कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर धांधली के बेबुनियाद आरोप लगाए हैं। इसमें विपक्ष के साथ-साथ विदेशी मीडिया भी उन्हें समर्थन दे रहा है। द वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जजीरा सहित कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने गुमराह करने वाले लेख प्रकाशित किए हैं ताकि ‘वोट चोरी’ के राहुल गाँधी के प्रोपेगेंडा को हवा दिया जा सके।
INDI गठबंधन के नेताओं ने 11 अगस्त 2025 को संसद से लेकर चुनाव आयोग मुख्यालय तक विरोध मार्च निकालकर हंगामा काटा। हालाँकि इस मार्च के लिए प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई थी। लिहाजा विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। धक्का मुक्की की स्थिति पैदा हो गई।
इस दौरान विपक्षी नेताओं ने यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि बल प्रयोग से उनकी आवाज दबाई जा रही है। तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद सांसद महुआ मोइत्रा और समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव जैसे कुछ नेता पुलिस बैरिकेड्स पर भी चढ़ गए थे।
इस घटना को द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘चुनावी अनियमितताओं का विरोध करने पर भारतीय सांसदों को हिरासत में लिया’ शीर्षक के साथ प्रकाशित किया ताकि विपक्ष के बेबुनियाद आरोपों को बल मिल सके।
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट
इसी तरह वाशिंगटन पोस्ट ने बिहार में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को शातिर तरीके से ‘विवादास्पद मतदाता सूची पुनरीक्षण’ बताया है।
‘वॉशिन्गटन पोस्ट’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट
अल जजीरा ने भी विरोध मार्च की रिपोर्टिंग में INDI गठबंधन के नेताओं के आरोपों को प्रमुखता दी है।
‘अल जजीरा’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट
इनके सुर में सुर मिलाते हुए ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (ABC) ने भी बिहार में मतदाता सूची संशोधन को “विवादास्पद” बताया।
ABC वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट
गौरतलब है कि राहुल गाँधी ने 7 अगस्त 2025 को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें चुनाव आयोग पर बीजेपी के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस पार्टी की चुनावी हार के लिए चुनाव आयोग और सत्ताधारी बीजेपी को दोषी ठहराया। बिना किसी प्रमाण 2024 के लोकसभा चुनावों को ‘फिक्स’ बता दिया।
राहुल गाँधी की रायबरेली में ‘फर्जी मतदाता’
इस दौरान राहुल गाँधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का जिक्र किया। कहा कि उनकी पार्टी ने यहाँ एक ‘आंतरिक सर्वेक्षण’ कर 1,00,250 मतों की ‘वोट चोरी’ पकड़ी है। उनका कहना था कि कर्नाटक को कॉन्ग्रेस में 16 सीट मिलने की उम्मीद थी। लेकिन वह 9 सीट ही जीत पाई और ऐसा ‘वोट चोरी’ से ही संभव है।
उनका कहना था कि उनकी पार्टी ने इस अप्रत्याशित हार का विश्लेषण करने के बाद पाया कि ‘वोट चोरी’ हुई थी। राहुल गाँधी ने सत्ता में आने पर चुनाव आयोग के अधिकारियों को ‘परिणाम’ भुगतने की धमकी भी दी।
राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मतदाता सूचियों में ‘मकान नंबर 0’ जैसी विसंगतियों का हवाला देते हुए, चुनाव आयोग पर फर्जी मतदाता बनाने का आरोप लगाया। लेकिन बाद में कुछ मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि राहुल गाँधी के खुद के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में भी बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में इस तरह की विसंगति है।
एक तरफ ‘फर्जी वोटरों’ का रोना, दूसरी तरफ SIR का विरोध
कॉन्ग्रेस पार्टी समेत पूरा INDI गठबंधन बिहार में SIR का विरोध कर रहा है। इस पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जा चुके हैं। हालाँकि शीर्ष अदालत ने मतदाता सूची संशोधन को नियमित प्रक्रिया और चुनाव आयोग का अधिकार बताते हुए रोक से इनकार कर दिया था।
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चुनाव आयोग राहुल गाँधी से उनके आरोपों पर शपथ देने को कह चुका है ताकि जाँच शुरू की जा सके। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता ने यह कहते शपथ पत्र देने से इनकार कर दिया कि एक नेता होने के कारण उनके कहे को ही शपथ के तौर पर लिया जाना चाहिए। इससे उनके आरोपों की ‘गंभीरता’ का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यही कारण है कि एक तरफ राहुल गाँधी मतदाता सूची में फर्जी लोगों का नाम जोड़ने का आरोप लगाते हैं, दूसरी तरफ मतदाता सूची से फर्जी, अयोग्य और मृत लोगों के नाम हटाए जाने का विरोध भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि बिहार में चुनाव आयोग की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया ने भारी विसंगतियाँ पकड़ी है।
आयोग ने पाया है कि सूची में 18 लाख मृत लोगों के नाम दर्ज थे। 7 लाख नाम डुप्लीकेट थे। इसके अलावा 26 लाख लोग ऐसे थे जो दूसरे जगहों पर जा चुके हैं।
तमिलनाडु के गीतकार और कवि वैरामुथु (Vairamuthu) ने भगवान श्रीराम पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। वैरामुथु ने कहा कि सीता को खोने के बाद श्रीराम ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया था। इस बयान के बाद बीजेपी ने वैरामुथु को ‘मूर्ख’ बताते हुए कहा कि वे अक्सर हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित करते रहते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वैरामुथु ने ये बयान तमिलनाडु से मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की मौजूदगी में दिया। जब वे तमिल कवि कंबन के नाम पर दिए गए एक पुरस्कार लेते समय दिया। कंबन ने ही रामायण के तमिल संस्करण ‘रामायणम्’ की रचना की थी।
वैरामुत्तु ने कहा, “सीता से अलग होने के बाद, राम ने मानसिक संतुलन खो दिया था, उन्हें नहीं पता था कि वो क्या कर रहे हैं। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 84 के मुताबिक, अगर किसी ने मानसिक बीमारी या दिमागी खराबी की वजह से कोई काम किया है तो वो अपराध नहीं माना जाता।”
उन्होंने तमिल संस्करण की रामायण के रचयिता कंबन के बारे कहा, “कंबन को भले ही कानून का ज्ञान न रहा हो, लेकिन वह समाज और मानव मन को जानते थे।” वे आगे कहते हैं, “राम को पूरी तरह से बेकसूर माना गया है, माफ कर दिया गया है। जिससे राम को इंसान बना दिया गया और कंबन को भगवान का रूप दे दिया गया।”
BJP ने वैरामुथु के बयान पर की आलोचना
वैरामुथु के इस बयान पर बीजेपी ने उनकी आलोचना की है। तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष नैनार नागेन्द्रन ने बयान पर सीएम स्टालिन पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या मुख्यमंत्री उनके इस बयान को स्वीकार करेंगे? वहीं, बीजेपी के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने वैरामुत्तु को ‘मूर्ख’ बता दिया।
नारायणन तिरुपति ने एक्स/ट्विटर पर पोस्ट कर लिखा, “मुझे वैरामुथु को मूर्ख कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है, क्योंकि वे मूर्ख हैं। ये मूर्ख खुद को भगवान से ऊपर समझते हैं और हर बात को सही ठहराते हैं।”
I don’t have any hesitation to call @Vairamuthu , a fool because he is a fool. He says Vali called Lord Ram a murderer & says Lord Ram was mentally ill and that is why he killed vali from his behind.
