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पैसे के लेनदेन का था मामला, लेकिन इलाहाबाद HC के जज ने क्रिमिनल कार्रवाई की दी परमिशन: सुप्रीम कोर्ट ने हड़काया, कहा- इनको सीनियर के साथ बिठाओ

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जज के खिलाफ एक्शन भी लिया है। यह कार्रवाई जज की बड़ी चूक के बाद हुई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार ने एक सामान्य मामले में आपराधिक कार्रवाई की मंजूरी दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत कुमार के आपराधिक मामले सुनने पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उन्हें किसी सीनियर जज के साथ बिठाया जाए।

सोमवार (4 अगस्त, 2025) को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे बी पारदीवाला और आर महादेवन वाली बेंच ने यह फैसला दिया। उन्होंने इस फैसले को अब तक के सबसे खराब और सबसे गलत आदेशों में से एक बताया। कोर्ट ने कहा कि इससे न्याय की गरिमा को ठेस पहुँची है और यह न्यायपालिका का मजाक उड़ाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या यह फैसला किसी बाहरी प्रभाव में लिया गया या पूरी तरह से कानून की अनदेखी की गई।

जज की योग्यता पर शीर्ष अदालत ने उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार की आपराधिक मामलों को निपटाने की क्षमता पर सवाल उठाते हुए बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि अब जस्टिस कुमार को अकेले आपराधिक मामले सुनने की अनुमति नहीं होगी। उन्हें हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ और अनुभवी जज के साथ खंडपीठ (डिवीजन बेंच) में बैठने का निर्देश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश जस्टिस कुमार द्वारा पारित एक विवादास्पद फैसले के बाद दिया। दरअसल, उन्होंने एक दीवानी विवाद (सिविल डिस्प्यूट) में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति दे दी थी। मामला एक कंपनी से जुड़ा था, जिस पर एक कारोबारी लेनदेन में बाकी रकम न चुकाने का आरोप था।

इस पर मजिस्ट्रेट ने समन जारी किया था, जिसे रद्द करने की याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका को जस्टिस कुमार ने खारिज कर दिया। उन्होंने इस मामले में आपराधिक केस चलाने की मंजूरी दे दी। उन्होंने कहा कि अगर मामला दीवानी अदालत में भेजा गया, तो शिकायतकर्ता को बहुत समय और पैसा खर्च करना पड़ेगा, जो उसके लिए मुश्किल होगा।

उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि ऐसा करना ‘अच्छे पैसे को बुरे पैसे के पीछे लगाने’ जैसा होगा और इससे शिकायतकर्ता को अपूर्णीय नुकसान होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह फैसला न्याय का मजाक उड़ाने जैसा है और जस्टिस कुमार को तत्काल आपराधिक मामलों से हटाया जाए। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य जज को निर्देश दिया कि वे यह आदेश तुरंत लागू करें।

इलाहाबाद HC के फैसले पर हैरान हुई शीर्ष अदालत

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को चौंकाने वाला और कानून के खिलाफ बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि इस तरह के फैसले पढ़ना न्याय प्रणाली के लिए एक दुखद दिन जैसा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “क्या हाईकोर्ट को सच में लगता है कि अगर आरोपित दोषी पाया गया, तो निचली अदालत उसे शेष पैसे दिलवाएगी? ऐसी टिप्पणियाँ चौंकाने वाली हैं।” कोर्ट ने साफ कहा कि दीवानी विवादों में आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कानून का दुरुपयोग है और ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस सोच पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि दीवानी मुकदमे में पैसा वसूलने में ज्यादा समय लग सकता है, इसलिए आपराधिक रास्ता अपनाना उचित है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि केवल समय बचाने के लिए आपराधिक कानून का सहारा लेना न्याय का अपमान है।

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पूरे आदेश को निरस्त (रद्द) कर दिया और दोहराया कि दीवानी विवादों में आपराधिक केस नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि कोई गंभीर आपराधिक तत्व साफ तौर पर सामने न हो।

कुदरत का बुलडोजर, खुदा की लाठी… ख़ुशी मनाओ: बादल फटने से देवभूमि में तबाही, इस्लामी कट्टरपंथी फैला रहे हिंदू घृणा

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में मंगलवार (5 अगस्त 2025) को बादल फटने से आई भयावह बाढ़ ने कई इलाकों को तहस-नहस कर दिया। गंगोत्री के पास बसे गाँव धराली में तबाही सबसे ज्यादा देखने को मिली। यहाँ लोगों के घर, जीवन और रोजगार सब पानी में बह गए। इस भयानक मंजर का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने हर किसी को दुखी कर दिया। जहाँ देश के ज्यादातर लोगों ने इस आपदा पर दुख और संवेदना जताई, वहीं कुछ इस्लामी कट्टरपंथी सोशल मीडिया यूजर्स ने इस त्रासदी का मजाक उड़ाया।

अली सोहराब, करिश्मा अजीज जैसे लोग और उनके समर्थकों ने इस दर्दनाक घटना पर खुशी जताई। उन्होंने इसे ‘कुदरत का बुलडोजर’ बताया। धराली में आम लोगों के घर-सम्पत्ति बर्बाद होने और जानें जाने पर असंवेदनशील रवैया दिखाते हुए यह इस्लामी कट्टरपंथी अपनी घृणा का प्रदर्शन करते रहे।

देवभूमि उत्तराखंड में हाल के महीनों में राज्य सरकार ने अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। खासतौर पर उन जगहों पर कार्रवाई हुई जहाँ बिना अनुमति के मजहबी ढाँचे खड़े किए गए थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने बुलडोजर चलाकर सार्वजनिक जमीनें खाली कराईं। कई जगह मजार-मदरसे तोड़े गए।

ये कार्रवाई कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आई। यही लोग इस प्राकृतिक आपदा को ‘अल्लाह का बदला’ बताकर पेश कर रहे हैं। किसी ने ट्वीट किया, “ये आपदा है या बुलडोजर चल रहा है?” एक और ने लिखा, “खुदा की लाठी में आवाज नहीं होती।” ये सब बातें सीधे-सीधे एक मजहबी बहाने से मानव त्रासदी का मजाक उड़ाना है।

इन प्रतिक्रियाओं की जड़ उस मानसिकता में है जहाँ कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। सालों तक चली तुष्टिकरण की राजनीति ने कुछ मुस्लिम वर्गों को ये यकीन दिला दिया कि उनको कोई भी कानून तोड़ने का अधिकार है। लेकिन जब मोदी सरकार और उत्तराखंड की धामी सरकार ने कानून को सब पर बराबर लागू किया, तो यह लोगों को चुभने लगा।

इस्लामी कट्टरपंथी कानूनी कार्रवाई को दमन बताते हैं। यही वजह है कि जब देवभूमि में बाढ़ आई, तो उन्होंने इसे ‘अल्लाह का बदला’ कहकर पेश किया, क्योंकि वहाँ की सरकार ने अवैध निर्माण गिराए थे। उनके हिसाब से यह उन पर हुए दमन का हिसाब हो रहा था।

यह सोच वही है जिसने देश के बँटवारे को जायज बताया, दंगों में तालियाँ बजाईं और आतंकवादियों तक के लिए सहानुभूति जताई। इन लोगों को सिर्फ वही बातें सही लगती हैं जो उनके मजहबी एजेंडे को पूरा करती हैं।

सबसे शर्मनाक बात ये है कि तथाकथित ‘सेकुलर’ या ‘उदारवादी’ आवाजें इस पर खामोश हैं। अगर कोई हिंदू इस तरह मुस्लिम आबादी वाले इलाके की किसी त्रासदी पर खुशी जताता, तो हर चैनल, हर मँच पर हंगामा होता। लेकिन जब हिंदुओं के दुख पर जश्न मनाया जाता है, तो सब चुप हो जाते हैं।

