Home Blog Page 2441

‘औरतबाजों से नहीं बचता देश का रुतबा’: हार्दिक पांड्या की फोटो शेयर कर मोहम्मद शमी की बीवी ने किया पोस्ट, नेटिजन्स सुना रहे खरी-खोटी

भारत ने एशिया कप के मैच में रविवार (28 अगस्त, 2022) को पाकिस्तान को 5 विकेट से हरा दिया। पूरे देश ने इस जीत का जश्न मनाया और पटाखे भी छूटे। लेकिन, जीत की बधाई देते हुए भारतीय तेज़ गेंदबाज मोहम्मद शमी की पत्नी हसीन जहाँ ने जो कहा, वो चर्चा में है। बता दें कि मोहम्मद शमी और उनकी पत्नी विवाद के बाद अलग-अलग रह रहे हैं। तीनों फॉर्मेट में भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय 386 विकेट ले चुके मोहम्मद शमी फ़िलहाल एशिया कप की भारतीय टीम का हिस्सा नहीं हैं।

पाकिस्तान पर भारत की जीत के बाद हसीन जहाँ ने भारतीय ऑलराउंडर हार्दिक पंड्या की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “बधाई हो। ये एक बड़ी जीत है। हमारे देश को जीत दिलाने के लिए हमारे देशों को बहुत-बहुत धन्यवाद। ये तो होना ही था। देश का रुतबा और देश की गरिमा ईमानदारों एवं देशभक्तों से ही बचती है, न कि अपराधियों व औरतबाजों से।” उनका इशारा किस तरफ था, कई लोगों को ये समझते हुए देर न लगी। कमेंट्स के जरिए लोगों ने उन्हें जम कर खरी-खोटी सुनाई।

मोहम्मद शमी ने भी इंस्टाग्राम पर हार्दिक पंड्या की तस्वीर लगाते हुए जीत की बधाई दी। बता दें कि हार्दिक पंड्या का इस जीत में अहम योगदान था, जिन्होंने विजयी छक्का लगाया। उन्होंने गेंद और बल्ले, दोनों से ही कमाल का प्रदर्शन किया। जहाँ उन्होंने गेंदबाजी करते हुए 4 ओवर में 25 रन देकर 3 अहम विकेट झटके, वहीं बल्लेबाजी करते हुए 4 चौकों और एक छक्के की मदद से 17 गेंदों पर नाबाद 33 रन जड़े। उनकी स्ट्राइक रेट 200 के करीब रही।

बता दें कि 2018 में मोहम्मद शमी की पत्नी ने उनके खिलाफ अन्य महिलाओं से सम्बन्ध बनाने, घरेलू हिंसा और बलात्कार के अलावा मैच फिक्सिंग जैसे आरोप भी लगाए थे। उस साल BCCI ने भी मोहम्मद शमी का कॉन्ट्रैक्ट रोक दिया था और उन पर FIR भी दर्ज हो गई थी। बाद में मैच फिक्सिंग के आरोपों से BCCI ने उन्हें मुक्त कर दिया। मोहम्मद शमी के परिजनों पर भी पत्नी ने मुकदमा ठोका था। मोहम्मद शमी ने उसके बाद भारतीय टीम में कमबैक भी किया।

‘द कश्मीर फाइल्स’ के सितारों को फिल्मफेयर अवॉर्ड में नहीं बुलावा, बोले विवेक अग्निहोत्री- यदि बुलाएँगे भी तो मैं नहीं जाऊँगा

67वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स (Filmfare Awards 2022) का आयोजन 31 अगस्त 2022 की रात मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में हुआ। अवॉर्ड शो में रणवीर सिंह, कियारा आडवाणी, दिशा पटानी, विक्की कौशल, कैटरीना कैफ, दीपिका पादुकोण समेत कई बॉलीवुड सितारों को आमंत्रित किया गया था। लेकिन ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ से जुड़े हुए किसी भी व्यक्ति को शो में इनवाइट नहीं किया गया था।

इस दुर्भाग्यपूर्ण वाकये को राजीव सिंह राठौर नाम के एक ट्विटर यूजर ने उठाया है। वे भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM), मध्य प्रदेश के सदस्य हैं। उन्होंने फिल्मफेयर अवॉर्ड्स के आयोजकों की साल 2022 की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ से दूरी का जिक्र करते हुए कहा है कि अब बॉलीवुड का पूरी तरह से बहिष्कार करने का समय आ गया है।

उन्होंने ट्वीट में कहा, “फिल्मफेयर ने फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ से जुड़े एक भी व्यक्ति को आमंत्रित नहीं किया। बॉलीवुड से किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया। यह दर्शाता है कि न केवल कुछ फिल्मों बल्कि पूरे बॉलीवुड के बहिष्कार की आवश्यकता है। यदि आप हमारी भावनाओं का सम्मान नहीं कर सकते, तो आप हमारे पैसे और प्रशंसा के भी लायक नहीं हैं।”

इस संबंध में ऑपइंडिया ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ के डायरेक्टर विवेक रंजन अग्निहोत्री से बात की। उन्होंने कहा, “यह 100% सच है। साल 2014 तक फिल्मफेयर अवॉर्ड के आयोजक मुझे और मेरी पत्नी को बुलाते थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने बुलाना बंद कर दिया। मैं इससे बहुत खुश हूँ।” साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि अवॉर्ड नाइट्स में जाने की उनकी अब दिलचस्पी भी नहीं रही। इसलिए वे बुलाएँगे तो भी मैं नहीं जाऊँगा। अग्निहोत्री ने कहा, “यह स्टैंड लेने का समय है ताकि हर कोई जान सके कि कौन भारत के साथ खड़ा है और कौन नहीं। यदि पाकिस्तान मुझे बुलाएगा तो क्या मैं जाऊँगा?”

