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₹5000 नहीं, उत्तरकाशी के पीड़ितों को ₹5 लाख देने की ही धामी सरकार ने कही है बात… लेकिन मीडिया ने बरगलाया, छिपाया मुआवजे का वितरण ‘शीघ्र शुरू’ करने वाला ऐलान

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में बादल फटने के बाद जो स्थिति पैदा हुई उससे निपटने के लिए धामी सरकार लगातार प्रयास कर रही है। पीड़ितों को सहायता देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है। खुद मुख्यमंत्री प्रभावित इलाके में जाकर पीड़ितों से मिल रहे हैं, उन्हें मदद का आश्वसन दे रहे हैं। बावजूद इसके मीडिया में एक खबर सामने आई है जिसमें दावा है कि धामी सरकार की ओर से पीड़ितों को मात्र 5000 रुपए दिए गए हैं और वह इससे नाराज होकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

इस खबर की सच्चाई क्या है… आइए जानें और ये भी देखें कि जिन स्थानीयों के नाम पर धामी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं वो जमीन पर क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

हकीकत यह है कि 05 अगस्त 2025 को धराली गाँव में तबाही के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ितों के लिए शोक संवेदनाएँ व्यक्त की। यहाँ तक की गृह मंत्री अमित शाह ने भी घटना की जानकारी लेने के लिए सीएम से बात की थी। सीएम ने पीड़ितों के लिए ₹5 लाख की सहायता राशि प्रदान करने की भी घोषणा कर दी।

सीएम ने यह जानकारी 09 अगस्त 2025 को एक्स/ट्विटर एक पोस्ट कर दी। उन्होंने लिखा था कि धराली गाँव में आई आपदा से ग्रसित लोगों को ₹5 लाख की राशि प्रदान की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों के मकान, जमीन, खेती और अन्य नुकसान का आकलन शुरू कर दिया गया है, जिसके मुआवजे का वितरण भी हम शीघ्र शुरू करेंगे।

सीएम ने यह जानकारी दी कि 09 अगस्त 2025 को दी और यह भी लिखा कि मुआवजा प्रक्रिय़ा शीघ्र शुरू की जाएगी। लेकिन इस बात को 24 घंटे भी नहीं बीते कि मीडिया में अलग प्रोपेगेंडा चालू हो गया। खबरें फैली कि स्थानीय लोगों को ₹5 हजार की सहायता राशि दी गई, जबकि सीएम ने तो ₹5 लाख का वादा किया था।

इन खबरों को चलाने के लिए शिकार भी घटना से ग्रस्त ग्रामीणों को बनाया गया। खबरें चलाई गई कि ग्रामीण सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। जबकि यह दावा एक झटके में झूठा साबित हो गया। जब सीएम धामी को धराली गाँव की ही एक महिला राखी बाँधती नजर आई।

यह वीडियो धराली गाँव में बादल फटने के हादसे के बाद सीएम धामी के दौरे का है। जब एक महिला अपनी साड़ी के पल्लू से कपड़ा फाड़कर सीएम धामी को राखी बाँधती है। वीडियो में दिख रहा है कि कैसे महिला सीएम को आशीर्वाद दे रही हैं। इस वीडियो से साफ है कि प्रदेश की जनता का सीएम धामी के लिए काफी स्नेह है।

परंतु मीडिया धराली गाँव में प्रदर्शन की खबरें चलाकर प्रोपेगेंडा सेट करना चाहती है कि उत्तराखंड सरकार हादसे के बाद भी पीड़ितों के लिए कुछ नहीं कर रही है। जबकि हकीकत इस वीडियो में साफ दिखती है। प्रदेश की जनता सीएम धामी द्वारा किए गए प्रयासों पर संतुष्ट हैं।

इससे साफ है कि उत्तराखंड सरकार प्रदेश पर आए हर संकट के लिए तैयार है। सरकार ने घटनास्थल पर हर नजर बनाई हुई थी, खुद प्रदेश के सीएम पल-पल की जानकारी के लिए स्थानीय प्रशासन और NDRF रेस्क्यु टीम से फोन पर जुड़े रहे। घटनास्थल पर जाकर भी ग्रामीणों से बात की। इसके बावजूद मीडिया ने उत्तराखंड सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया।

गौरतलब है कि 05 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में बादल फटने से दर्दनाक हादसा हो गया। पहाड़ से तेज बहाव से आए पानी में पूरा गाँव डूब गया। घटना में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि लगभग 50 लोग अब भी लापता है। घटनस्थल पर रेस्क्यु ऑपरेशन जारी है।

बस अब बहुत हुआ… पहलगाम आतंकी हमले के बाद मोदी सरकार ने खुले छोड़े थे सेना के हाथ, तभी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में मिली जीत: आर्मी चीफ जनरल बोले- हमने शतरंज की तरह चली चालें

ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटा दी। इस ऑपरेशन में हर कदम शतरंज के पासे की तरह फेंका गया और पाकिस्तान चेकमेट हो गया। आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत होने से ही यह ऑपरेशन सफल हो सका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 04 अगस्त 2025 को IIT मद्रास में ‘अग्निशोध’ के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति को साझा किया। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन शतरंज खेलने जैसा था। उन्होंने कहा, “हमें नहीं पता दुश्मन का अगला कदम क्या हो सकता है और फिर हम क्या करेंगे। इसे ही ग्रेजोन बोलते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ग्रेजोन का मतलब है कि हम पारंपरिक ऑपरेशन नहीं कर रहे हैं। हम जो कर रहे हैं, वह सामान्य ऑपरेशन से बस थोड़ा कम है… हम शतरंज की चालें चल रहे थे और वह (दुश्मन) भी शतरंज की चालें चल रहा था। कहीं हम उन्हें शह और मात दे रहे थे, तो कहीं हम अपनी जान गँवाने के जोखिम पर भी मार गिराने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन यही तो ज़िंदगी है।”

पहलगाम आतंकी हमले के अगले दिन ऑपरेशन की तैयारी

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जानें चली गई। इसके अगले ही दिन थल, जल और वायु सेना प्रमुखों और राजनीतिक नेतृत्वों के बीच अहम बैठक हुई। आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने बताया कि वह पहली बार था जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था- “बस, अब बहुत हो चुका।” आर्मी चीफ ने कहा कि भारतीय सेना को ऑपरेशन सिंदूर प्लान और लागू करने की खुली छूट दे दी गई थी।

आर्मी चीफ ने कहा, “23 को, हम सब बैठे थे। यह पहली बार था जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘बस अब बहुत हो चुका।’ सेना के तीनों प्रमुखों को साफ था कि अब जरूर कुछ करना ही है। खुला हाथ दे दिया गया था और कहा गया कि कुछ भी करने का निर्णय आप (सेना) स्वयं लें। इस तरीके का आत्मविश्वास, राजनीतिक दिशा और स्पष्टता हमने पहली बार देखा था। यही आपका मनोबल बढ़ाता है।”

आर्मी चीफ ने बताया इस मनोबल से ही कमांडर को जमीनी स्तर पर सफलता हासिल हुई, जहाँ उन्होंने अपने दिमाग से ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान पर कार्रवाई की।

सिंदूर में सैनिकों को भावनाएँ जुड़ी

आर्मी चीफ से जब ऑपरेशन सिंदूर के नाम को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह सैनिकों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि छोटा नाम होने के साथ-साथ वह देश के लोगों से भी जुड़ना चाहिए था, इसीलिए ऑपरेशन सिंदूर नाम चुना, जिसने पूरे देश को जोड़े रखा।

उन्होंने कहा, “इस एक नाम ने पूरे देश को एक कर दिया। आज लोग कह रहे हैं- सिंधु से सिंदूर तक… सब कुछ हमने संभाल लिया। जब मैं ग्राउंड पर गया तो मैंने सैनिकों से कहा कि कोई भी बहन, माँ या बेटी जब सिंदूर लगाएगी तो वो हमेशा सैनिक को याद करेगी। यही तो वह जुड़ाव था जिसने पूरे राष्ट्र को एक उद्देश्य के लिए खड़ा कर दिया। यही कारण था कि पूरा देश पूछ रहा था- ऑपने ऑपरेशन क्यों रोका? और इसका जवाब भी दिया जा चुका है।”

पाकिस्तानी जनता को गुमराह करने में लगी उनकी फौज

मई 2025 में चले ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान का आर्मी चीफ असीम मुनीर अब प्रमोट होकर फील्ड मार्शल बन गया है। इससे पाकिस्तानी जनता को लगता है कि ऑपरेशन सिंदूर को उनकी फौज ने विफल कर दिया। यह पाकिस्तानी फौज की रणनीति है, खुद की आवाम के सामने जीत का डंका बजाने की। आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी ने भी इस पर तंज कसा।

उन्होंने कहा, “अगर आप किसी पाकिस्तानी से पूछें कि जीते या हारे तो वो कहेगा, मेरा चीफ फील्ड मार्शल बन गया है तो हम जरूर जीते होंगे। यही तरीका है कि जनता की सोच को प्रभावित करने का… चाहे वो अपने मुल्क की आवाम हो या दुश्मन की जनता हो।”

