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‘राम राज्य’ का बनाया मजाक, माहौल बिगाड़ने का किया काम: असम में यूट्यूबर अभिसार शर्मा के खिलाफ FIR, देशद्रोह की भी धारा लगी

गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पत्रकार और यूट्यूबर अभिसार शर्मा के खिलाफ एक FIR दर्ज की है। यह FIR उनके एक यूट्यूब वीडियो के कारण दर्ज की गई है। शिकायत में कहा गया है कि अभिसार शर्मा ने अपने वीडियो में असम और केंद्र सरकार का मजाक उड़ाया है।

FIR में आरोप लगाया गया है कि उनका वीडियो सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काता है। पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धाराओं 152 (राजद्रोह), 196 और 197 के तहत दर्ज किया है।

शिकायत किसने और क्यों की?

यह शिकायत गुवाहाटी के रहने वाले आलोक बरुआ नाम के 23 वर्षीय व्यक्ति ने दर्ज कराई है। शिकायत में बताया गया कि अभिसार शर्मा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने ‘राम राज्य’ के सिद्धांत का मजाक भी उड़ाया।

शिकायत में यह भी बताया गया है कि अभिसार शर्मा ने कहा कि सरकार ‘सिर्फ हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण’ पर टिकी है। शिकायतकर्ता का मानना है कि ये टिप्पणियाँ जानबूझकर सरकारों को बदनाम करने और लोगों में नफरत फैलाने के लिए की गई हैं।

शिकायतकर्ता के अनुसार, अभिसार शर्मा की टिप्पणियाँ समाज में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का काम सकती हैं। इसके अलावा अभिसार शर्मा का वीडियो उनके इलाके में भी चर्चा का विषय बन गया है, जिससे लोग चिंतित हैं।

आगे क्या होगा?

पुलिस का कहना है कि ये आरोप BNS के उन प्रावधानों के तहत आते हैं जो भारत की संप्रभुता और एकता को खतरे में डालते हैं। साथ ही, ये आरोप विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ काम करने से जुड़े हैं।

इस मामले की जाँच अब गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच के हाथ में हैं। पुलिस सभी पहलुओं की जाँच करेगी कि क्या वीडियो में की गई टिप्पणियाँ वास्तव में कानून का उल्लंघन करती हैं या नहीं।

असम में घुसपैठ पर सीएम हिमंता का बड़ा वार, 18 वर्ष से ऊपर के लोग अब नहीं बनवा पाएँगे आधार कार्ड: सिर्फ SC-ST-चाय फर्म में काम करने वालों को छूट

असम में घुपैठियों से निपटने के लिए सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। असम सरकार ने फैसला किया है कि 18 साल से अधिक उम्र के लोगों का अब आधार कार्ड नहीं बनाया जाएगा। हालाँकि, इससे कुछ समुदायों को कुछ समय के लिए छूट दी गई है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने गुरुवार (21 अगस्त 2025) को मंत्रिमंडल की बैठक के बाद बताया कि यह फैसला अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को आधार कार्ड मिलने से रोकने के लिए लिया गया है। यह निर्णय अक्टूबर के पहले सप्ताह से लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी का आधार कार्ड नहीं है तो वह सितंबर के महीने में इसके लिए आवेदन कर सकता है। वहीं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और चाय बागान समुदाय से जुड़े लोग अगले एक वर्ष तक आधार कार्ड बनवा सकेंगे।

103% हुआ आधार सैचुरेशन: CM हिमंता

सीएम हिमंता ने बताया है कि राज्य में आधार सैचुरेशन 103% हो गया है, जिसका मतलब है कि कोई भी 18 वर्ष से ऊपर का व्यक्ति बिना आधार कार्ड के नहीं बचा है। आधार सैचुरेशन 103% होने का मतलब है कि अगर 100 लोगों की जनसंख्या है तो 103 आधार कार्ड जारी कर दिए गए हैं। इसमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी आधार कार्ड दिए जाने की आशंका है।

उन्होंने कहा, “SC, ST और चाय बागान समुदायों को इससे छूट दी गई है क्योंकि उनके बीच आधार का सैचुरेशन 96% है यानी 4% लोगों को अभी भी कवर किया जाना बाकी है।”

हिमंता ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई भी (अवैध विदेशी) असम में प्रवेश करके आधार कार्ड प्राप्त न कर सके और भारतीय नागरिक होने का दावा न कर सके। हमने वह रास्ता पूरी तरह से बंद कर दिया है।”

रेयर केस में DC जारी करेंगे आधार कार्ड: CM

हिमंता ने स्पष्ट कर दिया है कि दुर्लभतम मामलों में जिला आयुक्त (DC) को आधार कार्ड जारी करने का अधिकार होगा। उन्होंने कहा, “एक महीन के बाद SDC या सर्किल ऑफिसर आधार कार्ड जारी नहीं कर पाएँगे। केवल DC के पास यह अधिकार होगा।”

उन्होंने कहा कि आधार कार्ड जारी करने से पहले DC को SB (स्पेशल ब्रांच) रिपोर्ट और विदेशी न्यायाधिकरण की रिपोर्ट की जांच करनी होगी।

असम में बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। घुसपैठिए स्थानीय लोगों की मदद से आधार कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लेते हैं और फिर उनका इस्तेमाल कर अन्य कागजात भी उन्हें मिल जाते हैं। सीएम हिमंता के इस फैसले के बाद अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए असम में आधार कार्ड हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

असम में तेजी से बदल रही डेमोग्राफी, 2041 तक बराबर होंगे हिंदू-मुस्लिम

हिमंता ने पिछले महीने बताया था कि राज्य में 2041 तक मुस्लिम जनसंख्या हिंदुओं के बराबर हो जाएगी। सीएम सरमा ने बताया था कि 2011 में असम की कुल जनसंख्या 3.12 करोड़ थी, जिसमें मुस्लिम जनसंख्या 1.07 करोड़ (लगभग 34.22%) और हिंदू जनसंख्या 1.92 करोड़ (लगभग 61.47%) थी।

उन्होंने कहा था कि असम में रहने वाले महज 3% मुस्लिम ही असमिया मूल के हैं जबकि 31% मुस्लिम आबादी घुसपैठिए हैं जो मुख्यतः बांग्लादेश से आए हैं। उन्होंने इस बात की भी आशंका जताई कि अगर इसी तरह चलता रहा तो 2021, 2031 और 2041 तक असम की जनसंख्या में 50 फीसदी तबका मुस्लिम होगा और हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक बन जाएगा।

हिमंता ने बताया था कि 2001 में असम के 23 जिलों में से 6 मुस्लिम बहुल थे। इनमें धुबरी (74.29), गोलपारा (53.71), बारपेटा (59.37), नगांव (51), करीमगंज (52.3) और हैलाकांडी (57.63) थी। 2011 में जिलों की संख्या 27 हुई और इनमें 9 जिले मुस्लिम बहुल हो गए।

