वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने एक दिन पहले (शनिवार – 9 अगस्त 2025) ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि भारत ने इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान के पाँच लड़ाकू विमानों को मार गिराया था। यह बयान भारतीय वायुसेना की ताकत, रणनीति और साहस का प्रतीक है। इस बयान से जहाँ देशवासियों का मनोबल बढ़ा, वहीं कॉन्ग्रेस नेताओं ने इस पर सवाल खड़े कर दिए।
वहीं कॉन्ग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने भी संदेह जताते हुए कहा कि उन्हें वायुसेना प्रमुख की बातों पर शक नहीं है, लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट क्यों नहीं किया कि भारतीय विमान भी मारे गए या नहीं? यानी जब भी सेना या सरकार की ओर से कोई जानकारी दी जाती है, कॉन्ग्रेस उसमें भी संदेह खोजती है।
Delhi: On Chief of Air Staff Air Chief Marshal A.P. Singh’s statement that India downed five Pakistani fighter jet during Operation Sindoor, Congress leader Rashid Alvi says, "…Whatever the Air Chief has said, we have no doubts about it. However, no one has clearly clarified… pic.twitter.com/dv2o2PNCTj
कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने आरोप लगाया कि वायुसेना प्रमुख यह बयान तब दे रहे हैं जब वोट चोरी का मामला सामने आया है। उन्होंने कहा कि यह बयान ध्यान भटकाने के लिए दिया जा रहा है और सेना को राजनीतिक मोहरा बनाया जा रहा है। यह एक गंभीर आरोप है, जो देश की सुरक्षा से जुड़े विषय को सस्ती राजनीति में घसीटने जैसा है।
Delhi: On Chief of Air Staff Air Chief Marshal A.P. Singh’s statement that India downed five Pakistani fighter jet during Operation Sindoor, Congress leader Udit Raj says, "Why are you saying this only now, when the case of the vote theft was caught? Only then are the Army Chief… pic.twitter.com/j4vQE1eM7n
यह पहला मौका नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल उठाए हों। बालाकोट एयर स्ट्राइक, उरी सर्जिकल स्ट्राइक और गलवान संघर्ष जैसे मामलों में भी कॉन्ग्रेस ने सेना के दावों पर भरोसा करने के बजाय विदेशी मीडिया की रिपोर्टों का हवाला दिया। खासकर ब्रिटिश मीडिया जैसे BBC की रिपोर्ट्स को सच मानते हुए बार-बार भारतीय सेना की छवि को कमजोर करने की कोशिश की गई है।
कॉन्ग्रेस को यह समझने की जरूरत है कि राजनीति में आलोचना जरूरी हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सेना का सम्मान और विश्वास सर्वोपरि होना चाहिए। अगर हर सैन्य ऑपरेशन को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा, तो इससे भारत की सामरिक छवि भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित होगी।
इंदौर के परदेशीपुरा में रहने वाली 23 साल की एक हिंदू लड़की ने पुलिस में शिकायत की कि सोहिल खान नाम के शख्स ने उसका जिंदगी बर्बाद कर दी। उसने बताया कि करीब तीन साल पहले फेसबुक पर फाइटर राजपूत नाम से एक लड़के से उसकी दोस्ती हुई। उसने अपना नाम सोहिल राजपूत बताया और कहा कि वो हिंदू है। दोनों की बातचीत एक साल तक चली। इस दौरान सोहिल ने शादी का वादा किया। लड़की ने हाँ कर दी, लेकिन उसके मम्मी-पापा शादी के लिए तैयार नहीं हुए।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, सोहिल ने लड़की को बहाने से 21 जून 2025 को अहमदाबाद बुलाया। उसने 3 लाख रुपये और कुछ कागजात साथ लाने को कहा। अहमदाबाद में एक होटल में दो दिन तक रखा और शादी से पहले ही जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। फिर कुछ गुजराती में कागज बनवाए और लड़की से साइन करवाए। लड़की को गुजराती नहीं आती थी, इसलिए वो समझ नहीं पाई कि कागजों में क्या लिखा है।
इसके बाद सोहिल उसे अपने दोस्त के कारखाने में बने एक कमरे में ले गया। फिर अपने घर ले गया, जहाँ उसके अम्मी-अब्बू, भाई-बहन और कुछ रिश्तेदार थे। वहाँ लड़की को पता चला कि सोहिल का असली नाम सोहिल खान है और वो मुस्लिम है। सोहिल और उसके परिवार ने मिलकर उस पर धर्म बदलने का दबाव डाला। जबरदस्ती कलमा पढ़वाया और उसका नाम सना फातिमा रख दिया। फिर परिवार वालों ने मिलकर सोहिल के साथ उसका निकाह करवा दिया।
निकाह के बाद लड़की को घर से बाहर नहीं निकलने दिया गया। उसकी हर हरकत पर नजर रखी जाती थी। एक दिन उसने सोहिल का फोन देखा, तो पता चला कि वो और भी कई लड़कियों से बात करता है। जब उसने सोहिल से इस बारे में पूछा, तो उसने बेशर्मी से कहा कि हिंदू लड़कियों को फँसाना उसका काम है।
लड़की ने हिम्मत करके अपनी माँ और भाई से फोन पर संपर्क किया और सारी बात बताई। उनके साथ मिलकर उसने शनिवार (9 अगस्त 2025) को परदेशीपुरा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की।
पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू की और सोहिल खान उर्फ फाइटर राजपूत, उसकी अम्मी रजिया बेगम, अब्बू मोहम्मद यूनुस खान, भाई जाहिद खान, बहन नाजिया खान, रिश्तेदार मोहम्मद रफीक, मोहम्मद सलीम, शबाना बी, फरहाना बी, मोहम्मद इरफान, मोहम्मद शाहिद, मोहम्मद आसिफ और मौलवी अब्दुल रहमान के खिलाफ रेप, धोखाधड़ी, जबरन धर्म परिवर्तन और धमकी देने की धाराओं में केस दर्ज किया। पुलिस ने बताया कि मामले की जाँच चल रही है और आरोपितों की तलाश की जा रही है।
केंद्र सरकार ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा, अफगानिस्तान में सिखों पर अत्याचार से जुड़ी जानकारी संसद में दी हैं। साथ ही, सरकार ने अमेरिका और कनाडा में हिंदू मंदिरों मे हुई तोड़फोड़ से जुड़े आँकड़े भी बताए हैं। सरकार का कहना है कि वो धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़ी हिंसा को लेकर लगातार पड़ोसी देशों की सरकारों के संपर्क में रहती है।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों व टैगोर के घर तोड़फोड़ पर क्या बोली सरकार?
बांग्लादेश में हिंदू समुदाय लगातार कट्टरपंथी मुस्लिमों के निशाने पर रहा है। शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से हटने और मोहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले हमलों में तेजी आई है। 2022 की जनगणना के मुताबिक, बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं। वे कुल आबादी का 7.95% हैं। उनके बाद बौद्ध (0.61%) और ईसाई (0.30%) आते हैं।
विदेश राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को सुष्मिता देव के एक सवाल के जवाब में राज्यसभा में बताया कि बांग्लादेश में 2021 के बाद से हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के कम-से-कम 3,582 मामले सामने आए हैं।
सरकार ने इन मामलों पर अपनी चिंताओं को बांग्लादेश के साथ शीर्ष स्तर पर साझा किया है। सरकार ने उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश सरकार हिंदुओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए सभी जरूरी उपाय करेगी।
सरकार ने बांग्लादेश द्वारा लालमोनिरहाट एयरबेस का इस्तेमाल करने की अनुमति चीन को दिए जाने की रिपोर्ट पर भी संसद में जानकारी दी है। कौशलेंद्र कुमार के सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि हमने 26 मई 2025 को बांग्लादेशी सेना की प्रेस कॉन्फ्रेंस को नोट किया जिसमें कहा गया है कि लालमोनिरहाट एयरफील्ड को सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की फिलहाल कोई योजना नहीं है। सरकार ने कहा, “हम राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाली सभी घटनाओं पर लगातार नजर रखतें हैं और इसकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करते हैं।”
बांग्लादेश में रवींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर में तोड़फोड़ पर सरकार ने लोकसभा में कहा, “सरकार ने टैगोर के पैतृक घर पर हुए घृणित हमले और तोड़फोड़ की कड़ी निंदा की और इस बात पर जोर दिया कि यह हिंसक कृत्य गुरुदेव टैगोर की स्मृति और समावेशी मूल्यों का अपमान है। भारत ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से सख्त कार्रवाई करने और ऐसी घटनाओं को रोकने का आग्रह किया।”
टैगोर के घर पर हमले को लेकर 2 लोगों को गिरफ्तार किया गया। बांग्लादेश की सरकार ने रवींद्र कचहरीबाड़ी की सुरक्षा बढ़ाने के उपाय बढ़ाने की घोषणा की है। TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने यह सवाल पूछा था।
पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा पर दी जानकारी
पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा पर भी केंद्र ने संसद में जानकारी दी है। केंद्र सरकार ने बताया कि भारत ने 2021 से पाकिस्तान सरकार के सामने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 334 बड़े मामलों को उठाया गया है। सरकार ने पाकिस्तान से अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने और सांप्रदायिक हिंसा व धार्मिक असहिष्णुता को खत्म करने की बात कही है।
हिंदुओं के साथ अत्याचार की घटनाएँ पाकिस्तान में आम हो गई हैं। मंदिरों में तोड़फोड़, हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण, जबरन धर्मांतरण जैसे मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। उत्पीड़न, भेदभाव और जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाओं के चलते पाकिस्तान में हिंदुओं की जो आबादी आजादी के समय 1947 में लगभग 15-20% थी वो अब केवल 2-3% रह गई है।
कनाडा और अमेरिका में हिंदुओं पर हमले को लेकर सरकार ने दी जानकारी
सरकार ने बताया कि ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में हिंदुओं पर हमले और हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ किए जाने की घटनाएँ सामने आई हैं। सरकार ने कहा कि 2024 से अमेरिका में 5 और कनाडा में 4 हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की गई है। सरकार ने कहा, “ऐसे मामले संज्ञान में आने पर संबंधित संगठन व व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए मामले को तुरंत उन देशों की सरकारों के सामने उठाया जाता है।”
लोकसभा सांसद अनिल यशवंत देसाई ने सरकार से यह जानकारी माँगी थी। वहीं, सरकार ने स्कॉटिश संसद में हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव होने की खबरों को नकार दिया है।
अफगानिस्तान पर क्या बोली सरकार?
