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आतंकवादियों के अवैध डिजिटल ट्रांजेक्शन से मुश्किल में पाकिस्तान, फिर FATF की ग्रे लिस्ट में शामिल होने की आशंका: वित्त मंत्री औरंगजेब को सताया डर

पाकिस्तान एक बार फिर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में लौट सकता है। इसकी आशंका खुद पाकिस्तान ने जताई है। पाकिस्तानी वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने मुल्क पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी का डर जाहिर किया है।

वित्त मंत्री ने कहा कि अगर पाकिस्तान अवैध डिजिटल ट्रांजेक्शन की सही ढंग से व्यवस्थित नहीं करता है तो मुल्क पर FATF की ग्रे सूची में जाने का खतरा बढ़ सकता है। फिलहाल पाकिस्तान में 15 प्रतिशत तक आबादी अवैध डिजिटल ट्रांजेक्शन कर रही है।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान 4 साल में FATF की ग्रे लिस्ट से साल 2022 में बाहर हुआ है। इससे पता लगता है कि पाकिस्तान की वित्तीय स्थिति कितनी कमजोर है और वो अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करने में बार-बार फेल हो जाता है।

वित्त मंत्री ने यह भी कबूल किया कि पाकिस्तान को फिर से अंतर्राष्ट्रीय निगरानी में लाने का खतरा है। इसका मुख्य कारण जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ पाकिस्तान के संबंध हैं।

आतंकियों को डिजिटल वॉलेट से फंडिंग कर रहा पाकिस्तान

पाकिस्तानी वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने FATF के ग्रे लिस्ट में जाने के खतरे को देश की इकोनॉमी से जोड़ने की कोशिश की है लेकिन हकीकत पाकिस्तान द्वारा लगातार की जा रही आतंकियों को फंडिंग है। पाकिस्तान पर कई बार आतंकवादियों को फंडिंग के आरोप लगे हैं, जिससे मुल्क अंतरराष्ट्रीय निगरानी में भी फँस चुका है।

अब इसी FATF की अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचने के लिए पाकिस्तान ने आतंकियों को फंडिंग का नया तरीका अपनाया। अब फंडिंग डिजिटल वॉलेट से शुरू की गई है। अब बैंक खातों से पैसा ट्रांसफर करने से बचा जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की निगरानी से बचा जा सके।

कुछ समय पहले खबर आई थी कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में जैश-ए-मोहम्मद के जिस ठिकाने को तबाह किया था, अब उसे दोबारा खड़ा करने की तैयारी चल रही है।इसके लिए आतंकवादी EasyPaisa और SadaPay जैसे पाकिस्तानी डिजिटल वॉलेट्स में 390 करोड़ रुपए जुटाए जा रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 5 ऐसे वॉलेट मिले थे, जिनका जैश से सीधा संबंध है। एक SadaPay खाता मसूद अजहर के भाई तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर था।

भारत लंबे समय से कर रहा माँग

भारत लगातार पाकिस्तान को FATF की ग्रे लिस्ट में वापस डालने की माँग कर रहा है। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद से यह माँग तेज हो गई। भारत ने पाकिस्तान की पोल खोलते हुए बताया था कि उसने वर्ल्ड बैंक और IMF से लिए गए लोन को आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल किया है।

जून 2025 में FATF प्लेनरी से पहले भारत ने एक डोसियर भी तैयार किया और दुनियाभर के FATF सदस्यों से पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में शामिल करने के लिए समर्थन जुटाया। लेकिन पाकिस्तान के करीबी दोस्त चीन समेत तुर्की और जापान ने इसका समर्थन नहीं किया था।

लोकसभा में 31% तो राज्यसभा में 39% ही हो सका काम, विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ा संसद का मॉनसून सत्र: टैक्सपेयर्स के ₹200 करोड़ से अधिक हो गए बर्बाद

संसद का मॉनसून सत्र 21 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था और 21 अगस्त को समाप्त हो गया। सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सांसदों से देशहित में एकजुट होकर सार्थक चर्चा की अपील की थी। उन्हें उम्मीद थी कि यह सत्र देश को प्रगति देने वाले फैसलों से भरा होगा लेकिन यह पूरा सत्र विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया।

हालाँकि प्रधानमंत्री की अपील भी बेअसर ही रही। जिन जिम्मे इस देश को विकास के पथ पर ले जाने के लिए कानूनों का निर्माण करना है, वो सांसद SIR जैसे मुद्दों के नाम पर संसद में भी हंगामा कर अपना वोट बैंक साधने में लगे हैं। इस मॉनसून सत्र में राज्यसभा केवल 39% और लोकसभा केवल 31% काम कर पाई। इस पूरे सत्र में 200 करोड़ रुपए से अधिक बर्बाद हो गए। जाहिर है ये पैसे हमारे, आपके टैक्स के ही पैसे हैं।

संसद में कामकाज का हाल

जानकारी के मुताबिक, राज्यसभा में 41 घंटे 15 मिनट की कार्यवाही हुई यानी निर्धारित समय के मुकाबले सिर्फ 38.88% काम हो सका। वहीं, लोकसभा में 120 घंटे निर्धारित थे लेकिन काम सिर्फ 37 घंटे ही हो पाया।

इसके अलावा राज्यसभा में 285 प्रश्नों में से सिर्फ 14 लिए गए, जीरो ऑवर सबमिशन (शून्यकाल) के 7 नोटिस और 61 विशेष उल्लेख ही हो सके। वहीं, लोकसभा में 419 तारांकित प्रश्नों में सिर्फ 55 के उत्तर दिए जा सके।

विधेयकों का हाल

इस सत्र में राज्यसभा में 15 और लोकसभा में 12 विधेयक पारित हुए, जिनमें से हंगामे के चलते अधिकतर बिना चर्चा या बहुत ही सीमित चर्चा के पारित किए गए। इनमें आयकर विधेयक 2025, कराधान कानून (संशोधन) विधेयक, राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक, राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग संशोधन विधेयक, ऑनलाइन गेमिंग विनियमन विधेयक, समुद्र द्वारा वस्तुओं की ढुलाई विधेयक, तटीय जहाजरानी विधेयक, भारतीय बंदरगाह विधेयक, खनिज एवं खनन (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक शामिल है। इसके अलावा संविधान का 130वाँ संशोधन विधेयक फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया।

सबसे अहम चर्चा: ऑपरेशन सिंदूर

पूरे सत्र में एकमात्र गंभीर चर्चा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर हुई। इसमें लोकसभा में खुद प्रधानमंत्री मोदी और राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने जवाब दिया। यह भारत की सैन्य सफलता और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था, जिस पर सदन में विस्तार से चर्चा हुई। हालाँकि, इस पर चर्चा के दौरान भी विपक्षी सांसद हंगामा करते रहे।

विवाद और हंगामा

इस पूरे सत्र में विपक्ष के हंगामे का सबसे बड़ा कारण था- बिहार में SIR प्रक्रिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि इसके जरिए राज्य के लोगों के वोट काटे जा रहे हैं। चूँकि बिहार में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं, विपक्ष इस मुद्दे को लेकर लगातार हंगामा करता रहा। सदन में नारेबाजी, तख्तियाँ लहराना, बिल फाड़ना जैसे दृश्य भी देखने को मिले।

लगातार 20 दिनों तक इंडिया ब्लॉक से जुड़े विपक्षी दलों ने SIR के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा के अंदर और बाहर जमकर हंगामा किया। यही वजह है कि दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित होती रही।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने सांसदों के व्यवहार पर लगातार नाराजगी जताई। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन संसद को बाधित करना अलोकतांत्रिक है। एक और हैरानी की बात ये भी है कि कैप्टन शुभांशु शुक्ला तक पर भी चर्चा तक नहीं हो सकी।

कितना हुआ आर्थिक नुकसान?

