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स्पेन के जिस शहर पर रहा मुसलमानों का रहा सदियों तक कब्जा, वहाँ खुले में ईद-बकरीद भी नहीं मना पाएँगे मुस्लिम: इस्लामी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए ईसाई हुए एकजुट

यूरोप में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को अब सरकारें भी महसूस कर रही हैं। इसी क्रम में स्पेन में जुमिला नाम के शहर में ईद-बकरीद जैसे त्योहारों को पब्लिक प्लेस पर मनाने पर बैन लगा दिया गया है। स्पेन का जुमिला शहर कभी सदियों तक मुसलमानों के कब्जे में रहा था। खुद स्पेन के बड़े हिस्से पर इस्लामी सल्तनत ने राज किया था, लेकिन अब जुमिला की लोकल अथॉरिटी ने बाकायदा एक प्रस्ताव पास किया है। इसके मुताबिक, ‘ईसाइयों’ के शहर में ‘इस्लामी’ त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोक दिया गया है।

ईसाइयों की पार्टी ने ‘गायब’ रहकर पास कराया प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्ताव को कंजर्वेटिव मानी जाने वाली पीपल्स पार्टी (पीपी) ने पेश किया था और वामपंथी पार्टियों ने इसका विरोध किया। वहीं, वोटिंग के दौरान दक्षिणपंथी पार्टी ‘वॉक्स’ अनुपस्थित रही थी लेकिन फिर भी इस प्रस्ताव को पास करा लिया गया है।

इस प्रस्ताव में कहा गया है, “नगरपालिका खेल सुविधाओं का उपयोग हमारी पहचान से अलग की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा इसका आयोजन न किया जाए।”

‘वॉक्स’ पार्टी ने इस फैसले पर कहा, “वॉक्स के चलते स्पेन के सार्वजनिक जगहों पर इस्लामी त्योहारों पर प्रतिबंध लगाने का पहला कदम पारित हो गया है। स्पेन हमेशा से ईसाइयों का रहा है और हमेशा रहेगा।”

क्या कह रहे हैं विरोधी दल और मुस्लिम नेता?

इस फैसला का विरोधी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है। स्पैनिश फेडरेशन ऑफ इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख मुनीर बेनजेलून अंडालूसी अज़हरी ने एक अखबार से बातचीत में दावा किया कि यह प्रतिबंध इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा, “30 वर्षों में पहली बार मुझे डर लग रहा है। वे किसी दूसरे धर्म पर नहीं सिर्फ हमारे धर्म पर हमला कर रहे हैं।”

वहीं, मर्सिया क्षेत्र के समाजवादी नेता फ्रांसिस्को लुकास ने इस फैसले को लेकर कहा, “पीपी पार्टी संविधान का उल्लंघन करती है और सिर्फ सत्ता की चाह में सामाजिक एकता को खतरे में डाल रही है।” शहर के पूर्व समाजवादी मेयर जुआना गार्डियोला ने कहा, “यहाँ सदियों पुरानी मुस्लिम विरासत का क्या होगा?”

कोर्ट में जाएगा मामला?

जानकारी के मुताबिक, स्थानीय कानून विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया जा सकता है। यह फैसला स्पेन के संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है।

इस अनुच्छेद में कहा गया है, “व्यक्तियों और समुदायों की विचारधारा, धर्म और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाती है और उनकी अभिव्यक्ति पर कोई अन्य प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, सिवाय इसके कि कानून द्वारा संरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो।”

जुमिला और इस्लाम

जुमिला शहर का इतिहास रोमन साम्राज्य से जुड़ा है। 8वीं शताब्दी में अरबों द्वारा कब्जा किए जाने के पहले यह रोमन साम्राज्य का हिस्सा होता था। इसके बाद यह सदियों तक अरबों का शहर रहा और इसका नाम युमिल-ला हुआ करता था।

इसके बाद 13वीं शताब्दी के मध्य में कैस्टिले के अल्फोंसो X के नेतृत्व में ईसाइयों ने इस पर हमला कर वापस इसे अपने कब्जे में ले लिया था। मौजूदा समय में जुमिला की आबादी करीब 27,000 है, जिसमें करीब 7.5% आबादी मुस्लिमों की है।

जम्मू-कश्मीर में आतंक-अलगाववाद को बढ़ाने वाली 25 किताबें बैन, अरुंधति रॉय की ‘आजादी’ भी लिस्ट में शामिल: पंजाब-तेलंगाना को उपनिवेश बताने वाली वामपंथन पर चल रहा UAPA केस

जम्मू-कश्मीर सरकार ने हाल ही में वामपंथी अरुंधति रॉय सहित अन्य लेखकों की 25 किताबों पर बैन लगा दिया है। सरकार का कहना है कि ये किताबें अलगाववादी सोच को बढ़ावा देती हैं। सरकार ने कहा है कि यह देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं। सरकार ने बताया है कि ये किताबें युवाओं को भड़काने का काम करती हैं।

यह फैसला जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग ने लिया है। सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि इन किताबों में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और आतंकवादियों को हीरो की तरह दिखाया गया है। सरकार ने बताया है कि सेना और सुरक्षा बलों की छवि को इसमें खराब किया गया है और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है।

इन किताबों पर युवाओं को हिंसा की तरफ ले जाने वाली सोच को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया गया है। इन किताबों को भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152, 196 और 197 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 98 के तहत जब्त घोषित कर दिया गया है।

कौन-कौन सी किताबें कश्मीर में हुईं बैन

बैन की गई किताबों में कई वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथियों की किताबें शामिल हैं। इसमें अरुंधति रॉय की किताब ‘आजादी’, ए जी नूरानी की किताब ‘द कश्मीर डिस्प्यूट, 1947-2012’, सुमंत्रा बोस की ‘कश्मीर ऐट द क्रॉसरोड्स’ और ‘कॉन्टेस्टेड लैंड्स’, डेविड देवदास की  ‘इन सर्च ऑफ अ फ्युचर: द कश्मीर स्टोरी’ और पत्रकार अनुराधा भसीन की ‘अ डिसमैंटल्ड स्टेट: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370′ जैसी किताबें हैं।