सरकार ने 2021 के बाद बिगड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बाद अफगानिस्तान से सिखों समते 74 अल्पसंख्यकों को ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ के तहत निकालने की जानकारी दी है। सरकार ने कहा कि 18 जून 2022 को काबुल में गुरुद्वारे पर हुए हमले की भी भारत ने कड़ी निंदा की थी।
बिहार में चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दल लगातार विवाद कर हैं। हजारों-लाखों पात्र मतदाताओं के वोट कटने का दावा किया जा रहा है। वहीं, अब चुनाव आयोग ने SIR पर शनिवार (9 अगस्त 2025) को सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल कर दिया है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना नोटिस दिए किसी भी मतदाता को अंतिम वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जाएगा।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) नामक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि 65 लाख मतदाताओं को गलत तरीके से सूची से बाहर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 6 अगस्त को आदेश दिया कि चुनाव आयोग इस मामले में हलफनामा दायर करे। 1 अगस्त 2025 को यह ड्राफ्ट सूची प्रकाशित की गई थी। कोर्ट अब 13 अगस्त को इस मामले में सुनवाई करेगा।
अब आयोग ने अपने हलफनामे इसमें साफ कर दिया है कि बिना किसी पूर्व नोटिस, सुनवाई का अवसर और तर्कपूर्ण आदेश के किसी भी पात्र मतदाता का नाम नहीं हटाया जाएगा। आयोग ने बताया कि सभी योग्य मतदाताओं का नाम फाइनल सूची में आ जाए इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। किसी नाम को हटाए जाने को रोकने के लिए भी ‘कड़े निर्देश’ जारी किए गए हैं।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या बताया?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में बताया है कि 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ लोगों अपने फॉर्म किए हैं या अपने नामों को पुष्टि की है। इस विस्तृत में शामिल रहे लोगों को लेकर EC ने कहा कि इसके लिए बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, 38 जिला निर्वाचन पदाधिकारी, 243 निर्वाचन पंजीकरण पदाधिकारी, 77895 बूथ लेवल ऑफिसर (BLO), 2.45 लाख स्वयंसेवक और 1.60 लाख बूथ स्तर एजेंट सक्रिय रहे हैं।
राजनीतिक दलों को दी गई छूटे नामों की सूची: EC
चुनाव आयोग के मुताबिक, BLO ने घर-घर जाकर मौजूदा मतदाताओं से फॉर्म लिए और उसके बाद ही उन व्यक्तियों की पहचान की गई जिनके गणना फॉर्म नहीं मिले हैं। EC ने कहा कि 20 जुलाई 2025 तक इन बूथ-स्तरीय सूचियों को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बीएलए के साथ साझा कर दिया गया था। इसका मकसद था कि राजनीतिक दल भी वोटर वेरीफाई कर लें और कोई दिक्कत होने पर अपडेटेड सूची में जरूरी बदलाव किए जा सकें। बाद में इन दलों के ‘सक्रिय प्रयासों’ के बाद अपडेटेड सूची जारी की गई।
कोई मतदाता ना छूटे इसके लिए EC कर रहा है प्रयास
आयोग ने कहा कि हर योग्य मतदाता का नाम फाइन वोटिंग लिस्ट में आ जाए इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं और इस प्रक्रिया पर रोजाना प्रेस विज्ञप्ति के जरिए जनता को जानकारी दी जा रही है। प्रवासी मजदूरों के लिए 246 अखबारों में हिंदी में विज्ञापन, ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से फॉर्म भरने की सुविधा है। शहरी क्षेत्रों में विशेष कैंप, युवाओं के पंजीकरण के लिए अग्रिम आवेदन की व्यवस्था की गई है।
किसी भी नाम को प्रारूप सूची से हटाने से पहले नोटिस, सुनवाई और सक्षम अधिकारी का कारणयुक्त आदेश अनिवार्य है। 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक दावे और आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। इस दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट को लोग ऑनलाइन भी देख सकते हैं। इन दावों को 7 दिनों में निस्तारित करने की प्रक्रिया बनाई गई है। इसकी अपील पहले ERO फिर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के बाद जाएगी।
अगर किसी के पास मौजूदा वक्त में कोई दस्तावेज नहीं है तो उसे दस्तावेज इकट्ठा करने में भी चुनाव आयोग द्वारा मदद की जा रही है। जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं, वे अपने दस्तावेजों के साथ नाम दर्ज करा पाएँ इसके लिए चुनाव आयोग पूरी कोशिश में जुटा है।
ADR की याचिका पर EC ने उठाए सवाल
चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ता NGO ADR की याचिका को खारिज करने की माँग की और उस पर जुर्माना लगाकर ‘उचित कार्रवाई’ करने का भी अनुरोध किया है। आयोग का कहना है कि ADR ने ‘अशुद्ध हाथों’ से आवेदन दायर किया है और उनका तरीका पहले की तरह ही है, जिसमें वे डिजिटल, प्रिंट और सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाकर चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश करते हैं।
चुनाव आयोग ने ADR के इस तर्क को खारिज कर दिया कि जिन लोगों के नाम बूथ लेवल अधिकारियों ने अनुशंसित नहीं किए थे, वे मसौदे में शामिल थे। आयोग ने कहा कि BLO से मिली जानकारी केवल एक संकेत है और इसकी दोबारा जांच निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए।
क्या आप यकीन करेंगे अगर मैं कहूँ कि वो दिन दूर नहीं, जब हॉलीवुड की किसी अगली सुपरहिट फिल्म में विलेन कोई इंडियन होगा? जैसे कभी रशियन हुआ करते थे… जैसे कभी नॉर्थ कोरियन या कॉमिक्स और फ़िल्मों में नेगेटिव कैरेक्टर में चायनीज विलेन तो आपने देखें ही होंगे।
आप मेरी इस बात को अपनी मेमोरी में बिठा लीजिए क्योंकि आने वाले समय में यही होने वाला है। अमेरिका को जिस भी देश से समस्या होती है, सबसे पहले वो उसके चरित्र पर ही हमला कर माहौल बनाने का प्रयास करता है। और दुनिया के सामने साबित करने की कोशिश करता है कि ये देश या फिर ये नस्ल इतनी बुरी है। और हॉलीवुड के ज़रिए वो ये काम आसानी से करता रहा है।
जैसे जॉन रेम्बो फ़िल्म ही देख लीजिए कि वियतनाम युद्ध में हार के बावजूद, रेम्बो फिल्में अमेरिका को विक्टिम, लेकिन पावरफुल दिखाती है। जबकि वियतनामी, रूसी या अफगानी कैरेक्टर्स को हिंसक और बर्बर दिखाया जाता है। इस तरह की फिल्मों के ज़रिए अमेरिका न सिर्फ़ अपने Wars को या जेनोसाइड को नैतिक रूप से सही और जायज ठहराता है, बल्कि दुश्मन देशों या नस्लों को ‘असभ्य और खतरनाक’ भी साबित करने की कोशिश करता है।
रैम्बो फ़िल्म का थर्ड पार्ट, जब साल 1988 में रिलीज हुआ, तब हॉलीवुड ने अफगान मुजाहिदीन को सोवियत आर्मी के खिलाफ बहादुर और हीरो के रूप में पेश किया, क्योंकि उस समय अमेरिका, अफगान मुजाहिदीन का सोवियत संघ के खिलाफ समर्थन कर रहा था। लेकिन 9/11 के आतंकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के लिए इन हॉलीवुड की कहानी में ट्विस्ट आ गया। इसी हॉलीवुड ने साल 2012 में Zero Dark Thirty जैसी फ़िल्में बनाईं, जहाँ उन्हीं मुजाहिदीनों को आतंकवादी और विलेन के रूप में दिखाया गया।
ये कहानी सिर्फ एक भू-राजनीतिक विश्लेषण नहीं है, ये कहानी उस गठजोड़ की है, जो रीगनॉमिक्स (Reaganomics) से शुरू हुआ और अब RIC यानी, रूस, इंडिया और चीन के एकजुट होने तक पहुँच रहा है। इसमें गलवान की चोट भी है, ‘चाइमेरिका’ का मोहभंग भी… और डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) की दस्तक भी। ये सभी मिलकर के पश्चिमी साम्राज्य को ख़त्म करने जा रहे हैं।
