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वियतनाम का टैरिफ घटाकर 40 से 20% किया, बदले में मिला ₹12000+ करोड़ का गोल्फ रिजॉर्ट: क्या निजी फायदे के लिए अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचा रहे डोनाल्ड ट्रंप?

अमेरिका ने हाल ही में दुनिया के 90 देशों पर सख्त टैरिफ लगा दिया है। ट्रंप का मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली अमेरिका के साथ अन्याय कर रही है और इसी सोच के तहत उन्होंने ये कड़े कदम उठाए हैं।

शुरुआत में ट्रंप ने चीन के साथ एक बड़ा टैरिफ युद्ध शुरू किया था, जो बाद में सुलझ गया। अब उन्होंने भारत को निशाना बनाया है। ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करता है, तो उसे 50% टैरिफ देना पड़ेगा।

हालाँकि भारत ने इस दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया और अपना मजबूत रुख बनाए रखा। भारत की तरह ही अन्य देशों ने भी ट्रंप की धमकियों का जवाब देने के लिए अपनी-अपनी रणनीति तैयार की।

राष्ट्रपति ट्रंप 2 अप्रैल को ‘लिबरेशन डे’ पर नया टैरिफ लगाने वाले थे। इसके तहत वियतनाम पर सबसे ज्यादा 46% टैरिफ लगने वाला था। लेकिन बाद में यह घटा कर 20% कर दिया गया। यह बदलाव उस वक्त हुआ जब ट्रंप परिवार को वियतनाम में 1.5 बिलियन डॉलर (लगभग 12,500 करोड़ रुपये) के एक भव्य गोल्फ रिसॉर्ट बनाने की अनुमति मिली।

ट्रम्प परिवार का गोल्फ रिसॉर्ट बना वियतनाम में टैरिफ घटाने की ‘कीमत’!

रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, वियतनाम की राजधानी हनोई के पास अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ब्रांड का एक भव्य गोल्फ और रेसिडेंशियल रिसॉर्ट बनने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत मई में वियतनामी प्रधानमंत्री फाम मिन्ह चिन्ह और एरिक ट्रंप (डोनाल्ड ट्रंप के बेटे) द्वारा किए गए भूमि पूजन समारोह से हुई थी।

निर्माण कार्य अगले महीने से शुरू होने वाला है। यह प्रोजेक्ट 990 हेक्टेयर (2,446 एकड़) क्षेत्र में फैला होगा और इसमें तीन 18-होल गोल्फ कोर्स, लग्जरी रेसिडेंशियल अपार्टमेंट और कई सुविधाएँ होंगी।

प्रधानमंत्री चिन्ह ने एरिक ट्रंप की यात्रा को प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाने की प्रेरणा बताया और स्थानीय अधिकारियों को इसे 2027 के अंत तक पूरा करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसे अमेरिका-वियतनाम रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम भी बताया।

यह वियतनाम में ट्रंप परिवार के ब्रांड का पहला प्रोजेक्ट है। दिलचस्प बात यह है कि जब यह योजना मंजूर की गई, उसी समय वियतनाम और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता वार्ता भी चल रहा था।

वियतनामी रियल एस्टेट कंपनी ‘किन्हबाक सिटी’ और उसके साझेदार इस प्रोजेक्ट का निर्माण करेंगे। इन कंपनियों ने 5 मिलियन डॉलर (लगभग 42 करोड़ रुपए) ट्रंप ऑर्गनाइजेशन को सिर्फ उसका नाम इस्तेमाल करने के लिए दिए हैं।

हालाँकि ट्रंप ऑर्गनाइजेशन निर्माण, जमीन अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया में शामिल नहीं है, लेकिन प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद इसका संचालन ट्रंप परिवार की कंपनी ही करेगी रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट को धड़ाधड़ मंजूरी दी गई, यहाँ तक कि कई जरूरी प्रक्रियाएँ जैसे पर्यावरणीय समीक्षा भी पूरी नहीं हुईं।

ट्रस्ट की कमाई का असली लाभार्थी ट्रंप खुद

व्हाइट हाउस ने ट्रंप के बिजनेस ट्रस्ट में किसी भी तरह के हितों के टकराव (conflict of interest) से इनकार किया है। डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनके बच्चे ही बिजनेस ट्रस्ट को संभाल रहे हैं, लेकिन जून 2025 में सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, इस ट्रस्ट से मिलने वाली अधिकांश कमाई के असली लाभार्थी ट्रंप स्वयं हैं।

ट्रम्प कंपनी की परियोजना के लिए ली गई जमीन के बदले किसान विस्थापित, मिला मामूली मुआवजा

वियतनाम में एक 990 हेक्टेयर जमीन पर गोल्फ कोर्स बनाने की योजना के चलते वहाँ पर लंबे समय से रह रहे और खेती कर रहे किसानों को जमीन खाली करने के लिए कहा गया। बदले में उन्हें सिर्फ 3,200 डॉलर और कुछ महीनों के लिए चावल दिए जा रहे हैं। इस मामले से जुड़े छह लोगों और कुछ दस्तावेजों से पता चला है कि कई स्थानीय लोगों को इसी तरह का मुआवजा देकर वहाँ से हटने को कहा गया है।

इस जमीन पर फिलहाल लॉन्गन, केले और दूसरी फलों की खेती होती है। ज्यादातर किसान बुजुर्ग हैं और उन्हें डर है कि वियतनाम की युवा-आबादी वाली अर्थव्यवस्था में उन्हें नया काम मिलना मुश्किल होगा। वे चिंता में हैं कि सरकार उनकी जमीन जब्त कर लेगी और वे बेरोजगार हो जाएँगे।

शुरुआत में इस प्रोजेक्ट के लिए 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा के मुआवजे की बात थी, लेकिन अब डेवलपर्स मुआवजा घटाने की योजना बना रहे हैं। ट्रंप परिवार का इस निवेश और किसानों को भुगतान में कोई सीधा संबंध नहीं है। अंतिम मुआवजे की राशि जमीन के स्थान और आकार के आधार पर तय होगी और इसका आधिकारिक ऐलान अगले महीने होने की उम्मीद है।

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, पाँच किसानों को 12 से 30 डॉलर प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा मिला है। साथ ही, जिन पौधों को जमीन से हटाया गया, उनके लिए कुछ अतिरिक्त पैसे और कुछ महीनों के लिए चावल भी दिए गए हैं। लेकिन किसानों ने इन दरों को बहुत कम बताया है। एक और चिट्ठी में स्थानीय अधिकारियों ने कहा है कि अंतिम भुगतान का फैसला अगले महीने होगा और इससे हजारों लोग प्रभावित होंगे।

वियतनाम में सारी जमीन सरकार की होती है। किसानों को केवल लंबे समय तक इस्तेमाल करने के लिए जमीन दी जाती है, लेकिन सरकार जब चाहे जमीन वापस ले सकती है। मुआवजा सरकार देती है, लेकिन उसका खर्च निजी डेवलपर्स उठाते हैं।

मई में हुए भूमि पूजन समारोह में प्रधानमंत्री फाम मिन चिन्ह ने वादा किया था कि किसानों को उचित मुआवजा मिलेगा। लेकिन किसानों ने शिकायत की है कि वे मोलभाव नहीं कर सकते और देश में विरोध-प्रदर्शन भी असरदार नहीं होते।

किसानों के हितों से नहीं होगा कोई समझौता- भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए अनुचित टैरिफ (शुल्क) पर सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा,  “हमारे किसानों का हित ही हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत कभी भी अपने किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से समझौता नहीं करेगा। मुझे पता है कि हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और मैं इसके लिए तैयार हूँ। भारत इसके लिए तैयार है।”  

ट्रंप ने भारत पर यह शुल्क रूस से तेल आयात के मुद्दे को लेकर लगाया है और इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा व विदेश नीति से जुड़े कारणों का हवाला दिया है। व्हाइट हाउस के आदेश के अनुसार, ट्रंप का कहना है कि भारत द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूस से तेल मँगाना अमेरिका के लिए ‘असाधारण और असामान्य खतरा’ है।

भारत ने स्पष्ट किया है कि तेल आयात बाजार की स्थितियों के अनुसार होता है और इसका उद्देश्य देश की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत सरकार ने यह भी कहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कोई भी कदम उठाने को तैयार है।

इससे पहले भी मोदी सरकार ने अमेरिका और यूरोपीय संघ की दोहरी नीति पर सवाल उठाया था। भारत ने बताया कि ये देश खुद रूस से गैर-जरूरी वस्तुओं का व्यापार कर रहे हैं, जबकि भारत ने केवल तेल खरीदा जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति स्थिर बनी रही। इसके बावजूद भारत को निशाना बनाया जा रहा है।

एक अधिकारी ने जानकारी दी कि भारत सरकार धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर कोई रियायत नहीं देगी, जैसे कि माँसहारी गायों का दूध और उसके डेयरी प्रोडक्ट (non-vegetarian milk) और बीफ उत्पाद। मोदी सरकार ने अमेरिका को भारतीय डेयरी और कृषि बाजार खोलने से साफ इनकार किया है और इन पर शुल्क कम करने से भी मना किया है।

