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OpIndia एक्सक्लूसिव: ‘न्याय’ के लिए दिल्ली पुलिस की चौखट पर पहुँची रोहिणी, कहा- जो (चंद्रशेखर) दलित हितैषी बन रहा, उसने ही दलित बेटी का किया शोषण

उसकी नजर में बहन-बेटियों की इज्जत की कोई कीमत नहीं है। मुझसे झूठ बोल कर उसने संबंध बनाए। मैं उसका बैकअप प्लान थी।

यह बात डॉ रोहिणी घावरी ने ऑपइंडिया से विशेष बातचीत में कही हैं। वह स्विटरलैंड लौटने के बाद नगीना से लोकसभा के सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के खिलाफ शिकायत करने दिल्ली पुलिस के पास पहुँची।

दिल्ली पुलिस ने उनका बयान दर्ज कर लिया है। उल्लेखनीय है कि रोहिणी घावरी वही महिला हैं, जिन्होंने चंद्रशेखर पर कई लड़कियों का जीवन बर्बाद करने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें धमकियाँ भी मिली हैं।

चंद्रशेखर ने मेरा इस्तेमाल किया- डॉ. रोहिणी घावरी

डॉ. रोहिणी घावरी ने कहा, “चंद्रशेखर ने अपने स्वार्थ के लिए मेरा इस्तेमाल किया। मैं उसके लिए बैकअप प्लान थी। अगर भारत की राजनीति में नहीं चमक पाया तो मुझसे शादी कर स्विट्जरलैंड में सेटल हो सकता है। लेकिन वह पहले से शादीशुदा है, इस बात की मुझे जानकारी नहीं थी। अगर पता होता तो कभी इस रिश्ते में नहीं आती। मैं अब इस पूरे ‘जाल’ को समझ चुकी हूँ।”

घावरी कहती हैं, “दलितों का मसीहा बनता है। मैंने जिंदगी में ऐसा कोई मसीहा नहीं देखा जो महिलाओं का सम्मान ही नहीं कर पाया। जिस पर महिला उत्पीड़न के केस है, वह महिला सम्मान कैसे कर सकता है? नेता वो होता है जो समाज को सही दिशा दिखाए, जो नेता खुद महिला उत्पीड़न करता है, वह क्या दिशा दिखाएगा”

वह आगे कहती हैं, “उसने कभी त्याग और संघर्ष तक नहीं किया। अगर जेल नहीं जाता तो समाज को संघर्ष की कोई कहानी भी नहीं सुना पाता। उसने समाज को न्याय नहीं दिलाया बल्कि युवाओं का भविष्य बर्बाद करने का काम किया है।”

उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रशेखर आजाद नेता बनने के लायक नहीं है। भारत में दलित समाज की आबादी कही अधिक है। ऐसे समाज को दिशा दिखाने के लिए एक ईमानदार नेता की जरूरत है, जो खून बहाने को भी तैयार हो जाए। घावरी कहतीं हैं, “मैं दलित समाज के मासूम लोगों को समझाऊँगी कि आप चंद्रशेखर जैसे नेता पर भरोसा ना करें, क्योंकि ऐसे नेता आपको बचाने नहीं आएँगे।”

बेटी को न्याय दिलाने के लिए डॉ. घावरी के साथ आए उनके माता-पिता ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “चंद्रशेखर आजाद ने मेरी बेटी का मानसिक और शारीरिक शोषण किया है। आज मैं अपनी बेटी को न्याय दिलाने मध्य प्रदेश से आई हूँ। मेरी बेटी को न्याय जरूर मिलना चाहिए।”

वहीं, पीड़िता के पिता, जो खुद दलितों के हक की लड़ाई लड़ते हैं और सक्रिय समाजसेवी हैं। उन्होंने कहा, “बेटी ने हमें 8 महीने तक उस पर पीड़ा के बारे में नहीं बताया। हमें भी एक्स के जरिए मामले की जानकारी लगी। वह बताया करती थी कि चंद्रशेखर के साथ मिल कर भीम आर्मी के लोगों की मदद कर रही हूँ।”

पिता ने यह भी कहा, “चंद्रशेखर ने बेटी से शादी करने का झूठा वादा कर मानसिक शोषण किया। जो दलित का हितैषी बन रहा था, उसने ही दलित बेटी का शोषण कर दिया।”

उधर, डॉ. रोहिणी घावरी के साथ शारीरिक शोषण मामले में उनकी वकील ने कहा कि यह मामला हाइप्रोफाइल जरूर है, लेकिन चंद्रशेखर को सांसद न देखते हुए एक आम इंसान के खिलाफ अपराध के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, “केस को राजनीतिक एंगल नहीं दिया गया। पूरा विश्वास है कि दिल्ली पुलिस उचित कार्रवाई करेगी। कानूनी प्रक्रिया के तहत ही न्याय दिलाएँगे।”

जानें डॉ. रोहिणी घावरी का पूरा मामला

यह मामला भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ शारीरिक शोषण का है। स्विट्जरलैंड में रहने वाली दलित समाज की Ph.D स्कॉलर डॉ. रोहिणी घावरी ने महिला आयोग से चंद्रशेखर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता इंदौर के बीमा अस्पताल में काम करने वाले सफाईकर्मी की बेटी है।

पीड़िता ने शिकायत में बताया था कि साल 2019 में वह एक करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप लेकर हायर एजुकेशन की पढ़ाई करने स्विट्जरलैंड गई थी। तभी चंद्रशेखर से डॉ. रोहिणी की मुलाकात हुई थी। साल 2021 में दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई और चंद्रशेखर ने डॉ. रोहिणी को शादी करने का भरोसा दिलाकर शारीरिक संबंध बनाए।

डॉ. रोहिणी ने बताया कि भारत आने पर चंद्रशेखर ने कई बार उन्हें होटल और द्वारिका स्थित निवास पर बुला कर शारीरिक संबंध बनाए। चंद्रशेखर के साथ वह राजनीतिक अभियानों में भी हिस्सा लेती थीं। चंद्रशेखर ने खुद को अविवाहित बताकर पीड़िता को शादी का वादा भी किया। लेकिन बाद में सामने आया कि वह पहले से शादीशुदा है और एक बच्चे का पिता भी है।

इस संबंध में डॉ. रोहिणी ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स/ट्वविटर पर एक पोस्ट भी जारी किया था। पोस्ट में लिखा, “उसके लिए बहन-बेटियों की इज्जत की कोई कीमत नहीं… भरोसे में आकर बहुत बड़ी गलती कर दी। अब किसी भी पुरुष पर भरोसा नहीं कर पाऊँगी।” उन्होंने खुद को विक्टिम नंबर-3 बताया था। अब चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए डॉ. रोहिणी स्विट्जरलैंड से भारत आई हैं।

बार-बार फर्जी रेप केस दर्ज कराने वालों का बने डेटाबेस, ऐसे मामलों की हो जाँच: दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए सख्ती बरतने के निर्देश, कहा – लोग कानून का गलत फायदा उठा रहे

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस और राज्य सरकार से कहा कि जो लोग बार-बार रेप की झूठी शिकायत करते हैं, उनकी जाँच की जाए। हालाँकि, कोर्ट ने खुद इस मामले में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये काम पुलिस और सरकार का है और उन्हें पता है कि इसे कैसे करना है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जज तुषार राव गेडेला ने साफ-साफ कहा, “ये याचिका है या कोई सुझाव? ये उनका काम है। पुलिस को बेहतर पता है कि पुलिसिंग कैसे करनी है।”

यानी कोर्ट ने याचिका पर कोई फैसला नहीं दिया, बल्कि साफ किया कि ये काम पुलिस और सरकार का है, कोर्ट का नहीं।

याचिका में क्या था?

