गृह मंत्री अमित शाह ने एएनआई को दिए खास इंटरव्यू में 130वें संविधान संशोधन विधेयक, एसआईआर और चुनाव आयोग और जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे, एसआईआर विवाद और चुनाव आयोग से जुड़े तमाम मसलों पर बात रखी है।
130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर अमित शाह ने कहा कि एनडीए के चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार विधेयक से सहमत हैं। संसद में हंगामे के कारण कई लोगों को समर्थन करने का मौका नहीं मिल पा रहा है। जेपीसी बनेगी और संसद में चर्चा होगी तो सबको अपनी बात रखने का मौका मिलेगा।
जेल में रहकर सरकार चलाना चाहते हैं नेता
विपक्ष के लगाए जा रहे लगातार आरोपों पर अमित शाह ने कहा, “आज भी वे कोशिश कर रहे हैं कि अगर उन्हें कभी जेल जाना पड़ा, तो वे जेल से आसानी से सरकार बना लेंगे। जेल को ही सीएम हाउस, पीएम हाउस बना देंगे और डीजीपी, मुख्य सचिव, कैबिनेट सचिव या गृह सचिव जेल से आदेश देंगे। मेरी पार्टी और मैं इस विचार को पूरी तरह से खारिज करते हैं…इससे संसद या विधानसभा में किसी के बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। एक सदस्य जाएगा, पार्टी के अन्य सदस्य सरकार चलाएंगे, और जब आपको जमानत मिल जाएगी, तो वे आकर फिर से शपथ ले सकते हैं। इसमें क्या आपत्ति है?…”
बीजेपी के वरिष्ठ नेता आडवाणी जी, मदनलाल खुराना और कई अन्य लोगों को याद करते हुए अमित शाह ने कहा, ” इनलोगों ने पहले इस्तीफा दिया था। अभी हेमंत सोरेन ने झारखंड सीएम पद से इस्तीफा दिया। पहले जो भी किसी मामले में आरोपी होता था, वह इस्तीफा दे देता था। बरी होने के बाद, वे फिर से राजनीति में आ जाते थे। लेकिन अभी तमिलनाडु के कुछ मंत्रियों ने इस्तीफा नहीं दिया। दिल्ली के मंत्री और मुख्यमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया। अगर राजनीति और सामाजिक जीवन की नैतिकता का स्तर इस तरह से गिराया जा रहा है, तो हम इससे सहमत नहीं हैं।”
AAP संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल के इस्तीफा नहीं देने पर केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि अगर यह कानून लागू होता, तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ता। जेल से केजरीवाल के बाहर निकलने के बाद जनता जब सवाल पूछने लगी तब उन्होंने इस्तीफा दिया और आतिशी को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया।
राहुल गाँधी के अध्यादेश फाड़ने को किया याद
2013 में जब यूपीए की सरकार थी, उस वक्त राहुल गाँधी ने मनमोहन सरकार के लाए गए अध्यादेश को फाड़ दिया था। इसको याद करते हुए शाह ने कहा कि तब लालू यादव को राहत दी जा रही थी। अगर उस दिन नैतिकता थी तो अब क्या हो गया है? अब पीएम, सीएम समेत सभी मंत्रियों को 30 दिनों से ज्यादा जेल में रहने पर पद से हटाने की व्यवस्था की जा रही है तो राहुल गाँधी क्यों विरोध कर रहे हैं?
आरएसएस से उपराष्ट्रपति के संबंधों पर बोले शाह
एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार राधाकृष्णन को लेकर उन्होंने कहा कि आरएसएस से हम सब जुड़े रहे हैं। प्रधानमंत्री का RSS से संबंध है। उनका भी RSS से संबंध है। उन्होंने सवाल पूछा कि क्या RSS से संबंध होना कोई माइनस पॉइंट है? अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी जी RSS से जुड़े हैं। सी.पी. सुदर्शन की उम्मीदवारी का समर्थन करते हुए, अमित शाह ने कहा कि ये स्वाभाविक चयन था। राष्ट्रपति पूर्व से हैं, पीएम उत्तर-पश्चिम से, उपराष्ट्रपति दक्षिण से हों, तो बहुत अच्छा है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु चुनाव 2026 को लेकर राधाकृष्णन की उम्मीदवारी को जोड़ना गलत है।
धनखड़ के इस्तीफे की बताई वजह
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे को लेकर अमित शाह ने साफ किया है कि पूर्व उपराष्ट्रपति की सेहत ठीक नहीं थी, इसलिए स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने इस्तीफा दिया है। उनकी तारीफ करते हुए शाह ने कहा कि विपक्ष के ‘हाउस अरेस्ट’ वाले आरोप पूरी तरह गलत और निराधार है। एएनआई से गृहमंत्री ने कहा, “धनखड़ साहब का इस्तीफा पत्र खुद स्पष्ट है। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है और प्रधानमंत्री समेत सभी के प्रति आभार जताया है। बात का बतंगड नहीं बनाना चाहिए और बेवजह हंगामा नहीं किया जाना चाहिए। विपक्ष के बयान सच से परे हैं।”
इंडी गठबंधन के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार पर साधा निशाना
उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए इंडी गठबंधन ने बी. सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत जज बी. सुदर्शन रेड्डी की 2011 के छत्तीसगढ़ के सलवा जुडूम को लेकर की गई टिप्पणी का जिक्र करते हुए अमित शाह ने कहा कि इसकी वजह से नक्सलवाद दो दशक और जिंदा रहा। ऐसी टिप्पणियों ने नक्सलियों को बचाया। ऐसे में विपक्ष ने आखिर ऐसा उम्मीदवार क्यों चुना? उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में है कि सलवा जुडूम खत्म कर आदिवासियों का आत्मरक्षा का अधिकार छीना गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष का सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना वामपंथी सोच का नतीजा है।
जिस न्यायालय को लोकतंत्र में न्याय की आखिरी उम्मीद माना जाता है, वहीं अगर जजों पर अश्लीलता के आरोप लगने लगें तो जनता का विश्वास हिलना स्वाभाविक है। केरल से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न्यायपालिका की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
केरल हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के जज उदयकुमार वी. का तबादला कर दिया है। उदयकुमार वी. पर महिलाओं के साथ काउंसलिंग के दौरान यौन दुर्व्यवहार और अश्लील टिप्पणियाँ करने का आरोप है।
क्या है पूरा मामला?
