Home Blog Page 259

SC ने हाईकोर्ट जज के खिलाफ आदेश लिया वापस, 2 पैराग्राफ भी किए डिलीट: जस्टिस प्रशांत के फैसले को गलत माना, वापस इलाहाबाद HC को सौंपी सुनवाई; जानिए – पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपने ही एक आदेश को वापस ले लिया। ये आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार के खिलाफ था। पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जस्टिस प्रशांत कुमार को रिटायरमेंट तक आपराधिक मामलों की सुनवाई से हटा दिया जाए और उन्हें किसी सीनियर जज के साथ बैठकर काम करना होगा। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है।

पूरा मामला क्या था?

ये बात शुरू होती है मेसर्स शिखर केमिकल्स नाम की कंपनी से, जिसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कंपनी का कहना था कि उनका एक आर्थिक विवाद है, जो दीवानी (सिविल) मामला है, लेकिन इसके बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक केस चल रहा है। कंपनी चाहती थी कि ये आपराधिक केस रद्द हो।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार ने 5 मई 2025 को इस याचिका को खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि अगर कोई दीवानी रास्ता (सिविल केस) उपलब्ध है, तो भी आपराधिक केस चल सकता है, क्योंकि सिविल केस में समय लगता है और शिकायतकर्ता को तुरंत राहत चाहिए।

इस फैसले से कंपनी खुश नहीं थी। उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 4 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को गलत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस प्रशांत का फैसला ‘विकृत’ और ‘गैरकानूनी’ है।

यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत के खिलाफ सख्त टिप्पणी की और आदेश दिया कि उन्हें आपराधिक मामलों से हटाकर किसी सीनियर जज के साथ डिवीजन बेंच में काम करना होगा।

फिर क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश जैसे ही आया, इलाहाबाद हाईकोर्ट में हंगामा मच गया। हाईकोर्ट के 13 जजों ने इस आदेश के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली को पत्र लिखकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत है और इसे लागू नहीं करना चाहिए।

जजों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने बिना जस्टिस प्रशांत को नोटिस दिए या उनका पक्ष सुने ये टिप्पणियाँ की, जो ठीक नहीं है। इन जजों ने फुल कोर्ट मीटिंग बुलाने की माँग की, ताकि इस आदेश के खिलाफ प्रस्ताव पास किया जाए। ये पत्र सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गया, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

उधर, भारत के चीफ जस्टिस (CJI) बी.आर. गवई ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की बेंच को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि जस्टिस प्रशांत के खिलाफ दिए गए आदेश पर दोबारा विचार किया जाए। CJI के इस अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को फिर से सुनवाई के लिए लिस्ट किया।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश क्यों वापस लिया?

8 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने नया फैसला सुनाया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि उनका मकसद जस्टिस प्रशांत को शर्मिंदा करना या उनकी बेइज्जती करना नहीं था। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का काम न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखना है। अगर कोई फैसला गलत है और वो जनता के भरोसे को कम करता है, तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ता है।

लेकिन इस बार CJI के पत्र और हाईकोर्ट जजों की आपत्ति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने 4 अगस्त के आदेश के दो पैराग्राफ (25 और 26) हटा दिए। इन पैराग्राफ में जस्टिस प्रशांत को आपराधिक मामलों से हटाने और सीनियर जज के साथ बैठने का आदेश था।

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ किया कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ही तय करते हैं कि कौन सा जज कौन से केस सुनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के हवाले कर दिया कि वो जस्टिस प्रशांत के केस की सुनवाई को लेकर फैसला लें। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये माना कि हाईकोर्ट का 5 मई का फैसला गलत था, लेकिन अब वो इसकी नई सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को भेज रहे हैं।

इस मामले से क्या समझ आता है?

ये पूरा मामला दिखाता है कि न्यायपालिका में एक-दूसरे की गरिमा और स्वायत्तता कितनी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले जस्टिस प्रशांत के फैसले को गलत माना और सख्त टिप्पणी की, लेकिन जब हाईकोर्ट के जजों और CJI ने इस पर सवाल उठाए, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को वापस ले लिया।

ये पूरा मामला दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट भी अपनी गलतियों को सुधारने के लिए तैयार है। साथ ही ये भी साफ हुआ कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को अपने कोर्ट में जजों के कामकाज का पूरा अधिकार होता है और सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल नहीं देना चाहता।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये जरूर कहा कि जस्टिस प्रशांत का फैसला गलत था, क्योंकि दीवानी मामले को आपराधिक केस में बदलना ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे फैसले जनता का भरोसा कम कर सकते हैं। इसीलिए उन्होंने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेजा।

डोभाल-पुतिन की मुलाकात से उड़े डोनाल्ड ट्रंप के होश, गर्मजोशी दिखा रही – दोस्ती कितनी गहरी: प्रफुल्लित दिखे रूसी राष्ट्रपति, जल्द आएँगे भारत

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजीत डोभाल ने मॉस्को में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। दोनों देशों ने द्विपक्षीय साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। ये मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 25 फीसदी एक्स्ट्रा टैरिफ लगाते हुए भारत पर दुनिया में सबसे ज्यादा 50 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की। माना जा रहा है कि यह मुलाकात अमेरिकी दबाव को संतुलित करने की दिशा में अहम पहल है।

अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने का हवाला देते हुए टैरिफ दोगुना कर दिया है। साथ ही चेतावनी दी है कि अगर रूस ने करीब चार साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध को शुक्रवार तक खत्म नहीं किया, तो वह रूसी तेज खरीदने वाले देशों पर एक और प्रतिबंध लगाएगा।

क्रेमलिन प्रेस सेवा ने एक वीडियो शेयर किया है। इसमें डोभाल वार्ता से पहले रूस के राष्ट्रपति से हाथ मिलाते दिख रहे हैं। डोभाल ने अपने रूस के समकक्ष सर्गेई शोइगु से भी मुलाकात की। भारत और रूस के बीच रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों में संबंधों पर ही अमेरिका को ऐतराज है। हालाँकि भारत साफ कर चुका है कि वह रूस से व्यापार बंद नहीं करेगा।

इस साल के अंत में राष्ट्रपति पुतिन भारत यात्रा पर आने वाले हैं इसकी जमीन तैयार करने के लिए अजीत डोभाल मॉस्को गए हैं। डोभाल ने खुद जानकारी दी है कि पुतिन भारत आने वाले हैं। वहाँ पुतिन और डोभाल की गर्मजोशी दुनियाभर में सुर्खियाँ बन रही हैं। पुतिन जिस तेजी और जोश के साथ आकर डोभाल से मिलते हैं, उनका हाथ पकड़ते हैं और मुस्कुराते हुए बातें करते हैं और बैठने का आग्रह करते हैं। इनमें भी संकेत छुपे हुए हैं।

ब्राजील के बाद भारत पर ट्रंप ने लगाया सबसे ज्यादा टैरिफ

भारत पर 7 अगस्त को 25 फीसदी टैरिफ लागू होगा और फिर 21 अगस्त को दूसरे दौर की 25 फीसदी यानी पूरा 50 फीसदी टैरिफ लागू हो जाएगा। भारत ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने इसे अन्यायपूर्ण, असंगत कहा है। साथ ही कहा है कि देशहित में जरूरी कदम उठाए जाएँगे।

अमेरिका पर लगातार दोहरे मापदंड के आरोप लग रहे हैं। खुद अमेरिका यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, पैलेडियम और उर्वरक रूस से आयात करता है। इसके अलावा यूरोपीय यूनियन का कारोबार भी अभी तक रूस से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में भारत पर दबाव डालने की रणनीति हैरान करने वाली हैं। इसको लेकर जब राष्ट्रपति ट्रंप से पत्रकार ने सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें रूस से व्यापार की जानकारी ही नहीं है।

देशहित में लेंगे फैसला – पीएम मोदी

पीएम मोदी ने कहा है कि किसानों के हितों की रक्षा हमारी पहली प्राथमिकता है। भारत मछुआरों, डेयरी किसानों और अन्य किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि इसकी भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी लेकिन वे इसके लिए तैयार हैं।

दरअसल भारत ने अमेरिकी टैरिफ बम से निपटने की तैयारी तेज कर दी है। एक तरफ डोभाल रूस में हैं तो पीएम मोदी जापान और फिर चीन की यात्रा पर जा रहे हैं। ब्राजील ने पहले ही ब्रिक्स देशों को अमेरिकी टैरिफ से मुकाबला करने के लिए साथ आने का आह्वान कर चुका है। रूस के राष्ट्रपति इस साल के अंत में भारत आने वाले हैं।

कहीं कतार में खड़ा कर मारी ताबड़तोड़ गोलियाँ, कहीं ‘सिर तन से जुदा’… सिर्फ कश्मीर नहीं, जम्मू के डोडा में हुआ था हिंदुओं का नरसंहार: पढ़ें डेमोग्राफी बदलने के लिए कैसे हुआ था 310 का कत्लेआम

जम्मू और कश्मीर दशकों से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का शिकार रहा है। यहाँ हिन्दुओं को हिंसा का खामियाजा भुगतना पड़ा है। 90 के दशक में डोडा जिला कश्मीर घाटी से अलग जम्मू का वो जगह है, जहाँ हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया था। यहाँ जिहादियों ने हिन्दुओं को चुन-चुन कर मारा था। बंदूक की नोक पर उनके घर द्वार छीन लिए गए। बेरहमी से कत्ल किया गया, हिन्दू महिलाओं का रेप किया गया। ये सब जिहाद के नाम पर किया गया।