सीएम सरमा ने जनसांख्यिकीय बदलाव पर कहा कि ये सिर्फ ‘भूमि जिहाद’ ही नहीं बल्कि असम को खत्म करने वाला जिहाद है। योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम आबादी सरकारी और जंगलों की जमीन पर भी कब्जा कर रही है। इसके कारण असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान खतरे में पड़ गई है। अगर यही प्रवृत्ति जारी रही तो अगले 20 वर्षों में असम के मूल निवासी अल्पसंख्यक बन सकते हैं।

असम में 4 साल में घुसपैठियों से छुड़ाई गई 1.29 लाख बीघा जमीन

असम में घुसपैठ से निपटने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। जिनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानकर वापस उनके देश भेजना और घुसपैठियों द्वारा जबरन कब्जाई गई जमीन को खाली कराना जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।

हिमंता ने बीते महीने ही बताया था कि असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिकों’ का कब्जा है। उन्होंने कहा था, “2021 में जमीन खाली कराने की योजना शुरू की गई थी जिसके तहत अब तक 77,420 बीघा जमीन को अतिक्रमण से साफ कर दिया गया है। इसमें अधिकतर बंगाल के मुस्लिमों का कब्जा था।”

हिमंता ने कहा था, “दरंग जिले में अभियान की सफलता के बाद बोरसोल्ला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बतद्रा, चापर और पैकन में भी इस अभियान को चलाया गया। पिछले 4 वर्षों में हमने 1.29 लाख बीघा कब्जे वाली जमीन को मुक्त कराया है। अब इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा जंगल बनाने के लिए और प्रदेश की जनता के लिए उपयोग में लाया जा रहा है।”

बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए असम का रुख करते हैं। सीएम हिमंता ने इस बात को बार-बार दोहराया है कि वे बांग्लादेशी घुसपैठियों से असम को मुक्त करना चाहते हैं और इसके लिए वो लगातार अभियान भी चला रहे हैं।

टैरिफ विवाद के बीच ट्रंप की नई चाल? यूएस एंबेसी ने नकारी ‘भारत में मतदान के लिए ₹175 करोड़ देने की बात’

टैरिफ विवाद के बीच भारत पर अलग ढंग से व्यापार का दबाव बनाने के लिए ट्रंप ने नया दांंव चला है। पहले जहाँ खबर आई थी कि ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी एजेंसी USAID ने भारत में मतदान बढ़ाने के लिए 175 करोड़ रुपये दिए। लेकिन नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

अमेरिकी दूतावास ने भारत के विदेश मंत्रालय को बताया कि 2014 से 2024 तक USAID ने भारत में चुनाव या मतदान से जुड़ा कोई काम नहीं किया और न ही ऐसी कोई रकम दी या ली और न ही भारत में मतदान से जुड़ी कोई गतिविधि की।

फरवरी 2025 में विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी विभाग DOGE (Department of Government Efficiency) की एक समीक्षा का हवाला देते हुए दावा किया कि USAID दुनिया भर में चुनाव और मतदाता संबंधी परियोजनाओं को फंड कर रहा है।

ट्रंप ने खास तौर पर कहा कि भारत को भी इसमें शामिल किया गया था और 2.1 करोड़ डॉलर (174.3 करोड़ रुपए) मतदाता संख्या बढ़ाने के लिए रखे गए थे। इस दावे से नई दिल्ली में तुरंत चिंता बढ़ी और भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने अमेरिका से पूरे मामले की विस्तृत जानकारी माँगी।

28 फरवरी 2025 को विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से पिछले दस सालों में भारत में चलाए गए सभी USAID कार्यक्रमों की पूरी जानकारी देने को कहा। मंत्रालय ने खर्च का विवरण, सहयोगी संगठनों की जानकारी और यह भी पूछा कि क्या किसी तरह की मतदाता जुटाने से जुड़ी गतिविधियाँ हुई थीं।

इस पर अमेरिकी दूतावास ने 2 जुलाई 2025 को जवाब देते हुए आंकड़े सौंपे। दूतावास ने साफ किया कि सभी कार्यक्रम केवल भारत सरकार के साथ किए गए सात साझेदारी समझौतों के तहत ही चलाए गए हैं। ये कार्यक्रम मुख्य रूप से विकास सहयोग, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और शासन सुधार से जुड़े थे, न कि मतदान या चुनाव से।

अमेरिकी दूतावास ने साफ कहा कि USAID भारत ने 2014 से 2024 के बीच भारत में मतदान के लिए न तो 21 मिलियन डॉलर (175 करोड़ रुपए) लिए और न ही दिए और न ही कोई मतदान संबंधी गतिविधि चलाई।

29 जुलाई 2025 को दूतावास ने एक और पत्र भेजकर इस रुख को दोहराया और विदेश मंत्रालय को बताया कि बाइडेन प्रशासन के फैसले के बाद भारत में USAID के सभी काम 15 अगस्त 2025 तक बंद हो जाएँगे।

इसके बाद 11 अगस्त 2025 को दूतावास ने आर्थिक मामलों के विभाग को लिखे पत्र में पुष्टि की कि भारत के साथ किए गए सभी सात साझेदारी समझौते समाप्त कर दिए गए हैं। यह बयान ट्रंप के उन आरोपों के बीच अहम है, जिनमें उन्होंने अमेरिकी विदेशी सहायता के राजनीतिक इस्तेमाल की बात कही थी। ट्रंप के दावे जनवरी 2025 के कार्यकारी आदेश 14169 के बाद सामने आए थे, जिसके तहत विदेशी सहायता कार्यक्रमों की बड़ी समीक्षा शुरू की गई थी।

हालाँकि DOGE ने दुनिया भर में चुनाव और राजनीतिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने वाली CEPPS परियोजनाओं के लिए USAID द्वारा दिए गए 486 मिलियन डॉलर(4,033.8 करोड़ रुपए) के फंड को रद्द करने का ऐलान किया था, लेकिन नई दिल्ली स्थित दूतावास ने साफ कर दिया कि भारत को इसमें से कुछ भी नहीं मिला।

इसके साथ ही दूतावास ने 2022, 2023 और 2024 के लिए कार्यक्रमों और लाभार्थियों का पूरा ब्यौरा भी जारी किया। अधिकारियों ने फिर जोर देकर कहा कि भारत में USAID की सारी गतिविधियाँ विकास से जुड़ी और पारदर्शी हैं और उनका चुनाव या राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

अमेरिकी दूतावास ने यह भी बताया कि 15 अगस्त 2025 तक USAID के सारे काम भारत में बंद हो चुके हैं। ट्रंप का दावा गलत साबित होने से उनकी विश्वसनीयता पर फिर सवाल उठे हैं।

जैश-ए-मोहम्मद का ‘डिजिटल हवाला’: 300+ मरकज बनाने के लिए 390 करोड़ रुपए जुटा रहा आतंकी मसूद अजहर, FATF से बचने के लिए डिजिटल वॉलेट्स का कर रहा इस्तेमाल

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान में कई आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इनमें आतंकी मसूद अजहर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकाने भी शामिल थे। अब मसूद अजहर ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के साथ मिलकर फिर से आतंकी ठिकाने को खड़ा करने का प्लान बनाया है। इसके लिए 3.9 बिलियन (390 करोड़) पाकिस्तानी रुपए इकट्ठा करने का योजना नहीं है।

