पाकिस्तान में मौजूद हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी अब नेपाल के रास्ते भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं। हाफिज सईद का संगठन लश्कर ए तैयबा और मसूद अजहर का जैश के मोहम्मद पाकिस्तान-भारत की सीमा को पार करने के बजाए अब नेपाल के रास्ते भारत में आने की कोशिश कर सकता है। इस खतरे की जानकारी खुद नेपाल के राष्ट्रपति के सलाहकार ने दी है।
नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के सलाहकार सुनील बहादुर थापा ने आतंकवाद को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है। उन्होंने 9 जुलाई को काठमांडू में नेपाल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल को ऑपरेशन एंड एंगेजमेंट की ओर से आयोजित सेमिनार में कही। सेमिनार ‘दक्षिण में आतंकवाद: क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ’ विषय पर आयोजित की गई थी।
नेपाल से खुली सीमा का उठा सकता है फायदा
भारत और नेपाल के बीच 1751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा रेखा है। यहाँ चौकसी काफी कम होती है। आतंकवादियों के लिए अपनी पहचान छिपा कर इससे आना दूसरी जगहों की तुलना में आसान है। जम्मू कश्मीर में आतंकियों की एंट्री पर कड़ा पहरा होने के बाद आतंकी दूसरे दरवाजे की तलाश कर रहे हैं इसलिए हाल के वर्षों में नेपाल में आतंकी गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। नेपाल से भारत के बीच आने-जाने के लिए सड़क मार्ग आसान है। यहाँ वीजा नहीं लगता और हर दिन हजारों लोग सीमा पार करते हैं। नेपाली दस्तावेज बनाना यहाँ आसान है।
नेपाल में हिन्दू बहुसंख्यक हैं। इसके बाद बौद्ध का नंबर आता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यहाँ मुस्लिमों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है खास कर भारत-नेपाल से सटे तराई क्षेत्रों में। साल 2021 की जनगणना के मुताबिक मुस्लिम की जनसंख्या 4.27 फीसदी है। ये लोग सबसे ज्यादा 7 जिले में रहते हैं जो यूपी-बिहार से सटे हैं। इन जगहों में आईएसआई के स्लीपर सेल की मौजूदगी भी बताई जाती है। इनसे भारत-नेपाल सीमा की जानकारी लेने और आतंकियों के घुसपैठ के लिए किया जा सकता है।
आतंकवाद को खत्म करने के लिए सहयोग जरूरी
सुनील कुमार थापा ने भारत-नेपाल के मजबूत सहयोग की चर्चा की और खुफिया जानकारी शेयर करने, मनी लॉन्ड्रिंग पर एक्शन और सीमा की चौकसी बढ़ाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खात्मे के लिए भारत के साथ सहयोग बढ़ाना होगा। सेमिनार में पाकिस्तान में आतंक को मिल रही पनाह को क्षेत्रीय देशों और सार्क के लिए बड़ी चुनौती बताया है।
ऑपरेशन सिंदूर की तारीफ की नेपाल ने
उन्होंने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ आतंकवाद पर एक मजबूत चोट था। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान स्थित 9 आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया। थापा ने याद दिलाया कि पहलगाम हमले में एक नेपाली भी आतंकवाद की भेंट चढ़ गया था। इससे पता चलता है कि आतंकवाद की जद में सिर्फ एक देश नहीं बल्कि कई देश हैं।
पहले भी नेपाल की जमीन का इस्तेमाल किया था आतंकियों ने
1999 में इंडियन एयरलाइंस का विमान आईसी-814 का अगवा किया गया था। ये विमान काठमांडू से दिल्ली आ रहा था। आतंकवादी काठमांडू एयरपोर्ट की सुरक्षा चूक का फायदा उठाते हुए फ्लाइट में चढ़ गए। आतंकियों के पास आधुनिक हथियार थे। इनलोगों ने विमान का अपहरण कर लिया था।
अहमदाबाद प्लेन क्रैश को लेकर एअर इंडिया की फ्लाइट-AI171 के प्लेन की AAIB (एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो) की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। इसके बाद भी शनिवार (12 जुलाई 2025) को विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया।
इस रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई है। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की। इसके जरिए ये मीडिया संस्थान साफ तौर पर बोइंग कंपनी को बचाने की जुगत में लगे हैं। ये तब है जब बोइंग पर जेटलाइनर्स के खराब इंजन और मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट के लिए जाँच चल रही है।
भारत की विमान दुर्घटना जाँच एजेंसी (AAIB) ने अहमदाबाद में 12 जून 2025 को हुए एअर इंडिया फ्लाइट AI171 के हादसे पर अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की है। इस दुर्घटना में प्लेन में सवार 241 लोगों समेत 260 लोगों की मौत हुई थी।
इनमें 19 लोग वे थे जो प्लेन में सवार भी नहीं थे बल्कि प्लेन जिस बिल्डिंग के ऊपर गिरा वहाँ पर थे। अहमदाबाद से लंदन जा रहा यह विमान बोइंग का 787-8 ड्रीमलाइनर था। उड़ान भरने के कुछ ही सेकंड बाद दोनों इंजन बंद हो गए और विमान एयरपोर्ट के पास घनी आबादी वाले इलाके में क्रैश हो गया।
AAIB की 15 पन्नों की रिपोर्ट में कई अहम तकनीकी जानकारियाँ शामिल की गई हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, उड़ान भरते समय विमान की गति 180 नॉट्स पर थी। उसी समय दोनों इंजन बंद हो गए। इंजन-1 और इंजन-2 के फ्यूल कटऑफ स्विच ‘RUN’ से ‘CUTOFF’ की स्थिति में एक सेकंड के अंदर पहुँच गए। इसके कारण फ्यूल की आपूर्ति बंद हो गई और दोनों इंजन फेल हो गए।
इसके बाद कुछ सेकेंड के लिए इंजन फिर से चालू हुए, लेकिन वे स्टेब्लाइज (स्थिर) नहीं रह सके। इसी के काण विमान ने उड़ान भरते ही ऊपर जाने के बजाय एयरपोर्ट की दीवार तक भी नहीं पहुँच पाया।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्लेन का Ram Air Turbine (RAT) पूरी बिजली बंद होने पर अपने आप सक्रिय हो जाता है, वह भी उड़ान भरते ही चालू हो गया था। इससे यह बात स्पष्ट है कि प्लेन ने पूरी तरह से बिजली और इंजन पावर खो दिया था।
AAIB ने मौके पर जाकर भी निरीक्षण, ड्रोन फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की प्रक्रिया पूरी की है। दोनों इंजनों को सुरक्षित जगह पर रखा गया है और जरूरी हिस्सों की जाँच की जा रही है। इस रिपोर्ट में किसी पक्षी के टकराने की आशंका को भी खारिज कर दिया गया है क्योंकि उस समय किसी भी पक्षी के आसपास उड़ने की एक्टिविटी नहीं पाई गई थी।
पश्चिमी मीडिया ने क्रैश के लिए पायलट को माना जिम्मेदार
रिपोर्ट में शामिल तथ्यों के बावजूद, कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान इस हादसे को पायलटों की गलती दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पूरी जाँच के निष्कर्ष सामने आने से पहले ही इन संस्थानों ने रिपोर्ट के कुछ चुनिंदा हिस्सों को ही उठाया और कहा कि ये हादसा मानव त्रुटि के कारण हुआ।
इससे इस बात को लेकर चिंता सामने आई है कि पश्चिमी मीडिया बोइंग जैसी विमान बनाने वाली कंपनियों को बचाने की हरसंभव कोशिश कर रही है और इसके लिए हादसे में जान गँवाने वाले पायलटों को ही जिम्मेदार ठहरा रही है।
द गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया कि उड़ान भरते ही फ्यूल स्विच ‘CUTOFF’ स्थिति में चले गए, लेकिन ये नहीं बताया कि ऐसा किसने किया या क्यों हुआ।
बीबीसी ने बताया कि उड़ान भरते समय ही कॉकपिट के फ्यूल स्विच बंद कर दिए गए, जो केवल आपात स्थिति या लैंडिंग के बाद ही किए जाते हैं। इसके बाद कॉकपिट में असमंजस की स्थिति को लेकर आवाजें सुनाई पड़ी। इसमें एक पायलट दूसरे से पूछता है कि उसने फ्यूल क्यों बंद किया। यह विमान कैप्टन सुमित सभरवाल और को-पायलट क्लाइव कुंदर उड़ा रहे थे। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि आवाज किस पायलट की थी।