निक्सन का बीजिंग दौरा (1972)
इस पूरी जियो पॉलिटिक्स को समझने के लिए हमें 1949 में चलना होगा, जब माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद अमेरिका ने चीन की नई सत्ता को मान्यता देने से इनकार कर दिया और ताइवान का समर्थन शुरू किया। फिर कोरिया युद्ध में दोनों आमने-सामने आ गए, जिससे रिश्तों में गहरी खामोशी छा गई और ये खामोशी चली करीब 25 साल तक।
इस बीच 1960 के दशक में दुनिया कोल्ड वॉर की दो ध्रुवीय गुटों में बँटी हुई थी, जहाँ अमेरिका और USSR यानी, सोवियत संघ आमने-सामने थे। लेकिन यहाँ पर चीन के रूप में एक तीसरा खिलाड़ी भी जगह बना रहा था। 1970 के दशक की शुरुआत में समीकरण बदले। चीन और सोवियत संघ के बीच भी तनाव बढ़ने लगा और अमेरिका ने इस दूरी को अपने हित में भुनाने का फैसला किया।
इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर अपनी ‘शटल डिप्लोमेसी’ के लिए बहुत चर्चित थे। उन्होंने पाकिस्तान के रास्ते गुप्त रूप से बीजिंग की यात्रा की। किसिंजर की शटल डिप्लोमेसी के बाद साल 1972 आया, शीत युद्ध की गर्मागर्मी के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन पहुँचे। और इसी के साथ दोनों देशों की 25 साल पुरानी खामोशी टूटी। ‘निक्सन गोज़ टू चाइना’ केवल एक कूटनीतिक यात्रा नहीं थी, यह सोवियत संघ यानी USSR के खिलाफ एक रणनीतिक समीकरण की शुरुआत थी। इसका मकसद सिर्फ़ एक ही था, USSR के ख़िलाफ़ चीन के रूप में दूसरा धड़ा तैयार करना!
इसके बाद ‘शंघाई कम्युनिक‘ लाया गया। अमेरिका-चीन, दोनों देशों के रिश्तों की शुरुआत हुई, लेकिन कोई ठोस आर्थिक समझौता नहीं हुआ। असली फायदा कम्युनिस्ट राष्ट्र चीन को हुआ, जो अब तक बाजार में अलग-थलग पड़ा हुआ था लेकिन अब अमेरिका के पूंजीवादी सिस्टम का दोहन कर अपने आर्थिक ढाँचे की ज़मीन तैयार कर रहा था।
Deng Xiaoping (देंग शियाओपिंग) और चीन का चमत्कार
1978-80 की बात है- आधुनिक चीन का निर्माता कहे जाने वाले देंग शियाओपिंग ने सुधार और खुले मार्केट की ‘गैइग काइफांग’ (Gaige Kaifang) की पॉलिसी शुरू की। और इसका मतलब होता है ‘Reform and Opening-up’। देंग ने चीन की बंद इकॉनमी को मार्केट इकॉनमी में बदल दिया, जिसे समाजवाद का चोला पहनाया गया। पहली बार चीन में ‘स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स’ बने, विदेशी पूंजी का स्वागत किया गया। चीन में पश्चिमी निवेशकों की लाइन लगने लगी- जिसके परिणामस्वरूप IBM, HP और Motorola जैसी कंपनियाँ चीन में फैक्ट्रियाँ लगाने लगीं।
यहाँ से शुरुआत हुई Chimerica की, यानी अमेरिका की पूँजी और चीन का श्रम।
Reaganomics से Walmart तक
चीन को लुभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रॉनल्ड रेगन ने चीन को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा दिया। इसके पीछे वजह ये भी थी कि 1980 के दशक में अमेरिका को सस्ते मैन्युफैक्चरिंग की जरुरत महसूस हुई, और चीन को डॉलर और तकनीक की। Reaganomics की नीतियों ने बाजार को और खोल दिया।
अमेरिकी कंपनियाँ चीन में सेटअप लगाने लगीं, Walmart, Apple, Nike (नाइकी) जैसी कंपनियों ने चीन को 21वीं सदी आते-आते ‘फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’ बना दिया। याद रहे, ये नई दोस्ती इसलिए शुरू हुई क्योंकि इस बीच साल 1991 आया, जब USSR पूरी तरह से टूट गया। सोवियत संघ (USSR) के बिखरने के बाद चीन और अमेरिका के बीच एक किस्म का “फ्रेंड्स विद बेनिफिट” का क्रम चलता रहा। लेकिन हर गठजोड़ की एक एक्सपायरी डेट होती है।
WTO में चीन, Chimerica ‘चाइमेरिका’ का Honeymoon (2001)
साल 2001 में चीन को WTO की सदस्यता मिली। यह अमेरिका का एक बड़ा दाँव था और उम्मीद थी कि ग्लोबल इकोनॉमी में आने से चीन उदारवादी बनेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। चीन ने सस्ती वस्तुओं की बाढ़ अमेरिका में भेज दी, अमेरिका की घरेलू इंडस्ट्री चरमरा गई। Huawei, ZTE जैसी कंपनियाँ सामने आईं, Intellectual Property की धज्जियाँ उड़ाई गईं। ये कुछ वही था, जिसे आप आज आम भाषा में चायनीज माल कहते हैं।
चीनी कंपनियाँ अमेरिकी टेक्नोलॉजी की कॉपी करने लगीं। चीन से इम्पोर्ट तेजी से बढ़ा, लेकिन चीन ने अमेरिकी सामानों की खरीद कम की और यहीं से दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट का घमासान शुरू हुआ। नतीजा ये हुआ कि साल 1993 में अमेरिका का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब $22 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2005 तक $202 अरब डॉलर हो गया, यानी 12 साल में यह 9 गुना बढ़ गया। और यही असंतुलन आगे चलकर ट्रम्प और बायडेन, दोनों की ‘चाइना पॉलिसी’ पर हावी नजर आता है।
2008: अमेरिका की मंदी, चीन की बाजार पर आक्रामकता
फिर आया साल 2008… जब फाइनेंशियल क्राइसिस ने अमेरिका को तोड़कर रख दिया, लेकिन चीन ने इस मौके का इस्तेमाल बाजार पर अपनी ताकत दिखाने में किया। स्टेट-कैपिटलिज्म और सेंट्रल बैंकिंग मॉडल को ग्लोबल मंच पर रखा गया। यही समय था जब चीन को लगने लगा कि वो अमेरिका को टक्कर दे सकता है। अब चीन, डॉलर का सिर्फ़ ग्राहक नहीं, उसका विकल्प भी बनने निकला।
यही वो समय था, जब हॉलीवुड की फ़िल्मों में चायनीज विलेन दिखाई देने लगे। याद कीजिए साल 2008 की “The Dark Knight” फ़िल्म जिसमें Lau नाम का एक चीनी अकाउंटेंट और बिज़नेसमैन गौथम सिटी के माफिया डॉन और करप्ट बिज़नेस लॉबी का पैसा हांगकांग में छुपाकर रखता है। इसके बाद चीन ने हॉलीवुड फिल्मों पर सख़्त सेंसरशिप और कोटा सिस्टम लागू कर दिया।
फिल्म में Lau को एक चीनी बिज़नेसमैन, धोखेबाज़ और माफिया का सहयोगी दिखाया गया था। ये असल में चीन-विरोधी नैरेटिव था जिसमें चीन की छवि एक भ्रष्ट ठिकाने के रूप में सामने रखी गई।
2018–20: ट्रंप की ट्रेड वॉर, डि-कपलिंग की शुरुआत
अब थोड़ा और करीब आते हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में 2016 में खुलकर घोषणा की कि ‘चीन दशकों से हमें लूट रहा है।’ ट्रंप के तेवरों से ये साफ़ दिखने लगा कि उसके भीतर चीन को लेकर कितना आक्रोश भरा था। कोरोना वायरस को लगातार ‘चायनीज वायरस’ कहना भी इसी गुस्से की झलक थी।
अमेरिका में फौरन Huawei, TikTok पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिए गए, सैकड़ों अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर टैरिफ, Currency Manipulation के आरोप लगे। अमेरिका ने चीन से रिश्ते सख्त कर दिए। और चीन पूरी दुनिया का दुश्मन नजर आने लगा।
COVID-19 के बाद अमेरिकी समाज और मीडिया में चीन के खिलाफ माहौल और गर्माया। जो बाइडन भी उसी राह पर चल पड़े और उन्होंने कहा कि “We will de-risk, not decouple.” बाइडेन ने शब्द बदला, नीति नहीं। लेकिन चीन अब ऐसी स्थिति में नहीं है कि अमेरिका की गुंडागर्दी को जवाब ना दे सके।
अमेरिकी घबराहट और Eurasian विकल्प
अमेरिका को अब डर सिर्फ चीन से नहीं है बल्कि उस संभावित गठजोड़ से भी है, जिसमें रूस और भारत जैसे देश शामिल हो सकते हैं। ये गठजोड़ सिर्फ सेना या व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि ये एक सोच थी, जो पश्चिमी देशों के दबदबे और डॉलर की ताकत को चुनौती दे सकती थी। दुनिया धीरे-धीरे पूछने भी लगी कि, “हम सिर्फ़ डॉलर से क्यों बँधे रहें?”
