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शेख हसीना की सरकार गिराने के बाद से बांग्लादेश में महिलाओं-बच्चियों के खिलाफ बढ़ा अपराध, 7 माह में 75% बढ़े रेप केस: 2 सालों में गरीबी हुई दोगुनी, आँकड़ों में खुली यूनुस सरकार की पोल

बांग्लादेश इस समय दोहरी त्रासदी से जूझ रहा है। एक ओर मासूम बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं में भयानक वृद्धि हुई और दूसरी ओर तेजी से बढ़ती गरीबी। साल 2025 के पहले सात महीनों में देश में बच्चियों के साथ रेप के मामलों में लगभग 75% की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं गरीबी की दर भी 28% के करीब पहुँच गई है, जो महज दो वर्षों में दोगुनी हो चुकी है। यह सब तब हो रहा है जब देश की बागडोर मुहम्मद यूनुस के हाथ में है, जो एक ‘लोकतांत्रिक और पारदर्शी सरकार’ के वादे के साथ सत्ता में आए थे।

रेप के बढ़ते आँकड़े – एक राष्ट्रीय शर्म

बांग्लादेश में बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले में चौंकाने वाली वृद्धि हुई है। मानवाधिकार संगठन आईन ओ सालिश केंद्र (ASK) के आँकड़ों के अनुसार, 2025 के पहले सात महीनों (जनवरी-जुलाई) में 306 लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ, जबकि 2024 में इसी अवधि में यह संख्या 175 थी। इसका मतलब है कि केवल सात महीनों में ही बलात्कार के मामलों में लगभग 75% की बढ़ोतरी हुई है।

यह संख्या 2024 के पूरे साल के कुल 234 मामलों को भी पार कर गई है। इनमें से 49 पीड़ित बच्चियाँ 0-6 साल की थीं, 94 बच्चियाँ 7-12 साल की थीं और 103 किशोरियाँ थीं। 30 लड़कों के साथ बलात्कार हुआ, जिनमें से अधिकांश 12 साल से कम उम्र के थे। इनमें मात्र 20 मामलों में केस दर्ज हो सके। बलात्कार के प्रयास के भी 129 मामले सामने आए। कानूनी कार्रवाई की बात करें तो, 306 में से केवल 251 मामलों में ही केस दर्ज हो पाया, यानि 55 बच्चियों को अब तक न्याय नहीं मिल सका। इस भयावह वृद्धि का कारण कमजोर कानून-व्यवस्था और अपराधियों में जवाबदेही की कमी है।

बांग्लादेश में बढ़ती गरीबी

जहाँ एक तरफ अपराध बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ती जा रही है। पावर एंड पार्टिसिपेशन रिसर्च सेंटर (PPRC) के अनुसार, बांग्लादेश में गरीबी दर 2022 के 18.7% से बढ़कर अब 27.93% हो गई है। इसी तरह, अत्यधिक गरीबी में रहने वाले लोगों का अनुपात भी 5.6% से बढ़कर 9.35% हो गया है। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2025 में लगभग 30 लाख और लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं।

जब शेख हसीना सत्ता में थीं, तब बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था जीडीपी वृद्धि के मामले में मजबूत दिख रही थी। वर्तमान में, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार काम कर रही है, जहाँ गरीबी और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है। मुहम्मद यूनुस के कार्यकाल के पहले नौ महीनों में 21 लाख से ज्यादा नौकरियाँ खत्म हो गईं, जिनमें से अधिकांश महिलाओं की थीं।

बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर हमले और अत्याचार की घटनाएँ लगातार हो रही हैं। लूटपाट, मंदिरों पर हमले और धार्मिक मूर्तियों को निशाना बनाना आम बात हो गई है। यूनुस के शासन में, भारत के साथ संबंधों में तनाव भी बढ़ा है, जिससे हिंदुओं की स्थिति और भी नाजुक हो गई है। कुल मिलाकर, बांग्लादेश में यूनुस सरकार के आने के बाद से अपराध और आर्थिक चुनौतियों में कोई खास कमी नहीं आई है, जिससे वहाँ की जनता, खासकर बच्चों और अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

लाखों का रेप, करोड़ों का कत्लेआम… 1971 में पाकिस्तान ने खून तो बहाया, लेकिन करतूतों को लिए नहीं माँग रहा माफी: बांग्लादेश माँग रहा ₹3.75 लाख करोड़ का मुआवजा, मंत्री बोला – मामला पहले ही सुलझ चुका

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार के बांग्लादेश दौरे के बीच ‘संबंध सुधारने की कोशिश’ को धक्का लगा है। ढाका ने पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वह 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुए अत्याचारों के लिए माफी माँगे। उस वक्त पाकिस्तानी सेना ने लाखों बांग्ला भाषी नागरिकों की हत्या कर दी थी और अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। लेकिन पाकिस्तान ने माफी माँगने से साफ इनकार कर दिया है।

1971 के युद्ध के मुद्दे पर पाकिस्तान बोला

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शनिवार (23 अगस्त 2025) को ढाका दौरे पर आए डार ने कहा, “1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान पहले ही हो चुका है। 1974 में और फिर 2002 में।” उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच पिछले समझौतों और प्रयासों से इस मुद्दे को सुलझा लिया गया है।

ढाका ने माँगा 3.75 लाख करोड़ की क्षतिपूर्ति

यूनुस की अंतरिम सरकार में विदेश मंत्री तौहीद हुसैन ने डार के बयान को खारिज कर दिया। ढाका ने पाकिस्तान से अनुरोध किया कि वह 1971 के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुए अत्याचार के लिए माफी माँगे।आपको बता दें कि बांग्लादेश की आजादी के वक्त युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना ने सामूहिक नरसंहार किया था और हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। यूनुस सरकार ने पाकिस्तान से ‘अविभाजित पाकिस्तान’ की 1971 से पहले की संपत्ति में से बांग्लादेश को उसका हिस्सा यानी3.75 लाख करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की माँग की।