रिपोर्ट्स के अनुसार, लोकसभा में 83 घंटे काम नहीं हुआ, इससे कुल 124 करोड़़ 50 लाख रुपए बर्बाद हुए। वहीं, राज्यसभा में 73 घंटे की बर्बादी से 80 करोड़़ रुपयों की बर्बादी हुई। यानी दोनों सदनों को मिलाकर 204 करोड़ 50 लाख रुपए पूरी तरह से बर्बाद हो गए। आँकडों की बात करें तो संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर करीब 2.50 लाख रुपए खर्च होते हैं, मतलब 1 दिन की संसद की कार्यवाही पर करीब 9 करोड़ का खर्च होता है। बर्बाद हुआ यह पैसा किसी पार्टी का नहीं बल्कि देश की आम जनता की मेहनत की कमाई थी।

राज्य सभा के डिप्टी चेयरमैन हरिवंश ने कहा, “कोशिशों के बावजूद ये सत्र व्यवधानों के की वजह से प्रभावित हुआ, इससे बार-बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इससे न केवल संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ, बल्कि सार्वजनिक महत्व के कई मामलों पर चर्चा और विचार-विमर्श संभव नहीं हो सका।”

लोक सभा स्पीकर ओम बिरला ने अपने समापन भाषण में कहा, “जनप्रतिनिधि के रूप में हमारे आचरण और कार्यप्रणाली को पूरा देश देखता है। जनता बहुत उम्मीदों के साथ चुनकर सदन में भेजती है। सहमति और असहमति होना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु हमारा सामूहिक प्रयास होना चाहिए कि सदन गरिमा, मर्यादा और शालीनता के साथ चले।”

उन्होंने कहा, “सदन में नियोजित गतिरोध कभी हमारी परंपरा नहीं रही है। हमें विचार करना होगा कि हम देश के नागरिकों को देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था के माध्यम से क्या संदेश दे रहे हैं। मुझे विश्वास है कि इस विषय पर सभी राजनीतिक दल और माननीय सदस्य गंभीर विचार और आत्म-मंथन करेंगे।”

विचार-विमर्श और गंभीर मुद्दों पर चर्चा तो दूर की बात है, अंतिम दिन लोकसभा स्पीकर की चाय पार्टी में भी विपक्ष के नेता नहीं पहुँचे। जिन्होंने सामान्य शिष्टाचार तक नहीं निभाया वो देश की जनता से कोई रिश्ता क्या ही निभा सकते थे।

‘मैं किरदार हूँ…खिलाड़ी कोई और’: शव दफनाने का दावा करने वाले चिन्नैया ने खुद को बताया मोहरा, पैसे के लालच में फैलाता रहा धर्मस्थल के खिलाफ झूठ; पहली पत्नी बोली- अत्याचारी था

कर्नाटक के धर्मस्थल में कथित रूप से सैकड़ों शवों को दफनाने का दावा करने वाले गुमनाम मास्कमैन का चेहरा अब सामने आ चुका है। यह व्यक्ति मंड्या निवासी चिन्नैया निकला जिसे स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने गिरफ्तार कर बेल्थंगडी कोर्ट में पेश किया। SIT की पूछताछ में चिन्नैया ने खुद स्वीकार किया कि उसने झूठ बोला था और असल में वह मोहरा मात्र था और साजिश रचने वाले असली लोग अब भी परदे के पीछे हैं।

SIT की जाँच में खुलासा

चिन्नैया ने पूछताछ में बताया कि उसे पिछले साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में तमिलनाडु में कुछ लोगों से मिलवाया गया था। वहीं से उसे इस साजिश में शामिल किया गया। इन लोगों ने उसे भरोसा दिलाया कि अगर वह धर्मस्थल के खिलाफ माहौल खड़ा करता है तो और शिकायतकर्ता सामने आएँगे और मामला बड़ा बनेगा। साथ ही बदले में उसे पैसे का लालच भी दिया गया।


चिन्नैया ने कहा, “मुझे बेंगलुरु में ट्रेनिंग दी गई थी कि पुलिस पूछे तो कैसे जवाब देना है। मैं वही बोलता जो मास्टरमाइंड कहता था। असली खिलाड़ी कोई और है, मैं तो बस किरदार हूँ।”

शुक्रवार (22 अगस्त 2025) देर रात तक SIT ने चिन्नैया से पूछताछ की, जहाँ उसने अपने झूठ को कबूल लिया। शनिवार (23 अगस्त 2025) की सुबह उसे मेडिकल जाँच के लिए ले जाया गया और फिर कोर्ट में पेश किया गया। SIT पहले ही धर्मस्थल में गवाह की बताई गई 18 जगहों में से 17 स्थानों पर खुदाई कर चुकी है। इनमें से दो जगह कुछ अवशेष मिले हैं जिन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।

क्या बोली चिन्नैया की पहली पत्नी?

गिरफ्तारी के बाद चिन्नैया की पहली पत्नी ने भी उसकी पोल खोली। उन्होंने ‘कन्नड़ प्रभा’ अखबार से कहा कि चिन्नैया हमेशा से झूठा रहा है और उसने शादी के दौरान उन पर अत्याचार किया। महिला ने आरोप लगाया कि चिन्नैया पैसों के लिए किसी और के इशारे पर यह सब कर रहा है।

पत्नी ने बताया कि वे नागमंगला की रहने वाली हैं और 25 साल पहले चिन्नैया से उनकी शादी हुई थी। उनके दो बच्चे हैं। शादी के बाद जब वे धर्मस्थल पहुँचे तो धर्माधिकारी वीरेंद्र हेग्गड़े ने उन्हें घर और नौकरी दिलवाई थी। महिला ने कहा, “मुझे स्नान घाट पर सफाई कर्मचारी की नौकरी मिली थी, 3000 रुपए वेतन के साथ, लेकिन चिन्नैया कभी मेहनत करने वाला इंसान नहीं था। वह हमेशा आसान पैसे के चक्कर में रहता था।”

आरोपित की पत्नी ने यह भी खुलासा किया कि तलाक के बाद उन्हें पता चला कि चिन्नैया ने दो और शादियाँ कर ली थीं, जिनमें से एक पत्नी तमिलनाडु की है। चिन्नैया की गिरफ्तारी के बाद धर्मस्थल में माहौल गरम हो गया है। वहीं, श्रद्धालु जुलूस निकालकर SIT की कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं और माँग कर रहे हैं कि इस साजिश के पीछे के मास्टरमाइंड को भी बेनकाब किया जाए।

स्कॉर्पियो-बुलेट के अलावा चाहिए थे ₹36 लाख, माँग पूरी ना करने पर ससुराल वालों ने जलाकर मार डाला: 6 साल के बेटे ने बताया कैसे मारा मम्मी को… पुलिस ने पैर में गोली मारकर पति को पकड़ा

ग्रेटर नोएडा के सिरसा गाँव में दहेज की माँग को लेकर 26 वर्षीय निक्की की उसके पति और ससुराल वालों ने मिलकर हत्या कर दी। पुलिस ने निक्की के पति विपिन भाटी को पैर में गोली मारकर पकड़ा है और बाकी का परिवार अभी फरार है, जिसकी तलाश जारी है।