भारत ने पाकिस्तान के 5 विमानों को उड़ा दिया

आर्मी चीफ से पहले एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान की तबाही पर पूरी रिपोर्ट साझा की थी। उन्होंने कहा था कि ऑपरेशन के दौरान IAF ने पाँच पाकिस्तानी फाइटर जेट और एक बड़े एयरक्राफ्ट को तबाह कर दिया था।

एयर चीफ मार्शल ने यह भी कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का अहम कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति है। उन्होंने कहा, “हमने कम से कम पाँच फाइटर जेट और एक बड़े विमान को पक्के तौर पर मार गिराया। यह बड़ा विमान या तो ELINT विमान था या AEW&C विमान। इसे 300 किलोमीटर की दूरी से निशाना बनाया गया। यह अब तक का सबसे लंबी दूरी का सतह से हवा में मार करने वाला हमला है।”

कॉन्ग्रेस के केंद्र सरकार पर सवालों के मिले जवाब

पहलगाम आतंकी हमले के बाद कॉन्ग्रेस और कई विपक्षी दलों ने सरकार पर चुप्पी के सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था मोदी सरकार आतंकवादियों से डरकर पीछे हट गई है। यहाँ तक की ऑपरेशन सिंदूर पर भी विपक्ष को यकीन नहीं हुआ। अब तक वह ऑपरेशन के प्रमाण माँगती रही और इसमें पाकिस्तान को क्लीनचिट देती रही।

अब तो एयर चीफ मार्शल और आर्मी चीफ ने भी ऑपरेशन सिंदूर को लेकर साफ कर दिया है कि पाकिस्तान में कितनी तबाही मची है। यह सब भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण ही हुआ है। ऐसे में केंद्र सरकारी की मजबूती और उनकी दृण इच्छाशक्ति के बारे में अब विपक्ष को मानना ही होगा कि पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर भारत की कामयाबी है।

ऑपरेशन सिंदूर को लेकर राहुल गाँधी समेत तमाम विपक्षी नेताओं को फर्जी दावे हुए ध्वस्त: IAF चीफ बोले – सेना को ‘खुले हाथ’ मिली थी पूरी आजादी, मार गिराए 6 पाकिस्तानी विमान

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए न सिर्फ आतंकवाद को करारा जवाब दिया, बल्कि अपनी सैन्य ताकत और रणनीतिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया। यह ऑपरेशन भारत के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय बन गया है, जिसने पाकिस्तान को घुटनों पर लाकर यह साबित कर दिया कि भारत अब आतंकियों और उनके समर्थकों को कहीं भी छोड़ेगा नहीं।

भारतीय सेना की इस शानदार जीत के बावजूद राहुल गाँधी जैसे विपक्ष के कुछ नेता ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाकर देश की सेना और सरकार की मेहनत को कमजोर करने की कोशिश करते रहे। उन्होंने फर्जी बयानों, दावों और वीडियो के जरिए जनता को गुमराह करने की कोशिश की।

हालाँकि अब भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल (ACM) एपी सिंह ने बेंगलुरु में एक लेक्चर के दौरान ऐसी सभी बातों का करारा जवाब दे दिया। बिना किसी का नाम लिए उन्होंने उन तमाम भ्रामक दावों को ध्वस्त कर दिया, जो ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर सवाल उठा रहे थे।

राहुल गाँधी के संसद में किए दावों को IAF चीफ ने किया ध्वस्त

दरअसल, राहुल गाँधी ने संसद में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सरकार पर बयानबाजी की थी और कई आरोप मढ़े थे। राहुल ने कहा था कि बीजेपी सरकार में “राजनीतिक इच्छाशक्ति” की कमी है और सेना को पूरी आजादी नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि सेना को काम करने के लिए मजबूत राजनीतिक समर्थन और पूरी ऑपरेशनल आजादी चाहिए, जैसे 1971 के युद्ध में इंदिरा गाँधी ने जनरल मानेकशॉ को समय और आजादी दी थी।

राहुल ने ऑपरेशन सिंदूर में सरकार पर आरोप लगाया कि उसने सेना के हाथ बाँधे। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने पायलटों को पाकिस्तान के हवाई रक्षा सिस्टम पर हमला करने से रोका, जिसके चलते हमारे लड़ाकू विमान गिरा दिए गए। यही नहीं, राहुल गाँधी ने सेना को किनारे रखते हुए बड़ी चतुराई से इसे राजनीतिक नेतृत्व की तरफ मोड़ दिया था, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ था ही नहीं।

राहुल गाँधी ने कहा था कि गलती भारतीय वायुसेना की नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक नेतृत्व’ की थी, जिसने सेना को पाकिस्तान के फौजी ठिकानों पर हमला करने से रोका। ये भी सवाल उठाए गए कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना को कितने लड़ाकू विमानों का नुकसान हुआ।

हालाँकि अब वायुसेना प्रमुख ने इन दावों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार ने सेना को पूरी छूट दी थी। उन्होंने बताया, “हमें साफ निर्देश मिले थे और कोई रोक-टोक नहीं थी। हमने खुद तय किया कि कितना आगे बढ़ना है। हमारे हमले सोच-समझकर किए गए थे।” उन्होंने यह भी साफ किया कि ऑपरेशन की सफलता में तीनों सेनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बड़ा योगदान था। यह बयान उन लोगों के लिए करारा जवाब था, जो सेना के मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।

राजनीतिक इच्छाशक्ति और सेना की आजादी

वायुसेना प्रमुख ने साफ किया कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के पीछे सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने सेना को हर कदम पर साथ दिया और कोई पाबंदी नहीं लगाई। यह ऑपरेशन सिर्फ आतंकी ठिकानों को नष्ट करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका मकसद आतंकी नेतृत्व को सीधे चुनौती देना था। उन्होंने कहा कि सेना को पूरी आजादी थी और हमले सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर किए गए।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि ऑपरेशन की सफलता का एक बड़ा कारण सरकार की स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति थी। उन्होंने कहा, “हमें कोई राजनीतिक बाधा नहीं आई। हमें पूरी आजादी दी गई थी। हमने खुद तय किया कि कितना बढ़ाना है। हमने हमले को सोच-समझकर अंजाम दिया, क्योंकि हम परिपक्व तरीके से जवाब देना चाहते थे।”

एपी सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के फैसले का समर्थन करते हुए कहा, “लोगों ने युद्ध में अपने अहंकार को बीच में ला दिया। एक बार जब हमने अपने लक्ष्य हासिल कर लिए, तो हमें रुकने के लिए सभी मौकों को देखना चाहिए था। मेरे कुछ करीबी लोग कह रहे थे, ‘और मारना था।’ लेकिन क्या हम हमेशा युद्ध में रह सकते हैं? देश ने शांति का सही फैसला लिया।”

एयरफोर्स चीफ ने बताई पूरे ऑपरेशन की कहानी

बेंगलुरु में 16वें एयर चीफ मार्शल एल.एम. कात्रे मेमोरियल लेक्चर के दौरान वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर की पूरी कहानी खुलकर बताई। उन्होंने बताया कि सुदर्शन यानी S-400 मिसाइल सिस्टम की मदद से भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के 5 लड़ाकू विमानों को हवा में ही मार गिराया। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की खुफिया निगरानी के अहम हिस्से AEW&C/ELINT को भी 300 किलोमीटर की दूरी से नष्ट कर दिया गया। यह दुनिया में अब तक का सबसे लंबी दूरी का सतह-से-हवा में मार करने का रिकॉर्ड है।

वायुसेना प्रमुख ने बताया कि जेकबाबाद और भोलारी एयर बेस पर खड़े कुछ अमेरिका निर्मित F-16 विमानों को भी सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर तबाह किया गया। सैटेलाइट तस्वीरों और स्थानीय मीडिया की तस्वीरों से साफ हुआ कि इन हमलों से पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ। भारत ने पाकिस्तान के दो कमांड और कंट्रोल सेंटर (मुरीद और चकलाला), छह रडार, और तीन हैंगर (सुक्कुर UAV हैंगर, भोलारी हैंगर और जेकबाबाद F-16 हैंगर) को भी नष्ट किया। ऑपरेशन में 800-900 पाकिस्तानी ड्रोन भी बेअसर किए गए। यह सब 80-90 घंटे के हाई-टेक युद्ध में हुआ, जिसके बाद पाकिस्तान को अपने डीजीएमओ के जरिए युद्धविराम की गुहार लगानी पड़ी।

गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर 7 मई 2025 को शुरू हुआ था। यह ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसमें 26 बेगुनाह लोग मारे गए थे। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। भारत ने इसे बर्दाश्त नहीं किया और तुरंत जवाबी कार्रवाई की। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना ने मिलकर पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में 9 बड़े आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के ट्रेनिंग कैंप और ठिकाने शामिल थे।

