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1200 यहूदियों की हत्या को स्वरा भास्कर ने धोया-पोंछा, हमास आतंकियों पर नहीं फूटा बोल, गाजा पर रोना-धोना: ये मक्कारी नहीं तो और क्या?

हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर वीभत्स आतंकी हमला किया था। महिलाओं और बच्चों समेत हजारों लोगों को मारा गया, रेप किए और सैकड़ों लोग बंधक बनाए गए। इसके जवाब में जब इजरायल ने गाजा में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया तो तथाकथित सेकुलर जमात का रोना शुरू हो गया।

स्वरा भास्कर जैसे लोग हमास के आतंकियों पर सवाल उठाने के बजाय इजरायल को ही इसका सारा दोष दे रहे हैं। मुंबई के आजाद मैदान में बुधवार (20 मार्च 2025) को गाजा के समर्थन में करीब 200 लोग इकट्ठा हुए। इस भारी भीड़ की माँग थी कि इजरायल अपने हमले बंद कर दे। स्वरा भास्कर ने भी इस सभा में तकरीर की और इजरायल पर किए गए हमले को ‘वाइटवॉश’ करने की कोशिश की।

स्वरा ने हमास के आतंकियों के कुकृत्यों को जायज ठहराने की भी पूरी कोशिश की। स्वरा ने कहा, “जो 7 अक्टूबर को हुआ जिसमें 1,200 इजरायल के नागरिक मारे गए। इसमें कोई शक नहीं है कि किसी भी दुनिया में किसी भी जगह पर किसी नागरिक की जान जाए तो यह दुख की बात है। लेकिन ऐसा दिखाना कि इतिहास की शुरुआत 7 अक्टूबर 2023 से हुई थी। ये झूठ है और ये मक्कारी है।”

मतलब सीधा है कि 7 अक्टूबर के आतंकी हमले की बात अगर आप करोगे तो आप मक्कार हैं लेकिन असल में मक्कारी क्या है, ये लोग बेहतर जानते समझते हैं। आतंकियों को खुलेआम मंच से बचाना, रेप, हत्याओं को जायज ठहराने की कोशिश करना और आतंकियों को क्लीन चिट दे देना, ये पता नहीं मक्कारी की श्रेणी में आएँगे की नहीं। अपनी तकरीर में स्वरा ने गाजा पर खूब आँसू बहाए लेकिन हमास के आतंकियों को आलोचना में उनके मुँह से 2 शब्द तक नहीं निकले।

पहले भी आतंकियों का बचाव करती रही है स्वरा

ऐसा पहली बार भी नहीं है जब स्वरा ने इस तरह की हिमाकत की हो, जिस दिन हमास के आतंकियों ने हमला किया उस दिन से ही स्वरा ने हमास के आतंकियों को बचाना शुरू कर दिया था।

इस हमले के तुरंत बाद स्वरा ने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा, “अगर आपको फिलिस्तीनियों पर इजरायल के हमले से सदमा नहीं लगा तो…इजरायल पर हमास के हमलों से आपका सदमा और डर पाखंडी लगता है।” यानी स्वरा यह बता रही थी कि हमास ने जो हत्याएं की हैं, रेप किए हैं उन सब पर लोग शांत रहे, उन्हें सदमा ना लगे क्योंकि यह सब उसकी नजरों में गलत नहीं था।

इजरायल पर ही लगाए यौन हिंसा के आरोप

कुछ दिनों पहले की ही बात है जब BBC ने एक रिपोर्ट छापी कि किस तरह हमास के आतंकियों ने रेप और यौन हिंसा को नरसंहार की रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया था। स्वरा यहाँ भी आतंकियों का बचाव करने से नहीं चूकी। स्वरा ने कह दिया कि स्वरा ने अपने ट्वीट में उल्टा इजरायल पर इल्जाम लगाए। उसने यह बताया कि हमास द्वारा यौन उत्पीड़न की खबरें झूठी हैं।

क्या इजरायल के दर्द पर प्रोपेगैंडा करने वाले ‘मक्कार’ नहीं?

स्वरा जैसे लोग कथित सेकुलर लोग झूठे और मनगढ़ंत इतिहास का लबादा ओढ़कर आतंकियों को कुकृत्यों को जायज ठहराते हैं। स्वरा ने अपनी तकरीर में कहा कि इतिहास 7 अक्टूबर से नहीं बल्कि 1948 से देखा जाएगा। मतलब इतिहास भी जितनी स्वरा की सुविधा हो उनता पीछे ही जाए, अगर स्वरा को इतिहास में ही जाना है तो फिर 2000-2500 साल पीछे क्यों नहीं जाती?

असल में ऐसे लोगों को ना इतिहास से मतलब है, ना किसी के दर्द है इन लोगों को सिर्फ अपने प्रोपेगैंडा से मतलब है। लोग मरते रहे और इनका प्रोपेगैंडा चलता रहे फिर चाहे इसके लिए इन्हें आतंकियों के ही पक्ष में क्यों ना बोलना पड़े। आतंकवाद को जायज ठहराने इनके नैरेटिव को सूट करता है। कभी आपने देखा है कि पाकिस्तान में, बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ स्वरा ने हाथों में तख्ती लेकर आवाज उठाई हो?

इस्लामी मुल्कों से घिरे एक यहूदी मुल्क पर जुल्म होता रहे, उनके बच्चे मरते रहें, उनकी बेटियों-महिलाओं का रेप होता रहे उससे इन्हें कोई मतलब नहीं है। हत्याओं को ऐसे लोगों ने अपनी नौटंकी और प्रोपेगैंडा का हिस्सा मान लिया है। इजरायली लोगों का दर्द इनके लिए सजा नहीं है, क्योंकि असल में प्रोपेगैंडा चलाने वाले ये लोग ‘मक्कारी’ करते हैं।

विदेशी चर्च से कनेक्शन, धर्मांतरण, मीट खिलाने का आरोप और अब हिंदू छात्र की हत्या… अहमदाबाद के ‘सेवेंथ डे स्कूल’ में पहले भी हो चुके हैं कई विवाद, पढ़ें सबकी डिटेल

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में 19 अगस्त 2025 को एक बड़ा हादसा हुआ है। स्कूल में 10वीं कक्षा के एक हिंदू छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि हत्या एक मुस्लिम छात्र ने की। हमले के बाद घायल छात्र को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने आरोपित छात्र को हिरासत में ले लिया है। उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

घटना के बाद, 20 अगस्त 2025 को स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग स्कूल में जमा हुए और उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों ने स्कूल प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि स्कूल में सुरक्षा को लेकर लापरवाही हुई। मामले की जाँच जारी है और पुलिस स्थिति पर नजर रख रही है।

घटना के बाद स्कूल प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों का कहना है कि स्कूल ने घायल छात्र की मदद नहीं की और छात्र को समय पर अस्पताल नहीं ले जाया गया। यह भी कहा गया है कि स्कूल ने हादसे के तुरंत बाद सफाई शुरू कर दी।