अगर भारतीय कृषि और डेयरी बाजार अमेरिका के लिए खोले गए, तो करोड़ों भारतीय किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए भारत ने कृषि क्षेत्र को व्यापार समझौतों से बाहर रखा है।

फिर भी अमेरिका लगातार दबाव बनाता रहा है, क्योंकि वह भारत जैसे बड़े बाजार से अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहता है। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान जैसे आतंकवाद-समर्थक देश की ओर बढ़ता दिख रहा है।

कतर ने ट्रम्प को दिया 400 मिलियन डॉलर का उपहार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कतर की शाही फैमिली की ओर से एक लग्जरी बोइंग 747-8 विमान तोहफे में दिया गया है, जिसकी कीमत करीब 400 मिलियन डॉलर (लगभग 3,300 करोड़ रुपये) है। यह विमान अमेरिकी रक्षा विभाग को मई में सौंपा गया और इसे भविष्य में ‘एयर फोर्स वन’ के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है, यानी राष्ट्रपति के आधिकारिक विमान के रूप में।

हालाँकि इस विमान को पूरी तरह तैयार करने और सुरक्षा व तकनीकी अपग्रेड करने में कई साल और करोड़ों डॉलर लगेंगे। लेकिन व्हाइट हाउस के एक वक्तव्य पर विवाद हो गया है। इसके अनुसार, ट्रंप के कार्यकाल के बाद यह विमान उनके राष्ट्रपति पुस्तकालय (Presidential Library) में रखा जाएगा। इसका मतलब है कि ट्रंप इसे पद छोड़ने के बाद भी इस्तेमाल कर सकेंगे।

जैसे ही यह खबर सामने आई, अमेरिका में राजनीतिक हलकों में हंगामा मच गया। ट्रंप ने अपने बचाव में कहा, “अमेरिका का विमान दुनिया के बाकी नेताओं से बेहतर और ज्यादा शानदार होना चाहिए।” उन्होंने मौजूदा एयर फोर्स वन को ‘छोटा और कम प्रभावशाली’ बताया।

लेकिन इस फैसले पर दोनों पार्टियों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट) ने कड़ी आलोचना की। कई नेताओं ने इसे संभावित सुरक्षा खतरा बताया और इस पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे।

सीनेट अल्पसंख्यक नेता चक शूमर ने कहा कि जब तक व्हाइट हाउस इस ‘तोहफे’ से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं करता, वह जस्टिस डिपार्टमेंट के सभी नामांकनों को रोके रखेंगे। उन्होंने अटॉर्नी जनरल पैम बॉन्डी को भी कॉन्ग्रेस के सामने गवाही देने को कहा।

रिपब्लिकन सीनेट मेजॉरिटी लीडर जॉन थ्यून ने कहा, “इस मामले में गंभीर सवाल उठने तय हैं।” वहीं, रिपब्लिकन सीनेट कॉमर्स कमेटी के चेयरमैन टेड क्रूज ने कहा कि “इस विमान से जासूसी और निगरानी जैसे सुरक्षा खतरे हैं।”

ट्रंप के इस कदम की आलोचना रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों पार्टियों के नेताओं ने मिलकर की। यह अमेरिका की राजनीति में एक असामान्य बात मानी जा रही है।

दूसरे देशों को मजबूर करने की चाल है ट्रंप का टैरिफ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में दावा किया कि उनके लगाए गए टैरिफ से अमेरिका को अरबों डॉलर की आमदनी हो रही है। इसके साथ ही उन्होंने धमकी दी कि विदेशों में बने कंप्यूटर चिप्स पर 100% शुल्क लगाया जाएगा। उन्होंने अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय कीं और कहा कि समय के साथ इसमें बदलाव भी आएगा।

ट्रम्प ने बातचीत के लिए अगस्त तक की समय सीमा तय की। इसके अलावा, स्टील और ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों से जुड़े कई अन्य टैरिफ के कारण अमेरिका का औसत टैरिफ रेट अब पिछले सौ सालों में सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया है।

इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों पर पड़ा, जो निर्यात (exports) पर अधिक निर्भर हैं। खासकर, लाओस और म्यांमार जैसे मैन्युफैक्चरिंग आधारित देशों पर ट्रम्प ने 40% तक के भारी टैरिफ लगाए। जनवरी में व्हाइट हाउस में वापसी के बाद ट्रम्प ने अमेरिका के तीन सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन, कनाडा और मैक्सिको पर भी नए टैरिफ लागू किए।

ट्रम्प का मकसद खुद को एक मजबूत और प्रभावशाली वैश्विक नेता के रूप में पेश करना है, जो अपने टैरिफ के जरिए दुनिया की राजनीति को अपनी शर्तों पर प्रभावित कर सकता है। वे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव डालना भी चाहते हैं ताकि उन्हें गंभीरता से लिया जाए।

इसके अलावा, ट्रम्प चाहते हैं कि अन्य देश उनके अनुसार चलें। इसी वजह से उन्होंने भारत के प्रति सख्त रुख अपनाया, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान मध्यस्थता को लेकर भारत द्वारा उनके दावों को खारिज करने पर। ट्रम्प ने पाकिस्तान से जैसी ‘शुक्रगुजारी’ की उम्मीद की थी, वैसी भारत से नहीं मिली, जो उन्हें नागवार गुजरी।

ट्रम्प खुद को विश्व शांति दूत के रूप में दिखाना चाहते हैं और नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लिए भी उत्सुक हैं। कुछ देशों, जैसे पाकिस्तान, ने उन्हें इसके लिए नामांकित भी किया।

स्पष्ट है कि ट्रम्प टैरिफ्स का इस्तेमाल अन्य देशों पर अपनी शर्तें थोपने के लिए कर रहे हैं। उनके कुछ अधिकारियों ने भी इस बात को स्वीकार किया, खासकर तब जब अमेरिका की एक कोर्ट ने उनके इस कदम को अवैध करार दिया।

कोर्ट ने कहा कि व्हाइट हाउस की ओर से लागू की गई आपातकालीन कानून ट्रम्प को यह अधिकार नहीं देता कि वे लगभग सभी देशों पर टैरिफ्स लगा दें। तीन जजों के पैनल ने फैसला दिया कि ट्रम्प ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया और 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत घोषित की गई राष्ट्रीय आपातकाल स्थिति भी कानूनी तौर पर सही नहीं थी।

व्हाइट हाउस पर ‘कानून के विपरीत’ काम करने का आरोप भी लगा। वहीं सरकार के वकीलों ने तर्क दिया कि टैरिफ्स ने अंतरराष्ट्रीय बातचीत को बढ़ावा दिया है और अगर इन पर रोक लगाई गई तो अमेरिका का वैश्विक प्रभाव कम हो जाएगा। न्याय विभाग के वकील ब्रेट शुमेट ने कोर्ट में कहा, “अगर टैरिफ्स पर रोक लगाई गई, तो यह राष्ट्रपति की ताकत को पूरी तरह खत्म कर देगा।”

निजी और राजनीतिक फायदे के लिए लगाया टैरिफ

ट्रंप साफ तौर पर टैरिफ का इस्तेमाल अपने निजी और राजनीतिक फायदों के लिए कर रहे हैं। वियतनाम में उनके गोल्फ कोर्स और पाकिस्तान से मिली नोबेल पुरस्कार की नामांकन जैसी बातें इसका संकेत देती हैं।

अगर मोदी सरकार ने ट्रंप की शर्तें मान ली होती तो भारत भी बढ़ी हुई टैरिफ की धमकियों से बच सकता था, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय मोदी सरकार ने मजबूती दिखाई, जो ट्रंप को और ज्यादा नाराज कर गई।

ट्रंप टैरिफ को इनाम या सजा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। जिस देश से उनकी मर्जी चलती है, उसे फायदा देते हैं और जो विरोध करता है, उस पर दबाव डालते हैं।

मूल रुप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

केंद्र सरकार ने ममता बनर्जी के दावों को संसद में किया खारिज, कहा – दिल्ली के वसंत कुंज में बंगालियों की कोई बेदखली नहीं: कोर्ट के आदेश पर काटे गए थे बिजली के सिर्फ 2 कनेक्शन

केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में बीजेपी सरकार बंगाली भाषी लोगों को जबरदस्ती उनके घरों से निकाल रही है। संसद में साफ कर दिया गया कि सरकार की तरफ से ऐसी कोई बेदखली का आदेश कभी जारी ही नहीं हुआ।

कुछ दिन पहले ममता बनर्जी ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि बीजेपी शासित दिल्ली के वसंत कुंज में जय हिंद कॉलोनी में रहने वाले बंगाली भाषी लोगों को परेशान किया जा रहा है और उन्हें वहाँ से हटाया जा रहा है। लेकिन अब इस मामले में सच्चाई सामने आई है।

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) की सांसद जून मालिया के एक लिखित सवाल के जवाब में स्पष्ट किया कि दिल्ली सरकार ने जय हिंद कॉलोनी में कोई बेदखली अभियान नहीं चलाया।

जून मालिया ने संसद में पाँच सवाल उठाए थे, जो इस कथित बेदखली से जुड़े थे। उनके सवाल कुछ इस तरह थे:

  1. क्या सरकार को जय हिंद कॉलोनी और वसंत कुंज, नई दिल्ली में बिजली और पानी की आपूर्ति काटने की कोई शिकायत मिली है?
  2. अगर हाँ, तो ये कार्रवाइयाँ किन कानूनी नियमों या सरकारी आदेशों के तहत की जा रही हैं?
  3. इस बेदखली अभियान से कितने परिवार प्रभावित हुए हैं?
  4. क्या सरकार ने बेदखल किए गए लोगों की भारतीय नागरिकता या उनके कानूनी निवास की स्थिति की जाँच की है?
  5. क्या प्रभावित परिवारों के लिए कोई मुआवजा या पुनर्वास की योजना शुरू की गई है? अगर हाँ, तो उसका पूरा ब्योरा क्या है?

