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बौद्ध-जैन मंदिरों के बीच दरगाह बनाई, जिस मजार को पुलिस ने किया ध्वस्त… वो फिर चकमकाई: नेपाल सीमा पर बढ़ती मुस्लिम आबादी – OpIndia Ground Report

हाल में कई रिपोर्टें आई हैं जो बताती हैं कि नेपाल-भारत सीमा पर तेजी से डेमोग्राफी में बदलाव हो रहा है। मस्जिद-मदरसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए 20 से 27 अगस्त 2022 तक ऑपइंडिया की टीम ने सीमा से सटे इलाकों का दौरा किया। हमने जो कुछ देखा, वह सिलसिलेवार तरीके से आपको बता रहे हैं। इस कड़ी की छठी रिपोर्ट:

बौद्धों की आस्था के मुख्य केंद्रों में से एक है श्रावस्ती। यहीं है अंगुलिमाल गुफा। इसी गुफा से लगभग सटी है मीरा शाह नाम की एक बड़ी दरगाह। बौद्धों वाली जगह पर दरगाह का क्या काम? इसी सवाल को टटोलने के लिए हमने दरगाह के खादिम और संरक्षक के साथ वहाँ मौके पर मौजूद लोगों से उस जगह के बारे में जानने का प्रयास किया।

यह रिपोर्ट एक सीरीज के तौर पर है। इस पूरी सीरीज को एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भारत के साथ-साथ नेपाल के भी आते हैं जायरीन

दरगाह के संरक्षक मुश्ताक अहमद ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि हर जुम्मेरात को दरगाह पर भारी भीड़ लगती है। इसी के साथ उन्होंने कहा कि हर साल माघ महीने की बसंत पंचमी (मतलब हर साल सरस्वती पूजा के दिन) को मज़ार पर साला उर्स भी लगता है।

मुश्ताक अहमद के मुताबिक इस दिन न सिर्फ भारत के कोने-कोने से बल्कि नेपाल से भी हजारों जायरीन दरगाह पर जुटते हैं। इनमें हिन्दू और मुस्लिम सभी होते हैं। अहमद के अनुसार इस भीड़ को कंट्रोल करने के लिए प्रशासन अपने स्तर से होमगार्ड आदि की तैनाती करता है।

पक्की बॉउंड्री से घिरी दरगाह

सालार गाज़ी से जुड़ी है दरगाह

मुश्ताक ने हमें आगे बताया कि मीरा शाह की दरगाह बहराइच के सालार गाज़ी वाली दरगाह से कनेक्टेड है। सालार गाज़ी को सरकार कहते हुए मुश्ताक ने कहा कि जब से बहराइच की दरगाह शरीफ है, तब से ये भी मजार यहीं हैं।

मुश्ताक अहमद ने दरगाह को वक्फ बोर्ड से रजिस्टर्ड और बाकायदा एक कमिटी द्वारा संचालित बताया। उन्होंने दरगाह के सदर जव्वाद और नायब सदर मुश्ताक रज़ा को बताया। दरगाह के ऊपर इस्लामी झंडे लगे हैं।

दरगाह के ऊपर हरे-लाल झंडे

दरगाह को मिले बौद्ध और जैन मंदिरों जैसी सुविधाएँ

बौद्धों के धर्मस्थलों पर सुरक्षा और अन्य जनसुविधाओं का जिक्र करते हुए दरगाह के संरक्षक मुश्ताक़ ने कहा कि उन्हें सब कुछ मिला है लेकिन दरगाह को कुछ भी नहीं। मुश्ताक के मुताबिक वहाँ कोई आता है तो खुले में सोता है और दरगाह कमिटी पूरी व्यवस्था करती है।

मुश्ताक अहमद ने कहा कि काफी दिन सुनवाई के बाद भी दरगाह को कुछ नहीं मिला है, इसलिए उन्होंने अब वक्फ बोर्ड को बताया है और वक्फ बोर्ड सरकार से ये सब सुविधाएँ माँगेगा। उनके मुताबिक दरगाह की पक्की बॉउंड्री और अंदर तमाम जनसुविधाओं की मॉंग सरकार को पूरी करनी चाहिए। मुश्ताक ने दरगाह से 200 मीटर की दूरी पर एक जैन मंदिर भी बताते हुए उसे सभी सरकारी सुविधाओं से पूर्ण बताया।

सरकारी नल गाँव वालों के लिए, लगा दिया दरगाह में

जब हमने दरगाह में लगे बल्बों के जलने के बारे में सवाल किया तब मुश्ताक अहमद ने कहा कि उन्हें सरकार ने अभी तक लाइट नहीं दी है। मुश्ताक के मुताबिक दरगाह कमिटी ने खुद से सोलर लाइट लगवा लिया है।

इसके अलावा दरगाह कैम्पस में 4 सरकारी नल और गाँव में प्रयोग होने वाली सरकारी डस्टबिन दिखने पर मुश्ताक ने खुद को हुसैनजोत गाँव का पूर्व प्रधान प्रतिनिधि बताया और लगे नल और डस्टबिन को उसी गाँव के लिए आए सामान से लगा बताया। दरगाह पर पानी का समर्सिबल चलाने के लिए जेनरेटर भी लगा है।

हैंड पंप

बसपा सांसद ने दिया है दरगाह को सुविधाएँ दिलाने का भरोसा

दरगाह के संरक्षक अहमद को बहुजन समाज पार्टी (BSP) के स्थानीय सांसद राम शिरोमणि वर्मा ने काफी भरोसा दिया है। मुश्ताक के मुताबिक बसपा सांसद ने उन सभी को भरोसा दिया है कि वो दरगाह को तमाम सुविधाएँ शासन स्तर से दिलवाने में पूरी मदद करेंगे। हालाँकि मुश्ताक ने उनके द्वारा लम्बे समय से किए गए वादे पर अमल न करने पर अफसोस जताते हुए कहा कि वो सभी एक बार और उन्हें वादा याद दिलाने जाएँगे।

दरगाह में औरतों के जाने की इजाजत नहीं

मीरा शाह दरगाह के खादिम जव्वाद अली ने हमें बताया कि शरीयत के मुताबिक दरगाह में औरतों का जाना प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि बोर्ड लगा दिया गया है लेकिन फिर भी कई महिलाएँ अंदर चली जाती हैं। जब हमने उनसे सवाल किया कि क्या शरीयत कानून को तोड़ कर जो महिलाएँ अंदर चली जाती हैं, उनकी मुराद पूरी होगी? इस पर उनका जवाब था – “बेशक पूरी होगी।”

दरगाह के अंदर जाती महिला

भगवा गमछे में मौलाना

एक खास बात जो हमने इस मज़ार पर देखी, वो ये थी कि मजार के संरक्षक अहमद ने जिस हिन्दू श्रद्धालु को हमसे बात करने के लिए आगे किया, वो भगवा वस्त्रों में था। वह अपना नाम हरिहर बाबा बता रहा था और खुद को मीरा शाह दरगाह का भक्त बता रहा था। इसी के साथ एक अन्य मौलना जैसा दिख रहा व्यक्ति गले में भगवा गमछा डाल रखा था।

दरगाह के संरक्षक मुश्ताक (चश्मे में) और पीछे भगवा गमछे में एक मौलाना

पुरातत्व विभाग को अलर्ट, टूटी मजार फिर ‘पनपी’

ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक साल 2018 में श्रावस्ती पुलिस ने लिखित तौर पर पुरातत्व विभाग को क्षेत्र में बढ़ रही इबादतगाहों के बारे में अलर्ट भेजा था। उस अलर्ट पर पुरातत्व विभाग द्वारा क्या कार्रवाई हुई, ये जानकारी अभी नहीं मिल पाई है और उसे आते ही अपडेट किया जाएगा।