खास बात यह थी कि भारत ने न सिर्फ सीमा पर, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और बहावलपुर जैसे इलाकों में गहरे अंदर तक हमले किए। इन हमलों ने आतंकियों और उनके समर्थकों को साफ संदेश दे दिया कि भारत अब कोई जगह सुरक्षित नहीं छोड़ेगा। ऑपरेशन में जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर के साले रऊफ अजहर का भी खात्मा हुआ, जो IC-814 विमान हाईजैक मामले का वांटेड था। यह ऑपरेशन सिर्फ आतंकियों को खत्म करने का नहीं, बल्कि भारत की ताकत और इरादों को दुनिया के सामने लाने का भी था।

ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य शक्ति और रणनीतिक दक्षता का एक शानदार उदाहरण है। इसने न सिर्फ आतंकवाद को करारा जवाब दिया, बल्कि पाकिस्तान को भी साफ संदेश दे दिया कि भारत अब किसी भी तरह की नापाक हरकत बर्दाश्त नहीं करेगा। वायुसेना प्रमुख एपी सिंह के खुलासों ने उन तमाम लोगों के मुँह पर ताला लगा दिया, जो इस ऑपरेशन की सफलता पर सवाल उठा रहे थे। यह ऑपरेशन देश के लिए गर्व का विषय है और यह दिखाता है कि जब सरकार और सेना एकजुट होकर काम करते हैं, तो कोई भी चुनौती भारत का रास्ता नहीं रोक सकती।

मुस्लिम प्रेमिका से छिप कर मिलता था SC युवक नितिन, वसीम-कलीम-अजीज-असलम-पप्पू ने कर दिया हमला: बाद में मुस्लिमों की भीड़ ने भाई अमित को मार डाला, FIR दर्ज-4 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के सैधरी गाँव में एक ऐसी भयानक घटना घटी, जिसने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया। यहाँ अनुसूचित जाति का युवक नितिन का मुस्लिम प्रेमिका से प्रेम-प्रसंग चल रहा था, जिसकी वजह से न सिर्फ उस पर जानलेवा हमला हुआ, बल्कि उनके भाई की हत्या भी कर दी गई।

जानकारी के मुताबिक, 2 अगस्त 2025 की सुबह, नितिन अपनी प्रेमिका से मिलने महेवागंज थाना क्षेत्र के एक नदी के पुल पर गया था। उसके साथ दो दोस्त भी थे। लेकिन उसे क्या पता था कि वहाँ उसका इंतजार सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि मौत का खौफनाक साया कर रहा था। अचानक प्रेमिका के परिजनों का गुस्से से भरा गैंग वहाँ आ धमका। वसीम, कलीम, अजीज, असलम और पप्पू नाम के ये पाँच लोग लाठी-डंडों और तेज धार वाले हथियारों से लैस थे। उनके चेहरों पर नफरत की आग साफ झलक रही थी, जैसे वे नितिन को सबक सिखाने आए हों।

बिना एक शब्द बोले हमलावरों ने नितिन पर टूट पड़ने का इरादा कर लिया। लाठियों की बौछार और डंडों की मार के बीच नितिन को बेरहमी से पीटा गया। उसकी चीखें हवा में गूँज रही थीं, लेकिन हमलावरों का दिल नहीं पसीजा। एक हमलावर ने उसकी गर्दन पर तेज धार वाले हथियार से वार किया। नितिन का शरीर खून से लथपथ हो गया, कपड़े फट गए और वह दर्द से कराहता हुआ बेहोश होकर नदी किनारे गिर पड़ा।

हमलावरों ने उसे मरा समझकर नदी में फेंक दिया, जैसे वह कोई बेकार चीज हो। यह सिर्फ एक हमला नहीं था, बल्कि नफरत और हिंसा का वह खौफनाक चेहरा था, जो अनुसूचित जाति नितिन की धार्मिक और जातिगत पहचान को कुचलना चाहता था।

मरा समझकर नदी किनारे छोड़ा

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी के मुताबिक, नितिन के दोस्त किसी तरह जान बचाकर भागे और करीब एक किलोमीटर दूर उसके घर पहुँचे। वहाँ उन्होंने परिवार को बताया कि नितिन की जिंदगी खतरे में है। परिजन दौड़ते हुए नदी के पास पहुँचे। वहाँ का मंजर देखकर उनके होश उड़ गए, क्योंकि नितिन खून से लथपथ बेहोश नदी में पड़ा था। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी हालत गंभीर थी।

भाई को उतारा मौत के घाट

इस बीच वहाँ पहुँचे मुस्लिमों की भीड़ और नितिन के परिवार के बीच तीखी झड़प हो गई। इस झगड़े में नितिन का बड़ा भाई अमित भी हमलावरों के हत्थे चढ़ गया। उसे इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसके सिर और शरीर पर गहरे जख्म बन गए। अस्पताल में इलाज के दौरान अमित ने दम तोड़ दिया। एक परिवार का बेटा मर गया, दूसरा जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था। यह दृश्य गाँव के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था।

वसीम, कलीम, अजीज, असलम और पप्पू के खिलाफ FIR

पुलिस ने नितिन के बड़े भाई की शिकायत पर FIR दर्ज की। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 115(2), 118(1), और 109(1) लगाई गईं, जो हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश और उकसावे जैसे गंभीर अपराधों से जुड़ी हैं। FIR में वसीम, कलीम, अजीज, असलम और पप्पू को नामजद किया गया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू की और 4 आरोपित को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन बाकी चार अब भी फरार हैं। पुलिस जगह-जगह छापेमारी कर उनकी तलाश में जुटी है।

इस मामले में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदू संगठनों ने भी दखल दिया है और जल्द कार्रवाई की माँग की है।

अनुसूचित जाति की पहचान को बनाया निशाना

यह घटना सिर्फ एक प्रेम कहानी का दुखद अंत नहीं है। यह उस गहरी नफरत को उजागर करती है, जो धर्म और जाति की दीवारों से पनपती है। नितिन का प्यार उसे और उसके भाई को मौत के मुँह में ले गया। हमलावरों ने न सिर्फ नितिन को निशाना बनाया, बल्कि उसकी धार्मिक और जातिगत पहचान को अपमानित किया। खून से सनी नदी और अमित की लाश इस बात का सबूत है कि यह हमला सिर्फ व्यक्तिगत रंजिश नहीं था। यह एक ऐसी सोच का नतीजा था, जो अनुसूचित जाति और हिंदू होने की सजा देना चाहती थी।

रायबरेली लोकसभा सीट पर मिले 0 मकान नंबर वाले कई मतदाता, वोटर लिस्ट में एक ही पते पर दर्ज हैं 27 वोटर: क्या राहुल गाँधी ने फर्जीवाड़े से जीता चुनाव?

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग पर फर्जी वोटर बनाने का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि कई वोटर लिस्ट में कई मकानों की संख्या 0 है। अब सामने आया है कि राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश की जिस रायबरेली लोकसभा सीट से सांसद हैं, वहाँ भी वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में लोगों के मकान नंबर 0 मिले हैं।

इसके अलावा रायबरेली में वोटर लिस्ट में एक ही पते पर 27 लोगों के नाम दर्ज मिले हैं। अब सवाल उठते हैं कि क्या राहुल गाँधी जो वोटर फर्जीवाड़े का आरोप चुनाव आयोग और बीजेपी पर लगा रहे हैं, वैसा ही फर्जीवाड़ा करके उन्होंने भी अपनी सीट जीती है?

राहुल की लोकसभा सीट पर भी 0 मकान नंबर वाले वोटर

राहुल गाँधी ने 7 अगस्त 2025 को प्रेस कॉन्फ्रेस में कर्नाटक की बेंगलौर सेंट्रल लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का डेटा दिखाया था जिसमें वोटर लिस्ट में कई लोगों के नंबर के आगे 0 लिखा हुआ था। राहुल ने ऐसे दावों को बहुत बड़ा षड्यंत्र बताया लेकिन अपने बुने हुए जाल में राहुल गाँधी खुद ही फँस गए हैं।

टाइम्स नाउ नवभारत की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रायबरेली लोकसभा के तहत आने वाली रायबरेली विधानसभा की वोटर लिस्ट में भी ऐसे कई वोटर हैं जिनके मकान नंबर के आगे 0 लिखा हुआ है। रायबरेली वही सीट है जिस पर अब राहुल गाँधी और पहले उनकी माँ सोनिया गाँधी लगातार लोकसभा का चुनाव जीतते रहे हैं।

वोटर लिस्ट के जिस 0 मकान नंबर के आधार पर राहुल गाँधी ने वोटर चोरी और बीजेपी की जीत का दावा किया है, अगर उसकी कसौटी पर उनकी खुद की सीट को भी कसा जाए तो सवाल उठता है कि क्या उन्होंने भी फर्जी वोटों के सहारे अपना चुनाव जीता है? राहुल गाँधी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो यही साबित करने की कोशिश की थी कि सारे फर्जी वोट जीतने वाली पार्टी को ही मिले हैं।

असल में वोटर लिस्ट में मकान नंबर 0 मिलना सिर्फ गड़बड़ी नहीं हो सकती है, क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि गाँव में लोगों को मकान नंबर की जानकारी नहीं होती है और वोटर लिस्ट में उनका नंबर 0 ही दर्ज कर लिया जाता है।

रायबरेली में एक पते पर कई वोटर, क्या राहुल गाँधी ने किया फर्जीवाड़ा?

