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अमेरिका के आगे झुकने का सवाल ही नहीं उठता, आपदा में भी अवसर खोज लेना पीएम मोदी की आदत: ‘स्वावलंबी भारत’ खुद दे रहा ‘टैरिफ ट्रंप’ को जवाब

आत्मनिर्भरता भारत, मेक इन इंडिया, आपदा में अवसर पीएम मोदी के ऐसे मंत्र हैं जिनके दम पर भारत दुनिया की पाँच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो पाया है। चाहे अमेरिका-चीन जैसे ट्रेड वॉर हो या कोरोना जैसी वैश्विक महामारी, पीएम मोदी ने हमेशा इन चुनौतियों को अवसर में बदल कर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता दिखाया है।।

जब अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ की घोषणा की, तो मोदी सरकार ने न केवल इसका मुकाबला करने की बात कही, बल्कि घरेलू उद्योगों को और मजबूत कर आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया। अब जब अमेरिका ने टैरिफ 50 फीसदी तक बढ़ा दी है। ऐसे में भारत के लिए आत्मनिर्भरता के लिए उठाए गए कदम बेहद जरूरी लग रहे हैं।

भारत ने अमेरिकी एक्सट्रा 25 फीसदी टैरिफ को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए अपनी स्थिति साफ कर दी है। भारत ने कहा है कि हमारा आयात बाजार पर आधारित है। इसमें भारत के 140 करोड़ लोगों का हित जुड़ा है। पीएम मोदी के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है। इसलिए रूस से कच्चे तेल का आयात भारत जारी रखेगा

टैरिफ बन रहा अमेरिकी हथियार

वैश्विक व्यापार युद्धों में टैरिफ एक प्रमुख हथियार बन गया है। अमेरिका भी यही कर रहा है। 2025 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने पर ‘दंड’ देते हुए 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया। यह भारत- अमेरिकी रिश्तों को एक बड़ा झटका भी है। भारत पर अब 50 फीसदी टैरिफ लग चुका है, लेकिन मोदी सरकार ने इसे चुनौती के रूप में लिया है। सरकार ने साफ किया है कि वह किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। पीएम मोदी ने कहा, ” भारत किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, मुझे इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूँ। “

इससे पहले 2018 से ही पीएम मोदी ने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए आयात पर निर्भरता कम करने के लिए आयात शुल्क बढ़ाए थे। इससे घरेलू उद्योगों को आगे बढ़ने का मौका मिला और रोजगार के अवसर भी बढ़े। मोदी सरकार की ट्रेड पॉलिसी हमेशा संतुलित रही है। अमेरिका के साथ व्यापार डील में भारत ने बोरबॉन व्हिस्की और मोटरसाइकिल जैसे उत्पादों पर टैरिफ घटाए जिससे द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा।

पीएम मोदी की कूटनीति का कमाल है कि ट्रंप जैसे ‘ट्रू फ्रेंड’ के साथ भी रिश्ते मजबूत रखते हुए भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को संरक्षित किया। टैरिफ वॉर में पीएम मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जो वैश्विक दबावों का सामना कर घरेलू हितों की रक्षा कर सकते हैं।

दुनिया के अन्य देशों से बढ़ेगा व्यापार

अमेरिकी टैरिफ जो अब तक 2.6 फीसदी था, वो 27 अगस्त 2025 से 50 फीसदी होने वाला है। इसका असर ये होगा कि अमेरिका में भारत का सामान जो पहले 102.6 रुपए में वो अब 150 रुपए में मिलेगा। इसके मुकाबले वियतनाम, चीन के सामान सस्ते मिलेंगे। इसका असर भारत के सामानों की खपत पर पड़ेगा। भारत इससे मुकाबले के लिए तैयार है। भारत की ब्रिटेन के साथ खुला व्यापार समझौता हो चुका है। यूरोपीय यूनियन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 2024 में भारत के कुल व्यापार का 11.5 फीसदी हिस्सा यूरोपीय यूनियन के साथ हुआ। इसमें और बढ़ोतरी होने की संभावना है। यानी भारत दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ा कर अमेरिकी ‘टैरिफ बम’ को फुस्स कर सकता है।

आत्मनिर्भर भारत से निकलेगा समाधान

2020 में शुरू की गई आत्मनिर्भर भारत अभियान देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिस पर चल कर भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर बढ़ रहा है। इस अभियान के तहत 20 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज घोषित किया गया, जिसमें एमएसएमई सेक्टर के लिए 3 लाख करोड़ रुपए की कोलैटरल-फ्री लोन स्कीम शामिल थी। एमएसएमई में विदेशी निवेश को बढ़ावा देकर सरकार ने लघु, मध्यम और सुक्ष्म उद्योंगो को बढ़ावा दिया है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के तहत लगातार निवेश हो रहा है। केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक इसे 2023 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है।

आत्मनिर्भर भारत के लिए ये पांच हैं जरूरी

आत्मनिर्भर भारत के लिए ये पाँच अहम बिंदू हैं जिनका मजबूत होना जरूरी है। ये हैं- अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर, सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड। कृषि में सप्लाई चेन रिफॉर्म्स से किसानों को लाभ हुआ। फसल बीमा का फायदा किसानों को मिल रहा है। वहीं प्रवासी मजदूरों के लिए ‘वन नेशन वन राशन स्कीम’ फायदेमंद साबित हो रही है।

मिनरल सेक्टर में टैक्स सिस्टम में सुधार से निवेश बढ़ा है। वहीं ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ब्रह्मोस, तेजस जैसे फाइटर एयरक्राफ्ट का कई देशों से ऑर्डर मिला है। ये हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। डिजिटल इंडिया का फायदा भी हमें मिल रहा है। यूपीआई की डिमांड भी विदेशों में हो रही है।

आपदा में अवसर तलाशता रहा है भारत

पीएम मोदी की सबसे बड़ी खासियत है आपदाओं को अवसर में बदलना। कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया की अर्थव्यवस्था हिलोरे मार रही थी। उस वक्त भारत की ग्रोथ रेट दुनिया में सबसे ज्यादा थी। 2020 में जब दुनिया लॉकडाउन में थी, तो पीए मोदी ने घोषणा की कि इस संकट को आत्मनिर्भर भारत बनाने का अवसर बनाएँ। इस दौरान सरकार ने 22.6 बिलियन डॉलर का स्टिमुलस पैकेज लॉन्च किया, जो जीडीपी का 10% था और मेक इन इंडिया को बूस्ट दिया।

इस दौरान भारत ने वैक्सीन का उत्पादन शुरू किया। कोवैक्सीन और कोविशील्ड के जरिए न केवल खुद को बचाया बल्कि कई देशों की मदद की। इस दौरान कृषि क्षेत्र, टैक्स और श्रम कानूनों में भी बदलाव किए गए। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कोविड से लड़ाई में भारत की भूमिका की तारीफ की।

दुनिया को हर आपदा में दी सहायता

चाहे सुनामी हो या साइक्लोन, भारत ने हमेशा राहत कार्यों को तेज किया है और पुनर्निर्माण में मदद की। यहाँ तक कि पड़ोसी मालदीव के कड़वे फैसलों का घूँट पीकर भी भारत मुश्किल घड़ी में उसकी मदद करने सामने आया है। पीएम मोदी ने मालदीव दौरा कर उसे करोड़ों रुपए की आर्थिक सहायता दी। एक समय ऐसा था जब भारत पेट भरने के लिए विदेशों पर निर्भर था। अनाज से लेकर दूध तक विदेशों से आते थे। लेकिन अब भारत इन मामलों में पूरी तरह आत्मनिर्भर है।

देश भर में 8.72 लाख वक्फ प्रॉपर्टी, लेकिन सरकार को नए पोर्टल पर मिले सिर्फ 69 के डाटा: आखिर क्यों WAMSI पर दर्ज जानकारी UMEED पर नहीं दे पा रहे मुस्लिम समाज के लोग?