जानकारी यह भी मिली कि इस दरगाह के पास सड़क से सटा कर बनी मज़ार को साल 2020 में जिला प्रशासन ने ध्वस्त करवा दिया था। हालाँकि अब ध्वस्त करवाई गई मज़ार फिर से बन चुकी है और वहाँ भीड़ लगना भी चालू हो गया है।

पढ़ें पहली रिपोर्ट : कभी था हिंदू बहुल गाँव, अब स्वस्तिक चिह्न वाले घर पर 786 का निशान: भारत के उस पार भी डेमोग्राफी चेंज, नेपाल में घुसते ही मस्जिद, मदरसा और इस्लाम – OpIndia Ground Report

पढ़ें दूसरी रिपोर्ट : घरों पर चाँद-तारे वाले हरे झंडे, मस्जिद-मदरसे, कारोबार में भी दखल: मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही नेपाल में कपिलवस्तु के ‘कृष्णा नगर’ पर गाढ़ा हुआ इस्लामी रंग – OpIndia Ground Report

पढ़ें तीसरी रिपोर्ट : नेपाल में लव जिहाद: बढ़ती मुस्लिम आबादी और नेपाली लड़कियों से निकाह के खेल में ‘दिल्ली कनेक्शन’, तस्कर-गिरोह भारतीय सीमा पर खतरा – OpIndia Ground Report

पढ़ें चौथी रिपोर्ट : बौद्ध आस्था के केंद्र हों या तालाब… हर जगह मजार: श्रावस्ती में घरों की छत पर लहरा रहे इस्लामी झंडे, OpIndia Ground Report

पढ़ें पाँचवीं रिपोर्ट : महाराणा प्रताप के साथ लड़ी थारू जनजाति बहुल गाँव में 3 मस्जिद, 1 मदरसा: भारत-नेपाल सीमा पर बढ़ती मुस्लिम आबादी का ये है ‘पैटर्न’ – OpIndia Ground Report

जुड़वा बच्चे, दोनों के पिता अलग-अलग: 19 साल की युवती ने 1 दिन में 2 पुरुषों से किया था सेक्स, 9 महीने बाद हुआ हैरान कर देने वाला वाकया

ब्राजील की एक महिला के साथ हैरान कर देने वाला वाकया हुआ है। जुड़वा बच्चों को जन्म देने वाली 19 वर्षीय महिला का दावा कि उसके दोनों बच्चों के दो अलग-अलग पिता हैं। ‘ग्लोबो’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गोआस (Goias) के मिनेरियोस (Minerios) की रहने वाली अज्ञात महिला ने एक ही दिन में दो पुरुषों के साथ सेक्स किया और नौ महीने बाद उसने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। महिला को अपने जुड़वा बच्चों के पिता को लेकर संदेह हुआ, तो उसने इसकी पुष्टि के लिए डीएनए टेस्ट कराया।

महिला उस वक्त दंग रह गई, जिस वक्त DNA टेस्ट की रिपोर्ट आई, क्योंकि यह रिपोर्ट चौंकाने वाली थी। वह जिसे अपने बच्चों का पिता मान रही थी, उस व्यक्ति का डीएनए केवल एक बच्चे के साथ ही मैच हुआ। यानी, वह शख्स केवल एक ही बच्चे का पिता निकला। महिला ने बताया कि दो अलग-अलग पुरुषों द्वारा गर्भधारण करने के बावजूद दोनों बच्चे काफी हद तक एक जैसे दिखते हैं।

महिला ने दूसरे पुरुष को भी DNA टेस्ट के लिए बुलाया, जिसके साथ उसने सेक्स किया था। दूसरे बच्चे से उसका डीएनए मैच हो गया। महिला ने बताया कि वह इन परिणामों से बेहद हैरान थी, क्योंकि उसे नहीं पता था कि ऐसा भी हो सकता है। दो अलग-अलग पिता के बच्चे एक जैसे दिख सकते हैं।

बता दें कि यह एक दुर्लभ स्थिति है, लेकिन पूरी तरह से असंभव नहीं है। इसमें जुड़वा बच्चों में अलग-अलग पिता का DNA पाया जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘हेट्रोपैरेंटल सुपरफेक्यूंडेशन (Heteroparental Superfecundation)’ नाम दिया गया है। डॉक्टर टुलियो जॉर्ज फ्रेंको के मुताबिक, दस लाख में से किसी एक मामले में हेट्रोपैरेंटल सुपरफेक्यूंडेशन की स्थिति बनती है। उस वक्त माँ के शरीर में मौजूद अंडे दो अलग-अलग पुरुषों के जरिए फर्टिलाइज हो जाते हैं।

वहीं, महिला ने भी यह बात स्वीकार की है कि उसने दो अलग-अलग पुरुष के साथ सम्बंध बनाए थे। यही बच्चों में अलग-अलग डीएनए की वजह बने हैं।

‘मुस्लिम भीड़ ने काट डाला था मेरे दादा का गला’: योगेंद्र यादव उर्फ़ ‘सलीम’ को है गर्व, अब राहुल गाँधी की कंटेनर यात्रा में घूम रहे

संगठन ‘स्वराज इंडिया पार्टी’ के संस्थापक योगेंद्र यादव का एक वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में योगेंद्र यादव कहते दिख रहे हैं कि उनके दादा को मुस्लिमों की भीड़ ने मार डाला था। इस वीडियो को लेकर लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

इस वीडियो में योगेंद्र यादव ने कहा है कि उनके दादा मुस्लिमों की ‘मॉब लिंचिंग’ का शिकार हुए थे। तब, उनके दादा का मुस्लिमों की भीड़ ने गला काट दिया था।

योगेंद्र यादव ने कहा है, “जैसे मैं अपने दादा के बारे में कहता हूँ कि मेरे दादाजी ने मुस्लिमों की भीड़ से कहा तुम इन बच्चों को मार नहीं सकते। ये मेरे बच्चे हैं, मेरा गला काट लो… और उस भीड़ ने मेरे दादा का गला काट दिया था। आज मैं उनका पोता गर्व से यह बात कहता हूँ। वैसे ही मैं चाहता हूँ मेरी आने वाली पीढ़ी ये कह सके हाँ मेरा दादा लड़ा था।”

योगेंद्र यादव के दादा की हत्या मुस्लिमों की भीड़ ने की थी, यह जानते हुए भी वह लगातार मुस्लिमों के पक्ष में और हिन्दुओं के विरोध में बोलते रहे हैं। ज्ञानवापी के मुद्दे पर हिन्दुओं से बदला लेने की बात इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

यही नहीं, योगेंद्र यादव पर कई बार खुले मंच से मुस्लिमों को भड़काने के आरोप भी लग चुके हैं। खासतौर से उमर खालिद की गिरफ्तारी के बाद योगेंद्र यादव ने मुस्लिमों को उकसाने वाले कारनामे किए हैं। योगेंद्र ने अपने एक लेख में कहा था “उमर खालिद की गिरफ्तारी के बाद अब मुसलमानों को भारत में लड़ने के लिए लोकतांत्रिक तरीके काफी नहीं हैं। मुस्लिमों की नई पीढ़ी को अब गैर लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।”

इसके अलावा, उन्होंने एक रैली में बताया था, “जब मेरे दादाजी की हत्या कर दी गई थी, उसके बाद मेरे पिता ने मेरा नाम सलीम, मेरी बहन का नाम नजमा रखा था। मेरे करीबी दोस्त, मेरा परिवार और मेरी पत्नी अब भी मुझे सलीम कहते हैं। यह मेरे परिवार का एक गुप्त रहस्य माना जाता था।”