इससे पहले अग्निहोत्री ने उन मीडिया हाउसों की आलोचना की थी जिन्होंने 68वें राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड्स में ‘द कश्मीर फाइल्स’ की उपेक्षा की खबर चलाई थी। दरअसल यह अवॉर्ड 2020 में रिलीज फिल्मों के लिए था, जबकि ‘द कश्मीर फाइल्स’ इस साल रिलीज हुई है। इस तथ्य की अनदेखी कर कुछ मीडिया हाउस ने खबर इस तरह चलाई जैसे ‘द कश्मीर फाइल्स’ पुरस्कार के योग्य ही नहीं पाया गया।

गौरतलब है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ इस साल 11 मार्च को रिलीज हुई थी। अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, दर्शन पाठक, पल्लवी जोशी स्टारर फिल्म ने करीब 337.23 करोड़ रुपए का बिजनेस किया है। कोविड-19 महामारी के दौर में 300 करोड़ के क्लब में शामिल होने वाली यह एकमात्र हिंदी फिल्म थी।

किसी को जिंदा जलाया, किसी को उठाया… एक्टिव है गैंग, छोटी उम्र की हिंदू लड़कियाँ टारगेट: रिपोर्ट में दावा- पहचान बदलकर फँसाना, फिर निकाह-धर्मांतरण आम

झारखंड के दुमका में शाहरुख़ हुसैन नाम के युवक ने नाबालिग छात्रा अंकिता सिंह को जला कर मार डाला। इसमें उसका साथ दिया उसके दोस्त नईम ने। अब इस मामले के कनेक्शन ‘अंसार उल बांग्ला’ नामक बांग्लादेशी आतंकी संगठन से जुड़ रहे हैं। दोनों आरोपित 72 घंटे की रिमांड पर लिया है और उनसे पूछताछ की जा रही है। नईम के मोबाइल फोन से कुछ ऐसे वीडियोज मिले हैं, जो बताते हैं कि वो ‘अंसार उल बांग्ला’ से प्रभावित है।

वो अक्सर मोबाइल पर आतंकी संगठन की गतिविधियों को देखता रहता था। ये वो संगठन है, जो गैर-मुस्लिम लड़कियों को फँसा कर उन्हें इस्लाम कबूलवाने की गतिविधियों पर काम करता है। सीमावर्ती इलाकों में खासकर के इस संगठन के लोग सक्रिय हैं। ‘दैनिक भास्कर’ ने अपनी पड़ताल में पाया है कि दुमका के डंगालपाड़ा, सानीडंगाल, जरुवाडीह और बंदरजोड़ी में कई ऐसी लड़कियाँ मिलीं, जो इन गतिविधियों का शिकार बनी हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं।

ये वो लड़कियाँ हैं, जो ‘लव जिहाद’ का शिकार बनीं। निकाह करा के उनका इस्लामी धर्मांतरण तक कराया गया। पाकुड़, गोड्डा, साहिबगंज और जामताड़ा में भी ऐसी पीड़िताएँ हैं। मीडिया संस्थान ने दुमका के डंगाल मोहल्ले की एक लड़की से बात की, जिसने बताया कि एक मुस्लिम लड़के से उसे प्यार हुआ था। बाद में उसे उसके मजहब के बारे में पता चला। शादी के बाद 10 साल बीत चुके हैं और अब बच्चे भी स्कूल जाने लगे हैं।

दुमका गाँधी मैदान के नजदीक रहने वाली एक युवती के पिता ने बताया कि 8 साल पहले उनकी बेटी उन्हें छोड़ कर चली गई थी। ऐसे कई मामलों में लोकलाज के कारण लोग चुप रहते हैं। दुमका के अधिवक्ता संघ ने भी निर्णय लिया है कि वो दोनों आरोपितों का केस नहीं लड़ेंगे। झारखंड के गृह विभाग ने भी एक रिपोर्ट में कहा था कि साहिबगंज व पाकुड़ में चिह्नित अवैध प्रवासियों ने वोटर आईडी, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस बनवा रखा है।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इन इलाकों में जमात उल मुजाहिदीन बांग्लादेश और पाॅपुलर फ्रंट आफ इंडिया व अंसार उल बांग्ला जैसे प्रतिबंधित संगठनों का दबदबा बढ़ रहा है। साहिबगंज, पाकुड़ और धनबाद जैसे जिलों में भी इसी तरह की गतिविधियाँ चल रही हैं। दुमका की अधिवक्ता प्रियादत्ता सिन्हा भी बता चुकी हैं कि नाबालिग लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर इस्लामी धर्मांतरण कराने का गिरोह सक्रिय हैं और उच्च-स्तरीय जाँच में चीजें सामने आ सकती हैं।

प्रियादत्ता सिंह ने ‘दैनिक जागरण’ को बताया था, “दुमका में इस तरह का एक संगठित गिरोह काम कर रहा है। खासतौर पर हिन्दू नाबालिग लड़कियों को निशाना बना कर उन्हें धर्म-परिवर्तन के लिए जाल में फँसाया जाता है। लोकलज्जा के कारण कई मामले तो पुलिस तक पहुँचते ही नहीं। अंकिता सिंह हत्याकांड निंदनीय है और दोनों आरोपितों को फाँसी की सज़ा होनी चाहिए। मैंने दुमका की एक ऐसी ही पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी।”

ये भी जानने लायक बात है कि नईम 2021 में भी एक नाबालिग हिंदू लड़की को अगवा कर चुका है। इस लड़की को भी उसी तरह प्रताड़ित किया जा रहा था, जैसे अंकिता के मामले में देखने को मिला है। नईम ने नाबालिग लड़की को अगवा कर निकाह का दबाव डाला था। उसे बेचने की धमकी दी थी। इस मामले में पॉक्सो एक्ट के तहत वह गिरफ्तार भी हुआ था। बाद में उसे जमानत दे दी गई। जेल से बाहर आने के बाद वह नाबालिग पीड़िता के परिवार को केस उठाने की धमकी भी दे रहा था।

नौसेना को मिला पहला स्वदेशी युद्धपोत ‘INS विक्रांत’: पहली बार राष्ट्रगान, ब्रिटिशों का निशान हटा; PM मोदी ने छत्रपति शिवाजी को किया समर्पित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर (युद्धपोत) INS विक्रांत को कोच्चि के कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में देश को समर्पित किया। यह युद्धपोत पूर्णत: स्वदेशी है। इसके साथ पीएम ने नौसेना के नए झंडे ‘निशान’ का भी अनावरण किया। इसे लहराने के दौरान पहली बार विक्रांत पर ‘जन गण मन’ बजाया गया।

बता दें कि INS विक्रांत पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसका डिजाइन से लेकर निर्माण तक, सब कुछ भारत में ही हुआ है। इसका निर्माण भारत के प्रमुख औद्योगिक घरानों के साथ-साथ 100 से अधिक लघु एवं मध्यम उपक्रमों द्वारा उपलब्ध कराए गए स्वदेशी उपकरणों से किया गया है।

भारत के पास INS विक्रमादित्य नाम से एक युद्धपोत पहले से ही मौजूद है। स्वदेशी INS विक्रांत का निर्माण रक्षा क्षेत्र में भारत के आत्मनिर्भरता को दिखाता है। इस युद्धपोत पर अलग-अलग तरह के 30 से ज्यादा लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर आदि तैनात किए जा सकते हैं।