केंद्र सरकार द्वारा वक्फ संपत्तियों के मैनेजमेंट के लिए 2 महीने पहले शुरू किए गए UMEED पोर्टल पर अब तक केवल 69 वक्फ निर्माताओं (संपत्ति वक्फ करने वाले) ने अपनी संपत्तियों का डेटा अपलोड किया है।

इस पोर्टल पर सारी वक्फ संपत्तियों का ब्यौरा इसके शुरू होने के 6 महीने के भीतर अपलोड किया जाना है। एक और जहाँ पुराने WAMSI पोर्टल पर 8.72 लाख संपत्तियाँ दर्ज हैं तो नए पोर्टल पर वक्फ से जुड़ी संपत्तियों के अपलोड करने में हो रही देरी पर अब सवाल उठने लगे हैं।

केवल 663 ने शुरू की डेटा अपलोड करने की प्रक्रिया

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया है कि अब तक सिर्फ 663 वक्फ निर्माताओं ने डेटा अपलोड करने की प्रक्रिया शुरू की है जिसमें सबसे ज्यादा 163 ओडिशा से हैं ।

रिजिजू द्वारा पेश किए गए आँकड़ों के मुताबिक, अब तक 4 संपत्तियों को खारिज किया जा चुका है जिनमें आंध्र प्रदेश की 3 और ओडिशा की एक संपत्ति शामिल है। वहीं, अब तक एक भी अनुमोदनकर्ता के अनुमोदन को स्वीकृत नहीं किया गया है।

कैसे काम करता है UMEED पोर्टल?

किरेन रिजिजू ने 6 जून को दिल्ली से UMEED पोर्टल की शुरुआत की थी। सरकार के मुताबिक, यह पोर्टल वक्फ संपत्तियों की वास्तविक समय पर अपलोडिंग, सत्यापन और निगरानी के लिए एक सेंट्रल डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। सरकार को उम्मीद थी कि इससे देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।

जानकारी के मुताबिक, इस पोर्टल में 3-स्तरों वाली सत्यापन प्रणाली ‘निर्माता-जांचकर्ता-स्वीकृतकर्ता’ है। इसके तहत एक मुतवल्ली संपत्ति के विवरण को ‘निर्माता’ के रूप में दर्ज करता है जिसके बाद वक्फ बोर्ड के अधिकारियों द्वारा इसका सत्यापन और निर्धारित सरकारी प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड की जांच के बाद स्वीकृति दी जाती है।

रिजिजू ने लोकसभा में बताया कि देश के विभिन्न वक्फ बोर्ड्स द्वारा इस पोर्टल से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए एक हेल्पलाइन भी बनाई गई है। उन्होंने बताया कि 28 जुलाई 2025 तक देश भर से करीब 140 शिकायतें या सुझाव उन्हें मिले और इसके समाधानों को पोर्टल पर ही अपलोड कर दिया गया है।

पुराने पोर्टल पर हैं 8.72 लाख संपत्तियाँ?

अभी तक वक्फ की सभी संपत्तियों का ब्यौरा ‘वक्फ असेट्स मैनेजमैंट सिस्टम ऑफ इंडिया‘ (WAMSI) के पोर्टल पर होता है। WAMSI पर मौजूद डेटा के मुताबिक, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 32 वक्फ बोर्ड के पास 8,72,985 अचल संपत्तियाँ हैं। इन संपत्तियों में 1.5 लाख से अधिक कब्रिस्तान, 1.4 लाख कृषि भूमि से जुड़ी संपत्तियाँ और 1.19 लाख मस्जिदें शामिल हैं।

वहीं, अगर राज्यों की बात करें तो पोर्टल के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में सर्वाधिक 2.17 लाख संपत्तियाँ रजिस्टर्ड हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड और पंजाब वक्फ बोर्ड में क्रमश: 80,922 और 75,965 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं।

संपत्तियाँ दर्ज कराने से क्यों बच रहे हैं वक्फ बोर्ड?

वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और कई जगहों को वक्फ के काम पर जबरन कब्जाने को लेकर लगातार शिकायती सामने आ रही थीं। राज्यों को वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी सामने आए जिसके बाद वक्फ के प्रबंधन को और बेहतर करने के लिए मोदी सरकार ने काम करने शुरू किया। इसके लिए सरकार द्वारा नया वक्फ संशोधन कानून भी बनाया गया है।

UMEED पोर्टल भी इसी कड़ी की एक हिस्सा था जिससे वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन बेहतर हो उनसे जुड़े सही रिकॉर्ड्स भी सरकार तक पहुँच सकें। WAMSI जैसे पोर्टल जहाँ संपत्तियों को दर्ज करने के लिए ज्यादा कानूनी पेचीदगों की जरूरत नहीं हैं, वहाँ लाखों की संख्या में सपत्तियाँ दर्ज हैं तो नए पोर्टल पर संपत्तियाँ दर्ज करने से बोर्ड बचते नजर आ रहे हैं। इसे लेकर ही कई सवाल उठने लगे हैं।

वक्फ कानून को लेकर लगातार हंगामा हुआ था और देशभर में इसके खिलाफ प्रदर्शन किए गए थे, ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कहीं वक्फ बोर्ड से जुड़े लोगों को इस कानून के वापस होने का भरोसा तो नहीं है जिससे ये वक्फ संपत्तियों के विवरण देने से बच सकें।

दूसरी और कई जगहों पर संपत्तियों को अवैध तरह से कब्जा करने के बाद उन्हें जबरन वक्फ घोषित करने जैसे आरोप भी लगाए गए थे तो क्या ऐसा भी संभव है कि बहुत बड़ी संख्या में संपत्तियों से जुड़े कागजात ही बोर्ड्स के पास ना हों और वे अब इनका ब्यौरा देने से बच रहे हों।

रक्षाबंधन पर सीएम योगी का तोहफा, 1.23 करोड़ बहनों को मुफ्त बस यात्रा: ₹101 करोड़ खर्च कर बाखूबी निभा रहे भाई का फर्ज

रक्षाबंधन पर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बहनों को मुफ्त बस यात्रा का जो तोहफा दिया है, उसका लाख 1.23 करोड़ महिलाएँ उठा चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में रक्षाबंधन के समय 3 दिनों तक महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की योजना साल 2017 में शुरू हुई थी। बीते साल 2024 तक 1.23 करोड़ महिलाएँ इस योजना का फायदा उठा चुकी थी। इस दौरान सरकार ने ₹101.42 करोड़ रुपये खर्च किए।

बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2017 में यह योजना शुरू की थी, जिसमें रक्षाबंधन के अवसर पर रोडवेज की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है। इसका उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित, सुविधाजनक और सम्मानजनक यात्रा उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपने भाइयों के पास राखी बांधने बिना किसी आर्थिक चिंता के जा सकें।

इस योजना की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब 11,16,332 महिलाओं ने इसका लाभ उठाया और सरकार ने ₹6.08 करोड़ की टिकट लागत वहन की। अगले वर्ष 2018 में यह संख्या बढ़कर 11,69,226 हो गई और ₹7.41 करोड़ खर्च किए गए।

2019 में 12,04,085 महिलाओं को ₹7.68 करोड़ की टिकट राशि दी गई। हालाँकि 2020 में कोविड-19 के कारण लाभार्थी संख्या घटकर 7,36,605 रह गई और टिकट पर ₹4.82 करोड़ खर्च हुए। 2021 में यह संख्या फिर बढ़कर 9,63,466 हो गई और सरकार ने ₹8.91 करोड़ खर्च किए।

इसके बाद योजना ने रफ्तार पकड़ी और 2022 में 22,32,322 महिलाओं को ₹18.98 करोड़ का लाभ मिला। 2023 में यह योजना सबसे अधिक प्रभावी रही, जब 29,29,755 महिलाओं ने मुफ्त यात्रा की और टिकट पर ₹27.66 करोड़ खर्च हुए।

