीतिक पार्टियाँ वोट चोरी के आरोप लगा रही हैं। जबकि सच यह है कि उन्हीं पार्टियों के बूथ-स्तर के एजेंटों ने खुद ही वोटर लिस्ट पर साइन किए थे। इसका मतलब या तो यह है कि जिलों में बैठे उनके नेताओं की बात सही तरीके से उनके राष्ट्रीय नेताओं तक नहीं पहुँच रही है, या फिर जानबूझकर मतदाताओं के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है।”

उन्होंने आगे कहा, “SIR की प्रक्रिया 10 लाख से अधिक बूथ-स्तर के एजेंट और 20 लाख से अधिक संभावित उम्मीदवारों के एजेंट मौजूद थे। इतनी पारदर्शिता और इतने लोगों की मौजूदगी में यह काम हुआ, तो फिर यह वोट चोरी कैसे हो सकती है?

CEC ने सवाल उठाया कि वोटर लिस्ट का सुधार चुनाव से पहले होना चाहिए या फिर चुनाव खत्म होने के बाद। उन्होंने कहा “जनप्रतिनिधित्व कानून साफ कहता है कि हर चुनाव से पहले मतदाता सूची को ठीक करना जरूरी है। यह चुनाव आयोग की कानूनी जिम्मेदारी है।”

ज्ञानेश कुमार ने यह भी कहा कि यह झूठ फैलाया जा रहा है कि एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया को जल्दबाजी में किया गया। उन्होंने कहा कि यह काम 24 जून से शुरू हुआ था और लगभग 20 जुलाई तक पूरे राज्य में यह प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी। उन्होंने कहा कि SIR का मकसद है कि मतदाता सूची ज्यादा से ज्यादा सही बनाया जा सके।

वहीं, बिहार में 22 लाख मृत मतदाता दिखाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ये 22 लाख लोग छले 6 महीनों में नहीं बल्कि पिछले कई साल में मरे हैं। हालाँकि, इसे रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया था।

मशीन रीडेबल फॉर्मेट में क्यों नहीं वोटर लिस्ट?

मतदाता सूची को मशीन रीडेबल फॉर्मेट में उपलब्ध कराए जाने की माँग पर भी चुनाव आयोग ने जवाब दिया है। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में ही आदेश दिया था कि मशीन रीडेबल सूची मतदाताओं की निजता का उल्लंघन करती है।

उन्होंने बताया कि इस तरह की सूची को आसानी से एडिट और सर्च किया जा सकता है। इससे मतदाताओं की निजी जानकारी सार्वजनिक होने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने हाल ही में कुछ राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं की जानकारी सार्वजनिक करने को भी इसे निजता का हनन बताया है।

शपथ-पत्र देने से क्यों बच रहे हैं राहुल गाँधी?

‘राहुल गाँधी के आरोपों की जाँच बिना उनके शपथ-पत्र के क्यों नहीं हो सकती’ सवाल पर CEC ने कहा कि चुनाव आयोग इतने गंभीर आरोपों पर बिना शपथ-पत्र के काम नहीं कर सकता है। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक इन आरोपों के समर्थन में कोई सबूत या ठोस प्रमाण सामने नहीं दिया गया है।

राहुल गाँधी से शपथ पत्र माँगने को लेकर ज्ञानेश कुमार ने कहा, “यदि आप निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक नहीं हैं और शिकायत को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो आपके पास कानून में केवल एक ही विकल्प है। वह है निर्वाचन नियमों का पंजीकरण, नियम संख्या 20 उपखंड 3 उपखंड बी। यह कहता है कि यदि आप उस विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचक नहीं हैं, तो आप एक गवाह के रूप में अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को आपको शपथ देनी होगी। वह शपथ उस व्यक्ति के सामने एडमिनिस्टर करानी होगी जिसके खिलाफ आपने शिकायत की है।”

इससे पहले, कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने राहुल गाँधी को पत्र लिखकर उनके दावों के लिए शपथ पत्र और मतदाताओं के नाम माँगे ताकि जाँच शुरू हो सके। इसके जवाब में राहुल ने डॉयलागबाजी शुरू कर दी थी। राहुल गाँधी ने कहा था, “मैं राजनेता हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता। मेरे शब्द ही शपथ हैं।”

अगर राहुल गाँधी को लगता है कि उनके आरोप सही हैं तो क्यों वो चुनाव आयोग के सामने शपथ-पत्र देने से बच रहे हैं यह सवाल जितना मुश्किल लगता है उतना ही आसान भी है। शपथ पत्र पर दिए गए आरोपों में कुछ गड़बड़ी होती है तो उसका खामियाजा गंभीर हो सकता है। ऐसे में क्यों राहुल गाँधी सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं, यह समझना बेहद मुश्किल भी नहीं है।

वामपंथी मीडिया आउटलेट ‘द वायर’ ने बांग्लादेशी से लिखवाया भारत विभाजन पर लेख, बताया ‘मुस्लिमों का सामाजिक न्याय’: मोपला नरसंहार पर चढ़ाई ‘वर्ग संघर्ष’ की स्याही

वामपंथी और इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ‘द वायर’ नाम के मीडिया आउटलेट ने शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को बांग्लादेशी लेखक अहमदे हुसैन का एक लेख छापा, जिसमें पाकिस्तान आंदोलन को एक नया रंग देने की कोशिश की गई।

इस लेख के मुताबिक, पाकिस्तान की माँग कोई धार्मिक अलगाववाद नहीं थी, बल्कि ये कथित तौर पर किसानों और दबे-कुचले वर्गों का जमींदारों और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ ‘वर्ग संघर्ष’ था।

लेख ये भी दावा करता है कि बंगाल में इस्लाम ने समानता का रास्ता दिखाया, और इसलिए भारत का बँटवारा कम्युनल प्रोजेक्ट कम और सामाजिक न्याय की खोज ज्यादा थी।