इसमें विदेशी लेखकों की भी कई किताबें शामिल हैं, जैसे हाफ्सा कंजवाल की ‘क्लोंजिंग कश्मीर’, हेली दुशिंस्की की  ‘रेसिस्टिंग ऑकुपेशन इन कश्मीर’, विक्टोरिया स्कोफील्ड की ‘कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट’ और क्रिस्टोफर स्नेडन की ‘इंडिपेंडेंट कश्मीर’। कश्मीर पर लगातार प्रोपगेंडा चलाने वाले वामपंथियों के अलावा इस्लामी कट्टरपंथियों की किताबें भी बैन की गई हैं। इसमें मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘अल जिहाद फिल इस्लाम’ और हसन अल-बन्ना की ‘मुजाहिद की अजान’ भी शामिल है।

बाकी किताबों में पिओत्र बाल्सेरोविक्ज और अग्निएश्का कुसेव्स्का की लॉ एंड कॉन्फ्लिक्ट इन कश्मीर, डॉ. शमशाद शान की ‘यूएसए एंड कश्मीर’, और डॉ. अफाक की ‘तारिख-ए-सियासत कश्मीर’ भी शामिल हैं। सरकार ने बताया है कि इस तरह की किताबें युवाओं के मन में असंतोष, कट्टरता और देशविरोधी विचार पैदा करती हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं। इसलिए अब इन किताबों का छपना, बाँटना या रखना गैरकानूनी है।

वामपंथी अरुंधति रॉय पर चल रहा UAPA का मुकदमा

दिल्ली के LG वीके सक्सेना ने जून 2024 में अरुंधति रॉय के खिलाफ UAPA कानून के तहत केस चलाने की मंजूरी दी थी। अरुंधति रॉय पर 21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली के कॉपरनिकस रोड पर मौजूद LTG ऑडिटोरियम में ‘आजादी – द ओनली वे’ के बैनर तले आयोजित एक सम्मेलन में भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा था।

बता दें कि सम्मेलन में ‘कश्मीर को भारत से अलग करने’ का प्रचार किया गया था। 21 अक्टूबर 2010 को दिए भाषणों को लेकर कश्मीर के सामाजिक कार्यकर्ता सुशील पंडित ने 28 अक्टूबर को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत में यह आरोप लगाया गया था कि रॉय ने जोर देकर कहा था कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था, उस पर भारतीय सशस्त्र बलों ने जबरन कब्जा किया था। शिकायत में कहा गया था कि अरुंधति रॉय ने इस कायर्क्रम में कहा कि भारत से जम्मू-कश्मीर की आजादी के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए।

शिकायतकर्ता ने इन बयानों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराई थी। इसके बाद दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद वामपंथन अरुंधति रॉय के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी।अक्टूबर 2023 में भी दिल्ली LG वीके सक्सेना ने दूसरी धाराओं में मुकदमा चलाने की मंजूरी दी थी।

सभी राज्यों को उपनिवेश बताती है वामपंथन अरुंधति

अरुंधति रॉय सिर्फ कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के बाकी इलाकों को भी तोड़ने की बातें करती आई है। उसने 2011 में ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिन्स्टर के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, ह्यूमैनिटीज़ एंड लैंग्वेजेज के तत्वावधान में ऐसा ही जहर उगला था।

रॉय ने कहा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत ने एक तरह से उपनिवेशवाद ही किया है और आज तक भारत के लोग भारतीय सेना की बर्बरता झेल रहे हैं। रॉय ने आगे कहा था कि हर जगह के कबीलाई लोग, एवम् समुदाय विशेष और ईसाई भारतीय राष्ट्र के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं।

वामपंथी अरुंधति रॉय ने दावा किया था कि आजादी के बाद भारत ने इन सारे राज्यों को उपनिवेश बना लिया और वो अपनी आजादी के लिए संघर्षरत हैं। ये कहते हुए रॉय ने कश्मीर से शुरुआत की और पंजाब, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, गोवा होते हुए तेलंगाना और हैदराबाद तक पहुँच गई थी।

साथ ही, रॉय ने बिना झिझक के यह भी कहा कि इस तरह की बर्बरता तो पाकिस्तान की फौज भी नहीं करती। आगे इन्होंने बताया कि अपर कास्ट हिन्दू राष्ट्र लगातार युद्ध की स्थिति में रहा है।

उसने कहा था, “पाक फौज बलूचिस्तान में जो कुछ भी कर रही है या बांग्लादेश में उसने जो नरसंहार किया- इस बारे में मेरी राय कभी भी अस्पष्ट नहीं रही है। मैंने इस बारे में काफी कुछ लिखा है। हिन्दू राष्ट्रवादी मेरे पुराने विडियो क्लिप को निकाल कर हंगामा मचा रहे हैं।” अरुंधति रॉय ने इसके बाद पाक फ़ौज को लेकर माफी माँग ली थी।

उसने कहा, “जिसने भी मुझे पढ़ा है वो इन बातों पर एक सेकंड के लिए भी विश्वास नहीं करेगा। नैतिक रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में से कोई भी एक-दूसरे से बढ़ कर नहीं है। भारत में अभी फासिज्म का वातावरण तैयार हो रहा है। जो इसके खिलाफ आवाज उठाता है, उसे बदनाम होने, ट्रोल किए जाने, जेल में भेजे जाने और पिटाई किए जाने का डर है।”

अरुंधति रॉय जैसे वामपंथी कभी किताबों के जरिए तो कभी अपने बयानों से लगातार कश्मीर को लेकर जहर फैलाते रहे हैं। एक दौर था कि यह लोग भारत की राजधानी में खड़े होकर भारत को तोड़ने की बातें करते थे। तब इनकी बातों को तालियाँ बजती थीं। इनकी किताबों को पुरस्कार मिलते थे। लेकिन अब समय बदल गया है और इनकी अलगाववादी सोच को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं रह गया है।

‘विदेशी एजेंट’ की तरह बोल रहे राहुल गाँधी? ट्रंप को दी ‘अडानी कार्ड’ इस्तेमाल करने की सलाह: पहले मोसाद ने हिंडनबर्ग-सोरोस वाली हिटजॉब से निकाला था लिंक

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर भारत के खिलाफ वैश्विक शक्तियों को उकसाने का काम किया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाते हुए अमेरिका में चल रही अदानी समूह पर जाँच को रूस के तेल व्यापार से जोड़ दिया।

गौरतलब हो कि कुछ ही दिन पहले गाँधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत की ‘डेड इकोनॉमी’ वाली बात दोहराई थी। अब उन्होंने उससे भी आगे बढ़कर एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने ट्रंप को ‘अडानी कार्ड’ इस्तेमाल करने का सुझाव दे डाला है।