इसके जवाब में 5 अगस्त को नित्यानंद राय ने संसद में लिखित जवाब दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार ने जय हिंद कॉलोनी, वसंत कुंज में न तो कोई बेदखली अभियान चलाया और न ही बिजली या पानी की आपूर्ति काटने की कोई लिखित शिकायत मिली। हाँ, 10 जुलाई 2025 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस बारे में एक पोस्ट जरूर सामने आई थी, लेकिन इसके अलावा कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली।

राय ने आगे बताया कि जय हिंद कॉलोनी एक झुग्गी-झोपड़ी (जे.जे. क्लस्टर) वाला इलाका है। वहाँ पानी की पाइपलाइन बिछी हुई नहीं है, इसलिए वहाँ के लोगों को रोजाना टैंकरों से पानी पहुँचाया जाता है। यह काम नियमित रूप से चल रहा है और इसमें कोई रुकावट नहीं आई। साथ ही 8 जुलाई 2025 को दो बिजली कनेक्शन जरूर काटे गए थे, लेकिन यह कार्रवाई एक सिविल कोर्ट के फैसले (14 मई 2024, सिविल सूट नंबर 56914/2016) के पालन में की गई थी।

इससे पहले, 31 जुलाई 2025 को जून मालिया ने लोकसभा में यही सवाल उठाया था। उन्होंने पूछा था कि क्या सरकार को जय हिंद कॉलोनी में चल रहे बेदखली अभियान और बिजली-पानी की आपूर्ति काटने की शिकायतों की जानकारी है।

साथ ही उन्होंने यह भी पूछा था कि ये कार्रवाइयाँ किन कानूनी नियमों के तहत हो रही हैं, कितने परिवार प्रभावित हुए हैं, क्या बेदखल लोगों की नागरिकता या कानूनी निवास की जाँच हुई है, और क्या प्रभावित परिवारों के लिए कोई मुआवजा या पुनर्वास योजना बनाई गई है।

इसका जवाब देते हुए आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री तोखराम साहू ने साफ कहा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने जय हिंद कॉलोनी में कोई बेदखली अभियान नहीं चलाया और न ही बिजली-पानी काटने की कोई शिकायत मिली। उन्होंने कहा कि जब कोई बेदखली हुई ही नहीं, तो न तो कानूनी कार्रवाई का सवाल उठता है, न प्रभावित परिवारों की संख्या का और न ही मुआवजे या पुनर्वास योजना का।

उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली जल बोर्ड को पानी की आपूर्ति काटने की कोई लिखित शिकायत नहीं मिली, सिवाय 10 जुलाई 2025 को X पर एक पोस्ट के। इसके अलावा, दिल्ली सरकार के बिजली विभाग ने बताया कि 8 जुलाई 2025 को दो बिजली कनेक्शन काटे गए, लेकिन यह कोर्ट के आदेश (14 मई 2024) के मुताबिक किया गया।

जुलाई में ममता बनर्जी ने बीजेपी पर जमकर हमला बोला था। उन्होंने आरोप लगाया था कि बीजेपी अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई के बहाने बंगाली भाषी भारतीय नागरिकों को निशाना बना रही है। उन्होंने X पर लिखा था, “पानी की सप्लाई काट दी गई, बिजली के मीटर जब्त कर लिए गए, और परसों अचानक बिजली काट दी गई।”

ममता ने जय हिंद कॉलोनी से बंगालियों की कथित बेदखली को बीजेपी की ‘बंगला-विरोधी’ नीति करार दिया। उन्होंने कहा, “बीजेपी शासित राज्यों में बंगालियों को घुसपैठिया माना जा रहा है। बंगाली बोलने से कोई बांग्लादेशी नहीं हो जाता।”

ममता बनर्जी का ट्वीट

13 अगस्त को बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ममता बनर्जी पर पलटवार करते हुए उनके दावों को झूठा बताया। उन्होंने कहा कि टीएमसी सांसद जून मालिया ने अपने सवालों से ही ममता के झूठ को उजागर कर दिया। मालवीय ने कहा कि जय हिंद कॉलोनी में कोई बेदखली अभियान नहीं हुआ। पानी की आपूर्ति काटने की कोई शिकायत दिल्ली जल बोर्ड को नहीं मिली, सिवाय एक सोशल मीडिया पोस्ट के। सिर्फ दो बिजली कनेक्शन काटे गए, और वह भी सिविल कोर्ट के आदेश (14 मई 2024) के तहत।

अमित मालवीय ने कहा, “टीएमसी सांसद ने ममता बनर्जी के झूठ का पर्दाफाश कर दिया। जून मालिया ने लोकसभा में जय हिंद कॉलोनी में बेदखली के बारे में सवाल पूछा था। सरकारी जवाब से सच्चाई साफ हो गई: कोई बेदखली नहीं हुई। पानी काटने की एक भी शिकायत दिल्ली जल बोर्ड को नहीं मिली, सिवाय 10 जुलाई 2025 को एक सोशल मीडिया पोस्ट के। सिर्फ दो बिजली कनेक्शन काटे गए, और वह भी कोर्ट के आदेश पर। टीएमसी का झूठा प्रचार उनके ही सवाल से संसद में बेनकाब हो गया। ममता बनर्जी अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए बंगालियों को निशाना बनाए जाने का झूठा आरोप लगा रही हैं। तथ्य उनके झूठ से ज्यादा जोर से बोलते हैं।”

बता दें कि सोशल मीडिया पर कुछ दिनों पहले अफवाह फैली थी कि दिल्ली में बंगाली भाषी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। हालाँकि बाद में ये दावे फर्जी निकले। इसके बावजूद टीएमसी सांसद ने इस मुद्दे को संसद में उठाया। ये अलग बात है कि केंद्र सरकार ने सभी तथ्यों को सामने रखते हुए ऐसी किसी भी कार्रवाई की बात को खारिज कर दिया।

इटली की नागरिक रहते हुए भी 2 बार भारत की वोटर बन गईं थी सोनिया गाँधी: BJP नेता ने दिखाए सबूत, कहा- अयोग्य-अवैध लोगों को बचाने के लिए SIR का विरोध कर रहे राहुल

बिहार में SIR के खिलाफ पूरा विपक्ष संसद से सड़क तक हंगामा मचा रखा है। चुनाव आयोग के साथ बीजेपी की ‘मिलीभगत’ का आरोप लगाया जा रहा है। इस बीच बीजेपी ने सोनिया गाँधी को घेरा है। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने पूछा है कि सोनिया गाँधी इटली की नागरिक रहते हुए वोटर कैसे बन गईं?

सोशल मीडिया एक्स पर 1980 की वोटर लिस्ट की कॉपी शेयर करते हुए अमित मालवीय ने लिखा, ” भारत की मतदाता सूची के साथ सोनिया गाँधी का रिश्ता चुनाव कानूनों के घोर उल्लंघनों से जुड़ा हुआ है। शायद यही कारण है कि राहुल गाँधी अयोग्य और अवैध मतदाताओं को नियमित करने के पक्षधर हैं और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का विरोध करते हैं।”

मालवीय ने कहा है कि सोनिया गाँधी का नाम पहली बार 1980 में मतदाता सूची में दिखाई दिया था, उस वक्त उनके पास इटली की नागरिकता थी। इसके तीन साल बाद वो भारत की नागरिक बनीं। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था। 1980 में गाँधी परिवार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आधिकारिक निवास 1, सफदरजंग रोड में रहता था।

1980 में पहली बार मतदाता सूची में आया नाम

बीजेपी नेता के मुताबिक, “1980 से पहले पीएम आवास के पते पर पंजीकृत मतदाता इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी और मेनका गाँधी थे। नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में 1 जनवरी, 1980 को अर्हता तिथि मानकर 1980 में संशोधन किया गया था। संशोधन के बाद सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 145 के क्रमांक 388 पर जोड़ा गया। यह प्रक्रिया उस कानून का स्पष्ट उल्लंघन थी जिसके अनुसार मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।”

नाम हटाया फिर जोड़ा गया

सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने और फिर जोड़ने को लेकर अमित मालवीय ने कहा कि 1982 में भारी विरोध के बाद सोनिया गाँधी का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया और 1983 में फिर से नाम जोड़ दिया गया। इस बार भी नाम जोड़ने पर सवाल उठे थे। 1983 के मतदाता सूची के संशोधन में सोनिया गाँधी का नाम मतदान केंद्र 140 के क्रम संख्या 236 पर दर्ज था। पंजीकरण की अर्हता तिथि 1 जनवरी, 1983 थी। जबकि उन्हें 30 अप्रैल, 1983 को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई।

कानून के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मालवीय ने कहा, “सोनिया गाँधी का नाम नागरिकता के लिए अनिवार्य शर्तें पूरी किए बिना ही दो बार मतदाता सूची में दर्ज हुआ—पहली बार 1980 में , जब वह एक इतालवी नागरिक थीं और दूसरी बार 1983 में जब कानूनी रूप से वह भारत की नागरिक नहीं बनी थीं।”

सोनिया गाँधी ने शादी के तुरंत बाद नागरिकता क्यों नहीं ली? इस पर सवाल खड़ा न करते हुए बीजेपी नेता ने कहा, “हम यह भी नहीं पूछ रहे हैं कि राजीव गाँधी से शादी करने के बाद उन्हें भारतीय नागरिकता स्वीकार करने में 15 साल क्यों लग गए? लेकिन यह घोर चुनावी धाँधली नहीं है, तो और क्या है?”