इस बार इन आतंकियों और उनके आकाओं ने अतंरराष्ट्रीय एजेंसियों की पकड़ में आने से बचने के लिए पैसे इकट्ठा करने का नया तरीका ईजाद किया है। आतंकी इस बार किसी बैंक खाते में नहीं बल्कि डिजिटल वॉलेट में पैसा जुटा रहे हैं।

FATF जैसी संस्थाओं से बचने के लिए जैश की चाल

पाकिस्तान आतंकियों की फंडिंग के लिए दुनिया भर में कुख्यात है। इसके चलते वह लंबे समय तक फाइनेंशियल एक्शन टाक्स फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में था। इससे बचने के लिए पाकिस्तान ने जो योजना पेश की उसमें जैश-ए-मोहम्मद पर लगाम लगाना शामिल था। पाकिस्तान ने दावा किया कि वह आतंकियों को पैसे नहीं देता है और इसके लिए उसने मसूद अजहर, उसके भाई रऊफ असगर और उसके सबसे छोटे भाई तल्हा अल सैफ के बैंक खातों पर निगरानी रखने की बात कही थी।

पाकिस्तान को इन चालों के जरिए 2022 में FATF की ग्रे लिस्ट से निकलने में तो सफलता मिली लेकिन उसकी चालें कम-से-कम भारत से छिपी नहीं थीं। जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन पाकिस्तान में खूब फलते फूलते रहे और आतंक का कारोबार बिल्कुल धीमा नहीं हुआ। आतंकियों को अपना खर्च चलाने के लिए पैसे की जरूरत थी और बैंक खातों की निगरानी के चलते यह काम मुश्किल होता जा रहा था। इसके लिए अब EasyPaisa और SadaPay जैसे पाकिस्तानी डिजिटल वॉलेट्स का सहारा लिया गया है।

भारत के डर से 313 नए कैंप बनाएगा जैश

ISI और जैश अब मस्जिदों और मरकजों के निर्माण के नाम पर 3.9 बिलियन पाकिस्तानी रुपए इकट्ठा करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे ही मरकजों का इस्तेमाल आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा किया करता था। भारत की एजेंसियों का मानना है कि इस पैसे के बड़े हिस्से का इस्तेमाल आतंकियों के पालन-पोषण और आतंक के लिए हथियार खरीदने में किया जाता है।

जैश का लक्ष्य है कि वह इस पैसे के जरिए 313 नए कैंप खोल दे। सैकड़ों की तादाद में नए कैंप खोलने का मकसद भारत का डर भी है। जिस तरह ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने जैश के ठिकानों को उड़ाया है, ऐसे में वो भारत को कन्फ्यूज करने के लिए बड़ी संख्या में नए कैंप खोल रहा है।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में जैश के हेड क्वॉर्टर मरकज सुभानअल्लाह को भी उड़ा दिया गया था। साथ ही, जैश के 4 अन्य ट्रेनिंग कैप मरकज बिलाल, मरकज अब्बास, महमोना जोया और सरगल भी नष्ट कर दिए गए थे। भारत के इस ऑपरेशन में 100 से अधिक आंतकी मारे गए थे।

जैश के 5 डिजिटल वॉलेट मिले

यह पैसा आतंकी के मसूद अजहर के परिवार के सदस्यों के नाम पर बने डिजिटल वॉलेट के जरिए इकट्ठा किया जा रहा था। बैंकों के जरिए लेन-देन ना होने पर पाकिस्तान यह कहकर अपनी जान छुड़ा सकता था कि जैश को मिलने वाले धन में कटौती हो गई है जबकि असल में भारी संख्या में पैसा आतंकियों के पास पहुँच रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 5 ऐसे वॉलेट मिले हैं जिनका जैश से सीधा संबंध है। आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, एक SadaPay खाता मसूद अजहर के भाई तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर था, जो पाकिस्तानी मोबाइल नंबर +92 3025xxxx56 से जुड़ा था। यह नंबर जैश के हरिपुर जिला कमांडर अफताब अहमद के नाम पर रजिस्टर्ड था।

मसूद अजहर के बेटे अब्दुल्ला अजहर के मोबाइल नंबर +92 33xxxx4937 से भी एक EasyPaisa वॉलेट जुड़ा हआ था। वहीं, गाजा में मदद के नाम पर भी एक वॉलेट चलाया जा रहा था। यह वॉलेट +92xxxx195206 नंबर से चलाया जा रहा था और खालिद अहमद के नाम पर थाष हालाँकि, मसूद अजहर का बेटा हम्माद अजहर इसे संचालित कर रहा था।

मस्जिदों में चल रहा डोनेशन का अभियान

ऑनलाइन पैसा लेने के अलावा जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी जुमे की नमाज के दौरान भी मस्जिदों से पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। इन्हें इस तरह दिखाया जाता है कि इस पैसे का इस्तेमाल गाजा में मदद के लिए किया जाएगा लेकिन असल में इस पैसे को जैश अपने आतंकी इरादों को पूरा करने के लिए ही जुटा रहा था। जैश के कमांडर वसीम चौहान (उर्फ वसीम खान) का एक वीडियो भी सामने आया था जिसमें वह एक जुमे की नमाज के बाद इकट्ठा हुए पैसे को गिन रहा था।

मसूद अजहर और उसके करीबियों द्वारा चलाया जाने वाला एक ट्रस्ट ‘अल-रहमत’ भी आतंकी फंडिग के इस अभियान में एक अहम कड़ी बन गया है। यह ट्रस्ट गुलाम मुर्तजा के नाम से संचालित नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान के एक खाते (खाता नंबर 105XX9) के जरिए धन इकट्ठा कर रहा था। यह ट्रस्ट हर साल जैश के फंड में करीब 100 करोड़ पाकिस्तान रुपए का योगदान देता है।

सोशल मीडिया से विदेश तक पैसों की माँग कर रहा जैश

खुफिया एजेंसियों को मिली ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, जैश ने अपने सक्रिय गुर्गों और प्रॉक्सी नेटवर्क को पूरी तरह से एक्टिव कर दिया है और अब फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए भी धन उगाही की योजना बनाई गई है।

जानकारी के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स पर जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े प्रॉक्सी अकाउंट्स और सीधे इसके कमांडरों द्वारा संचालित अकाउंट्स से लगातार पोस्टर, उकसाने वाले वीडियो और यहां तक कि मसूद अजहर द्वारा लिखी गई चिट्ठी भी शेयर की जा रही है।

इन पोस्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि जैश-ए-मोहम्मद 313 मरकज का निर्माण कर रहा है। ऐसे हर मरकज के लिए 12.5 मिलियन पाकिस्तानी रुपए की जरूरत बताई है। यह फंड रेजिंग केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। जैश-ए-मोहम्मद ने विदेशों में बसे पाकिस्तानी नागरिकों से भी पैसे देने की माँग की है। जाहिर है कि इस रकम का इस्तेमाल आतंकियों की ट्रेनिंग, हथियारों की सप्लाई और नेटवर्क फैलाने पर ही खर्च किया जाएगा।

डिजिटल वॉलेट्स के जाल का कैसे फायदा उठा रहा जैश?