हिन्दुओं के प्रति घृणा और किसी भी तरह से मुस्लिम बहुल घाटी को भारत से अलग करने की कोशिश में जिहादियों ने ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया। लेकिन डोडा घाटी का हिस्सा नहीं था। उसके सामरिक महत्व के चलते आतंकवादियों ने साजिश के तहत हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। उस वक्त डोडा तक पहुँचना भी काफी मुश्किल होता था।

ये ऐसा पहाड़ी क्षेत्र है जहाँ पगडंडियों और खच्चरों के सहारे ही पहुँचा जा सकता था। ये क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, उधमपुर, लद्दाख और अनंतनाग से घिरा हुआ है। लेकिन इसके सामरिक महत्व को पाकिस्तान ने पहचान लिया और आतंकियों के सहारे यहाँ हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। स्वराज के अभिमन्यु सिंह के मुताबिक 1991 में इस क्षेत्र में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ की केवल 5 यूनिट थी।

सेना की संख्या में कमी होने की वजह से आतंकियों के लिए यहाँ पैर जमाना और आसान हो गया क्योंकि भारत की सेना घाटी में अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर चुकी थी।

डोडा घाटी अब डोडा, किश्तवाड़ और रामबन में बंटा हुआ है, लेकिन उस वक्त 11,691 वर्म किलोमीटर में पूरा घाटी फैला हुआ था, जहाँ जम्मू कश्मीर का करीब 26 फीसदी वन मौजूद थे।

फोटो साभार-Swarajya

एक और उबर-खाबड़ पहाड़ी रास्ते और दूसरी तरफ घने जंगल, ऐसे दुर्गम जगह पर अभियान के लिए अधिक सैनिकों की जरूरत थी। इसके विपरीत आतंकियों को चप्पा-चप्पा पता था जहाँ वो खुलकर ‘हिन्दुओं से मुक्त क्षेत्र’ बनाने का काम कर रहे थे।

1991 की जनगणना के मुताबिक, मुस्लिम जनसंख्या 57.3% ( 90% कश्मीरी) , हिन्दुओं की 42.22%, अनुसूचित जाति ( 8.74%) थे, जिससे इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और भी बढ़ गई। इसके अलावा डोडा की कठुआ और उधमपुर से निकटता और एनएच-1ए के कारण आतंकवादी घाटी से आसानी से पहुँच पाए।

1993 से 2001 के बीच आतंकवादियों ने 310 हिन्दुओं को मार डाला। ये घटनाएँ सुनियोजित तरीके से चिनाब नदी के दक्षिण में हिन्दुओं की संख्या कम कर डेमोग्राफी बदलने के लिए किया गया। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि कुछ स्थानीय मुस्लिमों ने ‘भविष्य में आजादी’ की संभावना को देखते हुए हिन्दुओं के जमीन जायदाद, घर-द्वार को आपस में बाँट लिया।

पहले से असहाय हिन्दुओं का शोषण इस क्षेत्र में और बढ़ गया क्योंकि जिहादियों की संख्या यहाँ बढ़ने लगी। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र भी जिम्मेदार है क्योंकि 1950 में संयुक्त राष्ट्र के मध्यस्थ ओवेन डिक्सन ने 1950 में जनमत संग्रह के जरिए जम्मू-कश्मीर को विभाजित करने की कोशिश की थी। वह डोडा, राजौरी और पुंछ जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र को घाटी में मिलाना चाहते थे और चिनाब नदी के उत्तर में सीमा बनाना चाहते थे।

पाक समर्थित आतंकवाद से डोडा त्रस्त

1990 तक डोडा में कश्मीर घाटी की तुलना में शांति थी। इस वक्त यहाँ के युवक पाकिस्तानी आतंकी शिविरों में प्रशिक्षण के लिए सीमा पार गए। इस दौरान यहाँ एक फ्रांसीसी इंजीनियर का अपहरण यहाँ हुआ था, मंत्री बीए किचलू के घर और उनके निजी सुरक्षा अधिकारी पर हमले हुए थे।

शुरुआत में आतंकवादी यहाँ सेना से बचने और पनाहगार के रूप में इस्तेमाल के लिए घुसे थे। 19 दिसंबर 1992 को बीजेपी के जिला महासचिव संतोष कुमार ठाकुर की उनके घर के बाहर हत्या कर दी गई। यहाँ से अल्पसंख्यकों को टारगेट कर हत्या करने का सिलसिला शुरू हुआ।

18 फरवरी 1993 को आतंकवादियं ने मोहन सिंह को उनके बिजरानी स्थित घर से अगवा कर लिया और प्रताड़ित किया। उनके शव को घोड़े की पीठ पर बाँधकर भगवा सहकारी भंडार के पास लटका दिया गया था।

उसी दिन कश्मीरा सिंह का भद्रवाह स्थित उनके आवास से अपहरण कर लिया गया था। छह दिन बाद उनका शव पास की एक नहर में मिला, जिस पर यातना के स्पष्ट सबूत थे। दो दिन बाद बीजेपी सदस्य दीवान चंद की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

पूर्व भाजपा सदस्य और जनता दल के राजनेता मस्त नाथ योगी के भतीजे को 14 अप्रैल 1993 को भद्रवाह में हत्या कर दी गई। मस्त नाथ योगी को इसलिए मारा गया, क्योंकि उन्होंने डोडा में आतंकवाद को खत्म करने के लिए सेना के हस्तक्षेप का समर्थन किया था।

हिंदू रक्षा समिति के नेता सतीश भंडारी की एक महीने बाद ही 10 मई को डोडा में हत्या कर दी गई। जून के अंत में भद्रवाह में तीन हिंदू युवकों का अपहरण कर उन्हें प्रताड़ित किया गया। 30 जून को उनमें से एक भागने में कामयाब रहा, लेकिन बाकी दो को मौत के घाट उतार दिया गया।

हिन्दुओं के कत्लेआम का सबसे बुरा वक्त

14 अगस्त 1993 को पाँच हथियारबंद आतंकवादियों ने किश्तवाड़ से जम्मू जा रही एक यात्री बस को रोक लिया। इसके बाद हमलावरों ने हिंदू पुरुष यात्रियों को अलग कर दिया और उन्हें अंधाधुंध गोलियों से भून दिया गया। इस दौरान हिंदू बच्चों को भी नहीं बख्शा गया था। ये पाकिस्तान की आजादी का दिन था।

आतंकवादियों ने चौदह लोगों की हत्या कर दी और दो अन्य को गंभीर रूप से घायल कर दिया, जिनमें से एक की अस्पताल में मौत हो गई। एक स्थानीय सरकारी अधिकारी का बेटा आरिफ हुसैन ने यह हमला किया था। वह आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन का नेता था।

डोडा में 1994 आते आते आतंकवाद पूरी तरह हावी था। पूरी घाटी के आकार के इस क्षेत्र में सेना की केवल दो बटालियन, बीएसएफ की सात और सीआरपीएफ की एक बटालियन रह गई। स्थानीय प्रशासन ने भी डरे सहमे बचे हुए हिंदू समुदाय को कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई।

मई में गोहा में करतार सिंह और मान सिंह के घरों पर धावा बोलने की कोशिश कर रहे दो आतंकवादियों को गोली मार दी गई थी। लेकिन उन्हें आतंकियों के बदले की कार्रवाई का डर था। स्थानीय प्रशासन पर कोई विश्वास नहीं था इसलिए गोहा और गुंडोह तहसील के कलजुगासर, सीरू और कुठेरा जैसे गाँव के 822 हिन्दू पलायन कर हिमाचल प्रदेश के चंबा चले गए।

20 मई को आसपास के जिलों से लगभग 2,000 मुस्लिम भीड़ 4-5 घंटे पैदल चलकर गोहा पहुँची। इनलोगों ने करतार सिंह के रिश्तेदारों के 13 घरों को आग के हवाले कर दिया और एक आतंकवादी का शव अपने साथ ले गई।

27 मई को भाजपा नेता बलवंत सिंह की हत्या होते-होते बची, लेकिन उनका सुरक्षा गार्ड घायल हो गया। इसके अलावा, उसी दिन हडयाल-ग्राभा में जिहादियों ने तीन दलित भाइयों की हत्या कर दी। खबरों के मुताबिक, सुंबर में भी चरमपंथियों ने तीन लोगों का सिर कलम कर दिया।

30 मई को भद्रवाह में भाजपा के जिला उपाध्यक्ष स्वामी राज कटल की एक महिला समेत दो अन्य लोगों के साथ गोली मारकर हत्या कर दी गई। कटल एक साल पहले हुए एक हत्याकांड में बाल-बाल बच गए थे। 7 जून को एके-47 से लैस तीन आतंकवादियों ने रुचिर कुमार की हत्या कर दी। वह बीजेपी के तहसील अध्यक्ष थे।

इसके बाद भद्रवाह के वासक डेरा में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए। मुस्लिम बहुल किला मोहल्ला में दस हिंदू घरों को लूट लिया गया और नष्ट कर दिया गया। इसके एक हफ्ते से भी कम समय बाद जीलाना के लोक निर्माण विभाग के एक जूनियर इंजीनियर की हत्या कर दी गई।

भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुओं की हत्याओं की आलोचना की। 23 जून को भाजपा नेताओं ने अपने “डोडा बचाओ” प्रदर्शन के तहत विरोध प्रदर्शन शुरू किया और इस गंभीर स्थिति के मद्देनजर इस क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करने की माँग की। भाजपा कार्यकर्ताओं, सांसदों, विधायकों और पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को हिरासत में ले लिया गया।

