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जेल से अब नहीं चलेगी सरकार, संविधान संशोधन बिल पेश करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने बोला हमला: कहा- जिन्होंने लालू यादव की राजनीति खत्म की, अब उनके साथ दे रहे भाषण

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (20 अगस्त 2025) को लोकसभा में संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक, 2025, केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक-2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किए। इन विधेयकों का उद्देश्य राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता को बढ़ावा देना है, लेकिन जैसे ही ये बिल सदन में पेश हुए, विपक्षी दलों ने तीखा विरोध शुरू कर दिया।

नारेबाजी, कागज फाड़ने और हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इस बीच, गृह मंत्री अमित शाह ने अपने बयान में विपक्ष पर जमकर निशाना साधा और अपनी सरकार की मंशा को स्पष्ट किया।

अमित शाह ने बताया भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कदम

गृहमंत्री अमित शाह ने अपने बयान में कहा, “देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश को देखकर मैंने संसद में लोकसभा अध्यक्ष जी की सहमति से संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री जेल में रहते हुए सरकार न चला पाएँ।”

उन्होंने कहा कि इस बिल का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में गिरते नैतिकता के स्तर को ऊपर उठाना और राजनीति में शुचिता लाना है। बिल में तीन मुख्य प्रावधान हैं-

  1. कोई भी व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र या राज्य सरकार के मंत्री के रूप में शासन नहीं चला सकता।
  2. संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा था कि भविष्य में ऐसे राजनेता आएँगे जो गिरफ्तारी के बावजूद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं देंगे। हाल के वर्षों में कुछ मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने जेल से सरकार चलाने की कोशिश की, जो अनैतिक है।
  3. बिल में यह प्रावधान है कि अगर कोई राजनेता 30 दिन के भीतर जमानत नहीं ले पाता, तो 31वें दिन उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। हालाँकि जमानत मिलने पर वह अपने पद पर वापस आ सकता है।

अमित शाह ने जोर देकर कहा, “अब देश की जनता को यह तय करना पड़ेगा कि क्या जेल में रहकर किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा सरकार चलाना उचित है?” उन्होंने इस बिल को राजनीतिक नैतिकता को मजबूत करने वाला कदम बताया और कहा कि यह जनता की भावनाओं का सम्मान करता है।

मोदी बनाम कॉन्ग्रेस की नीति

अमित शाह ने अपने बयान में विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आप को कानून के दायरे में लाने का संविधान संशोधन पेश किया है और दूसरी ओर कानून के दायरे से बाहर रहने, जेल से सरकारें चलाने और कुर्सी का मोह न छोड़ने के लिए कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में पूरे विपक्ष ने इसका विरोध किया है।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस की पुरानी नीतियों का जिक्र करते हुए कहा कि 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संविधान संशोधन संख्या-39 के जरिए प्रधानमंत्री को कानूनी कार्यवाही से ऊपर रखने का प्रावधान किया था। शाह ने तंज कसते हुए कहा, “यह कॉन्ग्रेस की कार्य संस्कृति है कि वे प्रधानमंत्री को कानून से ऊपर करते हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी की नीति है कि हम अपने प्रधानमंत्री, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को कानून के दायरे में ला रहे हैं।”

गृहमंत्री अमित शाह ने इस बिल को जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप बताया और कहा कि यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि कोई भी नेता गंभीर आपराधिक आरोपों में जेल में रहकर शासन नहीं कर सकता। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए इस बिल का विरोध कर रहे हैं।

व्यक्तिगत टिप्पणी पर भी दिया जवाब

विपक्षी सांसद केसी वेणुगोपाल ने शाह पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए कहा कि जब शाह गुजरात के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने एक मामले में नैतिकता का पालन नहीं किया था। इस पर शाह ने तीखा जवाब देते हुए कहा, “मैं कॉन्ग्रेस को याद दिलाना चाहता हूँ कि मैंने अरेस्ट होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था और बेल पर बाहर आने के बाद भी, जब तक मैं अदालत से पूरी तरह निर्दोष साबित नहीं हुआ, तब तक मैंने कोई संवैधानिक पद नहीं लिया था। मेरे ऊपर लगाए गए फर्जी केस को अदालत ने यह कहते हुए खारिज किया कि केस political vendetta से प्रेरित था।”

केंद्रीय गृहमंत्री ने बीजेपी और एनडीए की नैतिकता का हवाला देते हुए कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी ने भी केवल आरोप लगने पर ही इस्तीफा दे दिया था। दूसरी ओर उन्होंने कॉन्ग्रेस पर लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को बचाने का आरोप लगाया।

अमित शाह ने कहा, “जिस लालू प्रसाद यादव को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने अध्यादेश लाया था, जिसका राहुल गाँधी ने विरोध किया था, आज वही राहुल गाँधी पटना में लालू जी को गले लगा रहे हैं। विपक्ष का यह दोहरा चरित्र जनता भली-भांति समझ चुकी है।”

केंद्र सरकार लाई कौन से बिल, जिस पर विपक्ष कर रहा आपत्ति

संविधान (130वाँ संशोधन) विधेयक-2025 में प्रावधान है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक मामले (5 साल या उससे अधिक सजा वाले) में 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे स्वतः पद से हटा दिया जाएगा। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन करता है। सरकार का दावा है कि यह बिल राजनीति में शुचिता लाने और जनता के प्रति नेताओं की जवाबदेही बढ़ाने के लिए है।

विपक्ष ने इस बिल को संविधान के साथ छेड़छाड़ और गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर करने की साजिश करार दिया। विपक्षी सांसदों ने बिल की कॉपियाँ फाड़कर और शाह की ओर कागज फेंककर विरोध जताया।

जेपीसी के पास भेजा गया बिल

हंगामे के बीच शाह ने कहा कि सरकार इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजने का प्रस्ताव रखती है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद शामिल होंगे। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि नैतिकता के मूल्य बढ़ें। हम ऐसे निर्लज्ज नहीं हो सकते कि हम पर आरोप लगें और हम संवैधानिक पद पर बने रहें।”

संविधान संशोधन बिल ने संसद में तीखी बहस और हंगामे को जन्म दिया है। अमित शाह ने इसे नैतिकता और पारदर्शिता का कदम बताया, जबकि विपक्ष इसे संविधान के साथ छेड़छाड़ करार दे रहा है। जेपीसी में इस बिल पर गहन चर्चा होगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह विधेयक भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। जनता भी अब इस सवाल का जवाब ढूँढ रही है कि क्या जेल से सरकार चलाना उचित है, चूँकि वो कुछ समय पहले ही दिल्ली में ऐसा होते देख चुकी है, जिसमें पूरे दिल्ली की व्यवस्थाएँ चरमरा गई थी।

फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे… दुनियाभर से CSDS को मिलता है पैसा, संजय कुमार के ‘डाटा फ्रॉड’ के बाद फंड देने वाली सरकारी संस्थान ने भेजा नोटिस

देश में ‘वोट चोरी’ के नाम पर राजनीतिक बवंडर खड़ा करने वाले सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के संजय कुमार और कॉन्ग्रेस के युवराज राहुल गाँधी समेत कई लोगों के खिलाफ दिल्ली में शिकायत की गई है। फर्जी आँकड़ों के आधार पर ये खेल शुरू करने वाले संजय कुमार अब निशाने पर आ चुके हैं।

इस बीच, सीएसडीएस को सबसे ज्यादा फंडिंग देने वाली सरकारी संस्थान – भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) ने CSDS पर सवाल उठाए हैं और शो कॉज नोटिस जारी किया है। ICSSR ने सीएसडीएस पर फर्जी डेटा पेश करने और चुनाव आयोग की गरिमा को ठेस पहुँचाने का भी आरोप लगाया है। वहीं, सीएसडीएस की विदेशी फंडिंग खासकर जर्मनी की कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन से मिलने वाले करोड़ों रुपए अब जाँच के घेरे में हैं। आइए समझते हैं पूरा मामला..

मामला कैसे शुरू हुआ?

यह विवाद 17 अगस्त 2025 को तब शुरू हुआ जब सीएसडीएस के संजय कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि नासिक वेस्ट का वोटर संख्या लोकसभा चुनाव से विधानसभा चुनाव तक 47.38% बढ़ गई, जबकि हिंगणा में 42.08% की बढ़ोतरी हुई। साथ ही, रामटेक और देवलाली में वोटर संख्या में 40% की कमी आई। इन दावों को कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी बढ़ाया और चुनाव आयोग (ECI) पर सवाल उठाए। खेड़ा ने तो तंज कसते हुए लिखा, “अगली बार वे कहेंगे कि 2+2=420।”

लेकिन 19 अगस्त को संजय कुमार को कथित तौर पर अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने अपने पोस्ट को डिलीट कर दिया और माफी माँगी। उनका कहना था कि उनकी टीम ने डेटा की पंक्तियों को गलत पढ़ लिया था। लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।

फर्जी आँकड़े सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर फैल चुके थे। असली डेटा देखें तो नासिक वेस्ट में वोटर संख्या में सिर्फ 6% और हिंगणा में 5.9% की मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि रामटेक और देवलाली में 3-4% की मामूली वृद्धि हुई।

ICSSR की कड़ी प्रतिक्रिया

इस घटना से नाराज होकर 19 अगस्त को ICSSR ने एक बयान जारी किया। शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली ICSSR सीएसडीएस को फंडिंग देने वाली मुख्य संस्था है। ICSSR के बयान में कहा गया कि सीएसडीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी (संजय कुमार) ने गलत डेटा पेश किया, जो बाद में वापस लेना पड़ा। इसके अलावा, सीएसडीएस ने चुनाव आयोग के SIR (सार्वजनिक जानकारी अभ्यास) को गलत तरीके से पेश करके मीडिया स्टोरीज छापीं।

ICSSR ने कहा कि चुनाव आयोग भारत की सबसे बड़ी लोकतंत्र की रीढ़ है और इसके सम्मान को ठेस पहुँचाना गंभीर अपराध है। उन्होंने सीएसडीएस पर डेटा से छेड़छाड़ और गलत नैरेटिव बनाने का आरोप लगाया, जो उनके अनुदान नियमों (Grant-in-Aid Rules) का उल्लंघन है। इसके जवाब में ICSSR ने सीएसडीएस को शो कॉज नोटिस जारी करने का फैसला लिया है। उनका कहना है कि यह घटना संस्थान और चुनाव प्रक्रिया दोनों की गरिमा को ठेस पहुँचाती है।

विनीत जिंदल ने दर्ज कराई एफआईआर

इसी बीच वकील विनीत जिंदल ने 19 अगस्त 2025 को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को एक शिकायत दी। उनकी शिकायत में राहुल गाँधी (विपक्ष के नेता), संजय कुमार (सीएसडीएस) और लोकसभा के सदस्य लोक सबा समेत कई लोगों पर आरोप लगाए गए। जिंदल का कहना है कि इन लोगों ने फर्जी डेटा फैलाकर जनता में अशांति फैलाई और सरकार के खिलाफ साजिश रची। उन्होंने कहा कि यह डेटा लोकसभा चुनावों को लेकर गलत था और चुनाव आयोग की साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश थी।

जिंदल ने अपनी शिकायत में लिखा कि ये लोग सोशल मीडिया और प्रेस के जरिए झूठी खबरें फैला रहे हैं, जिससे जनता का भरोसा लोकतंत्र पर कमजोर हो रहा है। उन्होंने माँग की कि इस मामले में सख्त कार्रवाई हो और जाँच शुरू की जाए।

सीएसडीएस की फंडिंग: कौन देता है पैसा?

अब सवाल उठता है कि सीएसडीएस को फंडिंग कहाँ से मिलती है? ICSSR सीएसडीएस का मुख्य फंडर है, जो सरकार के जरिए चलता है। लेकिन इसके अलावा सीएसडीएस को विदेशी फंडिंग भी मिलती है, जिस पर कई सवाल उठ रहे हैं।

सीएसडीएस की वेबसाइट और विदेशी योगदान की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों और संगठनों से पैसा आता है। इनमें फोर्ड फाउंडेशन, गेट्स फाउंडेशन (अमेरिका), आईडीआरसी (International Development Research Centre-कनाडा), डीएफआईडी (यूके), नॉराड (नॉर्वे), ह्यूलेट फाउंडेशन और जर्मनी की KAS जैसी एजेंसियाँ शामिल हैं। इसके अलावा स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान की कुछ एनजीओ से भी डोनेशन मिलते हैं।