योगेंद्र यादव के इस वीडियो के सामने आने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया सामने आयी है। श्यामल उपाध्याय नामक ट्विटर यूजर ने लिखा ” और ये आज तक उनसे डरा हुआ है….अब समझ में आया इस का मुस्लिम प्रेम का कारण।”

वहीं, अतुल पाण्डेय नामक यूजर ने लिखा “सलीम मियाँ, तुम क्या हो सब जानते हैं।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “आजकल सलीम अपने फिरोज खान अंकल के पोते को प्रधानमंत्री बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है।” बता दें कि अब योगेंद्र यादव कॉन्ग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को सफल बनाने के लिए सक्रिय हैं। वो राहुल गाँधी के साथ घूम रहे हैं, सोशल मीडिया में इस यात्रा के लिए प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और भीड़ जुटाने में मदद कर रहे हैं।

‘ये हिंदू हैं, इन्हें मार डालो’: अवैध मदरसा संचालक ने गुर्गों से कहा – धारदार हथियार लेकर आओ… जिन रिपोर्टर-कैमरामैन को बनाया बंधक, जानिए उनकी आपबीती

देश की राजधानी दिल्‍ली के निजामुद्दीन इलाके में बने अवैध मदरसा जामिया अरबिया में 5 दिन पहले ‘हेडलाइंस इंडिया’ के रिपोर्टर और कैमरामैन को बंधक बनाकर मारपीट की गई थी। इस मदरसे को इलाके का कट्टरपंथी तौफील खान चलाता है। स्‍थानीय लोगों के मुताबिक, यह जमीन ‘लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस’ की है, जिस पर अवैध रूप से मदरसा चल रहा है। कोर्ट ने इस जमीन का सर्वे कराने के आदेश भी LnDO को दिए हैं।

इसी बात की जानकारी लेने और तौफील खान का पक्ष लेने ‘हेडलाइंस इंडिया’ के रिपोर्टर और कैमरामैन मौके पर पहुँचे थे। तौफील और उसके बेटों ने पहले तो रिपोर्टर विनोद शर्मा और कैमरामैन को कागजात दिखाने के बहाने ऑफिसनुमा घर में बुलाया। फिर दोनों को बंधक बना लिया। यही नहीं, कैमरा बंद करके दोनों के साथ मारपीट की। अवैध मदरसा संचालक ने अपने गुर्गों से कहा कि चापड़ (एक प्रकार का धारदार हथियार) लेकर आओ। इस तरह से दोनों को जान से मारने को लेकर धमकाया गया। साथ ही हिंदू होने पर तौफील और उसके साथियों ने गाली-गलौज की।

अवैध मदरसे के संचालक तौफील और उसके साथियों की मारपीट से घायल रिपोर्टर विनोद शर्मा और कैमरामैन तुषार शर्मा ने जो कहानी सुनाई, आप पर वह सुनेंगे तो होश उड़ जाएँगे, कि कैसे एक रिपोर्टर के हिंदू होने पर अवैध मदरसा संचालक उन्हें जान से मारने को आमादा हो गया।

समझिए पूरा घटनाक्रम, ‘हेडलाइंस इंडिया’ के रिपोर्टर विनोद शर्मा की जुबानी

हम लोगों को खबर मिली थी कि दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में एलएंडडीओ की जमीन पर एक अवैध मदरसा संचालित हो रहा है। कोर्ट ने तीन साल पहले इस जमीन पर सर्वे कराने के आदेश भी दिए थे, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इसी हकीकत को टटोलने मैं अपने कैमरामैन तुषार के साथ गया था। यह अवैध मदरसा निजामुद्दीन इलाके में DPS स्‍कूल के पास में है। इसका नाम ‘मदरसा जामिया अरबिया’ है।

मैं जैसे ही मदरसे के कैंपस में पहुँचा तो देखा कि यह करीब 2 हजार गज से ज्‍यादा की जमीन है, जिस पर मदरसे के नाम पर मकान बनाए गए हैं, जिनमें कई परिवार रहते हैं। हमारी मुलाकात अवैध मदरसे के संचालक तौफील खान से हुई। वह ही इसे संचालित करता है। हमने कैमरा ऑन करके तौफील से जमीन के बारे में सवाल पूछने शुरू किए। वह किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे सका। मैंने पूछा- क्‍या यह जमीन एलएंडडीओ की है तो उसने कहा- हाँ, लेकिन इस पर केस चल रहा है।

फिर मैंने पूछा कि जब आप कह रहे हैं कि यह जमीन एलएंडडीओ की है तो आपने फिर मदरसा क्‍यों खोल रखा है। मेरी इसी बात से तौफील भड़क गया। उसने कहा कि आप मेरे साथ ऑफिस में आइए मैं आपको अपने कागजात दिखाता हूं। मुझे और मेरे कैमरामैन तुषार को कागजात दिखाने के बहाने ऑफिसनुमा घर में ले गया। जैसे ही मैं अंदर पहुँचा तो देखा कि वहाँ ऑफिस नहीं, बल्कि‍ घर था। उसके साथ 5-6 लोग पहले से ही बैठे थे।

मैंने ऑफिस में पहुँच कर फिर वही सवाल पूछा कि आपके पास जमीन का क्या रिकॉर्ड है। मैं सवाल पूछ ही रहा था तभी उसके एक साथी ने बाहर से दरवाजा बंद कर लिया। मैंने रोकने की कोशिश की तो मुझे धक्का देकर पीछे धकेल दिया। इसी बीच अंदर उसके दो से तीन साथियों ने पहले मुझसे माइक छीनने की कोशिश की, इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो गया है। उन्होंने मेरे हाथ को मोड़ा, मुझे धक्का देकर कुर्सी पर गिरा दिया।

इसके बाद हमारे कैमरामैन तुषार से कैमरा बंद करने को कहा, लेकिन तुषार ने कैमरा बंद करने की बजाए कैमरे को बचाने के लिए हाथों को उठा लिया, इस पर तौफील ने डंडे से तुषार पर हमला किया। इससे कैमरे के लेंस टूट गए। तौफील और उसके बेटों ने तुषार से कैमरा झपटा और उस पर हाथ-घूँसो से हमला कर दिया। मैं इधर बुरी तरह से फँस चुका था और पुलिस को फोन लगाने की कोशिश कर रहा था, ताकि किसी तरह हमारी जान बच सके।

तौफील और उसके साथियों ने तुषार के गले में ‘हेडलाइंस इंडिया’ का आईकार्ड देखा। इसमें उसका नाम देख लिया था। इस पर तौफील ने साथियों से कहा कि ये दोनों हिंदू हैं, इनको आज सबक सिखा दो। जाओ घर से चापड़ लेकर आओ। यह हालत देख हमारी साँसें अटक गई थीं। मैंने तुषार को इशारा किया वो गेट खोलकर बाहर भाग जाए। तुषार ने ऐसा ही किया, लेकिन तुषार जैसे ही भागा वैसे ही तौफील और उसके गुर्गों ने तुषार के पेट और प्राइवेट पार्ट पर लात-घूँसो से हमला कर दिया।