Vali was killed by Lord Ram for the filthy claim that his own brother’s wife…
बीजेपी नेता सीआर केसव ने वैरामुथु के बयान पर कहा, “वैरामुथु रामासामी पवित्र हिंदू देवताओं का अपमान करते हैं और हिंदू धर्म का बहुत गलत इस्तेमाल करते हैं। वो ऐसा बार-बार करते हैं और ये बहुत गलत है। वैरामुथु ने अपने नाम में ‘राम’ शब्द लगाया है, लेकिन अब वो कम्ब रामायण को गलत तरीके से समझकर भगवान राम को मानसिक रूप से बीमार बताते हैं।”
सोशल मीडिया पर एक बार फिर भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। साल 2023 की एक पुरानी वोटर लिस्ट का स्क्रीनशॉट वायरल कर दावा किया गया कि वाराणसी में एक आदमी के 48 बेटे हैं, वो भी एक ही घर में और कुछ तो बिल्कुल एक ही उम्र के है। इस लिस्ट को शेयर कर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
कॉन्ग्रेस समर्थकों और कुछ कथित पत्रकारों ने इसे सच बताकर खूब प्रचारित किया। लेकिन जब इस वायरल स्क्रीनशॉट दावे की पड़ताल की तो सच्चाई कुछ और ही निकली। दरअसल यह कहानी 2023 के वाराणसी नगर निगम चुनाव की है और 48 बेटों वाली बात एक धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, न कि कोई गड़बड़ी।
फैक्ट चेक: क्या रामकमल दास के 48 बेटे हैं?
सोशल मीडिया पर वायरल हुई वोटर लिस्ट के स्क्रीनशॉट में वाराणसी के वार्ड नंबर 51 की मतदाता सूची दिखाई गई है। इसमें एक ही पते पर रहने वाले कई मतदाताओं के पिता का नाम रामकमल दास लिखा गया है। इन सभी मतदाताओं की उम्र अलग-अलग है, जिससे यह दावा किया गया कि एक ही व्यक्ति के इतने सारे बेटे कैसे हो सकते हैं।
ये वाराणसी है… 50 बच्चों के पिता का नाम राजकमल दास.. सबसे छोटा बेटा राघ्वेन्द्र 28 साल का.. सबसे बड़ा बेटा बनवारी दास 72 साल का.. pic.twitter.com/6488ZBwIQr
यह दावा पूरी तरह से गलत और भ्रामक है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही यह लिस्ट 2023 के वाराणसी नगर निगम चुनाव की है, जिसमें 48 वोटरों के पिता के रूप में राम जानकी मठ के महंत स्वामी रामकमल दास वेदांती का नाम दर्ज है। ये सभी उनके बच्चे नहीं, बल्कि शिष्य हैं।
Fake news by PP Bajpai
Ramkamal Das is a religious guru and is unmarried. His ashram follows the Guru–Shishya tradition, in which his disciples list his name as their father, adhering to the tradition. pic.twitter.com/ZQBTDbWvmN
जब से बिहार में चुनाव आयोग ने SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन शुरू करने का ऐलान किया है, तभी से विपक्ष बौखला रहा है। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इससे वोटिंग लिस्ट में गड़बड़ियाँ हो रही हैं। 7 अगस्त 2025 को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वोटर लिस्ट से जानबूझकर छेड़छाड़ की जा रही है।
इसी गर्मा-गर्मी में 2 साल पुरानी एक वायरल तस्वीर सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि एक ही व्यक्ति के 48 बेटे हैं। इस फोटो को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें की जा रही हैं।
असली सच्चाई क्या है?
वायरल तस्वीर की सच्चाई जानने के लिए हमने गूगल पर खोज की। हमें कई बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म की खबरें भी मिलीं, जिनमें दैनिक जागरण, अमर उजाला और ईटीवी भारत शामिल है। इनमें सबसे पहले मई 2023 की एक रिपोर्ट पर ध्यान गया।
वायरल तस्वीर वाराणसी की वोटर लिस्ट की है। यह लिस्ट वार्ड नंबर 51 भेलूपुर की नगर निगम चुनाव के दौरान बनी थी। इसमें एक नाम है– रामकमल दास। उन्हें 48 लोगों का पिता बताया गया है।
अब जानिए असल बात। रामकमल दास एक साधु महात्मा हैं। वह शादीशुदा नहीं हैं। वह वाराणसी के राम जानकी मठ के महंत हैं। उनके साथ जो 48 लोग रहते हैं, वे उनके बेटे नहीं बल्कि शिष्य हैं। मठ में गुरु-शिष्य परंपरा चलती है। यहाँ शिष्य अपने गुरु को पिता जैसा मानते हैं।
जब ये शिष्य वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाते हैं तो पिता के नाम की जगह गुरु का नाम लिखते हैं। इसलिए सभी ने रामकमल दास का नाम पिता के तौर पर दिया। यह कोई धोखा या फर्जीवाड़ा नहीं है।
मठ के प्रबंधक ने भी यही बात बताई। उन्होंने कहा कि ये सभी शिष्य मठ में ही रहते हैं। कुछ तो आजीवन वहीं रहते हैं। उनकी पढ़ाई के कागजों में भी पिता के नाम पर गुरु का नाम होता है। पहले लिस्ट में 150 और नाम भी थे, लेकिन बाद में कुछ हटाए गए। अब कुल 48 शिष्यों का नाम लिस्ट में है।
हमने निर्वाचन आयोग की वेबसाइट से लिस्ट भी चेक की। B, 24/19 नाम के घर में 51 वोटर्स हैं। इनमें 48 ने रामकमल दास को पिता बताया है। यह जानकारी आपको भाग-5, संख्या-725 पर मिलेगी। कई की उम्र एक जैसी है- जैसे 13 लोग 37 साल के हैं। बाकी की उम्र भी 39, 40 या 42 साल है।
रामकमल दास किसी के जैविक पिता नहीं हैं। जो नाम उनके नीचे लिखे हैं, वे शिष्य हैं, बेटे नहीं। यह परंपरा के तहत हुआ है। और यह सब कानूनी और सही तरीके से हुआ है। सोशल मीडिया पर जो बातें फैलाई गईं, वो अधूरी और भ्रामक हैं।
फिल्म ‘रामायण’ में बॉलीवुड अभिनेता रणबीर कपूर की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की भूमिका के लिए रणबीर उपयुक्त नहीं हैं। इनमें वरिष्ठ पत्रकार उदय माहुरकर से लेकर महाभारत में पितामह भीष्म की भूमिका निभाने वाले मुकेश खन्ना तक शामिल हैं।
‘सेव कल्चर सेव भारत फाउंडेशन’ के संस्थापक माहुरकर ने इसको लेकर मोदी सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र भी लिखा है। इसमें कहा है कि फिल्म ‘एनिमल’ में पोर्न सीन करने के बाद रणबीर कपूर का भगवान श्रीराम का किरदार निभाना सही नहीं है।
रणबीर कपूर को रामायण से निकालने के लिए लिखा पत्र
वहीं मुकेश खन्ना का कहना है कि रणबीर अच्छे अभिनेता हैं। लेकिन एनिमल की जो उनकी छवि है उसके बाद उन्हें राम की भूमिका में दर्शक स्वीकार नहीं करेंगे। आदिपुरुष का जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि यदि इसे किसी और नजरिए से दिखाया गया तो आज के हिंदू छोड़ेंगे नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार उदय माहुरकर ने पत्र लिखकर भारत सरकार से माँग की है कि एनिमल फिल्म में पोर्न सीन करने वाले रणबीर कपूर को रामायण फिल्म में श्रीराम की भूमिका से हटा देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि एनिमल फिल्म में रणबीर कपूर ने नशा, अपराध और पोर्नोग्राफी को प्रमोट किया था। ऐसे अभिनेता के श्रीराम की भूमिका निभाने से भगवान की छवि भी खराब होगी।
Can an actor who did a semi-p0rn role with a half-naked actress in film ‘Animal’ be cast as Lord Ram in a mega film ? Nation must take a call.