डेली मेल ने भी अपनी रिपोर्ट में ये बताया कि वॉयस रिकॉर्डर में कैसे कॉकपिट में असमंजस की स्थिति को सुना गया, जिसमें पायलट एक दूसरे से फ्यूल बंद करने के लेकर सवाल कर रहे थे।
AAIB की रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया गया है कि कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डिंग से हादसे से ठीक पहले के पलों की महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। रिकॉर्डिंग में एक पायलट दूसरे से पूछता है, “तुमने कट ऑफ क्यों किया?” इस पर दूसरा पायलट जवाब देता है कि उसने ऐसा नहीं किया।
इसके बाद पायलट ने इंजन को फिर से चालू करने की कोशिश की और स्विच को वापस ‘RUN’ की स्थिति में ले गया। इंजन 1 दोबारा चालू होने की स्थिति में आया, लेकिन इंजन 2 में समस्या जस की तस रही।
इस बातचीत के बाद इस बात के लेकर चिंता जाहिर की गई कि हादसे से पहले के कुछ ही अहम सेकंड्स में या तो पायलटों के बीच गलतफहमी हुई या फिर कोई तकनीकी खराबी सामने आई, जिसके बाद दोनों इंजन बंद हो गए।
बोइंग के फ्यूल लॉक को लेकर FAA की एडवाइजरी
AAIB की रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू भी है जिसे कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने नजरअंदाज कर दिया है। वह है- FAA (फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन) की बोइंग विमानों में फ्यूल लॉक समस्या से संबंधित एडवाइजरी।
यह तकनीकी खामी बोइंग विमानों में पहले भी देखी गई है और इसे लेकर FAA ने चेतावनी जारी की थी। AAIB की रिपोर्ट में इस पहलू को शामिल किया गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स ने इसे जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स में यह दिखाया जा रहा है कि कॉकपिट में असमंजस की स्थिति बनी और प्लेन क्रैश पायलटों की गलती से हुआ, जबकि असल में दोनों पायलटों ने फ्यूल स्विच बंद करने से इनकार किया। रिपोर्ट में भी तकनीकी खराबी की आशंका जलाई गई है।
पायलटों पर दोषारोपण करके लोगों को बरगलाने और यहाँ तक कि जाँच में भी पक्षपात किए जाने की आशंका बढ़ जाती है। सच ये है कि AAIB ने अभी तक जाँच का कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है। रिपोर्ट में न तो पायलटों को दोषी ठहराया है और न ही बोइंग या इंजन निर्माता को पूरी तरह निर्दोष बताया गया है।
रिपोर्ट में केवल अब तक सिर्फ पहले से ही मिले तथ्यों का उल्लेख किया गया है। साथ ही ये स्पष्ट किया गया है कि जाँच अभी भी जारी है। बिना किसी निष्कर्ष के मृत पायलटों पर दोषारोपण करना न केवल उनके लिए अन्याय है बल्कि सच्चाई के प्रति भी अनादर है।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने 9 जुलाई को स्वतंत्र विशेषज्ञ फ्रांसेस्का अल्बानीज पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। अल्बनीज को यूएन ने फिलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जाँच के लिए विशेष दूत नियुक्त किया था। वह इजरायल की मुखर विरोधी रही हैं।
गाजा में इजरायल की कार्रवाई का उन्होंने हमेशा विरोध किया और इसे ‘नरसंहार’ और ‘इंटरनेशनल कानून’ का उल्लंघन करार दिया। यहाँ तक कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने जब गिरफ्तारी वारंट जारी किया तो उन्होंने उसका भी समर्थन किया।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फ्रांसेस्का अल्बानीज पर लगे प्रतिबंध पर कहा है कि उन्होंने आईसीसी को मजबूर करने की कोशिश की कि वह अमेरिका और इजरायल के अधिकारियों पर कार्रवाई करे। अमेरिकी विदेश मंत्री ने चेतावनी दी है, ” अमेरिका और इजरायल के खिलाफ उनके अभियान को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए हमेशा खड़े रहेंगे।”
Today I am imposing sanctions on UN Human Rights Council Special Rapporteur Francesca Albanese for her illegitimate and shameful efforts to prompt @IntlCrimCourt action against U.S. and Israeli officials, companies, and executives.
अल्बनीज ने अमेरिकी एक्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “ताकतवर लोग कमजोर की पैरवी करने वालों को सजा दे रहे हैं।” उन्होंने कहा कि ” ये ताकत की नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है।”
"The powerful punishing those who speak for the powerless, it is not a sign of strength, but of guilt".
— Francesca Albanese, UN Special Rapporteur oPt (@FranceskAlbs) July 10, 2025
मिडिल ईस्ट आई से बात करते हुए अल्बनीज ने कहा, ” ऐसा लगता है कि मैंने दुखती रग पर पैर रख दिया है। जब मैं और आप बात कर रहे हैं तब भी गाजा में लोग मर रहे हैं और यूएन कुछ नहीं कर पा रहा।”
उन्होंने अपने पिछले पोस्ट में लिखा था कि सबको गाजा की स्थिति के बारे में सोचना चाहिए। हर हाल में वहाँ नरसंहार रुकना चाहिए।
I ? sensible lawyers as much as I?principled politicians. Right now, we need both fully engaged, 200% committed, to stopping the genocide. All eyes must remain on Gaza, where children are dying of starvation in their mothers’ arms, while their fathers and siblings are bombed… https://t.co/rgBFdBDFL2
— Francesca Albanese, UN Special Rapporteur oPt (@FranceskAlbs) July 10, 2025
अल्बनीज के मुताबिक अमेरिकी प्रतिबंध उनके मिशन को कमजोर करने के लिए लगाया गया है। उन्होंने कहा, “मुझे जो करना है वो मैं करती रहूँगी।”
इस बीच संयुक्त राज्य मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने अमेरिका से इन प्रतिबंधों को तुरंत हटाने की माँग की हैं। उन्होंने कहा, “तमाम असहमति के बावजूद यूएन के सदस्य देशों को इस मुद्दे पर बातचीत कर हल निकालना चाहिए। “
गौरतलब है कि व्हाइट हाउस ने पिछले महीने 4 आईसीसी जस्टिस पर प्रतिबंध लगा दिया था। इन पर अमेरिका के खिलाफ काम करने का लगाया आरोप
क्या थी अल्बनीज की रिपोर्ट?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की सदस्य अल्बनीज एक ऐसे पैनल की सदस्य हैं जो विश्वस्तर पर मानवाधिकार हनन की रिपोर्ट तैयार करता है और उसकी निगरानी करता है। ये संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक प्रवक्ता नहीं होते लेकिन उनके निष्कर्षों पर ध्यान दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को इससे मदद मिलती है।
परिषद ने खास राष्ट्रों और क्षेत्रों के लिए 13 विशेषज्ञ नियुक्त किए हैं। अफगानिस्तान, बेलारूस, बुरुंडी, कंबोडिया, उत्तर कोरिया, इरिट्रिया, ईरान, म्यांमार और रूस के अलावा सीरिया, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, माली और सोमालिया में इनकी नियुक्ति हुई है।
फिलिस्तीनी क्षेत्र में हाल ही में हुई इजरायली हमले को देखते हुए एक निष्पक्ष विशेषज्ञ को नियुक्त किया है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय के अनुसार अल्बानीज अंतर्राष्ट्रीय कानून में विशेषज्ञ हैं और उन्होंने शरणार्थी एवं विस्थापितों के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी के साथ साथ दूसरे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ काम किया है।
फ्रांसेस्का अल्बनीज कौन है?
