ब्रिटेन की क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 8 सितंबर 2022 को उन्होंने 96 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। क्वीन एलिजाबेथ के निधन के बाद दुनिया भर के नेताओं ने उन्हें याद किया, श्रद्धांजलि दी। भारत की ओर से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, पीएम मोदी से लेकर राहुल गाँधी जैसे नेताओं ने भी उन्हें याद किया।
I had memorable meetings with Her Majesty Queen Elizabeth II during my UK visits in 2015 and 2018. I will never forget her warmth and kindness. During one of the meetings she showed me the handkerchief Mahatma Gandhi gifted her on her wedding. I will always cherish that gesture. pic.twitter.com/3aACbxhLgC
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) को याद करते हुए ट्वीट किया। इस ट्वीट में फोटो के तौर पर कुछ यादें थीं और एक रुमाल का जिक्र किया गया है। रुमाल जो क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय को उनकी शादी पर मोहनदास करमचंद गाँधी ने गिफ्ट के तौर पर दिया था।
रुमाल या आड़बंद (लंगोट)
पीएम मोदी ने जिस रुमाल का जिक्र किया है, उसको लेकर कुछ विवाद है। विवाद इसलिए क्योंकि क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) ने भले ही उसे रुमाल बोल कर या मोहनदास करमचंद गाँधी से नाम जोड़ कर उसका जिक्र किया हो लेकिन वास्तव में उनकी शादी के समय क्या हुआ था, प्रेस में क्या छपा था… यह उनके दावे को नकारता है।
The Telegraph में एक खबर छपी थी – 2007 में। शीर्षक था – The missing pearls and Gandhi’s loincloth (गायब हुए मोती और गाँधी की लंगोट)। लिखने वाली का नाम था – Lady Pamela Hicks.
पामेला हिक्स कोई साधारण महिला नहीं थी। वो भारत के अंतिम वायसराय और पहले गवर्नर जेनरल लुइस माउंटबेटन और एडविना माउंटबेटन की बेटी थी। एक तरह से पामेला हिक्स ने क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) की शादी की आत्मकथा लिखी थी। उन्होंने ही इस लेख के माध्यम से खुलासा किया गाँधी का दिया हुआ रुमाल दरअसल लंगोट समझा गया था।
क्वीन एलिजाबेथ की शादी, गाँधी का गिफ्ट और अंग्रेजी मानसिकता
मोहनदास करमचंद गाँधी ने जितनी आत्मीयता से खुद अपने चरखे पर बुन कर जो कपड़ा गिफ्ट में दिया था, उसे loincloth समझा गया, सबसे ज्यादा असभ्य समझा गया। एक रिपोर्ट में तो यहाँ तक लिखा गया है कि उस गिफ्ट को अश्लील तक समझा गया था। मतलब उस समय भले हम आजाद हो गए थे लेकिन अंग्रेजों की मानसिकता हमें गुलाम समझने भर से अधिक की नहीं थी… बावजूद हम उनकी शादी में गिफ्ट दिए जाने के लिए बिछे जा रहे थे!
JAI HIND लिखा वो कपड़ा, जिसे समझा गया लंगोट (साभार: GETTY)
आखिर मतलब क्या होता है loincloth का? डिक्शनरी जो कहती है, उसे देखते हैं:
A loincloth is a one-piece garment, either wrapped around itself or kept in place by a belt. It covers the genitals and, at least partially, the buttocks.
हिंदी में इसे मोटा-मोटी आप लंगोट कह सकते हैं। कुछ जगहों पर इसे लंगोटी, लंगोटा और कटि-वस्त्र से लेकर आड़बंद, आड़बन तक कहते हैं। इस विवाद से हटते हैं और वर्तमान में आते हैं। 8 सितंबर 2022 को जब क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) अंतिम सांस ले रही थीं, उसी समय राजपथ (Kingsway) वाली गुलामी की मानसिकता को हम अपने देश से मिटा रहे थे।
बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने महाराष्ट्र सरकार के वन विभाग को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि संजय गाँधी नेशनल पार्क (SGNP, एसजीएनपी) में गणपति की मूर्ति का विसर्जन नहीं किया जाए। इस मामले में गुरुवार (8 सितंबर 2022) को बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस पीबी वराले और जस्टिस एसएम मोदक की पीठ ने सुनवाई की।
गणपति की मूर्ति का विसर्जन मामले को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि वन विभाग के अधिकारी उन लोगों के खिलाफ कानून के तहत उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं, जो मूर्तियों का विसर्जन करने के लिए नियमों का उल्लंघन करते हैं और संजय गाँधी नेशनल पार्क में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं।
बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार, यदि वन विभाग इस मसले पर अतिरिक्त पुलिस बल की सहायता या पुलिस बल की तैनाती के लिए अनुरोध करता है तो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अनुरोध पर विचार करें और स्वयं उचित निर्णय लें।
संजय गाँधी नेशनल पार्क में गणपति विसर्जन का मामला