हैरानी की बात है कि जर्मनी की सत्ताधारी पार्टी सीडीयू (क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन ऑफ जर्मनी) से जुड़ी कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन सीएसडीएस के लिए सर्वाधिक फंडिंग करती है। सीएसडीएस की वेबसाइट पर विदेशी फंडिग से जुड़ी जो जानकारी साझा की गई है, वो जनवरी 2016 से लेकर अब तक की है।

हर तिमाही में कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन ने सीएसडीएस को लाखों की फंडिंग की है। इन 10 सालों में देखा जाए, तो ये आँकड़ा कई करोड़ों में है। हालाँकि बदले में सीएसडीएस ने कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन के साथ मिलकर कुछ रिसर्स पेपर पब्लिश किए हैं, लेकिन फंडिंग के स्तर और काम को देखते हुए साफ है कि ये पैसा सिर्फ रिसर्च पेपर के लिए तो नहीं ही मिलता है।

CSDS के सहयोग से जर्मन संस्था द्वारा प्रकाशित पेपर

बीते एक साल की बात की जाए, तो कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन ने सीएसडीएस को 25 लाख 9 हजार 190 रुपए ( 29 सितंबर 2024 को ₹4,58,950, 20 नवंबर 2024 को ₹4,39,300 / 17 दिसंबर 2024 को ₹4,38,600 रुपए / 27 फरवरी 2025 को ₹11,72,340) दिए।

वहीं, अमेरिका की UCLA लाइब्रेरी से ₹12.71 लाख का डोनेशन मिला। UCLA की लाइब्रेरी डिपार्टमेंट से जुड़ी रेचेल डेबलिंगर ने ये धन दिए हैं। उसने 24 जून 2024 को भी 24 लाख 92 हजार रुपए से ज्यादा की धनराशि दान दी है।

जनवरी 2024 में फ्रांस की FNSP संस्था के पास से 12 लाख रुपए से अधिक की धनराशि आई, तो ब्रिटिश लाइब्रेरी ने 5 फरवरी 2024 को 14 लाख रुपए से ज्यादा की धनराशि CSDS को दी।

इसके अलावा अतीत में जाकर देखें तो साल 2016 से अगले कई सालों तक कनाडा की संस्था की तरफ से हर साल करोड़ों की धनराशि लगातार मिलती रही। भारत सरकार ने एनजीओ की आड़ में विदेशी धन के प्रवाह को रोकने के लिए जब कदम उठाए, तो इसका असल सीएसडीएस की फंडिंग पर भी पड़ा। साल 2016 और 2025 के आँकड़ों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।

इन विदेशी फंडिंग का आँकड़ा हर तिमाही की रिपोर्ट में उपलब्ध है, जो सीएसडीएस की वेबसाइट पर सार्वजनिक है। आरोप है कि यह पैसा हिंदू समाज को जाति के आधार पर बाँटने और गलत नैरेटिव बनाने में इस्तेमाल हो रहा है। उदाहरण के लिए सीएसडीएस के लोकनीति प्रोग्राम में हिंदुओं को ओबीसी, ईबीसी, दलित और सवर्ण में बांटकर वोटिंग पैटर्न की रिपोर्ट छापी जाती है, जो अखबारों में सुर्खियाँ बनती हैं। लेकिन मुसलमानों की अंदरूनी जातीय दरारों (जैसे दलित मुसलमान, अशरफ) पर चुप्पी साध ली जाती है।

कई लोग इसे साजिश मानते हैं और कहते हैं कि सीएसडीएस का मकसद हिंदू समाज को तोड़कर कॉन्ग्रेस जैसे दलों को फायदा पहुँचाना है। योगेंद्र यादव और संजय कुमार जैसे नाम इस एजेंडे को हमेशा आगे बढ़ाते दिखते हैं। फिर, योगेंद्र कुमार किसान आंदोलन से लेकर उन तमाम मंचों पर खड़े नजर आते हैं, जो सरकार के विरोध में खड़े होते हैं।

फंडिंग रोकने की आशंका

ICSSR ने साफ कर दिया है कि सीएसडीएस का यह व्यवहार उनके नियमों का उल्लंघन है। शो कॉज नोटिस के बाद अगर सीएसडीएस संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता, तो फंडिंग रोकने की नौबत आ सकती है। यह कदम न सिर्फ सीएसडीएस के लिए बड़ा झटका होगा, बल्कि इस बात की भी जाँच शुरू हो सकती है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है। अगर साबित हो जाता है कि विदेशी पैसा किसी खास राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल हुआ तो कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

विदेशी फंडिंग की वजह से अफवाहों में शामिल हुआ CSDS?

यह पूरा मामला अब साजिश के दावों से भरा हुआ है। एक तरफ जहाँ ICSSR और विनीत जिंदल इसे जानबूझकर फैलाई गई अफवाह मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सीएसडीएस इसे तकनीकी गलती बता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि एक प्रतिष्ठित संस्थान जैसे सीएसडीएस की टीम ने बिना जाँच-पड़ताल के डेटा क्यों पेश किया? क्या यह गलती सचमुच भूल थी या इसके पीछे कोई बड़ा प्लान था?

आरोप हैं कि विदेशी फंडिंग का दबाव सीएसडीएस पर है, जिसके चलते वह गलत डेटा पेश कर रहा है। हालाँकि ये तो तय है कि यह घटना भारतीय लोकतंत्र और शोध संस्थानों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।

दूर तलक जाएगा ये मामला

सीएसडीएस को ICSSR के शो कॉज नोटिस और विनीत जिंदल की एफआईआर से साफ है कि यह मामला यहीं खत्म नहीं होगा। चुनाव आयोग की साख बचाने और फर्जी डेटा से नुकसान को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अगर सीएसडीएस दोषी पाया जाता है, तो न सिर्फ उसकी फंडिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि उसके शोध कार्यों पर भी सवाल उठेंगे।

दूसरी तरफ विदेशी फंडिंग की जाँच शुरू होने से सीएसडीएस को और दबाव का सामना करना पड़ सकता है। जनता के लिए भी यह सब एक सबक है कि सोशल मीडिया पर आने वाली हर खबर पर भरोसा करने से पहले उसकी सच्चाई जाँच लेनी चाहिए।

यह पूरा मामला सीएसडीएस, ICSSR और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। फंडिंग को लेकर उठे सवाल, फर्जी डेटा का विवाद, और एफआईआर सब कुछ मिलाकर यह दिखाता है कि शोध संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। ICSSR का कड़ा रुख और जिंदल की शिकायत से उम्मीद है कि सच सामने आएगा और दोषियों पर कार्रवाई होगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि जाँच निष्पक्ष हो, ताकि किसी का भी राजनीतिक फायदा न हो।