‘बार ऐंड बेंच’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला ने कोल्लम के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज को पत्र लिखकर जज उदयकुमार वी. के खिलाफ शिकायत दी थी। महिला ने अपने पत्र में दावा किया कि उदयकुमार ने काउंसलिंग के दौरान यौन दुर्व्यवहार किया और उनको लेकर अश्लील टिप्पणियाँ कीं।
यह मामला सामने आने के बाद न्यायपालिका में हड़कंप मच गया। इसके बाद केरल हाईकोर्ट ने चवरा फैमिली कोर्ट के जज उदयकुमार वी को कोल्लम मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल में ट्रांसफर कर दिया गया। इसके अलावा हाईकोर्ट ने कोल्लम में मोटर ऐक्सिडेंट क्लेम्स ट्राइब्यूनल के जज प्रसन्ना गोपालन का ट्रांसफर फैमिली कोर्ट में कर दिया है। जिला न्यायालय के रजिस्ट्रार ने दोनों जजों के म्यूचुअल ट्रांसफर का आदेश जारी कर दिया है।
जज उदयकुमार के खिलाफ जाँच का आदेश जारी
इस मामले की गंभीरता को देखता हुए हाईकोर्ट ने जज के खिलाफ उदयकुमार वी. के खिलाफ जाँच के आदेश जारी किए हैं। केरल हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने रजिस्ट्रार (जिला न्यायपालिका) को मामले की जाँच का आदेश दिया है। रजिस्ट्रार द्वारा की गई इस जाँच की रिपोर्ट समिति को सौंपी जाएगी और समिति आने वाले सप्ताह में इस रिपोर्ट पर विचार करेगी।
फैमिली कोर्ट्स में परिवारिक समस्याओं को निपटारा किया जाता है। न्यायालयों पर बोझ और सुनवाई में देरी को देखते हुए ये कोर्ट बनाए गए थे लेकिन परिवार से जुड़े कोर्ट में ही महिलाओं के साथ इस तरह दुर्व्यवहार किया जाए तो इससे न्यायापालिका की साख पर बट्टा लगता है।
पाकिस्तान में 6,00,000 से ज्यादा मस्जिदें और 36,000 मदरसे हैं, जबकि मात्र 23,000 कारखाने हैं। पाकिस्तान की पहली आर्थिक जनगणना में ये बात सामने आई है। इसे पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल ने जारी किया है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब नकदी संकट से जूझ रहा पाकिस्तान करीब 61 हजार करोड़ रुपए के बेलआउट पैकेज की दूसरी समीक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ बातचीत कर रहा है।
मात्र 2.42 लाख स्कूल और 214 यूनिवर्सिटी
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में 2,42000 स्कूल, 11568 कॉलेज और मात्र 214 यूनिवर्सिटी हैं। कॉलेजों में प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत ज्यादा है। इससे पता चलता है कि शिक्षा और कल-कारखानों की जगह देश ने मस्जिदों और मदरसों पर निवेश किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 27 लाख रिटेल शॉप्स, 1.88 लाख होलसेल की दुकानें, 2.56 लाख होटल और 1.19 लाख अस्पताल हैं।
250 से ज्यादा रोजगार वाले मात्र 7086 प्रतिष्ठान
पाकिस्तान के अंदर सबसे ज्यादा विकसित राज्य पंजाब है, जहाँ देश की 58 फीसदी प्रतिष्ठान हैं। इसके बाद सिंध में 20 फीसदी, खैबर पख्तूनख्वा में 15 फीसदी और बलूचिस्तान में 6 फीसदी हैं। राजधानी इस्लामाबाद में 1 फीसदी से कम प्रतिष्ठान हैं। पंजाब में मदरसे और मस्जिदें भी सबसे ज्यादा हैं। देश में छोटे कारोबार का बोलबाला हैं। यहाँ 71 लाख ऐसे बिजनेस हैं जहाँ 1 से 50 लोग काम करते हैं। जबकि 35351 ऐसे प्रतिष्ठान हैं जहाँ 50 से 250 लोग काम करते हैं। सिर्फ 7086 ऐसे बिजनेस यूनिट्स हैं जहां 250 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं।
मस्जिदों- मदरसों की तुलना में फैक्ट्री काफी कम
देश में कुल 400 लाख स्थाई यूनिट्स हैं जिनमें से 72 लाख रोजगार देती हैं। देश में 2023 तक 254 लाख लोग काम कर रहे थे। इनमें सबसे ज्यादा सर्विस सेक्टर में 113 लाख लोग हैं यानी करीब 45 फीसदी। 76 लाख लोग सोशल सेक्टर में हैं जो करीब 30 फीसदी हैं। जबकि 22 फीसदी लोग प्रोडक्शन सेक्टर में काम करते हैं। देश में करीब 6.04 लाख मस्जिदें हैं जबकि 36331 मदरसे हैं।
पाकिस्तान के हालात को ये रिपोर्ट बयाँ कर रहा है। गंभीर आर्थिक संकट की एक अहम वजह पिछले कुछ दशकों में देश में इस्लामिक कट्टरता को माना जा रहा है। यही वजह है कि देश में मस्जिदों, मदरसों की संख्या, कारखानों से कहीं अधिक है। शिक्षण संस्थान कम हैं और जो हैं वहाँ की शिक्षा का स्तर भी विश्वस्तरीय नहीं है।
भारत में घुसपैठियों के नए-नए पैरोकार सामने आ रहे हैं। खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाली सैयदा हमीद का कहना है कि बांग्लादेशियों को भारत में रहने का पूरा हक है। सैयदा इससे पहले मनमोहन सिंह सरकार के समय योजना आयोग की सदस्य रही थीं। सैयदा का यह बयान उनके असम दौरे के समय आया है। असम सरकार इन दिनों सरकारी जमीनों से अवैध कब्जा हटाने और बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को वापस भेजने की कोशिशों में जुटी हुई है।
सैयदा हमीद पूरे वामपंथी गिरोह के साथ असम दौरे पर पहुँची हैं। इस दौरे पर उनके साथ जाने-माने वामपंथी प्रशांत भूषण, हर्ष मंदर, जवाहर सरकार और अन्य लोग शामिल हैं। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि असम सरकार ने वहाँ के मुसलमानों पर आफत ला दी है और उन्हें बांग्लादेशी कहकर निशाना बनाया जा रहा है।
सैयदा ने कहा, “अगर वे (घुसपैठिए) बांग्लादेशी भी हैं तो इसमें गलत क्या है? बांग्लादेशी भी इंसान हैं। धरती इतनी बड़ी है, बांग्लादेशी यहाँ भी रह सकते हैं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि यह कहना कि अवैध घुसपैठिए असली नागरिकों का हक छीन रहे हैं, बहुत ही परेशान करने वाली बात है। सैयदा ने इसे भ्रामक है और इंसानियत के लिए पूरी तरह नुकसानदायक बताया है।
This is Syeda Hameed, former member of the Planning Commission during congress era. Just look at the audacity! If she feels so strongly about the “rights” of illegal Bangladeshis in Assam, why doesn’t she accommodate them in her own home? Perhaps her like-minded friends can also… pic.twitter.com/7ZVdtx3uDc
सैयदा हमीद ने आगे कहा, “अल्लाह ने यह धरती इंसानों के लिए बनाई है, हैवानों के लिए नहीं। अगर कोई इंसान जमीन पर खड़ा है और उसे वहाँ से खदेड़ा जाता है, तो यह मुसलमानों के लिए कयामत जैसा है।” उन्होंने यह भी कहा कि सबको मिलकर गंगा-जमुनी तहजीब और भारत की मिली-जुली संस्कृति के लिए खड़ा होना होगा।
सैयदा हमीद ने एक और जहाँ यह माना कि असम सरकार बांग्लादेश से आए अवैध लोगों को वापस भेज रही है। वहीं, प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि भारत के मुसलमानों को बांग्लादेश भेजा जा रहा है। उन्होंने कहा, “यह साफ है कि हिमंता बिस्वा सरमा की अगुवाई वाली असम सरकार हर तरह की गैरकानूनी हरकत कर रही है। खासकर नागरिकों को जबरन बांग्लादेश और देश से बाहर धकेल रही है, उनको जमीन से बेदखल कर रही है और उनके घर गिरा रही है।”
यह टीम असम नागरिक सम्मेलन नामक एक मंच के निमंत्रण पर असम आई थी। इस मंच के सदस्य और राज्यसभा सांसद अजीत कुमार भुइयां का कहना है कि वे बाहर से जानी-मानी हस्तियों को बुलाते हैं ताकि वे ताजा हालात पर अपनी राय दे सकें।
इस टीम के दौरे को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि जमतीय द्वारा उनका इस्तीफा माँगे जाने के बाद दिल्ली से आई एक टीम असम में डेरा डाले हुए है। उन्होंने कहा, “इस टीम में हर्ष मंदर, वजाहत हबीबुल्लाह, फैयाज शाहीन, प्रशांत भूषण और जवाहर सरकार शामिल हैं।”
After Jamaat-e-Hind’s outburst demanding my dismissal yesterday, a Delhi-based team — Harsh Mander, Wajahat Habibullah, Fayaz Shaheen, Prashant Bhushan, and Jawahar Sircar — is now camping in Assam.