ये लड़ाई किसी मजहब के खिलाफ नहीं है, ये लड़ाई उस जहरीली सोच के खिलाफ है जो मानवता को बाँटती है और त्रासदी को मजाक का जरिया बनाती है। ऐसे समय में जब पूरे देश को एकजुट होकर पीड़ितों के लिए खड़ा होना चाहिए, तब इस्लामी कट्टरपंथियों ने इसे बदला और अल्लाह का बदला दिखाने का हथियार बनाना चुना है।

जिस ख़ुशी के साथ वे मृत्यु का जश्न मनाते हैं, वह उनके वैचारिक दिवालियापन का आईना है और बाकी देश के लिए एक चेतावनी है। जब किसी की मौत पर कोई हँसे, तो समझ लीजिए कि हम सिर्फ डिजिटल नफरत नहीं देख रहे, ये हमारी आत्मा पर हमला है।

क्योंकि जब इंसानियत मरने लगे और मौत पर ताली बजाई जाए, तब हम सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि उस विचारधारा से जूझ रहे होते हैं जो देश की आत्मा को ही नष्ट करना चाहती है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट जिनित जैन ने अंग्रेजी में लिखी है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

‘द बंगाल फाइल्स’ की आवाज FIR से दबाना चाहती है TMC, बोले विवेक अग्निहोत्री- वहीं से करूँगा ट्रेलर रिलीज: ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर बनी है फिल्म

‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाने वाले फिल्म मेकर विवेक अग्निहोत्री एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने 1946 में बंगाल में हुए हिन्दू नरसंहार, जिसे ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम से जाता जाता है, पर ‘द बंगाल फाइल्स’ (The Bengal Files) नाम से एक फिल्म बनाई है। अग्निहोत्री का कहना है कि बंगाल की टीएमसी सरकार इस फिल्म को रोकने का प्रयास कर रही है।

बंगाल के कई शहरों में विवेक अग्निहोत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। हालाँकि इस पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। इसके बाद अग्निहोत्री ने सोशल मीडिया में वीडियो जारी कर कहा है कि वो इस फिल्म का ट्रेलर बंगाल से ही जारी करेंगे।

ये फिल्म 5 सिंतबर 2025 को रिलीज होने वाली है। फिल्म के प्रमोशन के लिए अग्रिहोत्री इनदिनों अमेरिका में हैं। उन्होंने वीडियो में और भी कई खुलासे किए हैं।

वीडियो में विवेक अग्निहोत्री ने क्या कहा

अमेरिका में अपनी फिल्म का प्रमोशन कर रहे विवेक अग्निहोत्री ने वीडियो जारी कर बंगाल की ममता सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा,” बंगाल के अलग-अलग शहरों में उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज करवाई गई है। टीएमसी सरकार की रणनीति है कि फिल्म को किसी भी तरह कानूनी मामलों में उलझाया जाए, ताकि फिल्म का प्रमोशन नहीं किया जा सके।”

उन्होंने कहा कि कानूनी लड़ाई वो कोर्ट में ही सुलझाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था और कोलकाता हाईकोर्ट पर पूरा विश्वास है और उन्होंने एफआईआर पर स्टे लगाकर न्याय किया। फिल्म निर्माता ने पूछा, “हमारी आवाज वे क्यों दबाना चाहते हैं? आखिर बंगाल के इतिहास के काले पन्ने को वे क्यों छिपाना चाहते हैं? मुर्शिदाबाद के लोगों को उनका इतिहास पता होना चाहिए, आखिर लोगों के बीच सच क्यों नहीं आने देना चाहते हैं? वे फिल्म से डरते हैं या सच से।”

उन्होंने कहा, “हम बंगाल में ही फिल्म का ट्रेलर रिलीज करेंगे। मुझे कोई चुप नहीं कर सकता क्योंकि सच को छिपाया नहीं जा सकता।”

बंगाल में फिल्म शूट करने से रोका गया

फिल्म निर्माण को लेकर विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि बंगाल की पृष्ठभूमि में बनी ‘द बंगाल फाइल्स’ की शूटिंग बंगाल में नहीं करने दी गई, कम संसाधनों के साथ पूरी फिल्म मुंबई में बनी। विवेक अग्निहोत्री का कहना है, “ये जनता की फिल्म है, आप मेरी ताकत हैं। सच के साथ हम फिलहाल अकेले हैं।”

‘द बंगाल फाइल्स’ की स्टोरी विवेक अग्रिहोत्री ने खुद लिखी है और फिल्म का निर्देशन किया है। इस फिल्म में पल्लवी जोशी, मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खेर और दर्शन कुमार हैं। फिल्म रिलीज होने में करीब 1 महीना बचा है। हाल ही में अमेरिका में इसका प्रीमियर भी हुआ।

हिन्दुओं नरसंहार था ‘डायरेक्ट एक्शन डे’

यह फिल्म 1946 में अविभाजित बंगाल में हुई हिन्दू नरसंहार को दर्शाती है। इसमें 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे और 1946 का ही नोआखली दंगा शामिल है। ये नरसंहार 5 दिनों तक चला था। कोलकत्ता में ही सिर्फ 72 घंटों में करीब 6000 हिन्दू मार दिए गए थे।

इस मजहबी दंगे में करीब 20,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 100000 लोगों को अपना सबकुछ छोड़कर पलायन करना पड़ा। हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हिंदुओं की संपत्तियों को जला दिया गया।

पूर्वी बंगाल के नोआखाली में हिन्दुओं का कत्लेआम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। ये कई महीनों तक चलता रहा। इस दौरान हजारों हिन्दुओं की हत्या कर दी गई।

एक अनुमान के मुताबिक करीब 75 हजार हिन्दुओं ने सिर्फ नोआखली में घर- बार छोड़ा जबकि टिप्परा से 20 हजार से ज्यादा लोग अपना सबकुछ छोड़ कर चले गए। फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि फिल्म हिन्दुओं के नरसंहार पर आधारित है और इसमें उस इतिहास को दिखाया गया है जिसको अब तक दबा कर रखा गया था।

कोलकाता हाईकोर्ट ने फिल्म के रिलीज का रास्ता किया साफ

इस बीच कोलकाता हाईकोर्ट ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हुए एफआईआर पर स्टे लगा दी है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 26 अगस्त तक फिल्म टीम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि फिल्म की जब सुनवाई हो रही थी, तो कई एफआईआर जानबूझ कर दर्ज किए गए ताकि फिल्म से जुड़े लोगों को कानूनी पचड़ों में फँसाया जा सके। फिल्म के रिलीज को रोका जा सके।

17 साल के लड़के ने ढूँढी NASA की वेबसाइट में कमी, ‘हॉल ऑफ फेम’ में दर्ज हुआ नाम: माँ को अडानी समूह ने मुश्किल समय में दी थी मदद, पिता की मौत के बाद बना था सहारा

17 साल के लड़के वंश ने अमेरिका की स्पेस कंपनी NASA की वेबसाइट में कमी ढूँढ निकाली है। वंश की इस प्रतिभा की प्रशंसा खुद NASA ने भी की है। यहाँ तक की NASA ने अपने ‘हॉल ऑफ फेम’ में भी वंश का नाम दर्ज कर लिया है। वंश को बचपन से ही तकनीकी समझ में रुचि रही है। 14 साल की उम्र में वंश ने अपने पिता को कोरोना महामारी में खो दिया। वंश की माँ पूजा को अडानी समूह ने अपनी कंपनी में नौकरी दी। बिना पिता के वंश की जीवन अधूरा तो रहा, लेकिन उसने अपने हौसलों को नहीं खोया।

आइए वंश की पूरी कहानी शुरुआत से जानते हैं:

साल 2021 में जब पूरी दुनिया कोरोना की चपेट में थी, उस वक्त दिल्ली की रहने वाली पूजा सक्सेना की जिंदगी भी एक झटके में बिखर गई। उनके पति विवेक कुमार, जो अडानी सीमेंट में 23 सालों तक हेड ऑफ एनवायरनमेंट एंड हॉर्टिकल्चर के पद पर कार्यरत थे, वे महामारी की लहर में चल बसे।