इकोनॉमिक टाइम्स रिपोर्ट के मुताबिक, जैश जिन EasyPaisa और SadaPay जैसे डिजिटल वॉलेट्स का इस्तेमाल कर रहा है, ये वॉलेट्स परंपरागत बैंकिंग से अलग वॉलेट-टू-वॉलेट व वॉलेट-टू-कैश ट्रांसफर की सुविधा देते हैं। इसी कारण FATF जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए इन पर नजर रखना मुश्किल होता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मसूद अजहर का परिवार एक समय में 7 से 8 वॉलेट्स ऑपरेट करता है और हर 4 महीने बाद उन्हें बदल देता है। जब किसी वॉलेट में बड़ी रकम इकट्ठी हो जाती है तो उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर नकद निकाल लिया जाता है। बताया जा रहा है कि हर महीने करीब 30 नए वॉलेट्स खोले जाते हैं।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अमित दूबे का कहना है कि ये डिजिटल वॉलेट्स ‘डिजिटल हवाला‘ की तरह काम करते हैं, जो बिना बैंकिंग नेटवर्क के पैसों का लेनदेन संभव बनाते हैं। यही कारण है कि जैश का यह नेटवर्क जांच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं की पकड़ से बच निकलता है।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मौजूदा वक्त में जैश के वित्तीय लेनदेन इन वॉलेट्स के जरिए किए जानते हैं जो करीब 80-90 करोड़ पाकिस्तानी रुपए है। इस पैसे का इस्तेमाल हथियार खरीदने, ट्रेनिंग कैंप चलाने, अजहर के परिवार की मदद के लिए और लग्जरी कारों के लिए होता है। बताया जाता है कि इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा अरब देशों से आता है।

‘बहुत बड़ा सेक्स रैकेट चल रहा है यहाँ’: वायरल वीडियो में नंगा दिखने वाला रामपुर की मस्जिद का इमाम हथियारों के साथ गिरफ्तार, धर्म परिवर्तन की करा रहा था कोशिश

रामपुर की एक मस्जिद में सेक्स रैकेट चलाने का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की है और आरोपित इमाम रहीस अहमद को गिरफ्तार किया है। रामपुर पुलिस ने रहीस अहमद के पास से हथियार भी बरामद किए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेके पैसेल रोड की नदराबाग मस्जिद से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था, जिसमें एक लड़की इमाम पर सेक्स रैकेट चलाने के गंभीर आरोप लगा रही थी। वायरल वीडियो में लड़की की आवाज भी सुनी जा सकती है, जिसमें वो साफ तौर पर आरोप लगा रही है। इसके बाद रामपुर पुलिस हरकत में आई और जाँच शुरू की। 20 अगस्त 2025 को वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की।

क्षेत्राधिकारी नगर की अगुआई में एक टीम बनाई गई, जो मस्जिद में जाकर जाँच करने लगी। गहन जाँच के बाद 21 अगस्त 2025 को पुलिस ने रहीस अहमद को गिरफ्तार किया। रहीस अहमद शफी अहमद का बेटा है और परचई कुम्हरिया, अजीमनगर का रहने वाला है। गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से 2 तमंचे 12 बोर, 4 जिंदा कारतूस और एक मोबाइल बरामद हुआ।

पुलिस ने बताया कि रहीस अहमद पर धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश और अश्लील वीडियो वायरल करने का आरोप है।

इस मामले में कई और लोगों के शामिल होने की बात सामने आ रही है, लेकिन अभी उनकी पहचान छिपाई गई है। रामपुर पुलिस ने बताया कि कार्रवाई जारी है और जल्द ही बाकी आरोपितों को भी पकड़ा जाएगा। स्थानीय लोग इस घटना से काफी नाराज हैं और पुलिस से सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल- बिल पर कुंडली मारकर बैठ जाएँ गवर्नर तो क्या करें? केंद्र का जवाब- इसका समाधान राजनीतिक ही, तय नहीं कर सकते डेडलाइन

सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के विधेयकों पर फैसला लेने के लिए डेडलाइन लागू करने के मामले पर सुनवाई चल रही है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले की सुनावई कर रही है। गुरुवार (21 अगस्त) को तीसरे दिन भी इस मामले पर सुनवाई जारी रही जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विधेयकों से जुड़ी दिक्कतों के न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने की बात कही है।

यह मामला तमिलनाडु से शुरू हुआ था जहाँ राज्यपाल के बिल रोककर रखने पर राज्य सरकार ने अदालत का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा था कि राज्यपाल के पास पॉकेट वीटो नहीं है। इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रपति को भी राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत ने 14 सवाल पूछे थे जिस पर यह पीठ विचार कर रही है।

बिलों की दिक्कतों के राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे: सरकार

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा था कि अगर राज्यपाल बिलों को अनुमति देने में देरी कर रहे हैं तो इससे निपटने का उपाय क्या हो सकता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि अगर राज्यपाल ऐसा करते भी हैं तो राज्यों को न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे।

तुषार मेहता ने कहा है, “अगर कोई राज्यपाल विधेयकों में देरी कर रहा है तो राजनीतिक समाधान हो सकते हैं। ऐसे समाधान हो भी रहे हैं और हर बार राज्य को सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत नहीं होती। मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलकर बात करते हैं, कभी राष्ट्रपति से जाकर मिलते हैं। कई बार नेताओं का दल जाकर कहता है कि ये बिल अटके पड़े हैं, राज्यपाल से इस पर कार्रवाई करने के लिए कहें। कई बार फोन पर ही बात करके मामला सुलझा लिया जाता है। कभी-कभी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यपाल की बैठक होती है और रोकटोक दूर हो जाती है।”

उन्होंने कहा, “अब सवाल ये है कि क्या अदालत कोई तय समय-सीमा तय कर सकती है? संविधान में जब कोई समय-सीमा दी ही नहीं है। ये दिक्कत कई दशकों से हर राज्य में कभी-न-कभी सामने आती रही हैं। जब नेता समझदारी और राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हैं, तो आपस में बैठकर ही हल निकाल लेते हैं। यही असली समाधान है। देश की हर समस्या का समाधान यहाँ (सुप्रीम कोर्ट) नहीं हो सकता। कुछ समस्याएँ ऐसी भी हैं जिनका समाधान आपको सिस्टम में ही मिल जाएगा।”

कानून की व्याख्या में खुद से कुछ नहीं जोड़ सकता SC: सॉलिसिटर

CJI गवई ने कहा कि अगर कुछ चीज गलत है तो उसका समाधान भी होना चाहिए। इस पर मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सभी समस्याओं के लिए समाधान नहीं हो सकता है। कोर्ट ने जब कहा कि ‘कानून की व्याख्या’ न्यायालय द्वारा की जानी चाहिए तो इस पर मेहता ने कहा कि व्याख्या के दौरान संविधान में शब्द जोड़ना बिल्कुल अलग बात है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हम डेडलाइन नहीं तय कर सकते हैं तो ऐसे मामलों का समाधान क्या होना चाहिए। मेहता ने कहा, “आपकी आपत्ति समय-सीमा तय करने के औचित्य पर है लेकिन इससे अदालत को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह खुद समय-सीमा तय करे। कभी–कभार 1-2 राज्यों से ऐसे मामले आते हैं। अगर यही समस्या है तो उसका हल संसद के पास है। सुप्रीम कोर्ट संसद से अनुरोध कर सकता है लेकिन आप सीधे संसद को आदेश नहीं देते। एक संवैधानिक संस्था दूसरी संवैधानिक संस्था को आदेश नहीं देती, यही संवैधानिक मर्यादा है।”