राहुल गाँधी ने अपनी पोस्ट में लिखा, “भारत, कृपया समझिए: प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति ट्रंप के बार-बार के धमकियों के बावजूद उनके सामने क्यों नहीं खड़े हो पा रहे हैं, इसका कारण अदानी पर चल रही अमेरिकी जाँच है। एक धमकी यह है कि मोदी, एए (अदानी) और रूसी तेल सौदों के बीच वित्तीय संबंधों को उजागर किया जाएगा। मोदी के हाथ बँधे हुए हैं।”

भारत के आंतरिक मामलों में राहुल का विदेशी ताकतों को खींचने का कोई नया कदम नहीं हैं, बल्कि ये उनकी आदत बन चुका है। लेकिन किसी जाँच का सहारा लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत पर दबाव बनाने का सुझाव देना उन पर सवाल खड़े कर रहा है। सवाल ये कि क्या राहुल गाँधी को सच में देश की परवाह है या सिर्फ राष्ट्र हित के नाम पर वह भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

इजरायली खुफिया एजेंसी ने पहले ही किया था राहुल के अडानी पर आरोप का खुलासा

यह पहली बार नहीं है जब अडानी समूह की जाँच पर हो रहे हमलों के सिलसिले में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का नाम सामने आया है। स्पुतनिक इंडिया की एक असत्यापित लेकिन चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने राहुल गाँधी, इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा और अमेरिका की शॉर्ट-सेलर कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च के बीच एक छुपी हुई साजिश का खुलासा किया है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोसाद ने पित्रोदा का होम सर्वर हैक किया और उसमें से ऐसे संचार डिक्रिप्ट किए गए जिनसे पता चला कि अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को प्रधानमंत्री मोदी और भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के हथियार की तरह इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी।

हिंडनबर्ग ने 2023 में अडानी समूह पर कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी का आरोप लगाया था, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।

रिपोर्ट आने का समय भी संदेहास्पद माना गया, क्योंकि यह रिपोर्ट तब आई जब गौतम अडानी इजराइल के हाइफा बंदरगाह को 1.2 बिलियन डॉलर में खरीदने का सौदा लगभग पूरा करने वाले थे।

इजरायली सरकार ने इस रिपोर्ट को रणनीतिक हमला माना और इसके पीछे की ताकतों को खोजने के लिए ‘ऑपरेशन जेपेलिन’ नाम का एक खुफिया अभियान शुरू किया। इस ऑपरेशन में सामने आया कि इस अभियान के तार चीन, पश्चिमी लॉबी, कुछ एक्टिविस्ट वकील, हेज फंड्स और भारत की विपक्षी राजनीति के एक प्रमुख चेहरे से जुड़े हुए हैं।

सोरोस से जुड़ा एनजीओ नेटवर्क और राहुल गाँधी की गुप्त अमेरिका यात्रा

राहुल गाँधी के 2023 के विदेश दौरों ने अडानी मामले और भारत सरकार पर विदेशी हमलों से जुड़े विवादों को और गहरा कर दिया है। खासतौर पर उनके अमेरिका दौरे और वहाँ की गतिविधियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की 10 दिन की यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने व्हाइट हाउस के अधिकारियों से चुपचाप मुलाकात की। ये राजनयिक नियमों का गंभीर उल्लंघन था, क्योंकि इस यात्रा की जानकारी या समन्वय भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से नहीं किया गया था।

इसके अलावा हडसन इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में उन्हें ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ के पास बैठे देखा गया। यह संस्था जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित है और इसे हिंदू विरोधी गतिविधियों के लिए जाना जाता है।

जॉर्ज सोरोस ने खुद भारत में सत्ता परिवर्तन का सार्वजनिक आह्वान किया है। उनकी संस्था ओपन सोसाइटी फाउंडेशन ने OCCRP (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) को फंडिंग दी है, जिसने अडानी समूह के खिलाफ रिपोर्टें प्रकाशित की थीं।

राहुल गाँधी की उज़्बेकिस्तान यात्रा भी चर्चा में रही, क्योंकि वह यात्रा यूएसएआईडी की प्रशासक सामंथा पावर की यात्रा के साथ मेल खाती थी। सामंथा पावर भी सोरोस समर्थित नेटवर्क से जुड़ी मानी जाती हैं।

साथ ही सैम पित्रोदा के एनजीओ ‘ग्लोबल नॉलेज इनिशिएटिव’ को यूएसएआईडी, रॉकफेलर फाउंडेशन और अमेरिकी विदेश विभाग से फंडिंग मिलती रही है।

इन सभी बातों को मिलाकर यह संकेत मिलता है कि राहुल गाँधी और उनके सहयोगियों के विदेशी संगठनों और भारत-विरोधी तत्वों के साथ संबंध हो सकते हैं। ये गतिविधियाँ भारत की राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को और मजबूत करती हैं।

राजनीतिक राजद्रोह या सिर्फ गलत निर्णय?

हालाँकि मोसाद के कथित खुलासे की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जो परिस्थितियाँ सामने आई हैं वे राहुल गाँधी की राजनीति की एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं।

राहुल गाँधी ने हाल के वर्षों में सोरोस से जुड़े एक्टिविस्टों से मिलने और विदेशी ताकतों को भारत के खिलाफ बोलने वालों को आगे बढ़ाने का काम किया है। ये वे सीमाएँ हैं जिन्हें एक जिम्मेदार विपक्षी नेता को कभी पार नहीं करना चाहिए, खासकर एक लोकतंत्र में।

उनका हालिया ट्वीट, जिसमें उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप से प्रधानमंत्री मोदी, अडानी और रूस के तेल व्यापार से जुड़ी कथित वित्तीय जानकारी ‘उजागर’ करने की अपील की, वह न सिर्फ बेबुनियाद है, बल्कि यह भारत की आंतरिक नीति में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने के खतरे के बहुत करीब माना जा रहा है।

इस तरह के बयान और गतिविधियाँ भारत की भू-राजनीतिक स्थिति, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक सहयोगियों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। इन प्रयासों को एक राजनीतिक वापसी की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर तब जब कॉन्ग्रेस को लगातार तीन लोकसभा चुनावों और कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है।