युद्धपोत को समर्पित करने के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने आजादी के 75 साल बाद भारतीय नौसेना के झंडे बदल दिया है और नए झंडे ‘निशान’ का अनावरण किया। ‘निशान’ को अपनाने से पहले भारतीय नौसेना के झंडे पर सेंट जॉर्ज के क्रॉस वाले होते थे। यह ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान अपनाया गया था।

‘निशान’ के अनावरण के साथ ही 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी के बाद पहली बार नौसेना के ध्वज को फहराने के दौरान भारत का राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ गाया गया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौसेना के झंडे को सलामी भी दी।

इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वे इस युद्धपोत को मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज को समर्पित करते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज को भारतीय ‘नौसेना का पितामह’ कहा जाता है। नौसेना के झंडे में शिवाजी महाराज की शील्ड से प्रेरित अष्टकोणीय प्रतीक को भी शामिल किया गया है।

औपनिवेशिक भारतीय नौसेना के झंडे में सफेद रंग की पृष्ठभूमि पर लाल रंग में सेंट जॉर्ज का क्रॉस होता था। इसके ऊपरी हिस्से में बाएँ तरफ ब्रिटेन का झंडा यूनियन जैक बना होता था। आजादी के बाद भी झंडे और बैज का इस्तेमाल जारी रहा। हालाँकि, 26 जनवरी 1950 को इसमें थोड़ा बहुत बदलाव किया गया था। इसके बाद साल 2001 में इसमें थोड़ा बदलाव किया।

अब नौसेना के इस झंडे को पूरी तरह बदल दिया गया है। अब इस झंडे की पृष्ठभूमि को सफेद रखा गया है। इसके साथ ही ऊपर बाईं ओर तिरंगा को दर्शाया गया है और आगे की ओर नौसेना के चिह्न को रखा गया है। इस तरह पुराने झंडे को पूरी तरह बदल दिया गया है।

क्या है सेंट जॉर्ज क्रॉस

सेंट जॉर्ज क्रॉस का नामकरण एक ईसाई योद्धा के नाम पर किया गया है, जो तीसरे धर्मयुद्ध (क्रूसेड- ईसाइयों की मुस्लिमों से धार्मिक लड़ाई) में शामिल हुए थे। यह क्रॉस इंग्लैंड के झंडे को भी प्रदर्शित करता है। इस झंडे को इंग्लैंड ने सन 1190 में अपनाया था। बाद में ब्रिटेन की शाही नौसेना ने अलग-अलग आकार में अपना लिया था। इस झंडे का वर्तमान स्वरूप सन 1707 के आसपास अंगीकार किया गया था।

बिहार के सरकारी स्कूल में 7 साल की बच्ची से रेप, महिला टीचर ने बिस्किट देकर कहा- घर में मत बताना: दिल्ली में तीसरी कक्षा के छात्र से कुकर्म

बिहार और दिल्ली के सरकारी स्कूलों में छात्रों के यौन शोषण के मामले सामने आए हैं। बिहार के बेगूसराय में दूसरी क्लास की बच्ची से स्कूल के सफाईकर्मी ने रेप किया। दिल्ली के मधु विहार स्थित स्कूल में तीसरी कक्षा के छात्र के साथ स्कूल के सीनियर ने कुकर्म की घटना को अंजाम दिया।

रिपोर्ट के अनुसार बेगूसराय के जीरोमाइल थाना क्षेत्र स्थित एक मध्य विद्यालय में 7 साल की बच्ची के साथ सफाइकर्मी ने टॉयलेट में रेप किया। उसने इस घटना के बारे में किसी को नहीं बताने की धमकी भी बच्ची को दी। स्कूल की दो शिक्षिकाओं को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने भी कथित तौर पर बच्ची को बिस्किट देते हुए घर में इसके बारे में किसी को बताने से मना किया।

आरोप है कि स्कूल प्रशासन ने मामले को दबाने की कोशिश की। लेकिन स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपित सफाईकर्मी सीताराम मलिक को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही स्कूल के प्रिंसिपल को भी गिरफ्तार किए जाने की सूचना है।

पीड़िता के परिवार का कहना है कि उनकी शिकायत को प्रिंसिपल ने अनसुना कर दिया था। बताया जाता है मलिक ने टॉयलेट में बच्ची को अकेला पाकर इस घटना को अंजाम दिया। दो शिक्षिकाओं ने पीड़िता को बिस्कुट देकर उसकी बहन के साथ घर भेज दिया। रास्ते में तबीयत बिगड़ने के बाद वह बेहोश हो गई। पीड़िता इतनी डरी हुई थी कि उस समय परिजनों को इस घटना के बारे में पता नहीं चल पाया। बाद में उसने परिवार के लोगों को इस घटना के बारे में बताया।

29 अगस्त को पीड़िता के परिजन स्कूल पहुॅंचे तो प्रिंसिपल ने एक्शन लेने की जगह आरोपित को उनके सामने पीटकर मामला दबाने की कोशिश की। आरोप यह भी है कि मामले को दबाने के लिए पीड़िता के पिता और चेचेरे भाई के साथ एक शिक्षिका के पति ने भी मारपीट की। 1 सितंबर को जब स्थानीय लोगों ने इस घटना को लेकर हंगामा करते हुए सड़क जाम कर दिया उसके बाद पुलिस हरकत में आई। जिला मुख्यालय के डिप्टी एसपी निश्चित प्रिया का कहना है कि गुरुवार को मामले की जानकारी होते ही पुलिस ने केस दर्ज कर फौरन कार्रवाई की।

दिल्ली के स्कूल में छात्र ने दूसरे छात्र से किया कुकर्म

दूसरी घटना राजधानी दिल्ली के मधु विहार थाना क्षेत्र की है। यहाँ सरकारी सर्वोदय बाल विद्यालय में पढ़ने वाले क्लास 3 के एक छात्र के साथ अप्राकृतिक यौनाचार हुआ। इस मामले में आरोपित स्कूल की क्लास 10 में पढ़ने वाला एक छात्र है। उसे पुलिस ने IPC की धारा 377 के तहत गिरफ्तार कर लिया है।

जिस शिला पर विवेकानंद ने किया था चिंतन, वहाँ स्मारक का विरोध कर रहे थे ईसाई: कॉन्ग्रेसी मंत्री हुमायूँ कबीर को भी नहीं आया रास, RSS ने पूरा किया काम

आज आपको हम एक ऐसे स्मारक के बारे में बता रहे हैं, जिसने स्वामी विवेकानंद के विचारों को जीवंत रखा। महान विभूतियों के नाम पर अनेकों सार्वजनिक स्थलों का नामकरण वर्षों से होता आया है। लेकिन, जिन स्थानों से उन विभूतियों का नाता और रिश्ता रहा है – वह स्थल और भी महत्वपूर्ण और विशेष हो जाते है। वह स्थान कोई साधारण जगह नहीं होती, बल्कि कर्म भूमि का भाग होती है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाती है।

