अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगा दिया है, जो बुधवार (27 अगस्त 2025) से लागू हो गया। इसके बाद भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर कुल शुल्क 50% हो गया है। यह कदम अमेरिका ने भारत के रूस से तेल खरीदने के कारण उठाया है।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारत के हीरा उद्योग पर बताया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, सूरत का हीरा कारोबार पहले से ही गहरी मंदी का सामना कर रहा था और अब टैरिफ बढ़ने से हालात और बिगड़ सकते हैं। इस मंदी से हजारों नौकरियों पर संकट मंडराने की आशंका है।
सूरत भारत का हीरा निर्यात केंद्र है, जहाँ से हर साल हजारों करोड़ रुपए के हीरे अमेरिका समेत कई देशों में भेजे जाते हैं। रॉयटर्स और बीबीसी जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं ने रिपोर्टिंग करते हुए इस मंदी को ट्रंप के टैरिफ से जोड़कर प्रस्तुत किया। बाद में गुजराती और हिंदी मीडिया ने भी यही नैरेटिव आगे बढ़ाया।
रिपोर्ट के अनुसार, सूरत की कई हीरा फैक्ट्रियों में पहले बड़ी संख्या में लोग काम करते थे, लेकिन अब ऑर्डर न मिलने की वजह से कर्मचारियों की संख्या घटा दी गई है और कई लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लोगों की नौकरी बची है, उन्हें समय पर वेतन नहीं मिल रहा। कई ज्वेलर्स का कहना है कि उनकी सैलरी कम कर दी गई है या फिर उन्हें काम से हटा दिया गया है।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, टैरिफ से पैदा हुई मंदी का सीधा असर अब मजदूरों पर दिखने लगा है। रिपोर्ट में कुछ लोगों के हवाले से कहा गया है कि एक लाख से ज्यादा ज्वेलर्स की नौकरियाँ खतरे में हैं और उनका भविष्य अनिश्चित है।
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में सूरत के डायमंड बोरस पर फोकस किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ समय पहले इसका उद्घाटन किया था, लेकिन यह अब तक पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि टैरिफ बढ़ने से ऑर्डर कम हो गए हैं, कई दफ़्तर खाली पड़े हैं और कई कारोबारी यहाँ अपना बिजनेस शिफ्ट करने से कतराने लगे हैं।
रिपोर्ट में छोटे हीरा कारोबारियों के हवाले से भी मंदी की बात कही गई है। कई गुमनाम लोगों ने भी यही दावे दोहराए हैं। विदेशी मीडिया के बाद अब गुजराती मीडिया ने भी इस मुद्दे को उठाया है।
गुजरात समाचार ने 28 अगस्त को एक रिपोर्ट प्रकाशित की और दावा किया कि ट्रंप के 50% टैरिफ से सूरत के हीरा-टेक्सटाइल उद्योग में 50 हजार से अधिक नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि सूरत के हीरा व्यापार का लगभग 30% हिस्सा अमेरिका से जुड़ा है, इसलिए टैरिफ का असर उद्योग पर ज्यादा पड़ेगा।
सत्य क्या है?
सूरत गुजरात की आर्थिक राजधानी है और गुजरात प्रधानमंत्री मोदी का गृह राज्य है। अगर यह प्रचार किया जाए कि सूरत का सबसे बड़ा उद्योग टैरिफ और वैश्विक हालात की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, तो इससे यह संदेश जाता है कि ट्रंप सीधे मोदी और उनके राज्य को निशाना बना रहे हैं।
लेकिन जरूरी है यह समझना कि कई रिपोर्ट्स में पूरी तस्वीर या सही संदर्भ नहीं दिए जा रहे, जिससे गलत नैरेटिव फैल रहा है।
असलियत यह है कि सूरत का हीरा उद्योग पिछले एक साल से मंदी का सामना कर रहा है। इस दौरान कई रिपोर्ट्स प्रकाशित हुईं, जब जो बाइडेन राष्ट्रपति थे, तब टैरिफ का कोई मुद्दा सामने नहीं था। यानी अगर बीबीसी की टीम ट्रंप के आने से पहले सूरत गई होती, तो वहाँ की स्थिति वही मिलती, जो अब दिखाई दे रही है।
यह सही है कि अमेरिकी टैरिफ का असर हीरा उद्योग पर पड़ेगा, लेकिन यह भी सच है कि भारतीय हीरा कारोबारियों की पकड़ मज़बूत है। भारत के पास अमेरिका के अलावा अन्य बाजार भी हैं, जबकि अमेरिका के पास ऐसे वैकल्पिक सप्लायर नहीं हैं जो इतने बड़े पैमाने पर हीरे निर्यात कर सकें। अमेरिका में हीरों की माँग बहुत अधिक है, जिसे केवल भारत ही पूरा कर सकता है।