द वायर में प्रकाशित लेख का स्क्रीनशॉट

पहली नजर में ये नजरिया इतिहास को समझने की एक समझदारी भरी कोशिश लग सकती है। लेकिन गौर से देखें तो ये एकदम गलत और छुपाने की कोशिश है। जो बात बौद्धिक व्याख्या के रूप में सामने आती है, वो असल में एक वैचारिक प्रोजेक्ट है: हिंदू पीड़ा को मिटाना और इस्लामिक कट्टरता को मार्क्सवाद और ‘सामाजिक न्याय’ की चमकदार भाषा में जायज ठहराना।

ऐसी कहानियों का खतरनाक नतीजा ये है कि ये उन तर्कों को फिर से जिंदा करती हैं, जिन्हें 1921 के मोपला दंगों, डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार जैसे खूनी कांडों को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

पाकिस्तान आंदोलन: धर्म था असली ताकत, वर्ग नहीं

‘द वायर’ का लेख दावा करता है कि पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान आंदोलन असल में किसानों का विद्रोह था, जहाँ इस्लाम सिर्फ एकता का प्रतीक था। ये नजरिया जानबूझकर पाकिस्तान की माँग के मजहबी चरित्र को कम करता है।

हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मोहम्मद अली जिन्ना की ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ यानी टू नेशन थ्योरी कोई वर्ग क्रांति का घोषणापत्र नहीं था; ये साफ-साफ कहता था कि हिंदू और मुसलमान एक राष्ट्र के तौर पर साथ नहीं रह सकते।

मुस्लिम लीग ने गरीबों को समाजवाद के लाल झंडे के नीचे नहीं, बल्कि इस्लाम के हरे झंडे के नीचे लामबंद किया। इसके भाषण, प्रस्ताव और अभियान मजहबी अपीलों से भरे थे, न कि आर्थिक बराबरी की बातों से।

अगर समस्या सचमुच जमींदारी शोषण थी, तो इसका हल जमीन सुधार या समाजवादी नीतियाँ हो सकती थीं, न कि एक इस्लामिक देश का गठन। ये तथ्य कि नतीजा पाकिस्तान था, जो मुसलमानों के लिए एक मजहबी देश था, इस मिथक को तोड़ देता है कि ये वर्ग संघर्ष था। ये शुद्ध रूप से कम्युनल लामबंदी थी।

बँटवारे का खून – डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली

इस नए नजरिए में सबसे बड़ी चूक है बँटवारे से पहले की भयानक कम्युनल हिंसा को जानबूझकर भूल जाना। 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे पर जिन्ना ने मुस्लिम ताकत दिखाने का आह्वान किया। कोलकाता में जो हुआ, वो कोई किसान विद्रोह नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नरसंहार था। तीन दिन तक शहर कसाईखाना बना रहा।

हिंसा की भयावहता इंसानी समझ से परे थी। एक अनुमान के मुताबिक 4,000 लोग मारे गए, हालाँकि कई स्रोत 10,000 के करीब आँकड़ा बताते हैं। तीन दिन में एक लाख से ज्यादा हिंदू बेघर हो गए। हिंसा में क्रूरता की कोई हद नहीं थी। हिंदू महिलाओं के साथ उनके परिवारों के सामने सामूहिक बलात्कार हुआ, फिर उनकी हत्या की गई। बच्चों को काट डाला गया, लाशों को क्षत-विक्षत कर दिया गया।

चश्मदीद फिलिप टैल्बॉट ने लिखा, “फूली हुई लाशें, कटे-फटे शरीर, गड्ढों और नालों में फँसी लाशें, खाली मैदानों में ढेर लगाई गई लाशें।” यह जमींदारी सुधार की माँग नहीं थी, बल्कि हिंदुओं को डराने के लिए किया गया इस्लामिक आतंक था।

ये जमीन सुधार की पुकार नहीं थी; ये इस्लामिक आतंक का खुला प्रदर्शन था, जिसका मकसद हिंदुओं को डराकर झुका देना था। निशाने सिर्फ कम्युनल नहीं थे, बल्कि सभ्यतागत थे। हिंदू मंदिरों को अपवित्र और नष्ट किया गया, धार्मिक प्रतीकों का अपमान हुआ, पवित्र ग्रंथ जलाए गए। हमलावरों ने कोलकाता से हिंदू मौजूदगी को मिटाने की कोशिश की, क्योंकि इसे वे पूर्वी पाकिस्तान की भावी राजधानी मानते थे।

इस दौरान मंदिर तोड़े गए, धार्मिक प्रतीकों को अपमानित किया गया और शास्त्र जलाए गए। हमलावरों का मकसद कलकत्ता से हिंदू उपस्थिति मिटाना था, ताकि यह भविष्य के ईस्ट पाकिस्तान की राजधानी बन सके।

महज दो महीने बाद, 10 अक्टूबर 1946 को, पूर्वी बंगाल में नोआखाली नरसंहार हुआ, जो सुनियोजित और भयावह था। 5,000 से ज्यादा हिंदू, ज्यादातर पुरुष और लड़के, मारे गए। कई गुना ज्यादा को जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। हिंदुओं को गोमांस खाने और इस्लामिक आयतें (कलमा) पढ़ने के लिए मजबूर किया गया।

हजारों हिंदू महिलाओं के साथ उनके बच्चों और पतियों के सामने बलात्कार हुआ, और उन्हें सेक्स स्लेव के तौर पर कैद किया गया। हिंदू अल्पसंख्यकों पर ये व्यवस्थित और क्रूर हमले उनकी आबादी को तेजी से कम करने का कारण बने।

हैरानी की बात है कि नोआखाली हिंदू नरसंहार को ‘दंगे’ कहा जाता है, जबकि सारे संकेत बताते हैं कि ये पूर्ण रूप से नरसंहार था।

मोपला नरसंहार: लीपापोती की एक सदी

केरल के मलप्पुरम जिले के तुव्वुर गाँव में 25 सितम्बर 1921 को एक भयानक नरसंहार हुआ।