Sharing my letter to GOI urging it on behalf of the nation to replace Ranbir Kapoor as Ram in Namit Malhotra’s upcoming mega film on…
पत्र में उदय माहुरकर लिखते हैं, “रामायण फिल्म के निर्माताओं ने 5000 करोड़ रुपए का PR कैंपेन चलाने की प्लानिंग की है। अगर पब्लिक फेस रणबीर कपूर होंगे तो इसमें यौन अश्लीलता, अपराध और नैतिक पतन जैसी चीजों को बढ़ावा मिलेगा। इससे बच्चे और आने वाली पीढ़ी समेत देशभर के हिंदुओं के मन में भगवान श्रीराम की गलत छवि जाएगी।”
उन्होंने आगे लिखा, “यह कला की स्वतंत्रता नहीं है बल्कि यह सोची समझी सांस्कृतिक बर्बादी है। जो बड़े स्तर पर मीडिया के जरिए की जा रही है। जो काम कोई औरंगज़ेब या गजनी नहीं कर सका अब वह किया जा रहा है। यानि मंदिर की किसी दीवार को छुए बिना भक्ति के अंदरूनी हिस्से को खराब किया जा रहा है।”
उदय माहुरकर ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और फिल्म (MIB) के निर्माता नमित मल्होत्रा से माँग की कि रामायण फिल्म के लिए दोबारा से कास्टिंग की जाए। श्रीराम का किरदार रणबीर कपूर से हटाकर किसी अन्य अभिनेता को दे दिया जाए।
बता दें कि रामायण फिल्म दीपवाली 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज के लिए तैयार है। इसका ट्रेलर रिलीज किया जा चुका है। इसके बाद से ही फिल्म को लेकर बॉयकॉट का हैशटैग सोशल मीडिया पर ट्रेन्ड कर रहा है। फिल्म में रणबीर कपूर को श्रीराम का किरदार निभाने के लिए आपत्ति जताई जा रही है।
हिंदू रणबीर कपूर को नहीं छोड़ेंगे: मुकेश खन्ना
‘शक्तिमान’ सीरियल के मशहूर एक्टर मशहूर खन्ना ने भी रणबीर कपूर पर रामायण फिल्म में श्रीराम का किरदार निभाने पर आपत्ति जताई है। गलाटा इंडिया से बात करते हुए मुकेश खन्ना ने कहा, “मुझे नहीं पता कि रणबीर कपूर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की छवि को बखूबी निभा पाएँगे या नहीं। वो एक अच्छे अभिनेता हैं लेकिन उनके पीछे ‘एनिमल’ की छवि लगी हुई है।”
गलाटा इंडिया से बात करते हुए मुकेश खन्ना ने कहा, “मुझे नहीं पता कि रणबीर कपूर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की छवि को बखूबी निभा पाएँगे या नहीं। वो एक अच्छे अभिनेता हैं लेकिन उनके पीछे ‘एनिमल’ की छवि लगी हुई है।”
मुकेश खन्ना ने आगे कहा, “रामायण से बड़ा विषय कोई हो ही नहीं सकता। लेकिन मैंने देखा है कि कैसे उन्होंने ‘आदिपुरुष’ की चटनी बना दी। अब इसे कोई और बना रहा है। अगर आप इसे उसी नजरिए से बनाएँगे, तो आज के हिंदू आपको नहीं छोड़ेंगे।”
रणबीर कपूर ने साल 2022 की फिल्म ‘एनिमल’ में गैगस्टर रोल को प्रमोट किया था। फिल्म में वह अपराध और नशे को प्रमोट करते नजर आए। उन्होंने फिल्म में कुछ पोर्न सीन भी किए थे। इसके बाद से उनकी छवि गैंगस्टर और अश्लील फिल्म बनाने वाले अभिनेता के रूप में जानी जाने लगी।
अब इसी छवि के साथ वे रामायण फिल्म में श्रीराम की भूमिका निभाने जा रहे है, जिसके लिए उन्हें ट्रोल किया जा रहा है और लगातार उनको रिप्लेस करने की माँग उठ रही हैं। इससे पहले भी रणबीर कपूर हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ आहत करने को लेकर ट्रोल किया जा चुका है।
उज्जैन के महाकाल मंदिर में नहीं मिले दर्शन
साल 2022 में फिल्म ब्रह्मास्त्र की रिलीज से पहले रणबीर कपूर और आलिया भट्ट उज्जैन में महाकाल के दर्शन करने पहुँचे थे। लेकिन हिंदू संगठन के विरोध के बाद उन्हें दर्शन करने से रोक दिया गया। मंदिर के बाहर खड़े हिंदू संगठनों ने काली पट्टी दिखाकर उनका जमकर विरोध किया। लोगों ने कहा कि वह रणबीर जैसे गौ-भक्षक को महाकाल के मंदिर में नहीं जाने देंगे।
यह विरोध 11 साल पुराने रणबीर कपूर के वायरल वीडियो से जुड़ा था, जिसमे एक्टर खुद को ‘बिग बीफ गाय’ बता रहे थे। उनकी इसी टिप्पणी के कारण साल 2024 में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेने पर भी रणबीर कपूर का विरोध किया गया था।
रणबीर कपूर ने दारू के साथ लगाया ‘जय माता दी’ का जयकारा
साल 2023 में क्रिसमस पार्टी के दौरान के रणबीर कपूर और उनकी पत्नी आलिया भट्ट का एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें कपूर परिवार क्रिसमस का जश्व मनाते देखा गया। क्रिसमस के मौके पर केक में दारू डलवाई गई और फिर आग लगाते हुए ‘जय माता दी’ के जयकारे लगाए। जयकारे लगाते हुए पूरा कपूर परिवार हँस रहा था।
वीडियो वायरल होने के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट में रणबीर कपूर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई गई थी। शिकायत में कहा गया था कि एक्टर और उनके परिवार के खिलाफ IPC की धारा 295, 509 और 34 के तहत FIR की माँग की थी।
पाकिस्तान प्रेम दिखाने में नहीं चूके रणबीर कपूर
रणबीर कपूर को पाकिस्तान का समर्थन करते भी सुना गया है। साल 2022 में सऊदी अरब में हुए ‘रेड सी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ पर रणबीर कपूर ने पाकिस्तान की फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ मौला जट’ की काफी तारीफ की थी। साथ ही यह भी कहा था कि उन्हें पाकिस्तानी कलाकार के साथ काम करने में खुशी होगी।
जहाँ एक तरफ एक्टर पाकिस्तान का गुणगान करते हैं तो दूसरी तरफ भारत के समर्थन में चुप्पी साध लेते हैं। अप्रैल 2025 में भारत में काले पन्ने में शामिल पहलगाम आतंकी हमले पर एक्टर रणबीर कपूर ने कुछ नहीं बोला। यहाँ तक कि उनके पूरे परिवार से इस निंदनीय आतंकी हमले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गई।
कॉन्ग्रेस की नीति इजरायल विरोध की रही है। ईरान युद्ध हो या फिलिस्तीन से जंग, कॉन्ग्रेस हमेशा केन्द्र को इजरायल के खिलाफ कदम उठाने की नसीहत देती है। कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इजरायल के बहाने केन्द्र सरकार को घेरने की कोशिश की है। उन्होंने इजरायल पर फिलिस्तीन के नरसंहार का आरोप लगाया है। साथ ही कहा है कि केन्द्र सरकार इस पर चुप क्यों है?