जहाँ तक डायमंड बोरस का सवाल है, उसकी स्थिति पर सवाल इसके उद्घाटन के समय से ही उठते रहे हैं। कई दफ़्तर अब तक शुरू नहीं हुए हैं, लेकिन इसका सीधा संबंध अमेरिकी टैरिफ से नहीं है। जब टैरिफ का मुद्दा नहीं था, तब भी डायमंड बोरस की यही हालत थी। हकीकत यह है कि सरकार लगातार इसे सक्रिय बनाने की कोशिश कर रही है।
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
सूरत डायमंड एसोसिएशन के अध्यक्ष जगदीशभाई खुंट के अनुसार, हीरा उद्योग में भयंकर मंदी आने की बातें ज्यादातर मीडिया की बनाई हुई हैं।
उन्होंने बताया कि सूरत में पिछले दो साल से मंदी का माहौल है और पिछले एक साल में यह और बढ़ा है। यह स्थिति टैरिफ विवाद से पहले से ही मौजूद थी। अमेरिकी टैरिफ के असर पर बोलते हुए खुंट ने कहा कि इसका असर शॉर्ट टर्म जरूर होगा, लेकिन लंबे समय में उद्योग इस स्थिति को संभाल लेगा।
‘अमेरिका भारत पर निर्भर है, अगर नुकसान भी होगा तो अल्पकालिक होगा’
उन्होंने कहा कि आज करीब 90% हीरों का उत्पादन भारत में होता है और अमेरिका भी यह अच्छी तरह जानता है। इसलिए दुनिया का कोई भी देश अमेरिका की जरूरत के हिसाब से इतने बड़े पैमाने पर हीरे निर्यात नहीं कर सकता। अमेरिका पूरी तरह भारत पर निर्भर है, जबकि भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं है।
खुंट ने कहा कि अगर अमेरिका टैरिफ बढ़ाता भी है तो असली नुकसान वहीं के आम नागरिकों को होगा। अमेरिका में हीरे शादी और सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा हैं, जैसे भारत में सोने का महत्व है। अगर वहाँ लोगों को हीरे नहीं मिलेंगे तो असंतोष पैदा होगा या फिर लोग महँगे दाम देकर भी खरीदेंगे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को इससे नुकसान नहीं होगा। जो हीरे पहले अमेरिका भेजे जाते थे, उन्हें अन्य देशों को भेजकर आसानी से भरपाई की जा सकती है। क्योंकि भारत दुनिया के लगभग सभी देशों में हीरे निर्यात करता है।
इसी लिए उनके अनुसार, अमेरिकी टैरिफ से भारत के हीरा उद्योग पर कोई बड़ा संकट नहीं आएगा। बल्कि अमेरिका ही भारत पर ज्यादा निर्भर है, भारत अमेरिका पर नहीं।
यह रिपोर्ट झूठी है कि मंदी का कारण टैरिफ था
उन्होंने वही तर्क दिया कि अमेरिका में हीरे उतने ही अहम हैं जितना भारत में सोना। इसलिए हीरे महंगे होने पर भी अमेरिकी इन्हें खरीदेंगे। अगर वे नहीं खरीदते, तो भारत अन्य देशों को हीरे बेच सकता है।
असली नुकसान अमेरिका को होगा, क्योंकि भारत के अलावा कोई और देश इतनी मात्रा में हीरे नहीं दे सकता। सूरत में 10-12 फैक्ट्रियों का संचालन करने वाले ठाकरसिभाई पटेल ने भी यही बात दोहराई।
उन्होंने कहा कि मंदी से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन यह मंदी अमेरिकी टैरिफ की वजह से नहीं है। टैरिफ का असर थोड़े समय के लिए जरूर पड़ सकता है, लेकिन लंबे समय तक इसका कोई बड़ा असर नहीं होगा। इसी तरह, एक अन्य फैक्ट्री मालिक लक्ष्मणभाई और कुछ ज्वेलर्स ने भी यही राय रखी।
गौर करने वाली बात यह है कि 2024 में भी गुजराती मीडिया ने हीरा उद्योग में मंदी की रिपोर्ट प्रकाशितकी थी, जबकि तब टैरिफ विवाद का कोई मुद्दा नहीं था। यानी यह साफ है कि सूरत की हीरा इंडस्ट्री में मंदी पहले से थी, लेकिन यह अमेरिकी टैरिफ की वजह से नहीं आई।
इसके अलावा, उद्योग जगत ने अमेरिका पर निर्भरता घटाने और अन्य देशों को हीरे बेचने की योजना भी बनाई है। खुंट के अनुसार, राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों हीरा उद्योग के साथ खड़ी हैं और जरूरत पड़ने पर हमेशा सकारात्मक कदम उठाती हैं।
मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती में भार्गव राजगुरु ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ें।