यह हिंसा अगस्त 1921 में शुरू हुई थी, जब खिलाफत आंदोलन (जो तुर्की के ओटोमन खलीफा से जुड़ा था और महात्मा गाँधी ने भी इसका समर्थन किया था) अचानक हिंदुओं पर हमलों में बदल गया।

तुव्वूर में ही 50 हिंदुओं को मारकर उनके शव कुएँ में फेंक दिए गए। अगले चार महीनों में, जब तक हत्याएँ रोकी गईं, 2500 से ज्यादा हिंदुओं को, अक्सर सिर काटकर मार डाला गया। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना किया, उनकी लाशें कुओं में डाल दी गईं।

लगभग एक लाख हिंदू अपने घरों और गाँवों से भागने को मजबूर हुए, रातोंरात शरणार्थी बन गए। हजारों परिवारों को मौत की धमकी देकर इस्लाम कबूल करवाया गया। यहाँ तक कि बाद में केरल के पहले मुख्यमंत्री बने ईएमएस नंबूथिरीपाद को अपनी जान बचाने के लिए अपने पैतृक घर से भागना पड़ा।

इसके बावजूद, बाद की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने इस घटना को क्लास स्ट्रगल या स्वतंत्रता संग्राम बताकर सच्चाई को छिपाया। जबकि महात्मा गाँधी, एनी बेसेन्ट और भीमराव आंबेडकर ने इन अत्याचारों का जिक्र किया था।

आज भी केरल सरकार इन हत्यारों को स्वतंत्रता सेनानी कहकर सम्मानित करती है। इतिहासकारों की संस्था ICHR (इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च) ने साफ कहा है कि यह कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं था, बल्कि जिहादी हिंसा थी, जिसका मकसद इस्लामिक खिलाफत कायम करना था। इसके बावजूद इस्लामिक हिंसा को मार्क्सवादी भाषा में छुपाने की कोशिशें अब तक जारी हैं।

मोपला नरसंहार कोई किसान विद्रोह नहीं था

इस्लाम में शहादत (शहीद) का असली मतलब तब बदल गया, जब हिंदुओं के सफाए का मकसद सिर्फ मजहब बन गया। उसी नाम पर गैर-मुस्लिमों को बेरहमी से मारा गया, बलात्कार किया गया और लूटा गया। उनके मुताबिक, इस्लामी शहीद, जो इस तथाकथित विद्रोह में मारे जाते थे, उनका कीमती पत्थरों से सजे घोड़ों पर जन्नत में स्वागत होता था, जहाँ ‘हूरें’ (कुँवारी अप्सराएँ) और दूसरी फँतासियाँ उनका स्वागत करती थीं। एक अनपढ़ एरनाड मोपला के लिए ये बाद के जीवन के वादे उस साधारण जमीन पर जिंदगी से ज्यादा आकर्षक थे।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों ने हर पुरुष और महिला को एक साझा लक्ष्य के लिए हाथ मिलाने को कहा। गाँधी का विचार था कि खिलाफत आंदोलन को स्वराज आंदोलन के साथ जोड़ा जाए, ताकि दूर रहने वाले मुसलमान स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हों। उन्हें क्या पता था कि इस्लाम के नाम पर हजारों हिंदुओं की बलि चढ़ जाएगी। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एक आजाद देश का सपना देखते थे, लेकिन खिलाफतवादी एक आजाद इस्लामिक देश का सपना देखते थे।

ये थी 1921 की मप्पिला जिहाद की शुरुआत। ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’ जैसे नारे न राष्ट्रवादी जोश से गूँजे, न किसानों की ताकत से। न तो उन्होंने स्वराज का झंडा (पिंगली वेंकय्या द्वारा डिजाइन किया गया) उठाया, न ही खिलाफत का झंडा (दो चौराहे वाले गोले)। इसके बजाय, दंगाइयों ने ‘बैनर ऑफ ईगल’ के साथ मार्च किया, जिसे रायत-अल-उकब कहा जाता है, जो इस्लामी परंपरा में मोहम्मद द्वारा इस्तेमाल किया गया ऐतिहासिक झंडा था। ये शिया इस्लाम में एक प्रलयकारी प्रतीक है, जो महदी के आगमन का संकेत देता है। ये साफ तौर पर इस्लामी अतिवाद और जिहादी कामों में इस्तेमाल होने वाला प्रतीक है।

वे लोहे की छड़ों से हमला करते थे। पुलिस की संगीनें उनके बढ़ते हुए हुजूम के सामने बेकार थीं। पुलिस की गोलीबारी में नौ दंगाई मारे गए। जब भीड़ पीछे हटी, तो ब्रिटिश ने थानूर खलिफत कमेटी के सचिव कुंजीखादर और 40 अन्य मप्पिलाओं को पकड़ लिया।

ब्रिटिश प्रशासन के पहिए कुछ समय के लिए थम गए, और कट्टरपंथी हथियार उठाए हुए थे। उन्होंने पुलिस स्टेशनों, खजानों, अदालतों और अन्य सरकारी कार्यालयों को लूटा और तहस-नहस कर दिया। ये मजहबी अशांति जल्दी ही मलप्पुरम के आसपास के इलाकों में जंगल की आग की तरह फैल गई।

सामाजिक न्याय का हथियार सनातनियों के खिलाफ

पैटर्न साफ है। जब भी हिंदू इस्लामिक हिंसा का शिकार होते हैं, उसे ‘सामाजिक न्याय’ की शब्दावली से नया नाम दे दिया जाता है। जब हिंदुओं का नरसंहार होता है, तो व्याख्या बदल जाती है: ये जिहाद नहीं था, ये ‘वर्ग संघर्ष’ था। ये कम्युनल हिंसा नहीं थी; ये ‘औपनिवेशिक विरोध’ था। पीड़ितों को मिटा दिया जाता है, और अपराधियों को क्रांतिकारी बना दिया जाता है।

ये सामाजिक न्याय की भाषा का क्रूर दुरुपयोग है। जातिगत असमानता या किसान शोषण को वास्तव में संबोधित करने के बजाय, इन शब्दों को इस्लामी आक्रामकता को जायज ठहराने के लिए हथियार बनाया जाता है। मोपला को इसलिए माफ कर दिया गया क्योंकि उनके हिंदू शिकार जमींदार थे।

