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नदीमर्ग में हिंदुओं के नरंसहार की फाइल फिर खुलेगी, जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का आदेशः 24 कश्मीरी पंडित (11 पुरुष+11 महिला+2 बच्चे) 2003 में भून दिए गए थे

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने एक दशक पहले बंद हो चुके नदीमर्ग नरसंहार केस (Nadimarg Massacre Case) को फिर से खोलने का आदेश दिया है। यह नरसंहार मार्च 2003 में पुलवामा जिले के नदीमर्ग गाँव मे हुआ था। लश्कर आतंकियों ने 24 कश्मीरी हिन्दुओं की निर्मम हत्या कर दी थी।

न्यायमूर्ति संजय धर ने राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे फिर से खोलने का आदेश शुक्रवार (26 अगस्त 2022) को दिया। इस याचिका में दिसंबर 2011 के आदेश को वापस लेने की माँग की गई थी। उस समय आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई थी।

नदीमर्ग नरसंहार मामले में स्थानीय जैनपोरा थाने में धारा 302, 450, 395, 307, 120-बी, 326, 427 आरपीसी, 7/27 आर्म्स एक्ट और धारा 30 के तहत दर्ज किया गया था। शुरुआती जाँच के बाद 7 आरोपितों के खिलाफ प्रधान सत्र न्यायालय पुलवामा में चालान पेश किया गया। बाद में केस शोपियाँ के प्रधान सत्र न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया गया।

शोपियाँ की अदालत को अभियोजन पक्ष ने बताया था कि गवाह डर के कारण घाटी छोड़कर जा चुके हैं। वे सुनवाई के दौरान हाजिर नहीं हो सकते। इसके बाद केस बंद कर दिया गया। लेकिन, जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के ताजा आदेश से इस मामले में एक बार फिर न्याय की उम्मीद जगी है। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2022 को होगी।

क्या है नदीमर्ग नरसंहार

शोपियाँ जिले में नदीमर्ग (अब पुलवामा में) एक हिन्दू बहुल गाँव था, जिसकी कुल आबादी मात्र 54 थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के पैतृक गाँव से 7 किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव में 23 मार्च, 2003 की रात सब तबाह हो गया। जब पूरा देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की याद में शहीद दिवस मना रहा था, तब नदीमर्ग में हिन्दुओं का नरसंहार हो रहा था। उस दिन 7 आतंकवादी गाँव में घुसे और सभी हिन्दुओं को चिनार के पेड़ के नीचे इकठ्ठा करने लगे। रात के 10 बजकर 30 मिनट पर इन आतंकियों ने 24 हिन्दुओं की गोली मार कर हत्या कर दी। गौर करने वाली बात थी कि 23 मार्च को पाकिस्तान का राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है।

मरने वालों में 70 साल की बुजुर्ग महिला से लेकर 2 साल का मासूम बच्चा तक शामिल था। क्रूरता की हद पार करते हुए एक दिव्यांग सहित 11 महिलाओं, 11 पुरुषों और 2 बच्चों पर बेहद नजदीक से गोलियाँ चलाई गई थी। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि पॉइंट ब्लेंक रेंज से हिन्दुओं के सिर में गोलियाँ मारी गई थी। आतंकी यही नहीं रुके उन्होंने घरों को लूटा और महिलाओं के गहने उतरवा लिए। न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने इस घटना का जिम्मेदार ‘मुस्लिम आतंकवादियों’ बताया। अमेरिका के स्टेट्स डिपार्टमेंट ने भी इसे धर्म आधारित नरसंहार माना था।

आतंकियों को मदद पड़ोस के मुस्लिम बहुलता वाले गाँवों से मिली थी। उस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस के इंटेलिजेंस विंग को संभाल रहे कुलदीप खोड़ा भी मानते हैं कि बिना स्थानीय सहायता के नदीमर्ग नरसंहार को अंजाम ही नहीं दिया जा सकता था। नरसंहार के चश्मदीद बताते है कि आतंकियों ने हिन्दूओं को उनके नाम से पुकारकर घरों से बाहर निकाला था। यानी वे पहले से ही इस योजना पर काम कर रहे थे। आतंकियों ने गाँव का दौरा किया हो, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस प्रकरण में राज्य सरकार की भूमिका भी संदेह वाली बनी रही। उस इलाके की सुरक्षा में लगी पुलिस को हटा लिया गया था। घटना से पहले वहाँ 30 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जिनकी संख्या उस रात घटाकर 5 कर दी गई।

नदीमर्ग नरसंहार के बाद जम्मू-कश्मीर के हिन्दुओं के मन में बैठ गया कि वे राज्य में सुरक्षित नहीं हैं। इस नरसंहार के करीब एक महीने बाद आतंकी जिया मुस्तफा गिरफ्तार किया गया था। वह पाकिस्तान के रावलकोट का रहने वाला था और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तय्यबा का एरिया कमांडर था। उसने बताया था कि लश्कर के अबू उमैर ने उसे ऐसा करने के लिए कहा था। मुस्तफा के मुताबिक वह उन बैठकों का हिस्सा रहा था, जहाँ भारत के हिन्दू मंदिरों पर आतंकी हमले की योजना बनाई गई थी। 

जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में 24 अक्टूबर 2021 को सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच एक मुठभेड़ में जिया मुस्तफा मारा गया था। कश्मीर की कोट बलवाल जेल में बंद मुस्तफा को 10 दिनों की रिमांड पर लिया गया था। भाटा दूरियान नाम की जगह पर पहचान के लिए उसे ले जाते वक़्त आतंकियों ने जवानों पर फायरिंग कर दी थी। आग से घिर जाने के चलते आतंकी मुस्तफा को निकाला नहीं सके। बाद में उसकी लाश बरामद की गई।

अमेरिका में ‘बाबा का बुलडोजर’ वाली परेड पर IBA का माफी माँगने से इनकार, कहा- भारत में यह अवैध निर्माणों को गिराता है

भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर परेड के दौरान अमेरिका के न्यू जर्सी में बुलडोजर शामिल करने वाले इंडियन बिजनेस एसोसिएशन (IBA) ने माफी माँगने से इनकार कर दिया है। एसोसिएशन का कहा कि परेड में बुलडोजर को शामिल करके उसने कुछ भी गलत नहीं किया है।

टाउनशिप काउंसिल की बैठक में 24 अगस्त 2022 को आईबीए के अध्यक्ष चंद्रकांत पटेल ने कहा कि संगठन ने कुछ भी गलत नहीं किया है। इसलिए माफी नहीं माँगेगा। पटेल ने कहा, “बुलडोजर केवल सरकारी भूमि (भारत में) पर अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का काम करता है।” चार घंटे तक चली बैठक में कई स्थानीय लोगों ने इस पर अपनी राय रखी।

टाउनशिप काउंसिल की बैठक में स्थानीय लोगों के साथ भारतीय मुसलमानों और हिंदुओं ने भी भाग लिया (फोटो साभार- MEE)

दरअसल, भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अमेरिका के न्यू जर्सी के एडिसन में इंडियन बिजनेस एसोसिएशन ने परेड निकाली थी। इस परेड में संगठन ने बुलडोजर को भी शामिल किया था, जिसका नाम नाम ‘बाबा का बुलडोजर’ (Baba ka Bulldozer) रखा था।

आयोजकों ने बुलडोजर के ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) का पोस्टर भी लगाया था। साथ ही उन्होंने सड़कों पर बुलडोजर भी घुमाया।

इस तस्वीर को देखने के बाद इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल भड़क गया। उसने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल IAM काउंसिल से ट्वीट करके बताया कि उसे बुलडोजर देख कितनी परेशानी हुई है।

आईएएम काउंसिल ने लिखा, “आज, न्यू जर्सी के ए़़डिसन में दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों ने उस बुलडोजर के साथ मार्च किया, जो भारत में मुस्लिमों के घरों और जीवन को तबाह करने के लिए भाजपा सरकार का हथियार बन चुका है।”

इस ट्वीट को देखने के बाद कई अन्य मुस्लिमों ने भी प्रतिक्रिया दी। एक यूजर ने लिखा था, “भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी ये लोग मुस्लिमों के खिलाफ अपनी घृणा को नहीं छिपा पा रहे।”

वहीं, अमेरिका में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन से जुड़े समाजसेवी जेली थॉमस ने कहा, “जैसे कभी अमेरिका में अश्वेतों को पेड़ों से बाँधकर मार दिया जाता था और रस्सी अश्वेतों को डराने की प्रतीक बन गई थी, उसी तरह बुलडोजर अल्पसंख्यकों को डराने का प्रतीक है।”

अपडेट : इंडियन बिजनेस एसोसिएशन (IBA) ने मुस्लिमों की आहत भावनाओं को देख न्यू जर्सी परेड में बुलडोजर शामिल किए जाने पर खेद जताया है। यह परेड भारत की स्वतंत्रता दिवस के मौके पर निकाला गया था। शुरुआत में आईबीए ने इसके लिए माफी माँगने से इनकार किया था। लेकिन दबाव बढ़ने पर उसने 30 अगस्त 2022 को खेद जताते हुए विवाद का निपटारा करने की कोशिश की है।

हिमंता सरकार का आतंकियों के खिलाफ अभियान तेज: असम पुलिस ने बोंगाईगाँव से अल-कायदा के एक और आतंकी को किया गिरफ्तार, मदरसे में था मौलवी

पुलिस ने शुक्रवार (26 अगस्त 2022) को असम ने बोंगाईगाँव जिले से एक संदिग्ध आतंकी को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जाँच में इस आतंकी का संबंध अल-कायदा भारतीय उपमहाद्वीप (AQIS) और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) से जुड़ा पाया गया है। फिलहाल यह आतंकी पुलिस हिरासत में है, जहाँ इससे कड़ी पूछताछ की जा रही है।

पुलिस ने यह गिरफ्तारी गोलपारा जिला पुलिस द्वारा बोंगाईगाँव जिले के जोगीघोपा इलाके से की है। गिरफ्तार संदिग्ध आतंकी की पहचान हाफिजुर रहमान मुफ्ती के रूप में हुई है। हाफिजुर इलाके के एक मदरसे में पढ़ाता है।