हत्याओं का दौर जारी रहा और 18 सितंबर को गंडोह के बथोली गाँव में छह हिंदुओं की हत्या कर दी गई तथा 19 दिसंबर को पुशाल गाँव में बीजेपी कार्यकर्ता सुमित कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

हिंदुओं ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की

इलाके के हिंदू समुदाय ने आतंकवादियों के अत्याचारों से त्रस्त होकर जवाबी कार्रवाई की। भद्रवाह के पास मोंडा गाँव में गुस्साए हिंदुओं ने एक आतंकवादी के घर में आग लगा दी। कुछ जगहों पर आत्मरक्षा के लिए हथियार भी जुटाना शुरू कर दिया।

मई में चंबा आकर बसे लोगों में भी यह जोश साफ दिखाई दे रहा था। ज़्यादातर लोग 30 जून तक अपने-अपने गाँव लौट आए थे, लेकिन वे सुरक्षा के लिए बंदूक रखने पर अड़े रहे।

सरकार ने ग्राम रक्षा समिति (वीडीसी) कार्यक्रम फिर से शुरू किया। ये कार्यक्रम बढ़ती हिंसा के बीच हिंदुओं के पलायन को रोकने के प्रयास के लिए काफी जोखिम वाले क्षेत्रों में पूर्व सैनिकों और कमजोर समुदायों को आत्मरक्षा के लिए हथियार प्रदान करता था। 1995 के अंत तक डोडा जिले के लगभग 330 समुदाय वीडीसी के अंतर्गत आ गए थे।

इसके अलावा आतंकवाद विरोधी अभियानों में मदद के लिए डोडा में सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई। सितंबर 1994 में सीआई (आतंकवाद विरोधी) बल (डेल्टा) का गठन किया गया। इसमें सीआरपीएफ की 35 कंपनियां, बीएसएफ की छह बटालियन और राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) की चार बटालियनें शामिल थीं।

फोटो साभार- स्वराज्य

1996 की शुरुआत तक कई कुख्यात आतंकियों का सफाया हो चुका था। लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के ज़िला कमांडर जुलकर नैन, हरकत-उल-अंसार (एचयूए) के ज़िला कमांडर राजा दाउद मन्हास और हिज़्बुल मुजाहिदीन (एचएम) के प्रांतीय कमांडर जावेद कुरैशी भी इसमें शामिल थे। इससे आतंकवादी समूह काफी कमजोर पड़ा, लेकिन हिंदुओं की हत्याएँ फिर भी नहीं रुकीं।

हिंदुओं की हत्या का सिलसिला जारी

आतंकवादियों ने हिंदुओं को मारने के लिए मुखबिरी का संदेह और झूठे आरोप लगाए और दिनदहाड़े हत्या करना शुरू कर दिया। 5-6 जनवरी की रात को बरसाला में 15 हिंदुओं की हत्या कर दी गई, क्योंकि स्वामी राज नामक एक स्थानीय हिंदू कथित तौर पर सुरक्षा बलों का मुखबिर था। 8-9 जून की रात को कमलारी में 9 ग्रामीणों की हत्या कर दी गई और 25 जुलाई को सारोधर में 13 अन्य लोगों की हत्या कर दी गई।

हालाँकि, डोडा में सुरक्षा बलों की संख्या कम कर दी गई क्योंकि बाद में और सैनिकों को तैनात करने के बजाय छह बीएसएफ बटालियनों को हटा दिया गया। यह घटनाक्रम कथित तौर पर उसी समय हुआ जब इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) ने घाटी के बाहर और डोडा सहित जम्मू क्षेत्र में अपने आतंकवाद के व्यापक प्रसार के लिए अपनी रणनीति बदल दी।

इस प्रकार, 1997 और 1998 में डोडा में सशस्त्र संघर्ष फिर से शुरू हो गया, जब लगभग 60 से 70 विदेशी आतंकवादियों ने इस क्षेत्र में घुसपैठ की। अक्टूबर 1997 में कुदधार में छह वीडीसी सदस्यों की हत्या कर दी गई। जिहादियों ने 1998 में सामूहिक हत्याओं का सिलसिला एक बार फिर शुरू कर दिया।

चंपानेरी गाँव के पास 19 जून 1997 को गाड़ी का इंतजार कर रहे एक बारात को पाँच आतंकवादियों ने निशाना बनाया। उन्होंने पुरुषों को महिलाओं से जबरन अलग किया और फिर 32 में से 25 पुरुषों को गोलियों से भून डाला। एक महीने बाद,कलाबन में हुए एक और हमले में 23 हिंदू मारे गए। 27 जुलाई को किश्तवाड़ के पास हॉर्ना और केशवान गाँवों में 16 हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

आतंकवाद का जाल हिमाचल प्रदेश तक फैला

आतंक किसी एक क्षेत्र या जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं था। इस साल उधमपुर के निकटवर्ती इलाके प्राणकोट, डाकीकोट और थूब के साथ-साथ डोडा के बाहरी इलाके वंधामा में भी अल्पसंख्यकों का उतना ही भयावह नरसंहार हुआ। इसके अलावा, 27 जून 1997 को भद्रवाह के आतंकवादियों ने हिमाचल प्रदेश में चार जड़ी-बूटी बीनने वालों की हत्या कर दी। 2 और 3 अगस्त 1997 की रात को डोडा से चंबा जिले में घुसते समय आतंकवादियों ने बारागढ़-पांगी मार्ग पर स्थित मजदूर शिविरों को निशाना बनाया।

कलाबन में जब मुस्लिम मजदूरों को हिंदुओं से अलग किया गया, तो उन्हें उनके तंबुओं की रस्सियों से बाँध दिया गया। फिर या तो उन्हें गोली मार दी गई या उनका गला काट दिया गया।

फोटो साभार- स्वराज्य

इसके बाद वे सतरुंडी की ओर बढ़े, जहाँ उन्होंने 11 और मजदूरों की हत्या कर दी और 12 अन्य को घायल कर दिया। कुली के रूप में काम करने वाले नौ मजदूरों का भी अपहरण कर लिया गया और बाद में तीन मुसलमानों को छोड़ दिया गया। 4 अगस्त को, तीसा और शिम्बा गाँवों में 35 पीड़ितों का अंतिम संस्कार किया गया।

इसको लेकर मुस्लिम गुज्जर चरवाहा गुटों और हिंदू गद्दियों के बीच तनाव पैदा हो गया। आतंकियों ने मौके का फायदा उठाकर हिंदुओं पर और भी बड़ा हमला किया। 18 अगस्त को तीन गद्दियों का अपहरण कर लिया गया। उन्हें प्रताड़ित किया गया और फिर उनकी हत्या कर दी गई। इनकी हत्या एक मुस्लिम गुज्जर की वजह से हुई थी। उसने आतंकवादियों को बताया कि उन्होंने जो हथियार छिपाए थे उनके बारे में गद्दियों ने ही सेना को जानकारी दी।

कारगिल युद्ध और ‘ऑपरेशन विजय’ के वक्त हिन्दुओं की स्थिति

जैसे-जैसे समय बीतता गया हिंदुओं की स्थिति और भी खराब होती गई। ‘ऑपरेशन विजय‘ और 1999 में कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण का दूर-दराज के इलाकों पर असर पड़ा। राजौरी-पुंछ क्षेत्र में पाकिस्तानी आक्रमण की आशंका को देखते हुए 9-सेक्टर के सैनिकों को किश्तवाड़ से हटाकर वहाँ रियर एरिया सिक्योरिटी ड्यूटी पर तैनात करना पड़ा।

हमलावरों ने सैनिकों की कमी का फायदा उठाया। आतंकियों ने अनगिनत सेना के सूत्रों और मुखबिरों की हत्या कर दी। यहाँ तक कि कुछ लोगों की तो ज़िदा खाल भी उधेड़ दी गई।

20 जुलाई 1999 को लियोटा गाँव में आतंकवादियों ने आठ महिलाओं सहित 15 हिंदुओं को निशाना बनाया। इसके बाद सैनिकों की संख्या यहाँ बढ़ाई गई। राष्ट्रीय राइफल्स की दो बटालियनों और सिख लाइट इन्फैंट्री की 5वीं बटालियन यहाँ तैनात की गई। वर्ष 2000 में हिंदुओं ने हिंसा का एक और दौर झेला। 1 अगस्त 2000 को मुरलाकोट में 5, कुंडा में 12 और धम्मोता में 4 हिंदुओं की हत्या कर दी गई। 2 अगस्त 2000 को कियार में 8 हिंदुओं की जान ले ली गई।

21 नवंबर को खानपुरा में 4 हिंदुओं का नरसंहार हुआ और 24 नवंबर को 5 अन्य लोगों की भी इसी तरह हत्या कर दी गई। इन छह सामूहिक हत्याओं का जिक्र मेजर जनरल डीजी बख्शी की किताब “किश्तवाड़ कॉल्ड्रॉन” में किया गया है।

हिंदुओं के खिलाफ क्रूरता अगले साल भी जारी रही। 10 मई 2001 को आतंकवादियों ने स्थानीय पुलिस चौकी से पुलिसकर्मियों का अपहरण कर उन्हें अपने हथियार सौंपने के लिए कहा। हालाँकि पुलिस ने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप सात पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया गया, जबकि 3 घायल हो गए।

20 जुलाई 2001 को तागुड़ गाँव के ऊपर एक चरागाह में चार ग्रामीणों की हत्या कर दी गई और अगले दिन चीरजी के पास आठ और लोगों को मार डाला गया। इसके बाद 3 और 4 अगस्त को सरहोट धार में सबसे बड़ी घटना घटी।

सीढ़ी के 22 दलित और राजपूतों को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। ये लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए ऊंचाई वाली जगह शरोट धार लेकर गए थे। इस दौरान आतंकियों ने हिंदुओं का मज़ाक भी उड़ाया और कहा, “क्या पता भी है कि बंदूक क्या होती है,” और कहा, “क्या उन्हें पता है कि बंदूक से क्या निकलता है?”