निक्की से ससुराल वाले लगातार पैसों की माँग कर रहे थे। स्कॉर्पियो और बुलेट बाइक देने के बावजूद ₹36 लाख माँग रहे थे। आखिर में 21 अगस्त 2025 को निक्की को उसके ही बेटे और बहन के सामने आग लगाकर मार डाला, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। झुलसी निक्की की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई।

घटना का विवरण

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, निक्की रूपवास गाँव की रहने वाली थी। निक्की एक मेकओवर आर्टिस्ट थी और इंस्टाग्राम पर उसके 45 हजार से ज्यादा फॉलोवर्स थे। निक्की की शादी 9 दिसंबर 2016 को विपिन भाटी से हुई थी। दहेज में स्कॉर्पियो, एक बुलेट बाइक और अन्य सामान देने के बावजूद, उसके पति और ससुराल वालों की लालच खत्म नहीं हुई। वे लगातार पैसों और अन्य कीमती सामान की माँग कर रहे थे। निक्की का पति विपिन बेरोजगार था और शराब का आदी था।

निक्की की बड़ी बहन कंचन की भी शादी उसी घर में विपिन के बड़े भाई रोहित भाटी से हुई थी। कंचन ने बताया कि वे दोनों बहनों को दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहे। स्थानीय पंचायतों में कई बार मामला उठाया गया, लेकिन उत्पीड़न जारी रहा। 21 अगस्त 2025 की शाम 5:30 बजे निक्की को बुरी तरह पीटा गया और फिर उस पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी गई। कंचन ने बताया कि पहले गर्दन पर हमला किया गया, फिर आग लगाई गई।

बुरी तरह झुलसी निक्की को पहले एक प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल रेफर किया गया। हालाँकि, अस्पताल पहुँचने से पहले ही रास्ते में उसकी मौत हो गई। निक्की की मौत के बाद उसके परिजनों ने, खासकर उसके पिता ने आरोपितों के लिए सख्त से सख्त सजा की माँग की है। उनका कहना है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी। परिजनों ने आरोपितों का एनकाउंटर करने और उनके घर पर बुलडोजर चलाने की माँग की है।

बर्बरता का सबूत: बेटे का बयान और वायरल वीडियो

इस मामले में सबसे दर्दनाक और चौंकाने वाला सबूत निक्की के 6 साल के बेटे का बयान है। एक वीडियो में वह मासूम अपनी मौसी कंचन के साथ खड़ा होकर कह रहा है, “पापा ने मम्मी पर कुछ छिड़का, चांटे मारे और फिर लाइटर से जला दिया।” यह बयान घटना की क्रूरता को साफ-साफ उजागर करता है। इसके अलावा, घटना से जुड़े कुछ वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं।

एक वीडियो में निक्की और उसकी सास व पति उसे बालों से खींचते हुए नजर आ रहे हैं, जबकि एक अन्य वीडियो में निक्की आग लगने के बाद सीढ़ियों से उतरती दिख रही है।

कानूनी कार्रवाई और पति गिरफ्तार

पुलिस ने निक्की की बहन कंचन की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की है। इस एफआईआर में निक्की के पति विपिन भाटी, सास दया, ससुर सतवीर और जीजा रोहित भाटी का नाम शामिल है। पुलिस ने हत्या, दहेज उत्पीड़न और आपराधिक साजिश की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

मामले का मुख्य आरोपित विपिन भाटी को हिरासत में ले लिया गया है, जबकि अन्य आरोपित फरार हैं और उनकी तलाश जारी है। पुलिस की बंदूक छिनकर आरोपित विपिन भाटी हिरासत से भागने का प्रयास कर रहा था जिसके बाद पैर मे गोली मारकर उसे पकड़ा गया। इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं, जिसमें निक्की के लिए न्याय की माँग की जा रही है।

7.24 करोड़ वोटर, आपत्तियाँ सिर्फ 0.16% की आई: बिहार में SIR का काम अब अंतिम चरण में, लास्ट तारीख से 8 दिन पहले 98.2% वोटरों ने जमा किए दस्तावेज

बिहार में एसआईआर के तहत 1 सितंबर 2025 से 8 दिन पहले तक 98.2 फीसदी लोगों के दस्तावेज जमा हो चुके हैं। चुनाव आयोग ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि तीन लाख से अधिक नए वोटर्स ने फॉर्म भरा है। दस्तावेजों को जमा कराने के काम के साथ दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया भी चल रही है। आयोग का मानना है कि तय समय सीमा के पहले इसे पूरा कर लिया जाएगा और 30 सितंबर को वोटर लिस्ट जारी कर दी जाएगी।

वक्त से पहले पूरा हो जाएगा SIR- आयोग

बिहार में 24 जून 2025 से 25 जुलाई 2025 तक चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत वोटरों की गणना का काम पूरा किया गया। इसके बाद 1 अगस्त 2025 को मतदाता सूची के प्रारूप सामने आया। इसके आधार पर दावा, आपत्तियाँ और दस्तावेज जमा करने के लिए 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक यानी पूरे एक महीने का वक्त दिया गया।

1 सितंबर में अभी भी 8 दिन बाकी हैं और केवल 1.8% मतदाताओं के ही दस्तावेज जमा करना शेष रह गया है। बीएलओ और स्वयंसेवकों की मदद से उनके दस्तावेज जमा करने का काम जारी है। ऐसे में माना जा रहा है कि वोटरों के गणना के काम की तरह, दस्तावेजों के जमा करने से जुड़ा काम समय से पहले पूरा हो जाएगा।

आयोग ने बीएलए से लेकर पार्टियों तक की तारीफ की

चुनाव आयोग ने इसके लिए बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, सभी 38 जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों, 243 ईआरओ, 2,976 एईआरओ, 90,712 बीएलओ, लाखों स्वयंसेवकों और सभी 12 प्रमुख राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय प्रतिनिधियों, उनके जिला अध्यक्षों और 1.60 लाख बीएलए के काम की तारीफ की है।

दावा और आपत्तियों के एक महीने का वक्त मतदाताओं को वोटर लिस्ट में किसी तरह की गड़बड़ी होने पर उसकी शिकायत करने और दस्तावेज जमा करने के लिए है। ये दस्तावेज वे लोग जमा करा रहे हैं, जो गणना के वक्त नहीं दे पाए थे। आयोग के मुताबिक, 24 जून 2025 से 24 अगस्त 2025 तक यानी 60 दिनों में 98.2% व्यक्तियों ने दस्तावेज जमा कर दिए हैं यानी औसतन प्रतिदिन लगभग 1.64% लोगों ने दस्तावेज दिए। 24 जून 2025 से 243 ईआरओ और 2,976 एईआरओ इन जमा किए गए दस्तावेजों का सत्यापन भी कर रहे हैं।

सिर्फ 0.16% दावे और आपत्तियाँ प्राप्त हुई- आयोग

आयोग के मुताबिक राज्य की 7.24 करोड़ मतदाताओं में से, अब तक 0.16% दावे और आपत्तियाँ प्राप्त हुई हैं। बिहार में 12 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बीएलए से 10 दावे और आपत्तियाँ मिली हैं। राज्य के 3,28,847 नए मतदाता, जिन्होंने 18 साल पूरी कर ली है या 1 अक्टूबर तक 18 साल के हो जाएँगे, उन्होंने भी अपना फॉर्म 6 और घोषणा पत्र जमा कर दिया है।