गोलपारा के SP वीवी राकेश रेड्डी ने बताया, “गोलपारा जिला पुलिस ने बोंगाईगाँव जिले के जोगीघोपा इलाके से एक्यूआईएस/एबीटी से जुड़े हाफिजुर रहमान मुफ्ती को गिरफ्तार किया है। वह एक मदरसे में शिक्षक है। एक सप्ताह के भीतर AQIS/ABT से संबंध के मामले में यह चौथी गिरफ्तारी है।”

गौरतलब है कि असम पुलिस अल-कायदा भारतीय उपमहाद्वीप (AQIS) और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) से जुड़े आतंकियों के खिलाफ लगातार अभियान चला रही है। इस अभियान में एक के बाद आतंकी पुलिस के हत्थे चढ़ रहे हैं।

बता दें AQIS और ABT से जुड़े आतंकियों की यह पहली गिरफ्तारी नहीं है। गत शनिवार (20 अगस्त 2022) को पुलिस ने गोलपारा जिले से अब्दुस सुभान और जलालुद्दीन शेख नामक दो संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ये दोनों ही अलग-अलग मस्जिदों में इमाम थे।

इन संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी पर पुलिस ने बताया था कि ये दोनों बांग्लादेश से आए जिहादी आतंकियों को रहने और खाने-पीने का इंतजाम करते थे। इसके साथ ही ये AQIS की ओर से गोलपारा जिले में स्लीपर सेल की भर्ती कर रहे थे।

इसी प्रकार, 28 जुलाई 2022 को भी असम पुलिस ने 11 संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया था। इसके बाद हुई पूछताछ में इनके संबंध AQIS और ABT से जुड़े पाए गए थे।

बचकाना हरकत, रिमोट कंट्रोल मॉडल, चापलूसों की मंडली… राहुल गॉंधी के 2013-2022 तक की ‘राजनीति’ का गुलाम नबी आजाद ने 5 पन्नों में किया पोस्टमार्टम

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने शुक्रवार (26 अगस्त 2022) को पार्टी छोड़ दिया। उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता सहित सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। वे काफी समय से पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे थे।

पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखे अपने त्याग-पत्र में गुलाम नबी आजाद ने कहा कि उन्होंने इंदिरा गाँधी से लेकर सोनिया गाँधी तक के नेतृत्व में काम किया और पार्टी की मजबूती में हर तरह का योगदान दिया। हालाँकि, आजाद ने त्याग-पत्र में राहुल गाँधी को अपने निशाने पर रखा।

राहुल गाँधी को लेकर गुलाम नबी ने लिखा, “दुर्भाग्य से राहुल गाँधी की राजनीति में प्रवेश के बाद, खासकर जनवरी 2013 में आपके (सोनिया गाँधी) द्वारा उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने के बाद उन्होंने पार्टी में पहले से मौजूद परामर्श लेने के मैकेनिज्म को ध्वस्त कर दिया। सभी वरिष्ठ एवं अनुभवी नेताओं को किनारे कर दिया गया और चाटुकारों की अनुभवहीन नई मंडली पार्टी को चलाने लगी।”

गुलाम नबी आजाद ने कहा कि इस अपरिपक्वता का सबसे बड़ा उदाहरण राहुल गाँधी द्वारा सार्वजनिक रूप से सरकारी अध्यादेश को फाड़ना था। उन्होंने कहा, “यह अध्यादेश कॉन्ग्रेस कोर ग्रुप से बनाया गया था, जिसे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने पारित किया था और बाद में राष्ट्रपति ने इसे अनुमोदित किया था।”

गुलाम नबी आजाद ने कहा कि राहुल गाँधी की इस ‘बचकाना’ हरकत ने प्रधानमंत्री और भारत सरकार की गरिमा को विकृत कर दिया। उन्होंने कहा कि इस एक गलती ने साल 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपीए की हार में महत्वपूर्ण निभाई। दक्षिणपंथी दलों और कुछ कॉरपोरेट ने इसे मुद्दा बनाया।

गुलाम नबी यहीं नहीं रूके। उन्होंने सोनिया गाँधी को याद दिलाया कि सीताराम केसरी को कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के बाद पार्टी के दो-दो चिंतन शिविरों में कुछ सिफारिशें की गई थीं। इसके अलावा, साल 2013 के जयपुर शिविर में भी उन्होंने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ सहयोगियों के साथ मिलकर कुछ सिफारिशें पेश की थीं, जिसे कॉन्ग्रेस वर्किंग ग्रुप ने भी पारित किया था। इन सभी सिफारिशों को कभी लागू नहीं किया गया। यहाँ तक 2013 के जयपुर शिविर में की सिफारिशों को साल 2014 से पहले लागू किया जाना था, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया।

गुलाम नबी ने अपने त्याग-पत्र में कहा कि इन सिफारिशों को लागू करने के लिए वह सोनिया गाँधी और पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गाँधी से कई बार मिले, लेकिन उनकी बातों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया।