वह गिर गया। मैंने बीच-बचाव किया। तभी मौका पाकर तुषार ऑफिस का गेट खोलकर बाहर भाग निकला। उसने बचाने की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। करीब एक घंटे तक तौफील और उसके गुर्गों ने हमारे साथ मारपीट की। फिर कुछ देर बाद दिल्ली पुलिस आ गई। वो हमें और तौफील को थाने ले आई। मारपीट में मेरे अंगूठे में काफी चोट लग गई। वहीं, हमारे कैमरामैन तुषार के गले, पेट और पैर में काफी चोट लगी। उसे चलने में भी दिक्कत हो रही थी। अवैध मदरसा संचालक तौफील की दबंगई देखकर आसपास के लोग भी दहशत में आ गए।

PM मोदी के सामने हाथ जोड़े नीतीश कुमार, प्रशांत किशोर ने तस्वीरें शेयर कर डिलीट किया: कहा- दिल्ली में मेल-मुलाकात का कोई असर नहीं

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा प्रशांत किशोर को अंड-बंड बोलने वाला बताने के बाद दोनों के बीच आरोपों का दौर जारी है। प्रशांत किशोर ने गुरुवार (8 सितंबर 2022) को एक ट्वीट मे नीतीश कुमार के चार फोटो साझा कर उन पर तंज कसा। इसके साथ ही विपक्षी दलों का नेता बनने की कोशिश का माखौल उड़ाया।

गुरुवार की सुबह प्रशांत किशोर ने पीएम मोदी के साथ नीतीश कुमार के चार फोटो साझा किए थे। हालाँकि, बाद में उन्होंने इस ट्वीट को डिलीट कर दिया। इस फोटो में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हाथ जोड़कर नमस्कार करते, उनके सामने झुकते, उन्हें नमस्कार करते नजर आ रहे हैं।

प्रशांत किशोर द्वार किया गया ट्वीट

इतना ही नहीं, NDA के साथ गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार दिल्ली जाकर गैर-भाजपा दलों के नेताओं से भी मिल रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने कॉन्ग्रेस के नेता राहुल गाँधी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक से मुलाकात की। इस मुलाकात पर भी प्रशांत किशोर ने तंज कसा है।

प्रशांत किशोर ने कहा, “बिहार में जो राजनीतिक घटनाक्रम है वो केवल राज्य विशिष्ट मद्दा है और मुझे नहीं लगता कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर असर पड़ेगा। कथित तौर पर जो आदमी अभी विपक्ष में है, वो दिल्ली जाकर दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात करता है तो केवल मुलाकात करने से विपक्ष नए तरीके और रणनीति के साथ खड़ा हो रहा है, ऐसा मुझे नहीं लगता है।”

बिहार के भागलपुर में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, “मैंने तो कहीं ऐसी घोषणा नहीं देखी जिसमें सारे विपक्ष के नेता एक साथ बैठकर किसी चेहरे आदि की घोषणा की हो। अभी मुझे इस प्रयास में कुछ नई बात नहीं दिखती है।”

बता दें कि बुधवार (7 सितंबर 2022) को नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को अंड-बंड बोलने आदमी और धंधेबाज बताया था। उन्होंने कहा था, “वो आदमी मेरे साथ भी आया। मैंने बाद में सुझाव दिया कि ये सब काम छोड़ दीजिए पर नहीं माने। वो देशभर में अलग-अलग पार्टी का प्रचार करते रहे। उनका ये एक धंधा है।”

नीतीश कुमार ने आगे कहा था, “प्रशांत किशोर बिहार में जो करना चाहते हैं वो करें। उनके स्टेटमेंट का कोई महत्व ही नहीं है। उन्हें क्या ABC भी मालूम है कि 2005 से क्या काम हुआ है? स्टेटमेंट देकर पब्लिसिटी देने का काम है। वो इसी सबके एक्सपर्ट हैं। कुछ भी अंड-बंड बोलते रहते हैं। अगर ऐसा कोई कुछ कहता है तो शायद अंदर से बीजेपी को मदद करने का मन होगा। इसीलिए कुछ बोल रहे हैं।”

अब काशी के रजिया मस्जिद और धरहरा मस्जिद पर कानूनी लड़ाई, वर्शिप एक्ट के खिलाफ कोर्ट पहुँची शाही परिवार की बेटी: औरंगजेब-ऐबक ने ध्वस्त किए थे मंदिर

काशी के शाही परिवार की बेटी ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 को चुनौती देने वाली याचिका में हस्तक्षेप आवेदन दायर किया है​। इसके तहत काशी में विवादित ढाँचे रजिया मस्जिद (Razia Mosque) में बदलाव की माँग की गई है।

इसमें दावा किया गया है कि यहाँ मूल रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर है​। हस्तक्षेप आवेदन के अनुसार, काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर 1194 ईस्वी में कुतुब-उद-दीन-ऐबक (Qutub-ud-Din Aibak) द्वारा रजिया मस्जिद का निर्माण किया गया था। ‘लॉ बीट’ के मुताबिक, रजिया मस्जिद के अलावा शाही परिवार धरहरा मस्जिद के मंदिर के रूप में पुनर्निर्माण की भी माँग कर रहा है, जिसे औरंगजेब ने 1682 में वाराणसी के पंचगंगा घाट पर बिंदु माधव मंदिर को तोड़कर बनाया था।

औरंगजेब ने दो बड़े मंदिरों को गिराया

वहीं, इतिहासकारों का दावा है कि औरंगजेब ने न केवल ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को बनाया, बल्कि इसी तरह उसने हिंदुओं के दो बड़े मंदिरों समेत अन्य कई सनातन आस्था के केंद्रों को भी गिराया था और वहाँ मस्जिदें बनवाई थी। भगवान शिव की नगरी काशी के पंचगंगा घाट पर स्थित ‘बिंदु माधव का मंदिर’ अब ‘धरहरा मस्जिद’ के नाम से जाना जाता है।

औरंगजेब ने सन 1669 के आसपास बिंदु माधव का प्राचीन मंदिर तोड़कर यहाँ धरहरा मस्जिद बनवाई थी, जिसके बाद औंध नरेश ने मंदिर से बिंदु माधव की मूर्ति को बगल में एक अन्य जगह स्थानांतरित करा दिया था। यहाँ पर अभी भी उनकी (भगवान विष्णु) पूजा की जाती है। अब इसे आलमगीर मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है।

काशी को काफी नुकसान पहुँचाया

इसके अलावा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर माधव जनार्दन रटाटे ने भी बताया था कि औरंगजेब ने काशी को काफी नुकसान पहुँचाया था। उसने यहाँ के कृतिवाशेश्वर, बिंदु माधव और विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर उस स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया था। इसके अलावा ओंकारेश्वर और लाटभैरव मंदिर को भी उसने नष्ट कर दिया था। साथ ही ओंकारेश्वर मंदिर के आसपास भी कई मंदिरों को नुकसान पहुँचाकर उन्हें पूरी तरह लुप्त कर दिया।

‘कुछ लोग पापा को मार देंगे’: KRK के बेटे ने लगाई न्याय की गुहार, कहा – नहीं चाहता उनकी मौत सुशांत की तरह हो

दिवंगत अभिनेता ऋषि कपूर और इरफान खान को लेकर किए गए विवादास्पद ट्वीट और अभिनेत्री से छेड़छाड़ मामले में जेल में बंद कमाल राशिद खान यानी केआरके (KRK) को बुधवार (7 सितंबर, 2022) को जमानत मिलने के बाद गुरुवार (8 सितंबर) को ठाणे जेल से रिहा किया गया है। इस बीच केआरके के बेटे फैसल कमाल ने अपने पिता के ट्विटर अकाउंट से ट्वीट करते हुए उनकी मदद करने की गुहार लगाई है।