भारत पर वाशिंगटन का बढ़ता दबाव और अडानी कार्ड

राहुल गाँधी की हालिया टिप्पणी को समझने के लिए उसका पूरा संदर्भ जानना जरूरी है। अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह एक ऐसा व्यापार समझौता करे जो भारत के लिए असंतुलित है लेकिन अमेरिकी हितों के लिए काफी फायदेमंद है।

जब भारत ने इस तरह के समझौते पर आपत्ति जताई, तो अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 25% तक टैक्स लगाने की धमकी दी। इस बीच, अमेरिका ने भारत पर यह आरोप भी लगाया कि वह ‘रूस की युद्ध मशीन को फंड कर रहा है’, जबकि सच्चाई ये है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ खुद रूस से अरबों डॉलर की चीजें आज भी आयात कर रहे हैं। ऐसे में यह आरोप पाखंड भरा और दोहरा मापदंड दिखाता है।

ऐसे संवेदनशील समय में राहुल गाँधी अगर अडानी मामले की आड़ लेकर अमेरिका के आरोपों का समर्थन करते हैं, तो यह भारत पर अमेरिकी दबाव को और बढ़ाने जैसा है। इस तरह की राजनीति से एकतरफा और भारत विरोधी व्यापार समझौते का रास्ता खुल सकता है, जिससे भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और संप्रभुता को नुकसान पहुँच सकता है।

राहुल गाँधी किसके पक्ष में हैं?

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, गलतियों को उजागर करता है और जनता की आवाज को मंच देता है। लेकिन जब कोई नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते विदेशी ताकतों से मेलजोल बढ़ाए तो वह शत्रुतापूर्ण और भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देता है।

इसके साथ ही वह राष्ट्रीय हितों से समझौता करने जैसा जोखिम उठाता है, तब असहमति और विश्वासघात के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। राहुल गाँधी के पिछले बयानों और विदेश दौरों से जुड़ी गतिविधियाँ इसी ओर इशारा करती हैं।

उन पर विदेशी हस्तक्षेप को हवा देने, संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय संगठनों और लॉबियों से जुड़ने और अब अडानी मुद्दे को आधार बनाकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भारत के खिलाफ कार्रवाई की अपील करने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।

यह सब मिलाकर एक बड़ा और चिंताजनक सवाल खड़ा करता है। क्या राहुल गाँधी आज भारत की विपक्षी राजनीति की आवाज हैं या फिर वे किसी विदेशी एजेंडे की पटकथा निभा रहे हैं?

‘हिंदुत्व-यहूदियों को खत्म करने के लिए आगे बढ़ो’: असीम मुनीर से पहलगाम हमले का फायदा उठाने को कह रही थी अल कायदा आतंकी शमा, गुजरात ATS ने बताया- खिलाफत लाने की दी थी सलाह

बेंगलुरु से पकड़ी गई अल कायदा इंडियन सब कॉन्टिनेन्ट (AQIS) की शमा परवीन ने पाकिस्तान के फौजी चीफ असीम मुनीर से भारत पर हमला करने का न्यौता दिया था। शमा परवीन ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फेसबुक पर पोस्ट डालकर मुनीर से कहा था कि पाकिस्तान को इसका फायदा उठाते हुए भारत पर हमला कर हिंदुत्व को खत्म कर देना चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गुजरात ATS ने बताया कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर शुरू करने के दो दिन बाद 09 जुलाई 2025 को शमा परवीन ने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट किया, जिसमें पाकिस्तानी फौजी चीफ असीम मुनीर की तस्वीर लगाकर कहा, “आपके पास एक सुनहरा अवसर है… इस्लाम के प्रचार के लिए खिलाफत योजना को अपनाएँ, मुस्लिम भूमि को एकीकृ करें और हिंदुत्व और यहूदी को खत्म करने के लिए आगे बढ़ें।”

परवीन के सोशल मीडिया पर एक अन्य वीडियो मिला, जिसमें एक मौलवी को मुस्लिम द्वारा पहलगाम हमले की निंदा करने की आलोचना कर रहा है और भारतीय सेना को समर्थन देने का भी विरोध कर रहा है। शमा परवीन द्वारा पोस्ट की गए एक और वीडियो में लाहौर की लाल मस्जिद का इमाम अब्दुल अजीज सरकार के खिलाफ हथियारों से लड़कर भारत में खिलाफत व्यवस्था लाने के बारे में उकसाने वाले बयान देते हुए सुने जा सकते हैं।

ATS ने बताया कि एक वीडियो में अल कायदा का नेता गजवा-ए-हिंद के बारे में बात करते हुए भारत के खिलाफ हिंसा भड़काने को उकसाता दिख रहा है। इस वीडियो में हिंदू धर्म और भारत में लोकतांत्रिक शासन की संस्थानों को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी भी की गई हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शमा परवीन दो फेसबुक पेज और एक इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए भारत के खिलाफ जहर फैलाती थी। इन सोशल मीडिया हैंडल पर उसके 10 हजार से अधिक फॉलोअर्स हो गए थे। वह सोशल मीडिया पर अल कायदा के ऑनलाइन टेरर मॉड्यूल को आगे बढ़ाने का काम कर रही थी।

गौरतलब है कि गुजरात ATS ने 29 जुलाई 2025 को शमा परवीन को अल कायदा के ऑनलाइन टेरर मॉड्यूल के प्रचार के आरोप में गिरफ्तार किया था। वह भारत में अल कायदा मॉड्यूल की सरगना थी। 23 जुलाई 2025 को देश के विभिन्न राज्यों से पकड़े गए 4 इस्लामी आतंकियों से पूछताछ में शमा परवीन का नाम आया था। इसके बाद बेंगलुरु से शमा परवीन को दबोचा गया।

कौन है शमा परवीन ?