पाकिस्तान आंदोलन को इसलिए नया रूप दिया जाता है क्योंकि हिंदू ‘उच्च-जाति के दबंग’ थे। लेकिन हकीकत ये है कि हजारों गरीब हिंदू किसान, कारीगर और दलित उनमें शामिल थे, जिन्हें मार डाला गया या जबरन धर्मांतरण करवाया गया। उनकी पीड़ा को ‘बड़े संघर्ष’ के बहाने मिटा दिया जाता है।

यह सिर्फ इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना नहीं है, बल्कि यह दूसरी बार किया गया अत्याचार है। पहली बार उनकी जान और घर छीन लिए गए और दूसरी बार उनकी याद और सम्मान को मिटा दिया गया।

विभाजन का विश्वासघात: पाकिस्तान में सामाजिक न्याय नहीं

अगर ये मान भी लें कि बँटवारा एक सामाजिक क्रांति थी, तो इसका नतीजा इस झूठ को उजागर करता है। क्या पाकिस्तान ने दबे-कुचले लोगों को बराबरी दी?

जवाब है, बिल्कुल नहीं। पाकिस्तान जल्दी ही एक सामंती-सैन्य राज्य बन गया, जहाँ कुलीन वर्गों का दबदबा रहा। भूमि सुधार विफल रहे, किसान गरीब बने रहे, और अल्पसंख्यक, खासकर हिंदू पहले से कहीं ज्यादा सताए गए। आजादी के बजाय, पाकिस्तान अपने अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए एक बुरा सपना बन गया।

इस तरह पाकिस्तान किसी के लिए मुक्ति का सपना नहीं बल्कि गरीबों और अल्पसंख्यकों दोनों के लिए एक बड़ा दुःस्वप्न साबित हुआ। इसलिए यह दावा कि पाकिस्तान आंदोलन सामाजिक न्याय के लिए था, न सिर्फ अपनी शुरुआत में गलत था बल्कि अपने नतीजे में भी पूरी तरह ढह गया।

खतरा यहीं खत्म नहीं होता। जब मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे द वायर इस्लामी हिंसा को सामाजिक न्याय की भाषा में ढकते हैं, तो वे उसी विचारधारा को मजबूत करते हैं जो आज भी हिंदू समाज को खतरे में डालती है।

इस तरह असली धार्मिक नफरत को मिटा दिया जाता है और संदेश साफ हो जाता है हिंदुओं की जिंदगी का कोई अपना महत्व नहीं, उनकी मौत का जिक्र तभी होगा जब उसे किसी और की संघर्ष कथा में इस्तेमाल किया जा सके।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

फतेहपुर में मकबरा-मंदिर विवाद पर प्रशासन ने CM योगी को भेजी रिपोर्ट, खतौनी और वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों में दर्ज जमीन के मिले अलग-अलग आँकड़े

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में मकबरा-मंदिर विवाद में प्रयागराज कमिश्नर और आईजी रेंज ने विवाद की विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेज दी है। बीते 11 अगस्त को नवाब अब्दुल समद के मकबरे को हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों ने मंदिर बताते हुए यहाँ पूजा की थी, जिस पर खूब हंगामा हुआ था।

हिंदू संगठन से जुड़े लोगों ने मकबरे के भीतर बनीं 2 मजारों में तोड़फोड़ की थी और मुस्लिम पक्ष ने हिंदुओं पर पथराव किया था। दरअसल, मुस्लिम पक्ष इस मकबरे को नवाब अब्दुल समद खान और उनके बेटे अबू बकर की कब्र बताता है जबकि हिंदू पक्ष इस जगह पर भगवान शिव और भगवान कृष्ण का प्राचीन मंदिर होने का दावा करता है। दावा किया जाता है कि यह मकबरा 200 वर्ष पुराना है।

क्या कहती है शासन की रिपोर्ट?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मकबरे को लेकर हुए विवाद के बाद जिला प्रशासन ने इसकी विस्तृत रिपोर्ट बनाने के लिए उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी। इस समिति में 2 अपर जिलाधिकारी (ADM), 3 उपजिलाधिकारी (SDM), 2 तहसीलदार और 12 लेखपाल शामिल थे। अब करीब 75 पेज की इस रिपोर्ट को कमिश्नर के जरिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजा गया है।

इस रिपोर्ट में मकबरे की जमीन गाटा संख्या 753 के साथ-साथ आसपास पूरे इलाके के 8 गाटा संख्या की जानकारी दी गई है। 753 के साथ मकबरे से सटे 1159 गाटा संख्या का ब्यौरा दिया गया है। 1159 गाटा संख्या के 23 खातेदारों में 6 नंबर पर ठाकुर जी विराजमान मंदिर भी दर्ज है।

इस रिपोर्ट में सामने आया है कि खतौनी में गाटा संख्या 753 के तहत मकबरे की कुल 11 बीघा जमीन दर्ज है। वहीं, वक्फ बोर्ड ने जो दस्तावेज दिए हैं उनमें सिर्फ 15 बिस्वा जमीन ही वक्फ संपत्ति के तौर पर दर्ज है। इन दोनों कागजातों के बीज करीब 10 बीघा जमीन की अंतर दिखाई दिया है।

रिपोर्ट में जिस गाटा संख्या 753 में मकबरा दर्ज है उसके मालिकाना हक से लेकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित होने और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में दर्ज होने का विवरण इस रिपोर्ट में दिया गया है।

रिपोर्ट में मकबरे के अस्तित्व, निर्माण काल और इस्तेमाल की भी जानकारी दी गई है। साथ ही, इसमें बवाल के दिन चूक को लेकर भी जानकारी दी गई है।

इस पूरे विवाद के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद कर दी गई है। मकबरे के एक किलोमीटर के दायरे की सड़कों पर निगरानी रखी जा रही है। पुलिस ने इस पूरे मामले में 10 नामजद और 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। इस FIR में एक सपा नेता का भी नाम है जिसे इस घटना के बाद अब पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है।