एक याचिकाकर्ता ने कुछ समाचारों के आधार पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें दावा किया गया था कि मूर्तियों को संजय गाँधी नेशनल पार्क (एसजीएनपी) में विसर्जित किया जा सकता है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि इन लेखों को पढ़ने से आम आदमी को यही लगेगा कि वन अधिकारियों ने एसजीएनपी के अंदर स्थित जल निकायों में मूर्तियों को विसर्जित करने की अनुमति दी है।
याचिका में लोगों को संजय गाँधी नेशनल पार्क के भीतर स्थित जलाशयों में गणेश प्रतिमाओं को विसर्जित करने से रोकने का निर्देश देने की माँग की गई थी।
इस मामले पर महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील पूर्णिमा कंथारिया ने कहा कि याचिका यह साबित करने में विफल रही कि अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा कि पारिस्थितिकी और वन्य जीवों को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए वन विभाग के अधिकारी काफी सतर्क हैं।
“अगर आप कह रहे हैं कि अनुमति नहीं दी है और किसी ने खुद ही ऐसा कहा है तो आप बयान देते कि अनुमति नहीं है। समाचारों से तो पता चलता है कि अनुमति दी गई है। एक आम आदमी को क्या जानना चाहिए? यह एक सीधा संकेत है कि अनुमति माँगी गई थी और इसे नेशनल पार्क में मूर्ति विसर्जन की अनुमति दे दी गई है।”
बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने सरकारी वकील कंथारिया को स्पष्ट रूप से बयान देने के लिए कहा कि विसर्जन के लिए ना तो लिखित अनुमति दी गई और ना ही मौखिक आश्वासन दिया गया। इसलिए वह एक आदेश जारी करेंगे कि समाचारों को अनुमति के रूप में नहीं माना जाए।
कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नेशनल पार्क के प्रवेश द्वार के पास एक कृत्रिम तालाब स्थापित किया जाए और राज्य सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए वन विभाग हर संभव कदम उठाए। बॉम्बे हाई कोर्ट की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि समाचारों के कारण भ्रम पैदा हुआ है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग मूर्ति विसर्जन के लिए आ सकते हैं। इसलिए, वन्यजीवों को नुकसान से बचाने के लिए राज्य को अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करने की अनुमति दी गई है।
बॉम्बे हाई कोर्ट की पीठ ने साथ ही यह भी कहा, “यदि कुछ गलत बयान देकर जनता को गुमराह करने का कोई प्रयास किया जाता है तो राज्य सरकार कानून के प्रावधानों के तहत इस तरह की शरारत को रोकने के लिए उचित कदम उठा सकती है।” बता दें कि याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीनिवास पटवर्धन, एसआर नारगोलकर, केतन जोशी, अर्जुन कदम और सुदमन नारगोलकर पेश हुए थे।
भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे इस्लामी मुल्क कभी हिन्दुओं के लिए स्वर्ग से भी बढ़ कर हुआ करते थे, लेकिन आज यही मुल्क हिन्दुओं-सिखों के लिए नर्क से भी बदतर हैं। आज हम चर्चा करने वाले हैं पकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में स्थित कोहट की, जहाँ सितंबर 1924 में हुए दंगों में हिन्दुओं को पूरी तरह से निकाल बाहर किया गया। कट्टर मुस्लिम भीड़ ने इस इलाके का इस्लामीकरण कर दिया।
जिसे आज कहते हैं खैबर पख्तूनख्वा, उसका अलग ही है इतिहास
खैबर पख्तूनख्वा के बारे में बता दें कि आज भले ही ये पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम इलाके में स्थित एक प्रांत हो, लेकिन कभी ये चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। उससे पहले इसने सिकंदर के हमले को देखा था। भौगोलिक रूप से पाकिस्तान का ये सबसे छोटा प्रांत अफगानिस्तान से लगती उसकी सीमा पर स्थित है, जिसकी राजधानी पेशावर है। 1001 ईस्वी में महमूद गजनी का हाथों राजा जयपाल की हार के साथ ही इलाके में तुर्कों का अतिक्रमण शुरू हो गया था।
जयपाल ने खिन्न होकर आत्महत्या कर ली, लेकिन उसके बेटे आनंदपाल ने भी कई वर्षों तक इस्लामी फ़ौज को सिंधु पार करने से रोके रखा। 2017 की जनगणना में सामने आया था कि इस राज्य में हिन्दुओं की जनसंख्या मात्र 5392 है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का मात्र 0.015% है। हालाँकि, पाकिस्तान के हिन्दू संगठनों की मानें तो इससे 4 गुना अधिक हिन्दू यहाँ रहते हैं। इस आँकड़े को ले लें फिर भी ये जनसंख्या नगण्य ही कहलाएगी।
कभी सिंधु घाटी सभ्यता के लिए कारोबार का रूट रहा खैबर पख्तूनख्वा महाभारत काल में गांधार साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। आज जो पेशावर है, वो तब पुरुषपुर हुआ करता था। ये क्षेत्र तब पुष्कलावती का हिस्सा हुआ करता था। विद्या अर्जन के लिए इस क्षेत्र का एक अलग ही महत्व था। ऋग्वेद के दशराज युद्ध में यहाँ की पख्त जनजाति राजा सुदास के साथ लड़ी थी। इस्लामीकरण का प्रभाव देखिए, आज वहाँ पख्त नहीं, पख्तून हैं और वो मुस्लिम हैं।