संविधान में 31 जगहों पर है समय-सीमा: मेहता

मेहता ने कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगह ऐसी हैं जहाँ समय-सीमा स्पष्ट रूप से लिखी गई है, क्योंकि संविधान निर्माताओं ने माना कि कुछ काम समयबद्ध तरीके से होने चाहिए। जहाँ समय-सीमा नहीं दी गई, वहाँ यह जान-बूझकर छोड़ा गया है। उन्होंने कहा, “संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर तय किया था कि कुछ कार्यों में समय-सीमा होनी चाहिए और कुछ में नहीं।”

संविधान का कोई अंग ऊपर नहीं: मेहता

मेहता ने तर्क दिया कि राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 200 या 201 के तहत लिया गया फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह मूल रूप से विधायी काम है। उन्होंने कहा, “सहमति की शक्ति एक विधायी कार्य है और चूँकि राज्यपाल/राष्ट्रपति भी संविधान के समान स्तर के संवैधानिक अंग हैं, इसलिए इसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।” मेहता ने कहा कि भारत में संवैधानिक सर्वोच्चता का सिद्धांत लागू होता है और संविधान का कोई भी अंग यह दावा नहीं कर सकता कि वही सबसे ऊपर है।

न्यायिक आतंकवाद ना बने न्यायिक सक्रियता: CJI

CJI गवई ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलनी चाहिए। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि हमें निर्वाचित लोगों को कभी कमतर नहीं आँकना चाहिए। इस पर CJI ने कहा, “हमने निर्वाचित लोगों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद या न्यायिक दुस्साहस नहीं बननी चाहिए।”

मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते हैं। अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हैं। अब मतदाता जागरूक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता है।

बत्तख-हंस छोड़ सूअर खाने लगे चीनी, पंखों का पड़ा अकाल: ‘स्वाद’ में बदलाव से खतरे में बैडमिंटन का खेल, सिंथेटिक ‘चिड़िया’ से खिलाड़ियों का बिगड़ा जायका

बैडमिंटन की चिड़िया या चिड़ी, जो खेल का सबसे जरूरी हिस्सा होती है, वह अब ‘दुर्लभ’ होने की कगार पर पहुँच रही है। हम बात कर रहे हैं शटलकॉक की, जिसका निर्यात मुख्य रूप से चीन से होता है। बीते कुछ वर्षों से चीन में बदल रही खानपान की आदतों से बैडमिंटन की शटलकॉक खतरे में पड़ गई है। एक ओर चीनी लोगों की खाने की डिशेज बदल रही हैं तो वहीं उसके कारण वैश्विक स्तर पर बैडमिंटन के खिलाड़ियों को परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। आइए जानते हैं क्या है ये पूरा मसला।

शटल कैसे बनती है?

बैडमिंटन की शटल (shuttlecock) आमतौर पर बत्तख (duck) या हंस (goose) के पंखों से बनाई जाती है। एक अच्छी गुणवत्ता वाली शटल में लगभग 16 पंख लगते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले मैचों में हंस के पंखों से बनी शटल को प्राथमिकता दी जाती है। असल में ये पंख चीन जैसे देशों से निर्यात किया जाता है क्योंकिइन पक्षियों का वहाँ पालन बड़े पैमाने पर होता है।

चीन में खानपान में कैसे हो रहा बदलाव

हाल के वर्षों में चीन में लोगों की खाने की पसंद तेजी से बदली है। जहाँ पहले चीन के लोगों को बत्तख और हंस का मांस काफी पसंद था तो वहीं अब ये जगह सूअर (pork) के मांस ने ले ली है। बीते कई वर्षों से बत्तख खाने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। लोग पोर्क की माँग अधिक करने लगे हैं।

हंस और बत्तख की माँग कम होने से किसान भी बत्तख और हंस को पालना कम कर रहे हैं। इसके चलते इन पक्षियों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है।

शटल के उत्पादन पर असर

बत्तख और हंस की संख्या में कमी आने से उनके पंख भी कम मिलते हैं। यही पंख शटल बनाने में इस्तेमाल होते हैं। नतीजा यह हुआ कि शटल की सप्लाई में भारी कमी आ गई है और कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। भारत ही नहीं, फ्रांस, डेनमार्क, इंडोनेशिया और अन्य यूरोपीय देशों में भी बैडमिंटन अकादमियों को शटल की कमी झेलनी पड़ रही है।

भारत में शटल की कीमतों में काफी इजाफा देखा जा रहा है। ये कीमतें ₹12,00 से ₹3,000 प्रति शटल पहुँच गई हैं। गोपीचंद अकादमी में तो दो हफ्ते से भी कम का स्टॉक बचा था। वहीं, छोटे स्तर की अकादमी और खिलाड़ियों को इससे भी अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या हो सकते हैं संभावित समाधान

शटल की कमी के संकट को देखते हुए बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (BWF) अब प्लास्टिक या सिंथेटिक शटल पर एक बार फिर विचार कर रही है। फ्रांस के बैडमिंटन संघ जूनियर स्तर की प्रतियोगिताओं में वैकल्पिक शटल इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं।

फ्रांस के अलावा डेनमार्क जैसे कई यूरोपीय देशों में राष्ट्रीय संघों को उच्च गुणवत्ता वाली शटल प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। इसके साथ ही शटल की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर कई समस्याएँ सामने आ रही हैं।

इसके अलावा इंडोनेशिया में शटल की आपूर्ति में कमी के कारण कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है।

कृत्रिम शटल में भी हैं कई चुनौतियाँ

इस समस्या से निपटने के लिए कुछ कंपनियाँ हाइब्रिड शटल बना रही हैं। ये आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से कृत्रिम होती हैं। फिलहाल ये शटल बाजार में अभी महँगी हैं और खेल में उतनी टिकाऊ नहीं हैं जितनी कि पारंपरिक शटल होती हैं।

कृत्रिम शटल अपनी दिशा काफी जल्दी बदल लेती हैं। ऐसे में खिलाड़ियों के लिए उनकी गति और दिशा पर काबू पाना मुश्किल होता है। इसके अलावा ये तेज स्मैश या हिट पर जल्दी टूट जाती हैं। इससे मैच को जारी रखने में काफी मुश्किल होती है।

इसके साथ साथ पारंपरिक शटल का फील कृत्रिम शटल नहीं दे पाती। रैकेट से टकराने के बाद खिलाड़ियों को स्पिन देने में परेशानी आती है।

फिलहाल बैडमिंटन के शटलकॉक के लिए कई समाधान खोजे जा रहे हैं। इसे लेकर उत्पादकता को बढ़ाने और पारंपरिक शटल की कमी को पूरा करने की जद्दोजहद जितनी जल्दी खत्म होगी, खेल जगत के लिए ये उतना ही बेहतर होगा।