प्रियंका के बयान को इजरायल के राजदूत रेवुएन अजार ने कहा, ” आपकी धुर्तता कितनी शर्मनाक है। इजरायल ने 25,000 हमास आतंकवादियों को मारा। मानव जीवन को हुई क्षति के लिए हमास की घिनौनी रणनीति जिम्मेदार है। नागरिकों के पीछे छिप कर कायराना हमला, पलायन करने वालों पर गोली चलाना और रॉकेट दागना हमास कर रहा है।”
What is shameful is your deceit. Israel Killed 25,000 Hamas terrorists. The terrible cost in human lives derives from Hamas’s heinous tactics of hiding behind civilians, their shooting of people trying to evacuate or receive assistance and their rocket fire. Israel facilitated 2… https://t.co/e3lSUwfmXH
इजरायल के राजदूत ने ये भी कहा है कि इजरायल ने गाजा में 20 लाख टन खाद्य सामग्री पहुँचाई। हमास ने उसे जब्त करने की कोशिश की, जिससे भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई। उन्होंने दावा किया कि पिछले 50 सालों में गाजा की आबादी 450% बढ़ी है। वहाँ कोई नरसंहार नहीं हुआ है। हमास के आँकड़ों पर यकीन मत कीजिए।
इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने कहा, “इजरायल नरसंहार कर रहा है। उसने 60,000 से ज़्यादा लोगों की हत्या की है, जिनमें 18,430 बच्चे थे। सैकड़ों लोगों को भूख से मरने के लिए मजबूर किया गया। इनमें कई बच्चे भी शामिल हैं। लाखों लोगों को भूखा मारने की धमकी दी जा रही है।”
केन्द्र सरकार पर इस मामले में निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए प्रियंका गाँधी ने कहा, “चुप्पी साधकर और निष्क्रियता से अपराधों को बढ़ावा देना अपने आप में एक अपराध है। यह शर्मनाक है कि भारत सरकार चुप बैठी है जबकि इजरायल फिलिस्तीन के लोगों पर तबाही मचा रहा है।”
दरअसल कॉन्ग्रेस ने 9 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजरायली हमले के दूसरे दिन खुले तौर पर फिलिस्तीनियों के समर्थन में प्रस्ताव पास किया था। इसमें फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों का समर्थन किया था।
प्रस्ताव में कहा गया था कि CWC फिलिस्तीनी लोगों के जमीन, स्वशासन और आत्मसम्मान एवं गरिमा के साथ जीवन के अधिकारों के लिए अपने दीर्घकालिक समर्थन को दोहराती है। लेकिन इस प्रस्ताव में हमास के आतंकी हमले का जिक्र तक नहीं किया गया था। कॉन्ग्रेस की नीति में इजरायल का विरोध शुरू से नजर आता है। लेकिन भारत की विदेश नीति निस्पक्ष रही है। इसके तहत बगैर भेदभाव के मानवीय आधार पर सहायता भारत करता रहा है।
जम्मू-कश्मीर में 1990 में हुई कश्मीरी पंडित सरला भट्ट की हत्या का मामला एक बार चर्चा में है। राज्य जाँच एजेंसी (SIA) ने इस मामले की जाँच आगे बढ़ाई है। मंगलवार (12 अगस्त 2025) को श्रीनगर में SIA ने 8 जगह छापेमारी की है। यह छापेमारी जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का मुखिया यासीन मलिक और उसके साथियों के घरों पर की गई है।
JKLF ही 1990 में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का जिम्मेदार है। सरला भट्ट को भी इसी आतंकी संगठन ने अपहरण और गैंगरेप कर हत्या कर दी थी। इस घटना को 35 साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक सरला भट्ट को न्याय नहीं मिला है।
SIA को मामले की जाँच सौंपे जाने के बाद तेजी आई है। SIA को जाँच में सरला भट्ट की हत्या से जुड़े काफी सबूत मिले, जिसके आधार पर SIA आगे की कार्रवाई शुरू की गई।
कौन थीं सरला भट्ट?