इस तरह हमने देखा कि वहाँ हिन्दुओं का दमन तुर्की आक्रमणों के साथ ही शुरू हो गया था। अंग्रेजों के समय में भारत में जिन्नावादी विचारधारा ने जब जोर पकड़ना शुरू किया तो जगह-जगह देंगे होने लगे। खलीफा से भारत का कुछ लेनादेना नहीं था, लेकिन खिलाफत आंदोलन को महात्मा गाँधी ने समर्थन दिया और जगह-जगह दंगे हुए। आज़ादी के समय तो बंगाल और पंजाब के दंगों में तो लाखों मौतें हुईं और इससे कई गुना अधिक लोगों को पलायन करना पड़ा।
कोहट दंगा: जानिए किसने इसके बारे में क्या लिखा है
ऐसा ही एक दंगा 9 सितंबर, 1924 को हुआ था, जिसमें हिन्दुओं को इस इलाके से पलायन के लिए मजबूर कर दिया गया। इन दंगों में हिन्दुओं और सिखों की हत्याएँ हुईं, उनके घर लूट लिए गए और कइयों का जबरन इस्लामी धर्मांतरण करा दिया गया। ऊपर से 1924 में ‘मुस्लिम लीग’ के बॉम्बे सत्र में मौलाना मोहम्मद अली जौहर (जो 1923 में कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष थे) एक प्रस्ताव लेकर आए कि हिंसा हिन्दुओं ने शुरू की थी और उन्होंने मुस्लिमों को भड़काया।
बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने भी लिखा है कि एक कविता को इस्लाम विरोधी बताते हुए मुस्लिम भीड़ ने कहर बरपाया और कोहट की पूरी की पूरी हिन्दू सिख जनसंख्या को ये जगह छोड़नी पड़ी। उन्होंने मृतकों और घायलों का आँकड़ा 155 दिया है। 9-11 सितंबर तक 3 दिन लगातार ये दंगा चला था। इतिहासकार आरसी मजूमदार ने भी लिखा है कि मुस्लिम बहुल इलाके में हिन्दुओं की सारी दुकानों को लूट कर जला दिया गया।
इसके बाद पूरे शहर में मुस्लिम भीड़ ने कहर बरपाना शुरू कर दिया और हिन्दुओं के घरों को चुन-चुन कर आग के हवाले किया जाने लगा। कुछ हिन्दुओं ने आत्मरक्षा में फायरिंग की, लेकिन इसे भी भड़काऊ मान कर तबाही मचाना जारी रखा गया। 9 तारीख़ को सुबह से ही ये सब शुरू हुआ और दोपहर तक हिन्दुओं के घर और दुकानें धू-धू कर जल रहे थे। अंग्रेज अधिकारी भी मुस्लिम भीड़ को रोकने में नाकाम हुए। हिन्दुओं को वहाँ से हटाया जाने लगा।
महात्मा गाँधी ने इस घटना की जाँच के लिए शौकत अली के नेतृत्व में जो समिति बनाई थी, उसने भी लिखा है कि कैसे मुस्लिमों को कुछ नहीं सूझ रहा था और हिन्दुओं को बचा कर कैंटोनमेंट में नहीं लाया जाता तो कोई ज़िंदा नहीं बचता। जिन लोगों को खिलाफत आंदोलन के लिए नियुक्त किया गया था, उन्होंने भी मुस्लिम भीड़ के साथ हिन्दुओं पर क्रूरता में कोई कसर नहीं छोड़ी। कोहट में आसपास के इलाकों से भी हजारों की मुस्लिम भीड़ कहर बरपाने के लिए जमा हुई थी।
1921 की जनगणना की बात करें तो कोहट में मुस्लिमों की जनसंख्या 12,000 थी, वहीं इलाके में हिन्दू आधे से भी कम, 5000 थे। कारोबारों में हिन्दुओं का प्रभाव था और वो समृद्ध थे। इनमें से कई ‘आर्य समाज’ और ‘सनातन धर्म सभा’ के अनुयायी थे। एक तालाब को लेकर झगड़े को हिन्दू-मुस्लिम एंगल दिया गया। एक सरदार और एक मुस्लिम लड़की प्रेम में पड़ने के बाद साथ भाग गए, जिसके बाद मुस्लिम नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए। इस तरह हर घटना को सांप्रदायिक रंग देकर हिन्दुओं को वहाँ से भगाने की साजिश लंबे समय से चल रही थी।
मुस्लिम पत्रिका में गीता जलाने की बातें, हिन्दुओं ने जवाब दिया तो हुए दंगे
ये सारा मामला शुरू हुआ एक इस्लामी पत्रिका ‘लाहौल’ द्वारा छपी गई एक कविता से, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता को जलाने और भगवान श्रीकृष्ण की बाँसुरी को तोड़ डालने की बात की गई थी। इसमें मुस्लिमों को भड़काया गया था कि वो तलवार उठा कर हिन्दुओं पर टूट पड़ें और उनके अस्तित्व को मिटा कर उनकी देवियों को जला डालें। इसका जवाब देते हुए ‘सनातन धर्म सभा’ के जीवन दास ने ‘कृष्ण सन्देश’ नामक एक पत्र छपवाया, जिसमें काबा की जगह विष्णु मंदिर बनवाने की बात की गई थी और मुस्लिमों को अपना नमाज वाला चादर लेकर अरब वापस जाने की सलाह दी गई थी।
ध्यान दीजिए, मुस्लिमों ने हिन्दुओं और हिन्दू देवी-देवताओं को लेकर जो भड़काऊ बातें की थी और नरसंहार के लिए उकसाया था, उसके जवाब में ये तो कुछ भी नहीं था। ऐसे 1000 पैंपलेट बाँटे गए, जिसके बाद मुल्ला-मौलवी उन पर कार्रवाई के लिए अंग्रेज अधिकारियों से मिले। जीवन दास को गिरफ्तार किया गया, लेकिन फिर उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। हिन्दू समाज ने अपनी गलती मानी और माफ़ी भी माँग ली, लेकिन मुस्लिम समाज की माँग के हिसाब से उन्होंने पैंप्लेट्स को जलाया नहीं क्योंकि उन पर भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर थी।