आयोग के मुताबिक, सभी दावों और आपत्तियों पर फैसला और दस्तावेजों का सत्यापन 25 सितंबर 2025 तक संबंधित ईआरओ/एईआरओ कर लेंगे इसके बाद अंतिम जाँच किया जाएगा। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित कर दिया जाएगा।

विपक्ष लगातार विरोध में खड़ा रहा

बिहार में वोटर वेरिफिकेशन के खिलाफ विपक्ष लगातार हंगामा कर रहा है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं और सरकार पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हुए आयोग के काम पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर बिहार की जनता आयोग की पूरी कवायद में साथ दे रही है। यही वजह है कि वोटरों की गणना भी वक्त से पहले हो पाया और अब दस्तावेजों को जमा करने का काम भी अपने अंतिम दौर में है।

जन्माष्टमी पर हिंदू ग्रामीणों को प्रधान मोहम्मद शमी ने बाँटी चिकन बिरयानी, मीट-हड्डी दिखने पर मचा बवाल: वीडियो वायरल होने के बाद 2 गिरफ्तार, पुलिस से कहा- हम बाढ़ पीड़ितों की कर रहे थे मदद

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिला स्थित चिनघटपुर गाँव में बाढ़ राहत के नाम पर ग्राम प्रधान शमी मोहम्मद ने जन्माष्टमी पर चिकन बिरयानी बँटवा दीं। उस दिन हिंदू लोग व्रत में थे। खाने में मांस देखकर लोग गुस्सा गए। सोशल मीडिया पर गाँव के सुनील ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी।

वीडियो में सुनील कहता है, “इसमें देखो, मुर्गा है ये। शमी प्रधान ने बाँटा है। बच्चे लेकर आए हैं, उन्होंने खाया। देखो, इसमें ये निकला है।”

क्या है पूरा मामला ?

फर्रुखाबाद से 40 किमी की दूरी पर कायमगंज तहसील में कंपिल कस्बा स्थित है। यहाँ गंगा खतरे के निशान से 20 सेमी ऊपर बह रही है, जिसकी वजह से आस-पास के 50 से ज्यादा गाँव डूब चुके हैं। ऐसी ही हालत राईपुर चिनघटपुर गाँव की भी है।

चिनघटपुर गाँव में बाढ़ राहत के लिए ग्राम प्रधान शमी मोहम्मद ने खाना बाँटा। खाने का वीडियो बनाने वाले गाँव के सुनील ने दैनिक भास्कर को पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए बताया, “मेरे बड़े भाई पिंटू बाढ़ राहत के लिए बाँटा गया खाना खा रहा था। अचानक वह चिल्लाया, खाने में मीट है। उसने पैकेट फेंक दिया, मुझे लगा कि वो बिरयानी में डाली सोयाबीन बरी को मीट समझ रहा है। फिर भी मैंने पैकेट उठाकर देखा। बिरयानी में सच में चिकन और हड्डियाँ थीं।”

सुनील ने गाँव के प्रधान को फोन लगाया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद सुनील ने चिकन बिरयानी के डब्बे का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। वीडियो को देखकर हिंदू संगठन ने सपोर्ट किया।

इसके बाद हिंदू महासभा, बजरंग दल और VHP के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। 17 अगस्त 2025 को विरोध प्रदर्शन कर कंपिल थाने को घेर लिया और शिकायत दर्ज कराई।

इसके बाद फर्रुखाबाद पुलिस ने ग्राम प्रधान शमी मोहम्मद, उसके बेटे सैफ और तालिब के साथ मोहम्मद सामी उर्फ मुस्तफा के खिलाफ BNS की धारा 196 (धर्म, जाति या समुदाय के बीच नफरत को बढ़ावा देना), 352 (शांति भंग) और 351 (आपराधिक धमकी देने) की धाराओं के तहत केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

गाँववालों ने क्या कहा?

मामले पर दैनिक भास्कर से बातचीत में गाँव के लोगों ने अपनी आबपीती सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे ग्राम प्रधान ने गलत मंशा से हिंदू त्योहार पर मांस भेजा। इससे लोगों का धर्म भ्रष्ट हुआ है।

गाँव की सुनीता देवी बताती हैं, “दोपहर के लगभग 3 बज रहे होंगे। स्टीमर की आवाज सुनाई दी। हमें समझ आ गया कि गाँववालों के लिए खाना आया है। बच्चे दौड़कर स्टीमर की तरफ पहुँच गए।”

सुनीता बताती हैं, “हमने पैकेट खोला तो उसमें चावल के साथ चिकन और हड्डी निकली। ये देखकर मन खराब हो गया। हमने तुरंत सारे पैकेट फेंक दिए। तब तक घर के कुछ लोगों और बच्चों ने वही खाना खा लिया था। इससे मेरा जन्माष्टमी का व्रत खंडित हो गया।”

दो गुटों में बँटा गाँव

जहाँ एक तरफ कुछ गाँववाले प्रधान को दोषी मान रहे हैं, वहीं कुछ लोग उसके समर्थन में खड़े हैं। प्रधान के समर्थकों का कहना है कि मामले को जानबूझ कर हाइलाईट किया जा रहा है ताकि प्रधान की बदनामी हो। दूसरी तरफ अन्य गाँववालों का आरोप है कि प्रधान और उसके बेटे की गिरफ्तारी के बाद उन्हें केस वापस लेने के लिए धमकियाँ मिल रही हैं।

सबसे पहले हिंदू संगठनों को मामले की जानकारी देने वाले देवेंद्र यादव का कहना है, “16 अगस्त को प्रधान शमी अपने बेटों सैफ अली और तालिब अली के अलावा 3 लोगों के साथ बिरयानी के पैकेट बाँट रहे थे। जन्माष्टमी होने की वजह से ज्यादातर गाँववालों का व्रत था। कुछ लोगों ने बिरयानी खाना शुरू किया तो उसमें मांस के टुकड़े मिले। गाँव में 10 से 12 परिवार ऐसे हैं, जिन्हें उस दिन नॉनवेज खाना मिला।”

दूसरी तरफ प्रधान शमी मोहम्मद की बीवी हुसनुमा बेगम का कहना है, “वे तो लोगों की मदद करने गए थे। उन्हें नहीं पता था कि इस काम के लिए भी उन्हें फँसा दिया जाएगा। पूरा केस प्रधान को बदनाम करने के इरादे से बनाया गया।”

वहीं, हिंदू महासभा के प्रदेश अध्यक्ष विमलेश मिश्रा कहते हैं, “जिस गाँव में ये दुखद घटना हुई, वहाँ हमारे यादव समाज के भाई रहते हैं। वे धूमधाम से कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। सवाल ये है कि एक गैर हिंदू प्रधान ने चिकन बिरयानी बँटवाने के लिए वही दिन क्यों चुना। हिंदुओं का मांस वाला खाना खिलाया गया, ये एक सोची समझी साजिश है।”

उन्होंने बताया, “16 अगस्त को रात तक मुकदमा नहीं लिखा गया, तो हिंदू संगठनों के लोगों ने दुर्वासा ऋषि आश्रम के महंत ईश्वरदास महाराज की मदद से जिले की SP आरती सिंह और DM आशुतोष कुमार द्विवेदी तक इस मामले को पहुँचाया। इसके बाद आरोपितों पर FIR दर्ज की गई।”