जहाँ एक ओर शटल की कमी हो रही है वहीं दूसरी ओर बैडमिंटन के खेल में खिलाड़ियों की संख्या में भी तेजी से इजाफा होता जा रहा है। ऐसे में खिलाड़ियों के मनोबल के लिए ‘चिड़िया’ की अनुपलब्धता उनके हौसले को डिगाने का काम कर सकती है।

दावा- बनासकांठा के एक गाँव में पहली बार सैलून में दलित का कटा बाल, हकीकत- आपसी झगड़े को जाति का रंग दिया: ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट से बाहर आई सच्चाई

गुजरात के बनासकांठा जिले के धनेरा तालुका के अलवाड़ा गाँव में दलित समुदाय के साथ नाई की दुकानों पर भेदभाव की खबरें मीडिया में सुर्खियाँ बनीं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने दावा किया कि 24 साल के कीर्ति चौहान पहले दलित बने जिन्होंने गाँव में बाल कटवाए, और इसे दशकों पुराने भेदभाव का अंत बताया। लेकिन ऑपइंडिया की जाँच में अलग तथ्य सामने आए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गाँव के रहने वाले कीर्ति चौहान पहले दलित बने जिन्होंने गाँव की नाई की दुकान पर बाल कटवाए। अखबार ने लिखा कि उस दिन दलित समुदाय के लिए माहौल स्वतंत्रता दिवस जैसा था।

गाँव की सभी पाँच नाई की दुकानें पहली बार दलितों के लिए खोली गईं। लगभग 6,500 की आबादी वाले इस गाँव में करीब 250 दलित रहते हैं, जिन्हें पीढ़ियों से नाई की दुकानों पर जाने से रोका जाता था। मजबूरन वे बाल कटवाने के लिए दूसरे गाँव जाते थे, कई बार अपनी पहचान छिपाकर। लेकिन पिछले हफ़्ते गाँव में सभी समुदायों के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें इस अलिखित सामाजिक प्रतिबंध को हटाने पर सहमति बनी। इसके बाद पहली बार दलितों को गाँव की नाई की दुकानों में बराबरी का हक मिला।

TOI की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

गुजरात के बनासकांठा जिले के धनेरा तालुका के अलवाड़ा गाँव में दलितों के साथ बाल कटाने को लेकर पीढ़ियों से जारी भेदभाव खत्म हो गया है। अब गाँव के दलित भी पहली बार खुले तौर पर स्थानीय नाई की दुकानों पर बाल कटवा पा रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में गाँव की दलित युवती कीर्ति चौहान का जिक्र है। भावुक कीर्ति ने कहा “मैं यहाँ बाल कटवाने वाली पहली दलित हूँ। बचपन से ही हमें बाल कटवाने के लिए दूसरे गाँव जाना पड़ता था। अपने 24 साल के जीवन में पहली बार, मैं अपने गाँव में आजाद और स्वीकार्य महसूस कर रही हूँ।”

रिपोर्ट में कार्यकर्ता चेतन डाभी और कुछ अन्य लोगों का नाम भी लिया गया है, जिन्होंने इस पीढ़ियों पुरानी प्रथा को खत्म करवाने में भूमिका निभाई।

गाँव के सरपंच सुरेश चौधरी ने कहा “सरपंच होने के नाते, मुझे इस पुरानी प्रथा पर अफसोस है। गर्व है कि मेरे कार्यकाल में यह समाप्त हुई।” गाँव के एक बुज़ुर्ग छोगाजी चौहान ने याद करते हुए कहा कि उन्हें बाल कटवाने के लिए मीलों पैदल जाना पड़ता था और आजादी से पहले उनके पिता ने भी यही कठिनाई झेली थी।

गाँव के नाई पिंटू नाई ने कहा कि वे पहले सिर्फ समाज के नियमों का पालन करते थे। लेकिन जब बड़े-बुज़ुर्ग मान गए, तो उन्होंने भी दलितों के बाल काटने शुरू कर दिए और कहा कि यह व्यापार के लिए भी अच्छा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट आने के बाद अन्य मीडिया संस्थानों ने भी इसे बड़े पैमाने पर कवर किया। लेकिन रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर सवाल भी उठे कहीं कीर्ति का नाम बदलकर किरण लिख दिया गया, तो कहीं उन्हें महिला बता दिया गया।

कुछ रिपोर्टों में यह तक कहा गया कि आजादी के बाद पहली बार दलितों को गाँव में बाल कटवाने की अनुमति मिली। बाद में गुजराती अखबारों ने भी ऐसी ही खबरें हूबहू प्रकाशित कीं। बीबीसी गुजराती ने भी इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रकाशित की।

उसमें कुछ दलित युवकों और गाँव के नाई के हवाले से कहा गया कि वास्तव में दलितों को नाई की दुकानों पर बाल कटवाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें दूसरे गाँव जाना पड़ता था। स्थानीय नाई ने बीबीसी से कहा “हमने दलितों के बाल नहीं काटे क्योंकि गाँव के लोगों से समस्या थी। लेकिन अब समझौता हो गया है और सभी के बाल कट रहे हैं।”

सरपंच ने ऑपइंडिया को क्या बताया

गुजरात के बनासकांठा जिले के अलवाड़ा गाँव में दलितों को नाई की दुकान पर बाल कटवाने से रोके जाने की खबरें मीडिया में तेजी से वायरल हुई थीं। लेकिन ऑपइंडिया की जाँच में इन दावों से अलग सच सामने आया है।

ऑपइंडिया ने गाँव के सरपंच और स्थानीय पुलिस से बात की। दोनों ने स्पष्ट कहा कि गाँव में कभी भी जातिगत भेदभाव नहीं हुआ। यह मामला केवल एक दलित युवक और नाई के बीच हुए झगड़े से जुड़ा था।

गाँव के सरपंच की वास्तविक पदाधिकारी सुरेश चौधरी की पत्नी हैं, जबकि मीडिया ने गलती से सुरेश को ही सरपंच बताया। सुरेश चौधरी ने ऑपइंडिया को बताया “असलियत मीडिया की खबरों से बिल्कुल अलग है। यह सिर्फ दो लोगों का विवाद था, जिसका जाति या समुदाय से कोई संबंध नहीं था। गाँव के दलित हमेशा से स्थानीय दुकानों पर बाल कटवा सकते थे।”

जानकारी के अनुसार, कुछ समय पहले गाँव के एक दलित युवक ने रात करीब 10 बजे नाई को बुलाकर बाल काटने को कहा। नाई ने देर रात काम करने से मना कर दिया, जिसके चलते दोनों के बीच झगड़ा हुआ। मामला थाने तक पहुँचा, लेकिन बाद में पुलिस और सरपंच की मौजूदगी में समझौता हो गया। इसके बाद नाई ने उसी युवक के बाल भी काट दिए और विवाद वहीं खत्म हो गया।

भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं: पुलिस

गुजरात के बनासकांठा जिले के अलवाड़ा गाँव में दलितों को नाई की दुकानों पर बाल कटवाने से रोके जाने की खबरों को पुलिस ने खारिज कर दिया है।