Their sole aim is to paint the lawful evictions as so-called “humanitarian…
सरमा ने आगे कहा कि इस टीम एक ही मकसद है कि किसी तरह कानूनी तौर पर की जा रही बेदखली को तथाकथित ‘मानवीय संकट’ बताकर बदनाम किया जाए। उन्होंने कहा, “यह अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ हमारी लड़ाई को कमजोर करने की सोची-समझी कोशिश है। हम सतर्क हैं और मजबूती से खड़े हैं, कोई भी प्रोपेगेंडा या दबाव हमें अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा करने से रोक नहीं पाएगा।”
गुजरात के अहमदाबाद में एक हिंदू छात्र की हत्या की घटना के बाद अब साबरकांठा जिले से भी ऐसा ही मामला सामने आया है। वडाली के शेठ सीजे हाई स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक हिंदू छात्र पर चार मुस्लिम नाबालिगों ने हमला किया और उसे जान से मारने की धमकी दी।
पीड़ित छात्र के पिता ने बताया कि यह घटना 21 अगस्त की शाम करीब साढ़े चार बजे स्कूल की छुट्टी के बाद हुई। चार मुस्लिम नाबालिगों ने स्कूल परिसर में उनके बेटे पर हमला किया और मारने की धमकी दी।
वडाली बजरंग दल के संयोजक रमेशभाई सागर ने बताया कि घटना के तुरंत बाद स्थानीय हिंदू और हिंदू संगठनों ने इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन किया है। 23 अगस्त को फिर से स्थानीय लोग और हिंदू संगठन के कार्यकर्ता पीड़ित परिवार के साथ स्कूल पहुँचे और आरोपितों पर कार्रवाई की माँग की। उस समय स्कूल प्रशासन ने आश्वासन दिया कि आरोपितों को एलसी (लीविंग सर्टिफिकेट) दिया जाएगा, जिसके बाद विरोध प्रदर्शन रोक दिया गया।
‘मुस्लिम नाबालिग पहले भी स्कूल में चाकू लेकर आए थे’: पीड़ित परिवार का दावा
पीड़ित छात्र के पिता मणिभाई ने ऑपइंडिया को बताया कि मुस्लिम नाबालिग उनके बेटे को बार-बार छेड़ते थे। जब बच्चे ने इसका विरोध किया तो 21 अगस्त की शाम स्कूल छुट्टी के बाद उस पर हमला कर दिया गया।
मणिभाई के अनुसार, घटना के बाद वे आरोपियों के परिवार से मिलने गए थे लेकिन मुख्य आरोपी के पिता ने कहा कि उसका बेटा उनके पास नहीं है। इसके बाद उन्होंने हिंदू संगठनों को जानकारी दी, जिसके चलते स्कूल में विरोध प्रदर्शन हुआ।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि ये चारों नाबालिग पहले भी स्कूल में चाकू जैसे धारदार हथियार लेकर आते थे। छह महीने पहले भी उन्होंने उनके बच्चे पर हमला किया था, लेकिन उस समय स्कूल प्रशासन ने केवल मौखिक आश्वासन दिया था कि आगे ऐसा नहीं होगा।
मणिभाई ने बताया कि इस बार भी स्कूल प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। परिवार की माँग है कि आरोपी नाबालिगों को तुरंत एल.सी. (लीविंग सर्टिफिकेट) दिया जाए और उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएँ।
उन्होंने यह भी बताया कि पीड़ित बच्चे की पीठ पर गंभीर चोटें हैं, क्योंकि उसे मवेशियों से पीटा गया। फिलहाल वह चलने में सक्षम नहीं है और उसका इलाज जारी है।
स्कूल ने घटना को बच्चों के बीच झगड़ा बताया, कहा- हम LC नहीं दे सकते
स्कूल के प्राथमिक विभाग के प्रधानाचार्य अमितभाई ने ऑपइंडिया को बताया कि चार मुस्लिम नाबालिगों ने एक हिंदू छात्र पर हमला किया था। लेकिन उन्होंने इस घटना को केवल ‘बच्चों के बीच मामूली झगड़ा’ बताया।
प्रधानाचार्य ने पीड़ित परिवार के उन आरोपों को नकार दिया जिनमें कहा गया था कि आरोपित नाबालिग पहले स्कूल में हथियार लेकर आए थे या पहले भी झगड़ा हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों को लीविंग सर्टिफिकेट)देने की कोई बात नहीं हुई थी।
एल सी को लेकर प्रधानाचार्य ने स्पष्ट किया कि चूँकि आरोपित नाबालिग प्राथमिक कक्षा के छात्र हैं, इसलिए शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत उन्हें स्कूल से निकाला नहीं जा सकता।
जब तक उनके माता-पिता अपील न करें या किसी वरिष्ठ अधिकारी का आदेश न हो, तब तक एल सी जारी नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, पीड़ित परिवार इस घटना को गंभीर मान रहा है।
उनका कहना है कि आरोपित मुस्लिम नाबालिगों को तुरंत स्कूल से निकाला जाए और कार्रवाई की जाए। परिवार ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर स्कूल प्रशासन कार्रवाई नहीं करता, तो वे पुलिस में शिकायत दर्ज कराएँगे।
(मूल रूप से ये खबर गुजराती में भार्गव राजगुरु ने लिखी है, इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।)
जिस वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) पर विपक्ष हंगामा खड़ा कर रहा है। उसी प्रक्रिया के दौरान बिहार के भागलपुर में अवैध रूप से रह रही दो औरतों को पकड़ा गया है। पाकिस्तान की इमराना खानम और फिरदौसिया खानम 1956 से भारत में छिपकर बैठी थीं। उनके पास आधार कार्ड भी मिले हैं।
अधिकारियों के अनुसार, दोनों औरतें पाकिस्तान के पासपोर्ट पर साल 1956 में भारत आई थीं। इमराना खानम तीन साल के वीजा और फिरदौसिया तीन महीने के वीजा पर भारत में घुसीं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक दोनों ही औरतों ने वीजा को नवीनीकरण कराए बिना भारत में अवैध ढंग से रहना जारी रखा।
यह मामला बिहार में SIR के तहत मतदाता सूची की जाँच में सामने आया। चूँकि प्रक्रिया में नागरिकता की भी जाँच की जा रही है। हालाँकि, दोनों पाकिस्तानी औरतों का नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल है, जिसे गृह मंत्रालय ने हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
गृह मंत्रालय ने शुरू की वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया
गृह मंत्रालय ने 11 अगस्त 2025 को दोनों पाकिस्तानी औरतों के नाम मतदाता सूची से हटाने को लेकर प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं। इसकी जानकारी देते हुए बूथ लेवल अधिकारी (BLO) फरजाना खानम ने कहा, “मुझे लेटर मिला है, जिसमें इमराना खानम का पाकिस्तानी पासपोर्ट नंबर हैं। वे काफी उम्रदराज हैं और बीमार रहती हैं।”
#WATCH | Bhagalpur, Bihar: A Pakistani woman, who came to India in 1956, has been found to be in Bihar's voter list and was even verified in the SIR carried out in the state. When the Home Ministry started carrying out an investigation regarding foreign nationals who had… pic.twitter.com/CodczsabaD
BLO ने आगे कहा, “मंत्रालय के निर्देशों मतदाता सूची से औरतों के नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इमराना खानम का पासपोर्ट 1956 का है। अब इस मामले में विभाग आगे की जाँच करेगा।”
वहीं, भागलपुर के जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी ने भी वोटर लिस्ट में दो पाकिस्तानी औरतों के नाम शामिल होने की पुष्टि की। जिलाधिकारी ने कहा, “जिले में 24 लाख मतदाता हैं। BLO ने हर बूथ पर विरेफिकेशन किया है। ऐसा मामला पहली बार आया है। इस मामले में कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी।”
VIDEO | Bihar: Two Pakistani nationals with valid voter IDs have reportedly been found in Bhagalpur. The district administration has started the process to remove them from the voter list.