बांग्लादेश में 1971 का दर्द आज भी गहरा है। पाकिस्तानी सेना ने रक्तपात मचाया था जिसमें लाखों लोग मारे गए और अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। आधिकारिक माफी की माँग ढाका की विदेश नीति में शामिल है। हर बार जब दोनों देशों के बड़े नेता मिलते हैं तो ये माँग की जाती है। इस बार पाकिस्तानी विदेश मंत्री डार ने इस मुद्दे को ‘ऐतिहासिक रूप से सुलझा लेने’ की बात कही है। जबकि बांग्लादेश के विदेश मंत्री हुसैन इससे सहमत नहीं दिख रहे हैं।

तनाव के बावजूद समझौतों पर हस्ताक्षर

इन मतभेदों के बावजूद, दोनों देशों ने सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौते किए। इनमें आधिकारिक और राजनयिक पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा आवश्यकता से छूट, व्यापार समझौता, विदेश सेवा संस्थानों के बीच सहयोग, राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के बीच सहयोग और थिंक टैंकों के बीच सहयोग शामिल हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम पर भी सहमति बनी।

दूसरे विश्व युद्ध में जापान को हराने को लेकर भिड़े चीन के राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट, ताइवान और CCP ने किए अपनी जीत के दावे: जानें क्या है इतिहास

दूसरे विश्व युद्ध के खत्म हुए 80 साल हो गए हैं लेकिन चीन और ताइवान अभी भी इस युद्ध में ‘किसने क्या किया’ को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं। बीजिंग में होने वाली विक्ट्री डे परेड से पहले चीन और ताइवान के बीच यह बयानबाजी और तेज हो गई है।

ताइवान की राजधानी ताइपे में एक कार्यक्रम में, 99 वर्षीय अनुभवी पान चेंग-फा ने कहा कि उन्होंने जापान के खिलाफ दूसरे विश्व युद्ध में चीन के लिए लड़ाई लड़ी थी। जब उनसे यह पूछा गया कि उस समय रिपब्लिकन सरकार के साथ जुड़े कम्युनिस्टों की भूमिका क्या थी, तो उन्होंने कहा, “हमने उन्हें हथियार और उपकरण दिए, हम उन्हें मजबूत बनाते रहे।”

चीन-ताइवान विवाद की पृष्ठभूमि

यह सब 1895 से शुरू हुआ। पहले चीन-जापान युद्ध में चीन का चिंग (Qing) वंश हार गया और शिमोनोसेकी संधि के तहत ताइवान पर जापान का कब्जा हो गया। 1911 में चीन में क्रांति हुई और चिंग वंश का अंत हो गया। अगले ही साल ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना हो गई।

चीन में 1927 में गृहयुद्ध शुरू हुआ जब कम्युनिस्ट पार्टी ने रिपब्लिकन सरकार के खिलाफ विद्रोह किया। 1931 में जापान ने चीन के उत्तर-पूर्वी हिस्से मंचूरिया पर कब्जा कर लिया।

रिपब्लिक ऑफ चाइना के नेता च्यांग काई शेक को 1936 में उनके ही दो जनरलों ने अगवा कर लिया ताकि उन्हें माओत्से तुंग के नेतृत्व वाले कम्युनिस्टों के साथ मिलकर जापान से लड़ने के लिए मजबूर किया जा सके।

जापान ने पूरे चीन में 1937 में हमला तेज कर दिया। लेकिन हालात जापान के खिलाफ गए। 1943 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और चीन के रिपब्लिकन नेता च्यांग काई शेक ने ‘काहिरा घोषणा’ पर हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया कि ताइवान को ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को वापस किया जाएगा।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के साथ दूसरा चीन-जापान युद्ध भी खत्म हुआ। जापान की हार कई कारणों से हुई, चीनी सेना की थकाऊ रणनीति, जापानी गलतियाँ और अंत में अमेरिका व अन्य मित्र राष्ट्रों का युद्ध में उतरना। 1945 की पॉट्सडैम घोषणा ने जापान के बिना शर्त आत्मसमर्पण और काहिरा घोषणा की पुष्टि की।

जापान के आत्मसमर्पण के बाद ताइवान रिपब्लिक ऑफ चाइना को सौंपा गया लेकिन 1946 में कम्युनिस्ट और रिपब्लिकन फिर से भिड़ गए और गृहयुद्ध शुरू हो गया। 1947 में ताइवान की जनता ने रिपब्लिक ऑफ चाइना के खिलाफ विद्रोह किया, जिसे कठोरता से दबा दिया गया।

जब माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट जीत गए और 1949 में ‘पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना हुई, तब च्यांग काई शेक ताइवान भाग गए और माओ ने ताइवान को मुक्त कराने की कसम खाई। आज ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को ही ताइवान कहा जाता है।

ताइवान एक विवादित क्षेत्र क्यों बना हुआ है?

1951 में जापान ने सैन फ्रांसिस्को शांति संधि पर हस्ताक्षर किए और ताइवान पर अपना दावा छोड़ दिया। लेकिन ताइवान की संप्रभुता का सवाल अब तक अनसुलझा है। चूंकि इस संधि में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) शामिल नहीं थी, इसलिए वह इसे गैरकानूनी और अमान्य मानती है।

1952 में रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC) और जापान ने शांति संधि पर हस्ताक्षर किए। इसमें जापान ने ताइवान पर अपने दावे से दोबारा हाथ खींच लिया। ताइवान की सरकार का कहना है कि इस समझौते से साफ होता है कि पिछली संधि के तहत ताइवान की संप्रभुता रिपब्लिक ऑफ चाइना (यानी उस समय की रिपब्लिकन सरकार) को मिली थी, न कि कम्युनिस्टों को। आज तक चीन और ताइवान की सरकारें एक-दूसरे को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं देतीं।

स्रोत: एबीसी न्यूज

चीनी रिपब्लिकन जापान के खिलाफ लड़े; कम्युनिस्टों ने श्रेय ले लिया: ताइवान ने CCP पर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया

दूसरे विश्व युद्ध के बाद की स्थिति पर बोलते हुए 99 साल के पान चेंग-फा ने कहा, “जापान को हराने के बाद कम्युनिस्टों का अगला निशाना रिपब्लिक ऑफ चाइना था।”