जुमे पर नमाज नहीं पढ़ी तो होगी 2 साल की जेल, भरना पड़ेगा जुर्माना: मलेशिया में तालिबानी फरमान का हो रहा विरोध, इसी मुल्क में है भारत का भगोड़ा जाकिर नाइक

मलेशिया के टेरेंगानु राज्य में जुमे की नमाज पढ़ने में नहीं शामिल होने वाले मुस्लिमों पुरुषों को 2 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। शरिया कानून को सख्ती से लागू करते हुए सरकार ने ये फरमान सुनाया है।

इसमें कहा गया है कि अगर बिनी किसी उचित कारण बताए शुक्रवार की नमाज में अनुपस्थित रहे, तो मुस्लिम पुरुषों को जेल जाना पड़ेगा। साथ ही 3000 रिंगिट यानी 61,000 रुपए जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

पहले लगातार 3 जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य था

टेरेंगानू में पीएएस यानी पैन मलेशियाई इस्लामिक पार्टी की सरकार है। पहले लगातार तीन शुक्रवार को नमाज छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को ये सजा दी जाती थी। लेकिन अब हर जुमे की नमाज में शामिल होना अनिवार्य कर दिया गया है।

राज्य के कार्यकारी परिषद के सदस्य मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने बेरिटा हरियन अखबार को बताया, “नमाज केवल मजहबी प्रतीक नहीं है, बल्कि मुस्लिमों की खुदा के आज्ञा मानने से भी जुड़ा हुआ है।”

तालिबान बन जाएँगे हम- अजीज

इस पर मलेशियाई वकील अजीरा अजीज ने तर्क दिया है कि कुरान में कहा गया है कि ‘मजहब में कोई जबरदस्ती नहीं’ होती। सरकार का फरमान इसके खिलाफ है। उन्होंने कहा, “जुमे की नमाज अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन इसे अपराध बनाना गलत है। हमें सभी मलेशियाई लोगों की चिंता है, वरना हम तालिबान बन जाएँगे।”

रिपोर्ट के मुताबिक, मलेशिया के इस राज्य में कोई विपक्षी पार्टी नहीं है। 12 लाख की आबादी है, जिसमें अधिकतर स्थानीय मुस्लिम हैं। सत्ताधारी पीएएस पार्टी ने 2022 में सभी 32 सीटों पर जीत हासिल की थी। ये हथकंडा पीएएस को अपनी सत्ता बचाने के लिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि दो साल के अंदर चुनाव होने वाले हैं।

इस्लाम मलेशिया का आधिकारिक मजहब है। मलेशिया का संविधान राज्यों को इस्लामी मामलों पर कानून बनाने का अधिकार देता है। लेकिन उसका क्षेत्र परिवार या व्यक्तिगत स्तर पर होना चाहिए।

दूसरे राज्य ने भी कानून बनाना चाहा था

2019 में, मलेशियाई राज्य केलंतन ने अपने शरिया कानून को विस्तार देना चाहा था। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। यहाँ मलेशियाई संघ का कानून सबसे अहम है। इस फैसले को पीएएस नेताओं ने इस्लामी सत्ता पर हमले के रूप में प्रचारित किया और जमकर बवाल काटा।

तेरेंगानु के नए फरमान के खिलाफ भी लोग सड़कों पर आ गए हैं। कई लोगों ने कानूनी दबाव के जरिए मजहबी रिवाजों को मनवाने की ‘समझदारी’ पर सवाल उठाए हैं। इनका कहना है कहा, “धर्मनिष्ठा दिल से आनी चाहिए, न कि लोगों के डर से”। कुछ लोगों ने चेताया है कि ऐसे कानून दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं।

मलेशिया में ही है भगोड़ा जाकिर नाइक

भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।

भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।

पूजा ने ठोक दिया रेप-SC/ST एक्ट का केस, जाँच में पता चला वह मौके पर थी ही नहीं: जमीन विवाद में फर्जी मुकदमा करवाने वाले वकील को उम्रकैद, जानिए क्या है मामला

लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक वकील परमानंद गुप्ता को झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही ₹5.10 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है। वकील ने एक जमीन विवाद में पड़ोसियों को फँसाने के लिए पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली महिला से झूठा रेप केस दर्ज करवाया। जाँच में सभी आरोप बेबुनियाद निकले।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वकील परमानंद गुप्ता ने एक जमीन विवाद में अपने पड़ोसी अरविंद यादव और उनके परिवार को फँसाने के लिए दलित महिला पूजा रावत से बलात्कार और उत्पीड़न का फर्जी केस दर्ज कराया। पूजा रावत वकील की पत्नी संगीता गुप्ता के ब्यूटी पार्लर में काम करती थी।

मुकदमे में आरोप लगाया गया कि मार्च से जुलाई 2024 के बीच उसके साथ दुराचार हुआ। वकील परमानंद गुप्ता का मकसद था कि इस आरोप के बाद उसके विरोधियों को जेल हो जाएगी और वह व्यक्तिगत बदला भी ले लेगा।

जाँच में कैसे खुला फर्जीवाड़ा?

सीबीआई जाँच अधिकारी ने पाया कि पूजा रावत घटना के समय 1 मार्च 2024 से 24 जुलाई 2024 तक मौके पर मौजूद नहीं थी। जहाँ उसे किरायेदार बताया गया था, वह मकान उस समय निर्माणाधीन था। मोबाइल लोकेशन, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेज़ों से साबित हुआ कि मामला पूरी तरह फर्जी है।

पूजा रावत ने कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि वकील परमानंद गुप्ता और उसकी पत्नी ने दबाव बनाकर झूठे बयान दिलवाए। वह डर के कारण मजिस्ट्रेट के सामने झूठा बयान देने को मजबूर हुई।

कोर्ट का फैसला: उम्रकैद और AI निगरानी का आदेश

स्पेशल जज विवेकानंद त्रिपाठी ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि दूध से भरे महासागर में खट्टे पदार्थों की बूंदों को गिरने से नहीं रोका गया तो पूरा महासागर खराब और नष्ट हो जाएगा।” जज ने यह भी कहा कि अगर ऐसे वकीलों को नहीं रोका गया तो भारतीय न्यायपालिका पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा।