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि वोटर लिस्ट में एक ही पते पर 80 वोटर दर्ज हैं और उन्होंने इसे भी फर्जीवाड़े से जोड़ दिया था। राहुल गाँधी की रायबरेली सीट पर भी वैसा ही पैटर्न सामने आया जैसा वे दूसरों पर आरोप लगाते समय गिना रहे थे। एक बूथ में मकान संख्या 8 में 27 लोगों के नाम दर्ज मिले। दो अन्य बूथों में मकान संख्या 80 और मकान संख्या 4 पर 18-18 लोगों के नाम दर्ज हैं।

यह राजनीतिक विडंबना ही है कि जिस कथित फर्जीवाड़े का वो दावा कर रहे हैं, वैसा ही उनके चुनावी क्षेत्र में भी हो रहा है। भारत की विस्तृत चुनाव प्रणाली में यह कोई विशेष बात नहीं है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में अक्सर संयुक्त परिवार या किराएदारों के चलते ऐसी स्थिति बन जाती है। चुनाव आयोग समय-समय पर अपनी सूची में सुधार भी करता है।

बिहार में वोटर लिस्ट से जुड़ी विस्तृत SIR प्रक्रिया ऐसे ही सुधार का हिस्सा है। अब राहुल गाँधी को उस चुनाव सुधार पर भी ऐतराज है और उसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। जब चुनाव आयोग ने शिकायत माँगी है तो किसी भी मामले में वो लिखित शिकायत देने को तैयार नहीं हैं।

क्या है राहुल गाँधी के एक पते 80 वोटरों वाले दावे का सच?

राहुल गाँधी ने एक मकान संख्या पर 80 फर्जी वोटरों का आरोप लगाते हुए जो दावा किया था उसकी भी अब पोल खुल गई है। महादेवपुरा के जिस मुनीयप्पा रेड्डी गार्डन क्षेत्र में यह मकान स्थित वहाँ के BLO मुनीरत्न ने न्यूज चैनल से बातचीत में बताया है कि यहाँ कोई डुप्लीकेसी का मामला नहीं है।

इस घर में अधिकांश लोग किराए पर रहने आते हैं और बीते 14 वर्षों से कोई स्थाई रूप से इसमें नहीं रहा है। पते के प्रमाण के लिए लोग रेंट एग्रीमेंट करवाकर वोटर आईडी बनवाते हैं लेकिन फिर मकान को छोड़ देते हैं।

मुनीरत्न ने कहा कि लोग रजिस्टर्ड हैं और जो अब कहीं और बाहर रह रहे हैं। पहले जिन लोगों का नाम यहाँ से रजिस्टर्ड था उनकी सूची बनाकर चुनाव आयोग को दे दी गई है और उसे हटा दिया जाएगा।

डोनाल्ड ट्रंप के ‘टैरिफ वॉर’ के बाद चीन के सरकारी मीडिया ने बदले सुर, अब करने लगा भारत से दोस्ती की बातें: अमेरिका के ‘राष्ट्रपति’ की वजह से बदल रहा है वर्ल्ड ऑर्डर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ युद्ध छेड़ा हुआ है और उनके निशाने पर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि सभी BRICS देश हैं। अमेरिकी टैरिफ से अलग-अलग देशों के व्यापार पर जो असर होना है, वो तो होगा है लेकिन ऐसा लग रहा है कि ट्रंप ने दुनिया भर के कई दुश्मन देशों को एकजुट कर दिया है। ट्रंप के इस टैरिफ वॉर से भारत-चीन भी फिर से नजदीक आते दिख रहे हैं।

ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर टैरिफ लगाया और तमाम तरह की धमकियाँ भी दी हैं। भारत को दी गईं इन धमकियों के चलते चीन ट्रंप पर बरस पड़ा है। यह असर सिर्फ चीन के राजनीतिक हलकों तक ही सीमित नहीं है बल्कि चीन का सरकारी मीडिया भी भारत को लेकर अपने सुर बदल रहा है।

ग्लोबल टाइम्स, चीनी सरकार का वो अखबार जो भारत के खिलाफ नैरेटिव फैलाने के लिए कुख्यात था, वो अब भारत के साथ दोस्ती और विकास की बातें करने लगा है। ट्रंप के टैरिफ के बीच चीन अब भारत के साथ अपनी दोस्ती पक्की करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है।

6 अगस्त 2025 को ग्लोबल टाइम्स ने एक ओपिनियन (विचार) प्रकाशित किया था। इसकी हेडलाइन थी “भारत ‘विदेशी निवेश का कब्रिस्तान’ के लेबल को क्यों नहीं हटा पा रहा?” इस लेख में तर्क दिया गया कि पश्चिमी मीडिया द्वारा फैलाया गया चीन और भारत के बीच ‘कौन किसकी जगह लेगा’ का नैरेटिव असल में बेबुनियाद है।

इस लेख में कहा गया है, “भारत और चीन के बीच सहयोग का लंबा इतिहास रहा है और उनकी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के पूरक हैं। चीन भारत के साथ सहयोग को बहुत महत्व देता है और भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदारों में से शामिल है। आज के जटिल और लगातार बदलते वैश्विक परिदृश्य में, यह चर्चा करने के बजाय कि कौन किसकी जगह लेता है, एक-दूसरे की ताकत का इस्तेमाल करना, व्यावहारिक सहयोग पर काम करना और आपसी लाभ, सभी के लिए फायदे वाले परिणामों और साझा विकास को बढ़ावा देना कहीं अधिक समझदारी है।”

इस लेख में बात पर भी जोर दिया गया है कि भारत-चीन के संबंध खराब दौर से गुजरकर अब एक महत्वपूर्ण जगह पर पहुँच गए हैं। साथ ही, कहा गया है कि भारत-चीन के संबंध दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दोनों के हित में रहते हैं।

भारत स्थित चीन के दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने भी X पर यह लेख शेयर किया है। उन्होंने हाथी और ड्रेगन की दोस्ती दिखाने वाली तस्वीर शेयर कर लिखा, “आज के समय में दोनों देशों के लिए सहयोग और सहमति को बढ़ाना और एशिया व विश्व स्तर पर शांति को बढ़ावा देना समझदारी की बात होगी।”

इसके बाद 7 अगस्त को ग्लोबल टाइम्स ने एक और ओपिनियन (विचार) प्रकाशित किया। इसे ब्राज़ील के एक पत्रकार ने लिखा था और इसमें बताया गया कि कैसे अमेरिका के आर्थिक दबाव के खिलाफ ग्लोबल साउथ को एकजुट होने की आवश्यकता है। इसमें लिखा गया कि ग्लोबल साउथ में अपने रणनीतिक साझेदारों को अलग थलग करने की जो अमेरिका की कोशिश है, उसका असर उल्टा ही होता है। इससे उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएँ और करीब आ जाती हैं और अमेरिका पर उनकी निर्भरता कम हो जाती है। ग्लोबल टाइम्स के 7 अगस्त के ही एक लेख में बताया गया कि भारत और ब्राज़ील के साथ मिलकर अमेरिका के टैरिफ का विरोध कर रहे हैं।

भारत को कभी इस बात का भ्रम नहीं था कि अमेरिका भारत के साथ बहुत गहरी दोस्ती निभाएगा। भारत को पता है कि अमेरिका का उससे दोस्ती रखने का बड़ा मकसद चीन के साथ बैलेंस बनाने की नीति ही है। इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि अमेरिका का एजेंडा अगर कोई देश ना माने तो उन्हें वो बिल्कुल भूल जाता है फिर चाहे दोस्ती कैसी भी हो।

अगर भारत अमेरिका का बराबरी का साझेदार न होता, तो वह खुशी-खुशी अमेरिका के आगे झुक जाता और ट्रंप की शर्तों पर ट्रेड डील साइन कर देता। लेकिन हुआ इसका उल्टा, भारत ने अपने किसानों की रोजी-रोटी पर चोट करने वाली माँग यानी अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलने से साफ मना कर दिया। भारत ने रूस से तेल खरीदना भी बंद नहीं किया और अमेरिका व यूरोप की दोहरी नीति वाली सोच पर खुलकर वार भी किया है। इससे इतना तो साफ है कि अगर कोई देश भारत को जूनियर पार्टनर समझता है तो वह भूल ही कर रहा है। क्योंकि भारत पाकिस्तान नहीं है।

अमेरिका ने अगर यह सोचा था कि भारत, अमेरिका का भोंपू बनकर काम करेगा तो उसे BRICS और क्वाड में भारत की मौजूदगी से साफ पता चल जाना चाहिए था कि भारत किसी और देश की झोली में नहीं है और ना ही किसी एक महाशक्ति के सर्वशक्तिमान होने पर उसका भरोसा है।