स्वामी विवेकानंद के जीवन काल से जुड़े हुए अनेकों स्थल सरकार या उनके संगठन ‘रामकृष्ण मिशन’ द्वारा संरक्षित किए गए है। स्वामी जी ने अपने जीवन काल में पूरे भारत का भ्रमण किया था, एक परिव्राजक सन्यासी के तौर पर। इसलिए, उनसे जुड़े हुए विशेष स्थल भी सम्पूर्ण भारत में मौजूद है। जहाँ-जहाँ उनका प्रवास हुआ, वह स्थान खुद ही विशेष बन गया क्योंकि उनके पदचिह्न वहाँ पर है।

जिस शिला पर मिला था स्वामी जी को अपने जीवन का उद्देश्य

स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ा हुआ ऐसा ही एक विशेष जगह है दक्षिण भारत का आखिरी तट कन्याकुमारी, जहाँ पर समुद्र के बीच में उन्होंने एक शिला पर 3 दिन और रात साधना और चिंतन किया था भारत के भूत, वर्तमान और भविष्य पर। ये ध्यान उन्होंने उन्होंने 25-27 दिसंबर 1892 तक धरा था। यह स्थान और भी विशेष हो जाता है, क्योंकि स्वामी जी को अपने जीवन का उद्देश्य भी यही मिला था और माता कन्याकुमारी का सम्बन्ध भी इस शिला से रहा है।

जिस शिला पर स्वामी विवेकानंद ने ध्यान कर भारत के अवनति का कारण और उन्नति के रास्ते को जाना, मान्यता अनुसार यह वही शिला थी जहाँ माता पार्वती ने कन्याकुमारी  के रूप में अवतार लेकर भगवान शिव के लिए तप किया था। वो शिला जहाँ स्वामी जी को ज्ञात हुआ कि ‘धर्म नहीं, बल्कि धर्म का अज्ञान’ भारत की अवनति का कारण था। इसलिए उन्होंने अमेरिका के शहर शिकागो में आयोजित ‘विश्व धर्म महासभा (World Parliament of Religions)’ में जाकर, हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने का निश्चय किया।

ऐसा करने के पीछे उद्देश्य था कि पश्चिमी देश वेदांत के महत्व को समझें और भारत  के हर नागरिक को अपने धर्म पर गर्व हो। क्योंकि, जो भारत स्वामी जी के समक्ष था वो उनकी आकांक्षाओं से कोसों दूर था। उनके समक्ष एक एक ऐसा भारत था, जहाँ पढ़े लिखे लोगों ने स्वयं को भारत माता और उसकी संस्कृति आत्मा से अलग कर लिया था, जहाँ लोगों के पास दो वक्त की रोटी कमाने के अलावा किसी और कार्य  के लिए ना समय था ना ही उत्साह।

स्वामी विवेकानंद के अपने 39 वर्ष की अल्प आयु में ही हमें भारत माँ की असली तस्वीर का बोध करवा गए जिसकी शुरुआत उनके अपने लक्ष्य और ‘भारत माँ के कार्य समझने’ से हुई।

शिला से विवेकानंद शिला स्मारक तक

कन्याकुमारी में समुद्र के बीचोंबीच स्थित शिला पर स्वामी विवेकानंद की जन्म शताब्दी पर कन्याकुमारी के लोगों द्वारा एक शिला स्मारक बनाने की कल्पना की गई। ‘विवेकानंद शिला स्मारक’ और साथ ही एक समिति का गठन भी किया। स्मारक के शिला पर बनने के विचार से ही कन्याकुमारी में उपस्थित ईसाई समुदाय ने बेबुनियादी मान्यताओं के आधार पर इस बात का विरोध करना शुरू कर दिया। साथ ही केंद्रीय मंत्री हुमायूँ कबीर और उस वक्त के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भक्तवत्सल्म भी शुरुआती काल में स्मारक के विरोध में थे।

‘विवेकानंद स्मारक समिति’ के सदस्य जब अपनी समस्या को लेकर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)’ के द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी गोकवलकर के पास पहुँचे तो ये पवित्र कार्य के लिए एकनाथ रानाडे को चुना गया, जो उस वक्त संघ के वरिष्ठ प्रचारक थे। एकनाथ रानाडे की परिपूर्णता और निपुणता को देख संघ परिवार के लोग मजाक में अक्सर कहते थे, “यदि क़ुतुब मीनार का भी स्थानांतरण करना हो तो एक व्यक्ति है जो ये काम कर सकता है और वह हैं एकनाथ जी।”

सामाजिक मनोविज्ञान के बहुत बड़े अभ्यासक होने के साथ वे ये भी जानते थे कि जनभावना के आगे राजनीति किस तरह नया मोड़ ले लेती है, इसी कारण चाहे हुमायूँ कबीर हो या भक्तवत्सलम को स्मारक के लिए सहमत करवाना हो, या 3 दिनो में 323 सांसदों के हस्ताक्षर करवाने हो, उनके लिए एक सफल चुनौती थी। विवेकानंद शिला स्मारक एक ऐसा स्मारक है जो ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का जीता-जागता उदाहरण है।

एक ऐसा स्मारक, जहाँ आर्थिक मामलों में दिक्कत पड़ने पर पूरे राष्ट्र ने आर्थिक योगदान दिया और जब आज भी कोई व्यक्ति राजस्थान, असम, ओडिशा, या महाराष्ट्र से कन्याकुमारी आकर स्मारक को देखता है तो अनायास ही कहता है, “मैंने भी इस स्मारक के निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग किया है।” इस स्मारक को बनाने में पूरे देश ने योगदान दिया, इसीलिए सही मायने में यह एक ‘राष्ट्रीय स्मारक’ हुआ !