वहीं 2024 में अब तक 19,78,403 महिलाएँ इसका लाभ ले चुकी हैं और सरकार ने ₹19.87 करोड़ की टिकट लागत वहन की है। यह आँकड़े दर्शाते हैं कि योजना का प्रभाव हर वर्ष बढ़ता गया और महिलाओं में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

इस योजना से खासतौर पर ग्रामीण इलाकों, पिछड़े वर्गों और निम्न आय वर्ग की महिलाएँ लाभान्वित हुई हैं। उनके लिए यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि ‘सम्मान का तोहफा’ है।

यह योजना दिखाती है कि सरकार केवल घोषणाएँ नहीं कर रही, बल्कि जमीन पर ठोस काम कर रही है। महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सुविधा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता इस योजना से साफ नजर आती है।

पुनौरा धाम ही नहीं, उस फुलहर को भी सँवार रही नीतीश सरकार जहाँ पहली बार मिले राम-जानकी के नयन: सीतामढ़ी को मोदी सरकार ने दी ‘अमृत भारत’

बिहार के सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को माँ जानकी के भव्य मंदिर की आधारशिला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह रखेंगे। इससे पहले मोदी सरकार ने सीतामढ़ी को ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ का उपहार दिया है।

सीतामढ़ी से दिल्ली के बीच चलने वाली इस ट्रेन को अमित शाह 8 अगस्त को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। पुनौरा धाम के साथ बिहार की नीतीश सरकार भगवान राम और माँ सीता से जुड़े फुलहर जैसे अन्य स्थलों को भी नव जीवन प्रदान कर रही है। साथ ही अयोध्या से पुनौरा धाम को सीधे जोड़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का भी निर्माण हो रहा है।

जानकारी के अनुसार, जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने सीतामढ़ी और दिल्ली के बीच नई अमृत भारत ट्रेन को मंजूरी मिलने की जानकारी साझा की है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने कहा, “माँ जानकी की पावन प्राकट्य स्थली पुनौराधाम (सीतामढ़ी) में 8 अगस्त को होने वाले भव्य माँ जानकी मंदिर के निर्माण के भूमि पूजन एवं कार्यारंभ कार्यक्रम के दौरान गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाएँगे।”

सीतामढ़ी और दिल्ली के बीच नई अमृत भारत ट्रेन की सेवा शुरू करने के लिए संजय झा के नेतृत्व में NDA के कुछ सांसद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से 5 अगस्त 2025 को मिले थे। अब पुनौरा धाम में रेलवे स्टेशन बनाने की भी माँग हो रही है। इसके लिए बिहार के मुख्य सचिव अमृत लाल मीणा ने रेलवे बोर्ड को पत्र लिखा है। उनका कहना है कि माँ सीता के मंदिर तक पहुँचने के लिए नेशनल हाईवे का निर्माण हो रहा है। लेकिन जब रेलवे लाइन भी मंदिर के पास से गुजरती है तो पुनौरा धाम में रेलवे स्टेशन का भी निर्माण किया जाना चाहिए।

माँ जानकी के प्राकट्य स्थल के पुनरुद्धार के साथ-साथ केंद्र सरकार भगवान राम और माँ सीता से संबंधित अन्य स्थानों का भी विकास कर रही है। 26 जुलाई 2025 को सीएम नितीश कुमार ने एक्स पर एक पोस्ट साझा किया था। इसमें उन्होंने बताया था, “मधुबनी जिले में अवस्थित फुलहर स्थान, हरलाखी की पावन धरती माता जानकी और प्रभु श्रीराम के प्रथम मिलन की साक्षी रही है। यह स्थान उनके प्रथम मिलन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।”

सीएम नितीश ने आगे लिखा, “मधुबनी जिले के हरलाखी में यात्रियों की सुविधा के लिए 31.13 करोड़ रुपए की लागत से पर्यटकीय सुविधाओं के विकास कार्य के शिलान्यास की घोषणा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।” बता दें कि यह स्थान श्री राम और सीता के प्रथम मिलन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

इसके अलावा रामनवमी के अवसर पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने बिहार को राम जानकी पथ के रूप में एक बड़ी सौगात दी थी। माता जानकी की जन्मस्थली सीतामढ़ी को भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या से जोड़ने वाले राम-जानकी पथ को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण भी माना जा रहा है।

बता दें कि राम-जानकी मार्ग उत्तर प्रदेश-बिहार बॉर्डर के समीप मेहरौना घाट से शुरू होगा और सीवान, सारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर होते हुए सीतामढ़ी के भिट्ठा मोड़ तक जाएगा। इस 240 किलोमीटर लंबी और 70 मीटर चौड़ी सड़क परियोजना पर होने वाली कुल अनुमानित लागत करीब 6155 करोड़ रुपये आँकी गई है।

राम जानकी मार्ग विकसित होने से राम जन्मभूमि अयोध्या और माता सीता की जन्मस्थली तक भक्तों के लिए यात्रा सुविधाजनक हो जाएगी। वहीं इस मार्ग के बनने से क्षेत्र में पर्यटन विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।

किसानों के हितों के लिए रोकी अमेरिका से ट्रेड डील, खुद भी ‘कीमत’ चुकाने को तैयार हो गए PM मोदी: जानिए कैसे लाखों करोड़ खर्च कर भारत का एग्री सेक्टर बचा रही भाजपा सरकार

1960 के दशक में देश अनाज की भयानक कमी से जूझ रहा था। बड़ी आबादी विदेशों से आने वाली मदद पर निर्भर थी। सूखे और उत्पादन में कमी ने समस्या को विकराल बना दिया था। तब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा दिया था। इसके बाद देश का खाद्य उत्पादन सेक्टर बदल गया। हमारे किसान आत्मनिर्भर हो गए। PM शास्त्री के 6 दशकों के बाद भारत को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसने किसानों के हितों के लिए अमेरिका से लड़ाई मोल ले ली है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसानों और पशुपालकों के हितों से समझौता नहीं करने वाले हैं। नई दिल्ली में एमएस स्वामीनाथन शताब्दी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने बिना ट्रंप या टैरिफ का जिक्र किए हुए कहा, “किसानों का हित हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। और मुझे पता है कि इसके लिए मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं तैयार हूँ।”

PM मोदी ने कहा कि देश के किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हित में भारत तैयार है। उनके इस बयान ने स्पष्ट कर दिया कि भारत का किसानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्या रवैया रहने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दिया है। अमेरिका ने यह टैरिफ दो किश्तों में लगाए हैं। अमेरिका का कहना है कि रूस से तेल खरीद के चलते भारत पर यह टैरिफ लगाए गए हैं।

दूध के सौदे’ से मोदी सरकार ने किया इनकार

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा है कि वह आने वाले समय में टैरिफ की दरें और बढ़ाएंगे। अमेरिका का भारत पर टैरिफ लगाने का फैसला व्यापार समझौते की बातचीत टूटने के बाद सामने आया। बीते लगभग 3-4 महीनों से यह बातचीत चल रही थी। इसलिए लिए भारतीय और अमेरिकी अधिकारी पाँच बार मिल चुके थे। समझौते की अधिकांश बातों पर दोनों पक्ष सहमत भी थे। यहाँ तक कि यह उम्मीद भी जताई गई थी कि अमेरिका के 15% टैरिफ पर भारत के साथ समझौता हो जाएगा।

यह समझौता 1 अगस्त के पहले होना था। हालाँकि, भारत इसमें कुछ चीजों पर अड़ गया और उसने इनके बिना समझौता करने से इनकार कर दिया। इसके चलते अंतिम मौके पर ट्रेड डील टूट गई। सामने आई जानकारी के अनुसार, अंतिम मौके तक सारी बातें तो तय हो गईं थी लेकिन पूरा मामला डेयरी और कृषि सेक्टर पर फँसा हुआ था। मोदी सरकार ने अमेरिका से साफ़ कर दिया कि वह डेयरी और कृषि क्षेत्र में कोई भी रियायतें नहीं देगी।