Bhagalpur District Magistrate Dr. Nawal Kishor Choudhary says, "There are 24 lakh voters… pic.twitter.com/bt7oeHbXIv
बिहार में SIR प्रक्रिया में भारत में अवैध रूप से रह रही दो पाकिस्तानी औरतों को पकड़ा गया है। इससे साबित होता है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) कितनी जरूरी प्रक्रिया है। वहीं कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। इस मामले से विपक्ष के SIR के खिलाफ फैलाए गए सभी प्रोपेगेंडा धाराशाही हो गए हैं।
भारत ने अपनी हवाई सुरक्षा को और मज़बूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। शनिवार, 23 अगस्त 2025 को भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने ओडिशा के समुद्र तट पर ‘इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम‘ (IADWS) का पहला सफल परीक्षण किया। यह सिस्टम कई तरह के हथियारों को मिलाकर बनाया गया है, जो एक साथ मिलकर दुश्मन के किसी भी हवाई हमले से देश की रक्षा कर सकता है।
इस एयर डिफेंस सिस्टम में तीन मुख्य हथियार शामिल है। पहला, क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल (QRSAM), जो जमीन से हवा में मार करती है। दूसरा, एडवांस्ड वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS) जो बहुत करीब से आने वाले टारगेट को गिरा सकती है और तीसरा, डायरेक्ट एनर्जी वेपन (DEW)– यह एक लेजर आधारित हथियार है, जो बिना मिसाइल छोड़े सीधे लेज़र किरण से दुश्मन को खत्म करता है।
इन सभी हथियारों को एक ही कमांड सेंटर से कंट्रोल किया जाता है। यह कमांड सेंटर DRDO की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL) ने बनाया है। वहीं, VSHORADS मिसाइल को विकास रिसर्च सेंटर (RCI) ने और लेजर हथियार DEW को विकास सेंटर फॉर हाई एनर्जी सिस्टम्स एंड साइंसेज (CHESS) नाम की संस्था ने तैयार किया है।
Maiden flight Tests of Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) was successfully conducted on 23 Aug 2025 at around 1230 Hrs off the coast of Odisha.
IADWS is a multi-layered air defence system comprising of all indigenous Quick Reaction Surface to Air Missile (QRSAM),… pic.twitter.com/Jp3v1vEtJp
परीक्षण के दौरान DRDO ने एक साथ तीन अलग-अलग हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाया। इनमें दो तेज रफ्तार ड्रोन और एक मल्टी-कॉप्टर ड्रोन शामिल थे। ये सभी अलग-अलग ऊँचाई और दूरी पर उड़ रहे थे। DRDO की तीनों प्रणालियों ने अलग-अलग टारगेट को एकदम सटीकता से मार गिराया।
रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस टेस्ट के दौरान सभी सिस्टम ने मिलकर शानदार काम किया, चाहे वो मिसाइलें हों, राडार सिस्टम, कम्युनिकेशन या टारगेट ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी। पूरे परीक्षण को ओडिशा के चांदीपुर में मौजूद इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में रिकॉर्ड किया गया और DRDO के वैज्ञानिकों के साथ-साथ सेना के वरिष्ठ अफसरों ने खुद मौके पर जाकर इसे देखा।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बड़ी कामयाबी पर DRDO, सेना और भारतीय उद्योगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह टेस्ट दिखाता है कि अब भारत के पास एक ऐसा मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम है, जो दुश्मन के किसी भी हवाई हमले से देश की रक्षा कर सकता है।
The @DRDO_India has successfully conducted the maiden flight Tests of Integrated Air Defence Weapon System (IADWS), on 23 Aug 2025 at around 1230 Hrs off the coast of Odisha.
IADWS is a multi-layered air defence system comprising of all indigenous Quick Reaction Surface to Air… pic.twitter.com/TCfTJ4SfSS
गुजरात पुलिस ने एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है। इसमें चार सीरियाई नागरिकों पर आरोप है कि उन्होंने गाजा पीड़ितों के नाम पर चंदा इकट्ठा किया और उस पैसे को अपनी आलीशान जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस ने इनमें से दमिश्क के रहने वाले एक आरोपित अली मेघत अल-अजहर को अहमदाबाद के एलिसब्रिज इलाके के एक होटल से गिरफ्तार किया है। उसके पास से 3,600 अमेरिकी डॉलर और 25,000 रुपए नकद बरामद हुए हैं।
बाकी तीन आरोपित जकारिया हैथम अलजार, अहमद अलहबाश और यूसुफ अल-जहर फिलहाल फरार हैं। ये सभी उसी होटल में ठहरे हुए थे। पुलिस ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिए हैं ताकि वे भारत से भाग न सकें। संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम ब्राँच) शरद सिंघल ने बताया कि जाँच जारी है और बाकी आरोपितों की तलाश की जा रही है।
कोलकाता के रास्ते प्रवेश और संदिग्ध गतिविधियाँ
जाँच में सामने आया है कि यह चारों टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे। वे 22 जुलाई को कोलकाता उतरे और 2 अगस्त को अहमदाबाद पहुँच गए। यहाँ आरोपित ने मस्जिदों में जाकर गाजा में भूखे परिवारों के वीडियो दिखाकर चंदा इकट्ठा किया।
पुलिस को अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि यह पैसा गाजा भेजा गया हो। पीटीआई से बातचीत में शरद सिंघल ने कहा कि यह जाँच का विषय है कि वे पहले कोलकाता क्यों गए और फिर अहमदाबाद आए।
यह भी पता लगाया जा रहा है कि वे वास्तव में चंदा इकट्ठा कर रहे थे या किसी और मकसद से भारत आए थे। उन्होंने बताया कि अमेरिकी डॉलर की बरामदगी और कुछ डिजिटल लेन-देन भी शक पैदा करते हैं। पुलिस अब उनकी गतिविधियों और संपर्कों को समझने के लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। शुरुआती जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित कुछ संदिग्ध लोगों के संपर्क में थे।
आतंकवाद विरोधी एजेंसियाँ जाँच में शामिल
गुजरात एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड (ATS) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भी इस मामले की जाँच शुरू कर दी है, ताकि आरोपित के असली इरादों का पता लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि इकट्ठा किया गया पैसा कहाँ भेजा गया।
पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है ताकि उनके नेटवर्क और संपर्कों का पता चल सके। पूछताछ में गिरफ्तार आरोपित ने माना है कि यह पैसा उन्होंने अपनी शानो-शौकत वाली जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस के मुताबिक, दान इकट्ठा कर उन्होंने अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया है। सरकार ने अब उन्हें ब्लैकलिस्ट और डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
गाजा में इजराइल-हमास युद्ध
आतंकवादी संगठन हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमला किया, जिसमें लगभग 1,300 इजरायली और विदेशी नागरिक मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए। कई इजरायली और विदेशी नागरिकों को हमास बंधक बनाकर ग़ाज़ा ले आया था।