‘न कोई पक्ष – न विपक्ष, सभी दल और मतदाता बराबर’: चुनाव आयोग ने बिहार SIR पर ‘वोट चोरी’ के आरोप किए खारिज, कहा- मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़े

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार (17 अगस्त 2025) को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर खुलकर बात की। उन्होंने साफ कहा कि चुनाव आयोग किसी भी राजनीतिक दल के साथ पक्षपात नहीं करता। उनके लिए न कोई पक्ष है, न विपक्ष, बल्कि सभी दल और मतदाता बराबर हैं। यह बयान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों के जवाब में आया, जिसे आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया।

ज्ञानेश कुमार ने कहा कि बिहार में SIR का काम पूरी पारदर्शिता के साथ हो रहा है। इस प्रक्रिया में 1.6 लाख बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) ने मतदाता सूची का मसौदा तैयार किया है। इस मसौदे को सभी राजनीतिक दलों के एजेंट्स ने अपने हस्ताक्षरों से सत्यापित किया है। मतदाताओं ने इस दौरान 28,370 दावे और आपत्तियाँ दर्ज की हैं। आयोग ने गलतियों को ठीक करने के लिए 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक का समय दिया है।

सीईसी ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कुछ राजनीतिक दलों के जिला स्तर के अध्यक्षों और उनके द्वारा नामित एजेंट्स के सत्यापित दस्तावेज या तो उनके राष्ट्रीय नेताओं तक नहीं पहुँच रहे या फिर जानबूझकर भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि यह बेहद गंभीर मसला है। अगर कोई शिकायत है, तो आयोग के दरवाजे हमेशा खुले हैं। लेकिन ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके जनता को गुमराह करना संविधान का अपमान है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह भी बताया कि कुछ नेताओं ने बिना सबूत के दोहरे मतदान के आरोप लगाए। जब उनसे सबूत माँगे गए, तो कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि जब लोकसभा चुनाव में एक करोड़ से ज्यादा कर्मचारी, 10 लाख से ज्यादा बूथ लेवल एजेंट्स और 20 लाख से ज्यादा पोलिंग एजेंट्स पारदर्शी तरीके से काम करते हैं, तो क्या कोई वोट चुरा सकता है?

ज्ञानेश कुमार ने यह भी कहा कि कुछ समय पहले कई मतदाताओं की तस्वीरें बिना उनकी सहमति के मीडिया में दिखाई गईं। उन्होंने पूछा, “क्या चुनाव आयोग को माताओं, बहनों, बेटियों के सीसीटीवी वीडियो सार्वजनिक करने चाहिए?” उन्होंने साफ किया कि मतदाता सूची में जिनके नाम हैं, वही अपने उम्मीदवार को चुनने के लिए वोट डालते हैं।

बिहार में SIR के तहत 7.89 करोड़ लोगों का सत्यापन हुआ, जिसमें से 7.24 करोड़ फॉर्म 30 दिन के भीतर वापस मिले। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि नेपाली और बांग्लादेशी नागरिक भारत में सांसद या विधायक का चुनाव नहीं कर सकते। 30 सितंबर तक ऐसे लोगों की गहन जाँच होगी और इस दौरान उनका वोट काट दिया जाएगा। पश्चिम बंगाल में SIR की घोषणा जल्द होगी, और बाकी देश में भी यह प्रक्रिया चलेगी।

उन्होंने कहा कि शिकायत करना, शिकायत को बढ़ाना और भ्रम फैलाना, ये तीन अलग-अलग चीजें हैं। अगर 45 दिन तक कोई गलती नहीं दिखी, तो अब आरोप लगाने का क्या मतलब? जनता सब समझती है। SIR का मकसद मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि कोई गलत व्यक्ति वोट न डाल सके।

ज्ञानेश कुमार ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग निडर होकर काम करता है। यह गरीब, अमीर, युवा, बुजुर्ग, महिला और सभी धर्मों के मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। उन्होंने कहा कि आयोग का काम संविधान के तहत हर भारतीय नागरिक को वोट देने का हक देना है। सभी राजनीतिक दलों का पंजीकरण भी आयोग के पास होता है, फिर भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता।

मुख्य चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि बिहार में SIR की प्रक्रिया में सभी हितधारक मिलकर काम कर रहे हैं। बूथ स्तर पर मतदाता, अधिकारी और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि पारदर्शी तरीके से सत्यापन कर रहे हैं। कई जगह वीडियो प्रशंसापत्र भी दिए जा रहे हैं। आयोग का मकसद है कि मतदाता सूची में कोई गलती न रहे और हर पात्र व्यक्ति को वोट देने का मौका मिले।