आज भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) यह प्रचार करती है कि जापान को हराने में उसकी मुख्य भूमिका थी। लेकिन हकीकत यह है कि च्यांग काई-शेक के नेतृत्व वाली रिपब्लिकन सरकार ने इसमें निर्णायक भूमिका निभाई थी।

काहिरा घोषणा (1943) और पॉट्सडैम घोषणा (1945), जिनमें ताइवान को चीन का हिस्सा बताया गया, च्यांग ने ही साइन की थीं। उस समय पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) का अस्तित्व भी नहीं था, क्योंकि वह 1949 में बना।

15 अगस्त को जापान के आत्मसमर्पण दिवस पर ताइवान के शीर्ष अधिकारी चिउ चुई-चेंग ने कहा  “रिपब्लिक ऑफ चाइना ने जापान के खिलाफ युद्ध लड़ा था, उस समय पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना अस्तित्व में भी नहीं था। लेकिन हाल के वर्षों में CCP लगातार झूठ फैलाती रही है कि उसने ही जापान को हराया।”

चिउ ने दावा किया कि उस समय कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति ‘70% खुद को मजबूत करने, 20% रिपब्लिकन सरकार से लड़ने और सिर्फ 10% जापान का विरोध करने’ पर आधारित थी। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने भी कहा, “इतिहास गवाह है कि जापान के खिलाफ युद्ध रिपब्लिक ऑफ चाइना ने जीता था।”

ताइपे में रक्षा मंत्रालय के कार्यक्रम में कलाकारों ने रिपब्लिकन सैनिकों की वेशभूषा में प्रस्तुति दी और अमेरिकी पायलट फ्लाइंग टाइगर्स की तस्वीरें भी दिखाई गईं। यह बात CCP को नागवार गुजरी।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ताइवान पर आरोप लगाया कि वह द्वितीय चीन-जापान युद्ध में CCP की भूमिका को गलत तरीके से पेश कर रहा है। CCP के अखबार पीपुल्स डेली ने लिखा कि इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि CCP की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं थी।

CCP का दावा है कि जापान पर जीत सबकी साझा थी और 1945 के समझौते से ताइवान चीन को लौटा। लेकिन ताइवान कहता है कि यह समझौता रिपब्लिक ऑफ चाइना और च्यांग काई-शेक ने साइन किया था, न कि माओ या CCP ने। CCP का कहना है कि वह रिपब्लिक ऑफ चाइना की वैध उत्तराधिकारी है और ताइवान चीन का अभिन्न हिस्सा है।

चीन और ताइवान लंबे समय से इतिहास को लेकर जुबानी जंग लड़ रहे हैं, लेकिन मौजूदा समय में यह टकराव और तेज हो गया है। चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति दिखा रहा है और ताइवान को परोक्ष रूप से धमका रहा है, जबकि ताइवान कह रहा है कि वह CCP की आक्रामकता का जवाब देगा।

मौजूदा हालात बताते हैं कि भविष्य में चीन और ताइवान के बीच सैन्य संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फर्क बस इतना होगा कि इस बार अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा होगा, न कि CCP के साथ।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।)

गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है… जब बच्ची के चुटकुला सुनाने पर फायर हुआ AIR का पूरा स्टाफ: राहुल गाँधी याद करें 37 साल पुरानी घटना, आज बच्चों से ‘वोट चोर’ बुलवाकर हो रहे चौड़े

साल 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला कैंपेन फेल होने के बाद राहुल गाँधी ने अब केंद्र सरकार पर नए इल्ज़ाम लगाने शुरू किए हैं। वो चाहते हैं कि किसी भी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी छिन जाए और वो सत्ता पर काबिज हो जाए। इसके लिए वो लगातार ऊल-जलूल आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर भी रहे हैं, मगर अफसोस, हर बार वो मुँह के बल गिरते दिखते हैं।

सत्ता पाने की बौखलाहट में राहुल गाँधी न सिर्फ बिहार एसआईआर को लेकर फर्जी दावे करते दिखे और बल्कि उन्होंने फर्जी आँकड़ों के साथ प्रेस-कॉन्फ्रेंस भी कर डाली। हालाँकि जब आँकड़ों की सच्चाई दुनिया के सामने आ गई, तो उनका मुँह नहीं खुला, और न ही माफी माँगी.. बल्कि उस शर्मिंदगी को पीछे छोड़ने की कोशिश में एक और हरकत कर डाली। कभी ‘चौकीदार…’ वाले नारे पर मुँह की खाने के बाद अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर वो लोगों को भड़का रहे हैं।

इसी कड़ी मेंकॉन्ग्रेस की अगुवाई वाला पूरा विपक्ष अब ‘वोट चोरी’ वाला कैंपेन चला रहा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग, मोदी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है और बीजेपी के फायदे के लिए आम लोगों के वोटिंग के हक को छीनने की साजिश रच रहा है।

महागठबंधन भी बिहार में होने वाले चुनावों से पहले चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मुहिम से नाराज़ है। इस मुहिम में 65 लाख फर्जी वोटरों को हटाया गया, जिससे वोटिंग की प्रक्रिया साफ-सुथरी होगी। लेकिन विपक्ष का गुस्सा इस बात पर है कि ये फर्जी वोटर उनके I.N.D.I. गठबंधन के समर्थक थे।

खास बात ये है कि चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से कहा कि वो अपने इल्ज़ामों के सबूत के साथ हलफनामा दें या फिर सार्वजनिक माफी माँगें। लेकिन राहुल ने कहा, “मैं एक नेता हूँ, जो मैं लोगों से कहता हूँ, वही मेरा वचन है। मैंने ये बात सबके सामने कही, इसे कसम मान लो। खास बात ये है कि उन्होंने मेरी बात का खंडन नहीं किया।” ये विपक्ष की वही पुरानी चाल है, जिसमें वो इल्ज़ाम लगाकर भाग जाते हैं।