पति को खोने के बाद पूजा अब अकेली रह गईं। पूजा पूरी तरह टूट चुकी थीं। उन्हें भविष्य के लिए कोई राह नजर नहीं आ रही थी। तब भी वह किशोर बेटे की परवरिश की चिंता में लगी रहती थीं। बिना पिता एक बेटे की जिम्मेदारी उठा पाना उनके लिए काफी मुश्किल होता जा रहा था।

पूजा के इस कठिन समय में अडानी समूह ने उनकी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया। पूजा ने पर्यावरण विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है। लेकिन परिवार की जिम्मेदारी के चलते वह व्यस्त थीं। तभी अडानी समूह ने उनके पति की कंपनी को दी गई सेवाओं का सम्मान किया और पूजा को उनकी शैक्षणिक क्षमता के अनुसार नौकरी ऑफर की।

पूजा को कंपनी में नई भूमिका दी गई। यह भूमिका पूजा के लिए नई जरूर थी, लेकिन इस मंच से उन्हें आत्मनिर्भर बनने का हौसला दिया।

बेटे वंश को कंप्यूटर से हुआ गहरा लगाव

जिस समय पूजा जिंदगी की कठिनाइयों से जूझ रही थीं। तभी उनका 14 साल का बेटा वंश भी गुमसुम सा रहने लगा। वंश को बचपन से ही कंप्यूटर से गहरा लगाव था। वह घंटों कमरे में बंद रहकर कंप्यूटर को अपनी दुनिया समझ चुका था। वंश को कंप्यूटर की भाषा की अच्छी समझ हो चुकी थी। तभी उसकी रुचि एथिकल हैकिंग की ओर बढ़ने लगी।

एथिकल हैकिंग कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाए बिना सिस्टम और नेटवर्क में कमजोरियों को पता लगात है, ताकि सिस्टम को शातिर हैकरों के दुरुपयोग होने से पहले ठीक किया जा सके। वंश कहते हैं, “मैं मानता हूँ कि तकनीक का इस्तेमाल जिम्मेदारी से होना चाहिए। इसे सुरक्षा देने का माध्यम बनाना चाहिए, ना कि डर का।”

NASA के ‘हॉल ऑफ फेम’ में वंश का नाम

वंश जैसे प्रतिभाशाली छात्र को केवल 17 साल की उम्र में अमेरिका की स्पेस कंपनी नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) की वेबसाइट में तकनीकी खामी खोज निकाली। इस उपलब्धि पर NASA ने वंश की प्रशंका की। यहाँ तक की NASA ने वंश के सम्मान में उसका नाम अपने ‘हॉल ऑफ फेम’ में दर्ज कर लिया है।

इस बारे में बात करते हुए वंश कहते हैं, मैं कई दिनों से टेस्ट कर रहा था। एक दिन अचानक स्क्रीन पर वह बग नजर आया। कुछ देर तक मैं बस देखता रहा। यकीन नहीं हो रहा था कि मैं ये कर पाया।” वंश की माँ पूजा के लिए यह पल गौरवपूर्ण था।

पूजा ने बेटे की प्रतिभा को सराहा और तमाम संघर्षों को याद करते हुए भावुक हो गईं। वे कहतीं हैं, “ये सिर्फ नासा का सम्मान नहीं था। ये उस मेहनत और ईमानदारी की जीत थी, जो वंश ने बिना शोर किए दिखाई थी। मेरे लिए वह पल जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।”

तो कुछ इस तरह अडानी समूह ने एक परिवार की मदद कर उनकी जिंदगी सँवार दी। आज पूजा और उनका बेटा वंश भविष्य की हर कसौटी पर उतरने के लिए तैयार हैं। अडानी समूह ने पूजा को आत्मनिर्भर और बेटे वंश को भविष्य का उजाला दिखा दिया है।

मालेगाँव में हिन्दुओं को मिला न्याय ‘कोर्ट की चूक’, मुंबई ब्लास्ट में मुस्लिम बरी ‘सच की जीत’: वामपंथी मीडिया के लिए हमेशा सनातनी दोषी-मुस्लिम मासूम, दो अदालती फैसलों ने दिखाया

पिछले एक माह में दो आतंकी हमलों में अदालत ने फैसले सुनाए। एक फैसला 2006 के मालेगाँव धमाकों से जुड़ा था जबकि दूसरा 2008 में हुए मुंबई लोकल धमाकों से। दोनों मामलों में धमाके के आरोपित बरी हो गए। उन्हें लगभग 2 दशक के बाद इन मुकदमों से मुक्ति मिली।

एक महीने के भीतर ही इन दोनों धमाकों के फैसले सुनाए गए। दोनों मामलों में फैसला भी एक जैसा आया, फैसला सुनाने वाली अदालतें इसी देश की हैं। कोर्ट ने फैसले में दोनों ही ब्लास्ट में सबूत ना मिलने पर दोषियों को बरी कर दिया। दोनों मामलों की शुरूआती जाँच करने वाली एजेंसी (महाराष्ट्र ATS) भी एक है। यह हमले हुए भी एक ही राज्य- ‘महाराष्ट्र’ में हुए थे।

इन दोनों फैसलों में बस एक मूलभूत फर्क है। मुंबई ब्लास्ट 2006 में आरोपित मुस्लिम थे, जिन पर बम ब्लास्ट करने का तगड़ा शक था। दूसरी तरफ मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में वे हिंदू थे, जिनको ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी गढ़ने के लिए फँसाया गया था। दोनों को बरी किया गया। लेकिन वामपंथी मीडिया ने दोनों फैसलों पर अलग-अलग एजेंडे से रिपोर्टिंग की।

मुंबई ब्लास्ट पर वामपंथी मीडिया को यह चिंता हुई कि कैसे मुस्लिम दोषियों की जिंदगी बर्बाद हो गई। वहीं मालेगाँव ब्लास्ट का फैसला आते ही यह चिंता खत्म हो गई। तब उनका एक्टिविज्म इस दुख में बदल गया कि आखिर हिंदू आतंकवादी साबित कैसे नहीं हुए? यह दिखाने के लिए वामपंथी मीडिया ने तरह-तरह के प्रपंच रचे।

मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में मुंबई की NIA स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाया। इस मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित समेत 7 हिंदुओं को बरी कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि NIA की जाँच में किसी के भी खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं और सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

जहाँ देश की बड़ी आबादी ने इस फैसले को ‘न्याय की जीत’ माना तो वहीं वामपंथी मीडिया ने फैसले को लेकर वही पुराना ‘भगवा आतंकवाद’ का हौव्वा और अदालत की नीयत पर सवाल करने वाला एजेंडा आगे बढ़ाया। लेकिन वामपंथी मीडिया की दोहरी सोच तब सामने आ गई जब उसने 7/11 मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट में 12 मुस्लिमों के कोर्ट से बरी होने पर ‘न्याय की जीत’ बताया और मुस्लिमों कि जिन्दगी खराब होने पर आँसू बहाए।

हिन्दू हुए बरी तो वामपंथी मीडिया को शक भी लगा सबूत

मालेगाँव ब्लास्ट 2008 का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने साफ कहा था कि बिना सबूतों के सभी को बरी किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा था कि केवल ‘शक’ के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसके बावजूद वामपंथी मीडिया ने कोर्ट के बयान को सबूत समझ लिया, वो भी सिर्फ ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी को साबित करने के लिए।

मालेगाँव ब्लास्ट द वायर
मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

‘द वायर’ के इस आर्टिकल में साफतौर पर यह जताने की कोशिश की गई कि सभी आरोपित दोषी ही थे, लेकिन कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। कोर्ट के बयान को इस तरीके से दिखाया गया कि गंभीर सबूत होने के बावजूद कोर्ट ने केवल शक के आधार पर हिंदू दोषियों को बरी किया है। इस रिपोर्ट में कोर्ट के उस बयान पर जोर दिया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा, “घटनास्थल से प्राथमिक साक्ष्यों का संग्रह ठीक से नहीं किया गया था।”