गुरु-शिष्य परंपरा को बदनाम करने पर संतों ने फटकारा, किया बुद्धि शुद्धि पूजन: ‘वोट चोरी’ को हवा देने के लिए राजकमल दास पर गुमराह कर रहा था कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम

गुरु-शिष्य परंपरा को बदनाम करने के लिए कॉन्ग्रेस को साधु-संतों ने फटकार लगाई है। इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी है। मठ में ‘बुद्धि शुद्धि पूजा’ का आयोजन किया गया ताकि ऐसी भ्रामक जानकारी फैलाने वालों की बुद्धि शुद्ध हो सके।

राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों को हवा देने के लिए कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम रामकमल दास को 50 बच्चों का पिता बताते हुए गुमराह करने की कोशिश कर रहा था। जिसके बाद संतों की प्रतिक्रिया सामने आई।

संत समाज की चेतावनी

कॉन्ग्रेस के इस आरोप पर संतों ने कड़ी आपत्ति जताई है। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कॉन्ग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे सनातन हिंदू परंपरा को बदनाम करने की साजिश बताया। उन्होंने कहा कि यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और इसे बिना सही जानकारी के राजनीतिक कारणों से बदनाम किया जा रहा है।

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की गलत जानकारी फैलाई जाती रही तो संत समिति कानूनी कार्रवाई करेगी।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि कॉन्ग्रेस जिस मामले को लेकर भ्रम फैला रही है असल में वह मकान नहीं बल्कि एक मंदिर है। मतदाता सूची में दर्ज पता B 24/19 कोई आम मकान नहीं बल्कि राम जानकी मठ मंदिर है, जिसकी स्थापना आचार्य रामकमल दास ने की थी।

वहीं, धार्मिक परंपरा में साधु-संत अपने आधिकारिक दस्तावेजों जैसे- आधार कार्ड या वोटर आईडी में जन्म देने वाले पिता की जगह अपने गुरु का नाम पिता के रूप में लिखवाते हैं। और वाराणसी के राम जानकी मठ में भी ऐसा ही हुआ। इसी वजह से मतदाता सूची में 48 लोगों के पिता के नाम की जगह गुरु का नाम ‘रामकमल दास’ लिखा हुआ है। इसलिए शिष्यों के पते के तौर पर B 24/19 का पता लिखा गया है।

मठ के वरिष्ठ शिष्य अभिराम दास ने भी बताया कि भारत सरकार ने 2016 में एक आदेश जारी कर यह साफ किया था कि साधु-संन्यासी अपने दस्तावेजों में अपने गुरु का नाम पिता के रूप में दर्ज करा सकते हैं।

कॉन्ग्रेस का दुष्प्रचार: परंपरा को बनाया चुनावी हथियार

यूपी कॉन्ग्रेस ने X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर लिखा, “वाराणसी में चुनाव आयोग का एक और चमत्कार देखिए! मतदाता सूची में एक ही व्यक्ति ‘राजकमल दास’ के नाम पर 50 बेटों का रिकॉर्ड दर्ज है।”

इसी मसले पर तथाकथित प्रोपेगेंडाई पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने भी अपने X अकाउंट से भ्रामक जानकारियाँ फैलाई और लिखा, “ये वाराणसी है… 50 बच्चों के पिता का नाम राजकमल दास.. सबसे छोटा बेटा राघ्वेन्द्र 28 साल का.. सबसे बड़ा बेटा बनवारी दास 72 साल का..”

2 साल पहले भी हुआ था विवाद

संत राजकमल दास को लेकर विपक्ष ने 2 साल पहले भी भ्रामक जानकारियाँ फैलाई थी। लेकिन चुनाव आयोग ने फैक्ट चेक तथ्यों के साथ विपक्ष को जवाब दिया था कि ये पिता-पुत्र नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य है। लेकिन कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम फिर पुराने विवाद को लेकर हंगामा करने पर उतर आया है और मोदी सरकार पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रहा है।

राहुल, प्रियंका, अखिलेश, डिंपल, अभिषेक, स्टालिन… सब ने की वोट चोरी? BJP ने INDI गठबंधन को मारा वही जूता, जो वह चुनाव आयोग को बदनाम करने के लिए चला रही थी

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर जोरदार पलटवार किया है। BJP ने दावा किया है कि जिन लोकसभा सीटों पर INDI गठबंधन के बड़े नेता जीते हैं, वहाँ वोटर लिस्ट में इतनी गड़बड़ियाँ मिली हैं कि सच्चाई सामने आ गई है। इनमें डुप्लिकेट वोटर, फर्जी पते, मिश्रित घरों के वोटर और एक साथ हजारों वोटर जोड़ने की बातें शामिल हैं।

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिल्ली के BJP मुख्यालय में बुधवार (13 अगस्त 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने राहुल गाँधी को ‘प्रोपेगेंडा किंग’ और ‘LoB- लीडर ऑपोजिंग भारत’ तक कह डाला।

वायनाड: प्रियंका- राहुल गाँधी की सीट

वायनाड से राहुल गाँधी सांसद थे, इस्तीफे के बाद प्रियंका गाँधी वाड्रा सांसद हैं। BJP का दावा है कि यहाँ 93,499 संदिग्ध वोटर हैं। इनमें 20,438 वोटर डुप्लिकेट निकले, यानी एक ही शख्स का नाम कई बार दर्ज हुआ। 17,450 वोटरों के पते फर्जी पाए गए, 4246 वोटर ऐसे हैं जिनके एक छोटे से पते पर अलग-अलग धर्मों के लोग लिखे गए (जैसे मिश्रित घर) और 51,365 वोटर एक साथ जोड़े गए, जो बहुत अजीब लगता है।

नीचे तस्वीर में में माईमूना नाम की शख्स का उदाहरण है, जो बूथ नंबर 135 में मौजूद है (EPIC: ZGR0553818), लेकिन बूथ नंबर 115 (EPIC: ZGR6629158) और 152 (EPIC: ZGR6716849) में भी दोहराई गई।

ये साफ दिखाता है कि एक ही वोटर को कई बार गलत तरीके से जोड़ा गया। सबसे हैरानी की बात ये है कि 99, 101 और 102 साल के बुजुर्ग वोटर पहली बार 2024 में लिस्ट में आए, जो वोटर रोल में छेड़छाड़ का सबूत माना जा रहा है। अनुराग ठाकुर ने कहा, “राहुल गाँधी जीत के लिए फर्जी वोटरों का सहारा ले रहे हैं, लेकिन अब सच सबके सामने है।”

रायबरेली – गाँधी परिवार का गढ़

रायबरेली को गाँधी का गढ़ माना जाता है। लेकिन यहाँ 2,00,089 संदिग्ध वोटर मिले हैं। इनमें 19,512 डुप्लिकेट वोटर, 71,977 फर्जी पते, 15,853 मिश्रित घर, और 92,747 वोटर एक साथ जोड़े गए।

नीचे दी गई तस्वीर में मोहम्मद कैफ खान का नाम तीन बूथों—83 (EPIC: YDG3034774), 151 (EPIC: YDG3160587) और 218 (EPIC: YDG3015831) में दर्ज है, जो साफ तौर पर गड़बड़ी दिखाता है। साथ ही 52,000 से ज्यादा फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मिले, जो सवाल उठाते हैं कि क्या रायबरेली की जीत सही वोटों से हुई या फर्जी वोटरों की मदद से।

अभिषेक बनर्जी की डायमंड हार्बर सीट पर भी गड़बड़ी

डायमंड हार्बर में TMC नेता अभिषेक बनर्जी की जीत हुई, लेकिन यहाँ 2,59,779 संदिग्ध वोटर पाए गए। इनमें 3,613 डुप्लिकेट, 1,55,365 फर्जी पते, 290 फर्जी रिश्तेदार (जैसे किसी का भाई-बहन फर्जी तरीके से जोड़ा गया), 43,947 मिश्रित घर, और 56,564 एक साथ जोड़े गए वोटर हैं।