इस ट्वीट में फैसल कमाल ने अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख और महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से केआरके को बचाने का अनुरोध किया है। साथ ही, उसने कहा है कि वह नहीं चाहता कि उसके पिता सुशांत सिंह राजपूत की तरह मरें।

फैसल कमाल ने ट्वीट करते हुए कहा, “मैं केआरके का बेटा फैसल कमाल हूँ। मुंबई में मेरे पिता को मारने के लिए कुछ लोग प्रताड़ित कर रहे हैं। मैं अभी 23 साल का हूँ और लंदन में रह रहा हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं अपने पिता की मदद कैसे करूँ। मैं अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख और देवेन्द्र फडणवीस जी से मेरे पिता की जान बचाने का अनुरोध करता हूँ। मैं और मेरी बहन उनके बिना मर जाएँगे।”

केआरके के ट्विटर अकाउंट से किए गए अगले ट्वीट में फैसल कमाल ने कहा, “वह हमारा जीवन हैं। मैं जनता से भी अनुरोध करता हूँ कि मेरे पिता की जान बचाने के लिए उनका समर्थन करें। हम नहीं चाहते कि वह सुशांत सिंह राजपूत की तरह मर जाएँ।”

गौरतलब है कि बॉलीवुड अभिनेता, निर्माता और फिल्म समीक्षक कमाल राशिद खान उर्फ केआरके (KRK) को मुंबई पुलिस ने गत 30 अगस्त को पुराने मामले को लेकर गिरफ्तार कर लिया था। उनकी इतने समय बाद हुई गिरफ़्तारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उनकी गिरफ़्तारी के पीछे करण जौहर का हाथ भी हो सकता है, क्योंकि वे फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ का नेगेटिव रिव्यू नहीं होने देना चाहते।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, KRK को विदेश से आते ही मुंबई हवाई अड्डे पर ही गिरफ्तार कर लिया गया था। हालाँकि, केआरके को जमानत पर जेल से रिहा कर दिया गया है। लेकिन, उनकी रिहाई तब हुई है जब अगले ही दिन, यानी 9 सितंबर 2022 को ‘ब्रह्मास्त्र’ सिनेमा घरों में दस्तक दे रही है।

वहीं सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा उनकी गिरफ़्तारी का कारण रणबीर और आलिया की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ को बताया जा रहा है। ट्विटर पर यूट्यूबर और व्लॉगर निखिल शर्मा ने बॉयकोट ट्रेंड को लेकर लिखा, “वास्तव में ‘ब्रह्मास्त्र’ के एक अच्छी फिल्म होने का अनुमान है। बहिष्कार छोड़कर क्या लगता है? कैसी फिल्म होगी?” इसके जवाब में एक यूजर ने लिखा, “सुपरफ्लॉप! फिल्म पर यदि कॉन्फिडेंस होता तो बॉलीवुड माफिया वाले KRK को जेल में नहीं डलवाते।”

दूसरे लोगों के साथ सोने को कहता था, नहीं मानी तो इमरान ने फोन पर ही गालियाँ बकते हुए दिया तीन तलाक: निकाह के बाद करता था अप्राकृतिक सेक्स

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से तीन तलाक का एक मामला सामने आया है। यहाँ की रहने वाली एक विशेष समुदाय की महिला को उसके पति ने बेंगलुरु फोन करके तीन तलाक दे दिया है। महिला ने अपनी शिकायत जिले के नागफनी थाना क्षेत्र में दर्ज कराई और अपनी आपबीती सुनाई। पीड़िता ने अपने शौहर के साथ-साथ उसके परिवार वालों पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।

‘दैनिक जागरण’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित महिला यूपी के मुरादाबाद जनपद की रहने वाली है। पीड़िता ने थाने में अपने पति, सास और ननद पर दहेज उत्पीड़न के साथ-साथ कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं। महिला के मुताबिक, उसकी शादी बेंगलुरु निवासी ऑटो पार्ट्स व्यापारी के साथ 22 नवंबर, 2019 को हुई थी। आरोप है कि निकाह के बाद से ही इमरान ने बीवी के साथ अप्राकृतिक सेक्स करना शुरू कर दिया था।

ये है पूरा मामला

महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही पति, सास और ननद दहेज में 10 लाख रुपए नहीं देने पर तंग करने लगे थे। पीड़ित महिला ने पति पर आरोप लगाते हुए बताया कि वह उसे दूसरे व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए कई बार दबाव भी बना चुका है। जब इन सब अत्याचारों का महिला ने विरोध किया तो उसके पति ने उसके साथ मारपीट कर उसे अपने घर से निकाल दिया।

इस घटना के बाद महिला अपने मायके मुरादाबाद आ गई। महिला के मुताबिक, हाल ही में 31 अगस्त, 2022 की मध्यरात्रि में उसके पति ने उसे 2 बार फोन किया। पहली फोन कॉल में उसने महिला को गालियाँ बकी, वहीं दूसरी कॉल में उसने महिला को तलाक-तलाक-तलाक बोलकर तीन तलाक दे दिया। पुलिस के मुताबिक, इस मामले में सभी आरोपित बेंगलुरु में रहते हैं, उन्हें जल्द ही पूछताछ के लिए बुला लिया जाएगा।

पीलीभीत जिले में भी महिला को दिया तीन तलाक

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से भी हाल ही में एक तीन तलाक का मामला सामने आया था। इस केस में पीड़िता उम्र मात्र 19 साल ही बताई जा रही है। वहीं पीड़ित युवती ने पुलिस को बताया कि उसके पति ने अप्रैल में उसके साथ मारपीट की और तीन तलाक दे दिया, यह कहते हुए कि उसने थाली में ठंडी सब्जी परोसी है।

पीड़ित युवती के पति का नाम सलमान बताया जा रहा है और उसने 12 अप्रैल 2022 को तीन तलाक देकर अपनी पत्नी से रिश्ता खत्म कर दिया था। ये शादी 23 मई, 2021 को हुई थी। महिला ने आरोप लगाया है कि दहेज न देने पर ससुराल वालों ने उसे अपने साथ ले जाने से इनकार कर दिया था, लेकिन बाद दहेज देकर उन्हें मना लिया गया। बाद में उन्होंने फिर से महिला को परेशान करना शुरू कर दिया और आखिर में उसे तीन तलाक देकर घर से भी निकाल दिया।

बंगाल में गो-तस्करी में माफिया से लेकर पुलिस तक शामिल: रिपोर्ट में दावा, गायों की गर्दन को केले के तने में बाँध नदी के जरिए भेजा जा रहा बांग्लादेश

पश्चिम बंगाल से सटी सीमा के जरिए बांग्लादेश में गायों की तस्करी के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। तस्करी के लिए सबसे आसान और अमानवीय तरीका है गायों के पैरों को बाँधने के बाद उसके सिर को केले के तने से बाँधकर नदी में छोड़ देना। बंगाल के तस्कर गायों को बांग्लादेश भेजने के लिए यही तरीका अपनाते हैं।

तस्कर आमतौर पर गायों की तस्करी के लिए कोडवर्ड का प्रयोग करते हैं। भारत में जो गाय 30 हजार में खरीदी गई, उसे बांग्लादेश में डेढ़ लाख रुपए तक में बेच दिया जाता है। ईद जैसे मौकों पर इनकी कीमतों में और भी वृद्धि हो जाती है।

इतना ही तस्करी के इस खेल में आम अपराधी से लेकर बड़े तस्कर तक शामिल होते हैं। वहीं, राज्य के राजनीतिक दलों का इन्हें भरपूर संरक्षण मिला होता है। इस कारण पुलिस ने इनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाती है और वह भी इनका हिस्सा बनकर कमाई पर ध्यान देती है। मवेशियों से लदे वाहनों से रिश्वत लेकर पुलिस उन्हें सुरक्षित आगे जाने देती है।  