स्कूल प्रशासन ने पानी का टैंकर मँगवाया और स्कूल परिसर की धुलाई करवाई। लोगों का आरोप है कि इससे सबूत मिटाने की कोशिश की गई। अब पुलिस इन आरोपों की जाँच कर रही है। मामला सबूत छिपाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।

पहले भी विवादों में रहा है स्कूल

जिस स्कूल में हिंदू छात्र की हत्या हुई, वह पहले भी विवादों में घिर चुका है। 2016 में एक घटना सामने आई थी। उस समय स्कूल के एक शिक्षक ने कक्षा 4 के एक बच्चे की पिटाई कर दी थी। बच्चे की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने मौखिक परीक्षा के दौरान किसी से बात कर ली थी।

इस बात से गुस्साए शिक्षक ने बच्चे के बाल पकड़कर मारपीट की। आरोप है कि शिक्षक ने चेहरे पर घूंसा मारा, जिससे बच्चे के खून बहने लगा। इस घटना को लेकर भी स्कूल की काफी आलोचना हुई थी।

इस घटना के बाद कई अभिभावक स्कूल पहुँच गए। उन्होंने स्कूल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। अभिभावकों के दबाव के बाद स्कूल प्रशासन ने शिक्षक को निलंबित कर दिया। निलंबित शिक्षक का नाम ‘मोसेस अदला‘ था।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह शिक्षक पहले भी चार बच्चों की पिटाई कर चुका है। अभिभावकों ने इस मामले की शिकायत खोखरा थाने में की थी। पुलिस ने केस दर्ज कर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की थी।

यह स्कूल अक्टूबर 2024 में भी विवादों में आया था। उस समय स्कूल का स्टाफ 200 छात्रों को मेहसाणा के एक वॉटर पार्क में लेकर गया थे। इस यात्रा के लिए जिला शिक्षा कार्यालय से कोई अनुमति नहीं ली गई थी, जो कि सरकारी नियमों का उल्लंघन थी।

घटना सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारियों ने इसका संज्ञान लिया। उन्होंने स्कूल प्रशासन को बकायदा नोटिस भेजा था। साथ ही, पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई गई थी।

स्कूल प्रशासन पर और भी गंभीर आरोप

हिंदू छात्र की हत्या के बाद स्कूल प्रशासन पर कई सवाल उठे हैं। स्थानीय लोगों ने स्कूल की भूमिका पर शक जताया है। मृतक छात्र के दादा ने ऑपइंडिया से बातचीत में बड़ा दावा किया। घटना वाले दिन कुछ मुस्लिम छात्रों ने चेहरे ढक रखे थे। उन्होंने पीड़ित छात्र पर चाकू से हमला कर दिया। मृतक के दादा ने कहा कि घटना से दो महीने पहले ही स्कूल में शिकायत दी गई थी। शिकायत में कहा गया था कि मुस्लिम छात्र हिंदू छात्रों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन स्कूल ने कोई कार्रवाई नहीं की।

इसके अलावा, दादा ने बताया कि उनका पूरा परिवार शाकाहारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम छात्र स्कूल में मटन लाते थे। उनके पोते को पनीर बताकर मटन खिलाया जाता था।

इतना ही नहीं, स्कूल कैब के मालिक ने भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्रों पर हमले किए हैं। अब इन आरोपों की पुलिस जाँच कर रही है।

पीड़ित छात्र के दादा ने बताया कि उन्होंने कई बार वीडियो बनाकर स्कूल को सबूत दिए। उन्होंने लगातार शिकायतें कीं, लेकिन स्कूल ने कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने धर्मांतरण का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि पहले हिंदू छात्रों पर ईसाई या मुस्लिम बनने का दबाव डाला जाता था।

अन्य अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने भी यही आरोप लगाए। उनका कहना है कि मुस्लिम छात्र लगातार हिंदू छात्रों को परेशान करते थे। इन घटनाओं की स्कूल में शिकायत की गई, लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके अलावा एक और गंभीर आरोप सामने आया है। कहा गया कि स्कूल में नैतिक शिक्षा के नाम पर ईसाई मजहब का प्रचार किया जा रहा है। सिलेबस के जरिए छात्रों को ईसाई मजहब की ओर आकर्षित करने की कोशिश हो रही है।

इसके अलावा, एक महिला ने बड़ा दावा किया है। उसने कहा कि स्कूल संचालक अभिभावकों से ₹2 लाख माँग रहे थे। साथ ही, छात्रों से कहा जा रहा था कि वे बिना बोर्ड परीक्षा दिए पास हो जाएँगे। इन आरोपों की भी अब जाँच की जा रही है।

चर्च के जरिए चलता स्कूल

जाँच में पता चला कि यह स्कूल ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च‘ नाम का एक विदेशी संगठन चलाता है। इस संगठन का मुख्यालय अमेरिका में है। अहमदाबाद में यह स्कूल एक स्थानीय ट्रस्ट, ‘एश्लॉक ट्रस्ट’ के जरिए चलाया जाता है। यह ट्रस्ट भी उसी चर्च का हिस्सा है। पूरी दुनिया में, यह चर्च संगठन 7,804 स्कूल और कॉलेज चलाता है।

इस स्कूल के मूल्य और नियम ईसाई मजहब के अनुसार बनाए गए हैं। चर्च के स्कूल अधिकतर चर्च के नियमों के अनुसार चलते हैं। दुनिया भर में, ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च संगठन’ सभी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के नियम बनाता है और फिर उन पर लागू करवाता है।

स्कूल का प्रिंसिपल जी इमैनुएल

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल के प्रिंसिपल का नाम जी इमैनुएल है। जी इमैनुएल ईसाई मजहब को मानते हैं और पूरे स्कूल का प्रबंधन संभालते हैं। हत्या से पहले, स्थानीय लोग और अभिभावक प्रिंसिपल से कई बार शिकायत कर चुके थे। लेकिन प्रिंसिपल ने इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया और कोई कदम नहीं उठाया।

यह स्कूल ‘काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन’ (CISCE) से जुड़ा है। यह एक गैर-सरकारी संगठन है। यह संस्था 1990 से स्कूल की पढ़ाई की देखरेख करती है। खास बात यह है कि प्रिंसिपल जी इमैनुएल खुद इस संस्था का अध्यक्ष है।

सेवेंथ डे स्कूल CISCE और गुजरात बोर्ड दोनों से जुड़ा हुआ है। चूंकि स्कूल के प्रिंसिपल खुद CISCE के अध्यक्ष हैं, इसलिए कई आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर परिषद का अध्यक्ष ही स्कूल का प्रिंसिपल है, तो स्कूल के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा?