फोटो साभार- स्वराज्य

वर्ष 2002 भी हिंदुओं के लिए कोई राहत लेकर नहीं आया। 6 जनवरी को लुड्डू और रामसू में 8 हिंदुओं की हत्या कर दी गई तथा 9 अप्रैल को डोडा के नागनी में एक परिवार के पाँच सदस्यों जिसमें दो महिलाएँ और तीन बच्चे शामिल थे, उनकी हत्या कर दी गई।

थर्वा और कुलहंड में 2006 में आखिरी बड़ा नरसंहार हुआ। 30 अप्रैल को, भारतीय सेना के वेश में आए आतंकवादियों ने इलाके को घेर लिया और स्थानीय लोगों को गाँव के मुखिया के घर इकट्ठा होने को कहा। आतंकवादियों ने तब तक गोलीबारी की जब तक उनके कारतूस खत्म नहीं हो गए। इस दौरान 22 लोग मारे गए जिसमें एक तीन साल की बच्ची और गाँव का मुखिया भी शामिल था।

उसी शाम, उधमपुर ज़िले के बसंतगढ़ में आतंकवादियों ने दो स्थानीय चरवाहों, मोहम्मद सिराजुद्दीन और उनके बेटे रुकुनुद्दीन को पास के लालोन गल्ला नामक घास के मैदान में ले जाने के लिए कहा। कई हिंदू चरवाहों ने वहाँ गर्मियों के लिए डेरा डाला हुआ था। 13 हिंदू चरवाहों को बुलाया गया और उन्हें जंगल में ले जाया गया जहाँ उन्हें मार डाला गया ।

13 मई को आतंकवादियों ने डोडा शहर में भाजपा कार्यकर्ताओं और कुलहंड से विस्थापित हुए स्थानीय लोगों के एक जुलूस पर ग्रेनेड से हमला किया। इससे दो पार्टी कार्यकर्ताओं की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए।

यह हमला मई 1998 में हुए डेसा नरसंहार की याद दिलाता है, जब जिहादियों ने शोक मनाने वाले लोगों पर हमला करके पाँच लोगों की जान ले ली थी। ये लोग पहले मारे गए चार वीडीसी सदस्यों के शव लेकर अपने गाँव लौट रहे थे।

लश्कर ए तैयबा के टारगेट पर हिन्दू

लश्कर-ए-तैयबा के गाजियान-ए-सफ-शिकन (इस्लामी महान योद्धा और युद्धक्षेत्र) के मुहम्मद ताहिर नक्काश ने अपने 2001 के अंक में हिंदुओं के खिलाफ बेलगाम हिंसा की प्रशंसा की और उन्हें नीचा दिखाया। लाहौर के गाजी मुहम्मद शफीक अबू साद ने भी हिंदुओं पर हुए भीषण हमलों पर जश्न मनाया

ग्रामीण इलाकों में हिंदू घरों की लूट को ‘युद्ध लूट’ कहा गया। इंटरसेप्ट किए गए वायरलेस ट्रांसमिशन ने खुलासा हुआ कि 2006 के कुलहंड और थारवा हमलों से पहले भी आतंकवादी कमांडरों ने अपने कैडरों को विशेष रूप से हिंदुओं को मारने के लिए कहा था।

हिंसा की घटना में भले ही कमी आई हो, लेकिन हिंदुओं की मौत का सिलसिला जारी है। ग्राम रक्षा समितियों (वीडीजी) के सदस्य कुलदीप कुमार और नज़ीर अहमद 7 नवंबर 2024 को किश्तवाड़ में मृत पाए गए, उनकी आँखें निकाल ली गई थी।

“कश्मीर टाइगर्स” के आतंकवादियों ने इसकी ज़िम्मेदारी ली और दूसरों को वीडीजी में शामिल न होने की चेतावनी दी। चरवाहे मान सिंह गाड़ी की तार से गला घोंटकर हत्या की तस्वीरें बाद में सितंबर 2024 में बसंतगढ़ मुठभेड़ में मारे गए पाकिस्तानी आतंकवादियों के फोन पर मिलीं।

पहलगाम में हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाकर किया गया आतंकवादी हमला और रियासी में हिंदू तीर्थयात्रियों पर हमला भी ऐसी ही कड़ी है। ये हिंदुओं के विरुद्ध की गई भयावह आतंकी हमले को दर्शाता है।

आतंकवादियों ने पूर्ववर्ती राज्य के सभी क्षेत्रों में हिंदुओं को निशाना बनाया, राजौरी से लेकर, जहाँ अक्टूबर 2005 में हिंदू पुरुषों का गला रेत दिया गया था, डोडा जिले के सुदूर इलाकों तक। गौरतलब है कि 1 और 2 जनवरी 2023 को आतंकियों ने राजौरी के डांगरी गाँव में हिंदुओं पर फिर से हमला किया, जिसमें 2 बच्चों सहित 7 लोगों की मौत हो गई और 9 घायल हो गए।

कश्मीर में हिंदू नरसंहार का मुद्दा छाया

कश्मीरी हिंदुओं का दर्द किसी से छिपा नहीं है। जहाँ जम्मू संभाग, खासकर डोडा में, हिंदुओं को गोलियों और यातनाओं का सामना करना पड़ा, वहीं घाटी में उनकी हालत बद से बदतर होती गई। 2003 का नंदीमार्ग नरसंहार इस समुदाय पर हुई हिंसा की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक माना जाता है।

23 मार्च की उस मनहूस रात को 24 हिंदुओं की हत्या कर दी गई, जिनमें उनके बच्चे भी शामिल थे। पुलवामा इलाके में हथियारबंद आतंकवादियों और कुछ स्थानीय युवकों ने हिंदू परिवारों को इकट्ठा किया और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। पाकिस्तान समर्थित जिहादियों की “रालिव, गालिव, चालिव” योजना ने अंततः उन्हें उनके घरों से बेदखल कर दिया और उन्हें अपनी ही मातृभूमि में शरणार्थियों की जिंदगी जीने पर मजबूर कर दिया।

फोटो साभार- स्वराज्य

इसी प्रकार, अमरनाथ यात्रा भी जिहादियों का प्राथमिक लक्ष्य रही है, जिसके परिणामस्वरूप भयावह हमलों में बड़ी संख्या में हिंदुओं की जान गई है। जैसे- 2002 में पहलगाम आधार शिविर पर हुआ हमला, जिसमें कई अन्य लोगों के अलावा 22 तीर्थयात्री मारे गए थे।

डोडा को ‘कश्मीर घाटी’ बनाना चाहते हैं आतंकी

क्षेत्र के हिंदुओं पर आतंकवाद के असर पर वैश्विक स्तर पर शायद ही कभी वह ध्यान दिया जाता है। कश्मीरी पंडितों के घाटी से निष्कासन की बात हो या डोडा से हिन्दुओं का पलायन।

आतंकवादियों का लक्ष्य डोडा को एक और कश्मीर बनाना था क्योंकि इस क्षेत्र में रक्तपात और दबाव के जरिए हिंदू आबादी को खत्म करने की साजिश चल रही थी। हालाँकि मुस्लिम कट्टरपंथी और उनके वामपंथी-उदारवादी सहयोगी इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। उनके लिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर एक खास समुदाय की ‘नाज़ुक’ भावनाओं का सम्मान करना ज्यादा जरूरी है। हिंदुओं के जीवन का इनके लिए कोई मोल नहीं है।

( मूल रूप से ये अंग्रेजी में लिखी गई लेख है। इसे यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं। )

UP में 130 अवैध मस्जिद-मदरसों पर चला CM योगी का बुलडोजर, 198 सील: नेपाल से सटे 7 जिलों में 60 दिन में हुई कार्रवाई, जाँच में निकला- खाड़ी देशों से मिल रही थी करोड़ों की फंडिंग

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नेपाल सीमा से सटे सात जिलों में अवैध मजहबी ढाँचों के खिलाफ अभियान चलाया है। बीते 60 दिनों में सरकार ने श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी जैसे जिलों में 298 अवैध मस्जिद, मदरसे, मजार और ईदगाह चिन्हित किए।

इनमें से 223 को नोटिस जारी किए गए, 198 को सील करते हुए 130 ढाँचों को पूरी तरह समतल कर दिया गया। ये कार्रवाई सिर्फ अवैध कब्जों के खिलाफ नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग, धर्मांतरण और डेमोग्राफिक बदलाव की आशंकाओं के चलते की जा रही है।

इन इलाकों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में तेजी से बढ़ती जा रही है, संदिग्ध फंडिंग और जनसंख्या संतुलन में बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन चुका है।

जिलेवार कार्रवाई और आँकड़े: कौन सा जिला सबसे आगे?

