रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर पर तीखा हमला बोला है। राजनाथ सिंह ने कहा कि कुछ लोग खुद को दुनिया का बॉस समझ बैठे हैं। ये लोग भारत की तेज विकास गति से नाराज हैं लेकिन कोई अब भारत को नहीं रोक सकता है।
टैरिफ वॉर पर राजनाथ सिंह का करारा वार
मध्य प्रदेश के रायसेन में आयोजित एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने कहा, “कुछ लोगों को भारत का तेज़ गति से होता हुआ विकास रास नहीं आ रहा है। उन्हें अच्छा नहीं लग रहा है। सबके बॉस तो हम हैं फिर भारत कैसे आगे बढ़ रहा है।”
उन्होंने कहा, “बहुत सारे लोगों द्वारा कोशिश की जा रही है, कुछ ऐसा करें कि भारत में, भारतवासियों के हाथों से जो चीजें तैयार होती हैं। वे दुनिया के देशों में जाएँ तो उन देशों में बनने वाली चीजें महँगी हो जाएँ ताकि दुनिया के लोग उन्हें ना खरीदें। भारत जितनी तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है, दुनिया की कोई ताकत भारत को विश्व की बड़ी शक्ति बनने से रोक नहीं सकती है।”
VIDEO | Madhya Pradesh: Defence Minister Rajnath Singh (@rajnathsingh) slams the US President over the tariff issue without naming him, saying, “Some ‘boss’ is jealous, unable to accept India’s growth; trying to disrupt the country’s economy."
ट्रंप द्वारा शुरू किए गए टैरिफ वॉर और भारत की दी गई रूस से तेल ना खरीदने की धमकी पर भारत ने कड़ा पलटवार किया है। ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाने की घोषणा करते हुए रूस से तेल खरीदना बंद करने की माँग की है। ट्रंप की टैरिफ धमकी के बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर बातचीत की है। भारत ने दिखा दिया है कि वो किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
ट्रंप के टैरिफ की मार से जूझ रहे ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा से भी पीएम मोदी ने बातचीत की है। लुला दा सिल्वा ने स्पष्ट किया था कि वे ट्रंप से टैरिफ के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं करेंगे। इसके अलावा वह पीएम मोदी चीन भी जाने वाले हैं और ट्रंप के टैरिफ के जवाब में रूस-भारत-चीन (RIC) सहयोग को फिर से मजबूत करने की बातचीत चल रही है।
पीएम मोदी कह चुके हैं ‘कीमत चुकाने’ की बात
पीएम मोदी ने टैरिफ धमकियों पर सीधे बयान नहीं दिया है। वह परोक्ष रूप से डेयरी उद्योग को लेकर अमेरिका से अटके व्यापार समझौते पर स्पष्ट संदेश दे चुके हैं। वह खुद ‘बहुत बड़ी कीमत चुकाने‘ की बात कह चुके हैं।
पीएम मोदी ने एमएस स्वामीनाथन शताब्दी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा था, “किसानों का हित हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। और मुझे पता है कि इसके लिए मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं तैयार हूँ।”
भारतीय और अमेरिकी अधिकारी व्यापार समझौते के लिए कई दौर की बैठकें कर चुके हैं और 15% टैरिफ पर यह समझौता होने की उम्मीद थी। भारत ने सिर्फ अमेरिका की शर्तों पर यह समझौता करने से इनकार कर दिया है।
ट्रंप बार-बार यह दावा भी करते रहे हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया संघर्ष को उन्होंने रुकवाया था। हालाँकि, भारत यह बार-बार नकारता रहा है और भारत ने कई बार यह साफ किया है कि पाकिस्तान के DGMO ने भारत के DGMO से बात कर संघर्ष रोकने का अनुरोध किया था। इसे लेकर भी ट्रंप झल्लाए हुए हैं।
कॉन्ग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी चुनाव आयोग के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘फर्जी दस्तावेज’ दिखाने को लेकर आयोग के निशाने पर आ गए हैं। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने राहुल गाँधी को नोटिस जारी करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके द्वारा लगाए गए आरोपों से जुड़े कागजात माँगे हैं।
राहुल गाँधी ने दिखाए फर्जी दस्तावेज!
7 अगस्त 2025 को राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ दस्तावेज दिखाते हुए दावा किया था कि शकुन रानी नामक एक मतदाता की आईडी से दो बार वोट डाला गया है। राहुल गाँधी ने 70 वर्षीय शकुन रानी ने दो बार वोट बनवाने के लिए अप्लाई करने का दावा भी किया था। राहुल ने कहा, “इन्होंने (शकुन रानी) दो बार वोट किया है। पता नहीं इन्होंने किया है या किसी और ने किया है लेकिन इस ID कार्ड पर दो बार वोट लगा है। जो टिक लगी है वो पोलिंग बूथ के अधिकारी की है।”
राहुल गाँधी ने जो स्लाइड अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई थी, उसमें बूथ नंबर 341 पर शकुन के दो बार वोट डालने का दावा था। इस स्लाइड में स्रोत के तौर पर ‘BLA द्वारा मार्क किया गया इलेक्टोरल रोल’ लिखा गया था।
राहुल गाँधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई गई स्लाइड
कर्नाटक के CEO ने राहुल गाँधी के इस दावे पर आपत्ति जताते हुए इसे जाँच में गलत बताया गया है। CEO द्वारा जारी किए गए नोटिस में कहा गया है, “जाँच करने पर शकुन रानी ने बताया कि उन्होंने केवल एक बार मतदान किया है, 2 बार नहीं, जैसा कि आपने (राहुल गाँधी) आरोप लगाया है।”
CEO ने कहा, “हमारे ऑफिस द्वारा की गई शुरुआती जाँच से यह भी पता चला है कि आपके द्वारा प्रजेंटेशन में दिखाया गया टिक मार्क किया गया दस्तावेज मतदान अधिकारी द्वारा जारी किया गया दस्तावेज नहीं है।”
CEO ने राहुुल गाँधी से वो सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने की माँग की है, जिनके आधार पर शकुन रानी या किसी अन्य शख्स के दो बार वोट करने की बात उन्होंने कही है।
— Chief Electoral Officer, Karnataka (@ceo_karnataka) August 10, 2025
मतदाता सूची पर भी राहुल गाँधी का फर्जी दावा
राहुल गाँधी ने रविवार (10 अगस्त 2025) को वोटर चोरी से जुड़ा एक कैंपेन लॉन्च किया। राहुल गाँधी ने X पर इसका वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “चुनाव आयोग से हमारी मांग साफ है-पारदर्शिता दिखाएं और डिजिटल मतदाता सूची सार्वजनिक करें।”
चुनाव आयोग ने कुछ ही देर में राहुल गाँधी की इस माँग का फैक्ट-चेक कर दिया। चुनाव आयोग ने कहा, “चुनाव से पहले प्रारूप एवं अंतिम मतदाता सूची की डिजिटल तथा भौतिक प्रतियाँ समस्त राजनीतिक दलों, जिनमें कॉन्ग्रेस (INC) भी सम्मिलित है, को उनके हस्ताक्षर के साथ विधिवत रूप से प्रदान की जाती हैं।”