मुस्लिमों की कविता और हिन्दू संगठन का जवाब, जिस पर भड़क गए कट्टरपंथी
इसके बाद मुल्ले-मौलवियों ने मस्जिदों का इस्तेमाल कर मुस्लिमों को भड़काना शुरू किया और उन्हें शरीयत का हवाला दिया। हाजी बहादुर मस्जिदों में मुस्लिमों ने खास खाई कि अपने मजहब को नहीं बचा सके तो अपनी बीवियों को तलाक दे देंगे। 8 सितंबर की रात से ही मुस्लिम भीड़ हथियारों के साथ सड़कों पर उतर आई थी। पहले मुस्लिम युवकों ने पत्थरबाजी शुरू की और सरदार माकन सिंह का घर जला डाला, जिनके बेटे के साथ मुस्लिम लड़की भागी थी।
आत्मरक्षा में हिंदुओं की तरफ से गोली चली, जिसमें एक पत्थरबाज की मौत के बाद तो जैसे मुस्लिम भीड़ को हिन्दुओं को निशाना बनाने का बहाना मिल गया। उस दिन रात को पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया, लेकिन अगले दिन 4000 की संख्या में मुस्लिम जुटे और पूरे हिन्दू मोहल्ले में आग लगा दी। एक सप्ताह तक उस आग को ठंडा होने में लग गए। 12 हिन्दू मार डाले गए और 13 गायब थे, जिनकी हत्या ही की गई थी।
महात्मा गाँधी ने उपवास कर के कर ली इतिश्री, मुहर्रम पर मिठाई बाँटते थे हिन्दू
अंग्रेजों को ऐसी घटनाओं से लाभ ही होता था और वो मुस्लिमों को अपनी तरफ ही मानते थे। इधर महात्मा गाँधी हमेशा की तरह उपवास पर बैठ गए और 21 दिन उपवास पर रहे, लेकिन उनके मन में भी ये बात थी कि वो हिन्दू-मुस्लिम एकता की लाख बातें कर के और खिलाफत का समर्थन कर के भी मुस्लिमों में सहिष्णुता नहीं पैदा कर पाए। कई मंदिरों को भी तोड़ा गया था और मूर्तियों को खंडित कर दिया गया था। दिसंबर 1924 में रावलपिंडी में गाँधी कोहट के हिन्दुओं से मिले और कहा कि जब तक मुस्लिम उन्हें ससम्मान वापस नहीं ले जाते, वो न लौटें। वहीं मुस्लिमों ने शौकत अली से मिलने से इनकार कर दिया।
ये दंगा उस इलाके में हुआ, जहाँ कभी मुहर्रम जैसे त्योहारों पर हिन्दू लोग मुस्लिमों के बीच मिठाई तक बाँटा करते थे। लेकिन, खिलाफत आंदोलन के कारण उलेमा-मौलवी मजबूत हो रहे थे और हिन्दुओं के बीच भी उनके प्रतिकार के लिए राष्ट्रवाद की भावना जागृत हो रही थी। मुस्लिम त्योहार बारावफात और सनातन त्योहार होली एक साथ पड़ने पर भी 1909 में भी कोहट में दंगे हुए थे। इस तरह सितंबर 1924 की पटकथा पहले से ही लिखी जा रही थी। इस्लाम में धर्मांतरण बढ़ता जा रहा था, इसीलिए हिन्दुओं में आक्रोश भी था।
कोहट दंगे का परिणाम ये हुआ कि बचने के लिए 3000 हिन्दुओं को एक बड़े मंदिर परिसर में शरण लेनी पड़ी। पुलिस आत्मरक्षा कर रहे हिन्दुओं से निपटने में ज्यादा सक्रिय थी, मुस्लिम भीड़ को लेकर कम। जिन हिन्दुओं ने घर छोड़ने से इनकार कर दिया, उन्हें मार डाला गया। जनवरी 1925 के बाद से सरकार के काफी प्रयासों के बाद एकाध हिन्दू वापस लौटने शुरू हुए। हिन्दू और मुस्लिम नेताओं के बीच एक समझौता हुआ, लेकिन अब इसका क्या फायदा था जब हिन्दुओं को निकाल बाहर ही किया गया था।
पंजाब के अमृतसर से हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ के एक व्यक्ति को बस इसलिए काट दिया गया, क्योंकि उसने एक निहंग की पगड़ी पर हाथ डाला था। युवक का नाम हरमनजीत सिंह बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि वो शराब के नशे में था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमृतसर में बुधवार (7 सितंबर, 2022) की रात गोल्डन टेंपल की तरफ जाने वाले रास्ते में हरमनजीत सिंह का दो निहंगों के साथ झगड़ा हो गया। झगड़े में एक निहंग सिख की पगड़ी (दस्तार) उतर गई और गुस्से में दो निहंगों और एक सिख युवक ने मिलकर युवक पर तलवार से हमला कर दिया। घटना में बुरी तरह घायल हरमनजीत की मौत हो गई।
दोनों निहंग सिखों का नाम चरणजीत सिंह और तरुणदीप सिंह बताया जा रहा है। वहीं इस पूरे घटनाक्रम में हमला करने वाले निहंगों के साथ में एक अन्य तीसरा व्यक्ति भी था। पुलिस ने उस तीसरे युवक को गिरफ्तार भी कर लिया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि जब ये तीनों लोग युवक पर धारदार हथियार से हमला कर रहे थे, तब आस-पास खड़ी भीड़ में से किसी ने भी रोकने का प्रयास तक नहीं किया।
मृतक तरनतारन रोड हरमनजीत सिंह चाटीविंड निवासी था। इस मामले में पुलिस में जानकारी दी है कि सीसीटीवी फुटेज को कब्जे में ले लिया गया है। पुलिस का कहना है कि निहंगों की पहचान की जा रही है और जल्द ही आरोपितों को पकड़ लिया जाएगा। पुलिस के अनुसार, निहंगों का यह कहना है कि वह व्यक्ति नशे की हालत गली में घूम रहा था और उसने इस पवित्र जगह पर तंबाकू चबाने का अपराध किया।