ये जनहित याचिका शोनी कपूर नाम की एक महिला ने दायर की थी। उनके वकील थे शशि रंजन कुमार सिंह। याचिका में माँग थी कि पुलिस हर जिले में एक डेटाबेस बनाए, जिसमें उन लोगों की जानकारी हो जो बार-बार रेप या ऐसे ही अपराधों की शिकायत करते हैं।

याचिका में ये भी कहा गया कि ऐसी शिकायतों के लिए शिकायतकर्ता से पहचान पत्र जरूर लिया जाए। साथ ही ये आरोप लगाया गया कि कई बार रेप के कानून का गलत इस्तेमाल होता है और कोर्ट को भी इस बात की चिंता रही है।

हाई कोर्ट में आगे क्या हुआ

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 3 मार्च को दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दूसरे अधिकारियों को एक शिकायत पत्र भेजा था। 17 अप्रैल को RTI से जवाब मिला कि ये मामला बड़े अधिकारियों के पास विचार के लिए है।

इस पर कोर्ट ने कहा, “चूँकि याचिकाकर्ता ने पहले ही अधिकारियों को शिकायत दे दी है, तो हम इस याचिका को खत्म करते हैं। लेकिन हम आदेश देते हैं कि अधिकारी जल्दी से इस शिकायत पर ठोस फैसला लें।”

फर्जी मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

आजकल कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ कुछ महिलाएँ पुरुषों पर झूठे रेप के इल्जाम लगा देती हैं। जब जाँच होती है, तो पता चलता है कि सारे इल्जाम बेबुनियाद हैं।

आज के समय में जब महिलाएँ अपने हक के लिए खुलकर बोल रही हैं और रेप जैसे गंभीर मामलों पर आवाज उठा रही हैं, तब कुछ लोग इन कानूनों का गलत फायदा उठाते हैं। इससे असली पीड़ितों की लड़ाई कमजोर पड़ती है।

ऐसा ही एक मामला, 64 साल के रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर कैप्टन राकेश वालिया के साथ ऐसा ही हुआ। एक 39 साल की शादीशुदा महिला, जिसके दो बच्चे हैं… ने उनके खिलाफ रेप का केस दर्ज कराया। उसने कहा कि उसकी मुलाकात वालिया से फेसबुक पर हुई थी। वालिया ने उसे मॉडलिंग के बहाने बुलाया, नशीला पदार्थ देकर सुनसान जगह ले गए और रेप किया।

केस दर्ज हुआ, लेकिन जाँच में चौंकाने वाली बात सामने आई। इस महिला ने 2014 से अब तक 9 अलग-अलग पुरुषों के खिलाफ रेप, छेड़छाड़ और धमकी जैसे लगभग एक जैसे इल्ज़ाम लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि महिला ने हर बार FIR में अपना नाम, उपनाम और दूसरी जानकारी बदल-बदलकर दी, ताकि वो नया व्यक्ति लगे।

इसके अलावा, FIR दर्ज कराने के बाद उसने जाँच में कोई मदद नहीं की और कोर्ट में भी नहीं आई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘कानून का गलत इस्तेमाल’ बताया और सवाल किया कि जब इतने फर्जी मामले पहले से दर्ज थे, तो निचली कोर्ट ने पहले क्यों नहीं कुछ किया।

कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ एक महिला की बात पर किसी बेगुनाह को सजा नहीं दी जा सकती, खासकर जब सारे सबूत उसकी बेगुनाही की तरफ इशारा कर रहे हों।

एक और फर्जी केस का उदाहरण

एक महिला ने अपनी 5 साल की बेटी के साथ रेप का झूठा इल्ज़ाम कुछ लोगों पर लगाया। ये केस पोक्सो एक्ट की धारा 5 (गंभीर यौन अपराध) के तहत दर्ज हुआ। अतिरिक्त सत्र जज सुशील बाला डागर ने जाँच में पाया कि महिला ने गुस्से और प्रॉपर्टी के झगड़े की वजह से ये झूठा केस किया था। उसका मकसद प्रॉपर्टी हड़पना था। कोर्ट ने इसे कानून और न्याय व्यवस्था का गलत इस्तेमाल बताया।

कोर्ट ने कहा कि कई लोग जमीन, शादी, राजनीति या निजी फायदे के लिए पोक्सो जैसे सख्त कानूनों का गलत इस्तेमाल करते हैं। इससे कानून का असली मकसद कमजोर होता है। इसलिए कोर्ट को ऐसे मामलों में सख्त और सावधान रहना चाहिए।

पोक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत कोर्ट ने महिला पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और एक महीने में इसे भरने को कहा। अगर जुर्माना नहीं भरा, तो उसे 3 महीने की जेल होगी। कोर्ट ने साफ कहा कि महिला ने कानून को गुमराह किया और इसका गलत इस्तेमाल किया, जो गंभीर अपराध है।

जिसे राहुल गाँधी बता रहे थे ‘एटम बम’, उसका ‘SIR’ ही उपचार… महाराष्ट्र की तरह ही कर्नाटक पर भी हुए फुस्स: चुनाव आयोग को ‘चोर’ दिखाने चले थे, खुद ‘पप्पू’ दिखे

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले दावा किया था कि उनके पास चुनाव आयोग के खिलाफ सबूतों का ‘एटम बम’ है। इसी कथित बम को चलाने के लिए राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को एक घंटा 11 मिनट लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन यह एटम बम उनके पहले कई दावों की तरह फुस ही निकला।

हार की हताशा में डूबे राहुल गाँधी लगातार देश के चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं लेकिन तथ्यों और सबूतों से अक्सर दूर ही भागते नज़र आते हैं और इस बार भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने कई पुराने आरोप दोहराए और कई मनगढ़ंत दावे भी किए। लेकिन अपने कथित सबूतों के अंत तक आते-आते राहुल गाँधी खुद ही सवालों के घेरे में आ गए हैं।

राहुल के मनगढ़ंत दावों की असलियत

बीजेपी को एंटी इनकंबेसी नहीं लगती: राहुल गाँधी

देश के चुनाव आयोग को पानी पी-पीकर कोसने वाले राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेस का पहला आरोपी एंटी इनकंबेसी को लेकर था। उन्होंने कहा कि बीजेपी को ऐंटी इनकंबेसी नहीं लगती है। यानी अगर देश के मतदाता बीजेपी को चुन रहे हैं तो इसमें गलती ना तो कॉन्ग्रेस के कर्मों की है, ना राहुल गाँधी की मेहनत में कमी है। बल्कि चुनाव आयोग ही सबसे बड़ी गड़बड़ी कर रहा है। वोट चोरी के गंभीर आरोपों के बीच इस तरह की हल्की बात करना राहुल गाँधी की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।

UPA के 10 वर्षों के दौरान गुजरात के चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने वापसी की थी, मध्य प्रदेश में भी इस दौर में लगातार बीजेपी जीतती रही। तो क्या तब भी एंटी इनकंबेसी ना होने का जिम्मेदार चुनाव आयोग था?

एग्जिट पोल्स पर राहुल गाँधी का दावा

राहुल गाँधी ने अपने दावे के दौरान कहा कि ओपिनियन पोल्स और एग्जिट पोल्स का डेटा अलग-अलग रहता था। एक पूरी विस्तृत करोड़ों वोटरों वाली चुनावी प्रक्रिया को ओपिनियन या एग्जिट पोल्स के आधार पर गलत ठहरा देना एक हास्यास्पद तर्क से ज्यादा क्या ही हो सकता है?

एग्जिट पोल्स पीछे 10 वर्षों से तो शुरू हुए नहीं है। माना जाता है कि 80 के दशक में यह प्रक्रिया शुरू हुई थी और सर्वे के आधार पर हार-जीत का अनुमान लगाया जाता रहा है। लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो 2004, 2009 में अधिकतर एग्जिट पोल्स सही साबित नहीं हुए।

साल 2014 के एग्जिट पोल्स में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने का दावा शायद एक भी बड़े एग्जिट पोल ने नहीं किया था और 2024 के एग्जिट पोल्स में जितनी सीटें एनडीए को मिलने का दावा किया गया था वो भी गलत ही साबित हुआ। तो क्या ये सभी चुनावों को गलत ठहरा दिया जाए?