चुनाव आयोग ने कहा, “यह दावा कि राजनीतिक दलों को मतदाता सूची की डिजिटल प्रतियाँ प्रदान नहीं की जातीं, पूरी तरह से झूठा और पूरी तरह भ्रामक है।”
राहुल गाँधी का एक पते 80 वोटर वाला दावा भी नहीं निकला सच
राहुल गाँधी ने एक मकान संख्या पर 80 फर्जी वोटरों का आरोप लगाते हुए जो दावा किया था उसकी भी अब पोल खुल गई है। महादेवपुरा के जिस मुनीयप्पा रेड्डी गार्डन क्षेत्र में यह मकान स्थित वहाँ के BLO मुनीरत्न ने न्यूज चैनल से बातचीत में बताया है कि यहाँ कोई डुप्लीकेसी का मामला नहीं है।
इस घर में अधिकांश लोग किराए पर रहने आते हैं और बीते 14 वर्षों से कोई स्थाई रूप से इसमें नहीं रहा है। पते के प्रमाण के लिए लोग रेंट एग्रीमेंट करवाकर वोटर आईडी बनवाते हैं लेकिन फिर मकान को छोड़ देते हैं।
मुनीरत्न ने कहा कि लोग रजिस्टर्ड हैं और जो अब कहीं और बाहर रह रहे हैं। पहले जिन लोगों का नाम यहाँ से रजिस्टर्ड था उनकी सूची बनाकर चुनाव आयोग को दे दी गई है और उसे हटा दिया जाएगा।
चुनाव आयोग ने राहुल से की है माफी की माँग
चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया है और कहा है कि इससे आयोग की निष्पक्षता पर गलत सवाल उठाए जा रहे हैं। आयोग ने जोर देकर कहा है कि लोकतंत्र की प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए नेताओं को अपने बयान हमेशा तथ्य और ठोस सबूतों के साथ देना चाहिए।
आयोग ने यह भी कहा कि अगर राहुल गाँधी के पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई आधिकारिक दस्तावेज या साक्ष्य है, तो वे तुरंत उसे प्रस्तुत करें नहीं तो उन्हें पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जुलाई 2024 में देश में सोने के आयात पर 15% से घटाकर 6% शुल्क लगाने का फैसला लिया। इसका सबसे अधिक असर केरल को हुआ, जहाँ सालों से सोने के अवैध कारोबार के जरिए पैरलल इकॉनमी मजबूत हो रही थी। पैरलल इकॉनमी का मतलब है कि पैसों का लेन-देन तो हो रहा होता है, लेकिन वो किसी सिस्टम में दर्ज नहीं होता। इसी पैरलल इकॉनमी से निकले मनी को ब्लैक मनी भी कहते हैं।
बिजनेस वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल के चार अतंरराष्ट्रीय हवाई अड्डे- तिरुवनंतपुरम, कोच्चि, कोझिकोड और कन्नुर खाड़ी देशों से सोने की तस्करी करने वाले मुख्य रास्ते हैं। यहाँ तक कि केरल की सोने की तस्करी का गढ़ माने जाने वाले दुबई से भी कनेक्शन मिले। केरल इन खाड़ी देशों से संबंध बेहतर करने के चलते ही ‘तस्करों का स्वर्ग’ बनता गया।
साल 2020 से 2023 तक केरल में 3,100 से अधिक सोना तस्करी के मामले सामने आए, इन सभी मामलों में करीब 200 से 400 टन अवैध सोना बरामद किया गया। लेकिन इससे भी हैरानी की बात यह है कि केरल में हर साल ₹1,31,586 करोड़ (15 अरब डॉलर) की कीमत के सोने की तस्करी होती थी, जो कि जब्त किए गए सोने के मुकाबले काफी कम मानी गई।
यह सोना तस्करी का कारोबार तब तक बढ़ता चला गया जब तक सोने के आयात में अच्छा शुल्क था। उस समय एक किलो सोने में करीब ₹9 लाख का मुनाफा होता, जिसमें से कुछ कैरियर शुल्क भी दिया जाता था। इस मुनाफा ने केवल तस्करों को अमीर नहीं बल्कि केरल की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (जिसका कागजों में कोई आकड़ा नहीं है) को भी गति दी।
इस काले धन से बिना हिसाब-किताब के रीयल एस्टेट डील, ज्वैलरी नेटवर्क और हवाला कारोबार चलाया गया। इससे जुड़ा एक मामला भी सामने आया था, जिसमें एक ज्वैलरी चेन के 4000 निवेशक थे, जो SEBI की सीमा का उल्लंघन है। ऐसी कंपनियाँ मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराध में भी सक्रिय रहती हैं।
लेकिन वित्त मंत्री ने जब से सोने के आयात पर शुल्क घटाने का फैसला लिया है, तभी से यह पूरी व्यवस्था ढह गई है। एक किलों पर मुनाफा घटकर अब करीब ₹3 लाख रह गया है, कैरियर की फीस भी कम हो गई और यहाँ तक की खाड़ी देशों से केरल आने वाला सोना भी अब कम हो गया है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड ने भी इस फैसले के बाद जब्तियों में तेज गिरावट की पुष्टि की है।
एयर ट्रैफिक के आँकड़े बताते हैं कि खाड़ी देशों से आने वाले यात्रियों की संख्या भी भारत में कम हुई है। यहाँ तक कि गल्फ एयर ने डिमांड कम होने के चलते साल 2025 में कालीकट की उड़ानें बंद कर दीं। इससे साफ है कि तस्करी के तार टूटने लगे हैं।
हालाँकि, इससे कानूनी सोने का व्यापार जरूर बढ़ा और वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने साल 2024 की तीसरी तिमाही में हर साल 18% वृद्धि दर्ज की। लेकिन अवैध नगदी के अचानक गायब होने से केरल की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा। 2024-25 में प्रदेश की GSDP ग्रोथ 6.19% रह गई, जो दक्षिण भारत में सबसे कम थी। रीयल एस्टेट, निर्माण और लग्जरी रिटेल जैसे सभी क्षेत्रों में गिरावट साफ दिखने लगी।
इस मंदी ने साफ कर दिया केरल की अर्थव्यवस्था अब तक काले धन पर निर्भर थी। केरल में प्रॉपर्टी डील 18% घटी, लग्जरी हाउसिंग की कीमतें 25% तक नीचे आईं और निर्माण क्षेत्र की वृद्धि राष्ट्रीय औसत से पीछे रह गई। खाड़ी से आने वाले रेमिटेंस में भी 2024 में 10% की कमी आई, जिससे प्रदेश में काला धन लाने वाले कानूनी और अवैध सोर्स दोनों की कमजोर हो गए।
यह कदम महज एक टैक्स सुधार नहीं था बल्कि एक रणनीतिक प्रहार था, जिसने आतंकवाद फंडिंग और राजनीतिक भ्रष्टाचार से जुड़े एक अपराधिक नेटवर्क को कमजोर कर दिया। लेकिन इस कहानी का राजनीतिक पहलू अभी भी जीवित है। साल 2020 के केरल गोल्ड स्मगलिंग केस की मुख्य आरोपितों में से एक स्वप्ना सुरेश ने 2023 में सनसनीखेज दावा किया कि उन्हें मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का नाम केस से हटाने के लिए 30 करोड़ रुपए की पेशकश हुई थी।
एक फेसबुक लाइव ब्रॉडकास्ट में स्वप्ना सुरेश ने आरोप लगाया कि खुद मुख्यमंत्री ने उन्हें देश छोड़ने की धमकी दी और CPM के प्रदेश सचिव गोविंदन मास्टर के कहने पर पार्टी के लोग उन्हें डराने-धमकाने लगे। यहाँ तक कि उन्हें हरियाणा या जयपुर भेजने की योजना बनाई गई थी, जिसमें सरकार की तरफ से फ्लैट और फर्जी पासपोर्ट की भी व्यवस्था की जा रही थी।
स्वप्ना ने कई बार सीएम विजयन और उनके परिवार के सदस्यों और तीन कैबिनेट मंत्रियों के नाम हवाला और तस्करी से जुड़े मामलों में लिए हैं। उन्होंने पहले भी गवाही में कहा था कि 2016 में दुबई में मौजूद सीएम को भेजे जा रहे नगदी से भरे बैग को एयरपोर्ट स्कैनिंग में पकड़ा गया था, जो कांसुलर प्रोटोकॉल के तहत भेजा जा रहा था। उन्होंने यह भी दावा किया कि तब के प्रिंसिपल सेक्रेटरी एम. शिवशंकर के निर्देश पर UAE कॉन्सुलेट से मेटल से भरे बिरयानी के बर्तन मुख्यमंत्री के सरकारी आवास क्लिफ हाउस में ले जाए गए।