निहंगों के मुताबिक, इसी बात पर उन्हें गुस्सा आया। मृतक के परिजनों का कहना है कि शाम के समय किसी का फोन आने के बाद वह घर से निकला था, मगर लौटा नहीं। बता दें घटना की जानकारी पुलिस को लगने के जब पुलिस मौके पर पहुँची तो हमलावर घटनास्थल से फरार हो गए थे। पुलिस कमिश्नर अरुणपाल सिंह ने बताया कि घटना के बाद एक युवक को गिरफ्तार किया है। युवक की पहचान रमनदीप सिंह के रूप में हुई है।
कर्नाटक के शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को लेकर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (8 सितंबर 2022) को कहा कि हिजाब की तुलना और सिख की पगड़ी एवं कृपाण से नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि सिखों को संविधान में अनुमति दी गई है।
जस्टिस हेमंत गुप्ता की अगुवाई वाली सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने कहा कि इस्लाम से सिख की और हिजाब से सिख धर्म की प्रथाओं की तुलना करना बहुत उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सिख धर्म के ‘फाइव के’ – केश, कड़ा, कच्छा, कृपाण और कंघा का जिक्र किया।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि यह सिखों द्वारा कृपाण ले जाने की अनुमति देता है। इसलिए इन प्रथाओं की तुलना न करें, क्योंकि उन्हें 100 साल से भी पहले ही मान्यता दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उसे मान्यता दी है।
जस्टिस गुप्ता ने कहा, “पगड़ी आवश्यकता है। इस अदालत की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि सिखों के लिए पगड़ी पहनना और कृपाण रखना आवश्यक है। इसलिए हम कह रहे हैं कि सिख के साथ तुलना उचित नहीं हो सकती है। सिखों के 5K को अनिवार्य माना गया है।”
इस पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील निज़ाम पाशा ने तर्क दिया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब के मामले में भी ऐसा ही है। उन्होंने कहा, “सिखों के लिए 5K की तरह ही इस्लाम के भी 5 स्तंभ हैं।” निजाम पाशा ने हज, नमाज-रोज़ा, ज़कात, तौहीद और हिजाब को इस्लाम के पाँच बुनियादी स्तंभ बताया।
इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा, “कृपया सिख धर्म से तुलना न करें। यह पूरी तरह से भारतीय संस्कृति में रच-बस चुका है।” उन्होंने कहा कि 500 सालों से सिखों की ये पहचान भारतीय संस्कृति में समाहित हो चुकी है। इस पर पाशा ने कहा, “इसी तरह इस्लाम भी 1400 साल से है और हिजाब भी है।”
मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक केन्द्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर लगातार हमलावर हैं। कई बार उन्होंने, सार्वजनिक मंचों से सरकार के फैसलों की आलोचना की है। एक बार फिर उन्होंने एमएसपी को लेकर कानून न बनाए जाने और राजपथ का नाम बदलने समेत कई अन्य मुद्दों को लेकर सरकार पर टिप्पणी की है। उन्होंने यह भी कहा है कि वो अपना इस्तीफा जेब में डालकर घूम रहे हैं।
सत्यपाल मलिक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा, “यदि सरकार किसानों की एमएसपी की बात नहीं मानती है तो किसान और सरकार के बीच बड़ी लड़ाई होगी। मैं उस लड़ाई में राज्यपाल के पद से इस्तीफा देकर कूद पड़ूँगा। जब तक एमएसपी का कानून नहीं बनाया जाएगा किसानों की समस्याएँ कम नहीं होंगी।
उन्होंने यह भी कहा, “एमएसपी जब तक लागू ना हो और उसको कानूनी दर्जा ना मिले, तो दोबारा लड़ाई होगी और इस बार जबरदस्त लड़ाई होगी। देश के किसान को आप पराजित नहीं कर सकते है। उसे डरा नहीं सकते। उसके यहाँ ईडी नहीं भेज सकते। किसी इनकम टैक्स वाले को नहीं भेज सकते। उसको कैसे डराओगे, वो तो पहले से ही फकीर है। उसको तो वैसे ही कहीं का नहीं छोड़ा। इसलिए वो लड़ेगा और एमएसपी लेकर रहेगा।”
यही नहीं सत्यपाल मलिक सरकार द्वारा राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ किए जाने से भी असहमत दिखाई दिए। उन्होंने कहा, “राजपथ का नाम बदलने की मेरी दृष्टि में कोई जरूरत नहीं थी। यह कोई अंग्रेजों का दिया हुआ नाम नहीं था। चूँकि प्रधानमंत्री हर तीसरे दिन उद्घाटन करते हैं तो आज उन्होंने इसका भी कर दिया।”
मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने यह भी कहा, “इस्तीफा मेरी जेब में है यदि किसी को मेरी बात से दुख पहुँच रहा है, चोट पहुँच रही है तो मैं अपने पद से तुरंत हट जाऊँगा।” साथ ही उन्होंने, राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा के लिए उन्हें शुभकामनाएँ भी दीं हैं। मलिक ने कहा है राहुल गाँधी अच्छा काम कर रहे हैं।