बच्चों को अपनी राजनीति में घसीट रहे हैं राहुल गाँधी

उम्मीदों के मुताबिक, इस बार भी रायबरेली के सांसद राहुल गाँधी का बनाया हुआ राजनीतिक ड्रामा हकीकत से कोसों दूर है। अब वो कह रहे हैं कि बच्चे भी उन्हें ‘वोट चोरी’ की बात बता रहे हैं।

24 अगस्त को बिहार के अररिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने कहा, “एक बहुत ही मजेदार बात सामने आ रही है, जो मेरी पिछली दो यात्राओं में नहीं थी। बच्चे मेरे पास आ रहे हैं। ये बहुत अजीब बात है। वो कह रहे हैं, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’। ये बड़े लोग नहीं हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं। अब छह साल का एक बच्चा ये बात समझ गया, और सिर्फ एक नहीं, हज़ारों बच्चे। अब चुनाव आयोग को इन बच्चों से जाकर बात करनी चाहिए। उन्हें सब पता चल जाएगा।”

राहुल ने आगे कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले सरकारी कंपनियों को प्राइवेट किया, अब वो चुनाव आयोग की मदद से गरीबों के वोट चुराना चाहती है।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष बिहार में ऐसा नहीं होने देगा। उन्होंने कहा, “संविधान हर नागरिक को बराबर हक देता है। ये एसआईआर संविधान के खिलाफ है। बिहार के लोग विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों को करारा जवाब देंगे।”

जब एक बच्ची ने सचमुच राजीव गाँधी को कहा था चोर

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने बच्चों के नाम पर अपनी झूठी कहानियाँ और गलत मकसद फैलाए हों। 1988 में एक बड़ी घटना हुई थी, जब एक बच्ची ने ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को चोर कहा था।

राहुल गाँधी शायद भूल गए हों कि एक बच्ची ने उनके पिता के लिए कहा था, “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है।” ये बात एक लाइव शो में कही गई थी। मजेदार बात ये है कि ‘फासिस्ट’ कहलाने वाली बीजेपी सरकार ऐसी बातों पर कोई कार्रवाई नहीं करती, लेकिन ‘उदार और लोकतांत्रिक’ राजीव गाँधी और उनकी पार्टी ने उस वक्त इसका जवाब बहुत सख्ती से दिया था।

साल 1988 में “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है” का नारा राजीव सरकार के खिलाफ बहुत मशहूर हो गया था। ये बोफोर्स घोटाले के खुलासे के बाद हुआ था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन पर एक प्रोग्राम हुआ, जिसमें एक छोटी बच्ची से मजाक सुनाने को कहा गया। उसने जवाब में यही नारा बोल दिया। iChowk.in के मुताबिक, इस प्रोग्राम को आयोजित करने वाली ऑल इंडिया रेडियो की टीम को इसकी सजा भुगतनी पड़ी। लेकिन और भी बुरा होना बाकी था।

इस घटना के बाद सागर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया – “कौन सा ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन ‘राजीव गाँधी चोर है’ वाक्य प्रसारित करने के लिए जाना गया?” ये सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड, प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय के लिए बहुत भारी पड़ा। कॉन्ग्रेस ने उन्हें जमकर निशाना बनाया।

यूथ कॉन्ग्रेस के लोग पत्रकारिता विभाग में घुस गए और प्रोफेसर को पीटा। उनका मुँह काला किया गया और पूरे कैंपस में घुमाया गया। सागर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रायग दास हजेला ने इस घटना के विरोध में इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, “ये सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं है। देश में राजनीति में गुंडागर्दी को जोड़ने की कोशिश हो रही है।”

यूनिवर्सिटी ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू की और सभी फैकल्टी मेंबर्स ने क्लास का बहिष्कार किया, जब तक कि प्रोफेसर के अपमान के जिम्मेदार लोगों को पकड़ा नहीं गया। पुलिस ने 10 लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफेसर के खिलाफ जाँच शुरू कर दी। उन्हें जवाब देने के लिए बुलाया गया, लेकिन पुलिस ने उन्हें और परेशान किया।

प्रोफेसर कृष्णात्रेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और 504 के तहत गिरफ्तार किया गया। उन पर अशोभनीय व्यवहार, अपमान और शांति भंग करने के इल्ज़ाम लगाए गए। इस कार्रवाई की हर तरफ निंदा हुई। 8 अगस्त को प्रोफेसर ने अपनी सफाई में कहा, “मुझे इस सवाल से जुड़ी समस्याओं की जानकारी नहीं थी। मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। मैंने ये सवाल इसलिए पूछा क्योंकि ये एक बड़ी घटना थी, और मैं उम्मीदवार की सतर्कता और याददाश्त जाँचना चाहता था।”

लेकिन 8 अगस्त की सुबह, जिला यूथ कॉन्ग्रेस के प्रमुख राकेश शर्मा की अगुवाई में एक भीड़ वाइस चांसलर के दफ्तर पहुँची और हजेला पर चिल्लाने लगी। वो तुरंत कृष्णात्रेय को हटाने की माँग कर रहे थे। हजेला ने मना कर दिया और कहा, “उनके खिलाफ कोई कार्रवाई जाँच पूरी होने और 17 अगस्त 2025 को यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद में रिपोर्ट पेश होने के बाद ही होगी। मैं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकता क्योंकि कुछ नेता चाहते हैं।”

इस बीच, शर्मा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के गलत काम को खारिज किया और कहा कि प्रोफेसर ने खुद ऐसा किया और तस्वीरें भी खिंचवाईं। दूसरी तरफ कृष्णात्रेय अपने चेहरे पर काला पेंट लिए बिना ही इलाज के बाद घर लौटे। उसी शाम वो टीचर्स यूनियन की मीटिंग में भी उसी हालत में गए। एक और प्रोफेसर ने उनके समर्थन में अपना चेहरा काला किया।

अगले दिन से टीचर्स ने हफ्ते भर तक क्लास का बहिष्कार करने का फैसला किया, जब तक कि जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाता। लेकिन गवर्नर ने यूनिवर्सिटी की कार्यकारी और शैक्षणिक परिषद को भंग कर दिया और सारी ताकत नए वाइस चांसलर एमएल जैन को दे दी। इसके बाद कैंपस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