हालाँकि, प्रिंसिपल इमैनुएल की तरफ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है। पुलिस फिलहाल मामले की जाँच कर रही है।

‘भारत-चीन प्रतिद्वंदी नहीं, साझेदार’: टैरिफ विवाद के बीच चीनी राजदूत ने अमेरिका पर किया पलटवार, कहा- चुप रहे तो धमकी देने वालों को मिलेगी ताकत

पिछले साल तक भारत के खिलाफ बोलने वाले चीन के अब सुर बदल गए हैं। वह अमेरिका के भारत पर लगाए गए दोगुने टैरिफ को लेकर अब खुलकर भारत के पक्ष में खड़ा हो गया है। चीन ने भारत के समर्थन में एक सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है।

चीन के भारत में राजदूत शू फेइहोंग ने कहा, “अमेरिका लंबे समय से मुक्त व्यापार से लाभ उठाता रहा है, लेकिन अब वह टैरिफ को सौदेबाजी के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में चुप्पी केवल धमकाने वाले को और हिम्मत देती है। चीन भारत के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा।”

नई दिल्ली के थिंक टैंक चिंतन रिसर्च फाउंडेशन और सेंटर फॉर ग्लोबल इंडिया इनसाइट्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में चीनी राजदूत फेईहोंग ने कहा कि भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि साझेदार हैं। दोनों देशों को आपस में रणनीतिक विश्वास और सहयोग को बढ़ाना चाहिए।

गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर के आयात पर 50% तक का शुल्क लगाने की घोषणा की है। पहले भारत पर 25% टैरिफ लगाया था, जो 7 अगस्त से लागू हो गया। बाद में घोषणा की 25% अतिरिक्त टैक्स लगेगा जिसके बाद ये कुल 50% हो गया। साथ ही ट्रंप ने चीन पर भी 30 प्रतिशत टैरिफ लगाया है।

असल में ये घोषणा भारत के रूस के साथ संबंधों और रूसी तेल को खरीदने के विरोध में लगाया गया है। अमेरिका का आरोप है कि भारत सस्ते रूसी तेल को खरीदकर मुनाफा कमा रहा है। इस पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे ‘आर्थिक धमकी’ की नीति कहा है।

चीन ने अमेरिका के टैरिफ नीति को की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वह इस प्रकार के टैरिफ का पूरी तरह से विरोध करता है। चीन का कहना है कि यह अमेरिका की एकतरफा और अनुचित व्यापार नीति है, जो वैश्विक व्यापार की व्यवस्था को नुकसान पहुँचा सकती है।

चीन के भारत में राजदूत शू फेइहोंग ने इस मुद्दे पर आगे कहा कि अमेरिका विभिन्न देशों से अत्यधिक कीमतें वसूलने के लिए दबाव बना रहा है और भारत पर लगाए गए टैरिफ इसी नीति का हिस्सा हैं।

राजदूत फेइहोंग ने यह भी कहा कि वह विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे बहुपक्षीय व्यापार ढाँचे की रक्षा के लिए भारत का समर्थन करेगा। यह बयान भारत और चीन के बीच बढ़ते सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को भी दर्शाता है।

आलोचक बन गए प्रशंसक

ग्लोबल टाइम्स, चीनी सरकार का वो अखबार जो भारत के खिलाफ नैरेटिव फैलाने के लिए कुख्यात था, वो अब भारत के साथ दोस्ती और विकास की बातें करने लगा है। ट्रंप के टैरिफ के बीच चीन अब भारत के साथ अपनी दोस्ती पक्की करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है।

6 अगस्त 2025 को ग्लोबल टाइम्स ने एक ओपिनियन (विचार) प्रकाशित किया था। इसकी हेडलाइन थी “भारत ‘विदेशी निवेश का कब्रिस्तान’ के लेबल को क्यों नहीं हटा पा रहा?” इस लेख में तर्क दिया गया कि पश्चिमी मीडिया द्वारा फैलाया गया चीन और भारत के बीच ‘कौन किसकी जगह लेगा’ का नैरेटिव असल में बेबुनियाद है।

इसके अलावा भारत स्थित चीन के दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने भी X पर यह लेख शेयर किया है। उन्होंने हाथी और ड्रेगन की दोस्ती दिखाने वाली तस्वीर शेयर कर लिखा, “आज के समय में दोनों देशों के लिए सहयोग और सहमति को बढ़ाना और एशिया व विश्व स्तर पर शांति को बढ़ावा देना समझदारी की बात होगी।”

भारत-चीन साझेदारी पर जोर

चीन ने भारत के साथ हाल ही में सीमा विवाद को सुलझाने के लिए WMCC कार्य समूह बनाने, सीमा बाजारों को फिर से खोलने और रिवर डेटा साझा करने जैसे कदम उठाए हैं। चीनी राजदूत ने भारत और चीन को एशिया की ‘डबल इंजन शक्ति’ बताया और कहा कि दोनों देशों को मिलकर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।

फेइहोंग ने बताया, “भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए चीन की ओर से कैलाश पर्वत और झील की यात्रा फिर से शुरू की है। भारत ने भी चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा फिर से शुरू कर दिया है।” इसके जरिए दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और रणनीतिक सहय़ोग को बढ़ाने की और काम किया जा रहा है।

इसके साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले सप्ताह बीजिंग की यात्रा पर जाने वाले हैं। 2018 के बाद ये उनकी पहली चीन यात्रा होगी। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

‘राम राज्य’ का बनाया मजाक, माहौल बिगाड़ने का किया काम: असम में यूट्यूबर अभिसार शर्मा के खिलाफ FIR, देशद्रोह की भी धारा लगी

गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पत्रकार और यूट्यूबर अभिसार शर्मा के खिलाफ एक FIR दर्ज की है। यह FIR उनके एक यूट्यूब वीडियो के कारण दर्ज की गई है। शिकायत में कहा गया है कि अभिसार शर्मा ने अपने वीडियो में असम और केंद्र सरकार का मजाक उड़ाया है।

FIR में आरोप लगाया गया है कि उनका वीडियो सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काता है। पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धाराओं 152 (राजद्रोह), 196 और 197 के तहत दर्ज किया है।

शिकायत किसने और क्यों की?

यह शिकायत गुवाहाटी के रहने वाले आलोक बरुआ नाम के 23 वर्षीय व्यक्ति ने दर्ज कराई है। शिकायत में बताया गया कि अभिसार शर्मा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने ‘राम राज्य’ के सिद्धांत का मजाक भी उड़ाया।

शिकायत में यह भी बताया गया है कि अभिसार शर्मा ने कहा कि सरकार ‘सिर्फ हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण’ पर टिकी है। शिकायतकर्ता का मानना है कि ये टिप्पणियाँ जानबूझकर सरकारों को बदनाम करने और लोगों में नफरत फैलाने के लिए की गई हैं।

शिकायतकर्ता के अनुसार, अभिसार शर्मा की टिप्पणियाँ समाज में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का काम सकती हैं। इसके अलावा अभिसार शर्मा का वीडियो उनके इलाके में भी चर्चा का विषय बन गया है, जिससे लोग चिंतित हैं।

आगे क्या होगा?