हालाँकि, सत्यपाल मलिक ने इस्तीफे की बात तब कही है जबकि उन्हें रिटायर होने में एक महीने से भी कम का समय बचा है। मलिक, आगामी 30 सितंबर को मेघालय के राज्यपाल पद से रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में, यदि वह रिटायर होने से पहले इस्तीफा भी दे देते हैं तो आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।
भारत में बैठे कुछ बुद्धिजीवी आज पाकिस्तान और पाकिस्तान में बैठे कट्टरपंथीयों के लिए प्रेम व भाईचारे की बातें करते हैं। उन सभी लोगों को हम आज 1934 की उस घटना के बारे में बताना चाहते हैं, जिसे ‘गंगा-जमुनी तहबीज’ के नीचे सालों पहले दबा दिया गया था और अब तक दबाए रखा गया। यह घटना कराची के एक मुस्लिम जमींदार और हिंदू बनिया की मौत की है।
इस घटना की चर्चा इतने सालों के बाद तब शुरू हुई, जब सोशल मीडिया पर एक समाचार क्लिपिंग वायरल होने लगी। इस समाचार क्लिपिंग में कराची के हिंदू बनिया साहूकार और मुस्लिम जमींदार के बीच हुए विवाद का जिक्र है, जिसमें बनिया को एक गाय की हत्या करने को कहा गया था। सोशल मीडिया पर क्लिपिंग को ‘धनी मारवाड़’ यूजर आईडी से शेयर किया गया है।
Sindh, 1934: Forced by a Muslim Zamindar to settle the dues by either burning the account books or killing a cow, Bania chose to settle the dues by killing three people, including the Muslim Zamindar. pic.twitter.com/Tj5pXPMeuV
इसी समाचार क्लिपिंग के अनुसार, कराची के एक बनिया साहूकार ने एक मुस्लिम जमींदार को कुछ पैसे उधार दिए। इसे वापस लेने के लिए जब बनिया जमींदार के पास गया तो उसने बनिया से एक गाय की तलवार से हत्या करने को कहा। मगर बनिया ने गाय की हत्या नहीं की, बल्कि उस मुस्लिम जमींदार को ही चाकू मार दिया।
जमींदार पर अचानक हुए इस हमले से उसकी मौत हो गई, वहीं बनिया ने जमींदार की हत्या करने के बाद उसके दो आदमियों को भी मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद हिंदू बनिया ने आत्मसमर्पण कर दिया, लेकिन गोहत्या नहीं की। (ऑपइंडिया इस घटना की ऑपइंडिया पुष्टि नहीं करता है)
गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर लोगों की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। एक यूजर ने इसको लेकर कॉन्ग्रेस पर ही सवाल खड़ा किया और लिखा, “1947 में कॉन्ग्रेस ने इस तरह के बनियों को छोड़ दिया। सिंध का विभाजन होना चाहिए था, या एक हिस्सा जोधपुर राज्य में मिला दिया जाना चाहिए था, जैसा कि महाराजा ने माँग की थी।”
Banias like this were abandoned by the Congress in 1947.
Sindh should have been partitioned, or a portion merged with Jodhpur state, as was demanded by the Maharaja.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (8 सितंबर, 2022) को राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट के समीप स्थित भव्य और आकर्षक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा का अनावरण कर दिया। ये अनावरण समारोह बेहद खास रहा। प्रतिमा का अनावरण ‘आजाद हिंद फौज’ के पारंपरिक गीत ‘कदम, कदम बढ़ाए जा’ की धुन के बीच किया गया।
नेताजी सुभाष चंद्र बॉस ने ही अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध स्वतंत्रता से पहले ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन किया था। ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर श्रेष्ठ भारत और अनेकता में एकता की भावना को प्रदर्शित करने के लिए भारत के हर कोने से आए 500 नर्तकों द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया।
अनावरण समारोह को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “आज एक नई प्रेरणा और ऊर्जा मिली है। आज हम बीते हुए कल को छोड़कर आने वाले कल की तस्वीर में नए रंग भर रहे हैं। आपको हर तरफ यह नई आभा दिख रही है। यह नए भारत के आत्मविश्वास की आभा है। आज से किंग्सवे हमेशा के लिए मिट गया। मैं गुलामी की एक और पहचान से मुक्ति के लिए बधाई देता हूँ। आज इंडिया गेट के समीप राष्ट्रनायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित हुई है। जहाँ कभी जॉर्ज पंचम की प्रतिमा थी, आज उसी स्थान पर नेताजी की प्रतिमा लगाकर आधुनिक और सशक्त भारत की प्राण प्रतिष्ठा कर दी है।”
पीएम मोदी ने आगे कहा कि आजादी के साथ ही हमारे महानायक को भुला दिया गया और उनके प्रतीकों को नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने याद किया कि उन्हें सुभाष बाबू की जन्मजयंती पर उनके घर जाने का मौका मिला था, जहाँ उन्होंने उनकी अनंत ऊर्जा को महसूस किया। पीएम मोदी ने कहा कि आज देश का प्रयास है कि नेताजी की वह ऊर्जा देश का पथ प्रदर्शन करे। बकौल पीएम मोदी, ‘कर्तव्य पथ’ पर नेताजी की प्रतिमा इसका माध्यम बनेगी।