कॉन्ग्रेस जोसेफ गोएबल्स की प्रचार नीति से प्रेरणा ले रही है और बीजेपी पर वही इल्ज़ाम लगा रही है, जो उसकी अपनी भ्रष्टाचार भरी हुकूमत में उस पर लगे थे। बच्चों के नाम पर पीएम मोदी पर हाल का हमला भी उसी का हिस्सा है।

टेलर मोहम्मद सलीम ने गला घोंटकर हिंदू युवती को उतारा मौत के घाट, शव नाले में फेंक भागा: दिल्ली में 2 दिन बाद सड़ी-गली मिली लाश, हाथ के टैटू से हुई पहचान

पश्चिमी दिल्ली के डाबड़ी इलाके में टेलर मोहम्मद सलीम ने 22 साल की हिंदू युवती की गला घोंटकर हत्या कर दी। हत्या के दो दिन बाद युवती का बोरे में सड़ा गला शव नाले में पड़ा मिला। हाथ में बने टैटू से शव की पहचान की गई। मामले की जाँच के बाद पुलिस ने आरोपित को हरदोई से गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला 23 अगस्त 2025 को सामने आया। जब दोपहर करीब 2.54 बजे दिल्ली पुलिस को PCR कॉल के जरिए एक युवती का बोरे में शव मिलने की सूचना मिली। सूचना पर पुलिस डाबड़ी थाना क्षेत्र में मिले शव की लोकेशन पर पहुँची। पुलिस ने बोरे में मिले युवती के शव की जाँच शुरू की। पुलिस की शुरुआती जाँच में युवती की पहचान लापता के रूप में हुई।

पुलिस ने बताया युवती की माँ ने 21 अगस्त 2025 को गुमशुदगी का मामला दर्ज करवाया था। युवती के हाथ पर बने टैटू के आधार पर शव की शिनाख्त की गई। शव की पहचान 22 वर्षीय रूपा नाम से हुई, वह मेड का काम करती है। रूपा 21 अगस्त 205 को सुबह 10.30 बजे अपने घर से निकली थी और वापस नहीं लौटी। पुलिस के अनुसार घर से निकलने के दौरान वह अपने फोन पर किसी से बात कर रही थी।

पुलिस ने हत्या मामले में जाँच शुरू की। आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले। कैमरे में रूपा को आखिरी बार महावीर एन्क्लेव में आरोपित 35 वर्षीय सलीम के साथ एक बिल्डिंग में घुसते देखा गया। कुछ देर बाद उसी बिल्डिंग से सलीम बाहर निकला, उसके हाथ में रूपा का छिपा हुआ शव भी दिखा।

पुलिस ने बताया कि सलीम युवती के शव को बाइक पर रखकर ठिकाने लगाने जा रहा था लेकिन रास्ते में शव बाइक से फिसल गया। सलीम हड़बड़ी में शव को नाले में फेंककर फरार हो गया। पुलिस ने सलीम को हरदोई से गिरफ्तार कर लिया है।

पैसे के लेनदेन में की हत्या

पुलिस ने आरोपित सलीम को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू कर दी है। शुरुआती जाँच में हत्या का कारण पैसे का लेनदेन सामने आया है। पुलिस ने बताया कि सलीम काफी समय से युवती को जानता था। सलीम के पास युवती के पैसे बकाया था, जिसे युवती वापस माँग रही थी।

इसी बात पर दोनों की बहस भी हुई थी। गुस्से में आकर सलीम ने युवती का गला घोंट दिया। इसके बाद युवती की लाश को बाइक पर ले जाकर नाले में फेंक दिया। इसके बाद पकड़े जाने के डर से हरदोई फरार हो गया।

पुलिस ने आरोपित सलीम पर हत्या में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस आरोपित से पूछताछ कर रही है और यह जानने की कोशिश में है क्या हत्या में कोई और भी शामिल था। उधर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर आगे की जाँच भी शुरू कर दी है।

फिजी में हिंदू मंदिरों पर बढ़े हमले, 1 दिन में चोरी हुई हनुमान जी की 9 मूर्तियाँ: वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन ने PM मोदी से लगाई मदद की गुहार तो खुली सरकार की नींद, डिप्टी पीएम बोले- हमलावरों को देंगे सजा

फिजी में हाल के दिनों में हिंदू मंदिरों और धार्मिक प्रतीकों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आई हैं। इन हमलों को लेकर न सिर्फ फिजी के हिंदू समुदाय में गुस्सा है, बल्कि अब वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन (Pacific) ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी हस्तक्षेप की माँग की है। इस बीच, फिजी के उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका ने सख्त बयान देते हुए कहा कि ऐसे कृत्य अब बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।

जानकारी के अनुसार, 22 अगस्त 2025 को नाडी और कोरोसिरी इलाकों में कुल 9 मूर्तियाँ चोरी हुईं, जिनमें सभी भगवान हनुमान की मूर्तियाँ थीं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ तीन अलग-अलग घरों से चुराई गईं और कुछ मामलों में मंदिरों को भी निशाना बनाया गया। पुलिस ने इन घटनाओं की पुष्टि की है और बताया कि एक टीम संदिग्धों की पहचान करने के लिए दिन-रात जाँच में जुटी है।

कार्यवाहक प्रधानमंत्री का सख्त रुख

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिजी के उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका ने एक हिंदू एकता सभा में बोलते हुए, देश भर में धार्मिक स्थलों की बेअदबी की कड़ी निंदा की। उन्होंने सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा, “यदि आप इन कृत्यों में विश्वास करते हैं, तो फिजी आपके लिए सही जगह नहीं है।” उन्होंने हिंदू समुदाय को भरोसा दिलाया कि सरकार सभी नागरिकों को एकजुट करने और उनके पूजा करने के अधिकार की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत करेगी।

उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका ने प्रधानमंत्री सिटिवेनी राबुका की ओर से भी संदेश दिया, जो इस समय भारत की यात्रा पर हैं। कामिकामिका ने कहा कि सरकार धार्मिक स्थलों पर हमलों के प्रति ‘शून्य सहिष्णुता’ यानि जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाएगी। उन्होंने इस सभा को सामाजिक विश्वास और मेल-मिलाप को बढ़ावा देने वाली ‘राष्ट्र निर्माण की पहल’ बताया।

भारत से मदद की अपील

जानकारी के अनुसार, वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन (पैसिफिक) ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि वे इस मामले को फिजी के प्रधानमंत्री सिटिवेनी राबुका के सामने उठाएँ। फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ सुनील कुमार ने हमलों पर ‘गहरी चिंता’ व्यक्त करते हुए कहा कि मंदिरों और घरों से पवित्र शिवलिंग और मूर्तियों की चोरी और हिंदू समुदाय के खिलाफ बर्बरता की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।

डॉ सुनील कुमार ने फिजी की सरकार पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बार-बार निंदा के बावजूद इस तरह के अपराध ‘चिंताजनक आवृत्ति’ के साथ जारी हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री राबुका से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उनकी सरकार हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी। फेडरेशन ने फिजी सरकार से सभी धार्मिक समूहों की सुरक्षा के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने का आग्रह किया है ताकि शांति, आपसी सम्मान और बहु-नस्लीयता के मूल्यों को बनाए रखा जा सके।

पाकिस्तान में एक साल में 1000 हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण, जबरन इस्लाम कबूल कर करवाया जा रहा निकाह; ईशनिंदा कानून के बाद हिंदुओं पर बढ़े अत्याचार

पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण किया जाता है और उनका जबरन धर्मांतरण कराया जाता है। मूवमेंट फॉर सॉलिडैरिटी एंड पीस ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि इन लड़कियों की उम्र करीब 12 से 25 साल के बीच होती है। स्थिति ये है कि पुलिस ऐसा मामलों में कार्रवाई नहीं करती।

एक दूसरे मानवाधिकार संस्था जुबली कैंपेन और ओपन डोर्स ने दावा किया है कि अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मांतरण के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। 2024 में 10 साल और उससे ऊपर की कई लड़कियाँ का अपहरण किया गया था। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक कई लड़कियाँ ऐसी त्रासदी झेलने के बाद मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो गईं। जबकि आरोपित खुले में घूम रहा होता है। कोर्ट अक्सर ऐसे मामले में आरोपित की ये दलीलें मान लेती है कि लड़की ने अपनी मर्जी से धर्मपरिवर्तन कर निकाह किया था।

ईशनिंदा कानून का अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहा इस्तेमाल

इस इस्लामिक मुल्क में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहद खराब है। द वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने इस पर गंभीर चिंता भी जताई है। संगठन का कहना है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून लागू होने के बाद, इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को धमकाने और हिंसा भड़काने के लिए किया जा रहा है। ‘डर की गलियाँ: 2024-25 में धर्म या आस्था की स्वतंत्रता’ शीर्षक से रिपोर्ट जारी कर संगठन ने कहा है कि हिन्दुओं, ईसाईयों, अहमदियों के लिए ये ‘बेहद चिंताजनक साल’ रहा। इनके खिलाफ हिंसा में जबरदस्त बढोतरी हुई। इनके पूजा स्थलों को तोड़ा गया और टारगेट कर हत्याएँ की गई।

बच्चों के बचाव के लिए बने कानूनों का कोई मतलब नहीं

संगठन ने कहा है कि अल्पसंख्यकों का जबरन धर्मांतरण और कम उम्र में निकाह जारी है। बाल विवाह निरोधक कानूनों का कोई मतलब यहाँ नहीं है। ईशनिंदा कानून आने के बाद अल्पसंख्यकों की स्थिति और दयनीय हो गई है। इस्लामी भीड़ किसी को भी इसका शिकार बना देते हैं। कोर्ट में बार एसोसिएशन भी इनका पक्ष लेता है। कट्टरपंथी सोच के खिलाफ कोई नहीं बोलता। रिपोर्ट में इस स्थिति को ‘बेहद खतरनाक’ कहा गया है। रिपोर्ट में पाकिस्तान सरकार से एक ऐसे आयोग बनाने की सिफारिश की गई है, जो अल्पसंख्यकों को फँसाने वाले मामलों की जाँच करे। रिपोर्ट में मदरसों पर भी नजर रखने पर जोर दिया गया है। ये नाबालिग लड़कियों के धर्मांतरण में शामिल हैं।

वहीं अमेरिका के ‘ सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट’ के अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, ईसाई, अहमदिया और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों का सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है।

2023 में नाबालिग मुस्कान बनी थी शिकार

घटना का जिक्र करते हुए कहा गया है कि मई 2023 में 14 साल की मुस्कान का मोहम्मद अदनान और उसके पिता ने अपहरण कर लिया। उसका जबरन धर्मांतरण करवा कर निकाह करवा दिया गया।2 साल बाद किसी तरह भाग गई मुस्कान ने बताया कि उसे लोहे के छड़ से पीटा जाता था। उसका एक बार गर्भपात भी इसकी वजह से हुआ। ईसाइयों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।

4 भाई-बहनों का धर्मांतरण करवाया गया

19 जून 2025 को सिंध के शाहदादपुर से 4 हिन्दू भाई-बहनों का अपहरण किया गया। इनमें सबसे बड़ी जिया 22 साल की, दूसरी दीया (20), दिशा ( 16) और गणेश कुमार (14) था। अपहरण के दो दिन बाद इनका वीडियो सामने आया। इसमें चारो नए नामों के साथ नमाज पढ़ रहे थे। परिवार का इसके बाद बुरा हाल है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि बच्चों से कैसे मिल पाएँगे?