ग्लोबल टाइम्स में 7 अगस्त को ‘RIC बहुध्रुवीय व्यवस्था को आगे बढ़ाने का एक रणनीतिक अवसर’ हेडलाइन से प्रकाशित एक अन्य लेख में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि रूस-भारत-चीन (RIC) त्रिपक्षीय सहयोग को फिर से शुरू करने के लिए इसे सिर्फ प्रतीक नहीं रहने देना होगा। इसमें कहा गया, “यह तीनों के लिए बाहरी प्रतिबंधों के दबाव के खिलाफ एकजुट होने, मुक्त विदेश नीति दिखाने और एक बहुध्रुवीय व्यवस्था को आगे बढ़ाने का एक रणनीतिक अवसर है।”

SCO शिखर सम्मेलन के लिए पीएम मोदी के चीन जाने की भी चर्चा है। इसी को लेकर गुरुवार को ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित संपादकीय लेख में कहा गया है, “अगर भारत पीएम मोदी की इस यात्रा को मौका मानकर अपनी चीन नीति में जल्दी बदलाव करे और बेवजह की रुकावटें हटाए, तो दोनों देशों के रिश्तों में आगे बढ़ने की बहुत ज्यादा गुंजाइश है।”

लेख में कहा गया कि पश्चिमी मीडिया जिस तरह मोदी जी की चीन यात्रा को अमेरिका के खिलाफ ‘संतुलन बनाने’ की कोशिश बता रहा है, वैसा नहीं है। इसमें लिखा गया, “आज दुनिया के ज्यादातर देशों की इच्छा है कि मुक्त व्यापार होता रहे और एकतरफा टैरिफ का विरोध हो।” ग्लोबल टाइम्स ने यह भी कहा कि भारत और चीन दोनों पुरानी सभ्यताएं हैं और तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी हैं। ये दोनों देश ग्लोबल साउथ के अहम सदस्य हैं और अपने विकास के एक अहम मोड़ पर हैं।

अखबार ने मोदी जी का स्वागत करते हुए एक हिंदू कहावत ‘अपने भाई की नाव पार लगाओ तो तुम्हारी नाव किनारे तक पहुँच जाएगी’ का जिक्र भी किया है। लेख में यह भी कहा गया कि क्षेत्रीय ताकतों के रूप में भारत और चीन के बीच आतंकवाद-रोधी कदम, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे कई क्षेत्रों में साझा हित हैं।

ग्लोबल टाइम्स ने संपादकीय में चीन का प्रतिनिधित्व करने के लिए आक्रामक ड्रैगन के बजाय पांडा का इस्तेमाल किया

दरअसल, भारत और चीन के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर दोनों पड़ोसी मिलकर काम कर सकते हैं, खासकर आतंकवाद से लड़ाई में लेकिन दिक्कत यह है कि चीन, पाकिस्तान को सैन्य और नीतिगत मदद देता है। पाकिस्तान में असल में सेना ही हुकूमत चलाती है और वह भारत के खिलाफ सीमा पार जिहादी आतंकवाद को बढ़ावा देता है। चीन का ऐसे देश का समर्थन करना भारत को कभी भी मंजूर नहीं होगा।

अगर भारत-चीन रिश्ते सच में सुधरने हैं तो बीजिंग को इस मसले पर गंभीर कदम उठाने होंगे। भारत यह भी नहीं भूला है कि पिछले मई में जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था, तब चीन ने पाकिस्तान को बचाने का वादा किया था और रक्षा समर्थन भी दिया था।

पाकिस्तान का अमेरिका की तरफ झुकाव और ट्रंप की चापलूसी चीन के लिए आंख खोलने वाली बात होनी चाहिए। उसका यह ‘हर मौसम का दोस्त’ असल में सिर्फ डॉलर का दोस्त है।

जैसा कहा जाता है, वक्त की सबसे अच्छी बात यह है कि वह बदलता है। आज जब चीन खुद अमेरिका के टैरिफ युद्ध का सामना कर रहा है तो उसे भारत में एक अहम साझेदार और पश्चिमी दबाव के खिलाफ संतुलन का साधन दिखने लगा है। भले ही चीन की अपनी क्षेत्र में दबदबा बनाने और विस्तारवाद की महत्वाकांक्षाएं रही हैं लेकिन अब वह खुलकर भारत की उस सोच का समर्थन कर रहा है जिसमें दुनिया एक ही ताकत के बजाय कई ताकतों में बँटी हो। वहीं, अमेरिका एकतरफा दुनिया बनाना चाहता है जहाँ वह ‘बड़ा भाई’ बना रह सके।

भारत ने BRICS और SCO जैसे मंचों पर हमेशा अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और संतुलित वैश्विक व्यवस्था की सोच रखी है। अब जब चीन भी इस सोच की तारीफ कर रहा है और ग्लोबल टाइम्स के लेखों में इसका असर दिख रहा है तो लगने लगा है कि बीजिंग भारत के साथ मिलकर काम करने को तैयार है ताकि अमेरिका को टक्कर दी जा सके।

ग्लोबल टाइम्स अब भले ही मीठी बातें कर रहा हो लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पहले यही अखबार भारत के खिलाफ लगातार जहर उगलता रहा है।

इसी साल मई में जब पहलगाम में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंक और सैन्य ढाँचों के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया था, तो ग्लोबल टाइम्स और शिन्हुआ जैसे बाकी चीनी प्रोपेगेंडा मीडिया ने झूठी खबर फैलाई कि पाकिस्तान के चीनी JF-17 लड़ाकू विमान ने पंजाब के आदमपुर में भारत के S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट कर दिया। बाद में भारतीय सेना ने सबूत देकर इन दावों को पूरी तरह झूठा साबित कर दिया।

इतना ही नहीं, ग्लोबल टाइम्स ने पाकिस्तानी फोर्स के इस दावे को भी फैलाया कि उन्होंने साइबर अटैक करके भारत के 70% पावर ग्रिड को ठप कर दिया है। इस झूठ को भी चीनी सरकारी मीडिया जैसे शिन्हुआ ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था।

चीन की वेबसाइट China.com ने भी पाकिस्तान के उस झूठे दावे को छापा था जिसमें कहा गया था कि उसने भारत के ब्रह्मोस मिसाइल भंडारण केंद्र को नष्ट कर दिया। इसी तरह Sina News ने पाकिस्तान के इस झूठ को फैलाया कि भारत ने नीलम-झेलम हाइड्रोपावर स्टेशन को निशाना बनाया। पाकिस्तान ने तो यहाँ तक फर्जी दावा किया था कि उसने एक भारतीय महिला पायलट को पकड़ लिया है और चीनी मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इसे भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।

सबसे शर्मनाक बात यह रही कि Xinhua जैसे चीनी मीडिया ने पहलगाम में हुए इस्लामी आतंकी हमले को ‘शूटिंग की घटना’ बताया था। जबकि साफ था यह हमला पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के एक गुट द रेजिस्टेंस फ्रंट के आतंकियों ने अंजाम दिया था। इस हमले में दो दर्जन से ज्यादा मासूम लोगों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम नहीं थे और चीनी मीडिया ने इसे धार्मिक नफरत से प्रेरित नरसंहार के बजाय एक मामूली गोलीबारी की घटना दिखाने की कोशिश की।

मई में जब पाकिस्तान के चीनी हथियार भारत के सामने नाकाम हो गए, तो चीन ने पश्चिमी मीडिया में प्रोपेगेंडा चलाकर अपनी इज्जत बचाने और भारतीय सेना को कमजोर दिखाने की कोशिश की। हकीकत यह है कि भारत ने हमले के दौरान पाकिस्तान के चीनी एयर डिफेंस सिस्टम को कुछ समय के लिए बेकार कर दिया था और पाकिस्तान को गहरे अंदर तक चोट पहुंचाई थी।

दरअसल, यह कोई नई बात नहीं है। चीनी सरकारी मीडिया लंबे समय से भारत की विदेश नीति को निशाना बनाता रहा है और भारत के अंदरूनी मामलों पर भी नकारात्मक और चालाकी भरे नैरेटिव फैलाता रहा है। OpIndia पहले भी चीन और कॉन्ग्रेस राहुल गाँधी के रिश्तों पर रिपोर्ट कर चुका है। हालाँकि, यह प्यार एक-तरफा नहीं है। ग्लोबल टाइम्स और बाकी चीनी मीडिया कई बार राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के बयानों का इस्तेमाल भारत को घेरने के लिए करते रहे हैं।

चीन खुद अपने विस्तारवादी रवैये और पड़ोसियों के साथ सीमा विवादों पर आक्रामक व्यवहार के लिए बदनाम है। फिर भी, अब उसका सरकारी मीडिया रणनीतिक स्वतंत्रता और संप्रभुता की बातें करने लगा है। लेकिन जब अगस्त 2024 में भारत ने अपना दूसरा परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN), INS अरिघाट को नौसेना में शामिल किया, तो ग्लोबल टाइम्स ने एक द्वेष से भरा लेख छापा कि ‘भारत की दूसरी परमाणु मिसाइल पनडुब्बी का जिम्मेदारी से इस्तेमाल होना चाहिए: विशेषज्ञ’ यानी भारत को ‘जिम्मेदार इस्तेमाल’ का नैतिकता का पाठ पढ़ाने की कोशिश की थी।