27 साल की सरला भट्ट जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में रहने वाली एक कश्मीरी पंडित थीं। शायद यही उनका गुनाह था। जब 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों का जिहादियों ने नरसंहार किया, तब सरला भी उसका शिकार हुईं।
वे कश्मीर के सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में एक नर्स के रूप में कार्यरत थीं। आतंकी उन्हें उठाकर ले गए 5 दिन बाद सड़क पर उनका शव पड़ा मिला था।
सरला भट्ट के शरीर के टुकड़े कर बाजार में फेंके गए
14 अप्रैल 1990 का दिन था। जब सरला भट्ट SKIMS के हब्बा खातून हॉस्टल से आतंकियों ने उन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर ले गए। सरला भट्ट का 5 दिन तक कुछ पता नहीं लगा। रिपोर्टों के अनुसार, उनके साथ गैंगरेप किया गया। उन्हें बुरी तरह टॉर्चर किया गया। 19 अप्रैल 1990 को उनका क्षत-विक्षत शव सड़क पर पड़ा मिला था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरला भट्ट के शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उन्हें पुलिस का मुखबिर बताया गया था। द हिंदू के मुताबिक, इस मामले में निगीन पुलिस थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसकी संख्या 56/1990 है। हालाँकि, इसमें हिंदू नर्स के साथ रेप का कोई जिक्र तक नहीं है। इस बर्बर मामले में JKLF के पूर्व नेता पीर नूरुल हक शाह उर्फ एयर मार्शल का भी नाम सामने आया था।
सरला भट्ट की हत्या में JKLF के खिलाफ सबूत
SIA को जब सरला भट्ट मामले की जाँच सौंपी गई तो JKLF सरगना यासीन मलिक और उसके साथियों के खिलाफ सबूत मिले। इसी के आधार पर SIA ने यासीन मलिक और उसके गुर्गों के घरों पर छापेमारी की है। बता दें कि यासीन मलिक आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के चलते तिहाड़ जेल में बंद है।
NIA ने यासीन मलिक को फाँसी की सजा सुनाने की माँग की है। यासीन मलिक पर 1990 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार में शामिल होने के भी आरोप हैं।
700 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हुई हत्या
सरला भट्ट केवल एकलौता नाम नहीं है, जिनकी बर्बरता से हत्या की गई। 1980-90 तक ऐसे 700 कश्मीरी पंडितों की घाटी में हत्या कर दी गई। ये हत्या कश्मीरी पंडितों के बीच दहशत फैलाने के लिए की गई थी।
आतंकी सरेआम हिंदू महिलाओं को घर से उठा ले जाते थे, कई माँ-बाप के सामने उनके बच्चों की हत्या हुई, हिंदुओं का मकान चुनकर निशाना बनाया जाता था। इन सब से परेशान होकर उस समय लगभग 3.5 लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया।
रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 तक घाटी में केवल 728 गैर-प्रवासी पंडित ही बचे हैं, जबकि 2021 में 808 परिवारों की थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ भी कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को दर्शाने वाली फिल्म थी, जिसमें घाटी की असलियत दिखाई गई थी।
मुस्लिम में तलाक अब मौखिक तौर पर लिए जा सकेंगे। गुजरात हाईकोर्ट ने इस पर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि ‘मुबारात’ के जरिए तलाक संभव है। ‘मुबारात’ का मतलब है आपसी सहमति से बगैर लिखित समझौते के मौखिक तौर पर लिया जाने वाला तलाक।
‘मुबारात’ के जरिए तलाक हो सकता है- हाई कोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट के वकील जस्टिस ए वाई कोगजे और जस्टिस एन एस संजय गौड़ा की खंडपीठ ने तलाक को लेकर दायर केस में सुनवाई के दौरान ये फैसला दिया। कोर्ट ने कुरान और हदीस का हवाला देते हुए राजकोट की एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें मुस्लिम कपल के ‘मुबारात’ द्वारा तलाक से रोका गया था।
हाई कोर्ट ने कहा, “कुरान और हदीस के आयात या मुस्लिम पर्सनल लॉ से फैमिली कोर्ट का फैसला मेल नहीं खाता है। इनमें कही भी नहीं लिखा कि मुबारात के लिए लिखित समझौता जरूरी है।”
हाई कोर्ट का कहना है कि ऐसा कोई रिवाज मुस्लिम में नहीं है कि आपसी सहमति से तलाक के लिए रजिस्ट्री या रिटन कॉन्ट्रैक्ट जरूरी हो। निकाहनामा निकाह का दस्तावेज है। जैसे निकाह के लिए कबूल पर्याप्त है, वैसे ही तलाक के लिए मुबारात काफी है।
राजकोर्ट फैमिली कोर्ट ने क्या कहा था?
राजकोट की फैमिली कोर्ट का कहना था कि धारा 7 के तहत ये मुकदमा सुनने योग्य नहीं है क्योंकि तलाक के लिए आपसी सहमति के साथ लिखित समझौता जरूरी है। केस में लिखित समझौते का दस्तावेज संलग्न नहीं था इसलिए इसे खारिज कर दिया गया था।
हालाँकि हाई कोर्ट ने ये मामला एक बार फिर फैमिली कोर्ट में भेज दिया है और इसे 3 महीने के अंदर दोबारा सुनवाई करने के लिए कहा है।
मुस्लिम दंपति के तलाक का मामला
ये मामला ऐसे दंपति का है जिनका निकाह 2021 में बिहार में हुआ था। कुछ समय बाद दोनों मियाँ-बीवी में मतभेद शुरू हो गए । दोनों ने मुबारात के जरिए अलग होने का फैसला किया और राजकोट के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए केस दायर किया।
भारत के साथ चली आ रही रही तनातनी के बीच इस्लामी मुल्क नीचता पर उतर आया है। खबर है कि पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग (Indian High Commission) के कर्मचारियों और उनके परिवारों को बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति पर रोक लगा दी है। इस कदम को भारत ने ‘जानबूझकर उठाया गया एक पूर्व-निर्धारित’ कदम बताया है।
जानकारी के अनुसार, भारत ने इसे विएना कन्वेंशन (Vienna Convention) का उल्लंघन कहा है, जो गारंटी देता है कि एक मुल्क में दूसरे देश के राजनयिकों की सुरक्षा और कामकाज करने को गारंटी मिलेगी।
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय राजनयिकों को अब खाना पकाने के लिए गैस, पीने के लिए साफ पानी, यहाँ तक कि अखबार भी नहीं मिल पा रहे हैं। गैस पाइपलाइन होने के बावजूद गैस की सप्लाई बंद कर दी गई है। जिन दुकानदारों से पहले गैस सिलेंडर मिलते थे, उन्हें अब भारतीय स्टाफ को कुछ भी बेचने से मना कर दिया गया है।
इसके अलावा पीने के पानी की नियमित सप्लाई भी रोक दी गई है और सभी स्थानीय वाटर वेंडर्स को उच्चायोग को पानी न देने का निर्देश दिया गया है। वहीं अखबारों की सप्लाई बंद होने से भारतीय राजनयिकों की स्थानीय खबरों तक पहुँच मुश्किल हो गई है।
क्या है इसकी वजह?