पुलिस जाँच में पता चला है कि प्रधान ने मुस्लिम बहुल गाँव एकलहरा के लिए नॉनवेज बिरयानी और हिंदू बहुल राईपुर चिनघटपुर के लिए सोयाबीन बिरयानी तैयार करवाई थी। SI प्रेमपाल सिंह के अनुसार, गलती से नॉनवेज पैकेट राईपुर गाँव में पहुँचा दिए गए।

हालाँकि, मामले को लेकर अब भी गाँव में तनाव बरकरार है। गाँव में माहौल न बिगड़े इसीलिए पुलिस की तैनाती की गई है।

राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ वाले रोने को मिला विदेशी मीडिया का साथ, Al Jazeera से लेकर वॉशिंगटन पोस्ट ने SIR पर प्रोपेगेंडा फैलाया: विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को लिखा- लोकतंत्र बचाने वाली लड़ाई

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी इन दिनों कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर लगातार हंगामा खड़ा कर रहे हैं। वे लगातार चुनाव आयोग (ECI) और BJP सरकार पर बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) प्रक्रिया से वोट काटने का आरोप लगा रहे हैं। उनके इन आरोपों पर अब विपक्ष से ज्यादा विदेशी मीडिया सुर में सुर मिला रही है।

अल जजीरा, BBC, वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स और अमेरिकन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (ABC) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने भारत की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए रिपोर्ट्स छापी हैं। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आते हैं-

  1. भारत सरकार अल्पसंख्यकों और गरीब तबकों को पहचान के नाम पर परेशान कर रही है।
  2. मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी कर विपक्षी वोट बैंक काटा जा रहा है।
  3. मोदी सरकार लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है।

विदेशी मीडिया की इन कहानियों में भारत की वास्तविक स्थिति और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर आधी-अधूरी जानकारी देकर एकतरफा तस्वीर पेश की जा रही है। इससे पता लगता है कि राहुल गाँधी जिस कथित ‘वोट चोरी’ के नारे के सहारे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं, उसी प्रोपेगेंडा को अब विदेशी मीडिया ने उठाकर भारत की छवि पर सवाल खड़े करने का जरिया बना लिया है।

अल जज़ीरा ने अपनी इस रिपोर्ट में लिखा कि भारत में लगभग 8 करोड़ लोगों को अपने वोटिंग अधिकार साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने पड़ रहे हैं। इसे उन्होंने NRC जैसी प्रक्रिया बताया है, जिसमें खासतौर पर मुस्लिम और प्रवासी मजदूरों पर असर पड़ने का दावा किया गया।

अल जजीरा की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

जबकि हकीकत यह है कि भारत में चुनाव आयोग हर 5 साल पर ‘वोटर लिस्ट रिवीजन’ कराता है। इसका मकसद फर्जी वोटरों को हटाना और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना है। यह कोई ‘नागरिकता साबित करने’ का अभियान नहीं है बल्कि केवल वोटर लिस्ट की सफाई है।

अल जज़ीरा ने इसे NRC जैसी प्रक्रिया बताकर अतिशयोक्ति की है, जबकि भारत सरकार और आयोग दोनों साफ कह चुके हैं कि किसी भी नागरिक का वोट बिना ठोस कारण हटाया नहीं जा सकता।

वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी इन रिपोर्ट में यह दावा किया कि बिहार में मतदाता सूची में संशोधन के लिए जल्दबाजी की गई, जिससे तकनीकी गडबड़ियाँ, दस्तावेजों में कमी और व्यापक भ्रम की स्थिति बनी।

The Washington Post की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

जबकि असल में वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) प्रक्रिया नई नहीं है। हर 5 साल में चुनाव आयोग इसे करवाता है। चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया कि यह प्रक्रिया सभी जिलों में समान रूप से लागू है न कि किसी खास समुदाय पर। इसके तहत सिर्फ उन लोगों के नाम हटते हैं जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो गए, डुप्लीकेट एंट्री हैं या फिर जिनका निधन हो चुका है।

न्यूयॉर्क टाइम्स और अमेरिकन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी (ABC) की इन रिपोर्ट्स में वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) को विवादित बताकर विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन को सपोर्ट किया गया, जिसमें राहुल गाँधी समेत विपक्षी नेता को दिल्ली पुलिस ने रोका। विदेशी मीडिया ने इसे ‘लोकतंत्र बचाने की लड़ाई’ की तरह पेश किया।

Newyork Times की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
American Broadcasting Company (ABC) की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

लोकतंत्र में विपक्ष को बोलने का पूरा अधिकार है लेकिन सिर्फ आरोप लगा देना ही सबूत नहीं होता। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और भारत की न्यायपालिका कई बार यह साफ कर चुकी है कि वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) पारदर्शी प्रक्रिया है।

विपक्ष ने अभी तक अदालत या आयोग को कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया कि बीजेपी या सरकार ने ‘वोट चोरी’ की हो विदेशी मीडिया की रिपोर्ट्स केवल राजनीतिक बयानों पर आधारित हैं, जिनमें तथ्यात्मक आधार कमजोर है।

विदेशी मीडिया अक्सर भारत से जुड़ी खबरों को अपने नजरिए से पेश करता है। अल जज़ीरा, BBC, वॉशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी संस्थाएँ पहले भी CAA, NRC और कृषि कानूनों पर एकतरफा रिपोर्टिंग को लेकर विवादों में रही हैं।

इस बार भी उन्होंने राहुल गाँधी के बयानों को आधार बनाकर यह नैरेटिव गढ़ा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है। जबकि वास्तविकता यह है कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया हर साल होती है। इसमें लाखों नए वोटर जुड़ते हैं, जिससे चुनाव पारदर्शी तरीके से होते हैं।

राहुल गाँधी का ‘वोट चोरी’ मुद्दा राजनीतिक प्रोपेगेंडा

उधर, राहुल गाँधी ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाकर राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। उनके बयानों को विदेशी मीडिया ने और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है ताकि यह दिखाया जा सके कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और अल्पसंख्यकों को वोट से वंचित किया जा रहा है।

लेकिन तथ्य यही बताते हैं कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया नियमित है, सभी पर समान रूप से लागू होती है और किसी भी नागरिक का वोट मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सकता।

यानि राहुल गाँधी और विदेशी मीडिया के दावे एक राजनीतिक नैरेटिव से ज्यादा कुछ नहीं लगते। भारत का लोकतंत्र मजबूत है और वोट की ताकत हर नागरिक को बराबरी से हासिल है।

बिहार में बने इंजन से अफ्रीकी देश ‘गिनी’ को मिलेगी रफ्तार… पहली खेप रवाना: 3 साल में ₹3000 करोड़ के लोकोमोटिव्स का होगा निर्यात, उद्योग मंत्री बोले- ये ऐतिहासिक क्षण

बिहार के सारण ने विश्वस्तर पर रेलवे निर्माण में अपनी पहचान बनाई है। जिले के मढ़ौरा स्थित WLPL मढ़ौरा लोकोमोटिव (रेल इंजन) प्लांट से 4500 हॉर्स पावर का आधुनिक रेल लोकोमोटिव्स की चार इंजन की पहली खेप अफ्रीकी देश गिनी निर्यात किए गए हैं। ये इंजन बिहार से पहले मुंद्रा पोर्ट पहुँची और फिर अफ्रीकी देश गिनी के लिए रवाना हुई।

मुंद्रा पोर्ट गुजरात के कच्छ जिले में मौजूद भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह है। हर साल यहाँ से करीब 338 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक सामानों की ढुलाई होती है।