अमेरिका लगातार यह चाहता था कि उसके यहाँ उत्पादित दूध और कृषि उत्पाद भारत में बेचे जाए। SBI की एक रिपोर्ट बताती है कि यदि अमेरिकी कम्पनियों को भारत में डेयरी क्षेत्र में खुला एक्सेस दे दिया जाता तो इससे देश में दूध की कीमतें 15% तक गिर सकती थीं। इसके चलते भारतीय दूध उत्पादकों को ₹1 लाख करोड़ तक का नुकसान होता। इससे दूध का आयात 250 लाख टन/वर्ष बढ़ जाता। भारतीय डेयरी उत्पादकों को लागत निकालने में भी समस्या आती और पहले से स्थापित डेयरी चलाने में मुश्किल होती।

इससे भारत में 8 करोड़ डेयरी उत्पादकों के रोजगार पर खतरा मंडराने लगता और बड़ी समस्याएँ खड़ी होतीं। यही नहीं दूध की कीमतों में गिरावट सीधे तौर पर भारतीय गायों की नस्लों को तक प्रभावित करती। भारत ने अमेरिका की डेयरी पर जिद मानने से इसलिए भी इनकार कर दिया क्योंकि वह अपने यहाँ इस सेक्टर को 30 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.5 लाख करोड़) तक की सब्सिडी देता है। इसमें से ₹85 हजार करोड़ तो सीधे तौर पर दूध उत्पादकों को दी जाती हैं।

इस फायदे को लेकर अमेरिकी डेयरी उत्पादक भारत आते और भारतीय उत्पादकों से सस्ता दूध बेच कर उन्हें धंधे से बाहर करते। यह मोदी सरकार को नहीं मंजूर हुआ, उसने इसके चलते यहाँ समझौते से इनकार का दिया और मेज पर रखी ट्रेड डील को ठुकराने में भी हिचक नहीं दिखाई। उसने ट्रंप सरकार को स्पष्ट कर दिया कि वह भारतीय पशुपालकों के हितों को सबसे ऊपर रखेगी ना कि अमेरिकी कारोबारी घरानों को।

किसानों के हितों के चलते नहीं की डील

मोदी सरकार ने डेयरी के साथ ही किसानों के हितों को भी सबसे ऊपर रखा। ट्रेड डील के लिए अमेरिका भारत के खाद्य बाजार में भी एंट्री चाहता था। अमेरिका भारत में सेब, बादाम और GM फसलें बेचना चाहता था। भारत ने लगातर GM फसलों का विरोध किया है। अमेरिका के भारत में इन उत्पादों को आयात करने से छोटे किसान प्रभावित होते। भारत में सेब जैसे फल हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के छोटे किसान उगाते हैं। अमेरिका में यही काम बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ करती हैं।

ऐसे में इनकी भारतीय बाजार में एंट्री ना सिर्फ छोटे किसानों के लिए हानिकारक होती बल्कि इससे देश में रोजगार का संकट भी पैदा हो सकता था। भारत में अब भी लगभग 70 करोड़ लोग कृषि पर ही निर्भर हैं। भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 20% कृषि क्षेत्र से आता है। इसके अलावा अमेरिका यहाँ के बाजार में GM फसलें भी बेचना चाहता है। भारत ने वर्षों से GM फसलों को स्वास्थ्य और पर्यावरण चिंताओं के चलते रोक रखा है।

भारत कई विदेशी खाद्य उत्पादों पर 150% तक की इम्पोर्ट ड्यूटी लगाता है। इससे वह अपने यहाँ किसानों के हितों को प्रभावित होने से रोकता है। यही कदम उसने अमेरिका से डील के मामले में उठाया। भारत ने स्पष्ट किया कि वह बड़े टैरिफ और लाखों करोड़ के व्यापार घाटे को लेकर तो चीजें झेल सकता है लेकिन किसानों और डेयरी उत्पादकों के हितों को प्रभावित नहीं होने देना चाहता है, क्योंकि इससे जुड़े लोग ही भारत की आत्मा हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ तक स्पष्ट किया कि वह इसके लिए ‘बड़ी कीमत’ चुकाने को तैयार हैं।

सम्मान निधि से MSP तक: मोदी सरकार किसानों के लिए करती रही है काम

प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी टैरिफ केचलते किसानों के हितों की बात की हो, ऐसा कुछ नहीं है। मोदी सरकार जबसे सत्ता में आई है, उसने किसानों के भले के लिए कई कदम उठाए हैं। मोदी सरकार ने फसलों की MSP को लेकर अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है। उदाहरण के लिए धान की MSP 2013-14 में ₹1310 थी जो 2024-25 में बढ़ कर ₹2300 से अधिक हो गई। इस प्रकार इन दामों में लगभग 80% की बढ़त की गई।

2014 तक देश में लगभग ₹4 लाख करोड़ की ही फसलें सरकार खरीद रही थी। मोदी सरकार में यह 4 गुना हो कर ₹16 लाख करोड़ पहुँच चुकी है। इसके अलावा मोदी सरकार ने किसानों को सीधा नकद लाभ भी दिया है। मोदी सरकार ने 2019 से 2025 के बीच किसानों को ₹3.69 लाख करोड़ सम्मान निधि के रूप में दिए हैं। यह पैसे किसानों को खाद-बीज खरीदने में काम आते हैं। देश में लगभग 10 करोड़ किसान इसका लाभ ले रहे हैं।

इसके अलावा मोदी सरकार ने किसानों के क्रेडिट कार्ड की सीमा भी बढ़ाई है। नैनो यूरिया जैसी कई सुविधाएँ दी हैं। ऐसे में चाहे सामने अमेरिका हो या कोई और ताकत, भारत किसानों के हित में हमेशा खड़ा मिलेगा।

SC ने खारिज की ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका, इन हाउस कमेटी को बताया था अवैध: महाभियोग का रास्ता हुआ साफ

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने अपने घर में मिले कैश को लेकर चल रही इन-हाउस जाँच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और एजी मसीह की पीठ ने ये कहकर याचिका खारिज कर दी कि इन-हाउस समिति का गठन और उसकी जाँच प्रक्रिया गलत नहीं थी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व CJI संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को अपने पद से इस्तीफा देने की सलाह दी जिसे वर्मा ने इंकार कर दिया। इसके बाद CJI ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की।

इस पर कोर्ट ने कहा, “हमने माना है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को CJI द्वारा पत्र भेजना असंवैधानिक नहीं था। हमने कुछ टिप्पणियाँ की हैं। इसका उपयोग जस्टिस वर्मा आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई में विकल्प के तौर पर भविष्य में कर सकते हैं।”

पिछली सुनवाई के दौरान पीठ ने यह सवाल उठाया था कि यदि जस्टिस वर्मा को समिति का गठन असंवैधानिक लगता था, तो उन्होंने शुरुआत में ही इसका विरोध क्यों नहीं किया। पीठ ने टिप्पणी की कि वर्मा ने जाँच प्रक्रिया में भाग लिया था, इसलिए अब वे उसकी रिपोर्ट की वैधता को चुनौती नहीं दे सकते।

क्या था पूरा मामला

ये मामला 14 मार्च 2025 को सामने आया था जब दिल्ली में जस्टिस वर्मा के घर में आग लग गई थी। इसके बाद दमकल विभाग को वहाँ एक कमरे से बड़ी संख्या में जली हुई नकदी मिली थी। इसके बाद उन पर जाँच बैठी। मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया और उनसे सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिए।

जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट पूरी की। इसमें पाया गया कि नकदी को 15 मार्च की सुबह वहाँ से हटाया गया था। समिति में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश के सीजे जीएस संधवालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।