चुनाव आयोग के प्रेस कॉन्फ्रेंस की अहम बातें

  • चुनाव आयोग के लिए न कोई पक्ष है, न कोई विपक्ष है। चुनाव आयोग के लिए सब समकक्ष हैं
  • सभी राजनीतिक दलों ने बिहार SIR में 1.6 लाख बूथ लेवल एजेंट्स ने हस्ताक्षर किए हैं
  • मतदाताओं ने 28 हजार क्लेम और ऑब्जेक्शन दिए हैं
  • चुनाव आयोग त्रुटियों को हटाने के लिए 1 अगस्त से 1 सितंबर का समय दिया
  • यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि राजनीतिक दलों के जिलाध्यक्ष और एजेंट के हस्ताक्षर किए हुए कागज राष्ट्रीय स्तर के नेताओं तक पहुँच नहीं पा रहे हैं या भ्रम फैलाने का प्रयास हो रहे है
  • वोट चोरी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके जनता को गुमराह किया जाए तो यह संविधान का अपमान है
  • हमने बीते दिनों देखा कि कई मतदाताओं की फोटो बिना उनकी सहमति के बिना मीडिया में रखी गई
  • क्या चुनाव आयोग को माताओं बेटियों की वीडियो साझा करनी चाहिए क्या?
  • कुछ मतदाताओं द्वारा दोहरे मतदान के आरोप लगाए गए, साक्ष्य नहीं दिया गया। इनसे चुनाव आयोग नहीं डरता है
  • चुनाव आयोग निडरता के साथ सभी वर्ग के मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़ा है, खड़ा रहेगा
  • बिहार में 7.89 करोड़ लोगों का SIR हुआ। 7.24 करोड़ फॉर्म वापस मिले 30 दिन के अंदर
  • नेपाली बांग्लादेशी भारत के MP MLA का चुनाव नहीं कर सकते।
  • 30 सितंबर तक नेपाली-बांग्लादेशी नागरिकों की जाँच होगी, गहन जाँच प्रक्रिया के दौरान उनका वोट काट दिया जाएगा।
  • पश्चिम बंगाल में SIR का ऐलान आने वाले समय में उचित समय पर लिया जाएगा। बाकी देश में भी होगा।
  • एक होता है, शिकायत करना, एक होता है शिकायत बढ़ाना और एक होता है भ्रम फैलाना।
  • जब चुनाव के 45 दिन के बाद कोई गलती नजर नहीं आई, तो अब आरोप लगाने का मतलब क्या यह पूरे देश की जनता समझती है
  • SIR का काम वोटर लिस्ट को पूरी तरह से प्यूरीफाई करना है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज्ञानेश कुमार ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना ठीक नहीं। जब सात करोड़ से ज्यादा मतदाता आयोग के साथ हैं, तो उसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। उन्होंने नेताओं से अपील की कि वे बिना सबूत के आरोप न लगाएँ और अगर कोई शिकायत है, तो कोर्ट में याचिका दायर करें।

ब्रिटिश नहीं चाहते थे बँटवारा फिर भी कॉन्ग्रेस को था स्वीकार: विभाजन विभीषिका में राजनीतिक इस्लाम और मुस्लिम लीग की हिंसा पर क्या कहता है NCERT का नया मॉड्यूल?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए दो अलग-अलग मॉड्यूल जारी किए हैं। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस हर वर्ष 14 अगस्त को मनाया जाता है।

NCERT एक स्वायत्त संस्था है जो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है। यह राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा तैयार करती और किताबें प्रकाशित करती है। इन किताबों का उपयोग CBSE के कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों द्वारा किया जाता है।

अब हाल ही में जारी किए गए NCERT के एक मॉड्यूल में यह बताया गया है कि भारत के बँटवारे के पीछे सबसे बड़ी ताकत राजनीतिक इस्लाम और उसकी विचारधारा थी। इसमें हिंदुओं पर हुए अत्याचार, मुस्लिम लीग की हिंसा, कॉन्ग्रेस पार्टी की जिम्मेदारी और यह बात भी शामिल की गई है कि पाकिस्तान के लिए वोट करने वाले ज्यादातर मुसलमान भारत में ही रह गए थे।

राजनीतिक इस्लाम और बंटवारा, पाक नहीं गए ज्यादातर मुस्लिम

मॉड्यूल में कहा गया कि मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाया गया था फिर भी ज्यादातर मुस्लिम पाकिस्तान नहीं गए।

मॉड्यूल के पेज नंबर 4 पर लिखा गया है, “मुसलमानों के लिए एक पृथक देश बना दिया गया, फिर भी लगभग 3.5 करोड़ मुसलमान भारत में ही रह गए। पाकिस्तान की माँग और उस का निर्माण इसी आधार पर हुआ था कि यह समस्त भारतीय मुसलमानों का अलग देश होगा।”

मॉड्यूल में कहा गया है कि 1946 में हुए संविधान सभा के चुनावों में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित 78 में से 73 सीटें जीत लीं। इस मुस्लिम लीग की मुख्य माँग पाकिस्तान थी।

मॉड्यूल में साफ तौर पर कहा गया है कि पाकिस्तान बनाने वाली संदेह, द्वेष और शत्रुता-भावना आज भी भारत में मौजूद है। इसमें बँटवारा और पाकिस्तान आंदोलन का मुख्य कारण राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा को माना गया है।

इसमें पेज 6 पर लिखा है, “धर्म, संस्कृति, साहित्य, रीति-रिवाज, इतिहास, प्रेरणा-स्रोत और जीवन-दृष्टि के सभी आधारों पर मुस्लिम नेताओं ने अपने को हिन्दुओं से स्थाई रूप से भिन्न घोषित किया। इस की जड़ राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा में थी, जो गैर-मुसलमानों के साथ किसी स्थायी या समान संबंध की संभावना को सिद्धांत रूप से ही नकारती है। यह सिद्धांत विश्व के विभिन्न हिस्सों में सदियों से लागू होता आया है, और आज भी अनेक देशों में देखा जा सकता है।”

इस मॉड्यूल में मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना के 22 मार्च 1940 के भाषण का भी जिक्र किया गया है। जिसमें जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए अलग राष्ट्र की स्पष्ट माँग की थी।

जिन्ना ने कहा था, “हिंदू और मुसलमान दो भिन्न-भिन्न धार्मिक दर्शनों, सामाजिक रीति-रिवाजों, और साहित्य से जुड़े रहे हैं। वे न तो आपस में विवाह सम्बन्ध करते हैं, न ही साथ-साथ खाते-पीते हैं। वस्तुतः दोनों दो भिन्न सभ्यताओं से जुड़े हैं जिन के विचार और धारणाएं एक-दूसरे से विपरीत हैं।”

भारतीय नेताओं को विभाजन के भयावह परिणामों का अनुमान नहीं था। उन्होंने इस निर्णय के पहलुओं पर विचार नहीं किया था। इसमें विभाजन को जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया गया है।

मॉड्यूल में पेज 12 पर कहा गया है, “जिन कारणों से विभाजन स्वीकार किया गया था, वे आज भी बने हुए हैं। यह भी दिखाता है कि नेताओं ने उस मूल प्रश्न पर गंभीरता से विचार नहीं किया – मजहबी अलगाववाद की विचारधारा और किसी एक मजहब के लिए विशेष अधिकारों की माँग।”