इसके बाद इजराइल ने हमास को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। इस दौरान गाजा में हजारों लोगों की मौत हुई है। कहा जाता है कि हमास ने कई बार स्थानीय फिलिस्तीनियों को बाहर निकलने से रोका और दुनिया भर से भेजी गई खाद्य सामग्री और दवाओं जैसी मानवीय मदद को भी बाधित किया। इससे हालात और बिगड़ गए।
विशेषज्ञों के अनुसार, हमास का मकसद यह दिखाना है कि गाजा में अकाल और संकट के लिए इजरायल जिम्मेदार है। अगर हमास बंधकों को रिहा कर देता तो युद्ध खत्म हो सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और यही वजह है कि इजरायल-हमास युद्ध लगभग दो साल से जारी है।
कर्नाटक के धर्मस्थल से हैरान करने वाली खबर आई। धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाई कर्मचारी ने ‘सैकड़ों शवों’ के मिलने का दावा किया। इसके बाद तो आरोपों की झड़ी लग गई। जुलाई 2025 में पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया ने दावा किया कि उन्होंने इस क्षेत्र में ‘सैकड़ों शवों’ को दफनाया। इसे कई मीडिया संस्थानों ने राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। लेकिन जैसे ही गवाह चिन्नैया की ‘सच्चाई’ सामने आई, किसी ने ‘गंभीर विश्लेषण’ के साथ रिपोर्टिंग नहीं की।
सफाई कर्मचारी चिन्नैया के मुताबिक, “कुछ सालों में लोगों की हत्या की गई थी और शवों को जमीन के नीचे गाड़ दिया गया। उसने घटना का वक्त 1995 से 2014 के बीच का बताया। बगैर सबूत के सिर्फ चिन्नैय की गवाही के आधार पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने जाँच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया। दो हफ्तों तक SIT के अधिकारी शवों की तलाश में जंगलों, नदी के किनारों और घाटों की खाक छानते रहे।”
लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, एसआईटी को मामले पर शक हुआ। पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया को SIT ने गिरफ्तार कर लिया और बेलथांगडी कोर्ट में पेश किया। कोर्ट में चिन्नैया ने माना कि उसने झूठ बोला था। पूछताछ के दौरान उसकी कहानी की सच्चाई सामने आ गई। इस दौरान उसने जो खुलासा किया, वह गंभीर साजिश की ओर इशारा कर रहा था, जिसका वह एक मोहरा मात्र था।
धर्मस्थल मामले का ‘गवाह’ चिन्नैया गिरफ्तार, साजिश की बात कबूली
रिपोर्टों के अनुसार, चिन्नैया ने एसआईटी की जाँच में खुलासा किया कि पिछले साल उससे किसी ने संपर्क किया और पैसे देने का वादा किया। उसे धर्मस्थल के पास लोगों को मारने और सैकड़ों शवों को गाड़ने का झूठ फैलाना था, ताकि मंदिर की छवि खराब हो सके। उससे संपर्क करने वाले लोगों ने कहा था, “उसकी मनगढ़ंत गवाही से जनता में आक्रोश फैलेगा, तब दूसरे लोग उसे समर्थन देने के लिए आगे आ जाएँगे। उसे परिणामों से डरने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि एक बार यह झूठा प्रचार लोगों के दिमाग में घर बना लिया, तो मंदिर की छवि खराब हो जाएगी और चिन्नैया को बचा लिया जाएगा।”
उसने कथित तौर पर जाँचकर्ताओं को बताया, “मुझे बेंगलुरु में प्रशिक्षण दिया गया था। मुझे बताया गया था कि पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान कैसे जवाब देना है। मैं मास्टरमाइंड के निर्देशों के अनुसार काम करूँगा। मैं यहाँ सिर्फ एक किरदार हूँ, मास्टरमाइंड कोई और है।”
चिन्नैया ने अपने झूठ को और पुख्ता करने की कोशिश भी की थी। उसने अदालत में एक खोपड़ी पेश किया और दावा किया कि यह उन पीड़ितों में से एक की है, जिन्हें उसने दफनाया था। लेकिन कोर्ट में वह ये नहीं बता सका कि उसे यह खोपड़ी कहाँ से मिली थी? उसके बयानों में विरोधाभाष साफ नजर आ रही थी। एसआईटी अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि उसके द्वारा बताए गए 18 में से 17 स्थानों से कुछ भी नहीं मिला। एक जगह हड्डियाँ बरामद हुईं, लेकिन प्रारंभिक जाँच से पता चला कि वे हाल ही में हुए एक आत्महत्या के मामले की थीं। फोरेंसिक जाँच से इसकी पुष्टि हो जाएगी।
अब तक चिन्नैया का ‘राज’ खुल चुका था। जिसे गवाह के रूप में पेश किया गया था, वह वास्तव में धर्मस्थल, उसके मंदिर ट्रस्ट और धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को बदनाम करने की साजिश का एक हिस्सा था।
‘पत्रकारिता’ की आड़ में हिंदू मंदिर के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप
इस कहानी का अंदाज बदल चुका था। अपने मंदिर, धार्मिक परंपराओं और दान के लिए प्रसिद्ध धर्मस्थला को बदनाम करने के लिए मीडिया हफ़्तों तक लगा रहा। मीडिया ने इस खबर को एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में पेश किया।
हालाँकि जाँच से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। कोई सामूहिक कब्र नहीं मिली, कोई अपराध साबित नहीं हुआ। यहाँ तक कि गवाह को ही झूठी जानकारी देने के आरोप में कर्नाटक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
धर्मस्थल मंदिर की प्रतिष्ठा धुमिल करना था मकसद
लेकिन जो भी हुआ उससे धर्मस्थल की प्रतिष्ठा दाँव पर लग गई। पूरे मामले का मकसद था- धर्मस्थल की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना, श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर मंदिर ट्रस्ट और उसके धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े की छवि धूमिल करना।
हालाँकि ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतना काल्पनिक, बिना किसी सबूत के, एक आरोप का प्रचार इतनी तेजी से कैसे हुआ कि देश की ‘बड़ी खबर’ बन गया। इसका जवाब है मीडिया में पनप रहा दुष्प्रचार का ‘झूठतंत्र’। एक ऐसा तंत्र जिसमें ‘द न्यूज़ मिनट’ और उसकी संपादक धन्या राजेंद्रन की भूमिका अहम रही।
हर साजिश जो ज़ोर पकड़ती है, उसके पहचाने जाने योग्य किरदार होते हैं। एक तो वह सूत्रधार होता है, जो दावा करता है। दूसरा, वह राजनीतिक ताकतें होती हैं, जो उसे हथियार बनाती हैं। तीसरा, वह कार्यकर्ता और प्रभावशाली लोग होते हैं जो उसे प्रसारित करते हैं। और चौथा सबसे महत्वपूर्ण, वह सम्मानित मीडिया संस्थान जो ‘संतुलित’ और ‘नपी-तुली’ पत्रकारिता की आड़ में आरोपों को सही बताने की साजिश करती है।
मीडिया ने लगाए बेबुनियाद आरोप
‘न्यूज मिनट’ को इसी कटेगरी में रखा जा सकता है। इसने कभी भी सीधे तौर पर धर्मस्थल पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन हर आरोप की उसकी जबरदस्त कवरेज, एसआईटी के हर अपडेट को गंभीरता से संदर्भ के साथ रखना और दावों के जरिए राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश करना। यही वजह रही कि इस भ्रामक कहानी को सुर्खियाँ मिली, जबकि इसे काफी पहले खत्म हो जाना चाहिए था।
This is the most disgusting aspect of the Dharmasthala Case.@thenewsminute was trying to raise money through the Dharmasthala Fake News.