नीचे की तस्वीर में जाकिर हुसैन मोल्ला और सुबिद अली मोल्ला के नाम कई बार दोहराए गए हैं, जैसे जाकिर का नाम बूथ 10 और 100 में (EPIC: ATR1141407 और ATR2963288) और सुबिद का नाम बूथ 120 और 214 में (EPIC: ATR2198513 और ATR2473577)। ये गड़बड़ियाँ उन बूथों पर ज्यादा हैं जहाँ TMC को भारी वोट मिले, जो साजिश की ओर इशारा करता है।

पश्चिम बंगाल को बनाया जा रहा पश्चिम बांग्लादेश

BJP ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में TMC और वामपंथियों ने राजनीतिक लाभ के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा दिया। बीजेपी ने अपने पोस्ट में लिखा है कि “लेफ्ट और TMC ने राजनीतिक फायदे के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा दिया, जिससे बंगाल, बंगालियों और बंगाली अस्मिता को नुकसान हुआ।” उनका कहना है कि इतना बुरा हाल हो गया है कि पश्चिम बंगाल अब पश्चिम बांग्लादेश बनने के कगार पर है।

अखिलेश यादव की कन्नौज सीट

कन्नौज से अखिलेश यादव सांसद हैं और यहाँ 2,91,798 संदिग्ध वोटर मिले, जो उनकी जीत के अंतर से दोगुने हैं।

इसमें 16,163 डुप्लिकेट, 1,53,919 फर्जी पते, 25,772 मिश्रित घर, और 74,531 एक साथ जोड़े गए वोटर हैं।

कन्नौज में अकील और राजू जैसे वोटरों के नाम दोहराए गए हैं – अकील का नाम बूथ PS 454 (EPIC: WTM0065920) और राजू का नाम बूथ PS 270 (EPIC: UP/64/298/0678072) में। कुछ वोटरों की उम्र 100 साल से ज्यादा बताई गई, जो संदेह को और गहरा करता है।

अनुराग ठाकुर ने कहा, “अखिलेश यादव की जीत फर्जी वोटरों पर टिकी है, ये लोकतंत्र के लिए खतरा है।”

एमके स्टालिन का कोलाथुर विधानसभा क्षेत्र

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के कोलाथुर क्षेत्र में 19,476 संदिग्ध वोटर मिले। इसमें 4,379 डुप्लिकेट, 9,133 फर्जी पते, और 5,964 मिश्रित घर शामिल हैं।

कई वोटर एक से ज्यादा बार अलग-अलग EPIC नंबर से दर्ज हैं, जो सिस्टम में गड़बड़ी का सबूत है।

अनुराग ठाकुर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “राहुल गाँधी सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद झूठ फैलाते हैं। उन्होंने 90 चुनाव हारे हैं, और अब भी EVM, चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बदनाम कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव से पहले विपक्षी दलों के साथ मिलकर कॉन्ग्रेस झूठ बोल रही है।

अनुराग ठाकुर ने राहुल, प्रियंका, अखिलेश, स्टालिन, अभिषेक बनर्जी और डिम्पल यादव से सवाल किया, “क्या आप अपने क्षेत्रों में ये गड़बड़ियाँ साबित होने पर इस्तीफा देंगे?” उन्होंने कहा कि असली वोट चोरी विपक्षी नेताओं के क्षेत्रों में हुई, जहाँ वोटर लिस्ट में जानबूझकर छेड़छाड़ की गई।

BJP ने राहुल गाँधी के “वोट चोरी” के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि वायनाड, रायबरेली, डायमंड हार्बर, कन्नौज और मैनपुरी जैसी सीटों पर गड़बड़ियाँ साफ हैं। BJP ने इन क्षेत्रों में डुप्लिकेट वोटर, फर्जी पते, और मास एडिशन का सबूत पेश किया। अनुराग ठाकुर ने कहा, “राहुल गाँधी प्रोपेगेंडा फैलाते हैं, लेकिन उनकी अपनी सीटों पर गड़बड़ियाँ ज्यादा हैं।” उन्होंने चुनाव आयोग के SIR प्रोसेस का विरोध करने का भी आरोप लगाया, जो फर्जी वोटरों को हटाने के लिए था।

ये सारा मामला सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी है। BJP का कहना है कि विपक्षी नेता अपने फायदे के लिए वोटर लिस्ट को गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। राहुल गाँधी के आरोपों के बाद BJP का ये जवाब सियासी गलियारों में हलचल मचा रहा है। अब देखना ये है कि विपक्षी नेता इस पर क्या जवाब देते हैं।

‘गरीबी हटाओ’ का लॉलीपॉप इंदिरा-राजीव सब ने दिया, पर गरीबी उन्मूलन योजनाओं ने जमीन पर मोदी राज में छोड़ी छाप: जानिए कैसे महिला-बच्चों पर फोकस से बदली तस्वीर

मोदी सरकार की गरीबी उन्मूलन योजनाओं का असर धरातल पर दिख रहा है। इन योजनाओं ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। पीएम आवास योजना से लेकर लखपति दीदी जैसी योजनाओं ने देश में खासकर महिलाओं और बच्चों की गरीबी दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। यह जानकारियाँ इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) की एक रिपोर्ट से सामने आई है।

शनिवार (9 अगस्त 2025) को प्रकाशित जाने-माने अर्थशास्त्री शमिक रवि और मुदित कपूर की रिसर्च से पता चला है कि भारत में 2011-12 से 2023-24 के बीच बच्चों और महिलाओं की गरीबी में काफी कमी आई है।

इस रिसर्च का शीर्षक है: ‘घर के अंदर संसाधनों का बँटवारा और 2011–12 से 2023–24 के बीच बाल और लैंगिक गरीबी में बदलाव’। इसमें बताया गया है कि ज्यादातर गरीबी के आँकलन पूरे घर की औसत खपत के आधार पर किए जाते हैं, जिसमें यह मान लिया जाता है कि घर के सभी सदस्यों के बीच संसाधन बराबर बाँटे जाते हैं। लेकिन यह अध्ययन इस मान्यता को चुनौती देता है।

शोधकर्ताओं ने घरेलू खर्च के उन हिस्सों को देखा जो सीधे किसी व्यक्ति पर होते हैं, जैसे कपड़े, दवा, शिक्षा आदि। ताकि यह समझा जा सके कि बच्चों (0–14 वर्ष), वयस्क महिलाओं और पुरुषों (15–79 वर्ष) को कितना संसाधन वास्तव में मिल रहा है।

इतिहास में हमेशा से यह देखा गया है कि घरेलू संसाधनों के वितरण में पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है और महिलाओं व बच्चों के साथ भेदभाव होता है। EPW में प्रकाशित इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अगर घर के भीतर संसाधन बराबर नहीं बाँटे जाते, तो एक ही घर में कुछ लोग गरीब हो सकते हैं और कुछ नहीं।

मोदी सरकार की ‘समावेशी और महिला-नेतृत्व विकास’ की नीति को ध्यान में रखते हुए, यह अध्ययन खासतौर पर यह समझने की कोशिश करता है कि घरों में महिलाओं और बच्चों को मिलने वाले संसाधनों में क्या बदलाव आए हैं और इसका गरीबी पर क्या असर पड़ा है।

शोध में भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा कराए गए Household Consumption Expenditure सर्वे (HCES) के 2011-12 और 2023-24 के आँकड़ों का इस्तेमाल किया गया।

रिसर्च में एक उन्नत अर्थमितीय (econometric) मॉडल का उपयोग किया गया, जो Dunbar et al. (2013) और Calvi (2020) जैसे पहले के कामों पर आधारित है। इसमें Engel curves और non-linear regression techniques जैसे सांख्यिकी उपकरणों की मदद से यह आँकलन किया गया कि घर के भीतर किसे कितने संसाधन मिल रहे हैं।

भारत में बच्चों और महिलाओं की गरीबी में बड़ी गिरावट

यह शोध महिलाओं की घरेलू संसाधनों में हिस्सेदारी और उनके सौदेबाजी की ताकत (bargaining power) पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि महिलाओं को मिलने वाले संसाधनों का हिस्सा किन बातों से प्रभावित होता है और समय के साथ इसमें क्या बदलाव आए हैं।

2011–12 में हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के घरों में महिलाओं की हिस्सेदारी कम थी, पर 2023–24 में इन घरों की महिलाओं को ज्यादा हिस्सा मिला, ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को शहरी महिलाओं की तुलना में कम संसाधन मिले, उत्तर, पूरब और दक्षिण भारत की महिलाओं को पश्चिम भारत की महिलाओं की तुलना में कम हिस्सा मिला, लेकिन उत्तर-पूर्व भारत की महिलाओं को ज्यादा हिस्सा मिला।