उन्होंने कहा, साल 2014 के बाद से आपके (सोनिया गाँधी) और राहुल गाँधी के नेतृत्व में पार्टी दो लोकसभा चुनावों में अपमानजनक तरीके हारी। 2017-2022 के बीच 49 विधानसभा चुनावों में से 39 में पार्टी की हार हुई। पार्टी केवल चार विधानसभा चुनाव जीत पाई।”

उन्होंने कहा, “साल 2019 के चुनावों के बाद पार्टी की स्थिति और बदतर हुई। उसके बाद आवेश में आकर राहुल गाँधी ने पद छोड़ दिया और आपने (सोनिया गाँधी) अंतरिम अध्यक्ष का पदभार सँभाला। तीन साल बाद भी आप इस पद पर बनी हुई हैं। यूपीए सरकार की सबसे बुरी दुर्गति ‘रिमोट कंट्रोल मॉडल’ के कारण हुई, जो पार्टी में भी लागू कर दिया गया।”

राहुल गाँधी को निशाने पर लेते हुए उन्होंने पत्र में सोनिया गाँधी को कहा, “आप तो नाममात्र की प्रमुख हैं, जबकि पार्टी से संबंधित सारे महत्वपूर्ण निर्णय राहुल गाँधी और यहाँ तक कि उनके सिक्योरिटी गार्ड और निजी सहायक (PA) द्वारा लिए जाते हैं।”

गुलाम नबी आजाद ने आरोप लगाया कि जब अगस्त 2020 में पार्टी के अंदर जारी घमासान को लेकर उन्होंने और उनके साथ 22 अन्य वरिष्ठ नेताओं ने हाईकमान को लिखा तो ‘चापलूसों की मंडली’ ने उन पर हमले शुरू कर दिए। उन्होंने कहा कि चापलूसों की इस मंडली का उत्साहवर्धन राहुल गाँधी और पार्टी के कुछ महासचिव करते रहे।

उन्होंने कहा कि देश भर पार्टी के किसी भी स्तर पर कोई चुनाव नहीं होता और चापलूसों को पद पर बैठा दिया जाता है। उन्होंने कहा कि पार्टी की स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दलों के लिए राजनीतिक जगह बची रह गई है।

बता दें कि गुलाम नबी आजाद ने शुक्रवार (26 अगस्त 2022) को कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को 5 पन्नों का इस्तीफा भेजा है। इसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर संजय गॉंधी तक का जिक्र है। गुलाम नबी ने पत्र में सोनिया गाँधी को ‘रबर स्टांप’ की तरह बताया है।

सेवा की मूर्ति बता राइस बैग छिपाए, मदर का तमगा दे मिशनरी में बच्चों को बाँधकर रखना छिपायाः जिस टेरेसा को इंदिरा की इमरजेंसी में भी दिखी थी ‘खुशी’, वह ‘संत’ कैसे

1910 में 26 अगस्त को अल्बेनिया के स्काप्जे में एक लड़की पैदा हुई। नाम रखा गया- गोंझा बोयाजिजू। दुनिया ने जाना ‘मदर टेरेसा’ के नाम से। उसे करुणा और सेवाभाव की मूर्ति के तौर पर वैसे ही प्रचारित किया गया, जैसे संत वेलेंटाइन को प्रेम का मसीहा बताया जाता है।

इसकी आड़ में मदर टेरेसा का ‘चावल के बोरों’ वाला परिचय छिपा लिया गया। यह नहीं बताया गया कि टेरेसा ‘मदर’ नहीं, कलकत्ता की ‘पिशाच’ थी। भोपाल गैस त्रासदी का समर्थन किया था। करोड़ों रुपयों की हेराफेरी की थी। उसकी मिशनरी में बच्चे बाँध कर रखे जाते थे। नन खुद को कोड़े मारती थीं। वह एक ऐसे पादरी की ‘रक्षक’ थी, जिस पर बच्चे के यौन शोषण का आरोप था।

मदर टेरेसा की दिल का दौरा पड़ने के कारण 5 सितंबर 1997 को मौत हो गई थी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उसकी मौत के बाद यह सिलसिला बंद हो गया। उसकी ‘मिशनरी ऑफ चैरिटी’ पर बच्चों के खरीद-फरोख्त का आरोप है। ‘मदर टेरेसा वेलफेयर ट्रस्ट’ के शेल्टर होम में बच्चियों के यौन शोषण की खबर तो पिछले साल ही सामने आई थी। दिसंबर 2021 में गुजरात में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के बाल गृह पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगा था। आरोप था कि यहाँ पर लड़कियों को गले में क्रॉस बाँध जबरन बाइबल पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें ईसाई धर्म अपनाने का लालच दिया जाता है। हिंदू लड़कियों को मांसाहारी भोजन दिया जाता है। 

‘The Turning: The Sisters Who Left’ नामक पॉडकास्ट में मदर टेरेसा के ऐसे ही डार्क साइड को दिखाया गया है। इसमें एक महिला की कहानी है, जो अपने समाज की मजहबी व्यवस्था से बाहर निकलना चाहती है और मदर टेरेसा की मिशनरी में फँस जाती है।