पश्चिम बंगाल में गायों की तस्करी का सबसे बड़ा सरगना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अनुब्रत मंडल को माना जाता है। बाहुबली अनुब्रत बीरभूम जिले के TMC के नेता और ममता बनर्जी के बेहद करीबी हैं। तस्करी के आरोपों में सीबीआई ने उन्हें पिछले महीने गिरफ्तार किया है।

दैनिक भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, मुर्शिदाबाद जिले में बॉर्डर के पास बसा जालंगी गाँव पशु तस्करी के बड़ों अड्डों में से एक है। इस गाँव की बांग्लादेश से दूरी 5 किलोमीटर से भी कम है। यह गाँव पद्मा नदी के किनारे बसा है। पद्मा नदी बांग्लादेश और मुर्शिदाबाद में बहती है।

यहाँ पर तस्कर किसानों से गायों को खरीद कर लाते हैं और सैकड़ों-हजारों के समूह में उन्हें नदी में धकेल देते हैं। इस दौरान बॉर्डर पर तैनात जवान भी चाहकर कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि वे गिनती में एक-दो होते हैं और हथियारों से लैस तस्कर सैकड़ों की तदाद में होते हैं।

जब मवेशियों को नदी में छोड़ दिया जाता है तो बांग्लादेश में नदी किनारे खड़े तस्कर उसे निकाल लेते हैं। गायों पर बनाए गए विभिन्न निशानों के आधार पर वे अपने साथ ले जाते हैं। इस काम में कस्टम के अधिकारी भी मिले होते हैं।

हालाँकि, साल 2018 के बाद और अनुब्रत मंडल की गिरफ्तारी के बाद तस्करी में काफी गिरावट आई है। लेकिन तस्कर अब गायों के बजाय बछड़ों पर नजर गड़ाए हैं। वहीं, स्थानीय एजेंसियों का भी मानना है कि मवेशियों की तस्करी में गिरावट आई, लेकिन ड्रग्स की तस्करी में बढ़ोत्तरी हुई है।

केरल सरकार ने शूटिंग की नहीं दी अनुमति, सेंसर बोर्ड ने कई सीन काट डाले: मोपला नरसंहार पर फिल्म बनाने वाले निर्देशक ने बताई पूरी कहानी, मिल रही धमकियाँ

साल 1921 में मालाबार में मोपला मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं का नरसंहार किया जाना भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। एक अनुमान के अनुसार, मालाबार नरसंहार में मोपला मुस्लिमों ने 10,000 से अधिक हिंदुओं का नरसंहार किया था। यह नरसंहार मोहनदास करमचंद गाँधी द्वारा शुरू किए गए खिलाफत आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम था। इस नरसंहार के बाद हमलावरों को ही पीड़ित के रूप में दिखाया गया। साथ ही, हिन्दुओं पर हुए अत्याचार और नरसंहार को पूरी तरह से छिपाने का प्रयास किया गया।

इस नरसंहार के बाद से वामपंथियों ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि मालाबार नरसंहार एक ‘किसान विद्रोह’ था, जहाँ गरीब मुस्लिम अपने अधिकारों की माँग करते हुए हिन्दू जमींदारों के खिलाफ खड़े हुए थे। वामपंथी यह कहते रहे हैं कि यह नरसंहार सांप्रदायिक नफरत के कारण नहीं हुआ था। बल्कि, मुसलमानों द्वारा सामना किए गए उत्पीड़न का परिणाम था।

वास्तव में, वामपंथियों ने हमेशा ही सच को छिपाने का प्रयास किया है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही है क्योंकि सच्चाई कुछ और है। दीवान बहादुर सी. गोपालन नायर द्वारा लिखित पुस्तक ‘द मोपला रिबेलियन 1921’ में, उन्होंने बताया है कि मोपला नरसंहार से पहले भी कई बार मुस्लिमों ने धार्मिक उन्माद के चलते हिन्दुओं की हत्याएँ की थीं। सी. गोपालन नायर ने पुस्तक में बताया है कि कैसे मुस्लिम कभी-कभी अपने “हाल इलकम” (धार्मिक उन्माद) में चले जाते हैं और न केवल हिंदुओं की हत्या करते थे, बल्कि उनके मंदिरों को भी अपवित्र करते थे।

उस समय, मिस्टर टीएल स्ट्रेंज को मालाबार में स्पेशल कमिश्नर के रूप में भेजा गया था। स्ट्रेंज को मालाबार सिर्फ इसलिए भेजा गया था क्योंकि वह मुस्लिमों द्वारा उन्मादी हिंसा के पीछे के कारणों का पता लगा सकें। 1852 की अपनी एक रिपोर्ट में, स्ट्रेंज ने इस थ्योरी को साफ तौर से खारिज कर दिया था कि हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा किए गए अपराध ‘किसान विद्रोह’ के परिणाम थे। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि हिन्दू जमींदारों ने किसानों के साथ अच्छा व्यवहार किया और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा इस्लामी नफरत का ही परिणाम थी।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हिंदुओं के मालाबार नरसंहार के बारे में वामपंथियों द्वारा सेट किए गए नैरेटिव को जिसने भी तोड़ने का प्रयास किया है, उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ा है। इसलिए, ऐसी आशंका पहले से ही जताई जा रही थी कि रामसिम्हा (जिन्हें पहले अली अकबर के नाम से जाना जाता था) की आगामी फिल्म को इसी तरह के विरोध का सामना करना पड़ेगा।

उम्मीद के मुताबिक ही, गत 27 जून को खबर सामने आई कि केरल के सेंसर बोर्ड ने फिल्म निर्माता अली अकबर उर्फ ​​​​रामसिम्हा की आगामी मलयालम फिल्म ‘पुझा मुथल पूझा वरे’ को एक सार्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया है। इस फिल्म की कहानी, मालाबार में हुए हिन्दुओं के नरसंहार के इर्द-गिर्द घूमती है। 

ऐसा माना जाता है कि रामसिम्हा की फिल्म को सार्टिफिकेट मिलना इतना कठिन नहीं था। लेकिन, जब बार-बार इस्लामवादियों के आचरण से परेशान होकर (खासतौर से सीडीएस विपिन रावत के निधन पर कट्टर मुस्लिमों के जश्न मनाने के बाद) उन्होंने हिन्दू धर्म अपना लिया था, तबसे कई चीजें उनके लिए समस्याजनक हो चुकी हैं।

रामसिम्हा का कहना है, “हिंदुओं के मालाबार नरसंहार पर एक फिल्म रिलीज हो रही थी जिसमें हत्यारों का महिमामंडन किया गया था। फिल्म ‘वरियमकुन्नन’ वरियमकुनाथ कुन्हमेद हाजी और अली मुसलियार के जीवन पर आधारित थी। 1920 के दशक की शुरुआत में केरल में हजारों हिंदुओं का नरसंहार करने के लिए जिहादी जिम्मेदार हैं। जब इस फिल्म की घोषणा की गई, तो कई लोगों ने मुझसे एक ऐसी फिल्म बनाने के लिए संपर्क किया, जो हिंदू समुदाय के साथ हुई सच्चाई का प्रतिनिधित्व करती हो। तभी मैंने इस फिल्म को बनाने का फैसला किया।”