इटली की मानवाधिकार आयोग की वकील फ्रांसेस्का अल्बनीज गाजा और वेस्ट बैंक क्षेत्र में विशेष दूत हैं। 2022 में उनकी नियुक्ति हुई थी। वह इंटरनेशनल वकील होने के साथ साथ जॉजटाउन विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल प्रवासी स्टडी सेंटर से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने मध्यपूर्व के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है। ‘ अंतर्राष्ट्रीय कानून में फिलिस्तीनी शरणार्थी’ किताब की सह लेखिका हैं।
उन्होंने 2003-13 के बीच यूएन के साथ काम किया। 2013-15 के बीच इबोला बीमारी से पश्चिम अफ्रीका को बचाने के मुहिम का हिस्सा रहीं इस दौरान गैर सरकारी संगठन प्रोजेक्ट कंसर्न इंटरनेशनल की सुरक्षा सलाहकार थी
उन्होंने कानून में इटली के पीसा विश्वविद्यालय से स्नातक किया है। स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से मानवाधिकार में एलएलएम किया है। 2015 तक उनका संबंध अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बेरूत के इस्साम फारेस इंस्टीट्यूट और आईएसआईएम से था।
इजरायल की मुखर विरोधी रही हैं अल्बनीज
गाजा पर इजरायल के हमले के बाद अल्बनीज लगातार इजरायल की कार्रवाइयों का विरोध करती रही हैं। उन्होंने यूएनएचआरसी में दिए अपने भाषण में इजरायल को ‘आधुनिक इतिहास का क्रूरतम नरसंहारक’ कहा था।
2024 में अल्बनीज ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें इजरायल पर सामूहिक हत्या, फिलिस्तीन का विनाश की चर्चा की। जून 2025 में उन्होंने अपनी रिपोर्ट में उन बैंकों और हथियार निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नाम बताए थे जो इजरायल के अभियान का समर्थन कर रहे थे।
अल्बनीज अपनी विवादित टिप्पणियों के लिए भी सुर्खियों में रही हैं। उन्होंने 2014 में इजराइल -फिलिस्तीन के जंग में यहूदी लॉबी की बात की थी। उन्होंने कहा था कि अमेरिकी सरकार के फैसलों को “यहूदी लॉबी” प्रभावित कर रही थी। बाद में उन्होंने माफी माँगी थी। इससे उनके ‘यहूदी विरोधी’ रुझान का पता चलता है।
(मूल रूप से इस खबर को अंग्रेजी में रुकमा राठौड़ ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार (12 जुलाई 2025) को 16वें रोजगार मेले में भाग लिया। मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए 51 हजार से ज्यादा युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए।
ये युवा अब विभिन्न सरकारी विभागों और संगठनों में काम करेंगे। देश भर में आयोजित रोजगार मेलों के जरिए अब तक 10 लाख से अधिक नियुक्ति पत्र जारी किए जा चुके हैं।
सरकारी नौकरियों पर जोर और पारदर्शिता
प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार युवाओं को पक्की नौकरी देने के लिए लगातार काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह ‘बिना पर्ची, बिना खर्ची’ वाली प्रक्रिया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि ये नए युवा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
केंद्र सरकार में युवाओं को पक्की नौकरी देने का हमारा अभियान निरंतर जारी है।
हमारी पहचान भी है – बिना पर्ची, बिना खर्ची।
आज 51,000 से अधिक युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए गए हैं।
ऐसे रोजगार मेलों के माध्यम से अब तक लाखों नौजवानों को भारत सरकार में परमानेंट जॉब मिल चुकी है।
प्रधानमंत्री ने रोजगार मेले के बारे में एक्स (पहले ट्विटर) पर भी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था कि सरकार विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में युवाओं की भागीदारी बढ़ाना चाहती है।
‘इम्प्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम’ और निजी क्षेत्र
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार निजी क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर बढ़ा रही है। इसके लिए एक नई योजना शुरू की गई है। इसका नाम ‘इम्प्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम’ है।
The Government of India is focusing on creating new employment opportunities in the private sector.
Recently, the government approved a new scheme — the Employment Linked Incentive Scheme.
Under this scheme, the government will provide ₹15,000 to young individuals who get… pic.twitter.com/iMuChtW5Bx
इस योजना के तहत, सरकार निजी क्षेत्र में पहली बार नौकरी पाने वाले युवाओं को ₹15,000 देगी। यह राशि उनकी पहली नौकरी की पहली सैलरी में सरकार का योगदान होगी।
इस योजना के लिए सरकार ने करीब ₹1 लाख करोड़ का बजट बनाया है। इस स्कीम से लगभग 3.5 करोड़ नए रोजगार पैदा होने की उम्मीद है।
महाराष्ट्र के लिए यह एक बड़ा गौरवशाली क्षण है। UNESCO ने ‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ के तहत छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़े 12 ऐतिहासिक किलों को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है।
यह निर्णय पेरिस में आयोजित विश्व धरोहर समिति (WHC) के 47वें सत्र के दौरान लिया गया। भारत के लिए यह 44वीं संपत्ति है जिसे यह वैश्विक मान्यता मिली है।
यह उपलब्धि मराठा शासकों की मजबूत किलेबंदी प्रणाली और सैन्य रणनीति का प्रतीक है। ये किले महाराष्ट्र और तमिलनाडु में फैले हुए हैं।
विश्व धरोहर लिस्ट में शामिल किले
‘मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स’ में कुल 12 किले चुने गए हैं। इनमें से 11 किले महाराष्ट्र में हैं। इनके नाम- साल्हेर, शिवनेरी, लोहगढ़, खंडेरी, रायगढ़, राजगढ़, प्रतापगढ़, सुवर्णदुर्ग, पन्हाला, विजय दुर्ग और सिंधुदुर्ग हैं।
तमिलनाडु का जिंजी किला (Gingee Fort) भी इसमें शामिल है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने इन्हें ‘स्वराज्य’ के लिए बनवाया था। ये किले मराठा साम्राज्य की वास्तुकला (बनावट) और उनकी युद्ध कला को दिखाते हैं।
किले और उनकी रणनीतिक स्थिति
ये किले अलग-अलग जगहों पर बने हैं। ये दिखाते हैं कि मराठा सैनिक कितने समझदार थे और रणनीतिक रक्षा योजना को दर्शाते हैं। कुछ किले पहाड़ों पर हैं। इन्हें ‘पहाड़ी किले’ कहते हैं। जैसे- साल्हेर, शिवनेरी, लोहागढ़, रायगढ़, राजगढ़ और जिंजी।
प्रतापगढ़ जंगल के बीच एक पहाड़ पर बना है। पन्हाला एक पहाड़ी पठार पर स्थित किला है। विजयदुर्ग समुद्र किनारे बना है। खंडेरी, सुवर्णदुर्ग और सिंधुदुर्ग पानी के बीच बने हैं। इन्हें ‘द्वीप किले’ कहते हैं। ये सभी किले मिलकर एक मजबूत सैनिक व्यवस्था बनाते हैं।
12 किलों की खासियत
सालहेर किला- यह महाराष्ट्र का सबसे ऊँचा किला है। यह नासिक जिले में है और यहाँ से बहुत सुंदर नज़ारा दिखता है।
शिवनेरी किला- यह पुणे जिले में है। छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म इसी किले में हुआ था।
लोहगढ़ किला- यह पुणे जिले में है। इसका मतलब है ‘लोहे जैसा मजबूत किला’। यह मराठा साम्राज्य की रक्षा में बहुत महत्वपूर्ण था।
खंडेरी किला- यह रायगढ़ जिले में समुद्र के बीच एक द्वीप पर है। शिवाजी महाराज ने इसे समुद्री रास्तों पर नियंत्रण के लिए बनवाया था।
रायगढ़ किला- यह शिवाजी महाराज की राजधानी था। उन्हें यहीं पर 1674 में छत्रपति बनाया गया था।
राजगढ़ किला- यह पुणे जिले में है। यह छत्रपति शिवाजी महाराज की पहली राजधानी था।
प्रतापगढ़ किला- यह सतारा जिले में है। यह किला 1659 में अफजल खान के साथ हुए युद्ध के लिए मशहूर है।
सुवर्णदुर्ग- यह रत्नागिरी जिले में समुद्र के बीच एक द्वीप पर है। यह मराठा नौसेना की ताकत का प्रतीक है।
पन्हाला किला- यह कोल्हापुर जिले में है। शिवाजी महाराज ने इसे 1659 में जीता था।
विजय दुर्ग- यह सिंधुदुर्ग जिले में समुद्र किनारे है। यह भारत के सबसे मजबूत समुद्री किलों में से एक है। शिवाजी महाराज ने इसे नौसेना का केंद्र बनाया।
सिंधुदुर्ग- यह सिंधुदुर्ग जिले में समुद्र के बीच एक द्वीप पर है। शिवाजी महाराज ने इसे समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए बनवाया था। यहाँ शिवाजी महाराज के हाथों के निशान भी हैं।
जिंजी किला- यह तमिलनाडु में है। इसे ‘दक्षिण भारत का सबसे मजबूत किला’ माना जाता है। यह किला तीन पहाड़ियों पर फैला हुआ है।
देश भर से बधाई संदेश
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर देश के नेताओं ने खुशी जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह सम्मान हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। उन्होंने लोगों से इन किलों को देखने की अपील की।
Every Indian is elated with this recognition.