इतिहास देखें तो भारत-चीन रिश्ते हमेशा तनाव से भरे रहे हैं, सीमा विवाद, 2017 का डोकलाम संकट, 2020 की गलवान झड़प, आर्थिक मुकाबला, रणनीतिक अविश्वास और अलग-अलग वैश्विक गुटों में खड़ा होना, ये सब रिश्तों को मुशकिल बनाते रहे। मगर अब हवाएँ कुछ बदलती दिख रही हैं।

रिश्ते सुधारने के हाल के प्रयास उम्मीद जगाते हैं लेकिन भारत अभी भी चीन के इरादों पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता है। मोदी सरकार, चीन की भारत-चीन दोस्ती की बातों को सावधानी और आशा के साथ देख रही है लेकिन साथ-साथ पूरी तरह सतर्क भी है।

दिलचस्प यह है कि ट्रंप के टैरिफ युद्ध ने अनजाने में वो कर दिया जो लगभग असंभव लगता है यानि चीन और भारत को एक मुद्दे पर साथ खड़ा कर दिया है। चीन के सख्त कंट्रोल वाले सरकारी मीडिया का यह बदला हुआ लहजा अहम है। टकराव से मेल-मिलाप की ओर यह बदलाव बीजिंग की एक नई दिशा को दिखा रहा है। लगता है कि पीएम मोदी की चीन यात्रा से पहले चीन, भारत के साथ विचारधारा और रणनीति की खाई पाटने की कोशिश कर रहा है।

यह जितना अजीब सुनने में लगता है, उतना ही सच भी है। चीन का टकराव से दोस्ती की ओर आना दिखाता है कि ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ का सपना, असल में ‘BRICS फर्स्ट’ की हकीकत में बदलता जा रहा है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

मोदी सरकार ने बदल दी रक्षा उत्पादन की तस्वीर, 10 साल में ₹46429 करोड़ से बढ़कर ₹150590 करोड़ पर पहुँचा: पूरी दुनिया में बज रहा ‘मेक इन इंडिया’ हथियारों का डंका

भारत का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड 1 लाख 50 हजार 590 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। यह पिछले साल से 18% ज्यादा और 2019-20 की तुलना में 90% की बड़ी बढ़ोतरी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियानों की ऐतिहासिक कामयाबी बताया।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इस बारे में एक्स पर पोस्ट करके सूचना दी है। उन्होंने लिखा, “भारत का रक्षा उत्पादन 2024-25 में रिकॉर्ड 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया। पिछले साल के 1.27 लाख करोड़ से 18% ज्यादा और 2019-20 के 79,071 करोड़ से 90% की बड़ी बढ़ोतरी। मैं रक्षा उत्पादन विभाग, सरकारी कंपनियों और निजी उद्योगों की मेहनत की तारीफ करता हूं। ये तरक्की दिखाती है कि भारत का रक्षा उद्योग कितना मजबूत हो रहा है।”

सरकार के आँकड़ों के मुताबिक, रक्षा उत्पादन में 77% हिस्सा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (डीपीएसयू) और सरकारी संस्थाओं का है, जबकि 23% निजी कंपनियों का योगदान है। खास बात ये है कि निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी में 2% की बढ़ोतरी हुई, जो रक्षा निर्माण में उनकी बढ़ती भूमिका दिखाती है। डीपीएसयू के उत्पादन में 16% और निजी क्षेत्र में 28% की वृद्धि हुई।

मंत्रालय का कहना है कि नीतिगत सुधार, व्यापार को आसान बनाना और स्वदेशी उत्पादन पर जोर देने से ये मुमकिन हुआ। यह न सिर्फ रक्षा क्षेत्र को मजबूत कर रहा है, बल्कि रोजगार और तकनीकी विकास को भी बढ़ावा दे रहा है।

आत्मनिर्भर भारत के तहत पुराने हेलीकॉप्टरों की विदाई, नए निर्माण की तैयारी

इसके साथ ही, मोदी सरकार सेना और एयरफोर्स को अपग्रेड करने में जुटी है। पुराने चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों को रिटायर करने की तैयारी शुरू हो गई है। ये हेलीकॉप्टर 1960 के दशक की डिजाइन पर बने थे और लंबे समय से सेना-एयरफोर्स में काम कर रहे थे। लेकिन अब इनकी क्षमता और सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। हाल के सालों में इनमें कई दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें बहादुर सैनिकों ने बलिदान दिया। इसलिए इन्हें धीरे-धीरे हटाया जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय ने 200 नए हल्के हेलीकॉप्टरों की खरीद के लिए जानकारी माँगी है। इनमें से 120 सेना को और 80 एयरफोर्स को मिलेंगे। ये हेलीकॉप्टर दिन-रात टोही, निगरानी, खोज-बचाव, विशेष मिशन, सैनिकों की तेज तैनाती और सामान ढोने में सक्षम होंगे। ये हमलावर हेलीकॉप्टरों के साथ तालमेल बनाकर काम करेंगे और अंदर-बाहर से भारी सामान उठा सकेंगे, जिससे इनका इस्तेमाल बहुत लचीला होगा।

रक्षा मंत्रालय ने साफ किया है कि ये हेलीकॉप्टर भारत में ही बनाए जाएँगे। भारतीय कंपनियाँ विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर इन्हें तैयार करेंगी। इससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को बल मिलेगा और स्वदेशी रक्षा निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से 156 हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर खरीदने की मंजूरी दी गई है। इनकी लागत 45 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है।

ये हेलीकॉप्टर सेना और एयरफोर्स के पास रहेंगे और चीन-पाकिस्तान सीमाओं पर तैनात होंगे। इससे सीमाओं पर भारत की स्थिति और मजबूत होगी। एयरफोर्स हल्के फाइटर जेट (एलसीए), हल्के उपयोगी हेलीकॉप्टर (एलयूएच), मल्टी-परपज हेलीकॉप्टर और हवा में ईंधन भरने वाले विमानों की खरीद की योजना बना रही है। साथ ही रडार, गाइडेड हथियार, ड्रोन (यूएवी) और ट्रेनिंग विमानों के निर्माण पर भी ध्यान दे रही है।

ये आधुनिक हेलीकॉप्टर न केवल सर्वे और निगरानी करेंगे, बल्कि छोटे सैनिक दलों की आवाजाही, विशेष अभियानों में सहायता, हमलावर हेलीकॉप्टरों के साथ समन्वय और सामरिक रसद पहुँचाने जैसे कार्यों के लिए भी सक्षम होंगे। साथ ही ये आंतरिक और बाहरी भार वहन करने में भी सक्षम होंगे, जिससे इनका इस्तेमाल बेहद लचीला और उपयोगी बन जाता है।

यह सारी कोशिशें भारत को एक ताकतवर रक्षा शक्ति बनाने की दिशा में हैं। रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी से न सिर्फ सेना-एयरफोर्स आधुनिक होंगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा। स्वदेशी निर्माण से विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलेगा। निजी और सरकारी क्षेत्र की साझेदारी इस दिशा में एक नया रास्ता खोल रही है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि यह उपलब्धि भारत के रक्षा क्षेत्र की ताकत और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। पुराने उपकरणों को हटाकर नए लाना और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना देश को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

लिव इन ‘हराम’, इस्लाम में ‘जिना’ की सजा 100 कोड़े: जानिए हाई कोर्ट को क्यों कहना पड़ा- धर्मांतरण विरोधी कानून से बचने के लिए हो रहा इस्तेमाल

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुस्लिम पुरुष और दलित महिला के उस जोड़े को राहत देने से इनकार किया है, जिसने ‘लिव इन’ में रहने की बात करते हुए गिरफ्तारी पर रोक की गुहार लगाई थी। हाई कोर्ट ने कहा है कि इस्लामी कानून के अनुसार हिंदू और मुस्लिम का लिव इन में रहना ‘हराम’ है।

अदालत ने कहा कि इस्लामी कानून में ‘जिना’ की सजा 100 कोड़े हैं। मोटे तौर पर जिना का अर्थ निकाह के बगैर कामुक रिश्तों से है। अदालत ने कहा कि इस्लाम में निकाह से पहले ‘किस’ और ‘टच’ जैसी किसी भी प्रकार की यौन गतिविधि ‘हराम’ बताई गई है।

29 जुलाई 2025 के अपने इस आदेश में जस्टिस संगीता चंद्रा और ​जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने यह भी कहा है कि उत्तर प्रदेश में जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए बनाने गए कानून से बचने के लिए भी लिव इन का दुरुपयोग हो रहा है।

इस मामले में युवती के पिता ने BNS और SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज कराई है। कोर्ट में युवक-युवती लिव इन में रहने से जुड़े पूरे सबूत भी नहीं दे पाए। इसके बाद कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर गिरफ्तारी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्तों को धर्मांतरण के कानून या पर्सनल लॉ के तहत नैतिकता से बचने का बहाना नहीं बनाया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं। बालिग हैं। इसके कारण अपनी मर्जी से किसी के भी साथ रहने को स्वतंत्र हैं। लेकिन युवती के पिता और पुलिस उन्हें परेशान कर रही है। इस दलील को मानने से इनकार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि कपल को साथ रहने के लिए उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी ऐक्ट के हिसाब से कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