योगी सरकार की सबसे सख्त कार्रवाई श्रावस्ती जिले में हुई जहाँ 149 अवैध निर्माण चिन्हित किए गए, जिनमें से 140 को सील किया गया और 37 को गिराया गया। इसके बाद महराजगंज में 45 अवैध निर्माण पाए गए, जिनमें से 24 सील और 31 ध्वस्त किए गए।

बलरामपुर में 41 निर्माण चिन्हित हुए, जिनमें 19 को सील और 21 को ढहाया गया। सिद्धार्थनगर में 23 अवैध निर्माणों में से 21 को ध्वस्त किया गया, वहीं बहराइच में 25 चिन्हित में से 15 को गिरा दिया गया। लखीमपुर खीरी में 13 अवैध निर्माण का पता चला, जिनमें 10 को सील किया गया और 3 गिराए गए।

पीलीभीत में 2 अवैध निर्माण चिन्हित हुए और दोनों पर सीधा बुलडोजर चला। इन सात जिलों की कुल 570 किलोमीटर लंबी सीमा नेपाल से जुड़ी है, जो संवेदनशील मानी जाती है। इस कार्रवाई से पहले सभी ढाँचों को नोटिस देकर कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई थी।

विदेशी फंडिंग, डेमोग्राफिक बदलाव और राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा

आयकर विभाग और गृह मंत्रालय की रिपोर्टों ने खुलासा किया है कि नेपाल सीमा से सटे इलाकों में मजहबी ढाँचों के निर्माण के लिए दक्षिण भारत (खासकर तमिलनाडु) और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए की फंडिंग हुई है।

यह फंडिंग नकद और UPI जैसे डिजिटल माध्यमों से की गई, जिसमें एक मामले में एक व्यक्ति के खाते में 12 करोड़ रुपए पाए गए। रिपोर्टों में लगभग 150 करोड़ रुपए की संदिग्ध फंडिंग का पता चला है, जिसका इस्तेमाल मस्जिदों, मदरसों और मजारों के निर्माण व धर्मांतरण में किया गया।

इसके साथ ही सीमा के आसपास के गाँवों में मुस्लिम आबादी में तेजी से बढ़ोतरी और हिंदू आबादी में गिरावट देखी गई है। SSB की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2021 के बीच मस्जिदों की संख्या 738 से बढ़कर 1000 और मदरसों की संख्या 500 से बढ़कर 645 हो गई।

नेपाल की ओर भी इसी तरह मुस्लिम आबादी 20 साल में दोगुनी हो चुकी है। उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़, चम्पावत और ऊधमसिंह नगर भी अब इस खतरे से अछूते नहीं हैं। इन सारी गतिविधियों को देखते हुए यह आशंका गहराई है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में एक ‘मुस्लिम पट्टी’ बसाने की कोशिश की जा रही है, जो बांग्लादेश से शुरू होकर पाकिस्तान तक फैले एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकती है।

अमेरिका चाहे न करे बात, चीन-भारतीय साथ-साथ… टैरिफ विवाद के बीच चीनी मीडिया के बदले सुर: ग्लोबल टाइम्स ने लिखा- PM मोदी का करते हैं स्वागत, अगर दोनों देशों के रिश्ते सुधरे तो दुनिया देखेगी

भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ को लेकर चल रहा विवाद अभी थमा नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप अपनी खीझ निकालने के लिए मीडिया में कह रहे हैं कि वो भारत पर लगाए गए टैरिफ के बारे में अभी बात नहीं करेंगे। वहीं दूसरी तरफ चीन है जो इस समय सामने से भारत के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है। चीन के प्रमुख मीडिया संस्थान ग्लोबल टाइम्स ने इसे लेकर ट्वीट भी किया है।

अपने ट्वीट में ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने हिंदू कहावत का जिक्र करते हुए हिंदी-चीनी को भाई-भाई बताया। ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक्स पर पोस्ट किया- “जैसा कि हिंदू कहावत है कि अगर आप अपने बंधु की सहायता करेंगे तो आपकी मदद अपने आप हो जाएगी… एक अच्छे भारतीय-चीन संबंध क्षेत्र में और विश्व में सकारात्मक प्रभाव लाएँगे।”

आगे पोस्ट में ये भी लिखा है- “हम शुभेच्छा के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में स्वागत करते हैं ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हो और एक नया अध्याय शुरू हो जहाँ भारतीय और चीनी भाई-भाई बनकर साथ-साथ रहें।”

इस पोस्ट के साथ ग्लोबल टाइम्स ने एक संपादकीय शेयर किया है। जिसका शीर्षक है- आखिर क्यों पीएम मोदी की चीन आने की खबर ने खींचा वैश्विक ध्यान? इस आर्टिकल में भारत और चीन की प्राचीन सभ्यता, बढ़ती जनसंख्या, उभरती अर्थव्यवस्था की बात है। साथ ही इसमें ये भी कहा गया है कि दोनों ही देश इस समय उस पड़ाव पर हैं कि वे वैश्विक ध्यान अपनी ओर खींच सकते हैं।

संपादकीय में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर के चीन दौरे की चर्चा है। साथ ही ये भी लिखा है कि अगर मोदी इस बार चीन आते हैं तो चीन-भारत के सकारात्मक संबंधों को धार मिलेगी।

दिलचस्प बात ये है कि चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स जो पिछले कुछ सालों से लगातार सिर्फ भारत विरोधी बात करने के लिए कुख्यात रहा, उसने अपने इस आर्टिकल में पश्चिमी मीडिया को भी घेरा है जो टैरिफ विरोध को अमेरिका के विरुद्ध दिखा रहे हैं। लेख में कहा गया है कि चीन और भारत के बीच सुधरते हालात अमेरिका अपनी ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के तहत भारत को चीन के विरुद्ध करना चाहता है।

किसानों के हित से नहीं करेंगे समझौता- पीएम मोदी

बता दें कि भारत-अमेरिका के बीच व्यापार डील को लेकर हो रहे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को साफ बताया है कि वो अपने देश के किसानों के हित विरुद्ध नहीं जाएँगे। उनके लिए देश के किसानों का हित ही सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी कीमत पर भारत अपने देश के किसानों, मछुआरों और डेयर कृषकों के साथ समझौता नहीं करेगा।

पीएम मोदी ने यह भी कहा है कि वो अच्छे से जानते हैं कि इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन वो इसके लिए तैयार हैं और कोई भी दबाव पड़ने पर पीछे नहीं हटेंगे।

जब तक नहीं सुलझेगा मामला नहीं होगी बात- डोनाल्ड ट्रंप

वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ओवल ऑफिस में पीसी के दौरान सवाल पूछे जाने पर कहा है कि वो अभी नए सिरे से बिलकुल बात नहीं करेंगे। कम से कम तब तक तो नहीं जब तक वो इस मामले को नहीं सुलझा लेते।

जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका ने चीन पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। वहीं पहले भारत पर 25% टैरिफ लगाया था, जो 7 अगस्त से लागू हो गया। बाद में घोषणा की 25% अतिरिक्त टैक्स लगेगा जिसके बाद ये टोटल 50% हो गया।

ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, भारत रूस से तेल की खरीद करता है और ट्रंप के दिमाग में ये है कि इसी कमाई को रूस, यूक्रेन के विरुद्ध हथियार खरीदने में लगाता है।

आज सत्ता में आने पर चुनाव आयोग को देख लेने की धमकी दे रहे हैं राहुल गाँधी, कभी केरल में फेक वोटर कार्ड के साथ पकड़े गए थे यूथ कॉन्ग्रेस के नेता

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त) को चुनाव आयोग पर वोटर फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें राहुल गाँधी ने सबूतों के नाम पर सिर्फ एक लोकसभा सीट के एक क्षेत्र का डेटा दिखाकर खानापूर्ति करने की कोशिश की और चुनाव आयोग के अधिकारियों को परिणाम भुगतने की धमकी दी। राहुल गाँधी फर्जी वोटरों के जैसे आरोपों के जरिए चुनाव आयोग को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही एक मामले में 2023 में यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं को फर्जी वोटर कार्ड के साथ गिरफ्तार किया गया था।

EC के अधिकारियों को धमकाते हुए क्या बोले राहुल गाँधी?

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कई ऐसे दावे किए जिनका तथ्यों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। हालाँकि, चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाने में राहुल गाँधी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्होंने अधिकारियों को धमकाते हुए कहा कि आयोग को अब उन्हें और देश के लोगों को जानकारी देनी ही होगी।

राहुल ने आगे कहा, “अगर वे जानकारी नहीं देते हैं तो उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। इसमें शामिल हर पोलिंग अधिकारी को परिणाम भुगतने होंगे, चाहे वो सीनियर हो या जूनियर। एक दिन विपक्ष सत्ता में आएगा और तब आप देखेंगे कि हम क्या करेंगे।”

जब फर्जी वोटर आईडी के साथ गिरफ्तार हुए यूथ कॉन्ग्रेस के नेता

राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के केंद्र में फर्जी वोटरों से जुड़ा मुद्दा ही रहा। हालाँकि, जैसे फर्जी वोटरों के मामले में राहुल गाँधी चुनाव आयोग को अब घेरना चाहते हैं, वैसे ही एक मामले में उनकी पार्टी की युवा इकाई यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है।

नवंबर 2023 में केरल में यूथ कॉन्ग्रेस के नेता विक्रम, फैनी और बिनिल बीनू को पुलिस ने गिरफ्तार किया गया था। इन तीनों ने यूथ कॉन्ग्रेस के संगठन के चुनावों में मोबाइल ऐप की मदद से फर्जी वोटर आईडी कार्ड बनाए थे। यह ऐप यूथ कॉन्ग्रेस के नेता जैसन द्वारा बनाई गई थी और उसने भी पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था।