पुलिस का कहना है कि ये आरोप BNS के उन प्रावधानों के तहत आते हैं जो भारत की संप्रभुता और एकता को खतरे में डालते हैं। साथ ही, ये आरोप विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ काम करने से जुड़े हैं।

इस मामले की जाँच अब गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच के हाथ में हैं। पुलिस सभी पहलुओं की जाँच करेगी कि क्या वीडियो में की गई टिप्पणियाँ वास्तव में कानून का उल्लंघन करती हैं या नहीं।

असम में घुसपैठ पर सीएम हिमंता का बड़ा वार, 18 वर्ष से ऊपर के लोग अब नहीं बनवा पाएँगे आधार कार्ड: सिर्फ SC-ST-चाय फर्म में काम करने वालों को छूट

असम में घुपैठियों से निपटने के लिए सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। असम सरकार ने फैसला किया है कि 18 साल से अधिक उम्र के लोगों का अब आधार कार्ड नहीं बनाया जाएगा। हालाँकि, इससे कुछ समुदायों को कुछ समय के लिए छूट दी गई है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने गुरुवार (21 अगस्त 2025) को मंत्रिमंडल की बैठक के बाद बताया कि यह फैसला अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को आधार कार्ड मिलने से रोकने के लिए लिया गया है। यह निर्णय अक्टूबर के पहले सप्ताह से लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी का आधार कार्ड नहीं है तो वह सितंबर के महीने में इसके लिए आवेदन कर सकता है। वहीं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और चाय बागान समुदाय से जुड़े लोग अगले एक वर्ष तक आधार कार्ड बनवा सकेंगे।

103% हुआ आधार सैचुरेशन: CM हिमंता

सीएम हिमंता ने बताया है कि राज्य में आधार सैचुरेशन 103% हो गया है, जिसका मतलब है कि कोई भी 18 वर्ष से ऊपर का व्यक्ति बिना आधार कार्ड के नहीं बचा है। आधार सैचुरेशन 103% होने का मतलब है कि अगर 100 लोगों की जनसंख्या है तो 103 आधार कार्ड जारी कर दिए गए हैं। इसमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी आधार कार्ड दिए जाने की आशंका है।

उन्होंने कहा, “SC, ST और चाय बागान समुदायों को इससे छूट दी गई है क्योंकि उनके बीच आधार का सैचुरेशन 96% है यानी 4% लोगों को अभी भी कवर किया जाना बाकी है।”

हिमंता ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई भी (अवैध विदेशी) असम में प्रवेश करके आधार कार्ड प्राप्त न कर सके और भारतीय नागरिक होने का दावा न कर सके। हमने वह रास्ता पूरी तरह से बंद कर दिया है।”

रेयर केस में DC जारी करेंगे आधार कार्ड: CM

हिमंता ने स्पष्ट कर दिया है कि दुर्लभतम मामलों में जिला आयुक्त (DC) को आधार कार्ड जारी करने का अधिकार होगा। उन्होंने कहा, “एक महीन के बाद SDC या सर्किल ऑफिसर आधार कार्ड जारी नहीं कर पाएँगे। केवल DC के पास यह अधिकार होगा।”

उन्होंने कहा कि आधार कार्ड जारी करने से पहले DC को SB (स्पेशल ब्रांच) रिपोर्ट और विदेशी न्यायाधिकरण की रिपोर्ट की जांच करनी होगी।

असम में बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। घुसपैठिए स्थानीय लोगों की मदद से आधार कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लेते हैं और फिर उनका इस्तेमाल कर अन्य कागजात भी उन्हें मिल जाते हैं। सीएम हिमंता के इस फैसले के बाद अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए असम में आधार कार्ड हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

असम में तेजी से बदल रही डेमोग्राफी, 2041 तक बराबर होंगे हिंदू-मुस्लिम

हिमंता ने पिछले महीने बताया था कि राज्य में 2041 तक मुस्लिम जनसंख्या हिंदुओं के बराबर हो जाएगी। सीएम सरमा ने बताया था कि 2011 में असम की कुल जनसंख्या 3.12 करोड़ थी, जिसमें मुस्लिम जनसंख्या 1.07 करोड़ (लगभग 34.22%) और हिंदू जनसंख्या 1.92 करोड़ (लगभग 61.47%) थी।

उन्होंने कहा था कि असम में रहने वाले महज 3% मुस्लिम ही असमिया मूल के हैं जबकि 31% मुस्लिम आबादी घुसपैठिए हैं जो मुख्यतः बांग्लादेश से आए हैं। उन्होंने इस बात की भी आशंका जताई कि अगर इसी तरह चलता रहा तो 2021, 2031 और 2041 तक असम की जनसंख्या में 50 फीसदी तबका मुस्लिम होगा और हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक बन जाएगा।

हिमंता ने बताया था कि 2001 में असम के 23 जिलों में से 6 मुस्लिम बहुल थे। इनमें धुबरी (74.29), गोलपारा (53.71), बारपेटा (59.37), नगांव (51), करीमगंज (52.3) और हैलाकांडी (57.63) थी। 2011 में जिलों की संख्या 27 हुई और इनमें 9 जिले मुस्लिम बहुल हो गए।

सीएम सरमा ने जनसांख्यिकीय बदलाव पर कहा कि ये सिर्फ ‘भूमि जिहाद’ ही नहीं बल्कि असम को खत्म करने वाला जिहाद है। योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम आबादी सरकारी और जंगलों की जमीन पर भी कब्जा कर रही है। इसके कारण असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान खतरे में पड़ गई है। अगर यही प्रवृत्ति जारी रही तो अगले 20 वर्षों में असम के मूल निवासी अल्पसंख्यक बन सकते हैं।

असम में 4 साल में घुसपैठियों से छुड़ाई गई 1.29 लाख बीघा जमीन

असम में घुसपैठ से निपटने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। जिनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानकर वापस उनके देश भेजना और घुसपैठियों द्वारा जबरन कब्जाई गई जमीन को खाली कराना जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।

हिमंता ने बीते महीने ही बताया था कि असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिकों’ का कब्जा है। उन्होंने कहा था, “2021 में जमीन खाली कराने की योजना शुरू की गई थी जिसके तहत अब तक 77,420 बीघा जमीन को अतिक्रमण से साफ कर दिया गया है। इसमें अधिकतर बंगाल के मुस्लिमों का कब्जा था।”

हिमंता ने कहा था, “दरंग जिले में अभियान की सफलता के बाद बोरसोल्ला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बतद्रा, चापर और पैकन में भी इस अभियान को चलाया गया। पिछले 4 वर्षों में हमने 1.29 लाख बीघा कब्जे वाली जमीन को मुक्त कराया है। अब इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा जंगल बनाने के लिए और प्रदेश की जनता के लिए उपयोग में लाया जा रहा है।”

बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए असम का रुख करते हैं। सीएम हिमंता ने इस बात को बार-बार दोहराया है कि वे बांग्लादेशी घुसपैठियों से असम को मुक्त करना चाहते हैं और इसके लिए वो लगातार अभियान भी चला रहे हैं।

टैरिफ विवाद के बीच ट्रंप की नई चाल? यूएस एंबेसी ने नकारी ‘भारत में मतदान के लिए ₹175 करोड़ देने की बात’

टैरिफ विवाद के बीच भारत पर अलग ढंग से व्यापार का दबाव बनाने के लिए ट्रंप ने नया दांंव चला है। पहले जहाँ खबर आई थी कि ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी एजेंसी USAID ने भारत में मतदान बढ़ाने के लिए 175 करोड़ रुपये दिए। लेकिन नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

अमेरिकी दूतावास ने भारत के विदेश मंत्रालय को बताया कि 2014 से 2024 तक USAID ने भारत में चुनाव या मतदान से जुड़ा कोई काम नहीं किया और न ही ऐसी कोई रकम दी या ली और न ही भारत में मतदान से जुड़ी कोई गतिविधि की।

फरवरी 2025 में विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी विभाग DOGE (Department of Government Efficiency) की एक समीक्षा का हवाला देते हुए दावा किया कि USAID दुनिया भर में चुनाव और मतदाता संबंधी परियोजनाओं को फंड कर रहा है।

ट्रंप ने खास तौर पर कहा कि भारत को भी इसमें शामिल किया गया था और 2.1 करोड़ डॉलर (174.3 करोड़ रुपए) मतदाता संख्या बढ़ाने के लिए रखे गए थे। इस दावे से नई दिल्ली में तुरंत चिंता बढ़ी और भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने अमेरिका से पूरे मामले की विस्तृत जानकारी माँगी।

28 फरवरी 2025 को विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से पिछले दस सालों में भारत में चलाए गए सभी USAID कार्यक्रमों की पूरी जानकारी देने को कहा। मंत्रालय ने खर्च का विवरण, सहयोगी संगठनों की जानकारी और यह भी पूछा कि क्या किसी तरह की मतदाता जुटाने से जुड़ी गतिविधियाँ हुई थीं।

इस पर अमेरिकी दूतावास ने 2 जुलाई 2025 को जवाब देते हुए आंकड़े सौंपे। दूतावास ने साफ किया कि सभी कार्यक्रम केवल भारत सरकार के साथ किए गए सात साझेदारी समझौतों के तहत ही चलाए गए हैं। ये कार्यक्रम मुख्य रूप से विकास सहयोग, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और शासन सुधार से जुड़े थे, न कि मतदान या चुनाव से।

अमेरिकी दूतावास ने साफ कहा कि USAID भारत ने 2014 से 2024 के बीच भारत में मतदान के लिए न तो 21 मिलियन डॉलर (175 करोड़ रुपए) लिए और न ही दिए और न ही कोई मतदान संबंधी गतिविधि चलाई।

29 जुलाई 2025 को दूतावास ने एक और पत्र भेजकर इस रुख को दोहराया और विदेश मंत्रालय को बताया कि बाइडेन प्रशासन के फैसले के बाद भारत में USAID के सभी काम 15 अगस्त 2025 तक बंद हो जाएँगे।

इसके बाद 11 अगस्त 2025 को दूतावास ने आर्थिक मामलों के विभाग को लिखे पत्र में पुष्टि की कि भारत के साथ किए गए सभी सात साझेदारी समझौते समाप्त कर दिए गए हैं। यह बयान ट्रंप के उन आरोपों के बीच अहम है, जिनमें उन्होंने अमेरिकी विदेशी सहायता के राजनीतिक इस्तेमाल की बात कही थी। ट्रंप के दावे जनवरी 2025 के कार्यकारी आदेश 14169 के बाद सामने आए थे, जिसके तहत विदेशी सहायता कार्यक्रमों की बड़ी समीक्षा शुरू की गई थी।

हालाँकि DOGE ने दुनिया भर में चुनाव और राजनीतिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने वाली CEPPS परियोजनाओं के लिए USAID द्वारा दिए गए 486 मिलियन डॉलर(4,033.8 करोड़ रुपए) के फंड को रद्द करने का ऐलान किया था, लेकिन नई दिल्ली स्थित दूतावास ने साफ कर दिया कि भारत को इसमें से कुछ भी नहीं मिला।

इसके साथ ही दूतावास ने 2022, 2023 और 2024 के लिए कार्यक्रमों और लाभार्थियों का पूरा ब्यौरा भी जारी किया। अधिकारियों ने फिर जोर देकर कहा कि भारत में USAID की सारी गतिविधियाँ विकास से जुड़ी और पारदर्शी हैं और उनका चुनाव या राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

अमेरिकी दूतावास ने यह भी बताया कि 15 अगस्त 2025 तक USAID के सारे काम भारत में बंद हो चुके हैं। ट्रंप का दावा गलत साबित होने से उनकी विश्वसनीयता पर फिर सवाल उठे हैं।

जैश-ए-मोहम्मद का ‘डिजिटल हवाला’: 300+ मरकज बनाने के लिए 390 करोड़ रुपए जुटा रहा आतंकी मसूद अजहर, FATF से बचने के लिए डिजिटल वॉलेट्स का कर रहा इस्तेमाल

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान में कई आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इनमें आतंकी मसूद अजहर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकाने भी शामिल थे। अब मसूद अजहर ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के साथ मिलकर फिर से आतंकी ठिकाने को खड़ा करने का प्लान बनाया है। इसके लिए 3.9 बिलियन (390 करोड़) पाकिस्तानी रुपए इकट्ठा करने का योजना नहीं है।

इस बार इन आतंकियों और उनके आकाओं ने अतंरराष्ट्रीय एजेंसियों की पकड़ में आने से बचने के लिए पैसे इकट्ठा करने का नया तरीका ईजाद किया है। आतंकी इस बार किसी बैंक खाते में नहीं बल्कि डिजिटल वॉलेट में पैसा जुटा रहे हैं।

FATF जैसी संस्थाओं से बचने के लिए जैश की चाल

पाकिस्तान आतंकियों की फंडिंग के लिए दुनिया भर में कुख्यात है। इसके चलते वह लंबे समय तक फाइनेंशियल एक्शन टाक्स फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में था। इससे बचने के लिए पाकिस्तान ने जो योजना पेश की उसमें जैश-ए-मोहम्मद पर लगाम लगाना शामिल था। पाकिस्तान ने दावा किया कि वह आतंकियों को पैसे नहीं देता है और इसके लिए उसने मसूद अजहर, उसके भाई रऊफ असगर और उसके सबसे छोटे भाई तल्हा अल सैफ के बैंक खातों पर निगरानी रखने की बात कही थी।