जाँच प्रक्रिया में जस्टिस वर्मा के साथ उनकी बेटी और 55 अन्य गवाहों ने भी अपना बयान दर्ज करवाया था। इसके बाद रिपोर्ट में इस बात को माना गया कि जिस कमरे में नकदी थी वह वर्मा के परिवार के नियंत्रण में था। हालाँकि जस्टिस वर्मा इस मामले में कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दे सके इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई करने की बात रिपोर्ट में शामिल की गई।

जाँच के खिलाफ गुमनाम याचिका

इस कमेटी के फैसले के खिलाफ जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल की। हालाँकि उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए XXX यानी गुमनाम के तहत आवेदन किया। अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने आरोप लगाया कि जाँच समिति ने पूर्वनिर्धारित मानसिकता के साथ अपनी रिपोर्ट पूरी की। अनुमान के आधार पर सवाल पूछे गए। साथ ही उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया गया।

अपनी याचिका में उन्होंने यह भी कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई सिफारिश असंवैधानिक थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया के अनुसार ऐसा करना आवश्यक नहीं था।

याचिका की सुनवाई के दौरान सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए। उन्होंने कहा कि इन-हाउस समिति को किसी न्यायाधीश को हटाने की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है और इसका कार्यक्षेत्र केवल मुख्य न्यायाधीश को सलाह देने तक सीमित है।

दलीलों पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि CJI केवल ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं हैं। उनका काम केवल फाइलें आगे बढ़ाना नहीं है, बल्कि न्यायपालिका के नेता के रूप में राष्ट्र के प्रति उनका कर्तव्य है। उनके पास न्यायिक दुराचार पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब संसद में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह भारत के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है, क्योंकि यह संभवतः पहला मामला होगा जिसमें किसी हाईकोर्ट जज को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ के आगे नहीं झुकेगा ब्राजील: ट्रंप को फोन नहीं करेंगे राष्ट्रपति सिल्वा, भारत-चीन से बात करेंगे ताकि दे सकें जवाब

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ के मुद्दे पर ब्राजील ने जवाब दिया है। ब्राजील के राष्ट्रपति लुला डा सिल्वा ने कहा है कि वे ट्रंप से टैरिफ के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ट्रंप किसी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि वो अपमानित कर रहे हैं।

लूला ने आगे कहा कि वो चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करेंगे। ट्रंप ने ब्राजील पर सबसे ज्यादा 50 फीसदी टैरिफ लगा दी थी। हालाँकि अब भारत पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगा चुके हैं।

ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा, “मैं राष्ट्रपति ट्रंप को कॉल करने नहीं जा रहा हूँ, क्योंकि वो बात नहीं करना चाहते। लेकिन इतना तय है कि मैं उन्हें सीओपी में आने के लिए आमंत्रित करने के लिए फोन करूँगा, क्योंकि मैं जानना चाहता हूँ कि वह जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर क्या सोचते हैं। मैं फोन करने का शिष्टाचार दिखाऊँगा, मैं उन्हें फोन करूँगा। मैं शी जिनपिंग को फोन करूँगा। मैं प्रधानमंत्री मोदी को फोन करूँगा। मैं पुतिन को फोन नहीं करुँगा क्योंकि वो यात्रा नहीं कर सकते। लेकिन मैं कई राष्ट्रपतियों को फोन करुँगा।”

राष्ट्रपति लुला ने आगे कहा, “जिस दिन मुझे विश्वास हो जाएगा कि ट्रंप वार्ता के लिए तैयार हैं, मैं फोन करने में नहीं हिचकिचाऊँगा।” गौरतलब है कि 1 अगस्त 2025 को ट्रंप ने कहा था कि ब्राजील के राष्ट्रपति सिल्वा उन्हें टैरिफ पर चर्चा करने के लिए फोन कर सकते हैं।

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने लूला को लेकर कहा था, “वह जब चाहें मुझसे बात कर सकते हैं। मेरा ब्राजील के साथ काफी लगाव है लेकिन ब्राजील को चलाने वाले लोगों ने गलत काम किया है। “

यह बयान ऐसे समय में आया है जब ट्रंप ने कहा था कि वह ब्राजील की वस्तुओं पर 50 फीसदी टैरिफ लगाएँगे। ट्रंप ने 30 जुलाई को इस आदेश पर हस्ताक्षर किए थे।

राष्ट्रपति ट्रंप ने एक पत्र लिखा था जिसमें धमकी दी थी कि अगर ब्राजील दक्षिणपंथी पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो पर दायर मुकदमा खत्म नहीं करता है, तो भारी टैरिफ लगाया जाएगा। उन्होंने ब्राजील सरकार पर ‘गंभीर मानवाधिकार हनन’ का आरोप लगाते हुए कहा था कि ब्राजील में कानून का शासन कमजोर हो रहा है। बोल्सोनारो और ट्रंप के बीच नजदीकी सुर्खियों में रही है। उन पर लूला के खिलाफ तख्तापलट की कोशिश करने के आरोप में मुकदमा चल रहा है। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इसपर आपत्ति जताई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि बोल्सोनारो के खिलाफ मुकदमा ‘राजनीति से प्रेरित’ है।

लूला ने ब्रिक्स पर भरोसा जताया

राष्ट्रपति लूला ने भी ब्रिक्स पर भरोसा जताया और कहा, ‘अभी तक ब्रिक्स के बीच कोई समन्वय नहीं है, लेकिन होगा। ब्राजीलियाई राष्ट्रपति के कड़े बयानों ने ट्रंप को एक बार फिर शर्मिंदा कर दिया है। टैरिफ को हथियार बनाने और संप्रभु राष्ट्रों के खिलाफ दबाव बनाने की ट्रंप की कोशिशों से अमेरिका को कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिले हैं।

6 अगस्त को डोनाल्ड ट्रंप ने उस आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया। इसके साथ ही भारत पर कुल टैरिफ 50% हो गया है।

विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि भारत सरकार दोहराती है कि ये कार्रवाई अनुचित, अनुचित और अविवेकपूर्ण है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “हमने इन मुद्दों पर अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि हमारे आयात बाजार पर निर्भर करता है। इसलिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका ने भारत पर उन कदमों के लिए अतिरिक्त शुल्क लगाने का विकल्प चुना है जो कई अन्य देश भी अपने राष्ट्रीय हित में उठा रहे हैं।”

पिछले महीने, ट्रंप ने भारत पर नए व्यापार दंडों की घोषणा की थी, जिसमें 1 अगस्त से प्रभावी लगभग सभी भारतीय सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ शामिल है। ट्रंप ने इस पर भी अपनी निराशा जताई थी कि भारत रूस से सैन्य और रक्षा उपकरण खरीदने वाला अहम देश है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने 1 अगस्त को ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने भारतीय और रूसी अर्थव्यवस्थाओं को ‘डेड’ बताया। उन्होंने ये भी कहा कि भारत उन देशों में शामिल है जहाँ ‘दुनिया में सबसे अधिक टैरिफ’ लगाया जाता है। उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार कम होने के लिए भारत के टैरिफ को भी जिम्मेदार ठहराया था।

हालाँकि ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे अमेरिका खुद रूस के साथ व्यापार जारी रखे हुए है। रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के तीन साल बाद भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने मास्को के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को खत्म नहीं किया है। जनवरी 2022 से अमेरिका ने 24.5 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के रूसी सामान का आयात किया है। 2025 में अब तक अमेरिका 1.27 अरब डॉलर के खाद और उर्वरक, 62.4 करोड़ डॉलर के यूरेनियम और प्लूटोनियम, 87.8 करोड़ डॉलर के पैलेडियम खरीद चुका है।