घर के अंदर संसाधनों के बँटवारे में बदलाव की अहम भूमिका

शोध में यह भी देखा गया कि महिलाओं की उम्र और घर में बच्चों की मौजूदगी से भी संसाधनों का बँटवारा प्रभावित होता है। 2011–12 में अधिकांश उम्र समूहों में महिलाओं को 50% से कम संसाधन मिले (बराबरी की रेखा से नीचे)। सिर्फ शहरी इलाकों में, जिन घरों में बच्चे थे और महिलाओं की औसत उम्र 45-55 साल थी, वहाँ थोड़ी बराबरी या अधिक हिस्सा मिला। वहीं बगैर बच्चों वाले शहरी घरों में 20-30 साल की उम्र की महिलाओं को थोड़ा बेहतर हिस्सा मिला।

कुल मिलाकर, 2011-12 में महिलाओं की बातचीत की ताकत कम थी और संसाधनों का बँटवारा उनके खिलाफ था। 2023–24 में बड़ा बदलाव देखा गया, खासकर उन घरों में जहाँ बच्चे हैं, वहाँ महिलाओं को बराबरी से ज्यादा हिस्सा मिला। ग्रामीण घरों में, 15 से 55 साल की महिलाओं को बराबरी से ज्यादा संसाधन मिले

शहरी घरों में यह फायदा 15 से 65 साल की महिलाओं तक फैला हुआ है। बच्चों की मौजूदगी ने महिलाओं के पक्ष में संसाधन वितरण को प्रभावित किया। यानी जहाँ बच्चे हैं, वहाँ महिलाओं को ज्यादा अहमियत दी गई।

स्पष्ट है कि 2011–12 में महिलाओं को घरेलू संसाधनों में कम हिस्सा मिलता था, लेकिन 2023–24 में तस्वीर बदली है। अब महिलाओं, खासकर जिन घरों में बच्चे हैं, को ज्यादा हिस्सा मिल रहा है।

यह बदलाव समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार और नीति-निर्माण में उनके हितों को प्राथमिकता देने का संकेत देता है। यह भी दर्शाता है कि महिलाएँ अब घरों में अधिक सशक्त भूमिका निभा रही हैं।

पिछले दस सालों में 27 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से निकले बाहर

यह रिपोर्ट भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गरीबी की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करती है। इसमें तीन मुख्य आँकड़ों को पेश किया गया है:

1. गरीबी दर (Poverty Rate) – यह बताती है कि कुल जनसंख्या में से कितने प्रतिशत लोग गरीब हैं।

2. गरीबी का अंतर (Poverty Gap) – यह मापता है कि गरीब व्यक्ति की औसत खर्च क्षमता गरीबी रेखा से कितनी कम है, यानी गरीबी की तीव्रता।

3. गरीबी से उबरने वाले लोग (Poverty Upliftment) – यह उन लोगों की संख्या बताता है जिन्हें 2011–12 से 2023–24 के बीच गरीबी से बाहर निकाला गया।

रिपोर्ट के अनुसार, यह विश्लेषण रंगराजन गरीबी रेखा (Rangarajan Poverty Line) के आधार पर किया गया है और इसमें यह माना गया है कि हर घर के संसाधन घर के सभी सदस्यों में बराबर बँटे हैं। यह आँकड़े ग्रामीण और शहरी इलाकों के लिए हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में 2023–24 के लिए तैयार किए गए हैं।

मुख्य निष्कर्ष यह है कि पिछले दस सालों में 27 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले हैं।

इनमें से 15.6 करोड़ बच्चे और 12.3 करोड़ वयस्क महिलाएँ शामिल हैं। हालाँकि वयस्क पुरुषों की गरीब आबादी में करीब 36 लाख की बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि जनसंख्या के मुकाबले गरीबी में कमी की रफ्तार थोड़ी धीमी रही। यह रिपोर्ट गरीबी की स्थिति को समझने और नीति निर्माण के लिए अहम आँकड़े पेश करती है।

2011–12 में पूरे देश में गरीबी थी 29.5%, 2023–24 में घटकर रह गई सिर्फ 4%

EPW की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 2011–12 से 2023–24 के बीच गरीबी दर में बड़ी गिरावट आई है। अगर यह मान लें कि घर के संसाधन सभी सदस्यों में बराबर बाँटे जाते हैं, तो पूरे देश में गरीबी 2011–12 में 29.5% थी, जो 2023–24 में घटकर सिर्फ 4% रह गई।

राज्यों की बात करें तो, बिहार में गरीबी 41.3% से गिरकर 4.4% हो गई। वहीं, पश्चिम बंगाल में 2011–12 में गरीबी 30.4% थी, जो 2023–24 में घटकर 6% हो गई। यानी बंगाल की गरीबी पहले कम थी, लेकिन अब बिहार से थोड़ी ज्यादा रह गई।

उत्तर प्रदेश में भी बड़ी गिरावट आई, जहाँ गरीबी 40% से घटकर 3.5% हो गई। लेकिन जब शोधकर्ताओं ने माना कि घर के संसाधन बराबर नहीं, बल्कि असमान रूप से बाँटे जाते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही निकली। ऐसे में 2011–12 में पूरे भारत में गरीबी 34.7% थी, जो 2023–24 में घटकर 10.5% हुई। यानी गिरावट तो आई, लेकिन गरीबी के असली स्तर ज्यादा थे।

इस असमान वितरण के आधार पर देखा गया कि 2011–12 में बच्चों में गरीबी सबसे ज्यादा थी। 58.3%, महिलाओं में 33.3%, और पुरुषों में सबसे कम सिर्फ 15.1%। यह ट्रेंड लगभग सभी राज्यों में दिखा, सिवाय उत्तर-पूर्व भारत के, जहाँ पुरुषों में गरीबी महिलाओं और बच्चों से ज्यादा थी।

2023–24 तक हालात बेहतर हुए। इसके बाद बच्चों में गरीबी घटकर 17.8%, महिलाओं में सिर्फ 2.2%, और पुरुषों में हल्की गिरावट के साथ 13.5% रही। रिपोर्ट बताती है कि घरों में महिलाओं की बार्गेनिंग पावर यानी निर्णय लेने की ताकत बढ़ी। इससे संसाधनों का बँटवारा थोड़ा बराबरी वाला हुआ और महिलाओं–बच्चों को ज्यादा लाभ मिला।

गरीबी उन्मूलन पर अध्ययन: 2011–12 से 2023–24 के बीच महिलाओं और बच्चों की बढ़ी भूमिका

एक हालिया अध्ययन में बताया गया है कि 2011–12 से 2023–24 के बीच भारत में लगभग 27.58 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले। उस वक्त घरों में संसाधनों का असमान बँटवारा माना गया। वहीं अगर संसाधन सभी घर के सदस्यों में समान रूप से बाँटे जाते, तो यह संख्या 30.24 करोड़ तक पहुँच सकती थी।

अध्ययन में मोदी सरकार की कई योजनाओं को महिलाओं के सशक्तिकरण और गरीबी उन्मूलन का श्रेय दिया गया है। जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा योजना (जिसमें 70% लाभार्थी महिलाएँ थीं), लखपति दीदी योजना।

इन योजनाओं ने महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और संपत्ति में हिस्सेदारी को बढ़ावा दिया। 2011–12 में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को घर में कम संसाधन मिलते थे। लेकिन 2023–24 तक यह स्थिति उलट गई। अब महिलाओं को औसतन पुरुषों से अधिक संसाधन मिलते हैं।

इस बदलाव ने गरीबी कम करने में बड़ा योगदान दिया, खासकर महिलाओं और बच्चों के बीच। 2023–24 में, देश के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में महिलाओं की औसतन गरीबी दर पुरुषों से कम हो गई है, जबकि 2011–12 में यह उल्टा था।

यह बदलाव महिलाओं के सशक्तिकरण और नीतियों के सही दिशा में जाने का संकेत है।

वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने का फैसला सिर्फ चुनाव आयोग का, आधार को नहीं माना नागरिकता का प्रमाण: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR पर EC के रुख का किया समर्थन

बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट का कहना है कि मतदाता सूची से लोगों को शामिल करना या बाहर करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।

रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (12 अगस्त 2025) को चुनाव आयोग के SIR के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा,  ‘‘नागरिकता देने या छीनने का कानून संसद द्वारा पारित किया जाता है, लेकिन नागरिकों और गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना और बाहर करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में है।’’ 

साथ ही जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के इस कथन को भी सही ठहराया कि आधार कार्ड नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग का यह कहना सही है कि आधार को नागरिकता के निर्णायक सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है, इसे सत्यापित करना होगा। आधार अधिनियम की धारा-9 में स्पष्ट रूप से ऐसा कहा गया है।’’

जानकारी के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि इसके साथ अन्य दस्तावेज भी होने चाहिए। मामले में चुनाव आयोग ने बताया कि SIR के दौरान बिहार के लोगों से जरुरी दस्तावेजों की माँग की गई, लेकिन उनके पास दस्तावेज नहीं थे। इस पर जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा, ‘वे नागरिक हैं या नहीं, इसे देखने के लिए कुछ तो पेश करना पड़ेगा। फैमिली रजिस्टर, पेंशन कार्ड आदि हैं, यह कहना बहुत सामान्य सी बात है कि लोगों के पास ये दस्तावेज नहीं हैं।’

वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि दस्तावेज देना जरूरी है अन्यथा सूची से नाम हटा जाएगा। इस पर चुनाव आयोग की ओर से एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि कुल 7.9 करोड़ मतदाताओं में लगभग 6.5 करोड़ लोगों को कोई दस्तावेज देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे लोग या उनके माता-पिता 2003 की मतदाता सूची में शामिल थे। याचिकाएँ दायर करने वालों में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के नेता भी शामिल हैं।

राहुल गाँधी-तेजस्वी यादव SIR पर मचा रहे हंगामा, प्रक्रिया में शामिल बिहार के कॉन्ग्रेस नेता खुद को बता रहे चुनाव आयोग से संतुष्ट: अब तक नहीं दर्ज कराई गई है एक भी आपत्ति

INDI गठबंधन ने सोमवार (11 अगस्त 2025) को दिल्ली स्थित चुनाव आयोग (ECI) के मुख्यालय तक मार्च निकाला। यह मार्च बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के विरोध में किया गया था। गठबंधन ने आरोप लगाया कि इस अभियान के जरिए वोटर लिस्ट में हेराफेरी की जा रही है और ‘वोट चोरी’ हो रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया से कई लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। उनका आरोप था कि यह सब भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए किया जा रहा है।

बिहार में महागठबंधन इस अभियान को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है। यह फर्जी वोटरों को हटाने और वोटर लिस्ट को अपडेट करने के लिए चलाया जा रहा है। तेजस्वी यादव जैसे वरिष्ठ नेता चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगा चुके हैं और उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वे चुनाव बहिष्कार पर भी विचार कर सकते हैं।

चुनाव आयोग ने इस पूरी प्रक्रिया में सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे। दिलचस्प बात यह रही कि जिन नेताओं ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाए, उन्हीं के पार्टी कार्यकर्ता और बूथ लेवल एजेंट्स (BLAs) ने बताया कि प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हो रही है। इससे उनके नेताओं के दावे गलत साबित हुए।

BLA ने क्या कहा?

नवादा जिले में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रतिनिधि ने बताया कि पूरी मतदाता सूची समय पर जाँच कर उन्हें सौंप दी गई है। साथ ही जिन मतदाताओं के नाम किसी कारणवश सूची से हटाए गए हैं, जैसे कि स्थानांतरण, नाम दोहराव आदि, उनकी जानकारी भी दी गई है। ये नाम अब पंचायत और बूथ प्रमुखों को भेजे जाएँगे।

उन्होंने बताया कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और बूथ लेवल असिस्टेंट (BLA) अब आगे की प्रक्रिया तय करेंगे। यदि सूची में कोई गलती मिलती है, तो उसे 1 अगस्त से 1 सितंबर तक चलने वाली आपत्ति अवधि के दौरान सुधारा जाएगा। RJD प्रतिनिधि ने कहा, “हम संतुष्ट हैं। हमारे क्षेत्र में कोई समस्या नहीं है और किसी भी राजनीतिक पार्टी ने प्रशासन को परेशान नहीं किया है।” उन्होंने प्रशासन का धन्यवाद भी किया।

गोपालगंज जिले के कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा ने कहा कि प्रशासन द्वारा तैयार की गई मतदाता सूची की एक प्रति सभी राजनीतिक दलों को दी गई है, जिसमें हटाए गए नामों की भी जानकारी है। उन्होंने कहा, “हमें एक महीना दिया गया है ताकि अगर कोई नाम गलती से हट गया हो, तो हम उसमें आपत्ति दर्ज कर सुधार करवा सकें।”

पूर्णिया जिले के कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष अखिलेश कुमार ने बताया कि जिला प्रशासन के साथ बैठक हुई और मतदाता सूचियाँ राजनीतिक दलों को सौंप दी गई हैं। उन्होंने कहा, “हमें निर्देश दिए गए हैं कि जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, उन्हें शामिल कराने में मदद करें और यह भी जाँच करें कि जो लोग स्थानांतरित हो गए हैं या जिनका निधन हो चुका है, उनकी जानकारी सही है या नहीं।”

उन्होंने कहा, “हम अपने BLAs के माध्यम से BLOs की पूरी सहायता करेंगे। सभी पार्टियों को संशोधित सूची दे दी गई है। जिला प्रशासन का कार्य बहुत अच्छा रहा है और हम उनका पूरा सहयोग करेंगे।”

इसके अलावा, कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें विपक्षी दलों के BLAs ने प्रशासन की पारदर्शी प्रक्रिया की तारीफ की है और भरोसा जताया है कि सभी संबंधित पक्षों को इसमें शामिल किया गया।

चुनाव आयोग ने विपक्ष के दुष्प्रचार का किया खंडन

बिहार में चलाए गए SIR अभियान को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने तथ्यों, आँकड़ों और BLA की गवाही के साथ गलत साबित कर दिया है। निर्वाचन आयोग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि यह पूरी प्रक्रिया सभी राजनीतिक दलों की पूर्ण भागीदारी से पारदर्शिता के साथ की गई थी और अगर कहीं कोई गलती थी, तो उसे ठीक भी किया गया।

इसके बावजूद जब विपक्ष ने इस अभियान को लेकर गलत जानकारी फैलानी शुरू की, तब आयोग को दोबारा वही बात समझानी पड़ी। राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर विपक्षी सांसदों के विरोध की तस्वीरें साझा करते हुए ‘वोटर चोरी’ का आरोप लगाया। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कई लिंक साझा किए, जिनमें यह दिखाया गया कि पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी।

आयोग ने बताया कि मतदाता सूची के ड्राफ्ट प्रकाशित होने से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भी BLA के साथ बैठकें हुईं, और सभी दलों को शामिल कर पूरी पारदर्शिता बरती गई। ECI ने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने ड्राफ्ट रोल को लेकर कोई आपत्ति या शिकायत दर्ज नहीं करवाई है।

इससे यह साफ होता है कि यह विरोध सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, न कि किसी असली मुद्दे पर। महागठबंधन और RJD ने ECI पर दलितों, अल्पसंख्यकों, गरीबों और हाशिए पर गए वर्गों के वोटिंग अधिकारों को SIR के नाम पर खत्म करने का आरोप लगाया।

इसके जवाब में आयोग ने फिर दोहराया कि SIR अभियान में हर राजनीतिक दल के BLA को शामिल किया गया, उन्हें उनके क्षेत्रों की वोटर लिस्ट और संशोधित सूचियाँ दी गईं और हर स्तर पर उनकी शिकायतें सुनी गईं। यह भी बताया गया कि कई विपक्षी पार्टियों के BLA ने खुद सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी थी और उनकी पूरी भागीदारी रही।

इस प्रकार आयोग ने यह साफ कर दिया कि विपक्ष के आरोप बेबुनियाद, भ्रामक और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं, जबकि पूरी प्रक्रिया को नियमों और पारदर्शिता के तहत अंजाम दिया गया।

बिहार में SIR अभियान

चुनाव आयोग के SIR अभियान के तहत बिहार में बड़ी संख्या में फर्जी वोटरों का पता चला है। जाँच में लगभग 65 लाख ऐसे वोटर मिले जो असल में मौजूद ही नहीं थे। इनमें ज्यादातर लोग या तो मर चुके थे या फिर अपने पते पर नहीं मिले। इसके बाद इन नामों को मतदाता सूची से हटा दिया गया।

हालाँकि कुछ जिलों में नामों की भारी संख्या में कटौती चौंकाने वाली रही, खासतौर पर किशनगंज जिले में, जो मुस्लिम बहुल इलाका है। वहाँ से 1.45 लाख वोटर हटाए गए। यह जिले के कुल वोटरों का लगभग 11.8% है। एक चुनाव में जहाँ 4-5% का अंतर भी नतीजा बदल सकता है, वहाँ इतने वोटरों का हटना बेहद अहम माना जा रहा है।

राज्य में विपक्षी पार्टियाँ इस मुहिम के खिलाफ एकजुट हो रही हैं क्योंकि इन हटाए गए फर्जी वोटरों में से कई उनके समर्थक माने जा रहे थे। जाँच के दौरान कई विदेशी नागरिक, खासकर बांग्लादेशी, भी पकड़े गए जिनके पास आधार कार्ड जैसे भारतीय दस्तावेज पाए गए।

अब ऐसी ही जाँच पश्चिम बंगाल में भी शुरू होने जा रही है। इससे तृणमूल कॉन्ग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार में हड़कंप मच गया है। ममता पहले भी बांग्लादेशी घुसपैठियों के समर्थन में बयान दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें डर है कि यह अभियान उनके वोटबैंक को प्रभावित कर सकता है।

चुनाव आयोग का कहना है कि यह कार्रवाई लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए है, ताकि केवल वैध और जीवित वोटरों को ही मतदान का अधिकार मिले।

दिलचस्प बात यह है कि जिन शोधकर्ताओं ने पहले बिहार में 70 लाख फर्जी वोटरों की चेतावनी दी थी, वो अब सही साबित हुई। उन्होंने अब दावा किया है कि पश्चिम बंगाल में 2024 के लिए मतदाता सूची में करीब 1 करोड़ अतिरिक्त वोटर हो सकते हैं। अब आगे यह जाँच का विषय बनेगा।