धनेरा थाने के पीआई महेश चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा “ऐसा कोई मामला नहीं है। गाँव में दलित भी बाकियों की तरह बाल कटवाते रहे हैं। यह सिर्फ दो युवकों के बीच का मामूली विवाद था, जिसे सुलझा लिया गया।”

उन्होंने बताया कि हो सकता है किसी नाई ने व्यक्तिगत विवाद के कारण किसी युवक के बाल काटने से मना कर दिया हो, लेकिन बाद में समझौता हो गया और मामला वहीं समाप्त हो गया।

पुलिस अधिकारी ने यह भी कहा कि उन्होंने दलित समुदाय के लोगों से मुलाकात की है। समुदाय के लोगों ने भी उन्हें साफ बताया कि उन्हें कभी किसी तरह के भेदभाव या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। पीआई महेश चौधरी के मुताबिक, उनके पास दलित समुदाय के इन बयानों के वीडियो भी मौजूद हैं।

यह खबर मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, मूल खबर को इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

केरल की वायनाड से MP हैं प्रियंका गाँधी, पर ₹10 करोड़ देगी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार: ‘मेहरबानी’ पर CM सिद्धारमैया को BJP ने घेरा, पूछा- आलाकमान को खुश कर रहे

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार केरल के वायनाड में भूस्खलन से प्रभावित लोगों की मदद कर रही है। वायनाड कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी का संसदीय सीट है। यहाँ भूस्खलन से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए 10 करोड़ रुपए सिद्धारमैया सरकार दे रही है। इसको लेकर विवाद शुरू हो गया है।

भाजपा ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार केरल के वायनाड के लिए धन आवंटित कर रही है क्योंकि वायनाड लोकसभा क्षेत्र वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी का संसदीय क्षेत्र है। राज्य आपदा कोष यानी SDRF के माध्यम से दिया जा रहा है। इन पैसों से भूस्खलन से प्रभावित 100 परिवारों की मदद की जाएगी।

गौरतलब है कि जुलाई 2024 में वायनाड जिले के मेप्पाडी में भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन हुआ था। इससे जान-माल को भारी नुकसान हुआ था। इस आपदा में सैकड़ों परिवारों के घर तबाह हो गए।

अब कर्नाटक सरकार ने पुनर्वास कार्यों के लिए 10 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2024-25 के अपने अनुपूरक अनुमानों में इसका उल्लेख किया है। यह अनुदान एसडीआरएफ के माध्यम से केरल सरकार को हस्तांतरित किया जाएगा। इससे प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता और आवास दिया जाएगा।

इसको लेकर बीजेपी ने कर्नाटक सरकार पर हमला बोला। बीजेपी का कहना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कर्नाटक के गरीब लोगों की तुलना में पड़ोसी राज्य केरल के वायनाड निर्वाचन क्षेत्र के भूस्खलन पीड़ितों के लिए घर बनाने को अधिक प्राथमिकता दी है। आरोप लगाया गया है कि कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार प्रियंका गाँधी को खुश करने के लिए वायनाड पुनर्वास के लिए 10 करोड़ रुपये दे रही है।

कर्नाटक भाजपा ने X पर टिप्पणी करते हुए कहा, “घर बेचो, प्रियंका पर मेहरबानी करो! यह राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार कर रही है। राज्य में विकास कार्यों के लिए पैसा नहीं है, सरकारी कर्मचारियों के वेतन के लिए पैसा नहीं है, विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों को अनुदान देने के लिए पैसा नहीं है, स्कूलों और कॉलेजों के बुनियादी ढाँचे के लिए पैसा नहीं है। लेकिन अपने आलाकमान को खुश करने के लिए सब कर रही है। पड़ोसी राज्य केरल के वायनाड सीट के लोगों के लिए घर बनाने के लिए उदारतापूर्वक 10 करोड़ रुपये दे रही है, क्योंकि ये प्रियंका वाड्रा का निर्वाचन क्षेत्र है। सीएम @siddaramaiah, अपनी कुर्सी बचाने के लिए कन्नड़ लोगों के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल तुरंत बंद करें।”

गौरतलब है कि फरवरी 2024 में, कर्नाटक भाजपा ने वायनाड में हाथी के हमले में मारे गए एक व्यक्ति के लिए राज्य सरकार द्वारा जारी की गई 15 लाख रुपये की सहायता राशि की आलोचना की थी। यह राशि राहुल गाँधी के निर्देश के बाद जारी की गई थी, जिसमें कहा गया था कि मृतक पर हमला करने वाला हाथी मूल रूप से कर्नाटक का था। तब 15 लाख रुपये और अब 10 करोड़ रुपये, ऐसा लगता है कि कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता अपने लोगों की सेवा करने के बजाय गाँधी परिवार को खुश करना है।

RSS के संस्कारों से बना जीवन, ‘मुख्य शिक्षक’ से बने ‘मोगैम्बो’: कहानी उस स्वयंसेवक की जिन्होंने बचपन में पूछा था- काली भैंस के दूध से कैसे गोरा हो सकता हूँ माँ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आने वाली विजयदशमी को अपने 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है। संघ ने अपनी इस यात्रा में देश सेवा के संस्कार लाखों-करोड़ों स्वयंसेवकों को दिए हैं। इन्हीं में से एक नाम है अमरीश पुरी का। अपनी कड़कती आवाज से पर्दे पर खलनायक की भूमिका निभाने वाले अमरीश पुरी को उनके दोस्त और जानने वाले बेहद सरल और अनुशासित इंसान बताते हैं।

अमरीश पुरी का यह अनुशासन और सरलता संघ के संस्कारों से गढ़ी हुई थी। आज कई लोग आपको संघ को धार्मिक कट्टरवाद से जोड़ते हुए दिख जाएँगे लेकिन अमरीश पुरी जैसे लोगों के लिए यह देशभक्ति की भावना का प्रतीक था। 22 जून 1932 को जन्मे अमरीश पुरी का बचपन पंजाब के नवांशहर की गलियों में बीता था। जब वह 14 वर्ष के हुए तो देश आजादी के दौर की ओर बढ़ रहा था। उसी दौरान अमरीश पुरी ने संघ की शाखा में राष्ट्र भक्ति का ककहरा सीखना शुरू किया था।

अमरीश पुरी ने अपनी आत्मकथा ‘जीवन का रंगमंच’ में संघ से जुड़े अपने अनुभव साझा किया है। पुरी लिखते हैं, “मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य भी बना था और मेरे आदर्श बहुत ऊँचे थे। इससे मेरी विचारधारा पूरी तरह बदल गयी थी और मैं इस व्यवसाय (बॉलीवुड) में कदम भी रखने के विरुद्ध था। मैं RSS की गतिविधियों में भाग लेने लगा था।”

उन्होंने लिखा, “बहुत ईमानदारी से कहूँगा कि मैं उनकी हिंदुत्व की विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ था जिसके अनुसार हम हिंदू हैं और हमने हिंदुस्तान की विदेशी शक्तियों से रक्षा करनी है और इन्हें निकाल बाहर करना है, जिससे कि हम अपने देश पर शासन कर सकें। इसका धार्मिक कट्टरता के साथ कुछ संबंध नहीं था, यह मात्र देशभक्ति थी।”