शिला स्मारक से जीवंत संगठन तक

एकनाथ रानाडे का लक्ष्य सिर्फ बाकी स्मारकों की भाँति, विवेकानंद शिला स्मारक को एक निर्जीव स्मारक बनाना नहीं था, बल्कि वो इस स्मारक को जीवंत बनाना चाहते थे। जिस से वह सनातन धर्म का विचार देश के हर घर तक ले जाना चाहते थे, जिसके लिए “सिंह के पौरुष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से संपन्न और पवितृय की भावना से उद्वीप्त सहस्त्रों नर-नारी, दरिद्रों एवं उपेक्षित के प्रति हार्दिक सहानुभूति लेकर, देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भ्रमण करते हुए एक मुक्ति का, सामाजिक पुनरुत्थान का, सहयोग और समता का संदेश देंगे।”

जैसा की स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “विराट की पूजा न करो, जीवित भगवान को जरूरतमंद, दलित, पीड़ित लोगों में देखो।” 7 जनवरी, 1972 को अधिकृत तौर पर विवेकानंद केंद्र कि स्थापना हुआ। आज  ये समाज कल्याण के कार्य जैसे की शिक्षा, ग्रामीण विकास, युवा विकास, प्राकृतिक संसाधन विकास, सांस्कृतिक अनुसंधान और प्रकाशन के कार्य करता है। विवेकानंद केंद्र अपने शाखा केंद्रों और सेवा परियोजनाओं के माध्यम से 1005 से अधिक स्थानों पर 25 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में काम कर रहा है और दिन- प्रतिदिन बढ़ रहा है।

इसमें देश के युवाओं की एक बड़ी संख्या भी सम्मिलित है। विवेकानंद शिला स्मारक हम सब के लिए एक प्रेरणा स्रोत है जो स्वामी जी की ही तरह एक वट वृक्ष के समान है जो अपने अंदर अनेकों लोगों को भारतीय संस्कृति जीवित रखने और एक श्रेष्ठ मनुष्य बन ने का संदेश देता है।

(लेखिका आकृति कैंथोला और लेखक निखिल यादव , विवेकानंद केंद्र , उत्तर प्रान्त के कार्यकर्ता है।)

वसीम रिजवी की किताब ‘मोहम्मद’ पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, यति नरसिंहानंद की गिरफ्तारी की माँग भी ठुकराई

सुप्रीम कोर्ट ने वह जनहित याचिका खारिज कर दी है जिसमें यति नरसिंहानंद सरस्वती और वसीम रिजवी उर्फ जितेंद्र त्यागी को गिरफ्तार करने की माँग की थी। याचिका भारतीय मुस्लिम शिया इस्ना आशारी जमात की ओर से दायर की गई थी। याचिका में रिजवी की किताब ‘मोहम्मद’ पर भी प्रतिबंध लगाने की अपील की गई थी।

शीर्ष अदालत से याचिकाकर्ता ने यति नरसिंहानंद और रिजवी को इस्लाम, पैगंबर मोहम्मद और मजहब से जुड़े विषयों पर टीका टिप्पणी करने से रोकने की भी माँग की थी। लेकिन मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित और एसआर भट की पीठ ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 32 के तहत इस तरह की याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती।

गिरफ्तारी की माँग पर सवाल उठाते हुए शीर्ष अदालत ने कहा यदि अनुच्छेद 32 के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने और किसी की गिरफ्तारी के मामले में कार्रवाई आगे बढ़ती है तो फिर ललिता कुमारी मामले में दिए गए फैसले का क्या औचित्य रह जाएगा। साथ ही याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उन्होंने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है।

अदालत के इन सवालों के बाद याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी की अपील वापस लेने की बात कहते हुए पीठ से अन्य माँगों पर गौर करने की गुहार लगाई। लेकिन पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यह आर्टिकल 32 के तहत सुनवाई के योग्य नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता अन्य विकल्पों के तहत इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। याचिका में रिजवी और यति नरसिंहानंद को सुरक्षा और अखंडता, सामाजिक सद्भाव, शांति तथा कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए खतरा बताया गया था।

गौरतलब है कि शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने यति नरसिंहानंद सरस्वती से ही अपनी किताब ‘मोहम्मद’ का विमोचन करवाया था। उन्होंने कुरान की आयतें हटाने को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कुरान की 26 आयतों को आतंकवाद को बढावा देने वाला बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए रिजवी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था।

किताब ‘मोहम्मद’ को लेकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी तथा पार्टी के अन्य नेताओं ने नवंबर 2021 में को हैदराबाद में रिजवी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। ओवैसी ने शिकायत में कहा था, “हिंदी में लिखी गई किताब में इस्लाम और उसके अनुयायियों के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है।” 

प्रयागराज में नागवासुकी मंदिर के पास गंगा में नाव पर हुक्का-नॉनवेज पार्टी: हस्सान और फैजान सहित 8 की करतूत, Video वायरल होने के बाद 3 गिरफ्तार

पिछले दिनों प्रयागराज के संगम क्षेत्र का एक वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो में कुछ लोग गंगा नदी में नाव पर बैठ कर हुक्का पीते और नॉनवेज पकाते दिख रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद हिन्दू संगठनों ने विरोध दर्ज कराया था। पुलिस ने इस मामले में हस्सान और फैज़ान सहित कुल 8 लोगों पर FIR दर्ज की है। वीडियो वायरल होने के बाद से आरोपित फरार हैं। इनमें से 3 को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनसे अन्य के बारे में पूछताछ की जा रही है।

वायरल वीडियो प्रयागराज के दारागंज थाना क्षेत्र का है। जानकारी के मुताबिक जिस जगह ये वीडियो बनाया गया था वो हिन्दू समाज के आस्था केंद्र नागवासुकी मंदिर के पास का क्षेत्र है। वीडियो में नाव में कुल 8 लोग दिखाई दे रहे हैं। आसपास कई अन्य नौकाएँ भी दिख रहीं हैं, जिसमें कई श्रद्धालु बैठे दिखाई दे रहे हैं। नाव पर ही हुक्का रखा हुआ है और एक बर्तन में माँस पक रहा है। सफ़ेद शर्ट पहने एक युवक हुक्का पी रहा है और मोबाइल पर म्यूजिक भी बजाया जा रहा है।

माना जा रहा है कि आरोपितों ने खुद ही वीडियो को बनाकर इसे वायरल किया है। प्रयागराज के SSP शैलेश पांडेय ने 31 अगस्त 2022 को वीडियो में दिख रहे लोगों की पहचान के निर्देश दिए थे। जाँच के बाद 1 सितंबर को कुल 8 आरोपितों को नामजद किया गया। फैज़ान और हस्सान के अलावा 6 आरोपित अज्ञात हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हस्सान और फैज़ान फरार हैं। पुलिस के मुताबिक इनकी तलाश की जा रही है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले झारखंड के राजमहल के साहिबगंज में मौलाना नवाब शेख का सोशल मीडिया पर संदेश वायरल हुआ था जिसमें वो हिन्दू देवी- देवताओं को फर्जी बताते हुए सभी को इस्लाम कबूलने की चेतावनी दे रहा था।

वे नहीं रहे… क्योंकि वे हिंदू थे: कुल्हाड़ी से काट दबा दी कर्नाटक की एक युवा आवाज, कहानी उस हत्या की जिसके कसाई का बेटा और PFI बताए जाते हैं किरदार