जनवरी से नवंबर 2024 की अवधि में पैलेडियम और एल्युमीनियम जैसी धातुओं का आयात 876.5 मिलियन डॉलर का था। अकार्बनिक रसायनों का आयात 683 मिलियन डॉलर का था। बिजली से जुड़े उपकरण का आयात 79 मिलियन डॉलर और कॉर्क और लकड़ी का लगभग 64 मिलियन डॉलर का आयात था। इसके अलावा परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, तैयार पशु आहार, लोहा और इस्पात, और तिलहन आदि के 80.81 मिलियन डॉलर मूल्य के आयात शामिल थे।

विडंबना यह है कि यूक्रेन के साथ चल रहे संघर्ष के बावजूद रूस से अमेरिकी आयात के बारे में पूछे जाने पर राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि उन्हें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है।

भारत ने रूस के साथ संबंध तोड़ने से इनकार किया है। प्रधानमंत्री मोदी एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होने चीन जा रहे हैं। भारत रूस के साथ संबंधों को मजबूत कर रहा है। इससे ये संदेश दिया जा रहा है कि ट्रम्प की इच्छा के मुताबिक भारत नहीं चलेगा और अपने सहयोगियों को कभी नहीं छोड़ेगा। जब ट्रम्प भारत के विरुद्ध अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर रहे थे, उसी वक्त भारत और रूस औद्योगिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कर रहे थे।

प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए चीन का दौरा करने जा रहे हैं। पिछले सात वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी की यह पहली चीन यात्रा है। भारत और चीन के अपने-अपने मुद्दे हैं, चाहे वह वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की आक्रामकता हो, आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले पाकिस्तान का समर्थन हो, या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की कार्रवाई में बाधा डालना हो। हालाँकि जब पश्चिमी आधिपत्य के विरुद्ध राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता की रक्षा की बात आती है, तो दोनों देश सहयोग के लिए तैयार दिखाई देते हैं।

भारत, ब्राज़ील और चीन, चल रहे ‘टैरिफ के खेल’ में ट्रम्प के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ब्रिक्स देशों को ‘दंडित’ करने करने की कोशिश उनकी एकता का सूत्रधार बन सकता है।

( यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

स्पेन के जिस शहर पर रहा मुसलमानों का रहा सदियों तक कब्जा, वहाँ खुले में ईद-बकरीद भी नहीं मना पाएँगे मुस्लिम: इस्लामी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए ईसाई हुए एकजुट

यूरोप में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को अब सरकारें भी महसूस कर रही हैं। इसी क्रम में स्पेन में जुमिला नाम के शहर में ईद-बकरीद जैसे त्योहारों को पब्लिक प्लेस पर मनाने पर बैन लगा दिया गया है। स्पेन का जुमिला शहर कभी सदियों तक मुसलमानों के कब्जे में रहा था। खुद स्पेन के बड़े हिस्से पर इस्लामी सल्तनत ने राज किया था, लेकिन अब जुमिला की लोकल अथॉरिटी ने बाकायदा एक प्रस्ताव पास किया है। इसके मुताबिक, ‘ईसाइयों’ के शहर में ‘इस्लामी’ त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोक दिया गया है।

ईसाइयों की पार्टी ने ‘गायब’ रहकर पास कराया प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्ताव को कंजर्वेटिव मानी जाने वाली पीपल्स पार्टी (पीपी) ने पेश किया था और वामपंथी पार्टियों ने इसका विरोध किया। वहीं, वोटिंग के दौरान दक्षिणपंथी पार्टी ‘वॉक्स’ अनुपस्थित रही थी लेकिन फिर भी इस प्रस्ताव को पास करा लिया गया है।

इस प्रस्ताव में कहा गया है, “नगरपालिका खेल सुविधाओं का उपयोग हमारी पहचान से अलग की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा इसका आयोजन न किया जाए।”

‘वॉक्स’ पार्टी ने इस फैसले पर कहा, “वॉक्स के चलते स्पेन के सार्वजनिक जगहों पर इस्लामी त्योहारों पर प्रतिबंध लगाने का पहला कदम पारित हो गया है। स्पेन हमेशा से ईसाइयों का रहा है और हमेशा रहेगा।”

क्या कह रहे हैं विरोधी दल और मुस्लिम नेता?

इस फैसला का विरोधी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है। स्पैनिश फेडरेशन ऑफ इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख मुनीर बेनजेलून अंडालूसी अज़हरी ने एक अखबार से बातचीत में दावा किया कि यह प्रतिबंध इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा, “30 वर्षों में पहली बार मुझे डर लग रहा है। वे किसी दूसरे धर्म पर नहीं सिर्फ हमारे धर्म पर हमला कर रहे हैं।”

वहीं, मर्सिया क्षेत्र के समाजवादी नेता फ्रांसिस्को लुकास ने इस फैसले को लेकर कहा, “पीपी पार्टी संविधान का उल्लंघन करती है और सिर्फ सत्ता की चाह में सामाजिक एकता को खतरे में डाल रही है।” शहर के पूर्व समाजवादी मेयर जुआना गार्डियोला ने कहा, “यहाँ सदियों पुरानी मुस्लिम विरासत का क्या होगा?”

कोर्ट में जाएगा मामला?

जानकारी के मुताबिक, स्थानीय कानून विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया जा सकता है। यह फैसला स्पेन के संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है।

इस अनुच्छेद में कहा गया है, “व्यक्तियों और समुदायों की विचारधारा, धर्म और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाती है और उनकी अभिव्यक्ति पर कोई अन्य प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, सिवाय इसके कि कानून द्वारा संरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो।”

जुमिला और इस्लाम

जुमिला शहर का इतिहास रोमन साम्राज्य से जुड़ा है। 8वीं शताब्दी में अरबों द्वारा कब्जा किए जाने के पहले यह रोमन साम्राज्य का हिस्सा होता था। इसके बाद यह सदियों तक अरबों का शहर रहा और इसका नाम युमिल-ला हुआ करता था।

इसके बाद 13वीं शताब्दी के मध्य में कैस्टिले के अल्फोंसो X के नेतृत्व में ईसाइयों ने इस पर हमला कर वापस इसे अपने कब्जे में ले लिया था। मौजूदा समय में जुमिला की आबादी करीब 27,000 है, जिसमें करीब 7.5% आबादी मुस्लिमों की है।

जम्मू-कश्मीर में आतंक-अलगाववाद को बढ़ाने वाली 25 किताबें बैन, अरुंधति रॉय की ‘आजादी’ भी लिस्ट में शामिल: पंजाब-तेलंगाना को उपनिवेश बताने वाली वामपंथन पर चल रहा UAPA केस

जम्मू-कश्मीर सरकार ने हाल ही में वामपंथी अरुंधति रॉय सहित अन्य लेखकों की 25 किताबों पर बैन लगा दिया है। सरकार का कहना है कि ये किताबें अलगाववादी सोच को बढ़ावा देती हैं। सरकार ने कहा है कि यह देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं। सरकार ने बताया है कि ये किताबें युवाओं को भड़काने का काम करती हैं।

यह फैसला जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग ने लिया है। सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि इन किताबों में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और आतंकवादियों को हीरो की तरह दिखाया गया है। सरकार ने बताया है कि सेना और सुरक्षा बलों की छवि को इसमें खराब किया गया है और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है।

इन किताबों पर युवाओं को हिंसा की तरफ ले जाने वाली सोच को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया गया है। इन किताबों को भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152, 196 और 197 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 98 के तहत जब्त घोषित कर दिया गया है।

कौन-कौन सी किताबें कश्मीर में हुईं बैन

बैन की गई किताबों में कई वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथियों की किताबें शामिल हैं। इसमें अरुंधति रॉय की किताब ‘आजादी’, ए जी नूरानी की किताब ‘द कश्मीर डिस्प्यूट, 1947-2012’, सुमंत्रा बोस की ‘कश्मीर ऐट द क्रॉसरोड्स’ और ‘कॉन्टेस्टेड लैंड्स’, डेविड देवदास की  ‘इन सर्च ऑफ अ फ्युचर: द कश्मीर स्टोरी’ और पत्रकार अनुराधा भसीन की ‘अ डिसमैंटल्ड स्टेट: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370′ जैसी किताबें हैं।