इन संगठन चुनावों में यूथ कॉन्ग्रेस के नेता राहुल ममकोटातिल को राज्य इकाई का अध्यक्ष चुना गया था। बाद में पुलिस ने उससे भी पूछताछ की थी। पुलिस ने यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं के कब्जे से लैपटॉप, मोबाइल फोन और चुनाव के फर्जी आईडी कार्ड जब्त किए थे। चुनाव आयोग के एक अधिकारी की शिकायत पर यह केस दर्ज किया गया था।

पुलिस ने रेड के दौरान तब 24 फर्जी आईडी कार्ड बरामद किए थे जिनमें तमिल ऐक्टर अजित का फर्जी वोटर आईडी कार्ड भी शामिल थी। बीजेपी ने तब आरोप लगाया था कि इस मामले की जानकारी केसी वेणुगोपाल जैसे बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं को भी थी।

खंडहर को मदरसा बता डकारी लाखों की स्कॉलरशिप, मुस्लिम छात्रों के नाम पर 27 मदरसे-स्कूल मिले संदिग्ध: इंदौर में रफीक, शबनम, शहनाज समेत 5 घोटालेबाजों पर FIR

मध्य प्रदेश के इंदौर में मुस्लिम छात्रों के नाम से मिलने वाली छात्रवृत्ति में बड़ा घोटाला सामने आया है। इस मामले में 27 मदरसों और स्कूलों को घोटाले के लिए संदिग्ध माना गया है और 5 के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। क्राइम ब्रांच की जाँच में सामने आया है कि मदरसों और स्कूलों के संचालक खंडहर और खाली मैदान को ही शिक्षण संस्थान बताकर लाखों रुपए की छात्रवृत्ति ले रहे थे।

नई दुनिया की खबर के मुताबिक, क्राइम ब्रांच ने फर्जीवाड़ा करने वाले संचालकों की तलाश शुरू कर दी है और सरकार को इस मामले की रिपोर्ट भेजी जा रही है। दरअसल, क्राइम ब्रांच ने पिछड़ा वर्ग एवँ अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सहायक संचालक अनिल कुमार सोनी की शिकायत पर 17 जून 2025 को केस दर्ज किया था और इस मामले की जाँच कर रही थी।

रिपोर्ट में डीसीपी(क्राइम) राजेश कुमार त्रिपाठी के हवाले से बताया गया है कि पुलिस ने जब एक आरोपित आफताब खान के ठिकाने पर दबिश दी पर वह मोबाइल बंद कर फरार हो गया। आफताब का सेंट जेवियर कॉन्वेंट नाम से सब्जी मंडी खजराना में स्कूल था और उसने 7 लाख से ज्यादा की स्कॉलरशिप ली थी। हालाँकि, जब इस स्कूल की जाँच करने टीम पहुँची तो उस जगह पर कुछ नहीं मिला।

शिकायत के बाद निरीक्षक माधवसिंह भदौरिया ने जाँच की और केयर वेल स्कूल के संचालक मोहम्मद रफीक खान, मदरसा साफिया की संचालिक शबनम शाह, मदरसा उस्मानिया की संचालिका शहनाज खानम, सेंट जेवियर कान्वेंट के संचालक आफताब खान और जेआर डीआरडी मेमोरियल स्कूल के संचालक आफताब के खिलाफ केस दर्ज किया है।

माधवसिंह भदौरिया ने इस मामले को लेकर बताया कि 9वीं और 10वीं के लिए अपात्र विद्यार्थियों का सबसे पहले पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन किया गया फिर संस्थाओं ने अपने लॉग-इन का इस्तेमाल कर अपात्र छात्रों का रजिस्ट्रेशन आगे भी बढ़ा दिया था। इस जाँच में कुल 27 शिक्षण संस्थानों को संदिग्ध बताया गया है। इस फर्जीवाड़े की जाँच की जा रही है और दोषी पाए जाने पर इन संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

OpIndia एक्सक्लूसिव: ‘न्याय’ के लिए दिल्ली पुलिस की चौखट पर पहुँची रोहिणी, कहा- जो (चंद्रशेखर) दलित हितैषी बन रहा, उसने ही दलित बेटी का किया शोषण

उसकी नजर में बहन-बेटियों की इज्जत की कोई कीमत नहीं है। मुझसे झूठ बोल कर उसने संबंध बनाए। मैं उसका बैकअप प्लान थी।

यह बात डॉ रोहिणी घावरी ने ऑपइंडिया से विशेष बातचीत में कही हैं। वह स्विटरलैंड लौटने के बाद नगीना से लोकसभा के सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के खिलाफ शिकायत करने दिल्ली पुलिस के पास पहुँची।

दिल्ली पुलिस ने उनका बयान दर्ज कर लिया है। उल्लेखनीय है कि रोहिणी घावरी वही महिला हैं, जिन्होंने चंद्रशेखर पर कई लड़कियों का जीवन बर्बाद करने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें धमकियाँ भी मिली हैं।

चंद्रशेखर ने मेरा इस्तेमाल किया- डॉ. रोहिणी घावरी

डॉ. रोहिणी घावरी ने कहा, “चंद्रशेखर ने अपने स्वार्थ के लिए मेरा इस्तेमाल किया। मैं उसके लिए बैकअप प्लान थी। अगर भारत की राजनीति में नहीं चमक पाया तो मुझसे शादी कर स्विट्जरलैंड में सेटल हो सकता है। लेकिन वह पहले से शादीशुदा है, इस बात की मुझे जानकारी नहीं थी। अगर पता होता तो कभी इस रिश्ते में नहीं आती। मैं अब इस पूरे ‘जाल’ को समझ चुकी हूँ।”

घावरी कहती हैं, “दलितों का मसीहा बनता है। मैंने जिंदगी में ऐसा कोई मसीहा नहीं देखा जो महिलाओं का सम्मान ही नहीं कर पाया। जिस पर महिला उत्पीड़न के केस है, वह महिला सम्मान कैसे कर सकता है? नेता वो होता है जो समाज को सही दिशा दिखाए, जो नेता खुद महिला उत्पीड़न करता है, वह क्या दिशा दिखाएगा”

वह आगे कहती हैं, “उसने कभी त्याग और संघर्ष तक नहीं किया। अगर जेल नहीं जाता तो समाज को संघर्ष की कोई कहानी भी नहीं सुना पाता। उसने समाज को न्याय नहीं दिलाया बल्कि युवाओं का भविष्य बर्बाद करने का काम किया है।”

उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रशेखर आजाद नेता बनने के लायक नहीं है। भारत में दलित समाज की आबादी कही अधिक है। ऐसे समाज को दिशा दिखाने के लिए एक ईमानदार नेता की जरूरत है, जो खून बहाने को भी तैयार हो जाए। घावरी कहतीं हैं, “मैं दलित समाज के मासूम लोगों को समझाऊँगी कि आप चंद्रशेखर जैसे नेता पर भरोसा ना करें, क्योंकि ऐसे नेता आपको बचाने नहीं आएँगे।”

बेटी को न्याय दिलाने के लिए डॉ. घावरी के साथ आए उनके माता-पिता ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “चंद्रशेखर आजाद ने मेरी बेटी का मानसिक और शारीरिक शोषण किया है। आज मैं अपनी बेटी को न्याय दिलाने मध्य प्रदेश से आई हूँ। मेरी बेटी को न्याय जरूर मिलना चाहिए।”

वहीं, पीड़िता के पिता, जो खुद दलितों के हक की लड़ाई लड़ते हैं और सक्रिय समाजसेवी हैं। उन्होंने कहा, “बेटी ने हमें 8 महीने तक उस पर पीड़ा के बारे में नहीं बताया। हमें भी एक्स के जरिए मामले की जानकारी लगी। वह बताया करती थी कि चंद्रशेखर के साथ मिल कर भीम आर्मी के लोगों की मदद कर रही हूँ।”

पिता ने यह भी कहा, “चंद्रशेखर ने बेटी से शादी करने का झूठा वादा कर मानसिक शोषण किया। जो दलित का हितैषी बन रहा था, उसने ही दलित बेटी का शोषण कर दिया।”

उधर, डॉ. रोहिणी घावरी के साथ शारीरिक शोषण मामले में उनकी वकील ने कहा कि यह मामला हाइप्रोफाइल जरूर है, लेकिन चंद्रशेखर को सांसद न देखते हुए एक आम इंसान के खिलाफ अपराध के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “केस को राजनीतिक एंगल नहीं दिया गया। पूरा विश्वास है कि दिल्ली पुलिस उचित कार्रवाई करेगी। कानूनी प्रक्रिया के तहत ही न्याय दिलाएँगे।”

जानें डॉ. रोहिणी घावरी का पूरा मामला

यह मामला भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ शारीरिक शोषण का है। स्विट्जरलैंड में रहने वाली दलित समाज की Ph.D स्कॉलर डॉ. रोहिणी घावरी ने महिला आयोग से चंद्रशेखर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता इंदौर के बीमा अस्पताल में काम करने वाले सफाईकर्मी की बेटी है।

पीड़िता ने शिकायत में बताया था कि साल 2019 में वह एक करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप लेकर हायर एजुकेशन की पढ़ाई करने स्विट्जरलैंड गई थी। तभी चंद्रशेखर से डॉ. रोहिणी की मुलाकात हुई थी। साल 2021 में दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई और चंद्रशेखर ने डॉ. रोहिणी को शादी करने का भरोसा दिलाकर शारीरिक संबंध बनाए।