30 साल की शमा परवीन मूलरूप से झारखंड की रहने वाली बेरोजगार मुस्लिम महिला है। वह बेंगलुरु में अपने भाई के साथ रहती है। यहीं से वह सोशल मीडिया पर इस्लामी आतंक का प्रचार-प्रसार करती थी। उसके पाकिस्तान से सीधे संपर्क थे। सोशल मीडिया पर लोगों को हिंदुत्व के खिलाफ भड़काती थी। इसके साथ ही वह आतंकी भर्ती में भी लगी हुई थी।

गुजरात ATS ने बंगलुरु से गिरफ्तार कर शमा परवीन को कोर्ट में पेश किया था। अब वह ATS की रिमांड पर है, जहाँ आतंकी संगठन अल कायदा के मॉड्यूल से संबंधित पूछताछ की जा रही है।

‘अभी और भी प्रतिबंध-टैरिफ लगेंगे’: ट्रंप ने सिर्फ भारत को निशाना बनाने पर बताया, चीन-तुर्की पर एक्शन क्यों नहीं, इसका नहीं दिया जवाब

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह अभी और भी टैरिफ लगाएँगे। उन्होंने यह जवाब भारत को निशाना बनाने पर दिया है। ट्रंप ने इससे पहले भारत के खिलाफ 25% अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान किया था। भारत के खिलाफ अमेरिका अब तक 50% का टैरिफ लगा चुका है।

रूस से तेल खरीद पर ट्रंप भारत को ही केवल क्यों निशाना बना रहे हैं जबकि बाकी देश भी ऐसा कर रहे हैं, इस सवाल पर ट्रंप ने कहा, “अभी तो सिर्फ़ 8 घंटे ही हुए हैं। तो देखते हैं क्या होता है। आपको और भी बहुत कुछ देखने को मिलेगा… आपको बहुत सारे दूसरे प्रतिबंध देखने को मिलेंगे।”

ट्रंप का यह जवाब भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान के बाद आया है। ट्रंप के 25% अतिरिक्त टैरिफ के ऐलान के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि अन्य भी देश अपने राष्ट्रीय हित में वैसे ही कदम उठा रहे हैं, जैसे भारत ने उठाए हैं। भारत ने ट्रंप के इस कदम को अनुचित बताया था।

ट्रंप ने लेकिन अपने बयान में यह नहीं स्पष्ट किया कि वह वही कठोर रवैया चीन और बाक़ी देशों पर क्यों नहीं अपना रहे, जैसा उन्होंने भारत के खिलाफ अपनाया हुआ है। गौरतलब है कि चीन की रूस से कच्चे तेल की खरीद कहीं अधिक है। चीन के अलावा तुर्की भी लाखों करोड़ का गैस-तेल रूस से खरीद चुका है।

चीन और तुर्की मिला कर ₹24 लाख करोड़ से ज्यादा का गैस और तेल रूस से खरीद चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जहाँ रोज भारत के खिलाफ नए एक्शन का ऐलान कर रहे हैं और उसे ‘डेड इकॉनमी’ बता रहे हैं, वहीं चीन-तुर्की पर वह शांत हैं। यही नहीं, उनके सलाहकार भी इन प्रश्नों से बचते नजर आ रहे हैं।

आर्थिक मामलों पर ट्रंप के आर्थिक सलाहकार पीटर नवारो ने चीन पर प्रतिबन्ध को लेकर गोलमोल जवाब दिया है। पीटर नवारो ने कहा कि चीन पर हम इतने प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहते हैं कि हमें खुद ही नुकसान होने लगे। इसके आगे वह कोई जवाब नहीं दे पाए।

इससे पहले ट्रंप इस बात का जवाब भी नहीं दे पाए थे कि भारत पर रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए टैरिफ लगाने वाला अमेरिका स्वयं क्यों रूस से यूरेनियम, खाद और बाक़ी कई सामान क्यों बड़ी मात्रा में खरीदता है। उन्होंने इस पर जानकारी ना होने का बहाना बताया था।

‘अपने हित सुरक्षित करने को उठाएँगे सारे कदम’: ट्रंप के एक्स्ट्रा 25% टैरिफ का विदेश मंत्रालय ने दिया जवाब, कहा- अमेरिका का एक्शन अनुचित

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने के फैसले पर भारतीय ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हित में सभी कदम उठाएगा। भारत ने कहा है कि अमेरिका का भारत को निशाना बनाना अतार्किक और अनुचित है। इससे पहले ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान किया था क्योंकि वह रूस से कच्चा तेल खरीदता है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसको लेकर बुधवार (6 अगस्त, 2025) को एक बयान जारी किया। विदेश मंत्रालय ने कहा, “हाल के दिनों में, अमेरिका ने रूस से भारत के तेल आयात को निशाना बनाया है… भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।”

विदेश मंत्रालय ने आगे कहा, “हमने इन मुद्दों पर अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है, जिसमें यह बात भी शामिल है कि हमारे आयात बाज़ार की स्थितियों पर आधारित हैं और भारत के 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के समग्र उद्देश्य से किए जाते हैं।”

विदेश मंत्रालय ने इसके बाद अमेरिका इस कदम को अनुचित बताया। विदेश मंत्रालय ने कहा,”इसलिए, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका ने भारत पर उन कार्यों के लिए अतिरिक्त टैरिफ लगाने का विकल्प चुना है जो कई अन्य देश भी अपने राष्ट्रीय हित में कर रहे हैं… हम दोहराते हैं कि ये कार्य अनुचित, अनुचित और अविवेकपूर्ण हैं।”

भारत के इस जवाब से पहले ट्रंप ने नए टैरिफ का ऐलान किया था। इसको लेकर व्हाइट हाउस ने एक बयान भी जारी किया। व्हाइट हाउस ने लिखा,”अमेरिका के सीमा शुल्क क्षेत्र में आयातित भारत की वस्तुओं पर 25% की अतिरिक्त टैरिफ दर लागू होगी।”

इससे पहले ट्रंप ने भारत पर 25% का टैरिफ लगाया था। अब यह कुल मिलाकर 50% हो गया है। ऐसे में पहले भारत से निर्यात होने वाला कोई सामान अगर अमेरिका में ₹100 का बिकता था, तो वह ₹150 का बिकेगा। इससे भारतीय निर्यातक प्रभावित होंगे।

अमेरिका यह टैरिफ इसलिए लगा रहा है क्योंकि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है। हालाँकि, अमेरिका स्वयं रूस से लगातार यूरेनियम, खाद समेत तमाम वस्तुएं खरीदता आया है। ट्रंप तक भारतीय मीडिया के इस प्रश्न का जवाब नहीं दे पाए थे।

पैसे के लेनदेन का था मामला, लेकिन इलाहाबाद HC के जज ने क्रिमिनल कार्रवाई की दी परमिशन: सुप्रीम कोर्ट ने हड़काया, कहा- इनको सीनियर के साथ बिठाओ

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जज के खिलाफ एक्शन भी लिया है। यह कार्रवाई जज की बड़ी चूक के बाद हुई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार ने एक सामान्य मामले में आपराधिक कार्रवाई की मंजूरी दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत कुमार के आपराधिक मामले सुनने पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उन्हें किसी सीनियर जज के साथ बिठाया जाए।