क्या है WLPL

Wabtec Railway Lokomotive Plant Ltd (WLPL) एक संयुक्त उपक्रम है जो अमेरिकी कंपनी वेबटेक कॉर्पोरेशन (Webtec Corporation) और भारत सरकार के रेल मंत्रालय मिलकर संचालित करते हैं। भारतीय रेल मंत्रालय के लिए भी ये गर्व का क्षण है।

उद्योग मंत्री नीतीश मिश्रा ने एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी दी है। उन्होंने लिखा, “बिहार के लिए ऐतिहासिक क्षण है। सारण जिलान्तर्गत मढ़ौरा स्थित WLPL Marhowra Locomotive Plant (अमेरिकी कंपनी Wabtec और भारत सरकार के रेल मंत्रालय का संयुक्त उपक्रम) में निर्मित ES43ACmi (4500 HP) लोकोमोटिव्स की चार इंजन की पहली खेप मुंद्रा पोर्ट से अफ्रीकी देश गिनी (Guinea) के लिए रवाना हुई।”

इससे बिहार की प्रगति को नई रफ्तार मिलेगी। उद्योग मंत्री ने कहा, ” विगत 20 जून को सिवान की धरती से यशस्वी प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस खेप को फ्लैग-ऑफ किया था। अब यह खेप अफ्रीका के Simandou Project के लिए रवाना हो चुकी है। अगले 3 वर्षों में ₹3000 करोड़ मूल्य के लोकोमोटिव्स बिहार की धरती से गिनी भेजे जाएँगे।”

उद्योग मंत्री ने आगे कहा है, “यह केवल निर्यात नहीं, बल्कि बिहार की औद्योगिक क्षमता और भारत की तकनीकी सामर्थ्य का वैश्विक प्रदर्शन है। पहली बार बिहार में बने रेल इंजन किसी दूसरे देश में जा रहे हैं। अब यह पहल “Make in India” से आगे बढ़कर “Make for the World” की दिशा में नया अध्याय लिख रही है।”

मढोरा प्लांट में 6000 एचपी तक के इंजन बनते हैं

मढ़ौरा प्लांट में 4500 से 6000 हॉस पावर के डीजल रेल इंजन का निर्माण होता है। ये पर्यावरण के अनुकूल और अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से बनाए जाते हैं। भारतीय रेलवे को भी यहाँ से इंजन की आपूर्ति होती है। अब तक करीब 700 इंजन भारतीय रेलवे को यहाँ से दिया गया है। 2028 तक 1000 इंजन इस प्लांट से बना इंजन भारतीय रेलवे को मिल जाएगा।

ये प्लांट 270 एकड़ में फैला है जिसमें करीब 600 इंजीनियर और कर्मचारी काम करते हैं।

₹5,800 लाख करोड़ का निवेश, अमेरिका का टैरिफ विवाद, चीन का विकल्प: जानिए क्यों पीएम मोदी की जापान यात्रा हो सकती है दोनों देशों के लिए गेम-चेंजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29 अगस्त 2025 को जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। यह यात्रा सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं होगी बल्कि दोनों देशों के बीच रिश्तों को और मज़बूत करने का बड़ा कदम मानी जा रही है।

जापान ने अगले दस सालों में भारत में करीब ¥10 ट्रिलियन (5,800 लाख करोड़ रुपए) निवेश करने का ऐलान किया है। यह 2022 में किए गए पाँच साल के लिए ¥5 ट्रिलियन (2,750 लाख करोड़ रुपए) निवेश की प्रतिबद्धता से कहीं ज्यादा है।

पीएम मोदी का जापान दौरा सिर्फ दो देशों के बीच की औपचारिकता से कहीं ज्यादा है। बदलते हुए दुनिया के माहौल में भारत जापान के लिए एक जरूरी साझेदार बनकर उभरा है। जापान को चीन की बढ़ती आक्रामकता की चिंता है।

हालाँकि, यह अब एक नया ‘टैरिफ फ़्लोर’ बन गया है, जिससे जापानी कंपनियों के मुनाफे पर दबाव रहेगा और उन्हें अपनी अंतरराष्ट्रीय रणनीतियों पर फिर से सोचना पड़ेगा। यही स्थिति भारत के लिए एक बड़ा अवसर है, क्योंकि जापान अपने व्यापार और निवेश के नए रास्ते भारत में तलाश सकता है।

अमेरिका-जापान व्यापार विवाद से भारत को लाभ क्यों?

जापान और अमेरिका को सबसे करीबी साथी माना जाता है। इसके बावजूद वॉशिंगटन का आर्थिक राष्ट्रवाद सामने आया है, जिसमें अपने ही साथियों के खिलाफ भी टैरिफ लगाया गया है। अब सभी देशों को 15-20% “दुनिया भर का टैरिफ” का खतरा झेलना पड़ रहा है, वो भी जब तक कि वो अमेरिका के साथ खास समझौता नहीं कर लेते।

इसी वजह से जापान को मजबूरी में 15% टैरिफ समझौता मानना पड़ा। कुछ दिनों बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भी ऐसा ही किया। इसका बड़ा सबक जापान के लिए यह है कि अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भरता जोखिम भरी है। अगर मुनाफा सुरक्षित रखना है तो उसे नए बाजार तलाशने होंगे और इसमें भारत सबसे बड़ा उदाहरण बना है।

  1. जापान को बड़ा बाजार चाहिए, भारत वो देता है। अमेरिका के टैरिफ से मुनाफा घट रहा है, इसलिए जापानी कंपनियों को ऐसे बाजार चाहिए जहाँ कीमतें कम और खपत ज्यादा हो। भारत की 1.4 अरब की आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और 2025 तक 6.4% GDP वृद्धि (IMF का अनुमान) उसे चीन और अमेरिका दोनों की तुलना में अधिक आकर्षक विकल्प बनाते हैं।
  2. भारत की एक और ताकत है उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। नई दिल्ली न तो पश्चिमी पाबंदियों का हिस्सा बनी, न ही पूर्वी एशिया के RCEP समूह में शामिल हुई। जापान जहाँ चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है, वहीं भारत अपनी स्वतंत्र नीति की वजह से आदर्श साझेदार नजर आता है।
  3. बड़े ऐस्पेक्ट में देखें तो जापान के भीतर भी दबाव बढ़ रहा है। वहाँ मुद्रास्फीति बैंक ऑफ जापान के लक्ष्य से ऊपर है और आगे ब्याज दरें बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। यानी बेहद सस्ता ‘येन फ़ाइनेंस’ अब खत्म होने की ओर है। ऐसे में जापानी पूंजी अब भारत जैसे देशों में ज्यादा लाभ कमा सकती है।
  4. भारत पर भी दबाव है। हाल ही में अमेरिका-भारत की कुछ वार्ताएँ रद्द हो चुकी हैं। द्विपक्षीय समझौते न होने की वजह से भारत पर भी अमेरिकी अतिरिक्त शुल्क लगाने का खतरा बना हुआ है। वॉशिंगटन ने चेतावनी दी है कि अगर तेल और भू-राजनीति जैसी दिक्कतें जारी रहीं, तो और टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
  5. इसलिए भारत के लिए अब जरूरी है कि वह अपने निर्यात को विविध बनाए (Export mix risk कम करे), साथ ही अन्य देशों के साथ साझेदारी मजबूत करे, ताकि बाजार जोखिम कम हो।