These ‘Maratha Military Landscapes’ include 12 majestic forts, 11 of which are in Maharashtra and 1 is in Tamil Nadu.
When we speak of the glorious Maratha Empire, we associate it with good governance, military strength, cultural… https://t.co/J7LEiOAZqy
वहीं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे राज्य के लिए गौरव का क्षण बताया। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज को नमन किया और नागरिकों को बधाई दी।
Historic! Proud! & Glorious moment!
Maharashtra Govt offers Salutations to our beloved Chhatrapati Shivaji Maharaj!! Heartiest congratulations to all the citizens and ShivBhakts of Maharashtra… 12 forts of Chhatrapati Shivaji Maharaj listed on UNESCO World Heritage List!
विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 12 जून को अहमदाबाद में हुई एयर इंडिया दुर्घटना की कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डिंग में इंजन फेल होने के दौरान दोनों पायलटों के बीच छोटी लेकिन अहम बातचीत रिकॉर्ड हुई है।
कॉकपिट की बातचीत में अहम खुलासा
15 पन्नों की रिपोर्ट में बताया गया है कि कॉकपिट में एक पायलट ने दूसरे से कहा, “आपने ईंधन क्यों बंद कर दिया?” जिस पर दूसरे ने जवाब दिया, “मैंने ऐसा नहीं किया।” यह बातचीत उस समय हुई जब दोनों इंजन ईंधन कटऑफ स्विच 13:38:42 IST (08:08:42 UTC) पर ‘रन’ से ‘कटऑफ’ में बदल गए। इस वक्त बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर 180 नॉट्स की तेज रफ्तार में पहुँच चुका था।
Air India acknowledges receipt of the preliminary report released by the Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) today, 12 July 2025. It is working closely with stakeholders, including regulators and continues to fully cooperate with the AAIB and other authorities as their… pic.twitter.com/WpoFbMhYrd
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंजन 1 का स्विच 13:38:52 IST (08:08:52 UTC) पर वापस ‘रन’ पर चला गया। उसके बाद इंजन 2 का स्विच 13:38:56 IST (08:08:56 UTC) पर चला। इंजन और एयरक्राफ्ट फ़्लाइट रिकॉर्डर (EAFR) ने दोनों इंजनों के एग्जॉस्ट गैस तापमान (EGT) में वृद्धि के के संकेत दिए।
इंजन 1 का कोर रुक गया और फिर उसमें गति आने लगी। हालाँकि बार-बार ईंधन1 बंद और चल रहा था। वहीं इंजन 2 बंद होने के बाद चल नहीं पाया। दोनों इंजनों के काम नहीं करने पर विमान नीचे गिर गया।
MAY DAY का कॉल पायलट की तरफ से 08:09:05 UTC पर आया यानी दुर्घटना के चंद सैकेंड पहले। हालाँकि विमान नॉर्मल टेकऑफ की तरह की उड़ान भरा था लेकिन चंद सेकेंड के बाद ही उसमें गड़बड़ी आ गयी।
बोइंग के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी अभी
प्रारंभिक रिपोर्ट में फिलहाल बोइंग कंपनी और इंजन बनाने वाली इलेक्ट्रिक जनरल यानी जेई के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश नहीं की गई है । सुरक्षा जाँच में अभी गड़बड़ी के संकेत नहीं मिले हैं। हालाँकि रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ” सबूत माँगे जा रहे हैं और उनकी जाँच की जाएगी।”
एएआईबी ने कहा, “दोनों इंजनों को मलबे वाली जगह से बरामद कर लिया गया था जिसे अलग से जाँच के लिए रखा गया है। इसके अलावा विमान के अहम कलपुर्जे की पहचान करके आगे की जाँच के लिए अलग रखा गया है।”
एएआईबी ने आगे बताया कि ड्रोन फोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी सहित मलबे वाली जगह पर जाँच का काम पूरा हो गया है और मलबे को एक सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है।
तकनीकी पहलू की जाँच की गई
रिपोर्ट में उन तकनीकी चीजों का सिलसिलेवार तरीके से ज़िक्र किया गया है जो विमान के उड़ान के बाद कुछ सेकेंड में घटित हुईं। ये विमान अहमदाबाद से लंदन गैटविक के लिए अहमदाबाद हवाई अड्डे से उड़ान भरा था लेकिन कुछ सेकेंड बाद ही बी जे मेडिकल कॉलेज के होस्टल पर गिर गया। इस दुर्घटना में 260 लोग मारे गए।
इनमें 241 यात्री और चालक दल के सदस्य शामिल हैं जबकि हॉस्टल में मेडिकल कॉलेज के कई छात्रों समेत 19 अन्य लोग भी अपनी जान गँवा बैठे। इस हादसे में एक यात्री की जान बच गई। ये विमान हादसा भारत की सबसे भयानक विमान दुर्घटनाओं में एक माना जाता है।
इस फ्लाइट के दो पायलट कैप्टन सुमीत सभरवाल और क्लाइव कुंदर थे। 56 वर्षीय कैप्टन सभरवाल एक बेहद अनुभवी पायलट थे, जिनके पास 15,600 घंटों से ज़्यादा उड़ान भरने का अनुभव था।
वहीं 32 वर्षीय कुंदर के पास 3,400 से ज़्यादा घंटों तक उड़ान भरने का अनुभव था । दोनों के पास बोइंग 787 उड़ाने का लाइसेंस और योग्यता दोनों था।
12 जून, 2025 को गुजरात के अहमदाबाद में हुए एअर इंडिया विमान हादसे का दोष पायलटों पर डालने का प्रयास चालू हो गया है। जाँच रिपोर्ट सामने आने से पहले ही AI 171 फ्लाइट हादसे का आधार पायलट की कथित गलती को विदेशी मीडिया ने बना दिया। जबकि जाँच रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रूप से नहीं कही गई।
इस मामले में मीडिया ने विमान निर्माता कंपनी बोइंग को भी क्लीन चिट देने का प्रयास है, जिसका बनाया 787-8 ड्रीमलाइनर 242 लोगों के साथ क्रैश हुआ था। यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी विमान हादसे के बाद बोइंग ने पायलटों के सिर पर दोष मढ़ने का प्रयास किया हो।
वॉल स्ट्रीट जनरल ने पायलटों को बनाया ‘विलेन’
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की है। इस खबर में दावा किया गया है कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं।
वॉल स्ट्रीट जनरल ने यह रिपोर्ट अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से लिखी है, जिनका नाम नहीं दिया गया है। पायलटों को कठघरे में खड़े करने वाली यह रिपोर्ट पूरी तरह से ‘सूत्रों के हवाले से’ लिखी गई है। इसमें ना किसी अमेरिकी और ना ही एअर इंडिया के अधिकारियों का नाम दिया गया है।
वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट कहती है कि जाँच का दायरा काल कवलित हुई फ्लाइट के पायलटों कैप्टन सुमीत सभरवाल और फर्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंदर के कथित तौर पर विमान के दोनों इंजनों के फ्यूल स्विच एक साथ बंद किए जाने को लेकर है। रिपोर्ट में दावा है कि इनके बंद होने से विमान उठ नहीं पाया और उड़ान भरते ही एक इमारत से जा टकराया।
वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट में कहा गया है, “इन लोगों ने बताया कि उड़ान के दौरान ये स्विच सामान्यतः चालू रहते हैं, और यह स्पष्ट नहीं है कि इन्हें कैसे या क्यों बंद किया गया। लोगों ने यह भी बताया कि यह स्पष्ट नहीं है कि यह गलती से हुआ था या जानबूझकर, या इन्हें वापस चालू करने की कोशिश की गई थी।”
इस रिपोर्ट में सधे शब्दों के साथ यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि विमान असल में पायलट की ही भूल के चलते हादसे का शिकार हुए है। रिपोर्ट के पहले हिस्से में ही यह दावा कर दिया गया है कि बोइंग का 787 ड्रीमलाइनर एकदम सुरक्षित है और उसको लेकर जाँच की कोई तलवार नहीं लटक रही।
जबकि AAIB की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इंजन फ्यूल स्विच बंद हुए थे और कुछ सेकंड के बीच चालू भी हो गए थे। इस बीच पायलटों के बीच बातचीत भी हुई थी। जिसमे दूसरे पायलट ने पहले से इनकार किया था कि उसने इस स्विच के साथ कोई छेड़छाड़ की है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्विच वापस ऑन करने के बाद भी एक ही इंजन चालू हुआ था। दूसरा तब भी नहीं चालू हो पाया। संभव है किसी तकनीकी सस्या की वजह से फ्यूल स्विच बंद हुए हों।
विदेशी मीडिया में एक साथ सामने आए दावे
वॉल स्ट्रीट जनरल की यह रिपोर्ट भारत में विमान हादसे की जाँच कर रही एजेंसी AAIB (एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो) की रिपोर्ट के सामने आने से पहले आई है। AAIB के इस मामले में रिपोर्ट सार्वजनिक करने की तारीख शुक्रवार (11 जुलाई 2025) बताई गई थी। इसे 12 जुलाई की सुबह रिलीज किया गया।
एअर इंडिया की फ्लाइट AI 171 हादसे को लेकर केवल वॉल स्ट्रीट जनरल ने ही ऐसी रिपोर्ट नहीं प्रकाशित की है। AAIB की रिपोर्ट आने के कुछ दिनों पहले से संगठित रूप से वही मीडिया पोर्टल ऐसे दावे कर रहे हैं, जो लगातार भारत विरोधी प्रोपेगेंडा करते पकड़े गए हैं।
वॉल स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के गलती से बंद होना बताने का प्रयास किया है। इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई हैं।
विदेशी मीडिया में एक साथ ‘पायलट की गलती’ की बात को रेखांकित किया गया है
इनमें से एयर करेंट वेबसाइट ने तो विमान निर्माता बोइंग और उसके विमान 787 ड्रीमलाइनर के साथ ही उसके इंजन को भी बचाना चालू कर दिया है। एयर करेंट ने इस विमान के लिए इंजन सप्लाई करने वाले जनरल इलेक्ट्रिक के इंजन मॉडल को भी दोषमुक्त करार दे दिया है।
बोइंग को ‘बचाने’ के हो रहे प्रयास?