26 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ता प्रवीण नेट्टारू की कट्टर इस्लामी हमलावरों ने हत्या कर दी थी। चिकन की दुकान चलाने वाले नेट्टारू जब घर लौट रहे थे, तब उन पर हमला किया गया था। उनके हत्यारे शाम के समय कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ के बेल्लारे में एक बाइक पर आए थे। हत्यारों ने नेट्टारू पर धारदार हथियारों से हमला किया और फरार हो गए थे। हमले के बाद प्रवीण नेट्टारू को अस्पताल ले जाया गया था लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

प्रवीण नेट्टारू की हत्या के कारणों पर शुरुआती अटकलें

प्रवीण नेट्टारू भारतीय जनता पार्टी की युवा शाखा (भाजयुमो) के सक्रिय कार्यकर्ता थे। वह भारतीय जनता युवा मोर्चा की दक्षिण कन्नड़ जिला इकाई के कार्यकारी समिति के सदस्य थे। उनका बेल्लारी में पोल्ट्री व्यवसाय था। 26 जुलाई, 2022 को जब वह अपनी दुकान बंद करके घर लौट रहे थे, तब उन पर धारदार हथियारों से हमला किया गया और हमलावरों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमलावर मोटरसाइकिल पर आए थे। मोटरसाइकिल पर केरल का रजिस्ट्रेशन नंबर था। जिस स्थान पर यह घटना हुई, वह केरल सीमा के करीब है। प्रवीण नेट्टारू के गिरने के तुरंत बाद हमलावर भाग गए। प्रवीण नेट्टारू को अस्पताल ले जाया गया लेकिन वह बच नहीं सके।

इसके बाद जब कर्नाटक पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करते हुए जाँच शुरू की। कई अटकलों में यह कहा गया कि एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या और एक मस्जिद से संबंधित मामले सहित उससे पहले की दो घटनाओं के कारण प्रवीण नेट्टारू की हत्या हो सकती है। हालाँकि, ये सभी बातें सिर्फ शुरू में ही कही गई। इस पूरे घटनाक्रम के विरोध में भाजपा कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन शुरुआत में सामान्य था। लेकिन, फिर पूरे राज्य में प्रदर्शन होने शुरू हो गए थे।

जाँच और गिरफ्तारियाँ

28 जुलाई, 2022 को कर्नाटक पुलिस ने भाजपा युवा मोर्चा के सदस्य प्रवीण कुमार नेट्टारू की हत्या के मामले में दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया। आरोपितों की पहचान जाकिर और मोहम्मद शफीक के रूप में हुई। दोनों को केरल के कासरगोड से गिरफ्तार किया गया था। जाकिर 29 साल का है और सवनूर का रहने वाला है जबकि 27 साल का मोहम्मद शफीक बेल्लारी का रहने वाला है। ये दोनों हत्या के साजिशकर्ता थे, न कि वास्तविक हमलावर।

इन दो आरोपितों की गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद ही ऐसी खबरें सामने आई थीं कि शफीक और जाकिर इस्लामी आतंकवादी संगठन पीएफआई और एसडीपीआई से जुड़े हुए हैं। शफीक की पत्नी ने पुष्टि की है कि उसका पति PFI का सक्रिय सदस्य था। शफीक की पत्नी ने इंडिया टुडे को बताया था, “मेरे पति पीएफआई के सदस्य हैं और उन्हें मालूम था कि प्रवीण की हत्या हुई है।”

शफीक एसडीपीआई (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया) से भी जुड़ा और उसने विभिन्न कथित ‘सामाजिक’ कार्यक्रम भी आयोजित किए थे। शफीक की गिरफ्तारी के बाद उसकी पत्नी ने मीडिया से बात करते हुए यह भी कहा था कि शुरू में उसके पति को हत्या की जानकारी नहीं थी। उसका कहना था कि लेकिन, जब यह पता चला कि गाँव में किसी की हत्या हुई है तो उनकी आँखों में आँसू आ गए थे।

शफीक के पिता प्रवीण नेट्टारू की दुकान में काम करते थे

इस मामले में एक और अहम तथ्य यह है कि आरोपित शफीक के पिता इब्राहिम प्रवीण नेट्टारू की चिकन की दुकान पर कसाई का काम करते थे। इस बात का खुलासा खुद इब्राहिम ने मीडिया से बातचीत के दौरान किया था। इब्राहिम ने ‘इंडिया टुडे’ को बताया था, “मैं प्रवीण की दुकान पर काम करता हूँ। मेरा बेटा और प्रवीण वहाँ बात करते थे।” इब्राहिम ने अपराध में अपने बेटे की संलिप्तता से इनकार किया था। साथ ही आरोप लगाया था कि उसे सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वो लोग मुस्लिम हैं। प्रवीण नेट्टारू की नृशंस हत्या एक मामला है, जहाँ आरोपित और उसका परिवार पीड़ित को जानता था।

उदयपुर में दर्जी कन्हैया लाल और अमरावती में कैमिस्ट उमेश कोल्हे को पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा का समर्थन करने वाले सोशल मीडिया पोस्ट शेयर करने के लिए इस्लामवादियों ने मार डाला था। इन दोनों मामलों में मुखबिर या साजिशकर्ता पीड़ितों के परिचित थे। कन्हैया लाल की तस्वीर और लोकेशन को उसके पड़ोसी नाजिम ने लीक कर वायरल कर दिया था। नाजिम और उसके मुस्लिम साथियों ने भी उनकी दुकान की रेकी की।

उमेश कोल्हे के परिवार के साथ जो घटना घटी, उसमें उनके 16 साल पुराने दोस्त यूसुफ खान ने भी मदद की थी। कन्हैया लाल की तरह, नूपुर शर्मा का समर्थन करने के लिए उमेश कोल्हे को भी मौत के घाट उतार दिया गया था। कोल्हे की हत्या के लिए यूसुफ ने ही इस्लामवादियों को अपने दोस्त की हत्या करने के लिए उकसाया था। पुलिस के अनुसार, युसूफ खान ने उमेश कोल्हे के मैसेज को व्हाट्सएप ग्रुपों में यह कहते हुए शेयर किया था कि उमेश कोल्हे ईशनिंदा के आरोपी का समर्थन कर रहे हैं।