भारत-जापान साझेदारी दोनों देशों के लिए फायदेमंद

जापान और अमेरिका को सबसे करीबी सहयोगी माना जाता है, लेकिन अब वॉशिंगटन की आर्थिक राष्ट्रवाद की नीति मजबूत होकर टैरिफ (शुल्क) के रूप में सामने आ रही है और यह सहयोगियों पर भी लागू हो रही है।

अब सभी देशों पर 15–20% ‘दुनियाभर का टैरिफ’ का खतरा बना रहता है, जब तक कि वे अमेरिका के साथ विशेष समझौता न कर लें। बड़ी हानि से बचने के लिए जापान को 15% टैरिफ समझौते को मानना पड़ा।

अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) ने भी कुछ दिन बाद इसी तरह का समझौता किया। इससे जापान के लिए एक साफ सबक निकलता है। अमेरिकी बाजार पर उसकी ज्यादा निर्भरता जोखिमभरी है। अगर टैरिफ जारी रहते हैं, तो मुनाफे के लिए जापान को दूसरे बाजार तलाशने होंगे। ऐसे में भारत एक बड़ा विकल्प बनता जा रहा है।

1. जापान को बड़े पैमाने वाले बाजार की जरूरत है और भारत यह अवसर देता है। अमेरिकी टैरिफ से मुनाफा घट रहा है, इसलिए जापानी कंपनियों को अब ऐसे बाजार की तलाश है जहाँ कीमतें कम हों और खपत ज्यादा।

भारत इस मामले में सबसे उपयुक्त है यहाँ 1.4 अरब की आबादी है, तेजी से बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग है और IMF के अनुसार 2025 तक 6.4% GDP वृद्धि का अनुमान है। यही वजह है कि भारत, चीन और दुनियाभर में टैरिफ लाद रहे अमेरिका के बीच जापान के लिए सबसे व्यवहारिक विकल्प बन रहा है।

2. रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) भारत के लिए फायदेमंद साबित हुई है। भारत किसी भी गुट में शामिल होने से बचाता रहा है चाहे वह पश्चिमी देशों के प्रतिबंध हों या पूर्वी एशिया का RCEP समझौता।

जापान जब चीन पर निर्भर हुए बिना अपने विकल्प बढ़ाना चाहता है, तब नई दिल्ली उसके लिए सबसे उपयुक्त साझेदार बनती है, क्योंकि भारत अपनी संतुलित और स्वतंत्र नीति पर कायम है।

3. आर्थिक माहौल बदल रहा है। जापान में महँगाई दर अब बैंक ऑफ जापान (BoJ) के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है और बाजार भविष्य में ब्याज दरें बढ़ने का अनुमान लगा रहे हैं। इसका मतलब है कि बहुत सस्ते येन पर वित्त मिलने का दौर अब खत्म होने की ओर है, भले ही येन अभी कुछ समय तक कमजोर बना रहे। ऐसी स्थिति में जापानी पूंजी बेहतर मुनाफे की तलाश में बाहर जाएगी और यहीं भारत अपने लिए एक बड़ा अवसर बना सकता है।

4. जापान से आगे बढ़कर अब भारत पर भी दबाव है। हाल ही में भारत-अमेरिका की बातचीत के कई दौर रद्द हो चुके हैं और अगर द्विपक्षीय समझौता नहीं हुआ तो भारत को अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ का खतरा है। वॉशिंगटन ने चेतावनी दी है कि अगर तेल से जुड़ी राजनीति और अन्य मतभेद जारी रहे तो और शुल्क लगाए जा सकते हैं। इसी वजह से अगस्त के आखिर में होने वाली बातचीत भी रद्द कर दी गई।

इस स्थिति से भारत के लिए दो जरूरी बातें सामने आती हैं

  1. ऐसे तीसरे देशों के साथ साझेदारी मजबूत करना, जिससे बाजार का खतरा घट सके।
  2. निर्यात को विविध बनाकर जोखिम कम करना।

भारत-जापान साझेदारी पारस्परिक रूप से लाभकारी है

जैसे-जैसे अमेरिका जापान और यूरोपीय संघ (EU) जैसे अपने दोस्तों पर भी टैरिफ की दीवार मज़बूत कर रहा है, वैसे-वैसे भारत सबसे बड़ा टैरिफ-फ्री साझेदार बनकर उभर रहा है।

भारत और EFTA (यूरोपियन फ़्री ट्रेड एसोसिएशन) के बीच FTA समझौता 1 अक्टूबर 2025 से लागू होगा, जबकि ब्रिटेन (UK) के साथ FTA पहले ही तय हो चुका है। इसका मतलब है कि जापानी निवेशक भारत में निवेश करके सीधे यूरोप तक बिना टैरिफ के पहुँच पाएँगे।

प्रधानमंत्री मोदी इसे भारत की एक बड़ी भू-राजनीतिक बढ़त (geopolitical arbitrage) के रूप में पेश कर सकते हैं।

सेमीकंडक्टर एंड एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स : जापान के सेमीकंडक्टर रेनसान्स (semiconductor renaissance) में भारत को ‘प्लस-वन’ बनाया जा सकता है। जापान का रपिदुस प्रोजेक्ट 2027 तक 2-नैनोमीटर चिप उत्पादन का लक्ष्य रखता है, जिसे METI का मज़बूत सहयोग और वैश्विक साझेदारों का साथ मिला है।

टोक्यो ने पहले ही भारत-जापान सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पार्टनरशिप बनाई है और एक औपचारिक भारत-जापान सेमीकंडक्टर पॉलिसी डायलॉग की मेजबानी भी करता है। भारत को चाहिए कि वह रपिदुस इंडिया ‘डिजाइन, पैकेजिंग और टैलेंट’ कॉरिडोर का प्रस्ताव रखे, जिसका मुख्य केंद्र बेंगलुरु/हैदराबाद और गुजरात का धोलेरा हो। यह भारत की PLI और OSAT योजनाओं के साथ पूरी तरह मेल खाएगा।

इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड कनेक्टिविटी : मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन से लेकर उत्तर-पूर्वी राज्यों की सड़क परियोजनाओं तक, जापानी ODA (Official Development Assistance) ने भारत की कई बड़ी कनेक्टिविटी योजनाओं को सहयोग दिया है। जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) ने उत्तर-पूर्व क्षेत्र में लगभग 750 किलोमीटर नई सड़कों के निर्माण को फंड किया है, जिससे कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार हुआ है। इसके अलावा, जापान ने क्षेत्रीय पानी सप्लाई और स्वच्छता परियोजनाओं में भी योगदान दिया है। उदाहरण के लिए, गुवाहाटी में JICA ने पानी वितरण व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सहायता दी है।

भारत-जापान आर्थिक सहयोग का सबसे बड़ा प्रतीक है मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट, जिसे भारत की पहली बुलेट ट्रेन लाइन कहा जा रहा है। यह केवल हाई-स्पीड रेल नहीं है, बल्कि जापान की अत्याधुनिक शिंकानसेन तकनीक को भारत में लाने की महत्वाकांक्षा भी दिखाता है। इस प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर जापानी ODA लोन के जरिए फंड किया जा रहा है।

इसकी गुजरात वाली लाइन दिसंबर 2027 तक पूरी करने का लक्ष्य है, जबकि पूरे प्रोजेक्ट का उद्घाटन दिसंबर 2029 में होगा। भारतीय सरकार चाहती है कि जापान भारत की राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेल परियोजना में और भी ज्यादा सहयोग करे। उम्मीद है कि जापान पश्चिम भारत की मौजूदा लाइन के अलावा, देश के अन्य हिस्सों में भी शिंकानसेन तकनीक वाली नई रूट्स के प्रस्ताव पेश करेगा।