गाँधी, गोडसे और संविधान… कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी एक ही बार में बोल गए सब पर झूठ: जानिए वायरल हो रहे बयान का क्या है पूरा सच

बिहार के कटिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महात्मा गाँधी, नाथूराम गोडसे और भारतीय संविधान को लेकर एक के बाद एक कई झूठ बोले, जिसने उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना दिया है। हाथ में संविधान की लाल किताब लेकर, राहुल गाँधी ने दावा किया कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की क्योंकि वह संविधान से नफरत करता था और महात्मा गाँधी ने इसी संविधान के लिए अपना जीवन दिया।

हालाँकि, उनके ये दावे ऐतिहासिक तथ्यों के आगे टिक नहीं पाते। हकीकत यह है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी, तब भारतीय संविधान का मसौदा (ड्राफ्ट) भी सामने नहीं आया था। नाथूराम गोडसे को भी संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दी जा चुकी थी। राहुल गाँधी का यह बयान सच्चाई से कोसों दूर है।

महात्मा गाँधी की हत्या और संविधान का अस्तित्व

राहुल गाँधी ने दावा किया कि गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की, क्योंकि गोडसे संविधान से नफरत करता था और गाँधी जी ने संविधान के लिए अपना पूरा जीवन दिया। यह दावा पूरी तरह से निराधार है।

बता दें कि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। भारतीय संविधान को भारतीय संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अपनाया था और यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था।

इन तारीखों से यह स्पष्ट है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई, तब भारत का संविधान अस्तित्व में नहीं था। संविधान का पहला मसौदा (ड्राफ्ट) भी गाँधी जी की हत्या के एक महीने बाद, यानी 21 फरवरी 1948 को प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार, यह कहना पूरी तरह से बेतुका है कि गोडसे ने उस चीज से नफरत की, जो उस समय मौजूद ही नहीं थी और गाँधी ने ऐसी चीज का बचाव किया, जिसका अस्तित्व उनके जीवनकाल में नहीं था।

गोडसे की फाँसी और संविधान का लागू होना

राहुल गाँधी का दूसरा बड़ा झूठ यह था कि गोडसे की नफरत संविधान से थी, जिसके कारण उसने गाँधी जी को गोली मारी। सच्चाई तो यह है कि गोडसे को संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दे दी गई थी।

दरअसल, 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए फाँसी दी गई थी। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था, यानि गोडसे को फाँसी दिए जाने के दो महीने बाद।

यह तथ्य ही राहुल गाँधी के पूरे कथन को खोखला साबित कर देता है। गोडसे को भारतीय गणराज्य द्वारा संविधान अपनाए जाने से पहले ही सजा मिल चुकी थी। ऐसे में, यह दावा कि उसकी नफरत संविधान से थी, हास्यास्पद है।

महात्मा गाँधी जी और संविधान सभा में उनकी भूमिका

राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया। यह बात भी ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो महात्मा गाँधी ने खुद को संक्रमण प्रक्रिया से अलग कर लिया था। वह न तो अंतरिम सरकार का हिस्सा थे और न ही संविधान सभा के सदस्य थे। महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि इसका गठन वायसराय ने किया है और यह ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई है।

महात्मा गाँधी इसे एक सार्वभौम (Sovereign) सभा नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखा और इसमें शामिल नहीं हुए। महात्मा गाँधी ने कुछ विशिष्ट प्रस्ताव जरूर दिए थे, जैसे कि ग्राम-आधारित शासन मॉडल, जिसे ग्राम स्वराज के नाम से जाना जाता है। महात्मा गाँधी के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र गाँव की संस्थाओं में निहित होता है, जो आत्मनिर्भर और स्वशासित हों।

संविधान निर्माण का काम मुख्य रूप से डॉ बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति ने किया था। ऐसे में, यह दावा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया, सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।

RSS और बीजेपी पर राहुल गाँधी का आरोप

राहुल गाँधी ने यह भी दावा किया कि RSS और बीजेपी ने संविधान को नहीं बनाया। दरअसल, बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था, जबकि संविधान 1950 में लागू हो गया था। इसलिए, बीजेपी की संविधान बनाने में कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह एक बेतुका दावा है। RSS एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और उसकी संविधान निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।

राहुल गाँधी के ये दावे न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं, बल्कि वे एक बड़ी झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। राहुल गाँधी की ये टिप्पणियाँ, जिसमें वह संविधान की प्रति हाथ में लेकर झूठे दावे कर रहे थे, न केवल देश के इतिहास को गलत तरीके से पेश करती हैं, बल्कि महात्मा गाँधी और संविधान के महत्व को भी कम करती हैं। राहुल गाँधी हमेशा से अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ के पेश करते हैं, जिसका मजाक वो खुद ही बनकर रह जाते हैं।

फर्जी गैंगरेप केस में BJP नेता को फँसाने का हो रहा था प्रयास, अश्लील वीडियो दिखा दी जा रही थी धमकी: UP पुलिस ने किया पर्दाफाश, 1 महिला समेत 3 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में भारतीय जनता पार्टी के नेता वीरेंद्र शुक्ला और सरकारी अधिवक्ता प्रवेश त्रिपाठी को फर्जी गैंगरेप मामले में फँसाने की साजिश का खुलासा हो गया है। पुलिस ने साजिश रचने वाले तीन लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इनमें एक महिला भी है, जिसने बीजेपी नेता के खिलाफ फर्जी रेप केस दर्ज करवाया था।

भदोही पुलिस अधीक्षक (SP) अभिमन्यु मांगलिक ने रविवार (24 अगस्त 2025) को प्रेस वार्ता कर मामले को सुनियोजित साजिश बताया। पुलिस के अनुसार, यह साजिश बीजेपी नेता वीरेंद्र शुक्ला के भाई अशोक शुक्ला और भतीजे कैलाशपति शुक्ला को फँसाने के लिए रची गई थी। साजिश में सुशील दुबे भी शामिल था।

इन लोगों ने अयोध्या की रहने वाली सुमन पांडेय नाम की महिला से झूठे दुष्कर्म मामले की तहरीर दिलवाई थी। लेकिन पुलिस की जाँच में बीजेपी नेता पर दुष्कर्म के आरोप झूठे साबित हुए। साथ ही पुलिस पूछताछ में बीजेपी नेता को फँसाने के पीछे दो मकसद भी सामने आए।