कोर्ट ने बताया कि परमानंद गुप्ता ने 11 और पूजा गुप्ता ने 18 फर्जी मुकदमे दर्ज करवाए, इसलिए दोषी वकील को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा कोर्ट ने झूठे मुकदमों को रोकने के लिए AI का उपयोग करने का निर्देश दिया है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ रोकी जा सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR दर्ज होते ही मुआवजे की राशि न दी जाए, बल्कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद ही दी जाए।

कोर्ट ने पूजा रावत को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। हालाँकि, अदालत ने उसे चेतावनी दी कि अगर वह भविष्य में ऐसा करती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

‘मकान नंबर- 0’ का मतलब वोट चोरी नहीं, यह पात्र मतदाता को वोट की गारंटी: राहुल गाँधी की ‘बाल बुद्धि’ में यह घुसने से रहा, पर आप जान लीजिए इसके बारे में सब कुछ

भारत निर्वाचन आयोग ने राहुल गाँधी से अपने आरोपों के साथ औपचारिक शिकायत दर्ज कराने को कहा है, ताकि जाँच शुरू की जा सके। लेकिन विपक्ष के नेता ने अभी तक किसी भी प्राधिकारी के समक्ष कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है। राहुल गाँधी के निराधार आरोपों के बाद ‘मकान नंबर 0’ को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई है।

लगभग दो हफ्ते पहले राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलीभगत करके, लाखों फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए हैं। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कई लोगों के मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते की जगह ‘0’ लिखा हुआ था। यानी ये फर्जी मतदाता थे, जिनके घर का पता नहीं था।

अपने आरोपों की पुष्टि के लिए राहुल गाँधी ने एक दस्तावेज भी दिखाया। उन्होंने दावा किया कि यह कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची है। इसमें मकान नंबर ‘0’ वाले कई मतदाता हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार (17 अगस्त 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गाँधी के दावों का खंडन किया। मकान संख्या ‘0’ को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि बेघर लोगों को ये नंबर दिया गया है। इनका पता स्पष्ट नहीं होता है।

चुनाव आयोग ‘मकान संख्या 0’ का इस्तेमाल इसलिए करता है ताकि वे मतदाता छूट न जाएँ, जिनके पास स्पष्ट रूप से घर का पता नहीं है या जिनका कोई घर नहीं है। ऐसे लोगों का चुनावी फॉर्म में पूरा पता दर्ज नहीं होता है। कई बार संयुक्त परिवार, साझा आवास या किराए के घरों में एक ही पते पर कई लोगों के नाम दर्ज होते हैं। ऐसे में एक ही पते पर कई मतदाताओं के नाम भी मिलते हैं।

2013 में शुरू मकान संख्या ‘0’

चुनाव आयोग ने मकान संख्या शून्य देने की शुरूआत 2013 में की थी। उस वक्त बेघर लोगों का मतदाता पहचान पत्र बनाने का काम शुरू हुआ। सबसे पहले दिल्ली में इसे लागू किया गया। पहली बार बेघर लोगों को मतदाता पहचान पत्र जारी किए गए।

एक ब्लॉक जिला अधिकारी (बीडीओ) ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मतदाता बनने के लिए किसी बेघर व्यक्ति को फॉर्म 6 भरना पड़ता है। वह जिस घर में रहता है, उसका निवास प्रमाण पत्र और बर्थ सर्टिफिकेट देना होगा। फॉर्म जमा करने के बाद, बीएलओ सत्यापन के लिए दिए गए पते पर जाता है।

दिल्ली में मकान संख्या ‘0’ वाले बेघर मतदाता

द इंडियन एक्सप्रेस ने राष्ट्रीय राजधानी के कुछ मतदाताओं से बात की, जिनके मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते की जगह ‘0’ लिखा है। पश्चिम बंगाल से आए 67 वर्षीय अपूर्व चटर्जी ने बताया कि वह शंकर गली सीता राम बाजार के एक घर में रहते हैं, लेकिन उनके मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते में ‘0’ लिखा है। चटर्जी ने ये भी कहा, “मैंने 2024 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ इस फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी अपना वोट डाला था।”

रैन बसेरा बंगला साहिब आश्रय गृह में रहने वाले एक बेघर व्यक्ति ने भी मीडिया को बताया कि उसने घर के पते ‘0’ का इस्तेमाल करके एक बैंक खाता भी खोला है। वह पहले वसंत कुंज के शेल्टर होम में रहता था, जहाँ से यहाँ आया है। उसने बताया कि 2013 से चुनावों में उसने वोट डाला था, वोटर आईडी कार्ड में उसके घर का पता ‘0’ लिखा है।

एक और बेघर महिला, दर्शना ने राष्ट्रीय राजधानी के एक शेल्टर होम में रहते हुए अपना मतदाता पहचान पत्र बनवाया। दर्शना के पास आधार कार्ड नहीं है। वह कई साल पहले पंजाब से दिल्ली आई थी जब उसका परिवार उसे छोड़कर चला गया था। वह अब एक दुकान में काम करती है। उसका कहना है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में उसने वोट डाला था।

राहुल की संसदीय सीट में मकान संख्या ‘0’ वाले मतदाता

‘0’ मकान संख्या वाले मतदाता सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मौजूद हैं। इनमें उत्तर प्रदेश का रायबरेली लोकसभा क्षेत्र भी शामिल है। गाँधी परिवार का गढ़ रहे रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में कई मतदाता ऐसे हैं, जो मकान संख्या ‘0’ वाले हैं। कई मतदाताओं का पता भी एक ही है। क्या इसका मतलब यह है कि राहुल गाँधी ने फर्जी मतदाताओं का इस्तेमाल करके अपनी सीट जीती है?