सुरक्षा और साझेदारी: भारत और जापान का सुरक्षा सहयोग अब एक गहरी रणनीतिक साझेदारी में बदल चुका है, जो आपसी हित और भरोसे पर आधारित है। इसकी नींव 2008 में हुए ‘ज्वॉइंट डिक्लेरेशन ऑन सिक्योरिटी कोऑपरेशन’ से रखी गई, जिसमें खुफिया जानकारी साझा करने, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी कदम और शांति स्थापना जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया।

इसके बाद कई समझौतों ने इस साझेदारी को और मजबूत किया, जैसे 2014 का रक्षा आदान-प्रदान समझौता, 2015 के रक्षा उपकरण और तकनीकी सहयोग तथा सैन्य सूचना सुरक्षा समझौते और 2020 का RPSS (Reciprocal Provision of Supplies and Services) समझौता, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे को लॉजिस्टिक सहायता प्रदान कर सकते हैं।

हाल ही में 2024 में दोनों देशों ने एक मेमरैन्डम ऑफ इन्टेन्ट पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत भारतीय नौसेना के लिए UNICORN मस्त को संयुक्त रूप से विकसित किया जाएगा। यह रक्षा तकनीक सहयोग की दिशा में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा का महत्व

इस यात्रा का एक अहम पहलू रियलपॉलिटिक भी है। प्रधानमंत्री मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि भारत न केवल दुनिया में हो रहे अशांति के बीच टिके हुए है, बल्कि उससे फायदा भी उठा रहा है। जहाँ बाकी देश सिर्फ प्रतिक्रिया देते हैं, भारत व्यापारिक संघर्षों को सप्लाई चेन, पूँजी प्रवाह और भू-राजनीतिक ताकत में बदल रहा है।

भारत-जापान साझेदारी को और मज़बूत करने के लिए दोनों देशों के नेता कई क्षेत्रों पर ध्यान देंगे, जैसे इंटेलिजेंस शेयरिंग (खुफिया जानकारी साझा करना), सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी रेयर अर्थ मेटल्स और व्यापक आर्थिक-सुरक्षा सहयोग, जिसमें क्वाड फ्रेमवर्क भी शामिल है।

चीन की आक्रामक नीतियों ने इंडो-पैसिफिक को बदल दिया है, जिससे दोनों लोकतांत्रिक देशों के पास विकल्प कम और जरूरतें ज्यादा हो गई हैं। जापान का भारत की ओर झुकाव चाहे वह रक्षा उपकरण और तकनीकी सहयोग, न्यूक्लियर छूट, मालाबार और समुद्री साझेदारी जैसे अभ्यास या नई टेक्नोलॉजी साझेदारियाँ हों क्षेत्रीय अस्थिरता के खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति है।

भारत और जापान दोनों विचारधारा-आधारित गठबंधनों से बचते हैं और इसके बजाय क्वाड, SCRI और द्विपक्षीय संबंधों के जरिए एक लचीला और हित-आधारित सुरक्षा ढाँचा बना रहे हैं। यह किसी औपचारिक गठबंधन में फँसे बिना ही मज़बूत निवारक (deterrence) तैयार करता है। प्रधानमंत्री मोदी की यह टोक्यो यात्रा सिर्फ एक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं होगी, बल्कि भारत की प्रगति को दुनिया के सामने पेश करने का अवसर बनेगी।

चीन जहाँ धमकियों से दबदबा बनाने की कोशिश कर रहा है और अमेरिका अपने साझेदारों पर टैरिफ का दबाव डाल रहा है, वहीं मोदी के नेतृत्व में भारत एक विश्वसनीय और मजबूत साझेदार के रूप में सामने आ रहा है।

आज भारत को एशिया के भविष्य का अहम खिलाड़ी माना जा रहा है बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट, नए चिप प्रोजेक्ट्स, रक्षा सहयोग और जापान की बड़ी निवेश योजनाएँ इसका सबूत हैं। यह यात्रा दिखाती है कि भारत अब सिर्फ परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि दुनिया की नई दिशा तय करने वाला देश बनता जा रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत आत्मविश्वासी, भरोसेमंद और वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार नजर आ रहा है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद कट्टरपंथियों का हुआ मिलाप, बांग्लादेश- पाकिस्तान के बीच बढ़ने लगी नजदीकियाँ: जानिए PAK के उप प्रधानमंत्री इशाक डार के ढाका दौरे का भारत पर क्या पड़ेगा असर

बांग्लादेश में पिछले साल अगस्त में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। इस बदलाव का सीधा असर बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों पर भी पड़ा है। दोनों देशों के संबंधों में लंबे समय बाद एक नई मधुरता देखने को मिल रही है।

पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार इन दिनों तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर ढाका पहुँचे हैं, जहाँ वे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के शीर्ष नेताओं के अलावा कई कट्टरपंथी संगठनों के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे।

भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय मानी जा रही है, क्योंकि इन बैठकों में ऐसे संगठनों के नेता भी शामिल होंगे, जिनका रुख भारत विरोधी रहा है।

ढाका और इस्लामाबाद के बीच बढ़ती नजदीकीयाँ

पिछले एक साल में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कई अहम पहलें हुई हैं। फरवरी में दोनों देशों के बीच सीधे सरकारी स्तर पर व्यापार शुरू हुआ, जिसमें 50,000 टन चावल का सौदा शामिल था।

इसी दौरान पाकिस्तान की एयरलाइन फ्लाई जिन्ना को कराची से ढाका के लिए उड़ानें संचालित करने की मंजूरी भी मिली। हाल ही में गृह मंत्री मोहसिन नकवी की ढाका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने राजनयिक और आधिकारिक पासपोर्ट धारकों को वीजा-मुक्त यात्रा की सुविधा देने पर सहमति जताई।

कॉमर्स मिनिस्टर जाम कमाल खान और अब उप प्रधानमंत्री इशाक डार की यात्राएँ इस बात का संकेत हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश रिश्तों को बहुपक्षीय स्तर पर गहरा करने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक, डार की इस यात्रा के दौरान व्यापार, मीडिया, संस्कृति और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में चार से पाँच समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। साथ ही दोनों देश व्यापार बढ़ाने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह स्थापित करने की प्रक्रिया में भी हैं।

बांग्लादेश में कट्टरपंथ की बढ़ती भूमिका

शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने राजनीतिक संवाद के दरवाजे व्यापक रूप से खोले हैं। इस प्रक्रिया में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतों को भी जगह मिल रही है।

डार की इस यात्रा के दौरान वे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस और विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन के अलावा बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया से भी मुलाकात करेंगे।

लेकिन सबसे जरूरी और परेशान होने वाली बात यह है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री ढाका में जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश जैसे कट्टरपंथी संगठनों के नेताओं से भी मिलने वाले हैं। यह संगठन भारत विरोधी रुख और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोपों के चलते लंबे समय तक प्रतिबंधित रहा है।

इन मुलाकातों से संकेत मिलता है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें एक बार फिर मुख्यधारा की राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रही हैं और पाकिस्तान उन्हें प्रोत्साहित करने की भूमिका निभा सकता है।

एक ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच व्यापार और कूटनीतिक संबंध मज़बूत हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत विरोधी समूहों को बढ़ावा मिलना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर सवाल खड़े करता है। खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान लंबे समय से बांग्लादेशी कट्टरपंथियों के सहयोग की तलाश में रहा है।