पाकिस्तान को इन चालों के जरिए 2022 में FATF की ग्रे लिस्ट से निकलने में तो सफलता मिली लेकिन उसकी चालें कम-से-कम भारत से छिपी नहीं थीं। जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन पाकिस्तान में खूब फलते फूलते रहे और आतंक का कारोबार बिल्कुल धीमा नहीं हुआ। आतंकियों को अपना खर्च चलाने के लिए पैसे की जरूरत थी और बैंक खातों की निगरानी के चलते यह काम मुश्किल होता जा रहा था। इसके लिए अब EasyPaisa और SadaPay जैसे पाकिस्तानी डिजिटल वॉलेट्स का सहारा लिया गया है।

भारत के डर से 313 नए कैंप बनाएगा जैश

ISI और जैश अब मस्जिदों और मरकजों के निर्माण के नाम पर 3.9 बिलियन पाकिस्तानी रुपए इकट्ठा करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे ही मरकजों का इस्तेमाल आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा किया करता था। भारत की एजेंसियों का मानना है कि इस पैसे के बड़े हिस्से का इस्तेमाल आतंकियों के पालन-पोषण और आतंक के लिए हथियार खरीदने में किया जाता है।

जैश का लक्ष्य है कि वह इस पैसे के जरिए 313 नए कैंप खोल दे। सैकड़ों की तादाद में नए कैंप खोलने का मकसद भारत का डर भी है। जिस तरह ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने जैश के ठिकानों को उड़ाया है, ऐसे में वो भारत को कन्फ्यूज करने के लिए बड़ी संख्या में नए कैंप खोल रहा है।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में जैश के हेड क्वॉर्टर मरकज सुभानअल्लाह को भी उड़ा दिया गया था। साथ ही, जैश के 4 अन्य ट्रेनिंग कैप मरकज बिलाल, मरकज अब्बास, महमोना जोया और सरगल भी नष्ट कर दिए गए थे। भारत के इस ऑपरेशन में 100 से अधिक आंतकी मारे गए थे।

जैश के 5 डिजिटल वॉलेट मिले

यह पैसा आतंकी के मसूद अजहर के परिवार के सदस्यों के नाम पर बने डिजिटल वॉलेट के जरिए इकट्ठा किया जा रहा था। बैंकों के जरिए लेन-देन ना होने पर पाकिस्तान यह कहकर अपनी जान छुड़ा सकता था कि जैश को मिलने वाले धन में कटौती हो गई है जबकि असल में भारी संख्या में पैसा आतंकियों के पास पहुँच रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 5 ऐसे वॉलेट मिले हैं जिनका जैश से सीधा संबंध है। आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, एक SadaPay खाता मसूद अजहर के भाई तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर था, जो पाकिस्तानी मोबाइल नंबर +92 3025xxxx56 से जुड़ा था। यह नंबर जैश के हरिपुर जिला कमांडर अफताब अहमद के नाम पर रजिस्टर्ड था।

मसूद अजहर के बेटे अब्दुल्ला अजहर के मोबाइल नंबर +92 33xxxx4937 से भी एक EasyPaisa वॉलेट जुड़ा हआ था। वहीं, गाजा में मदद के नाम पर भी एक वॉलेट चलाया जा रहा था। यह वॉलेट +92xxxx195206 नंबर से चलाया जा रहा था और खालिद अहमद के नाम पर थाष हालाँकि, मसूद अजहर का बेटा हम्माद अजहर इसे संचालित कर रहा था।

मस्जिदों में चल रहा डोनेशन का अभियान

ऑनलाइन पैसा लेने के अलावा जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी जुमे की नमाज के दौरान भी मस्जिदों से पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। इन्हें इस तरह दिखाया जाता है कि इस पैसे का इस्तेमाल गाजा में मदद के लिए किया जाएगा लेकिन असल में इस पैसे को जैश अपने आतंकी इरादों को पूरा करने के लिए ही जुटा रहा था। जैश के कमांडर वसीम चौहान (उर्फ वसीम खान) का एक वीडियो भी सामने आया था जिसमें वह एक जुमे की नमाज के बाद इकट्ठा हुए पैसे को गिन रहा था।

मसूद अजहर और उसके करीबियों द्वारा चलाया जाने वाला एक ट्रस्ट ‘अल-रहमत’ भी आतंकी फंडिग के इस अभियान में एक अहम कड़ी बन गया है। यह ट्रस्ट गुलाम मुर्तजा के नाम से संचालित नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान के एक खाते (खाता नंबर 105XX9) के जरिए धन इकट्ठा कर रहा था। यह ट्रस्ट हर साल जैश के फंड में करीब 100 करोड़ पाकिस्तान रुपए का योगदान देता है।

सोशल मीडिया से विदेश तक पैसों की माँग कर रहा जैश

खुफिया एजेंसियों को मिली ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, जैश ने अपने सक्रिय गुर्गों और प्रॉक्सी नेटवर्क को पूरी तरह से एक्टिव कर दिया है और अब फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए भी धन उगाही की योजना बनाई गई है।

जानकारी के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स पर जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े प्रॉक्सी अकाउंट्स और सीधे इसके कमांडरों द्वारा संचालित अकाउंट्स से लगातार पोस्टर, उकसाने वाले वीडियो और यहां तक कि मसूद अजहर द्वारा लिखी गई चिट्ठी भी शेयर की जा रही है।

इन पोस्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि जैश-ए-मोहम्मद 313 मरकज का निर्माण कर रहा है। ऐसे हर मरकज के लिए 12.5 मिलियन पाकिस्तानी रुपए की जरूरत बताई है। यह फंड रेजिंग केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। जैश-ए-मोहम्मद ने विदेशों में बसे पाकिस्तानी नागरिकों से भी पैसे देने की माँग की है। जाहिर है कि इस रकम का इस्तेमाल आतंकियों की ट्रेनिंग, हथियारों की सप्लाई और नेटवर्क फैलाने पर ही खर्च किया जाएगा।

डिजिटल वॉलेट्स के जाल का कैसे फायदा उठा रहा जैश?