ये आरोप 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले सामने आए थे और 2024 में फिर से चर्चा में आ गए, जब केंद्र सरकार के इस राजकोषीय प्रहार ने उस आर्थिक जड़ को काट दिया, जिस पर यह पूरा अवैध साम्राज्य खड़ा था।
कॉन्ग्रेस महासचिव और वायनाड की सांसद प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा को 58 करोड़ रुपए की अपराध की आय हुई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ दायर चार्जशीट में यह अहम खुलासा हुआ है। यह मामला गुरुग्राम में कथित जमीन घोटाले से जुड़ा हुआ है। ED ने गुरुग्राम स्थित शिखोपुर (अब सेक्टर 83) लैंड डील मामले में 17 जुलाई 2025 को चार्जशीट दायर की थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वाड्रा को यह धन दो कंपनियों के जरिए आया था। इसमें ब्लू ब्रीज ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड (BBTPL) के जरिए 5 करोड़ रुपए और स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड (SLHPL) के जरिए 53 करोड़ रुपए वाड्रा को मिले हैं। बताया जा रहा है कि ये दोनों कंपनियाँ रॉबर्ट वाड्रा के कारोबारी नेटवर्क से जुड़ी हुई हैं।
The investigation precisely quantified the Proceeds of Crime (PoC) generated from the alleged criminal activities. Robert Vadra was found to have received PoC amounting to Rs 58 crores. This amount was received through two channels. The PoC amounting to Rs 5 crores were routed…
वाड्रा ने यह रकम अचल संपत्तियाँ खरीदने, अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश करने, कंपनियों को कर्ज देने और अपने समूह की कंपनियों का बकाया चुकाने में लगाई है। ईडी का आरोप है कि यह पूरी रकम अवैध कमाई से आई थी और इसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग के तहत अपराध की श्रेणी में आता है। जांच एजेंसी ने कहा कि यह पैसा ‘शेड्यूल अपराध’ से आया है यानी उसे सोर्स से जिसे कानून पहले से ही अपराध मानता है।
अधिकारियों के मुताबिक, जांच में बैंक लेन-देन, कंपनी के रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों के आधार पर पैसों की पूरी आवाजाही का पता लगाया गया। ईडी ने बताया कि जिन कंपनियों से यह रकम आई, उन्हें वाड्रा के करीबी सहयोगी चला रहे थे। एजेंसी का आरोप है कि इन कंपनियों का इस्तेमाल पैसे को वैध दिखाने के लिए किया गया।
इससे पहले वाड्रा को गुरुग्राम में 3.5 एकड़ जमीन रिश्वत में मिलने की बात भी सामने आई थी। चार्जशीट के मुताबिक, ओंकारेश्वर प्रॉप्रटीज प्राइवेट लिमिटेड (OPPL) ने जमीन स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड (SLHPL) को रिश्वत के तौर पर दी थी ताकि SLHPL के निदेशक रॉबर्ट वाड्रा अपनी व्यक्तिगत पहुँच का इस्तेमाल कर हरियाणा के तत्कालीन ‘नगर एवं ग्राम नियोजन’ मंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से OPPL को उसी गाँव में हाउसिंग लाइसेंस दिला सकें।
यह मामला 2018 में हरियाणा पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के बाद शुरू हुआ था। ईडी ने दिसंबर 2018 में इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की थी। अदालत ने इस मामले में वाड्रा को नोटिस जारी किया है और 28 अगस्त को इसकी सुनवाई होनी है। गौरतलब है कि यह वाड्रा के खिलाफ दायर पहली आपराधिक चार्जशीट है।
पाकिस्तान में मीडिया की हालत बद से बदतर होती जा रही है और वहाँ पत्रकारों पर शिकंजा कसना कोई नई बात नहीं है। इस बार पाकिस्तान ने अपने पत्रकार असद अली तूर को इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ान भरने से रोक दिया। असद कुछ दिनों पहले तोता खरीद को लेकर चर्चा में आए थे, जब तोता खरीदने के बाद इनके बैंक अकाउंट्स को फ्रीज कर दिया गया था।
असद अली तूर इस्लामाबाद से अमेरिकी विदेश मंत्रालय के 12 दिवसीय इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम (IVLP) में भाग लेने के लिए वॉशिंगटन जा रहे थे। इमिग्रेशन अधिकारियों ने तूर ने कहा कि उनका नाम पाकिस्तान की प्रोविजनल नेशनल आइडेंटिफिकेशन लिस्ट (PNIL) में है। पाकिस्तान में इस लिस्ट में शामिल लोगों को कुछ समय तक विदेश यात्रा से रोक दिया जाता है।
तूर ने पाकिस्तानी सरकार को घेरा
तूर ने शनिवार (9 अगस्त 2025) को एक्स पर एक पोस्ट में पाकिस्तानी सरकार की आलोचना की है। तूर ने लिखा, “मैंने बार-बार PNIL में अपना नाम जोड़ने का कारण पूछा लेकिन अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं था।”
तूर ने कहा, “पाकिस्तान में पत्रकारिता और सत्ता के सामने सच बोलना अपराध माना जाता है। हाँ, मैंने यह अपराध किया है और मैं यह अपराध दोहराता रहूँगा। एक पत्रकार को रोकना इस ‘हाइब्रिड’ शासन की एक और उपलब्धि है, जिसके शासन में पाकिस्तान विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 152वें स्थान से 6 अंक गिरकर 158वें स्थान पर आ गया है।”
पाकिस्तान मानवाधिकार परिषद (HRCP) ने तूर को विदेश जाने से रोके जाने की निंदा की हैं और पत्रकारों के उत्पीड़न को रोकने की माँग की है।
तूर की एक्स प्रोफाइल से पता चलता है कि वह ब्लूचिस्तान के गायब हुए लोगों को लेकर प्रदर्शन करने वालों का समर्थन कर रहे थे। तूर ने कई पोस्ट में पाकिस्तान की सरकार पर सवाल भी उठाए थे।
तूर की X पोस्ट
पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देशों में शामिल पाकिस्तान
रिपोटर्स विदआउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा जारी 2025 के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान 180 देशों की सूची में 158वें नंबर पर है। RSF ने अपनी प्रोफाइल में कहा है कि पाकिस्तान पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक है और जहाँ हर साल कई पत्रकारों की हत्याएँ होती हैं।
अगर कोई पाकिस्तानी पत्रकार वहाँ की सेना के नियमों के खिलाफ जाता है तो उसके अपहरण होने, कई वर्षों तक जेल में रहने का खतरा बना रहता है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI किसी भी आलोचना करने वाले को ‘चुप’ करा देती है। पत्रकारिता की सुरक्षा की आड़ लेकर पाकिस्तानी कानून का उपयोग सरकार और सेना की किसी भी आलोचना को सेंसर करने के लिए किया जाता है।
पाकिस्तान में मुश्किल होती पत्रकारिता