पुलिस ने बताया कि आरोपितों का मकसद बीजेपी नेता पर झूठा मुकदमा दर्ज कर पैसे ऐंठना था, जिसे हनीट्रैप से भी जोड़ा गया है। इसके अलावा बीजेपी नेता के भाई अशोक शुक्ला पर दर्ज प्रॉपर्टी से संबंधित मुकदमों को निपटाने का भी दबाव बनाने के चलते भी साजिश रची गई थी।

बीजेपी नेता को फोन पर दी धमकी

बीजेपी नेता को झूठे गैंगरेप केस में फँसाने वाले आरोपितों का एक गैंग है। पुलिस ने बताया कि ये लोग पेशेवर तरीके से लोगों को झूठे मुकदमों में फँसाकर उनसे वसूली करता था। बीजेपी नेता के मामले भी पूरी प्लानिंग की गई थी।

महिला सुमन पांडेय बीजेपी नेता को फोन पर धमकी दे रही थी। वहीं बाकी साजिशकर्ता एक पुराना अश्लील वीडियो वायरल कर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने जब गहराई से जाँच की तो साफ हुआ कि पूरा मामला बीजेपी नेता और सरकारी अधिवक्ता को झूठे केस में फँसाने की सोची-समझी साजिश थी।

पुलिस ने साजिशकर्ता अशोक शुक्ला, उसके सहयोगी सुशील दुबे और महिला सुमन पांडेय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। वहीं अशोक शुक्ला का बेटा कैलाशपति शुक्ला फिलहाल फरार है। चारों आरोपितों के खिलाफ धारा 217, 351(3), 308 (7) और 61 (2)a के तहत मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।

औलाद पाने की चाह में मुस्लिम महिला पहुँची मुश्ताक के पास, झाड़-फूँक के नाम पर हुआ रेप: मीडिया ‘तांत्रिक’ लिखकर कर रहा हिंदुओं को बदनाम, तलाश में जुटी पुलिस

उत्तर प्रदेश के मथुरा में झाड़फूंक करने वाले मुस्लिम ‘आलिम’ मुश्ताक अली ने एक महिला से रेप कर उसे जान से मारने की धमकी दी है। इस महिला की कोई औलाद नहीं है और इसी के लिए वह मुश्ताक से उपाय पूछने गई थी।

इसके बाद मुश्ताक ने कमरे में अगरबत्ती जलाकर धुआँ कर दिया और एक घंटे तक उसका रेप किया। उसने महिला को धमकी भी दी कि अगर उसने किसी को बताया वह उसकी हत्या करवा देगा। वहीं, इस खबर के सामने आने के बाद मीडिया ने वही पुराना राग अलापते हुए मुश्ताक को तांत्रिक बताना शुरू कर दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आगरा की रहने वाली और वह नौहझील में मुश्ताक से उपाय पूछने गई थी। पीड़िता का कहना है, “निकाह के 8 साल बाद भी मेरी कोई औलाद नहीं हुई। मुझे बताया गया कि नौहझील, मथुरा में बटन वाली गली, मस्जिद के पास रहने वाला मुश्ताक अली इसका इलाज कर सकता है। इससे मेरा बच्चा हो सकता है। इस पर विश्वास कर करीब 1 महीने पहले मैं अपनी ननद के साथ तांत्रिक के पास गई। उसने कहा कि हर जुमेरात (गुरुवार) मुझे वहाँ आना होगा।”

महिला का कहना है कि दूसरी बार जब वह अपने शौहर के साथ वहाँ गई। वहाँ पहुँचने के बाद मुश्ताक उसे एक कमरे में ले गया और कहा, “मैंने तुम्हें मना किया था कि ननद के अलावा किसी और को साथ मत लाना।”

गुरुवार (21 अगस्त 2025) को वह अपनी ननद के साथ फिर से उसके घर गई। वहाँ वह उसे एक कमरे में ले गया और दरवाजा बंद कर दिया, उसने कमरे में अगरबत्ती जला कर धुआँ फैला दिया।

इसका फायदा उठाकर मुश्ताक उसने उसके साथ रेप किया। महिला ने कहा, “मैंने शोर मचाने की कोशिश की लेकिन आवाज नहीं निकल पा रही थी। उसने मुझे करीब 1 घंटे कमरे में बंद रखा। साथ ही धमकी दी कि अगर मैंने किसी को बताया तो मेरी ननद और शौहर की हत्या करवा देगा।”

महिला ने बताया कि वह किसी तरह अपनी जान बचाकर ननद के साथ अपने घर आगरा वापस आई और शौहर को घटना की जानकारी दी। पीड़ित महिला ने शनिवार (24 अगस्त 2025) को एसएसपी ऑफिस में आरोपित के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

एसपी ग्रामीण सुरेश चंद्र रावत के अनुसार, “महिला ने शिकायत दी है। इसके आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस की टीम दबिश दे रही है। आरोपित को जल्द गिरफ्तार किया जाएगा।”

मीडिया ने मुश्ताक को बताया ‘तांत्रिक’

इस खबर के सामने आने के बाद मीडिया ने आरोपित मुश्ताक को तांत्रिक बताना शुरू कर दिया। ऐसा मामला जहाँ पीड़िता मुस्लिम हो, उसके साथ रेप करने वाला आलिम मुश्ताक मुस्लिम को, उसे तांत्रिक बताना मीडिया की हिंदू विरोधी सोच पर सवाल खड़े करता है।

ऐसा कोई पहली बार भी नहीं हुआ है, वर्षों से ऐसे मामलों में मुस्लिम आरोपित को तांत्रिक लिखना, हवन-पूजन जैसे चित्रों का इस्तेमाल करना, जैसी चालें हिंदू विरोधी मीडिया चलता रहा है। ऐसे मामलों में जहाँ ना कोई तंत्र है, ना कोई मंत्र हैं, वहाँ तांत्रिक कहकर सिर्फ एक धर्म को बदनाम करने की साजिश ही है। पूरे धर्म को बदनाम करने के लिए हिंदुओं के खिलाफ चल रही इस साजिश को रोके जाने की जरूरत है।