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने यह कदम भारत के हाल के दो फैसलों के जवाब में उठाया है। इसमें पहला है, ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और दूसरा है सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को भारत द्वारा सस्पेंड करना।
इन दोनों घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने यह ‘छोटी सोच वाली बदले की कार्रवाई’ की है, ताकि इस्लामाबाद में रह रहे भारतीय राजनयिकों की जिंदगी मुश्किल हो जाए। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत भी अब पाकिस्तान के राजनयिकों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई कर सकता है।
बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की हरकत हुई है। 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत द्वारा बालाकोट के समय भी इसी तरह भारतीय राजनयिकों को परेशान किया गया था।
पाकिस्तान ने भारतीय राजनयिकों की निगरानी भी बढ़ा दी है। उनके घरों और दफ्तरों पर नजर रखी जा रही है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान की ये हरकतें विएना कन्वेंशन का सीधा उल्लंघन हैं, जो किसी भी देश में राजनयिकों को बुनियादी सुविधाएँ देने और उनके सम्मान की रक्षा करने की बात करता है। भारत ने चेतावनी दी है कि इस तरह की घटनाएँ दोनों देशों के बीच रिश्तों को और ज्यादा नुकसान पहुँचा सकती हैं।
अमेरिका ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और उससे जुड़ी मजीद ब्रिगेड को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। इससे पहले पाकिस्तान के तेल भंडार को विकसित करने के लिए अमेरिका पहले ही समझौता कर चुका है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान का तेल और गैस भंडार है जिसका नए सिरे से दोहन करने की तैयारी है। बीएलए इलाके के आर्थिक शोषण का विरोध करता रहा है।
बीएलए को अमेरिका ने घोषित किया विदेशी आतंकी संगठन
अमेरिका ने पाकिस्तान की मुराद पूरी कर दी है। उसने बलूच लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए और मजीद ब्रिगेड को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। इसकी घोषणा 11 अगस्त 2025 को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने की। अमेरिका अब इन संगठनों की हर एक्टिविटी पर प्रतिबंध लगा देगा। अमेरिका स्थित संगठन के सदस्यों की संपत्तियों को जब्त कर सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, ये कदम आतंकवाद पर अमेरिकी सख्ती को दिखाता है। दरअसल बलूच विद्रोहियों पर एक्शन लेने की माँग पाक आर्मी चीफ ने विश्वसमुदाय से की थी
बलूच समूहों ने अमेरिकी आतंकवाद के टैग को खारिज करते हुए इसे आत्मनिर्णय की लड़ाई बताया है, क्योंकि ट्रम्प के पाकिस्तान तेल समझौते से इस क्षेत्र में अमेरिका की और अधिक भागीदारी की आशंका बढ़ गई है, जो पहले से ही संसाधन दोहन और राजनीतिक अशांति से ग्रस्त है।
ट्रंप के ‘पाकिस्तान प्रेम’ की एक वजह तेल भी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तान के ‘तेल भंडार’ को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए इस्लामाबाद के साथ एक नए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह घोषणा भारतीय आयातों पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड के पहले दौर की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने दावा किया कि किसी दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा, “हमने अभी-अभी पाकिस्तान के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत पाकिस्तान और अमेरिका अपने विशाल तेल भंडार को विकसित करने के लिए मिलकर काम करेंगे… कौन जाने, शायद वे किसी दिन भारत को भी तेल बेचेंगे!”
फोटो साभार- ट्रूथ
बलूचिस्तान कहाँ है?
बलूचिस्तान वो इलाका है जो पाकिस्तान को ईरान और अफगानिस्तान से जोड़ता है। बलूचिस्तान को अलग देश बनाने की माँग होती है। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा है। पाकिस्तान ने बलूचियों के साथ काफी दुर्व्यवहार किया जाता रहा है। पाकिस्तानी फौज की दमनकारी नीति, आर्थिक और सामाजिक शोषण की वजह से बलूचिस्तानी की आजादी की माँग को लेकर बलूच लिबरेशन आर्मी का गठन किया गया। इससे जुड़ा माजिद ब्रिगेड भी है।
पाकिस्तान ने जबरन किया था कब्जा
1948 में पाकिस्तान ने इस प्रांत को अपने में मिला लिया था। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी सबसे कम है। 2023 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान की आबादी करीब 24 करोड़ है, लेकिन बलुचिस्तान की आबादी मात्र 1.5 करोड़ है।
बलूच 1948 से ही पाकिस्तान से आजादी की माँग करते आ रहे हैं। उनके राजा को धोखा देकर पाकिस्तान ने इलाके पर कब्जा किया था। दरअसल जब भारत का बँटवारा हुआ और प्रांतों को भारत या पाकिस्तान या फिर आजाद रहने का विकल्प दिया गया तो बलूचिस्तान ने फैसला नहीं लिया था कि उसे किसके साथ जाना है या अलग मुल्क बन कर रहना है। स्थिति का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने राजा अहमद यार खान को मजबूर किया कि वह पाकिस्तान में अपने ‘रियासत कलात’ का विलय कर दें। हालाँकि इसके खिलाफ पहला विद्रोह 1948 में ही हो गया था।
पाकिस्तान में विलय के लिए नेहरू भी जिम्मेदार
तिलक देवाशर की किताब ‘द बलूचिस्तान कोरंड्रम’ के अनुसार, कलात के खान ने अंग्रेजों से कहा था कि वह आजाद रहना चाहते हैं। इसको लेकर दस्तावेज भी अंग्रेजों द्वारा भेजे गए कैबिनेट मिशन को दिए थे। मजे की बात यह है कि इस काम में मोहम्मद अली जिन्ना ने उनकी सहायता की थी। जिन्ना कलात के खान के वकील थे। ‘कलात के खान’ और कलात के प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री की 1947 में बलूचिस्तान के भविष्य को लेकर बैठक हुई थी।
हमद यार खान ने कहा कि पाकिस्तान में शामिल होना जनता के विरोध के कारण चुनौतीपूर्ण था। इसके अलावा भारत वाले विकल्प को पाकिस्तान की चिंताओं पर नकार दिया गया था।
अहमद यार खान ने कथित तौर पर दावा किया कि नेहरू उनसे नफरत करते थे और कॉन्ग्रेस ने कभी उन पर भरोसा नहीं किया। कलात के विदेश मंत्री डगलस येट्स फेल ईरान में शामिल होने के पक्ष में थे। उन्होंने इसे बलोच एकता के लिए फायदेमंद करार दिया था। गौरतलब है कि बड़ी बलोच आबादी ईरान में रहती है। हालाँकि, कलात के खान अफगानिस्तान में भी शामिल होने के पक्ष में थे लेकिन इस पर भी नहीं बात बन पाई। अंत में लंदन वाला विकल्प भी नकार दिया गया।
इसके बाद कलात के खान के पास कोई विकल्प नहीं शेष थे। इसी बीच पाकिस्तान ने लासबेला, मकरान और खरान को मिला लिया। अब कलात बीच में फंस गया और उसके पाकिस्तान में मिलने के सिवा कोई चारा ना रहा। बलूच के पाकिस्तान में मिलने में नेहरू के ढीलेढाले रवैये का अहम रोल था।
पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को लूटा
बलूचियों का कहना है कि पाकिस्तानी सरकार ने अब तक सिर्फ इस प्रांत को लूटा है और लोगों की उपेक्षा की है। मिनरल्स से भरपूर इस प्रांत में कोयला,सोना, तांबा, गैस की बहुतायत है। फिर भी पाकिस्तान जैसे भिखारी देश का ये सबसे गरीब इलाका है। आज भी पाकिस्तान का सबसे बड़ा बंदरगाह ग्वादर इसी क्षेत्र में है। ये चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी के लिए काफी अहम है।