NCERT ने बताया है कि भारतीय नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों की सच्चाइयों को नजरअंदाज कर सांप्रदायिकता का दोष भी ब्रिटिश शासकों पर डाल दिया।

इसमें पेज 11-12 पर लिखा है, “भारतीय नेताओं ने…अपने विमर्श को मुख्यतः ‘देशी बनाम विदेशी’ के रूप में सीमित रखा। भारत का वास्तविक इतिहास उपेक्षित किया गया। 1919 से, खलीफत-असहयोग आंदोलन से शुरू करके, राष्ट्रीय नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की ऐतिहासिक सच्चाइयों को लगातार नजरअंदाज किया। उन्होंने प्रत्येक समस्या, यहाँ तक कि सांप्रदायिकता का दोष भी, केवल ब्रिटिश शासकों पर डाल दिया। यह एक अतिशयोक्तिपूर्ण दोषारोपण था। यदि वे सच्चे इतिहास के आधार पर विचार कर निर्णय करते तो वे मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति को प्रारंभ से ही रोक सकते थे।”

जिहादी आतंक फैलाता है पाकिस्तान, दूसरे देशों से मिलती है मदद

NCERT के मॉड्यूल में पाकिस्तानी की भारत में जिहादी आतंकवाद फैलाने की कोशिशों और ‘हजार घाव’ देने की नीति का भी जिक्र किया गया है।

मॉड्यूल में लिखा है, “पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए तीन युद्ध किए, और उस में बार-बार हारने पर अंदर-बाहर से ‘हजार घाव’ देने की नीति अपनाई। इस के अंतर्गत भारत में जिहादी आतंकवाद फैलाने की कोशिशें चलती रही है। इस के फलस्वरूप और इस से निपटने में अब तक हजारों भारतीय नागरिक और सैनिक मारे जा चुके हैं। यह सब भारत विभाजन के परिणाम हैं।”

साथ ही, इसमें पाकिस्तान को कई देशों से मिलने वाले हथियारों और भारत के खिलाफ पाकिस्तान का उपयोग किए जाने की भी बात की गई है।

पेज 5 पर मॉड्यूल में लिखा है, “कुछ महत्वपूर्ण देश पाकिस्तान का उपयोग भारत पर दबाव बनाने के लिए करते रहते हैं। कई देश आज भी पाकिस्तान को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देते रहते हैं। परिणामस्वरूप, भारत को अपने रक्षा व्यय पर लगातार भारी खर्च करना पड़ता रहा है।”

विभाजन के लिए कॉन्ग्रेस भी जिम्मेदार: NCERT

मॉड्यूल में NCERT ने विभाजन के लिए लॉर्ड माउंटबेटन और जिन्ना के साथ-साथ कॉन्ग्रेस को भी जिम्मेदार बताया है।

इसमें कहा गया है, “ऐतिहासिक दृष्टि से भारत विभाजन के लिए तीन तत्व जिम्मेदार थे। जिन्ना, जिन्होंने इस की माँग की। दूसरे, कॉन्ग्रेन जिस ने इसे स्वीकार किया। तीसरे, माउंटबेटन जिन्होंने इसे औपचारिक रूप देकर कार्यान्वित किया।”

इसमें बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार ने अंत तक भारत को एक बनाए रखने की कोशिश की थी और वायसराय लिनलिथगो और वायसराय वावेल दोनों विभाजन के खिलाफ थे। लॉर्ड वावेल ने 1940 से लेकर मार्च 1947 तक बार-बार कहा था कि विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का समाधान नहीं होगा।

पेज 9 पर मॉड्यूल में लिखा गया है, “यह जल्दबाजी और करोड़ों लोगों के भविष्य, जीवन व सुरक्षा का ऐसे फैसला करना एक गंभीर राजनीतिक लापरवाही थी। जो भी लोग सत्ता-हस्तांतरण की तिथि घटाकर निकट कर लेने पर सहमत हुए, वे सभी इस के उत्तरदायी थे।”

मॉड्यूल में कहा गया है कि ब्रिटिश सरकार हमेशा विभाजन के खिलाफ थी और कॉन्ग्रेस नेताओं ने जिन्ना को कम आँका था।

इसमें कहा गया है, “1947 में पहली बार भारतीय नेताओं ने ही देश का एक विशाल भाग कई करोड़ नागरिकों सहित स्वेच्छा से स्थायी रूप से राष्ट्रीय सीमा के बाहर कर दिया। वह भी बिना उन करोडों नागरिकों की सहमति के। यह मानव इतिहास में एक अद्वितीय दुर्घटना थी, जब किसी देश के नेताओं ने बिना युद्ध के, शांतिपूर्वक और बंद कमरों में अचानक करोड़ो लोगों को अपने ही देश से काट दिया!”

विभाजन के दौर में कैसे हुआ हिंदुओं का उत्पीड़न?

मॉड्यूल में पेज 3-4 पर विभाजन से हुईं हानि को लेकर लिखा गया है, “साम्प्रदायिक हिंसा में लाखों लोगों की जा गई और करोड़ों विस्थापित हुए। बहुत-से परिवारों को अपने प्राण सम्मान या संपत्ति बचाने के लिए जबरन इस्लाम कबूल करना पड़ा।”

बँटवारे के बाद जम्मू-कश्मीर की सामाजिक संरचना में परिवर्तन और कश्मीरी पंडितों की खराब होती गई स्थितियों का भी इस मॉड्यूल में जिक्र किया गया है। इसमें लिखा है, “कश्मीरी पंडितों की स्थिति दयनीय होती गई। आगे आने वाले दशकों में यह स्थिति और अधिक बिगड़ी जब वहाँ आंतरिक और बाहरी आतंकवाद ने अपना दबदबा बनाया।”

NCERT ने बताया कि कैसे जिन्ना ने अपनी माँग मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया था और 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की थी।