उन्होंने कहा कि देश की नीतियों में सुभाष बाबू की छाप रहे, यह प्रतिमा इसके लिए प्रेरणास्रोत बनेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि नेताजी सुभाष अखंड भारत के पहले प्रधान थे, जिन्होंने 1947 से भी पहले अंडमान को आजाद करके भारत का झंडा लहराया था। पीएम मोदी ने याद किया कि ‘आजाद हिंद ‘सरकार के 75 वर्ष होने पर उन्हें लाल किले पर तिरंगा लहराने का सौभाग्य मिला था। उन्होंने बताया कि वर्तमान सरकार के प्रयास से लाल किले में नेताजी और आजाद हिंद फौज से जुड़ा म्यूजियम बनाया गया।
पीएम मोदी ने कहा कि जब 2019 में गणतंत्र दिवस की परेड में आजाद हिंद फौज के सिपाहियों ने हिस्सा लिया था, वह क्षण भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि जिन द्वीपों के नाम अंग्रेजी शासकों के नाम पर थे, उनकी सरकार ने उनके नाम बदलकर भारत की पहचान दी। उन्होंने ‘पंच प्रण’ की चर्चा करते हुए कहा कि इन पंच प्रणों में कर्तव्यों की प्रेरणा है, इसमें गुलामी की मानसिकता की त्याग का आह्वान है, अपनी विरासत पर गर्व की अनुभूति है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर ये भी कहा कि आज भारत के संकल्प अपने हैं, लक्ष्य अपने हैं, आज हमारे पथ अपने हैं और प्रतीक अपने हैं। उन्होंने कहा कि आज अगर राजपथ का अस्तित्व समाप्त होकर कर्तव्य पथ बना है और आज अगर जॉर्ज पंचम के निशान को हटाकर नेताजी की मूर्ति लगी है तो यह गुलामी की मानसिकता की त्याग का पहला उदाहरण नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह ना तो शुरुआत है और ना ही अंत है।
PM मोदी ने कहा, “हमने रेसकोर्स मार्ग को ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया। नेशनल वॉर मेमोरियल बनाया गया। यह बदलाव केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की समृतियों का हिस्सा बन चुका है। भारतीय बजट में बदलाव किया गया। हमें सर्वश्रेष्ठ भारत का निर्माण करना है। इसका रास्ता ‘कर्तव्य पथ’ से होकर जाता है। यह सर्वकालिक आदर्शों का जीवंत मार्ग है। यहाँ जब देश के लोग आएँगे और नेताजी की प्रतिमा, नेशनल वॉर मेमोरियल देखेंगे तो उन्हें कर्तव्यबोध से ओतप्रोत करेंगे। इसी स्थान पर देश की सरकार काम कर रही है। आप कल्पना करिए देश ने जिन्हें देश की सेवा का दायित्व सौंपा हो, उन्हें देश का सेवक होने का अहसास कैसे कराता। अगर पथ ही राजपथ हो तो लोगों को अहसास कैसे होता। राजपथ ब्रिटिश राज के लिए था। इसकी संरचना भी गुलामी की प्रतीक थी। आज इसकी संरचना भी बदल गई और आत्मा भी बदल गई। अब देश के सांसद, मंत्री और अधिकारी इस पथ से गुजरेंगे तो देश के प्रति कर्तव्य का बोध होगा।”
पीएम मोदी ने श्रमजीवीयों से कही ये बात
इस अनावरण समारोह में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रमजीवीयों से भी बातचीत की। वहीं उन्होंने इस दौरान श्रमजीवीयों से कहा कि वह 26 जनवरी गणतंत्र दिवस परेड के लिए सेंट्रल विस्टा के पुनर्विकास परियोजना पर काम करने वाले सभी लोगों को आमंत्रित करेंगे।
आपको बताते चलें कि मूर्तिकारों ने 26,000 घंटे के अथक कलात्मक प्रयासों से विशाल ग्रेनाइट पत्थर को तराश कर 65 मीट्रिक टन वजन की इस प्रतिमा को तैयार किया है। काले रंग के ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित 28 फुट ऊँची यह प्रतिमा इंडिया गेट के समीप एक छतरी के नीचे स्थापित की जाएगी। संस्कृति मंत्रालय ने बुधवार (7 सितंबर 2022) को इसकी जानकारी दी।
गौरतलब है कि आज ही दिन को ओर खास बनाने के लिए राजपथ का भी नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ किया गया है। यह इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन को जोड़ता है। इस सड़क के दोनों तरफ लॉन को विकसित किया गया है। हरियाली के साथ-साथ पैदल चलने वालों के लिये 15.5 किलोमीटर लंबा लाल ग्रेनाइट पत्थरों से बना पैदल पथ इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाता है।
देश भर से अब लव जेहाद (Love Jihad) की सच्चाई खुलकर सामने आने लगी है। उत्तराखंड के रुद्रपुर में शाहरुख नाम का शख्स अपनी पहचान छुपाकर दोस्ती की, उसके बाद बात नहीं मानने पर युवती को दुमका के अंकिता जैसी जलाकर मारने की धमकी दी।
उत्तराखंड में उधमसिंह नगर के रुद्रपुर में पुलिस ने 24 साल के शाहरुख को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उसके पास से दो आधार कार्ड बरामद किया है। गौरतलब है कि अंकिता झारखंड के दुमका जिले की रहने वाली एक नाबालिग छात्रा थी। उस पर शाहरुख नाम का शख्स दोस्ती का दबाव डालता था। जब लड़की ने बात नहीं मानी तो उस पर पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया।