सोमवार (4 अगस्त, 2025) को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे बी पारदीवाला और आर महादेवन वाली बेंच ने यह फैसला दिया। उन्होंने इस फैसले को अब तक के सबसे खराब और सबसे गलत आदेशों में से एक बताया। कोर्ट ने कहा कि इससे न्याय की गरिमा को ठेस पहुँची है और यह न्यायपालिका का मजाक उड़ाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या यह फैसला किसी बाहरी प्रभाव में लिया गया या पूरी तरह से कानून की अनदेखी की गई।

जज की योग्यता पर शीर्ष अदालत ने उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार की आपराधिक मामलों को निपटाने की क्षमता पर सवाल उठाते हुए बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि अब जस्टिस कुमार को अकेले आपराधिक मामले सुनने की अनुमति नहीं होगी। उन्हें हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ और अनुभवी जज के साथ खंडपीठ (डिवीजन बेंच) में बैठने का निर्देश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश जस्टिस कुमार द्वारा पारित एक विवादास्पद फैसले के बाद दिया। दरअसल, उन्होंने एक दीवानी विवाद (सिविल डिस्प्यूट) में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति दे दी थी। मामला एक कंपनी से जुड़ा था, जिस पर एक कारोबारी लेनदेन में बाकी रकम न चुकाने का आरोप था।

इस पर मजिस्ट्रेट ने समन जारी किया था, जिसे रद्द करने की याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका को जस्टिस कुमार ने खारिज कर दिया। उन्होंने इस मामले में आपराधिक केस चलाने की मंजूरी दे दी। उन्होंने कहा कि अगर मामला दीवानी अदालत में भेजा गया, तो शिकायतकर्ता को बहुत समय और पैसा खर्च करना पड़ेगा, जो उसके लिए मुश्किल होगा।

उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि ऐसा करना ‘अच्छे पैसे को बुरे पैसे के पीछे लगाने’ जैसा होगा और इससे शिकायतकर्ता को अपूर्णीय नुकसान होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह फैसला न्याय का मजाक उड़ाने जैसा है और जस्टिस कुमार को तत्काल आपराधिक मामलों से हटाया जाए। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य जज को निर्देश दिया कि वे यह आदेश तुरंत लागू करें।

इलाहाबाद HC के फैसले पर हैरान हुई शीर्ष अदालत

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को चौंकाने वाला और कानून के खिलाफ बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि इस तरह के फैसले पढ़ना न्याय प्रणाली के लिए एक दुखद दिन जैसा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “क्या हाईकोर्ट को सच में लगता है कि अगर आरोपित दोषी पाया गया, तो निचली अदालत उसे शेष पैसे दिलवाएगी? ऐसी टिप्पणियाँ चौंकाने वाली हैं।” कोर्ट ने साफ कहा कि दीवानी विवादों में आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कानून का दुरुपयोग है और ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस सोच पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि दीवानी मुकदमे में पैसा वसूलने में ज्यादा समय लग सकता है, इसलिए आपराधिक रास्ता अपनाना उचित है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि केवल समय बचाने के लिए आपराधिक कानून का सहारा लेना न्याय का अपमान है।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पूरे आदेश को निरस्त (रद्द) कर दिया और दोहराया कि दीवानी विवादों में आपराधिक केस नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि कोई गंभीर आपराधिक तत्व साफ तौर पर सामने न हो।

कुदरत का बुलडोजर, खुदा की लाठी… ख़ुशी मनाओ: बादल फटने से देवभूमि में तबाही, इस्लामी कट्टरपंथी फैला रहे हिंदू घृणा

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में मंगलवार (5 अगस्त 2025) को बादल फटने से आई भयावह बाढ़ ने कई इलाकों को तहस-नहस कर दिया। गंगोत्री के पास बसे गाँव धराली में तबाही सबसे ज्यादा देखने को मिली। यहाँ लोगों के घर, जीवन और रोजगार सब पानी में बह गए। इस भयानक मंजर का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने हर किसी को दुखी कर दिया। जहाँ देश के ज्यादातर लोगों ने इस आपदा पर दुख और संवेदना जताई, वहीं कुछ इस्लामी कट्टरपंथी सोशल मीडिया यूजर्स ने इस त्रासदी का मजाक उड़ाया।

अली सोहराब, करिश्मा अजीज जैसे लोग और उनके समर्थकों ने इस दर्दनाक घटना पर खुशी जताई। उन्होंने इसे ‘कुदरत का बुलडोजर’ बताया। धराली में आम लोगों के घर-सम्पत्ति बर्बाद होने और जानें जाने पर असंवेदनशील रवैया दिखाते हुए यह इस्लामी कट्टरपंथी अपनी घृणा का प्रदर्शन करते रहे।

देवभूमि उत्तराखंड में हाल के महीनों में राज्य सरकार ने अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। खासतौर पर उन जगहों पर कार्रवाई हुई जहाँ बिना अनुमति के मजहबी ढाँचे खड़े किए गए थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने बुलडोजर चलाकर सार्वजनिक जमीनें खाली कराईं। कई जगह मजार-मदरसे तोड़े गए।

ये कार्रवाई कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आई। यही लोग इस प्राकृतिक आपदा को ‘अल्लाह का बदला’ बताकर पेश कर रहे हैं। किसी ने ट्वीट किया, “ये आपदा है या बुलडोजर चल रहा है?” एक और ने लिखा, “खुदा की लाठी में आवाज नहीं होती।” ये सब बातें सीधे-सीधे एक मजहबी बहाने से मानव त्रासदी का मजाक उड़ाना है।

इन प्रतिक्रियाओं की जड़ उस मानसिकता में है जहाँ कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। सालों तक चली तुष्टिकरण की राजनीति ने कुछ मुस्लिम वर्गों को ये यकीन दिला दिया कि उनको कोई भी कानून तोड़ने का अधिकार है। लेकिन जब मोदी सरकार और उत्तराखंड की धामी सरकार ने कानून को सब पर बराबर लागू किया, तो यह लोगों को चुभने लगा।

इस्लामी कट्टरपंथी कानूनी कार्रवाई को दमन बताते हैं। यही वजह है कि जब देवभूमि में बाढ़ आई, तो उन्होंने इसे ‘अल्लाह का बदला’ कहकर पेश किया, क्योंकि वहाँ की सरकार ने अवैध निर्माण गिराए थे। उनके हिसाब से यह उन पर हुए दमन का हिसाब हो रहा था।