Even Newslaundry's Manisha Pandey says people should donate to 'Independent Media' citing this case! pic.twitter.com/cCfEx2dh8U
आरोपों की बार-बार रिपोर्टिंग करके, टीएनएम ने एक निराधार खबर को ‘विवाद’ में बदल दिया। तथ्यों को रिपोर्ट करने के बजाय मीडिया ने धर्मस्थल के बारे में जहर उगला।
टीएनएम ने बेबुनियाद आरोप नहीं लगाए, बल्कि बेबुनियाद आरोपों को जगह दी, उसका विश्लेषण किया। अब सवाल ये उठता है कि अगर आरोप मदरसों में सामूहिक बलात्कार या किसी मस्जिद द्वारा आपराधिक गतिविधियों को छुपाने के बारे में होता, तो क्या द न्यूज मिनट की रिपोर्टिंग इसी तरह होती? क्या उसने धार्मिक नेटवर्क के जरिए सैकड़ों हिंदू लड़कियों की तस्करी की संभावना पर लंबी-चौड़ी रिपोर्टिंग की होती? इसका उत्तर साफ है- नहीं।
खबरों का विश्लेषण, स्पेशल कवरेज केवल तभी दिखाई देता है जब निशाना हिंदू संस्थाएँ होती हैं। जब बात चर्चों में यौन अपराधों या मस्जिदों की होती है, तो ‘द न्यूज़ मिनट’ बड़ी आसानी से उन्हें रिपोर्ट करने से बचता है या ऐसी घटनाओं को कम करके आंकने की कोशिश करता है।
अजमेर कांड, केरल की कहानी और उत्तराखंड में धर्मस्थल के फर्जीवाड़े को कवर करने में पक्षपात
यह पक्षपात 20 अगस्त, 2024 के अजमेर सेक्स स्कैंडल के फैसले से तुलना करने पर और भी स्पष्ट हो जाता है। बत्तीस साल की कानूनी लड़ाई के बाद, एक जिला अदालत ने 1990 के दशक की शुरुआत में अजमेर में 100 से ज़्यादा स्कूली लड़कियों के सामूहिक बलात्कार और ब्लैकमेल के लिए छह लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आरोपी कोई मामूली नहीं थे। इनमें अजमेर दरगाह के खादिमों के साथ-साथ फारूक चिश्ती, नफीस चिश्ती और अनवर चिश्ती जैसे अजमेर युवा कांग्रेस के नेता भी शामिल थे।
पीड़िता ज़्यादातर हिंदू लड़कियाँ थीं, जिनमें से कई को फँसाया गया, बलात्कार किया गया, उनकी तस्वीरें खींची गईं और फिर ब्लैकमेल कर सेक्स रैकेट में शामिल किया गया। कुछ को आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया। यह भारतीय इतिहास के सबसे बड़े सेक्स स्कैंडल में से एक था। फिर भी, द न्यूज़ मिनट, ने अजमेर शरीफ पर कोई टिप्पणी नहीं की। इस मामले में कोई विशेष कवरेज नहीं, कोई विश्लेषण नहीं। भारत के सबसे कुख्यात अपराधों में से एक का फैसला खामोशी में दफना दिया गया।
टीएनएम ने ‘द केरल स्टोरी’ की कवरेज में भी यही किया। जब एक फिल्म में उन महिलाओं की गवाही दिखाई गई, जिन्हें रिश्तों में फँसाया गया।उनका धर्मांतरण कराया गया और आईएसआईएस दुल्हनों के रूप में तस्करी की गई, तो टीएनएम ने इसे एक दुष्प्रचार फिल्म बताकर खारिज कर दिया। पीड़ितों के अपने शब्दों, उनकी दर्दनाक आपबीती को इसलिए नजरअंदाज कर दिया गया, क्योंकि कहानी में अपराधी इस्लाम को मानने वाले थे।
यहाँ प्रशिक्षण, तस्करी और कट्टरपंथ के एक वास्तविक मामले को कम करके आँका गया और उसका मजाक उड़ाया गया। जबकि धर्मस्थल में सामूहिक हत्याओं के एक पूरी तरह से काल्पनिक दावे को राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया गया।
ये एक खास पैटर्न को उजागर करता है। हिंदुओं के खिलाफ बगैर सबूत के निराधार आरोपों को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, इस्लामिक भीड़ के अपराधों को भी खारिज करना। साथ ही उन कहानियों को मिटा देना, जहाँ हिंदू पीड़ित हैं।
यह पैटर्न अतिक्रमण के मामलों में भी देखा जा सकता है। देवभूमि उत्तराखंड में मस्जिदों और मदरसों द्वारा हथिया ली गई सरकारी जमीन का कई बार पर्दाफाश हुआ। मस्जिदों और मदरसों का निर्माण वन क्षेत्रों और यहाँ तक कि तीर्थयात्रा मार्गों पर अवैध रूप से कब्जा कर बनाए जाने का पता चला। इन अतिक्रमणों के कारण तोड़फोड़ और राजनीतिक बहस भी हुई। लेकिन गलत कामों के स्पष्ट दस्तावेजी सबूत भी सामने आए।
लेकिन यहाँ भी ‘द न्यूज़ मिनट’ गायब था। खोजी पत्रकारिता और ‘सच’ का पता लगाने वाली कोई रिपोर्टिंग नहीं थी। धार्मिक संस्थाओं द्वारा जमीन हड़पने पर कोई संपादकीय ‘आक्रोश’ नहीं था। वही ‘न्यूज़रूम’ को उत्तराखंड में इस्लामिक संस्थाओं द्वारा किए गए अतिक्रमणों को बताने में कोई रुचि नहीं थी। क्या कवर नहीं करना है- इसका खास ख्याल रखते हुए टीएनएम ने सिर्फ हिन्दू संस्थानों को ‘संदिग्ध’ के रूप में पेश किया, ताकि इस्लामी संस्थाएँ जाँच से बच जाएँ।
यही बात लव जिहाद के मामलों पर भी लागू होती है, जिसका जिक्र ‘द न्यूज़ मिनट’ की कवरेज में शायद ही कभी होता है। और जब होता भी है, तो ‘मीडिया’ संस्थान अक्सर इसे ‘दक्षिणपंथी सोच’ बताकर खारिज कर देता है। ये उन हज़ारों महिलाओं के दर्द का अपमान है, जो लव जिहाद के आतंक से गुज़री हैं। मुस्लिम पुरुषों द्वारा पीड़ित होती हैं, जो उन्हें झूठे प्रेम जाल में फँसाकर रिश्ते बनाते हैं और फिर धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करते हैं।
धर्मस्थल मंदिर को लेकर फैलाए गए झूठ से ये भी साबित होता है कि कैसे तंत्र का इस्तेमाल दुष्प्रचार के लिए किया जाता है। ऑल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर और प्रतीक सिन्हा जैसे लोग और न्यूज़लॉन्ड्री से जुड़े पत्रकार, अक्सर ट्वीट करके मंदिर के बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। इसका उद्देश्य सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदू संस्थाओं को बदनाम करना होता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह की निराधार साजिशों का प्रचार करके, ऐसे लोग जनमत को बताने की कोशिश करते हैं कि हिंदू पूजा स्थलों को सरकारी नियंत्रण में क्यों रहना चाहिए?