अलग-अलग चरणों में चुनाव पर भी सवाल

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेस के दौरान कहा कि कागज से वोट एक दिन में पड़ते थे लेकिन ईवीएम से महीनों लग जाते हैं। चुनाव के शेड्यूल को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था, हजारों-लाखों ईवीएम को लाना ले जाना, हजारों जवानों का चुनाव की सुरक्षा के लिए पहुँचना, यकीनी तौर पर यह एक दिन में करना मौजूदा परिस्थितियों में लगभग नामुमकिन है। राहुल का दावे को लेकर भी कई सवाल हैं। देश के पहले आम चुनाव से ही बात करें तो पहले आम चुनाव दिसंबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुए थे। जाहिर है ये एक दिन में नहीं हो गए।

अलग-अलग चरणों में चुनाव से बीजेपी को फायदा होता है तो ऐसा 2004 के आम चुनावों में भी होना चाहिए था तब भी आम चुनाव 4 चरणों में हुए थे। अगर चुनाव के चरणों के आधार पर ही कोई पार्टी हारती है तो कॉन्ग्रेस को 2009 का लोकसभा चुनाव हार जाना चाहिए था क्योंकि तब भी चुनाव 5 चरणों में हुए थे।

किसी भी पार्टी का इस आधार पर चुनाव हारना या जीतना कि कितने चरणों में चुनाव हो रहे हैं ये बेतुका तर्क ही लगता है। अलग-अलग चरणों में चुनाव कराए जाने की वजह लॉजिस्टिक की जरूरतें, सेना और अर्द्धसैनिक बलों को उपलब्धता के आधार पर तय होती आई है ना कि किसी पार्टी की हार और जीत के लिए।

‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं पर सवाल

राहुल गाँधी ने कहा, “चुनाव जीतने पर ऐसा माहौल बनाया जाता है कि लाडली बहना, पुलवामा, सिंदूर के कारण चुनाव जीते।” लाडली बहना जैसी योजनाओं को राहुल गाँधी सिर्फ नैरेटिव का हिस्सा बताकर खारिज कर देना चाहते हैं लेकिन तथ्य इसके खिलाफ हैं। जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर वोट मिलना कोई नई बात नहीं है।

सबसे ताज़ा उदाहरण ही देखें तो आने वाले कुछ दिनों में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव के लिए खुद कॉन्ग्रेस ने ‘माई बहिन मान योजना’ का एलान किया है। इसमें कॉन्ग्रेस की सरकार बनने पर ज़रूरतमंद महिलाओं को 2500 रुपए महीना की सम्मान राशि दिए जाने की बात है। ऐसा ही वादा कॉन्ग्रेस ने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी किया था।

राहुल गाँधी को अब लगता है कि ऐसी बीजेपी की किसी योजना के नाम पर वोट नहीं मिलते तो क्यों उनकी पार्टी ऐसी घोषणाएँ कर रही है, जाहिर है इसमें तथ्य कुछ भी नहीं है और राहुल गाँधी सिर्फ अपनी तरफ से फर्जी नैरेटिव गढ़ रहे हैं।

अंदरूनी सर्वे पर टिके हैं राहुल के दावे

राहुल गाँधी चुनाव में फर्जीवाड़े के जो सब दावे कर रहे हैं उनमें उनका आधार पार्टी के कुछ अंदरूनी सर्वे में हैं। कॉन्ग्रेस के अंदरूनी सर्वे ने राहुल गाँधी को बताया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कर्नाटक में 16 सीटें जीतने जा रही है लेकिन जब कॉन्ग्रेस 16 सीटें ना जीत पाई तो यह चुनावी धोखाधड़ी हो गई। अब यूँ तो बीजेपी भी चुनाव से पहले 400 पार की बात कर रही थी तो क्या ऐसे में बीजेपी को भी सड़क पर उतरकर हल्ला-हंगामा शुरू कर देना चाहिए कि उनका अनुमान या सर्वे गलत साबित हो गया तो पूरा इलेक्शन ही गड़बड़ है।

महाराष्ट्र को लेकर दोहराए आरोप

महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी ने फिर वही पुराने आरोप दोहराते हुए महाराष्ट्र में 40 लाख वोटर बढ़ने पर सवाल उठाए। राहुल गाँधी ने इस बीच एक महत्वपूर्ण बात कही कि उनके पास महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद चुनाव में धाँधली से जुड़ा कोई सबूत नहीं था और बाद में उन्होंने इसकी पड़ताल की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे, राहुल गाँधी की बात मानें तो ये सब आरोप और सवाल बिना किसी सबूत के उठाए जा रहे थे।

महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच वोटरों का बढ़ना कोई नई बात नहीं है और पहले भी ऐसा कई बार देखा जा चुका है। महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी के दावों का हम पहले भी फैक्ट चेक कर चुके हैं जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

राहुल गाँधी ने कहा कि लोगों को महाराष्ट्र के चुनाव में गड़बड़ नजर आई थी। महाराष्ट्र के चुनाव में अगर लोगों को गड़बड़ी लगती तो जाहिर तौर पर प्रदर्शन किए जाते, चुनाव आयोग के दफ्तर का लोग घेराव करते लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। जैसे राहुल गाँधी पहले बिना सबूतों के आरोप लगा रहे थे, वैसे ही इस बार लोगों के कँधे पर बंदूक रखकर अपनी बात सही साबित करने पर तुले हैं।

राहुल गाँधी के सबूत में कितना दम?

अपनी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत के नाम पर राहुल गाँधी ने कर्नाटक की एक लोकसभा सीट (बेंगलौर सेंट्रल) के अंतर्गत आने वाली एक विधानसभा सीट (महादेवपुरा) का डेटा दिया। यानी जिस बम को फोड़ने की बात राहुल गाँधी कर रहे थे वो बिना बारूद वाला ही निकला। इस लोकसभा सीट पर बीजेपी ने 32,707 वोटों पर जीत दर्ज की थी। राहुल गाँधी ने दावा किया इस सीट पर 1,00,250 फर्जी वोटर थे, इनमें उन्होंने डुप्लिकेट वोटर, फेक एड्रेस और गलत फोटो जैसे चीजें बताई।

चुनाव में डेटा एंट्री में गड़बड़ियाँ होती हैं, मतदाता सूची में गलतियाँ रहती हैं और कई बार लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने पर अपना नाम नहीं कटवा पाते या जानबूझकर एक से अधिक जगहों पर वोट डालते हैं।

ये ऐसी समस्याएँ हैं जिनके बारे में लोगों को पता है। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोगों को इस बात का बखूबी अंदाजा है लेकिन ऐसे मुद्दों को राहुल गाँधी ने एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बता दिया है। जो बचकाना आरोपी ही लगता है।

राहुल गाँधी ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को लेकर जो सवाल उठाए हैं वो लंबे वक्त से चले आ रहे हैं। एक घर में कई वोटरों का होना, फोटो सही ना होना, कई जगहों पर एक ही व्यक्ति के वोट होना समस्याएँ हैं और इन्हीं के सुधार के लिए चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रिया शुरू की है। बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है और इस पर भी राहुल गाँधी समेत अन्य विपक्षी दल हंगामा कर रहे हैं।

यह विशुद्ध हंगामा इसलिए हैं कि चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कमियों पर आपत्ति माँगी हैं लेकिन कई दिनों बाद भी एक भी राजनीतिक दल की और से कोई भी आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई है। जब राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस और अन्य दलों के पास अपनी बात सही साबित करने का मौका है तो वे खामोश हैं।

उल्टा अब सवाल राहुल गाँधी पर ही हैं कि अगर वोटिंग लिस्ट में असंगतियाँ होती हैं, जिनका एक लंबा इतिहास है तब भी क्यों वे SIR जैसी प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। राहुल गाँधी और अन्य दलों को ऐसी जाँच के बाद खुलकर चुनाव आयोग का समर्थन करना चाहिए।

कर्नाटक में भी नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में कॉन्ग्रेस को वोटर लिस्ट दी गई थी लेकिन अब तक कॉन्ग्रेस ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने 7 अगस्त को राहुल गाँधी को पत्र लिखा है। आयोग ने राहुल से कहा कि अगर उनके पास वोटर लिस्ट में फर्जी नामों की जानकारी है, तो वे प्रक्रिया के तहत शपथ पत्र के साथ शिकायत दर्ज करें।

राहुल तो ठहरे राहुल, उन्होंने इसका जवाब बाहुबली फिल्म के अंदाज में देते हुए कहा, “मैं राजनेता हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता। मेरे शब्द ही शपथ हैं।” इतने गंभीर विषय पर जवाब देने के बजाय फिल्मी अंदाज में बाद करना ये बताता है कि वो अपने ही आरोपों को लेकर कितने गंभीर हैं।