पाकिस्तान में पत्रकारों के लिए स्थितियाँ मुश्किल होती जा रही हैं। सरकार से सवाल करने वाले पत्रकारों पर हमले किए जाने का लंबा इतिहास है। हामिद मीर जैसे कई पत्रकारों को उनकी पत्रकारिता के लिए निशाना बनाया गया है। 2025 के शुरुआत में आई HRCP की रिपोर्ट में बताया गया कि पाकिस्तान में स्वतंत्र पत्रकारिता के पक्षधर मीडिया आउटलेट्स को कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। इस रिपोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बिगड़ती स्थिति का वर्णन किया गया था।
वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने एक दिन पहले (शनिवार – 9 अगस्त 2025) ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि भारत ने इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के पाँच लड़ाकू विमानों को मार गिराया था। यह बयान भारतीय वायुसेना की ताकत, रणनीति और साहस का प्रतीक है। इस बयान से जहाँ देशवासियों का मनोबल बढ़ा, वहीं कॉन्ग्रेस नेताओं ने इस पर सवाल खड़े कर दिए।
वहीं कॉन्ग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने भी संदेह जताते हुए कहा कि उन्हें वायुसेना प्रमुख की बातों पर शक नहीं है, लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट क्यों नहीं किया कि भारतीय विमान भी मारे गए या नहीं? यानी जब भी सेना या सरकार की ओर से कोई जानकारी दी जाती है, कॉन्ग्रेस उसमें भी संदेह खोजती है।
Delhi: On Chief of Air Staff Air Chief Marshal A.P. Singh’s statement that India downed five Pakistani fighter jet during Operation Sindoor, Congress leader Rashid Alvi says, "…Whatever the Air Chief has said, we have no doubts about it. However, no one has clearly clarified… pic.twitter.com/dv2o2PNCTj
कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने आरोप लगाया कि वायुसेना प्रमुख यह बयान तब दे रहे हैं जब वोट चोरी का मामला सामने आया है। उन्होंने कहा कि यह बयान ध्यान भटकाने के लिए दिया जा रहा है और सेना को राजनीतिक मोहरा बनाया जा रहा है। यह एक गंभीर आरोप है, जो देश की सुरक्षा से जुड़े विषय को सस्ती राजनीति में घसीटने जैसा है।
Delhi: On Chief of Air Staff Air Chief Marshal A.P. Singh’s statement that India downed five Pakistani fighter jet during Operation Sindoor, Congress leader Udit Raj says, "Why are you saying this only now, when the case of the vote theft was caught? Only then are the Army Chief… pic.twitter.com/j4vQE1eM7n
यह पहला मौका नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल उठाए हों। बालाकोट एयर स्ट्राइक, उरी सर्जिकल स्ट्राइक और गलवान संघर्ष जैसे मामलों में भी कॉन्ग्रेस ने सेना के दावों पर भरोसा करने के बजाय विदेशी मीडिया की रिपोर्टों का हवाला दिया। खासकर ब्रिटिश मीडिया जैसे BBC की रिपोर्ट्स को सच मानते हुए बार-बार भारतीय सेना की छवि को कमजोर करने की कोशिश की गई है।
कॉन्ग्रेस को यह समझने की जरूरत है कि राजनीति में आलोचना जरूरी हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सेना का सम्मान और विश्वास सर्वोपरि होना चाहिए। अगर हर सैन्य ऑपरेशन को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा, तो इससे भारत की सामरिक छवि भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित होगी।
इंदौर के परदेशीपुरा में रहने वाली 23 साल की एक हिंदू लड़की ने पुलिस में शिकायत की कि सोहिल खान नाम के शख्स ने उसका जिंदगी बर्बाद कर दी। उसने बताया कि करीब तीन साल पहले फेसबुक पर फाइटर राजपूत नाम से एक लड़के से उसकी दोस्ती हुई। उसने अपना नाम सोहिल राजपूत बताया और कहा कि वो हिंदू है। दोनों की बातचीत एक साल तक चली। इस दौरान सोहिल ने शादी का वादा किया। लड़की ने हाँ कर दी, लेकिन उसके मम्मी-पापा शादी के लिए तैयार नहीं हुए।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, सोहिल ने लड़की को बहाने से 21 जून 2025 को अहमदाबाद बुलाया। उसने 3 लाख रुपये और कुछ कागजात साथ लाने को कहा। अहमदाबाद में एक होटल में दो दिन तक रखा और शादी से पहले ही जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। फिर कुछ गुजराती में कागज बनवाए और लड़की से साइन करवाए। लड़की को गुजराती नहीं आती थी, इसलिए वो समझ नहीं पाई कि कागजों में क्या लिखा है।
इसके बाद सोहिल उसे अपने दोस्त के कारखाने में बने एक कमरे में ले गया। फिर अपने घर ले गया, जहाँ उसके अम्मी-अब्बू, भाई-बहन और कुछ रिश्तेदार थे। वहाँ लड़की को पता चला कि सोहिल का असली नाम सोहिल खान है और वो मुस्लिम है। सोहिल और उसके परिवार ने मिलकर उस पर धर्म बदलने का दबाव डाला। जबरदस्ती कलमा पढ़वाया और उसका नाम सना फातिमा रख दिया। फिर परिवार वालों ने मिलकर सोहिल के साथ उसका निकाह करवा दिया।
निकाह के बाद लड़की को घर से बाहर नहीं निकलने दिया गया। उसकी हर हरकत पर नजर रखी जाती थी। एक दिन उसने सोहिल का फोन देखा, तो पता चला कि वो और भी कई लड़कियों से बात करता है। जब उसने सोहिल से इस बारे में पूछा, तो उसने बेशर्मी से कहा कि हिंदू लड़कियों को फँसाना उसका काम है।
लड़की ने हिम्मत करके अपनी माँ और भाई से फोन पर संपर्क किया और सारी बात बताई। उनके साथ मिलकर उसने शनिवार (9 अगस्त 2025) को परदेशीपुरा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की।
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू की और सोहिल खान उर्फ फाइटर राजपूत, उसकी अम्मी रजिया बेगम, अब्बू मोहम्मद यूनुस खान, भाई जाहिद खान, बहन नाजिया खान, रिश्तेदार मोहम्मद रफीक, मोहम्मद सलीम, शबाना बी, फरहाना बी, मोहम्मद इरफान, मोहम्मद शाहिद, मोहम्मद आसिफ और मौलवी अब्दुल रहमान के खिलाफ रेप, धोखाधड़ी, जबरन धर्म परिवर्तन और धमकी देने की धाराओं में केस दर्ज किया। पुलिस ने बताया कि मामले की जाँच चल रही है और आरोपितों की तलाश की जा रही है।
केंद्र सरकार ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा, अफगानिस्तान में सिखों पर अत्याचार से जुड़ी जानकारी संसद में दी हैं। साथ ही, सरकार ने अमेरिका और कनाडा में हिंदू मंदिरों मे हुई तोड़फोड़ से जुड़े आँकड़े भी बताए हैं। सरकार का कहना है कि वो धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़ी हिंसा को लेकर लगातार पड़ोसी देशों की सरकारों के संपर्क में रहती है।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों व टैगोर के घर तोड़फोड़ पर क्या बोली सरकार?