क्या है इस्लाम का जिना, इस पर हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट कहा, “इस्लामी कानून में निकाह के बिना यौन संबंध को मान्यता नहीं दी जा सकती। मियाँ-बीवी बीच के यौन संबंध के अलावा किसी भी अन्य यौन संबंध को ‘जिना’ माना गया है। इसमें निकाह से पहले या निकाह के बाद किसी गैर मर्द/औरत से संबंध भी शामिल है। इस तरह निकाह से पहले यौन संबंध इस्लाम में जायज़ नहीं है।”

हाई कोर्ट ने आगे कहा, “निकाह से पहले किसी भी प्रकार की यौन, कामुक, स्नेहपूर्ण क्रिया जैसे चुंबन, स्पर्श, घूरना जैसी चीजें इस्लाम में ‘हराम’ है क्योंकि इन्हें ‘ज़िना’ का हिस्सा माना जाता है। कुरान के अनुसार ऐसे अपराध की सजा व्यभिचार सौ कोड़े मारने की है। ‘सुन्नत’ में इसकी सज़ा पत्थर से मार-मारकर जान लेने की है।”

हाईकोर्ट के आदेश का हिस्सा

हाई कोर्ट ने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता अपनी रिश्ते को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं पेश कर पाए। वे अपनी उम्र और अन्य जरूरी तथ्यों की जाँच कराए बगैर रिश्ते पर अदालत की मुहर चाहते थे। हाई कोर्ट ने इस दौरान लिव इन से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों का हवाला भी दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि कुछ फैसले बालिगों के सहमति से बनाए संबंधों के पक्ष में हैं, लेकिन इन्हें सभी लिव इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं माना जा सकता।

मुस्लिमों को लिव इन में रहने का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट

इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अन्य फैसले में कहा ​था कि इस्लाम को मानने वाला व्यक्ति लिव इन रिलेशनशिप में रहने का दावा नहीं कर सकता। खासकर तब जब उसका जीवन साथी जीवित हो। यह फैसला जस्टिस अताउ रहमान मसूदी और जस्टिस अजय कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनाया था।

लिव इन रिलेशनशिप पर क्या कहता है भारत का कानून?

भारतीय कानून में लिव इन रिलेशनशिप को खास तौर पर परिभाषित करने वाला कोई अधिनियम नहीं है। लेकिन इन संबंधों को संविधान के अनुच्छेद 21 से कानूनी अधिकार मिलता है। सुप्रीम कोर्ट यह मानता है कि वयस्कों को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने का मौलिक अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा शर्मा बनाम वीएवी शर्मा 2013 के मामले में लिव इन रिलेशनशिप को लेकर गाइडलाइंस दी हैं। इनमें ‘लिव-इन में रहने वालों का व्यस्क होना, एक तय अवधि तक साथ रहना, एक घर में साथ रहना, एक ही घर की वस्तुओं का इस्तेमाल करना, बच्चों को प्रेम से रखना और लोगों को यह जानकारी होना कि दोनों साथ रहते हैं’ जैसी चीजें शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) मामले में कहा है कि दो बालिगों के बीच सहमति से लिव इन संबंध कोई अपराध नहीं है, भले ही इसे अनैतिक माना जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में कट्टुकंडी एडथिल कृष्णन बनाम वाल्सन मामले में कहा कि लंबे समय के लिव इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जा सकता है। यदि कोई पुरुष और महिला सहमति से लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो उनके बच्चे को पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी से वंचित नहीं किया जा सकता है।

अखिलेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि कोई पक्षकार पहले से विवाहित है तो लिव इन रिलेशनशिप अवैध मानी जा सकती है।

RG कर मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर रेप-मर्डर केस के 1 साल, न्याय तो दूर – न्याय माँगने वालों का भी दमन कर रही ममता सरकार: अब प्रदर्शन कर रही माँ पर पुलिस ने बरसाई लाठियाँ

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 9 अगस्त 2024 को महिला जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने राज्यभर में आक्रोश फैला दिया और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, जो छह हफ्तों से ज्यादा समय तक चले। ये प्रदर्शन अब भी जारी है, जिसे अब ममता सरकार ताकत के दम पर दबाने में जुट गई है।

अब, इस घटना को एक साल बीत चुका है, लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता को न्याय दिलाने की माँग को लेकर प्रदर्शन करने वाले जूनियर डॉक्टरों को लगातार कानूनी और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

जिन डॉक्टरों ने विरोध का नेतृत्व किया, उनमें अनिकेत महतो, अशफाकउल्ला नैया, किंजल नंदा और देबाशीष हलदर प्रमुख नाम हैं। इन सभी को या तो दंडात्मक तरीके से दूर-दराज अस्पतालों में भेज दिया गया या फिर उन पर पुलिस एफआईआर, कोर्ट केस और जाँचों के जरिए दबाव डाला जा रहा है। डॉ अनिकेत महतो, अशफाकउल्ला नैया और देबाशीष हलदर को ऐसे समय में ट्रांसफर किया गया जब उन्हें मात्र तीन महीने पहले ही नई नियुक्तियाँ मिली थीं।

उन्होंने इस कार्रवाई को बदला बताया और इसके खिलाफ कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। सरकार का तर्क है कि यह ‘नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया’ है, लेकिन विरोध कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि यह साफ तौर पर उन्हें सबक सिखाने और आंदोलन दबाने की कोशिश है।

पुलिस ने कई डॉक्टरों को उस आंदोलन के सिलसिले में नोटिस भेजे हैं, जिसमें ‘अवैध जमावड़ा’, ‘पुलिस पर हमला’ जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें से कुछ डॉक्टरों के घरों पर छापे भी मारे गए।

उदाहरण के तौर पर, डॉ अशफाकउल्ला नैया के खिलाफ उनकी डिग्री को लेकर एक शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने उनके घर पर छापा मारा। डॉ किंजल नंदा से भी पूछताछ की जा रही है कि क्या उन्होंने फिल्मों में अभिनय करने से पहले संस्थान से अनुमति ली थी।

साथ ही उनके भत्तों और ड्यूटी घंटों की जानकारी भी माँगी गई है। डॉ अनिकेत महतो का कहना है कि वह अप्रैल से ड्यूटी से बाहर हैं और उन्हें वेतन भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने बताया कि मानसिक रूप से भी वे इस स्थिति से बहुत प्रभावित हुए हैं।

डॉक्टरों की प्रमुख माँगें जैसे कि हेल्थ वर्कर्स की सुरक्षा, केंद्रीय रेफरल प्रणाली और रिक्त पदों की भर्ती अब तक पूरी नहीं की गई हैं। डॉक्टरों को संदेह है कि इस केस में केवल संजय रॉय ही नहीं, बल्कि और भी लोग शामिल हो सकते हैं और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई है।

हालाँकि सियालदह की एक अदालत ने जनवरी 2025 में संजय रॉय को दोषी ठहराया था, लेकिन अब भी पुलिस जाँच की निष्पक्षता और राज्य सरकार के रवैये पर सवाल उठ रहे हैं। पीड़िता के माता-पिता और साथी डॉक्टर आज भी इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि प्रदर्शनकारियों को अपनी नौकरी और मानसिक स्वास्थ्य की कीमत चुकानी पड़ रही है।

इस बीच, आरजे कर रेप-मर्डर केस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बंगाल पुलिस ने लाठीचार्ज भी कर दिया है, जिसमें पीड़िता की माँ को भी नहीं छोड़ा गया। इस लाठीचार्ज में पीड़िता की माँ गंभीर रूप से घायल हो गई। इस प्रदर्शन में बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी, अग्निमित्रा पॉल और अन्य विधायक भी शामिल हुए, उन्हें भी पुलिस की हिंसा झेलनी पड़ी।

इस पूरी घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या किसी महिला डॉक्टर की सुरक्षा और उसके लिए न्याय की माँग करना इतना महँगा पड़ सकता है कि उसकी कीमत एक डॉक्टर को अपनी नौकरी, मानसिक शांति और पेशेवर पहचान से चुकानी पड़े?