एक अलग रिपोर्ट में ‘द वायर’ मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में पूर्व स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर रोहिणी सालियान के पुराने बयान को हिन्दुओं के खिलाफ एजेंडा के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे द वायर ने यह दिखाने का दावा किया कि फैसले के पीछे राजनीतिक दबाव था।

सालियन ने कहा था कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मालेगाँव ब्लास्ट की पैरवी में गंभीर चूक हुई हैं। उन्होंने कहा था कि तत्कालीन मोदी सरकार ने NIA के जरिए मालेगाँव ब्लास्ट के दोषियों पर नरमी बरतने को कहा था।

मालेगाँव ब्लास्ट द वायर
मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

मामले में कोर्ट के फैसले के बाद अब रोहिणी सालियान ने आरोप लगाते हुए कहा, “यह तो पता था कि ऐसा होगा। अगर आप सच्चे सबूत पेश नहीं करेंगे तो और क्या उम्मीद की जा सकती है?” सालियान ने कहा कि साल 2017 से ही वह अभियोजक के रूप में बाहर कर दी गई थीं।

मालेगाँव ब्लास्ट द क्विंट
मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में मुस्लिम पीड़ितों की आपबीती बताती ‘द क्विंट’ की खबर (फोटो साभार: The Quint)

मालेगाँव मामले में फैसले पर बदजुबानी करने में केवल द वायर ही नहीं बल्कि दूसरे वामपंथी मीडिया पोर्टल भी शामिल हुए। मालेगाँव फैसले पर रूदाली करने वाले गिरोह में दूसरा नाम द क्विंट है। वामपंथी पोर्टल ‘द क्विंट’ ने इस लेख में मालेगाँव ब्लास्ट 2008 के मुस्लिम पीड़ितों पर रोना रोया।

कोर्ट के फैसले पर पीड़ितों की आपबीती को क्विंट ने खूब प्रचारित किया। ब्लास्ट में मारे गए उस्मान खान के भतीजे को न्याय के साथ विश्वास टूटने का भावनात्मक प्लॉट खड़ा किया गया। मानों 7 लोगों को बरी कर कोर्ट ने कोई अपराध कर दिया हो, जबकि कोर्ट का फैसला सबूतों के आधार पर लिया गया था।

मालेगाँव पर वामपंथी मीडिया का दर्द असल में इसलिए फूटा क्योंकि हिन्दुओं को न्याय मिल गया। हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी पूरे देश के सामने मुंह के बल गिर गई। जिन साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को फँसाने का प्रयास किया गया, वह बेदाग़ छूट गए।

मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते खड़े किए भगवा आतंकवाद के नैरेटिव का दफ़न होना और वामपंथियों के प्रपंचों का अस्वीकार किया जाना, क्विंट और वायर के लिए मौत समान है। अब इस दुख को पाटने के लिए वह कुछ भी बातें कर रहे हैं। फिर इसके लिए चाहे कोर्ट को कठघरे में ही क्यों ना खड़ा करना पड़ जाए।

मुस्लिम छूटे तो न्याय व्यवस्था पर पढ़े कसीदे

इसी वामपंथी मीडिया ने मुंबई ब्लास्ट 2006 के दोषी पर कोर्ट के फैसले की सराहना की। कोर्ट के फैसले को ‘न्याय की जीत’ करार दिया। क्योंकि बरी हुए लोग ‘मुस्लिम’ थे। इन मुस्लिमों को लेकर भावानात्मक रिपोर्ट करनी शुरू कर दी गई। यहाँ कोर्ट के फैसले पर सवाल नहीं किया और ना ही राजनीतिक दबाव जैसा कोई प्रपंच रचने की बातें हुईं।

मुंबई ब्लास्ट द वायर
मुंबई ब्लास्ट 2006 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

‘द वायर’ ने इस मामले में एक रिपोर्ट में मुस्लिम आरोपितों को न्याय मिलने का गुणगान किया। बताया गया कि मुंबई बम धमाका 2006 में इन्हें केवल इनका हिस्सा होने तक सीमित कर दिया। उसने मुस्लिमों के 19 साल जेल में जाने के लिए आंसू बहाए और पूछा की उनकी भरपाई कौन करेगा।

मालेगाँव मामले में ATS की जाँच को ब्रह्मवाक्य मान कर हिन्दुओं को फाँसी पर चढ़ाने की इच्छा रखने वाला वामपंथी मीडिया इस मामले में इसी एजेंसी की जिम्मेदारी तय करने जैसी बातें करने लगा।

मुंबई ब्लास्ट द वायर
मुंबई ब्लास्ट 2006 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

मुंबई ब्लास्ट 2006 की जाँच के दौरान पुलिस ने जो प्रताड़ना आरोपितों पर की, उसकी कोर्ट के फैसले से तुलना की गई। पुलिस को तुरंत खलनायक बताया गया और 19 सालों का हिसाब माँगा गया।

मुंबई ब्लास्ट द वायर
मुंबई ब्लास्ट 2006 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

इसके बाद तो ‘द वायर’ ने मुंबई ब्लास्ट 2008 के एक आरोपित की कहानी अलग से बताई और बर्बाद हुई जिंदगी बताकर रोना-पीटना चालू किया। आरोपित की ‘फाँसी यार्ड’ से निकलने की कहानी इस तरह लिखी जैसे कोई मेलोड्रामा वाली फिल्म चल रही हो। पूरा आर्टिकल मानों किसी आरोपित नहीं, बल्कि फकीर की कहानी हो।

असल में वामपंथी मीडिया का यह स्वभाव ही है, हिंदू को अपराधी और मुस्लिम को पीड़ित बताना। उसे देश का औसत हिंदू हिंसक, लेकिन मुस्लिम शांतिप्रिय लगता है। उसे ईद की सेवइयों में भाईचारा दिखता है लेकिन होली के रंगों में उसे नफरत दिखाई पढ़ती है।

वह मुस्लिम के आतंकी होने पर innocent until proven guilty का रवैया अपनाती है, लेकिन हर हिंदू को वह हमेशा ही दोषी मानती है। यही वह करती आई है, और करती रहेगी।

‘ISIS टेरेरिस्ट संगठन नहीं’: आतंकी साकिब नाचन की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज, क्रिमिनल कोर्ट जाने को कहा; महाराष्ट्र के गाँव को घोषित किया था ‘अल शाम’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को आतंकी साकिब नाचन की याचिका खारिज कर दी है। यह याचिका दिसंबर 2024 में दाखिल की गई थी। इसमें भारत में ISIS को आतंकवादी संगठन घोषित करने को लेकर चुनौती दी गई थी। साकिब नाचन की जून 2025 में ब्रेन हैमरेज से मौत हो चुकी है।

याचिका में नाचन ने दावा किया था कि उसे और उसके बेटे शमिल नाचन को ISIS से जुड़े होने के संदेह में गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने ये कहकर याचिका खारिज कर दी कि इस तरह के आरोपों पर उचित क्रिमिनल कोर्ट ही विचार कर सकती है।

नाचन की याचिका में 2015 और 2018 में जारी दो सरकारी नोटिफिकेशनों को चुनौती दी गई थी, जिन्हें अलनॉफुल एक्टीविटीज प्रीवेंशन एक्ट (UAPA), 1967 की धारा 35 के तहत जारी किया गया था। कोर्ट ने कहा कि वह इस तरह की याचिका पर विचार नहीं करना चाहता है।

साकिब नाचन की मृत्यु के बाद वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता को कोर्ट ने amicus curiae (न्याय मित्र) नियुक्त किया। उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि इन नोटिफिकेशनों में ‘खिलाफत’ और ‘जिहाद’ जैसे मजहबी शब्दों की गलत व्याख्या की गई है, जिससे याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाले धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

गुप्ता ने कहा कि UAPA की धारा 3 के तहत जिस तरह ‘अवैध संघ’ घोषित करने की प्रक्रिया तय है, वैसी कोई प्रक्रिया धारा 35 के तहत नहीं है, जिससे संगठन को ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित किया जा सके। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि UAPA में आतंकवादी संगठन की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।

जस्टिस बागची ने कहा कि नोटिफिकेशन में ‘खिलाफत’ जैसे शब्दों का उपयोग मजहबी संदर्भ में नहीं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में किया गया है, इसलिए उन्हें उसी संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि UAPA में ‘terrorist act’ (आतंकवादी कृत्य) की परिभाषा दी गई है, और जो संगठन ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, उन्हें ‘आतंकी संगठन’ घोषित किया जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता दरअसल इस याचिका के जरिए अपने और अपने बेटे के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों में राहत लेना चाह रहे थे, जबकि इसके लिए क्रिमिनल कोर्ट ही सही जगह है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “ऐसे मामलों में राहत के लिए याचिकाकर्ता को सही फोरम पर जाना चाहिए। वह जमानत या अन्य राहत के लिए आपराधिक कोर्ट का रुख कर सकते हैं।” इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

कौन था साकिब नाचन?