अमेरिका के आगे झुकने का सवाल ही नहीं उठता, आपदा में भी अवसर खोज लेना पीएम मोदी की आदत: ‘स्वावलंबी भारत’ खुद दे रहा ‘टैरिफ ट्रंप’ को जवाब

आत्मनिर्भरता भारत, मेक इन इंडिया, आपदा में अवसर पीएम मोदी के ऐसे मंत्र हैं जिनके दम पर भारत दुनिया की पाँच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो पाया है। चाहे अमेरिका-चीन जैसे ट्रेड वॉर हो या कोरोना जैसी वैश्विक महामारी, पीएम मोदी ने हमेशा इन चुनौतियों को अवसर में बदल कर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता दिखाया है।।

जब अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ की घोषणा की, तो मोदी सरकार ने न केवल इसका मुकाबला करने की बात कही, बल्कि घरेलू उद्योगों को और मजबूत कर आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया। अब जब अमेरिका ने टैरिफ 50 फीसदी तक बढ़ा दी है। ऐसे में भारत के लिए आत्मनिर्भरता के लिए उठाए गए कदम बेहद जरूरी लग रहे हैं।

भारत ने अमेरिकी एक्सट्रा 25 फीसदी टैरिफ को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए अपनी स्थिति साफ कर दी है। भारत ने कहा है कि हमारा आयात बाजार पर आधारित है। इसमें भारत के 140 करोड़ लोगों का हित जुड़ा है। पीएम मोदी के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है। इसलिए रूस से कच्चे तेल का आयात भारत जारी रखेगा

टैरिफ बन रहा अमेरिकी हथियार

वैश्विक व्यापार युद्धों में टैरिफ एक प्रमुख हथियार बन गया है। अमेरिका भी यही कर रहा है। 2025 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने पर ‘दंड’ देते हुए 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया। यह भारत- अमेरिकी रिश्तों को एक बड़ा झटका भी है। भारत पर अब 50 फीसदी टैरिफ लग चुका है, लेकिन मोदी सरकार ने इसे चुनौती के रूप में लिया है। सरकार ने साफ किया है कि वह किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। पीएम मोदी ने कहा, ” भारत किसानों, मछुआरों और डेयरी किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, मुझे इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूँ। “

इससे पहले 2018 से ही पीएम मोदी ने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए आयात पर निर्भरता कम करने के लिए आयात शुल्क बढ़ाए थे। इससे घरेलू उद्योगों को आगे बढ़ने का मौका मिला और रोजगार के अवसर भी बढ़े। मोदी सरकार की ट्रेड पॉलिसी हमेशा संतुलित रही है। अमेरिका के साथ व्यापार डील में भारत ने बोरबॉन व्हिस्की और मोटरसाइकिल जैसे उत्पादों पर टैरिफ घटाए जिससे द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा।

पीएम मोदी की कूटनीति का कमाल है कि ट्रंप जैसे ‘ट्रू फ्रेंड’ के साथ भी रिश्ते मजबूत रखते हुए भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को संरक्षित किया। टैरिफ वॉर में पीएम मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जो वैश्विक दबावों का सामना कर घरेलू हितों की रक्षा कर सकते हैं।

दुनिया के अन्य देशों से बढ़ेगा व्यापार

अमेरिकी टैरिफ जो अब तक 2.6 फीसदी था, वो 27 अगस्त 2025 से 50 फीसदी होने वाला है। इसका असर ये होगा कि अमेरिका में भारत का सामान जो पहले 102.6 रुपए में वो अब 150 रुपए में मिलेगा। इसके मुकाबले वियतनाम, चीन के सामान सस्ते मिलेंगे। इसका असर भारत के सामानों की खपत पर पड़ेगा। भारत इससे मुकाबले के लिए तैयार है। भारत की ब्रिटेन के साथ खुला व्यापार समझौता हो चुका है। यूरोपीय यूनियन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 2024 में भारत के कुल व्यापार का 11.5 फीसदी हिस्सा यूरोपीय यूनियन के साथ हुआ। इसमें और बढ़ोतरी होने की संभावना है। यानी भारत दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ा कर अमेरिकी ‘टैरिफ बम’ को फुस्स कर सकता है।

आत्मनिर्भर भारत से निकलेगा समाधान

2020 में शुरू की गई आत्मनिर्भर भारत अभियान देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिस पर चल कर भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर बढ़ रहा है। इस अभियान के तहत 20 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज घोषित किया गया, जिसमें एमएसएमई सेक्टर के लिए 3 लाख करोड़ रुपए की कोलैटरल-फ्री लोन स्कीम शामिल थी। एमएसएमई में विदेशी निवेश को बढ़ावा देकर सरकार ने लघु, मध्यम और सुक्ष्म उद्योंगो को बढ़ावा दिया है। भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के तहत लगातार निवेश हो रहा है। केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक इसे 2023 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है।

आत्मनिर्भर भारत के लिए ये पांच हैं जरूरी

आत्मनिर्भर भारत के लिए ये पाँच अहम बिंदू हैं जिनका मजबूत होना जरूरी है। ये हैं- अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर, सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड। कृषि में सप्लाई चेन रिफॉर्म्स से किसानों को लाभ हुआ। फसल बीमा का फायदा किसानों को मिल रहा है। वहीं प्रवासी मजदूरों के लिए ‘वन नेशन वन राशन स्कीम’ फायदेमंद साबित हो रही है।

मिनरल सेक्टर में टैक्स सिस्टम में सुधार से निवेश बढ़ा है। वहीं ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ब्रह्मोस, तेजस जैसे फाइटर एयरक्राफ्ट का कई देशों से ऑर्डर मिला है। ये हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। डिजिटल इंडिया का फायदा भी हमें मिल रहा है। यूपीआई की डिमांड भी विदेशों में हो रही है।

आपदा में अवसर तलाशता रहा है भारत

पीएम मोदी की सबसे बड़ी खासियत है आपदाओं को अवसर में बदलना। कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया की अर्थव्यवस्था हिलोरे मार रही थी। उस वक्त भारत की ग्रोथ रेट दुनिया में सबसे ज्यादा थी। 2020 में जब दुनिया लॉकडाउन में थी, तो पीए मोदी ने घोषणा की कि इस संकट को आत्मनिर्भर भारत बनाने का अवसर बनाएँ। इस दौरान सरकार ने 22.6 बिलियन डॉलर का स्टिमुलस पैकेज लॉन्च किया, जो जीडीपी का 10% था और मेक इन इंडिया को बूस्ट दिया।

इस दौरान भारत ने वैक्सीन का उत्पादन शुरू किया। कोवैक्सीन और कोविशील्ड के जरिए न केवल खुद को बचाया बल्कि कई देशों की मदद की। इस दौरान कृषि क्षेत्र, टैक्स और श्रम कानूनों में भी बदलाव किए गए। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने कोविड से लड़ाई में भारत की भूमिका की तारीफ की।

दुनिया को हर आपदा में दी सहायता

चाहे सुनामी हो या साइक्लोन, भारत ने हमेशा राहत कार्यों को तेज किया है और पुनर्निर्माण में मदद की। यहाँ तक कि पड़ोसी मालदीव के कड़वे फैसलों का घूँट पीकर भी भारत मुश्किल घड़ी में उसकी मदद करने सामने आया है। पीएम मोदी ने मालदीव दौरा कर उसे करोड़ों रुपए की आर्थिक सहायता दी। एक समय ऐसा था जब भारत पेट भरने के लिए विदेशों पर निर्भर था। अनाज से लेकर दूध तक विदेशों से आते थे। लेकिन अब भारत इन मामलों में पूरी तरह आत्मनिर्भर है।

देश भर में 8.72 लाख वक्फ प्रॉपर्टी, लेकिन सरकार को नए पोर्टल पर मिले सिर्फ 69 के डाटा: आखिर क्यों WAMSI पर दर्ज जानकारी UMEED पर नहीं दे पा रहे मुस्लिम समाज के लोग?