पुलिस के अनुसार, महिला ने अपनी शिकायत में बताया कि गदरपुर थाना क्षेत्र में अपने भाई के साथ रहती है। उसके माता-पिता का निधन हो चुका है। एक साल पहले उसके भाई ने घर में सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे। उस दौरान कैमरा लगाने आए शाहरुख ने अपना परिचय गदरपुर के रहने वाले राजकुमार के रूप में दिया था।
इसके बाद उसने महिला से पहचान बढ़ानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे दोनों की फोन पर बातचीत होने लगी। बाद में पता चला कि इंस्टॉल करने आए आरोपित शाहरुख ने घर के कैमरों को अपने मोबाइल से भी कनेक्ट कर लिया था।
कुछ समय बाद में महिला को पता चला कि उसका असली नाम राजकुमार नहीं, शाहरुख है। महिला ने यह भी बताया कि वह लव जिहाद गैंग का सदस्य है और पहले भी कई हिंदू लड़कियों की जिंदगी बर्बाद कर चुका है। इसके बाद उसने शाहरुख का फोन उठाना बंद कर दिया।
महिला का कहना है कि जब आरोपित से उसने बात करना बंद कर दिया तो शाहरुख उसे ब्लैकमेल कर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगा। वह उसका पीछा भी करता था। वह झारखंड की अंकिता की तरह अंजाम भुगतने की धमकी देने लगा। वह युवती को जिंदा जलाने की धमकी देने लगा।
महिला ने अपनी शिकायत में कहा कि शाहरुख उसे धमकी दे रहा था कि अगर मिलने नहीं आई तो घर आकर वह उसकी हत्या कर देगा। इसके बाद बाद महिला उसके बताए समय के अनुसार बुधवार (7 सितंबर 2022) को 9 बजे गाबा चौक आई तो शाहरुख ने उसके साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी और साथ चलने का दबाव भी बनाने लगा। महिला का कहना है कि जब उसने शोर मचाया तो शाहरुख वहाँ से भाग गया।
महिला की शिकायत पर पुलिस ने शाहरुख के खिलाफ IPC की धारा 153ए, 323, 354, 354 ए, 354 डी, 417, 420, 504, 506 और 386 के तहत FIR दर्ज कर ली है। उसके बाद उसकी गिरफ्तारी के लिए टीम गठित की गई।
उधमसिंह नगर जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) मंजूनाथ टीसी ने बताया कि पुलिस की टीम ने आरोपित शाहरुख को काशीपुर रोड से गिरफ्तार कर लिया।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की है। हाल ही में हुए एक इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि पीएम मोदी बेहद शानदार काम कर रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप ने इस इंटरव्यू में कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के साथ मेरे संबंध अच्छे रहे हैं। मोदी और मैं अच्छे दोस्त थे और आज भी हैं। मुझे लगता है कि मोदी बहुत शानदार व्यक्ति हैं और भारत के लिए बेहतरीन काम कर रहे हैं। उनके पास जो जवाबदारी है, वह आसान नहीं है। हम एक-दूसरे को बहुत लंबे समय से जानते हैं। मोदी एक अच्छे इंसान हैं।”
उन्होंने यह भी कहा ” मेरे कार्यकाल के दौरान भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते सबसे ज्यादा मजबूत हुए। मुझे लगता है कि भारत के पास मुझसे अच्छा दोस्त कभी नहीं रहा। ये उन रिश्तों में से एक है, जिन्हें मैंने मजबूत बनाया।”
इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2024 में अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों को लेकर भी टिप्पणी की। ट्रंप ने कहा, “हर कोई यह चाहता है कि मैं चुनाव (राष्ट्रपति चुनाव) लड़ूँ। कई सारे सर्वे में मैं आगे भी हूँ। इस बारे में मैं जल्द ही कोई फैसला लूँगा।”
इस इंटरव्यू के दौरान, भारत और अमेरिका की प्राथमिकताओं पर बात करते हुए ट्रंप ने कहा पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत अच्छा कर रहा है। उन्होंने कहा, “हालाँकि, मैं केवल अमेरिका की प्राथमिकताओं के बारे में बात कर सकता हूँ। अमेरिका के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता ऊर्जा है, इस मामले में हमें आत्मनिर्भर होना है। हमारी अर्थव्यवस्था अभी बेहद सुस्त पड़ी है, उसे फिर से मजबूत बनाना होगा।”
गौरतलब है, पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों के बारे में पूरी दुनिया को पता है। अमेरिका में जब, ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम हुआ था, तब इस रैली में दोनों नेताओं ने एक साथ मंच साझा किया था। इस रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे की तर्ज पर अमेरिका में चल रहे ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ नारे का जिक्र भी किया था। यही नहीं, इसके बाद जब ट्रंप भारत आए थे तब भी अहमदाबाद में पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप एक ही मंच पर थे। इस कार्यक्रम को पूरी दुनिया ने कवरेज मिली थी।