बलूचिस्तान के सुई इलाके में 1950 के ही दशक में गैस का पता चला था। इस गैस की लूट मचा दी गई। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में इस गैस की सप्लाई नहीं दी बल्कि पंजाब और सिंध तक पहुँचाई। यहाँ तक कि 1990 का दशक आते-आते यह गैस लगभग खत्म हो गई। इसके बाद पाकिस्तान के हुक्मरानों ने बलूचिस्तान में जमीन बेच दी। वर्तमान में बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह और एयरपोर्ट चीन के अधीन है। स्थानीय लोग इसका विरोध करते हैं।
बलूचिस्तान में अयस्क और खनिज भरे हुए हैं। पाकिस्तान ने यह भी चीन को लगभग बेच दिए हैं। इससे भी बलोच लोगों में गुस्सा है। बलूचिस्तान में स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पाकिस्तान ने नहीं पहुँचाई हैं। ऐसे में विद्रोह के लिए लोग मजबूर हो रहे हैं। बलोच महिलाएँ भी इस विद्रोह में शामिल हैं। इन महिलाओं को पाकिस्तानी फौज ने अत्याचार का शिकार बनाया है।
बलाच मर्री ने की बीएलए की स्थापना
पाकिस्तान द्वार कब्जा कर लिए जाने के बाद बलुचियों ने अलग राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत रहे हैं। इनका कहना है कि प्रांत के संसाधनों का बड़ा हिस्सा उनके प्रांत के काम आना चाहिए। 2000 के दशक में बलूचिस्तान की आजादी की माँग को लेकर बीएलए यानी बलूच लिबरेशन आर्मी की स्थापना की गई। बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब खैर बख्श मर्री के बेटे बलाच मर्री ने इसकी स्थापना की।
बलूचिस्तान में विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तानी फौज ने प्रदर्शन करने वाले निर्दोष बलूचों पर हवाई हमले किए। उनपर गोलियाँ बरसाईं। 2006 में बलूच के बड़े नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या पाकिस्तानी फौजी शासक परवेज मुशर्रफ ने करवा दी। उनके शव तक को परिवार को नहीं सौंपा। इसके बाद बलोच और भी भड़क गए। पाकिस्तानी सरकार एक के बाद एक बलूची नेताओं की हत्या करने लगे।
एक साल बाद बलूची नेता बलाच मरी की भी हत्या कर दी गई। पाकिस्तानी हुक्मरान ने बीएलए पर प्रतिबंध लगा दिया। ये विद्रोह 2005 में उस वक्त और ज्यादा भड़क गई जब बलूचिस्तान में तैनात एक फौज के मेजर ने एक बलोच लड़की के साथ बलात्कार किया। उस पर कार्रवाई करने के बजाय परवेज मुशर्रफ ने उसे बचाया और बलोच लोगों को धमकाया।
पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं बलूची
बीएलए प्रतिबंध के बावजूद पूर्ण स्वतंत्रता की माँग को लेकर संघर्ष कर रहा है। बशीर जैब बलूच बीएलए ने फिलहाल नेतृत्वकर्ता माने जाते हैं। संगठन में महिलाओं को भी शामिल किया गया है। माजिद ब्रिगेड का नेतृत्व हम्माल रेहान के हाथों में है। संगठन की ट्रेनिंग में रहमान गुल बलूच का अहम रोल है। वो पाकिस्तानी फौज के पूर्व अधिकारी हैं।
बीएलए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी का विरोधी है। संगठन का मानना है कि ये आर्थिक शोषण के लिए बनाया गया है। इसलिए पाकिस्तान में हुए कई हमलों को बीएलए ने अंजाम दिया है। 2024 में कराची हवाई अड्डा और ग्वादर बंदरगाह प्राधिकरण के परिसर में हमला शामिल है। 2025 में क्वेटा से पेशावर जा रही जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाईजैक कर बीएलए ने किया था। 2018 में पाकिस्तान स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास पर हमले की जिम्मेदारी संगठन ने ली थी।
बलूचिस्तान में 5 बार बड़े विद्रोह की आग भड़क चुकी है। अगर 1980-90 का दशक छोड़ दिया जाए तो अब तक लगातार हर दशक में बलूच विद्रोही उठ खड़े हुए हैं। वर्तमान में बलूचिस्तान में चल रही लड़ाई की चिंगारी 2005 में भड़की थी। तब से पाकिस्तानी फौज के साथ बलूच लिबरेशन आर्मी की टक्कर होती रहती है।
चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची की खास समीक्षा की। इसमें 60 लाख से ज्यादा फर्जी या अपंजीकृत मतदाता सामने आए। इस खुलासे ने भारतीय लोकतंत्र में फर्जी वोटिंग और राजनीतिक संरक्षण के जरिए वोटरों की घुसपैठ की गंभीरता को उजागर कर दिया है।
इस अभियान के दौरान जो सामने आया कि 35 लाख लोग या तो अब नहीं मिल रहे हैं या हमेशा के लिए कहीं और चले गए हैं, 22 लाख वोटर अब इस दुनिया में नहीं हैं यानी उनकी मौत हो चुकी है, 7 लाख वोटर एक से ज्यादा जगहों पर नामांकित हैं और लगभग 1.2 लाख फॉर्म अभी लंबित हैं।
चुनाव आयोग के इस कदम को लेकर विपक्षी दल, खासकर राजद (RJD) और कॉन्ग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। उनका आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया एक ‘साजिश’ है जिसका मकसद वोटरों, खासकर मुस्लिम समुदाय के वोटरों को बाहर करना है। उन्होंने ECI की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए और कहा कि आयोग BJP के इशारे पर काम कर रहा है।
खास बात यह है कि IIM संस्थानों के प्रोफेसरों द्वारा पहले ही एक शोध पत्र में चेतावनी दी गई थी कि बिहार में 70 लाख से अधिक फर्जी वोटर हो सकते हैं।
यह पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। इससे देशभर में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ चल रहे अभियानों को भी नई ताकत मिली है। जैसे ही बिहार में फर्जी वोटरों की पहचान हुई, वैसे ही कई राज्यों में अवैध घुसपैठियों को पहचानने, हिरासत में लेने और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।
इस अभियान को लेकर तथाकथित ‘धार्मिक रूप से तटस्थ’ (secular) पार्टियों में नाराजगी साफ देखी जा रही है।
ममता बनर्जी ने बीएलओ को दिलाया याद, वे चुनाव आयोग नहीं राज्य सरकार के लिए करते हैं काम
हरियाणा और अन्य BJP शासित राज्यों में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई और बिहार में SIR की प्रक्रिया के बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन पर पहले भी यह आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार वोट बैंक बढ़ाने के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देती है।
ममता बनर्जी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बंगाल में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) लागू नहीं होने देंगी। हाल ही में उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर हिरासत में लिया जा रहा है, वे असल में बंगाली प्रवासी हैं।
इसके साथ ही उन्होंने मतदाता सूची सुधार (Summary Revision) के लिए ट्रेनिंग ले रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) को एक तरह से चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग सिर्फ तब सक्रिय होता है जब चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं। उससे पहले और उसके बाद भी प्रशासन राज्य सरकार के हाथ में रहता है। आप राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, किसी को बेवजह परेशान मत कीजिए।”