कर्नाटक में मकान संख्या ‘0’ वाले मतदाता

करीब एक हफ्ते पहले, कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र में मकान संख्या ‘0’ वाले कई मतदाताओं के वीडियो सामने आए थे। इसमें कई लोगों ने अपना मतदाता पहचान पत्र दिखाया। इनमें उनके घर का पता ‘0’ लिखा हुआ था। इनमें से कुछ मतदाता 10-15 सालों से इस इलाके में रह रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके घरों पर नंबर नहीं थे। चुनाव अधिकारियों ने उनके मतदाता पहचान पत्र में मकान संख्या की जगह ‘0’ लिख दिया। उनके चुनावी फोटो पहचान पत्र (EPIC) में भी पते की जगह मकान संख्या 0 लिखा था।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने अपने आरोपों के सबूत देने के लिए राहुल गाँधी को एक हफ्ते की मोहलत दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपनी प्रेस वार्ता में आरोप को लेकर सबूत माँगे थे। सवाल यह है कि धोखाधड़ी का चुनाव आयोग पर आरोप लगा कर हंगाम खड़ा करने वाले राहुल गाँधी आरोपों की जाँच क्यों नहीं कराना चाहते।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर… हर जगह से अखिलेश यादव की हुई थू-थू, ‘वोट चोरी’ पर बड़बोलापन सपा सुप्रीमो को पड़ा भारी: एक-एक DM ने बताया फैक्ट

‘वोट चोरी’ के नाम पर राहुल गाँधी के सुर में सुर मिलाते हुए अब अखिलेश यादव भी राग अलापने लगे हैं। सपा सुप्रीमो ने उत्तर प्रदेश के कई जिलों जैसे- लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी और जौनपुर की ओर उंगली उठाते हुए आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट से लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने फिर इन दावों को खारिज कर पोल खोल दी। जाँच में सारे आरोप झूठे निकले। इतना ही नहीं, इन जिलों के DM ने अखिलेश यादव के पोस्ट पर खुद फैक्ट चेक करते हुए जवाब भी दिया है।

अखिलेश यादव का आरोप

अखिलेश यादव ने 17 अगस्त 2025 को X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर बताया कि यूपी के कई विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, जो वोट चोरी का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने इस संबंध में चुनाव आयोग को कई सबूत दिए हैं, लेकिन आयोग इन्हें नजरअंदाज कर रहा है। इसके अलावा अखिलेश यादव ने 4 तस्वीरें भी पोस्ट में शेयर की, जो लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर की है।

अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि लखनऊ के बक्शी का तालाब में 13 मतदाताओं के नाम हटाए गए। कासगंज के अमांपुर में 8 मतदाताओं के नाम हटाए गए। बाराबंकी के कुर्सी में 2 मतदाताओं के नाम हटाए गए। जौनपुर में 5 मतदाताओं के नाम हटाए गए। अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा दी गई डिजिटल रसीद अगर गलत साबित होती है तो ‘डिजिटल इंडिया’ की विश्वसनीयता भी खतरे में है।

लखनऊ DM का फैक्ट चेक

अखिलेश का दावा था कि लखनऊ के ‘बक्शी का तालाब’ क्षेत्र में 13 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए। लखनऊ DM ने जब जाँच की तो पता चला कि सिर्फ एक मतदाता का नाम 2012 में हटाया गया था। इसका कारण यह था कि वह व्यक्ति उस क्षेत्र में नहीं रहता था। बाकी सभी 12 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद हैं।

कासगंज DM का फैक्ट चेक

अखिलेश यादव ने दावा किया कि कासगंज के अमांपुर क्षेत्र से 8 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे। काजगंज DM ने जब इसकी जाँच की तो पाया कि 7 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दो बार लिखे हुए थे। नियमानुसार एक नाम को विलोपित (हटा दिया गया) किया गया। एक मतदाता का नाम अभी भी मतदाता सूची में है।

बाराबंकी DM का फैक्ट चेक

अखिलेश यादव ने दावा किया कि बाराबंकी के 266 कुर्सी क्षेत्र में 2 मतदाताओं ने शपथ पत्र दिया था कि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। लेकिन जब बाराबंकी DM ने जाँच की तो पाया कि दोनों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं। किसी का भी नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया गया है।

जौनपुर DM का फैक्ट चेक

अखिलेश यादव ने दावा किया कि जौनपुर में पाँच मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। जौनपुर DM ने जब की तो पाया कि ये सभी पाँचों मतदाता 2022 से पहले ही मर चुके थे। इसकी पुष्टि उनके परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने भी की थी। इसलिए इन पाँचों मतदाताओं के नाम नियमानुसार हटाए गए थे।

आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से नियमानुसार और पारदर्शी है। जिन मामलों में नाम हटाए गए, वे या तो दोहरे नामांकन के कारण थे या फिर मतदाता की मृत्यु हो गई थी। इस तरह के झूठे आरोप लगाकर अखिलेश यादव न केवल एक संवैधानिक संस्था पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि जनता को भी गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ लोगों को हायर कर चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगवाया, जिनका जवाब ECI ने फैक्ट चेक के साथ देकर बोलती बंद की।

PM हो या CM, या फिर केंद्र से लेकर राज्य तक के मंत्री… जेल में रहकर नहीं चला पाएँगे सरकार: जानिए किस स्थिति में 31वें दिन ‘दागी’ अपने आप पद से हो जाएँगे मुक्त

लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने संविधान संशोधन से जुड़े 3 विधेयक पेश किए। बुधवार (20 अगस्त 2025) को सदन में पेश करते समय विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। इन विधेयकों में प्रावधान है कि आपराधिक मामलों में जेल गए पीएम, सीएम या मंत्री अपने पद पर बने नहीं रह सकेंगे।

ये विधेयक हैं-

  1. संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025
  2. संघ राज्य क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक 2025
  3. जम्मू कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025

130वाँ संविधान संशोधन विधेयक

  1. संविधान संशोधन विधेयक 2025 के तहत अनुच्छेद 75, 164 और 230ए में संशोधन कर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री या अन्य मंत्री को हटाने का प्रावधान किया जा रहा है।

विधेयक में कहा गया है, ” कोई भी मंत्री जो गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया जाता है या 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, जिसमें 5 साल या उससे अधिक जेल हो सकती है, तो प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकते हैं। अगर उसे हटाया नहीं जाता है तो वह 31वें दिन से पदमुक्त माना जाएगा।”

इसी तरह प्रधानमंत्री भी आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किए जाते हैं या 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, जिसमें कम से कम 5 साल जेल की सजा हो सकती है, तो उन्हें भी पद से हटना होगा। अगर नहीं हटते हैं तो 31वें दिन उन्हें पदमुक्त समझा जाएगा।

संघ राज्य क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक 2025

केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार अधिनियम, 1963 (1963 का 20) के तहत गंभीर आपराधिक आरोपों के कारण गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए मुख्यमंत्री या मंत्री को हटाने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक 2025 लाया गया है। इसमें केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार अधिनियम, 1963 की धारा 45 में संशोधन किया जाएगा।

ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री या दूसरे मंत्री को हटाने के लिए कानूनी प्रावधान किया जा रहा है। इसमें कहा गया है कि ऐसे आपराधिक मामले, जिसमें 5 साल या उससे अधिक जेल हो सकती है, उसके तहत गिरफ्तार मंत्री को उसके पद से हटाया जा सकता है या 31वें दिन वह खुद ही पदमुक्त माना जाएगा।

जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक में जुड़ेगा खंड

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 में मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी और 30 दिन तक हिरासत में रहने पर पदमुक्त हो जाने का प्रावधान है। इससे पहले जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। इसलिए इसकी धारा 54 में संशोधन कर 4ए जोड़ा जा रहा है।

इसमें बताया गया है कि 30 दिन हिरासत में रहने पर 31वें दिन मुख्यमंत्री की सलाह पर उपराज्यपाल आरोपित मंत्री को पद से हटा देंगे। अगर मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर रहे हैं तो अगले दिन वह खुद ही पदमुक्त हो जाएगा।

विधेयक का मकसद जनता में विश्वास पैदा करना है ताकि संवैधानिक तौर पर नैतिकता की रक्षा की जा सके। इसमें कहा गया है कि जनता अपना प्रतिनिधि विश्वास के साथ चुनती है। लोगों की आशाओं पर खड़े उतरना इनका कर्तव्य है। इसमें ये भी कहा गया है कि मंत्रियों का आचरण किसी भी संदेह से परे होना चाहिए।

दिल्ली के सीएम ने जेल से चलाई सरकार

दिल्ली में शराब घोटाले को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। केजरीवाल जेल गए थे, लेकिन उन्होने पद से इस्तीफा नहीं दिया। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने सीएम पद छोड़ा। दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का भी रहा। उन्हें शराब घोटाले को लेकर गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में वे जेल गए थे। जनता की अदालत में वे भी हार गए। दिल्ली के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन को 2022 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया। वो जेल गए लेकिन पद से इस्तीफा काफी दिनों बाद दिया।

राहुल गाँधी ने बिहार में जीप पर चढ़वाकर जिससे कहलवाया ‘वोट चोरी’, वो निकला बड़ा फ्रॉड: चुनाव आयोग ने राजद BLA सुबोध कुमार के हर झूठ की खोली पोल, देखिए सबूत

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी इस समय बिहार के नवादा में ‘वोट अधिकार यात्रा’ पर निकले हुए है। रैली के दौरान राहुल गाँधी की गाड़ी पर एक शख्स सवार होता है और चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर कहता है कि ‘वोट चोरी’ हुई है और उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।

आश्चर्य नहीं कि चुनाव आयोग की फैक्ट चेक में यह दावा पूरी तरह झूठा निकला। चुनाव आयोग ने बताया कि सुबोध कुमार नाम का यह शख्य कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि ये राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट (BLA) हैं और उसका नाम कभी भी वोटर लिस्ट में था ही नहीं।

चुनाव आयोग पर राहुल गाँधी का ‘नकली ड्रामा’

राहुल गाँधी को तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं। वो हर चुनाव से पहले बच्चों जैसी जिद पर अड़े रहते हैं कि ‘वोट चोरी हो गई’ और हर बार चुनाव आयोग फैक्ट चेक कर उनके झूठ को उजागर करता है, फिर भी वो वही रट लगाते रहते हैं।

दरअसल, अपनी ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान नवादा में एक शख्स को मंच पर माइक थमाकर राहुल गाँधी ने कहा, “इनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है, यही लाखों लोगों के साथ हो रहा है।” यह शख्स सुबोध कुमार था, जिसने राहुल गाँधी के रथ पर चढ़ते ही कैमरे के सामने आरोप जड़ा कि उसका नाम वोटर लिस्ट से गायब है।

राहुल गाँधी ने इस पूरे वाकये को रैली से लाइव दिखाया और फिर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलाया। X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, “जो सुबोध कुमार जी के साथ हुआ, वही लाखों लोगों के साथ बिहार में हो रहा है। वोट चोरी भारत माता पर आक्रमण है– बिहार की जनता ये होने नहीं देगी।”

सुबोध कुमार नाम के व्यक्ति को मंच पर बुलाना, माइक थमाना और कैमरे के सामने आरोप लगवाना… यह सब पहले से स्क्रिप्टेड था। राहुल गाँधी ने इसे ‘भारत माता पर हमला‘ बताया। लेकिन असल हमला जनता की समझदारी पर किया गया छल था। रंजू देवी के झूठ के बाद अब सुबोध कुमार पर राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की कहानी हर बार फेल होती है।

फैक्ट चेक: चुनाव आयोग ने आरोपों को किया तार-तार

चुनाव आयोग की विस्तृत जाँच रिपोर्ट के अनुसार, सुबोध कुमार नाम का व्यक्ति कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट है। 29 अक्तूबर 2024 को प्रकाशित सूची और फिर 2025 के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में भी सुबोध कुमार का नाम कभी भी मतदाता सूची में नहीं था। उसके परिवार के कुछ सदस्य सूची में शामिल है, लेकिन खुद उसका नाम कभी दर्ज नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर प्रकाशित विलोपित मतदाताओं की सूची में भी उसका नाम दर्ज नहीं है।

चुनाव आयोग बताता है कि सुबोध कुमार ने ना तो फॉर्म-6 भरा और ना ही किसी प्रकार का घोषणा पत्र (Annexure-D) दिया। जब बीएलओ ने विलोपित मतदाताओं की सूची बूथ पर चिपकाई तब सुबोध वहीं मौजूद था, लेकिन उसने कोई आपत्ति नहीं दर्ज की। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वह स्वयं हस्ताक्षर कर चुका है, फिर भी मंच पर दावा किया कि उसका नाम हटा दिया गया। चुनाव आयोग ने कहा कि सुबोध कुमार ने जो आरोप लगाए, वो निराधार एवं असत्य है। यदि वे भविष्य में नियमानुसार फॉर्म-6 एवं घोषणा पत्र प्रस्तुत करेंगे तो उनका नाम जोड़ा जा सकता है।

बार-बार दोहराया गया झूठ

यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने इस तरह का निराधार आरोप लगाया है। इससे पहले, औरंगाबाद में उन्होंने रंजू देवी नाम की एक महिला का मामला उठाया था, यह दावा करते हुए कि उनका नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। लेकिन बाद में रंजू देवी ने खुद एक वीडियो में बताया कि उनका नाम मतदाता सूची में मौजूद है और उन्हें गुमराह किया गया था।