एअर इंडिया हादसे को लेकर विदेशी मीडिया में एक साथ खबरें आना असमान्य सा लगता है। यह बात अगर किसी जाँच रिपोर्ट के हवाले से कही जाती तो मानी भी जा सकती थी। जाँच रिपोर्ट में कहीं स्पष्ट रूप से नहीं लिखा कि पायलटों ने स्विच बंद किया था। उसमे केवल स्विच बंद होने की बात है।
इससे प्रश्न उठता है कि कहीं बोइंग इस मामले में पायलटों को दोषी ठहरा अपनी जिम्मेदारी से बचना तो नहीं चाह रही और इसी के लिए एक साथ ऐसी खबरें सामने आई हों। यह आशंका निराधार भी नहीं है, इससे पहले बोइंग कई हादसों में पायलटों के ऊपर दोष डाल चुकी है।
बाद में हुई जाँच में बोइंग की ही गड़बड़ियां सामने आई हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2019 और 2020 में हुए 737 मैक्स विमान के हादसे हैं। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के विमानों के साथ हुए थे।
इथियोपियन एयर का 737 मैक्स उड़ने के कुछ ही मिनटों के बाद क्रैश हो गया था (फोटो साभार: UPI)
इन हादसों में 346 लोग मारे गए थे। इन हादसों के बाद न्यू यॉर्क टाइम्स के साथ एक बातचीत में बोइंग के CEO डेविड कोल्हान ने कहा था,”वहाँ (एशिया और अफ्रीका) के पायलटों का अनुभव, अमेरिकी पायलटों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।”
उन्होंने सीधे तौर पर पायलटों को कम अनुभव वाला और हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया था। इन्हीं हादसों को लेकर डेविड कोल्हान से पहले बोइंग के CEO रहे डेनिस मुलिनबर्ग ने भी ऐसी ही टिप्पणी की थी।
उन्होंने हादसों के बाद अमेरिकी संसद के सामने कहा था कि उनके विमान (737 मैक्स) एकदम ठीक थे लेकिन पायलटों ने सारे कदम नहीं उठाए, जिसके चलते विमान हादसे का शिकार हो गए। इन दोनों की बातें आगे चलकर एकदम झूठ साबित हुई थीं।
यह दोनों विमान हादसे बोइंग की ही एक गलती के चलते हुए थे। बोइंग ने अपने 737 मैक्स में MCAS नाम का एक सॉफ्टवेयर लगाया था जो विमान के आगे के हिस्से को अधिक ऊपर उठने से रोकता था। इसके विषय में बोइंग ने पायलटों को नहीं बताया था। यह सॉफ्टवेयर खुद ही काम करता था।
बोइंग के पायलटों को इस विषय में ना बताने के पीछे कारण था कि यह विमान खरीदने वाली एयरलाइंस को उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़ती जो बड़ा खर्च होता। इसके अलावा इस सिस्टम का प्रमाणन भी बोइंग को करवाना पड़ता, यह भी एक खर्चीली प्रक्रिया है।
बोइंग की बेइमानी का परिणाम यह हुआ कि यह दोनों हादसे हो गए। इन दोनों हादसे में विमान के उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह नीचे की तरफ गोते खाने लगा और अंत में जाकर क्रैश हो गया। इसके पीछे कारण था कि MCAS सॉफ्टवेयर लगातार इन दोनों में विमानों को नीचे की तरफ दबाता रहा और पायलट चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए।
बोइंग ने पहले तो अपनी गलती स्वीकार ही नहीं की और इन दोनों एयरलाइंस के पायलट पर ही दोष मढ़ दिया। बाद में हुई जाँच में सच्चाई खुली और बोइंग को लगभग ₹20 हजार करोड़ का जुर्माना झेलना पड़ा था और MCAS में गड़बड़ी की बात भी स्वीकार करनी पड़ी थी।
इससे पहले भी पायलटों को बदनाम कर चुकी बोइंग
737 मैक्स से जुड़े हादसों के अलावा इससे पहले भी बोइंग का यह रवैया रहा है कि खुद को बचाने के लिए तुरंत पायलटों को निशाना बनाओ। वर्ष 2009 में टर्किश एयरलाइन का एक विमान भी ऐसे ही हादसे का शिकार बना था, जब बोइंग ने पायलटों को निशाना बनाया था।
25 फरवरी, 2009 को टर्किश एयरलाइन का एक विमान एम्स्टर्डम एयरपोर्ट पर उतरते समय हादसे का शिकार हो गया था और इसमें 9 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में 120 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह हादसा बोइंग के बनाए 737-800 विमान के साथ हुआ था।
एम्सटर्डम के रनवे पर तुर्की का विमान हादसे का शिकार हुआ था (फोटो साभार: FAA US Gov)
हादसे की जाँच में सामने आया था कि इस विमान को ऊँचाई का डाटा देने वाला उपकरण (अल्टीमीटर) गड़बड़ कर गया था। इसने विमान के 2000 फीट ऊंचाई पर होने के बावजूद सिस्टम को यह डेटा दिया कि वह नीचे उतर चुका है और लैंडिंग के आखिरी चरणों में हैं।
इसके चलते विमान के ऑटो थ्रोटल सिस्टम ने उसके इंजन को लगभग बंद कर दिया। हालांकि विमान तब भी ठीकठाक ऊंचाई पर था। इस गड़बड़ी के चलते विमान सीधा एयरपोर्ट पर आकर गिरा और कई टुकड़ों में बंट गया। बाद में सामने आया कि यह गड़बड़ी बोइंग के सिस्टम की थी और कॉकपिट में मौजूद पायलटों को इस गड़बड़ी को पहचानने में देरी हो गई थी।
इस मामले में भी पश्चिमी देशों की प्रेस ने यही खबरें चलाई थीं कि पायलटों को भूल से ही यह हादसा हुआ है। हालांकि बाद में हुई जाँच में असल कारण सामने आए थे और बोइंग को इसके बाद एक्शन भी लेना पड़ा था। इसी तरह की कहानी जुलाई 2013 सैन फ्रांसिस्को के एक विमान हादसे में हुई थी।
दक्षिण कोरिया की एशियाना एयरलाइन का एक बोइंग 777 विमान इस एयरपोर्ट पर हादसे का शिकार हो गया था। यह विमान कम स्पीड के चलते एक दीवाल में जा टकराया था और इसका बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था। इस हादसे में तीन लोगों की मौत हुई थी।
जाँच में सामने आया था कि इसमें भी विमान की लैंडिंग के समय स्पीड घट गई थी। पायलटों ने इस पर ध्यान नहीं दिया था। बोइंग ने यह कह कर बचने का प्रयास किया था कि पायलट सही से सीखे नहीं हुए थे। जबकि असल बात यह थी कि विमान के तकनीक इतनी ज्यादा थी कि पायलट कुछ समझ नहीं पाए। एयरलाइन ने भी तकनीक में गड़बड़ी को समस्या बताया था।
पुरानी स्क्रिप्ट फिर चलाई जा रही
स्पष्ट है कि बोइंग कभी भी बिना दबाव के अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुई है। एअर इंडिया हादसे के मामले में भी कुछ ऐसा ही प्रयास चल रहा है। इस मामले में पायलटों को दोषी ठहराना और भी आसान है क्योंकि दुखद तौर पर वह अपनी सफाई पेश करने के लिए इस संसार में मौजूद ही नहीं हैं।
बोइंग अपने आप को इसलिए भी बचा रही है कि अगर उसकी गलती इस मामले में निकली तो एक तो 787 ड्रीमलाइनर का अब तक का सुरक्षित विमान होने का रिकॉर्ड टूट जाएगा और दुनिया भर में उसके व्यापार पर बड़ा फर्क पड़ेगा।
इसके अलावा उसका दोष निकलने पर उसे बड़ी मात्रा में मुआवजे तक देने पड़ सकते हैं। ऐसे में वह पहले ही पायलटों के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चला कर अपने को बचाने के प्रयास कर रही हो, यह आशंका है। अमेरिकी और पश्चिमी देशों की मीडिया एजेंसी में एक जैसी खबरें आना इसी का संकेत लगती हैं।
पायलटों को दोषी ठहराने के अलावा भी बोइंग कोई दूध की धुली नहीं है और उसके खिलाफ गड़बड़ी का बड़ा इतिहास है। चाहे अमेरिकी वायु सेना के लिए टैंकर डील हो या फिर एयरबस से प्रतियोगिता, वह हर बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल करती आई है।
अब इस मामले में AAIB और बाकी जाँच एजेंसियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि हादसे की असल वजह क्या थी और इसके लिए बोइंग दोषी है या पायलटों की चूक वाली बात ऐसे ही फैलाई जा रही है।
अहमदाबाद हादसे में क्या हुआ