बीरभूम में जुलाई में एक प्रशासनिक बैठक को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग BJP के इशारों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “मतदाता सूची गुजरात में बैठे लोग बना रहे हैं। यह काम BJP की एक एजेंसी कर रही है, मुझे उसका नाम भी पता है।”
इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर बंगाल में किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई तो छऊ नृत्य (एक आदिवासी नृत्य) होगा, ढोल और शंख की आवाज सुनाई देगी। मैं जिंदा रहते हुए ना NRC लागू होने दूँगी और ना ही डिटेंशन कैंप बनने दूँगी।”
पश्चिम बंगाल वह राज्य है, जहाँ जाली दस्तावेजों और स्थानीय मदद से रह रहे अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या है सबसे अधिक
हाल ही में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर राज्य में SIR कराया गया तो लाखों फर्जी मतदाता, खासकर वे जो बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर नकली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान बना चुके हैं, वे सूची से हटा दिए जाएँगे।
पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है जहाँ सबसे अधिक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2,688 बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और उन्हें वापस भेजा गया है।
8 अगस्त को, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (Chief Election Officer – CEO) से एक ‘स्पष्टीकरण’ माँगा, क्योंकि उन्होंने चुनाव आयोग को यह लिखा था कि राज्य SIR के लिए ‘तैयार’ है।
पिछले हफ्ते चुनाव आयोग ने 293 विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की SIR वोटर लिस्ट प्रकाशित की (सिर्फ एक सीट को छोड़कर)।
गौरतलब है कि बंगाल में आखिरी बार SIR वर्ष 2002 में हुआ था और उसी के आधार पर 2004 की मतदाता सूची तैयार की गई थी। अब जब 22 साल बाद फिर से SIR की संभावना है तो राज्य में राजनीति गरमा गई है।
चुनाव आयोग का काम होता है कि वह मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करे, गलतियाँ सुधारे, मृतकों के नाम हटाए और फर्जी वोटरों को चिन्हित करे, लेकिन राज्य की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार, जिसे कई लोग ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहकर मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ते हैं, इस SIR प्रक्रिया को लेकर विरोध जता रही है और इसे लेकर चुनाव आयोग को ‘याद दिला’ रही है और दबाव भी बना रही है।
पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील राज्य में मतदाता सूची में गड़बड़ी (Electoral Roll Inflation) कोई नई बात नहीं है और इसी वजह से SIR की जरूरत महसूस की जा रही है।
IIM प्रोफेसरों के शोध पत्र में आया सामने: पश्चिम बंगाल की 2024 की मतदाता सूची में 1 करोड़ अतिरिक्त मतदाता
7 अगस्त 2025 को प्रकाशित एक रिसर्च पेपर, जिसका नाम ‘Electoral Roll Inflation in West Bengal: A Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts (2024)’ है, यह दिखाता है कि पश्चिम बंगाल की 2024 की वोटर लिस्ट में लगभग 1 करोड़ फर्जी नाम हो सकते हैं। यह 13.69% का वोटर इन्फ्लेशन है।
यह रिसर्च IIM विशाखापत्तनम के डॉ. मिलन कुमार और SP जैन के डॉ. विधु शेखर ने किया है। उन्होंने सरकारी आँकड़ों जैसे कि वोटर लिस्ट, जनगणना और सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया और हर चरण पर रक्षात्मक (conservative) तरीका अपनाया, ताकि अनुमान नीचे रहे।
शोध पत्र में कहा गया है, “हम सभी पात्र युवाओं के पूर्ण पंजीकरण को मानते हैं, उच्च उत्तरजीविता संभावनाओं को लागू करते हैं, और हालिया वृद्धि के बजाय दशकीय रुझानों के आधार पर प्रवासन का मॉडल तैयार करते हैं। इससे हमें वैध मतदाता आबादी का एक निम्न-सीमा अनुमान लगाने में मदद मिलती है। फिर हम इस आँकड़े की तुलना 2024 के लिए चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित आधिकारिक मतदाता सूची से करते हैं।”
यह शोध 2024 तक पश्चिम बंगाल में वैध मतदाता आबादी के अनुभवजन्य अनुमान तीन चरणों में प्रस्तुत करता है: (i) 2004 की मतदाता सूची से बचे लोगों का अनुमान, (ii) 1986 और 2006 के बीच जन्मे नए मतदाता समूहों से जुड़ाव, और (iii) शुद्ध स्थायी प्रवास के लिए समायोजन। इसके बाद शोधकर्ताओं ने मतदाता सूची में अनुमानित अधिशेष की गणना करने के लिए परिणामों का संश्लेषण किया।
2004 की मतदाता सूची में 4.74 करोड़ पंजीकृत मतदाता दर्ज थे। शोध में इस जनसंख्या को छह आयु समूहों में विभाजित किया गया और 2001 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, आयु-विशिष्ट 20-वर्षीय उत्तरजीविता दरों का उपयोग किया गया। इन अनुमानों से 2004 की मतदाता सूची के अनुसार, अनुमानित 3.74 करोड़ जीवित मतदाता प्राप्त होते हैं।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2004 और 2024 के बीच लगभग 3.01 करोड़ नए पात्र व्यक्ति नामांकित होंगे।
इसके बाद, शोध ने 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके स्थायी बाहरी और आंतरिक प्रवास का अनुमान लगाया। विश्लेषण में पाया गया कि 2001 और 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में प्रवासियों की कुल संख्या में गिरावट आई है।
2001 और 2011 की जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए तथा CAGR के माध्यम से अनुमान लगाते हुए शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस अवधि के दौरान पश्चिम बंगाल से कुल 17.86 लाख व्यक्तियों का स्थाई प्रवास हुआ।
विश्लेषण के अनुसार, वैध मतदाताओं की अनुमानित संख्या (2024) 6,57,06,849 है, जबकि आधिकारिक मतदाता सूची (2024) के अनुसार मतदाताओं की संख्या 7,61,24,780 है। यह अनुमानित 1,04,17,931 मतदाताओं का अधिशेष दर्शाता है, जो प्रतिशत के हिसाब से 13.69% है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर ऊँची सर्वाइवल रेट, ज्यादा पंजीकरण और धीमी माइग्रेशन रेट मानी, ताकि कम से कम फर्जीवाड़ा दिखे, फिर भी इतना बड़ा अंतर मिला। इसका मतलब है कि असल वोटर इन्फ्लेशन इससे भी ज्यादा हो सकता है।
इस रिसर्च के अनुसार, इतने ज्यादा फर्जी नाम होने से चुनावों की निष्पक्षता पर खतरा पैदा होता है, क्योंकि कई सीटों पर जीत का अंतर इससे छोटा होता है। इसका फायदा धोखाधड़ी, फर्जी वोटिंग और राजनीतिक गड़बड़ी में उठाया जा सकता है।
रिसर्च सुझाव देता है कि वोटर लिस्ट को आधार, सिविल रजिस्ट्रेशन और माइग्रेशन डेटा से जोड़ा जाए। एल्गोरिदम से ऑटोमेटिक चेकिंग हो जैसे 100 साल से ऊपर के हजारों वोटर, एक ही व्यक्ति के कई रजिस्ट्रेशन आदि और हर तीन महीने में जनसांख्यिकीय ऑडिट हो।
पश्चिम बंगाल और ऐसे राज्य जहाँ पिछले कई सालों से SIR नहीं हुई है, वहाँ घर-घर जाकर वोटर वेरिफिकेशन होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में 2024 में 13.69% यानी 1 करोड़ से ज्यादा फर्जी नाम हो सकते हैं। यह चुनाव की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाता है और जरूरी है कि सरकार व चुनाव आयोग इस पर तुरंत और सख्त कदम उठाए।
नोट: मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।