ज़ुबैर ने धर्मस्थल की कहानी को लगातार कवर करने के लिए द न्यूज़ मिनट की भी सराहना की, और उनकी रिपोर्टों का इस्तेमाल हिंदू संस्थाओं के खिलाफ अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए किया। लेकिन जब एसआईटी को कुछ नहीं मिला, और गवाह खुद गिरफ्तार हो गया, तो ज़ुबैर ने चुपचाप अपना जश्न मनाने वाला ट्वीट डिलीट कर दिया। न माफी माँगी और न ही स्पष्टीकरण दिया।
ज़ुबैर ने धर्मस्थल की कहानी को लगातार कवर करने के लिए द न्यूज़ मिनट की भी सराहना की, और उनकी रिपोर्टों का इस्तेमाल हिंदू संस्थाओं के खिलाफ अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए किया। लेकिन जब एसआईटी को कुछ नहीं मिला, और गवाह खुद गिरफ्तार हो गया, तो ज़ुबैर ने चुपचाप अपना जश्न मनाने वाला ट्वीट डिलीट कर दिया। न माफी माँगी और न ही स्पष्टीकरण दिया
जुबैर चुपचाप अपने झूठ से पीछे हट गया। यही उनका तरीका है। हिंदुओं के ‘गलत कामों’ को आक्रामक तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना। लेकिन जब कहानी उल्टी नजर आए, तो बेशर्मी से बच निकलना। पिछले कुछ समय से, ज़ुबैर और उनके जैसे लोग ऐसे हथकंडों का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। किसी और के कंधे पर बंदूक रखकर हिंदू मान्यताओं पर हमला करना और जब जवाबदेह ठहराया जाए तो भाग जाना।
ज़ुबैर पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ ‘सर तन से जुदा’ गैंग शुरू करने के लिए कुख्यात है। 2022 में पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ टिप्पणी करने का उसने नूपुर शर्मा पर आरोप लगाया था। तीन साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी, ज़ुबैर ने अभी तक नूपुर द्वारा कही गई बातों को झूठा साबित करने के लिए कोई ‘फ़ैक्ट-चेक’ नहीं किया है। वह नूपुर के दावों पर अपने ‘फ़ैक्ट-चेक’ से जुड़े सवालों का जवाब देने से बचते रहे हैं।
जब मुस्लिम मौलवियों को मस्जिदों के अंदर नाबालिगों के साथ बलात्कार का दोषी ठहराया जाता है, या जब अवैध अतिक्रमण के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है, तो इस पूरे तंत्र को साँप सूँघ जाता है। निरंतर कवरेज का यह मॉडल केवल एक ही दिशा में लागू होता है। वही ज़ुबैर जो हिंदू धर्मगुरुओं के भाषणों पर कटाक्ष करते हैं, वे मुस्लिम मौलवियों द्वारा विवादास्पद सांप्रदायिक टिप्पणियों को उजागर करना भूल जाते हैं। वही टीएनएम जो धर्मस्थल की साजिशों पर व्याख्यात्मक लेख प्रकाशित करता है, उसे अजमेर, उत्तराखंड के अतिक्रमणों या इस्लामी कट्टरपंथ के शिकार लोगों के लिए जगह नहीं मिलती।
झूठी नैतिक समानता का जाल
हर बार जब कोई मुस्लिम घोटालों में फँसता है तो उन्हें ‘संतुलित’ करने का प्रयास किया जाता है। अजमेर, बिशप फ्रैंको, आईएसआईएस भर्ती जैसे मामले सामने आने पर हिंदुओं से जुड़ा कोई ‘कांड’ गढ़ने की कोशिश की जाती है। ‘लव जिहाद’ का मुकाबला करने के लिए ‘भगवा प्रेम जाल’ सामने आता है। ‘जय श्री राम’ को ‘अल्लाहु अकबर’ के बराबर बताया जाता है ताकि इस्लामी कट्टरपंथ को ‘संतुलित’ किया जा सके। उसे तर्कसंगत बनाने के लिए हमेशा एक हिंदू समकक्ष तैयार रहे, क्योंकि यह केवल इस्लाम तक सीमित नहीं है। तर्कवादी हत्याओं का इस्तेमाल हिंदू धर्म को असहिष्णु बताने के लिए किया जाता है। अजमेर या केरल की कहानी को संतुलित करने के लिए एक मनगढ़ंत हिंदू डरावनी कहानी गढ़ना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘इस्लामिक कट्टरपंथ’ दोषी न लगे।
इंजीनियरिंग के नजरिए से देखा जाए, तो आरोप कच्चे माल की तरह होते हैं। ‘द न्यूज़ मिनट’ जैसे प्रवर्तक उन्हें ‘गंभीर मुद्दों’ में बदल देते हैं। जुबैर और सिन्हा जैसे दुष्प्रचार के सौदागर उन्हें व्यापक रूप से फैलाते हैं। फिर भुगतान के रूप में सोशल मीडिया ट्रोल किया जाता है। फिर ऐसे बढ़ा-चढ़ा कर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया जाता है। इस चर्चा में सबसे पहले छिप जाती है वह सच्चाई, जो वास्तव में होती है। चर्चा को सनसनीखेज बनाया जाता है और जब झूठा साबित होता है, तो प्रतिक्रिया के रूप में सामने आती है चुप्पी। कोई जिम्मेदारी नहीं लेने की बेशर्म कोशिश।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते की कहानी कई दशकों की है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते उसी दिन से असामान्य रहे हैं, जब 1947 में देश का बँटवारा हुआ था। पाकिस्तान का जन्म ही लाखों लोगों की मौत और बर्बादी के साथ हुआ। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों महिलाएँ दरिंदगी का शिकार बनीं। लेकिन इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू के दौर में भारत ने पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति को भाईचारे और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आधारित रखा।
लेकिन नरेंद्र मोदी के दौर में नीति ने ‘प्रतिशोध’ का रूप लिया। पाकिस्तान को सीधे तौर पर करारा जवाब देते हुए कहा कि ‘सुख चैन से जियो! रोटी खाओ..वरना मेरी गोली तो है ही।’ यह बदलाव भारत की बदलती सोच और वास्तविकता को दर्शाती है।
नेहरू का दौर: ‘दिल और बाहों का हिस्सा’
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पाकिस्तान के प्रति नजरिया भावनात्मक और सुलह-समझौते वाला रहा था। 1957 में लाल किले से अपने भाषण में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और वह ‘भारत के दिल और बाहों का हिस्सा’ है, उससे लड़ना ‘खुद को नुकसान पहुँचाने जैसा’ होगा। भले ही विभाजन के दौरान लाखों लोगों का नरसंहार और हजारों महिलाओं-बेटियों के साथ बलात्कार ही क्यों ना हुआ हो, फिर भी नेहरू का नजरिया पाकिस्तान के प्रति शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित था।
1947 में भारत के विभाजन के बाद एक नया देश पाकिस्तान बना, जो मुस्लिम बहुल था। लेकिन पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख भी रहते थे, खासकर पंजाब, सिंध और पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में। विभाजन के समय और उसके बाद पाकिस्तान के पश्चिमी हिस्सों (वर्तमान पाकिस्तान) में हजारों हिंदू और सिखों को हत्या, लूटपाट और दंगे का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा जबरन धर्म परिवर्तन कराए गए, मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले हुए, अपहरण और महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ सामने आईं। इन हालातों के चलते लाखों हिंदू और सिख परिवारों को भारत पलायन करना पड़ा।
हालाँकि, भारत में इन घटनाओं को लेकर जनता और विपक्षी नेताओं में आक्रोश था, फिर भी नेहरू सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई सैन्य कदम नहीं उठाया। पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया। नेहरू का मानना था कि भारत को एक ज़िम्मेदार और शांतिप्रिय राष्ट्र की तरह पेश आना चाहिए और पाकिस्तान को भी अपनी जिम्मेदारी खुद निभाने का मौका दिया जाना चाहिए। इसी शांतिप्रिय राष्ट्र का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान ने 1947 और 1965 में दो बार कश्मीर पर हमला किया।