केंद्र सरकार द्वारा वक्फ संपत्तियों के मैनेजमेंट के लिए 2 महीने पहले शुरू किए गए UMEED पोर्टल पर अब तक केवल 69 वक्फ निर्माताओं (संपत्ति वक्फ करने वाले) ने अपनी संपत्तियों का डेटा अपलोड किया है।

इस पोर्टल पर सारी वक्फ संपत्तियों का ब्यौरा इसके शुरू होने के 6 महीने के भीतर अपलोड किया जाना है। एक और जहाँ पुराने WAMSI पोर्टल पर 8.72 लाख संपत्तियाँ दर्ज हैं तो नए पोर्टल पर वक्फ से जुड़ी संपत्तियों के अपलोड करने में हो रही देरी पर अब सवाल उठने लगे हैं।

केवल 663 ने शुरू की डेटा अपलोड करने की प्रक्रिया

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया है कि अब तक सिर्फ 663 वक्फ निर्माताओं ने डेटा अपलोड करने की प्रक्रिया शुरू की है जिसमें सबसे ज्यादा 163 ओडिशा से हैं ।

रिजिजू द्वारा पेश किए गए आँकड़ों के मुताबिक, अब तक 4 संपत्तियों को खारिज किया जा चुका है जिनमें आंध्र प्रदेश की 3 और ओडिशा की एक संपत्ति शामिल है। वहीं, अब तक एक भी अनुमोदनकर्ता के अनुमोदन को स्वीकृत नहीं किया गया है।

कैसे काम करता है UMEED पोर्टल?

किरेन रिजिजू ने 6 जून को दिल्ली से UMEED पोर्टल की शुरुआत की थी। सरकार के मुताबिक, यह पोर्टल वक्फ संपत्तियों की वास्तविक समय पर अपलोडिंग, सत्यापन और निगरानी के लिए एक सेंट्रल डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। सरकार को उम्मीद थी कि इससे देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी।

जानकारी के मुताबिक, इस पोर्टल में 3-स्तरों वाली सत्यापन प्रणाली ‘निर्माता-जांचकर्ता-स्वीकृतकर्ता’ है। इसके तहत एक मुतवल्ली संपत्ति के विवरण को ‘निर्माता’ के रूप में दर्ज करता है जिसके बाद वक्फ बोर्ड के अधिकारियों द्वारा इसका सत्यापन और निर्धारित सरकारी प्राधिकरण द्वारा रिकॉर्ड की जांच के बाद स्वीकृति दी जाती है।

रिजिजू ने लोकसभा में बताया कि देश के विभिन्न वक्फ बोर्ड्स द्वारा इस पोर्टल से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए एक हेल्पलाइन भी बनाई गई है। उन्होंने बताया कि 28 जुलाई 2025 तक देश भर से करीब 140 शिकायतें या सुझाव उन्हें मिले और इसके समाधानों को पोर्टल पर ही अपलोड कर दिया गया है।

पुराने पोर्टल पर हैं 8.72 लाख संपत्तियाँ?

अभी तक वक्फ की सभी संपत्तियों का ब्यौरा ‘वक्फ असेट्स मैनेजमैंट सिस्टम ऑफ इंडिया‘ (WAMSI) के पोर्टल पर होता है। WAMSI पर मौजूद डेटा के मुताबिक, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 32 वक्फ बोर्ड के पास 8,72,985 अचल संपत्तियाँ हैं। इन संपत्तियों में 1.5 लाख से अधिक कब्रिस्तान, 1.4 लाख कृषि भूमि से जुड़ी संपत्तियाँ और 1.19 लाख मस्जिदें शामिल हैं।

वहीं, अगर राज्यों की बात करें तो पोर्टल के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में सर्वाधिक 2.17 लाख संपत्तियाँ रजिस्टर्ड हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड और पंजाब वक्फ बोर्ड में क्रमश: 80,922 और 75,965 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं।

संपत्तियाँ दर्ज कराने से क्यों बच रहे हैं वक्फ बोर्ड?

वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और कई जगहों को वक्फ के काम पर जबरन कब्जाने को लेकर लगातार शिकायती सामने आ रही थीं। राज्यों को वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी सामने आए जिसके बाद वक्फ के प्रबंधन को और बेहतर करने के लिए मोदी सरकार ने काम करने शुरू किया। इसके लिए सरकार द्वारा नया वक्फ संशोधन कानून भी बनाया गया है।

UMEED पोर्टल भी इसी कड़ी की एक हिस्सा था जिससे वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन बेहतर हो उनसे जुड़े सही रिकॉर्ड्स भी सरकार तक पहुँच सकें। WAMSI जैसे पोर्टल जहाँ संपत्तियों को दर्ज करने के लिए ज्यादा कानूनी पेचीदगों की जरूरत नहीं हैं, वहाँ लाखों की संख्या में सपत्तियाँ दर्ज हैं तो नए पोर्टल पर संपत्तियाँ दर्ज करने से बोर्ड बचते नजर आ रहे हैं। इसे लेकर ही कई सवाल उठने लगे हैं।

वक्फ कानून को लेकर लगातार हंगामा हुआ था और देशभर में इसके खिलाफ प्रदर्शन किए गए थे, ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कहीं वक्फ बोर्ड से जुड़े लोगों को इस कानून के वापस होने का भरोसा तो नहीं है जिससे ये वक्फ संपत्तियों के विवरण देने से बच सकें।

दूसरी और कई जगहों पर संपत्तियों को अवैध तरह से कब्जा करने के बाद उन्हें जबरन वक्फ घोषित करने जैसे आरोप भी लगाए गए थे तो क्या ऐसा भी संभव है कि बहुत बड़ी संख्या में संपत्तियों से जुड़े कागजात ही बोर्ड्स के पास ना हों और वे अब इनका ब्यौरा देने से बच रहे हों।

रक्षाबंधन पर सीएम योगी का तोहफा, 1.23 करोड़ बहनों को मुफ्त बस यात्रा: ₹101 करोड़ खर्च कर बाखूबी निभा रहे भाई का फर्ज

रक्षाबंधन पर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बहनों को मुफ्त बस यात्रा का जो तोहफा दिया है, उसका लाख 1.23 करोड़ महिलाएँ उठा चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में रक्षाबंधन के समय 3 दिनों तक महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की योजना साल 2017 में शुरू हुई थी। बीते साल 2024 तक 1.23 करोड़ महिलाएँ इस योजना का फायदा उठा चुकी थी। इस दौरान सरकार ने ₹101.42 करोड़ रुपये खर्च किए।

बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2017 में यह योजना शुरू की थी, जिसमें रक्षाबंधन के अवसर पर रोडवेज की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है। इसका उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित, सुविधाजनक और सम्मानजनक यात्रा उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपने भाइयों के पास राखी बांधने बिना किसी आर्थिक चिंता के जा सकें।

इस योजना की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब 11,16,332 महिलाओं ने इसका लाभ उठाया और सरकार ने ₹6.08 करोड़ की टिकट लागत वहन की। अगले वर्ष 2018 में यह संख्या बढ़कर 11,69,226 हो गई और ₹7.41 करोड़ खर्च किए गए।

2019 में 12,04,085 महिलाओं को ₹7.68 करोड़ की टिकट राशि दी गई। हालाँकि 2020 में कोविड-19 के कारण लाभार्थी संख्या घटकर 7,36,605 रह गई और टिकट पर ₹4.82 करोड़ खर्च हुए। 2021 में यह संख्या फिर बढ़कर 9,63,466 हो गई और सरकार ने ₹8.91 करोड़ खर्च किए।

इसके बाद योजना ने रफ्तार पकड़ी और 2022 में 22,32,322 महिलाओं को ₹18.98 करोड़ का लाभ मिला। 2023 में यह योजना सबसे अधिक प्रभावी रही, जब 29,29,755 महिलाओं ने मुफ्त यात्रा की और टिकट पर ₹27.66 करोड़ खर्च हुए।

वहीं 2024 में अब तक 19,78,403 महिलाएँ इसका लाभ ले चुकी हैं और सरकार ने ₹19.87 करोड़ की टिकट लागत वहन की है। यह आँकड़े दर्शाते हैं कि योजना का प्रभाव हर वर्ष बढ़ता गया और महिलाओं में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

इस योजना से खासतौर पर ग्रामीण इलाकों, पिछड़े वर्गों और निम्न आय वर्ग की महिलाएँ लाभान्वित हुई हैं। उनके लिए यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि ‘सम्मान का तोहफा’ है।

यह योजना दिखाती है कि सरकार केवल घोषणाएँ नहीं कर रही, बल्कि जमीन पर ठोस काम कर रही है। महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सुविधा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता इस योजना से साफ नजर आती है।