बांग्लादेश में हिंदू समुदाय लगातार कट्टरपंथी मुस्लिमों के निशाने पर रहा है। शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से हटने और मोहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले हमलों में तेजी आई है। 2022 की जनगणना के मुताबिक, बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं। वे कुल आबादी का 7.95% हैं। उनके बाद बौद्ध (0.61%) और ईसाई (0.30%) आते हैं।
विदेश राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को सुष्मिता देव के एक सवाल के जवाब में राज्यसभा में बताया कि बांग्लादेश में 2021 के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के कम-से-कम 3,582 मामले सामने आए हैं।
सरकार ने इन मामलों पर अपनी चिंताओं को बांग्लादेश के साथ शीर्ष स्तर पर साझा किया है। सरकार ने उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश सरकार हिंदुओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए सभी जरूरी उपाय करेगी।
सरकार ने बांग्लादेश द्वारा लालमोनिरहाट एयरबेस का इस्तेमाल करने की अनुमति चीन को दिए जाने की रिपोर्ट पर भी संसद में जानकारी दी है। कौशलेंद्र कुमार के सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि हमने 26 मई 2025 को बांग्लादेशी सेना की प्रेस कॉन्फ्रेंस को नोट किया जिसमें कहा गया है कि लालमोनिरहाट एयरफील्ड को सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की फिलहाल कोई योजना नहीं है। सरकार ने कहा, “हम राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाली सभी घटनाओं पर लगातार नजर रखतें हैं और इसकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करते हैं।”
बांग्लादेश में रवींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर में तोड़फोड़ पर सरकार ने लोकसभा में कहा, “सरकार ने टैगोर के पैतृक घर पर हुए घृणित हमले और तोड़फोड़ की कड़ी निंदा की और इस बात पर जोर दिया कि यह हिंसक कृत्य गुरुदेव टैगोर की स्मृति और समावेशी मूल्यों का अपमान है। भारत ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से सख्त कार्रवाई करने और ऐसी घटनाओं को रोकने का आग्रह किया।”
टैगोर के घर पर हमले को लेकर 2 लोगों को गिरफ्तार किया गया। बांग्लादेश की सरकार ने रवींद्र कचहरीबाड़ी की सुरक्षा बढ़ाने के उपाय बढ़ाने की घोषणा की है। TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने यह सवाल पूछा था।
पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा पर दी जानकारी
पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा पर भी केंद्र ने संसद में जानकारी दी है। केंद्र सरकार ने बताया कि भारत ने 2021 से पाकिस्तान सरकार के सामने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 334 बड़े मामलों को उठाया गया है। सरकार ने पाकिस्तान से अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने और सांप्रदायिक हिंसा व धार्मिक असहिष्णुता को खत्म करने की बात कही है।
हिंदुओं के साथ अत्याचार की घटनाएँ पाकिस्तान में आम हो गई हैं। मंदिरों में तोड़फोड़, हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण, जबरन धर्मांतरण जैसे मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। उत्पीड़न, भेदभाव और जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाओं के चलते पाकिस्तान में हिंदुओं की जो आबादी आजादी के समय 1947 में लगभग 15-20% थी वो अब केवल 2-3% रह गई है।
कनाडा और अमेरिका में हिंदुओं पर हमले को लेकर सरकार ने दी जानकारी
सरकार ने बताया कि ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में हिंदुओं पर हमले और हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ किए जाने की घटनाएँ सामने आई हैं। सरकार ने कहा कि 2024 से अमेरिका में 5 और कनाडा में 4 हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की गई है। सरकार ने कहा, “ऐसे मामले संज्ञान में आने पर संबंधित संगठन व व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए मामले को तुरंत उन देशों की सरकारों के सामने उठाया जाता है।”
लोकसभा सांसद अनिल यशवंत देसाई ने सरकार से यह जानकारी माँगी थी। वहीं, सरकार ने स्कॉटिश संसद में हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव होने की खबरों को नकार दिया है।
अफगानिस्तान पर क्या बोली सरकार?
सरकार ने 2021 के बाद बिगड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बाद अफगानिस्तान से सिखों समते 74 अल्पसंख्यकों को ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ के तहत निकालने की जानकारी दी है। सरकार ने कहा कि 18 जून 2022 को काबुल में गुरुद्वारे पर हुए हमले की भी भारत ने कड़ी निंदा की थी।
बिहार में चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दल लगातार विवाद कर हैं। हजारों-लाखों पात्र मतदाताओं के वोट कटने का दावा किया जा रहा है। वहीं, अब चुनाव आयोग ने SIR पर शनिवार (9 अगस्त 2025) को सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल कर दिया है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना नोटिस दिए किसी भी मतदाता को अंतिम वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जाएगा।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) नामक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि 65 लाख मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से बाहर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त को आदेश दिया कि चुनाव आयोग इस मामले में हलफनामा दायर करे। 1 अगस्त 2025 को यह ड्राफ्ट सूची प्रकाशित की गई थी। कोर्ट अब 13 अगस्त को इस मामले में सुनवाई करेगा।
अब आयोग ने अपने हलफनामे इसमें साफ कर दिया है कि बिना किसी पूर्व नोटिस, सुनवाई का अवसर और तर्कपूर्ण आदेश के किसी भी पात्र मतदाता का नाम नहीं हटाया जाएगा। आयोग ने बताया कि सभी योग्य मतदाताओं का नाम फाइनल सूची में आ जाए इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। किसी नाम को हटाए जाने को रोकने के लिए भी ‘कड़े निर्देश’ जारी किए गए हैं।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या बताया?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में बताया है कि 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ लोगों अपने फॉर्म किए हैं या अपने नामों को पुष्टि की है। इस विस्तृत में शामिल रहे लोगों को लेकर EC ने कहा कि इसके लिए बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, 38 जिला निर्वाचन पदाधिकारी, 243 निर्वाचन पंजीकरण पदाधिकारी, 77895 बूथ लेवल ऑफिसर (BLO), 2.45 लाख स्वयंसेवक और 1.60 लाख बूथ स्तर एजेंट सक्रिय रहे हैं।
राजनीतिक दलों को दी गई छूटे नामों की सूची: EC
चुनाव आयोग के मुताबिक, BLO ने घर-घर जाकर मौजूदा मतदाताओं से फॉर्म लिए और उसके बाद ही उन व्यक्तियों की पहचान की गई जिनके गणना फॉर्म नहीं मिले हैं। EC ने कहा कि 20 जुलाई 2025 तक इन बूथ-स्तरीय सूचियों को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बीएलए के साथ साझा कर दिया गया था। इसका मकसद था कि राजनीतिक दल भी वोटर वेरीफाई कर लें और कोई दिक्कत होने पर अपडेटेड सूची में जरूरी बदलाव किए जा सकें। बाद में इन दलों के ‘सक्रिय प्रयासों’ के बाद अपडेटेड सूची जारी की गई।