यह सोच वही है जिसने देश के बँटवारे को जायज बताया, दंगों में तालियाँ बजाईं और आतंकवादियों तक के लिए सहानुभूति जताई। इन लोगों को सिर्फ वही बातें सही लगती हैं जो उनके मजहबी एजेंडे को पूरा करती हैं।

सबसे शर्मनाक बात ये है कि तथाकथित ‘सेकुलर’ या ‘उदारवादी’ आवाजें इस पर खामोश हैं। अगर कोई हिंदू इस तरह मुस्लिम आबादी वाले इलाके की किसी त्रासदी पर खुशी जताता, तो हर चैनल, हर मँच पर हंगामा होता। लेकिन जब हिंदुओं के दुख पर जश्न मनाया जाता है, तो सब चुप हो जाते हैं।

ये लड़ाई किसी मजहब के खिलाफ नहीं है, ये लड़ाई उस जहरीली सोच के खिलाफ है जो मानवता को बाँटती है और त्रासदी को मजाक का जरिया बनाती है। ऐसे समय में जब पूरे देश को एकजुट होकर पीड़ितों के लिए खड़ा होना चाहिए, तब इस्लामी कट्टरपंथियों ने इसे बदला और अल्लाह का बदला दिखाने का हथियार बनाना चुना है।

जिस ख़ुशी के साथ वे मृत्यु का जश्न मनाते हैं, वह उनके वैचारिक दिवालियापन का आईना है और बाकी देश के लिए एक चेतावनी है। जब किसी की मौत पर कोई हँसे, तो समझ लीजिए कि हम सिर्फ डिजिटल नफरत नहीं देख रहे, ये हमारी आत्मा पर हमला है।

क्योंकि जब इंसानियत मरने लगे और मौत पर ताली बजाई जाए, तब हम सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि उस विचारधारा से जूझ रहे होते हैं जो देश की आत्मा को ही नष्ट करना चाहती है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट जिनित जैन ने अंग्रेजी में लिखी है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

‘द बंगाल फाइल्स’ की आवाज FIR से दबाना चाहती है TMC, बोले विवेक अग्निहोत्री- वहीं से करूँगा ट्रेलर रिलीज: ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर बनी है फिल्म

‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाने वाले फिल्म मेकर विवेक अग्निहोत्री एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने 1946 में बंगाल में हुए हिन्दू नरसंहार, जिसे ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम से जाता जाता है, पर ‘द बंगाल फाइल्स’ (The Bengal Files) नाम से एक फिल्म बनाई है। अग्निहोत्री का कहना है कि बंगाल की टीएमसी सरकार इस फिल्म को रोकने का प्रयास कर रही है।

बंगाल के कई शहरों में विवेक अग्निहोत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। हालाँकि इस पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। इसके बाद अग्निहोत्री ने सोशल मीडिया में वीडियो जारी कर कहा है कि वो इस फिल्म का ट्रेलर बंगाल से ही जारी करेंगे।

ये फिल्म 5 सिंतबर 2025 को रिलीज होने वाली है। फिल्म के प्रमोशन के लिए अग्रिहोत्री इनदिनों अमेरिका में हैं। उन्होंने वीडियो में और भी कई खुलासे किए हैं।

वीडियो में विवेक अग्निहोत्री ने क्या कहा

अमेरिका में अपनी फिल्म का प्रमोशन कर रहे विवेक अग्निहोत्री ने वीडियो जारी कर बंगाल की ममता सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा,” बंगाल के अलग-अलग शहरों में उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज करवाई गई है। टीएमसी सरकार की रणनीति है कि फिल्म को किसी भी तरह कानूनी मामलों में उलझाया जाए, ताकि फिल्म का प्रमोशन नहीं किया जा सके।”

उन्होंने कहा कि कानूनी लड़ाई वो कोर्ट में ही सुलझाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था और कोलकाता हाईकोर्ट पर पूरा विश्वास है और उन्होंने एफआईआर पर स्टे लगाकर न्याय किया। फिल्म निर्माता ने पूछा, “हमारी आवाज वे क्यों दबाना चाहते हैं? आखिर बंगाल के इतिहास के काले पन्ने को वे क्यों छिपाना चाहते हैं? मुर्शिदाबाद के लोगों को उनका इतिहास पता होना चाहिए, आखिर लोगों के बीच सच क्यों नहीं आने देना चाहते हैं? वे फिल्म से डरते हैं या सच से।”

उन्होंने कहा, “हम बंगाल में ही फिल्म का ट्रेलर रिलीज करेंगे। मुझे कोई चुप नहीं कर सकता क्योंकि सच को छिपाया नहीं जा सकता।”

बंगाल में फिल्म शूट करने से रोका गया

फिल्म निर्माण को लेकर विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि बंगाल की पृष्ठभूमि में बनी ‘द बंगाल फाइल्स’ की शूटिंग बंगाल में नहीं करने दी गई, कम संसाधनों के साथ पूरी फिल्म मुंबई में बनी। विवेक अग्निहोत्री का कहना है, “ये जनता की फिल्म है, आप मेरी ताकत हैं। सच के साथ हम फिलहाल अकेले हैं।”

‘द बंगाल फाइल्स’ की स्टोरी विवेक अग्रिहोत्री ने खुद लिखी है और फिल्म का निर्देशन किया है। इस फिल्म में पल्लवी जोशी, मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खेर और दर्शन कुमार हैं। फिल्म रिलीज होने में करीब 1 महीना बचा है। हाल ही में अमेरिका में इसका प्रीमियर भी हुआ।

हिन्दुओं नरसंहार था ‘डायरेक्ट एक्शन डे’

यह फिल्म 1946 में अविभाजित बंगाल में हुई हिन्दू नरसंहार को दर्शाती है। इसमें 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे और 1946 का ही नोआखली दंगा शामिल है। ये नरसंहार 5 दिनों तक चला था। कोलकत्ता में ही सिर्फ 72 घंटों में करीब 6000 हिन्दू मार दिए गए थे।

इस मजहबी दंगे में करीब 20,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 100000 लोगों को अपना सबकुछ छोड़कर पलायन करना पड़ा। हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हिंदुओं की संपत्तियों को जला दिया गया।

पूर्वी बंगाल के नोआखाली में हिन्दुओं का कत्लेआम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। ये कई महीनों तक चलता रहा। इस दौरान हजारों हिन्दुओं की हत्या कर दी गई।