साकिब नाचन एक कुख्यात आतंकवादी था, जिस पर मुंबई में चार महीनों के अंदर तीन बड़े बम धमाकों को अंजाम देने का आरोप है। ये धमाके 6 दिसंबर 2002 से 13 मार्च 2003 के बीच हुए थे। आखिरी धमाका सबसे खतरनाक था, जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी और 82 लोग घायल हुए थे।

इन धमाकों को मुंबई के व्यस्त रेलवे स्टेशन और बाजारों को निशाना बनाकर अंजाम दिया गया था ताकि ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। मुंबई पुलिस ने 10 अप्रैल 2003 को साकिब को गिरफ्तार किया था। उसे 8 साल की सजा हुई और फिर उसे 1 लाख के मुचलके पर जमानत मिल गई।

बाद में मार्च 2016 में कोर्ट ने उसे धमाकों के मामले में दोषी ठहराया। लेकिन वह 2 साल से भी कम समय के लिए ही जेल में रहा और नवंबर 2017 में उसे ‘अच्छे व्यवहार’ के चलते 5 महीने पहले रिहा कर दिया गया।

इस बीच, 4 अगस्त 2012 को उसे विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ता मनोज राइचा की हत्या की कोशिश के आरोप में फिर से गिरफ्तार किया गया। लेकिन उसे अगस्त 2014 में फिर जमानत मिल गई।

रिहाई के बाद भी साकिब नाचन ने अपनी आतंकी गतिविधियाँ जारी रखीं। 9 दिसंबर 2023 को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उसे फिर से गिरफ्तार किया, क्योंकि वह महाराष्ट्र में एक ISIS मॉड्यूल चला रहा था।

शुरुआती जाँच में पता चला कि साकिब ने ठाणे के ग्रामीण इलाके पाडघा को ‘मुक्त क्षेत्र’ और ‘अल-शाम’ घोषित कर दिया था। यह वही तरीका है जो सीरिया में ISIS अपनाता है। NIA ने यह भी बताया कि वह मुस्लिम युवाओं को भड़काकर उन्हें उनके घरों से पाडघा लाकर आतंकी नेटवर्क को मजबूत करने में जुटा था।

इससे पहले 11 अगस्त 2023 को NIA ने साकिब का बेटा शमिल नाचन को भी गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी पुणे ISIS मॉड्यूल केस में हुई। जाँच में शमिल के ठिकाने से आपत्तिजनक सबूत मिले। शमिल और उसके साथियों ने 2022 में पुणे में एक घर में IED (बम) बनाने और ट्रेनिंग की वर्कशॉप का आयोजन किया था और वहाँ बम तैयार किए थे। इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेजा गया।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

आर्मी-नेवी-एयरफोर्स के लिए खरीदे जाएँगे ₹67000 करोड़ के हथियार, मोदी सरकार ने दी मंजूरी: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान को तबाह करने वाले ब्रह्मोस, ड्रोन और रडार भी लिस्ट में शामिल

मोदी सरकार ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को लगभग ₹67,000 करोड़ के रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इसमें लंबी दूरी के उड़ान भरने वाले ड्रोन्स के साथ ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम की खरीद शामिल है। जिन हथियारों की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है, उनमें से कई हथियार औसे हैं जिनका उपयोग ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी किया गया था इनमें S-400 मिसाइल सिस्टम समेत अन्य के अपगग्रेडेशन और मेंटेनेंस समेत कई प्रस्ताव शामिल किए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय की ओर से रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council – DAC) की बैठक हुई। इसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। इसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना के लिए कई महत्वपूर्ण उपकरणों और प्रणालियों की खरीद को स्वीकृति दी गई। इस प्रस्ताव का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों की सामरिक युद्धक क्षमता को आधुनिक तकनीक से लैस करना है।

किस सेना को क्या मिला

थल सेना के लिए बीएमपी इंफैंट्री (पैदल सेना) लड़ाकू वाहनों में थर्मल इमेजर आधारित नाइट साइट्स लगाए जाएँगे। इससे रात के समय इन वाहनों के संचालन में बेहतरी आएगी। इसके अलावा पर्वतीय इलाकों में निगरानी के लिए विशेष राडार सिस्टम भी खरीदे जाएँगे इससे दुर्गम क्षेत्रों में भी सटीक जानकारी आसानी से मिल सकेगी।

वायु सेना को स्पाइडर एयर डिफेंस सिस्टम का अपग्रेड मिलेगा। साथ ही MALE (मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस) ड्रोन के खरीद की भी स्वीकृति मिली है। ये हथियारों और सेंसर से लैस होंगे और 24×7 निगरानीके साथ सटीक हमले की क्षमता के साथ आएँगे। वायु सेना के लिए C-17 और C-130J जैसे भारी परिवहन विमानों के रखरखाव और अपग्रेड का प्रस्ताव भी इसमें शामिल है।

नौसेना के लिए कॉम्पैक्ट ऑटोनॉमस सरफेस क्राफ्ट, ब्रह्मोस मिसाइल के लिए फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर और बराक-1 मिसाइल प्रणाली का अपग्रेड का प्रस्ताव शामिल किया गया है। ये सभी उपकरण समुद्री सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी युद्ध और तटीय निगरानी में एक स्तर ऊपर उठेंगे।

इन सभी प्रस्तावों को ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत स्वदेशी निर्माण को प्राथमिकता देते हुए मंजूरी दी गई है ताकि देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को भी बढ़ावा मिले।

सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा कदम

यह रक्षा खरीद निर्णय भारत की सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। खास तौर पर अगर चीन और पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को देखा जाए तो ये रक्षा उपकरण आधुनिक होने के साथ बेहतर मारक और सुरक्षा प्रणाली से लैस होंगे। इस खरीद से भारतीय सेनाओं को आधुनिक हथियार तो मिलेंगे ही, पर साथ ही उनकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी कई गुना बढ़ जाएगी।

110+ एयर लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों को मंजूरी

ब्रह्मोस मिसाइल की खरीद को लेकर रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी किए गए प्रस्ताव में 110+ एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों को खरीदने की मंजूरी भी मिल गई है। इसका अनुमानित बजट लगभग ₹10,800 करोड़ है। इसके अलावा नौसेना के पुराने युद्धपोतों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और वर्टिकल लॉन्चर की खरीद को भी मंजूरी दी गई है। इसकी लागत लगभग ₹650 करोड़ है।

इससे पहले मार्च 2023 में भारत ने 220 ब्रह्मोस मिसाइलों के लिए ₹19,519 करोड़ का सौदा किया था। अब तक इस मिसाइल प्रणाली पर कुल ₹58,000 करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है।

ब्रह्मोस क्यों है इतना ज़रूरी?