और अब बारी आई एक ऐतिहासिक पहल की – De-Dollarization
De-Dollarization: यानी डॉलर के साम्राज्य पर चोट
कोविड महामारी के बीच जब 2022 में रूस और यूक्रेन एक दूसरे के सामने आए, तब रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद उसने युआन और रूबल में व्यापार शुरू किया। चीन पहले से ही अपने डिजिटल युआन को बढ़ावा दे रहा है। ये वो समय है जब भारत भी रुपया-रूबल और अन्य द्विपक्षीय समझौतों की ओर बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया को ही कहते हैं- De-dollarization, एक ऐसी मुहिम जो अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व की नींव हिला सकती है।
वो समय बहुत पीछे रह गया जब डॉलर के सामने किसी की नहीं चलती थी- अन्तरराष्ट्रीय व्यापार सिर्फ़ डॉलर पर ही होता था, जो अमेरिका की शर्तों से सहमत नहीं होता था उन पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाते थे; और कई देशों में तो अपनी मुद्रा के ऊपर डॉलर को ही तवज्जो दी जाती थी।
जैसे जिम्बाब्वे को ही देख लीजिए। 2008-2009 में ज़िम्बाब्वे ने दुनिया की सबसे बदहाल मुद्राओं में से एक का रिकॉर्ड बनाया, हाइपरइन्फ्लेशन इतना बढ़ गया कि 100 ट्रिलियन ज़िम्बाब्वे डॉलर का नोट छापना पड़ा। लोग अपनी ही करेंसी लेने को तैयार नहीं थे। दुकानदारों ने ज़िम्बाब्वे डॉलर में सामान बेचना बंद कर दिया और आम लोग लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर की माँग करने लगे। सरकार को भी मजबूरन ज़िम्बाब्वे डॉलर को बंद कर अमेरिकी डॉलर को आधिकारिक मुद्रा बनाना पड़ा।
लेकिन अब वो दिन गए। अब अर्थव्यवस्थाओं का सोचना है कि आख़िर सभी देश एक ही करेंसी के अनुसार क्यों चलें? डॉलर का ही प्रभुत्व दुनिया पर क्यों रहे? इसलिए अब सभी देश अपनी ही करेंसी में व्यापार करने की पालिसी अपना रहे हैं। और इसका मतलब ये नहीं है कि वे डॉलर का बहिष्कार कर रहे हैं। इसका मतलब ये है कि जब डॉलर की जरूरत होगी तभी डॉलर का इस्तेमाल किया जाएगा। और बस उतना ही करेंगे जितनी जरूरत होगी।
डॉलर की दादागिरी से आज़ादी की सोच ने एक नया रास्ता निकाला- BRICS+, वही BRICS जिसके ख़िलाफ़ Trump लगातार बयान दे रहे हैं। और कह रहा है कि जो देश BRICS की ‘एंटी-अमेरिकन’ नीतियों का समर्थन करेगा, उस पर भारी मात्र में टैरिफ लगाया जाएगा।
आपने ध्यान दिया होगा कि साल 2023-24 में BRICS का विस्तार हुआ। सऊदी अरब, यूएई, ईरान, मिस्र जैसे देश शामिल हुए। ये सभी देश पश्चिमी दबाव से बाहर निकलकर एक नए पॉवर सेंटर की तलाश में हैं। BRICS बैंक, डिजिटल करेंसी और युआन में ट्रेड की चर्चाएं अमेरिका की चिंता का कारण बन चुकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने इसी बीच कई देशों पर टैरिफ़ और आर्थिक धमकियाँ फिर से शुरू कर दीं। और इसका सबसे ताजा निशाना भारत है। क्योंकि BRICS में जो RIC है, अमेरिका और ट्रंप को सबसे ज़्यादा समस्या उसी से है।
गलवान की चोट और R-I-C में खटपट
RIC यानी Russia-India-China, साल 1990s से सक्रिय यह ट्रायंगल 2002 में औपचारिक बना। इसके लिए कई बार आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी साझा चुनौतियों पर चर्चा के ज़रिए छोटे-छोटे कदम उठाए जाते रहे। लेकिन 2020 में गलवान संघर्ष के बाद यह संबंध ठप हो गया।
भारत और चीन के बीच संबंधों में बर्फ जम गई, 20 भारतीय जवान बलिदान हुए और कई चीनी सैनिक मारे गए। जिसके बाद भारत ने चीन की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने और उन पर बाजार की निर्भरता को कम करने के लिए कई किस्म की पहल भी की और कई चायनीज कंपनियों को बैन किया। रेलवे, टेलीकॉम, रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सरकारी परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को बाहर कर दिया गया या कठोर जाँच की प्रक्रिया बना दी गई।
अमेरिका ने गलवान में हुई भिड़ंत के इस मौक़े को भाँपते हुए भारत के साथ रिश्ते और मजबूत किए। QUAD (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) को नई दिशा मिली। भारत इस दौरान आत्मनिर्भर भारत नीति पर ज़ोर तो दे ही रहा था। लेकिन इस सबके बीच साल 2022 में रूस-यूक्रेन संकट शुरू हुआ और वैश्विक समीकरण फिर गड़बड़ाने लगे।
अमेरिका और पश्चिमी देश चाहते थे कि रूस एकदम अलग-थलग पड़ जाए, लेकिन बिना किसी गुट के साथ खड़े हुए भारत और चीन ने रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा और बौखलाहट अमेरिका के फैसलों में नजर आने लगी। अब अमेरिका सीधे तौर पर रूस के साथ खड़े देशों को खुली धमकी देने लगा। और टैरिफ के नाम पर धमकी इसी का परिणाम है।
RIC की वापसी की कोशिशें: रूस की मजबूरी
साल 2025 में रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने RIC गुट को फिर से ज़िंदा करने की बात की। यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिम से पूरी तरह से कट चुके रूस को अब भारत और चीन की ज़रूरत महसूस होने लगी, एक नए ‘Multipolar World Order’ के लिए। चीन इस पर पूरी तरह से सहमत है, लेकिन भारत फ़िलहाल असमंजस की स्थिति में है और इसके लिए चीन की पाकिस्तान से यारी बहुत बड़ी वजह है।
RIC यानी रूस, भारत और चीन का एकसाथ आना कोई असंभव बात नहीं है और इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि ये तीनों ऐसे देश हैं जिनके पास अपनी सभ्यता और संस्कृत का इतिहास है जो कि अमेरिका के पास नहीं है।
रूस, चीन और भारत, ये तीनों देशों की सभ्यताएँ हजारों साल पुरानी हैं और इनकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं।
रूस खुद को ‘थर्ड रोम’ मानता है। बाइज़ंटाइन साम्राज्य के पतन के बाद उसने रूढ़िवादी ईसाई सभ्यता का झंडा उठाया।
चीन की आत्मा उसके राष्ट्रवाद में बसती है, जिसे ताओवाद, कन्फ्यूशियस और बौद्ध दर्शन से गहराई मिली है।
भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और वैदिक परंपराओं वाला देश है, जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी ‘पूरा संसार एक परिवार’ की भावना बसती है।
तीनों में अनुशासन, बलिदान और आत्म-संस्कृति की गहरी भावना है और यही उन्हें अमेरिका जैसे सांस्कृतिक रूप से खोखले देशों से अलग बनाती है।
RIC अगर अपनी सभ्यता की शक्ति के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इस काम में सबसे बड़ी समस्या का नाम पाकिस्तान है। सभी लोग ये भी जानते हैं कि अमेरिका के पास पूरी दुनिया में इस वक्त सिर्फ़ पाकिस्तान ही आख़िरी फ़ुटहोल्ड है। इसके अलावा ज़्यादा से ज्यादा एक साउथ कोरिया ही अभी अमेरिका के हाथ में है। लेकिन चीन को समझना पड़ेगा कि गधों की सवारी करने से उसे RIC में कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।
इसका उदाहरण आप इस बात से समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में जब इमरान खान रूस जाकर चाय पानी की फोटो पोस्ट कर रहे थे, तब उसके फौरन बाद पाकिस्तान में उनकी सरकार का तख्तापलट अमेरिका ने करवा दिया था। पाकिस्तान की रूस से नजदीकी उसे पसंद नहीं आई। इमरान ख़ान की रूस यात्रा और उसके तख्तापलट के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था।
अभी भी आप देख रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद के ज़रिए भारत को निरंतर परेशान करने की कोशिश करता है, यहाँ से बांग्लादेश में अमेरिका ने अपना आदमी बिठाकर रखा है, दोनों ही देश में जिहादी इस्लाम है, आतंकवाद है और भुखमरी भी, लेकिन चीन की पाकिस्तान से दोस्ती हर बार इस गठबंधन के बीच आती है। उसके पास आतंकवाद के सिवाय और कुछ विकल्प नहीं है, जो चीन को समझना होगा।