मॉड्यूल में लिखा है, “इस ‘डायरेक्ट एक्शन’ के मात्र दो-तीन दिनों में कलकत्ता में लगभग 6000 लोग मारे गए। यह हिंसा मुस्लिम लीग और उस के स्थानीय शासन द्वारा आयोजित थी, जिस के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी थे।”

मुस्लिम लीग को वोट देने के बाद भी भारत में बड़ी संख्या में रह गए मुस्लिम

1946 के प्रांतीय चुनावों में मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर मुस्लिम लीग को वोट दिया। मुस्लिम लीग ने उस समय मजहब के आधार पर लोगों की भावनाएँ भड़काते हुए यह माँग उठाई थी कि मुस्लिमों के लिए अलग इस्लामिक देश बने।

मुस्लिम लीग का कहना था कि हिंदू और मुस्लिम एक ही देश में साथ नहीं रह सकते है। मुसलमानों के लिए भारत से अलग एक देश बनना चाहिए।

1946 के चुनावों में पूरे भारत में मुस्लिम लीग ने लगभग 87% सीटें जीतीं। अगर 1937 और 1946 के चुनावों की तुलना करें तो साफ दिखाई देता है कि 1946 में जिन्ना की मुस्लिम लीग द्वारा जीते गए प्रांतों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई थी।

बिहार में 1937 में मुस्लिम लीग को एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन 1946 में 40 में से 34 सीटें जीत गई।मद्रास में 1937 में 9 सीटें मिली थीं लेकिन 1946 में सभी 29 सीटें जीत लीं।

यह पैटर्न उस समय सभी प्रांतों में दिखाई दिया। हमें याद रखना चाहिए कि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत स्वयं बहुत लंबे समय तक अस्तित्व में रहा फिर भी मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की औपचारिक राजनीतिक माँग 1940 में की गई।

असल में 1940 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में साफ-साफ पाकिस्तान की मांग रखी थी। जिन्ना ने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, उत्तर-पश्चिमी प्रांत और बंगाल जैसे इलाकों को मिलाकर मुसलमानों के लिए एक स्वतंत्र और संप्रभु देश बनाने का लक्ष्य रखा था।

इसे ही लाहौर प्रस्ताव कहा गया जिसे बंगाल के मुख्यमंत्री ए.के. फजलुल हक ने पेश किया था और 23 मार्च 1940 को यह पास हो गया था। प्रस्ताव में गैर-मुस्लिम धर्मों के संरक्षण की भी गारंटी दी गई थी। यही पाकिस्तान के पहले संविधान की नींव बना था।

स्रोत: शिकागो विश्वविद्यालय

1940 में पाकिस्तान की माँग औपचारिक रूप से सामने आने के बाद मुस्लिम लीग को मुसलमानों का जबरदस्त समर्थन मिलने लगा। यह सीधे तौर पर अलग इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान की माँग को बढ़ावा था।

फिर भी यह हैरानी की बात है कि कुछ लोग आज यह तर्क देते हैं कि ज्यादातर मुसलमान भारत में अपनी इच्छा से ही रहे और उस समय वे अलग इस्लामी देश नहीं चाहते थे।

यह सच है कि उस समय कई मुसलमान भी पाकिस्तान की माँग के खिलाफ थे लेकिन राजनीतिक बयान और असल में वोट डालने के समय लिए गए फैसले, दोनों बहुत अलग बातें होती हैं।

अगर मुसलमान सचमुच पाकिस्तान चाहते थे और भारी संख्या में उसके पक्ष में वोट भी दिया था तो फिर इतने बड़े पैमाने पर मुसलमान भारत में क्यों रह गए?

पाकिस्तान के निर्माण के लिए मिले भारी समर्थन का मुकाबला करने के लिए बिना किसी ठोस तथ्य के यह दिया जाता है कि अगर ज्यादातर मुसलमानों ने दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया था, तो फिर वे भारत में क्यों ठहरे? और अगर वे ठहर गए तो इसका मतलब है कि उन्होंने दो-राष्ट्र सिद्धांत को ठुकरा दिया।

दरअसल, विभाजन के बाद कई नेता पूरी आबादी के आदान-प्रदान के पक्ष में थे। इनमें डॉ. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे।

विभाजन पर अपनी किताब में अंबेडकर ने साफ लिखा था कि वे क्यों पूरी तरह से जनसंख्या के आदान-प्रदान के पक्ष में हैं। इसका मतलब था कि पाकिस्तान में रहने वाले सभी हिंदू और अन्य धर्मों के लोग भारत आ जाएँ और भारत के सभी मुसलमान पाकिस्तान चले जाएँ। उन्होंने तो जनसंख्या से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक खाका भी तैयार किया था।

यहाँ तक कि सरदार पटेल ने भी विभाजन के बाद भी इस बारे में विस्तार से बात की थी कि कैसे मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाने में मदद की थी। 1948 में कोलकाता में एक भाषण में कहा था, “ज्यादातर मुसलमान जिन्होंने हिंदुस्तान में रहना चुना वे पाकिस्तान बनाने में मददगार रहे। अब मुझे समझ नहीं आता कि एक रात में ऐसा क्या बदल गया कि वे हमसे अपनी वफादारी पर शक ना करने की उम्मीद कर रहे हैं।

इसी तरह, कई बड़े नेताओं ने उस समय पूरी आबादी की अदला-बदली की माँग का समर्थन किया था।

Sunday Guardian की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और राजकुमारी अमृत कौर, गाँधी से मिलने गए थे ताकि वे जिन्ना के प्रस्ताव (आबादी की अदला-बदली) पर सहमत हों। उन्होंने (गाँधी) साफ कह दिया कि विभाजन तो क्षेत्रीय आधार पर हुआ है, धार्मिक आधार पर नहीं। इसलिए हिंदुओं और मुसलमानों के आदान-प्रदान का सवाल ही नहीं उठता। जबकि सच्चाई यही थी कि विभाजन पूरी तरह हिंदू और मुसलमान के आधार पर हुआ था।”