(मूल रुप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जो रामजी 17 साल से ‘लापता’, जिनकी पत्नी आज भी जी रही सुहागन की जिंदगी, उन्हें टॉर्चर कर मार डाला था: मालेगांव ब्लास्ट की जाँच से जुड़े रहे अधिकारी का दावा

“ATS ने RSS से जुड़े तीन लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया था। उन्हें टॉर्चर करके मार दिया और रिकॉर्ड में फरार बता दिया।”

यह दावा 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच में शामिल रहे महबूब मुजावर ने दैनिक भास्कर से बातचीत में किया है। इसी ब्लास्ट का फैसला सुनाते हुए NIA की कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय समेत 7 लोगों को बरी कर दिया।

मुजावर जिन तीन लोगों की हत्या की बात कर रहे हैं उनका नाम संदीप डांगे, रामजी कलसंगार और दिलीप पाटीदार है। इनमें से एक रामजी कलसंगार NIA कोर्ट के फैसले के बाद सुर्खियों में आए थे। वे 17 साल से लापता हैं और उनकी पत्नी आज भी सुहागिन की तरह जीवन जी रही हैं।

मुजावर ने दैनिक भास्कर को बताया है कि इन तीनों लोगों की हत्या के बाद भी ऐसा दिखाया गया कि ये सभी जीवित हैं। इसे साबित करने के लिए इनके घरों में जाँच के लिए अधिकारी भी भेजे जाते थे। इससे लोगों को लगता था कि इनकी जानकारी पुलिस के पास नहीं है और ये फरार हैं। मुजावर ने कहा है:

“संदीप, रामजी और दिलीप को जिंदा बताने की कोशिश सब परमबीर के कहने पर हो रही थी। तीनों की मौत को राज रखने के लिए सिचुएशन क्रिएट की गई”

मालेगाँव ब्लास्ट में मोहन भागवत को फँसाने के अपने दावे को ATS में रहे महबूब मुजावर ने फिर से दोहराया है। कहा है कि उन्हें जो दो टास्क दिए गए थे, उनमें से एक मोहन भागवत को उठाने का आदेश था। मुजावर के अनुसार, इन आदेशों का मकसद ‘भगवा आतंकवाद’ की झूठी कहानी गढ़ना था।

हालाँकि, मुजावर ने यह आदेश मानने से इनकार कर दिया था। उनका कहना है कि मोहन भागवत जैसी बड़ी शख्सियत को बिना किसी ठोस वजह के पकड़ना उनके बस की बात नहीं थी। इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा और IPS अधिकारी परमबीर सिंह ने झूठे केस में फँसा दिया, जिससे उनकी 40 साल की पुलिस सेवा खत्म हो गई।

मुजावर ने बताया कि पूरी जाँच एक ‘फर्जी अफसर’ ने की थी, जो कि झूठ पर आधारित थी। उन्होंने हालिया NIA कोर्ट के फैसले पर कहा कि इससे साबित हो गया है कि ‘भगवा आतंकवाद’ नहीं था, यह सब कुछ फर्जी था।

जिस 600 किलो RDX को जमा करने के आरोपों में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित को पकड़ा गया था, उस पर मुजवार कहते हैं, “अफसरों ने 600 किलो RDX की कहानी गढ़ी और साध्वी प्रज्ञा-कर्नल पुरोहित को इससे जोड़ने की कोशिश की।”

महबूब मुजावर ने 2016 में सोलापुर कोर्ट में अपने ऊपर चल रहे केस में जमा किए गए एफिडेविट में भी इसका जिक्र किया था।

मस्जिद से ऐलान कर जुटाई गई भीड़, हरियाणा-राजस्थान की सीमा पर पथराव-आगजनी: रिपोर्ट, पीड़ित बोले- नूहं में हिंदुओं पर हमले के बाद से बने हुए हैं हमारे दुश्मन

राजस्थान-हरियाणा की सीमा पर हुई हिंसा के लिए मस्जिद से ऐलान कर भीड़ जुटाई गई थी। इस भीड़ ने आगजनी और पथराव किया। कच्चे मकानों पर काँच की बोतलें फेंकी गई। सड़क पर खड़ी एक बाइक और कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, घटना में 10 लोग घायल हैं। दोनों प्रदेशों से लगी इस सीमा पर मंगलवार (12 अगस्त 2025) को हिंसा की गई। जब हिंदू युवक समय सैनी ने दो मुस्लिम युवक नस्सी और लुकमान को रास्ते से हटने को कहा। इससे गुस्साए नस्सी ने सैनी के सिर पर काँच की बोतल दे मारी। वे यहीं नहीं रुके, दोनों ने भीड़ जुटाकर दंगे करवाए।

इस मुस्लिम भीड़ ने डेढ़ घंटे तक छतों से पथराव किया और सड़कों पर घूमकर उत्पात मचाया। हालात काबू करने के लिए पुलिस की 2 कंपनियाँ तैनात की गई। इसके बाद भी दंगाइयों ने सड़क को जाम करके रखा। तब राजस्थान बॉर्डर की पुलिस टीम को भी बुलाया गया। इस हिंसा से आसपास के कई गाँवों में दहशत फैल गई।

वहीं, पीड़ित ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत के मुताबिक मुंडाका गाँव के समय सिंह सैनी राजस्थान बॉर्डर पर टेंट की दुकान चलाते हैं। मंगलवार (12 अगस्त 2025) की शाम करीब 4.30 बजे वे अपने दादा की रस्म पगड़ी कार्यक्रम के लिए टेंट का सामान लेकर बाइक से जा रहे थे। तभी गाँव की सड़क पर एक कार रास्ता रोककर खड़ी थी।

समय सैनी ने बताया कि कार में नस्सी और लुकमान शराब पी रहे थे। सैनी ने दोनों को रास्ते से ट्रक हटाने के लिए कहा तो नस्सी भड़क गया और बोला कि सड़क तुम्हारे बाप की नहीं है। इसके बाद सैनी के सिर पर शराब की बोतल से हमला कर दिया, जिससे वह खून में लथपथ हो गया। सैनी ने मदद के लिए अपने भाई चुन्नी, गोपाल और बीर सिंह को बुलाया।

उधर, नस्सी ने राजस्थान के अलवर जिले के हाजीपुर गाँव से रमजान, मुहरखों, रुस्तम, शमशेर, हारून, सुब्बन, इस्माइल, अरशद, कालू, जुबेर, यूनुस, इस्लाम, जुहरूदीन, उम्मर, सकरुल्ला, साहुन, करीम, सफी, सुब्बा, याकूब और जुनैद को बुला लिया। सभी लाठी-डंडों से लैस होकर आए। इसके बाद मामूली कहासुनी ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया।

मुस्लिम भीड़ ने पूरे गाँव में आगजनी की। मकानों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया। लाठी-डंडों से पीड़ित सैनी और उसके भाई को बुरी तरह पीटा गया। मौके पर पहुँची पुलिस भी दंगाइयों को काबू में नहीं कर पाई। वहीं, पीड़ित सैनी ने बताया कि दंगाइयों ने साल 2023 में नूहं में हुए दंगों की दुश्मनी निकालते हुए हमला किया है।

उल्लेखनीय है कि साल 2023 में 31 जुलाई 2023 को हरियाणा के नूहं में मुस्लिम भीड़ द्वारा विश्व हिंदू परिषद के जुलूस को रोकने की कोशिश की गई थी। उन्होंने हिंदुओं पर हमला कर दिया था। इस दौरान मंदिर को घेर कर किए गए हमले में 5 लोगों और दो होमगार्डों की मौत हो गई थी और कई पुलिसकर्मियों सहित कम से कम 15 अन्य घायल हो गए थे।

पुलिस के सामने भी पथराव करती रही मुस्लिम भीड़

मंडाका गाँव में हुए दंगों को शांत करवाने के लिए आसपास की 5 थाने की पुलिस पहुँची। इसके बाद भी मुस्लिम भीड़ शांत नहीं हुई। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिसमें पुलिस दंगाइयों के सामने बेबस खड़ी है। एक वीडियो में दंगाई पुलिसकर्मी के सामने पथराव करते नजर आए। वहीं, एक वीडियो में पुलिस को तेवर दिखाते हुए झड़प भी की।

घटना में नूहं SP राजेश कुमार ने बताया कि हिंसा में चुन्नीलाल, गोपाल, लेखराज, वीर सिंह, फूलचंद, हंसराज गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका फिरोजपुर झिरका के स्थानीय अस्पताल में इलाज चल रहा है। वहीं, मुस्लिम भीड़ में शामिल खुर्शीद, फरहान और शाहबाज को भी हल्की चोटें आई हैं।

SP ने कहा कि कुछ शरारती तत्वों ने शांति व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की, लेकिन समय रहते स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया। कुछ शरारती तत्वों ने एक बाइक में आग लगा दी। 2 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। घटनास्थल पर 2 DSP, 2 पुलिस कंपनियाँ और भारी पुलिस बल तैनात है।