पुनौरा धाम ही नहीं, उस फुलहर को भी सँवार रही नीतीश सरकार जहाँ पहली बार मिले राम-जानकी के नयन: सीतामढ़ी को मोदी सरकार ने दी ‘अमृत भारत’

बिहार के सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को माँ जानकी के भव्य मंदिर की आधारशिला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह रखेंगे। इससे पहले मोदी सरकार ने सीतामढ़ी को ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ का उपहार दिया है।

सीतामढ़ी से दिल्ली के बीच चलने वाली इस ट्रेन को अमित शाह 8 अगस्त को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। पुनौरा धाम के साथ बिहार की नीतीश सरकार भगवान राम और माँ सीता से जुड़े फुलहर जैसे अन्य स्थलों को भी नव जीवन प्रदान कर रही है। साथ ही अयोध्या से पुनौरा धाम को सीधे जोड़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का भी निर्माण हो रहा है।

जानकारी के अनुसार, जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने सीतामढ़ी और दिल्ली के बीच नई अमृत भारत ट्रेन को मंजूरी मिलने की जानकारी साझा की है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने कहा, “माँ जानकी की पावन प्राकट्य स्थली पुनौराधाम (सीतामढ़ी) में 8 अगस्त को होने वाले भव्य माँ जानकी मंदिर के निर्माण के भूमि पूजन एवं कार्यारंभ कार्यक्रम के दौरान गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाएँगे।”

सीतामढ़ी और दिल्ली के बीच नई अमृत भारत ट्रेन की सेवा शुरू करने के लिए संजय झा के नेतृत्व में NDA के कुछ सांसद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से 5 अगस्त 2025 को मिले थे। अब पुनौरा धाम में रेलवे स्टेशन बनाने की भी माँग हो रही है। इसके लिए बिहार के मुख्य सचिव अमृत लाल मीणा ने रेलवे बोर्ड को पत्र लिखा है। उनका कहना है कि माँ सीता के मंदिर तक पहुँचने के लिए नेशनल हाईवे का निर्माण हो रहा है। लेकिन जब रेलवे लाइन भी मंदिर के पास से गुजरती है तो पुनौरा धाम में रेलवे स्टेशन का भी निर्माण किया जाना चाहिए।

माँ जानकी के प्राकट्य स्थल के पुनरुद्धार के साथ-साथ केंद्र सरकार भगवान राम और माँ सीता से संबंधित अन्य स्थानों का भी विकास कर रही है। 26 जुलाई 2025 को सीएम नितीश कुमार ने एक्स पर एक पोस्ट साझा किया था। इसमें उन्होंने बताया था, “मधुबनी जिले में अवस्थित फुलहर स्थान, हरलाखी की पावन धरती माता जानकी और प्रभु श्रीराम के प्रथम मिलन की साक्षी रही है। यह स्थान उनके प्रथम मिलन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।”

सीएम नितीश ने आगे लिखा, “मधुबनी जिले के हरलाखी में यात्रियों की सुविधा के लिए 31.13 करोड़ रुपए की लागत से पर्यटकीय सुविधाओं के विकास कार्य के शिलान्यास की घोषणा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।” बता दें कि यह स्थान श्री राम और सीता के प्रथम मिलन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

इसके अलावा रामनवमी के अवसर पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने बिहार को राम जानकी पथ के रूप में एक बड़ी सौगात दी थी। माता जानकी की जन्मस्थली सीतामढ़ी को भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या से जोड़ने वाले राम-जानकी पथ को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण भी माना जा रहा है।

बता दें कि राम-जानकी मार्ग उत्तर प्रदेश-बिहार बॉर्डर के समीप मेहरौना घाट से शुरू होगा और सीवान, सारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर होते हुए सीतामढ़ी के भिट्ठा मोड़ तक जाएगा। इस 240 किलोमीटर लंबी और 70 मीटर चौड़ी सड़क परियोजना पर होने वाली कुल अनुमानित लागत करीब 6155 करोड़ रुपये आँकी गई है।

राम जानकी मार्ग विकसित होने से राम जन्मभूमि अयोध्या और माता सीता की जन्मस्थली तक भक्तों के लिए यात्रा सुविधाजनक हो जाएगी। वहीं इस मार्ग के बनने से क्षेत्र में पर्यटन विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।

किसानों के हितों के लिए रोकी अमेरिका से ट्रेड डील, खुद भी ‘कीमत’ चुकाने को तैयार हो गए PM मोदी: जानिए कैसे लाखों करोड़ खर्च कर भारत का एग्री सेक्टर बचा रही भाजपा सरकार

1960 के दशक में देश अनाज की भयानक कमी से जूझ रहा था। बड़ी आबादी विदेशों से आने वाली मदद पर निर्भर थी। सूखे और उत्पादन में कमी ने समस्या को विकराल बना दिया था। तब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा दिया था। इसके बाद देश का खाद्य उत्पादन सेक्टर बदल गया। हमारे किसान आत्मनिर्भर हो गए। PM शास्त्री के 6 दशकों के बाद भारत को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसने किसानों के हितों के लिए अमेरिका से लड़ाई मोल ले ली है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसानों और पशुपालकों के हितों से समझौता नहीं करने वाले हैं। नई दिल्ली में एमएस स्वामीनाथन शताब्दी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने बिना ट्रंप या टैरिफ का जिक्र किए हुए कहा, “किसानों का हित हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। और मुझे पता है कि इसके लिए मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं तैयार हूँ।”

PM मोदी ने कहा कि देश के किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हित में भारत तैयार है। उनके इस बयान ने स्पष्ट कर दिया कि भारत का किसानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्या रवैया रहने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दिया है। अमेरिका ने यह टैरिफ दो किश्तों में लगाए हैं। अमेरिका का कहना है कि रूस से तेल खरीद के चलते भारत पर यह टैरिफ लगाए गए हैं।

‘दूध के सौदे’ से मोदी सरकार ने किया इनकार

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा है कि वह आने वाले समय में टैरिफ की दरें और बढ़ाएंगे। अमेरिका का भारत पर टैरिफ लगाने का फैसला व्यापार समझौते की बातचीत टूटने के बाद सामने आया। बीते लगभग 3-4 महीनों से यह बातचीत चल रही थी। इसलिए लिए भारतीय और अमेरिकी अधिकारी पाँच बार मिल चुके थे। समझौते की अधिकांश बातों पर दोनों पक्ष सहमत भी थे। यहाँ तक कि यह उम्मीद भी जताई गई थी कि अमेरिका के 15% टैरिफ पर भारत के साथ समझौता हो जाएगा।

यह समझौता 1 अगस्त के पहले होना था। हालाँकि, भारत इसमें कुछ चीजों पर अड़ गया और उसने इनके बिना समझौता करने से इनकार कर दिया। इसके चलते अंतिम मौके पर ट्रेड डील टूट गई। सामने आई जानकारी के अनुसार, अंतिम मौके तक सारी बातें तो तय हो गईं थी लेकिन पूरा मामला डेयरी और कृषि सेक्टर पर फँसा हुआ था। मोदी सरकार ने अमेरिका से साफ़ कर दिया कि वह डेयरी और कृषि क्षेत्र में कोई भी रियायतें नहीं देगी।

अमेरिका लगातार यह चाहता था कि उसके यहाँ उत्पादित दूध और कृषि उत्पाद भारत में बेचे जाए। SBI की एक रिपोर्ट बताती है कि यदि अमेरिकी कम्पनियों को भारत में डेयरी क्षेत्र में खुला एक्सेस दे दिया जाता तो इससे देश में दूध की कीमतें 15% तक गिर सकती थीं। इसके चलते भारतीय दूध उत्पादकों को ₹1 लाख करोड़ तक का नुकसान होता। इससे दूध का आयात 250 लाख टन/वर्ष बढ़ जाता। भारतीय डेयरी उत्पादकों को लागत निकालने में भी समस्या आती और पहले से स्थापित डेयरी चलाने में मुश्किल होती।