डॉ. रोहिणी ने बताया कि भारत आने पर चंद्रशेखर ने कई बार उन्हें होटल और द्वारिका स्थित निवास पर बुला कर शारीरिक संबंध बनाए। चंद्रशेखर के साथ वह राजनीतिक अभियानों में भी हिस्सा लेती थीं। चंद्रशेखर ने खुद को अविवाहित बताकर पीड़िता को शादी का वादा भी किया। लेकिन बाद में सामने आया कि वह पहले से शादीशुदा है और एक बच्चे का पिता भी है।

इस संबंध में डॉ. रोहिणी ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स/ट्वविटर पर एक पोस्ट भी जारी किया था। पोस्ट में लिखा, “उसके लिए बहन-बेटियों की इज्जत की कोई कीमत नहीं… भरोसे में आकर बहुत बड़ी गलती कर दी। अब किसी भी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पाऊँगी।” उन्होंने खुद को विक्टिम नंबर-3 बताया था। अब चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए डॉ. रोहिणी स्विट्जरलैंड से भारत आई हैं।

बार-बार फर्जी रेप केस दर्ज कराने वालों का बने डेटाबेस, ऐसे मामलों की हो जाँच: दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए सख्ती बरतने के निर्देश, कहा – लोग कानून का गलत फायदा उठा रहे

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस और राज्य सरकार से कहा कि जो लोग बार-बार रेप की झूठी शिकायत करते हैं, उनकी जाँच की जाए। हालाँकि, कोर्ट ने खुद इस मामले में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये काम पुलिस और सरकार का है और उन्हें पता है कि इसे कैसे करना है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जज तुषार राव गेडेला ने साफ-साफ कहा, “ये याचिका है या कोई सुझाव? ये उनका काम है। पुलिस को बेहतर पता है कि पुलिसिंग कैसे करनी है।”

यानी कोर्ट ने याचिका पर कोई फैसला नहीं दिया, बल्कि साफ किया कि ये काम पुलिस और सरकार का है, कोर्ट का नहीं।

याचिका में क्या था?

ये जनहित याचिका शोनी कपूर नाम की एक महिला ने दायर की थी। उनके वकील थे शशि रंजन कुमार सिंह। याचिका में माँग थी कि पुलिस हर जिले में एक डेटाबेस बनाए, जिसमें उन लोगों की जानकारी हो जो बार-बार रेप या ऐसे ही अपराधों की शिकायत करते हैं।

याचिका में ये भी कहा गया कि ऐसी शिकायतों के लिए शिकायतकर्ता से पहचान पत्र जरूर लिया जाए। साथ ही ये आरोप लगाया गया कि कई बार रेप के कानून का गलत इस्तेमाल होता है और कोर्ट को भी इस बात की चिंता रही है।

हाई कोर्ट में आगे क्या हुआ

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 3 मार्च को दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दूसरे अधिकारियों को एक शिकायत पत्र भेजा था। 17 अप्रैल को RTI से जवाब मिला कि ये मामला बड़े अधिकारियों के पास विचार के लिए है।

इस पर कोर्ट ने कहा, “चूँकि याचिकाकर्ता ने पहले ही अधिकारियों को शिकायत दे दी है, तो हम इस याचिका को खत्म करते हैं। लेकिन हम आदेश देते हैं कि अधिकारी जल्दी से इस शिकायत पर ठोस फैसला लें।”

फर्जी मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

आजकल कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ कुछ महिलाएँ पुरुषों पर झूठे रेप के इल्जाम लगा देती हैं। जब जाँच होती है, तो पता चलता है कि सारे इल्जाम बेबुनियाद हैं।

आज के समय में जब महिलाएँ अपने हक के लिए खुलकर बोल रही हैं और रेप जैसे गंभीर मामलों पर आवाज उठा रही हैं, तब कुछ लोग इन कानूनों का गलत फायदा उठाते हैं। इससे असली पीड़ितों की लड़ाई कमजोर पड़ती है।

ऐसा ही एक मामला, 64 साल के रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर कैप्टन राकेश वालिया के साथ ऐसा ही हुआ। एक 39 साल की शादीशुदा महिला, जिसके दो बच्चे हैं… ने उनके खिलाफ रेप का केस दर्ज कराया। उसने कहा कि उसकी मुलाकात वालिया से फेसबुक पर हुई थी। वालिया ने उसे मॉडलिंग के बहाने बुलाया, नशीला पदार्थ देकर सुनसान जगह ले गए और रेप किया।

केस दर्ज हुआ, लेकिन जाँच में चौंकाने वाली बात सामने आई। इस महिला ने 2014 से अब तक 9 अलग-अलग पुरुषों के खिलाफ रेप, छेड़छाड़ और धमकी जैसे लगभग एक जैसे इल्ज़ाम लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि महिला ने हर बार FIR में अपना नाम, उपनाम और दूसरी जानकारी बदल-बदलकर दी, ताकि वो नया व्यक्ति लगे।

इसके अलावा, FIR दर्ज कराने के बाद उसने जाँच में कोई मदद नहीं की और कोर्ट में भी नहीं आई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘कानून का गलत इस्तेमाल’ बताया और सवाल किया कि जब इतने फर्जी मामले पहले से दर्ज थे, तो निचली कोर्ट ने पहले क्यों नहीं कुछ किया।

कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ एक महिला की बात पर किसी बेगुनाह को सजा नहीं दी जा सकती, खासकर जब सारे सबूत उसकी बेगुनाही की तरफ इशारा कर रहे हों।

एक और फर्जी केस का उदाहरण

एक महिला ने अपनी 5 साल की बेटी के साथ रेप का झूठा इल्ज़ाम कुछ लोगों पर लगाया। ये केस पोक्सो एक्ट की धारा 5 (गंभीर यौन अपराध) के तहत दर्ज हुआ। अतिरिक्त सत्र जज सुशील बाला डागर ने जाँच में पाया कि महिला ने गुस्से और प्रॉपर्टी के झगड़े की वजह से ये झूठा केस किया था। उसका मकसद प्रॉपर्टी हड़पना था। कोर्ट ने इसे कानून और न्याय व्यवस्था का गलत इस्तेमाल बताया।

कोर्ट ने कहा कि कई लोग जमीन, शादी, राजनीति या निजी फायदे के लिए पोक्सो जैसे सख्त कानूनों का गलत इस्तेमाल करते हैं। इससे कानून का असली मकसद कमजोर होता है। इसलिए कोर्ट को ऐसे मामलों में सख्त और सावधान रहना चाहिए।

पोक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत कोर्ट ने महिला पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और एक महीने में इसे भरने को कहा। अगर जुर्माना नहीं भरा, तो उसे 3 महीने की जेल होगी। कोर्ट ने साफ कहा कि महिला ने कानून को गुमराह किया और इसका गलत इस्तेमाल किया, जो गंभीर अपराध है।

जिसे राहुल गाँधी बता रहे थे ‘एटम बम’, उसका ‘SIR’ ही उपचार… महाराष्ट्र की तरह ही कर्नाटक पर भी हुए फुस्स: चुनाव आयोग को ‘चोर’ दिखाने चले थे, खुद ‘पप्पू’ दिखे

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले दावा किया था कि उनके पास चुनाव आयोग के खिलाफ सबूतों का ‘एटम बम’ है। इसी कथित बम को चलाने के लिए राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को एक घंटा 11 मिनट लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन यह एटम बम उनके पहले कई दावों की तरह फुस ही निकला।

हार की हताशा में डूबे राहुल गाँधी लगातार देश के चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं लेकिन तथ्यों और सबूतों से अक्सर दूर ही भागते नज़र आते हैं और इस बार भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने कई पुराने आरोप दोहराए और कई मनगढ़ंत दावे भी किए। लेकिन अपने कथित सबूतों के अंत तक आते-आते राहुल गाँधी खुद ही सवालों के घेरे में आ गए हैं।

राहुल के मनगढ़ंत दावों की असलियत

बीजेपी को एंटी इनकंबेसी नहीं लगती: राहुल गाँधी

देश के चुनाव आयोग को पानी पी-पीकर कोसने वाले राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेस का पहला आरोपी एंटी इनकंबेसी को लेकर था। उन्होंने कहा कि बीजेपी को ऐंटी इनकंबेसी नहीं लगती है। यानी अगर देश के मतदाता बीजेपी को चुन रहे हैं तो इसमें गलती ना तो कॉन्ग्रेस के कर्मों की है, ना राहुल गाँधी की मेहनत में कमी है। बल्कि चुनाव आयोग ही सबसे बड़ी गड़बड़ी कर रहा है। वोट चोरी के गंभीर आरोपों के बीच इस तरह की हल्की बात करना राहुल गाँधी की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।

UPA के 10 वर्षों के दौरान गुजरात के चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने वापसी की थी, मध्य प्रदेश में भी इस दौर में लगातार बीजेपी जीतती रही। तो क्या तब भी एंटी इनकंबेसी ना होने का जिम्मेदार चुनाव आयोग था?

एग्जिट पोल्स पर राहुल गाँधी का दावा

राहुल गाँधी ने अपने दावे के दौरान कहा कि ओपिनियन पोल्स और एग्जिट पोल्स का डेटा अलग-अलग रहता था। एक पूरी विस्तृत करोड़ों वोटरों वाली चुनावी प्रक्रिया को ओपिनियन या एग्जिट पोल्स के आधार पर गलत ठहरा देना एक हास्यास्पद तर्क से ज्यादा क्या ही हो सकता है?