कोई मतदाता ना छूटे इसके लिए EC कर रहा है प्रयास
आयोग ने कहा कि हर योग्य मतदाता का नाम फाइन वोटिंग लिस्ट में आ जाए इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं और इस प्रक्रिया पर रोजाना प्रेस विज्ञप्ति के जरिए जनता को जानकारी दी जा रही है। प्रवासी मजदूरों के लिए 246 अखबारों में हिंदी में विज्ञापन, ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से फॉर्म भरने की सुविधा है। शहरी क्षेत्रों में विशेष कैंप, युवाओं के पंजीकरण के लिए अग्रिम आवेदन की व्यवस्था की गई है।
किसी भी नाम को प्रारूप सूची से हटाने से पहले नोटिस, सुनवाई और सक्षम अधिकारी का कारणयुक्त आदेश अनिवार्य है। 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक दावे और आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। इस दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट को लोग ऑनलाइन भी देख सकते हैं। इन दावों को 7 दिनों में निस्तारित करने की प्रक्रिया बनाई गई है। इसकी अपील पहले ERO फिर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के बाद जाएगी।
अगर किसी के पास मौजूदा वक्त में कोई दस्तावेज नहीं है तो उसे दस्तावेज इकट्ठा करने में भी चुनाव आयोग द्वारा मदद की जा रही है। जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं, वे अपने दस्तावेजों के साथ नाम दर्ज करा पाएँ इसके लिए चुनाव आयोग पूरी कोशिश में जुटा है।
ADR की याचिका पर EC ने उठाए सवाल
चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ता NGO ADR की याचिका को खारिज करने की माँग की और उस पर जुर्माना लगाकर ‘उचित कार्रवाई’ करने का भी अनुरोध किया है। आयोग का कहना है कि ADR ने ‘अशुद्ध हाथों’ से आवेदन दायर किया है और उनका तरीका पहले की तरह ही है, जिसमें वे डिजिटल, प्रिंट और सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाकर चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश करते हैं।
चुनाव आयोग ने ADR के इस तर्क को खारिज कर दिया कि जिन लोगों के नाम बूथ लेवल अधिकारियों ने अनुशंसित नहीं किए थे, वे मसौदे में शामिल थे। आयोग ने कहा कि BLO से मिली जानकारी केवल एक संकेत है और इसकी दोबारा जांच निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए।
क्या आप यकीन करेंगे अगर मैं कहूँ कि वो दिन दूर नहीं, जब हॉलीवुड की किसी अगली सुपरहिट फिल्म में विलेन कोई इंडियन होगा? जैसे कभी रशियन हुआ करते थे… जैसे कभी नॉर्थ कोरियन या कॉमिक्स और फ़िल्मों में नेगेटिव कैरेक्टर में चायनीज विलेन तो आपने देखें ही होंगे।
आप मेरी इस बात को अपनी मेमोरी में बिठा लीजिए क्योंकि आने वाले समय में यही होने वाला है। अमेरिका को जिस भी देश से समस्या होती है, सबसे पहले वो उसके चरित्र पर ही हमला कर माहौल बनाने का प्रयास करता है। और दुनिया के सामने साबित करने की कोशिश करता है कि ये देश या फिर ये नस्ल इतनी बुरी है। और हॉलीवुड के ज़रिए वो ये काम आसानी से करता रहा है।
जैसे जॉन रेम्बो फ़िल्म ही देख लीजिए कि वियतनाम युद्ध में हार के बावजूद, रेम्बो फिल्में अमेरिका को विक्टिम, लेकिन पावरफुल दिखाती है। जबकि वियतनामी, रूसी या अफगानी कैरेक्टर्स को हिंसक और बर्बर दिखाया जाता है। इस तरह की फिल्मों के ज़रिए अमेरिका न सिर्फ़ अपने Wars को या जेनोसाइड को नैतिक रूप से सही और जायज ठहराता है, बल्कि दुश्मन देशों या नस्लों को ‘असभ्य और खतरनाक’ भी साबित करने की कोशिश करता है।
रैम्बो फ़िल्म का थर्ड पार्ट, जब साल 1988 में रिलीज हुआ, तब हॉलीवुड ने अफगान मुजाहिदीन को सोवियत आर्मी के खिलाफ बहादुर और हीरो के रूप में पेश किया, क्योंकि उस समय अमेरिका, अफगान मुजाहिदीन का सोवियत संघ के खिलाफ समर्थन कर रहा था। लेकिन 9/11 के आतंकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के लिए इन हॉलीवुड की कहानी में ट्विस्ट आ गया। इसी हॉलीवुड ने साल 2012 में Zero Dark Thirty जैसी फ़िल्में बनाईं, जहाँ उन्हीं मुजाहिदीनों को आतंकवादी और विलेन के रूप में दिखाया गया।
ये कहानी सिर्फ एक भू-राजनीतिक विश्लेषण नहीं है, ये कहानी उस गठजोड़ की है, जो रीगनॉमिक्स (Reaganomics) से शुरू हुआ और अब RIC यानी, रूस, इंडिया और चीन के एकजुट होने तक पहुँच रहा है। इसमें गलवान की चोट भी है, ‘चाइमेरिका’ का मोहभंग भी… और डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) की दस्तक भी। ये सभी मिलकर के पश्चिमी साम्राज्य को ख़त्म करने जा रहे हैं।
निक्सन का बीजिंग दौरा (1972)
इस पूरी जियो पॉलिटिक्स को समझने के लिए हमें 1949 में चलना होगा, जब माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद अमेरिका ने चीन की नई सत्ता को मान्यता देने से इनकार कर दिया और ताइवान का समर्थन शुरू किया। फिर कोरिया युद्ध में दोनों आमने-सामने आ गए, जिससे रिश्तों में गहरी खामोशी छा गई और ये खामोशी चली करीब 25 साल तक।
इस बीच 1960 के दशक में दुनिया कोल्ड वॉर की दो ध्रुवीय गुटों में बँटी हुई थी, जहाँ अमेरिका और USSR यानी, सोवियत संघ आमने-सामने थे। लेकिन यहाँ पर चीन के रूप में एक तीसरा खिलाड़ी भी जगह बना रहा था। 1970 के दशक की शुरुआत में समीकरण बदले। चीन और सोवियत संघ के बीच भी तनाव बढ़ने लगा और अमेरिका ने इस दूरी को अपने हित में भुनाने का फैसला किया।
इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर अपनी ‘शटल डिप्लोमेसी’ के लिए बहुत चर्चित थे। उन्होंने पाकिस्तान के रास्ते गुप्त रूप से बीजिंग की यात्रा की। किसिंजर की शटल डिप्लोमेसी के बाद साल 1972 आया, शीत युद्ध की गर्मागर्मी के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन पहुँचे। और इसी के साथ दोनों देशों की 25 साल पुरानी खामोशी टूटी। ‘निक्सन गोज़ टू चाइना’ केवल एक कूटनीतिक यात्रा नहीं थी, यह सोवियत संघ यानी USSR के खिलाफ एक रणनीतिक समीकरण की शुरुआत थी। इसका मकसद सिर्फ़ एक ही था, USSR के ख़िलाफ़ चीन के रूप में दूसरा धड़ा तैयार करना!
इसके बाद ‘शंघाई कम्युनिक‘ लाया गया। अमेरिका-चीन, दोनों देशों के रिश्तों की शुरुआत हुई, लेकिन कोई ठोस आर्थिक समझौता नहीं हुआ। असली फायदा कम्युनिस्ट राष्ट्र चीन को हुआ, जो अब तक बाजार में अलग-थलग पड़ा हुआ था लेकिन अब अमेरिका के पूंजीवादी सिस्टम का दोहन कर अपने आर्थिक ढाँचे की ज़मीन तैयार कर रहा था।
Deng Xiaoping (देंग शियाओपिंग) और चीन का चमत्कार
1978-80 की बात है- आधुनिक चीन का निर्माता कहे जाने वाले देंग शियाओपिंग ने सुधार और खुले मार्केट की ‘गैइग काइफांग’ (Gaige Kaifang) की पॉलिसी शुरू की। और इसका मतलब होता है ‘Reform and Opening-up’। देंग ने चीन की बंद इकॉनमी को मार्केट इकॉनमी में बदल दिया, जिसे समाजवाद का चोला पहनाया गया। पहली बार चीन में ‘स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स’ बने, विदेशी पूंजी का स्वागत किया गया। चीन में पश्चिमी निवेशकों की लाइन लगने लगी- जिसके परिणामस्वरूप IBM, HP और Motorola जैसी कंपनियाँ चीन में फैक्ट्रियाँ लगाने लगीं।
यहाँ से शुरुआत हुई Chimerica की, यानी अमेरिका की पूँजी और चीन का श्रम।
Reaganomics से Walmart तक