12 जून, 2025 को अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ी एअर इंडिया की फ्लाइट AI 171 हादसे का शिकार हो गई थी। यह हादसा बोइंग निर्मित 787-8 ड्रीमलाइनर विमान के साथ हुआ था। इस हादसे में विमान में सवार 241 लोग मारे गए थे, जिनमें दोनों पायलट और क्रू भी शामिल थे।
अहमदाबाद में क्रैश हुआ एअर इंडिया का विमान एक होस्टल में जा घुसा था (फोटो साभार: Narendra Modi/X)
यह हादसा दोपहर लगभग 1:40 मिनट पर हुआ था। यह विमान उड़ान भरने के साथ ही हादसे का शिकार हो गया था। यह विमान जहां टकराया था वहां भी लोग मारे गए थे। हादसे के बाद घटनास्थल का दौरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी किया था।
एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) की गिरफ्त में आए जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर के मंसूबे बहुत खतरनाक थे। जाँच में पता चला है कि छांगुर पीर अवैध धर्मांतरण के लिए ईसाई मिशनरियों की मदद लेता था। इसके अलावा छांगुर पीर के ISI कनेक्शन भी सामने आए है।
मिशनरियों से मदद
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, छांगुर पीर ने अवैध धर्मांतरण के लिए एक पूरा नेटवर्क बना रखा था। छांगुर पीर के संबंध नेपाल सीमा से सटे 7 जिलों में सक्रिय कुछ ईसाई मिशनरियों से थे।
इन मिशनरियों के वालंटियरों को छांगुर पीर पैसे देता था। बदले में वालंटियर छांगुर पीर को गरीब और कमजोर परिवारों की जानकारी देते थे।
छांगुर पीर फिर इन परिवारों को निशाना बनाकर और उन्हें आर्थिक मदद देकर अपने प्रभाव में लेता था। इसके बाद वह उनका धर्म परिवर्तन करवाता था।
इस धर्मांतरण में होने वाले खर्च का पूरा हिसाब नसरीन (नीतू) रखती थी, जो कथित तौर पर छांगुर पीर की पत्नी है। छांगुर पीर पुलिस और स्थानीय प्रशासन को मैनेज करता था ताकि काम चलता रहे।
मिशनरियों का नेटवर्क
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, देवीपाटन मंडल में मिशनरियों ने एक मजबूत नेटवर्क बनाया था। मिशनरियों ने हर वर्ग के लिए अलग-अलग प्रचारक नियुक्त किए थे। प्रचारक, पास्टर और पादरी इस नेटवर्क की मुख्य कड़ी थे।
मिशनरियों के इन नेटवर्क के पास दलित, वंचित, बीमार और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पूरी जानकारी होती थी। छांगुर पीर समय-समय पर पैसे देकर यह जानकारी लेता था। फिर वह इन परिवारों को धर्मांतरण के लिए राजी करता था।
जानकारी के अनुसार, छांगुर पीर का संबंध कई अन्य संगठनों से भी रहा है। जाँच में पता चला है कि उसका जुड़ाव सऊदी अरब इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक, मुस्लिम वर्ल्ड लीग, दावत-ए-इस्लाम और इस्लामिक संघ ऑफ नेपाल जैसे संगठनों से था।
विदेशी फंडिंग और ISI कनेक्शन
खुफिया एजेंसियों के अनुसार, छांगुर पीर ‘मिशन आबाद’ का हिस्सा था। धर्मांतरण के बदले छांगुर पीर को विदेश से पैसा मिलता था। पूर्व IB अधिकारी ने बताया कि इसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भी भेजी गई थी। अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई हो रही है।
जाँच में यह भी सामने आया है कि छांगुर पीर के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI से कनेक्शन थे। छांगुर पीर हाल ही में काठमांडू में हुए एक कार्यक्रम में शामिल हुआ था।
यह कार्यक्रम काठमांडू स्थित पाकिस्तान दूतावास में हुआ था। इसमें पाकिस्तान की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी और ISI के अधिकारी भी मौजूद थे। इस कार्यक्रम के बाद पाकिस्तानी दल ने भारत सीमा का दौरा किया था। छांगुर पीर ने तब ISI के साथ कनेक्शन में आया।
प्रभावित करने की रणनीति और प्रचार
छांगुर पीर खुद का और नसरीन का उदाहरण देकर हिंदू परिवारों को धर्मांतरण के लिए राजी करवाता था। छांगुर पीर बताता था कि वे दोनों पहले सिंधी थे। इस्लाम कबूल करने के बाद उनकी जिंदगी में बदलाव आया।
छांगुर पीर लोगों को दिखाता था कि अब उनके पास पैसे, आलीशान घर और महंगी गाड़ियाँ हैं। छांगुर पीर दावा करता था कि अगर वे भी इस्लाम अपना लेंगे तो उनकी भी जिंदगी में बदलाव आएगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में कुछ ऐसा कहा, जिसे विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने का बहाना बना लिया। बात ये है कि भागवत जी ने 75 साल की उम्र पूरी होने पर लोगों को साइड हो जाने और दूसरों को मौका देने की बात कही। अब चूँकि पीएम मोदी इस साल 17 सितंबर को 75 साल के हो जाएँगे, तो कॉन्ग्रेस और शिवसेना जैसे विपक्षी दल चिल्ला रहे हैं कि ये बयान मोदी जी को रिटायरमेंट का संदेश है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? आइए, इस पूरे मामले की असलियत को समझते हैं, बिना किसी लाग-लपेट मिलावट के।
सबसे पहले तो जानते हैं कि मोहन भागवत ने क्या कहा और किस संदर्भ में। ये बात 9 जुलाई 2025 को नागपुर में हुई। वहाँ एक किताब का विमोचन था – नाम है ‘मोरोपंत पिंगले: द आर्किटेक्ट ऑफ हिंदू रिसर्जेंस’। ये किताब आरएसएस के दिवंगत नेता मोरोपंत पिंगले पर लिखी गई है, जो राम जन्मभूमि आंदोलन के बड़े प्रेरक थे। कार्यक्रम में भागवत ने पिंगले की विनम्रता, दूरदर्शिता और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान की तारीफ की। उन्होंने एक पुराना किस्सा सुनाया।
मोहन भागवत बोले, “मोरोपंत पिंगले जी 75 साल के हो गए थे। उस वक्त हम सब वृंदावन में एक बैठक में थे। शेषाद्री जी ने कहा कि आज मोरोपंत जी के 75 साल पूरे हुए हैं और उन्हें शॉल पहनाई गई। फिर उनसे बोलने को कहा गया। पिंगले जी ने मजाक में कहा कि मेरी मुश्किल ये है कि मैं खड़ा होता हूँ तो लोग हँसते हैं, बोलता हूँ तो भी हँसते हैं। लगता है लोग मुझे गंभीरता से नहीं लेते। मैं जब मर जाऊँगा, तब लोग पत्थर मारकर चेक करेंगे कि सच में मरा हूँ या नहीं।” फिर पिंगले जी ने आगे कहा, “75 साल पर शॉल पहनाने का मतलब मैं जानता हूँ। इसका अर्थ है कि अब आपकी उम्र हो गई, जरा साइड हो जाओ, हमें करने दो।”
देखिए, ये पूरा बयान मोरोपंत पिंगले की याद में था। मोहन भागवत उन्हें निस्वार्थता की मिसाल बता रहे थे। पिंगले ने कभी अपनी तारीफ नहीं सुनी, हमेशा काम किया। यहाँ तक कि राम जन्मभूमि आंदोलन में उन्होंने अशोक सिंघल को आगे रखा, खुद बैकग्राउंड में रहे। भागवत का मकसद था ये बताना कि सच्चे नेता कैसे होते हैं – जो काम करते हैं, लेकिन सत्ता से चिपकते नहीं। उन्होंने ये भी कहा कि पिंगले उम्र के आखिरी दिनों में भी सक्रिय थे, सलाह देते थे, चिंतन करते थे।
तो बयान का संदर्भ था मोरोपंत पिंगले की जिंदगी और उनकी ह्यूमर वाली बातें, न कि किसी आज के नेता पर तंज। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहर भागवत ने करीब दो घंटे की स्पीच में पिंगले जी की प्रशंसा की, उनकी सादगी को याद किया। ये कोई नई पॉलिसी या संदेश नहीं था, बल्कि एक पुरानी स्टोरी थी, जो हल्के मूड में सुनाई गई।
अब आते हैं विवाद पर। जैसे ही ये बयान वायरल हुआ, विपक्ष ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ दिया। कॉन्ग्रेस के जयराम रमेश ने ट्वीट किया, “बेचारे पुरस्कार विजेता प्रधानमंत्री! घर वापसी पर सरसंघचालक ने याद दिला दिया कि 17 सितंबर 2025 को वे 75 साल के हो जाएँगे। लेकिन पीएम सरसंघचालक से कह सकते हैं कि वे खुद 11 सितंबर को 75 के हो जाएँगे! एक तीर, दो निशाने!”