जिन दिनों वह अपनी आत्मकथा भी लिख रहे थे और उन्हें तब भी संघ की प्रार्थना याद थी। वे लिखते हैं, “मुझे हमारी प्रार्थना याद है: नमस्ते सदा वात्सल्य मातृभूमि…। RSS के शिविरों और शाखाओं में संध्या के समय आज भी इस प्रार्थना का गायन होता है। स्वभावतः राष्ट्रवाद की उन भावनाओं में बहकर मैं इस सम्बन्ध में बहुत निश्चित और स्पष्ट था कि मुझे क्या करना है और क्या नहीं करना है।”

अमरीश पुरी की आत्मकथा

वह लिखते हैं, “मैं केवल 14 वर्ष का था जब मुझे युवा विभाग का प्रभारी बना दिया गया। विभाग अधिकारी के रूप में मुझे अन्य युवाओं को सैनिकों की भाँति प्रशिक्षण देना था। हम मात्र ‘हमारा भारत वर्ष’ के सन्दर्भ में सोचते थे। RSS में इस प्रकार के प्रशिक्षण ने मुझे उत्तरदायित्व की भावना से ओतप्रोत कर दिया था। केवल शाब्दिक अर्थ में ही मेरा यह उत्तरदायित्व पूर्ण नहीं था अपितु में सब व्यावहारिक रूप से कर रहा था और उसने मुझे बहुत अनुशासित कर दिया था।”

अमरीश पुरी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा था कि RSS की शाखाओं में यह सिखाया गया कि उन्हें यह सिखाया गया कि आपातकाल जैसे कठिन समय में कैसे व्यवहार करना है। कैसे सैकड़ों लोगों के समूह से एक ही समय में निपटना है। उनका मानना था कि इस प्रशिक्षण का असली उद्देश्य हिंदुत्व के प्रसार के साथ-साथ बेहतर भारत का निर्माण करना था। उन्होंने लिखा, ” मैं आत्मनिर्भर होने के विचित्र आनंद का अनुभव कर रहा था और यदि आप इसे अपनी युवावस्था में पा लेते हैं तो यह एक मादक एहसास होता है।”

अमरीश पुरी ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा था कि संघ की शाखाओं में दैनिक सत्रों ने उन्हें समझाया कि स्वयंसेवक होने का अर्थ स्वयं सेवा, साथियों की सेवा और राष्ट्र की सेवा का प्रशिक्षण है। इन सत्रों के जरिए उनके अपरिपक्व मन में एक नई जागरूकता का संचार हुआ। उन्हें अलग-अलग तरीकों से व्यक्तित्व विकास की सही दिशा दी जाती रही।

उन्होंने स्वीकार किया था कि उनकी निष्ठा मुख्यत: शारीरिक प्रशिक्षण और भागीदारी तक सीमित रह लेकिन संघ की शाखाओं में स्वास्थ्य पर दिया गया जोर उनके जीवन की दिशा तय करने में बेहद महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। शुरुआत में वे केवल अपनी उत्सुकता और कसरतों के चलते संघ की ओर खिंचे थे पर धीरे-धीरे राष्ट्र के लिए बलिदान की भावना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसी दृढ़ता विश्वास से उनके व्यक्तित्व में सैनिक जैसा अनुशासन आ गया था।

पुरी लिखते हैं, “मैं पूरी ईमानदारी के साथ यह स्वीकार करता हूँ कि मेरी जीवन शैली, रंगमंच और फिल्मों में जो भी अनुशासन बोध दिखाई देता है, वह सब किशारोवस्था के दौरान RSS के साथ मेरे संपर्कों की देन है। जैसा कि कहा जाता है कि समान विचारधारा के लोग इकट्ठे हो जाते हैं, यह अपने आप में विचित्र संयोग ही था कि मेरे रंगमंच के गुरु पण्डित सत्यदेव दुबे भी एक समय RSS में जुड़े रहे हैं। वे मुझसे अक्सर कहते कि हमारी मानसिक अनुशासनबद्धता के कारण हम बचे हुए हैं।”

पाञ्चजन्य को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, “मैं संघ की ‘शाखा’ में इस कदर शामिल हो गया था कि मुझे ‘मुख्य शिक्षक’ बना दिया गया था। मेरा मानना है कि शाखा से जो ‘संस्कार’ मिले उन्होंने मेरे व्यक्तित्व और चरित्र को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई। आज मैं फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हूँ, जहाँ चरित्र का पतन सबसे ज्यादा है। मैं आज भी शुद्ध चरित्र वाला हूँ और इसका श्रेय सिर्फ संघ की शिक्षाओं को जाता है। फिल्म इंडस्ट्री के काम की वजह से भले ही मैं संघ की गतिविधियों में सक्रिय न रह पाऊँ लेकिन संघ के दिए हुए संस्कार हमेशा मेरे साथ रहेंगे।”

जब पुरी ने काली भैंस का दूध पीने से किया मना

अमरीश पुरी के जीवन के कई दिलचस्प किस्से हैं। इनमें एक किस्सा उनके बचपन से जुड़ा है। पुरी दिखने में अपने सभी भाई बहनों में दिखने में थोड़े काले थे। अपने काले रंग के चलते पुरी बचपन में खूब दूध पीने लगे थे। उन्हें लगता था कि वे अगर दूध पिएँगे तो उनका रंग गोरा हो जाएगा। एक बार पुरी ने भैंस देखी तो उन्होंने फिर दूध पीने से इनकार कर दिया। उन्हें लगने लगा कि काली भैंस का दूध पीकर तो उनका रंग और भी काला हो जाएगा। इसके बाद उन्होंने अपनी माँ से काली भैंस का दूध ना देने का आग्रह कर दिया था।

अपनी राष्ट्रवादी छवि और लॉबी ना बना पाने की आज से उन्हें कोई नामचीन पुरस्कार तो नहीं मिल पाया लेकिन दर्शकों का बेपनाह प्यार ऐसा मिला की लोग फिल्मी दुनिया के विलेन ‘मोगेम्बो’ से प्रेम करने लगे। हालाँकि, उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संघ से मिले संस्कार केवल शाखा तक सीमित नहीं रहते बल्कि व्यक्ति के पूरे जीवन को आकार देते हैं। पर्दे पर चाहे उन्होंने खलनायक का किरदार निभाया हो लेकिन असल जिंदगी में वे अनुशासन, देशभक्ति और सादगी के प्रतीक बने रहे। संघ की शिक्षाएँ आजीवन उनके साथ रहीं।

अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में ‘निशांत’, ‘गाँधी’, ‘कुली’, ‘नगीना’, ‘राम लखन’, ‘त्रिदेव’, ‘फूल और कांटे’, ‘विश्वात्मा’, ‘दामिनी’, ‘करण अर्जुन’, ‘कोयला’ आदि शामिल हैं। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय फिल्‍म ‘गाँधी’ में ‘खान’ की भूमिका भी निभाई थी। उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म ‘किसना’ थी जो 2004 में ब्रेन ट्यूमर से हुई उनकी मौत के बाद 2005 में रिलीज हुई।