आपने नोटिस किया होगा तो चीन और भारत के बीच जो सम्बन्ध खराब हुए उस समय भी डोनाल्ड ट्रम्प भी अमेरिका के राष्ट्रपति थे। और जो मारपीट हुई थी दोनों देश की सीमाओं पर वो भी उनके ही कार्यकाल में हुई थी। यानी कोई तो है जो चाहता है कि भारत और चीन में तनातनी ही रहे।
अब सवाल ये है कि रूस, भारत और चीन के साथ रहने से दुनिया को क्या फ़ायदा और नुकसान हो सकता है। तो नुकसान तो ये है कि दुनिया फिर से अमेरिका और उसके डॉलर की दादागिरी से ही जूझती रहेगी और अगर साथ नहीं आते हैं तो टैरिफ़ की धौंस बढ़ती जाएगी। जबकि इस वक्त बहस ही मल्टी-पोलर दुनिया की छिड़ी हुई है। जिसका केंद्र अकेला सिर्फ़ अमेरिका ना हो और डॉलर की गुंडागर्दी सभी देशों की इकॉनमी को तय ना करे।
और जहाँ तक फायदे की बात है तो भारत, रूस और चीन के एकसाथ होने से ये ग्लोबल पॉलिसी के मामलों में एकसाथ खड़े नजर आएँगे। एशियाई देशों का आर्थिक सहयोग मजबूत होगा और अमेरिका भी इन तीनों देशों की आर्थिक शक्ति के सामने झुककर ही रहेगा।
आप देखिए कि फार्मा और मेडिकल के सेक्टर में जितनी भी नई रिसर्च हो रही हैं उनमें रूस, चीन और भारत जैसे देश पश्चिमी देशों से कहीं आगे चल रहे हैं। जैसे जैसे मार्किट बढ़ रहा है उस हिसाब से रूस और चीन बहुत आगे बढ़ जाएँगे, जिससे सबसे ज्यादा अमेरिका का मार्किट प्रभावित होगा। आप तमाम ऐसी बीमारियों को देखिए जो लाइलाज मानी जाती हैं, रूस और चीन उनमें वैक्सीन पर काम कर रहे हैं, रिसर्च में लगे हुए हैं।
ये सारी चीजें बाजार से जुड़ी हैं और यही बात अमेरिका को परेशान करती है। क्योंकि दुनिया की कूटनीति और जियो पॉलिटिक्स इकॉनमी से चलती है। जिसमें चीन और भारत बड़े बाजार हैं। इतने बड़े बाजार कोई कोई भी नहीं छोड़ना चाहेगा।
भारत की दोराहे वाली विदेश नीति का प्रश्न
भारत के सामने एक तरफ अमेरिका है, जो उसे इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक समर्थन, टेक्नोलॉजी और निवेश देता है। दूसरी ओर रूस है जो हमारा सैन्य साझेदार और पुराना मित्र है। और जहाँ तक बात चीन की है तो वो विरोधी भी है, लेकिन पड़ोसी और क्षेत्रीय ताकत भी।
लेकिन अगर ये तीनों देश अपने-अपने हितों के आधार पर रणनीतिक तालमेल करें, तो यह अमेरिकी वर्चस्व को संतुलित कर सकता है। RIC का यही उद्देश्य है- एक ऐसा ध्रुव खड़ा करना, जो अमेरिका की ‘वर्ल्ड पावर’ की एकाधिकार की फ़ितरत को संतुलित करे।
जिस दिन भारत, रूस और चीन अपनी प्राथमिकताएँ साझा करने लगेंगे, उसी दिन वॉशिंगटन को एहसास होगा कि ‘Unipolar World’ अब इतिहास बन चुका है।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में बादल फटने के बाद जो स्थिति पैदा हुई उससे निपटने के लिए धामी सरकार लगातार प्रयास कर रही है। पीड़ितों को सहायता देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है। खुद मुख्यमंत्री प्रभावित इलाके में जाकर पीड़ितों से मिल रहे हैं, उन्हें मदद का आश्वसन दे रहे हैं। बावजूद इसके मीडिया में एक खबर सामने आई है जिसमें दावा है कि धामी सरकार की ओर से पीड़ितों को मात्र 5000 रुपए दिए गए हैं और वह इससे नाराज होकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
इस खबर की सच्चाई क्या है… आइए जानें और ये भी देखें कि जिन स्थानीयों के नाम पर धामी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं वो जमीन पर क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
हकीकत यह है कि 05 अगस्त 2025 को धराली गाँव में तबाही के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ितों के लिए शोक संवेदनाएँ व्यक्त की। यहाँ तक की गृह मंत्री अमित शाह ने भी घटना की जानकारी लेने के लिए सीएम से बात की थी। सीएम ने पीड़ितों के लिए ₹5 लाख की सहायता राशि प्रदान करने की भी घोषणा कर दी।
सीएम ने यह जानकारी 09 अगस्त 2025 को एक्स/ट्विटर एक पोस्ट कर दी। उन्होंने लिखा था कि धराली गाँव में आई आपदा से ग्रसित लोगों को ₹5 लाख की राशि प्रदान की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों के मकान, जमीन, खेती और अन्य नुकसान का आकलन शुरू कर दिया गया है, जिसके मुआवजे का वितरण भी हम शीघ्र शुरू करेंगे।
धराली (उत्तरकाशी) में आई आपदा में पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के लिए ₹5 लाख की तत्काल सहायता राशि प्रदान की जाएगी। साथ ही स्थानीय लोगों के मकान, जमीन, खेती व अन्य नुकसान का आकलन शुरू कर दिया गया है, जिसके मुआवजे का वितरण भी हम शीघ्र शुरू करेंगे। इसके अतिरिक्त, आपदा में…
सीएम ने यह जानकारी दी कि 09 अगस्त 2025 को दी और यह भी लिखा कि मुआवजा प्रक्रिय़ा शीघ्र शुरू की जाएगी। लेकिन इस बात को 24 घंटे भी नहीं बीते कि मीडिया में अलग प्रोपेगेंडा चालू हो गया। खबरें फैली कि स्थानीय लोगों को ₹5 हजार की सहायता राशि दी गई, जबकि सीएम ने तो ₹5 लाख का वादा किया था।
इन खबरों को चलाने के लिए शिकार भी घटना से ग्रस्त ग्रामीणों को बनाया गया। खबरें चलाई गई कि ग्रामीण सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। जबकि यह दावा एक झटके में झूठा साबित हो गया। जब सीएम धामी को धराली गाँव की ही एक महिला राखी बाँधती नजर आई।
धराली आपदा अकस्मात थी। मुख्यमंत्री @pushkardhami जी ने लेकिन हृदय जीत लिया। जब हेलीकॉप्टर को भारी बारिश में उड़ने की अनुमति नहीं थी तब वे निरन्तर प्रभावित इलाक़ों का दौरा कर रहे हैं। लोगों के बीच में हैं। हमें अपनी नकारात्मकता के चश्मे से ही राजनीति की हर बार नहीं देखना चाहिए। CM… https://t.co/pAeYAqiSnppic.twitter.com/gilCpj5pQ9
यह वीडियो धराली गाँव में बादल फटने के हादसे के बाद सीएम धामी के दौरे का है। जब एक महिला अपनी साड़ी के पल्लू से कपड़ा फाड़कर सीएम धामी को राखी बाँधती है। वीडियो में दिख रहा है कि कैसे महिला सीएम को आशीर्वाद दे रही हैं। इस वीडियो से साफ है कि प्रदेश की जनता का सीएम धामी के लिए काफी स्नेह है।
परंतु मीडिया धराली गाँव में प्रदर्शन की खबरें चलाकर प्रोपेगेंडा सेट करना चाहती है कि उत्तराखंड सरकार हादसे के बाद भी पीड़ितों के लिए कुछ नहीं कर रही है। जबकि हकीकत इस वीडियो में साफ दिखती है। प्रदेश की जनता सीएम धामी द्वारा किए गए प्रयासों पर संतुष्ट हैं।
इससे साफ है कि उत्तराखंड सरकार प्रदेश पर आए हर संकट के लिए तैयार है। सरकार ने घटनास्थल पर हर नजर बनाई हुई थी, खुद प्रदेश के सीएम पल-पल की जानकारी के लिए स्थानीय प्रशासन और NDRF रेस्क्यु टीम से फोन पर जुड़े रहे। घटनास्थल पर जाकर भी ग्रामीणों से बात की। इसके बावजूद मीडिया ने उत्तराखंड सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया।
गौरतलब है कि 05 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में बादल फटने से दर्दनाक हादसा हो गया। पहाड़ से तेज बहाव से आए पानी में पूरा गाँव डूब गया। घटना में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि लगभग 50 लोग अब भी लापता है। घटनस्थल पर रेस्क्यु ऑपरेशन जारी है।
ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटा दी। इस ऑपरेशन में हर कदम शतरंज के पासे की तरह फेंका गया और पाकिस्तान चेकमेट हो गया। आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत होने से ही यह ऑपरेशन सफल हो सका है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 04 अगस्त 2025 को IIT मद्रास में ‘अग्निशोध’ के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति को साझा किया। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन शतरंज खेलने जैसा था। उन्होंने कहा, “हमें नहीं पता दुश्मन का अगला कदम क्या हो सकता है और फिर हम क्या करेंगे। इसे ही ग्रेजोन बोलते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “ग्रेजोन का मतलब है कि हम पारंपरिक ऑपरेशन नहीं कर रहे हैं। हम जो कर रहे हैं, वह सामान्य ऑपरेशन से बस थोड़ा कम है… हम शतरंज की चालें चल रहे थे और वह (दुश्मन) भी शतरंज की चालें चल रहा था। कहीं हम उन्हें शह और मात दे रहे थे, तो कहीं हम अपनी जान गँवाने के जोखिम पर भी मार गिराने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन यही तो ज़िंदगी है।”