एग्जिट पोल्स पीछे 10 वर्षों से तो शुरू हुए नहीं है। माना जाता है कि 80 के दशक में यह प्रक्रिया शुरू हुई थी और सर्वे के आधार पर हार-जीत का अनुमान लगाया जाता रहा है। लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो 2004, 2009 में अधिकतर एग्जिट पोल्स सही साबित नहीं हुए।

साल 2014 के एग्जिट पोल्स में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने का दावा शायद एक भी बड़े एग्जिट पोल ने नहीं किया था और 2024 के एग्जिट पोल्स में जितनी सीटें एनडीए को मिलने का दावा किया गया था वो भी गलत ही साबित हुआ। तो क्या ये सभी चुनावों को गलत ठहरा दिया जाए?

अलग-अलग चरणों में चुनाव पर भी सवाल

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेस के दौरान कहा कि कागज से वोट एक दिन में पड़ते थे लेकिन ईवीएम से महीनों लग जाते हैं। चुनाव के शेड्यूल को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था, हजारों-लाखों ईवीएम को लाना ले जाना, हजारों जवानों का चुनाव की सुरक्षा के लिए पहुँचना, यकीनी तौर पर यह एक दिन में करना मौजूदा परिस्थितियों में लगभग नामुमकिन है। राहुल का दावे को लेकर भी कई सवाल हैं। देश के पहले आम चुनाव से ही बात करें तो पहले आम चुनाव दिसंबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुए थे। जाहिर है ये एक दिन में नहीं हो गए।

अलग-अलग चरणों में चुनाव से बीजेपी को फायदा होता है तो ऐसा 2004 के आम चुनावों में भी होना चाहिए था तब भी आम चुनाव 4 चरणों में हुए थे। अगर चुनाव के चरणों के आधार पर ही कोई पार्टी हारती है तो कॉन्ग्रेस को 2009 का लोकसभा चुनाव हार जाना चाहिए था क्योंकि तब भी चुनाव 5 चरणों में हुए थे।

किसी भी पार्टी का इस आधार पर चुनाव हारना या जीतना कि कितने चरणों में चुनाव हो रहे हैं ये बेतुका तर्क ही लगता है। अलग-अलग चरणों में चुनाव कराए जाने की वजह लॉजिस्टिक की जरूरतें, सेना और अर्द्धसैनिक बलों को उपलब्धता के आधार पर तय होती आई है ना कि किसी पार्टी की हार और जीत के लिए।

‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं पर सवाल

राहुल गाँधी ने कहा, “चुनाव जीतने पर ऐसा माहौल बनाया जाता है कि लाडली बहना, पुलवामा, सिंदूर के कारण चुनाव जीते।” लाडली बहना जैसी योजनाओं को राहुल गाँधी सिर्फ नैरेटिव का हिस्सा बताकर खारिज कर देना चाहते हैं लेकिन तथ्य इसके खिलाफ हैं। जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर वोट मिलना कोई नई बात नहीं है।

सबसे ताज़ा उदाहरण ही देखें तो आने वाले कुछ दिनों में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव के लिए खुद कॉन्ग्रेस ने ‘माई बहिन मान योजना’ का एलान किया है। इसमें कॉन्ग्रेस की सरकार बनने पर ज़रूरतमंद महिलाओं को 2500 रुपए महीना की सम्मान राशि दिए जाने की बात है। ऐसा ही वादा कॉन्ग्रेस ने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी किया था।

राहुल गाँधी को अब लगता है कि ऐसी बीजेपी की किसी योजना के नाम पर वोट नहीं मिलते तो क्यों उनकी पार्टी ऐसी घोषणाएँ कर रही है, जाहिर है इसमें तथ्य कुछ भी नहीं है और राहुल गाँधी सिर्फ अपनी तरफ से फर्जी नैरेटिव गढ़ रहे हैं।

अंदरूनी सर्वे पर टिके हैं राहुल के दावे

राहुल गाँधी चुनाव में फर्जीवाड़े के जो सब दावे कर रहे हैं उनमें उनका आधार पार्टी के कुछ अंदरूनी सर्वे में हैं। कॉन्ग्रेस के अंदरूनी सर्वे ने राहुल गाँधी को बताया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कर्नाटक में 16 सीटें जीतने जा रही है लेकिन जब कॉन्ग्रेस 16 सीटें ना जीत पाई तो यह चुनावी धोखाधड़ी हो गई। अब यूँ तो बीजेपी भी चुनाव से पहले 400 पार की बात कर रही थी तो क्या ऐसे में बीजेपी को भी सड़क पर उतरकर हल्ला-हंगामा शुरू कर देना चाहिए कि उनका अनुमान या सर्वे गलत साबित हो गया तो पूरा इलेक्शन ही गड़बड़ है।

महाराष्ट्र को लेकर दोहराए आरोप

महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी ने फिर वही पुराने आरोप दोहराते हुए महाराष्ट्र में 40 लाख वोटर बढ़ने पर सवाल उठाए। राहुल गाँधी ने इस बीच एक महत्वपूर्ण बात कही कि उनके पास महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद चुनाव में धाँधली से जुड़ा कोई सबूत नहीं था और बाद में उन्होंने इसकी पड़ताल की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे, राहुल गाँधी की बात मानें तो ये सब आरोप और सवाल बिना किसी सबूत के उठाए जा रहे थे।

महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच वोटरों का बढ़ना कोई नई बात नहीं है और पहले भी ऐसा कई बार देखा जा चुका है। महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी के दावों का हम पहले भी फैक्ट चेक कर चुके हैं जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

राहुल गाँधी ने कहा कि लोगों को महाराष्ट्र के चुनाव में गड़बड़ नजर आई थी। महाराष्ट्र के चुनाव में अगर लोगों को गड़बड़ी लगती तो जाहिर तौर पर प्रदर्शन किए जाते, चुनाव आयोग के दफ्तर का लोग घेराव करते लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। जैसे राहुल गाँधी पहले बिना सबूतों के आरोप लगा रहे थे, वैसे ही इस बार लोगों के कँधे पर बंदूक रखकर अपनी बात सही साबित करने पर तुले हैं।

राहुल गाँधी के सबूत में कितना दम?

अपनी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत के नाम पर राहुल गाँधी ने कर्नाटक की एक लोकसभा सीट (बेंगलौर सेंट्रल) के अंतर्गत आने वाली एक विधानसभा सीट (महादेवपुरा) का डेटा दिया। यानी जिस बम को फोड़ने की बात राहुल गाँधी कर रहे थे वो बिना बारूद वाला ही निकला। इस लोकसभा सीट पर बीजेपी ने 32,707 वोटों पर जीत दर्ज की थी। राहुल गाँधी ने दावा किया इस सीट पर 1,00,250 फर्जी वोटर थे, इनमें उन्होंने डुप्लिकेट वोटर, फेक एड्रेस और गलत फोटो जैसे चीजें बताई।

चुनाव में डेटा एंट्री में गड़बड़ियाँ होती हैं, मतदाता सूची में गलतियाँ रहती हैं और कई बार लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने पर अपना नाम नहीं कटवा पाते या जानबूझकर एक से अधिक जगहों पर वोट डालते हैं।

ये ऐसी समस्याएँ हैं जिनके बारे में लोगों को पता है। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोगों को इस बात का बखूबी अंदाजा है लेकिन ऐसे मुद्दों को राहुल गाँधी ने एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बता दिया है। जो बचकाना आरोपी ही लगता है।

राहुल गाँधी ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को लेकर जो सवाल उठाए हैं वो लंबे वक्त से चले आ रहे हैं। एक घर में कई वोटरों का होना, फोटो सही ना होना, कई जगहों पर एक ही व्यक्ति के वोट होना समस्याएँ हैं और इन्हीं के सुधार के लिए चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रिया शुरू की है। बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है और इस पर भी राहुल गाँधी समेत अन्य विपक्षी दल हंगामा कर रहे हैं।

यह विशुद्ध हंगामा इसलिए हैं कि चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कमियों पर आपत्ति माँगी हैं लेकिन कई दिनों बाद भी एक भी राजनीतिक दल की और से कोई भी आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई है। जब राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस और अन्य दलों के पास अपनी बात सही साबित करने का मौका है तो वे खामोश हैं।

उल्टा अब सवाल राहुल गाँधी पर ही हैं कि अगर वोटिंग लिस्ट में असंगतियाँ होती हैं, जिनका एक लंबा इतिहास है तब भी क्यों वे SIR जैसी प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। राहुल गाँधी और अन्य दलों को ऐसी जाँच के बाद खुलकर चुनाव आयोग का समर्थन करना चाहिए।

कर्नाटक में भी नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में कॉन्ग्रेस को वोटर लिस्ट दी गई थी लेकिन अब तक कॉन्ग्रेस ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने 7 अगस्त को राहुल गाँधी को पत्र लिखा है। आयोग ने राहुल से कहा कि अगर उनके पास वोटर लिस्ट में फर्जी नामों की जानकारी है, तो वे प्रक्रिया के तहत शपथ पत्र के साथ शिकायत दर्ज करें।

राहुल तो ठहरे राहुल, उन्होंने इसका जवाब बाहुबली फिल्म के अंदाज में देते हुए कहा, “मैं राजनेता हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता। मेरे शब्द ही शपथ हैं।” इतने गंभीर विषय पर जवाब देने के बजाय फिल्मी अंदाज में बाद करना ये बताता है कि वो अपने ही आरोपों को लेकर कितने गंभीर हैं।