सबसे ज्यादा अत्याचार तो मिशनरी में ननों के साथ होता था। इस पॉडकास्ट में दिखाया गया है कि ननों को मरीजों और बच्चों को छूने तक की मनाही थी और न ही वो किसी से दोस्ती कर सकती थीं। जिन बच्चों की वो देखभाल करती थीं, उन्हें ही छूने की इजाजत नहीं थी। इन ननों को खुद पर ही कोड़े बरसाने का निर्देश दिया जाता था और एक दशक में 1 बार ही वो अपने परिवार से मिलने घर जा सकती थीं।  ननों को काँटों वाली चेन से खुद लो बाँध कर मात्र एक मग पानी से स्नान करना होता था। ननों की भर्ती के बाद उनके बाल शेव कर के जला डाला जाता था।

टेरेसा पर आम जनता का ध्यान शायद 1969 में आई बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म (समथिंग वंडरफुल फॉर गॉड) से शुरू हुआ था। उनका कोलकाता स्थित संस्थान पीड़ितों का इलाज नहीं करता था बल्कि उन्हें बताता था कि उन्हें पापों के लिए ईश्वरीय दंड मिला है, जिसे उन्हें बिना शिकायत झेलना चाहिए। नॉबेल पुरस्कार लेते वक्त टेरेसा ने 1979 में कहा था कि आज के दौर में शांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा गर्भपात है।

‘टेरेसा शोषित और वंचित वर्ग की हितैषी थीं’ – ऐसी तमाम कहानियों के विपरीत तानाशाहों के साथ भी उसके बहुत अच्छे संबंध थे। अपने जीवन के दौरान, उसने अक्सर क्रूर तानाशाहों का समर्थन किया और इस तरह अपने अत्याचार को वैधता का लिबास देने का प्रयास किया। 1971-86 के बीच पुलिस राज्य के रूप में हैती पर शासन करने वाले दुवैलियर के साथ टेरेसा के अच्छे संबंध थे। 1981 में अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने शासन को ‘गरीबों का दोस्त’ बताया, वही शासन जिसके शासकों ने 1986 के विद्रोह के बाद लाखों डॉलर के लिए हैतियों को लूट लिया था।

जेसुइट पादरी डोनल्ड जे मग्वायर मदर टेरेसा का आध्यात्मिक सलाहकार था। उसने 11 साल के एक लड़के का यौन शोषण किया – एक बार नहीं, हजारों बार। उसके खिलाफ यौन संबंधों के बारे में जब रिपोर्ट आई थी, तब मदर टेरेसा ने सभी आरोपों को असत्य बताया था। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जब इंदिरा गाँधी सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी तब मदर टेरेसा ने कहा था, “लोग इससे खुश हैं। उनके पास ज्यादा रोजगार है और हड़तालें भी कम हो रही हैं।”

UP में गायों को लाने, ले जाने के लिए परमिट आवश्यक नहीं: इलाहाबाद HC के जस्टिस असलम ने रद्द किया वाराणसी DM का ऑर्डर

उत्तर प्रदेश में गाय या गौवंश का परिवहन यूपी गौहत्या अधिनियम (UP Cow Slaughter Act) के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) के जस्टिस मोहम्मद असलम ने यह बात कही है। जस्टिस असलम ने गुरुवार (25 अगस्त 2022) को वाराणसी के जिलाधिकारी द्वारा पारित एक आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश राज्य के भीतर गाय और उसके वंश को ले जाने के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है।

जिलाधिकारी ने बिना वैध अनुमति के कथित गौहत्या के उद्देश्य से जानवरों को ले जा रहे वाहन को जब्त करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा कि वाराणसी के डीएम ने 18 अगस्त 2021 को जब्ती का गलत आदेश पारित किया, जबकि उत्तर प्रदेश राज्य के भीतर गाय और उसके वंश को ले जाने के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने कहा कि वाराणसी के डीएम का आदेश उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर का था।

जस्टिस असलम ने एक पुराने निर्णय का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि यदि यह मान भी लिया जाए कि आरोपित हत्या के लिए गाय और बैल ले जा रहे हैं तो भी वह गौहत्या अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध नहीं है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार इस फैसले में कहा गया था, “यदि परिवहन के दौरान गाय और बैल की मौत सामान्य कारणों से हो जाती है तो यह गौहत्या अधिनियम के तहत अपराध नहीं है। भले ही इन मवेशियों को हत्या करने के इरादे से ले जाया गया हो, क्योंकि हत्या के अपराध का इरादा दंडनीय नहीं है।”

मोहम्मद शाकिब ने दायर की थी याचिका

रिपोर्ट्स के मुताबिक मोहम्मद शाकिब ने वाराणसी जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने ट्रक को छोड़ने के लिए एक आवेदन दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उसने पुनरीक्षण याचिका दायर की थी, उसे भी खारिज कर दिया गया। फिर शाकिब ने डीएम के आदेश के साथ-साथ पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की

इस मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मोहम्मद असलम ने कहा कि गाय और उसके वंश को उत्तर प्रदेश के भीतर ले जाने के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है। बिना किसी कानूनी अधिकार के गाय के परिवहन व्यवसाय में लगे ट्रक को पुलिस ने पकड़ लिया और जब्त कर लिया। इस मामले में गौहत्या अधिनियम की धारा 3/5ए/8, 5बी और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 11 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