इससे भारत में 8 करोड़ डेयरी उत्पादकों के रोजगार पर खतरा मंडराने लगता और बड़ी समस्याएँ खड़ी होतीं। यही नहीं दूध की कीमतों में गिरावट सीधे तौर पर भारतीय गायों की नस्लों को तक प्रभावित करती। भारत ने अमेरिका की डेयरी पर जिद मानने से इसलिए भी इनकार कर दिया क्योंकि वह अपने यहाँ इस सेक्टर को 30 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.5 लाख करोड़) तक की सब्सिडी देता है। इसमें से ₹85 हजार करोड़ तो सीधे तौर पर दूध उत्पादकों को दी जाती हैं।

इस फायदे को लेकर अमेरिकी डेयरी उत्पादक भारत आते और भारतीय उत्पादकों से सस्ता दूध बेच कर उन्हें धंधे से बाहर करते। यह मोदी सरकार को नहीं मंजूर हुआ, उसने इसके चलते यहाँ समझौते से इनकार का दिया और मेज पर रखी ट्रेड डील को ठुकराने में भी हिचक नहीं दिखाई। उसने ट्रंप सरकार को स्पष्ट कर दिया कि वह भारतीय पशुपालकों के हितों को सबसे ऊपर रखेगी ना कि अमेरिकी कारोबारी घरानों को।

किसानों के हितों के चलते नहीं की डील

मोदी सरकार ने डेयरी के साथ ही किसानों के हितों को भी सबसे ऊपर रखा। ट्रेड डील के लिए अमेरिका भारत के खाद्य बाजार में भी एंट्री चाहता था। अमेरिका भारत में सेब, बादाम और GM फसलें बेचना चाहता था। भारत ने लगातर GM फसलों का विरोध किया है। अमेरिका के भारत में इन उत्पादों को आयात करने से छोटे किसान प्रभावित होते। भारत में सेब जैसे फल हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के छोटे किसान उगाते हैं। अमेरिका में यही काम बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ करती हैं।

ऐसे में इनकी भारतीय बाजार में एंट्री ना सिर्फ छोटे किसानों के लिए हानिकारक होती बल्कि इससे देश में रोजगार का संकट भी पैदा हो सकता था। भारत में अब भी लगभग 70 करोड़ लोग कृषि पर ही निर्भर हैं। भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 20% कृषि क्षेत्र से आता है। इसके अलावा अमेरिका यहाँ के बाजार में GM फसलें भी बेचना चाहता है। भारत ने वर्षों से GM फसलों को स्वास्थ्य और पर्यावरण चिंताओं के चलते रोक रखा है।

भारत कई विदेशी खाद्य उत्पादों पर 150% तक की इम्पोर्ट ड्यूटी लगाता है। इससे वह अपने यहाँ किसानों के हितों को प्रभावित होने से रोकता है। यही कदम उसने अमेरिका से डील के मामले में उठाया। भारत ने स्पष्ट किया कि वह बड़े टैरिफ और लाखों करोड़ के व्यापार घाटे को लेकर तो चीजें झेल सकता है लेकिन किसानों और डेयरी उत्पादकों के हितों को प्रभावित नहीं होने देना चाहता है, क्योंकि इससे जुड़े लोग ही भारत की आत्मा हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ तक स्पष्ट किया कि वह इसके लिए ‘बड़ी कीमत’ चुकाने को तैयार हैं।

सम्मान निधि से MSP तक: मोदी सरकार किसानों के लिए करती रही है काम

प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी टैरिफ केचलते किसानों के हितों की बात की हो, ऐसा कुछ नहीं है। मोदी सरकार जबसे सत्ता में आई है, उसने किसानों के भले के लिए कई कदम उठाए हैं। मोदी सरकार ने फसलों की MSP को लेकर अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है। उदाहरण के लिए धान की MSP 2013-14 में ₹1310 थी जो 2024-25 में बढ़ कर ₹2300 से अधिक हो गई। इस प्रकार इन दामों में लगभग 80% की बढ़त की गई।

2014 तक देश में लगभग ₹4 लाख करोड़ की ही फसलें सरकार खरीद रही थी। मोदी सरकार में यह 4 गुना हो कर ₹16 लाख करोड़ पहुँच चुकी है। इसके अलावा मोदी सरकार ने किसानों को सीधा नकद लाभ भी दिया है। मोदी सरकार ने 2019 से 2025 के बीच किसानों को ₹3.69 लाख करोड़ सम्मान निधि के रूप में दिए हैं। यह पैसे किसानों को खाद-बीज खरीदने में काम आते हैं। देश में लगभग 10 करोड़ किसान इसका लाभ ले रहे हैं।

इसके अलावा मोदी सरकार ने किसानों के क्रेडिट कार्ड की सीमा भी बढ़ाई है। नैनो यूरिया जैसी कई सुविधाएँ दी हैं। ऐसे में चाहे सामने अमेरिका हो या कोई और ताकत, भारत किसानों के हित में हमेशा खड़ा मिलेगा।

SC ने खारिज की ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका, इन हाउस कमेटी को बताया था अवैध: महाभियोग का रास्ता हुआ साफ

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने अपने घर में मिले कैश को लेकर चल रही इन-हाउस जाँच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और एजी मसीह की पीठ ने ये कहकर याचिका खारिज कर दी कि इन-हाउस समिति का गठन और उसकी जाँच प्रक्रिया गलत नहीं थी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व CJI संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को अपने पद से इस्तीफा देने की सलाह दी जिसे वर्मा ने इंकार कर दिया। इसके बाद CJI ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की।

इस पर कोर्ट ने कहा, “हमने माना है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को CJI द्वारा पत्र भेजना असंवैधानिक नहीं था। हमने कुछ टिप्पणियाँ की हैं। इसका उपयोग जस्टिस वर्मा आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई में विकल्प के तौर पर भविष्य में कर सकते हैं।”

पिछली सुनवाई के दौरान पीठ ने यह सवाल उठाया था कि यदि जस्टिस वर्मा को समिति का गठन असंवैधानिक लगता था, तो उन्होंने शुरुआत में ही इसका विरोध क्यों नहीं किया। पीठ ने टिप्पणी की कि वर्मा ने जाँच प्रक्रिया में भाग लिया था, इसलिए अब वे उसकी रिपोर्ट की वैधता को चुनौती नहीं दे सकते।

क्या था पूरा मामला

ये मामला 14 मार्च 2025 को सामने आया था जब दिल्ली में जस्टिस वर्मा के घर में आग लग गई थी। इसके बाद दमकल विभाग को वहाँ एक कमरे से बड़ी संख्या में जली हुई नकदी मिली थी। इसके बाद उन पर जाँच बैठी। मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया और उनसे सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिए।

जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट पूरी की। इसमें पाया गया कि नकदी को 15 मार्च की सुबह वहाँ से हटाया गया था। समिति में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश के सीजे जीएस संधवालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।

जाँच प्रक्रिया में जस्टिस वर्मा के साथ उनकी बेटी और 55 अन्य गवाहों ने भी अपना बयान दर्ज करवाया था। इसके बाद रिपोर्ट में इस बात को माना गया कि जिस कमरे में नकदी थी वह वर्मा के परिवार के नियंत्रण में था। हालाँकि जस्टिस वर्मा इस मामले में कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दे सके इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई करने की बात रिपोर्ट में शामिल की गई।

जाँच के खिलाफ गुमनाम याचिका

इस कमेटी के फैसले के खिलाफ जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दाखिल की। हालाँकि उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए XXX यानी गुमनाम के तहत आवेदन किया। अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने आरोप लगाया कि जाँच समिति ने पूर्वनिर्धारित मानसिकता के साथ अपनी रिपोर्ट पूरी की। अनुमान के आधार पर सवाल पूछे गए। साथ ही उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया गया।

अपनी याचिका में उन्होंने यह भी कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई सिफारिश असंवैधानिक थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया के अनुसार ऐसा करना आवश्यक नहीं था।

याचिका की सुनवाई के दौरान सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए। उन्होंने कहा कि इन-हाउस समिति को किसी न्यायाधीश को हटाने की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है और इसका कार्यक्षेत्र केवल मुख्य न्यायाधीश को सलाह देने तक सीमित है।