पहलगाम आतंकी हमले के अगले दिन ऑपरेशन की तैयारी
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जानें चली गई। इसके अगले ही दिन थल, जल और वायु सेना प्रमुखों और राजनीतिक नेतृत्वों के बीच अहम बैठक हुई। आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने बताया कि वह पहली बार था जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था- “बस, अब बहुत हो चुका।” आर्मी चीफ ने कहा कि भारतीय सेना को ऑपरेशन सिंदूर प्लान और लागू करने की खुली छूट दे दी गई थी।
#WATCH | Speaking on Operation, Chief of Army Staff (COAS) General Upendra Dwivedi says, "…On 23rd, we all sat down. This is the first time that RM (Defence Minister Rajnath Singh) said, 'enough is enough'. All three chiefs were very clear that something had to be done. The… pic.twitter.com/aSFRXsS2qn
आर्मी चीफ ने कहा, “23 को, हम सब बैठे थे। यह पहली बार था जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘बस अब बहुत हो चुका।’ सेना के तीनों प्रमुखों को साफ था कि अब जरूर कुछ करना ही है। खुला हाथ दे दिया गया था और कहा गया कि कुछ भी करने का निर्णय आप (सेना) स्वयं लें। इस तरीके का आत्मविश्वास, राजनीतिक दिशा और स्पष्टता हमने पहली बार देखा था। यही आपका मनोबल बढ़ाता है।”
आर्मी चीफ ने बताया इस मनोबल से ही कमांडर को जमीनी स्तर पर सफलता हासिल हुई, जहाँ उन्होंने अपने दिमाग से ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान पर कार्रवाई की।
सिंदूर में सैनिकों को भावनाएँ जुड़ी
आर्मी चीफ से जब ऑपरेशन सिंदूर के नाम को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह सैनिकों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि छोटा नाम होने के साथ-साथ वह देश के लोगों से भी जुड़ना चाहिए था, इसीलिए ऑपरेशन सिंदूर नाम चुना, जिसने पूरे देश को जोड़े रखा।
उन्होंने कहा, “इस एक नाम ने पूरे देश को एक कर दिया। आज लोग कह रहे हैं- सिंधु से सिंदूर तक… सब कुछ हमने संभाल लिया। जब मैं ग्राउंड पर गया तो मैंने सैनिकों से कहा कि कोई भी बहन, माँ या बेटी जब सिंदूर लगाएगी तो वो हमेशा सैनिक को याद करेगी। यही तो वह जुड़ाव था जिसने पूरे राष्ट्र को एक उद्देश्य के लिए खड़ा कर दिया। यही कारण था कि पूरा देश पूछ रहा था- ऑपने ऑपरेशन क्यों रोका? और इसका जवाब भी दिया जा चुका है।”
पाकिस्तानी जनता को गुमराह करने में लगी उनकी फौज
मई 2025 में चले ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान का आर्मी चीफ असीम मुनीर अब प्रमोट होकर फील्ड मार्शल बन गया है। इससे पाकिस्तानी जनता को लगता है कि ऑपरेशन सिंदूर को उनकी फौज ने विफल कर दिया। यह पाकिस्तानी फौज की रणनीति है, खुद की आवाम के सामने जीत का डंका बजाने की। आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने भी इस पर तंज कसा।
#WATCH | During an address at IIT Madras, Chief of Army Staff (COAS) General Upendra Dwivedi says, "…If you ask a Pakistani whether you lost or won, he'd say my chief has become a field marshal. We must have won only, that's why he's become a field marshal…" (09.08)
उन्होंने कहा, “अगर आप किसी पाकिस्तानी से पूछें कि जीते या हारे तो वो कहेगा, मेरा चीफ फील्ड मार्शल बन गया है तो हम जरूर जीते होंगे। यही तरीका है कि जनता की सोच को प्रभावित करने का… चाहे वो अपने मुल्क की आवाम हो या दुश्मन की जनता हो।”
भारत ने पाकिस्तान के 5 विमानों को उड़ा दिया
आर्मी चीफ से पहले एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान की तबाही पर पूरी रिपोर्ट साझा की थी। उन्होंने कहा था कि ऑपरेशन के दौरान IAF ने पाँच पाकिस्तानी फाइटर जेट और एक बड़े एयरक्राफ्ट को तबाह कर दिया था।
एयर चीफ मार्शल ने यह भी कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का अहम कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति है। उन्होंने कहा, “हमने कम से कम पाँच फाइटर जेट और एक बड़े विमान को पक्के तौर पर मार गिराया। यह बड़ा विमान या तो ELINT विमान था या AEW&C विमान। इसे 300 किलोमीटर की दूरी से निशाना बनाया गया। यह अब तक का सबसे लंबी दूरी का सतह से हवा में मार करने वाला हमला है।”
कॉन्ग्रेस के केंद्र सरकार पर सवालों के मिले जवाब
पहलगाम आतंकी हमले के बाद कॉन्ग्रेस और कई विपक्षी दलों ने सरकार पर चुप्पी के सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था मोदी सरकार आतंकवादियों से डरकर पीछे हट गई है। यहाँ तक की ऑपरेशन सिंदूर पर भी विपक्ष को यकीन नहीं हुआ। अब तक वह ऑपरेशन के प्रमाण माँगती रही और इसमें पाकिस्तान को क्लीनचिट देती रही।
अब तो एयर चीफ मार्शल और आर्मी चीफ ने भी ऑपरेशन सिंदूर को लेकर साफ कर दिया है कि पाकिस्तान में कितनी तबाही मची है। यह सब भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण ही हुआ है। ऐसे में केंद्र सरकारी की मजबूती और उनकी दृण इच्छाशक्ति के बारे में अब विपक्ष को मानना ही होगा कि पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर भारत की कामयाबी है।
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए न सिर्फ आतंकवाद को करारा जवाब दिया, बल्कि अपनी सैन्य ताकत और रणनीतिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया। यह ऑपरेशन भारत के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय बन गया है, जिसने पाकिस्तान को घुटनों पर लाकर यह साबित कर दिया कि भारत अब आतंकियों और उनके समर्थकों को कहीं भी छोड़ेगा नहीं।
भारतीय सेना की इस शानदार जीत के बावजूद राहुल गाँधी जैसे विपक्ष के कुछ नेता ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाकर देश की सेना और सरकार की मेहनत को कमजोर करने की कोशिश करते रहे। उन्होंने फर्जी बयानों, दावों और वीडियो के जरिए जनता को गुमराह करने की कोशिश की।
हालाँकि अब भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल (ACM) एपी सिंह ने बेंगलुरु में एक लेक्चर के दौरान ऐसी सभी बातों का करारा जवाब दे दिया। बिना किसी का नाम लिए उन्होंने उन तमाम भ्रामक दावों को ध्वस्त कर दिया, जो ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर सवाल उठा रहे थे।
राहुल गाँधी के संसद में किए दावों को IAF चीफ ने किया ध्वस्त
दरअसल, राहुल गाँधी ने संसद में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सरकार पर बयानबाजी की थी और कई आरोप मढ़े थे। राहुल ने कहा था कि बीजेपी सरकार में “राजनीतिक इच्छाशक्ति” की कमी है और सेना को पूरी आजादी नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि सेना को काम करने के लिए मजबूत राजनीतिक समर्थन और पूरी ऑपरेशनल आजादी चाहिए, जैसे 1971 के युद्ध में इंदिरा गाँधी ने जनरल मानेकशॉ को समय और आजादी दी थी।
राहुल ने ऑपरेशन सिंदूर में सरकार पर आरोप लगाया कि उसने सेना के हाथ बाँधे। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने पायलटों को पाकिस्तान के हवाई रक्षा सिस्टम पर हमला करने से रोका, जिसके चलते हमारे लड़ाकू विमान गिरा दिए गए। यही नहीं, राहुल गाँधी ने सेना को किनारे रखते हुए बड़ी चतुराई से इसे राजनीतिक नेतृत्व की तरफ मोड़ दिया था, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ था ही नहीं।