बेचारे अवार्ड-जीवी प्रधानमंत्री! कैसी घर वापसी है ये- लौटते ही सरसंघचालक के द्वारा याद दिला दिया गया कि 17 सितंबर 2025 को वे 75 साल के हो जाएंगे।
लेकिन प्रधानमंत्री सरसंघचालक से भी कह सकते हैं कि -वे भी तो 11 सितंबर 2025 को 75 के हो जाएंगे!
शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने कहा, “पीएम मोदी ने आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे बड़े नेताओं को जबरन रिटायर कराया। अब देखते हैं, क्या खुद पालन करेंगे?”
ये लोग कह रहे हैं कि आरएसएस नरेंद्र मोदी को रिटायरमेंट का हिंट दे रहा है। सोशल मीडिया पर भी मीम्स और पोस्ट्स की बाढ़ आ गई। एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा, “आरएसएस चीफ का 75 पर रिटायर होने का बयान, क्या मोदी को मैसेज?”
लेकिन असलियत क्या है? ये पूरा विवाद बिना वजह का है। दरअसल, मोहन भागवत का बयान किसी आज के नेता पर नहीं था। ये तो मोरोपंत पिंगले के 75 साल के होने के मौके की पुरानी स्टोरी थी, जो 1980-90 के दशक की है। पिंगले खुद 75 के बाद भी सक्रिय रहे – बाबरी मस्जिद ध्वंस के वक्त उनकी उम्र 74 थी और वे 6 दशक से ज्यादा काम करते रहे।
मोहन भागवत ने स्पीच में जीवनभर सक्रिय रहने का संदेश दिया, न कि रिटायर होने का। उन्होंने कहा कि अगर स्वास्थ्य और दिमाग ठीक है, तो काम जारी रखो। पीएम नरेंद्र मोदी और आरएसएस चीफ मोहन भागवत दोनों का पूरा जीवन सार्वजनिक सेवा को समर्पित है। पीएम मोदी तो 75 की उम्र में भी रैलियाँ करते हैं, अंतरराष्ट्रीय दौरों पर जाते हैं, बैठकें लेते हैं – उनकी एनर्जी युवाओं को मात देती है।
आरएसएस और बीजेपी के इतिहास को देखें तो 75 साल की उम्र पर मार्गदर्शक मंडल में भेजने की परंपरा रही है। जैसे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को 2014-15 में साइड किया गया। लेकिन ये कोई सख्त नियम नहीं है। अमित शाह ने 2023 में कहा था कि बीजेपी के संविधान में रिटायरमेंट क्लॉज नहीं है, मोदी जी 2029 तक लीड करेंगे। राजनाथ सिंह ने भी यही दोहराया। तो ये विपक्ष की राजनीति है – जो चुनाव में पीएम मोदी को हरा नहीं पा रहे, वो ऐसे बयानों से अफवाह फैला रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि भागवत का बयान नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव पर है।
देखिए, समस्या ये है कि आजकल हर बयान को मोदी-बीजेपी से जोड़कर देखा जाता है। भागवत आरएसएस के चीफ हैं, उनका फोकस संगठन और विचारधारा पर है, न कि राजनीतिक सत्ता पर। उन्होंने हमेशा कहा है कि आरएसएस राजनीति से अलग है, लेकिन सहयोग करता है। इस बयान में भी कोई छिपा संदेश नहीं… बल्कि ये तो मोरोपंत पिंगले पर आधारित किताब की लॉन्चिंग पर उनकी यादें थीं। विपक्ष को लगता है कि इससे पीएम मोदी की इमेज खराब होगी, लेकिन जनता समझदार है। पीएम मोदी की लोकप्रियता उनकी मेहनत से है, न कि उम्र से। वे 2014 से अब तक तीन बार पीएम बने और 2024 में भी एनडीए की जीत हुई।
अगर हम गहराई से सोचें, तो 75 साल पर रिटायरमेंट का आईडिया बुरा नहीं है – ये युवाओं को मौका देता है। लेकिन ये हर किसी पर लागू नहीं होना चाहिए। अगर कोई नेता फिट है, अनुभवी है और लोग उसे चाहते हैं, तो क्यों रिटायर कराएँ? अमेरिका में जो बाइडेन 81 साल के हैं, फिर भी प्रेसिडेंट बने रहना चाहते थे। भारत में भी कई नेता 80 पार करके काम करते रहे, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी। लेकिन मोदी जी का केस अलग है – उनकी फिटनेस और वर्क एथिक्स कमाल की है। वे योग करते हैं, लंबे घंटे काम करते हैं। भागवत जी खुद भी 75 होने वाले हैं, लेकिन आरएसएस में सर्संघचालक लाइफटाइम पोस्ट है, उम्र से नहीं हटते।
निष्कर्ष में कहूँ तो ये विवाद विपक्ष की हताशा का नतीजा है। वे मोदी जी को हराने के लिए कुछ भी जोड़-तोड़ करते हैं। असलियत ये है कि भागवत जी का बयान मोरोपंत पिंगले की याद में था, उनकी विनम्रता और सक्रियता पर। ये कोई रिटायरमेंट का फरमान नहीं। दोनों नेता – पीएम मोदी और भागवत जी, खुद तय करेंगे कब क्या करना है। उनका सक्रिय रहना देश के लिए अच्छा है।
विपक्ष को अनर्गल बातें बंद करके असली मुद्दों पर फोकस करना चाहिए, जैसे महँगाई, रोजगार। वहीं, फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को एक ऐसे बैट्समैन की तरह देखें, जो विपक्षियों से आउट ही नहीं हो रहा। ऐसे में वो उनके रिटायर्ड हर्ट की ‘दुआएँ’ माँग रहे हैं, जो ‘वीरता’ नहीं बल्कि ‘कायरता’ है। और कॉन्ग्रेस पार्टी, विपक्षी दल जितनी जल्दी ये कायरता छोड़ देंगे, देश के लिए उतना ही अच्छा होगा।
पंजाब के सीएम भगवंत मान ने पीएम मोदी की विदेश यात्राओं पर बेहद शर्मनाक बयान दिया है। ये बयान पीएम मोदी से ज्यादा देश की विदेश नीति पर है इसलिए विदेश मंत्रालय को भी इस पर संज्ञान लेना पड़ा है। विदेश मंत्रालय ने मान की टिप्पणी को गैर जिम्मेदाराना करार देते हुए कड़ी निंदा की है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का भारत के मित्र देशों के साथ भारत के संबंधों के बारे में की गई टिप्पणियाँ निराशाजनक और गैर जिम्मेदाराना है, ऐसे बयान किसी प्रदेश के मुखिया को शोभा नहीं देती। भारत सरकार ऐसे अनुचित बयानबाजी से खुद को अलग करती है।”
भगवंत मान ने कहा था, “पीएम कहाँ गए हैं? मुझे लगता है कि वह घाना गए हैं। वह वापस आएँगे, उनका स्वागत है। भगवान ही जानें वह किन-किन देशों में जाते रहते हैं, मैग्नेशिया, गैल्विसा, टार्विसिया। 140 करोड़ वाले देश के नेता वहाँ जा रहे हैं जहाँ 10 हजार लोग रहते हैं और वहाँ सर्वोच्च सम्मान पाते हैं। हमारे यहाँ तो 10 हजार लोग जेसीबी देखने इकट्ठा हो जाते हैं।”
भगवंत मान के बयान के बाद विदेश नीति के बारे थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी आश्चर्यचकित रह गया है। क्योंकि अपने बयान से मान ने अपनी ‘समझ’ की पोल खोल दी है। राजनीति में आलोचना विपक्ष करता ही रहता है। लेकिन जब ये टिप्पणी देश की कूटनीति और प्रधानमंत्री के विदेशी यात्राओं से जुड़ी हो, तो ये राजनीति अंदरुनी नहीं आत्मघाती हो जाती है।
पीएम मोदी का दौरा वैश्विक स्थिति, रणनीतिक भागीदार, निवेश की संभावनाओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसी तमाम पहलुओं से जुड़ी होती है। ये भारत के विदेश नीति का चेहरा बनती हैं और इसके दम पर देश की आन बान और शान की रक्षा होती है।
UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन
भारत यूएनएससी में स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान सभी 5 देशों ने भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। इसका काफी महत्व है। ब्राजील में हुई ब्रिक्स सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर भारत को बड़ी सफलता मिली और सदस्य देशों ने यूएनएससी के विस्तार और भारत की दावेदारी का समर्थन किया। इससे पहले क्वार्ड देशों ने भी यूएनएससी विस्तार का समर्थन किया।
पीएम मोदी ने हाल में जिन 5 देशों की यात्राएँ की हैं। उनमें दो दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील, अर्जेंटीना है वहीं तीन अफ्रीकी देश त्रिनिदाद एंड टोबैगो, नामीबिया और घाना है। इन पाँच देशों में से 4 देशों ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा।
पीएम मोदी को मिल चुके हैं 27 देशों के सर्वोच्च सम्मान
अफ्रीकन देश घाना में ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना’ और त्रिनिदाद और टोबैगो में ‘ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया, जहाँ उन्होंने उनकी संसद को संबोधित किया। वे 20 से अधिक वर्षों में इन कैरेबियाई राष्ट्र की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। ये छोटे- छोटे देश ग्लोबल साउथ की रीढ़ हैं। भारत लगातार ग्लोबल साउथ के साथ संबंध मजबूत कर रहा है और इंटरनेशनल मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।
Interacted with MPs from Namibia after my address to their Parliament. Their positivity towards India is clearly visible! pic.twitter.com/Bxa8pR6bey
पीएम मोदी को अब तक 27 देशों ने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है। सिर्फ 2025 में ही अब तक पीएम मोदी को 7 देशों ने सम्मानित किया। 27 देशों में से 8 मुस्लिम देश हैं।
आर्थिक मोर्चे पर चीन से टक्कर के लिए जरूरी
पाँच देशों की यात्रा का महत्व आर्थिक दृष्टि से भी काफी अहम है। घाना, नामीबिया, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना और ब्राज़ील की यात्रा ने दुनिया का ध्यान खींचा। चीन से मुकाबला करने के एक रणनीतिक विकल्प, आतंकवाद के खिलाफ एक ज़िम्मेदार आवाज और ग्लोबल साउथ के एक विकास साझेदार के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करना था।
दरअसल इन देशों का चीन के साथ कई मुद्दों पर मतभेद है। चीन छोटे देशों को आर्थिक गुलाम बनाना चाहता है जबकि भारत इन्हें अहम साझीदार के दौर पर देखता है। इसलिए चीन को संतुलित करने के अपने प्रयासों में एकजुट हैं और इसलिए वे भारत के साथ काम करना चाहते हैं।
नामीबिया के खनिज में भारत का निवेश
प्रधानमंत्री मोदी की सबसे हालिया यात्रा नामीबिया की थी। वह लगभग 30 वर्षों में वहाँ जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे। गौरतलब है कि भारत लाए गए आठ चीते नामीबिया के रेगिस्तान से आए थे। नामीबिया अफ्रीका में एक स्थिर लोकतंत्र है जहाँ प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। रेयर मिनर्ल्स, खनिज, यूरेनियम, कोबाल्ट, लिथियम और समुद्री हीरे शामिल हैं, और ये सभी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए खनन उद्योग में भारतीय कंपनियों ने यहाँ पहले ही 80 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। नामीबिया भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकता है, जिससे चीन पर भारत की निर्भरता कम होगी।
प्रधानमंत्री मोदी की घाना यात्रा पिछले 30 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। साझा लोकतांत्रिक सिद्धांत और आतंकवाद की दोनों देशों को चिंता है। अफ्रीका में सोने का सबसे बड़ा उत्पादक देश घाना है जहाँ लिथियम का भी भंडार है। ऐसे में भारत की इलेक्ट्रिक वाहन की जरूरत यहाँ से पूरी हो सकती है। चीन ने हाल ही में इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।
यूपीआई, रक्षा सहयोग, एआई में भारत करेगा मदद
भारत के यूपीआई को ये देश अपनाने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा भारत ने साइबर सुरक्षा सहायता, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग की दिशा में अहम भागीदार साबित होगा।
प्रधानमंत्री मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा में इतिहास याद आ गई जब गिरमिटिया के रूप भारतीय इस देश का विकास करने गए थे। यही वजह है कि बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय अभी यहाँ रहते हैं।
इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंधों को मजबूती मिली। त्रिनिदाद कैरेबियाई क्षेत्र में UPI लागू करने वाला पहला देश बन गया।
अर्जेंटीना के ऊर्जा से भारत की जरूरत होगी पूरी
अर्जेंटीना की यात्रा का समय इससे बेहतर नहीं हो सकता था। भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ सतत ऊर्जा की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव कर रहा है और यह दक्षिण अमेरिकी देश तांबा और लिथियम जैसे जरूरी खनिजों के लिए मशहूर है। दुनिया में दूसरे सबसे बड़े शेल गैस और चौथे सबसे बड़े शेल तेल भंडारों वाला अर्जेंटीना ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का अहम साझीदार बन सकता है।
महत्वपूर्ण खनिज, यूपीआई का इस्तेमाल, रक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोध, फार्मास्यूटिकल्स और प्रवासी भारतीयों से संपर्क, प्रधानमंत्री मोदी के दोनों महाद्वीपों के दौरे के प्रमुख विषय रहे। इस दौरान मिले राजकीय सम्मान ने वैश्विक मंच पर भारत को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में पेश किया।
मान जी बोलें, लेकिन जरा जुबान संभाल के
प्रधानमंत्री मोदी का राजनयिक दौरा निश्चित रूप से देश को हर मोर्च में मजबूत बनाने वाला रहा। फिर भी, मान की कूटनीतिक नासमझी इसे पहचानने में विफल रही। आम आदमी पार्टी वैसे भी विदेश नीति के मामले में सिफर मानी जाती है। मान ने अपने बयान से इसे सच साबित कर दिया।
अरे भाई…राजनीति करो, लेकिन देश की कूटनीति पर हमला मत करो। तुम जैसे लोग सिर्फ वोट के लिए कुछ भी बोलते हो, लेकिन समझो कि पीएम के दौरे भारत को मजबूत बनाते हैं। अगली बार मुँह खोलने से पहले विदेश नीति पढ़ लो, समझ लो या फिर चुप ही रहो। ऐसे में पंजाब को संभालो, जहाँ किसान परेशान हैं, नशा फैला है, हर तरफ बर्बादी है। क्योंकि वैश्विक कूटनीति तुम्हारे बस की नहीं।