फिर 1960 में, भारत और पाकिस्तान के बीच एक सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुआ, जिसकी भीख पाकिस्तान ने खुद माँगी थी। जल संधि पर हस्ताक्षर के तहत भारत से बहने वाली छह नदियों में से तीन का पानी पाकिस्तान को दिया गया। नेहरू ने इस समझौते को दोनों देशों के बीच सद्भावना बनाए रखने का एक नाम दिया। हालाँकि, कुछ लोगों का मानना है कि यह समझौता भारत के किसानों के साथ अन्याय था, क्योंकि देश के हक का पानी दुश्मन देश को दिया जा रहा था।
पाकिस्तान में लगातार हिंदुओं की स्थिति बदतर देखते हुए नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने एक समझौता किया। इसका उद्देश्य था कि दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा को रोका जाए। जबरन धर्म परिवर्तन और हिंसा को रोका जाए।
जब हो सकता था कश्मीर पर समझौता
इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ, जिसके बाद बांग्लादेश का निर्माण हुआ। भारत ने पाकिस्तान की सेना को निर्णायक रूप से हराया और 93,000 पाकिस्तानी फौजियों को युद्धबंदी बनाया। लेकिन इस जीत के बाद भी भारत ने कश्मीर मुद्दे पर कोई लाभ नहीं उठाया।
पाकिस्तान के फौजियों को बिना शर्त छोड़ देना इस बात का प्रतीक था कि भारत अब भी पाकिस्तान को ‘भाई’ मानता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक ऐतिहासिक मौका था, जिसके चलते भारत कश्मीर मुद्दे पर एक फैसला कर सकता थै, जिसे शांति की नीति के चलते छोड़ दिया।
राजीव गाँधी के कार्यकाल में पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति अधिक मौन थी। स्वतंत्रता दिवस के भाषणों में पाकिस्तान का नाम भी मुश्किल से लिया जाता था। इसी दौरान पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देना शुरू कर दिया।
1980-1990 के दशक के दौरान जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद तेजी से बढ़ने लगा। हजारों कश्मीरी पंडितों को घाटी से अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। हजारों कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया और तब आतंक का दौर जम्मू-कश्मीर से शुरू हुआ। पाकिस्तान की भूमिका आतंकवाद पर स्पष्ट थी, लेकिन भारत की प्रतिक्रिया अभी भी संयमित थी।
2008 में जब मुंबई में 26/11 का आतंकी हमला हुआ और पाकिस्तान से आए आतंकियों ने 166 लोगों की हत्या कर दी, तब भी भारत ने किसी प्रकार की सीधी जवाबी कार्रवाई नहीं की। 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त के भाषण में सिर्फ कश्मीर को दी गई रियायतों का ज़िक्र किया, लेकिन इस भाषण में कहीं भी पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया। यह सब दर्शाता है कि उस समय भारत की नीति में अब भी ‘संयम’, ‘राजनीतिक शिष्टाचार’ और ‘शांति प्रक्रिया’ का ही वर्चस्व था।
नरेंद्र मोदी का दौर: कठोर यथार्थवाद और निर्णायक कार्रवाई
जब 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति ने पूरी तरह से नया मोड़ लिया। मोदी सरकार ने पाकिस्तान के प्रति एक कठोर और आक्रामक रुख अपनाया और ‘भाईचारे’ की पुरानी नीति को पूरी तरह से त्याग दिया। उनका मानना है कि भारत अब ‘परमाणु ब्लैकमेल’ को बर्दाश्त नहीं करेगा और आतंकवाद को संरक्षण देने वालों पर कोई तरस नहीं दिखाया जाएगा। पीएम मोदी ने अपने भाषणों में पाकिस्तान को सीधे तौर पर आतंकवाद का आश्रयदाता करार दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को बेनकाब करना शुरू कर दिया।
2016 में पाकिस्तान ने उरी में भारतीय सैनिकों पर हमला किया, जिसमें 19 जवान शहीद हुए। इस हमले के बाद भारत ने पहली बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकियों के ठिकानों को नष्ट किया। यह भारत की सैन्य नीति में ऐतिहासिक बदलाव था।
फिर 2019 में पुलवामा हमले में 40 जवानों की शहादत के बाद भारत ने ‘बालाकोट एयरस्ट्राइक’ कर पाकिस्तान के अंदर घुसकर आतंकी ठिकानों पर बमबारी की। ये दोनों घटनाएँ इस बात का संकेत थीं कि भारत अब ‘हमला होने के बाद चुप नहीं बैठेगा’, बल्कि करारा जवाब देगा।
2019 में, मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर एक बड़ा कदम उठाया, जिससे राज्य को विशेष दर्जा देने वाला प्रावधान खत्म हो गया। यह भी पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि वह इस मुद्दे पर लगातार अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की माँग करता रहा था।
मोदी सरकार ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने की भी रणनीति अपनाई। संयुक्त राष्ट्र, G20, BRICS जैसे मंचों पर भारत ने बार-बार पाकिस्तान को आतंकवाद का समर्थन करने वाला देश बताया। साथ ही, बलूचिस्तान, गिलगित और पीओके जैसे मुद्दों को भी वैश्विक चर्चा में लाने का काम किया, जो पहले के प्रधानमंत्री कभी नहीं करते थे।
मोदी सरकार ने सिंधु जल संधि को भी नए सिरे से देखने की बात कही। मोदी ने सार्वजनिक मंच से कहा कि यह संधि भारत के किसानों के साथ अन्याय है, क्योंकि भारत की नदियों का पानी दुश्मन देश की जमीन सींच रहा है और भारतीय खेत सूख रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब ‘खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे।’ इसका मतलब था कि अगर पाकिस्तान भारत में आतंक फैलाएगा, तो भारत उसे पानी भी नहीं देगा। सिंधु जल समझौते पर यह अब तक की सबसे कठोर टिप्पणी थी, जो यह दर्शाती है कि भारत अब रियायत देने के मूड में नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत अब परमाणु धमकियों के सामने नहीं झुकेगा। पाकिस्तान लंबे समय से ‘न्यूक्लियर ब्लैकमेल’ की रणनीति अपनाता रहा है– जैसे ही भारत कुछ सख्त रुख दिखाता है, पाकिस्तान परमाणु हथियारों की धमकी देने लगता है। लेकिन मोदी ने यह साफ कह दिया कि अब भारत की सेना जवाब अपने समय, अपने तरीके और अपनी शर्तों पर देगी। यही बात उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी कही, जिसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तान के घर में घुसकर आतंकियों के ठिकानों का चकनाचूर किया था।
पीएम मोदी ने पाकिस्तान को करारा जवाब देते हुए ये भी कहा था, कि सुख चैन से जियो! रोटी खाओ..वरना मेरी गोली तो है ही”… जो दर्शाता है कि मौन रहने वाला दौर अब कॉन्ग्रेसी काल के दौरान ही चला गया है।
इस प्रकार देखा जाए तो जहाँ नेहरू और उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने पाकिस्तान के प्रति सुलह, समझौता और भाईचारे की नीति अपनाई, वहीं मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान को अब आतंकवाद के हर कदम का जवाब मिलेगा। नेहरू के जमाने में पाकिस्तान को ‘दिल और बाहों का हिस्सा’ कहा जाता था, जबकि मोदी के नेतृत्व में भारत ने उसे ‘आतंकवाद का अड्डा’ बताया और उससे बिना किसी भावनात्मक मोह के सख्ती से निपटने का संकल्प लिया।
आज भारत की नीति यह है कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। भारत अब ‘हमला सहने वाला देश’ नहीं रहा, बल्कि ‘जवाब देने वाला राष्ट्र’ बन गया है। मोदी सरकार के नेतृत्व में पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति भावनात्मक नहीं, बल्कि यथार्थवादी और निर्णायक बन चुकी है।