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस ने साथ मिलकर तैयार किया है। ये दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक है। इसकी गति Mach 2.8 (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना) है और यह 450 किलोमीटर तक सटीक निशाना साध सकती है। इसे थल, जल और वायु – तीनों माध्यमों से लॉन्च किया जा सकता है। इसकी ये क्षमता इसे बहुआयामी बनाते हैं।

हालिया समय में ब्रह्मोस मिसाइल भारत की डिटरेंस रणनीति का केंद्र बिंदु भी रहा है। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर में इस मिसाइल ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों, एयरबेस और आतंकी कैंपों पर सटीक हमले किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी सराहना करते हुए कहा कि यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ताकत का प्रतीक है।

ब्रह्मोस की खरीद केवल एक तकनीकी अपग्रेड नहीं है, बल्कि यह भारत की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ भी है। यह मिसाइल प्रणाली न केवल दुश्मन की गहराई में सटीक हमला करने की क्षमता देती है, बल्कि भारत को क्षेत्रीय सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी मदद करती है।

चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के लिहाज से यह एक शक्तिशाली जवाबी हथियार है जो भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर में काम आए शस्त्र भी होंगे अपग्रेड

ऑपरेशन सिंदूर में जिन हथियारों का प्रयोग किया गया, वे भारत की सटीक और बहुआयामी युद्धक क्षमता का प्रतीक बने। इस ऑपरेशन में सबसे प्रमुख भूमिका निभाने वाले ब्रह्मोस एयर-लॉन्च सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की खरीद के साथ ऑपरेशन में राफेल विमानों से लॉन्च होने वाले SCALP क्रूज़ मिसाइल का भी उपयोग हुआ था। ये दुश्मन के भीतर गुप्त ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है। इसे बी अपग्रेड किया जाएगा।

इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर में Loitering Munition यानी कामिकाज़े ड्रोन का भी प्रयोग हुआ। इसने दुश्मन के रडार और वायु रक्षा प्रणाली को भेदने का काम किया था। रक्षा परिषद ने MALE ड्रोन की खरीद को मंजूरी देकर आधुनिक शस्त्रों की संख्या में इजाफा किया है।

इसके अलावा जिस आकाश मिसाइल प्रणाली का प्रयोग पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए किया गया, उसके नए वर्ज़न की खरीद भी इस प्रस्ताव में शामिल है। एल–70 एंटी–एयरक्राफ्ट गन और ZSU-23-4 शिल्का सिस्टम जैसे हथियारों ने ड्रोन हमलों को रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। इन प्रणालियों के अपग्रेड को भी मंजूरी दी गई है।

इन सभी हथियारों की खरीद और अपग्रेड से भारत ने ये साफ कर दिया है कि सरकार ऑपरेशन सिंदूर जैसी रणनीतिक कार्रवाइयों के लिए कमर कस चुका है और बेहतर तैयारी में है। यह न केवल सशस्त्र बलों की ताकत को बढ़ाता है, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति को भी एक निर्णायक दिशा देता है।

भारत की सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। खास तौर पर अगर चीन और पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को देखा जाए तो ये रक्षा उपकरण आधुनिक होने के साथ बेहतर मारक और सुरक्षा प्रणाली से लैस होंगे। इस खरीद से भारतीय सेनाओं को आधुनिक हथियार तो मिलेंगे ही, पर साथ ही उनकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी कई गुना बढ़ जाएगी।

महात्मा गाँधी की मूर्ति को अपमानित करना अनैतिक, पर अपराध नहीं: केरल हाई कोर्ट, छात्र के खिलाफ केस रद्द; जानिए क्या है मामला

केरल हाई कोर्ट ने महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अभद्रता करने वाले शख्स के खिलाफ कार्रवाई रद्द कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना कोई अपराध नहीं था। ऐसा करने वाला एक छात्र था, जिसने महात्मा गाँधी के ऊपर एक क्रिसमस वाला श्रद्धांजलि माला भी रख दिया था।

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि छात्र का कृत्य भले ही निंदनीय है, लेकिन उसे कानूनन अपराध नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य को दंडित करने के लिए कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।

कोर्ट का क्या कहना था?

यह मामला केरल हाई कोर्ट की जस्टिस वी जी अरुण की बेंच ने सुना। उन्होंने यह कहते हुए मामला रद्द कर दिया कि याचिकाकर्ता का आचरण भले ही सामाजिक रूप से अस्वीकार्य और निंदनीय हो लेकिन कानून के अनुसार उसे गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि हर अनैतिक कार्य, अवैध कार्य नहीं होता।

कोर्ट ने ‘nullum crimen sine lege’ यानी ‘बिना कानून के कोई अपराध नहीं’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जब तक किसी कृत्य को किसी कानून में अपराध के रूप में परिभाषित नहीं किया गया हो, तब तक उसे अपराध नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में भी राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाओं को अपवित्र करने के खिलाफ कोई प्रावधान नहीं है।

वकीलों की दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी

छात्र के वकील एडवोकेट एस राजीव ने दलील दी कि भले ही छात्र का तरीका गलत था, लेकिन उसे अपराध नहीं कहा जा सकता। वकील ने दलील दी कि न तो कोई कानून टूटा है और न ही किसी की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया है।

वहीं, सरकारी पक्ष की ओर से एडवोकेट हाशिम के एम ने तर्क दिया कि यह कृत्य समाज में असंतोष फैलाने वाला था। कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत के नागरिकों को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के साथ-साथ अपने मौलिक कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए।

कोर्ट ने माना कि स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करना भी एक नैतिक कर्तव्य है, भले ही संविधान में उसका स्पष्ट रूप से जिक्र नहीं किया गया हो।

क्या था मामला?

यह मामला एक लॉ छात्र से जुड़ा है, जिस पर आरोप था कि उसने महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर चशमा और क्रिसमस की माला रखी और फिर कहा कि गाँधी जी का निधन बहुत पहले हो चुका है।

इस पूरे कृत्य की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई और उसे छात्रों के व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर किया गया। इससे कॉलेज में तनाव फैल गया और प्रिंसिपल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद छात्र को पाँच दिन के लिए कॉलेज से निलंबित कर दिया गया और उसे ₹5000 का जुर्माना भी भरना पड़ा।

छात्र के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 (दंगा भड़काने के इरादे से जानबूझकर उकसाना) और धारा 426 (शरारत के लिए दंड) के तहत केस दर्ज किया गया था। अब यह केस रद्द हो गया है।

ब्रह्मोस की ताकत से बदला ‘एशिया पैसिफिक’, फिलीपींस के राष्ट्रपति ने बताया ‘इंडो पैसिफिक’: भारतीयों के लिए वीजा फ्री एक्सेस, जानिए कैसे बदली रिश्तों की धुरी

चीन के लगातार बढ़ते खतरे के बीच भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक बढ़त हासिल की है। भारत की यात्रा पर आए फिलिपींस के राष्ट्रपति फ़र्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्र को एशिया पैसिफिक के बजाय इंडो पैसिफिक कह कर संबोधित किया है। उनके कहने का सीधा अर्थ है कि एशिया पैसिफिक का अभिभावक और रक्षक भारत है। उनकी यह यात्रा भारत और फिलिपींस सम्बन्धों में एक नया अध्याय है। इस दौरान रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात भी हुई है।

भारत की यात्रा पर आए फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड आर मार्कोस जूनियर का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को राष्ट्रपति भवन में स्वागत किया। राष्ट्रपति मार्कोस भारत की 5 दिवसीय राजकीय यात्रा पर आए हैं।

यह दौरा भारत और फिलीपींस के बीच कूटनीतिक संबंधों के 75 साल पूरे होने के अवसर पर हो रहा है। इसे दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

स्वागत समारोह के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मार्कोस ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की बदलती स्थिति पर बात की। उन्होंने कहा कि अब इसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की बजाय इंडो-पैसिफिक क्षेत्र कहा जा रहा है और यह आज की वैश्विक राजनीति, व्यापार और अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि नई तकनीकों और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति के कारण दोनों देशों के लिए कई नए अवसर उभरे हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “यह यात्रा नई संभावनाओं की खोज और हमारे मौजूदा संबंधों को मजबूत करने के लिए है।”

मार्कोस ने याद दिलाए अपने पारिवारिक संबंध

फिलीपींस के राष्ट्रपति मार्कोस ने भारत में होने पर खुशी जताई और हाल के वर्षों में भारत के तेज विकास की सराहना की। उन्होंने अपने पिता और पूर्व राष्ट्रपति फर्डिनैंड मार्कोस सीनियर को याद करते हुए कहा कि वे 1976 में भारत की यात्रा करने वाले पहले फिलीपीनी राष्ट्रपति थे।