इसमें विदेशी लेखकों की भी कई किताबें शामिल हैं, जैसे हाफ्सा कंजवाल की ‘क्लोंजिंग कश्मीर’, हेली दुशिंस्की की  ‘रेसिस्टिंग ऑकुपेशन इन कश्मीर’, विक्टोरिया स्कोफील्ड की ‘कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट’ और क्रिस्टोफर स्नेडन की ‘इंडिपेंडेंट कश्मीर’। कश्मीर पर लगातार प्रोपगेंडा चलाने वाले वामपंथियों के अलावा इस्लामी कट्टरपंथियों की किताबें भी बैन की गई हैं। इसमें मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘अल जिहाद फिल इस्लाम’ और हसन अल-बन्ना की ‘मुजाहिद की अजान’ भी शामिल है।

बाकी किताबों में पिओत्र बाल्सेरोविक्ज और अग्निएश्का कुसेव्स्का की लॉ एंड कॉन्फ्लिक्ट इन कश्मीर, डॉ. शमशाद शान की ‘यूएसए एंड कश्मीर’, और डॉ. अफाक की ‘तारिख-ए-सियासत कश्मीर’ भी शामिल हैं। सरकार ने बताया है कि इस तरह की किताबें युवाओं के मन में असंतोष, कट्टरता और देशविरोधी विचार पैदा करती हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं। इसलिए अब इन किताबों का छपना, बाँटना या रखना गैरकानूनी है।

वामपंथी अरुंधति रॉय पर चल रहा UAPA का मुकदमा

दिल्ली के LG वीके सक्सेना ने जून 2024 में अरुंधति रॉय के खिलाफ UAPA कानून के तहत केस चलाने की मंजूरी दी थी। अरुंधति रॉय पर 21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली के कॉपरनिकस रोड पर मौजूद LTG ऑडिटोरियम में ‘आजादी – द ओनली वे’ के बैनर तले आयोजित एक सम्मेलन में भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा था।

बता दें कि सम्मेलन में ‘कश्मीर को भारत से अलग करने’ का प्रचार किया गया था। 21 अक्टूबर 2010 को दिए भाषणों को लेकर कश्मीर के सामाजिक कार्यकर्ता सुशील पंडित ने 28 अक्टूबर को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत में यह आरोप लगाया गया था कि रॉय ने जोर देकर कहा था कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था, उस पर भारतीय सशस्त्र बलों ने जबरन कब्जा किया था। शिकायत में कहा गया था कि अरुंधति रॉय ने इस कायर्क्रम में कहा कि भारत से जम्मू-कश्मीर की आजादी के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए।

शिकायतकर्ता ने इन बयानों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराई थी। इसके बाद दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद वामपंथन अरुंधति रॉय के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी।अक्टूबर 2023 में भी दिल्ली LG वीके सक्सेना ने दूसरी धाराओं में मुकदमा चलाने की मंजूरी दी थी।

सभी राज्यों को उपनिवेश बताती है वामपंथन अरुंधति

अरुंधति रॉय सिर्फ कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के बाकी इलाकों को भी तोड़ने की बातें करती आई है। उसने 2011 में ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिन्स्टर के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, ह्यूमैनिटीज़ एंड लैंग्वेजेज के तत्वावधान में ऐसा ही जहर उगला था।

रॉय ने कहा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत ने एक तरह से उपनिवेशवाद ही किया है और आज तक भारत के लोग भारतीय सेना की बर्बरता झेल रहे हैं। रॉय ने आगे कहा था कि हर जगह के कबीलाई लोग, एवम् समुदाय विशेष और ईसाई भारतीय राष्ट्र के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं।

वामपंथी अरुंधति रॉय ने दावा किया था कि आजादी के बाद भारत ने इन सारे राज्यों को उपनिवेश बना लिया और वो अपनी आजादी के लिए संघर्षरत हैं। ये कहते हुए रॉय ने कश्मीर से शुरुआत की और पंजाब, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, गोवा होते हुए तेलंगाना और हैदराबाद तक पहुँच गई थी।

साथ ही, रॉय ने बिना झिझक के यह भी कहा कि इस तरह की बर्बरता तो पाकिस्तान की फौज भी नहीं करती। आगे इन्होंने बताया कि अपर कास्ट हिन्दू राष्ट्र लगातार युद्ध की स्थिति में रहा है।

उसने कहा था, “पाक फौज बलूचिस्तान में जो कुछ भी कर रही है या बांग्लादेश में उसने जो नरसंहार किया- इस बारे में मेरी राय कभी भी अस्पष्ट नहीं रही है। मैंने इस बारे में काफी कुछ लिखा है। हिन्दू राष्ट्रवादी मेरे पुराने विडियो क्लिप को निकाल कर हंगामा मचा रहे हैं।” अरुंधति रॉय ने इसके बाद पाक फ़ौज को लेकर माफी माँग ली थी।

उसने कहा, “जिसने भी मुझे पढ़ा है वो इन बातों पर एक सेकंड के लिए भी विश्वास नहीं करेगा। नैतिक रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में से कोई भी एक-दूसरे से बढ़ कर नहीं है। भारत में अभी फासिज्म का वातावरण तैयार हो रहा है। जो इसके खिलाफ आवाज उठाता है, उसे बदनाम होने, ट्रोल किए जाने, जेल में भेजे जाने और पिटाई किए जाने का डर है।”

अरुंधति रॉय जैसे वामपंथी कभी किताबों के जरिए तो कभी अपने बयानों से लगातार कश्मीर को लेकर जहर फैलाते रहे हैं। एक दौर था कि यह लोग भारत की राजधानी में खड़े होकर भारत को तोड़ने की बातें करते थे। तब इनकी बातों को तालियाँ बजती थीं। इनकी किताबों को पुरस्कार मिलते थे। लेकिन अब समय बदल गया है और इनकी अलगाववादी सोच को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं रह गया है।

‘विदेशी एजेंट’ की तरह बोल रहे राहुल गाँधी? ट्रंप को दी ‘अडानी कार्ड’ इस्तेमाल करने की सलाह: पहले मोसाद ने हिंडनबर्ग-सोरोस वाली हिटजॉब से निकाला था लिंक

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर भारत के खिलाफ वैश्विक शक्तियों को उकसाने का काम किया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाते हुए अमेरिका में चल रही अदानी समूह पर जाँच को रूस के तेल व्यापार से जोड़ दिया।

गौरतलब हो कि कुछ ही दिन पहले गाँधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत की ‘डेड इकोनॉमी’ वाली बात दोहराई थी। अब उन्होंने उससे भी आगे बढ़कर एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने ट्रंप को ‘अडानी कार्ड’ इस्तेमाल करने का सुझाव दे डाला है।

राहुल गाँधी ने अपनी पोस्ट में लिखा, “भारत, कृपया समझिए: प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति ट्रंप के बार-बार के धमकियों के बावजूद उनके सामने क्यों नहीं खड़े हो पा रहे हैं, इसका कारण अदानी पर चल रही अमेरिकी जाँच है। एक धमकी यह है कि मोदी, एए (अदानी) और रूसी तेल सौदों के बीच वित्तीय संबंधों को उजागर किया जाएगा। मोदी के हाथ बँधे हुए हैं।”

भारत के आंतरिक मामलों में राहुल का विदेशी ताकतों को खींचने का कोई नया कदम नहीं हैं, बल्कि ये उनकी आदत बन चुका है। लेकिन किसी जाँच का सहारा लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत पर दबाव बनाने का सुझाव देना उन पर सवाल खड़े कर रहा है। सवाल ये कि क्या राहुल गाँधी को सच में देश की परवाह है या सिर्फ राष्ट्र हित के नाम पर वह भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