BRS ने सत्ता में रहते 600+ के फोन टैप करवाए, चुनाव हारते ही 62 हार्ड डिस्क नष्ट करवाए: जानिए कैसे तेलंगाना में 1 घंटे के लिए CCTV बंद कर सबूत मिटाने की हुई कोशिश

तेलंगाना विधानसभा का चुनाव हारते ही KCR के नेतृत्व वाली BRS सरकार ने 62 हार्ड डिस्क नष्ट कर दिए थे। ये हार्ड डिस्क 600 से अधिक प्रभावशाली लोगों की जासूसी से जुड़े थे। इनमें कई नेता, पत्रकार और एक्टिविस्ट शामिल थे। बीआरएस सरकार ने इनके फोन टैप करवाए थे। लेकिन चुनाव हारते ही करीब 1 घंटे के लिए सीसीटीवी कैमरे बंद कर हार्ड डिस्क नष्ट करवा दिए।

तेलंगाना की विशेष खुफिया शाखा (SIB) के हैदराबाद स्थित दफ्तर में 4 दिसंबर 2023 की रात को यह घटना हुई। रात 8:34 बजे से लेकर 9:34 बजे तक पूरे एक घंटे के लिए SIB ऑफिस के CCTV कैमरे बंद कर दिए गए थे। जाँच में सामने आया है कि इसी एक घंटे के अंदर 62 हार्ड डिस्क नष्ट किए गए।

इन हार्ड डिस्क को काटा गया, उन्हें पीसकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदला गया और फिर उन्हें एक नदी में फेंक दिया गया। ये सब SIB ऑफिस के एक छोटे से कमरे में हुआ।  

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार हैदराबाद पुलिस की जाँच में सामने आया है कि इन हार्ड डिस्क में 600 से ज्यादा प्रभावशाली लोगों की फोन टैपिंग से जुड़ी जानकारी थी। कहा जा रहा है कि भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने अपने कार्यकाल के दौरान इन लोगों की फोन रिकॉर्डिंग करवाई थी।

​जो तकनीक नक्सलियों से लड़ने के लिए उससे राजनीतिक विरोधियों की जासूसी

यह मामला एक बड़े जाँच का हिस्सा है, जिसमें यह आरोप है कि 5 वरिष्ठ पुलिस-खुफिया अधिकारी और एक टीवी चैनल के संचालक ने मिलकर करीब 600 लोगों की अवैध निगरानी (जासूसी) की। यह निगरानी उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी BRS के फायदे के लिए की गई थी।

जिन लोगों की जासूसी की गई उनमें नेता, अफसर, व्यापारी और मौजूदा हाई कोर्ट के एक जज तक शामिल हैं। इनलोगों के परिजनों, ड्राइवर और दोस्तों के भी फोन टैप किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि यह निगरानी उन तकनीकी सिस्टम्स के जरिए की गई, जिन्हें असल में नक्सली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बनाया गया था। अब इस पूरे मामले की गहराई से जाँच चल रही है।

बीजेपी नेता ने दर्ज कराया बयान

जिन लोगों की निगरानी की गई उनमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और बीजेपी नेता बांदी संजय कुमार के होने की बात भी कही जा रही है। वे शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को हैदराबाद पुलिस के सामने पेश हुए। बयान दर्ज कराने के बाद उन्होंने दावा किया कि इस जासूसी मामले में करीब 6500 फोन टैप किए गए थे। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और BRS के कई विधायकों के फोन भी शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अलग टीम सिर्फ रेवंत रेड्डी और उनके करीबियों की निगरानी के लिए बनाई गई थी।

किसके आदेश पर नष्ट किए गए हार्ड डिस्क?

जाँचकर्ताओं का मानना है कि डिस्क को नष्ट करने का आदेश उस समय के SIB प्रमुख टी प्रभाकर राव ने दिया था। उन्होंने राज्य में कॉन्ग्रेस सरकार बनने के ठीक एक दिन बाद 4 दिसंबर 2023 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में राव ने दावा किया है कि डेटा नष्ट करने का फैसला 2 दिसंबर को ही ले लिया गया था। यह फैसला  एक समिति द्वारा लिया गया था। इस समिति में मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव और विधि सचिव शामिल थे।

डिस्क के अंदर क्या था?

पुलिस का कहना है कि नष्ट की गई ज्यादातर डिस्कों में ‘राजनीतिक खुफिया जानकारी’ थी। जिसमें नेताओं की निजी प्रोफाइल, फोन पर हुई बातचीत और ऑनलाइन चैट्स थे। हालाँकि कुछ डिस्क में CPI (माओवादी) से जुड़ी जानकारी भी थी, जिसे इकट्ठा करना SIB का काम होता है। जाँचकर्ताओं के मुताबिक, इन ड्राइव को नष्ट करने से कई दशकों की उपयोगी खुफिया जानकारी खत्म हो गई और यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है।

SOT के पास भी थे ​नष्ट किए गए डिस्क

62 डिस्कों में से 36 डिस्क एक स्पेशल ऑपरेशंस टीम (SOT) के कंट्रोल में थी, जो 2020 में SIB  के तहत बनाई गई थी। यह टीम नक्‍सल गतिविधियों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक जासूसी पर फोकस कर रही थी। इस टीम का नेतृत्व डीएसपी डी प्रनीत कुमार, जिन्हें प्रनीत राव के नाम से भी जाना जाता है, कर रहे थे। उन्हें इस मामले में बाद गिरफ्तार किया गया था, लेकिन अब वे जमानत पर बाहर हैं। प्रनीत राव के पास SIB दफ्तर में तीन अलग कमरे, 11 स्टाफ मेंबर, 17 डेस्कटॉप कंप्यूटर, दो लैपटॉप, अलग फोन लाइन और एक प्राइवेट इंटरनेट कनेक्शन की सुविधा थी।

किसके आदेश पर हुए फोन टैप?

जाँच में पता चला है कि SOT विभिन्न टेलीकॉम कंपनियों को चिट्ठी भेजकर फोन कॉल्स को इंटरसेप्ट (जासूसी के लिए सुनने) करने की अनुमति माँगता था। इस प्रक्रिया को ‘लीगल इंटरसेप्शन’ कहा जाता है। इसे प्रभाकर राव नाम के अधिकारी द्वारा मँजूरी दी जाती थी।

कानून के मुताबिक, ऐसे डेटा को हर छह महीने में नष्ट करना जरूरी होता है। लेकिन इस मामले में एक गवाह ने पुलिस को बताया कि डेटा नष्ट करने का आदेश एक महीने पहले ही आ गया। इस दौरान CCTV कैमरे भी बंद कर दिए गए, जबकि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी।

गौर करने वाली बात यह है कि किसी मशीन में खराबी आने पर भी टेक्नीशियन को SOT रूम के अंदर जाने की इजाजत नहीं होती थी। उन्हें मशीन बाहर ही लेकर मरम्मत करनी पड़ती थी।

एक निजी निगरानी कंपनी से सहायता

हैदराबाद की एक निजी कंपनी के साथ मिलकर SOT निगरानी कर रही थी। यह निगरानी कंपनी ऑनलाइन चैट्स, जैसे WhatsApp पर होने वाली बातचीत को इंटरसेप्ट करने में माहिर है। जाँचकर्ताओं के मुताबिक, इस कंपनी ने SOT को तीन खास तकनीकी टूल दिए।

पहला टूल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे X, Facebook, Instagram, YouTube और Snapchat से जानकारी निकालने के लिए था। दूसरा टूल नेटवर्क डेटा को डिक्रिप्ट यानी पढ़ने लायक बनाने के लिए इस्तेमाल होता है। वहीं तीसरे टूल की मदद से टारगेट किए गए मोबाइल फोनों से WhatsApp मैसेज पढ़े जा सकते हैं।

कैसे शुरू हुआ विरोधियों की निगरानी का खेल?

तेलंगाना में अवैध फोन टैपिंग और निगरानी की शुरुआत 2018-19 में हुई थी। लेकिन नवंबर 2023 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह बेहद तेज हो गया। 16 नवंबर से 30 नवंबर (चुनाव वाले दिन) तक, कम से कम 600 लोगों की जासूसी की गई। यह SIT की रिपोर्ट में सामने आया है।

जिन लोगों की निगरानी की गई, उनमें प्रमुख राजनीतिक नेता भी शामिल थे। उदाहरण के तौर पर तेलंगाना प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष महेश कुमार गौड़ और केंद्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार। इस मामले का खुलासा मार्च 2024 में तब हुआ जब SIB  के एक एडिशनल एसपी ने डीएसपी प्रनीत राव के खिलाफ FIR दर्ज कराई। उन पर गलत तरीके से जानकारी इकट्ठा करने का आरोप है।

बाद में पंजागुट्टा पुलिस ने इस मामले में 6 लोगों को आरोपित बनाया। इनमें पूर्व SIB प्रमुख टी प्रभाकर राव, डीएसपी प्रनीत राव, एएसपी एम तिरुपथन्ना, एन भुजंगा राव, पूर्व डीसीपी टी राधा किशन राव, टीवी चैनल मालिक एन श्रवण कुमार शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रभाकर राव को अगस्त तक गिरफ्तारी से छूट दी है। बाकी आरोपितों को पहले गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में उन्हें जमानत मिल गई। एन श्रवण कुमार अभी भी चंचलगुड़ा जेल में हैं। हालाँकि उन्हें फोन टैपिंग केस में अंतरिम राहत मिल चुकी है।

जाँच अधिकारियों के मुताबिक, इस निगरानी के लिए भारतीय टेलीग्राफ नियमों की धारा 419(A) का गलत इस्तेमाल किया गया। यह नियम केवल उच्च सरकारी अधिकारियों या आपात स्थिति में विशेष रूप से अधिकृत अधिकारियों को फोन इंटरसेप्ट करने की अनुमति देता है। लेकिन इस मामले में इसे तोड़-मरोड़कर ऐसे लोगों की जासूसी की गई जिनका नक्सलवाद या किसी सुरक्षा खतरे से कोई लेना-देना नहीं था। यानी यह सब राजनीतिक फायदे के लिए किया गया।