राष्ट्रपति मार्कोस ने कहा, “यह मेरे लिए बहुत सम्मान की बात है कि मैं अपने चार पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत आया हूँ। मैं भारत की आपकी अगुवाई में हुई शानदार उपलब्धियों के लिए बधाई देता हूँ। जब मैंने दिल्ली में कदम रखा, तो भारत के तेज बदलाव और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ऊर्जा मुझे साफ महसूस हुई।”

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आतिथ्य और सहयोग के लिए भी धन्यवाद किया और हाल ही में भारत द्वारा फिलीपींस को चावल के निर्यात प्रतिबंध से छूट देने पर आभार जताया। गौरतलब है कि चावल फिलीपींस के खाने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिलीपींस ने 2024 में भारत से 20 हजार+ टन चावल का निर्यात किया था।

राष्ट्रपति मार्कोस ने कहा, “हाल के वर्षों में हमारे बीच सहयोग काफी बढ़ा है। मुझे खुशी है कि अब हम इस मित्रता को एक पूर्ण रणनीतिक साझेदारी में बदल रहे हैं।”

फिलिपींस के लिए भारतीयों को नहीं लेना पड़ेगा वीजा

राष्ट्रपति मार्कोस ने लोगों के बीच बेहतर संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों पर एक भाषण दिया। उन्होंने इस दौरान ऐलान किया कि भारतीय पर्यटकों के लिए फिलीपींस में वीजा-फ्री प्रवेश की सुविधा होगी। उन्होंने और अधिक संख्या में भारतीयों को फिलीपींस घूमने का निमंत्रण दिया।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का आभार जताया कि भारत ने फिलीपींस के पर्यटकों के लिए वीजा की फीस माफ़ कर दी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “हम इस साल अक्टूबर से सीधी उड़ानों की दोबारा शुरुआत का स्वागत करते हैं और इस तरह की सीधी हवाई कनेक्टिविटी को आगे भी बनाए रखने और बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

रक्षा और समुद्री सहयोग पर फोकस

भारत और फिलीपींस के नेताओं के बीच बातचीत में रक्षा और समुद्री सहयोग पर खास जोर दिया गया। राष्ट्रपति मार्कोस ने भारत को रक्षा उद्योग में सहयोग खासकर भारत से ब्रह्मोस मिसाइल जैसे रक्षा प्लेटफॉर्म के निर्यात के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने इस क्षेत्र में और अधिक सहयोग की बात भी कही।

बातचीत में संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री गतिविधियों में सहयोग, अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आदान-प्रदान और अन्य रक्षा सहयोग के पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

भारत ने यह भी कहा कि वह कई देशों को रक्षा प्लेटफॉर्म निर्यात कर रहा है और फिलीपींस भी इन प्लेटफॉर्म्स में रुचि दिखा रहा है। दोनों देशों के बीच जहाजों के दौरे और बहुपक्षीय मंचों के तहत सहयोग पर भी चर्चा हुई।

यह सहयोग आपसी समझ, समुद्री क्षेत्र की निगरानी बढ़ाने, इंटरऑपरेबिलिटी बेहतर बनाने और आपदा प्रबंधन में तैयारियों को मजबूत करने पर केंद्रित है।

इसके अलावा, भारत ने अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं और कम लागत वाले स्पेस प्रोग्राम के बारे में भी बताया। राष्ट्रपति मार्कोस ने माना कि उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की लागत प्रभावशीलता का अध्ययन किया है और वे भारत की तकनीक का उपयोग मौसम की सटीक भविष्यवाणी, कृषि सुधार और आपदा राहत जैसे सामाजिक क्षेत्रों में करना चाहते हैं।

भारत-फिलीपींस रक्षा संबंध: ब्रह्मोस समझौता

भारत और फिलीपींस ने रक्षा क्षेत्र में एक अहम कदम उठाया है। अप्रैल 2024 में भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें डिलीवर की थी। यह मिसाइलें 2022 में हुए 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹3100 करोड़) के समझौते के तहत दी गई हैं।

इन मिसाइलों को भारतीय वायुसेना के C-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए भेजा गया था। यह भारत की ओर से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश फिलीपींस को किया गया पहला बड़ा रक्षा निर्यात है।

इधर जमीनों को ‘मुक्त’ करा रही असम की BJP सरकार, उधर सत्ता में आने पर ‘अवैध’ कब्जों वाली जमीनों को फिर से बाँटने का वादा कर रहे गौरव गोगोई

असम में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली BJP सरकार लगातार अवैध कब्जों के खिलाफ अभियान चला रही है। इससे बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए प्रभावित हुए हैं। इससे चिढ़ी कॉन्ग्रेस ने सत्ता में लौटने पर उन जमीनों को बाँटने का वादा किया है जो कथित तौर पर गलत तरीके से मौजूदा सरकार से जुड़े लोगों ने हड़पी है।

असम प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने 3 अगस्त को मुख्यमंत्री सरमा पर एक हमला करते हुए घोषणा की, “अगर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में विपक्षी पार्टी राज्य में सत्ता पर काबिज होती है तो मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल द्वारा ‘अवैध रूप से’ कब्जा की गई भूमि को वंचित लोगों को आवंटित किया जाएगा।”

जोरहाट से लोकसभा सांसद गोगोई ने कहा, “मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों द्वारा भूमि सुधार के नाम पर अवैध रूप से अर्जित की गई जमीनों को नई कॉन्ग्रेस सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही गरीबों में बाँटने का फैसला लिया जाएगा।” उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी जनता की मदद के लिए भूमि और आर्थिक नीति दोनों में बदलाव लाएगी।

जेल जाने को लेकर सीएम हिमंत ने दिया मुँहतोड़ जवाब

कॉन्ग्रेस नेता ने आगे कहा, “हिमंत बिस्वा सरमा के शासनकाल में हुई लूट और अन्याय पर रोक लगाई जाएगी। कांग्रेस प्रगतिशील भूमि नीतियों और आर्थिक विकास पर आधारित एक नई सरकार बनाएगी।” उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के इस वादे को पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है कि असम के लोग मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को जेल में देखेंगे।

इसका जवाब देते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, ” क्या गारंटी है कि मुझसे पहले राहुल गाँधी जेल नहीं जाएँगे।” उन्होंने कहा कि एक राष्ट्रीय नेता का इस तरह का बयान देना काफी अपमानजनक है और तब जब नेता अपनी माँ सोनिया गाँधी के साथ नेशनल हेराल्ड केस में पहले ही जमानत पर है।

असम के भूमि सुधार अभियान का सच

कॉन्ग्रेस असम में अतिक्रमण हटाने के अभियान का शुरू से विरोध कर रही है और इसे कोर्ट के आदेशों की अवमानना बता रही है। जबकि तथ्य ये है कि गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम जैसे 4 पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं पर मौजूद वन क्षेत्रों में अतिक्रमण से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करने का आदेश दिया है।

एनजीटी को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें बताया गया है कि मार्च 2024 तक राज्य में कुल अतिक्रमणग्रस्त वन क्षेत्र 3,620.9 वर्ग किलोमीटर (3,62,090 हेक्टेयर) था, जो देश में मध्य प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

अतिक्रमण के खिलाफ दायर याचिका में ये भी बताया गया था कि इसका वन्यजीवों और वन संरक्षण पर काफी बुरा असर पड़ा है। इस पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार को वन संरक्षित क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इससे पहले भी गुवाहाटी हाईकोर्ट वन क्षेत्रों को अतिक्रमण से मुक्त कराने का आदेश कई बार दे चुका है।

अतिक्रमण ने जानवरों को बेदखल किया

गौरतलब है कि राज्य में दशकों से चल रहे वन क्षेत्र में अतिक्रमण का असर जीव-जन्तुओं पर पड़ा है। ये लोग अक्सर गाँवों की ओर भागने के लिए विवश होते हैं। खास कर हाथियों के गाँव के खेतों में घुसने और लोगों पर हमला करने की कई घटनाएँ सामने आई है।