16 साल की हिंदू लड़की को अली ने मारी गोली, क्योंकि नहीं कर रही थी दोस्ती: दिल्ली की घटना, गली से लेकर सोशल मीडिया तक पीछे पड़ा था

दिल्ली के संगम विहार में एक 16 साल की लड़की को गोली मारने का मामला प्रकाश में आया है। बताया जा रहा है कि दूसरे समुदाय का एक लड़का काफी समय से उसका पीछा करता था। जब लड़की को पता चला कि लड़के का मजहब अलग है, तो उसने लड़के से बात करनी एकदम बंद कर दी। इसके बावजूद वह नाबालिग का पीछा करता रहा। अब उसी लड़के पर आरोप है कि उसने अपने साथियों के साथ आकर लड़की को गोली मारी।

घटना गुरुवार (24 अगस्त 2022) दोपहर की है। 2:15 के आसपास लड़की अपनी माँ और बहन के साथ स्कूल से घर आ रही थी। इसी दौरान उसका पीछा बाइकसवार लोगों ने किया और घर से थोड़ी दूर पहले उस पर गोली चली। घटना के बाद उसको एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया गया। लड़की का इलाज चल रहा है। उसने पुलिस को दिए बयान में बताया कि जब वो स्कूल से आ रही थी तो उसे तीन लोग बाइक पर आते दिखे। वह लोग उसका पीछा कर रहे थे। 

लड़की के अनुसार, उसने अपनी माँ-बहन के साथ जैसे ही संगम विहार के बी ब्लॉक में एंटर किया, तभी फायरिंग की गई। फिर लड़के बाइक तेज लेकर भाग गए। पड़ताल में पता चला है कि हमलावरों में से एक लड़का सोशल मीडिया के जरिए लड़की से संपर्क में था। पुलिस ने अब इस केस को हत्या की कोशिश मामले में दर्ज किया है। आरोपितों को पकड़ने का प्रयास भी चल रहा है।

जून में बीट कांस्टेबल ने लगाई थी फटकार

लड़की के पिता ने बताया है कि उन्हें बेटी पर हुए हमले के बारे में गुरुवार दोपहर 2:17 पर पता चला था। उन्हें इस घटना के पीछे उसी लड़के का हाथ लग रहा है जो उनकी बेटी का पीछा करता था। पिता के मुताबिक लड़का पड़ोस का था, इसलिए शुरू में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन बाद में वह सोशल मीडिया के जरिए बेटी को तंग करने लगा। बेटी ने कोई रिस्पांस नहीं दिया तो लड़के ने उसका पीछा किया। 

इसके बाद उन लोगों ने इस बारे में बीट कांस्टेबल को बताया। बीट कांस्टेबल ने लड़के को फटकारा भी था। पिता के अनुसार, उन्हें ये पक्का नहीं पता कि गोली चलाने वाले कौन थे, क्योंकि हमलावरों ने हेलमेट लगाया हुआ था। फिलहाल पुलिस ने स्कूल सीसीटीवी फुटेज प्राप्त कर ली है। लड़की को तंग करने वाले लड़के का नाम अली पता चला है। पुलिस परिजनों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी। हमलावरों को पकड़ने की कोशिश जारी है।

मुस्लिमों ने दलित का हाथ-पैर बाँध रात भर पीटा, पेशाब पिलाई: शरीर की कई हड्डियाँ टूटीं, बजरंग दल बोला- मधुबनी के इस गाँव में रहते हैं PFI सदस्य

देश में ‘जय भीम जय मीम’ के नारे लगाकर जिन कहानियों पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है, वो समय-समय पर सामने आ ही जाती है। बिहार के दरभंगा में मुस्लिमों ने एक हिंदू दलित पर चोरी का आरोप लगाकर इतनी पिटाई की कि उसके शरीर की कई हड्डियाँ टूट गईं। इतना ही नहीं, मरणासन्न हालत में जब युवक ने पानी माँगा तो उसे मुस्लिमों ने पेशाब पिला दिया। इसका वीडियो सामने आया है।

मामला मधुबनी का बताया जा रहा है। दरअसल, दरभंगा के केवटी थाना अंतर्गत रजोरा गाँव के रहने वाले राम प्रकाश पासवान 16 अगस्त को अपनी बुआ के यहाँ मधुबनी गए हुए थे। जब वे वापस लौट रहे थे तो मधुबनी के इजरा गाँव के कुछ मुस्लिमों ने उन पर चोरी का आरोप लगाते हुए पकड़ लिया।

इसके बाद पासवान के हाथ-पैर बाँध दिए गए और उन्हें लाठी-डंडे तथा लात-घूँसों से बुरी तरह पीटा गया। इस दलित व्यक्ति को इतना पीटा गया था कि उनकी पसली, रीढ़, कमर और कंधे की हड्डी टूट गई। यहाँ तक कि पिटाई से उसकी किडनी पर भी बुरा असर पड़ा है। राम प्रकाश को दरभंगा के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