रामसिम्हन की यह फिल्म पूरी तरह से क्राउड फंडिंग पर आधारित है। रामसिम्हा कहते हैं, “लोगों ने मुझे इस फिल्म को बनाने के लिए पैसे दिए थे। मैंने लोगों के योगदान से ही 1.4 करोड़ रुपये इकट्ठे किए।”

यहाँ, यह बताना जरूरी है कि मलयालम निर्देशक आशिक अबू ने विवादास्पद मलयालम अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन को अपनी पीरियड फिल्म ‘वरियमकुन्नन’ के लिए कास्ट किया था। हालाँकि, हंगामे के बाद यह खबर सामने आई कि अब यह फिल्म ठंडे बस्ते में चली गई है। जून 2020 में, विवादास्पद मलयाली अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन ने नई फिल्म की घोषणा करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने जिहादियों की तारीफ की थी।

पृथ्वीराज सुकुमारन ने फिल्म के पोस्टर को शेयर करते हुए कहा था, “वरियमकुनाथ एक ऐसे साम्राज्य के खिलाफ खड़े हुए, जिसने दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर शासन किया।” कई लोगों ने इस फिल्म के खिलाफ आरोप लगाते हुए आपत्ति जताई थी कि फिल्म एक आतंकवादी को अंग्रेजों के खिलाफ “विद्रोह” करने वाले के रूप में दिखा कर उसे अपराध से मुक्त करने का प्रयास है।

रामसिम्हा (अली अकबर) ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “शुरू से ही केरल सेंसर बोर्ड में पार्वती नाम की एक क्षेत्रीय अधिकारी फिल्म के खिलाफ थी। रजिस्ट्रेशन होने के समय से ही, वह मेरे खिलाफ थी। सॉफ्टवेयर ई-प्रमाण में फिल्म को रजिस्टर करने में लगभग डेढ़ महीने का समय लगा। बार-बार यह कहा जाता रहा कि फिलहाल यह जाँच के दायरे में है। हालाँकि, जब मैंने कहा कि अब मैं हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाऊँगा, उन्होंने जल्द ही रजिस्ट्रेशन कर दिया। इसके बाद उन्होंने स्क्रीनिंग के लिए बुलाया। लेकिन, स्क्रीनिंग के बाद बिना बताए ही उन्होंने रिवीजन कमेटी, मुंबई को फिल्म का सुझाव भेज दिया।”

रामसिम्हा का कहना है कि जब वह मुंबई पहुँचे तो रिवीजन कमेटी में 9 लोगों की सुनवाई हो रही थी। रिवीजन कमेटी ने कहा कि फिल्म में थोड़ी सी भी हिंसा होने के कारण इसे जो सर्टिफिकेट दिया जाएगा वह A सर्टिफिकेट होगा। रिवीजन कमेटी ने कुछ मामूली कटौती का भी सुझाव दिया जिसे रामसिम्हा ने स्वीकार कर लिया।

रिवीजन कमेटी की इस मीटिंग के बाद, जब रामसिम्हा फिल्म में हुई कटिंग की लिस्ट मिलने का इंतजार कर रहे थे। इस दौरान, उन्हें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से नोटिस मिला कि रिवीजन कमेटी की एक और मीटिंग होनी है। इस नोटिस के बाद से रामसिम्हा थोड़े घबराए हुए थे क्योंकि उन्हें रिवीजन कमेटी की दूसरी मीटिंग का कारण समझ नहीं आया था। इसके बाद, रामसिम्हा के सूत्रों ने उन्हें बताया कि फिल्म को रिवीजन कमेटी की पहली टीम द्वारा पास किया गया था। लेकिन, उस कमेटी द्वारा कुछ ‘गलतियाँ’ हुईं हैं जिस कारण दूसरी मीटिंग हो रही है। रामसिम्हा कहते हैं, जब वे रिवीजन कमेटी की दूसरी मीटिंग में लिए पहुँचे तो पैनल में कोई भी मलयाली सदस्य नहीं था।

फिल्म में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा सेंसर किए गए कुछ सीन्स में से एक वो सीन था जहाँ थुवूर के कुएँ में हुई घटना को दिखाया गया था। दरअसल, 25 सितंबर, 1921 को, उत्तरी केरल में थुवूर और करुवायकांडी के बीच बंजर पहाड़ी पर खिलाफत नेताओं में से एक, चंब्रासेरी इम्बिची कोइथंगल ने 4000 लोगों के साथ एक रैली की थी। इस रैली के दौरान, 40 से अधिक हिंदुओं को पकड़ लिया गया और उनके हाथ पीछे करके बाँध दिए गए थे। इसके बाद 40 में से 38 लोगों की हत्या कर दी गई थी। 38 में से 3 को गोली मार दी गई। जबकि, बाकी लोगों का सिर काटकर थुवूर कुएँ में फेंक दिया गया था।

थुवूर कुएँ की घटना के अलावा, ऐसे कई सीन थे जिन्हें सेंसर बोर्ड द्वारा काट दिया गया। रामसिम्हा ने उदहारण देते हुए ऑपइंडिया को बताया है, फिल्म में, एक संवाद था जो अल-दौला (इस्लामी राज्य) के बारे में बताता थ।, इस साम्राज्य को कुंजाहमद हाजी द्वारा मालाबार में स्थापित किया गया था। ऐसा बताया जाता है कि यह स्पष्ट रूप से एक ‘स्वतंत्र क्षेत्र’ था जिसे इस्लामवादियों ने स्थापित किया था और उन्होंने हिंदुओं पर जजिया भी लगाया था। 

सीबीएफसी की दूसरी मीटिंग में एक महिला (सेंसर बोर्ड की सदस्य) ने रामसिम्हा (अली अकबर) से शरीयत और इस्लाम के बारे में कुछ सवाल किए और फिर उस संवाद को पूरी तरह से कट कर दिया।

अकबर ने ऑपइंडिया को बताया कि 1921 में हिन्दुओं के नरसंहार के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याएँ हुईं थीं। हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण हुआ, हिंदुओं की आस्था का अपमान करने के लिए जानबूझकर गायों की हत्याएँ की गईं, कई हजार लोगों के सिर काट दिए गए और मंदिरों को धराशायी कर दिया गया। फिल्म में, ऐसे कई सीन थे जहाँ उन्होंने हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण और इस्लामवादियों द्वारा मंदिरों को तोड़े जाने को प्रदर्शित किया था। इन सभी सीन को सेंसर बोर्ड ने भी अस्वीकार कर दिया। एक अन्य सीन में, गोहत्या दिखाए बिना, इस्लामवादियों द्वारा गायों का वध करने का संकेत दिया गया था, लेकिन उस सीन को भी हटा दिया गया।

ऐसे सीन के अलावा, ऑपइंडिया को बताया गया कि सेंसर बोर्ड ने अली अकबर (रामसिम्हा) से कहा था कि “अल्ला हु अकबर” और “नारा-ए-तकबीर” के नारे इतनी बार नहीं दिखाए जाएँ।

यह साफ था कि फिल्म में जिस तरह से कट लगाए जा रहे हैं, वह मोपला मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचार और नरसंहार का वास्तविक रूप सामने नहीं आने देना चाहते थे। रामसिम्हा को संदेह है कि सेंसर बोर्ड केरल की उस अधिकारी के प्रभाव में था। रामसिम्हा को लगता है वह अधिकारी एक कम्युनिस्ट है जो कि इस नरसंहार को लेकर कम्युनिस्टों द्वारा गढ़ी गई थ्योरी (जमीदारों के प्रति मुस्लिमों का विद्रोह) को टूटने नहीं देना चाहती थी इसलिए वह फिल्म के कई सीन कटवा रही थी। इस बात की पुष्टि ऐसे भी हो जाती है कि जब फिल्म में हिंदू राजाओं के परिवार को “देवता” के रूप में दिखाया तो तो सेंसर बोर्ड ने जोर देकर कहा कि उन्हें “जमींदारों” के रूप में ही दिखाया जाना चाहिए।