हत्या के कारणों पर थ्योरी

अब तक हत्या के विभिन्न कारणों के साथ तीन अलग-अलग थ्योरी सामने आ चुकी हैं। एक तो यह है कि प्रवीण नेट्टारू को इसलिए मारा गया क्योंकि उन्होंने कन्हैया लाल का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। दूसरी थ्योरी यह थी हो सकता है कि एक मुस्लिम व्यक्ति, (जिसे हिन्दू व्यक्ति की पिटाई के बाद हिंदुओं ने मिलकर पीटा था जिस कारण उसकी मौत हो गई थी) की मौत के प्रतिशोध के रूप में उनकी हत्या की गई हो। तीसरी थ्योरी में कहा गया कि प्रवीण नेट्टारू ने जिस चिकन की दुकान खोली थी, वह इलाके में मुस्लिमों द्वारा चलाई जा रही मीट की दुकानों से कहीं बेहतर कमाई कर रही थी। ऐसे में प्रवीण इस्लामवादियों के लिए नफरत का कारण बन गए थे।

पुलिस प्रशासन की उदासीनता

दूसरी थ्योरी पर फोकस करें तो कई स्थानीय हिंदू नेता कथित रूप से उस क्षेत्र में इस्लामवादियों की हिटलिस्ट में थे। बताया जाता है कि, मसूद नाम के एक मुस्लिम की मौत का बदला लेने के लिए ऐसा प्लान बनाया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रवीण नेट्टारू ने स्थानीय पुलिस को धमकियों की जानकारी देते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई थी। लेकिन, पुलिस ने उन्हें यह कहते हुए सुरक्षा प्रदान करने से इनकार कर दिया था कि वह कोई इतने बड़े नेता नहीं हैं जिन्हें धमकियाँ मिल रही हों।

प्रवीण नेट्टारू हत्याकांड में पीएफआई और एसडीपीआई से जुड़ी और गिरफ्तारियाँ

11 अगस्त, 2022 को प्रवीण नेट्टारू हत्याकांड के तीन मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। ये गिरफ्तारी मंगलुरु पुलिस ने तलपडी चेक पोस्ट के पास की थी। गिरफ्तार आरोपितों की पहचान सुलिया के शियाबुद्दीन अली, बशीर और सुब्रमण्या के रियाज के रूप में हुई। उन्हें यह भी संदेह था कि गिरफ्तार आरोपित इस्लामिक संगठन PFI और उसकी राजनीतिक शाखा SDPI से जुड़े हो सकते हैं। 18 अगस्त, 2022 को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने इस मामले के 5 प्रमुख आरोपितों को आगे की जाँच के लिए हिरासत में ले लिया था।

प्रवीण नेट्टारू की हत्या के बाद सामने आया जन आक्रोश

प्रवीण नेट्टारू की हत्या के बाद कर्नाटक के दक्षिणी हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। बेल्लारी और सुलिया में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और ‘विश्व हिंदू परिषद’ ने बंद का आह्वान किया। 27 जुलाई की सुबह प्रवीण नेट्टारू के शव को उनके घर ले जाए जाने के दौरान सैकड़ों लोग उनके साथ थे।

इस हत्या के बाद गुस्साए भाजपा युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं  ने सामूहिक इस्तीफे देने शुरू कर दिए। इस घटना के बाद पार्टी की भाजयुमो के कार्यकर्ता बेहद दुःखी और आक्रोशित यह थे। कई कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफे वाली पोस्ट भी सोशल मीडिया पर शेयर की थी।

इस मामले में, कर्नाटक भाजपा विधायक रेणुकाचार्य ने यह भी कहा कि भाजपा शासन होने के बावजूद हिंदू सुरक्षित नहीं हैं। रेणुकाचार्य ने कर्नाटक में हिंदुओं की रक्षा नहीं होने पर विधायक पद से अपना इस्तीफा देने की धमकी भी दी थी।

यही नहीं, प्रवीण नेट्टारू की हत्या का विरोध कर रहे हिंदू कार्यकर्ताओं और भाजपा कार्यकर्ताओं ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नलिन कुमार कतील की कार को घेर लिया था और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से जवाब माँगा था।

कर्नाटक भाजपा ने सौधा में एक आधिकारिक कार्यक्रम और मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के कार्यालय में एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 28 जुलाई को डोड्डाबल्लापुर में एक विशाल रैली की योजना बनाई थी। इस कार्यक्रम में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा शामिल होने वाले थे। हालाँकि, इस हत्या और उसके बाद बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध को देखते हुए पार्टी ने कार्यक्रम रद्द कर दिया था।

राज्य सरकार का स्टैंड

28 जुलाई 2022 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा कि वह कर्नाटक में देश विरोधी और कट्टरपंथी उपद्रवियों से निपटने के लिए यूपी मॉडल को लागू करने में संकोच नहीं करेंगे। 

सीएम बसवराज बोम्मई ने कहा था, “जो भी संभव होगा, हम करेंगे। अगर जरूरत पड़ी तो ‘यूपी मॉडल’ या उससे भी सख्त कदम उठाने के लिए हम नहीं हिचकिचाएँगे।” यूपी मॉडल शब्द का अर्थ है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कड़े कदम, जिसमें बदमाशों और माफियाओं के खिलाफ बुलडोजर का इस्तेमाल शामिल है। 

27 जुलाई और 28 जुलाई की मध्यरात्रि को, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने घोषणा करते हुए कहा कि राज्य सरकार विशेष प्रशिक्षण, खुफिया, गोला-बारूद और संसाधनों के साथ एक कमांडो फोर्स बनाएगी। यह कमांडो फोर्स राष्ट्र-विरोधी और आतंकी समूहों द्वारा शांति भंग करने की साजिश रचने पर कार्रवाई करेगी।

कर्नाटक में पैर पसारता इस्लामिक कट्टरपंथ

बता दें कि इस्लामी कट्टरपंथ दक्षिणी राज्यों में भी पाँव पसार रहा है। टीपू सुल्तान का महिमामंडन होता रहता है। ऐसा दिखाया जाता है कि निजाम ने जानबूझ कर पाकिस्तान को छोड़ भारत को चुना।

कर्नाटक ने वर्ष 2022 की शुरुआत में इस्लामवाद और उसके कट्टरपंथ का बड़ा स्वरूप देखा है। राज्य के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में ड्रेस कोड होने के बाद भी मुस्लिम छात्राओं ने इस्लामी पारंपरिक पोशाक के अनुसार हिजाब पहनने के लिए अड़ियल रुख अपनाया। 2022 के शुरुआती महीनों में यह एक बड़ा मुद्दा रहा। इसके अलावा, लाउडस्पीकर से दिन में 5 बार नमाज खासतौर से सुबह-सुबह का शोर आसपास के निवासियों की परेशानी का दूसरा बड़ा कारण था।