राहुल गाँधी ने कहा था कि गलती भारतीय वायुसेना की नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक नेतृत्व’ की थी, जिसने सेना को पाकिस्तान के फौजी ठिकानों पर हमला करने से रोका। ये भी सवाल उठाए गए कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना को कितने लड़ाकू विमानों का नुकसान हुआ।
हालाँकि अब वायुसेना प्रमुख ने इन दावों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार ने सेना को पूरी छूट दी थी। उन्होंने बताया, “हमें साफ निर्देश मिले थे और कोई रोक-टोक नहीं थी। हमने खुद तय किया कि कितना आगे बढ़ना है। हमारे हमले सोच-समझकर किए गए थे।” उन्होंने यह भी साफ किया कि ऑपरेशन की सफलता में तीनों सेनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बड़ा योगदान था। यह बयान उन लोगों के लिए करारा जवाब था, जो सेना के मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
राजनीतिक इच्छाशक्ति और सेना की आजादी
वायुसेना प्रमुख ने साफ किया कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के पीछे सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने सेना को हर कदम पर साथ दिया और कोई पाबंदी नहीं लगाई। यह ऑपरेशन सिर्फ आतंकी ठिकानों को नष्ट करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका मकसद आतंकी नेतृत्व को सीधे चुनौती देना था। उन्होंने कहा कि सेना को पूरी आजादी थी और हमले सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर किए गए।
एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि ऑपरेशन की सफलता का एक बड़ा कारण सरकार की स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति थी। उन्होंने कहा, “हमें कोई राजनीतिक बाधा नहीं आई। हमें पूरी आजादी दी गई थी। हमने खुद तय किया कि कितना बढ़ाना है। हमने हमले को सोच-समझकर अंजाम दिया, क्योंकि हम परिपक्व तरीके से जवाब देना चाहते थे।”
#WATCH | Bengaluru, Karnataka | Speaking on Operation Sindoor, Chief of the Air Staff, Air Chief Marshal AP Singh says, "A key reason for success was the presence of political will. There were very clear directions given to us. No restrictions were put on us… If there were any… pic.twitter.com/nnveLS1fJr
एपी सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के फैसले का समर्थन करते हुए कहा, “लोगों ने युद्ध में अपने अहंकार को बीच में ला दिया। एक बार जब हमने अपने लक्ष्य हासिल कर लिए, तो हमें रुकने के लिए सभी मौकों को देखना चाहिए था। मेरे कुछ करीबी लोग कह रहे थे, ‘और मारना था।’ लेकिन क्या हम हमेशा युद्ध में रह सकते हैं? देश ने शांति का सही फैसला लिया।”
#WATCH | Bengaluru | "People got down to their egos in the war… Once we achieved our objective, we should have looked for all windows of opportunity to stop… Some people very close to me said, 'Aur maarna tha'. But can we continue to be at war?… The nation has taken a good… pic.twitter.com/HHzwombn1P
बेंगलुरु में 16वें एयर चीफ मार्शल एल.एम. कात्रे मेमोरियल लेक्चर के दौरान वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर की पूरी कहानी खुलकर बताई। उन्होंने बताया कि सुदर्शन यानी S-400 मिसाइल सिस्टम की मदद से भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 5 लड़ाकू विमानों को हवा में ही मार गिराया। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की खुफिया निगरानी के अहम हिस्से AEW&C/ELINT को भी 300 किलोमीटर की दूरी से नष्ट कर दिया गया। यह दुनिया में अब तक का सबसे लंबी दूरी का सतह-से-हवा में मार करने का रिकॉर्ड है।
वायुसेना प्रमुख ने बताया कि जेकबाबाद और भोलारी एयर बेस पर खड़े कुछ अमेरिका निर्मित F-16 विमानों को भी सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर तबाह किया गया। सैटेलाइट तस्वीरों और स्थानीय मीडिया की तस्वीरों से साफ हुआ कि इन हमलों से पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ। भारत ने पाकिस्तान के दो कमांड और कंट्रोल सेंटर (मुरीद और चकलाला), छह रडार, और तीन हैंगर (सुक्कुर UAV हैंगर, भोलारी हैंगर और जेकबाबाद F-16 हैंगर) को भी नष्ट किया। ऑपरेशन में 800-900 पाकिस्तानी ड्रोन भी बेअसर किए गए। यह सब 80-90 घंटे के हाई-टेक युद्ध में हुआ, जिसके बाद पाकिस्तान को अपने डीजीएमओ के जरिए युद्धविराम की गुहार लगानी पड़ी।
गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर 7 मई 2025 को शुरू हुआ था। यह ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसमें 26 बेगुनाह लोग मारे गए थे। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। भारत ने इसे बर्दाश्त नहीं किया और तुरंत जवाबी कार्रवाई की। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में 9 बड़े आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के ट्रेनिंग कैंप और ठिकाने शामिल थे।
खास बात यह थी कि भारत ने न सिर्फ सीमा पर, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और बहावलपुर जैसे इलाकों में गहरे अंदर तक हमले किए। इन हमलों ने आतंकियों और उनके समर्थकों को साफ संदेश दे दिया कि भारत अब कोई जगह सुरक्षित नहीं छोड़ेगा। ऑपरेशन में जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर के साले रऊफ अजहर का भी खात्मा हुआ, जो IC-814 विमान हाईजैक मामले का वांटेड था। यह ऑपरेशन सिर्फ आतंकियों को खत्म करने का नहीं, बल्कि भारत की ताकत और इरादों को दुनिया के सामने लाने का भी था।
ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य शक्ति और रणनीतिक दक्षता का एक शानदार उदाहरण है। इसने न सिर्फ आतंकवाद को करारा जवाब दिया, बल्कि पाकिस्तान को भी साफ संदेश दे दिया कि भारत अब किसी भी तरह की नापाक हरकत बर्दाश्त नहीं करेगा। वायुसेना प्रमुख एपी सिंह के खुलासों ने उन तमाम लोगों के मुँह पर ताला लगा दिया, जो इस ऑपरेशन की सफलता पर सवाल उठा रहे थे। यह ऑपरेशन देश के लिए गर्व का विषय है और यह दिखाता है कि जब सरकार और सेना एकजुट होकर काम करते हैं, तो कोई भी चुनौती भारत का रास्ता नहीं रोक सकती।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के सैधरी गाँव में एक ऐसी भयानक घटना घटी, जिसने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया। यहाँ अनुसूचित जाति का युवक नितिन का मुस्लिम प्रेमिका से प्रेम-प्रसंग चल रहा था, जिसकी वजह से न सिर्फ उस पर जानलेवा हमला हुआ, बल्कि उनके भाई की हत्या भी कर दी गई।
जानकारी के मुताबिक, 2 अगस्त 2025 की सुबह, नितिन अपनी प्रेमिका से मिलने महेवागंज थाना क्षेत्र के एक नदी के पुल पर गया था। उसके साथ दो दोस्त भी थे। लेकिन उसे क्या पता था कि वहाँ उसका इंतजार सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि मौत का खौफनाक साया कर रहा था। अचानक प्रेमिका के परिजनों का गुस्से से भरा गैंग वहाँ आ धमका। वसीम, कलीम, अजीज, असलम और पप्पू नाम के ये पाँच लोग लाठी-डंडों और तेज धार वाले हथियारों से लैस थे। उनके चेहरों पर नफरत की आग साफ झलक रही थी, जैसे वे नितिन को सबक सिखाने आए हों।