रामसिम्हा को इस फिल्म में हुए सभी कटों की पूरी सूची मिल चुकी है। उनका कहना है कि फिल्म में जिस तरह से कट लगाए गए हैं यदि फिल्म ठीक वैसे ही दिखाई गई तो इसका मतलब यह होगा कि मोपला मुस्लिमों ने हिन्दुओं पर अत्याचार तो किया, लेकिन यह फिल्म में दिखाया ही नहीं गया। सीधी बात यह है कि फिल्म में लगे कट्स इस वामपंथियों के “किसान विद्रोह” के नैरेटिव को और मजबूत कर देंगे। टीजी मोहनदास ने फिल्म में लगे अभी कट्स की पूरी सूची ट्विटर पर भी अपलोड की है।

रामसिम्हा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “फिल्म में लगे कट के साथ फिल्म को दिखाना केवल कट्टर मुस्लिमों की भलाई होगी। मोपला मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं पर किए गए अत्याचार जैसा दिखाया जाना इस फिल्म में कुछ भी नहीं बचा है।”

उन्होंने, यह भी कहा कि फिल्म की वास्तविक कहानी और सार को बदलने के अलावा, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने अपनी रिवीजन कमेटी की बैठक के दौरान उन्हें फिल्म के डायरेक्टर के रूप में अपने मुस्लिम नाम अली अकबर का उपयोग करने के लिए मजबूर किया था।

ऑपइंडिया से हुई एक्सक्लुसिव बातचीत में रामसिम्हा ने कहा, “मुझे लगता है कि उन्हें यह समस्या है कि एक मुस्लिम व्यक्ति हिन्दू धर्म में परिवर्तित हो गया और हिंदुओं के मालाबार नरसंहार पर एक फिल्म बना रहा है। शायद वे नहीं चाहते कि समाज में ऐसा संदेश जाए।”

उन्होंने आगे कहा “इतने सारे लोग पेन नेम्स (उपनाम) का उपयोग करते हैं। इतने सारे कलाकार और टेक्नीशियन अलग-अलग नामों का उपयोग करते हैं। अगर मैं अली अकबर को निर्माता नाम के रूप में उपयोग करना चाहता हूँ लेकिन निर्देशक के रूप में मेरा हिन्दू नाम उपयोग करना चाहता हूँ तो उन्हें समस्या क्यों होनी चाहिए? उनसे फिल्म की समीक्षा करने की अपेक्षा की जाती है, न कि नामों पर निर्णय लेने के लिए।”  

इस बातचीत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, “मुझे संदेह है कि केरल सेंसर बोर्ड की पार्वती ने सीबीएफसी (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) की रिवीजन कमेटी से कहा था कि ये कटौती होनी चाहिए। मुझे पीएफआई जैसे इस्लामी संगठनों के भी कुछ दबाव का संदेह है। 

यह पूछे जाने पर कि, केरल सेंसर बोर्ड और रिवीजन कमेटी, दोनों ही केंद्र सरकार के अधीन हैं। ऐसे में उन्हें यह क्यों लगता है कि उनकी फिल्म के लिए दबाव डाला जा रहा है? रामसिम्हा ने कहा, “आपको ‘द कश्मीर फाइल्स’ के उस डॉयलॉग को याद रखना होगा – सरकार किसी की भी हो सकती है लेकिन सिस्टम अभी भी उनका है। साथ ही, मुझे लगता है कि केंद्र सरकार आर्थिक विकास में अधिक रुचि रखती है और इस प्रक्रिया में, वे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मुद्दों की अनदेखी करते हैं।”

मोपला मुस्लिमों द्वारा किए गए हिन्दुओं के नरसंहार पर फिल्म बनाते समय रामसिम्हा के सामने आयीं कई समस्याएँ

रामसिम्हा ने ऑपइंडिया को बताया कि केवल सेंसर बोर्ड के कट्स ही फिल्म में बाधा नहीं बन रहे थे, बल्कि कई अन्य समस्याएँ भी सामने आईं। जैसे, वह फिल्म के हिंदी संस्करण के लिए एक नाम रजिस्टर करना चाहते थे। हालाँकि, वह भी बेहद मुश्किल साबित हुआ। रामसिम्हा इस फिल्म के हिंदी संस्करण का नाम, “1921: पूझा मुथल पूझा वरे” को पंजीकृत करना चाहते थे, जो “1921: नदी से नदी तक” का अनुवाद है। हालाँकि, जब उन्होंने यह नाम रजिस्टर कराने की कोशिश की तो वह पहले ही किसी और ने ले लिया था।

रामसिम्हा कहते हैं, “मैंने नाम के 20 अलग-अलग नामों रजिस्टर करने की कोशिश की, मालाबार नरसंहार से लेकर हर बदलाव के बारे में सोच सकते हैं। हालाँकि, सभी किसी और के द्वारा पहले ही रजिस्टर किए गए थे। मुझे यह ऐसा लग रहा था जैसे कोई यह चाहता हो कि मैं फिल्म के लिए हिन्दी नाम की तलाश न करूँ।” रामसिम्हा को लगता है कि कोई जानबूझकर फिल्म के सभी संभावित नाम रजिस्टर्ड करा रहा है, इसलिए वो कोई भी हिन्दी नाम रजिस्टर नहीं करा सके।

रामसिम्हा ने आगे कहा कि केरल पुलिस और केंद्रीय खुफिया अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया है, उन्हें सूचित किया है कि वह गंभीर खतरे में हैं। उन्होंने बताया, “फिल्म के खबरों में आने के बाद, यहाँ यहां तक ​​कि जब मैं फिल्म की शूटिंग कर रहा था, तब भी धमकियाँ मिल रही थीं। केंद्रीय एजेंसियाँ ​​मेरे घर आईं और सुरक्षा के लिहाज से मुझे आठ कैमरे लगाने के लिए कहा था।”

रामसिम्हा ने कहा, “यहाँ तक ​​​​कि जब मैं फिल्म की शूटिंग कर रहा था, तब भी राज्य सरकार ने मुझे शूटिंग की अनुमति देने से इनकार करके फिल्म को रोकने की कोशिश की थी। राज्य की ओर से मुझे पब्लिक प्लेसों में शूटिंग की अनुमति नहीं दी गई, जिसके बाद मुझे निजी क्षेत्रों में जाकर फिल्म की शूटिंग करनी पड़ी।” 

उन्हें मिल रही धमकियों के बारे में रामसिम्हा कहते हैं, “कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने फिल्म में काम करने वाले कलाकारों को भी धमकी दी थी, उन्हें फिल्म के साथ अपना जुड़ाव खत्म करने के लिए कहा था। रामसिम्हा आगे कहते हैं, “जिस दिन उन्हें (इस्लामवादियों को) मौका मिलेगा, वे मुझे खत्म कर देंगे, सुरक्षा के लिए सिर्फ मेरे कृष्ण हैं।”

बता दें, रामसिम्हा को पहले अली अकबर के नाम से जाना जाता था। लेकिन, उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाने के साथ ही अपना नाम रामसिम्हा रख लिया है। रामसिम्हा ने अब सीबीएफसी (केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड) द्वारा उनकी फिल्म पर की गई कटिंग को लेकर न्याय की गुहार लगाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है।