असम के विशेष रूप से ग्वालपाड़ा जैसे जिलों में आम लोगों और हाथियों के बीच संघर्ष की खबरें आती रहती हैं। अतिक्रमण से जैव विविधता पर भी असर पड़ा है। लेकिन कॉन्ग्रेस राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है। यहाँ तक कि पिछले साल सोनापुर के कोसुटोली इलाके में अवैध रूप से घुसे बांग्लादेशी घुसपैठियों को उकसाने के आरोप भी कॉन्ग्रेस पर सीएम सरमा ने लगाया था।

उन्होंने कहा, “कांग्रेस और अन्य कट्टरपंथी ताकतों ने अतिक्रमणकारियों को उकसाया। उन्होंने पुलिस पर हमला किया। बांग्लादेश में जो नारा लगाया जा रहा था, वही नारा अब यहाँ भी लगाया जा रहा है। असम पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाका फिर से शांत हो गया है और बेदखली का काम जारी है।”

ग्वालपाड़ा में सरकार की कार्रवाई के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 21 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इसके बाद सरमा ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चायगाँव में पार्टी कार्यकर्ताओं को ‘अतिक्रमणकारियों’ और ‘भूमि जिहादियों’ को सरकारी जमीन पर कब्जा करने के लिए उकसाया।

सरमा ने गोगोई पर लगाए आरोप

सीएम सरमा ने कॉन्ग्रेस नेता गौरव गोगोई पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी से संबंध होने के आरोप लगाते रहे हैं। गोगोई की ब्रिटिश पत्नी एलिजाबेथ कूलबर्न जब दिल्ली के क्लाइमेट एंड डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क में प्रोजेक्ट मैनेजर थी, उस वक्त उनके एक पाकिस्तानी से संबंध थे। पाकिस्तानी मूल के अली तौकीर शेख और एलिजाबेथ एक ही ऑफिस में काम करते थे। शेख एशिया क्षेत्रीय निदेशक थे। उनपर भारत के खिलाफ सोशल मीडिया में गलत जानकारी देने का रिकॉर्ड रहा है। उन्होंने दिल्ली दंगों को लेकर संसद में दिए गोगोई के बयान का समर्थन किया था।

फरवरी में सीएम सरमा ने आरोप लगाया था, “आईएसआई से संबंध, युवाओं का ब्रेनवॉश और पिछले 12 सालों से भारतीय नागरिकता लेने से इनकार करने के आरोपों से जुड़े गंभीर सवालों के जवाब दिए जाने की जरूरत है। इसके अलावा, धर्मांतरण गिरोह में शामिल होना और राष्ट्रीय सुरक्षा को अस्थिर करने के लिए जॉर्ज सोरोस समेत बाहरी लोगों से धन लेना गंभीर चिंता का विषय है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।”

गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में यही बात कही थी। उन्होंने गोगोई की ओर मुखातिब होते हुए कहा था, “आप कई बार पाकिस्तान गए हैं, लेकिन क्या कभी बॉर्डर वाले इलाकों में गए हैं। क्या आप समझते हैं कि हमारे सैनिक किस परिस्थितियों में काम करते हैं।”

असम सरकार ने कई अवैध मदरसों पर भी कार्रवाई की। इन मदरसों को शिक्षा देने के नाम पर कट्टरपंथी धार्मिक प्रशिक्षण दिया जा रहा था। यहाँ तक कि ये भी पता चला कि कई मदरसे के कनेक्शन पाकिस्तान के आतंकवादियों से हैं। इन मदरसों को ध्वस्त करने का कॉन्ग्रेस ने विरोध किया था।

गौर करने की बात ये भी है कि गोगोई जब असम कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, तो बराक घाटी जाकर कट्टरपंथी मौलाना अहमद सईद गोविंदपुरी से मुलाकात की थी। ये कार्यक्रम गुप्त था और इसे बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बहाने रात में अंजाम दिया गया।

अतिक्रमण के खिलाफ एक्शन जारी

विपक्ष और कट्टरपंथियों के तमाम विरोध के बावजूद असम में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई जारी है। प्रशासन ने पिछले 5 दिनों में गोलाघाट जिले के रेंगा रिजर्व वन से करीब 8900 बीघा भूमि खाली कराई और 4000 से अधिक अवैध ढाँचों को ध्वस्त किया।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, “पिछले 5 दिनों के दौरान वन भूमि अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की गई और उसपर अवैध कब्जा हटाया गया। ये अभियान बिद्यापुर, पीठाघाट,सोनारीबील, दोयालपुर, डोलोनीपाथर, खेरबारी, आनंदपुर और मधुपुर जैसे सघन आबादी वाले क्षेत्रों में चलाया गया। “

गोलाघाट जिले के दोयांग रिजर्व फॉरेस्ट के मेरापानी में 205 घरों को भी 8 अगस्त को खाली करने का नोटिस दिया गया है। मुख्यमंत्री ने बताया, ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिक’ कथित तौर पर असम के 29 लाख बीघा अर्थात 10 लाख एकड़ जमीन पर कब्जा किए हुए हैं। उन्होंने 21 जुलाई को दारंग ज़िले के गरुखुटी में बहुउद्देशीय कृषि परियोजना की चौथी वर्षगांठ के अवसर पर ये चौंकाने वाले खुलासे किए। 2021 में परियोजना की शुरुआत के बाद से 77,420 बीघा (25,500 एकड़) ज़मीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया जा चुका है।

उन्होंने बताया, “दारंग जिले में बेदखल अभियान के सफल होने के बाद इसे बोरसोला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बटाद्रवा, चापर और पैकान तक बढ़ाया गया है। पिछले चार वर्षों सरकार ने 1.29 लाख बीघा (करीब 43,000 एकड़) जमीन से अवैध कब्जा हटाया गया है। इसका एक बड़ा हिस्सा अब वन विकास और राज्य के नागरिकों के लिए आवंटित किया जा रहा है।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “असम सरकार ने अतिक्रमणकारियों से 182 वर्ग किलोमीटर जमीन वापस ले ली है। अब यही घुसपैठिए एक अलग ‘मिया लैंड’ राज्य की माँग कर रहे हैं। उनका सपना जरूर पूरा होगा। लेकिन भारत में नहीं, बल्कि बांग्लादेश या अफगानिस्तान में। मैं उन्हें वहाँ पहुँचने में जरूर मदद करूँगा।”

यहाँ तक कि हिंदू स्थलों पर भी कब्जा कर लिया गया है। राज्य के वैष्णव मठों के 15,288.52 बीघा क्षेत्र पर अभी भी अवैध अतिक्रमण है। हालाँकि वर्तमान सरकार इस भूमि को मुक्त कराने के लिए एक अभियान चला रही है।

मुख्यमंत्री के अनुसार , “सभी प्रशासनिक अधिकारियों को वन क्षेत्रों से अवैध कब्जा हटाने के निर्देश दिए गए हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि मूल निवासी माने जाने वाले जनजातीय समुदायों के लिए वन अधिकार अधिनियम के तहत सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।” सीएम के मुताबिक इस अभियान को पूरा होने में कम से कम 10 साल लगेंगे

10 साल में हट जाएगा अतिक्रमण- सीएम

कॉन्ग्रेस पार्टी सरमा और उनके मंत्रियों पर हमला करने में व्यस्त है, जबकि असम सरकार राज्य और उसके निवासियों के लाभ के लिए अवैध अतिक्रमण हटाने में लगी हुई है। कॉन्ग्रेस का नजरिया ऐसा है जिसमें वह भारतीय और बांग्लादेशी मुस्लिमों के बीच भी अंतर करना भूल गई है। साथ ही हाईकोर्ट के आदेश को नजरअंदाज कर चुनावी फायदे के लिए भूमि सुधार अभियान का विरोध कर रही है।

( मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे देखने के लिए यहाँ क्लिक करें)