बिना एक शब्द बोले हमलावरों ने नितिन पर टूट पड़ने का इरादा कर लिया। लाठियों की बौछार और डंडों की मार के बीच नितिन को बेरहमी से पीटा गया। उसकी चीखें हवा में गूँज रही थीं, लेकिन हमलावरों का दिल नहीं पसीजा। एक हमलावर ने उसकी गर्दन पर तेज धार वाले हथियार से वार किया। नितिन का शरीर खून से लथपथ हो गया, कपड़े फट गए और वह दर्द से कराहता हुआ बेहोश होकर नदी किनारे गिर पड़ा।
हमलावरों ने उसे मरा समझकर नदी में फेंक दिया, जैसे वह कोई बेकार चीज हो। यह सिर्फ एक हमला नहीं था, बल्कि नफरत और हिंसा का वह खौफनाक चेहरा था, जो अनुसूचित जाति नितिन की धार्मिक और जातिगत पहचान को कुचलना चाहता था।
मरा समझकर नदी किनारे छोड़ा
ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी के मुताबिक, नितिन के दोस्त किसी तरह जान बचाकर भागे और करीब एक किलोमीटर दूर उसके घर पहुँचे। वहाँ उन्होंने परिवार को बताया कि नितिन की जिंदगी खतरे में है। परिजन दौड़ते हुए नदी के पास पहुँचे। वहाँ का मंजर देखकर उनके होश उड़ गए, क्योंकि नितिन खून से लथपथ बेहोश नदी में पड़ा था। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी हालत गंभीर थी।
भाई को उतारा मौत के घाट
इस बीच वहाँ पहुँचे मुस्लिमों की भीड़ और नितिन के परिवार के बीच तीखी झड़प हो गई। इस झगड़े में नितिन का बड़ा भाई अमित भी हमलावरों के हत्थे चढ़ गया। उसे इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसके सिर और शरीर पर गहरे जख्म बन गए। अस्पताल में इलाज के दौरान अमित ने दम तोड़ दिया। एक परिवार का बेटा मर गया, दूसरा जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था। यह दृश्य गाँव के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था।
वसीम, कलीम, अजीज, असलम और पप्पू के खिलाफ FIR
पुलिस ने नितिन के बड़े भाई की शिकायत पर FIR दर्ज की। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 115(2), 118(1), और 109(1) लगाई गईं, जो हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश और उकसावे जैसे गंभीर अपराधों से जुड़ी हैं। FIR में वसीम, कलीम, अजीज, असलम और पप्पू को नामजद किया गया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू की और 4 आरोपित को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन बाकी चार अब भी फरार हैं। पुलिस जगह-जगह छापेमारी कर उनकी तलाश में जुटी है।
इस मामले में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदू संगठनों ने भी दखल दिया है और जल्द कार्रवाई की माँग की है।
संदर्भित प्रकरण में कोतवाली सदर पर तत्काल सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर घटना करने वाले नामजद सभी चारो अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया गया है। अग्रिम विधिक कार्यवाही प्रचलित है।
यह घटना सिर्फ एक प्रेम कहानी का दुखद अंत नहीं है। यह उस गहरी नफरत को उजागर करती है, जो धर्म और जाति की दीवारों से पनपती है। नितिन का प्यार उसे और उसके भाई को मौत के मुँह में ले गया। हमलावरों ने न सिर्फ नितिन को निशाना बनाया, बल्कि उसकी धार्मिक और जातिगत पहचान को अपमानित किया। खून से सनी नदी और अमित की लाश इस बात का सबूत है कि यह हमला सिर्फ व्यक्तिगत रंजिश नहीं था। यह एक ऐसी सोच का नतीजा था, जो अनुसूचित जाति और हिंदू होने की सजा देना चाहती थी।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग पर फर्जी वोटर बनाने का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि कई वोटर लिस्ट में कई मकानों की संख्या 0 है। अब सामने आया है कि राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश की जिस रायबरेली लोकसभा सीट से सांसद हैं, वहाँ भी वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में लोगों के मकान नंबर 0 मिले हैं।
इसके अलावा रायबरेली में वोटर लिस्ट में एक ही पते पर 27 लोगों के नाम दर्ज मिले हैं। अब सवाल उठते हैं कि क्या राहुल गाँधी जो वोटर फर्जीवाड़े का आरोप चुनाव आयोग और बीजेपी पर लगा रहे हैं, वैसा ही फर्जीवाड़ा करके उन्होंने भी अपनी सीट जीती है?
राहुल की लोकसभा सीट पर भी 0 मकान नंबर वाले वोटर
राहुल गाँधी ने 7 अगस्त 2025 को प्रेस कॉन्फ्रेस में कर्नाटक की बेंगलौर सेंट्रल लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का डेटा दिखाया था जिसमें वोटर लिस्ट में कई लोगों के नंबर के आगे 0 लिखा हुआ था। राहुल ने ऐसे दावों को बहुत बड़ा षड्यंत्र बताया लेकिन अपने बुने हुए जाल में राहुल गाँधी खुद ही फँस गए हैं।
टाइम्स नाउ नवभारत की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रायबरेली लोकसभा के तहत आने वाली रायबरेली विधानसभा की वोटर लिस्ट में भी ऐसे कई वोटर हैं जिनके मकान नंबर के आगे 0 लिखा हुआ है। रायबरेली वही सीट है जिस पर अब राहुल गाँधी और पहले उनकी माँ सोनिया गाँधी लगातार लोकसभा का चुनाव जीतते रहे हैं।
वोटर लिस्ट के जिस 0 मकान नंबर के आधार पर राहुल गाँधी ने वोटर चोरी और बीजेपी की जीत का दावा किया है, अगर उसकी कसौटी पर उनकी खुद की सीट को भी कसा जाए तो सवाल उठता है कि क्या उन्होंने भी फर्जी वोटों के सहारे अपना चुनाव जीता है? राहुल गाँधी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो यही साबित करने की कोशिश की थी कि सारे फर्जी वोट जीतने वाली पार्टी को ही मिले हैं।
असल में वोटर लिस्ट में मकान नंबर 0 मिलना सिर्फ गड़बड़ी नहीं हो सकती है, क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि गाँव में लोगों को मकान नंबर की जानकारी नहीं होती है और वोटर लिस्ट में उनका नंबर 0 ही दर्ज कर लिया जाता है।
रायबरेली में एक पते पर कई वोटर, क्या राहुल गाँधी ने किया फर्जीवाड़ा?
राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि वोटर लिस्ट में एक ही पते पर 80 वोटर दर्ज हैं और उन्होंने इसे भी फर्जीवाड़े से जोड़ दिया था। राहुल गाँधी की रायबरेली सीट पर भी वैसा ही पैटर्न सामने आया जैसा वे दूसरों पर आरोप लगाते समय गिना रहे थे। एक बूथ में मकान संख्या 8 में 27 लोगों के नाम दर्ज मिले। दो अन्य बूथों में मकान संख्या 80 और मकान संख्या 4 पर 18-18 लोगों के नाम दर्ज हैं।
यह राजनीतिक विडंबना ही है कि जिस कथित फर्जीवाड़े का वो दावा कर रहे हैं, वैसा ही उनके चुनावी क्षेत्र में भी हो रहा है। भारत की विस्तृत चुनाव प्रणाली में यह कोई विशेष बात नहीं है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में अक्सर संयुक्त परिवार या किराएदारों के चलते ऐसी स्थिति बन जाती है। चुनाव आयोग समय-समय पर अपनी सूची में सुधार भी करता है।
बिहार में वोटर लिस्ट से जुड़ी विस्तृत SIR प्रक्रिया ऐसे ही सुधार का हिस्सा है। अब राहुल गाँधी को उस चुनाव सुधार पर भी ऐतराज है और उसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। जब चुनाव आयोग ने शिकायत माँगी है तो किसी भी मामले में वो लिखित शिकायत देने को तैयार नहीं हैं।
क्या है राहुल गाँधी के एक पते 80 वोटरों वाले दावे का सच?
राहुल गाँधी ने एक मकान संख्या पर 80 फर्जी वोटरों का आरोप लगाते हुए जो दावा किया था उसकी भी अब पोल खुल गई है। महादेवपुरा के जिस मुनीयप्पा रेड्डी गार्डन क्षेत्र में यह मकान स्थित वहाँ के BLO मुनीरत्न ने न्यूज चैनल से बातचीत में बताया है कि यहाँ कोई डुप्लीकेसी का मामला नहीं है।
इस घर में अधिकांश लोग किराए पर रहने आते हैं और बीते 14 वर्षों से कोई स्थाई रूप से इसमें नहीं रहा है। पते के प्रमाण के लिए लोग रेंट एग्रीमेंट करवाकर वोटर आईडी बनवाते हैं लेकिन फिर मकान को छोड़ देते हैं।
मुनीरत्न ने कहा कि लोग रजिस्टर्ड हैं और जो अब कहीं और बाहर रह रहे हैं। पहले जिन लोगों का नाम यहाँ से रजिस्टर्ड था उनकी सूची बनाकर चुनाव आयोग को दे दी गई है और उसे हटा दिया जाएगा।