राम प्रकाश पासवान के बेटे का अभिषेक पासवान का आरोप है कि उनके पिता राम प्रकाश पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें पीटा गया और जब वे पीने के लिए पानी माँगे तो मुस्लिमों ने उन्हें पेशाब पिला दिया। अभिषेक का कहना है कि उनके पिता वेंटिलेटर पर हैं।

ऑपइंडिया को मिली FIR की कॉपी में कहा गया है कि राम प्रकाश की रात भर पिटाई की जाती रही। सुबह जब परिवार को पता चला तो वे लोग उन्हें लाने पहुँचे। उस दौरान पीड़ित की पत्नी पर हमला कर सिर को फोड़ दिया।

परिजनों का कहना है कि परिजनों पर रॉड और पिस्टल से हमला किया गया और जाति-सूचक गालियाँ दी गई। उनसे कहा गया कि 20 लाख रुपए दो नहीं तो पीड़ित का हाथ-पैर काटकर जंगल में फेंक दिया जाएगा। इसके बाद परिजनों ने तत्काल 50 हजार रुपए इकट्ठा कर आरोपितों को दिए। इसके बाद उन लोगों ने पुलिस थाने में जाने पर जान से मारने की धमकी दी।

राम प्रकाश की बेटी पूजा कुमारी का कहना है कि उनके पापा धर्म के काम में जुटे हुए थे, इसलिए वे कई लोगों के निशाने पर थे। पूजा ने कहा कि मुहर्रम के दिन ही उसके पिता को पीटने की योजना बनाई गई थी, लेकिन वे लोग इसमें सफल नहीं हो पाए। इसके बाद घटना वाले दिन आरोपितों ने दरभंगा लौट रहे उसके पिता जी को नाम लेकर रोका और कमरे में बंद करके पूरी रात पिटते रहे।

यह बात भी सामने आई कि पीड़ित परिवार ने थाने में शिकायत की, लेकिन SHO इंस्पेक्टर सरवर आलम ने मामले को दबाने की कोशिश की। जब घटना का वीडियो वायरल हुआ, उसके बाद पुलिस अपनी किरकिरी होती देख, कार्रवाई की बात कही। बेंता थाने की पुलिस अस्पताल पहुँचकर पीड़ित का बयान लिया।

दरभंगा के SDPO कृष्णनंदन कुमार ने घटना की पुष्टि की है। उनका कहना है कि घटनास्थल मधुबनी जिला है। इसलिए इस मामले में दरभंगा पुलिस मधुबनी पुलिस की जाँच में हर तरह का सहयोग देगी। पीड़ित पक्ष ने कुछ आरोपितों की पहचान की है। इनमें अकरम, मोहम्मद राजा, मोहम्मद अखरोट सहित सात लोगों के नाम पुलिस को बताया है।

बजरंग दल के नेता राजीव प्रकाश का कहना है कि जिस गाँव में यह घटना हुई वहाँ कुख्यात PFI के सदस्य रहते हैं। उन लोगों ने मॉब लिंचिंग की है। बजरंग दल ने चेतावनी देेते हुए कहा कि अगर पीड़ित व्यक्ति को इंसाफ नहीं मिला तो देश स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।

कॉन्ग्रेस से ‘आजाद’ हुए गुलाम नबीः सोनिया गाँधी को ‘रबर स्टांप’ बता 5 पन्नों की चिट्ठी भेजी, राहुल गाँधी को कोसते हुए कहा- फैसला ले रहे उनके PA और सिक्योरिटी गार्ड

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने शुक्रवार (25 अगस्त 2022) को कॉन्ग्रेस छोड़ दी। उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता सहित सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। वे काफी समय से पार्टी की नीतियों को लेकर नाराज चल रहे थे।

आजाद ने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को 5 पन्नों का इस्तीफा भेजा है। इसमें जवाहर लाल नेहरू से लेकर संजय गॉंधी तक का जिक्र हैं। गुलाम नबी ने पत्र में वायनाड के सांसद राहुल गॉंधी को भी जमकर कोसा है। सोनिया गाँधी को पत्र में ‘रबर स्टांप’ की तरह बताया है।

इस्तीफे वाले पत्र में गुलाम नबी आजाद ने लिखा है, “बड़े अफसोस और बेहद भावुक दिल के साथ मैंने भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस से अपना आधा सदी पुराना नाता तोड़ने का फैसला किया है।” राहुल गाँधी के लिए पत्र में कहा है, “वे अनुभवहीन लोगों से घिरे हुए हैं। उन्होंने 2013 में पार्टी उपाध्यक्ष बनने के बाद पुरानी कॉन्ग्रेस को खत्म कर दिया, जिसके कारण धीरे-धीरे पार्टी के जमीनी नेता दूर हो गए।”

गुलाम नबी आजाद ने राहुल गाँधी पर हमला करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी ने भाजपा और राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दलों से हार मान ली है। उन्होंने कहा, “यह सब इसलिए हुआ क्योंकि पिछले 8 वर्षों में नेतृत्व ने पार्टी के शीर्ष पर एक गैर-गंभीर व्यक्ति को थोपने की कोशिश की है।”

गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि राहुल गाँधी ने पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। बीते कुछ सालों में राहुल गाँधी ने सीनियर लीडर को दरकिनार कर दिया है। कॉन्ग्रेस में इन दिनों राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी की दो टीम काम कर रही है। राहुल गाँधी लगातार पार्टी के संविधान को दरकिनार करते हुए काम कर रहे हैं।

उन्होंने लिखा है, “यूपीए सरकार की संस्थागत अखंडता को ध्वस्त करने वाला ‘रिमोट कंट्रोल मॉडल’ अब भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस में लागू हो गया है। आप (सोनिया गाँधी) का केवल नाम बचा है। सभी महत्वपूर्ण निर्णय राहुल गाँधी या उनके सुरक्षा गार्ड और पीए ले रहे हैं।”

आगे आजाद ने लिखा है, “पूरी संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया एक दिखावा और ढकोसला है। देश में कहीं भी संगठन के किसी भी स्तर पर चुनाव नहीं हुए हैं। 24 अकबर रोड में बैठे AICC के चुने हुए लेफ्टिनेंटों को मंडली द्वारा तैयार की गई सूचियों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया है।”

उल्लेखनीय है कि गुलाम नबी आजाद की नाराजगी हाल ही में तब सामने आई थी, जब उन्होंने जम्मू-कश्मीर में पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के कुछ घंटों बाद ही इस्तीफा दे दिया था। उनके अलावा भी कई वरिष्ठ नेता आलाकमान से नाराज चल रहे हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में आनंद शर्मा ने पार्टी की चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था।

हकला हीरो, बाप-बेटी में घटिया एक्टिंग का कंपीटिशन… Liger का एक रिव्यू यह भी: कहा- डायरेक्टर ने करण जौहर को फुल टाइम थूक लगाया

साउथ के एक्टर विजय देवरकोंडा (Vijay Deverakonda) और अनन्या पांडे (Ananya Panday) की फिल्म ‘लाइगर’ (Liger) ने समीक्षकों और दर्शकों को खासा निराश किया है। विजय देवरकोंडा की हिंदी डेब्यू फिल्म में ऐसा कुछ नया नहीं है, जिसे देखने के लिए दर्शक सिनेमाघर जाएँ। बॉलीवुड फिल्मों का रिव्यू करके सुर्खियाँ बटोरने वाले अभिनेता से क्रिटिक बने कमाल राशिद खान उर्फ़ KRK ने भी अपने अंदाज में ‘लाइगर’ का रिव्यू किया है।

रिव्यू की शुरुआत में केआरके अभिनेता विजय देवरकोंडा को ‘विजय एनाकोंडा’ कहकर बुलाते हैं। उन्होंने फिल्म की कहानी को बाबा आदम के जमाने की बताते हुए कहा कि यही कहानी उनकी फिल्म ‘देशद्रोही’ की थी। ये कहानी उस वक्त की है, जब मुंबई में गुंडे हफ्ता लिया करते थे। फरहान अख्तर की फिल्म ‘तूफान’ की भी यही कहानी थी। पुरी जगन्नाथ ने इस फिल्म की स्टोरी, स्क्रीन प्ले और डायलॉग्स खुद ही लिखे हैं। KRK ने कहा, “इस फिल्म के लिए पुरीने 160 करोड़ रुपए लिए थे। लेकिन कोई स्क्रिप्ट राइटर, डायलॉग्स राइटर नहीं रखा। सारी चीजें खुद ही पेल दी, यानी सारा माल खुद ही अंदर कर लिया। वाह, मतलब करण जौहर को फुल टाइम थूक लगाया आपने।”

उन्होंने आगे कहा, “डायरेक्शन के नाम पर पुरी साहब ने फुल मजाक किया है। फिल्म के कलाकारों की बकवास एक्टिंग। विजय देवरकोंडा पूरी फिल्म में सिर्फ हकलाता हुआ नजर आ रहा है। राम्या कृष्णन के सिर से अभी तक ‘बाहुबली’ का भूत नहीं उतरा है। अनन्या पांडे तो इतनी टैलेंटड है कि अपनी जीभ से नाक को टच कर लेती है, उस बेचारी का एक्टिंग से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। इस फिल्म में बाप (चंकी पांडे) और बेटी के बीच वाहियात एक्टिंग करने का कॉम्पिटिशन लगा है।”

गौरतलब है कि विजय देवरकोंडा और अनन्या पांडे की फिल्म को ज्यादातर नाकारात्मक रिव्यूज ही मिल रहे हैं। ‘Liger’ का बजट 125 करोड़ रुपए है, जिसमें से 25 करोड़ रुपए तो सिर्फ लीड एक्टर विजय देवरकोंडा की फीस है। ‘मिर्ची 9’ ने अपनी समीक्षा में ‘Liger’ को बहुत-बहुत बुरी फिल्म करार दिया है। उसने लिखा कि ये एक ऐसा मौका है, जिसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया। उसने पूरा दोष विजय देवरकोंडा पर डाला है। साथ ही पूर्व अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज माइक टाइसन के कैमियों को भी उसने बेकार बताया है। उसने फिल्म को 5 में 1.75 स्टार दिए। वहीं फिल्म समीक्षक पीटर ने इसे 5 में 2 रेटिंग दी है।