चीन को लुभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रॉनल्ड रेगन ने चीन को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा दिया। इसके पीछे वजह ये भी थी कि 1980 के दशक में अमेरिका को सस्ते मैन्युफैक्चरिंग की जरुरत महसूस हुई, और चीन को डॉलर और तकनीक की। Reaganomics की नीतियों ने बाजार को और खोल दिया।
अमेरिकी कंपनियाँ चीन में सेटअप लगाने लगीं, Walmart, Apple, Nike (नाइकी) जैसी कंपनियों ने चीन को 21वीं सदी आते-आते ‘फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’ बना दिया। याद रहे, ये नई दोस्ती इसलिए शुरू हुई क्योंकि इस बीच साल 1991 आया, जब USSR पूरी तरह से टूट गया। सोवियत संघ (USSR) के बिखरने के बाद चीन और अमेरिका के बीच एक किस्म का “फ्रेंड्स विद बेनिफिट” का क्रम चलता रहा। लेकिन हर गठजोड़ की एक एक्सपायरी डेट होती है।
WTO में चीन, Chimerica ‘चाइमेरिका’ का Honeymoon (2001)
साल 2001 में चीन को WTO की सदस्यता मिली। यह अमेरिका का एक बड़ा दाँव था और उम्मीद थी कि ग्लोबल इकोनॉमी में आने से चीन उदारवादी बनेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। चीन ने सस्ती वस्तुओं की बाढ़ अमेरिका में भेज दी, अमेरिका की घरेलू इंडस्ट्री चरमरा गई। Huawei, ZTE जैसी कंपनियाँ सामने आईं, Intellectual Property की धज्जियाँ उड़ाई गईं। ये कुछ वही था, जिसे आप आज आम भाषा में चायनीज माल कहते हैं।
चीनी कंपनियाँ अमेरिकी टेक्नोलॉजी की कॉपी करने लगीं। चीन से इम्पोर्ट तेजी से बढ़ा, लेकिन चीन ने अमेरिकी सामानों की खरीद कम की और यहीं से दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट का घमासान शुरू हुआ। नतीजा ये हुआ कि साल 1993 में अमेरिका का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब $22 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2005 तक $202 अरब डॉलर हो गया, यानी 12 साल में यह 9 गुना बढ़ गया। और यही असंतुलन आगे चलकर ट्रम्प और बायडेन, दोनों की ‘चाइना पॉलिसी’ पर हावी नजर आता है।
2008: अमेरिका की मंदी, चीन की बाजार पर आक्रामकता
फिर आया साल 2008… जब फाइनेंशियल क्राइसिस ने अमेरिका को तोड़कर रख दिया, लेकिन चीन ने इस मौके का इस्तेमाल बाजार पर अपनी ताकत दिखाने में किया। स्टेट-कैपिटलिज्म और सेंट्रल बैंकिंग मॉडल को ग्लोबल मंच पर रखा गया। यही समय था जब चीन को लगने लगा कि वो अमेरिका को टक्कर दे सकता है। अब चीन, डॉलर का सिर्फ़ ग्राहक नहीं, उसका विकल्प भी बनने निकला।
यही वो समय था, जब हॉलीवुड की फ़िल्मों में चायनीज विलेन दिखाई देने लगे। याद कीजिए साल 2008 की “The Dark Knight” फ़िल्म जिसमें Lau नाम का एक चीनी अकाउंटेंट और बिज़नेसमैन गौथम सिटी के माफिया डॉन और करप्ट बिज़नेस लॉबी का पैसा हांगकांग में छुपाकर रखता है। इसके बाद चीन ने हॉलीवुड फिल्मों पर सख़्त सेंसरशिप और कोटा सिस्टम लागू कर दिया।
फिल्म में Lau को एक चीनी बिज़नेसमैन, धोखेबाज़ और माफिया का सहयोगी दिखाया गया था। ये असल में चीन-विरोधी नैरेटिव था जिसमें चीन की छवि एक भ्रष्ट ठिकाने के रूप में सामने रखी गई।
2018–20: ट्रंप की ट्रेड वॉर, डि-कपलिंग की शुरुआत
अब थोड़ा और करीब आते हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में 2016 में खुलकर घोषणा की कि ‘चीन दशकों से हमें लूट रहा है।’ ट्रंप के तेवरों से ये साफ़ दिखने लगा कि उसके भीतर चीन को लेकर कितना आक्रोश भरा था। कोरोना वायरस को लगातार ‘चायनीज वायरस’ कहना भी इसी गुस्से की झलक थी।
अमेरिका में फौरन Huawei, TikTok पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिए गए, सैकड़ों अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर टैरिफ, Currency Manipulation के आरोप लगे। अमेरिका ने चीन से रिश्ते सख्त कर दिए। और चीन पूरी दुनिया का दुश्मन नजर आने लगा।
COVID-19 के बाद अमेरिकी समाज और मीडिया में चीन के खिलाफ माहौल और गर्माया। जो बाइडन भी उसी राह पर चल पड़े और उन्होंने कहा कि “We will de-risk, not decouple.” बाइडेन ने शब्द बदला, नीति नहीं। लेकिन चीन अब ऐसी स्थिति में नहीं है कि अमेरिका की गुंडागर्दी को जवाब ना दे सके।
अमेरिकी घबराहट और Eurasian विकल्प
अमेरिका को अब डर सिर्फ चीन से नहीं है बल्कि उस संभावित गठजोड़ से भी है, जिसमें रूस और भारत जैसे देश शामिल हो सकते हैं। ये गठजोड़ सिर्फ सेना या व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि ये एक सोच थी, जो पश्चिमी देशों के दबदबे और डॉलर की ताकत को चुनौती दे सकती थी। दुनिया धीरे-धीरे पूछने भी लगी कि, “हम सिर्फ़ डॉलर से क्यों बँधे रहें?”
और अब बारी आई एक ऐतिहासिक पहल की – De-Dollarization
De-Dollarization: यानी डॉलर के साम्राज्य पर चोट
कोविड महामारी के बीच जब 2022 में रूस और यूक्रेन एक दूसरे के सामने आए, तब रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद उसने युआन और रूबल में व्यापार शुरू किया। चीन पहले से ही अपने डिजिटल युआन को बढ़ावा दे रहा है। ये वो समय है जब भारत भी रुपया-रूबल और अन्य द्विपक्षीय समझौतों की ओर बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया को ही कहते हैं- De-dollarization, एक ऐसी मुहिम जो अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व की नींव हिला सकती है।
वो समय बहुत पीछे रह गया जब डॉलर के सामने किसी की नहीं चलती थी- अन्तरराष्ट्रीय व्यापार सिर्फ़ डॉलर पर ही होता था, जो अमेरिका की शर्तों से सहमत नहीं होता था उन पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाते थे; और कई देशों में तो अपनी मुद्रा के ऊपर डॉलर को ही तवज्जो दी जाती थी।
जैसे जिम्बाब्वे को ही देख लीजिए। 2008-2009 में ज़िम्बाब्वे ने दुनिया की सबसे बदहाल मुद्राओं में से एक का रिकॉर्ड बनाया, हाइपरइन्फ्लेशन इतना बढ़ गया कि 100 ट्रिलियन ज़िम्बाब्वे डॉलर का नोट छापना पड़ा। लोग अपनी ही करेंसी लेने को तैयार नहीं थे। दुकानदारों ने ज़िम्बाब्वे डॉलर में सामान बेचना बंद कर दिया और आम लोग लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर की माँग करने लगे। सरकार को भी मजबूरन ज़िम्बाब्वे डॉलर को बंद कर अमेरिकी डॉलर को आधिकारिक मुद्रा बनाना पड़ा।
लेकिन अब वो दिन गए। अब अर्थव्यवस्थाओं का सोचना है कि आख़िर सभी देश एक ही करेंसी के अनुसार क्यों चलें? डॉलर का ही प्रभुत्व दुनिया पर क्यों रहे? इसलिए अब सभी देश अपनी ही करेंसी में व्यापार करने की पालिसी अपना रहे हैं। और इसका मतलब ये नहीं है कि वे डॉलर का बहिष्कार कर रहे हैं। इसका मतलब ये है कि जब डॉलर की जरूरत होगी तभी डॉलर का इस्तेमाल किया जाएगा। और बस उतना ही करेंगे जितनी जरूरत होगी।
डॉलर की दादागिरी से आज़ादी की सोच ने एक नया रास्ता निकाला- BRICS+, वही BRICS जिसके ख़िलाफ़ Trump लगातार बयान दे रहे हैं। और कह रहा है कि जो देश BRICS की ‘एंटी-अमेरिकन’ नीतियों का समर्थन करेगा, उस पर भारी मात्र में टैरिफ लगाया जाएगा।
आपने ध्यान दिया होगा कि साल 2023-24 में BRICS का विस्तार हुआ। सऊदी अरब, यूएई, ईरान, मिस्र जैसे देश शामिल हुए। ये सभी देश पश्चिमी दबाव से बाहर निकलकर एक नए पॉवर सेंटर की तलाश में हैं। BRICS बैंक, डिजिटल करेंसी और युआन में ट्रेड की चर्चाएं अमेरिका की चिंता का कारण बन चुकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने इसी बीच कई देशों पर टैरिफ़ और आर्थिक धमकियाँ फिर से शुरू कर दीं। और इसका सबसे ताजा निशाना भारत है। क्योंकि BRICS में जो RIC है, अमेरिका और ट्रंप को सबसे ज़्यादा समस्या उसी से है।