इजरायली खुफिया एजेंसी ने पहले ही किया था राहुल के अडानी पर आरोप का खुलासा

यह पहली बार नहीं है जब अडानी समूह की जाँच पर हो रहे हमलों के सिलसिले में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का नाम सामने आया है। स्पुतनिक इंडिया की एक असत्यापित लेकिन चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने राहुल गाँधी, इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा और अमेरिका की शॉर्ट-सेलर कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च के बीच एक छुपी हुई साजिश का खुलासा किया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोसाद ने पित्रोदा का होम सर्वर हैक किया और उसमें से ऐसे संचार डिक्रिप्ट किए गए जिनसे पता चला कि अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को प्रधानमंत्री मोदी और भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के हथियार की तरह इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी।

हिंडनबर्ग ने 2023 में अडानी समूह पर कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी का आरोप लगाया था, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।

रिपोर्ट आने का समय भी संदेहास्पद माना गया, क्योंकि यह रिपोर्ट तब आई जब गौतम अडानी इजराइल के हाइफा बंदरगाह को 1.2 बिलियन डॉलर में खरीदने का सौदा लगभग पूरा करने वाले थे।

इजरायली सरकार ने इस रिपोर्ट को रणनीतिक हमला माना और इसके पीछे की ताकतों को खोजने के लिए ‘ऑपरेशन जेपेलिन’ नाम का एक खुफिया अभियान शुरू किया। इस ऑपरेशन में सामने आया कि इस अभियान के तार चीन, पश्चिमी लॉबी, कुछ एक्टिविस्ट वकील, हेज फंड्स और भारत की विपक्षी राजनीति के एक प्रमुख चेहरे से जुड़े हुए हैं।

सोरोस से जुड़ा एनजीओ नेटवर्क और राहुल गाँधी की गुप्त अमेरिका यात्रा

राहुल गाँधी के 2023 के विदेश दौरों ने अडानी मामले और भारत सरकार पर विदेशी हमलों से जुड़े विवादों को और गहरा कर दिया है। खासतौर पर उनके अमेरिका दौरे और वहाँ की गतिविधियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की 10 दिन की यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने व्हाइट हाउस के अधिकारियों से चुपचाप मुलाकात की। ये राजनयिक नियमों का गंभीर उल्लंघन था, क्योंकि इस यात्रा की जानकारी या समन्वय भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से नहीं किया गया था।

इसके अलावा हडसन इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में उन्हें ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ के पास बैठे देखा गया। यह संस्था जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित है और इसे हिंदू विरोधी गतिविधियों के लिए जाना जाता है।

जॉर्ज सोरोस ने खुद भारत में सत्ता परिवर्तन का सार्वजनिक आह्वान किया है। उनकी संस्था ओपन सोसाइटी फाउंडेशन ने OCCRP (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) को फंडिंग दी है, जिसने अडानी समूह के खिलाफ रिपोर्टें प्रकाशित की थीं।

राहुल गाँधी की उज़्बेकिस्तान यात्रा भी चर्चा में रही, क्योंकि वह यात्रा यूएसएआईडी की प्रशासक सामंथा पावर की यात्रा के साथ मेल खाती थी। सामंथा पावर भी सोरोस समर्थित नेटवर्क से जुड़ी मानी जाती हैं।

साथ ही सैम पित्रोदा के एनजीओ ‘ग्लोबल नॉलेज इनिशिएटिव’ को यूएसएआईडी, रॉकफेलर फाउंडेशन और अमेरिकी विदेश विभाग से फंडिंग मिलती रही है।

इन सभी बातों को मिलाकर यह संकेत मिलता है कि राहुल गाँधी और उनके सहयोगियों के विदेशी संगठनों और भारत-विरोधी तत्वों के साथ संबंध हो सकते हैं। ये गतिविधियाँ भारत की राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को और मजबूत करती हैं।

राजनीतिक राजद्रोह या सिर्फ गलत निर्णय?

हालाँकि मोसाद के कथित खुलासे की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जो परिस्थितियाँ सामने आई हैं वे राहुल गाँधी की राजनीति की एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं।

राहुल गाँधी ने हाल के वर्षों में सोरोस से जुड़े एक्टिविस्टों से मिलने और विदेशी ताकतों को भारत के खिलाफ बोलने वालों को आगे बढ़ाने का काम किया है। ये वे सीमाएँ हैं जिन्हें एक जिम्मेदार विपक्षी नेता को कभी पार नहीं करना चाहिए, खासकर एक लोकतंत्र में।

उनका हालिया ट्वीट, जिसमें उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप से प्रधानमंत्री मोदी, अडानी और रूस के तेल व्यापार से जुड़ी कथित वित्तीय जानकारी ‘उजागर’ करने की अपील की, वह न सिर्फ बेबुनियाद है, बल्कि यह भारत की आंतरिक नीति में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने के खतरे के बहुत करीब माना जा रहा है।

इस तरह के बयान और गतिविधियाँ भारत की भू-राजनीतिक स्थिति, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक सहयोगियों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। इन प्रयासों को एक राजनीतिक वापसी की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर तब जब कॉन्ग्रेस को लगातार तीन लोकसभा चुनावों और कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है।

भारत पर वाशिंगटन का बढ़ता दबाव और अडानी कार्ड

राहुल गाँधी की हालिया टिप्पणी को समझने के लिए उसका पूरा संदर्भ जानना जरूरी है। अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह एक ऐसा व्यापार समझौता करे जो भारत के लिए असंतुलित है लेकिन अमेरिकी हितों के लिए काफी फायदेमंद है।

जब भारत ने इस तरह के समझौते पर आपत्ति जताई, तो अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 25% तक टैक्स लगाने की धमकी दी। इस बीच, अमेरिका ने भारत पर यह आरोप भी लगाया कि वह ‘रूस की युद्ध मशीन को फंड कर रहा है’, जबकि सच्चाई ये है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ खुद रूस से अरबों डॉलर की चीजें आज भी आयात कर रहे हैं। ऐसे में यह आरोप पाखंड भरा और दोहरा मापदंड दिखाता है।

ऐसे संवेदनशील समय में राहुल गाँधी अगर अडानी मामले की आड़ लेकर अमेरिका के आरोपों का समर्थन करते हैं, तो यह भारत पर अमेरिकी दबाव को और बढ़ाने जैसा है। इस तरह की राजनीति से एकतरफा और भारत विरोधी व्यापार समझौते का रास्ता खुल सकता है, जिससे भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और संप्रभुता को नुकसान पहुँच सकता है।

राहुल गाँधी किसके पक्ष में हैं?

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, गलतियों को उजागर करता है और जनता की आवाज को मंच देता है। लेकिन जब कोई नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते विदेशी ताकतों से मेलजोल बढ़ाए तो वह शत्रुतापूर्ण और भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देता है।

इसके साथ ही वह राष्ट्रीय हितों से समझौता करने जैसा जोखिम उठाता है, तब असहमति और विश्वासघात के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। राहुल गाँधी के पिछले बयानों और विदेश दौरों से जुड़ी गतिविधियाँ इसी ओर इशारा करती हैं।

उन पर विदेशी हस्तक्षेप को हवा देने, संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय संगठनों और लॉबियों से जुड़ने और अब अडानी मुद्दे को आधार बनाकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भारत के खिलाफ कार्रवाई की अपील करने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।

यह सब मिलाकर एक बड़ा और चिंताजनक सवाल खड़ा करता है। क्या राहुल गाँधी आज भारत की विपक्षी राजनीति की आवाज हैं या फिर वे किसी विदेशी एजेंडे की पटकथा निभा रहे हैं?