राहुल गाँधी का बार-बार एक ही तरह के निराधार आरोप लगाना, एक बच्चे की तरह रट्टा लगाने जैसा लगता है, जो ‘फैक्ट चेक’ के बाद भी अपनी बात पर अड़े रहते हैं। यह न सिर्फ उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी गलत आरोप लगाने का प्रयास करता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी के भी पीछे पड़ा कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम, राहुल गाँधी से ‘वोट चोरी’ पर माँगा था हलफनामा: ‘सजा’ देने के लिए परिवार पर झुंड बनाकर टूटे

राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ वाले प्रोपेगेंडा की पोल खोलने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अब कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम टारगेट कर रहा है। यहाँ तक की उनके परिवार को भी सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है। ज्ञानेश कुमार की दोनों बेटी मेधा रूपम और अभिश्री को भी इसका हिस्सा बनाया गया।

सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने ज्ञानेश कुमार के परिवार को बीजेपी का परिवार करार दिया। कॉन्ग्रेसियों ने सोशल मीडिया पर एक क्रम से ज्ञानेश कुमार के परिवार पर पोस्ट डालने चालू किए। हर पोस्ट में ज्ञानेश कुमार के परिवार का डाटा निकालकर ट्रोल किया गया।

पोस्ट में बताया गया कि ज्ञानेश कुमार की पहली बेटी मेधा रूपम, जो नोएडा की डीएम हैं और उनके पति मनीष बंसल सहारनपुर के डीएम हैं। इसके बाद दूसरी बेटी अभिश्री श्रीनगर IRS की डिप्टी डायरेक्टर हैं और उनके पति अखय लाब्रू श्रीनगर के डीएम हैं।

अब ज्ञानेश कुमार की बेटी और उनके पति को प्रशासन में उच्च पद हासिल करने को लेकर सवाल उठाए गए। कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने इसे बीजेपी से जोड़ दिया। इनमें कॉन्ग्रेस के सोशल मीडिया स्टार और कॉन्ग्रेस की चापलूसी करने वाले कई वामपंथी लोग शामिल हैं।

मुंबई कॉन्ग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार को टारगेट किया। उन्होंने भी ज्ञानेश कुमार, उनकी बेटी और दामाद के प्रशासनिक पद हासिल करने पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश के परिवार को ‘बीजेपी का परिवार’ करार दिया।

भारतीय युवा कॉन्ग्रेस (IYC) के सोशल मीडिया की स्टार मिनी नागरारे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार को टारगेट किया।

इसी क्रम में आगे ज्ञानेश कुमार को ‘बीजेपी का परिवार’ बताते हुए कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने पोस्ट किए।

ये वही लोग हैं जो ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया ब्रीफिंग करने वाले विदेश सचिव विक्रम मिस्री की बेटी के ट्रोल होने पर दक्षिणपंथी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। उस समय ट्रोलर्स को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने फटकार भी लगाई थी।

ज्ञानेश कुमार और उनके परिवार पर ये हमला ऐसे समय में शुरु हुआ है, जब उन्होंने वोट चोरी के आरोपों पर राहुल गाँधी से 7 दिनों के भीतर हलफनामा देने या माफी माँगने के लिए कहा है। इसके बाद से वो लगातार कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम से जुड़े लोगों के निशाने पर आ चुके हैं।

छांगुर पीर के धर्मांतरण गैंग में सपा नेता भी शामिल: पीड़िता ने अखिलेश यादव के साथ फोटो दिखाकर किया दावा, कहा- रेप करने के बाद मुस्लिम बना मेरा निकाह करवाया

धर्मांतरण और यौन शोषण के लिए कुख्यात छांगुर पीर गैंग का एक और मामला सामने आया है। कुशीनगर की एक पीड़िता ने विश्व हिंदू रक्षा परिषद के लखनऊ कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी आपबीती सुनाई। पीड़िता ने बताया कि समाजवादी पार्टी के नेताओं ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया, उसका धर्मांतरण कराया और फिर शारीरिक शोषण के बाद उसे छोड़ दिया।

नशीला पदार्थ, जूठा पान, निकाह और धर्मांतरण

जानकारी के अनुसार, पीड़िता ने बताया कि 2017 में जब वह हाई स्कूल की छात्रा थी, तब उसकी मुलाकात बबलू खान उर्फ रफी खान से हुई। बबलू उसे अपने घर ले गया और तीन दिन तक उसका रेप करता रहा।

बाद में उसने अपने दोस्त नौशाद उर्फ नाटा नवाब और आलमगीर अंसारी से मिलवाया, जो उसे छांगुर पीर के पास ले गए। पीड़िता ने बताया कि छांगुर ने उसे नशीला पदार्थ और जूठा पान खिलाकर नौशाद के साथ उसका निकाह करवाया और धर्मांतरण करा दिया।

आरोपितों की पहचान समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में हुई है, जिनकी तस्वीरें सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ भी हैं। पीड़िता ने आरोप लगाया कि नौशाद उसे मुंबई ले गया, जहाँ वह एक साल तक रही और लगातार उसका शारीरिक शोषण किया गया।

गैंगरेप और ब्लैकमेलिंग का खुलासा

यह पहली बार नहीं है जब छांगुर पीर गैंग के जघन्य अपराधों का खुलासा हुआ है। इससे पहले बेंगलुरु और औरैया की पीड़ितों ने भी अपनी कहानियाँ सुनाई थीं। बेंगलुरु की पीड़िता ने बताया था कि सऊदी अरब में उसके साथ गैंगरेप हुआ और उसे ब्लैकमेल कर ₹10 लाख ऐंठे गए।

आरोपित राजू राठौर ऊर्फ वसीम ने इंस्टाग्राम पर दोस्ती की थी। औरैया की पीड़िता ने बताया कि शराब की लत छुड़ाने के बहाने उसके पिता को झाँसे में लिया गया और फिर आरोपित ने उससे शादी कर ली।

इन सभी मामलों में पीड़िताएँ बताती हैं कि अपराधियों को स्थानीय पुलिस का संरक्षण प्राप्त था, जिसके कारण उनकी शिकायत दर्ज नहीं हो सकी। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के अध्यक्ष ने पुलिस पर बिना पैसे के मदद न करने का आरोप लगाया है। उन्होंने सरकार से माँग की है कि छांगुर पीर के गिरोह पर सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि उसके गुर्गे अभी भी बाहर घूम रहे हैं और पीड़ितों के लिए खतरा बने हुए हैं।