गलवान की चोट और R-I-C में खटपट
RIC यानी Russia-India-China, साल 1990s से सक्रिय यह ट्रायंगल 2002 में औपचारिक बना। इसके लिए कई बार आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी साझा चुनौतियों पर चर्चा के ज़रिए छोटे-छोटे कदम उठाए जाते रहे। लेकिन 2020 में गलवान संघर्ष के बाद यह संबंध ठप हो गया।
भारत और चीन के बीच संबंधों में बर्फ जम गई, 20 भारतीय जवान बलिदान हुए और कई चीनी सैनिक मारे गए। जिसके बाद भारत ने चीन की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने और उन पर बाजार की निर्भरता को कम करने के लिए कई किस्म की पहल भी की और कई चायनीज कंपनियों को बैन किया। रेलवे, टेलीकॉम, रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सरकारी परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को बाहर कर दिया गया या कठोर जाँच की प्रक्रिया बना दी गई।
अमेरिका ने गलवान में हुई भिड़ंत के इस मौक़े को भाँपते हुए भारत के साथ रिश्ते और मजबूत किए। QUAD (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) को नई दिशा मिली। भारत इस दौरान आत्मनिर्भर भारत नीति पर ज़ोर तो दे ही रहा था। लेकिन इस सबके बीच साल 2022 में रूस-यूक्रेन संकट शुरू हुआ और वैश्विक समीकरण फिर गड़बड़ाने लगे।
अमेरिका और पश्चिमी देश चाहते थे कि रूस एकदम अलग-थलग पड़ जाए, लेकिन बिना किसी गुट के साथ खड़े हुए भारत और चीन ने रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा और बौखलाहट अमेरिका के फैसलों में नजर आने लगी। अब अमेरिका सीधे तौर पर रूस के साथ खड़े देशों को खुली धमकी देने लगा। और टैरिफ के नाम पर धमकी इसी का परिणाम है।
RIC की वापसी की कोशिशें: रूस की मजबूरी
साल 2025 में रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने RIC गुट को फिर से ज़िंदा करने की बात की। यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिम से पूरी तरह से कट चुके रूस को अब भारत और चीन की ज़रूरत महसूस होने लगी, एक नए ‘Multipolar World Order’ के लिए। चीन इस पर पूरी तरह से सहमत है, लेकिन भारत फ़िलहाल असमंजस की स्थिति में है और इसके लिए चीन की पाकिस्तान से यारी बहुत बड़ी वजह है।
RIC यानी रूस, भारत और चीन का एकसाथ आना कोई असंभव बात नहीं है और इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि ये तीनों ऐसे देश हैं जिनके पास अपनी सभ्यता और संस्कृत का इतिहास है जो कि अमेरिका के पास नहीं है।
रूस, चीन और भारत, ये तीनों देशों की सभ्यताएँ हजारों साल पुरानी हैं और इनकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं।
रूस खुद को ‘थर्ड रोम’ मानता है। बाइज़ंटाइन साम्राज्य के पतन के बाद उसने रूढ़िवादी ईसाई सभ्यता का झंडा उठाया।
चीन की आत्मा उसके राष्ट्रवाद में बसती है, जिसे ताओवाद, कन्फ्यूशियस और बौद्ध दर्शन से गहराई मिली है।
भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और वैदिक परंपराओं वाला देश है, जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी ‘पूरा संसार एक परिवार’ की भावना बसती है।
तीनों में अनुशासन, बलिदान और आत्म-संस्कृति की गहरी भावना है और यही उन्हें अमेरिका जैसे सांस्कृतिक रूप से खोखले देशों से अलग बनाती है।
RIC अगर अपनी सभ्यता की शक्ति के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इस काम में सबसे बड़ी समस्या का नाम पाकिस्तान है। सभी लोग ये भी जानते हैं कि अमेरिका के पास पूरी दुनिया में इस वक्त सिर्फ़ पाकिस्तान ही आख़िरी फ़ुटहोल्ड है। इसके अलावा ज़्यादा से ज्यादा एक साउथ कोरिया ही अभी अमेरिका के हाथ में है। लेकिन चीन को समझना पड़ेगा कि गधों की सवारी करने से उसे RIC में कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।
इसका उदाहरण आप इस बात से समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में जब इमरान खान रूस जाकर चाय पानी की फोटो पोस्ट कर रहे थे, तब उसके फौरन बाद पाकिस्तान में उनकी सरकार का तख्तापलट अमेरिका ने करवा दिया था। पाकिस्तान की रूस से नजदीकी उसे पसंद नहीं आई। इमरान ख़ान की रूस यात्रा और उसके तख्तापलट के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था।
अभी भी आप देख रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद के ज़रिए भारत को निरंतर परेशान करने की कोशिश करता है, यहाँ से बांग्लादेश में अमेरिका ने अपना आदमी बिठाकर रखा है, दोनों ही देश में जिहादी इस्लाम है, आतंकवाद है और भुखमरी भी, लेकिन चीन की पाकिस्तान से दोस्ती हर बार इस गठबंधन के बीच आती है। उसके पास आतंकवाद के सिवाय और कुछ विकल्प नहीं है, जो चीन को समझना होगा।
आपने नोटिस किया होगा तो चीन और भारत के बीच जो सम्बन्ध खराब हुए उस समय भी डोनाल्ड ट्रम्प भी अमेरिका के राष्ट्रपति थे। और जो मारपीट हुई थी दोनों देश की सीमाओं पर वो भी उनके ही कार्यकाल में हुई थी। यानी कोई तो है जो चाहता है कि भारत और चीन में तनातनी ही रहे।
अब सवाल ये है कि रूस, भारत और चीन के साथ रहने से दुनिया को क्या फ़ायदा और नुकसान हो सकता है। तो नुकसान तो ये है कि दुनिया फिर से अमेरिका और उसके डॉलर की दादागिरी से ही जूझती रहेगी और अगर साथ नहीं आते हैं तो टैरिफ़ की धौंस बढ़ती जाएगी। जबकि इस वक्त बहस ही मल्टी-पोलर दुनिया की छिड़ी हुई है। जिसका केंद्र अकेला सिर्फ़ अमेरिका ना हो और डॉलर की गुंडागर्दी सभी देशों की इकॉनमी को तय ना करे।
और जहाँ तक फायदे की बात है तो भारत, रूस और चीन के एकसाथ होने से ये ग्लोबल पॉलिसी के मामलों में एकसाथ खड़े नजर आएँगे। एशियाई देशों का आर्थिक सहयोग मजबूत होगा और अमेरिका भी इन तीनों देशों की आर्थिक शक्ति के सामने झुककर ही रहेगा।
आप देखिए कि फार्मा और मेडिकल के सेक्टर में जितनी भी नई रिसर्च हो रही हैं उनमें रूस, चीन और भारत जैसे देश पश्चिमी देशों से कहीं आगे चल रहे हैं। जैसे जैसे मार्किट बढ़ रहा है उस हिसाब से रूस और चीन बहुत आगे बढ़ जाएँगे, जिससे सबसे ज्यादा अमेरिका का मार्किट प्रभावित होगा। आप तमाम ऐसी बीमारियों को देखिए जो लाइलाज मानी जाती हैं, रूस और चीन उनमें वैक्सीन पर काम कर रहे हैं, रिसर्च में लगे हुए हैं।
ये सारी चीजें बाजार से जुड़ी हैं और यही बात अमेरिका को परेशान करती है। क्योंकि दुनिया की कूटनीति और जियो पॉलिटिक्स इकॉनमी से चलती है। जिसमें चीन और भारत बड़े बाजार हैं। इतने बड़े बाजार कोई कोई भी नहीं छोड़ना चाहेगा।
भारत की दोराहे वाली विदेश नीति का प्रश्न
भारत के सामने एक तरफ अमेरिका है, जो उसे इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक समर्थन, टेक्नोलॉजी और निवेश देता है। दूसरी ओर रूस है जो हमारा सैन्य साझेदार और पुराना मित्र है। और जहाँ तक बात चीन की है तो वो विरोधी भी है, लेकिन पड़ोसी और क्षेत्रीय ताकत भी।
लेकिन अगर ये तीनों देश अपने-अपने हितों के आधार पर रणनीतिक तालमेल करें, तो यह अमेरिकी वर्चस्व को संतुलित कर सकता है। RIC का यही उद्देश्य है- एक ऐसा ध्रुव खड़ा करना, जो अमेरिका की ‘वर्ल्ड पावर’ की एकाधिकार की फ़ितरत को संतुलित करे।
जिस दिन भारत, रूस और चीन अपनी प्राथमिकताएँ साझा करने लगेंगे, उसी दिन वॉशिंगटन को एहसास होगा कि ‘Unipolar World’ अब इतिहास बन चुका है।