दलीलों पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि CJI केवल ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं हैं। उनका काम केवल फाइलें आगे बढ़ाना नहीं है, बल्कि न्यायपालिका के नेता के रूप में राष्ट्र के प्रति उनका कर्तव्य है। उनके पास न्यायिक दुराचार पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब संसद में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह भारत के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है, क्योंकि यह संभवतः पहला मामला होगा जिसमें किसी हाईकोर्ट जज को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ के आगे नहीं झुकेगा ब्राजील: ट्रंप को फोन नहीं करेंगे राष्ट्रपति सिल्वा, भारत-चीन से बात करेंगे ताकि दे सकें जवाब

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ के मुद्दे पर ब्राजील ने जवाब दिया है। ब्राजील के राष्ट्रपति लुला डा सिल्वा ने कहा है कि वे ट्रंप से टैरिफ के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ट्रंप किसी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि वो अपमानित कर रहे हैं।

लूला ने आगे कहा कि वो चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करेंगे। ट्रंप ने ब्राजील पर सबसे ज्यादा 50 फीसदी टैरिफ लगा दी थी। हालाँकि अब भारत पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगा चुके हैं।

ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा, “मैं राष्ट्रपति ट्रंप को कॉल करने नहीं जा रहा हूँ, क्योंकि वो बात नहीं करना चाहते। लेकिन इतना तय है कि मैं उन्हें सीओपी में आने के लिए आमंत्रित करने के लिए फोन करूँगा, क्योंकि मैं जानना चाहता हूँ कि वह जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर क्या सोचते हैं। मैं फोन करने का शिष्टाचार दिखाऊँगा, मैं उन्हें फोन करूँगा। मैं शी जिनपिंग को फोन करूँगा। मैं प्रधानमंत्री मोदी को फोन करूँगा। मैं पुतिन को फोन नहीं करुँगा क्योंकि वो यात्रा नहीं कर सकते। लेकिन मैं कई राष्ट्रपतियों को फोन करुँगा।”

राष्ट्रपति लुला ने आगे कहा, “जिस दिन मुझे विश्वास हो जाएगा कि ट्रंप वार्ता के लिए तैयार हैं, मैं फोन करने में नहीं हिचकिचाऊँगा।” गौरतलब है कि 1 अगस्त 2025 को ट्रंप ने कहा था कि ब्राजील के राष्ट्रपति सिल्वा उन्हें टैरिफ पर चर्चा करने के लिए फोन कर सकते हैं।

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने लूला को लेकर कहा था, “वह जब चाहें मुझसे बात कर सकते हैं। मेरा ब्राजील के साथ काफी लगाव है लेकिन ब्राजील को चलाने वाले लोगों ने गलत काम किया है। “

यह बयान ऐसे समय में आया है जब ट्रंप ने कहा था कि वह ब्राजील की वस्तुओं पर 50 फीसदी टैरिफ लगाएँगे। ट्रंप ने 30 जुलाई को इस आदेश पर हस्ताक्षर किए थे।

राष्ट्रपति ट्रंप ने एक पत्र लिखा था जिसमें धमकी दी थी कि अगर ब्राजील दक्षिणपंथी पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो पर दायर मुकदमा खत्म नहीं करता है, तो भारी टैरिफ लगाया जाएगा। उन्होंने ब्राजील सरकार पर ‘गंभीर मानवाधिकार हनन’ का आरोप लगाते हुए कहा था कि ब्राजील में कानून का शासन कमजोर हो रहा है। बोल्सोनारो और ट्रंप के बीच नजदीकी सुर्खियों में रही है। उन पर लूला के खिलाफ तख्तापलट की कोशिश करने के आरोप में मुकदमा चल रहा है। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इसपर आपत्ति जताई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि बोल्सोनारो के खिलाफ मुकदमा ‘राजनीति से प्रेरित’ है।

लूला ने ब्रिक्स पर भरोसा जताया

राष्ट्रपति लूला ने भी ब्रिक्स पर भरोसा जताया और कहा, ‘अभी तक ब्रिक्स के बीच कोई समन्वय नहीं है, लेकिन होगा। ब्राजीलियाई राष्ट्रपति के कड़े बयानों ने ट्रंप को एक बार फिर शर्मिंदा कर दिया है। टैरिफ को हथियार बनाने और संप्रभु राष्ट्रों के खिलाफ दबाव बनाने की ट्रंप की कोशिशों से अमेरिका को कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिले हैं।

6 अगस्त को डोनाल्ड ट्रंप ने उस आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया। इसके साथ ही भारत पर कुल टैरिफ 50% हो गया है।

विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि भारत सरकार दोहराती है कि ये कार्रवाई अनुचित, अनुचित और अविवेकपूर्ण है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “हमने इन मुद्दों पर अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी है, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि हमारे आयात बाजार पर निर्भर करता है। इसलिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका ने भारत पर उन कदमों के लिए अतिरिक्त शुल्क लगाने का विकल्प चुना है जो कई अन्य देश भी अपने राष्ट्रीय हित में उठा रहे हैं।”

पिछले महीने, ट्रंप ने भारत पर नए व्यापार दंडों की घोषणा की थी, जिसमें 1 अगस्त से प्रभावी लगभग सभी भारतीय सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ शामिल है। ट्रंप ने इस पर भी अपनी निराशा जताई थी कि भारत रूस से सैन्य और रक्षा उपकरण खरीदने वाला अहम देश है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने 1 अगस्त को ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने भारतीय और रूसी अर्थव्यवस्थाओं को ‘डेड’ बताया। उन्होंने ये भी कहा कि भारत उन देशों में शामिल है जहाँ ‘दुनिया में सबसे अधिक टैरिफ’ लगाया जाता है। उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार कम होने के लिए भारत के टैरिफ को भी जिम्मेदार ठहराया था।

हालाँकि ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे अमेरिका खुद रूस के साथ व्यापार जारी रखे हुए है। रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के तीन साल बाद भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने मास्को के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को खत्म नहीं किया है। जनवरी 2022 से अमेरिका ने 24.5 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के रूसी सामान का आयात किया है। 2025 में अब तक अमेरिका 1.27 अरब डॉलर के खाद और उर्वरक, 62.4 करोड़ डॉलर के यूरेनियम और प्लूटोनियम, 87.8 करोड़ डॉलर के पैलेडियम खरीद चुका है।

जनवरी से नवंबर 2024 की अवधि में पैलेडियम और एल्युमीनियम जैसी धातुओं का आयात 876.5 मिलियन डॉलर का था। अकार्बनिक रसायनों का आयात 683 मिलियन डॉलर का था। बिजली से जुड़े उपकरण का आयात 79 मिलियन डॉलर और कॉर्क और लकड़ी का लगभग 64 मिलियन डॉलर का आयात था। इसके अलावा परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, तैयार पशु आहार, लोहा और इस्पात, और तिलहन आदि के 80.81 मिलियन डॉलर मूल्य के आयात शामिल थे।

विडंबना यह है कि यूक्रेन के साथ चल रहे संघर्ष के बावजूद रूस से अमेरिकी आयात के बारे में पूछे जाने पर राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि उन्हें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है।

भारत ने रूस के साथ संबंध तोड़ने से इनकार किया है। प्रधानमंत्री मोदी एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होने चीन जा रहे हैं। भारत रूस के साथ संबंधों को मजबूत कर रहा है। इससे ये संदेश दिया जा रहा है कि ट्रम्प की इच्छा के मुताबिक भारत नहीं चलेगा और अपने सहयोगियों को कभी नहीं छोड़ेगा। जब ट्रम्प भारत के विरुद्ध अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर रहे थे, उसी वक्त भारत और रूस औद्योगिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर कर रहे थे।

प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के लिए चीन का दौरा करने जा रहे हैं। पिछले सात वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी की यह पहली चीन यात्रा है। भारत और चीन के अपने-अपने मुद्दे हैं, चाहे वह वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की आक्रामकता हो, आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले पाकिस्तान का समर्थन हो, या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की कार्रवाई में बाधा डालना हो। हालाँकि जब पश्चिमी आधिपत्य के विरुद्ध राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता की रक्षा की बात आती है, तो दोनों देश सहयोग के लिए तैयार दिखाई देते हैं।

भारत, ब्राज़ील और चीन, चल रहे ‘टैरिफ के खेल’ में ट्रम्प के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ब्रिक्स देशों को ‘दंडित’ करने करने की कोशिश उनकी एकता का सूत्रधार बन सकता है।

( यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)