एक अनुमान के मुताबिक करीब 75 हजार हिन्दुओं ने सिर्फ नोआखली में घर- बार छोड़ा जबकि टिप्परा से 20 हजार से ज्यादा लोग अपना सबकुछ छोड़ कर चले गए। फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि फिल्म हिन्दुओं के नरसंहार पर आधारित है और इसमें उस इतिहास को दिखाया गया है जिसको अब तक दबा कर रखा गया था।

कोलकाता हाईकोर्ट ने फिल्म के रिलीज का रास्ता किया साफ

इस बीच कोलकाता हाईकोर्ट ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हुए एफआईआर पर स्टे लगा दी है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 26 अगस्त तक फिल्म टीम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि फिल्म की जब सुनवाई हो रही थी, तो कई एफआईआर जानबूझ कर दर्ज किए गए ताकि फिल्म से जुड़े लोगों को कानूनी पचड़ों में फँसाया जा सके। फिल्म के रिलीज को रोका जा सके।

17 साल के लड़के ने ढूँढी NASA की वेबसाइट में कमी, ‘हॉल ऑफ फेम’ में दर्ज हुआ नाम: माँ को अडानी समूह ने मुश्किल समय में दी थी मदद, पिता की मौत के बाद बना था सहारा

17 साल के लड़के वंश ने अमेरिका की स्पेस कंपनी NASA की वेबसाइट में कमी ढूँढ निकाली है। वंश की इस प्रतिभा की प्रशंसा खुद NASA ने भी की है। यहाँ तक की NASA ने अपने ‘हॉल ऑफ फेम’ में भी वंश का नाम दर्ज कर लिया है। वंश को बचपन से ही तकनीकी समझ में रुचि रही है। 14 साल की उम्र में वंश ने अपने पिता को कोरोना महामारी में खो दिया। वंश की माँ पूजा को अडानी समूह ने अपनी कंपनी में नौकरी दी। बिना पिता के वंश की जीवन अधूरा तो रहा, लेकिन उसने अपने हौसलों को नहीं खोया।

आइए वंश की पूरी कहानी शुरुआत से जानते हैं:

साल 2021 में जब पूरी दुनिया कोरोना की चपेट में थी, उस वक्त दिल्ली की रहने वाली पूजा सक्सेना की जिंदगी भी एक झटके में बिखर गई। उनके पति विवेक कुमार, जो अडानी सीमेंट में 23 सालों तक हेड ऑफ एनवायरनमेंट एंड हॉर्टिकल्चर के पद पर कार्यरत थे, वे महामारी की लहर में चल बसे।

पति को खोने के बाद पूजा अब अकेली रह गईं। पूजा पूरी तरह टूट चुकी थीं। उन्हें भविष्य के लिए कोई राह नजर नहीं आ रही थी। तब भी वह किशोर बेटे की परवरिश की चिंता में लगी रहती थीं। बिना पिता एक बेटे की जिम्मेदारी उठा पाना उनके लिए काफी मुश्किल होता जा रहा था।

पूजा के इस कठिन समय में अडानी समूह ने उनकी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया। पूजा ने पर्यावरण विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है। लेकिन परिवार की जिम्मेदारी के चलते वह व्यस्त थीं। तभी अडानी समूह ने उनके पति की कंपनी को दी गई सेवाओं का सम्मान किया और पूजा को उनकी शैक्षणिक क्षमता के अनुसार नौकरी ऑफर की।

पूजा को कंपनी में नई भूमिका दी गई। यह भूमिका पूजा के लिए नई जरूर थी, लेकिन इस मंच से उन्हें आत्मनिर्भर बनने का हौसला दिया।

बेटे वंश को कंप्यूटर से हुआ गहरा लगाव

जिस समय पूजा जिंदगी की कठिनाइयों से जूझ रही थीं। तभी उनका 14 साल का बेटा वंश भी गुमसुम सा रहने लगा। वंश को बचपन से ही कंप्यूटर से गहरा लगाव था। वह घंटों कमरे में बंद रहकर कंप्यूटर को अपनी दुनिया समझ चुका था। वंश को कंप्यूटर की भाषा की अच्छी समझ हो चुकी थी। तभी उसकी रुचि एथिकल हैकिंग की ओर बढ़ने लगी।

एथिकल हैकिंग कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाए बिना सिस्टम और नेटवर्क में कमजोरियों को पता लगात है, ताकि सिस्टम को शातिर हैकरों के दुरुपयोग होने से पहले ठीक किया जा सके। वंश कहते हैं, “मैं मानता हूँ कि तकनीक का इस्तेमाल जिम्मेदारी से होना चाहिए। इसे सुरक्षा देने का माध्यम बनाना चाहिए, ना कि डर का।”

NASA के ‘हॉल ऑफ फेम’ में वंश का नाम

वंश जैसे प्रतिभाशाली छात्र को केवल 17 साल की उम्र में अमेरिका की स्पेस कंपनी नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) की वेबसाइट में तकनीकी खामी खोज निकाली। इस उपलब्धि पर NASA ने वंश की प्रशंका की। यहाँ तक की NASA ने वंश के सम्मान में उसका नाम अपने ‘हॉल ऑफ फेम’ में दर्ज कर लिया है।

इस बारे में बात करते हुए वंश कहते हैं, मैं कई दिनों से टेस्ट कर रहा था। एक दिन अचानक स्क्रीन पर वह बग नजर आया। कुछ देर तक मैं बस देखता रहा। यकीन नहीं हो रहा था कि मैं ये कर पाया।” वंश की माँ पूजा के लिए यह पल गौरवपूर्ण था।

पूजा ने बेटे की प्रतिभा को सराहा और तमाम संघर्षों को याद करते हुए भावुक हो गईं। वे कहतीं हैं, “ये सिर्फ नासा का सम्मान नहीं था। ये उस मेहनत और ईमानदारी की जीत थी, जो वंश ने बिना शोर किए दिखाई थी। मेरे लिए वह पल जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।”

तो कुछ इस तरह अडानी समूह ने एक परिवार की मदद कर उनकी जिंदगी सँवार दी। आज पूजा और उनका बेटा वंश भविष्य की हर कसौटी पर उतरने के लिए तैयार हैं। अडानी समूह ने पूजा को आत्मनिर्भर और बेटे वंश को भविष्य का उजाला दिखा दिया है।