इसके अलावा, नूपुर शर्मा की पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ कथित ईशनिंदा पर विरोध की आड़ में विरोध या हिंसा की घटनाओं ने बजरंग दल के कार्यकर्ता हर्ष और भाजयुमो नेता प्रवीण नेट्टारू की हत्याओं से पहले के महीनों में राज्य में कई ऐसी घटनाएँ होती रहीं हैं। ऐसी घटनाएँ बतातीं हैं कि इस्लामिक कट्टरपंथ किस हद तक हावी होता जा रहा है।

‘शूद्रों को नहीं था अनुष्ठान का अधिकार, ब्राह्मणों ने महिलाओं को भी इसी समूह में रखा’: बिना सबूत पढ़ा रहा NCERT, RTI में भी नहीं दे पाया तथ्य

बचपन से ही हर एक छात्र को वर्ण व्यवस्था (Varna System) के बारे में पढ़ाया जाता है। सदियों से वर्ण व्यवस्था पर बहस होती आ रही है, लेकिन सही मायने में वर्ण व्यवस्था क्या है इसे कोई सही रूप से समझा नही पाया है। कक्षा 6 की NCERT पुस्तक के अध्याय 5 में वर्ण व्यवस्था पर जो छात्रों को पढ़ाया जा रहा है, वही आज समाज में आपसी मतभेद का सबसे बढ़ा कारण बनता जा रहा है।

कक्षा 6 की NCERT पुस्तक के पृष्ठ संख्या 47-48 में लिखा है, “पुरोहितों ने लोगों को चार वर्णों में विभाजित किया, जिन्हें वर्ण कहते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक वर्ण के अलग-अलग कार्य निर्धारित थे। पहला वर्ण ब्राह्मणों का था। उनका काम वेदों का अध्ययन-अध्यापन और यज्ञ करना था, जिनके लिए उन्हें उपहार मिलता था। दूसरा स्थान शासकों का था, जिन्हें क्षत्रिय कहा जाता था। उनका काम युद्ध करना और लोगों की रक्षा करना था।

इसी में आगे लिखा गया है, “तीसरे स्थान पर विशु या वैश्य थे। इनमें कृषक, पशुपालक और व्यापारी आते थे। क्षत्रिय और वैश्य, दोनों को ही यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त था। वर्णों में अंतिम स्थान शूद्रों का था। इनका काम अन्य तीनों वर्गों की सेवा करना था। इन्हें कोई अनुष्ठान करने का अधिकार नहीं था। प्रायः महिलाओं को भी शूद्रों के समान माना गया।”

शूद्रों को लेकर इसमें कहा गया है, “महिलाओं तथा शूद्रों को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था। राज्य, राजा और एक प्राचीन गणराज्य पुरोहितों के अनुसार, सभी वर्गों का निर्धारण जन्म के आधार पर होता था। उदाहरण के तौर, पर ब्राह्मण माता-पिता की संतान ब्राह्मण होती थी।” 

NCERT के द्वारा वर्णित वर्ण व्यवस्था के इस अध्याय को आधार बनाते हुए लेखक के द्वारा एक आरटीआई (RTI) NCERT को दायर की गई थी। इस RTI में NCERT से 2 प्रमुख बिन्दुओं पर जानकारी माँगी गई थी।

  1. प्रायः महिलाओं को भी शूद्रों के समान माना गया है। महिलाओं तथा शूद्रों को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था।
  2. पुरोहितों के अनुसार सभी वर्णों का निर्धारण जन्म के आधार पर होता था। उदाहरण के तौर पर, ब्राह्मण माता-पिता की संतान ब्राह्मण होती थी।

इन दोनों प्रमुख बिन्दुओं पर NCERT के पास कोई भी तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध नही है। NCERT ने मनुस्मृति का उल्लेख तो किया, लेकिन उसके पास इसकी कोई सत्यापित कॉपी भी नहीं है, जिसके आधार पर छात्रों को यह वर्षों से पढ़ाया जा रहा है।

भारत देश के इतिहास एवं पारम्परिक रीति-रिवाजों से हम भी भली-भाँति परिचित हैं, जहाँ महिलाओं को ईश्वर के रूप में सदियों से पूजा जाता आ रहा है। इसके बावजूद हमारे देश में महिलाओं को वेद पढ़ने का अधिकार कैसे नहीं दिया गया? वेदों के अध्ययन को लेकर यजुर्वेद के अध्याय 26 के दूसरे मंत्र में लिखा गया है:

“हे मनुष्यों! मैं ईश्वर (यथा) जैसे (ब्रह्मराजन्याभ्याम्) ब्राह्मण, क्षत्रिय (अर्याय) वैश्य (शूद्राय) शूद्र (च) और (स्वाय) अपने स्त्री, सेवक आदि (च) और (अरणाय) उत्तम लक्षणयुक्त प्राप्त हुए अन्त्यज के लिए (च) भी (जनेभ्यः) इन उक्त सब मनुष्यों के लिए (इह) इस संसार में (इमाम्) इस प्रकट की हुई (कल्याणीम्) सुख देने वाली (वाचम्) चारों वेद रूपवाणी का (आवदानि) उपदेश करता हूँ, वैसे आप लोग भी अच्छे प्रकार उपदेश करें।”

इस मंत्र में साफ-साफ चारों वर्णों को वेदों का पाठ करने के लिए कहा गया है। हर एक वर्ण को वेदों का पाठ करने की पूरी पूरी आजादी है तो फिर NCERT बिना प्रमाणिकता के क्यों ऐसे लेख छात्रों को पढ़ा रहा है, जो समाज में आपसी मतभेद का कारण बन रहा है? 

NCERT की पुस्तक में लिखा है, पुरोहितों के अनुसार सभी वर्णों का निर्धारण जन्म के आधार पर होता था। उदाहरण के तौर पर, ब्राह्मण माता-पिता की संतान ब्राह्मण ही होती थी। NCERT ने इसका स्रोत मनुस्मृति को बताया है, जिसका सत्यापित प्रमाण उनके पास नहीं है।

वहीं, मनुस्मृति में महाराज मनु ने लिखा है, “ब्राह्मण शूद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण बन सकता है। किसी भी वर्ण का व्यक्ति ऐसे गुणों को प्राप्त करके किसी भी वर्ण में बदल सकता है।” भगवद्गीता में लिखा है, “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण उनके गुणों और कौशल से वितरित होते हैं और वे जो कर्म करते हैं, वह जन्म से प्राप्त नहीं होता है।”

इस पूरे अध्याय में NCERT ने वेदों में वर्णित कथनों को घूमा-फिरा कर लिखा है और आज तक छात्रों को यही सब पढ़ाया जा रहा है। जब शिक्षा ही मतभेदों की तर्ज पर दी जाएगी तो लोगों मे मतभेद होना लाजिमी है।