इकोनॉमिक टाइम्स रिपोर्ट के मुताबिक, जैश जिन EasyPaisa और SadaPay जैसे डिजिटल वॉलेट्स का इस्तेमाल कर रहा है, ये वॉलेट्स परंपरागत बैंकिंग से अलग वॉलेट-टू-वॉलेट व वॉलेट-टू-कैश ट्रांसफर की सुविधा देते हैं। इसी कारण FATF जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए इन पर नजर रखना मुश्किल होता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मसूद अजहर का परिवार एक समय में 7 से 8 वॉलेट्स ऑपरेट करता है और हर 4 महीने बाद उन्हें बदल देता है। जब किसी वॉलेट में बड़ी रकम इकट्ठी हो जाती है तो उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर नकद निकाल लिया जाता है। बताया जा रहा है कि हर महीने करीब 30 नए वॉलेट्स खोले जाते हैं।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अमित दूबे का कहना है कि ये डिजिटल वॉलेट्स ‘डिजिटल हवाला‘ की तरह काम करते हैं, जो बिना बैंकिंग नेटवर्क के पैसों का लेनदेन संभव बनाते हैं। यही कारण है कि जैश का यह नेटवर्क जांच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं की पकड़ से बच निकलता है।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मौजूदा वक्त में जैश के वित्तीय लेनदेन इन वॉलेट्स के जरिए किए जानते हैं जो करीब 80-90 करोड़ पाकिस्तानी रुपए है। इस पैसे का इस्तेमाल हथियार खरीदने, ट्रेनिंग कैंप चलाने, अजहर के परिवार की मदद के लिए और लग्जरी कारों के लिए होता है। बताया जाता है कि इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा अरब देशों से आता है।

‘बहुत बड़ा सेक्स रैकेट चल रहा है यहाँ’: वायरल वीडियो में नंगा दिखने वाला रामपुर की मस्जिद का इमाम हथियारों के साथ गिरफ्तार, धर्म परिवर्तन की करा रहा था कोशिश

रामपुर की एक मस्जिद में सेक्स रैकेट चलाने का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की है और आरोपित इमाम रहीस अहमद को गिरफ्तार किया है। रामपुर पुलिस ने रहीस अहमद के पास से हथियार भी बरामद किए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेके पैसेल रोड की नदराबाग मस्जिद से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था, जिसमें एक लड़की इमाम पर सेक्स रैकेट चलाने के गंभीर आरोप लगा रही थी। वायरल वीडियो में लड़की की आवाज भी सुनी जा सकती है, जिसमें वो साफ तौर पर आरोप लगा रही है। इसके बाद रामपुर पुलिस हरकत में आई और जाँच शुरू की। 20 अगस्त 2025 को वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की।

क्षेत्राधिकारी नगर की अगुआई में एक टीम बनाई गई, जो मस्जिद में जाकर जाँच करने लगी। गहन जाँच के बाद 21 अगस्त 2025 को पुलिस ने रहीस अहमद को गिरफ्तार किया। रहीस अहमद शफी अहमद का बेटा है और परचई कुम्हरिया, अजीमनगर का रहने वाला है। गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से 2 तमंचे 12 बोर, 4 जिंदा कारतूस और एक मोबाइल बरामद हुआ।

पुलिस ने बताया कि रहीस अहमद पर धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश और अश्लील वीडियो वायरल करने का आरोप है।

इस मामले में कई और लोगों के शामिल होने की बात सामने आ रही है, लेकिन अभी उनकी पहचान छिपाई गई है। रामपुर पुलिस ने बताया कि कार्रवाई जारी है और जल्द ही बाकी आरोपितों को भी पकड़ा जाएगा। स्थानीय लोग इस घटना से काफी नाराज हैं और पुलिस से सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल- बिल पर कुंडली मारकर बैठ जाएँ गवर्नर तो क्या करें? केंद्र का जवाब- इसका समाधान राजनीतिक ही, तय नहीं कर सकते डेडलाइन

सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के विधेयकों पर फैसला लेने के लिए डेडलाइन लागू करने के मामले पर सुनवाई चल रही है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले की सुनावई कर रही है। गुरुवार (21 अगस्त) को तीसरे दिन भी इस मामले पर सुनवाई जारी रही जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विधेयकों से जुड़ी दिक्कतों के न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने की बात कही है।

यह मामला तमिलनाडु से शुरू हुआ था जहाँ राज्यपाल के बिल रोककर रखने पर राज्य सरकार ने अदालत का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा था कि राज्यपाल के पास पॉकेट वीटो नहीं है। इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रपति को भी राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत ने 14 सवाल पूछे थे जिस पर यह पीठ विचार कर रही है।

बिलों की दिक्कतों के राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे: सरकार

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा था कि अगर राज्यपाल बिलों को अनुमति देने में देरी कर रहे हैं तो इससे निपटने का उपाय क्या हो सकता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि अगर राज्यपाल ऐसा करते भी हैं तो राज्यों को न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे।

तुषार मेहता ने कहा है, “अगर कोई राज्यपाल विधेयकों में देरी कर रहा है तो राजनीतिक समाधान हो सकते हैं। ऐसे समाधान हो भी रहे हैं और हर बार राज्य को सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत नहीं होती। मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलकर बात करते हैं, कभी राष्ट्रपति से जाकर मिलते हैं। कई बार नेताओं का दल जाकर कहता है कि ये बिल अटके पड़े हैं, राज्यपाल से इस पर कार्रवाई करने के लिए कहें। कई बार फोन पर ही बात करके मामला सुलझा लिया जाता है। कभी-कभी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यपाल की बैठक होती है और रोकटोक दूर हो जाती है।”

उन्होंने कहा, “अब सवाल ये है कि क्या अदालत कोई तय समय-सीमा तय कर सकती है? संविधान में जब कोई समय-सीमा दी ही नहीं है। ये दिक्कत कई दशकों से हर राज्य में कभी-न-कभी सामने आती रही हैं। जब नेता समझदारी और राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हैं, तो आपस में बैठकर ही हल निकाल लेते हैं। यही असली समाधान है। देश की हर समस्या का समाधान यहाँ (सुप्रीम कोर्ट) नहीं हो सकता। कुछ समस्याएँ ऐसी भी हैं जिनका समाधान आपको सिस्टम में ही मिल जाएगा।”

कानून की व्याख्या में खुद से कुछ नहीं जोड़ सकता SC: सॉलिसिटर

CJI गवई ने कहा कि अगर कुछ चीज गलत है तो उसका समाधान भी होना चाहिए। इस पर मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सभी समस्याओं के लिए समाधान नहीं हो सकता है। कोर्ट ने जब कहा कि ‘कानून की व्याख्या’ न्यायालय द्वारा की जानी चाहिए तो इस पर मेहता ने कहा कि व्याख्या के दौरान संविधान में शब्द जोड़ना बिल्कुल अलग बात है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हम डेडलाइन नहीं तय कर सकते हैं तो ऐसे मामलों का समाधान क्या होना चाहिए। मेहता ने कहा, “आपकी आपत्ति समय-सीमा तय करने के औचित्य पर है लेकिन इससे अदालत को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह खुद समय-सीमा तय करे। कभी–कभार 1-2 राज्यों से ऐसे मामले आते हैं। अगर यही समस्या है तो उसका हल संसद के पास है। सुप्रीम कोर्ट संसद से अनुरोध कर सकता है लेकिन आप सीधे संसद को आदेश नहीं देते। एक संवैधानिक संस्था दूसरी संवैधानिक संस्था को आदेश नहीं देती, यही संवैधानिक मर्यादा है।”

संविधान में 31 जगहों पर है समय-सीमा: मेहता

मेहता ने कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगह ऐसी हैं जहाँ समय-सीमा स्पष्ट रूप से लिखी गई है, क्योंकि संविधान निर्माताओं ने माना कि कुछ काम समयबद्ध तरीके से होने चाहिए। जहाँ समय-सीमा नहीं दी गई, वहाँ यह जान-बूझकर छोड़ा गया है। उन्होंने कहा, “संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर तय किया था कि कुछ कार्यों में समय-सीमा होनी चाहिए और कुछ में नहीं।”

संविधान का कोई अंग ऊपर नहीं: मेहता

मेहता ने तर्क दिया कि राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 200 या 201 के तहत लिया गया फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह मूल रूप से विधायी काम है। उन्होंने कहा, “सहमति की शक्ति एक विधायी कार्य है और चूँकि राज्यपाल/राष्ट्रपति भी संविधान के समान स्तर के संवैधानिक अंग हैं, इसलिए इसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।” मेहता ने कहा कि भारत में संवैधानिक सर्वोच्चता का सिद्धांत लागू होता है और संविधान का कोई भी अंग यह दावा नहीं कर सकता कि वही सबसे ऊपर है।

न्यायिक आतंकवाद ना बने न्यायिक सक्रियता: CJI

CJI गवई ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलनी चाहिए। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि हमें निर्वाचित लोगों को कभी कमतर नहीं आँकना चाहिए। इस पर CJI ने कहा, “हमने निर्वाचित लोगों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद या न्यायिक दुस्साहस नहीं बननी चाहिए।”

मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते हैं। अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हैं। अब मतदाता जागरूक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता है।

बत्तख-हंस छोड़ सूअर खाने लगे चीनी, पंखों का पड़ा अकाल: ‘स्वाद’ में बदलाव से खतरे में बैडमिंटन का खेल, सिंथेटिक ‘चिड़िया’ से खिलाड़ियों का बिगड़ा जायका

बैडमिंटन की चिड़िया या चिड़ी, जो खेल का सबसे जरूरी हिस्सा होती है, वह अब ‘दुर्लभ’ होने की कगार पर पहुँच रही है। हम बात कर रहे हैं शटलकॉक की, जिसका निर्यात मुख्य रूप से चीन से होता है। बीते कुछ वर्षों से चीन में बदल रही खानपान की आदतों से बैडमिंटन की शटलकॉक खतरे में पड़ गई है। एक ओर चीनी लोगों की खाने की डिशेज बदल रही हैं तो वहीं उसके कारण वैश्विक स्तर पर बैडमिंटन के खिलाड़ियों को परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। आइए जानते हैं क्या है ये पूरा मसला।

शटल कैसे बनती है?

बैडमिंटन की शटल (shuttlecock) आमतौर पर बत्तख (duck) या हंस (goose) के पंखों से बनाई जाती है। एक अच्छी गुणवत्ता वाली शटल में लगभग 16 पंख लगते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले मैचों में हंस के पंखों से बनी शटल को प्राथमिकता दी जाती है। असल में ये पंख चीन जैसे देशों से निर्यात किया जाता है क्योंकिइन पक्षियों का वहाँ पालन बड़े पैमाने पर होता है।

चीन में खानपान में कैसे हो रहा बदलाव

हाल के वर्षों में चीन में लोगों की खाने की पसंद तेजी से बदली है। जहाँ पहले चीन के लोगों को बत्तख और हंस का मांस काफी पसंद था तो वहीं अब ये जगह सूअर (pork) के मांस ने ले ली है। बीते कई वर्षों से बत्तख खाने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। लोग पोर्क की माँग अधिक करने लगे हैं।

हंस और बत्तख की माँग कम होने से किसान भी बत्तख और हंस को पालना कम कर रहे हैं। इसके चलते इन पक्षियों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है।

शटल के उत्पादन पर असर

बत्तख और हंस की संख्या में कमी आने से उनके पंख भी कम मिलते हैं। यही पंख शटल बनाने में इस्तेमाल होते हैं। नतीजा यह हुआ कि शटल की सप्लाई में भारी कमी आ गई है और कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। भारत ही नहीं, फ्रांस, डेनमार्क, इंडोनेशिया और अन्य यूरोपीय देशों में भी बैडमिंटन अकादमियों को शटल की कमी झेलनी पड़ रही है।

भारत में शटल की कीमतों में काफी इजाफा देखा जा रहा है। ये कीमतें ₹12,00 से ₹3,000 प्रति शटल पहुँच गई हैं। गोपीचंद अकादमी में तो दो हफ्ते से भी कम का स्टॉक बचा था। वहीं, छोटे स्तर की अकादमी और खिलाड़ियों को इससे भी अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या हो सकते हैं संभावित समाधान

शटल की कमी के संकट को देखते हुए बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (BWF) अब प्लास्टिक या सिंथेटिक शटल पर एक बार फिर विचार कर रही है। फ्रांस के बैडमिंटन संघ जूनियर स्तर की प्रतियोगिताओं में वैकल्पिक शटल इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं।

फ्रांस के अलावा डेनमार्क जैसे कई यूरोपीय देशों में राष्ट्रीय संघों को उच्च गुणवत्ता वाली शटल प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। इसके साथ ही शटल की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर कई समस्याएँ सामने आ रही हैं।

इसके अलावा इंडोनेशिया में शटल की आपूर्ति में कमी के कारण कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है।

कृत्रिम शटल में भी हैं कई चुनौतियाँ

इस समस्या से निपटने के लिए कुछ कंपनियाँ हाइब्रिड शटल बना रही हैं। ये आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से कृत्रिम होती हैं। फिलहाल ये शटल बाजार में अभी महँगी हैं और खेल में उतनी टिकाऊ नहीं हैं जितनी कि पारंपरिक शटल होती हैं।

कृत्रिम शटल अपनी दिशा काफी जल्दी बदल लेती हैं। ऐसे में खिलाड़ियों के लिए उनकी गति और दिशा पर काबू पाना मुश्किल होता है। इसके अलावा ये तेज स्मैश या हिट पर जल्दी टूट जाती हैं। इससे मैच को जारी रखने में काफी मुश्किल होती है।

इसके साथ साथ पारंपरिक शटल का फील कृत्रिम शटल नहीं दे पाती। रैकेट से टकराने के बाद खिलाड़ियों को स्पिन देने में परेशानी आती है।

फिलहाल बैडमिंटन के शटलकॉक के लिए कई समाधान खोजे जा रहे हैं। इसे लेकर उत्पादकता को बढ़ाने और पारंपरिक शटल की कमी को पूरा करने की जद्दोजहद जितनी जल्दी खत्म होगी, खेल जगत के लिए ये उतना ही बेहतर होगा।

जहाँ एक ओर शटल की कमी हो रही है वहीं दूसरी ओर बैडमिंटन के खेल में खिलाड़ियों की संख्या में भी तेजी से इजाफा होता जा रहा है। ऐसे में खिलाड़ियों के मनोबल के लिए ‘चिड़िया’ की अनुपलब्धता उनके हौसले को डिगाने का काम कर सकती है।